<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683</id><updated>2012-01-03T11:43:14.431+05:30</updated><category term='पुनरावलोकन'/><category term='राजनय'/><category term='पटना डायरी'/><category term='विश्लेषण'/><category term='Vishleshan'/><category term='कानोंकान'/><category term='Interview Surendra kishore'/><category term='संस्मरण'/><category term='परचून'/><category term='भूले बिसरे'/><title type='text'>surendra kishore</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>120</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-10487555716091981</id><published>2011-12-16T13:02:00.002+05:30</published><updated>2011-12-16T13:08:25.696+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्लेषण'/><title type='text'>आंदोलन के प्रति इंदिरा से अधिक लचीला है मनमोहन सरकार</title><content type='html'>सन् 1974-75 में इंदिरा गांधी की सरकार को जय प्रकाश आंदोलन से मुकाबला करना पड़ा था। आज अन्ना हजारे के नेतृत्व में जारी आंदोलन का मुकाबला मनमोहन सरकार कर रही है। दोनों आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ&lt;br /&gt;रहे। पर, दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण फर्क सामने आया है। इंदिरा गांधी का जेपी के प्रति रुख अत्यंत कड़ा था। जबकि जेपी की मुख्य मांग यह थी कि बिहार विधान सभा को भंग कर दिया जाए। हालांकि उनकी अन्य कई मांगें भी थीं। पर इंदिरा जी बिहार विधानसभा को भंग करने को कतई तैयार नहीं थीं। जबकि उन्हीं दिनों वह संगठन कांग्रेस के नेता मोरारजी देसाई के अनशन के कारण गुजरात की विधानसभा का नया चुनाव कराने पर तैयार हो  गई थीं। बाद में वहां बाबू भाई पटेल के नेतृत्व में संगठन कांग्रेस की सरकार भी बन गई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  पर जेपी की मांग पर इंदिराजी ने कहा कि चुनी हुई विधानसभा को किसी के कहने पर भंग नहीं किया जा सकता। इसी पर बात बिगड़ गई और और उसका नतीजा इंदिरा गांधी के लिए बुरा हुआ। उन्हें सन 1977 में भारी चुनावी हार का सामना करना पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   इसके विपरीत आज ना- ना कहते हुए भी मनमोहन सरकार अन्ना हजारे की मांगों के प्रति लचीलापन दिखा रही है। मनमोहन सरकार के लोग और कांग्रेस पार्टी तथा यू.पी.ए. के नेतागण बार- बार यह कहते रहे हैं कि वे अन्ना यानी संसद के बाहर के किसी व्यक्ति के दबाव में आकर कुछ नहीं कर रहे हैं। पर रोज -रोज अपना पक्ष बदलती केंद्र सरकार अन्ना आंदोलन से घबराई हुई जरूर लग रही है। यह घबराहट अन्ना टीम को मिल रहे जन समर्थन के कारण ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  लोकपाल विधेयक सन 1968 से लंबित है। इस बार यह विधेयक  लाया भी  जा रहा है तो अन्ना के दबाव के कारण ही। हाल में केंद्रीय कैबिनेट ने जिन चार विधेयकों के प्रारूप को अपनी स्वीकृति दी, वे भ्रष्टाचार से निपटने वाले विधेयक ही हैं। यह और बात हैं कि वे कितने कारगर हैं और अन्ना टीम को वे पसंद हैं या नहीं। पर अन्ना आंदोलन से पहले तो मनमोहन सरकार ऐसे कानूनों के प्रति तनिक भी उत्साही नहीं थी। निष्पक्ष राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार भी आंदोलन के दबाव में ही यह सब हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन 1974-75 का जेपी आंदोलन आज के अन्ना के आंदोलन की अपेक्षा  व्यापक और अधिक नैतिक धाक वाला आंदोलन था। जेपी को भी आंदोलन के बल पर सत्ता नहीं आना था। उस आंदोलन की नैतिक धाक इसलिए भी थी। तब के गैर कांगेसी दल जेपी के प्रति नतमस्तक भी थे। आजादी की लड़ाई के महान योद्धा होने का लाभ जेपी को मिला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   जेपी की मांगें भी निर्दोष थीं। पर इंदिरा गांधी ने तब यह सोचा कि वह अपनी पुरानी लोकप्रियता व सत्ता की ताकत के बल पर जेपी आंदोलन को दबा देंगीं। याद रहे कि गरीबी हटाओ के नारे के कारण लोकप्रिय बनीं इंदिरा गांधी सन 1971 के लोकसभा चुनाव में बड़े बहुमत से सत्ता में आई थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  उन्हें इस बात का पता नहीं चल सका कि जेपी के आंदोलन का असर कितना व्यापक हो चुका है और उनकी लोकप्रियता कम हो रही है। इंदिरा जी का इतना शासकीय आतंक था कि खुफिया एजेंसियां भी उन तक सही खबरें पहुंचाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थीं। यहां तक कि 1977 के लोकसभा चुनाव की घोषणा के पहले और बाद में भी खुफिया एजेंसी ने इंदिरा जी को यही सूचना दी थी कि वह चुनाव जीत जाएंगीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     कहा जाता है कि उन्हें इस बात की सही खबर होती कि आगे क्या होने वाला है तो वह न तो आपातकाल लगातीं और न ही जेपी की मांग को ठुकरातीं। बिहार विधानसभा भंग करने की जेपी की मांग वह उसी तरह मान लेतीं जिस तरह उन्होंने मोरारजी की मांग मान ली थी। तब संभवतः जेपी के आंदोलन का असर  बिहार तक ही सिमट कर रह जाता। पर तब इंदिरा गांधी के हठीले रुख का उन्हें ही अधिक खामियाजा भुगतना पड़ा था। हालांकि उन लोगों को भी भुगतना पड़ा जिन लोगों ने आपातकाल की अभूतपूर्व विपदा जेल के बाहर व भीतर झेली। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज यह बात सही है कि मनमोहन सरकार कमजोर है। साझे की सरकार है। सही दिशा देने वाला कोई केंद्रीय नेतृत्व उपलब्ध नहीं है। पर उसे लगता है कि प्रमुख गैर कांग्रेसी दलों के अन्ना टीम से मिल जाने के बाद केंद्र सरकार खतरे में आ गई है यदि अगले चुनाव को ध्यान में रखा जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   सिटीजन चार्टर विधेयक जैसे कानून की कैबिनेट द्वारा मंजूरी उसी आंदोलन के दबाव में उठाया गया कदम लगता है। इसे मनमोहन सरकार का लचीलापन ही कहा जा सकता है। यह और बात है कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित ऐसे भ्रष्टाचार विरोधी विधेयकों  के प्रारूप से टीम अन्ना या फिर प्रतिपक्ष संतुष्ट होगा या नहीं। प्रतिपक्ष की संतुष्टि इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यू.पी.ए. के पास राज्यसभा में अपना बहुमत नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संसदीय समिति द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के मसविदे पर टीम अन्ना की विपरीत टिप्पणी आ चुकी है। पर केंद्र सरकार उस प्रस्ताव में भरसक संशोधन करने का मन बना रही है तो यह उसका लचीलापन ही है। यह और बात है कि सरकार के लोकपाल विेधेयक में संशेाधन के बाद भी टीम अन्ना व प्रतिपक्ष उससे संतुष्ट होगा भी या नहीं ? यह बाद में पता चलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  पर यहां तो सन 1974 की अपेक्षा आज की केंद्र सरकार व कांग्रेस के लचीलेपन की बात की जा रही है। यह लचीलापन भले मजबूरी में है, पर स्वागतयोग्य है। लोकतंत्र में तंत्र लोक का ध्यान रखते हुए ही कानून बनाए और फैसले करे तो उसे 1977 की तरह जनता के गुस्से का सामना नहीं करना पड़ेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   दूसरी ओर अन्ना टीम द्वारा प्रस्तावित जन लोकपाल विधेयक को हू ब हू मानने की जिद होती है तो उससे शायद कोई सर्वसम्मत विधेयक पास नहीं हो पाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  यह एक अच्छी राय है कि अभी अन्ना टीम एक लचीली सरकार से जितना अधिक कठोर लोकपाल कानून पास करवा पाती है, वह करवा ले। और बाद में जरूरत पड़ने पर उसमें जरूरी संशोधन के लिए लड़े। क्योंकि प्रतिपक्ष भी अन्ना टीम के जन लोकपाल विधेयक के प्रारूप के सभी प्रावधानों से सहमत नहीं है। वैसे भी मौजूदा लोकसभा की बनावट भी कुछ ऐसी है कि उससे हू ब हू जन लोकपाल विधेयक पास करवाना शायद संभव नहीं होगा। पर जो भी यदि एक बेहतर लोकपाल विधेयक पास होगा, तो उसका श्रेय टीम अन्ना को ही तो मिलेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-10487555716091981?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/10487555716091981/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=10487555716091981&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/10487555716091981'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/10487555716091981'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='आंदोलन के प्रति इंदिरा से अधिक लचीला है मनमोहन सरकार'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-2014905650196362455</id><published>2011-09-22T02:07:00.002+05:30</published><updated>2011-09-22T02:12:25.634+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कानोंकान'/><title type='text'>बिहार लोकायुक्त बिल</title><content type='html'>मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने टीम अन्ना से कहा है कि वह बिहार लोकायुक्त विधेयक का मसविदा तैयार करे। अन्ना टीम की ओर से यह काम संतोष हेगड़े करेंगे। संतोष हेगड़े कर्नाटक के लोकायुक्त और सुप्रीम कोर्ट के जज रह चुके हैं।&lt;br /&gt;यही बात नीतीश कुमार को अन्य अनेक नेताओं से अलग करती है। याद रहे कि कर्नाटक के लोकायुक्त के रूप में हेगड़े ने भाजपाई मुख्यमंत्री येदुरप्पा की कुर्सी ले ली। पर जिसे कोई घोटाला नहीं करना है, उसे कड़े से कड़ा लोकायुक्त या फिर लोकपाल से क्यों डरना ? सूत्रों के अनुसार मुख्य मंत्री नीतीश कुमार यह भी चाहते हैं कि बिहार का लोकायुक्त विधेयक उस जन लोकपाल विधेयक से भी अधिक कड़ा और कारगर हो जिसको पारित कराने के लिए टीम अन्ना इन दिनों आंदोलित है।&lt;br /&gt;दूसरी ओर लालू प्रसाद और राम विलास पासवान जैसे कुछ नेतागण टीम अन्ना पर रोज -रोज बरस रहे हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार इस तरह लालू-पासवान द्वय खुद ही अपने राजनीतिक पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। पर लगता है कि किसी कारणवश बेचारे ये नेताद्वय ऐसा ही करने को लाचार हैं !&lt;br /&gt;याद रहे कि सामान्य राजनीतिक ज्ञान वाला कोई व्यक्ति भी आसानी से यह देख सकता है कि आज देश में 1967, 1977 और 1989 से भी अधिक केंद्र की सत्ता और देश भर में फैले भ्रष्टाचार के विरोध में हवा है।&lt;br /&gt;जदयू के एक नेता ने इन पंक्तियों के लेखक से हाल में कहा कि हमें तो आशंका थी कि कहीं राम विलास पासवान अन्ना की टीम में शामिल न हो जाएं। उससे हमें बिहार में थोड़ी कठिनाई होती। पर भगवान ने बिहारहित में पासवान की बुद्धि को अन्ना के विरोध में ही जाने दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;जनमत संग्रह शुरू&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;अन्ना आंदोलन की पृष्ठभूमि में जनमत संग्रह शुरू हो चुके हैं। उनके नतीजों पर नेताओं और विश्लेषणकर्त्ताओं की टिप्पणियां भी सामने आने लगी हैं।&lt;br /&gt;एक एजेंसी ने दिल्ली और दूसरी एजेंसी ने हाल में देश के 28 नगरों में जनमत संग्रह किया। एक एजेंसी के अनुसार टीम अन्ना को दिल्ली में भारी जन समर्थन मिल रहा है। दूसरी एजेंसी के अनुसार भाजपा को 28 नगरों में बढ़त मिल रही है। कांग्रेस पीछे चली गई है। 32 प्रतिशत लोग भाजपा को और 20 प्रतिशत कांग्रेस को पसंद कर रहे हैं। यानी अन्ना के आंदोलन का लाभ राजग को मिल रहा है।&lt;br /&gt;ऐसे सर्वेक्षणों पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं अब तक आती रही है, वैसी ही प्रतिक्रियाएं इस बार भी आने लगी हैं। जनमत संग्रह के नतीजे के अनुसार जो दल हारता होता है, उसके नेता हर बार यह कह देते हैं कि यह सर्वे फर्जी है। या फिर चुनाव आने तक स्थिति बदल जाएगी। जिसके पक्ष में जीत नजर आती है, वह कहता है कि हमारी स्थिति अभी और भी सुधरेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;कैसे-कैसे टिप्पणीकार !&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और उनके नतीजों को लेकर टिप्पणियां करने वालों का पुराना रिकार्ड देखा जाना चाहिए। यदि उन में से किसी ने गत तीन चुनावों की लगातार गलत भविष्यवाणियां ही की हांे तो उनको एक बार फिर यह काम नहीं दिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;ताजा जनमत संग्रह पर जिन नेताओं और विश्लेषणकर्त्ताओं के विचार इस बार आये हैं, उनके पिछले चुनावों के समय क्या विचार थे, यह बात जनता को एक बार फिर मालूम हो जाना चाहिए। यदि पिछली बार भी वे गलत ही साबित हुए थे तो जनता को उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। यदि बात उल्टी हो तो उन्हें जरूर गंभीरता से लिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;यदि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले उनकी टिप्पणियों की पुरानी क्लिपिंग एक बार फिर दिखा सकें तो आम लोगों को उन टिप्पणीकारों व दलों के बारे में अपनी राय बनाने में काफी सुविधा होे जाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;अगला राजनीतिक दृश्य&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;यदि इस बीच कोई अनहोनी नहीं हो गई तो लगता है कि लोकसभा का चुनाव 2014 में तय समय पर ही होगा। ताजा इतिहास बताता हैं कि कांग्रेस में येन-केण प्रकारेण गद्दी पर बने रहने की अद्भुत क्षमता है।&lt;br /&gt;यह भी आशंका है कि इस बीच टीम अन्ना को पूरी तरह संतुष्ट करने लायक कोई लोकपाल विधेयक पास करने की स्थिति में कांग्रेस नहीं ही होगी। यानी अगले चुनाव तक अन्ना का आंदोलन चलता रहेगा। स्वामी राम देव भी आंदोलन में एक बार फिर मजबूती से कूदने ही वाले हैं। बाबा राम देव के साथ एक बड़ी संगठित जमात भी है। यानी देश गरमाता रहेगा। इसका लाभ एन.डी.ए. को अगले चुनाव में मिल सकता है।&lt;br /&gt;पर दिक्कत यह है कि एन.डी.ए. में भी ऐसे-ऐसे नेताओं की कोई कमी नहीं है जो थोड़े-बहुत व मध्यम दर्जे के घोटाले के भीतर ही भीतर पक्षधर रहे हैं भले सार्वजनिक रूप से वे ऐसा नहीं कहें। वैसे लोगों की आदत ही ऐसी बन चुकी है। हालांकि राजग की कुल मिलकार कांग्रेस की अपेक्षा भ्रष्टाचार के मामले में अब भी बेहतर स्थिति है।&lt;br /&gt;इसलिए यदि अन्ना को अपने त्याग-तपस्या-संघर्ष का लाभ एन.डी.ए.को ही अंततः पहुंचाना है तो अन्ना को राजग के सामने अभी से ही एक शर्त रखनी चाहिए। वह यह कि आप अपने बीच के भ्रष्ट और अपराधी तत्वों को टिकट कतई नहीं दोगे और परिवारवाद से दूर रहोगे, तभी हमारा समर्थन चुनाव में पाओगे। अगले साल होने वाले यू.पी. के चुनाव में राजग की इस मामले में परीक्षा ले ली जा सकती है। साथ ही अन्ना टीम राजग से यह भी कहे कि आप अपनी पिछली गलतियों के लिए देश से माफी भी मांगिए। यदि यू.पी. के विधान सभा चुनाव में फिर भी राजग कुछ अपराधी और भ्रष्ट उम्मीदवारों को टिकट देता है तो अन्ना टीम को वहां अपने समानांतर उम्मीदवार खड़ा कराने चाहिए अन्यथा जनता की उम्मीदें अन्ना टीम से भी टूटेगी। समानांतर उम्मीदवार के बाद तो राजग अन्ना के यश का लाभ नहीं उठा पाएगा। वैसे भी यदि कांग्रेस सरकार ने अन्ना टीम को सताना जारी रखा तो अन्ना के नेतृत्व में भी नेताओं की नई संघर्षशील व ईमानदार जमात देश भर में उभर जाएगी। जिस तरह जेपी आंदोलन मंे नया नेतृत्व उभरा था। उनमें कई लोगों को जेपी ने भी 1977 में जनता पार्टी का उम्मीदवार बनवाया था। हालांकि उनमें से अधिकतर जेपी की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;काम नहीं आएंगे गंदे खेल&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;1996 में चारा घोटाले की जब जांच शुरू हुई थी तो बिहार की विधायिका ने सी.बी.आई. के अफसर यू.एन. विश्वास को विशेषाधिकार हनन का नाटिस दे दिया था। विश्वास को माफी मांगने पर मजबूर कर दिया गया था। इतना ही नहीं, विधान परिषद में सी. ए.जी. और पटना हाईकोर्ट पर विशेष चर्चा करवा कर उनको क्या -क्या नहीं कहा गया। यानी इन संस्थाओं की अभूतपूर्व आलोचनाएं की गईं।&lt;br /&gt;जांच कर्ताओं, कुछ नेताओं और पत्रकारों को तथा कुछ अन्य लोगों को भी घोटालेबाजों की ओर से धमकियां दी गई। और न क्या -क्या नहीं किया गया ? पर क्या इन तरीकों के जरिए आरोपितगण जेल जाने और मुकदमे का सामना करने से बच पाये ? अन्ना टीम को प्रताड़ित करने से पहले केंद्र सरकार को चाहिए था कि वह बिहार की उन घटनाओं से सबक ले लेती।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;और अंत में&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह कहा करते थे कि एक ग्रामीण चौकीदार का व्यवहार लोगों के साथ कैसा होता है, उसी को देख कर सरकार की छवि का पता चल जाता है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-2014905650196362455?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/2014905650196362455/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=2014905650196362455&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/2014905650196362455'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/2014905650196362455'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2011/09/blog-post_22.html' title='बिहार लोकायुक्त बिल'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-2967716752505601510</id><published>2011-09-15T18:21:00.002+05:30</published><updated>2011-09-15T18:28:49.948+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्लेषण'/><title type='text'>दागी अफसरों को सजा दिलाने में केंद्र की दिलचस्पी नहीं</title><content type='html'>बिहार सरकार ने भ्रष्टाचार के मुकदमे का सामना कर रहे आई.ए.एस. अफसर एस.एस. वर्मा के आलिशान मकान को तो जब्त कर लिया, पर उस अफसर के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति केंद्र सरकार नहीं दे रही है। नतीजतन अभियोजन पक्ष शिव शंकर वर्मा के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र नहीं दाखिल कर पा रहा है। वर्मा के अलावा भी बिहार के दो अन्य आई.ए.एस. अफसरों के खिलाफ भी मुकदमा चलाने की अनुमति केंद्र से बिहार को नहीं मिल पा रही है जबकि इसके लिए बिहार सरकार ने कई बार केंद्र को पत्र लिखे हैं। एक अन्य खबर के अनुसार केंद्रीय सेवाओं की प्रथम श्रेणी के अफसरों से संबंधित ऐसे करीब तीन सौ मामले प्रधानमंत्री सचिवालय में लंबे समय से लंबित है। ऐसा अन्ना आंदोलन के दौर में भी हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1981 बैच के आई.ए.एस. अफसर शिव शंकर वर्मा बिहार सरकार में लघु सिंचाई सचिव थे। उन पर अवैध संपत्ति बनाने का आरोप है। बिहार सरकार की विशेष निगरानी इकाई ने 6 जुलाई, 2007 को वर्मा के आवास पर छापा मार कर करीब एक करोड़ पचास लाख रुपये की अवैध संपत्ति के सबूत इकट्ठे किये थे। बिहार विशेष अदालत कानून, 2010 के तहत वर्मा के खिलाफ विशेष अदालत में मुकदमा चल रहा है। विशेष अदालत ने 17 मार्च 2011 को वर्मा की संपत्ति जब्त करने का आदेश दिया। वर्मा ने अदालत से गुजारिश की थी कि पटना स्थित उस मकान को उन्हें ही किराए पर दे दिया जाए जिसे अदालत ने नामंजूर कर दिया। जब्त मकान की बाजार कीमत करीब पांच करोड़ रुपये बताई जा रही है।&lt;br /&gt;एक अफसर इतने आलीशन मकान को भी किराए पर लेने को तैयार है। यह भी आश्चर्य की बात है। इससे उसकी अमीरी का पता चलता है। याद रहे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि ऐसे जब्त मकानों में बच्चों के सरकारी स्कूल खाले जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर ऐसे अफसरों को भी सजा दिलाने में केंद्र सरकार की अरूचि आश्चर्यजनक है। इतना ही नहीं, बिहार सरकार ने जब 2009 में बिहार विशेष अदालत अधिनियम, 2009 विधायिका से पास करवाकर केंद्र को भेजा तो उस पर भी राष्ट्रपति की मुहर दिलवाने में केंद्र सरकार ने एक साल लगा दिये। याद रहे कि उस कानून में मुकदमे की सुनवाई के दौरान भी आरोपित की अवैध संपत्ति को जब्त करने का आदश देने का कोर्ट को अधिकार मिल गया है। यह देश में अपने ढंग का नया व कारगर कानून है। हाल में केंद्र सरकार ने यह जरूर कहा है कि इस मामले में वह भी बिहार जैसा कानून बनवाना चाहती है। पर वर्मा पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देने के काम से लगता है कि केंद्र सरकार का वायदा खोखला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच बिहार सरकार ने प्रथम श्रेणी के कई अन्य अफसरों के खिलाफ भी ऐसे ही मुकदमे विशेष अदालतों में दायर कर रखे हैं। ऐसे छह स्पेशल कोर्ट में बिहार में काम कर रहे हैं। उनकी अवैध संपत्ति जब्त करने की कोर्ट से अभियोजन पक्ष ने गुजारिश भी की है। इस पर कोर्ट का फैसला आने ही वाला है। पर फिर सवाल उठेगा कि क्या केंद्र सरकार उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर करने की अनुमति देगी ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण यह रहा है कि यहां के सरकारी पैसों में से अधिकंाश बिचौलिये खा जाते हैं। भ्रष्टाचार के आरोप में यहां दो -दो पूर्व मुख्यमंत्री और आधा दर्जन आई.ए.एस. अफसर जेल की हवा खा चुके हैं। पिछले बीस साल में कई मंत्रियों व विधायकों को भी जेल जाना पड़ा। पर यह बात महसूस की गई कि जेल गये आरोपित अपनी अकूत संपत्ति त्त के जरिए मुकदमे की गर्मी भी कई बार सह जाते हैं। वे महंगे वकील रखकर तथ्यों को तोड़ मरोड़ करके और अदालत के सामने गलत तथ्य पेश करके केस में अपने पक्ष में कई बार जजमंेट दिलवा देते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए हाल में नीतीश सरकार ने यह महसूस किया कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही उनकी अवैध संपत्ति जब्त कर ली जाए तो आरोपित गण कई मामलों में अपनी उस अपार संपत्ति का बेजा फायदा मुकदमा जीतने के लिए नहीं उठा पाएंगे। इसलिए बिहार विशेष अदालत कानून बना। केंद्र सरकार ऐसे मामलों में अभियोजन की समय पर अनुमति देकर ही गरीबों के धन को लूटने वालों को सजा दिलवा सकती है। क्या अन्ना आंदोलन के सघन होते जाने के बावजूद केंद्र सरकार एस.एस. वर्मा जैसे अफसरों का परोक्ष रूप से बचाव करती रहेगी? बिहार में कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-2967716752505601510?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/2967716752505601510/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=2967716752505601510&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/2967716752505601510'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/2967716752505601510'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2011/09/blog-post_15.html' title='दागी अफसरों को सजा दिलाने में केंद्र की दिलचस्पी नहीं'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-4031554574707288821</id><published>2011-09-10T02:30:00.005+05:30</published><updated>2011-09-11T02:04:51.810+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भूले बिसरे'/><title type='text'>उपाधियों के खिलाफ थी संविधान सभा</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-Y4y47RDIneQ/Tmp_MCjU_nI/AAAAAAAAAGE/gn_xZpBTh08/s1600/bharat+ratna.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5650468527309913714" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 183px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-Y4y47RDIneQ/Tmp_MCjU_nI/AAAAAAAAAGE/gn_xZpBTh08/s200/bharat%2Bratna.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;भारतीय संविधान सभा ने 30 अप्रैल 1947 को यह प्रस्ताव स्वीकार किया था कि ‘यूनियन द्वारा कोई उपाधि नहीं दी जाएगी। यूनियन का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। राज्य के अधीन किसी लाभप्रद या विश्वसनीय पद पर काम करने वाला कोई व्यक्ति बिना सरकार के सहमत हुए किसी विदेशी राज्य से किसी प्रकार का कोई उपहार, वेतन, पद या उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। ’यह प्रस्ताव सरदार बल्लभ भाई पटेल ने रखा था।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;पर, आज जो हमारा संविधान उपलब्ध है, उसमें उपाधियों से संबंंिधत अनुच्छेद -18 में लिखा हुआ है कि ‘सेना या विद्या संबंधित सम्मान के सिवाय और कोई उपाधि राज्य प्रदान नहीं करेगा। भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा।’&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;यानी समय के साथ हमने कुछ संशोधनों के साथ उपाधियों का तो खात्मा कर दिया, पर अलंकरणों की परंपरा जरूर शुरू कर दीं। उपाधियां और अलंकरण एक जैसे ही लगते हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;वे अलंकरण हैं भारत रत्न और पद्म पुरस्कार। बगल के देश पाकिस्तान में निशान-ए-पाकिस्तान वहां का सबसे बड़ा नागरिक अलंकरण है। वह हमारे देश के मोरारजी देसाई और दिलीप कुमार को भी मिला। हमने भारत रत्न मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व पाकिस्तान के नागरिक खान अब्दुल गफार खान को भी दिया। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अंग्रेज शासक नाइटहुड, राय बहादुर और खान बहादुर जैसी उपाधियां देते थे। अब पद्म विभूषण और पद्म भूषण जैसे अलंकरण हैं। अंग्रेज आम तौर पर अपने समर्थकों को उपाधियां देते थे। भारत की सरकारें भी आम तौर पर अपनी ही विचारधारा के लोगों को अलंकृत करती हैं। अपवादों की बात और है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;संविधान सभा में श्रीप्रकाश ने कहा था कि यदि जनता किसी नेता को सम्मानित करना चाहती है तो वह कर सकती है। लेकिन हम इस घातक दुराचार उत्पन्न करने वाली प्रथा को मिटाना चाहते हैं जो व्यक्तियों को विवश करती है कि किसी सम्मान विशेष की प्राप्ति के लिए अधिकारियों से अनुग्रह भिक्षा मांगता फिरे।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आजादी के करीब 64 साल बाद इन दिनों पद्म पुरस्कारों की क्या स्थिति है? अपवादों को छोड़कर ये पुरस्कार आये दिन विवादों में रहते हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;कानूनन मनाही के बावजूद कई पुरस्कृत महानुभाव इन पुरस्कारों को अपने लेटर हेड, विजिटिंग कार्ड और नेम प्लेट में लिख लेते हैं। इन पुरस्कारों के लिए नामों के चयन में कई बार प्रतिभा, योग्यता, क्षमता और देश सेवा से इतर कारण होते हैं। कई बार लेन-देन की भी बातें सुनी जाती हैं। मोरारजी देसाई की सरकार ने 1977 में इन पुरस्कारों व अलंकरणों को बंद कर दिया था। पर बाद में इंदिरा जी के शासनकाल में दुबारा शुरू कर दिया गया।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;संविधान सभा में सेठ गोविंद दास ने कहा था कि फ्रांस की क्रांति और रूस की क्रांति के बाद वहां पर जितनी उपाधियां थीं, वे तमाम वापस ले ली र्गइं। मैं सरदार जी से पूछना चाहता हूं कि क्या वे गुलामी के तमगों से लोगों का उद्धार नहीं करना चाहते ? मैं चाहता हूं कि जो भी उपाधि उनके पास हैं, वह भी वापस ले ली जाएं। इस समय के उपाधिधारी भी स्वतंत्र भारत में उसी प्रकार के व्यक्तियों की तरह रह सकेंगे जिस तरह अन्य व्यक्ति रहेंगे।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दरअसल सरकार के पक्ष में कोई विशेष काम कर देने के लिए या करने की उम्मीद में या फिर अपनी सल्तनत को मजबूती प्रदान करने के लिए अंग्रेज शासक कतिपय गणमान्य लोगों को राय बहादुर -खान बहादुर या फिर इस तरह की अन्य उपाधियां देते थे। भारतीय संविधान सभा के अधिकतर सदस्यों ने ऐसी उपाधियों के खिलाफ सख्त टिप्पणियां की थीं। सब तो नहीं, पर संभवतः अधिकतर ऐसे उपाधिधारकों ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों का ही साथ दिया था।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;यहां भी फणीश्वर नाथ रेणु का उदाहरण है जिन्होंने जेपी पर पुलिस लाठी प्रहार के खिलाफ 1974 में पद्मश्री का अलंकरण लौटा दिया था। उससे पहले जालियांवाला बाग नरसंहार के खिलाफ कवि गुरू रवींद्र नाथ टैगोर ने नाइटहुड की उपाधि लौटा दी थी जो उन्हें 1915 में मिली थी।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;साथ ही, यह बात भी देखी गई कि अधिकतर लोगों ने नहीं लौटाई। न ही वे इतिहास के नाजुक मौकों पर स्वतंत्र चेतना के साथ कदम उठा पाए।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;संविधान सभा के सदस्य इस बात से अवगत थे। इसीलिए वे आजाद भारत में ऐसे नागरिक चाहते थे जो किसी उपाधि के दबाव में आकर निर्णय नहीं करे। पर आज क्या हो रहा है? अनेक क्षेत्रों में जो गिरावटें बढ़ती जा रही हैं, उससे हमारे संविधान निर्माता परलोक में अपने सिर धुन रहे होंगे।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;संविधान सभा में एम.आर. मसानी ने ठीक ही कहा था कि केवल पराधीन देशों में ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र कहे जाने वाले देशों में भी यह देखा गया है कि लेने वालों और देने वालों के लिए भी उपाधियां खतरनाक और दुराचरण का कारण बन जाती हैं। इसलिए देश भक्ति, आत्म सम्मान और सेवा भावना पर विश्वास रखते हुए बिना किसी प्रकार की उपाधियों के हम अपने काम करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;संबंधित प्रस्ताव पेश करते हुए सरदार पटेल ने कहा था कि विभिन्न कमेटियों में विचार विमर्श के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यूनियन द्वारा कोई उपाधि नहीं दी जाएगी। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-4031554574707288821?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/4031554574707288821/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=4031554574707288821&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/4031554574707288821'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/4031554574707288821'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2011/09/blog-post_10.html' title='उपाधियों के खिलाफ थी संविधान सभा'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-Y4y47RDIneQ/Tmp_MCjU_nI/AAAAAAAAAGE/gn_xZpBTh08/s72-c/bharat%2Bratna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-9162435205999097343</id><published>2011-09-07T15:47:00.002+05:30</published><updated>2011-09-07T16:21:45.703+05:30</updated><title type='text'>एक वह भी जमाना था, एक यह भी जमाना है</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-oByI1jwjJh8/TmdMrTtbnHI/AAAAAAAAAF8/fGAQGpmh87c/s1600/jp%2Bnarayan.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 133px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-oByI1jwjJh8/TmdMrTtbnHI/AAAAAAAAAF8/fGAQGpmh87c/s200/jp%2Bnarayan.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5649568564468489330" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;बिहार में 18 मार्च 1974 को छात्रों और युवकों के नेतृत्व में एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ था। आंदोलन भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और गलत शिक्षा नीति के खिलाफ था। आंदोलन का नेेतृत्व बाद में जेपी ने संभाल लिया था। क्योंकि 18 मार्च को हुए ‘विधानसभा मार्च’ के दौरान हिंसा हो गई थी। जेपी तब तक आंदोलन से जुड़े नहीं थे। इस हिंसा पर जेपी ने बयान दिया था कि ‘हिंसा और आगजनी से क्रांति नहीं होती है।’ आंदोलन के अराजक होते देख कुछ समझदार युवा व छात्र जेपी से उनके कदमकुआं स्थित आवास पर मिले और उनसे नेतृत्व करने का आग्रह किया। जेपी ने  आंदोलन को शांतिपूर्ण व अहिंसक बनाये रखने की शर्त रखी। छात्रों-युवकों ने शर्त मान ली। तत्पश्चात आंदोलन का एक नारा बना, ‘हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंदोलन को दिशा देने के लिए बिहार छात्र संघर्ष संचालन समिति का गठन हुआ था। इस महत्वपूर्ण समिति के सदस्य थे-लालू प्रसाद, सुशील कुमार मोदी, राम बहादुर राय, वशिष्ठ नारायण सिंह, शिवानंद तिवारी, रघुनाथ गुप्त, मिथिलेश कुमार सिंह, राम जतन सिन्हा, नरेंद्र कुमार सिंह, भवेशचंद्र प्रसाद, नीतीश कुमार, विक्रम कुंवर, गोपाल शरण सिंह, अक्षय कुमार सिंह, विजय कुमार सिन्हा, रघुवंश नारायण सिंह, उदय कुमार सिन्हा, अरुण कुमार वर्मा, रवींद्र प्रसाद और अशोक कुमार सिंह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आंदोलन के संचालन के लिए पटना के कदमकुआं में स्थापित कार्यालय को चलाने का भार पहले भवेश चंद्र प्रसाद को मिला और बाद में विजय कृष्ण को। समिति के सदस्यों में से राम बहादुर राय, अरुण कुमार वर्मा, उदय कुमार सिन्हा, रवींद्र प्रसाद, रघुवंश नारायण सिंह और अक्षय कुमार सिह को छोड़कर सभी छात्र व युवा नेता बाद के दिनों में समय- समय पर विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री बने। कोई सांसद बना तो कोई विधायक। कोई मंत्री बना तो कोई मुख्यमंत्री। इन दिनों भी नीतीश कुमार तो मुख्यमंत्री हैं और सुशील कुमार मोदी उप मुख्यमंत्री।