सोमवार, 19 फ़रवरी 2018


स्कूल स्तर से ही पर्यावरण विज्ञान के शिक्षण की जरूरत बढ़ी--
पिछले कुछ वर्षों में हरियाली  क्षेत्र का विस्तार करके बिहार सरकार ने सराहनीय काम किया है।
यह अत्यंत जरूरी काम है।इससे पर्यावरण संतुलन कायम करने और रखने में सुविधा होगी।
 पर रोज-रोज बिगड़ते पर्यावरण संतुलन के बीच स्कूली स्तर से ही  पर्यावरण विज्ञान की अनिवार्य पढ़ाई आज  और भी जरूरी मानी जा रही है। 
बचपन से ही जागरूक बनाया जाए तो आगे चल कर नागरिक  पर्यावरण की रक्षा के प्रति अधिक सचेत रहेंगे।
  इसी को ध्यान में रखते हुए एम.सी.मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में लोक हित याचिका दायर की थी।
उस पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 22 नवंबर, 1991 को केंद्र और राज्य सरकारों को  निदेश दिये थे ।निदेश यह था कि  वे प्राथमिक से लेकर विश्व विद्यालय स्तर तक पर्यावरण विज्ञान की पढ़ाई ‘पृथक और अनिवार्य विषय’ के रूप में कराएं।
पर सरकारों ने इस जरूरी विषय को भूगोल के साथ मिला दिया।
नतीजतन उसका वांछित परिणाम सामने नहीं आ रहा है।
  अब जबकि देश के अधिकतर नगर और महा नगर बिगड़ते पर्यावरण के कारण रहने लायक नहीं रह गए हंै, सरकारों को इस मसले पर  एक बार फिर विचार कर लेना चाहिए।
 कई साल पहले चर्चित खगोल वैज्ञानिक स्टीफन हाॅकिंग ने कहा था कि ‘ यदि मनुष्य को अपने अस्तित्व की रक्षा करनी है तो उसे दूसरे ग्रहों पर भी अपना बसेरा बना लेना चाहिए।’
 उन्होंने इसके जो तीन कारण बताए थे, उनमें एक कारण यह भी है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है।
जाहिर है कि तापमान बढ़ने का एक बड़ा कारण पर्यावरण संतुलन को लेकर अधिकतर लोगों की लापारवाही भी है।विभिन्न देशों की सरकारें भी या तो लापारवाह रही हैं या कम सावधान हैं।
भारत जैसे देश में आम लोगों में लापारवाही का एक बड़ा कारण जागरूकता का भारी अभाव है।
  ऐसी स्थिति में यदि जागरूकता स्कूली स्तर से ही ठीक ढंग से बढ़ाई जाए तो आगे चल कर उसके बेहतर रिजल्ट आ सकते हैं।
पर अब तक सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट के 1991 के निदेशों को नजरअंदाज ही किया है।या फिर अधूरे मन  से उसका पालन किया है।  
यदि सरकार अपने प्रयास से हरित क्षेत्र का विस्तार कर सकती है तो पर्यावरण संतुलन के प्रति नयी पीढ़ी को जागरूक करने का कोई बेहतर उपाय भी कर ही सकती है।  
सन 2000 में राज्य के विभाजन के बाद शेष बिहार में करीब  आठ प्रतिशत वन क्षेत्र रह गया था।अब यह बढ़कर 15 प्रतिशत हो गया है।
राज्य सरकार की कोशिश है कि इसे अगले दो साल में 17 प्रतिशत कर दिया जाए।
 मेडिकल उपकरणों की खरीद--- 
खबर है कि इस देश में चीन निर्मित  मेडिकल उपकरणों की उपलब्धि के बाद अब सरकारी खरीद के काम में लगे अफसरों व आपूत्र्तिकत्र्ताओं की चांदी ही चांदी है।
कुछ जानकार लोग इस बारे में भीतरी सूचनाएं संबंधित लोगों को देते रहते हैं।पर उसका कोई असर नहीं पड़ता।
 कल्पना कीजिए कि सरकार को एक करोड़ रुपए की लागत से किसी विश्वसनीय कंपनी के मेडिकल उपकरण की खरीद करनी  है।
  आपूत्र्तिकत्र्ता वही उपकरण 30 लाख रुपए में चीनी कंपनी से खरीद लेगा।उस उपकरण पर उस विश्वसनीय कंपनी की मुहर लगा देगा।ऐसा उपाय कर देगा कि मशीन ऊपर से देखने पर उसी नामी विश्वसनीय कंपनी का ही दिखे।
 70 लाख रुपए कई लोगों के बीच बंट जाएंगे।
