Friday, March 12, 2010

बिहार को मिला एक नया चुनावी मुद्दा

बिहार में विधान सभा का चुनाव इसी साल होना है। महिला आरक्षण एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन जाए तो यह कोई अजूबी बात नहीं होगी।

महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप के सबसे बड़े विरोधी नेताआंें में से एक नेता लालू प्रसाद इसी प्रदेश से हैं। विधान सभा चुनाव में मतदाता अन्य बातों के साथ -साथ इस बात पर भी अपना मत देंगे कि महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप का किस दल ने विरोध और किसने समर्थन किया।

लालू प्रसाद तथा अन्य विरोधियांे को तो यह लगता है कि चूंकि इस देश में पिछड़ों की आबादी अन्य समुदायों की अपेक्षा काफी अधिक है, इसलिए उन्हें इस आरक्षण के विरोध का चुनावी लाभ जरूर मिलेगा। पर क्या ऐसा हो पाएगा? इसका जवाब तो बिहार का अगला चुनाव नतीजा ही देगा।

हालांकि लालू-मुलायम से अलग राय रखने वाले लोग बताते हैं कि इस विरोध का नुकसान ही लालू प्रसाद को बिहार में होगा क्योंकि उनका विरोध पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं के हितों को ध्यान में रख कर कम बल्कि अपने कुछ खास चुनाव क्षेत्रों को महिलाओं से बचाने की समस्या को ध्यान में रख कर अधिक है।

लालू प्रसाद ने कहा है कि दुनिया के किसी देश में महिलाओं के लिए संसद में आरक्षण नहीं हैं। फिर यहीं क्यों ? उन्होंने यह भी कहा है कि यह पुरुष प्रधान समाज है। इसमें पति जहां वोट देने को कहता है, पत्नी वहीं वोट देती है। इसलिए इस विधेयक के पास हो जाने से कांग्रेस या भाजपा को महिलाओं के वोट नहीं बढ़ जाएंगे।

लालू प्रसाद ने यह कह कर समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति का वर्णन खुद ही कर दिया है। इससे भी शीघ्र महिला आरक्षण की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसे पुरुष प्रधान समाज में यदि आरक्षण देकर महिलाओं का सशक्तीकरण कर दिया जाए तो वे किसी को वोट देने के बारे में खुद निर्णय लेने की स्थिति में हो जाएंगी। लोकतंत्र के लिए यह जरूरी भी है। लोकतंत्र के लिए यह कोई अच्छी बात तो है नहीं कि एक बड़ी आबादी अपने पतियों के कहने पर ही मतदान किया करे !

महिला आरक्षण के मामले को गत 14 साल से लटका कर रखना कहां का लोकतंत्र है जबकि इस विधेयक के पक्षधर दलों व सांसदों की संख्या हमेशा ही विरोधियों की अपेक्षा अधिक रही है ? अब जब मौजूदा लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक के घोषित विरोधियों की संख्या और भी कम हो गई है तो लालू प्रसाद कहते हैं कि इस विधेयक के खिलाफ ‘युद्ध’ होगा। ऐसे ही युद्ध की घोषणा जब अल्पमत सवर्ण लोग सन 1990 में मंडल आरक्षण के खिलाफ कर रहे थे तो खुद लालू प्रसाद की उस पर कैसी प्रतिक्रिया थी ? यह भी याद रखने की जरूरत है कि वी.पी. सिंह की सरकार को जितने सांसद समर्थन कर रहे थे, उन सांसदों का बहुमत मंडल आरक्षण के खिलाफ ही था। फिर भी जरूरत समझ कर वी.पी. सिंह सरकार ने वह काम कर दिया था।

दरअसल लोकतंत्र का तकाजा यह है कि लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव यह कहते कि अभी तो मौजूदा स्वरूप में भले कांग्रेस इस विधेयक को पारित करा ले ,पर जब हमारे मत के लोग बहुमत में आएंगे तो हम आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान कर देंगे।

पर सवाल है कि पिछड़ा बहुल इस देश में लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं के दल संसद में बहुमत क्यों नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं ताकि वे आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान करा पाएं ? दरअसल वे इसलिए बहुमत नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि पिछड़े और अल्पसंख्यकों को भी उनकी कथनी और करनी पर अब कम ही भरोसा हो रहा है। पिछड़े वर्ग के एक नेता जी ने गत लोकसभा चुनाव में अपने दल के एक निवर्तमान अल्पसंख्यक सांसद का टिकट काट कर उनकी जगह अपने एक करीबी रिश्तेदार को टिकट देकर वहां से लोकसभा में पहुंचा दिया। वे नेताजी आज गला फाड़ कर यह ़कह रहे हंै कि मौजूदा महिला आरक्षण विधेयक अल्पसंख्यक विरोधी है।

बिहार विधानसभा के अगले चुनाव में महिला आरक्षण मुद्दा इस रूप में भी चर्चित हो सकता है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण के बहाने इस आरक्षण को अनंतकाल तक टाले रखना उचित है या फिर विधायिकाओं में महिलाओं को बड़ी संख्या में भेज कर उनका जल्द सशक्तीकरण जरूरी है ? यह मानी हुई बात है कि गाड़ी के दोनों पहिए यानी स्त्री-पुरुष समान रूप से मजबूत होंगे तो ही गाड़ी ठीक से चलेगी।

बिहार में पंचायतों व नगर निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान नीतीश सरकार ने किया। इन निकायों के चुनावों का अनुभव यह रहा कि ऐसी कुछ सामान्य सीटों से भी पिछड़ी जातियों की महिलाएं विजयी हुई जो सीटें सामान्य महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। संभवत इसी अनुभव के आधार पर नीतीश कुमार ने यह समझा है कि संसद में पेश महिला आरक्षण विधेयक के लागू हो जाने के बाद भी पिछड़े वर्ग की महिलाओं को कोई नुकसान नहीं होगा। यह जाहिर बात है कि जिस चुनाव क्षेत्र में जिस जाति की बहुलता होती है,उस क्षेत्र में उस जाति के उम्मीदवार की ही जीत की अधिक गुंजाइश रहती ही है चाहे उम्मीदवार महिला हो या पुरुष।

आजादी की लड़ाई के समय भी कुछ नेताओं ने ऐसे सवाल उठाए थे। कुछ दलित, अल्पसंख्यक व कमजोर वर्ग के नेतागण तब यह चाहते थे कि आजादी से पहले ही यह तय हो जाए कि आजाद भारत में उन समुदायों की स्थिति क्या होगी। उनकी बात सुनी जाती तो आज तक अंग्रेज यहीं रहते।

साभार: दैनिक जागरण पटना संस्करण (09 मार्च, 2010)