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    यह बात नहीं है कि ये सभी नेता जेपी आंदोलन के मंच से उतर कर सीधे सत्ता की कुर्सी पर चले गये। कुछ को तो बाद में भी संघर्ष करने पड़े। यहां यह सब इसलिए कहा जा रहा है कि आज अन्ना के आंदोलन से निकल कर आज के आंदोलनकारी कल सत्ता भी संभाल सकते हैं। आंदोलन नये नेतृत्व को उभारते हैं। जेपी आंदोलन में भी अनेक नये नेता उभरे थे। अन्ना आंदोलन में भी नये नेता उभर रहे हैं। इनमंे अरविंद केजरीवाल सबसे अधिक चमकते सितारे लग रहे हैं। जेपी आंदोलन को देखा जाए तो कुल मिलाकर उस आंदोलन से निकले नेताओं में आज सबसे चमकते सितारे नीतीश कुमार हैं। नीतीश कुमार खुद को लोहियावादी कहते हैं। नीतीश कुमार लोहियावादियों में भी सबसे चमकते सितारे साबित हो रहे हैं। यहां ऐसे ही लोहियावदियों की बात हो रही है जो सत्ता में पहुंचे। मधु लिमये जैसे लोहियावादी की नहीं। जेपी आंदोलन के दौरान छात्र संघर्ष संचालन समिति के अधिकतर सदस्य आंदोलन शुरू होने से पहले से ही किसी न किसी राजनीतिक दल व विचारधारा से बंधे हुए थे। शिवानंद तिवारी, रघुनाथ गुप्त  और नरेंद्र कुमार सिंह लोहियावादी दल में थे। वशिष्ठ नारायण सिंह और मिथिलेश कुमार सिंह संगठन कांग्रेस के युवा संगठन से जुड़े थे। पर जब वे जेपी आंदोलन में थे तो उस समय वे दलीय बंधन में नहीं बंधे हुए थे। इस दृष्टि से अन्ना आंदोलन की स्थिति भिन्न है। अन्ना के साथ गैर दलीय तत्व अधिक हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यहां तक कि आंदोलन के प्रारंभिक दिनों में छात्र-युवा आंदोलन के नेता राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने सभा मंचों पर चढ़ने तक नहीं देते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल जेपी आंदोलनकारियों का तर्क यह था कि 1967 से 1972 तक कुछ राज्यों में सत्ता में रह कर गैर कांग्रेसी दलों ने कांग्रेस की अपेक्षा खुद को बेहतर साबित नहीं किया। वे भी आम तौर पर व्यवस्था के अंग ही बन कर रह गये। इसीलिए इनको आंदोलन में साथ लेकर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। साथ ही इस छात्र-युवा आंदोलन को गैर दलीय बनाये रखने के फायदे होंगे। क्योंकि उसकी नैतिक धाक अधिक होगी। पर जब गफूर सरकार का बिहार में दमन शुरू हो गया तो जेपी आंदोलन में प्रतिपक्षी राजनीति के दल भी जुड़ गये। हालांकि गैर कांग्रेसी दलों के भीतर  आंदोलन के पक्ष में विधायिका से इस्तीफा देने के सवाल पर भारी मतभेद था। जिस तरह आज अन्ना के जन लोकपाल विधेयक पर गैर कांग्रेसी दलों में भी मतभेद है। जेपी ने जब विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देने को कहा तो कई विधायकों ने इस्तीफा देने से मना कर दिया था, जिनमें जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी, संगठन कांग्रेस के विधायक भी थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  जेपी आंदोलन की संचालन समिति के कार्यालय सचिव भवेश चंद्र प्रसाद ने उन दिनों के अनुभव हाल में इन पंक्तियों के लेखक को इन शब्दों में सुनाये, ‘मेरे कार्यालय में गरीब लोग आते थे और आंदोलन फंड के लिए दो, चार या फिर पांच रुपये देते थे। और कहते थे कि हमारा नाम भले मत पहुंचाइए, पर यह पैसा जेपी तक जरूर पहुंचा दीजिएगा। ऐसा जन लगाव जेपी आंदोलन के प्रति था।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; एक अन्य कार्यालय सचिव विजय कृष्ण ने बताया कि आपातकाल के दिनों में फरारी के काल में अक्सर गरीब लोग ही हमें रात में रहने के लिए अपने घरों में शरण देते थे। अधिकतर अमीर मित्र लोग तो डरे रहते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन पंक्तियों के लेखक को आपातकाल में बड़ौदा डायनामाइट मुकदमे के सिलसिले में सी.बी.आई. बेचैनी से खोज रही थी। सी.बी.आई के अनुसार जार्ज फर्नाडिस, रेवीकांत सिन्हा और एम.एन. वाजपेयी के साथ मिलकर इन पंक्तियों के लेखक ने पटना में जुलाई 1975 में एक गुप्त बैठक की। उसमें यह षड्यत्र रचा गया कि देश भर में सरकारी संस्थानों को डायनामाइट से उड़ाना है। नतीजतन इन पंक्तियों के लेखक को फरार हो जाना पड़ा। रिश्तेदारों के यहां रहने का सवाल ही नहीं था। पटना सचिवालय में कार्यरत एक अल्पवेतन भोगी कर्मचारी के मंदिरी मुहल्ले में स्थित एक कमरे के घर में लंबे समय तक के लिए मुझे शरण मिली। सी.बी.आई. से बचने के लिए बाद में मेघालय भाग जाना पड़ा। वहां कांग्रेस की सरकार नहीं थी। आपातकाल का दमन नहीं था। वहां मेरे एक रिश्तेदार रहते थे जहां शरण मिली। इन पंक्तियों के लेखक का भी यही अनुभव यह रहा कि आम गरीब लोगों ने छिपने में अपेक्षाकृत अधिक मदद की जबकि तब भी निहितस्वार्थियों की ओर से यह कहा जा रहा था कि जेपी आंदोलन मध्यम वर्ग का आंदोलन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस तरह वह किसी खास जाति या वर्ग का ही आंदोलन नहीं था, उसका एक उदाहरण उन दिनों सामने आते रहते थे। 1974 में जेपी आंदोलन के समय राज्य के कुछ इलाकों में चेचक का प्रकोप हो गया था। जयप्रकाश नारायण ने सार्वजनिक रूप से इस पर चिंता प्रकट की। फिर क्या था, पटना मेडिकल कालेज के छात्रों ने कुछ ही समय में राज्य के दस हजार लोगों को चेचक के टीके देने का काम पूरा कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  यह जेपी के प्रति सम्मान और उनके नेतृत्व में शुरू आंदोलन की गंभीरता का ही परिणाम था। अधिकतर लोगों को मालूम था कि जेपी का मुद्दा सही है और उनकी मंशा ईमानदार है। अन्ना के आंदोलन को देखकर जेपी आंदोलन की याद आना स्वाभाविक ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   इतना ही नहीं, जेपी के आहवान पर जब-जब पटना में सभा या आंदोलन का कोई कार्यक्रम बनता था तो राज्य भर से लोग आते थे। उनके खाने का प्रबंध किसी होटल या भंडारे से नहीं बल्कि आम लोगों के घरों से होता था। अनेक आम लोगों सहित इन पंक्तियों के लेखक के घर से भी अक्सर पूड़ी-भुजिया-आचार के पैकेट उन आंदोलनकारियों के लिए बनकर जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेपी बिहार आंदोलन के दौरान समय -समय पर घरों में थालियां बजाने और थोड़ी देर के लिए नियत समय पर बत्तियंा गुल कर देने का भी आहवान करते रहते थे। उस समय लगता था कि अधिकतर घरांे से आंदोलन की घंटियां बज रही हैं। उन कई घरों से भी थालियांें की आवाज आती थी, जिन्हें सक्रिय राजनीति से कोई मतलब नहीं था। उनमें से अधिकतर लोगों की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी नहीं थी। पर वे एक नेता की ओर विश्वास भरी नजरों से देख कर थे जो उनकी समस्याओं को लेकर 73 साल की आयु में भी आम जन की बेहतरी के लिए सड़कों पर निकल पड़ा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहना गलत है कि आम लोगों की राजनीति में कोई रूचि नहीं है। दरअसल लोगबाग विश्वसनीयता खो चुके नेताओं और दलों में कोई खास रूचि नहीं रखते भले वे औपचारिकता के लिए हर बार किसी न किसी को वोट दे देते हैं। सामने बेहतर विकल्प के अभाव में कई बार और अधिकतर स्थानों में विवादास्पद उम्मीदवारों के पक्ष में ही उन्हें मुहर लगानी पड़ती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेपी आंदोलन की घटनाएं बताती हैं और अन्ना आंदोलन की घटनाएं भी इस मामले में इस बात की पुनरावृति कर रही है कि यदि नेता प्रामाणिक हो तो बेहतर राजनीति की प्यासी जनता उस नेता की तरफ ख्ंिाची चली आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार और उससे उत्पन्न महंगाई की मार सबसे अधिक गरीब और निम्न मध्यवर्गीय जनता ही भुगतती हैं, इसलिए केले वाले केले और चने वाले कम कीमत पर या मुफ्त में चने आंदोलनकारियों को दे देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेपी आंदोलन में मशहूर साहित्यकार नागार्जुन भी सक्रिय थे। इन पंक्तियों का लेखक साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ का पटना संवाददाता था और नागार्जुन के नेतृत्व में यदा-कदा धरना, अनशन, प्रदर्शन में शामिल हुआ करता था। फटेहाल नागार्जुन को उन दिनों चंदे में जो भी छोटी राशि मिलती थी, उन सबको हम सबको चाय नाश्ता खिलाने -पिलाने में खर्च कर देते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पटना की कुछ खास लिट्टी -समोसा की दुकान से बाबा लिट्टी और समोसा खरीदकर हमें खिलाते और खुद खाते थे। हमने देखा कि लिट्टी के दुकानदार बाबा को गर्मागर्म चीजें ही देते थे और पैसे में भी खास मुरव्वत करते थे। गरीब लिट्टी वाला समझता है कि बुढ़ापे तक फटेहाल रहा यह बाबा जरूर आम जनता की भलाई के लिए ही संघर्षरत है। यह और बात है कि बाबा आंदोलन के आखिरी दिनों में जेपी आंदोलन से अलग हो गये थे। हालांकि यहां बात की जा रही है कि एक फुटपाथी दुकानदार की एक आंदोलनकारी के प्रति भावना की और उसके प्रति एक खास तरह के लगाव की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर साधनों और मीडिया को ध्यान में रखा जाए तो अन्ना आंदोलन बेहतर स्थिति में है। जेपी के पास साधन कम थे। मीडिया का ऐसा विस्फोट तब नहीं हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का दबदबा बहुत था। अधिकतर मीडिया और व्यापारिक घराने इंदिरा जी से सहमते थे। आज वैसी स्थिति नहीं है। इसका लाभ अन्ना के आंदोलन को मिल रहा है। पर जेपी की नैतिक धाक अधिक थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-9162435205999097343?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/9162435205999097343/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=9162435205999097343&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/9162435205999097343'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/9162435205999097343'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2011/09/blog-post_07.html' title='एक वह भी जमाना था, एक यह भी जमाना है'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><media:thumbnail 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मोहन निगम को इस संदेश के साथ पटना भेजा कि वे मुझे और शिवानंद तिवारी को जल्द विमान से बंगलुरू लेकर आयें। शिवानंद जी तो उपलब्ध नहीं हुए। पर मैं निगम जी के साथ मुम्बई होते हुए बंगलुरू पहुंचा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहां जार्ज के साथ तय योजना के अनुसार राम बहादुर सिंह, शिवानंद तिवारी, विनोदानंद सिंह, राम अवधेश सिंह और डा. विनयन को लेकर मुझे कोलकाता पहुंचना था। पटना लौटने पर मैंने उपर्युक्त नेताओं की तलाश की। पर इनमें से कुछ जेल जा चुके थे या फिर गहरे भूमिगत हो चुके थे। सिर्फ डा. विनयन उपलब्ध थे। उनके साथ मैं धनबाद गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद रहे कि आपातकाल में कांग्रेस विरोधी राजनीतिक नेताओं -कार्यकर्त्ताओं पर सरकार भारी आतंक ढा रही थी। राजनीतिककर्मियों के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना तक कठिन था। भूमिगत जीवन जेल जीवन की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धनबाद में समाजवादी लाल साहेब सिंह से पता चला कि राम अवधेश तो कोलकाता में ही हैं तो फिर हम कोलकाता गये। वहां जार्ज से हमारी मुलाकात हुई। पर वह मुलाकात सनसनीखेज थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जार्ज ने दक्षिण भारत के ही एक गैरराजनीतिक व्यक्ति का पता दिया था। उस व्यक्ति का नाम तीन अक्षरों का था। जार्ज ने कहा था कि इन तीन अक्षरों को कागज के तीन टुकड़ों पर अलग अलग लिखकर तीन पॉकेट में रख लीजिए ताकि गिरतार होने की स्थिति में पुलिस को यह पता नहीं चल सके कि किससे मिलने कहां जा रहे हो। यही किया गया। पार्क स्ट्रीट के एक बंगले में मुलाकात हुई। दक्षिण भारतीय सज्जन ने कह दिया था कि बंगले के मालिक के कमरे में जब भी बैठिए, उनसे हिंदी में बात नहीं कीजिए। अन्यथा उन्हें शक हो जाएगा कि आप मेरे अतिथि हैं भी या नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दक्षिण भारतीय सज्जन ने हमें जार्ज से मुलाकात करा दी। हम एक बड़े चर्च के अहाते में गये। जार्ज उस समय एक पादरी की पोशाक में थे। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। चश्मा बदला हुआ था और हाथ में एक विदेशी लेखक की मोटी अंग्रेजी किताब थी। जार्ज, विनयन और मुझसे देर तक बातचीत करते रहे। फिर हम राम अवधेश की तलाश में उल्टा डांगा मुहल्ले की ओर चल दिये। वहीं की एक झोपड़ी में हम टिके भी थे। फुटपाथ पर स्थित नल पर नहाते थे और बगल की जलेबी-चाय दुकान में खाते-पीते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उल्टा डांगा का वह पूरा इलाका बिहार के लोगांे ंसे भरा हुआ था। जार्ज के साथ टैक्सी में हम लोग वहां पहुंचे थे। हम जार्ज को उस चाय की दुकान पर ही छोड़ दिया और राम अवधेश की तलाश में उस झोपड़ी की ओर बढ़े। पर पता चला कि राम अवधेश जी भूमिगत कर्पूरी ठाकुर के साथ कोलकाता में ही कहीं और हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाय की दुकान पर बैठे जार्ज ने इस बीच चाय पी थी। जब हम लौटे और जार्ज चाय का पैसा देने लगे तो दुकानदार उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया आर कहा, हुजूर हम आपसे पैसा नहीं लेंगे। इस पर जार्ज घबरा गये। उन्हें लग गया कि वे पहचान लिये गये। अब गिरतारी में देर नहीं होगी। जार्ज को परेशान देखकर मैं भी पहले तो घबराया, पर मुझे बात समझने में देर नहीं लगी। मैंने कहा कि जार्ज साहब, चलिए मैं इन्हें बाद में पैसे दे दूंगा। मैं यहीं टिका हुआ हूं। फिर अत्यंत तेजी से हम टैक्सी की ओर बढ़े जो दूर हमारा इंतजार कर रही थी। फिर हमें बीच कहीं छोड़ते हुए अगली मुलाकात का वादा करके जार्ज कहीं और चले गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपातकाल में जिस तरह जान हथेली पर लेकर जार्ज फर्नांडीस ने अपने उसूलों के लिए बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी, यदि मंत्री बनने के बाद भी वे उसी तरह अपने उसूलों पर पूरी तरह खरा उतरे होते तो समाजवादी आंदोलन आगे बढ़ जाता। अक्सर उन कार्यकर्त्ताओं के मन में यह बात आती रहती है जिन लोगों ने भी कभी अपनी जान हथेली पर रखकर उनके साथ काम किया था और जिन्होंने बाद में भी सरकार से कभी कुछ नहीं लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद रहे कि आपातकाल में जार्ज और उनके साथियों पर बड़ौदा डायनामाइट केस को लेकर मुकदमा चला। सी.बी.आई. का आरोप था कि पटना में जुलाई 1975 मेें जार्ज फर्नाडीस, रेवती कांत सिंह, महेंद्र नारायण वाजपेयी और इन पंक्तियों के लेखक यानी चार लोगों ने मिलकर एक राष्ट्रद्रोही षड्यंत्र किया। षड्यंत्र यह रचा गया कि डायनाइट से देश के महत्वपूर्ण संस्थानों को उड़ा देना है और देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर देनी है। सन 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनने पर यह केस उठा लिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;( प्रभात खबर से साभार )&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-5826132195416925494?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/5826132195416925494/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=5826132195416925494&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/5826132195416925494'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/5826132195416925494'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='इमरजेंसी में फर्नांडीस से मुलाकात'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-6485606156789706441</id><published>2011-08-28T02:24:00.002+05:30</published><updated>2011-08-28T02:27:46.986+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्लेषण'/><title type='text'>विफल नहीं होता भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन</title><content type='html'>अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ इस देश का यह चौथा बड़ा जन आंदोलन है। वैसे तो मिनी आंदोलन रोज-रोज जहां -तहां होते ही रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रथम आंदोलन के नायक समाजवादी नेता व विचारक डा. राम मनोहर लोहिया थे। दूसरे के नायक लोकनायक जय प्रकाश नारायण थे। तीसरा आंदोलन वी.पी. सिंह के नेतृत्व में लड़ा गया। चौथा आंदोलन अन्ना हजारे के नेतृत्व में इन दिनों लड़ा जा रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किया गया कोई आंदोलन इस मामले में विफल नहीं होता कि उससे अंततः उस आंदोलन के कारण भ्रष्टाचार समर्थक सत्ता देर-सवेर हट जाती है। पर यह बात भी है कि अगली सत्ता अपने ही पिछले आंदोलन के मुद्दे को लगभग भूल जाती है। पता नहीं इस मामले में इस बार क्या होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस गरीब देश के अधिकतर लोग सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं, उनको छोड़कर जो लोग भ्रष्टाचार से लाभान्वित हैं। हालांकि एक ही व्यक्ति अधिकार की अपनी सीट पर बैठकर तो रिश्वत ले रहा है, पर वही जब दूसरे दतर में अपने किसी काम के लिए जाता है, तो उसे भी घूस देनी पड़ती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने का अर्थ यह है कि भ्रष्टाचार से तो लोगबाग आजादी के बाद से ही निरंतर पीड़ित रहे हैं। पहले कम पीड़ित थे, अब अधिक हो रहे हैं। पर जब जब प्रामाणिक नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ी होती है, तब तब आम जनता उसके पीछे उमड़ पड़ती है। चारों आंदोलनों में यही हुआ। इन आंदोलनों में एक समानता और भी है। ये सारे आंदोलन कांग्रेसी सत्ता के खिलाफ ही हुए। पर स्वार्थवश कांग्रेस ने इतिहास से अब तक नहीं सीखा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डा. लोहिया एक प्रामाणिक नेता थे जो सिर्फ देश और जनता के बारे में ही सोचते थे। उनकी न तो निजी कार थी और न ही बैंक खाता। अविवाहित थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी के बाद के चुनावों में अनेक प्रतिपक्षी दलों की उपस्थिति होती थी। उसका लाभ उठाकर 50 प्रतिशत से भी कम ही मत पाकर लगातार 20 साल तक कांग्रेस सत्ता में बनी रही। कांग्रेस ने जन समस्याओं की उपेक्षा की। भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ने लगा तो डा. लोहिया ने कुछ प्रतिपक्षी दलों को चुनाव के लिए एक किया। और नतीजतन 1967 में नौ राज्यों की सत्ता कांग्रेस के हाथों से निकल गई। लोकसभा में कांग्रेस का बहुमत घट गया। यदि कुछ और प्रतिपक्षी एकता हुई होती तो केंद्र की सत्ता से भी कांग्रेस का तभी सफाया हो गया होता। भ्रष्टाचार के मामले में इन नौ राज्यों की सरकारें पिछली कांग्रेसी सरकारों से बेहतर थीं। राजनीतिक महत्वाकांक्षा और बेमतलब के आंतरिक विवादों के कारण गैर कांग्रेसी सरकारें अल्पायु साबित हुईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार में 1965-66 में तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना गुस्सा था कि एक तत्कालीन सत्ताधारी नेता का नाम लेकर गांव-शहर मेें यह खुलआम नारा लगता था कि ‘गली -गली में शोर है और फलां नेता चोर है।’ गैर कांग्रेसी दलों की नाकामयाबी का लाभ उठाकर 1971-72 में दुबारा सत्ता में आकर कांग्रेस इस बार एकाधिकार, परिवारवाद और भ्रष्टाचार में लिप्त हो गई तो जेपी उठ खड़े हुए। दक्षिण को छोड़कर जेपी को पूरे देश का समर्थन मिला और इंदिरा गांधी जैसी महाबली नेता का पराजय हो गया। जिस तरह डा. लोहिया के असामयिक निधन के कारण प्रतिपक्ष खास कर समाजवादी आंदोलन दिशाहीन हो गया था, उसी तरह जेपी की किडनी खराब हो जाने के कारण जेपी जनता सरकार पर अंकुश नहीं रख सके। यानी एक अच्छे आंदोलन का सुपरिणाम सामने नहीं आ सका। हालांकि मोरारजी सरकार में भ्रष्टाचार कम था और मूल्य वृद्धि की रफतार बिलकुल काबू में थी। वी.पी. सिंह ने अपनी कुर्सी को खतरे में डाल कर राजीव गांधी से राजनीतिक लड़ाई मोल ली थी, इसलिए भी आम जनता के वे हीरो बने और भ्रष्टाचारविरोधी जनता की मदद से वे राजीव गांधी को सत्ता च्युत कर सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्ना हजारे को तो सत्ता की राजनीति से कोई मतलब ही नहीं है, इसलिए भी आज आम जनता का काफी समर्थन उन्हें मिल रहा है। उम्मीद की जा रही है कि उन्हें और भी अधिक जन समर्थन मिलेगा। सरकारी दमन और समय बीतने के साथ जन समर्थन बढ़ता है। आज के आधुनिक मीडिया ने भी अन्ना की बातों को अधिक से अधिक जनता तक पहुंचाने में मदद की है। ऐसी सुविधा इससे पहले के किसी आंदोलनकारी नेता को नहीं मिली थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी जनता तो भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में शामिल होने के लिए हमेशा ही तैयार बैठी रहती है, बस उसे प्रतीक्षा रहती है कि प्रामाणिक नेता के आगे आने की। डा. लोहिया, जे.पी., वी.पी. और अन्ना हजारे ऐसे ही प्रामाणिक नेता साबित हुए या फिर अधिकतर जनता ने उन्हें ऐसा माना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोहिया की सप्त क्रांति और जेपी की संपूर्ण क्रांति के तो उंचे लक्ष्य रहे हैं। पर आम जनता में तो फिलहाल सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचार से तत्काल मुक्ति की छटपटाहट है। वैसे भी गैर सरकारी भ्रष्टाचार सरकारी भ्रष्टाचार से ही प्रेरित-पोषित है। कई लोगों का मानना है कि इस गरीब देश की अन्य अधिकतर समस्याएं भी भ्रष्टाचार से ही उपजी हैं। इसीलिए जब अन्ना हजारे जैसी हस्ती भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जन लोकपाल विधेयक लेकर सामने आती है तो जनता उमड़ पड़ती है। अभी न तो किसी और अंादोलन से इस आंदोलन की तुलना करने का कोई मतलब है न ही किसी अन्य आंदोलन से इसे बड़ा या छोटा दिखाने का कोई औचित्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी आंदोलन को पर्याप्त जन समर्थन वाला आंदोलन मान लिया जाना चाहिए जिस आंदोलन के जरिए सरकार झुक जाए या फिर कोई भ्रष्टाचार समर्थक सरकार चुनाव के जरिए सत्ता से हट जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेपी आंदोलन ने अंततः केंद्र की सत्ता से इंदिरा गांधी को बाहर कर दिया था। वी.पी. सिंह के अभियान ने भी राजीव गांधी को सत्ताच्युत कर दिया। अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति कें्रद सरकार का जो रुख है, उससे फिलहाल तो यही लगता है कि सन 2014 के लोक सभा के चुनाव के बाद केंद्र में कांग्रेसी सरकार तो नहीं ही रह पाएगी। क्योंकि जन लोकपाल विधेयक को लेकर तब तक दोनों पक्षों में हुमचा-हुमची होती रहेगी और इसके साथ जनता का जागरण भी। पहले की तरह ही एक बार फिर जगह जगह नये नेता उभरेंगे। भ्रष्टाचार और उससे उपजे काला धन पर काबू पाने की जो समस्या है, उसको लेकर इस देश के अधिकतर दलों व नेताओं को भारी कठिनाई है।सबके अपने अपने भ्रष्टाचार हैं। कोई व्यक्ति हथकड़ी गढ़ने के लिए अपने ही पैसों से लुहार को आखिर ऑर्डर क्यों और कैसे दे देगा ? अन्ना यही चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनता तो तैयार दिख रही है, तय तो अन्ना हजारे और उनकी टीम को करना है।उनकी कल्पना का जन लोकपाल कानून पास हो सकता है,पर यह काम अगली लोक सभा ही शायद कर सकेगी। मौजूदा लोक सभा के अधिकतर सदस्य जन लोकपाल के लिए कत्तई तैयार नहीं है। इस मामले में स्वाभाविक है कि अधिकतर मौजूदा कांग्रेसी सांसदों की हालत बदतर है। पर गैर कांग्रेसी दलों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निहितस्वार्थी लोग तो चीजों को मिलाकर गड्मगड कर दे रहे हैं । जिस तरह कभी कहा जा रहा था कि इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया। उसी तरह आज कुछ लोग कह रहे हैं कि सांसद और संसद एक ही हैं। यदि अन्ना हजारे के आंदोलन के गर्भ से जनहितकारी नेतागण 2014 के लोक सभा चुनाव में जीत कर संसद में चले जाएं तो संसद का स्वरूप आज जैसा नहीं रहेगा। फिर जन लोकपाल जैेसे विेधयक के पास होने मंे कोई दिक्कत नहीं होगी। ऐसा संभव भी है ,यदि उम्मीदवारों के चयन में जेपी और वी.पी.के अधूरे कामों को पूरा कर दिया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल जेपी और वी.पी. और उनके निस्वार्थी सहयोगियों ने क्रमशः 1977 और 1989 में चुन -चुन कर देशप्रेमियों को टिकट दिये हेाते तो उनकी मंशा विफल नहीं होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद रहे कि ऐसे ग्यारह सांसदों को देशप्रेमी नहीं कहा जा सकता जिन्हें 2008 में खुद लोक सभा ने प्रस्ताव पास कर के सदन की सदस्यता से निकाला था।उन पर प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत लेने का आरोप साबित हो चुका था।यह एक स्टिंग आपरेशन का नतीजा था।उस दृश्य को टी.वी. पर देश ने देखा था। 1996 के झामुमो सांसद रिश्वत कांड की तरह पैसे लेकर सरकार बचाने वाले सांसदों के खिलाफ बोलकर कोई व्यक्ति कानून बनाने के मामले में संसद की सर्वोच्चता को चुनौती नहीं दे रहा होता है।वैसे भी न तो संसद सर्वोच्च है और न ही संविधान बल्कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च और सार्वभौम है जो संासदों का भी चयन करती है और उसी के प्रतिनिधि संविधान भी बनाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्य आंदोलनों से इस अन्ना आंदोलन की इस मामले में समानता है कि कभी कोई जब जब कोई भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाता है तो उसी पर उल्टे तरह -तरह के लांछन लगा दिये जाते हैं। मान लिया कि वे लांछित हैं,उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का कोई हक नहीं है। तो फिर लांछन लगाने वाले ही क्योें नहीं ऐसा कानून बना देते जिससे जनता को सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाए ? पर उल्टे प्रधान मंत्री कहते हैं कि मेरे पास भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जादू की कोई छड़ी नहीं है।अन्ना के साथ जन सैलाब इसलिए भी उमड़ रहा है क्योंकि जनता यह देख रही है कि भले रोकने के लिए कोई छड़ी नहीं है, पर कोई दूसरी छड़ी उनके पास जरूर है जो तब तक टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला और आदर्श घोटाले जैसे घोटाले कराने की छूट देती रहती है जब तक सुप्रीम कोर्ट कदम नहीं उठाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार विरोधी महिम में आम जनता की भारी सहभागिता को देखकर उन कुतर्कियों को शर्म करनी चाहिए जो इन दिनों अक्सर यह कहा करते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उपर से नहीं बल्कि नीचे से कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि जनता भी वोट के लिए पैसे मांगती है और अपराधियों को भी वेाट दे देती है। जनता को भ्रष्ट और अपराधी तत्वों से लाभ मिल होता तो जनता आज उल्टे अन्ना के खिलाफ आंदोलन करती। राजनीति में घुसाये गये भ्रष्ट और अपराधी तत्व तो भ्रष्ट नेताओं के लिए कवच का काम करते हैं। इसलिए अन्ना हजारे के आंदोलन के रास्ते में अवरोधक हर जगह फैले निहितस्वार्थी तत्व हैं जिनकी संख्या कम है हालांकि वे शक्तिशाली हैं। अगले चुनाव में वे तिनके की तरह उड़ जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-6485606156789706441?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/6485606156789706441/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=6485606156789706441&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/6485606156789706441'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/6485606156789706441'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2011/08/blog-post_28.html' title='विफल नहीं होता भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-1532029537610578479</id><published>2011-08-17T02:28:00.004+05:30</published><updated>2011-08-17T02:36:07.286+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्लेषण'/><title type='text'>मामला सिर्फ अन्ना हजारे और सरकार के ही बीच का नहीं</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-6vvQx9kyB00/Tkra7zLwxLI/AAAAAAAAAF0/Czbi4XyxOEA/s1600/anna+hazare.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5641562204121646258" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/-6vvQx9kyB00/Tkra7zLwxLI/AAAAAAAAAF0/Czbi4XyxOEA/s200/anna%2Bhazare.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सरकारांे और सत्ताधारी नेताओं ने इस देश में जब -जब ज्वलंत मुददों को दरकिनार करके उसके बदले मुददा उठाने वालों को ही अपना निशाना बनाया है,तब -तब अंततः सरकारों और दलों की हार ही हुई है।जेपी और वी.पी.सिंह के अभियानों के उदाहरण सामने हैं।पिछली गलतियों व अनुभवों को दरकिनार करके अब भी केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के मुददे को नजरअंदाज करके अन्ना हजारे को ही निशाना बना रही है।देखना है कि इस दफा इस द्वंद्व की तार्किक परिणति क्या होती है !&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;यदि थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाए कि अन्ना के खिलाफ भी कुछ आरोप हैं।तो भी देशव्यापी भ्रष्टाचार का मुददा आज सिर्फ अन्ना टीम बनाम केंद्र सरकार के बीच का ही मामला तो नहीं है ।जन -जन को पीड़ित करने वाले सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार का मुददा क्या मात्र स्वामी राम देव बनाम कांग्रेस के बीच का मामला है ? क्या यह साबित हो जाए कि आरोप लगाने वालों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप सही हैं तो देश में सर्व व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध का मुददा बेमतलब हो जाएगा ? कांग्रेस और केंद्र सरकार अन्ना-रामदेव को किसी तरह संतुष्ट कर भी दें तो भी एक कारगर लोकपाल की जरूरत समाप्त नहीं हो जाएगी ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;क्या कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के नुकीले सवालों का उनके अनुसार संतोषप्रद जवाब अन्ना हजारे नहीं दे सकें तो आंदोलन टांय-टांय फिस्स हो जाएगा ? ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है।ताजा इतिहास भी यही बताता है।देश के जन मानस को देख कर लगता है कि किसी कारणवश अन्ना-राम देव के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दृश्य से अलग होने के बावजूद इस बार भी भ्रष्टाचार का मुददा शांत होने वाला नहीं है।यह मुददा किसी न किसी रूप में अपना रंग दिखा कर ही रहेगा।विभिन्न जनमत संग्रहों के नतीजे भी यही बताते हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दरअसल इससे पहले भी कम से कम दो बार कांग्रेस पार्टी और सरकार ने भ्रष्टाचार केे मुददे को कुछ खास हस्तियों के बीच का ही मसला बनाने की विफल कोशिश की थी ।पर आम जनता ने इस मुददे को सही माना और बाद के आम चुनावों में कांग्रस को सबक सिखा ही दिया।ऐसा सन 1977 और सन 1989 में हो चुका है।पर लगता है कि कांग्रेस ने उन घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा और एक बार फिर वह मुददों के बदले व्यक्तिगत प्रहारों पर उतर आई है।शनिवार को आयोजित कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का हमलावर प्रेस कांफ्रंस इसका ताजा उदाहरण है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक तरफ अन्ना हजारे और स्वामी राम देव के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को देशव्यापी समर्थन मिल रहा है,दूसरी ओर केंद्र की कांग्रेस सरकार तथा पार्टी स्वामी राम देव और बाल कृष्ण को जेल भिजवाने और अन्ना को बदनाम करने का प्रयास कर रही है । सावंत आयोग की अन्ना विरोधी टिप्पणियां दिखाकर अन्ना से नैतिक सवाल कांग्रेस पूछ रही है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दूसरी ओर आम जनता का एक बड़ा वर्ग यह चाहता है कि चाहे अन्ना हों या रामदेव ,जिस किसी पर भ्रष्टाचार के आरोप साबित हो जाएं ,उन्हें कानून की गिरफत में ले लिया जाए।पर यह कार्रवाई सिर्फ अन्ना-रामदेव तक ही सीमित नहीं रहे।यदि आज अन्ना-राम देव भ्रष्टाचार के आरोपमें जेल जाते भी हैं तो कोई अन्य नेता भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का नेतृत्व संभाल लेगा।पर किसी भी स्थिति में यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है।इसका असर उससे पहले न भी दिखाई दे तो भी सन 2014 के लेाक सभा चुनाव में तो दिखाई पड़ ही जाएगा।तब तक जनता को यह स्पष्ट हो जाएगा कि भ्रष्टाचार के पक्ष में आखिर कौन खड़ा है और कौन खिलाफ में है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;an&lt;/span&gt; 1974 में जब जेपी ने बिहार में आंदोलन शुरू किया था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भुवनेश्वर की एक जन सभा में कहा कि ‘जो लोग पैसे वाले से मदद लेते हैं और उनसे रिश्ता जोड़े रहते हैं ,वे कैसे भ्रष्टाचार के बारे में बोलने का दुस्साहस करते हैं ?’गुजरात और बिहार की कुछ हिंसक वारदातों की चर्चा करते हुए उसके लिए प्रकारांतर से जय प्रकाश नारायण को जिम्मेदार ठहराते हुए इंदिरा गांधी ने यह भी कहा था कि ये लोग अबोध युवकों को राष्ट्रीय संपत्ति के विनाशके लिए उकसा रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जेपी एक तरफ राजनीति में एकाधिकारवाद और सरकार में ंभ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे थे और दूसरी ओर इंदिरा जी जेपी पर उसी तरह के आरेाप लगा रही थीं जिस तरह कांग्रेस की तरफ से आज मनीष तिवारी और सरकार की तरफ से कपिल सिब्बल अन्ना-रामदेव पर प्रति - आरोप लगा रहे हैं।क्या प्रति-आरोप से इंदिरा गांधी सन 1977 के चुनाव में पराजय से अपनी पार्टी को बचा पाईं ? क्या प्रति-आरोप में ं जनताने कोई दम पाया था ?&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;इसी तरह का प्रति -आरोप कांग्रेस के कुछ लेागों ने अस्सी के दशक में वी.पी.सिंह के पुत्र अजेय सिंह के नाम सेंट कींटस में फर्जी बैंक खाता खोल कर लगाया था। पर बोफर्स तोप सौदे के आरोप की पृष्ठभूमि में 1989 के लोक सभा चुनाव में राजीव गांधी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। तब भी अधिकतर जनता ने यह माना कि बोफर्स घोटाले पर राजीव गांधी की सफाई सही नहीं थी।भले शंकरानंद के नेतृत्व वाली जेपीसी और सी.बी.आई.ने बोफर्स के दलालों को साफ बचा लिया हो,पर केंद्रीय आयकर न्यायाधिकरण ने हाल में यानी इसी साल यह कह ही दिया कि क्वोत्रोची और एक अन्य व्यापारी ने बोफर्स दलाली के पैसों को स्विस बैंक की लंदन स्थित शाखा के अपने खातों में जमा किया था। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;लगता है कि हाल के इतिहास से भी कुछ नहीं सीखने की कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकार ने कसम खा ली है। अन्ना हजारे और स्वामी राम देव के आंदोलन में लग रहे पैसों पर सवाल उठाते हुए मनीष तिवारी कहते हैं कि ये पैसे कहां से आ रहे हैं,यह किसी को मालूम नहीं है।खोजी पत्रकारिता की इसमंे ंजरूरत है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सन 1974 में ऐसे सवालों का जवाब जय प्रकाश ने इंदिरा गांधी को दिया था।जेपी ने तब एक प्रेस बयान में कहा था कि यदि इंदिरा जी के मापदंड को मापा जाए तो महात्मा गांधी ही सबसे भ्रष्ट व्यक्ति माने जाएंगे।क्योंकि गांधी के सभी सहयोगियों का पोषण उनके धनी प्रशंसकों द्वारा किया जाता था।जेपी ने इस पर यह भी कहा था कि मुझे आश्चर्य है कि कब तक इस देश के लोग अपने उच्चपदस्थ और शक्तिशाली व्यक्तियों के ऐसे उटपटांग बकवासों को सहन करते रहेंगे ?&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;याद रहे कि 1977 के चुनाव नतीजों ने बता दिया था कि जनता ऐसे उटपटांग बयानों को अंततः मौका मिलने पर सहन नहीं किया करती जिस तरह की बातें कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी आज कर रहे हैं। केंद्र सरकार और कांग्रेस को भ्रष्टाचार के आरोप के सबूत मिलते ही अन्ना और स्वामी को जेल भिजवाना चाहिए ।पर लगता है कि कांग्रेस और उनकी सरकार अन्ना -स्वामी राम देव से यह उम्मीद करती है कि तुम हमारे भ्रष्टाचार को सहन करो और हम तुम्हारे भ्रष्टाचार को नजरअंदाज कर रहे हैं।अन्यथा हम तुम्हंे नैतिक रूपसे कमजोर करके तुम्हारे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की हवा निकाल देंगे।यदि ऐसा ही संभव होता तो जेपी से जुड़े संगठनों के खिलाफ भ्रष्टाचार के कथित आरोपों की कुदाल आयोग से जांच करवा कर सन 1977 में चुनावी पराजय से इंदिरा सरकार बच जाती।दरअसल सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार का सवाल आज सिर्फ नैतिकता का सवाल ही नहीं है,बल्कि रोजी-रोटी और राष्ट्र की सुरक्षा का भी सवाल है। यह सिर्फ कुछ परस्पर विरोधी हस्तियों के बीच का ही मामला कत्तई नहीं है। जो ऐसा मानेगा ,वह सन 2014 में सन 1977 और सन 1989 दोहराने को तैयार रहे।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;साभार जनसत्ता)&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-1532029537610578479?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/1532029537610578479/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=1532029537610578479&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/1532029537610578479'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/1532029537610578479'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='मामला सिर्फ अन्ना हजारे और सरकार के ही बीच का नहीं'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-6vvQx9kyB00/Tkra7zLwxLI/AAAAAAAAAF0/Czbi4XyxOEA/s72-c/anna%2Bhazare.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-4099551947935633807</id><published>2011-03-20T17:41:00.001+05:30</published><updated>2011-03-20T17:44:59.440+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्लेषण'/><title type='text'>बाबा राम देव पर डोरे डालने से पहले भाजपा अपनी पिछली  गलतियों के लिए देश से माफी भी मांगे</title><content type='html'>केंद्र की सत्ता करीब आती देख भाजपा बाबा राम देव पर राजनीतिक डोरे डाल रही है। कांग्रेस को परेशानी में देख कर  भाजपा समझ रही है कि ‘मेरी कमीज से तेरी कमीज यानी कांग्रेस की कमीज जब अधिक गंदी’ हो ही चुकी है, तो अगले चुनाव में कांग्रेस की सफलता संदिग्ध है। इसलिए भाजपा की समझ यह है कि यदि लोगों में लोकप्रियता पा रहे स्वामी रामदेव की थोड़ी मनुहार कर ली जाए तो एक बार फिर केंद्र की सत्ता उसे मिल सकती है। दिल्ली से आ रही खबरों के अनुसार हिमाचल के पूर्व मुख्य मंत्री शांता कुमार स्वामी राम  देव के संपर्क में हैं। स्वामी राम देव की हाल की दिल्ली रैली में भाजपा सांसद बलवीर पुंज भी हाजिर थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    पर क्या इतने ही से भाजपा का काम चल जाएगा ? राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार कत्तई नहीं। दरअसल एक बार फिर केंद्र की सत्ता पाने के लिए भाजपा को देश के सामने अपनी पिछली गलतियों के लिए माफी मांगनी चाहिए। सी.वी.सी. के रूप में विवादास्पद पी.जे. थाॅमस की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय के बाद खुद प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह ने भी अपनी जिम्मेदारी यानी गलती सार्वजनिक रूप से मानी है। यानी जिस गलती पर कोई सफाई नहीं दी जानी सकती, उसे स्वीकार करके जनता से माफी मांग लेने में ही नेताओं व दलों की अब भलाई है।भ्रष्टाचार व अपराधीकरण को लेकर अब जनता को कोई दल व नेता मूर्ख नहीं बना सकता ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  प्रायश्चित करने और रोने के लिए  एक स्वामी के कंधे से बढ़िया भाजपा के लिए बेहतर स्थान और क्या हो सकता है ? याद रहे अब तक के संकेत यही है कि स्वामी राम देव को खुद अपने लिए सत्ता नहीं चाहिए।पर वैसे लोगों से ईमानदारी का  विश्वास मिलना चाहिए जिन्हें लेकर रामदेव चलना चाहते हैं।बड़ा वह होता है जो अपनी गलतियां स्वीकार करके आगे उसे नहीं दुहराने का संकल्प करता है।राजनीति व दूसरे क्षेत्रों के घटिया लोग अपनी गलतियों व विफलताओं के  लिए किसी और को ही कोसते रहते हैं।ऐसे लोग इतिहास के कूड़ेदान में एक दिन नजर आते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   अनेक घोटालों की खबरों के बीच केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार दिनानुदिन ढीली पड़ती जा रही है और नैतिक दष्टि से प्रभावकारी  सिविल सोसायटी में भी बढ़ते रोष की झलक सड़कों पर भी अब देखी जा रही है। भाजपा को आज यह लग रहा है कि इसका राजनीतिक व चुनावी लाभ अंततः उसे ही मिलेगा। शायद मिले भी। जेपी आंदोलन का भी चुनावी लाभ राजनीतिक दलों को ही मिला था।सन 1974 में शुरू हुआ  जेपी का आंदोलन भी गैर दलीय ही था।पर जब क्रूर शासन की मार पड़ी तो गैर दलीय तत्व कमजोर पड़ने लगे।फिर तपे-तपाये दलीय नेताओं ने मार खाने व कष्ट सहने के लिए अपने कंधे आगे कर दिये थे।स्वामी रामदेव को भी इस उदाहरण को अपने सामने रख कर ही कोई निर्णायक राजनीतिक पहलकदमी करनी चाहिए। हां,उन्हें राजनीतिक दलों से सुधरने का वादा भी ले लेना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    सन 1998 से 2004 के बीच के शासन काल में तथा उससे पहले भी भाजपा व उसके सहयोगी दलों ने भ्रष्टाचार व राजनीति के अपराधीकरण और कानून तोड़कों के खिलाफ काफी  नरमी  दिखाई थी ।सन 1997 में भाजपा के केंद्रीय नेतत्व ने यू.पी. के कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में उस प्रदेश के लगभग सभी उन खूंखार अपराधियों व माफियाओं को शामिल कर लिया था जो  विधायक थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  भाजपा ने केंद्र में 1998 से 2004 तक लगातार छह साल तक शासन किया,पर उसने यह साबित कर दिया कि  भ्रष्टाचार के मामले में भी वहं कांग्रेस से वह बिलकुल अलग नहीं है।नतीजतन सन 2004 के लोक सभा चुनाव में उसके वोट बैंक में इतना अधिक इजाफा नहीं हो सका था कि वह संकट में काम आ जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      घटनाएं बताती हैं कि  भाजपा की चिंता का मुख्य विषय भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व राजनीति का घोर अपराधीकरण नहीं है बल्कि अब भी भावनात्मक मुद्दे ही हैं। भावनात्मक मुद्दे ही अब भी उसके मर्म स्थल को बंेधते हैं।बदलती स्थिति में इस दल के भविष्य के लिए इसे अच्छा नहीं माना जा रहा है।क्योंकि भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व अन्य तरह की शासनहीनता के खिलाफ जिस तरह अब इस देश के उच्चस्तरीय गैर राजनीतिक हलकों में भी गुस्सा व असंतोष बढ़ता जा रहा है कि सन 2014 में बनने वाली कोई भी अगली सरकार इसी तरह से देश को नहीं चला सकेगी जिस तरह आज सोनिया-मन मोहन की जोड़ी मजबूरी में या फिर लापारवाहीपूर्वक चला रही है।यही भाजपा सन 1998 से पहले जब केंद्र में प्रतिपक्ष में थी तो वह  भ्रष्टाचार व अपराधीकरण पर काफी हो हल्ला करती  रही थी।पर वह 1998 में सरकार में आने के बाद इन दो मुद्दों पर   समझौतावादी ही साबित हुई।अब ऐसी गलती की पुनरावति यह देश सहन नहीं करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   क्या भाजपाका केंद्रीय नेतृत्व अब भी बिहार की नीतीश सरकार की जिसमें भाजपा भी एक मजबूत सहयोगी है,राजनीतिक उपलब्धियों से भी कोई सबक नहीं लेगा जिसने भ्रष्टाचार व अपराधीकरण के खिलाफ .भरसक बेलाग कार्रवाइयां करके अपना जन समर्थन काफी बढ़ा लिया है।नीतीश सरकार ने बिहार में कोई सांप्रदायिक या फिर जातीय भावना उभार कर वोट नहीं लिया।बल्कि उसने अपराध व भ्रष्टाचार के खिलाफ हमले की ईमानदार कोशिश करके अपना जन समर्थन बढ़ाया।बिहार सहित पूरे देश की सबसे बड़ी समस्या भीषण सरकारी भ्रष्टाचार ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इन दो समस्याओं पर कठोर रुख अपनाने के बदले अन्य भावनात्मक मुददे भाजपा उठाती रही।ऐसा नहीं कि बिहार में कोई स्वर्ग आ गया है।पर नीतीश कुमार ने अपने करीब पांच  साल के क्रियाकलापों से जनता को यह जरूर विश्वास दिला दिया है कि वे भ्रष्टाचार व अपराध से कोई समझौता ं करने को तैयार नहीं हैं।क्या कर्नाटका की यदुरप्पा सरकार को लेकर भाजपा कोई ऐसा ही कदम नहीं उठा सकती ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   पर भाजपा ने अब तक अपने सत्ता काल में बार- बार यह साबित किया कि उसके लिए भ्रष्टाचार व अपराधीकरण  ‘मर्मस्थल मुद्दे’ नहीं हैं। अपराधीकरण व भ्रष्टीकरण को लेकर यदि भाजपा ने किसी नेता के खिलाफ वैसी ही सख्त कार्रवाई की होती जैसी कार्रवाई उसने जसवंत सिंह के खिलाफ एक बार की थी तो आज भाजपा पर न तो यह आरोप लगता और न उसे लगातार दो लोक सभा चुनाव हारना पड़ता।उसे चुनाव दृश्य से अटल बिहारी वाजपेयी की अनुपस्थिति और दूसरी तरफ राहुल गांधी यानी नेहरू खानदान के एक सदस्य राहुल गांधी की मजबूत उपस्थिति का जितना चुनावी नुकसान हुआ,उसकी क्षतिपूत्र्ति भी हो गई होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      अटल सरकार के समय भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को घूस लेते हुए कैमरे पर दिखाया गया था।इसके बावजूद बंगारू की पत्नी को भाजपा ने लोक सभा का चुनावी टिकट दे दिया था । जन विश्वास हासिल करने के लिए जरूरी है कि इन गलतियों के लिए भाजपा देश से माफी मांगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  इतना ही नहीं । याद कीजिए सन् 2000 की वह घटना जब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एन बिट्ठल ने अटल सरकार के चार मंत्रियों की संपत्ति की जांच करने का निदेश सी.बी.आई.को दिया था।वे चारों चर्चित  हवाला घोटाले के अभियुकत रह चुके थे।पर सुप्रीम कोर्ट ने ं कहा था कि सी.बी.आई.ने हवाला घोटाले की ठीक से जांच ही नहीं की।पर इसके विपरीत अटल सरकार ने आरोपितों केा बचाने के लिए सतर्कता आयोग को एक सदस्यीय की जगह तीन सदस्यीय बना दिया ताकि किसी अगले एन.बिटठल को भी किसी मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं हो।क्या यह गलती हाल में पी.जे.थामस को सी.वी.सी बनाने की कांग्रेसी सरकार की गलती से कम थी ? क्या यह गलती माफी मांगने योग्य नहीं है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    एक और गलत काम  अटल सरकार ने तब किया जब सुप्रीम कोर्ट ने 2 मई 2002 को चुनाव आयोग से कहा कि वह उम्मीदवारों के बारे में दिशा निदेश जारी करे। दिशा निदेश यह कि उम्मीदवार अपने शपथ पत्र के साथ संपत्ति,आपराधिक रिकाॅर्ड व शैक्षणिक योग्यता का विवरण दंे।अटल सरकार ने इस निदेश को विफल करने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में ही संशोधन कराने के लिए अध्यादेश जारी करा  दिया।पर भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने इस संशोधन को ही रद कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;( 9 मार्च 2011 को प्रभात खबर पटना में प्रकाशित )&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-4099551947935633807?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/4099551947935633807/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=4099551947935633807&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/4099551947935633807'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/4099551947935633807'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='बाबा राम देव पर डोरे डालने से पहले भाजपा अपनी पिछली  गलतियों के लिए देश से माफी भी मांगे'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-2690465521751280493</id><published>2011-02-02T12:44:00.002+05:30</published><updated>2011-02-02T12:48:23.479+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Vishleshan'/><title type='text'>1998 से 2004 तक की अपनी गलतियों के लिए देश से पहले माफी क्यों नहीं मांग लेती भाजपा ?</title><content type='html'>भाजपा का इन दिनों हौसला बढ़ा हुआ है। अनेक घोटालों की खबरों के बीच केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार ढीली पड़ती जा रही है और नैतिक दष्टि से प्रभावकारी  सिविल सोसायटी में भी बढ़ते रोष की झलक सड़कों पर भी अब देखी जा रही है। भाजपा को आज यह लग रहा है कि इसका राजनीतिक व चुनावी लाभ अंततः उसे ही मिलेगा। शायद मिले भी। जेपी आंदोलन का भी चुनावी लाभ राजनीतिक दलों को ही मिला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    पर इस तरह का कोई लाभ प्राप्त करने की कोशिश से पहले भाजपा अपने पिछले शासन काल की अपनी गलतियों के लिए देश से माफी क्यों नहीं मांग लेती ? माफी नहीं मांगने के साथ-साथ उसे मतदाताओं से यह भी वायदा करना चाहिए कि दुबारा सत्ता में आने के बाद वह गलतियां नहीं दुहराएगी। यदि भाजपा ऐसा नहीं करती तो भले लोक सभा के अगले चुनाव में उसे एक बार फिर केंद्र की सत्ता मिल जाए, पर जन मानस पर उसकी नैतिक धाक नहीं जम सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    याद रहे कि 1998 से 2004 के बीच के शासन काल में तथा उससे पहले भी भाजपा व उसके सहयोगी दलों ने भ्रष्टाचार व राजनीति के अपराधीकरण और कानून तोड़कों के खिलाफ  नरमी  दिखाई थी और इसका खामियाजा उसे आज भी भुगतना पड़ रहा है।सन 1997 में भाजपा के केंद्रीय नेतत्व ने यू.पी. के कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में उस प्रदेश के लगभग सभी उन खूंखार अपराधियों व माफियाओं को शामिल कर लिया था जो  विधायक थे। किसी भी कीमत पर  सत्ता में बने रहने के लिए ही भाजपा ने तब वैसा किया था। इस मुददे पर पूछे जाने पर एक बड़े भाजपा ने तब लखनउ में मीडिया से कहा था  कि जनता ने उन्हें विधायक बना दिया था। हमने तो उन्हें सिर्फ मंत्री बनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   बिहार में जिस तरह इन दिनों सरकारी व राजनीतिक प्रयासों से धीरे -धीरे राजनीति से खूंखार अपराधियों व माफियाओं का असर कम किया जा रहा है ,उससे यह साफ है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति बलवती हो तो यह काम देश के अन्य हिस्सों में भी संभव है।भाजपा को देश से यह वायदा करना चाहिए कि वह राजनीति के अपराधीकरण को कम करने के लिए गंभीर प्रयास करेगी,जब वह केंद्र में एक बार फिर सत्ता में आएगी। पर जनता उसके इस वायदे पर भरोसा तब तक नहीं करेगी जब तक  भाजपा उत्तर प्रदेश प्रकरण के लिए देश से माफी नहीं मांग लेती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     इस देश की ं कम्युनिस्ट पार्टी सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध करने की  अपनी गलती के लिए देश से माफी मांग चुकी है।ऐसे कुछ अन्य उदाहरण भी मौजूद हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  भाजपा ने केंद्र में 1998 से 2004 तक लगातार छह साल तक शासन किया,पर उसने यह साबित कर दिया कि  भ्रष्टाचार के मामले में भी वहं कांग्रेस से वह बिलकुल अलग नहीं है।नतीजतन सन 2004 के लोक सभा चुनाव में उसके वोट बैंक में इतना अधिक इजाफा नहीं हो सका था कि वह संकट में काम आ जाता। यहां तक कि भाजपा 2009 में अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक दृश्य से ओझल होने का झटका भी बर्दास्त नहीं कर सकी। याद रहे कि यह झटका मात्र तीन प्रतिशत मतों का ही था।याद रहे कि वाजपेयी की अनुपस्थिति और नेहरू-इंदिरा परिवार के राहुल गांधी की दमदार उपस्थिति के कारण भाजपा के करीब तीन प्रतिशत वोट कांग्रेस की तरफ चले गये और कांग्रेस दुबारा सत्ता में आ गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  दूसरी ओर, नीतीश कुमार की राजनीतिक व प्रशासनिक शैली अपना कर बिहार भाजपा ने बिहार विधान सभा के हाल के चुनाव में भी  अपना वोट बढ़ाया और सीटें भी। 2005 के बाद के बिहार के अन्य चुनाव नतीजे भी इसके सबूत हैं।हालांकि बिहार की शैली यानी नीतीश कुमार की शैली।पर सरकार में रहकर उसको समर्थन देने का लाभ जदयू के साथ -साथ भाजपा को भी मिल रहा है।नीतीश शैली का मतलब है भ्रष्टाचार व राजनीति के अपराधीकरण पर जोरदार सरकारी हमला।क्या भाजपा का केंद्रीय नेतत्व अपनी बिहार शाखाके नेताओं की शासन शैली से कुछ सीख सकेगी ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      घटनाएं बताती हैं कि  भाजपा की चिंता का मुख्य विषय भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व राजनीति का घोर अपराधीकरण नहीं है बल्कि अब भी भावनात्मक मुद्दे ही हैं। भावनात्मक मुद्दे ही अब भी उसके मर्म स्थल को बंेधते हैं।बदलती स्थिति में इस दल के भविष्य के लिए इसे अच्छा नहीं माना जा रहा है।क्योंकि भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व अन्य तरह की शासनहीनता के खिलाफ जिस तरह अब इस देश के उच्चस्तरीय गैर राजनीतिक हलकों में भी गुस्सा व असंतोष बढ़ता जा रहा है कि सन 2014 में बनने वाली कोई भी&lt;br /&gt;अगली सरकार इसी तरह से देश को नहीं चला सकेगी जिस तरह आज सोनिया-मन मोहन की जोड़ी लापारवाहीपूर्वक चला रही है।अब इस देश के बड़े बड़े उदयोगपति भी सरकार से सार्वजनिक रूप से यह अपील कर रहे हैं कि वह भ्रष्टाचार पर काबू पाए। इसी 30 जनवरी को सामाजिक संगठनों के आहवान पर देश के साठ शहरों में भ्रष्टाचार के खिलाफ रैलियां की गईं।इस अभियान का विस्तार हो सकता है।भाजपा को इस बदली स्थिति से &lt;br /&gt;सबक लेनी  चाहिए।याद रहे कि भाजपा 1998 से पहले जब केंद्र में प्रतिपक्ष में थी तो वह  भ्रष्टाचार व अपराधीकरण पर काफी हो हल्ला करती  रही थी।पर वह 1998 में सरकार में आने के बाद इन दो मुद्दों पर   समझौतावादी ही साबित हुई।अब ऐसी गलती देश सहन नहीं करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   क्या भाजपाका केंद्रीय नेतृत्व अब भी बिहार की नीतीश सरकार की जिसमें भाजपा भी एक मजबूत सहयोगी है,राजनीतिक उपलब्धियों से भी कोई सबक नहीं लेगा जिसने भ्रष्टाचार व अपराधीकरण के खिलाफ .भरसक बेलाग कार्रवाइयां करके अपना जन समर्थन काफी बढ़ा लिया है।नीतीश सरकार ने बिहार में कोई सांप्रदायिक या फिर जातीय भावना उभार कर वोट नहीं लिया।बल्कि उसने अपराध व भ्रष्टाचार के खिलाफ हमले की ईमानदार कोशिश करके अपना जन समर्थन बढ़ाया।बिहार सहित पूरे देश की सबसे बड़ी समस्या भीषण सरकारी भ्रष्टाचार ही है। उत्तर भारत के अनेक प्रांतों की दूसरी गंभीर समस्या राजनीति का अपराधीकरण व अपराध का राजनीतिकरण है।यदि केंद्र की अटल सरकार ने अपने छह साल के शासन काल में इन दो मुद्दों पर बेलाग फैसले किए होते तो राजग अटल बिहारी वाजपेयी की चुनावी दृश्य से अनुपस्थिति से  इस बार हुई क्षति की भी पूत्र्ति कर लेता। सन् 2004 के चुनाव में तो राजग की पराजय का मुख्य कारण फीलगुड के अहंकार में आकर उसके द्वारा अपने पुराने घटक दलों को तिरस्कृत करना था।तिरस्कृत दलों में लोजपा व द्रमुक शामिल थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;        इन दो समस्याओं पर कठोर रुख अपनाने के बदले जिन्ना बनाम सरदार पटेल के भावनात्मक मुद्दे को लेकर जसवंत सिंह को दल से निकालना भाजपा का दिमागी दिवालियापन ही नजर आया । अब राम मंदिर विवाद जब उसे चुनाव में काम नहीं आ रहा है तो सरदार पटेल भाजपा को अगले चुनाव में  कितना काम आएंगे ? हां,भ्रष्टाचार व अपराधीकरण पर निर्मम प्रहार जरूर काम आ सकता है।क्योंकि इन समस्याओं से समाज का हर वर्ग पीड़ित है।बिहार में इनका विरोध  काम आ भी रहा है।याद रहे कि अपराध व भ्रष्टाचार के कारण देश का विकास बाधित है।यह बात अब अनेक लोग कहने लगे हैं।सरकारी धन आम जनता तक नहीं पहंुच पा रहा है।ऐसा नहीं कि बिहार में कोई स्वर्ग आ गया है।पर नीतीश कुमार ने अपने करीब पांच  साल के क्रियाकलापों से जनता को यह जरूर विश्वास दिला दिया है कि वे भ्रष्टाचार व अपराध से कोई समझौता ं करने को तैयार नहीं हैं।क्या कर्नाटका की यदुरप्पा सरकार को लेकर भाजपा कोई ऐसा ही कदम नहीं उठा सकती ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   पर भाजपा ने अब तक अपने सत्ता काल में बार- बार यह साबित किया कि उसके लिए भ्रष्टाचार व अपराधीकरण  ‘मर्मस्थल मुद्दे’ नहीं हैं। अपराधीकरण व भ्रष्टीकरण को लेकर यदि भाजपा ने किसी नेता के खिलाफ वैसी ही सख्त कार्रवाई की होती जैसी कार्रवाई उसने जसवंत सिंह के खिलाफ एक बार की थी तो आज भाजपा पर न तो यह आरोप लगता और न उसे लगातार दो लोक सभा चुनाव हारना पड़ता।उसे चुनाव दृश्य से अटल बिहारी वाजपेयी की अनुपस्थिति और दूसरी तरफ राहुल गांधी की मजबूत उपस्थिति का जितना चुनावी नुकसान हुआ,उसकी क्षतिपूत्र्ति भी हो गई होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    भाजपा के लिए लाल चैक पर तिरंगा फहराना जरूरी लगता है,पर उसे यदुरप्पा पर कार्रवाई करना सही नहीं लगता।भाजपा के लिए सांप्रदायिक मुद्दे या फिर विभिन्न पक्षों में भावनाएं उभारने वाले मुददे और कुछ मंडलवादी  दलों के लिए जातीय मुद्दे ही अब भी आसान लगते हैं।पर अब ये चुनावी हथियार कुंद होते जा रहे हैं।राजनीतिक स्थिति बदल रही है।इस बीच केंद्र की कांग्रेस नीत सरकार ने भ्रष्टाचार व कानूनी अराजकता के मामले में इतनी अधिक लापारवाहियां की हैं कि अब जनता का गुस्सा उबाल के बिंदु तक पहुंच रहा है और किसी नई सत्ताधारी जमात द्वारा की जाने वाली रफफूगिरी से भी काम नहीं चलने वाला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      अटल सरकार के समय बंगारू लक्ष्मण को घूस लेते हुए कैमरे पर दिखाया गया था।दूसरी ओर एक मंत्री दिलीप सिंह जूदेव को लोगों ंने यह कहते हुए टी.वी.पर देखा था कि  ‘पैसा खुदा तो नहीं,पर खुदा कसम , खुदा से कम भी नहीं।’इसके बावजूद बंगारू की पत्नी को भाजपा ने लोक सभा का चुनावी टिकट दे दिया था  और दिलीप सिंह जूं देव के खिलाफ कोई कार्रवाई भी हुई,यह मालूम नहीं। जन विश्वास हासिल करने के लिए जरूरी है कि इन गलतियों के लिए भाजपा देश से माफी मांगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  इतना ही नहीं । याद कीजिए सन् 2000 की वह घटना जब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एन बिट्ठल ने अटल सरकार के चार मंत्रियों की संपत्ति की जांच करने का निदेश सी.बी.आई.को दिया था।वे चारों चर्चित  हवाला घोटाले के अभियुकत रह चुके थे।इन में से दो भाजपा के थे।बाद में हवाला कांड में वे बरी जरूर हो गये थे,पर सुप्रीम कोर्ट ने ं कहा था कि सी.बी.आई.ने हवाला घोटाले की ठीक से जांच ही नहीं की।यदि भाजपा ने अपने उन दो मंत्रियों पर सख्त कार्रवाई की हेाती तो जनता का उसमें विश्वास बढ़ता और भाजपा को 2004 में सत्ता से बाहर नहीं होना पड़ता।पर इसके विपरीत अटल सरकार ने आरोपितों केा बचाने के लिए सतर्कता आयोग को एक सदस्यीय की जगह तीन सदस्यीय बना दिया ताकि किसी अगले एन.बिटठल को भी किसी मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं हो।क्या यह गलती हाल में पी.जे.थामस को सी.वी.सी बनाने की कांग्रेसी सरकार की गलती से कम थी ? क्या यह गलती माफी मांगने योग्य नहीं है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    एक और गलत काम  अटल सरकार ने तब किया जब सुप्रीम कोर्ट ने 2 मई 2002 को चुनाव आयोग से कहा कि वह उम्मीदवारों के बारे में दिशा निदेश जारी करे।दिशा निदेश यह कि उम्मीदवार अपने शपथ पत्र के साथ संपत्ति,आपराधिक रिकाॅर्ड व शैक्षणिक योग्यता का विवरण दंे।अटल सरकार ने इस निदेश को विफल करने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में ही संशोधन कराने के लिए अध्यादेश जारी करा  दिया।पर भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने इस संशोधन को ही रद कर दिया।नतीजतन आज हम उम्मीदवारों के जो विवरण हासिल कर लेते हैं,वह भाजपा की इच्छा के विरूद्ध ही हासिल कर पाते हैं।क्या भाजपा ने इस के लिए कभी देश के सामने अफसोस जाहिर किया ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   यानी कांग्रेस के बदले केंद्र सरकार  की गददी पर बैठने का हौसला बांधने वाली भाजपा पहले खुद को पार्टी विथ अ डिफरेंस तो साबित करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  ऐसा करने पर किसी भी दल को राजनीतिक व चुनावी लाभ मिलेगा,भाजपा तो एक बड़ी पार्टी है।बिहार का ताजा इतिहास इस बात का सबूत देश के सामने पेश कर रहा है।भाजपा अब भी पार्टी विथ अ डिफेंस होती तो आर.एस.एस.के प्रधान मोहन भागवत को गत साल यह सलाह नहीं देना पड़ती कि  ‘भाजपा खुद को एक बार फिर ‘पार्टी विथ अ डिफरेंस’ के तौर पर पेश करे।’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;(1 फरवरी, 2011 को जनसत्ता में प्रकाशित)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-2690465521751280493?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/2690465521751280493/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=2690465521751280493&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/2690465521751280493'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/2690465521751280493'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2011/02/1998-2004.html' title='1998 से 2004 तक की अपनी गलतियों के लिए देश से पहले माफी क्यों नहीं मांग लेती भाजपा ?'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-2830642640045508578</id><published>2010-08-06T01:52:00.000+05:30</published><updated>2010-08-06T01:54:27.291+05:30</updated><title type='text'>बिहार ऐसे पा रहा है नक्सली समस्या पर काबू</title><content type='html'>देश की नक्सली समस्या और उसके समाधान के उपायों को समझने के लिए यहां प्रस्तुत एक आंकड़ा महत्वपूर्ण है। सन 2004 से 2008 तक पूरे देश मंे नक्सली हिंसा में हर साल औसतन करीब 500 नागरिक मारे गये। सन 2009 में यह संख्या बढ़ कर 591 हो गई। इस साल के जून तक 325 नागरिक मारे जा चुके हैं।   दूसरी ओर, बिहार में नक्सली हिंसा में 2001 से 2004 तक कुल 668 लोग मारे गये थे। पर सन 2006 से 2009 तक नक्सली हिंसा में मृतकों की संख्या घटकर 160 रह गई।  ऐसा आखिर कैसे और क्यों हुआ ? आखिर क्यों बिहार में नक्सलियों की मारक क्षमता घट रही है जबकि देश के कई अन्य हिस्सों में बढ़ रही है ? जबकि पांच -छह साल पहले बिहार में नक्सली बनाम निजी सेनाओं द्वारा जारी हिंसा-प्रतिहिंसा में आए दिन बड़े- बड़े नरसंहार होते रहते थे। बिहार के कुछ जघन्य व चर्चित नरसंहारों के स्थलों के नाम तो पूरे देश के अखबार पढ़ने वालों को संभवतः याद भी हो गये होंगे। दलेल चक बघौरा, बारा, सेनारी, मियांपुर, अरवल, लक्ष्मणपुर बाथे जैसे स्थानों के नाम अब बीते दिनों के दुःस्वप्न ही रह गये हैं जहां गत दो -तीन दशकों में बड़े -बड़े नरसंहार हुए थे। उन प्रत्येक नरसंहार में मृतकों की संख्या दर्जनों में थी।    यह संयोग या दैव योग नहीं है कि बिहार मंे नक्सलियों की मारक क्षमता गत चार पांच साल में काफी घटी है। इसके लिए राज्य सरकार ने संगठित उपाय किए हैं। यदि ऐेसे ही उपाय अन्य नक्सल पीड़ित प्रदेश करें तो वहां भी बिहार जैसी सफलता मिल सकती है। बिहार में भी अभी पूरी सफलता नहीं मिली है। पूरी सफलता के लिए केंद्र सरकार को राजनीति से उपर उठकर बिहार को भरपूर आर्थिक मदद करनी होगी। साथ ही, बिहार शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के स्तर को कड़ाई से घटाना होगा ताकि विकास व कल्याण योजनाओं के लाभ गरीबों को मिल सकें। दरअसल बिहार में नीतीश सरकार ने 2005 में सत्ता संभालने के साथ ही नक्सली समस्या पर काबू पाने के लिए समेकित उपाय शुरू कर दिए थे। राज्य सरकार ने अपने ही प्रदेश के पुराने अनुभवों का भी लाभ उठाया। राज्य सरकार ने यह बात अच्छी तरह समझ ली है कि सिर्फ पुलिसिया कार्रवाइयों से इस पर काबू नहीं पाया जा सकता है। जानकार सूत्रों के अनुसार राज्य सरकार ने नक्सली आंदोलन से जुड़े विभिन्न प्रकार के तत्वों की पहचान करके उनके अनुकूल उपाय किए तभी जाकर नक्सलियों की मारक क्षमता घटी।   दरअसल नक्सली समस्या के पांच  प्रमुख  तत्व व कारक हैं। पहला तत्व है मार्क्सवादी -लेनिनवादी-माओवादी विचारों से लैस वे थोड़े से लोग जिन्हें काबू में लाना काफी मुश्किल काम है। हां, उन्हें आम लोगों से अलग -थलग जरूर किया जा सकता है। ऐसे लोगों की मूल ताकत वे गरीब व उपेक्षित लोग ही हैं जिन्हें सरकारों ने भगवान भरोसे उनके हाल पर छोड़ रखा है। आजादी का कोई लाभ उन्हें अब तक नहीं मिला है। जहां लाभ मिलने लगा है, वहां स्थिति बदल रही है। यह दूसरा तत्व है।     किसी भी सरकार के लिए यह एक बड़ी समस्या है कि किस तरह समावेशी विकास करके इन गरीबों को माओवादी विचारकों व कार्यकर्ताओं की गिरफ्त से अलग किया जाए। इस आंदोलन में एक तीसरे प्रकार के लोग भी हैं जो यह समझते हैं कि किसी भी तरह की जघन्य हिंसा कर देने के बावजूद कानून के हाथ उन तक नहीं पहुंचेंगे। जमीन को लेकर जारी विवादों के कारण भी नक्सली मजबूत हुए हैं। यह चौथा तत्व व कारक है। पांचवां तत्व है भीषण सरकारी भ्रष्टाचार।  इन पांच तरह के तत्वों को ध्यान में रखते हुए नीतीश सरकार ने विभिन्न कानूनी व प्रशासनिक उपाय किए हैं। नक्सलियों की बिहार में मारक क्षमता घटने का यही कारण है। राज्य का आर्थिक विकास हो तो रहा है। पर अधूरा। सरकारी व राजनीतिक भ्रष्टाचार विकास में बाधक हैं। यदि समावेशी विकास कार्यों को जनता तक संपक्तता यानी सेचुरेशन की हद नहीं पहुंचाया गया तो नक्सली समस्या से मिली राहत क्षणिक साबित हो सकती है। अब जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर है कि वह राजनीति छोड़कर बिहार जैसे राज्यों की भरपूर आर्थिक मदद करे जो राज्य नक्सली समस्या से वास्तव में जूझ रहे हैं व एक हद तक सफलता भी पा रहे हैं।    नीतीश सरकार ने विचारों से लैस उन थोड़े से लोगों के लिए बल प्रयोग का रास्ता अपनाया है जो बंदूक के बल पर राजसत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं। पर गरीबों को नक्सलियों से काटने के लिए गत पौने पांच साल में बिहार में आम विकास के व्यापक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। ताजा आंकड़े के अनुसार बिहार की विकास दर इन दिनों देश में लगभग सर्वाधिक है। पर, यह भी नाकाफी हैं। केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने गत अप्रैल में संसद में कहा कि यदि राज्य सरकारें, केंद्र सरकार के साथ मिल कर काम करें तो तीन साल के अंदर नक्सलियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। बिहार के मुत्तलिक समस्या यह है कि केंद्र सरकार बिहार सरकार की भरपूर कौन कहे, वाजिब मदद भी नहीं कर रही है, ऐसी शिकायत मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने की है। नीतीश कुमार को ऐसा कहने का हक भी है क्योंकि नक्सली समस्या पर काबू पाने में भी बिहार ने हाल में देश को राह दिखाई है। अधिक दिन नहीं हुए जब केंद्र सरकार ने अन्य राज्यों से कहा था कि वे भी ‘आपकी सरकार आपके द्वार’ कार्यक्रम चलाकर नक्सली समस्या पर काबू पाए क्योंकि इस कार्यक्रम को बिहार में सफलता मिल रही है। बिहार में जारी इस कार्यक्रम का उद्देश्य चुने हुए खास इलाके में विकास को संपक्तता की हद तक पहुंचाना है। पर सभी गांवों में ऐसे विकास के लिए पर्याप्त साधन चाहिए जो केंद्र ही मुहैया करा सकता है।     प्रधानमंत्री मन मोहन सिंह ने गत 21 अप्रैल 2010 को कहा था कि माओवादी हिंसा आंतरिेक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ‘हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिन इलाकों में इस आतंकवाद ने पैर पसारा है, उनमें से ज्यादातर विकास के लिहाज से पिछड़े हैं।’ प्रधान मंत्री सिविल सेवा दिवस पर आयोजित समारोह में बोल रहे थे।’ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमण सिंह ने गत साल अगस्त मंे कहा कि नक्सलवाद की समस्या को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाना चाहिए। इस पष्ठभूमि में केंद्र की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। पर केंद्रीय राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने इसी 14 जुलाई, 2010 को पटना में कहा कि यदि बिहार में हमारी सरकार बनी तो बिहार को विशेष ‘सम्मान’ का दर्जा मिलेगा। इस सम्मान शब्द का अर्थ केंद्रीय आर्थिक मदद के रूप में लगाया गया। यानी कांग्रेस की सरकार नहीं बनेगी तो क्या बिहार पहले की तरह ही केंद्र द्वारा उपेक्षित रहेगा? यहां यह सवाल भी पूछा जा रहा है।ऐसे में कैसे होगा इस नक्सली समस्या का पूर्ण उन्मूलन जो प्रधानमंत्री के अनुसार आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है? यह बात भी याद रखने की है कि बिहार नेपाल सीमा के पास ही है।     नीतीश सरकार के कार्यकाल में त्वरित अदालतों के जरिए करीब 48 हजार अपराधी लोगों यानी आरोपितों को निचली अदालतों से सजाएं दिलवाई जा चुकी है। इनमें नक्सल हिंसा-प्रतिहिंसा से जुड़े आरोपी भी हैं। इन सजाओं के भय से वैसे नक्सली या फिर नक्सल विरोधी सेनाओं के लोग डर गये हैं जो किसी तरह की सजाओं से डरते हैं। इसलिए उनलोगों ने मारकाट कम कर दी है। जमीन को लेकर जारी झगड़ों को स्थानीय स्तर पर तुरंत सुलझाने के लिए भी संस्थागत प्रशासनिक उपाय मौजूदा राज्य सरकार ने किए हैं। इसके लिए कानून भी बनाया गया है। पर उसका लाभ अभी बाद में मिलेगा।पर सरकारी भ्रष्टाचार पर काबू पाने की जिम्मेदारी नीतीश सरकार की जरूर है।     आखिर इस नक्सली समस्या ने समय बीतने के साथ इतना विकराल रूप धारण ही कैसे कर लिया ? इसकी वस्तुपरक पड़ताल किए बिना इस पर काबू पाने में भी कठिनाइयां आएंगी। पहले के नक्सलियों और अब के माओवादियों के इस देश में फलने-फूलने के कई कारण रहे हैं। कई कारणों के मिले जुले असर के कारण ही माओवादी आज  ताकतवर हो चुके हैं। गरीबी, विस्थापन, अर्ध सामंती समाज -व्यवस्था और कानून -व्यवस्था की लचर स्थिति के मिले जुले कुप्रभाव को कम करने से ही इस समस्या पर काबू पाया जा सकेगा, ऐसा अनेक प्रेक्षक मानते हैं। कम करने का यह प्रयोग बिहार में एक सीमा तक हो रहा है और वह एक हद तक सफल भी रहा है। हालांकि ऐसे प्रयोग को देश भर में और भी सघन, व्यापक, ठोस व प्रामाणिक बनाने की जरूरत है। ऐसे उपायों को और सघन व प्रामाणिक बनाने की क्षमता बिहार सरकार में भी फिलहाल नजर नहीं आती क्योंकि बिहार के प्रशासन व राजनीति में भी भ्रष्टाचार व निहित स्वार्थ बहुत अधिक हैं जो प्रयासों के बावजूद कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ हाल में बने एक कारगर कानून को अभी अपना रंग दिखाना अभी बाकी है। हालांकि अभियोजन पक्ष ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में धराए राज्य के दस बड़े अफसरों की करोड़ों की संपत्ति जब्त करने की गुजारिश कोर्ट से कर दी है। यदि जब्त हो गई तो उसका असर अन्य भ्रष्ट अफसरों पर पड़ेगा।       याद रहे कि नक्सली आंदोलन भले सन 1967 में बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ, पर बाद के वर्षों में एक समय बिहार में इसका सर्वाधिक असर था। आंध्र प्रदेश तथा अन्य राज्यों में तो वह बिहार के बाद ही फैला।     हालांकि करीब बीस -पच्चीस साल पहले भी बिहार में जब तत्कालीन सरकार ने कम से कम दो स्थानों पर नक्सली नर संहारों के मूल कारणों को समाप्त कर दिया तो वहां भी बाद के वर्षों में नक्सलियों का असर कम हो गया था। वे स्थान हैं औरंगाबाद जिले के दलेल चक  - बघौरा और आसपास के इलाके तथा अरवल मुख्य बाजार। याद रहे कि अरवल में 1986 में पुलिस ने नक्सलियों की सभा पर अंधाधुंध गोलियां चलाकर 21 लोगों को मार दिया था। उधर 1987 में औरंगाबाद जिले के दलेल चक बघौरा में माओवादियों ने 54 किसानों की सामूहिक हत्याएं कर दी थीं।&lt;br /&gt;     सरकार के भ्रष्ट कारिंदों व हदबंदी से अधिक गैर कानूनी तरीके से जमीन रखने वाले अन्यायी लोगों ने अनेक मामलों में गरीबों को नक्सलियों की शरण में जाने के लिए बाध्य कर दिया। बिहार के कई उदाहरण मौजूद हैं जहां -जहां देर से ही सही प्रशासन व सरकार ने गरीबों की सुधि ली, वहां -वहां से नक्सलियों के तम्बू उखड़़ गये।&lt;br /&gt;यदि बिहार में सख्त व सभी पक्षों को मान्य बटाईदारी कानून बन जाता तो नक्सली समस्या से निजात पाने में राज्य सरकार को कुछ और भी सुविधा हो जाती। पर चुनाव लड़ने वाली किसी पार्टी के लिए यह काम अब असंभव नहीं तो कठिन जरूर हो गया है। योजना आयोग के पूर्व सचिव एन.सी. सक्सेना ने गत 18 अप्रैल को कहा कि ‘बिहार के मगध क्षेत्र में 30 प्रतिशत बटाईदार हैं। जाहिर है कि सरकार की सब्सिडी योजना का उन्हें कोई फायदा नहीं मिलता।’ हालांकि नक्सली समस्या के पीछे बटाईदारी समस्या का कम ही हाथ है। समस्याएं और भी हैं और गहरी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी गत 16 फरवरी 2010 को कहा कि ‘केवल हथियारों का सहारा लेने के बजाए सरकार को विकास कार्य तेज करना चाहिए।’&lt;br /&gt;    जून, 2006 में बिहार में भूमि सुधार आयोग बना। रिटायर आई.ए.एस., डी. बंदोपाध्याय उसके अध्यक्ष थे। आयोग ने अपनी रपट राज्य सरकार को दी। उस रपट में अन्य बातों के अलावा बटाईदारों को कारगर हक देने की सिफारिश है। गत साल जुलाई में नीतीश सरकार के एक मंत्री ने यह बयान दे दिया कि इसे लागू करने पर बिहार सरकार विचार कर रही है। फिर क्या था ! जमीन वालों की जमात नाराज हो गई और सितंबर में हुए उप चुनावों में राजग उम्मीदवारों को बुरी तरह हरा दिया। 18 विधान सभा क्षेत्रों में से 13 सीटों पर राजग हार गया। अब यह बात तय है कि नीतीश सरकार इसे लागू नहीं करेगी। यदि नीतीश सरकार अगले विधानसभा चुनाव के बाद फिर से सत्ता में आ भी जाए तोभी उसे वह लागू नहीं करेगी, ऐसा संकेत मिल रहा है। क्योंकि इस मुददे पर नीतीश सरकार काफी डर गई है। पर प्रतिपक्षी दल जमीन वालों को इस भावी बटाईदारी कानून का भय दिखा कर राजग के खिलाफ हवा बनाने की कोशिश जरूर कर रहे हैं। पता नहंीं अगले बिहार विधानसभा चुनाव में इसका क्या नतीजा होगा। इससे इस मामले की संवेदनशीलता और फिर इसकी गंभीरता का पता चलता है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि इससे यह भी पता चलता है कि इस समस्या को हल करना कितना जरूरी है। पर कई अन्य लोग इस स्थापना से सहमत नहीं हैं।      पश्चिम बंगाल में इस भूमि आयोग को जो सफलता मिली, उससे श्री बंदोपाध्याय को एक खास तरह की विश्वसनीयता मिली हुई है। तब बंगाल में नक्सली आंदोलन ठंडा पड़ा था। पर जब गरीबों के विकास व कल्याण के दूसरे काम वाम सरकार ने नहीं किए तो नक्सली फिर पनप गये। बंदोपाध्याय ने भी कहा था कि बिहार की भूमि समस्या पश्चिम बंगाल की समस्या से बिल्कुल अलग हैं। बिहार की भूमि समस्या अधिक जटिल है। इसीलिए उन्होंने भूमि हदबंदी, चकबंदी, भूमि अभिलेख , बटाईदारी, अतिक्रमण, भूदान में प्राप्त जमीन के वितरण की समस्याओं पर अपनी रपट दी। बंगाल का कथित क्रांतिकारी बटाईदारी कानून जब नक्सलियों को पनपने से अंततः नहीं रोक सका तो बिहार में बंदोपाध्याय रपट कैसी क्रांति कर देगी,यह देखना दिलचस्प होगा।याद रहे कि बंगाल में बंटाईदारी कानून कुछ ही दिनों तक नक्सलियों को उभरने से रोक सका था।असल काम तो हर जगह आम विकास का अधिक होना चाहिए था जो देश में काफी कम हो रहा है।   बिहार में करीब सत्तर प्रतिशत लोग खेती और उससे जुड़े धंधे पर निर्भर करते हैं।खेती को लेकर अनेक समस्याएं हैं।खेती के विकास से राज्य का विकास भी जुड़ा हुआ है।खेती से जुड़े लोगों की आमदनी बढ़ाए बिना राज्य में उद्योगों के विकास की कल्पना भी फिजूल है। सत्तर प्रतिशत लोगों की आय नहीं बढ़ेगी तो छोटे बड़े कारखानों से उत्पादित माल खरीदेंगे कितने लोग ? जनवरी, 2007 में नीतीश कुमार की सरकार ने पटना में एक शानदार ग्लोबल मीट कराया। इस मीट में बाहर से आए लोगों से राज्य में उद्योग लगाने की अपील की गईं।उद्योग लगाने के लिए लोगों को आमंत्रित करना भी जरूरी है।पर, क्या घोड़े के आगे तांगे को लगाया जाएगा ? खेती में आय बढ़ेगी तभी उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी और तभी किसान अपने परिवार के सदस्यों की जरूरतों के अनुसार  सामान खरीदेगा जो कारखानों में पैदा होते हैं। अभी गांवों की बहुत बड़ी आबादी अपने बच्चों के लिए जरूरत के मुताबिक जूते,कपड़े,स्लेट,कागज, कलम, पेंसिल आदि भी नहीं खरीद पाती।     खेती के विकास में सबसे बड़ी बाधा यह है कि खेती लायक जमीन का बहुत बड़ा हिस्सा उनके पास है जो खुद खेती नहीं करते।ऐसी स्थिति में खेती के साथ भारी लापारवाही होती है।कुछ खेत ऐसे ही बंजर छोड़ दिए जाते हैं।खेती में सिंचाई का उचित प्रबंध नहीं रहने के कारण भी खेती से आय कम है। खेती की पैदावार को बाजारों तक आसानी से पहुंचाने के लिए बिहार में अच्छी सड़कों की पिछले वर्षों में भारी कमी रही है।अब जरूर बन रही हैं।पर उन सड़कों की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं।खेती योग्य जमीन का असमान बंटवारा भी अविकास का एक बड़ा कारण है।एक मोटे  अनुमान के अनुसार बिहार में अब भी करीब सवा लाख ऐसे भूमिपति हैं जिनके पास औसतन 45 एकड़ या उससे अधिक जमीन है। अस्सी भूमिपतियों के पास 500 से 2000 एकड़ जमीन अब भी है।याद रहे कि बिहार में भूमि हदबंदी की अधिकतम सीमा 15 एकड़ से 45 एकड़ तक ही है।यानी सिंचाईयुक्त जमीन 15 एकड़ और अन्य 45 एकड़।पर इस कानून का राज्य भर में भारी उलंघन हो रहा है।जो गलती जमींदारी उन्मूलन के समय हुई,उसका खामियाजा राज्य अब तक भुगत रहा है।भूमि सुधार कानून तो बने ,पर उनका उलंघन भी बड़े पैमाने पर हुआ।उलंघन में राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यपालिका का एक हिस्सा भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सहयोगी रहा है।ऐसा स्वार्थवश हुआ।राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यपालिका के सदस्यों का आमतौर पर बड़ा हिस्सा आजादी के बाद भूमिपति परिवारों से ही आया।बिहार में नक्सलियों को अपनी जड़ें जमाने का जो मौका मिला,उसका यह सब कारण रहा है।यानी नक्सली समस्या भूमि समस्या से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।     नक्सलियों ने साठ के दशक में जिन तीन प्रमुख मांगों को लेकर बिहार के गरीबों को संगठित किया,उनमें भूमिपतियों से हदबंदी से फाजिल जमीन को छीनने का एजेंडा मुख्य रहा।दूसरी लड़ाई गैर मजरूआ जमीन को दबंगों के हाथों से निकाल कर उन्हें जरूरतमंद गरीब लोगों में वितरित करने के लिए थी।वे ही उनके असली कानूनी हकदार भी हैं।तीसरी मांग यह होती रही कि सरकार ने खेतिहर मजदूरों के लिए जो न्यूनत्तम मजदूरी तय की है,उसे लागू किया जाए।ये तीनों काम खुद सरकारी मशीनरी को करने चाहिए थे।इन्हें करने के लिए राज्य सरकार ने प्रखंड से लेकर राज्य मुख्यालय तक कर्मचारियों और अफसरों की भारी फौज भी खड़ी कर रखी है।उस पर तनख्वाह के रूप में सरकार भारी खर्च भी करती है।पर उसका इच्छित लाभ नहीं होता।    परिणामस्वरूप जहां तहां नर संहार होते रहे हैं।इन नर संहारों में अधिक गरीब लोग ही मारे जाते हैं।औरंगाबाद जिले के दलेलचक बघौरा में माओवादी कम्युनिस्ट केंद्र के हथियारबंद गिरोह ने 1987 में 41 लोगों की हत्या कर दी। गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार 54 लोग मारे गए।कई  लोग घायल हुए थे।घायलों में से कुछ लोगों की बाद में मौत हो गई।इससे पहले दलेल चक के आसपास के परसडीह,दरमिया,आंजन और छोटकी छेछानी में हत्याएं हुई थीं।यानी नरसंहारों की श्रृंखला बनी थी।दलेल चक बघौरा हत्याकांड तो अंतिम कड़ी था।दलेल चक बघौरा कांड को अंजाम देने वालों ने घटनास्थल पर नारा लगाया था कि ‘छोटकी छेछानी का बदला ले लिया।’     इन हत्याकांडों की जड़ में जमीन विवाद ही था।जमीन विवाद को समय पर हल करने में सरकारी विफलता के कारण ही इतने लोगों की जानें गईं।ऐसे उदाहरण राज्य में और भी हैं।पर भूमि सुधार कानून को लागू करने में सरकारी विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण यही है। औरंगा बाद जिले के मदन पुर प्रखंड के सलुपरा मठ की जमीन को लेकर खून खराबा हुआ। बगल के गया जिले के जानी बिगहा मठ के महंत ही इस सलुपरा मठ की संपत्ति के मालिक थे। सलुपरा मठ के पास कुल 117 एकड़ जमीन थी। मठ की वह जमीन हदबंदी से फाजिल थी। कानून से बचने के लिए ही जानी पुर मठ के महंत ने अपने एक चेले के नाम सलुपरा मठ की जमीन लिख दी।यह काम उसने गैर कानूनी तरीके से किया।सलुपरा मठ की जमीन वहां के गरीब और पिछड़ी जातियों के लोग बटाई पर जोतते थे।इन गरीबों को उम्मीद थी कि एक न एक दिन जानी बिगहा का महंत इन गरीबों के नाम वह जमीन लिख देगा।महंत तो कभी सलुपरा मठ की जमीन पर जाता भी नहीं था।    इस बीच महंत के चेले ने सलुपरा मठ की जमीन में से सत्रह एकड़ जमीन एक दबंग नेता  के नाम बेच दी।अब जानी पुर का महंत यह कहने लगा कि उस जमीन को उस नेता  के नाम बेचने का अधिकार उसके चेले को था ही नहीं।जानी पुर का महंत बाद में यह चाहने लगा कि सलुपरा मठ की जमीन उससे सरकार ले ले और उसे गरीबों में बांट दे।उधर नेता जी यह कहने लगे कि उन्होंने वह जमीन कानूनी तरीके से ही खरीदी है।   यानी यह जमीन विवाद में पड़ गई।मामला राजस्व बोर्ड के विचारार्थ चला गया।राजस्व बोर्ड को भी चाहिए था कि वह मामले का शीघ्र निपटारा कर दे।पर उसने नहीं किया।उधर नेता जी  ने उस जमीन पर अपना कब्जा करना चाहा जिसे  उन्होंने खरीद लिया था।सलुपरा मठ की जमीन से बटाईदार बेदखल होने लगे।बटाईदारों ने पहले प्रशासन के यहां गुहार लगाई।पर प्रशासन ने अपनी आदत का यहां भी परिचय दिया।फिर बटाईदारों ने माओवादियों की शरण ली।एम.सी.सी.ने उन बटाईदारों की मदद की।नेता जी ने उस जमीन पर अपने एक आदमी  को तैनात कर रखा था।माओवादियों ने उसकी हत्या कर दी। नेता जी के एक और मददगार की हत्या कर दी गई।  इसके जवाब में नेता जी के लोगों  ने बगल के गांव परस डीह में छह लोगों की हत्या कर दी।मृतकों में एम.सी.सी.के दो कार्यकर्ता भी थे। उन पर आरोप था कि इन लोगों ने नेता जी के उस आदमी की हत्या की थी।ये सब होता रहा और प्रशासन सोया रहा।परस डीह का बदला लेने के लिए माओवादियों के नेतृत्व में गरीबों ने दरमिया के ग्यारह राजपूतों की हत्या कर दी।इस पर तत्कालीन मुख्य मंत्री बिंदेश्वरी दुबे दरमिया पहुंच गए।उन्होंने घोषणा की कि अब ‘दरमिया’ नहीं होने दिया जाएगा।औरंगा बाद जिले में एम.सी.सी.के सफाए के लिए टास्क फोर्स लगाया गया।जिले के तेरह प्रमुख नक्सलियों की गिरफ्तारी के लिए इनाम की घोषणा की गई।जिले में सशस़्त्र पुलिस बल की सात कंपनियां तैनात की गईं।     उधर नक्सलियों ने अपने समर्थकों को समझाया कि मुख्य मंत्री दरमिया तो गए,पर वे परसडीह नहीं गए।नक्सलियों ने पर्चा छपवाया और बंटवाया,‘परस डीह होता रहे और दरमिया नहीं हो,यह कत्तई नहीं होगा।’औरंगा बाद की खुफिया पुलिस ने यह रपट दी कि सलुपरा मठ की जमीन को लेकर ये सब हत्याएं हो रही हैं। जिले के एस.पी.ने पर्यवेक्षण रपट में लिखा कि उस खास नेता जी की जीप का इस्तेमाल परस डीह हत्याकांड में हुआ।पर नेता जी ने अपनी अग्रिम जमानत के लिए जब जिला अदालत में अर्जी लगाई तो उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक कारणों से उन्हें इस केस में फंसाया गया।दरमिया नर संहार के बदला लेते हुए छोटकी छेछानी में एक और नर संहार कर दिया गया।छोटकी छेछानी कांड के प्रतिशोध में माओवादियों ने 29 मई 1987 की रात में दलेल चक बघौरा के 4 1 राजपूतों की हत्या कर दी। इस कांड की गूंज पूरे देश में सुनी गई।इसके बाद ही राज्य सरकार ने सलुपरा मठ की जमीन को भूमिहीनों में बंटवाया।तब जाकर वहां नर संहार रुका।पर उसके पहले नहीं।जमीन के बंटवारे के बाद उस इलाके में इस तरह की हिंसा-प्रतिहिंसा की घटना नहीं ंहुई।जिन भूमिहीनों को सलुपरा मठ की जमीन मिल गई,उन्हें अब माओवादियों के कॉडर बने रहने की जरूरत ही कहां थी ?      जमीन विवाद के मामले में औरंगा बाद जिले का शुरू से बुरा हाल रहा है।सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस जिले में 30 सितंबर,1986 तक 4445 एकड़ जमीन हदबंदी से फाजिल घोषित की गई थी।किंतु इनमें से सिर्फ 1438 एकड़ जमीन का ही भूमिहीनों में वितरण हो पाया था।नक्सली समस्या के गहराते जाने के बावजूद राज्य सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।जब नर संहार तेज हुआ तभी सलुपरा मठ की जमीन बांटी गई।औरंगा बाद जिले का यह मामला तो नमूना मात्र है।पूरे राज्य में राज्य सरकार ने भूमि समस्याओं को इसी तरह लटकाया।तब नक्सलियों के बारे में अस्सी के दशक की तत्कालीन राज्य सरकार की राय थी कि वे चोर डकैत से अलग नहीं हैं।        ऐसा ही वाकया सन् 1986 में अरवल में हुआ था।अरवल भी औरंगाबाद से बहुत दूर नहीं है।तब नक्सलियों के फं्रट संगठन एम.के.एस.एस.के नेत्त्व में जुटी भीड़ पर पुलिस ने अरवल में धुंआधार फायरिंग की थी।पुलिस दल का नेत्त्व खुद एस.पी. सी.आर.कासवान कर रहे थे।पुलिस की गोलियों से  गरीब लोग मारे गए।गरीब लोग अरवल में स्थित गैर मजरूआ जमीन के एक टुकड़े पर अपना कानूनी हक चाहते थे।जमीन गरीब भूमिहीनों की झोपड़ियों के पास ही थी।बल्कि उनके घर के नाले का पानी भी उसी जमीन पर गिरता था।नहर और झोपड़ी के बीच वह  जमीन थी। वे गरीब पकौड़ी बनाकर अरवल बाजार में बेचते थे और अपना जीविकोपार्जन करते थे।वह जमीन उनके लिए बहुत जरूरी थी।जहानाबाद के तब के कर्तव्यनिष्ठ एस.डी.ओ. व्यासजी मिश्र ने उन भूमिहीनों  के नाम वह जमीन आवंटित कर दी थी।पर बाद के अफसरों ने उसी जमीन को रिश्वत लेकर एक धनी व्यक्ति के नाम कर दिया। एक ऐसे परिवार के नाम भ्रष्ट अफसरों ने जमीन बंदोबस्त कर दी जिस परिवार में इंजीनियर तथा दूसरे अफसर थे।उस परिवार का बड़ा पक्का मकान इन पंक्तियों के लेखक ने अरवल में देखा था।उसके पास अपनी काफी जमीन भी थी।उस धनी व्यक्ति ने उस जमीन पर जबरन चहारदिवारी खड़ी कर दी तो भूमिहीनों से उसका झगड़ा बढ़ गया।प्रशासन से निराश गरीबों ने मजदूर किसान संग्राम समिति से मदद मांगी।यह संगठन नक्सली संगठन सी.पी.आई./एम.एल.-पार्टी यूनिटी/से जुड़ा हुआ था।बाद में पार्टी यूनिटी और एम.सी.सी.का पीपुल्स वार में विलयन हो गया और संगठन का नया नाम पड़ा,भाकपा/माओवादी/। समिति ने इस प्रशासनिक अन्याय के खिलाफ अरवल में एक जन  सभा की।समिति की सभा पर एस.पी.सी.आर.कासवान के निदेश पर पुलिस ने नाहक गोलियां चलाईं और करीब दो दर्जन  लोगों को मार डाला।।वहां के कलक्टर अशोक कुमार सिंह ने घटनास्थल के निरीक्षण के बाद गोलीकांड को गैर जरूरी  बताया था।फिर भी सरकार ने कासवान के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।भूमि समस्या के प्रति सरकार के रूख का इससे साफ पता चलता है।हां,अरवल में जिस भूमि विवाद के चलते नर संहार हुआ था,उस भूमि को राज्य सरकार ने उन्हीं गरीबों में वितरित कर दिया जिन्हें व्यास जी ने पहले एलाट किया था।नतीजतन अब वहां नरसंहार की कोई और घटना नहीं हुई।यानी दलेल चक बघौरा की जमीन विवाद को जिस तरह राज्य सरकार ने बाद में मजबूर होकर सुलझाया,ऐसा ही काम देश की विभिन्न सरकारें अन्य स्थानों में अभियान चला कर पहले ही कर दिया करे तो माओवादियों को कमजोर करने में ठोस मदद सरकारों  को मिल जाएगी।        श्    अरवल और दलेल चक बघौरा जैसी घटनाएं बताती हैं कि पहले से ही मौजूद भूमि सुधार कानूनों को लागू करने के लिए कितनी प्रशासनिक तत्परता की जरूरत है।इन्हें लागू करने से तनावों को दूर किया जा सकता है और नर संहारों को रोका जा सकता है।इन्हें लागू करने के लिए किसी भूमि सुधार आयोग की रपट के इंतजार की जरूरत ही नहीं है।बस राजनीतिक कार्यपालिका में राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिए।क्या वह इच्छा शक्ति है ? छत्तीस गढ़ तथा कुछ अन्य प्रदेशों के आदिवासियों की समस्याएं कुछ दूसरी होंगी।जिन बिंदुओं पर वे प्रशासन से निराश होकर माअेावादियों के पास जा रहे हैं ,उन समस्याओं को हल करके माओवादियों का कमजोर किया जा सकता है।हालांकि ये प्रशासनिक उपाय बल प्रयोग के अलावा और साथ साथ ही होने चाहिए।     ऐसा न हो कि राजस्व तथा अन्य विभागों  की गलतियों का खामियाजा पुलिस व केंद्रीय बल को ही लगातार भुगतना पडे।नक्सली हिंसा में पुलिसकर्मी ही अधिक मारे जाते हैं।क्योंकि घटनास्थल पर तो उसे ही जाना पड़ता है।चाहे अपराध रोकने के लिए या फिर अपराधहो जाने के बाद।गलती करने वाला संबंधित राजस्व,वन तथा अन्य विभागों के अधिकारी व  कर्मचारी तो अनेक मामलों में रिश्वत के पैसों से ऐश कर रहे होते हैं।       बिहार सरकार ने 1982 के अपने एक नोट में कहा था कि ‘नक्सली समस्या सामाजिक आर्थिक समस्या है।इसे सिर्फ पुलिस बल से समाप्त नहीं किया जा सकता।’      भूमि हदबंदी से फाजिल जमीन को भूमिपतियों से छीनकर गरीबों में बांटने के काम में थोड़ी बहुत जोर जबर्दस्ती करनी पड़ सकती है।पर पुलिस के लिए वह काम हथियारबंद नक्सलियों से लड़ने की अपेक्षा सस्ता ही पड़ेगा।गैर मजरूआ जमीन को गलत कब्जे से निकालने के लिए भी पुलिस को बल लगाना चाहिए।साथ ही यदि हदबंदी की सीमा कम कर दी जाए तो लाखों एकड़ जमीन निकाल कर गरीबों में बांटी जा सकती है।इससे गरीब लोगों को हिंसा, अपराध और देशद्रोह की राह पर जाने से काफी हद तक रोका जा सकता है।हालांकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ गरीब लोग ही इन रास्तों पर जाते हैं।एक बात और।एक विशेषज्ञ ने काफी पहले यह कहा था कि यदि बिहार में जमीन का सही रिकार्ड तैयार हो जाए तो मिनी क्रांति हो जाएगी।इस काम को करने के लिए भी किसी आयोग की रपट के इंतजार की जरूरत नहीं है।आयोग की रपट आ जाने पर भी उसे लागू करने के लिए भी सही रिकार्ड तैयार करना ही होगा।क्या पहले से ही बने भूमि सुधार कानूनों को लागू करने के लिए किसी आयोग की सिफारिशों की प्रतीक्षा करने की जरूरत है ?    आदिवासी इलाकों में गरीबी व शोषण की समस्या पर एक सामाजिक कार्यकर्त्ता  लक्ष्मी प्रसाद शुक्ल के लंबे नोट के कुछ हिस्से को यहां उधत करना मौजूं होगा।इससे नक्सली समस्या को हल करने की दिशा मंे सरजमीन से एक रोशनी मिल सकती है।वे लिखते हैं,‘उग्रवाद के विकास के कुछ प्रमुख कारण निम्न लिखित हैं1, सामंती महाजनी और वन विभाग के शोषण उत्पीड़न की क्रूर और अमानवीय परंपरा।2.पुलिस प्रशासन की संवेदन शून्यता,शोषकों-उत्पीड़कों की तरफदारी और विरोध और प्रतिरोध की आवाज का दमन।3.लोकतांत्रिक आंदेालनों की निरर्थकता।4.प्रतिनिधि सभाओं में क्षेत्र की आम जनता की समस्याओं के एहसास का अभाव।5.जीविका के साधनों का अभाव तथा आम लोगों की बेरोजगारी और फटेहाली।6.शिक्षा का अभाव और अत्यंत पिछड़ी मानसिकता।7.यातायात सुविधाओं और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव।8.अधिकारियों, ब्लाक अंचल द्वारा संचालित रोजगार योजनाओं की राशि,आत्म समर्पित सामंतों-महाजनों तथा केंद्रु पत्ता ठेकेदारों और वन विभाग से नक्सलियों को मिलने वाली भारी धन राशि।9.हथियारबंद दस्तों का विकास और पुलिस प्रशासन का भ्रष्टाचार तथा निकम्मापन।        नक्सली समस्या के समाधान  के सिलसिले में अनेक विशेषज्ञ समय समय पर उसका हल सुझाते रहते हैं।पर इस देश के जो मौजूदा हालात हैं,उनमें उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती।अधिकतर नेता और दल अपनी -अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार हल सुझाते हैं और सत्ता में आने पर उपाय करते हैं।पर मोटा -मोटी यही उपाय नजर आता है कि देश में वास्तव में यथासंभव कानून का शासन लागू हो।वह सबके लिए समान हो।सरकारी धन को भरसक  गरीबों तक पहुंचने देने में जो भी तत्व बाधक हों, उनके खिलाफ जारी मुकदमों को राजनीतिक कारणों से कमजोर नहीं किया जाए।नक्सलियों से अपने चुनाव जीतने के लिए बातचीत की जाए और बाद में उन्हें खत्म करने की घोषणा की जाए ,कई नेताओं और दलों द्वारा समय समय पर अपनाया गया यह दोहरा मापदंड नहीं चलेगा।भ्रष्टाचार और हिंसा के अपराधी कत्तई नहीं बख्शे जाएं।अरवल व दलेल चक बघौरा के नरसंहारों की घटनाओं  से नसीहत लेकर राजस्व महकमा और पुलिस थानोें को नियम कानून के पालन के लिए बाध्य किया जाए।नीतीश कुमार सरकार के हाल के उपायों पर ध्यान दिया जाए।विस्थापितों और भीषण गरीबी व भुखमरी की समस्या से जूझ रहे लोगों को कटटर माओवादियों की गिरफत में जाने व उनकी फौज के सिपाही बनने से येन केण प्रकारेण रोका जाए।क्या यह सब करने के लिए इस देश की पक्ष-विपक्ष की राजनीति में पर्याप्त राजनीतिक इच्छा शक्ति मौजूद है ? पता नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;/इस लेख के संपादित अंश जनसत्ता के ं 17 ,18 और 19 जुलाई 2010 के अंकों में  प्रकाशित/&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-2830642640045508578?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/2830642640045508578/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' 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कांग्रेस की सभाओं में हुई हिंसक घटनाओं से भी यह लगा कि प्रदेश कांग्रेस पर आपराधिक मनोवृति वाले तत्व हावी होते जा रहे हैं। इस पष्ठभूमि में डा. संघी का यह आश्वासन उम्मीद जगाता है कि कांग्रेस में आपराधिक पष्ठभूमि वालों के लिए कोई जगह नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;    दरअसल जब किसी दल पर आपराधिक तत्व हावी हो जातेे हैं तो देर-सवेर उस दल के सरकार में आने के बाद उस सरकार पर भी आपराधिक तत्वों का कब्जा हो जाता है। फिर तो आम शांतिप्रिय जनता का कष्ट बढ़ जाता है। अभी तो आपराधिक तत्वों से बिहार कांग्रेस के सभा स्थल ही पीड़ित हो रहे हैं। यदि खुदा न खास्ता कांग्रेस बिहार में सरकार में आ जाए तब तो उन आपराधिक तत्वों से आम जनता भी जहां-तहां रोज-ब-रोज पीड़ित होने लगेगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;   बिहार की निरीह जनता को सरकारी संरक्षण प्राप्त अपराधियों को झेलने का लंबा अनुभव रहा है। अब तो वैसी स्थिति नहीं है, पर वह पिछला कटु अनुभव एक दुःस्वप्न की तरह अब भी लोगों को कचोटता रहता है। डा. संघी जैसे समझदार नेताओं का यह कर्तव्य बनता है कि वह उस दुःस्वप्न की पुनरावृति नहीं होने दें। याद रहे कि कांग्रेस भी बिहार में अगले विधानसभा चुनाव के बाद अपनी सरकार बनाने का दावा कर रही है। सरकार किसकी बनेगी, यह तो मतदाताओं के हाथों में है। पर सरकार बनाने का दावा करने वाले दलों का यह कर्तव्य है कि वे अभी से ऐसा आचरण दिखाएं जिससे मतदाता साफ-साफ यह देख सकें कि कौन दल अपराधियों को गले लगाने वाला दल है और कौन दल अवांछित तत्वों को ‘गर्दनिया पासपोर्ट’ देकर अपने यहां से तत्काल भगा देने वाला दल है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;   कांग्रेस की एक खूबी है कि वह आम तौर पर ऐसे किसी नेता को चुनावी टिकट नहीं देती जिसके खिलाफ किसी अदालत में आरोप पत्र दाखिल हो चुका होता है। यह बात कई अन्य दलों से कांग्रेस को भिन्न दिखाती है। इसका थेाड़ा बहुत लाभ भी कांग्रेस को मिलता रहा है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;   पर अब कांग्रेस को बिहार में जब अपना प्रभाव कुछ और जमाना है तो उसे एक काम और करना चाहिए। उसे ऐसे लोगों को भी अगली बार चुनावी टिकट नहीं देना चाहिए जिनके कार्यकलाप ऐसे हैं जो आरोप पत्र के लायक बन सकते हैं। छपरा और आरा में जिन तत्वों ने कांग्रेस की सभाओं में हिंसा की, क्या वे आरोप पत्र के पात्र नहीं हैं ? क्या जरूरी है कि ऐसे उपद्रवी तत्वों व उन्हें संरक्षण देने वाले नेताओं के खिलाफ सचमुच किसी अदालत में आरोप पत्र दाखिल होने की कांग्रेस प्रतीक्षा करे ? यदि कांग्रेस पहले ही यह घोषित कर दे कि ऐसे लोगों को वह अगले विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं देगी तो ऐसे लोग दूसरे दलों का दामन पहले ही पकड़ लेंगे। कांग्रेस को आपराधिक पष्ठभूमि वालों से मुक्ति पाने में इससे सुविधा होगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;   गत लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बिहार कांग्रेस ने कई विवादास्पद छवि वालों को दूसरे दलों से बुलाकर टिकट दे दिया। ऐसे-ऐसे लोगों को भी टिकट मिले जिनका चरित्र कांगे्रस की आम राजनीतिक संस्कति से कतई मेल नहीं खाता। हालांकि ऐसे लोगों को टिकट देने का कोई ठोस चुनावी लाभ कांग्रेस को नहीं मिला। कांग्रेस पर अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप जरूर लगता रहा है, पर कांग्रेस अपराधियों की ही पार्टी है, ऐसा आरोप नहीं लगा। कांग्रेस की संस्कति आम तौर पर एक शालीन संस्कृति रही है। पर गत लोकसभा चुनाव के समय से उस संस्कृति को धक्का लगा है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;  कांग्रेस और बिहार के हक में है कि काग्रेस इस आरोप से जल्दी मुक्ति पा ले कि उस सवा सौ साल पुराने दल पर कम से कम बिहार में धीरे-धीरे बाहुबली तत्वों का कब्जा होता जा रहा है। इस पष्ठभूमि में डा. संघी का बयान उम्मीद की एक किरण के रूप में सामने आया है। अंत में एक यह बात भी कह देनी जरूरी है कि कांग्रेस के जो कुछ लोग बाहुबलियों के बल पर बिहार में सत्ता पर कब्जा करने का ख्वाब देख रहे हैं, वे भारी गलतफहमी में हैं। क्योंकि एक तो बाहुबली मार्का दल कांग्रेस की अपेक्षा अधिक ताकत के साथ पहले से ही बिहार में मौजूद हैं। जिस किसी को बाहुबली मार्का दल को वोट देना होगा, वह असली बाहुबली दलों को छोड़ कर किसी कार्बन काॅपी को वोट क्यों देगा ? दूसरी बात यह भी है कि अब बिहार में इस तरह अपेक्षाकृत साफ सुथरे और शांतिपूर्ण ढंग से मतदान हो रहे हैं कि बाहुबलियों की किसी चुनाव में भूमिका अब अत्यंत सीमित हो चुकी है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;b&gt;( दैनिक जागरण: पटना संस्करण में 6 अप्रैल 2010 को प्रकाशित )&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-2497527823944882974?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/2497527823944882974/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=2497527823944882974&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/2497527823944882974'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/2497527823944882974'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='अवांछित तत्वों से कांग्रेस को बचाने की समस्या'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-8026530288849164996</id><published>2010-04-04T20:17:00.004+05:30</published><updated>2010-04-06T12:26:04.501+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Interview Surendra kishore'/><title type='text'>पत्रकारिता के 40 साल पूरे कर चुके वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर से  ‘   ‘प्रभात खबर ’ की बातचीत</title><content type='html'>&lt;strong&gt;कोई सरकारी परसादी लेनी होती तो नीतीश कुमार का शासन आने की प्रतीक्षा क्यों करता ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना यही है सहन/आंगन/,यही सायबान/छप्पर/है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फैली हुई जमीन,खुला आसमान है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;---- मख्मूर सईदी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;मैं पूरी ताकत के साथ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;शब्दों को फेंकता हूं आदमी की तरफ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूं वह धमाका&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;मैं लिखना चाहता हूं ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;----- केदार नाथ सिंह&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;मशहूर शायर मख्मूर सईदी और प्रख्यात कवि केदार नाथ सिंह की इन पंक्तियों से गुजरते हुए &lt;strong&gt;सुरेंद्र किशोर&lt;/strong&gt; का चेहरा सामने आता है। बिहार के जाने-माने पत्रकार सुरेंद्र किशोर के लिए फैली हुई जमीन ही आंगन और खुला आसमान ही छप्पर है, और वह लिखने और बिना किसी लाग लपेट के लिखने की असीम ऊर्जा से लैस हैं, यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा, वह लिखने की चाहत से भरे रहे और भरे हैं, शायद यही वजह है कि क्लीन सेव के कारण साफ-सुथरा और लंबा चेहरा या घने बालों को पूरी मजबूती से दाहिनी ओर रखने का उनका हेयर स्टाइल, अहंकारशून्य व्यक्तित्व या फिर साधारण पहनावा ही उनकी पहचान नहीं, सुरेंद्र किशोर, आज सुरेंद्र किशोर हैं, क्योंकि गोपाल सिंह नेपाली की तरह उनका भी धन रही स्वाधीन कलम, और कलम इसलिए भी स्वाधीन रही कि उन्होंने न बहुत कुछ पाने की चाहत पाली और न ही कुछ नहीं मिल पाने का मलाल रहा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;बीते 40 वर्षों से निरंतर लिखते रहे सुरेंद्र किशोर को पढ़कर न सिर्फ बिहार और झारखंड, बल्कि एक हद तक हिंदी पटटी की पत्रकारिता की दो पीढ़ियां जवान हुईं हैं। समाजवादी राजनीति की सीढ़ी से सत्ता और शक्ति के शीर्ष पर जाने की जगह पत्रकारिता व लेखन का क्षेत्र चुनने वाले सुरेंद्र किशोर ने अपनी जिंदगी को अपने मायनों में आकार देने की आजादी दी। अपनी ईमानदारी, अपनी कर्तव्यनिष्ठा, अपने हुनर, अपनी दढ़ता से वह खुद को तरासते गये। संघर्ष के चिराग की रोशनी से जीवन को रोशन किया। मोटे फ्रेम और पावर के शीशे से बने चश्मे के पीछे उनकी आंखों की गहराई काफी कुछ कहती है, बशर्ते आप सुनना चाहें। लेखन व पत्रकारिता के क्षेत्र में चार दशक गुजारने के बहाने ‘प्रभात खबर’ के संपादकीय समन्वयक &lt;strong&gt;माधवेंद्र&lt;/strong&gt; ने श्री किशोर से लंबी बातचीत की।