क्या यह खबर सही है ? क्या ऐसी कोई व्यवस्था है कि खरीदी गयी नयी  मशीन के भीतरी हिस्से की प्रामाणिक जांच होती है ? क्या ऐसे महंगे उपकरणों की थर्ड पार्टी जांच की व्यवस्था नहीं हो सकती ? 
     एक भूली -बिसरी याद---- 
    नरेंद्र मोदी की सरकार के गठन के बाद अब तक वोहरा कमेटी की रपट पर कोई चर्चा नहीं सुनी गयी है।यानी लगता है कि रपट सन 1993 से ही केंद्र सरकार की आलमारी में धूल खा रही है।क्या  मोदी सरकार ने उसे देखा है ?
उस रपट में कतिपय सरकारी अफसरों, नेताओं और देश के माफिया गिरोहों के बीच के अपवित्र गठबंधन का जिक्र है।उस गठबंधन को तोड़ने के उपाय भी रपट में सुझाए गये हैं। समिति की सिफारिश आर्थिक क्षेत्र में सक्रिय लाॅबियों, तस्कर गिरोहों ,माफिया तत्वों के साथ कुछ प्रभावशाली नेताओं और अफसरों की बनी आपसी सांठगाठ से संबंधित है।
      काले धन, अपराध, भ्रष्टाचार और देशद्रोह के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए इस रपट से खास रोशनी  मिलती है।
   पांच दिसंबर, 1993 को तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव  एन.एन.वोहरा द्वारा सरकार को पेश  रपट में  कहा गया है कि ‘ इस देश में अपराधी गिरोहों ,हथियारबंद सेनाओं, नशीली दवाओं का व्यापार करने वाले माफिया गिरोहों,तस्कर गिरोहों,आर्थिक क्षेत्रों में सक्रिय लाॅबियों का तेजी से प्रसार हुआ है।इन लोगों ने विगत कुछ वर्षों के दौरान स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों,सरकारी पदों पर आसीन लोगों , राज नेताओं,मीडिया से जुड़े व्यक्तियों तथा गैर सरकारी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों के साथ व्यापक संपर्क विकसित किये हैं।इनमें से कुछ सिंडिकेटों की विदेशी आसूचना एजेंसियों के साथ- साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय सबंध भी हैं।’
    वोहरा रपट में यह भी कहा गया है कि इस देश के कुछ बड़े प्रदेशों  में इन गिरोहों को स्थानीय स्तर पर  राजनीतिक दलों के नेताओं और सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों का संरक्षण हासिल है। समिति ने  यह भी कह दिया  
था कि ‘तस्करों के बड़े -बड़े सिंडिकेट देश के भीतर छा गये हैं और उन्होंने हवाला लेन-देनों , काला धन के परिसंचरण सहित विभिन्न आर्थिक कार्यकलापों को प्रदूषित कर दिया है।
  ं यह भी कहा गया था कि ‘कुछ माफिया तत्व नारकोटिक्स,ड्रग्स और हथियारों की तस्करी में संलिप्त हैं ।चुनाव लड़ने जैसे कार्यों में खर्च की जाने वाली राशि के मददेनजर राजनेता भी इन तत्वों के चंगुल में आ गये हैं।वोहरा समिति की बैठक में आई.बी.के निदेशक ने साफ- साफ कहा था कि ‘माफिया तंत्र ने वास्तव में एक समानांतर सरकार चला कर राज्य तंत्र को एक विसंगति में धकेल दिया है।’
  क्या मोदी सरकार ने इस बात का आकलन किया है कि इन मामलों में 1993 और 2018 में ंकितना फर्क आया है ?उस रपट पर अब भी कार्रवाई करने की जरूरत है भी या नहीं ? 
      और अंत में-----
 पठन -पाठन का  माहौल बनाने के लिए भाजपा ने अपने हर राज्य शाखा कार्यालय में अच्छी   लाइब्रेरी स्थापित करने का निर्णय किया है। पार्टी कार्यकत्र्ताओं को बौद्धिक तर्कों से लैस करने के लिए अब तक छह राज्यों में यह काम पूरा हो चुका है।अभी बिहार बाकी है।केंद्रीय भाजपा आफिस में  पुस्तकालय की स्थापना तो 2016 में ही हो चुकी थी।अन्य दल चाहें तो भाजपा के इस कदम से कुछ सबक ले सकते हैं।
@16 फरवरी 2018 को प्रभात खबर -बिहार-में प्रकाशित मेरे कानोंकान काॅलम से@ 

  

कोई टिप्पणी नहीं: