Friday, March 31, 2017

जहां कोर्ट-सेना निष्पक्ष, वहां हिंदू राष्ट्र का कोई खतरा नहीं

जिन लोगों ने राजनीतिक स्वार्थ और वैचारिक-रणनीतिक जकड़न के कारण भाजपा को सत्ता में आने से रोकने की वास्तविक कोशिश नहीं की, वही लोग आज यह शोर मचा रहे हैं कि संघ परिवार देश में हिंदू राष्ट्र-राज्य कायम करना चाहता है। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह शोर तेज हो गया है। कुछ लोगों को आपातकाल की पुनरावृत्ति की भी आशंका हैं।

शायद उनके इस शोर में भी कोई स्वार्थ छिपा हुआ है। क्योंकि अब भी वे ऐसा कोई ठोस काम नहीं कर रहे हैं जिनसे भाजपा कमजोर हो। सिर्फ वोट बैंक और घिसे-पिटे नारों से ही काम चला लेना चाहते हैं।

धर्म निरपेक्ष देश को हिंदू राष्ट्र-राज्य में परिणत करने में आने वाली बाधाओं पर पहले चर्चा कर ली जाए।
भारतीय संविधान के मूल ढांचे को बदले बिना यहां किसी तरह का धार्मिक शासन कायम नहीं किया जा सकता।
क्या यह संभव है ?

24 अप्रैल 1973 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सिकरी की अध्यक्षता में 13 सदस्यीय संविधान पीठ ने ऐतिहासिक जजमेंट दिया था। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मुकदमे में पीठ ने कहा था कि ‘भारतीय संविधान के अंतर्गत संसद ‘सुप्रीम’ नहीं है। संसद संविधान के बुनियादी ढांचे और विशेषताओं को बदल नहीं सकती।’

जो नरेंद्र मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट की इच्छा के बगैर न्यायाधीशों की बहाली तक नहीं कर पाती, वह हिंदू राष्ट्र कैसे स्थापित करेगी ? उसकी ऐसी किसी मंशा के संकेत भी नहीं हैं।

क्या ऐसे किसी दुःसाहसी कदम में सरकार को सेना का साथ मिलेगा? सेना धर्म निरपेक्ष और अराजनीतिक है।
दरअसल ऐसे शोर मचाने वाले कुछ लोग तो अपने वैचारिक खोखलेपन और रणनीतिक जकड़ता को बरकरार रखना चाहते हैं ताकि  उनके विचार समय पार साबित न होने पाए।

इस श्रेणी के राजनीतिक कर्मी हिंदू राष्ट्र राज्य का शोर मचाकर वोट बैंक को मजबूत भी रखना चाहते हैं।
हालांकि वे भूल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कुछ मुस्लिम महिलाओं ने भी भाजपा को वोट दिए क्योंकि भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वह तीन तलाक के खिलाफ है। उधर शाहबानो केस में कांग्रेस सरकार ने क्या किया था?
   


ऐसे किया जा सकता है भाजपा को कमजोर


जिन कारणों से भाजपा केंद्र और उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई है, उन कारणों को दूर किया जाए तो भाजपा कमजोर हो ही सकती है। पर क्या गैर भाजपा दल इस बात के लिए तैयार हैं ? क्या उन्हें अपनी हार का असली कारण कभी समझ में आएगा भी ? पता नहीं।

गैर राजग दलों को 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद ही चेत जाना चाहिए था। कांग्रेस के पास तो ए.के. एंटोनी की एक हद तक  वस्तुपरक रिपोर्ट भी थी जिसमें हार का कारण बताया गया था।

पर, लगता है कि उन लोगों ने उत्तर प्रदेश के ताजा चुनाव नतीजे से भी सबक नहीं लिया।

शायद सबक लेना ही नहीं चाहते। यदि उनका रुख-रवैया ऐसा ही रहेगा तो उन्हें आने वाले दिनों में और भी चुनावी पराजयों का सामना करना पड़ सकता है। स्थानीय कारणों से पंजाब जैसी छिटपुट जीत से इठलाते रहेंगे तो और मात खाते रहेंगे।

भाजपा की जीत के निष्पक्ष राजनीतिक पंडित तीन मुख्य कारण बताते हैं।

पहला कारण अधिकतर भाजपा विरोधी दल और उनकी सरकारें भीषण भ्रष्टाचार में डूबी रही हैं। अपवादों की बात और है। जबकि इस गरीब देश के लोग भष्टाचार से काफी पीड़ित हैं। भ्रष्टाचार से विकास-कल्याण कार्यों की गति धीमी होती है। बढ़ती आबादी के बीच लोगों को सुखी-संपन्न बनाने की बात कौन कहे, खिलाने-पिलाने के लिए भी सरकार के पास कोई ठोस नीतियां नहीं हैं। उधर अधिकतर नेताओं की अमीरी बढ़ती जा रही है। असंतोष बढ़ रहा है।

दूसरा कारण वंशवाद है और तीसरा कारण अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण है।

कई जगह अयोग्य वंशज वैसे ही शासन-दल चला रहे हैं जैसे लर्नर लाइसेंस लेकर कोई एक्सप्रेसवे पर गाड़ी चलाए।

यदि गैर राजग शासित राज्यों में गरीब अल्पसंख्यकों के आर्थिक-शैक्षणिक बेहतरी के लिए ठोस काम हुए होते तो उससे कुल मिलाकर देश का ही भला होता।

पर, दरअसल वोटलोलुप दलों ने उनके बीच के वैसे तत्वों के तुष्टिकरण में ही अपनी शक्ति लगा रखी है जो राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय जेहादी तत्वों के प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थक रहे हैं।

इसके अनेक उदाहरण समय-समय पर मिलते रहते हैं।

ऐसे दलों को जेहादी तत्वों की इस देश में सक्रियता कोई समस्या नहीं लगती। बल्कि कुछ नेतागण आतंकी हमलों के समय ऐसे-ऐसे बयान देते हैं जिनसे कई लोगों को यह लगता है कि वे भूमिगत आतंकियों के सतह पर सक्रिय चेहरे हैं। गैर भाजपा दलों के ऐसे ही कारनामों का फायदा भाजपा उठा लेती है। उसे नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह के वोट मिलते हैं।

यदि अब से भी गैर भाजपा दल, जिन्हें ढोंगी धर्म निरपेक्ष दल भी कहा जाता है, अपनी उपर्युक्त गलतियों को सुधार लें तो भाजपा कमजोर होती चली जाएगी।

क्या उनमें खुद को सुधारने की ताकत बची भी है ?

दरअसल इस देश की आम जनता सब बात समझती है। सभी दलों की अच्छाइयों और कमजोरियों को भी। आम जनता आम तौर पर धर्म निरपेक्ष स्वभाव की है। अपवादों की बात और है।

वह हिन्दुत्व की सत्ता कायम करने के लिए भाजपा को वोट नहीं देती। इस सवाल पर भाजपा उन्हें गुमराह भी नहीं कर सकती। यह और बात है कि भाजपा और संघ परिवार में कुछ तत्व ऐसे जरूर हैं जो इस देश में हिन्दुत्व का एजेंडा लागू करना चाहते हैं। पर वैसे तत्व निर्णायक नहीं हैं।

कभी होंगे भी नहीं। अधिकतर जनता की यह समझ बनती जा रही है कि भाजपा ही जेहादी तत्वों से इस देश को बचा सकती है। यह भी कि भाजपा अपेक्षाकृत कम भ्रष्ट है। वंशवाद भाजपा में भी है। पर उसमें यह गुंजाइश नहीं है कि कोई नेता पुत्र सिर्फ इसीलिए प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ं बन जाए क्योंकि वह किसी खास नेता का पुत्र है। यानी जब बाजार में बेहतर माल उपलब्ध हों तो लोग बदतर क्यों खरीदेंगे?



आजम खान को दर किनार करना जरूरी

खबर है कि आजम खान सपा से दु‘खी हैं। स्वाभाविक ही है। यदि उनकी इच्छा रही हो कि वे विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता बनें तो इसमें कोई अस्वाभाविक बात भी नहीं है। वरीय हैं। समझदार हैं। पर वाचाल भी तो हैं।
बताया जाता है कि सपा की हार का एक कारण उनका बड़बोलापन भी रहा है। कल्पना कीजिए कि आजम खान विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता होते।
सदन में अक्सर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और आजम खान में नोंक-झोंक होती। कोई भी अंदाज लगा सकता है कि बहस में गर्मी बढ़ने पर दोनों कैसे-कैसे शब्दों का इस्तेमाल करते ! उससे समाज में तनाव बढ़ता। बढ़ने पर नुकसान किसे होता? सपा को होता।
शायद सपा के शीर्ष नेता इस बात को पहले ही समझ गए होंगे। इसीलिए आजम खान को प्रतिपक्ष का नेता नहीं बनाया। हालांकि संभव है कि न बनाने का कोई और भी कारण रहा हो।

और अंत में


राजनीतिक कर्मियों और विश्लेषकों के लिए एक अच्छी बात है। वह यह कि हमारे बीच डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेता उपलब्ध हैं। वह अपनी पार्टी की ‘असली लाइन’ से समय-समय पर लोगों को अवगत कराते रहते हैं। इससे अन्य दलों के नेताओं को अपनी राजनीतिक लाइन तय करने में सुविधा होती है।
देखना है कि रघुवंश बाबू के ताजा बयान के बाद जदयू कब अपनी राजनीतिक लाइन तय करता है! याद रहे कि राजद नेता का ताजा बयान यह है कि दो सांसदों वाले नेता को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भला कैसे बनाया जा सकता है !


(प्रभात खबर : बिहार के 31 मार्च 2017 के अंक में प्रकाशित)




Monday, March 13, 2017

नेक इरादों की प्रचंड जीत

इस देश में जब -जब किसी दल या नेता ने यह दिखाया कि  वह भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक जंग कर रहा है तो उसे मतदाताआंे ने जात-पांत से ऊपर उठकर वोट दिये। याद रहे कि भ्रष्टाचार कम होने के साथ गरीबी भी घटेगी।

कभी भ्रष्टाचार के साथ तानाशाही का तत्व जुड़ा तो कभी अपराध का। हां, यदि कभी पिछड़ा-दलित आरक्षण पर खतरा आया तो इन वर्गों के लोगों ने अन्य तत्वों को नजरअंदाज किया।

इस बार भाजपा ने यह भी प्रदर्शित किया कि वह देश की एकता-अखंडता को बचाने के लिए भी अन्य दलों की अपेक्षा अधिक समर्पित है। फिर क्या था! वही रिजल्ट होना था जो इस बार उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में  हुआ।

पंजाब में भी जनादेश मुख्यतः भ्रष्टाचार के ही खिलाफ था। अकाली सरकार के भ्रष्टाचार से लोग पीडि़त थे। भाजपा या नरेंद्र मोदी वहां निर्णायक स्थिति में नहीं थे। ‘आप’ को लोगों ने अधिक गंभीरता से नहीं लिया। अरविंद केजरीवाल एक ईमानदार और कर्मठ नेता जरूर हैं, पर उन्हें एक जिम्मेदार और प्रौढ़ नेता के रूप में उभरना अभी बाकी है।

देश में नोटबंदी का विरोध और राष्ट्र विरोधी तत्वों का यदाकदा प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन कुछ खास दलों व नेताओं को महंगा पड़ा।
उत्तर प्रदेश में जातिवाद, अपराध, परिवारवाद  और एकतरफा- -असंतुलित धर्म निरपेक्षता सपा के लिए घातक साबित हुए।
 याद रहे कि जिस नोटबंदी को कुछ राजनीतिक दल देश के लिए घातक मान रहे थे, उसे अधिकतर मतदाताओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के अभियान का एक हिस्सा माना।

 इससे यह भी साबित हुआ कि कुछ दल आम जनता से कितना कट चुके हैं। या फिर स्वार्थ में डूबे हुए हैं।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लोगों ने इसलिए भी विश्वास किया क्योंकि करीब तीन साल के प्रधानमंत्रित्व काल में उनके खिलाफ प्रतिपक्ष को  भ्रष्टाचरण का कोई सबूत नहीं मिला। साथ ही लोगों में यह भी धारणा बनी कि उन्हांेने केंद्रीय मंत्रिमंडल को घोटालों से मुक्त रखा।

वह अफसरों के स्तर से भ्रष्टाचार की समाप्ति की कोशिश में भी लगे हुए हैं। ऐसी अच्छी मंशा वाले प्रधानमंत्री यदि उत्तर प्रदेश जाकर कोई आश्वासन देता है तो लोग उस पर विश्वास करेंगे ही।

 ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।

1977 में इस देश के मतदाताओं ने जेपी यानी जय प्रकाश नारायण पर विश्वास करके जनता पार्टी को केंद्र में सत्ता में लाया था। याद रहे कि जेपी भ्रष्टाचार व तानाशाही के खिलाफ आंदोलन के प्रतीक बने थे।

लोगों को यह लगा था कि वह देश के लिए कष्ट सह रहे हैं। उन्हें खुद गद्दी पर नहीं बैठना है। यह और बात है कि जनता पार्टी की सरकार ने जेपी और आम लोगों की उम्मीदों को पूरा नहीं किया।

‘गरीबी हटाओ’ का नारा देकर 1971 में लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत पाई इंदिरा गांधी भी बाद में गरीबों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरी थीं।

पर उससे पहले उन्होंने 1969 में जब गरीबी हटाओ का नारा देकर 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था तो गरीबों को लगा था कि यह काम वह गरीबों के भले के लिए ही कर रही हैं। इंदिरा सरकार ने तब राजाओं के प्रिवी पर्स और  विशेषाधिकार समाप्त किये थे।

तत्कालीन सरकार ने यह दिखाया कि ये काम अमीरों से छीनकर गरीबों में बांटने की कोशिश में क्रम में हो रहे हंै।
ताजा नोटबंदी पर भी गरीबों ने यह समझा कि धनपतियों से कालाधन छीना जा रहा है। पर कुछ राजनीतिक दल जनता की इस समझ को समझ नहीं सके।

1987-89 के बोफर्स तोप घोटाले ने राजीव गांधी की सरकार को अपदस्थ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इससे साबित हुआ था कि आम लोग सरकारी भ्रष्टाचार को कितना बुरा मानते हैं।

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी गत के पीछे मनमोहन सरकार के महाघोटालों का सबसे बड़ा हाथ था। कांग्रेस की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति ने आग में घी का काम किया था।

सन 1952 के चुनाव में अधिकतर लोगों ने उसी पार्टी को वोट दिये जिसने आजादी दिलाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। यानी कांग्रेस। सन 1962 तक यही होता रहा। पुराने पुण्य प्रताप से कांग्रेस जीतती रही। पर जब कांग्रेसी सरकारें सत्ता के एकाधिकार के मद में अनर्थ करने लगीं और सरकारी भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ने लगा तो 1967 के चुनाव के बाद नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गईं।

1974 में इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ जेपी आंदोलन  एकाधिकारवाद, जातिवाद, परिवारवाद और भ्रष्टाचारवाद के खिलाफ था। आंदोलन को दबाने के लिए आपातकाल लगाया गया। अधिकतर लोगों ने जातपात से ऊपर उठकर 1977 में कांग्रेस को हरा दिया।

अधिकतर मतदाताओं ने जातपांत से ऊपर उठकर 1984 के लोकसभा चुनाव में भी ‘मिस्टर क्लीन’ यानी राजीव गांधी के दल को जिताया। हालांकि उस चुनाव पर इंदिरा गांधी की हत्या के कारण कांग्रेस खासकर राजीव के प्रति उपजी सहानुभति का तत्व भी हावी था।

उससे पहले कांग्रेस महासचिव के रूप में राजीव गांधी ने देश के तीन वैसे कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को पद से हटवाया था जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। उससे लगा था कि राजीव भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। यह और बात है कि राजीव से भी लोगों की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं।
क्या गैर भाजपा दल उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे से कोई सबक लेंगे ?

या फिर अन्य स्थानीय कारणों से दूसरी छोटी-मोटी चुनावी जीत में ही मगन रह कर अपनी पुरानी राह पर चलते रहेंगे ?
जानकार सूत्रों के अनुसार अभी मोदी सरकार आम लोगों के भले के लिए कुछ अन्य ऐसे काम भी करने वाली है जिनसे प्रतिपक्ष के और भी पस्त होने की संभावना है।

  उत्तर प्रदेश के चुनाव  के बाद केंद्र सरकार बेनामी संपत्ति के खिलाफ बड़ा अभियान चलाने का मन बना रही है। संशोधित बेनामी कानून गत साल पास भी हो चुका है। महिला आरक्षण विधेयक पास हो सकता है। इस तरह के चैंकाने वाले कुछ अन्य काम भी हो सकते हैं।

यह आम राय है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत दरअसल मोदी की ईमानदार मंशा की जीत है। ऐसी जीत के बाद भाजपा और राजग के भीतर के मोदी विरोधी तत्वों के भी होश  ठिकाने आ सकते हैं। इससे केंद्र सरकार के उन प्रशासनिक अधिकारियों के भी सही राह पर आने की संभावना है जो  मोदी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में दिल से साथ नहीं दे रहे हैं।

  नरेंद्र मोदी सरकार ने यदि महिला आरक्षण विधेयक पास करा दिया और बेनामी संपत्ति वालों के खिलाफ कारगर कार्रवाई शुरू करा दी तो 2019 का लोकसभा चुनाव नतीजा भी तय हो जाएगा। उससे पहले देश में दलीय समीकरण बदल सकते हैं।

उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे उन कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए संभवतः अंतिम चेतावनी है जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजों से कुछ नहीं सीखा। दरअसल वे दल
जातिवाद, भीषण भ्रष्टाचार, वंशवाद और वोट बैंक के तुष्टिकरण के काम में मगन रहे हैं। उन्हें यह सबक ले लेना चाहिए कि अधिकतर लोग अब स्वच्छ प्रशासन चाहते हैं और ऐसा कोई काम पसंद नहीें कर रहे हैं जो देश की एकता अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाला हो।

गैर भाजपा दलों के जो नेता यह कह रहे हैं कि भाजपा ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके चुनाव जीता है, उन्हें अब भी  भीषण भ्रष्टाचार, जातिवाद और वंशवाद की बुराइयों से तोबा करने की कोई जरूरत महसूस नहीं हो रही है। ऐसी सोच उनके भविष्य के लिए खतरनाक है।

यदि चुनाव पर ध्रुवीकरण के सीमित असर को मान भी लिया जाए तो उन नेताओं को आत्ममंथन करना चाहिए कि इस काम में उनका खुद का कितना योगदान रहा है!

(इस लेख का संपादित अंश दैनिक जागरण के 13 मार्च 2017 के अंक में प्रकाशित)