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न - कितने साल से आप पत्रकारिता में हैं ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;उत्तर -&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;वैसे तो मैं सन 1969-70 से ही इस पेशे में हूं, पर शब्दों के सही अर्थों में पेशेवर पत्रकारिता की शुरुआत मैंने सन 1977 में दैनिक ‘आज’ से की थी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हालांकि 1969 से ही पत्रकारिता से रोटी कमानी जरूर शुरू कर दी थी। तब पटना से ‘लोकमुख’ नाम से लोहियावादी समाजवादियों की एक साप्ताहिक पत्रिका निकलती थी। मैंने 120 रुपये महीने पर कुछ समय तक वहां काम किया था। मेैंने जार्ज फर्नांडिस के संपादकत्व में निकल रही चर्चित पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ और जेपी द्वारा संस्थापित ‘जनता’ साप्ताहिक में भी सत्तर के दशक में काम किया।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न - पेशेवर पत्रकार के रूप में आपने अनेक मंत्रिमंडलों को काम करते हुए देखा। अपने अनुभव बताइए।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;उत्तर -&lt;/strong&gt; दैनिक आज ज्वाइन करने के बाद सत्ता व प्रतिपक्ष की राजनीति व विभिन्न मुख्यमंत्रियों के काम काज को करीब से देखने का अवसर मिला।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हालांकि उससे पहले के कुछ मुख्यमंत्रियों की कार्य शैलियों के बारे में बहुत कुछ जान सुन व पढ़ रखा है। मैं विभिन्न मुख्यमंत्रियों के कामकाज के मोटा-मोटी तुलनात्मक अध्ययन की स्थिति में अब हूं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न - आपके बारे में यह कहा जाता है कि अपने पत्रकारिता जीवन में आपने कभी किसी मुख्यमंत्री की तारीफ नहीं की । क्या कारण है कि आप इन दिनों नीतीश कुमार के प्रशंसक बने हुए हैं ? इस अति प्रशंसा के कारण आपकी पुरानी छवि को धक्का लग रहा है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;उत्तर -&lt;/strong&gt; आपने बिलकुल सही कहा। कुछ लोग तो नेट पर यह भी लिख रहे हैं कि मैं किसी तरह की ‘परसादी’ पाने के लिए नीतीश कुमार की चापलूसी कर रहा हूं। दरअसल ऐसे लोग न तो मुझे जानते हैं और न ही बिहार व देश के सामने आज जो गंभीर समस्याएं हैं, उनका उन्हें कोई अनुमान है। यदि किसी को अनुमान है भी तो वे स्वार्थ या किसी अन्य कारणवश उन्हें देख नहीं पा रहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह बात सही नहीं है कि मैंने किसी मुख्यमंत्री की अपने लेखन में आम तौर पर कभी कोई सराहना ही नहीं की। जिस नेता के बारे में मुझे सबसे अधिक लिखने का मौका मिला, वे हैं लालू प्रसाद यादव। उन्होंने भी अपना काम किया और मेरे खिलाफ कुछ ऐसे कदम उठाए जो अभूतपूर्व रहे। इसके बावजूद 1990 में मंडल आरक्षण आंदोलन के दौरान मैंने लालू प्रसाद के पक्ष में और आरक्षण विरोधियों के खिलाफ लगातार जोरदार लेखन किया।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस लेखन के कारण मुझे अपने स्वजातीय, सवर्णों और यहां तक कि अपने परिजनों से भी आलोचनाएं सुननी पड़ी थीं। अनेक मुख्यमंत्रियों को देखने के बाद मैं यह कह सकता हूं कि नीतीश कुमार जैसा मुख्यमंत्री कुल मिलाकर इससे पहले मैंेने तो नहीं देखा। यदि यह बात मैं किसी लाभ की प्राप्ति के लिए कहूं तो मेरी इस बात पर किसी को ध्यान देने की जरूरत नहीं है। पर यदि राज्यहित में कह रहा हूं तो मेरी बात सुनी जानी चाहिए अन्यथा बाद में राज्य का नुकसान होगा। मंडल आरक्षण विवाद के समय मेरी बातें नहीं सुनी गईं जिसका नुकसान खुद उनको अधिक हुआ जो आरक्षण के खिलाफ आंदोलनरत थे। बाद में वे थान हार गये, पर पहले वे गज फाड़ने को तैयार नहीं थे। यदि 1990 में बिहार में आरक्षण का उस तरह अतार्किक विरोध नहीं हुआ होता तो लालू प्रसाद का दल 15 साल तक सत्ता में नहीं बना रहता। कांग्रेस के पूर्व विधायक हरखू झा अब भी यह कहते हैं कि ‘सुरेंद्र जी तब आरक्षण विरोधियों से कहा करते थे कि गज नहीं फाड़ोगे तो थान हारना पड़ेगा।’&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न - आपका लेखन इन दिनों नीतीश सरकार के पक्ष में एकतरफा लगता है। यह किसी पत्रकार के लिए अच्छा नहीं माना जाता। इस पर आपकी क्या राय है ? क्या नीतीश जी सारे काम ठीक ही कर रहे हैं ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;उत्तर -&lt;/strong&gt; इस आरोप को एक हद तक में स्वीकरता हूं। हालांकि यह पूरी तरह सच नहीं है। नीतीश कुमार की सरकार की कुछ गलत नीतियों की मैंेने लिखकर समय-समय पर आलोचना की है। आगे भी यह स्वतंत्रता मैं अपने पास रिजर्व रखता हूं क्योंकि न तो मैंने खुद को कभी किसी के यहां गिरवी रखा है और न ही ऐसा कोई इरादा है। जब जीवन के कष्टपूर्ण क्षण मैंेने काट लिए तो अब किसी से किसी तरह के समझौते की जरूरत ही कहां है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यदि मैं किसी लाभ या लोभ के चक्कर में किसी सरकार या नेता का विरोध या समर्थन करूं तो जरूर मेरे नाम पर थूक दीजिएगा। पर यदि देश और प्रदेश के व्यापक हित में ऐसा करता हूं तो उसे उसी संदर्भ में देखनेे की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैं पूछता हूं कि आजादी की लड़ाई के दिनों में क्या भारतीय पत्रकारों से यह सवाल पूछा जाता था कि आप आजादी की लड़ाई के पक्ष में एकतरफा क्यों हैं ? आज देश व प्रदेश में उससे मिलती-जुलती स्थिति है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;खतरे उससे कई मामलों में अधिक गंभीर हैं। खतरा लोकतांत्रिक व्यवस्था की समाप्ति का है। खतरा अलोकतांत्रिक अतिवाद व आतंकवाद के काबिज हो जाने का है। इन दोनों खतरों को हमारे देश व प्रदेश के कुछ खास नेतागण अपने स्वार्थ में अंधा होकर जाने अनजाने आमंत्रित कर रहे हैं। इस स्थिति में जो नेता सुशासन लाने की कोशिश कर रहा है, जो नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाना चाहता है और भरसक उठा भी रहा है। और जो नेता सांप्रदायिक मसलों पर संतुलित रवैया अपनाता है, वही इन खतरों से सफलतापूर्वक लड़ भी सकता है। वैसे नेताओं के प्रति पक्षधरता दिखाना ही आज देशहित व राज्यहित है। लोकतंत्र बना रहेगा तभी तो स्वतंत्र प्रेस भी रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न - आप तो पहले राजनीतिक रूप से सक्रिय थे। क्या अब दुबारा राजनीति में आने की इच्छा नहीं होती ? राजनीति में शामिल होकर आप नीतीश कुमार के कामों को और भी आगे बढ़ा सकते हैं।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;उत्तर -&lt;/strong&gt; मैंने 1973 में ही यह तय कर लिया था कि मैं राजनीति छोड़कर पत्रकारिता करूंगा। विशेष परिस्थिति में आपातकाल के दौरान जरूर राजनीतिक काम कर रहा था। यदि मैं पत्रकारिता को जिस दिन राजनीतिक कर्म की अपेक्षा दोयम दर्जे का काम मान लूंगा, उसी दिन सक्रिय राजनीति के प्रति मेरा आकर्षण हो जाएगा! या फिर मेरी इच्छा यदि निजी धनोपार्जन की हो जाए तो मैं राजनीति में दुबारा जाउंगा। एमपी-विधायक फंड ने तो राजनीति को काजल की कोठरी बना दिया है। वैसे भी जो लोग मुझे जानते हैं, वे मुझसे कभी यह नहीं कहते कि मुझे राजनीति में आना चाहिए। क्योंकि मुझे वे उस काम के लिए अनफिट मानते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न - क्या आपको ऐसा कोई आॅफर मिला था ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;उत्तर -&lt;/strong&gt; आॅफर तो सक्रिय राजनीति में शामिल होने के लिए नहीं हुआ था, पर ‘राजनीतिक नौकरियों’ का आॅफर जरूर हुुआ था। पर मैंने विनम्रतापूर्वक तब उसे अस्वीकार ही कर दिया था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न - अपने बारे में कुछ और बताइए।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;उत्तर -&lt;/strong&gt; सन 1966 में के.बी. सहाय की सरकार के खिलाफ छात्र आंदोलन के कारण मेरी पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी। उन दिनों मैं सारण जिला क्रांतिकारी विद्यार्थी संघ का सचिव था। वह लोहियावादी समाजवादी छात्रों का संगठन था। 1969 में मैं बिहार प्रदेश समाजवादी युवजन सभा के तीन में से एक संयुक्त सचिव चुना गया था। उनमें से एक अन्य संयुक्त सचिव लालू प्रसाद थे। सचिव थे शिवानंद तिवारी। संसद पर युवजनों के प्रदर्शन के सिलसिले में मैं अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार होकर तिहाड़ जेल भी गया था। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैं 1972-1973 में कर्पूरी ठाकुर का गैर सरकारी निजी सचिव था। आपातकाल में सी.बी.आई. ने बड़ौदा डायनामाइट मुकदमे का एक केस तैयार किया था। उसमें मेरा नाम उन चार मुख्य षडयंत्रकारियों में एक था जिन पर आपातकाल में देशभर में सरकारी प्रतिष्ठानों को डायनामाइट से उड़ाने का षडयंत्र रचने का आरोप लगाया गया था। अन्य तीन थे जार्ज फर्नाडिस, रेवतीकांत सिन्हा और महेंद्र नारायण वाजपेयी। वाजपेयी जी रेलवे यूनियन के नेता हैं और इन दिनों पटना में ही रहते हैं। यह खबर 1976 के देशभर के अखबारों में पहले पेज पर छपी थी।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि कर्पूरी ठाकुर की सरकार के कोई सदस्य या फिर मोरारजी देसाई मंत्रिमंडल के प्रभावशाली सदस्य जार्ज फर्नांडीस मेरे लिए कुछ सोचें ओर आॅफर भी करें। उन लोगों ने किया भी ,पर मुझे वह सब मंजूर ही नहीं था। क्योंकि मैं एक मामूली पत्रकार के रूप में ही संतुष्ट था और हूं भी।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि मुझे कभी कोई सरकारी परसादी लेनी होती तो नीतीश कुमार का शासन आने तक मैं प्रतीक्षा ही क्यों करता ? क्या दूसरे ऐसे लोग अवसर मिलने पर ऐसी कोई प्रतीक्षा करते भी हैं ? जब मेरी पत्नी मेरे सुख-दुःख में साथ देने के लिए हमेशा तैयार रहती हंै। जब मेरी संतानें आज्ञाकारी हैं। और मेरी जरूरतें जब सीमित हैं तो फिर अपनी स्वतंत्र लेखनी की कीमत पर किसी सत्ताधारी नेता के सामने मुझे हाथ पसारने या फिर याचक बनने की जरूरत ही क्या है? परसादी लेने की बात वही लोग करते हैं जो खुद छोटे मन-मिजाज के हैं। यह बात यहां मैं इसलिए भी कह रहा हूं कि लोग यह समझें कि करीब 40 साल के अनुभव वाला एक पत्रकार किसी लाभ-लोभ की इच्छा रखे बिना यदि यह बात कह रहा है कि किस तरह एक मुख्यमंत्री आज बिहार को पटरी पर लाने का ईमानदार प्रयास रात दिन कर रहा है तो इस बात को गंभीरता से समझना चाहिए और मुख्यमंत्री के इस प्रयास में उन तमाम लोगों को मदद करनी चाहिए जिनका अपना कोई निजी एजेंडा नहीं है। अन्यथा प्रदेश और देश को बचाना एक दिन असंभव हो जाएगा। मैं राजनीतिक दलों की बात नहीं कर रहा हूं। उनका तो काम ही विरोध करना और मौका मिलने पर सत्ता में आना है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न - पर नीतीश कुमार की एक ऐसी सरकार के समर्थन के कारण आपने अपनी छवि दांव पर लगा दी है जिस सरकार में भ्रष्टाचार बहुत अधिक है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;उत्तर -&lt;/strong&gt; सरकारी भ्रष्टाचार के मामले में आपकी टिप्पणी सही है। पर सवाल मुख्यमंत्री की मंशा का है। राहुल गांधी ने भी नीतीश कुमार की मंशा को सही बताया है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैंने पिछले 40 साल से बिहार के मुख्यमंत्रियों को करीब और दूर से काम करते हुए देखा है। विपरीत परिस्थितियों में भी इतना अच्छा काम करते हुए मैंने इससे पहले किसी अन्य मुख्यमंत्री को नहीं देखा। ऐसा नहीं कि वे बाकी सब भ्रष्ट व निकम्मे थे। उनमें कई अच्छी मंशा के ईमानदार नेता थे। पर उनमें से कोई नीतीश कुमार जैसा नहीं थे।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;नीतीश के काम के रिजल्ट भी बिहार की जनता को मिल रहे हैं। गत लोकसभा चुनाव में बिहार में 40 में से 32 सीटें राजग को देकर आम जनता ने भी नीतीश सरकार के काम पर अपने भारी समर्थन की मुहर ही लगाई। पर बटाईदारी के बारे में नीतीश सरकार की एक घोषणा से नीतीश कुमार थोड़े दबाव में जरूर आ गये हैं। पर यह बिहार के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बात ही होगी कि अगले चुनाव के बाद नीतीश कुमार को मौका नहीं मिलेगा।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैं बिहार के बाकी सारे नेताओं को भी जानता हूं। नीतीश कुमार और अन्य मुख्यमंत्रियों में मैं यह अंतर पाता हूं कि अन्य मुख्य मंत्रियों में से कुछ ने राजनीतिक व प्रशासनिक भ्रष्टाचार से समझौता कर लिया, कुछ ने खुद को किनारा कर लिया, कुछ ने लड़ने की कोशिश की तो वे हटा दिए गए। पर नीतीश कुमार अब भी भ्रष्टाचार से भरसक लड़ रहे हैं। साढ़े चार साल तक बिहार का मुख्यमंत्री कोई रहे और इस काजल की कोठरी में कोई दाग नहीं लगे, यह बिहार के लिए बड़ी बात है। पर यह सहसा या संयोगवश नहीं हुआ है, बल्कि ऐसा नीतीश कुमार की सावधानी के कारण हुआ है। दरअसल सरकारी व राजनीतिक भ्रष्टाचार कम नहीं होगा तेा गरीबी नहीं कम होगी। गरीबी कम नहीं होगी तो अराजकतावादी अलोकतांत्रिक तत्व देर-सवेर बिहार में पूरी तरह छा जाएंगे। जब यहां भी छा जाएंगे तो पूरे देश पर छा जाने में उन्हें काफी सुविधा हो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कमजोर नजर वाले लोग या फिर स्वार्थ में अंधे लोग इस खतरे को देख नहीं पा रहे हैं। आज देश और प्रदेश के सामने विशेष परिस्थिति उत्पन्न कर दी गई है। पत्रकार सहित हर नागरिक को आज अपनी विशेष भूमिका निभानी चाहिए,ऐसा मैं मानता हूं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;राजनीति में गांधी-नेहरू नहीं तो मीडिया में पराड़कर की तलाश क्यों&lt;/span&gt; ?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न - नीतीश कुमार की कौन सी बात आपको सबसे अधिक पसंद है ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;उत्तर -&lt;/strong&gt; जब वे कें्रदीय मंत्री थे तो मुझे उनके कामकाज को करीब से देखने का मौका नहीं मिला था। इसलिए उनके बारे में मेरी कोई विशेष राय नहीं बन पाई थी। पर पूत के पांव उसी समय पालने में दिखाई पड़ने लगे जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। सत्ता में आते ही उनकी सरकार ने बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण का काम शुरू करवा दिया। यह भी कोई अजूबी बात नहीं थी। नई बात यह थी कि सड़क की बगल में नालियों का भी साथ-साथ नीतीश सरकार ने निर्माण कराना शुरू कर दिया। ऐसा पहले नहीं होता था। यहीं ईमानदार मंशा की झलक मिली। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मुझे उर्दू पत्रकार मोईन अंसारी ने एक बार बताया था कि पटना जिले के ही एक शहर में पहले से बनी एक सीमेंटी सड़क को एक भ्रष्ट मंत्री ने साठ के दशक में किस तरह तोेड़वा कर उसे अलकतरा वाली सड़क में परिणत करवा दिया था। पूछने पर उसने मोईन चचा को बेशर्मी से बताया था कि मेरे और मेरे ठेकेदारों के पास भी अपने पेट हैं। सड़कें टूटेंगी नहीं तो उनकी मरमत कैेसे होगी ? हर साल मरम्मत नहीं होगी तो ठेकदार जिएगा कैसे ? तब से बिहार में भ्रष्टाचार आगे ही बढ़ता गया है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सन 1971 के लोकसभा चुनाव के बाद तो उसने संस्थागत रूप ले लिया। सरकारी धन की इसी लूट-खसोट की भावना और संस्थागत भ्रष्टाचार को विभिन्न मुख्यमंत्रियों ने पाला पोसा, आगे बढ़ाया या फिर उसके साथ सह अस्तित्व का जीवन जिया। कुछ ईमानदार मुख्यमंत्री थोड़े ही दिनों में हटा दिए गए। सबका नतीजा यह हुआ कि विकास नहीं हुआ। गरीबी बढ़ी, साथ में नक्सली भी।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;देश में नक्सली आंदोलन का हाल यह है कि उसे बिहार का गढ़ फतह करके नेपाल तक का कोरीडोर पूरा कर लेना है। यदि यह हो गया तो मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था समाप्त हो जाएगी। नीतीश जैसे मुख्यमंत्री विकास व सुशासन के जरिए उस स्थिति को टालने की कोशिश कर रहे हैं। पर राजनीतिक कार्यपालिका तथा प्रशासनिक कार्यपालिका नीतीश कुमार के अनुकूल उतना नहीं बन पा रही है जितना मुख्यमंत्रीे चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उनके ही दल के कुछ नेता लोकतंत्र पर उस खतरे को स्वार्थवश नहीं देख पा रहे हैं। जदयू के अनेक नेताओं के लिए पुत्र मोह, पैसा मोह और जाति मोह अधिक महत्वपूर्ण है। ऐसे लोग सकीर्ण स्वार्थ में पड़ कर अपनी ही आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय कर रहे हैं। आज बिहार में जितने नेता मुख्यमंत्री के घोषित -अघोषित उम्मीदवार हैं जितना उन्हें मैं जानता हूं, उसके अनुसार उनमें से किसी में भी भ्रष्टाचार व अपराधियांे से लड़ने की नीतीश कुमार जैसा माददा नहीं है। नीतीश कुमार की यही बात मुझे सर्वाधिक पसंद है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आज बिहार में कोई रामराज नहीं आया है। पर एक बात जरूर हुई है कि इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतीश कुमार उम्मीद की आखिरी किरण के रूप में जरूर उभरे हैं। कोई अन्य राजनीतिक व्यवस्था देश-प्रदेश के जनजीवन में कैसे फर्क ला पाएगी, यह मैं नहीं जानता।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न - नीतीश कुमार की सरकार में आपको कोई भी खराबी नजर आती है या नहीं ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;उत्तर -&lt;/strong&gt; क्यों नहीं नजर आती ? मैंने कई बार लिखा भी है कि नीतीश सरकार ने प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की बहाली के लिए प्राप्तांकों को आधार बना कर भयंकर भूल की है। बहाली के पहले उनके लिए प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन किया जाना चाहिए था। साथ ही, शराब की दुकानों की संख्या बढ़ाने का काम भी गलत हुआ। इससे उलट शराबबंदी की दिशा में राज्य सरकार को आगे बढ़ना चाहिए था जैसा कि संविधान के नीति निदेशक तत्व चैप्टर में राज्य को निदेश दर्ज है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जिस प्रदेश के ब्यूरोक्रेसी व राजनीति के रग -रग में भ्रष्टाचार प्रवेश कर चुका हो, वहां नीतीश कुमार क्या ब्रहमा-विष्णु-महेश भी एक साथ आ जाएं तो इतने थोड़े समय में उसे सुधार नहीं सकते। यहां अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कोई मुख्यमंत्री स्थिति को सुधारने की भरसक कोशिश कर रहा है या फिर सरकारी भ्रष्टाचार के समुद्र में खुद डुबकी लगा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न - आपका प्रारंभिक जीवन कैसा रहा और आप पत्रकारिता में कैसे आये?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;उत्तर -&lt;/strong&gt; मेरा प्रारंभिक जीवन गांव में बीता। छठवीं कक्षा में भी पढ़ने के लिए अपने गांव भरहापुर से 4 किलोमीटर दूर दिघवारा रोज पैदल जाना पड़ता था। पैर में चप्पल-जूता कुछ नहीं। सड़क कच्ची। गर्मी के दिनों में धूल में पैर वैसे ही जलते थे मानो गर्म तवे पर शरीर का कोई अंग।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मेरे पिता जी कम ही पढ़े-लिखे थे। पर वे परंपरागत विवेक से लैस थे। उन्होंने जमीन बेच कर भी हम भाइयों को उच्च शिक्षा दिलाई। मैंने 1963 में साइंस से फस्र्ट डिवीजन से मैट्रिक पास किया। मैं परिवार का पहला मैट्रिकुलेट था। बाबू जी मेरी सफलता पर काफी खुश थे। मैं परिवार का पहला मैट्रिकुलेट जो था। मेरे छोटे भाई नागेंद्र पढ़ाई में मुझसे एक साल जूनियर थे, पर अधिक गंभीर थे। बाबू जी चाहते थे कि में ओवरसियर बनूं और मेरा छोटा भाई वकील बने। &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैट्रिक में प्रथम श्रेणी वालों के लिए ओवरसियरी में प्राप्तांक के आधार पर ही नामांकन संभव हो जाता था। पर मेरी इच्छा वैसी नहीं थी। मैट्रिक में पढ़ते समय ही मैं गांधीवाद से प्रभावित हो गया। कालेज जाने के बाद लोहियावादी हो गया। कालेज जाने के बाद पढ़ाई में मन नहीं लगने लगा। पहले अध्यात्म व फिर राजनीति की ओर मुखातिब हुआ। पर जब सक्रिय राजनीति से जब मन उचटा तो पत्रिकाओं व अखबारों से जुड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छपरा में राजेंद्र कालेज में बिताये गये अपने छात्र जीवन में ‘सारण संदेश’ जैसी छोटी पत्रिकाओं में लेख लिखता ही था। वहीं रवींद्र कुमार ने मुझे 1965 में दिनमान पढ़ने की प्रेरणा दी जिसने मुझे पत्रकार बनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजनीति प्रसाद ने जार्ज फर्नांडीस से मेरा परिचय कराया और मुझे प्रतिपक्ष का पटना संवाददाता बनवा दिया। इधर ‘जनता’ साप्ताहिक में भी काम करता था। उसे रामानंद तिवारी निकालते थे। आपातकाल तक यही चलता रहा। क्योंकि स्थापित अखबारों में नौकरी पाना मेरे जैसे व्यक्ति के लिए तब कठिन था। पर सन 1977 में ‘आज’ में नौकरी पाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न - बड़े अखबारों में काम करने का अपना कुछ अनुभव बताएं। आप जब पत्रकारिता में आये थे, उस समय और आज के समय में कितना फर्क आया है ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उत्तर -&lt;/strong&gt; यदि पारसनाथ सिंह और प्रभाष जोशी जैसे ऋषितुल्य संपादक मुझे नहीं मिले होते तो मैं वह सब नहीं कर पाता जितना कुछ भी कर पाया। आज यदि मैं अपने पत्रकार जीवन से संतुष्ट हूं तो वह सब ‘आज’ के पारसनाथ सिंह और जनसत्ता के प्रभाष जोशी की कपा से ही यह संभव हो पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे एक बात जरूर कहूंगा कि राजनीति व खास कर सत्तापक्ष की राजनीति का पत्रकारिता पर असर पड़ता ही है। जब गांधी -नेहरू जैसे नेता राजनीति में थे तो बाबू राव विष्णु पराड़कर जैसे संपादक भी हुआ करते थे। जब मैं पत्रकारिता में आया तब तक गांधी युग के अनेक नेता जीवित थे और राजनीति में सक्रिय भी थे। उनकी मीडिया के प्रति अलग राय थी। मीडिया से निपटने का उनका तरीका आज के नेताओं से बिल्कुल भिन्न था।। मोरारजी देसाई तब सक्रिय थे। जवाहर लाल नेहरू के निधन के कोई पांच साल ही हुए थे। डा. श्रीकष्ण सिंह आठ साल पहले ही गुजरे थे। इनके कार्यकाल का हैंगओवर बाकी था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन लोगों के नाम इसलिए ले रहा हूं क्योंकि मैं बताना चाहता हूं कि उनके कार्यकाल में मीडिया को काम करने की कैसी आजादी थी। यह बात नहीं है कि मीडिया इन नेताओं की तीखी आलोचना नहीं करती थी। पर नेहरू, मोरारजी और श्रीबाबू उन अखबारों व पत्रिकाओं को पढ़ना ही छोड़ देते थे जिन प्रकाशनों के बारे में वे समझते थे कि वे प्रकाशन उनके साथ लेखन के स्तर पर अन्याय कर रहे हैं। वे बदले की भावना से मीडिया या फिर मीडियाकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद के वर्षों में तो आलोचना करने वाले अखबारों के मालिकों के व्यवसाय नष्ट किए गये, संपादकों को सत्ताधारी दल के नेताओं ने नौकरियों से हटवा दिया। पत्रकार जेल तक भिजवा दिए गए। धमकियां दी गईं और उन पर नाहक परेशान करने के लिए मुकदमे किए गए। अब ऐसे में अखबार मालिक व्यापारीगण अखबारों को युद्ध का मैदान तो बनाने से रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह संयोग नहीं है कि मीडिया को उसी सत्ताधारी नेताओं ने तंग तबाह किया जिन पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगे। जब राजनीति में ही आदर्श नहीं रहा तो सिर्फ मीडिया में ही उसे क्यों खोजा जा रहा है। यह बात और है कि मीडिया व राजनीति में आदर्श के कुछ टापू जरूर आज भी जहां- तहां मौजूद हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;strong&gt;( 15 मार्च और 16 मार्च 2010 को ‘प्रभात खबर’ के पटना संस्करण में दो किस्तों में प्रकाशित )&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-8026530288849164996?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/8026530288849164996/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=8026530288849164996&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/8026530288849164996'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/8026530288849164996'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2010/04/40.html' title='पत्रकारिता के 40 साल पूरे कर चुके वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर से  ‘   ‘प्रभात खबर ’ की बातचीत'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-8613321286341091639</id><published>2010-03-12T21:48:00.000+05:30</published><updated>2010-03-12T21:51:16.346+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनय'/><title type='text'>बिहार को मिला एक नया चुनावी मुद्दा</title><content type='html'>बिहार में विधान सभा का चुनाव इसी साल होना है। महिला आरक्षण एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन जाए तो यह कोई अजूबी बात नहीं होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप के सबसे बड़े विरोधी नेताआंें में से एक नेता लालू प्रसाद इसी प्रदेश से हैं। विधान सभा चुनाव में मतदाता अन्य बातों के साथ -साथ  इस बात पर भी अपना मत देंगे कि महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप का किस दल ने विरोध और किसने समर्थन किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; लालू प्रसाद तथा अन्य विरोधियांे को तो यह लगता है कि चूंकि इस देश में पिछड़ों की आबादी अन्य समुदायों की अपेक्षा काफी अधिक है, इसलिए उन्हें इस आरक्षण के विरोध का चुनावी लाभ जरूर मिलेगा। पर क्या ऐसा हो पाएगा? इसका जवाब तो बिहार का अगला चुनाव नतीजा ही देगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     हालांकि लालू-मुलायम से अलग राय रखने वाले लोग बताते हैं कि इस विरोध का नुकसान ही लालू प्रसाद को बिहार में होगा क्योंकि उनका विरोध पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं के हितों को ध्यान में रख कर कम बल्कि अपने कुछ खास चुनाव क्षेत्रों को महिलाओं से बचाने की समस्या को ध्यान में रख कर अधिक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू प्रसाद ने कहा है कि दुनिया के किसी देश में महिलाओं के लिए संसद में आरक्षण नहीं हैं। फिर यहीं क्यों ? उन्होंने यह भी कहा है कि यह पुरुष प्रधान समाज है। इसमें पति जहां वोट देने को कहता है, पत्नी वहीं वोट देती है। इसलिए इस विधेयक के पास हो जाने से कांग्रेस या भाजपा को महिलाओं के वोट नहीं बढ़ जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  लालू प्रसाद ने यह कह कर समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति का वर्णन खुद ही कर दिया है। इससे भी शीघ्र महिला आरक्षण की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसे पुरुष प्रधान समाज में यदि आरक्षण देकर महिलाओं का सशक्तीकरण कर दिया जाए तो वे किसी को वोट देने के बारे में खुद निर्णय लेने की स्थिति में हो जाएंगी। लोकतंत्र के लिए यह जरूरी भी है। लोकतंत्र के लिए यह कोई अच्छी बात तो है नहीं कि एक बड़ी आबादी अपने पतियों के कहने पर ही मतदान किया करे !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   महिला आरक्षण के मामले को गत 14 साल से लटका कर रखना कहां का लोकतंत्र है जबकि इस विधेयक के पक्षधर दलों व सांसदों की संख्या हमेशा ही विरोधियों की अपेक्षा अधिक रही है ? अब जब मौजूदा लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक के घोषित विरोधियों की संख्या और भी कम हो गई है तो लालू प्रसाद कहते हैं कि इस विधेयक के खिलाफ ‘युद्ध’ होगा। ऐसे ही युद्ध की घोषणा जब अल्पमत सवर्ण लोग सन 1990 में मंडल आरक्षण के खिलाफ कर रहे थे तो खुद लालू प्रसाद की उस पर कैसी प्रतिक्रिया थी ? यह भी याद रखने की जरूरत है कि वी.पी. सिंह की सरकार को जितने सांसद समर्थन कर रहे थे, उन सांसदों का बहुमत मंडल आरक्षण के खिलाफ ही था। फिर भी जरूरत समझ कर वी.पी. सिंह सरकार ने वह काम कर दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    दरअसल लोकतंत्र का तकाजा यह है कि लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव यह कहते कि अभी तो मौजूदा स्वरूप में भले कांग्रेस इस विधेयक को पारित करा ले ,पर जब हमारे मत के लोग बहुमत में आएंगे तो हम आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान कर देंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  पर सवाल है कि पिछड़ा बहुल इस देश में लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं के दल संसद में बहुमत क्यों नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं ताकि वे आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान करा पाएं ? दरअसल वे इसलिए बहुमत नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि पिछड़े और अल्पसंख्यकों को भी उनकी कथनी और करनी पर अब कम ही  भरोसा हो रहा है। पिछड़े वर्ग के एक नेता जी ने गत लोकसभा चुनाव में अपने दल के एक निवर्तमान अल्पसंख्यक सांसद का टिकट काट कर उनकी जगह अपने एक करीबी रिश्तेदार को टिकट देकर वहां से लोकसभा में पहुंचा दिया। वे नेताजी आज गला फाड़ कर यह ़कह रहे हंै कि मौजूदा महिला आरक्षण विधेयक अल्पसंख्यक विरोधी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  बिहार विधानसभा के अगले चुनाव में महिला आरक्षण मुद्दा इस रूप में भी चर्चित हो सकता है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण के बहाने इस आरक्षण को अनंतकाल तक टाले रखना उचित है या फिर विधायिकाओं में महिलाओं को बड़ी संख्या में भेज कर उनका जल्द सशक्तीकरण जरूरी है ? यह मानी हुई बात है कि गाड़ी के दोनों पहिए यानी स्त्री-पुरुष समान रूप से मजबूत होंगे तो ही गाड़ी ठीक से चलेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार में पंचायतों व नगर निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान नीतीश सरकार ने किया। इन निकायों के चुनावों का अनुभव यह रहा कि ऐसी कुछ सामान्य सीटों से भी पिछड़ी जातियों की महिलाएं विजयी हुई जो सीटें सामान्य महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। संभवत इसी अनुभव के आधार पर नीतीश कुमार ने यह समझा है कि संसद में पेश महिला आरक्षण विधेयक के लागू हो जाने के बाद भी पिछड़े वर्ग की महिलाओं को कोई नुकसान नहीं होगा। यह जाहिर बात है कि जिस चुनाव क्षेत्र में जिस जाति की बहुलता होती है,उस क्षेत्र में उस जाति के उम्मीदवार की ही जीत की अधिक गुंजाइश रहती ही है चाहे उम्मीदवार महिला हो या पुरुष।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी की लड़ाई के समय भी कुछ नेताओं ने ऐसे सवाल उठाए थे। कुछ दलित, अल्पसंख्यक व कमजोर वर्ग के नेतागण तब यह चाहते थे कि आजादी से पहले ही यह तय हो जाए कि आजाद भारत में उन समुदायों की स्थिति क्या होगी। उनकी बात सुनी जाती तो आज तक अंग्रेज यहीं रहते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;साभार: दैनिक जागरण पटना संस्करण (09 मार्च, 2010)&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-8613321286341091639?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/8613321286341091639/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=8613321286341091639&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/8613321286341091639'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/8613321286341091639'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='बिहार को मिला एक नया चुनावी मुद्दा'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-828250492351855462</id><published>2010-02-20T18:43:00.002+05:30</published><updated>2010-02-20T18:49:44.477+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनय'/><title type='text'>निंदक नियरे राखिए</title><content type='html'>चीन ने कहा है कि भारत, मिसाइल टैक्नोलाजी के मामले में, चीन से अभी दस साल पीछे है। संभव है कि यह बात चीन ने अपने लोगों का मनोबल बढ़ाने के लिए कही होगी! यह बात भी संभव है कि इसमें शायद सच्चाई भी हो। इस संबंध में अंतिम वाक्य तो कोई वैज्ञानिक ही बोल सकता है। याद रहे कि अग्नि -3 के सफल परीक्षण के बाद यह खबर आई थी कि चीन के सुदूर उत्तरी इलाके भी अब भारत के हमले की जद में हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   खैर जो हो, पर निंदक नियरे राखिए........वाली कबीर वाणी कम से कम कुछ मामलों में तो इस देश को माननी चाहिए। इससे पहले चीन ने यह भी कहा था कि ‘भारत में सरकारी भ्रष्टाचार इतना अधिक बढ़ चुका है कि विकास व कल्याण कार्यों के लिए आवंटित पैसों में से अधिकांश, वैसे ही जाया हो जाता है जिस तरह छेद वाले किसी लोटे में से उसका अधिकांश पानी नीचे गिर जाता है। ’याद रहे कि चीन में भ्रष्ट लोगों के लिए फांसी की व्यवस्था है जबकि भारत में जो जितना अधिक भ्रष्ट है, उस व्यक्ति के लिए उतना ही अधिक महत्वपूर्ण पद पर पहुंच जाने की गुंजाइश है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीन की इन बातों का मनन करके यदि भारत खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करे तो यह कोई हेठी की बात नहीं होगी। हमारे बाद आजाद हुए चीन ने अनेक मामलों में हमसे बेहतर ढंग से अपने देश को बनाया है तो उसे उपदेश देने का नैतिक अधिकार भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; सरकारी भ्रष्टाचार को कम करने के मामले में हमारे देश का यदि खराब रिकार्ड है तो इसके लिए हमारे हुकमरान ही जिम्मेदार रहे हैं। पर यह भ्रष्टाचार रक्षा खरीद मामलों में भी अपना असर दिखा रहा है जो देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक बात है। हाल में यह भी खबर आई थी कि मुम्बई के ताज होटल आदि पर हुए आतंकी हमले के समय हमारे पुलिस अफसरों ने जो बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखे थे, वे घटिया थे क्योंकि उसकी खरीद में घोटाला हुआ था। सोफमा जैसी बेहतर तोप को छोड़कर हमने बोफर्स तोप खरीदी थी, यह बात तो जगजाहिर है। पर इसके अलावा बहुत सी बातें जगजाहिर नहीं होतीं और बड़े बड़े घोटाले पलते रहते हैं। इससे हमारी रक्षा तैयारियां पीड़ित होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  भले अब हम सन 1962 की स्थिति में नहीं हैं जब हमारी चीन से शर्मनाक हार हुई थी। पर हमें जो चीन तक पहुंचना चाहिए था, हम वह काम भी नहीं कर पा रहे हैं तो इसके पीछे विभिन्न सरकारी स्तरों पर व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार ही है। इस समस्या के कोढ़ में खाज का काम करती है उस भीषण भ्रष्टाचार के प्रति हमारे यहां की विभिन्न सरकारों व नेताओं की भारी सहिष्णुता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  कई बार यह कहा जा चुका है कि रक्षा मामलों में हमारी बदतर तैयारियों ने इस देश को विदेशी हमलावरों के समक्ष लाचार भी बना दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   मध्य युग में बाबर कीे फौज में तोप थी तो राणा सांगा के सैनिकों के पास महज तलवारें और भालें। युद्ध में बाबर की ओर से एक तोप चलती थी और अनेक राजपूत वीर , तत्काल वीर गति को प्राप्त कर जाते थे। एक बार  फिर  तोप के सामने तलवार लेकर खड़े हो जाने के लिए सैनिकों की जमात तैयार हो जाती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   बाद के दिनों में भी इस देश में शाहजहां ने ताज महल और विशाल किलों के निर्माण में समय, शक्ति व धन तो खूब लगाये जबकि उसे देश की हमलावरों से रक्षा के लिए नेवी पर भी खर्च करना चाहिए था। हमलावर समुद्री मार्ग से भारत आये थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   आज जब भारत का अपने पड़ोस से अच्छा संबंध नहीं है तो हमारी तैयारी भी ऐसी होनी चाहिए ताकि दुश्मन हमारे खिलाफ कोई खिलवाड़ करने से पहले थोड़ा रुक कर सोंचें। परमाणु संपन्न देश बन जाने के कारण भारत की सैनिक धाक जरूर बढ़ी है। पर वही काफी नहीं है। हमें आर्थिक रूप से भी एक संपन्न देश बनना पड़ेगा। इसके लिए भ्रष्टाचार पर काफी हद तक काबू पाना होगा। भ्रष्टाचार कम होने से रक्षा तैयरियों में भी बेहतरी आएगी। साथ ही देश का आर्थिक स्वास्थ्य भी सुधरेगा। गांवों में भी जो व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न होता है, उसे उसके विरोधी भी जल्दी उससे नहीं उलझते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीन का मन इसलिए भी बढ़ा रहता है क्योंकि भारत ने आजादी के बाद खुद को बुलंद नहीं बनाया। अब भी यहां 84 करोड़ लोग औसतन बीस रुपये रोज पर किसी तरह पेट को पीठ से अलग रखने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरी ओर इस देश में धनपशुओं, कालाबाजारियों, करोड़पति-अरबपति नेताओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है। इस देश का भारी धन विदेशी बैंकों की शोभा बढ़ा रहे हैं। ऐसे में चीन की निंदा को कबीर तरह हम लें तो हमारा ही भला होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;(दैनिक ‘जागरण’ पटना संस्करण:16 फरवरी 2010 से साभार)&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-828250492351855462?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/828250492351855462/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=828250492351855462&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/828250492351855462'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/828250492351855462'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2010/02/blog-post_20.html' title='निंदक नियरे राखिए'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-2393743081550503963</id><published>2010-02-02T17:42:00.003+05:30</published><updated>2010-02-02T17:45:31.023+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनय'/><title type='text'>राजनयज्ञों की उठती पीढ़ी</title><content type='html'>इस देश में नेता कई तरह के होते हैं। अत्यंत थोड़े से राजनयज्ञ यानी स्टेटसमैन होते हैं। कुछ अन्य नेता होते हैं। कुछ कबीलाई सरदार होते हैं। कुछ शुद्ध माफिया व हत्यारे होते हैं जो राजनीति भी करते हैं। कुछ जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंकों के सौदागर होते हैं। कुछ अन्य कोटियां भी हैं जिनकी चर्चा यहां उचित नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   जब देश की सत्ता राजनयज्ञों या कम से कम नेताओं के हाथों में आती है तो देश भरसक सुरक्षित माना जाता है। पर जब बाकी श्रेणियों के राजनीतिक कर्मियों के हाथों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सत्ता आ जाती है तो देश या प्रदेश असुरक्षित माना जाने लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  इस देश के साथ परेशानी यह पैदा हो रही है कि यहां एक-एक करके राजनयज्ञ यानी स्टेटसमैन उठते जा रहे हैं। ज्योति बसु अब हमारे बीच नहीं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी और जार्ज फर्नांडीस बुरी तरह बीमार हैं और सक्रिय राजनीति से दूर जा चुके हैं। एल.के. आडवाणी को परिस्थितियों ने किनारे कर दिया। उनके अर्ध-संन्यास के लिए वे खुद कतई जिम्मेदार नहीं हैं। यदि पूरे देश के राजनीतिक नजारे को गौर से देखें तो स्टेटसमैन शायद ही कहीं नजर आएगा। यदि इक्के-दुक्के हैं भी तो उनकी संख्या इतनी कम है कि वे देश पर आने वाले किसी संकट में कोई निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   नेताओं की नई नई पीढ़ियां आंदोलनों की आंच से तप कर निकलती हैं। अब परिवारवाद के घरौदों से राजनीति में नई पीढ़ियां जबरन निकाली जा रही हैं। और इस अभागे व गरीब देश पर थोपी जा रही है। परिवारवाद की कल्पना ही स्वार्थ व जातिवाद पर आधारित है। इसलिए आम तौर पर परिवारवादी राजनीति का स्वरूप भी  वैसा ही बनता जा रहा है। शायद ही किसी परिवारवादी नेता ने देश का भला किया हो। अपवादों की बात और है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  ब्रिटेन के प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल को स्टटेसमैन कहा जाता है। स्टेटसमैन न सिर्फ देश व दुनिया के सामने मौजूद समस्याओं से मजबूती व होशियारी से लड़ता है बल्कि राजनीति का स्वरूप भविष्य में कैसा हो सकता है, इसका भी सही अनुमान रखता है। चर्चिल ने सफलतापूर्वक द्वितीय विश्व युद्ध का नेतृत्व किया था। साथ ही  उसे यह भी पता था कि आजादी दे देने के बाद भारत के नेतागण उस देश के साथ क्या कर गुजरेंगे। उनकी यह भविष्यवाणी भारत में सही साबित हुुई है जिसकी यहां अक्सर चर्चा होती रहती है। हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि भारत को आजाद करना गलत था।ं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; पर आज जब हम भारत में स्टटेसमैन की कमी की चर्चा करते हैं तो हमारे दिलोदिमाग में यह बात रहती है कि यदि देश के सामने कोई बहुत बड़ी व खतरनाक समस्या आ जाए तो हमारे नेतागण उससे कैसे निपटेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  आज भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या सरकारी भ्रष्टाचार है। इसी से लगभग अन्य सभी समस्याएं पैदा हो रही हैं। आज की भीषण महंगाई की समस्या भी सरकारी भ्रष्टाचार से ही पैदा हुई है। महंगाई से जूझने में हमारे देश व प्रदेश के नेतागण विफल हैं। जबकि निष्पक्ष विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यदि ईमानदारी, दूरदर्शिता व कड़ाई  से इस समस्या का समय पर समाधान कर दिया गया होता तो आज यह इतना भीषण रूप नहीं ले पाता। सरकारी भ्रष्टाचार की समस्या से सफलतापूर्वक जूझने के लिए ऐसे राजनयज्ञों की सख्त जरूरत है जो ईमानदारी से इस बीमारी पर हमला करे। इसके लिए यह जरूरी है कि वह राजनयज्ञ खुद भी ईमानदार हांे। वैसे भी व्यक्तिगत ईमानदारी के बिना कोई राजनयज्ञ का दर्जा पा ही नहीं सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  आज इस देश में कितने नेता बच गये हैं जिनकी व्यक्तिगत ईमानदारी ‘सीजर की पत्नी की तरह संदेह से परे’ है ?  ऐसे माहौल में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जरूरी कदम कौन उठाएगा ? यह एक बड़ी समस्या है जो समय के साथ इस देश में बढ़ती ही जा रही है। यह बात सही है कि अटल बिहारी वाजपेयी, जार्ज फर्नांडीस और ज्योति बसु ऐसी सरकारों में रहे जो भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं थी। पर ये तीन नेता कम से कम ऐसे तो माने ही गये जो सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर अपने तथा अपने परिवार के घर नहीं भरते थे। ये नेता जिन पदों पर रहे, उन पदें को तो कम से कम पैसे कमाने की मशीन बनाने से उन्होंने रोके रखा। पर आज अधिकतर सत्ताधारी व प्रतिपक्षी नेताओं की हालत कैसी है? एम.पी.-विधायक फंड ने तो अधिकतर नेताओं की बखिया उधेड़ कर रख ही दी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  इस माहौल में ज्योति बसु जैसे राज नेताओं का जाना अखरता है। राजनयज्ञों की दिनानुदिन घटती संख्या और भी अखरने वाली बात है। यह देश व इसके लोकतंत्र के भविष्य के लिए कतई शुभ नहीं है। आगे- आगे देखिए होता है क्या !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;साभार दैनिक जागरण पटना&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-2393743081550503963?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/2393743081550503963/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=2393743081550503963&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/2393743081550503963'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/2393743081550503963'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='राजनयज्ञों की उठती पीढ़ी'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-1471026158262693292</id><published>2010-01-30T17:50:00.002+05:30</published><updated>2010-01-30T17:58:22.272+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>तीन-तीन बार उनके दरवाजे पर आकर लौट गया था प्रधान मंत्री का पद</title><content type='html'>प्रधान मंत्री का पद तीन-तीन बार ज्योति बसु के दरवाजे पर आकर लौट गया था। एक बार तो सी.पी.एम. की केंद्रीय कमेटी ने उन्हें प्रधान मंत्री पद स्वीकारने ही नहीं दिया। यह 1996 की बात है। अन्य दो अवसरों पर खुद ज्योति बसु ने यह पद ठुकरा दिया। 1996 से पहले उन्हंे ऐसा आफर 1989 और 1990 में भी मिला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  संभवतः ऐसा इस देश में सिर्फ ज्योति बसु के ही साथ हुआ। इस बारे में खुद ज्योति बसु ने कहा था कि ‘भारत का प्रधान मंत्री बनने का प्रस्ताव मेरे सामने पिछले कई वर्षों से विभिन्न स्त्रोतों से आता रहा है। 1996 में जब वी.पी. सिंह ने प्रस्ताव दिया तब मुझे लगा कि इसे स्वीकार करने का समय आ गया है।’ इस बात का पता तो पूरे देश को तभी चल गया था कि किस तरह सी.पी.एम. ने ज्योति बसु को प्रधान मंत्री नहीं बनने दिया था। पर यह बात कम ही लोग जानते हैं कि 1989 में भी प्रधान मंत्री बनने का प्रस्ताव अरुण नेहरू ने ज्योति बसु को दिया था। यह प्रस्ताव राजीव गांधी की ओर से अरुण नेहरू ने ज्योति बाबू तक पहुंचाया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   ज्योति बसु के जीवन पर लिखित अरुण पांडेय की पुस्तक में इस बात का जिक्र  है। पुस्तक 1997 में राज कमल प्रकाशन ने प्रकाशित की थी। ज्योति बसु ने बताया था कि ‘मैंने तब अरुण नेहरू का आॅफर अस्वीकार कर दिया था।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  अरूण पांडेय लिखते हैं कि ‘उनके स्वीकारों व अस्वीकारों का अर्थ समझा जा सकता है। यदि वे 1989 में प्रधान मंत्री पद का ख्वाब देखने लगे होते तो भारतीय मतदाता उन्हें खलनायक मानते। क्योंकि 1989 के नायक तो विश्वनाथ प्रताप सिंह थे। ठीक उसी तरह यदि वे 1990 में राजीव गांधी से हाथ मिला कर प्रधान मंत्री बनते तो उन्हें विश्वासघाती कहा जाता। इससे अलग 1996 का प्रस्ताव उन्हें नायक बनाता लग रहा था। क्योंकि वे समूचे तीसरे मोर्चे की आखिरी पसंद थे। चुनौतियां विकट थीं, पर उनसे टकराने का पर्याप्त अनुभव उनके पास था। इसीलिए ज्योति बसु ने माकपा के इस निर्णय को भयंकर ऐतिहासिक भूल घोषित किया। याद रहे कि उनकी पार्टी ने ही उन्हें 1996 में प्रधान मंत्री नहीं बनने दिया था।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस संबंध में ज्योति बसु ने कहा था कि ‘सरकार में शामिल होने के सवाल पर पार्टी ने जैसा अड़ियल और अनम्य रूख अख्तियार किया, उसका कारण था मेरे अपने पाॅलिट ब्यूरो और केंद्रीय कमेटी के साथियों में उपयुक्त राजनीतिक समझ का अभाव। इसीलिए वे स्थिति का सामना सकारात्मक रूप से नहीं कर सके। अधिकतर के विचार युक्तियुक्त नहीं थे। उन्होंने भयंकर भूल की। इस बात का हमें दिली अफसोस है कि सरकार में शामिल न होने का निर्णय करके हमारी पार्टी के साथियों ने मेरे सुझाव को महत्वहीन माना और एक प्रकार से मेरे विवेक को अपमानित किया। लोग हमें इस निर्णय के लिए उसी प्रकार दोषी ठहराएंगे जिस प्रकार उन्होंने तब दोषी ठहराया था जब हमने मोरारजी सरकार को समर्थन नहीं दिया था।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  1979 में चैधरी चरण सिंह ने मोरारजी की सरकार गिराने पर अमादा थे। ज्योति बसु उसी समय की चर्चा कर रहे थे। तब ज्योति बसु विदेश में थे। बसु ने इस संबंध में कहा था कि ‘तत्कालीन प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने अपनी सरकार बचाने के लिए समर्थन की मांग मुझसे तब की थी, जब मैं बुखारेस्ट में छुटिटयां मना रहा था। उन्होंने मुझे फौरन भारत लौटने को कहा था। मैंने स्थिति का अध्ययन कर मन ही मन फैसला कर लिया कि मोरारजी देसाई को पद पर बैठाए रखने के लिए हमारी पार्टी को उनका समर्थन करना चाहिए। लेकिन इससे पहले कि मैं भारत पहुंचता, हमारी पार्टी उन्हें समर्थन नहीं देने का फैसला कर चुकी थी। मैं कुछ नहीं कर पाया। क्योंकि मैं पार्टी के भीतर अल्पमत में था। मेरी दृष्टि में यह भी भारी भूल थी। इंदिरा गांधी ने राजनीतिक निर्णय लेते समय राजनीतिक नैतिकता की कतई परवाह नहीं की। हमारी पार्टी पर मोरारजी देसाई सरकार को गिराने का आरेाप लगा। हमारी गलती ही इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी का कारण बनी। याद रहे कि इंदिरा गांधी ने समर्थन देकर चरण सिंह को प्रधान मंत्री बनवा दिया था और लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने से पहले समर्थन भी वापस ले लिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; माकपा में मौजूद उनके विरोधियों ने इस तरह के मामलों में ज्योति बसु के तर्कों को खारिज कर दिया था। उनके विरोधियों का मानना था कि पार्टी ऐसी किसी सरकार में शामिल नहीं हो सकती, जिसकी नीतियों को प्रभावित करने की स्थिति में वह नहीं हो। दूसरा तर्क यह था कि कांग्रेस के समर्थन से सरकार चलाने का हर अभियान पार्टी के विस्तार में बाधक होगा। तीसरा तर्क यह था कि सरकार से बाहर रहते हुए पार्टी सरकार पर अपना दबाव भी बना सकती हेै। साथ ही पार्टी मोर्चे के विभिन्न धड़ों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में अधिक सक्षम हो सकती है। ज्योति बसु को गम इस बात का नहीं था कि वे प्रधान मंत्री नहीं बन सके, बल्कि उन्हें इस बात का गम रहा कि उनकी पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति में सशक्त हस्तक्षेप करने का एक सुनहरा अवसर खो दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुरभि बनर्जी ज्योति बसु की अधिकृत जीवनीकार रही हैं। उन्होंने लिखा है कि ज्योति बसु किसी भी पद को स्वीकार करने में सदा संकोची रहे। उन्होंने यानी ज्योति बसु ने हंसते हुए जीवनीकार से कहा था कि ‘सरकार में शामिल नहीं होने का निर्णय लेकर केंद्रीय कमेटी के बहुमत ने मुझे बचा लिया। क्योंकि प्रधान मंत्री बनने के बाद मेरे उपर बोझ बढ़ जाता। स्वास्थ्य खराब होने के कारण मुझे तकलीफ होती।’ इस पर सुरभि बनर्जी ने लिखा है कि ‘केंद्रीय कमेटी के फैसले के बाद मैंेने माकपा के ढेर सारे सदस्यों और कई अन्य राजनीतिक विश्लेषकों से बात की। लगभग सभी ने कहा कि यह फैसला देशहित को ध्यान में रख कर किया गया फैसला नहीं था बल्कि पार्टी में मौजूद परंपरागत द्वंद्व का परिणाम था। ज्योति बसु से अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी और  विचारधारात्मक विरोधों के चलते केंद्रीय कमेटी के अधिकतर सदस्यों ने बैठक में आने से पहले ही यह तय कर लिया था कि किसी भी कीमत पर उन्हें प्रधान मंत्री नहीं बने देना है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  इस मसले पर बंगाल बनाम केरल वाला पुराना निष्कर्ष निकालने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। क्योंकि उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी किससे थी और विचारधारात्मक मतभेद किससे था, इस सवाल का किसी महत्वपूर्ण नेता की तरफ से कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt; साभार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-1471026158262693292?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/1471026158262693292/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=1471026158262693292&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/1471026158262693292'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/1471026158262693292'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='तीन-तीन बार उनके दरवाजे पर आकर लौट गया था प्रधान मंत्री का पद'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-6921133510071020291</id><published>2009-12-23T21:01:00.002+05:30</published><updated>2009-12-23T21:05:00.929+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Vishleshan'/><title type='text'>दूरगामी परिणामों वाला एक कदम</title><content type='html'>गुजरात विधानसभा ने स्थानीय निकायों के चुनाव में मतदान को अनिवार्य बनाने वाला विधेयक पास कर दिया। यह एक ऐसा कदम है जिसे देर सवेर सभी चुनावों में लागू कर दिया जाए तो उसका दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकता है। जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंक की बुराई को कम करने के लिए ऐसी मांग पिछले कई वर्षों से की जाती रही है। पर गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार ने स्थानीय निकायों से इसकी शुरुआत कर दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस विधेयक में यह व्यवस्था जरूर रखी गई है कि यदि कोई मतदाता अपनी अनुपस्थिति का कोई उचित कारण बता देता है तो उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी अन्यथा उसे अयोग्य मतदाता घोषित कर दिया जाएगा। संविधान निर्माताओं ने जब आजादी के बाद प्रत्येक बालिग नागरिक को मत देने का अधिकार दिया, तो उनसे यह उम्मीद की गई थी कि वे उस अधिकार समुचित उपयोग करके देश व प्रदशों के लिए जनसेवी सरकार बनवाएंगे। पर कई कारणों से ऐसा नहीं हो सका। उल्टे मतदाताओं की संख्या कम होने के कारण इस देश की राजनीति में कई तरह की बुराइयां पैदा होने लगीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई साल पहले पटना जिले के एक विधानसभा क्षेत्र में एक बाहुबली सिर्फ इसलिए चुनाव जीत गया क्योंकि अधिकतर मतदाता मतदान के दिन अपने घरों में ही रहे। उस बाहुबली ने दो सौ मतदान केदं्रों में सिर्फ 30 मतदान केंद्रों पर कब्जा करवा कर जीत हासिल कर ली। उन दिनों मतदान केंद्रों पर कब्जा आम बात थी। यदि उस क्षेत्र के सारे नहीं तो कम से कम अधिकतर मतदाताओं ने मतदान में भाग लिया होता तो ऐसा रिजल्ट कतई नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  पर कम मतदान का लाभ कई राजनीतिक दलों ने उठाकर इस देश की राजनीति का कचड़ा कर रखा है। पिछले दसियों साल का चुनावी अनुभव यह बताता है कि किसी दल या दलीय समूह को केंद्र की सत्ता पर कब्जा कर लेना हो तो उसे सिर्फ तीन या चार समुदाय या जाति समूहों का वोट बैंक बनाना होगा। यदि किसी प्रदेश की सत्ता हासिल करनी हो, तब तो किसी दो मजबूत समूहों से ही काम चल जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई मामलों में होता यह रहा है कि इस रीति से सत्ता में आया दल या नेता सिर्फ अपने समुदाय या जाति की थोड़ा बहुत जरूरतों को पूरी करता है और बाकी जनता को अपने हाल पर छोड़ देता है। इसके बावजूद उसे चुनावी जीत मिलती जाती है। क्योंकि उसके पास एक ठोस वोट बैंक जो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस देश में किसी समुदाय या जाति की आबादी पूरी आबादी के 10 -15 प्रतिशत से अधिक नहीं है। यदि सौ या नब्बे प्रतिशत मतदाता मतदान केंद्रों पर जाने लगें तो फिर इन जातीय वोट बैंकों की करामात लगभग समाप्त हो जाएगी। जब वोट बैंक के कारण किसी दल या नेता के पास चुनावी निश्चिंतता नहीं रहेगी तो उसे आम जनता के लिए ईमानदारी व मेहनत से काम करना पड़ेगा, तभी वह कोई चुनाव जीत पाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अब तक के अनेक चुनावों में इस देश में जातीय व सांप्रदायिक भावनाएं भड़का कर ऐसे ऐसे नेता, दल और दलीय समूह सत्ता में आते रहे हैं,जिन्हें शाय तब सत्ता नहीं मिलती जब 90 से सौ प्रतिशत लोग मतदान करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  ऐसा नहीं होना चाहिए कि चूंकि एक विवादास्पद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसा विधेयक पास कराया है तो उस विधेयक पर खराब विधेयक करार दे दिया जाए। ऐसे दूरगामी परिणाम वाले कदम पर देश में ंखुले दिलो दिमाग से विचार होना चाहिए और उसे लोकसभा व विधानसभाओं के चुनावों में भी लागू करने का प्रयास होना चाहिए।इससे यह भी होगा कि उन गरीबों को भी मत देने का अवसर मिलेगा जिन लोगों को ऐसा अवसर कम ही मिलता है। चूंकि देश के 84 करोड़ लोगों की रोज की औसत आय मात्र बीस रुपये रोजाना है, इसलिए उनके बीच के मतदाता अपने लिए सही उम्मीदवारों को ही चुनेंगे, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;(साभार दैनिक जागरण:पटना संस्करण: 22 दिसंबर 09)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-6921133510071020291?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/6921133510071020291/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=6921133510071020291&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/6921133510071020291'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/6921133510071020291'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2009/12/blog-post_4134.html' title='दूरगामी परिणामों वाला एक कदम'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-4504879186914411292</id><published>2009-12-23T20:44:00.003+05:30</published><updated>2009-12-24T18:38:55.158+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्लेषण'/><title type='text'>कांग्रेसी राज में ही क्यों बढ़ती है बेतहासा महंगाई ?</title><content type='html'>सन 1999 में गेहंू साढ़े सात रुपये प्रति किलो ग्राम की दर से बिक रहा था। सन 2004 में उसकी कीमत बढ़कर आठ रुपये प्रति किलो हो गई। आज लोग साढ़े 17 रुपये किलो गेहूं खरीदने को विवश हो रहे हैं।&lt;br /&gt;साधारण चावल का दाम 1999 में साढ़े आठ रुपये किलो था। 2004 में बढ़कर दस रुपये किलो हो गया। अब कम से कम सोलह रुपये किलो चावल बिक रहा है। विभिन्न स्थानों में इनकी कीमतों में थोड़ी कमी -बेशी स्वाभाविक है। जिंसों के प्रकार के अनुसार भी दामों में कमी -बेशी स्वाभाविक है। इस विश्लेषण की मूल बात अभूतपूर्व मूल्य वद्धि की चर्चा है। मूंग दाल की हालत और भी खराब है। इस साल करीब सौ रुपये किलो बिकी। जबकि 1999 से 2004 तक इसकी कीमत 24 रुपये किलो पर स्थिर थी। चीनी और सरसों तेल की कीमतों में तो हाल के वर्षांे में अपेक्षा कत और भी अधिक बढ़ोतरी हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपर्युक्त विवरण एनडीए के किसी आरोप पत्र से नहीं लिया गया है बल्कि दैनिक अखबारों के आर्थिक पन्नों से उतारा गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज जानकार लोग बता रहे हैं कि खाने पीने वाली सामग्री की कीमत मात्र गत एक साल में करीब 20 प्रतिशत बढ़ गई है। चीनी की कीमत तो एक साल पहले 18 रुपये प्रति किलो थी। इस साल क्यों वह 40 रुपये किलो बिकी ? जबकि किसानों को गन्ने के अलाभकर मूल्य निर्धारण के खिलाफ संसद भवन को घेरना पड़ा। क्यों गन्ने का समर्थन मूल्य तो दस साल में मात्र दुगुना किया जाता है, पर चीनी की कीमत मात्र एक साल में दुगुनी हो जाती है ? अन्य उपभोक्ता सामग्री का भी कमोवेश यही हाल है? आखिर इसमें केंद्र व राज्य सरकारों की कोई भूमिका रह भी गई है या नहीं ? या फिर आम निरीह जनता का खून चूसने के लिए विभिन्न सरकारोंने मुनाफाखार भेड़ियों को खुला छोड़ दिया है ? साफ -साफ लग रहा है कि केंद्र सरकार ने इस अभूतपूर्व महंगाई की समस्या के सामने न सिर्फ घुटने टेक दिये हैं, बल्कि संबंधित मंत्री शरद पवार ने यह कह कर मुनाफाखोरों व जमाखोरों का हौसला बढ़ा दिया है कि अगले तीन महीने तक महंगाई पर काबू नहीं पाया जा सकता है। इससे पहले कभी किसी सरकार को इतना निरीह नहीं पाया गया था। यह निरीहता है या मुनाफाखारों से सांठसांठ ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो केंद्रीय मंत्री महंगाई के लिए राज्यों को दोषी ठहरा कर अपनी राजनीतिक रोटी भी सेंक रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर विभिन्न राज्य सरकारों में व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार के कारण सार्वजनिक जन वितरण प्रणलियां करीब करीब फेल कर गई हैं। इस विफलता ने मुनाफाखोरों व जमाखोरों की बांछें खिला दी हैं। केंद्र सरकार के अन्न भंडार भरे हुए हैं। पर उन्हें बाजारों में नहीं उतारा जा रहा है। ऐसा मुनाफाखोरों के हित को ध्यान में रख कर किया जा रहा है ? यानी जाहिरा तौर पर महंगाई के लिए केंद्र व राज्य दोनों सरकारें जिम्मेदार हैं। यह बात और है कि केंद्र सरकार अपेक्षाकत काफी अधिक जिम्मेदार है। क्योंकि उसने महंगाई बढ़ाने के लिए कुछ और कुकत्य किए हैं। विभिन्न राजनीतिक दल इसको लेकर एक दूसरे पर आरोप भले लगाएं, पर आम जनता सब कुछ जान रही है। इस पर इस गरीब देश में चर्चाएं जारी हैं। यदि सिर्फ गैर यू।पी.ए. राज्य सरकारें ही जिम्मेदार होतीं तो दिल्ली में महंगाई अन्य राज्यों की अपेक्षा कम होती क्योंकि यहां तो दोनों सरकारें एक ही दल की हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी कहा जा रहा है कि भीषण महंगाई के बावजूद जब कोई सत्ताधारी दल चुनाव जीतता ही चला जाए तो उसे इस पर काबू पाने की भला कौन सी मजबूरी रहेगी ? प्रतिपक्षी पार्टियां भी आधे मन से ही इसके खिलाफ आवाज उठा रही हंै। क्योंकि थोड़े बहुत उसके भी तो निहित स्वार्थ हैं ही। मर तो गरीब रहा है। लगता है कि राजनीतिक दलों का गरीबों से संबंध सिर्फ वोट का रहा गया है, भावना व सेवा गायब है। राजनीति में सांप्रदायिक, पारिवारिक व जातीय भावना जरूर मजबूती से उपस्थित है। अब तो इस देश के परंपरागत कम्युनिस्ट दलों को भी फाइव स्टार होटलों में अपने सम्मेलन करने और फाइव स्टार जीवन जीने में कोई शर्म नहीं आ रही है। कुछ अपवादों की बात और है। नई आर्थिक नीतियां आने के बाद बाजार की ताकतों को अर्थ व्यवस्था की बागडोर थमा दी गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा ने ठीक ही कहा है कि ‘आयात-निर्यात की मात्रा और कीमतों की अनिश्चितता तथा कीमत नियंत्रण के लिए आयात का जिम्मा मुनाफाखोर तबकों को देना, महंगाई को न्योतना है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खामियों का कोई इलाज नहीं किया जाता है। नेताओं, पार्टियों और व्यवसायियों के गहराते निजी रिश्ते के परिप्रेक्ष्य में जनपक्षीय मूल्य नीति की उम्मीद करना बेमानी है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज दिल्ली में किसी बहुमंजिली इमारत में तैनात जो गार्ड महीने भर काम करने के बाद मात्र 47 सौ रुपये पाता है, वह खुद क्या खाएगा और क्या गांव में अपने परिवार को भेजेगा ? वैसे भी इस देश के कितने लोगों को इतने पैसे भी हर महीने मिल पाते हैं ? इस देश के गरीबों के बारे में अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्त बताते हैं कि ‘84 करोड़ लोगों की रोजाना औसत आय मात्र बीस रुपये है।’ एक अन्य उदाहरण यहां पेश है। पी।एफ. से जुडी पेंशन राशि तो पांच सौ से हजार -डेढ़ हजार रुपये तक ही है। इस पंेशन राशि में भी किसी तरह की सालाना बढ़ोतरी का कानूनी प्रावधान तक नहीं है। ऐसे दरिद्र लोगों के लिए महंगाई का क्या मतलब है, यह बात अतुल्य भारत का सपना दिखाने वाले लोग नहीं समझ पा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर सरकार द्वारा इस देश में ऐसी अर्थ व्यवस्था जरूर बना दी गई है ताकि करोड़पतियों व अरबपतियों की संपत्ति सचिन तेंदुलकर की रन संख्या के अनुपात से भी अधिक बढ़ती जाए। ताजा आंकड़ों के अनुसार इस देश के अरबपतियों की संख्या मात्र गत एक साल में 27 से बढ़कर 54 हो गई है। एक सौ अमीरों के पास इस देश की 25 प्रतिशत संपत्ति है। जबकि संविधान के नीति निदेशक तत्व चैप्टर के अनुच्छेद 39/ग/में यह कहा गया है कि ‘राज्य ऐसी व्यवस्था करेगा ताकि उत्पादन के साधनों का अहितकारी संकेंद्रण नहीं हो।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्थिक विशेषज्ञ, अखबारों व टी।वी.के टाॅक शो में यह बताते रहते हैं कि महंगाई बढ़ने के लिए किस तरह केंद्र सरकार अधिक और राज्य सरकारें कम जिम्मेदार रही हैं। उधर लोकसभा में महंगाई पर चर्चा होती है तो उस समय सदन में एक सौ सांसद भी उपस्थित नहीं रहते। आखिर उसकी उन्हें जरूरत ही कहां है ? उन्हें तो महंगाई छू भी नहीं गई है। सदन की बैठक के आखिरी दिन बिना बहस के संसद मत्रियों व सांसदों के वेतन भत्ते आये दिन सर्वसम्मति से बढ़ाती रहती है।ं 543 में से 316 सांसद करोड़पति हैं। उन्हें संसद की कैटीन में देश में सबसे सस्ता व स्तरीय खाना उपलब्ध ही है। वे क्यों महंगाई से तनिक भी दुःखी होंगे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि इस मामले में गैर कांग्रेसी सरकारें व पार्टियां दूध की धुली हुई हैं। आम भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के मामले में उनका रिकाॅर्ड भी लगभग कांग्रेस जैसा ही है। अब तो लगता है कि नेताओं के लिए भ्रष्टाचार कोई मुददा रहा ही नहीं। पर मुनाफाखोरों के प्रति कांग्रेस अपेक्षाकत अधिक उदार रही है। सरसों तेल की कीमत 1972 में 3 रुपये 95 पैसे प्रति लीटर थी। सन 1979 में वह घट कर 3 रुपये 50 पैसे हो गई। तब जनता पार्टी की सरकार केंद्र में थी। अन्य सामग्री की कीमतों का भी कमोवेश यही हाल था। पर सन 1980 में जब कांग्रेस सत्ता में वापस आ गई तो सरसों तेल की कीमत 1981 में बढ़कर साढ़े छह रुपये प्रति लीटर हो गई। मूंग दाल की कीमत सन 1972 में ढाई रुपये और 79 में सवा तीन रुपये थी, पर 81 में साढ़े छह रुपये हो गई। याद रहे कि यहां जो कीमतें दी जा रही हैं, उनमें से कई मद थोक कीमतों के हैं तो कुछ खुदरा के।कई साल के अखबारों की फाइलें देखने से यह लगता है कि 1999 से 2004 तक जिस रफतार से कीमतें बढ़ीं, उसकी अपेक्षा काफी अधिक गति से 2004 और 2009 के बीच में बढ़ी। मौजूदा केंद्र सरकार को इसका वाजिब जवाब देना चाहिए। क्या उसके पास जवाब है भी ? यदि नहीं है तो वह यह बात भी अच्छी तरह समझ ले कि इस मूल्य वद्धि की सर्वाधिक मार देश की 84 करोड़ आबादी पर पड़ रही है। माओवादियांे के खिलाफ किसी तरह के आपरेशन का कोई नतीजा सामने नहीं आएगा, यदि मूल्य वद्धि इसी तरह होती रहेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मूल्य वद्धि की रफ्तार&lt;br /&gt;  (दर प्रति किलो रुपये में)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;              1947 --1972---1979 - 1981---1999--2004--2009         &lt;br /&gt;                            ------------------------------------&lt;br /&gt;गेहूं  -     0.30  --1.25---1.80--- 2.20---7.50--8.00--17.50&lt;br /&gt;मूंग दाल-  0.25 --2.50 --3.25 ---6.50-- 24.00--24.00--95.00&lt;br /&gt;सरसों तेल-1.75--5.50---9.00----16.00-  अनुपब्ध-33.00--91.00&lt;br /&gt;चीनी--- 0.72 -3.95--3.50---- 6.50 --  15.00--16.65--40.00&lt;br /&gt; ( इनमें से कुछ जिंसों का भाव थोक का है और कुछ का खुदरा का।)&lt;br /&gt;------------------------------------------&lt;br /&gt;       इन आंकड़ों को देखने से यह साफ है कि किसके शासन काल में कीमतों के बढ़ने का अनुपात अधिक था और किसके शासन काल में कम।शरद पवार से पहले शायद ही किसी कषि मंत्री ने यह आधिकारिक घोषणा की थी कि अगले तीन महीने तक कीमतें बढ़ेंगी ही।इससे पहले संबंधित मंत्री यह कहते थे कि सरकार कीमतों पर काबू पाने की कोशिश व उपाय कर रही है।दोनों बयानों के मतलब व संदेश जाहिर है कि मुनाफाखारों के लिए अलग अलग हैं। भला लगातार चुनाव जीतते जाने वाले नेता क्यों इसकी चिता करंेगे कि उनके बयानों का क्या अर्थ लगेगा !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;(साभार प्रभात खबर: 22 दिसंबर 2009)&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-4504879186914411292?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/4504879186914411292/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=4504879186914411292&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/4504879186914411292'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/4504879186914411292'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2009/12/blog-post_23.html' title='कांग्रेसी राज में ही क्यों बढ़ती है बेतहासा महंगाई ?'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-8680021716308654805</id><published>2009-11-07T18:52:00.002+05:30</published><updated>2009-11-07T19:03:32.089+05:30</updated><title type='text'>एक ऋषितुल्य संपादक की विदाई</title><content type='html'>यदि कोई संपादक अपने किसी मामूली संवाददाता के लेखन की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए भी अपनी खुद की नौकरी दांव पर लगा दे तो उसे आप क्या कहेंगे ? यदि वही संपादक अपने पुत्र के कैरियर को नुकसान पहुंचा कर भी अपने सहकर्मी पत्रकार की स्वतंत्रता की रक्षा करे तो आप क्या कहेंगे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  आपको जो कहना है, वह कह लें, पर मैं तो कहूंगा कि वह यशस्वी संपादक प्रभाष जोशी एक पत्रकार और किसी प्राचीनकालीन ऋषि के बीच के प्राणी थे। गत 26 साल के उनसे संपर्क का मेरा तो यही अनुभव है। उपर्युक्त दोनों घटनाओं का मैं खुद पात्र रहा हूं। ऐसा अनुभव संभवतः मेरा अकेला का नहीं रहा होगा। इस देश में अनेक लोग हैं जो प्रभाष जी से खुद को सर्वाधिक करीबी मानते रहे क्योंकि प्रभाष जी ने उन्हें कुछ न कुछ दिया ही है जिस तरह उन्होंने अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी मुझे लिखने की स्वतंत्रता दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  मैं सन् 1983 से सन् 2001 तक जनसत्ता का पटना संवाददाता रहा। इन 18 वर्षों में से करीब 12 साल की कालावधि में मुझे प्रभाष जी के संपादकीय व प्रशासनिक नेतृत्व में काम करने का अवसर मिला। बाद के संपादक क्रमशः राहुल देव, अच्युतानंद मिश्र और ओम थानवी का व्यवहार भी मेरे साथ जनसत्ता की परंपरा के अनुकूल ही था जिस परंपरा की नींव प्रभाष जी ने डाली थी। पर प्रभाष जोशी के संपादकत्व का काल भारी राजनीतिक उथल-पुथल का काल था। ऐसा काल जिसमें संपादकों व संवाददाताओं की पहचान हो जाती है। जनसत्ता व उसके यशस्वी संपादक उस झंझावात में खरा उतरे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह रहा कि ‘जनसत्ता’ अपने शुरुआती काल से ही न तो किसी राजनीति व प्रशासनिक ताकत के दबाव में आया और न ही सरकारी विज्ञापन के मायामोह में फंसा। एक्सप्रेस समूह के मालिक राम नाथ गोयनका की परंपरा का यह असर था। एक्सप्रेस समूह द्वारा जनसत्ता का जब प्रकाशन शुरू हुआ, उस समय बिहार के मुख्यमंत्री पद पर बैठे थे चंद्र शेखर सिंह। वे खुद तो ठीकठाक व्यक्ति थे। कायदे से काम करने में विश्वास करते थे, पर उनकी सरकार भ्रष्ट थी। जनसत्ता का कर्तव्य था कि उनकी सरकार के बारे में पाठकों तक खबरें पहुंचाई जाएं। चंद्र शेखर सिंह खबरों के प्रति काफी संवेदनशील नेता थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; चूंकि जनसत्ता दिल्ली से निकलता है और कांग्रेस हाईकमान दिल्ली में बसता है, इसलिए किसी कांग्रेसी मुख्यमंत्री के लिए दिल्ली के अखबार में छपने वाली खबर का काफी महत्व होता है। वैेसे भी चंद्रशेखर सिंह के खिलाफ कांग्रेस का विक्षुब्ध गुट काफी सक्रिय था और वह हाईकमान को उकसाता रहता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  जनसत्ता में उनके तथा उनकी सरकार के बारे में छप रही खबरों से मुख्यमंत्री  परेशान रहा करते थे। स्टेटसमैन के पटना स्थित तत्कालीन संवाददाता और मेरे मित्र मोहन सहाय, चंद्र शेखर सिंह की शालीनता व उनके काम काज के तरीके के प्रशंसक थे। वे मुझसे अक्सर यह कहा करते थे कि ‘आप एक अच्छे मुख्यमंत्री के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। आपकी खबर पढ़कर एक बार चंद्र शेखर सिंह की आंखों में दुःख के आंसू मेैंने देखे थे।’ मेरी गलती कहिए या सही, मैं चंद्रशेखरसिंह से मिलता नहीं था। मुझे डर था कि सत्ताधारी नेताओं से मेलजोल बढ़ाने से कहीं मेरे मन में उनके प्रति मोह पैदा न हो जाए और मैं अपने कर्तव्य से डिग न जाऊं। हार कर मुख्यमंत्री ने जन संपर्क विभाग के एक अफसर को प्रभाष जोशी से मिलने के लिए दिल्ली भेजा। उस अफसर के हाथ में एक पेज का सरकारी विज्ञापन भी था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   उस अफसर की प्रभाष जोशी से क्या बातचीत हुई, उसका विवरण बाद में मेरे एक सहयोगी ने बताया। अफसर ने जोशी जी से कहा कि आपके संवाददाता मुख्यमंत्री से नहीं मिलते और एकतरफा लेखन करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  जोशी जी ने उनसे कहा कि एकतरफा लेखन करते होंगे, पर क्या वे गलत भी लिखते हैं ? अफसर ने कहा कि गलत तो नहीं लिखते, पर पुरानी -पुरानी बातें लिखते हैं। जोशी जी ने कहा कि जिस पार्टी की प्रधानमंत्री यह कहती हंै कि एनटी रामा राव सरकार की बर्खास्तगी की खबर मैंेने टेलीप्रिंटर पर पढ़ी, उस दल के मुख्यमंत्री का बचाव करने आप आए हैं ? यह सुन कर बेचारे अफसर अपने एक पेजी विज्ञापन को समेटते हुए जोशी जी के कमरे से निकल गये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  चंद्र शेखर सिंह के कार्यकाल के बाद बिंदेश्वरी दुबे मुख्य मंत्री बने। वे स्थितप्रज्ञ व्यक्ति थे और अखबारों को अधिक महत्व नहीं देते थे। उन्हें जनसत्ता की परवाह करने की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि कांग्रेस हाईकमान पर उनका असर अधिक था। पर भागवत झा आजाद का मुख्य मंत्रित्वकाल कई मामलों में तूफानी काल रहा। जनसत्ता ने भागवत झा आजाद के समय में एक सर्वेक्षण आयोजित किया था। कुछ चुनाव क्षेत्रों को नमूना बना कर हजारों लोगों से यह पूछा गया था कि आप किस नेता  को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। बिहार के सर्वेक्षण का भार जाहिर है कि मुझ पर था। उस सर्वेक्षण में बिहार के करीब 75 प्रतिशत लोगों ने यह कहा था कि वे अगले चुनाव के बाद भी भागवत झा आजाद को ही मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहेंगे। जनसत्ता ने इस विवरण को भी छापा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     कहा गया कि कांग्रेस चूंकि किसी मुख्यमंत्री को किसी राज्य में लोकप्रिय होना देखना नहीं चाहती, इसलिए आजाद जी को हटा दिया गया। आजाद ने कई चैंकाने वाले काम करके बिहार के निहितस्वार्थियों के हितों पर चोट पहुंचाई थी। इससे आम जनता आजाद से खुश थी, पर कांग्रेस के अनेक नेता उनसे नाराज थे। भागवत झा आजाद के खिलाफ नाराजगी को बल इसलिए भी मिलता था क्योंकि मुख्यमंत्री बनने के बाद वे अपने वैसे कुछ खास समर्थकों के प्रति भी नरम थे जो गलत कामों मंें संलग्न थे। भागलपुर के पापड़ी बोस अपहरण कांड के अभियुक्त के प्रति नरमी दिखाने का आजाद जी पर आरोप था। ऐसे में जनसत्ता जैसे अखबार से वे कैसे बच सकते थे! क्योंकि यह आजाद साहब को दोहरा मापदंड था। ऐसा नहीं था कि आजाद साहब के कुछ अच्छे कामों की तारीफ में जनसत्ता के पटना संवाददाता ने नहीं लिखा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   पर अधिकतर सत्ताधारी नेता तो यही चाहते हंै कि अखबार उनके अच्छे कामों की तारीफ में तो लिखे ही, पर साथ ही उनके गलत कामों को नजरअंदाज भी करता जाए। नेता जब सत्ता में होता है तो वह जनसंपर्क विभाग के प्रकाशन और किसी पेशेवर अखबार के बीच फर्क नहीं कर पाता। वह यह भी समझने लगता है कि पत्रकार या तो मेरा दोस्त हो सकता है या फिर दुश्मन। बीच की कोई स्थिति वह स्वीकार ही नहीं कर पाता। यही हुआ और भागवत झा आजाद जनसत्ता पर नाराज हो गये। दिल्ली के एक चर्चित पत्रकार के घर पर प्रभाष जोशी से आजाद साहब की भेंट हुई। उन्होंने जोशी जी से मेरी शिकायत की। आजाद साहब को उम्मीद थी कि जोशी जी वहीं से फोन उठाएंगे और सुरेंद्र किशोर को कहेंगे कि तुम क्यों आजाद साहब के खिलाफ लिख रहे हो ? पर जोशी जी ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने आजाद साहब से कह दिया कि ‘यह बात तो वहीं हो सकती है जहां सुरेंद्र किशोर भी रहें।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   जोशी जी ने यह बात इस बात के बावजूद कही कि कीर्ति आजाद दिल्ली क्रिकेट क्लब के अध्यक्ष थे और जोशी जी के पुत्र वहां खेलने जाते थे। यानी उनके पुत्र का कैरियर कीर्ति आजाद के रुख पर निर्भर करता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  कई महीने बाद जब हमारे सहकर्मी कुमार आनंद पटना आए तो उन्होंने आजाद जी से जोशी की मुलाकात का यह प्रकरण मुझे सुनाया। मैंने समझा कि शायद संकोचवश जोशी जी मुझे कोई निदेश नहीं दे रहे हैं। इसलिए मुझे ही पहल करके उनसे पूछना चाहिए कि अपने लेखन में भागवत झा आजाद के प्रति कैसा रुख अपनाऊं। मैंने जोशी जी को फोन किया और पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए। प्रभाष जी ने छूटते ही कहा कि ‘यह तो आपको खुद तय करना है। आप स्थल पर हैं। आपको तय करना है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। आई कान्ट लेट डाउन माइ्र्र रिपोर्टर फाॅर माई फ्रंेड।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    उन्होंने बड़ी आसानी से यह बात कह दी, पर इसका कुपरिणाम हुआ उनके पुत्र के क्रिकेट कैरियर पर जिसे कीर्ति आजाद ने आगे नहीं बढ़ाया। कीर्ति आजाद ने राजनीति के लिए पिता धर्म निभाया। पर प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता की खातिर पुत्र धर्म नहीं निभाया। क्या किसी अन्य संपादक पिता ने अपने पुत्र के कैरियर को अपने ही हाथों अपने पत्रकारिता धर्म के पालन के लिए नुकसान पहुंचाया होगा ? मुझे तो कोई दूसरा उदाहरण नहीं मालूम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  शायद आम लोग नहीं जानते कि एक संपादक के लिए अपने अच्छे बुरे कामों के लिए अपने किसी संवाददाता को अनुशासित कर लेना कितना आसान है ? कोई संवाददाता, अपने संपादक की इच्छा के विपरीत एक रपट भी नहीं लिख सकता है। पर जोशी जी ने मुझे हर कदम पर लेखन की मेरी स्वतंत्रता की रक्षा की। क्योंकि वे जानते थे कि मेरा सुरंेद्र किशोर गलती कर सकता है, पर बेईमानी नहीं कर सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  यही बात जोशी जी ने देवीलाल से हरियाणा भवन में अस्सी के दशक में कही थी जब लालू प्रसाद मेरे खिलाफ देवीलाल को उकसा रहे थे। प्रभाष जोशी ने देवीलाल जी से कहा था कि ‘आपका लालू यादव गलत हो सकता है, पर मेरा सुरेंद्र किशोर  गलत नहीं हो सकता है।’ यह तब की बात है जब एक्सप्रेस अखबार समूह राजीव गांधी की सरकार से कठिन संघर्ष कर रहा था। राजीव सरकार पत्रकारिता की स्वतंत्रता के प्रतीक एक्सप्रेस समूह को ही बर्बाद कर देने पर तुली हुई थी। उस कठिन लड़ाई में देवीलाल और आर।के हेडगे जैसे मुख्यमंत्री एक्सप्रेस समूह के बचाव में थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   इसी पष्ठभूमि में एक दिन प्रभाष जोशी हरियाणा भवन देवीलाल से मिलने गये थे। तभी बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता लालू प्रसाद भी वहां पहुंच गये। उसी दिन लालू प्रसाद के बारे में जनसत्ता में मेरी एक खबर छपी थी। उस खबर से लालू प्रसाद मुझ पर सख्त नाराज थे। खबर यह थी कि लोकदल विधायक दल के नेता पद से लालू प्रसाद को हटाने के लिए अधिकतर विधायकों ने एक स्मारपत्र पर दस्तखत कर दिया है जिसे लोकदल हाईकमान को सौंपा जाना है। ऐसी खबरंे नेताओं के बारे में छपती रहती हंै। कई मामलों में ऐसी खबर अपुष्ट तथ्यों के आधार पर भी होती है और बाद में गलत साबित होती है। पर कई बार सही भी रहती है। ऐसी किसी खबर को लेकर आम तौर पर कोई नेता किसी अखबार या फिर संवाददाता पर उतना नाराज नहीं होता जितना लालू प्रसाद नाराज थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  उन्होंने देवीलाल से कहा कि ‘बाबू जी, जोशी जी आपके पास यहां आकर तो बात करते रहते हैं, पर उनके अखबार में मेरे बारे में गलत -सलत खबर छपती रहती हैं। इन्हें रोकिए। अपने खास समर्थक को गुस्से में देखकर देवीलाल भी आपे से बाहर हो गये। उन्होंने भी नहले से दहला मारते हुए कहा कि हां, भाई यह तो हमारे खिलाफ भी लिखता रहता है। जरा मंगाओ इसकी फाइल। एक व्यक्ति ने जनसत्ता की कटिंगें लाकर रख दी। देवीलाल जनसत्ता के गपशप कालम की खबरों से खास तौर से नाराज थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  उन्होंने अपनी नाराजगी अपने खास हरियाणवी लहजे में जाहिर की। सब जानते हैं कि उनका लहजा कैसा होता था। जोशी जी एक्सप्रेस ग्रूप से देवीलाल की करीबी भी जानते थे। फिर भी उन्होंने जनसत्ता का बचाव करते हुए कहा कि मेरा संबंध आपसे अलग है और जनसत्ता में जो कुछ आपलोगों के बारे में छपता है, उसका इस संबंध से कोई मतलब नहीं है। वह सब गुणदोष के आधार पर छपता है और छपेगा। उसे मैं नहीं रोक सकता। यह सब कह कर जोशी जी हरियाणा भवन से निकल गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   इस तरह जोशी जी ने अखबार की स्वतंत्रता की रक्षा की। इस बात के बावजूद जोशी जी ने देवीलाल को खुश नहीं किया कि उस समय देवीलाल एक्सप्रेस ग्रूप के बचाव में चट्टान की तरह खड़े थे। इस प्रकरण में एक और आशंका थी। देवीलाल-प्रभाष जोशी संवाद की सूचना मिलने पर रामनाथ गोयनका नाराज भी हो सकते थे। पर उसकी भी परवाह जोशी जी ने नहीं की। हरियाणा भवन के इस संवाद का विवरण बाद में सुनने के बाद जनसत्ता में काम करने का एक बार फिर मुझे गर्व हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   आज मैं पत्रकारिता में जो कुछ भी हूं, उसमें जनसत्ता, एक्सप्रेस समूह और प्रभाष जोशी का सबसे बड़ा योगदान है। ऐसा महसूस करने वाले जनसत्ता के अनेक अन्य स्टाफ भी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  बिहार में लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान जनसत्ता और उसके संपादक प्रभाष जोशी की एक अन्य तरह की उदारता भी देखने को मिली। ऐसा नहीं कि मैंने लालू प्रसाद के पक्ष में कभी नहीं लिखा। जब तक लालू प्रसाद बिहार के आरक्षणविरोधियों से लड़ते रहे, मैं लगातार उनके पक्ष को पाठकों तक पहुंचाता रहा। मैं  आरक्षण समर्थक रहा हूं। पर मुझे लालू समर्थक मान लिया गया। पर जब लालू -राबड़ी सरकार के घोटाले एक-एक करके बाहर आने लगे तो मैंने जनसत्ता में अपनी पुरानी भूमिका निभाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   दूसरी ओर लालू प्रसाद धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भाजपा और संघ परिवार के खिलाफ कुछ अधिक ही अभियान चलाते रहे हैं। प्रभाष जोशी उनके इस पक्ष के समर्थक रहे हैं। जोशी जी को लगता था कि देश की एकता-अखंडता के लिए भाजपा के खिलाफ देश भर में सक्रिय शक्तियों को उनका समर्थन मिलना चाहिए। पर जनसत्ता का संपादक रहते हुए जोशी जी ने मुझसे कभी नहीं कहा कि तुम लालू प्रसाद के खिलाफ इतना क्यों लिखते हो। कोई संपादक अपने संवाददाता को इतनी स्वतंत्रता देता हो, यह संभवतः जनसत्ता में ही संभव रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   ऐसे अखबार से इस्तीफा देने का निर्णय मेरे लिए दुःखद निर्णय था। दरअसल मैं जनसत्ता में रहता तो 2005 में ही रिटायर हो जाता। तब तक मेरी एक भी पारिवारिक जिम्मेदारी पूरी नहीं हो पाई थी। मैंने मनमसोस कर अजय उपाध्याय का दैनिक हिंदुस्तान ज्वाइन करने का आॅफर स्वीकार कर लिया। यह 2001 की बात है। अजय उपाध्याय तब हिंदुस्तान के प्रधान संपादक थे। मैंने जब हिंदुस्तान ज्वाइन किया तो प्रमोद जोशी ने एक बात कही। उन्होंने कहा कि अरे सुरेंद्र जी, अजय जी ने आप पर कौन सा जादू कर दिया कि जनसत्ता छुड़वाने का जो काम राजेंद्र माथुर आपसे नहीं करा सके, वह काम हमारे संपादक ने कर दिया। उनसे मैं क्या कहता कि मेरी पारिवारिक जिम्मेदारियों ने ही मुझे यहां खींच लाया है। मेरा दिल अब भी जनसत्ता में ही बसता है। राजेंद्र माथुर ने कई बार कोशिश की थी कि मैं नभाटा ज्वाइन करूं। तब प्रमोद जी नभाटा में ही थे। वे इस बात को जानते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   आखिर जनसत्ता में ऐसा क्या रहा है कि कोई व्यक्ति कम पैसे में भी उसकी नौकरी स्वीकार करे ? इसका जवाब जनसत्ता व प्रभाष जोशी तथा उसके परिवर्ती संपादकों के व्यक्तित्व में खोजना होगा। हालांकि जनसत्ता और उसके पूरे परिवार का व्यक्तित्व गढ़ने में प्रभाष जोशी का ही तो हाथ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;strong&gt;  (प्रभात खबर: 7 नवंबर 2009: से साभार)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-8680021716308654805?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/8680021716308654805/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=8680021716308654805&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/8680021716308654805'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/8680021716308654805'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='एक ऋषितुल्य संपादक की विदाई'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-621191329965485629</id><published>2009-10-11T01:34:00.002+05:30</published><updated>2009-10-11T01:43:14.629+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कानोंकान'/><title type='text'>नेहरू परिवार बनाम शास्त्री परिवार</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;सरकार के आश्वासन के बावजूद लाल बहादुर शास्त्री की विधवा ललिता शास्त्री को इलाहाबाद में कोई भूखंड नहीं मिल सका। इलाहाबाद में ललिता शास्त्री की एक छोटे घर की आस भी पूरी नहीं हो सकी। यह आस लिए वे 1993 में वे सिधार गईं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;  पर दूसरी ओर नेहरू -इंदिरा परिवार के सिर्फ एक सदस्य राहुल गांधी की घोषित संपत्ति की एक हल्की झलक देखिए। उन्होंने गत लोस चुनाव में नामांकन पत्र दाखिल करते समय यह विवरण पेश किया था। याद रहे कि यहां सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की घोषित संपत्ति का विवरण नहीं दिया जा रहा है न ही मेनका गांधी और वरुण गांधी की संपत्ति अभी यहां बताई जा रही है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;  राहुल गांधी की नई दिल्ली के साकेत में एक माॅल मंे दो दुकानें हंै जिनकी कीमत क्रमशः एक करोड़ आठ लाख और 55 लाख 80 हजार रुपये हैं। फरीदाबाद में एक फार्म हाउस है जिसकी कीमत 18 लाख 22 हजार रुपये है। सुलतान गंज और मेहरौली में स्थित संपत्ति की कीमत 9 लाख 86 हजार रुपये है। इंदिरा गांधी फार्म हाउस में भी उनका हिस्सा है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;  इसके अलावा भी उनके पास संपत्ति है। बीमा है, बचत है और आभूषण भी है। उनकी संपत्ति की एक झलक इस तथ्य से  भी मिलती है कि उन्होंने गत वित्तीय वर्ष में करीब 11 लाख 20 हजार रुपये आयकर दिया। उन्होंने करीब 5 लाख 32 हजार रुपये सेवा कर और और 97,115 रुपये संपत्ति कर के रूप में जमा कराया।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;  नेहरू परिवार ने आजादी की लड़ाई के दौरान इलाहाबाद का अपना आनंद भवन जरूर कांग्रेस को दे दिया था। शास्त्री जी के पास ऐसा कुछ देने के लिए था ही नहीं। शास्त्री और नेहरू के बीच यह फर्क जरूर रहा। याद रहे कि करीब 62 साल की आजादी के बाद भी इस देश के 84 करोड़ लोगों की रोज की औसत आय मात्र बीस रुपये ही है। गत 62 साल में से कितने साल नेहरू-इंदिरा परिवार ने इस देश पर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से शासन किया, इसकी गणना आप खुद कर लीजिए। आज यदि माओवादी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं तो विशेषज्ञों के अनुसार उसका सबसे बड़ा कारण गरीबी ही है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;दलित और राहुल&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी इन दिनों दलित बस्तियों में जा रहे हैं। अपने आप में यह कोई गलत काम नहीं है। इस बात की कुछ लोग सराहना कर रहे हैं तो ठीक ही कर रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;  पर क्या दलितों के लिए इतना ही काफी है ? क्या यह सिर्फ प्रतीकवाद नहीं है ? इससे दलितों को अंततः क्या मिलने वाला है ? उनके जीवन में कितना फर्क आने वाला है ? बेहतर तो यह होता कि राहुल गांधी दलितों के यहां खुद पहंुच जाने से पहले उनके यहां वे सरकारी धन भिजवाने का समुचित प्रबंध करवाते जो धन बिचैलिये खा जाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;   उनके पिता राजीव गांधी ने सन् 1984 में ही कहा था कि दिल्ली से गरीबों के लिए जो सौ पैसे चलते हैं, उनमें से 15 पैसे ही उन तक पहुंच पाते हैं। यानी बाकी के 85 पैसे बिचैलिये ही खा जाते हैं। वे बिचैलिये कौन हैं, यह बात सब जानते हैं। राहुल गांधी भी आज 25 साल बाद यही बात दुहराते फिर रहे हैं। पर सिर्फ कहने से क्या होगा ? ऐसी स्थिति को कौन बदलेगा ? राहुल गांधी चाहें तो इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं जिस तरह उन्होंने बुंदेलखंड के लिए हाल में सफल पहल की है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt; &lt;strong&gt;   राहुल और बुंदेलखंड&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;बुंदेलखंड की गरीबी से पसीज कर राहुल गांधी ने 28 जुलाई, 2009 को प्रधानमंत्री मनमोेहन सिंह से भेंट की। मनमोहन सिंह पहले ही सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि ‘राहुल गांधी देश के भविष्य हैं।’ फिर क्या था, इस मुलाकात के दो महीने के भीतर ही केंद्र सरकार ने बुंदेलखंड में 4000 मेगावाट के पावर प्लांट लगाने की योजना को मंजूरी दे दी। बुंदेलखंड विकास प्राधिकार का गठन किया जा रहा है और वहां के विकास के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बन रही है। इस से यह साबित होता है कि राहुल गांधी की केंद्र सरकार पर कितनी अधिक पकड़ है और वे चाहें तो और भी अनेक ऐसे काम हो सकते हैं। पर सवाल है कि क्या राहुल गांधी को देश की मूल समस्या की समझ भी है ? क्या वे अब तक यह बात समझ पाए हैं कि मूल समस्या भीषण सरकारी भ्रष्टाचार ही है ? &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;याद रहे कि हाल के लोकसभा चुनाव में चुनाव प्रचार के लिए कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी को जो भारी धनराशि भेजी थी, उसमें से तीन करोड़ रुपये का कोई हिसाब ही नहीं मिल रहा है। इस आरोप में राज्य कांग्रेस के कोषाध्यक्ष दीपक गुप्त को उनके पद से हटा दिया गया है। हालांकि वे खुद को निर्दोष बता रहे हैं। इस घोटाले से भी राहुल की आंखें खुलनी चाहिए। अब सवाल है कि जो पैसे बुंदेलखंड के विकास के लिए दिल्ली से जाएंगे, उनमें से कितने पैसे अफसर, ठेकेदार और नेतागण गरीब जनता के लाभ के लिए खर्च होने देंगे ? वे पैसे वास्तव में गरीबों के विकास व कल्याण पर ही खर्च हांे, पहले तो ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए। उसके बाद ही राहुल गांधी या किसी अन्य नेता को दलितों केा अपना मुंह दिखाने उनके घर जाना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;   भ्रष्टाचार पर गौर करें राहुल&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;  गरीब जनता तक सौ में से 15 पैसे ही इसलिए पहुंच पा रहे हैं क्योंकि पूरे देश  में फैली उच्चस्तरीय ब्यूरोक्रेसी का अधिकांश भी अब भ्रष्ट हो चुका है। हिंदी प्रदेशों की हालत इस मामले में और भी खराब है। अधिकतर राजनीतिक कार्यपालिकाएं तो पहले से ही भ्रष्ट हो चुकी हंै। चूंकि बड़े भ्रष्ट सरकारी अफसरों को सजा देने की प्रक्रिया काफी जटिल बना कर रखी गई है, इसलिए उनका अंततः आम तौर पर कुछ नहीं बिगड़ता। इसलिए वे एक कांड में रिश्वत लेते पकड़े जाने के बावजूद जल्दी ही येन केन प्रकारेण कानून की गिरत फ्त से छूट जाते हैं और दुबारा जनता के धन की लूटपाट में कुछ नेताओं से मिलकर वीरप्पन की तरह लग जाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;   यदि ऐसे भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार के मामलों की त्वरित अदालतों के जरिए सुनवाई हो और सुनवाई के दौरान उनकी भ्रष्टाचार से कमाई गई भारी निजी  संपत्ति त्त  को जब्त करने का कानूनी प्रावधान हो जाए तो वे लूट नहीं पाएंगे। और फिर गरीबों, पिछड़ों, दलितों व अन्य जरूरतमंद लोगों के पास सौ में से पंद्रह की जगह 85 पैसे पहुंच सकेंगे। यदि उसके बाद ही राहुल गंांधी दलितों की बस्ती में जाएंगे तो वे उनके चेहरों पर वास्तविक खुशी देखेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;  बिहार विधान मंडल ने भ्रष्ट लोक सेवकों की संपत्ति जब्त करने और उनके मामलों की सुनवाई त्वरित अदालतों के जरिए करवाने के लिए एक विधेयक मार्च में ही पास करके राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को भिजवा दिया है। पर लगता है कि भ्रष्ट लोग उस पर राष्ट्रपति की मंजूरी नहींे लेने दे रहे हैं। बुंदेलखंड की तरह राहुल गांधी अपने प्रभाव का उपयोग करके पहले तो बिहार विधेयक को मंजूरी दिलवाएं और बाद में ऐसा ही कानून पूरे देश के लिए बनवाएं तो दलितों तक पैसे जरूर पहुंच जाएंगे। अन्यथा एक तरफ राहुल दलित की झोपड़ी से निकलेंगे और दूसरी ओर माओवादी उस झोपड़ी में जाकर अपनी जगह बना लेंगे। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;   &lt;strong&gt;भ्रष्टाचार पर उपन्यास &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;भ्रष्टाचार की समस्या पर रमेश चंद्र सिन्हा का उपन्यास आया है जिसमें कुछ जगबीती है तो कुछ आपबीती हैं। उपन्यास का नाम है ‘अभय कथा।’ जिस समस्या से यह देश व प्रदेश सर्वाधिक पीड़ित रहा है, उस पर कोई उपन्यास आए तो वह स्वागतयोग्य है। अब तो भ्रष्टाचार पर चर्चा भी करने वालों का, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा प्रभु वर्ग, आज मजाक ही उड़ाता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; ‘अभय कथा’ के लेखक ने आजादी से पहले और उसके बाद के भारतीय समाज में घटित बदलावों का तलस्पर्शी अध्ययन प्रस्तुत किया है। उपन्यास में भ्रष्टाचार के विविध आयामों को गहराई से देखने- परखने की कोशिश की गई है। लेखक पटना विश्वविद्यालय के अंग्रेजी प्रोफेसर रह चुके हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;       &lt;strong&gt; और अंत में &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;    बार -बार इस देश में एक सवाल पूछा जाता है कि चीन कैसे आगे बढ़ गया और हमारा देश क्यों पीछे रह गया ? इसका एकमात्र सही जवाब यही है कि चीन ने सरकारी खजाने के लुटेरों के लिए फांसी का प्रावधान किया और दूसरी ओर हमारे देश में जिस नेता या अफसर ने जितना अधिक सार्वजनिक धन लूटा, वह उतने ही अधिक ऊंचे पद पर पहुंचने के लायक समझा गया।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;साभार प्रभात खबर&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-621191329965485629?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/621191329965485629/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=621191329965485629&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/621191329965485629'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/621191329965485629'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2009/10/blog-post_11.html' title='नेहरू परिवार बनाम शास्त्री परिवार'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-1161430688385964769</id><published>2009-10-05T01:42:00.002+05:30</published><updated>2009-10-05T01:47:20.320+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भूले बिसरे'/><title type='text'>ऐसे विफल कर दी गई एक गांधीवादी की भूमि सुधार योजना</title><content type='html'>जय प्रकाश नारायण का सपना था कि कोशी क्षेत्र में माॅडल भूमि सुधार कार्यक्रम चलाया जाए। यह सन 1978 की बात है। तब कर्पूरी ठाकुर की सरकार थी। स्वाभाविक ही था कि कर्पूरी ठाकुर इस काम के लिए तत्काल राजी हो जाएं। इस काम के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान से गांधीवादी बी।जी. वर्गीस पटना आये थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस भूमि सुधार कार्यक्रम के तहत भूमि समस्याग्रस्त पूर्णिया जिले के पांच प्रखंडों में भूमि के रिकाॅर्ड को अद्यतन करना था। हदबंदी से फालतू घोषित जमीन का अधिग्रहण व भूमिहीनों में उनका वितरण करना था। साथ ही बटाईदारों के अधिकारों को स्वीकृति दिलानी थी। फिर उन चुने हुए पांच प्रखंडों के सर्वांगीण विकास का काम करना था। इसका नाम दिया गया कोशी क्रांति योजना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए जेपी की सलाह पर बिहार सरकार ने तत्काल अलग से एक सरकारी कोषांग का गठन भी कर दिया और उसमें एक उपायुक्त व कई स्तरों के 119 अन्य लोक सेवक तैनात कर दिये गये। पर जैसे ही बनमनखी, भवानीपुर, बरहरा कोठी, धमदाहा और रुपौली में इस काम की शुरुआत करने की प्रक्रिया शुरू हुई कि भूस्वामियों और सामंती प्रवत्ति के लोगों व उनके संरक्षक नेताओं ने तगड़ा विरोध शुरू कर दिया। उस इलाके के सत्ताधारी जनता पार्टी के अनेक दबंग जन प्रतिनिधियों  ने कर्पूरी सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया। पटना में भी गोलबंदी शुरू हो गई। कर्पूरी सरकार के गिरने की नौबत आ गई। कर्पूरी ठाकुर दबाव में आ गए। जेपी मन मसोस कर रह गये। और बी।जी. वर्गीस अपनी आंखों में आंसू लिए दिल्ली लौट गये। कोशी क्रांति योजना निष्क्रिय हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   भूमिपतियों का दबाव इतना बढ़ा कि इस संबंध में वर्गीस ने जो लम्बा लेख लिखा था, उसकी एक ही किस्त एक अखबार में छप सकी। दूसरी किस्त छापने की हिम्मत उस अखबार ने भी नहीं की। इस प्रकरण ने यह बात साबित कर दी कि बिहार में भूमि संबंधों को बदलने का मुद्दा कितना नाजुक है और यह काम कितना कठिन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   अब उस कोशी क्रांति योजना के बारे में प्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया द्वारा 2 अप्रैल,   1981 को जारी एक खबर का एक हिस्सा पढ़िए, ‘पूर्णिया, 2 अप्रैल (प्रे)। पूर्णिया जिले के पांच प्रखंडों में तीन वर्ष पूर्व शुरू की गई कोशी क्रांति योजना भूस्वामियों और भूमिहीनों के बीच सीधा टकराव उत्पन्न कर अपने ही भार से दबी जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस योजना की सफलता की उम्मीद नगण्य है। क्योंकि राजनीतिक संरक्षणप्राप्त कुछ भूस्वामी इस योजना के प्रत्येक स्तर पर अवरोध उत्पन्न कर रहे हैं। स्थानीय नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि भूमि सुधार के काम बंद नहीं किए गए तो परसबिगहा कांड की पुनरावत्ति हो सकती है। याद रहे कि मध्य बिहार के परसबिगहा में एक जमीन विवाद के चलते कई लोगों को उनके घर में बाहर से बंद कर उन्हें जिंदा जला दिया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  प्रेस ट्रस्ट के अनुसार गांधी शांति प्रतिष्ठान के श्री बीजी।वर्गीस की कोशी क्रांति योजना को तत्कालीन जनता पार्टी  सरकार ने 1978 में पूर्णिया जिले में माडल भूमि सुधार कार्यक्रम के रूप में शुरू किया था। भूमि सुधार के उपायुक्त के अनुसार दोषपूर्ण भूमि पद्धति और उपज में हिस्सा बंटाने की शोषणात्मक प्रवृत्ति आदि को देखते हुए इस योजना की आवश्यकता महसूस की गई थी। एक अधिकारी के अनुसार दो वर्षों में कार्य का केवल पहला भाग ही पूरा किया जा सका। अधिकारी ने प्रेस ट्रस्ट से बातचीत में यह स्वीकार किया कि इस गति से समस्या के समाधान में एक दशक लग जाएगा। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार पूर्णिया जिले में लगभग 10 हजार ऐसे भूस्वामी हैं जिनके पास एक सौ एकड़ से अधिक भूमि है। इस क्षेत्र की भूमि समस्या 50 साल पुरानी है। उस समय यह पूरा क्षेत्र घना जंगल था।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  कोशी क्रांति योजना ही नहीं, बाद के वर्षों में भी जब -जब भूमि सुधार की कोशिश हुई, भूस्वामियों ने तगड़ा विरोध कर दिया। दरअसल रोजगार के अन्य साधन विकसित नहीं होने के कारण भी भूस्वामी अपनी जमीन के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं और वे अपनी जमीन पर उनके स्वामित्व के मामले में किसी तरह के हल्के खतरे का भी पूरी जी-जान से विरोध कर देते हैं। आजादी के बाद राज्य का आम विकास हुआ होता तो जमीन मोह कम होता। पर सरकारी भ्रष्टाचार के कारण विकास नहीं हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  इसी तरह 1992 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भूमि सुधार खास कर बंटाईदार कानून को सख्त करने की कोशिश की तो उनके ही वोट बैंक के तबके से भी इसका तगड़ा विरोध हो गया। भारी दबाव के बीच तब ही लालू प्रसाद ने कह दिया था कि मैं बर्र के छत्ते में हाथ नहीं डालूंगा। भ्ूमि सुधार के प्रति अपनी 1992 की नीति पर लालू प्रसाद तब तक कायम रहे जबतक वे और राबड़ी देवी सत्ता में थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;(प्रभात खबर: 2 अक्तूबर, 2009 से साभार)&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-1161430688385964769?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/1161430688385964769/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=1161430688385964769&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/1161430688385964769'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/1161430688385964769'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='ऐसे विफल कर दी गई एक गांधीवादी की भूमि सुधार योजना'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-3914760124683794174</id><published>2009-09-26T20:38:00.002+05:30</published><updated>2009-09-26T20:59:11.098+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्लेषण'/><title type='text'>कैसे बदला तीन ही महीने में मतदाताओं का मूड !</title><content type='html'>मात्र तीन महीने में ही बिहार की राजनीति में क्या कुछ घट गया कि मतदाताओं का मूड ही बदल गया ? क्यों बिहार विधानसभा के इस सितंबर के उप चुनाव में 18 सीटों में से 13 सीटों पर राजग हार गया ? क्या यह बदला हुआ मूड एक बार फिर बदलेगा या यह मूड अगले साल तक कायम रहेगा ? हाल के ही लोक सभा चुनाव में बड़े बहुमत से बिहार में चुनाव जीतने वाला एन।डी.ए. बिहार विधान सभा के उपचुनावों में क्यों बुरी तरह पराजित होे गया ? क्या अगले साल होने बिहार विधान सभा के आम चुनाव में मतदाताओं का यही मूड कायम रहेगा या फिर बदलेगा ? तीन ही महीने में यह बदला हुआ मूड स्थानीय व तात्कालिक कारणों से बदला है या इसका स्थायी भाव है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   ये कुछ सवाल हैं जिनके ठोस जवाब आने वाले दिनों में तलाशे जाएंगे और आएंगे भी। पर फिलहाल सरसरी तौर पर देखने से दो बातें सामने आती हैं। ये बातें लोक सभा चुनाव के बाद ही घटित हुई हैं। एक तो नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले बिहार राजग ने यह तय किया कि इस बार भी किसी नेता के परिजन को वह टिकट नहीं देगा। और नहीं दिया भी। इस अभियान के पीछे नीतीश कुमार की मुख्य भूमिका थी। पर इस काम में जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने भी उनका दिल से समर्थन किया। इससे लोहियावादी समाजवादियों की छवि सुधरी। नीतीश कुमार की इस पहल की देश भर में सराहना हुई। नीतीश कुमार ने ऐसे समय में यह काम किया जबकि भाजपा भी परिवारवाद की कीचड़ में बुरी तरह धंसती जा रही है। जदयू के इस कदम को देश व प्रदेश की राजनीति के सुधारीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया। कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा जदयू ही देश में अब एक ऐसा प्रमुख दल है जिसमें परिवारवाद नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   पर खुद राजग यानी एन।डी.ए. के परिवारवादी नेताओं ने इसे अपने राजनीतिक भविष्य के लिए ‘घातक’ माना। जदयू सांसद पूर्णमासी राम और जदयू डा. जगदीश शर्मा ने इसपर विद्रोह भी कर दिया। इन दोनों के परिजन उम्मीदवार बने। डा.शर्मा की पत्नी जीत गई, पर पूर्णमासी राम के पुत्र हार गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   पर यह मामला सिर्फ इन दो नेताओं को ही प्रभावित नहीं करता है। बल्कि बिहार राजग के उन अनेक नेताओं को भी प्रभावित करता हैं जो अपने परिजन के लिए भविष्य में राजग से विधायिका के टिकट व मंत्री पद चाहते हैं। कई लोगों को परिवारवाद के आधार पर पहले भी टिकट मिलते भी रहे हैं। पर अब मिलने बंद हो गये। पूरी तरह बंद हो गये। जाहिर है कि ऐसे लोग यह चाहेंगे कि नीतीश कुमार का यह परिवारवाद विरोधी अभियान फेल हो जाए। इनमें से संभव है कि कुछ लोग इस प्रयोग को फेल करने के लिए इन उप चुनावों में सक्रिय भी हुए होंगे। कुछ नेता लोग निष्क्रिय रहे होेंगे। पर राजग के कुछ लोगों की  इस उप चुनाव में निष्क्रियता का भी विपरीत असर राजग उम्मीदवारों पर पड़ा होगा तो यह स्वाभाविक ही है। जहां चुनावी मुकाबला कड़ा हो वहां थोड़ा कम प्रभाव डालने वाला चुनावी तत्व भी मतदान  में निर्णायक हो जाता है। इस बार हुआ भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    सवाल उन परिवारवादी नेताओं के राजनीतिक पारिवारिक कैरियर का जो है। इसी पारिवारिक राजनीतिक  कैरियर को कायम रखने के लिए तो जदयू सांसद पूर्णमासी राम ने अपने पुत्र को राजद से बगहा में उम्मीदवार बनवा दिया था। उन्होंने पहले ही कह दिया था कि मेरा पुत्र कह रहा है कि उसे उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा तो वह जहर खा लेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  राजनीति में परिवारवाद के खात्मे का काम राजनीतिक सुधार का आज मौलिक काम हो चुका है। यह सती प्रथा व बलि प्रथा की कानूनी समाप्ति से भी अधिक कठिन काम लगता है। सुधार के काम करने वाले सुधारकगण इस दुनिया में कई बार गोलियां भी खाते रहे हैं। यहां तो मात्र गद्दी जाने का खतरा नीतीश कुमार के सामने है। पर ऐसे ही सुधारक लोग इतिहास पुरूष हुआ करते हैं। अब भला बताइए कि परिवारवाद के आधार पर ही हर जगह टिकट मिलने लगे तो वाजिब राजनीतिक कार्यकर्ताओं की बलि हुई या नहीं ? किसी चुनावी सीट को किसी राजनीतिक परिवार के साथ सती क्यों हो जाने दिया जाना चाहिए ? यह लोकतंत्र है या राजतंत्र ? अब यह नीतीश कुमार पर निर्भर करता है कि वे अगले किसी चुनाव में ‘इस सुधार कार्यक्रम की गलती को सुधार कर’ अपनी  गद्दी बचाने की कोशिश करते हैं या फिर इतिहास में अपना गौरवशाली नाम को दर्ज करा देना चाहते हैं। याद रहे कि पूरे देश की राजनीति  में इन दिनों परिवारवाद की बुराई इतनी व्यापक और गंभीर होती जा रही है कि इसके खिलाफ भारी विद्रोह एक न एक दिन होना ही होना है। यदि आज नीतीश कुमार अपने कदम पीछे कर लेंगे तो कोई अन्य सुधारक इसका श्रेय ले लेगा। आज नहीं तो कल यह होने ही वाला है। इसलिए सवाल यह बनता जा रहा है कि एक नेता के बेटा, बेटी या पत्नी को टिकट मिलेगा तो कोई दूसरा नेता इससे वंचित क्यों होना चाहेगा ? इस तरह इस बुराई की श्रृखंला पूरी राजनीति को निगल लेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस तरह करोड़पतियों व अरबपतियों का इस देश की संसद पर कब्जा होता जा रहा है। अभी इस साल 543 में से 360 करोड़पति लोक सभा सदस्य चुने गये। इस गरीब देश में यह भी एक खतरनाक बुराई है जिससे किसी व्यक्ति या संगठन को एक दिन लड़ना ही है। क्यांेकि जिस देश में 84 करोड़ लोगों की रोज की औसत आय मात्र बीस रुपये है उस देश की संसद पर सिर्फ करोड़पतियों का ही कब्जा कैसे होने दिया सकता है ? यदि होगा तो उस सरकार के मंत्री कैबिनेट की बैठक में इस बात को लेकर झगड़ा करते रहेंगे कि उन्हें ऐसे होटल में रहने दिया जाए जिस के एक कमरे का एक रात का किराया एक लाख रुपये ही क्यों न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बहुत अच्छी बात है कि ताजा उप चुनाव में झटके खाने के बावजूद शरद यादव व नीतीश कुमार ने कह दिया है कि वे परिवारवाद का विरोध जारी रखेंगे। जाहिर है कि शरद-नीतीश के इस ऐतिहासिक कदम से डा। राम मनोहर लोहिया की आत्मा को शांति मिल रही होगी। शायद यह कदम आगे कभी इस देश के लिए निदेशक भी साबित हो !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      कारण और भी हो सकते हैं, पर विधान सभा उप चुनावों में राजग की हार का एक दूसरा तात्कालिक कारण यह समझ में आता है कि राज्य सरकार के राजस्व व भूमि सुधार विभाग के सूत्रों के हवाले से अखबारों में इस जुलाई में ही यह खबर छप गई थी कि राज्य सरकार बटाईदारी कानून में सुधार सहित  भूमि सुधार आयोग की कुछ सिफारिशों को जल्दी ही लागू करेगी। इस खबर के मीडिया में आते ही राज्य भर में छोटे -बड़े किसानों में खलबली मच गई। उन किसानों में से अनेक लोग राजग के ठोस मतदाता रहे हैं। आशंकित बटाईदारी कानून से नाराज होने वालों में हर जाति के किसान हैं जिनके पास बंटाई पर देने के लिए जमीन है। राज्य सरकार को अपनी ‘गलती’ का एहसास हुआ। इसके बाद राज्य सरकार ने 5 अगस्त 2009 को यह घोषणा कर दी कि अभी पुराने ही सीलिंग व बटाईदारी कानून लागू रहेंगे। उनमें कोई बदलाव नहीं होगा। राज्य सरकार ने यह भी कहा कि बंदोपाध्याय आयोग की रपट समग्रता में नहीं है। इसलिए उसे लागू नहीं किया जाएगा। पर राज्य सरकार की इस सफाई पर अनेक किसानों ने भरोसा नहीं किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   जहां उप चुनाव हुए,उनमें एक चुनाव क्षेत्र फुलवारी शरीफ के एक सवर्ण बहुल गांव के एक किसान ने मतदान के दिन ही यानी 15 सितंबर, 2009 को ही इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि रामाश्रय प्रसाद सिंह (बिहार सरकार के मंत्री) की इज्जत रखने के लिए कुछ मतदाताओं ने जरूर जदयू को वोट दे दिया अन्यथा हमारा पूरा गांव बटाईदारी कानून लागू होने की आशंका से पीड़ित होकर राजग से नाराज हो गया है। इस गांव के अधिकतर वोट इस बार कांग्रेसी उमीदवार को पड़े। ऐसी ही  खबर सारण जिले के एक राजपूत बहुल गांव से भी मिली  थी जिस गांव के किसान बटाईदारी कानून नहीं चाहते। हालांकि यह आशंका सिर्फ इन दो गांवों व जातियों मंे ही नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल में एक अन्य संदर्भ में कहा था कि मैं कई तरह की बीमारियों का इलाज करने के लिए मुख्यमंत्री बना हूं। वैसे भी उन्होंने अब तक अनेक ऐसे सराहनीय व ऐतिहासिक काम किए हैं जिनकी तारीफ उनके कुछ राजनीतिक प्रतिद्धंद्धी दलों ने भी समय -समय पर की। उनके कई कामों को अन्य राज्यों ने बाद में अपने यहां भी किया। पर हाल के उनके कुछ कदमों के नतीजों से ऐसा लगा कि सारी बुराइयों से एक साथ नहीं लड़ा जा सकता। बिहार में तो बिलकुल ही नहीं जहां के प्रशासन व राजनीति को  हाल के कुछ दशकों में नेताओं ने बिगाड़ कर रख दिया। क्योंकि कई बुराइयों की काई तो इतनी गहरी बैठ चुकी है कि उन्हें छुड़ाना यहां एक बड़ा दुरूह काम है। बटाईदारी की समस्या भी ऐसी एक समस्या है जिसे हाथ लगा कर लालू प्रसाद जैसे महाबली भी पीछे हट गये थे। सन् 1992 में कुछ वामपंथी दलों व बुद्धिजीवियों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को सलाह दी कि वे भूमि सुधार लागू कर दें। लालू प्रसाद ने फरवरी, 1992 में यह घोषणा कर दी कि उनकी सरकार भूहदबंदी की सीमा घटाएगी और बटाईदारी कानून में संशोधन करके बटाईदारों को उनका वाजिब हक दिलाएगी। इसके लिए कानून में संशोधन का प्रारूप तैयार करने के लिए अफसरों की टीम को यह काम सौंप दिया गया है। लालू प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से यह भी कह दिया था कि मेरी सरकार यह भी चाहती है कि कोई एक व्यक्ति नौकरी, व्यापार व खेती तीनों पर एक साथ काबिज नहीं हो। उसके पास इनमें से एक ही रोजगार रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   पर इस घोषणा का सबसे कड़ा विरोध तत्कालीन निर्दल विधायक राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने किया। बाद में चर्चित पप्पू यादव सांसद भी बने थे। तब उन्होंने जेल से जारी बयान में कहा कि राज्य सरकार छोटे किसानों की जमीन बटाईदारों व खेतिहर मजदूरों में बांटना चाहती है। मैं तो कहूंगा कि पहले अट्टालिकाओं में रहने वाले उद्योगपतियों की संपत्ति बंटे। पप्पू यादव की आवाज एक खास दबंग पिछड़ी जाति यानी यादव की आवाज मानी गई जो जाति लालू प्रसाद का मजबूत वोट बैंक माना जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  बाद में इस तरह राज्य में व्याप्त लालू के अनेक वोटरों में भारी असंतोष को देखते हुए लालू प्रसाद ने अपनी घोषणा वापस ले ली। जब उनकी समर्थक पार्टी सी।पी.आई.ने इस बारे में उनसे पूछा तो लालू प्रसाद ने कहा कि हम बंटाईदारी कानून लागू करके बर्रे के छत्ते में हाथ नहीं डालना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  वैसे भी लालू प्रसाद-राबड़ी देवी के 15 साल के कार्यकाल में भूमि संबंधों में सरकारी प्रयासों से कोई खास बदलाव नहीं आया। अब जब नीतीश सरकार ने इस पर कुछ कहा तो कई राजग समर्थकों को लालू प्रसाद ही बेहतर लगने लग रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; दरअसल व्यावहारिक राजनीति करने वाले कुछ लोग कह रहे हैं कि बंटाईदारी जैसे  विवादास्पद मामलों में हाथ डालने के बदले नीतीश सरकार को चाहिए कि वे गांवों के विकास की गति को और तेज करें। बिजली, पानी और सड़क की बेहतर व्यवस्था की अपनी कोशिश को और तेज करें। कृषि आधारित उद्योग गांवों में लगें। जब कुछ अन्य विकसित राज्यों की तरह छोटे -बड़े किसानों की माली हालत इस राज्य में भी सुधरेगी तो वे बटाईदारों की स्थिति सुधारने में सरकार का सहयोग करेंगे। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि होम करते हाथ जलाने से बेहतर है कि होम की ज्वाला को अधिक तेज नहंीं होने दिया जाए। पुराने माॅडल की जर्जर एम्बसेडर कार की गति को अचानक अधिक बढ़ा देने के अपने खतरे हैं। हालांकि नीतीश कुमार कह रहे हैं कि बंटाईदारी कानून तो बिहार में पहले से ही है। इसमें संशोधन करने का अभी हमने कोई फैसला ही नहीं किया है।दरअसल पूरे मामले में गलतफहमी फैल गई।कौआ कान ले गया, यह चर्चा इस बात को देखे बिना हो गई कि कान अपनी जगह पर है भी या नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;( 20 सितंबर, 2009)&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-3914760124683794174?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/3914760124683794174/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=3914760124683794174&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/3914760124683794174'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/3914760124683794174'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2009/09/blog-post_26.html' title='कैसे बदला तीन ही महीने में मतदाताओं का मूड !'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-8278260899102060173</id><published>2009-09-26T20:28:00.003+05:30</published><updated>2009-09-26T20:37:00.901+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कानोंकान'/><title type='text'>बटाईदारी विवाद व उप चुनाव</title><content type='html'>अपनी जमीन बटाई पर देकर खेती कराने वालों की ताजा नाराजगी के समक्ष लगता है कि नीतीश सरकार सहम सी गई है।इस नाराजगी ने तो हाल के बिहार विधान सभा उप चुनावों में राजग को बड़ा झटका दे दिया है। आगे के लिए भी खतरा मौजूद है। जानकार सूत्र बताते हैं कि किसानों की इस नाराजगी को जल्द से जल्द दूर करने के उपाय भी बिहार सरकार द्वारा खोजे जा हैं। पर इस सिलसिले में इस बात का भी ध्यान रखा जा रहा है कि एक नाराजगी को दूर करने के क्रम में दूसरी नाराजगी न पैदा हो जाए। यानी बटाईदार उधर नाराज न हो जाएं। उनकी खेती भी चलती रहे और कुल मिलाकर राज्य का कृषि उत्पादन भी बढ़े।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ऐसा कोई रास्ता नीतीश कुमार जैसे कल्पनाशील नेता के लिए खोज लेना कोई कठिन काम भी नहीं है। जल्दी ही इस संबंध में कोई ठोस सरकारी फैसला सामने आ सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;जमीन वाले नाराज क्यों ?&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;कई जमीन वाले आखिर राजग सरकार से नाराज क्यों हुए? नाराजगी का मुख्य कारण जमीन से बेदखली का खतरा रहा। यह खतरा गत जुलाई में प्रकाशित एक अपुष्ट खबर के कारण पैदा हुआ था। खबर यह थी कि बिहार सरकार बटाईदारी कानून में इस तरह संशोधन करने जा रही है जिससे जमीन वालों का उनकी उस जमीन पर हक ही नहीं रहेगा जो जमीन वे बटाईदार को जोतने के लिए देंगे। कई लोगों के मन में इस बात का खतरा अब भी है। पर धीरे -धीरे वह कम होता जा रहा है। इस आशंका को पूरी तरह निर्मूल करने के लिए बिहार की राजग सरकार अत्यंत सक्रिय हो गई है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हालांकि बिहार सरकार ने गत अगस्त में ही यह कह दिया था कि वह बटाईदारी कानून में ऐसा कोई संशोघन नहीं करने जा रही है जिससे जमीन वाले अपनी जमीन को लेकर कोई असुरक्षा महसूस करें।पर जमीन वाले अभी पूरी तरह निश्चिंत नहीं हो पाए हैं। इस नाराजगी को बातों व बयानों के बदले अब किसी ठोस प्रशासनिक कदम से ही दूर करना होगा। जानकार लोग बताते हैं कि नीतीश कुमार इसी ठोस कदम की ओर आगे बढ़ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;बटाईदारी का 12 साला बंधन&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;यह बात कम ही लोग जानते हैं कि मौजूदा बटाईदारी कानून में भी एक बारह साला प्रावधान है। वह प्रावधान भी जमीन वालों के लिए सुखद नहीं है। प्रावधान यह है कि यदि किसी बटाईदार के पास किसी जमीन वाले का कोई भूखंड लगातार बारह साल तब बटाई में रह जाए तो उस जमीन पर उस बटाईदार का कानूनी हक हो जाता है।&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पता चला है कि नीतीश सरकार इस बारह साला प्रावधान को समाप्त करने की जरूरत पर गंभीरता से विचार कर रही है। इस प्रावधान की समाप्ति से जमीन वालों में निश्चिंतता का भाव पैदा होगा। उन्हें यह लगेगा कि उनकी जमीन कहीं नहीं जाएगी। बटाई पर देने के बावजूद उस जमीन के मालिक वही रहेंगे जो पहले से मालिक हैं। फिर जमीन मालिक किसी बटाईदार को एक साल या तीन साल के आपसी निजी समझौते के आधार पर जमीन बटाई पर दे सकते हैं। इस समझौते के आधार पर राज्य सरकार उस बटाईदार को सरकारी मदद देगी ताकि वह बेहतर ढंग से खेती करके उपज को और भी बढ़ा सके। उपज बढ़ेगी तभी उस जमीन वालों को मिलने वाला लाभ भी बढ़ेगा।यह द्विपक्षीय समझौता किसी तरह के कानूनी दावे का आधार नहीं बनेगा। समझौते की अवधि पूरी होते ही जमीन वाले अगली बार किसी अन्य बटाईदार को जोतने के लिए अपनी जमीन दे सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ये कुछ उपाय डैमेज कंट्रोल उपाय माने जा रहे हैं जिन पर राज्य सरकार सोच विचार कर रही है। अंततः क्या उभर कर सामने आता है, यह आने वाला समय बताएगा। पर ध्यान इसी बात का रखा जा रहा है जमीन वाले और बटाईदार में से किसी के हक को क्षति नहीं पहंचे और साथ ही राज्य का कृषि उत्पादन भी बढ़े। जमीन बटाईदारों को जोतने के लिए देने वालों में अब सिर्फ बड़े किसान ही नहीं हैं।एक दो एकड़ जमीन वालों को भी बटाई पर अपनी जमीन दे देनी पड़ रही है। यानी बटाई पर जमीन देने और लेने वालों दोनों की संख्या काफी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;लालू प्रसाद का कदम सराहनीय&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;गत उप चुनाव में सफलता पाने के बाद लालू प्रसाद ने एक अच्छी बात कही है। उन्होंने जनता से अपील की है कि वह राजद शासन काल के दौरान उनके कार्यकर्ताओं की गलतियों को माफ कर दे। उन्होंने कार्यकर्ताओं को अपनी जुबान पर लगाम लगाने की भी नसीहत दी।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;लालू प्रसाद के कद का कोई बड़ा नेता अपने दल की गलती को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करे और उसके लिए जनता से माफी मांगे, यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। कम ही नेता इस तरह अपनी गलती मानते हैं। इससे पहले कई बार चुनाव हारने के बाद भले लालू जी ने अपनी, सरकार व अपने कार्यकर्ताओं की गलती का बयान किया था, पर इस बार उन्होंने जीतने के बाद गलती मानी है। यह और भी अच्छी बात है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पर इससे पहले तो लालू जी कई बार अपनी बात पर कायम नहीं रह सके थे। इसका कारण जो भी रहा हो। संभव है कि उसके लिए वे खुद जिम्मेदार नहीं हों।देखना है कि वे इस बार अपने कार्यकर्ताओं को संयमित करने की अपनी बात पर कायम रह पाते हैं या नहीं। कायम रहेंगे तो उनकी ही राजनीतिक सेहत के लिए अच्छा होगा।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सन् 1990 में मंडल आंदोलन की लहर पर सवार होकर लालू प्रसाद राजनीति के महाबली बने थे। वे जिन करोड़ों लोगों के मसीहा बने थे, वे गरीब व पीड़ित लोग ही थे। वे गरीब लोग अपनी उदंडता के लिए नहीं जाने जाते रहे हैं बल्कि वे पुराने सामंतों की उदंडता के शिकार के रूप में जाने जाते थे। पर लालू प्रसाद सत्ता के शिखर पर चढ़े तो उनके इर्दगिर्द पार्टी नेता व कार्यकर्ता के नाम पर अनेक ऐसे अराजक तत्व एकत्र हो गये जो उदंडता के लिए जाने जाते रहे। नया सामंतवाद पैदा हुआ जिसका नुकसान अंततः लालू जी को ही हुआ। इससे उस कमजोर वर्ग को भी नुकसान हुआ जिनको मंडल आरक्षण से कुछ फायदा हुआ था। उन्हें लालू जी ने सीना तान कर चलना सिखाया भी था।&lt;br /&gt;लोकतंत्र में तो एक दल सत्ता में आता है तो दूसरा दल सत्ता की प्रतीक्षा करता है। इससे किसी नेता या दल को कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। समाज को फर्क तब पड़ता है जब कोई नेता राजनीतिक संस्कृति बनाता है या उसे बिगाड़ देता है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह अच्छी बात है कि लालू जी की अंतरात्मा ने अपने कार्यकर्ताओं को शालीन रहने की नसीहत दी है। हालांकि यह काम बड़ा कठिन है,पर लालू जी को इसकी कोशिश तो करनी ही चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि हनुमान जी को खुद के शाकाहार होने के बारे में सपने में दिए गए अपने वचन से जिस तरह लालू जी बाद में पलट गए,उसी तरह इस मामले में भी वे पलट जाएं। लालू प्रसाद अपने काय्रकर्ताओं को काबू में रखेंगे तो उससे उनके राजनीतिक विरोधी भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा।जो कोई नेता एक कठिन काम करता है तो लोगबाग उसकी वाहवाही करते ही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;और अंत में&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;अब सवाल हवाई जहाज के ‘पशु क्लास’ और ‘मनुष्य क्लास’ का ही नहीं है। इस गरीब देश के तो कई अमीर नेता अब सेवा विमान से चलना ही अपनी तौहीन मानने लगे हैं। कई बार वे विशेष विमान से वैसी जगह भी जाते हैं जहां के लिए सेवा विमान की अनेक उड़ानें रोज ही उपलब्ध  हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;(प्रभात खबर से साभार: 21 सितंबर, 2009)&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2821604865018332683-8278260899102060173?l=surendrakishore.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://surendrakishore.blogspot.com/feeds/8278260899102060173/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2821604865018332683&amp;postID=8278260899102060173&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/8278260899102060173'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2821604865018332683/posts/default/8278260899102060173'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://surendrakishore.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='बटाईदारी विवाद व उप चुनाव'/><author><name>Surendra Kishore</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_8ZfVgFa2A3Y/SapgWxCFYfI/AAAAAAAAAEg/17z8fsO-a7c/S220/Surendra+Kishore.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2821604865018332683.post-2465218506265958083</id><published>2009-08-22T12:20:00.002+05:30</published><updated>2009-08-22T12:24:52.846+05:30</updated><title type='text'>बंटवारे के लिए मौलाना आजाद की नजर में  नेहरू जिम्मेदार</title><content type='html'>मिस्टर जिन्ना सन् 1946 के आरंभ में  अखंड भारत के लिए तैयार हो गये थे, पर उसी साल के मध्य में जवाहर लाल नेहरू ने एक ऐसा बयान दे दिया कि जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन का नारा देकर पाकिस्तान बनवा लिया। यह बात आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद ने लिखी है। अपनी आत्मकथा ‘आजादी की कहानी’ में आजाद ने लिखा कि ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मिशन, कांग्रेस महासमिति और मुस्लिम लीग परिषद के बीच इस बात पर आपसी सहमति बन चुकी थी कि अखंड आजाद भारत की केंद्रीय सरकार के अधीन तीन विषय होंगे-रक्षा, विदेश और संचार। राज्यों को तीन श्रेणियों में बांट दिया जाएगा। उन्हें स्वायतता रहेगी। ‘बी’ श्रेणी के राज्यों में पंजाब, सिंध, उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत व ब्रिटिश बलोचिस्तान शामिल किए जाएंगे। ‘सी’ श्रेणी के राज्यों में बंगाल और असम शामिल थे। बाकी राज्य ‘ए’ श्रेणी में रखे गये थे। कैबिनेट मिशन का ख्याल था कि इस भावी व्यवस्था से मुसलमान अल्पसंख्यक वर्ग को पूरी तरह से इतमिनान हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद रहे कि आजादी के लिए हिंदुस्तान के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श की खातिर  ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन भारत भेजा था। मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मिशन ने मेरी यह बात भी मान ली थी कि अधिकतर विषय प्रांतीय धरातल पर संभाले जाएंगे। इसलिए बहुमत वाले राज्यों में मुसलमानों को प्रायः पूरी स्वायत्तता प्राप्त होगी। बी और सी श्रेणियों के राज्यों में मुसलमानों का बहुमत था। इस तरह वे अपनी सारी औचित्यपूर्ण आशाओं को सफल बना सकते थे।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ‘शुरू- शुरू में मि. जिन्ना ने इस योजना का घोर विरोध किया। मुस्लिम लीग स्वतंत्र देश की अपनी मांग को लेकर इतना आगे बढ़ चुकी थी कि उसके लिए कदम वापस लौटाना मुश्किल था। पर कैबिनेट मिशन ने बहुत ही साफ -साफ और असंदिग्ध शब्दों में कह दिया कि वह देश के बंटवारे का सुझाव कभी नहीं दे सकता। मिशन के सदस्य लाॅर्ड पेथिक लारेंस और सर स्टैफर्ड क्रिप्स ने बार- बार कहा कि हमारी समझ में नहीं आता कि मुस्लिम लीग जिस पाकिस्तान सरीखे राज्य की कल्पना कर रही है, वह कैसे जियेगा, कैसे बढ़ेगा और कैसे स्थायी होगा? उनका ख्याल था कि मैंने जो सूत्र दिया है, वही समस्या का हल है। मंत्रिमंडलीय मिशन का ख्याल था कि इसमें कोई हर्ज नहीं है ।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मुस्लिम लीग परिषद की तीन दिन तक बैठक हुई। तब कहीं जाकर वह किसी फैसले पर पहुंच सकी। आखिरी दिन जिन्ना को यह तसलीम करना पड़ा कि मिशन की योजना में जो हल प्रस्तुत किया गया है, अल्पसंख्यकों की समस्या का उससे अधिक न्यायपूर्ण हल और कोई नहीं हो सकता। और उन्हें इससे अच्छी शर्तें मिल ही नहीं सकतीं। उन्होंने परिषद को बताया कि मंत्रिमंडल मिशन ने जो योजना प्रस्तुत की है, उससे और कुछ भी ज्यादा मैं नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लीग को योजना मान लेने की सलाह दी और लीग परिषद ने सर्वसम्मति से उसके पक्ष में वोट दिया।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    इस संबंध में कांग्रेस के फैसले के बारे में मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘कांग्रेस कार्य समिति में जो विचार विमर्श हुआ, उसमें मैंने कहा कि कैबिनेट मिशन की योजना मूलतः वही है जो कांग्रेस पहले स्वीकार कर चुकी है। ऐसी हालत में योजना में जो प्रमुख राजनीतिक हल प्रस्तुत किया गया था, उसे मान लेने में कार्यसमिति को कोई मुश्किल नहीं हुई। 26 जून, 1946 के अपने प्रस्ताव में कांग्रेस कार्य समिति ने भविष्य के संबंध में कैबिनेट मिशन की योजना स्वीकार कर ली-यद्यपि उसने अंतरिम सरकार का सुझाव मानने में अपनी असमर्थता प्रकट की। कैबिनेट मिशन योजना का कांग्रेस व मुस्लिम लीग दोनों के द्वारा स्वीकार कर लिया जाना हिंदुस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की एक गौरवमय घटना थी। यह भी लगा मानो हम आखिरकार सांप्रदायिक कठिनाइयों को भी पीछे छोड़ आए हैं। मि. जिन्ना बहुत खुश न थे, लेकिन और कोई रास्ता न था, इसलिए योजना मानने के लिए उन्होंने खुद को तैयार कर लिया था।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; पर इस पूरी योजना को पलीता लगाने वाली घटना की चर्चा करते हुए मौलाना अबुल कलाम आजाद ने लिखा कि ‘तभी एक ऐसी दुःखद घटना घटी जिसने इतिहास का क्रम ही बदल दिया। दस जुलाई को कांग्रेस अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू ने बम्बई में एक संवाददाता सम्मेलन बुलाया। वहां उन्होंने एक बयान दिया जिस पर शायद सामान्य परिस्थितियों में कोई ध्यान भी न देता। पर उस बयान ने शंका और घृणा के तत्कालीन वातावरण में बड़े ही दुर्भाग्यपूर्ण परिणामों के एक क्रम को जन्म दिया।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    ‘कुछ पत्र प्रतिनिधियों ने उनसे सवाल किया, ‘क्या कांग्रेस कार्य समिति के प्रस्ताव पास कर देने का मतलब यह है कि कांग्रेस ने योजना को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया है जिसमें अंतरिम सरकार के गठन का सवाल भी निहित है ?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; जवाब में जवाहर लाल ने कहा कि कांग्रेस करारों की बेड़ियों से बिलकुल मुक्त रह कर और जब जैसी स्थिति पैदा होगी, उसका मुकाबला करने के लिए स्वतंत्र रहते हुए, संविधान सभा में जाएगी।’ पत्र प्रतिनिधियों ने फिर पूछा कि क्या इसका मतलब यह है कि कैबिनेट मिशन योजना में संशोधन किए जा सकते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  जवाहर लाल बड़ा जोर देकर जवाब दिया कि कांग्रेस ने सिर्फ संविधान सभा में भाग लेना स्वीकार किया है और वह मिशन योजना में जैसा उचित समझे, वैसा संशोधन-परिवर्तन करने के लिए अपने आपको स्वतंत्र समझती है।मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मैं यह कह दूं कि जवाहर लाल का बयान गलत था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहना सही न था कि कांग्रेस योजना में जो चाहे संशोधन करने के लिए स्वतंत्र है। असल में यह तो हम मान चुके थे कि केंद्रीय सरकार संघीय होगी ।’ (आजादी की कहानी:मौलाना अबुल कलाम आजाद की आत्म कथा-पृष्ठ-173)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  आजाद के शब्दों में ‘जवाहर लाल नेहरू के इस बयान से मि. जिन्ना भौंचक रह गये। उन्होंने तुरंत एक बयान जारी किया कि कांग्रेस अध्यक्ष के इस वक्तव्य से सारी स्थिति पर फिर से विचार करना जरूरी हो गया है। जिन्ना ने लियाकत अली खान से लीग परिषद की बैठक बुलाने के लिए कहा और अपने बयान में कहा कि मुस्लिम लीग परिषद ने दिल्ली में कैबिनेट मिशन की योजना इसलिए स्वीकार कर ली थी कि यह आश्वासन दिया गया था कि कांग्रेस ने भी उसे स्वीकार कर लिया है और य
