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रविवार, 1 फ़रवरी 2009

भूमि अर्जन की प्रेत बाधा

बिहार सरकार इन दिनों सरकारी उद्देश्यों के लिए किसाानों से काफी भूमि अर्जन कर रही है। राज्य सरकार के विकास अभियान को सफल बनाने के लिए अभी और अधिक जमीन चाहिए। पर, भूमि अर्जन की राह में कई बाधाएं सामने आती रहती हैं। भूमि के मुआवजे के मामले में नीतीश सरकार ने उदारता बरती है। पर ऐसी ही उदारता राज्य सरकार के संबंधित अफसर और कर्मचारी नहीं बरत रहे हैं।इससे किसानों का मन छोटा हो रहा है। साथ ही इसको लेकर किसानों में कहीं -कहीं राज्य सरकार के प्रति गुस्सा भी है। हाल में एक किसान ने बताया कि राज्य सरकार ने हमारी बहुमूल्य जमीन का अधिग्रहण कर लिया।ठीक है,उससे हमें कोई एतराज नहीं है। पर मुआवजे का भुगतान करने के काम में लगे सरकारी कर्मी ने मुआवजे की राशि के भुगतान के लिए 80 हजार रुपए की रिश्वत की मंाग कर दी है। अब भला हम इतने पैसे कहां से लाएं।खेत बेचकर ला सकते थे।पर बेचने के लिए अब हमारे पास खेत है कहां ? भू अर्जन के बाद मुआबजा बांटने वाले अफसर मुआवजे की राशि का दो प्रतिशत रिश्वत मांगते हैं। अब भला किसान क्या करे ?



विकास यात्रा बनाम पद यात्रा

नीतीश कुमार गांवों की विकास यात्राएं कर रहे हैं। इसके जवाब में लालू प्रसाद जन संपर्क के लिए पद यात्रा करने जा रहे हैं। क्या सिर्फ विकास यात्रा और जन संपर्क पद यात्रा से वोट मिलते हैं ? ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार को सिर्फ विकास यात्रा से वोट मिल जाएंगे और लालू प्रसाद को पद यात्रा से। दरअसल अब तो संकेत यह है कि काम पर वोट मिलेंगे।मतदाताओं ने पिछले वर्षों में बहुत कुछ सीखा है। बिहार के पिछले कुछ चुनाव नतीजों को देखने से यह लगता है कि अब भावनाओं पर वोट पाने का समय बीत चुका है।अब लोगों को विकास चाहिए। विकास होने भी लगे हैं। शुरूआत नीतीश कुमार की सरकार ने सन् 2005 में ही कर दी । अब लालू प्रसाद भी रेलवे के जरिए बिहार में विकास करवा रहे हैं।नीतीश कुमार ने सिर्फ विकास यात्राएं शुरू की होतीं और कोई विकास नहीं किया होता तो उन्हें इस यात्रा का कोई लाभ नहीं मिलता। पर विकास कार्य तो बिहार सरकार राज्य भर में करवा रही है। उन विकास कार्यों का लेखा- जोखा लेने नीतीश कुमार गांवों में जा रहे हैं।उन विकास कार्यों में कुछ प्रेत बाधाएं जरूर लगी हुई हैं। उन प्रेत बाधाओं में सबसे बड़ी बाधा सरकारी भ्रष्टाचार है।यह बात गांवों में आम लोगों ने मुख्य मंत्री को बताई है।उन बाधाओं को दूर करने के उपाय करने का मुख्य मंत्री आश्वासन दे रहे हैं।वे यह नहीं कह रहे हैं कि यह सब प्रतिपक्षी दलों का दुष्प्रचार है।दूसरी ओर लालू प्रसाद ने बिहार में रेलवे की कई योजनाएं शुरू कराई हैं। इसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं। हालांकि जब उनका बिहार में राजपाट था, तब तो वे कहा करते थे कि विकास का राजनीति से कोई आपस में रिश्ता ही नहीं है। देर आए, दुरूस्त आए। अच्छा होगा, वे पद यात्राएं उन्हीं इलाकों में करें जहां उन्होंने रेलवे योजनाओं का शिलान्यास किया है। उन निर्माण योजनाओं पर यदि वे काम तेज करा सकें तो बिहार की जनता उनका शुक्रगुजार रहेगी। साथ ही, आम जनता को भी तुलना करने में सुविधा होगी कि नीतीश सरकार का विकास कार्य अधिक प्रभावकारी और प्रामाणिक है या फिर लालू जी का। फिर तो वोट का फैसला हो ही जाएगा।ऐसा नहीं है कि विकास पर वोट नहीं मिलते।



पद्म पुरस्कार व दशरथ मांझी

जो पुरस्कार दशरथ मांझी को नहीं मिल सकता,उस पुरस्कार को इस गरीब देश में बने रहने का क्या औचित्य है ? अच्छा किया था कि मोरारजी देसाई की सरकार ने 1977 में उन पद्म पुरस्कारों की व्यवस्था ही समाप्त कर दी थी। पर, उसे फिर 1980 में शुरू कर दिया गया। बिहार सरकार ने दशरथ मांझी को पद्म पुरस्कार देने की तीन बार भारत सरकार से सिफरिश की। पर, ऐसे-वैसे और न जाने कैसे -कैसे लोगों को भी हर साल पद्म पुरस्कार मिलते रहते हैं,पर दशरथ मांझी को इस बार भी नहीं मिला।मिल जाता तो परलोक में उनकी आत्मा को शांति मिलती। कर्मयोगी दशरथ मांझी ने गया जिले की गहलोर घाटी की पहाड़ी को अकेले बल पर 22 वर्षों में काट कर लंबा रास्ता बना दिया था। अब वहां के लेागों को एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए मीलों तक लंबी घुमाववार दूरी तय नहीं करनी पड़ती।उन्होंने 350 फीट लंबी, 16 फीट चैड़ी और 25 फीट उंची यानी एक लाख 40 हजार घन फीट पहाड़ को अकेले काट डाला था। किसी अन्य देश में होते तो मांझी को संभवतः वहां का सबसे बड़ा पुरस्कार मिलता। पर यहां के किसी योग्य पुरस्कार के बिना ही वे गत 17 अगस्त 2007 को 80 साल की आयु में गुजर गए।



पद्म पुरस्कारों का हाल

अक्सर यह आरोप लगता रहता है कि इस देश में पद्म पुरस्कार कई मामलों में वोट बैंक, समुदाय-जाति बल, धन बल और जुगाड़ टैक्नोलाॅजी के आधार पर मिलता है। हालांकि अनेक मामलों में प्रतिभा का भी कद्र किया जाता है। फिर तो वह दशरथ मांझी को कैसे मिल सकता था। अनेक लोगों ने इन पुरस्कारों को लेने से समय समय पर मना कर दिया था क्योंकि उनके अनुसार इसे तय करने का कोई पारदर्शी आधार नहीं है। देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने तो ंभारत रत्न’ जैसे बड़े सम्मान को भी ठुकरा दिया था। उन्होंने कहा था कि जो सरकार, भारत रत्न से सम्मानित करने के लिए व्यक्तियों का चुनाव करती है,उसी सरकार में शामिल व्यक्तियों को खुद ही यह सम्मान नहीं ले लेना चाहिए। याद रहे कि कई अन्य लोगों के साथ- साथ 1954 में तत्कालीन उप राष्ट्रपति डा. राधाकृष्णन, 1955 में जवाहर लाल नेहरू 1957 में गोविंद बल्लभ पंत और 1962 में डा. राजेंद्र प्रसाद को भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। मौलाना आजाद को तो उनके निधन के बहुत बाद यानी सन् 1992 में भारत रत्न मिला। याद रहे कि सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह को इस सम्मान के लायक नहीं समझा गया। सरदार बल्लभ भाई पटेल व जय प्रकाश नारायण को भी यह सम्मान 1990 के बाद ही दिया गया जबकि तमिलनाडु के फिल्मी अभिनेता-सह -मुख्य मंत्री ं एम.जी.रामचंद्रन को 1988 में ही ‘भारत रत्न’ से सम्मानित कर दिया गया था। पद्म पुरस्कारों के बारे में खुशवंत सिंह और कांग्रेसी सांसद राजीव शुक्ल की राय गौर करने लायक है। गत साल 26 जनवरी को अपने नियमित काॅलम में खुशवंत सिंह ने लिखा था कि ‘अभी तक हमारी सरकारें लोगों को सम्मानित करने के लिए चुनाव करती हैं। नेताओं, वैज्ञानिकों, समाज सेवकों , साहित्यकारों ,संगीतकारों कलाकारों और पत्रकारों को पुरस्कारों के लिए चुना जाता है। हर साल होने वाले इन चुनावों में किस बात का ध्यान दिया जाता है, यह आज तक मेरी समझ में नहीं आया।’ इस बात को समझाया खुद राजीव शुक्ल ने। 26 जनवरी 2008 को दैनिक जागरण में प्रकाशित अपने लेख में शुक्ल ने लिखा कि ‘दिल्ली में लाॅबिंग करके कुछ लोग पहले भी पद्मश्री और पद्म भूषण पुरस्कार ले चुके हैं। मुझे लगता है कि प्रधान मंत्री को हस्तक्षेप करके इन पुरस्कारों की चयन समिति के सदस्यों के नाम तय करने चाहिए।’ इस बार कई अच्छे लोगेां को भी पुरस्कार मिले हैं। पर कुछ नाम ऐसे भी हैं जिन्हें देख कर लगता है कि प्रधान मंत्री ने राजीव शुक्ल की गत साल वाली सलाह नहीं मानी।



ऐसे ठुकराया पुरस्कार

सितारा देवी को जब 2002 में पद्म भूषण आॅफर किया गया तो उन्होंने यह कह कर उसे ठुकरा दिया कि मुझसे जूनियर और अल्पज्ञात लोगों को पहले ही पद्म विभूषण मिल चुका है। मुझे पद्म भूषण देना मेरा अपमान है। उस्ताद विलायत खान ने 1964 में पद्मश्री और 1968 में पद्म विभूषण यह कह कर ठुकरा दिया कि चयन समिति में संगीत की गुणवत्ता के बारे में फैसला करने की योग्यता रखने वाले सदस्य नहंी थे। मलयालम लेखक सुकुमार अजिकोड ने पद्मश्री ठुकराते हुए कहा कि ऐसा पुरस्कार देना संविधान विरोधी काम है। पत्रकार निखिल चक्रवर्ती ने 1990 में यह कहते हुए ठुकराया कि पत्रकार को प्रतिष्ठान से खुद को नहीं जोड़ना चाहिए। पुरस्कारों के बारे में एक बात जरूर कही जा सकती है कि तुलसी दास ने किस पुरस्कार के लिए राम चरित मानस की रचना की थी ? आज इतने अधिक पुरस्कार मौजूद हैं, फिर भी कोई कालजयी रचना सामने नहीं आ रही है।

तापमान (फरवरी, 2009)

स्वामी रामदेव और गंगा

गंगा नदी को साफ करने के लिए स्वामी रामदेव की गंभीर पहल स्तुत्य है। गंगा को उसकी पूरी लंबाई में साफ करके फिर से उसकी धारा को निर्मल व अविरल बनाने के लिए राम देव जी की कोशिश को देश भर के साधु संतों का समर्थन मिल रहा है।देश की शीर्ष धर्म सत्ता इस मुद्दे पर इन दिनों एक मंच पर है। स्वामी राम देव ने कहा है कि ‘हमारी मांग है कि केंद्र की सरकार गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करे और गंगा में गंदगी फैलाने वालों के खिलाफ संज्ञेय अपराध की धाराओं के तहत कार्रवाई हो। इस मांग के समर्थन में संतों ने अभियान शुरू भी कर दिया है।’ सवाल है कि चुनाव सर पर है। केंद्र की कथित धर्मनिरपेक्ष सरकार गंगा के लिए कुछ करने से पहले संभवतः इस बात का आकलन करेगी कि इससे उसके वोट बैंक पर तो कोई विपरीत असर तो नहीं पड़ेगा। यानी गंगा के लिए रामदेव जी की ‘लड़ाई’ लंबी होने वाली है। गंगा नदी की भी लम्बाई 2507 किलोमीटर है। संतों ने गंगा की पूरी लंबाई में जगह जगह शिविर लगाने का निर्णय किया है ताकि लोगों को ंगंगा की सफाई के प्रति जागरूक बनाया जा सके। गंंगा की सफाई का मसला देश के बिगड़ते पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है। पर संतों को इस मामले में एक और तरह से इस दिशा में पहल करनी चाहिए।जो नगर और महा नगर गंगा के किनारे बसे हुए हैं, उनकी नालियों और नालों के जरिए अत्यंत ही प्रदूषित जल सीधे गंगा में बहाया जा रहा है।पटना में ऐसे 29 नाले हैं जो गंगा को रोज- रोज प्रदूषित कर रहे हैं। बाबा राम देव तथा इस देश के कई अन्य संतों के पास इन दिनों काफी पैसे हैं।यदि ये संत अपने कुछ पैसे खर्च करके जहां तहां कुछ ही संख्या में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगवा देते तो संबंधित सरकारों को थोड़ी शर्म आती। इससे इन संत लोगों को सरकारों से ऐसी ही मांग करने का कुछ और नैतिक अधिकार मिल जाता।एक बात और है। संबंधित सरकार के सहयोग से स्वामी राम देव या कोई अन्य संत कहीं वाटर ट्रीटमेंठ प्लांट लगाएंगे तो उस प्लांट की गुणवत्ता भी बेहतर होगी ।क्या राम देव जी को तुलसी दास की वह बात याद हैजिसमें उन्होंने कहा था,‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरही ते नर न घनेरे ।’राम देव जी महाराज जब मंच पर बैठ कर खुद आसन-प्राणयाम करके लोगों को सिखाते हैं तभी लोगांे ंपर उसका भारी असर होता है।

जामिया मिलिया की छवि दांव पर
दिल्ली में आतंकी गतिविधि में शामिल आरोपितों को जामिया मिलिया के वी।सी.मुशीरूल हसन ने जामिया मिलिया के खर्चे पर कानूनी सहायता देने का निर्णय किया है। भारत में हो रही आतंकवादी घटनाओं के बारे में मुशीरूल साहब क्या सोचते हैं,यह बात खुद उन्होंने गत 22 सितंबर 2008 को सार्वजनिक रूप से बताई है। उन्होंने एन.डी.टी.वी. के कार्यक्रम में कहा कि ऐसी आतंकवादी घटनाएं इसलिए हो रही हैं क्योंकि भारत का मुस्लिम समुदाय यहां खुद को अलग थलग महसूस कर रहा है।उन्होंने सच्चर कमेटी की रपट का जिक्र करते हुए कहा कि मसलमानों की आर्थिक दशा काफी खराब है। मुशीरूल हसन के इस तर्क से यह बात स्पष्ट होती है कि आतंकवादी गतिविधियों में शामिल आरोपित ‘अलग-थलग पड़े’ मुस्लिम समुदाय की ओर से हिंसक लड़ाई लड़ रहे हैं।जबकि इस देश में आतंकी कार्रवाइयों में लिप्त सिमी और इंडियन मुजाहिदीन के जेहादी बार बार लिख लिख कर और बयान दे देकर यह खुलेआम कह रहे हैं कि वे भारत में इस्लामी शासन कायम करने के लिए लड़ रहे हैं। वे खलीफा का राज चाहते हैं। अब इन बातों का यहां अधिक व्याख्या करना जरूरी नहीं है। पाठक खुद समझ लें कि अंततः कौन क्या चाहता है। हा, एक सवाल मुशीरूल हसन से पूछा जा सकता है।वह यह कि वे जिन आतंकवादियों को कानूनी सहायता दे रहे हैं, वे यदि अदालत से दोषी करार दे दिए गए तो फिर जामिया मिलिया की पूरी दुनिया में कैसी छवि बनेगी ? क्या उसकी वह छवि बनी रह पाएगी जैसी छवि की कल्पना उसके कभी के उसके एक कुलपति जाकिर हुसेन ने की थी ?

नक्सली और इंडियन मुजाहिदीन
दिल्ली के जामिया नगर में हुई आतंकी-पुलिस मुंठभेड़ के बाद कुछ लोगों के द्वारा नक्सलियों से इन आतंकियों की तुलना की जाने लगी है।कहा जा रहा है कि नक्सली भी तो समाज की मुख्य धारा से अलग- थलग पड़े मुख्यतः दलितों और आदिवासियों को गोलबंद करके उनके लिए हथियारबंद लड़ाई लड़ रहे हैं ! पर यह तुलना गलत है। इंडियन मुजाहिदीनों और नक्सलियों के चरित्र में मूल अंतर हैं।नक्सलियों ने न सिर्फ दलित-आदिवासी के लिए, बल्कि समाज के करीब अस्सी प्रतिशत गरीब लोगों के लिए लड़ाई शुरू की है।वे इस देश पर सर्वहारा का शासन चाहते हैं। इस देश में अस्सी प्रतिशत सर्वहारा हैं जिनकी रोज की औसत आय मात्र बीस रुपए है। यानी वे बहुमत का शासन चाहते हैं।पर इंडियन मुजाहिदीन कुरान के उपदेशों के आधार पर अल्पसंख्यक का बहुमत पर शासन कायम करना चाहते हैं जैसा कि मध्य युग में यहां था।यह बात उनके साहित्य और बयानों में है जिसे मुशीरूल हसन जैसे बुद्धिजीवी जानबूझकर या अनजाने में नजरअंदाज कर रहे हैं।हालांकि यहां नक्सलियों के तरीके का समर्थन नहीं किया जा रहा है।एक बात और याद रखने की है।जब नक्सलियों की धरपकड़ के सिलसिले में उनके छिपे हुए स्थानों में पुलिस या अर्ध सैनिक बल धावा बोलते हैं और मुंठभेड़ें होती हैं और कुछ निर्दोष लोगों को भी क्षति पहुंचती है,तो उन स्थानों और उसके आसपास के लोगों की वैसी ही प्रतिक्रिया नहीं होती जैसी प्रतिक्रिया इन दिनों जामिया नगर और आसपास के कुछ लोगों की हो रही है।

दिन में कहीं, रात में कहीं और
राजनीति में भीतरघाती पहले भी हुआ करते थे,पर अब उनकी संख्या काफी बढ़ गई है। राजनीति में पैसे का बोलबाला बढ़ने और किसी तरह के आदर्श के लोप होतेे जाने के कारण ऐसा हुआ है। बिहार में किस दल का कौन नेता दिन में कहां है और रात में कहां रहता है, इसका पता ही नहीं चल रहा है। अपने दलीय सुप्रीमो से विश्वासघात करने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। कुछ सुप्रामों भी परेशान हैं।पर उन्होंने भी जब मौका आया था तो अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए अपने कैरियर निर्माताओं के साथ इसी तरह विश्वासघात किया था। छोटे नेता अपने बड़े नेताओं को अब उसी लहजे में जवाब दे रहे हैं।कहते हैं कि एक गति से चलना गधे का गुण होता हे। होशियार व्यक्ति तो जिस सीढ़ी के जरिए छत पर चढ़ता उस सीढ़ी को ढोए नहीं फिरता। यह बात और है कि जब वह छत से गिरता है तो उसे चोट बहुत लगती है। यह हर पेशे में है।पर राजनीति जबसे सेवा के बदले पेशा हो गई है, तब से इसमें यह अधिक है। हालांकि आज भी राजनीति में कई अच्छे लोग भी हैं। अगले लोक सभा चुनाव में बिहार का कौन सा नेता कहां से लड़ेगा, यह ठीक नहीं है। इस आशंका में टिकटार्थियों द्वारा लाॅयल्टी बदलने की प्रक्रिया तेज है। कोसी प्रलय को लेकर नेताओं और दलों के बीच आरोप प्रत्यारोप का जो दौर चल रहा है उसमें तो कई नेता अपने ही सुप्रीमो के खिलाफ उनके राजनीतिक विरोधियों को दबे छिपे सूचना, ‘मसाला’ व तर्कों से लैस कर रहे हैं।
तापमान (अक्टूबर, 2008)

चुनावी टिकट की शर्त

मध्य प्रदेश की कांग्रेस पार्टी ने एक अनुकरणीय काम किया है। उसने अपने वैसे सदस्यों को दो पेज का एक फार्म धराया है जो अगले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस का टिकट चाहते हैं। चुनाव इसी साल होने वाला है। उस फार्म में क्षेत्र के भाजपा विधायकों, मंत्रियों और प्रमुख भाजपा नेताओं के भ्रष्टाचार की तथ्यपूर्ण जानकारियां भर कर देनी हैं। जो कांग्रेसी नेता ऐसी तथ्यपूर्ण जानकारियां देगा, उसको टिकट मिलने की संभावना रहेगी। कांग्रेस ने मध्य प्रदेश विधान सभा के चुनाव में भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाने का फैसला किया है। कांग्रेस कह रही है कि मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चैहान तथा उनके मंत्रिमंडल के 14 सदस्यों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं। उधर भाजपा की मध्य प्रदेश इकाई ने जवाबी हमला करते हुए कहा है कि यदि कांग्रेस ने अपने इस फार्म को टिकट का आधार बनाया तो हम अपने कार्यकर्ताओं से कहेंगे कि हमें मध्य प्रदेश से किसी एक ईमानदार कांग्रेसी नेता, पूर्व मंत्री या पूर्व या वत्र्तमान विधायक का नाम बताओ और इनाम में भाजपा का टिकट ले जाओ। अच्छा होता कि बिहार की सत्ताधारी पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं से कहतीं कि सरकारी भ्रष्टाचार का मामला सबूत के साथ पकड़ो और इस तरह अगले चुनाव में टिकट पाने या फिर और कोई पद पाने की योग्यता हासिल करो। याद रहे कि बिहार की इन दिनों सबसे बड़ी समस्या सरकारी भ्रष्टाचार है जिस पर चाहते हुए भी नीतीश कुमार काबू पाने में असमर्थ हैं।

एक आंख-खोलू आंकड़ा
नब्बे के दशक तक इस देश में सिर्फ 18 लोग ऐसे थे जिनकी संपत्ति एक हजार करोड़ रुपए या उससे अधिक थी। आज ऐसे लोगों की संख्या बढ़ कर 533 हो चुकी है जिनमें प्रत्येक की संपत्ति चार हजार करोड़ रुपए या उससे अधिक है। दूसरी ओर इस देश में ऐसे लोगों की संख्या 84 करोड़ पहुंच चुकी है जिनकी रोज की औसत आय मात्र बीस रुपए है। इन 84 करोड़ लोगों में से 24 करोड़ लोगों की रोज की आय तो सिर्फ 9 रुपए है। यह सरकारी आंकड़ा है किसी प्रतिपक्षी नेता का आंकड़ा नहीं है।इस बढ़ती विषमता के कारण बढ़ रहे असंतोष को सरकार कैसे संभालेगी,यह देखना महत्वपूर्ण होगा।अभी तो इस देश के पक्ष-विपक्ष के अधिकतर नेतागण लोकतंत्र को नोट-तंत्र में पूरी तरह बदल देने के काम में लगे हुए हैं। नौ रुपए रोज की आय वाले अति गरीबों की ओर उनका ध्यान कभी जाएगा भी या नहीं, यह भी एक बड़ा सवाल है।

चारा घोटाला केस में आगे क्या ?
चारा घोटाले में आरोपितों को इन दिनों कोर्ट से धुआंधार सजाएं मिल रही हैं। आईएएस अफसरों को भी सजाएं मिल रही हैं। एक वर्तमान और एक सेवानिवृत आईएएस अफसर को निचली अदालत सजा दे चुकी है। अन्य आरोपित आईएएस अफसर भी शायद सजा से नहीं बचें। संकेत तो यही है। पहले आईएएस अफसरों का समाज में भी बड़ा सम्मान था। पर बाद के दिनों में जब इस देश व प्रदेश के अनेक आईएएस अफसर भ्रष्ट नेताओं के साथ मिलकर देश-प्रदेश को लूटने के धंधे में लग गए, तो उनकी अब वह इज्जत समाज में नहीं है जो कभी थी। साथ-साथ जब ऐसे लोगों को कोर्ट से सजा मिलती है तो इनके नाम पर कोई रोने वाला भी नहंीं मिलता है। 950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले से संबंधित कुल 53 मुकदमे दायर हुए थे। इन में से अब तक 28 मुकदमों में फैसला आ चुका है। सभी मामलों में अधिकतर आरोपितों को सजाएं मिली हैं। इन मुकदमों को करीब से देखने वाले लोगों का अनुमान है कि बाकी 25 मामलों में भी कोई अलग फैसला नहीं होने वाला है। इन में से कई ऐसे मुकदमे फैसला का इंतजार कर रहे हैं जिनमें कई नेतागण आरोपित हैं। उनका क्या होगा ? बिहार व झारखंड के अनेक लोगों की आंखें उन मुकदमों की ओर लगी हुई हैं। सजल चक्रवर्ती को सजा की मात्रा पर सुनवाई के दौरान सी।बी.आई. के वकील ने अदालत से यह अपील की थी कि वरीय अधिकारियों द्वारा किए गए अपराध के मामलों में नरमी नहीं बरती जानी चाहिए।यानी सी.बी.आई.यह कह रही थी कि जिसकी जितनी बड़ी जिम्मेदारी, गलती होने पर उसको उतनी ही अधिक सजा मिलनी चाहिए। तभी अन्य लोग भ्रष्टाचार करने से डरेंगे। देखना है कि आरोपित नेताओं का क्या होता है और उनके केस का कब फैसला होता है! क्या अगले लोक सभा चुनाव से ठीक पहले उन नेताओं के केस का फैसला होगा ? यह तय तो नहीं है, पर शायद संयोग से उसी समय फैसला हो ! फिर तो फैसले के अनुसार पक्ष विपक्ष को उसका राजनीतिक लाभ मिलना तय है। क्योंकि अब भी जन मानस में कोर्ट के किसी फैसला के लिए सम्मान का भाव मौजूद है।

शाबास मायावती !
राजनीति में बढ़ते प्रदूषण को कम करने में मायावती की भले कोई रूचि नहीं हो,पर नदियों के प्रदूषण को रोकने की दिशा में उत्तर प्रदेश की दबंग मुख्यमंत्री ने हाल में ठोस कदम उठाया है। बिहार सहित अन्य प्रदेशों के मुख्य मंत्रियों को कम से कम इस मामले मेंे मायावती से शिक्षा लेनी चाहिए। लखनऊ के पास से बह रही गोमती नदी को पूरी तरह प्रदूषणमुक्त करने के लिए मायावती सरकार ने फिलहाल 170 करोड़ रुपए की राशि मंजूर की हैं। लखनऊ में सीवेज शोधन संयंत्र का शिलान्यास हो चुका है। बन कर तैयार हो जाने पर 34 करोड़ 50 लाख लीटर दूषित जल का हर दिन शोधन होगा। यानी, लखनऊ के गंदे नालों का पानी शुद्ध बन कर ही गोमती में गिरेगा। उम्मीद है कि मायावती जल्दी ही गंगा को भी प्रदूषणमुक्त करने के लिए ऐसा ही कदम उठाएगी। इस तरह यदि उत्तर प्रदेश में गंगा और गोमती साफ हो गई तो फिर तो बंगाल, बिहार और दिल्ली की सरकारों पर भी ऐसा करने के लिए जन-दबाव पड़ेगा।

एक पुस्तक की प्रतीक्षा
कल्पना कीजिए कि जवाहर लाल नेहरू और डा श्रीकृष्ण सिन्हा ने एक दूसरे को अपने पत्रों में क्या-क्या लिखा होगा। एक ने दूसरे को अनेक पत्र लिखे थे। वे पत्र अब तक अप्रकाशित हैं। पता चला है कि उन पत्रों की प्रतियां बिहार सरकार के पास भी नहीं हैं। डा श्रीकृष्ण सिंह का अपने सचिव को संभवतः यही निदेश था। इन पत्रों को अलग से पुस्तकाकार छपवाया जा रहा है। उस पुस्तक का जल्दी ही लोकार्पण होगा। राजनीति के पतन के इस दौर में यह पढ़ना दिलचस्प होगा कि गांधी युग के उन दो महारथियों ने एक दूसरे को क्या- क्या लिखा था।
तापमान (अगस्त, 2008)

कहां से आए नया दल नया नेता

इस देश में एक नए दल और नए नेतृत्व की जरूरत तीव्रता से महसूस की जा रही है। ऐसा दल जो आर्थिक मामलों में गरीबपक्षी हो, पर देश की एकता - अखंडता को लेकर राष्ट्रवादी हो। कम्युनिस्ट गरीबपक्षी हैं, तो देश की सुरक्षा को लेकर वे लापारवाह हैं। उनमें अंतरराष्ट्रीयतावाद का पुट जरूरत से काफी अधिक है। जबकि दुनिया के अन्य देशों के कम्युनिस्ट पहले अपने देश के हित को देखते हैं। बाद में ही उन्हें अन्य देशों का या वहां के कम्युनिस्टों का ध्यान आता है। भाजपा राष्ट्रवादी जरूर है, पर गरीबों के लिए वह अपेेक्षाकृत कम ही सोचते और करते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ वे अब पहले जैसे निर्मम नहीं रहे।जबकि कम्युनिस्ट दलों में अब भी ईमानदार नेताओं और कार्यकत्र्ताओं की भरमार है। कभी डा राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि जनसंघ राष्ट्रवादी है, तो गरीबपक्षी नहीं है। कम्युनिस्ट गरीब पक्षी हैं तो राष्ट्रवादी नहीं। इस देश के कम्युनिस्ट अपने देश देश की सीमाओं के प्रति लापारवाह हैं।भारत पर 1962 में हुए चीनी हमले को लेकर यहां के कम्युनिस्टों के चीनपक्षी व्यवहार को लोहिया ने देखा था। दुर्भाग्यवश डा लोहिया का नाम लेने वाले अधिकतर लोहियावादियों के क्रियाकलापों को देखकर तो आज यही लगता है कि वे न तो राष्ट्रवादी हैं और न ही गरीबपक्षी। एक अच्छी बात यह हुई है कि कम्युनिस्टों ने पिछले दिनों भारत सरकार पर दबाव डाल कर इस देश की आर्थिक नीतियों में कई महत्वपूर्ण प्रस्तावित बदलाव को रोक दिया। मन मोहन सिंह की सरकार बदलाव चाहती थी। इसी का नतीजा है कि भारत वैश्विक आर्थिक मंदी के कुप्रभाव में उतना नहीं आया जितना कुछ अन्य देश आ चुके हैं। इसके लिए कम्युनिस्टों की सराहना की जानी चाहिए। पर, ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में जारी वैश्विक जेहादी हमलों को लेकर इस देश के कम्युनिस्ट ऐसी भूमिका निभा रहे हैं जिससे आतंकवादियों को ही परोक्ष रूप से मदद मिल रही है। अपनी इस शर्मनाक भूमिका पर शायद कम्युनिस्ट बाद में पछताएंगे। पर तब तक तो देर हो चुकी होगी।कांग्रेस अब इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस तो रही नहीं। इंदिरा गांधी तो दोनों तरह के अतिवादियों पर करारा हमला करती थीं।भाजपा का रुख ओसामा बिन लादेन के बंदों के खिलाफ सही जान पड़ता है। ऐसी स्थिति में इस देश में एक राष्ट्रवादी और गरीबपक्षी दल की सख्त जरूरत है। पर,उसके लिए जिस तरह के प्रभावशाली नेता की जरूरत है, वैसा नेता अभी इस देश में दिखाई नहीं पड़ रहा है। शायद अगली किसी आंदोलन, विपत्ति या संकट से वैसा नेता पैदा हो जाए !



नीतिगत बदलाव के खतरे

एक समय था जब इस देश में पहले जनसंघ और बाद में भाजपा के लोग आक्रमणशील राष्ट्रीयता की नीति में विश्वास करते थे। दूसरी ओर, आजादी के पहले की मुस्लिम लीग के लोग और कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीयतावाद में भरोसा रखते रहेे। कम्युनिस्ट कहते रहेे कि ‘दुनिया के मजदूरों एक हो।’ आजादी के पहले की मुस्लिम लीग के लोग या फिर उस तरह का विचार रखने वाले आज के लोग दुनिया भर के मुस्लिमों के बीच भाईचारे में विश्वास करते रहे हैं। सन् 1947 में मुस्लिम लीग ने देश का बंटवारा करा दिया। अब भी मुस्लिम लीग की नीतियों में भरोसा रखने वाले लोग भारत में मौजूद हैं। आजाद भारत में करीब बीस साल पहले तक कांग्रेस पार्टी की नीति इन दोनों अतियों के बीच की थी। पर मिली -जुली सरकारों के दौर शुरू होते ही कांग्रेस ने अपनी पोजिशन बीच से खिसका कर वाम दल और मुस्लिम लीग की तरह की नीतियों के करीब कर ली। इस बदलाव के अपने खतरे हैं। उन खतरों से यह देश इन दिनों आए दिन रू ब रू हो रहा है। मुम्बई हमले के बाद शायद कांग्रेस की इस नीति में शायद बदलाव हो ! पर अभी पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।क्योंकि सवाल वोट का जो है !आगे -आगे देखिए, होता है क्या !



चुनाव का एक नतीजा यह भी

हाल में देश के पांच राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव नतीजे सामने आए। मिजोरम की स्थिति तो विशेष है। उसे छोड़ दें तो बाकी चार राज्यों में कौन जीता और कौन हारा ? इस संबंध में अनेक विश्लेषण सामने आए। पर एक अलग तरह का विश्लेषण यहां पेश है। कल्पना कीजिए कि इन चारों राज्यों को मिला कर कभी एक ही राज्य बना दिया जाए तो क्या होगा ?फिर तो संयुक्त प्रदेश में भाजपा की ही सरकार बन जाएगी। क्योंकि इन चारों राज्यों में कुल मिला कर भाजपा ने विधान सभा की 295 सीटें जीती हैं। कांग्रेस को कुल मिला कर 246 सीटें ही मिलींं। हालांकि किन्हीं राज्यों के विलयन का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता, पर लोक सभा का चुनाव तो देश भर में एक ही साथ होना है। यानी विश्लेषण का यह नतीजा पूरी तरह सही नहीं लगता है कि हाल के विधान सभा चुनावों में भाजपा हार गई और कांग्रेस जीत गई।



कंधार पर अकारण अपराध बोध

28 दिसंबर, 1999 के दैनिक ‘ हिंदुस्तान ’ के पहले पेज पर एक खबर छपी थी। उसे हू ब हू यहां दिया जा रहा है, ‘देश के प्रमुख राजनैतिक दलों ने इंडियन एयरलाइंस के अपहृत विमान के यात्रियों और चालक दल की सकुशल रिहाई के लिए आवश्यक कदम उठाने का सरकार को सुझाव दिया है। इन दलों के नेताओं ने कहा कि संकट की इस घड़ी मेंे वे सभी एक हैं, मगर पल -पल बदलते घटनाक्रम के मद्दे नजर जरूरी कदम उठाने का फैसला तो सरकार ही ले सकती है। प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा बुलाई गई इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह,माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महा सचिव हर किशन सिंह सुरजित,भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जे।चित रंजन, समाजवादी पार्टी के अमर सिंह सहित कई प्रमुख नेताओं ने भाग लिया।सरकारी पक्ष से गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री जसवंत सिंह, नागरिक विमानन मंत्री शरद यादव , संसदीय कार्य मंत्री प्रमोद महाजन और संचार मंत्री राम विलास पासवान भी बैठक में मौजूद थे।तेलुगु देशम के येरन नायडु और जम्मू कश्मीर के मुख्य मंत्री फारूख अब्दुला भी बैठक में उपस्थित थे। बैठक में श्री वाजपेयी ने विपक्षी नेताओं को सारे घटना क्रम की विस्तृत जानकारी दी और आगे की रणनीति पर उनसे विचार विमर्श किया।’ यह बैठक 27 दिसंबर 1999 को हुई थी। कंधार विमान अपहरण कांड को लेकर आए दिन आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहता है। कांग्रेस तथा अन्य कुछ विपक्षी दल एनडीए खास कर भाजपा पर यह आरोप लगाते रहते हैं कि उसकी सरकार के विदेश मंत्री जसवंत सिंह तो अपने साथ विमान में ले जाकर आतंकवादी मसूद अजहर को कंधार छोड़ आए। ऐसे में भाजपा आतंकवाद के खिलाफ क्या लड़ेगी ? अब जरा उस समय की स्थिति पर विचार करें। करीब दो सौ बंधकों के साथ एयर इंडिया के विमान का अपहरण कर आतंकवादी ऐसे देश में ले गए थे जहां तालिबानियों का शासन था। उस सरकार के साथ भारत का कोई राजनयिक संबंध भी नहीं था। इधर पौने दो सौ बंधकों के रिश्तेदार दिल्ली में सरकार की नाक में दम किए हुए थे। वे दबाव डाल रहे थे कि चाहे देश को ही क्यों न ‘बेचना’ पड़,े पर हमारे रिश्तेदार सुरक्षित आने चाहिए। विपक्षी दलों की चिंता भी बंधकों की सुरक्षा में थी। कांग्रेस या किसी दल के किसी नेता ने अटल सरकार से तब यह नहीं कहा था कि चाहे बंधक मार ही क्यों न दिए जाएं, पर अजहर को रिहा नहीं किया जाना चाहिए। वे तो अटल सरकार को खुली छूट देकर सर्वदलीय बैठक से आए थे कि चाहे जो कुछ हो बंधकों की जानें नहीं जानी चाहिए। इस पृष्ठभूमि मेंे मसूद अजहर रिहा किया गया। अब इस देश की राजनीति के दोगलेपन का हाल तो देखिए। जिस फैसले में खुद प्रतिपक्षी दल शामिल हों, उसी फैसले को लेकर सरकार की बाद में सार्वजनिक रूप से आलोचना होगी ? यह कैसी परंपरा है ?

तापमान (जनवरी, 2009)

पुलिस की देशभक्ति

इस देश के कुछ वोटबाज नेताओं के बीच इस बात को लेकर सार्वजनिक तौर पर अब भी बहस जारी है कि सिमी एक निर्दोष संगठन है या राष्ट्रद्रोही । पर, दूसरी ओर इसी देश की पुलिस ने एकजुट होकर काफी मेहनत से यह खोज निकाला है कि इस देश के कई नगरों में हाल में जो बम विस्फोट हुए हैं, उनमें सिमी के लोग शामिल थे। हालांकि इस खोज में अग्रणी भूमिका गुजरात पुलिस ने निभाई क्योंकि उनके राज्य में ही हाल में सर्वाधिक राष्ट्रद्रोही घटनाएं हुई,पर इस काम में देश के अन्य राज्यों की पुलिस ने भी पेशेवर तरीके से व्यवहार करते हुए गुजरात पुलिस की मदद की।उन राज्यों में वे राज्य भी शामिल हैं जहां भाजपा या एन।डी.ए.की सरकार नहीं है।यहां तक कि केंद्र सरकार की खुफिया एजेंसियों ने भी गुजरात पुलिस को इस खोज बीन में भरपूर सहयोग दिया। यानी, चूंंकि पुलिस को किसी से वोट नहीं लेना होता है, इसलिए वे देशहित को ध्यान में रख कर अपना काम कर रही है। भले पुलिस पर जहां तहां आम जनता पर जुल्म करने व रिश्वतखोरी में लिप्त होने का आरोप लगें ,पर देशहित के मामले में वे इस देश के कई बड़े नेताओं से बेहतर साबित हुए हैं।क्या जयचंदी मानसिकता वाले वैसे नेताओं को अब भी शर्म आएगी ? सिमी के नेता खुद सार्वजनिक रूप से इस देश को बर्बाद करने का एलान करते रहे हैं। पर, हमारे देश के कुछ तथाकथित सेक्यूलर नेता उन्हें निर्दोष घोषित करते -फिरते हैं। 30 सितंबर ,2001 के टाइम्स आफ इंडिया में अहमदाबाद में सिमी के जोनल सेक्रेर्टी साजिद मंसूरी का बयान छपा था।मंसूरी ने कहा था कि ‘जहां भी हम सत्ता में आएंगे,हमलोग मंदिरों को नष्ट कर देंगे और वहां मस्जिद बनाएंगे।’उसी अखबार से बातचीत मेंं सिमी के बिहार जोन के सचिव रियाजुल मुसाहिल ने कहा था कि ‘अगर भारतीय संविधान का कुरान से टकराव होता है तो हम संविधान को नहीं मानेंगे।’ सिमी अपने लिटरेचर में लिखता है कि उसे एक और गजनी का इंतजार है।वह इस देश में खलीफा का शासन स्थापित करना चाहता है।

कहां हैं एक लाख बंगला देशी ?
यह किसी का अनुमान नहीं बल्कि एक जिम्मेदार पुलिस अफसर का बयान है। मेघालय पुलिस के ए।डी.जी. कुलवीर कृष्णा ने हाल में यह रहस्योद्घाटन किया है कि बंगला देश से आए करीब एक लाख नागरिक भारत में आकर गुम हो गए हैं। उन लोगों ने वैध पासपोर्ट व वीसा के सहारे भारत में प्रवेश किया था,पर अब उनका कोई अता -पता नहीं हैं। हाल में गुवहाटी हाई कोर्ट के एक निर्णय से एक और सनसनीखेज खुलासा हुआ है।पता चला है कि सन् 1996 के असम विधान सभा चुनाव में एक पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद कमरूद्दीन ने जमुना मुख क्षेत्र से असम विधान सभा का चुनाव भी लड़ा।हाई कोर्ट ने बंगला देशी घुसपैठियों की समस्या की चर्चा करते हुए अपने जजमेंट में कहा कि ऐसा सिर्फ असम में ही संभव है।कमरूद्दीन के पास पाकिस्तानी पासपोर्ट था।वह पहले पाकिस्तान से बंगला देश आया और फिर अवैध तरीके से असम में घुस गया। ये एक लाख लोग उन लोगों के अलावा है जो अवैध तरीके से भारत में प्रवेश करते रहते हैं।याद रहे कि इन एक लाख गुम बंगलादेशियों को लेकर उन नेताओं ने अब तक कोई चिंता नहीं व्यक्त की है जो वोट बैंक के सौदागर हैं और सिमी पर प्रतिबंध का विरोध करते हैं।यह सब अपने ही देश में संभव है।आए दिन यह खबर आती रहती है कि भारत में जो बम विस्फोट हो रहे हैं,उनमें हुजी का हाथ है।खुफिया एजेंसियां बताती हैं कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई.,बंगला देशी खुफिया एजेंसी डी.जी.एफ.आई.और सिमी सब आपस में मिले हुए हंै।उनका उद्देश्य है कि भारत में एक हजार ‘घाव’ करना है।हजार घाव का नारा एक पाकिस्तानी नेता ने तब दिया था जब बंगला देश की मुक्ति वाहिनी को भारत ने मदद की थी और बंगला देश बना था।

अवैध घुसपैठ की समस्या
सन् 1971 में जब तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना का जुल्म जारी था तो वहां से करीब एक करोड़ शरणार्थी भाग कर भारत आ पहुंचे थे।तत्कालीन बहादुर प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने शेख मुजीबुर रहमान की मुक्ति वाहिनी को इसलिए भी मदद की थी ताकि एक करोड़ शरणार्थी वापस जा सकें। वे हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ बन गए थे। पर आज दो से तीन करोड़ बंगला देशी अवैध तरीके से भारत में घुसपैठ कर चुके हैं और उनका आना जारी है।इस काम में इस देश के सीमा सुरक्षा बल के भ्रष्ट जवान व अफसर भी घुसपैठियों की मदद करते हैं क्योंकि उसके बदले उन्हें रिश्वत मिलती है। यह मांग पुरानी है कि भारत-बंगला देश की पूरी सीमा पर मजबूत बाड़ लगा दिए जाएं।पर इस काम में इसी देश के कुछ तत्व बाधक रहे हैं। एक बार एक निजी चैनल पर इस समस्या पर चर्चा चल रही थी।उसमें इस देश के एक पूर्व विदेश सचिव भाग ले रहे थे।चर्चा में यह सुझाव आया कि बंगला देश सीमा पर मजबूत बाड़ लगा दिए जाने चाहिए। @अब तो नेपाल सीमा पर भी बाड़ लगाने की जरूरत पड़ेगी।@इस पर पूर्व विदेश सचिव ने कहा कि सीमा पर बाड़ लगाने से दुनिया भर में हमारे देश की छवि खराब होगी।इस पर संजय निरूपम ने कहा कि लगता ही नहीं है कि आप भारत के विदेश सचिव थे या बंगला देश के ? पूर्व विदेश सचिव महोदय की बोलती बंद हो गई।पर वे अकेले नहीं हैं जो ऐसा सोचते हैं।भारत से सटे बंगला देश की सीमा 272 किलो मीटर है।हाल में बाड़े लगे हैं।पर अब भी पूरी सीमा की घेरेबंदी नहीं हो पाई है। बी।एस.एफ.के जवानों व अफसरों पर भारत सरकार सख्त कार्रवाई क्यों नहीं करती जो थोड़े से पैसे लेकर बंगला देशियों को भारत में प्रवेश कराते जा रहेे हैं ?

अपने भोला बाबू !
बिहार के नगर विकास मंत्री डा।भोला सिंह प्रभावशाली वक्ता हैं और मिलनसार और समझदार भी। निजी बातचीत में भी वे प्रभावित करते हैं।पर, हाल में पता नहीं क्यों वे गच्चा खा गए। पटना में नागरिक सुविधाओं को लेकर पटना हाई कोर्ट की एक टिपपणी पर भोला बाबू नाहक उखड़ गए।उन्होंने हाईकोर्ट को ही नसीहत दे डाली। पटना हाई कोर्ट पर बोलते समय नगर विकास मंत्री को याद ही नहीं था कि कुछ ही दिन पहले उन्होंने नगर निगम के कुछ काहिल व भ्रष्ट कर्मचारियों के बारे में खुद उन्होंने क्या कहा था। भोला बाबू ने भारी जल जमाव से दुखी होकर कहा था कि ‘पटना के संप हाउस के आपरेटर से जब कहा जाता है कि संप चालू करोे, तो लगता है कि उसके घर में कोई मर गया है।जब तक संप हाउस पर मैं रहा, तब तक तो वह चला,पर मेरे वहां से हटते ही बंद कर दिया गया।’ जाहिर है कि डिजल की चोरी के लिए संप नहीं चलते और लोग जल जमाव से पीडि़त होते रहते हैं।ऐसे नगर निगम के कामांे का बचाव करते हुए हाई कोर्ट पर टिप्पणी कर देने से भोला बाबू की छवि प्रभावित हुई है।यह तो अच्छा हुआ कि मुख्य मंत्री ने हाईकोर्ट के बचाव में बयान दे दिया। उम्मीद है कि भोला बाबू अब सावधानी बरतेंगे।
तापमान (सितंबर, 2008)

बुधवार, 21 जनवरी 2009

अल्पसंख्यकवाद बनाम अनिवार्य मतदान

यदि अगले लोक सभा चुनाव के बाद राजग को केंद्र में सत्ता मिल गई तो वह मतदान की अनिवार्यता के लिए कानून बना सकता है।भाजपा के नेताओं ने ऐसा संकेत दिया है। दुनिया के कई देशों में मतदान करना अनिवार्य है।जो नागरिक मतदान नहीं करते उनके लिए वहां सजा का प्रावधान है। कैसा रहेगा यदि एक दिन भारत में यह कानून बने कि जो मतदाता मतदान नहीं करेगा , उसे कुछ खास सरकारी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा ?और, यदि इस कानून को कड़ाई से लागू किया जाए तो कितने प्रतिशत मतदाता मतदान केंद्रों पर जाने को मजबूर हो जाएंगे ? फिर भी सब तो नहीं किंतु करीब अस्सी -नब्बे प्रतिशत मतदाता मतदान जरूर करने लगेंगे। आज तो औसतन 50 से 60 प्रतिशत मतदाता ही इस देश में मतदान करते हैं और मतों के भारी बंटवारे के कारण 20 -25 प्रतिशत या उससे से भी कम मत पाने वाले लोग भी कई बार चुनाव जीत जाते हैं।कई बार तो ऐसा भी होता है कि जिस उम्मीदवार की जमानत जब्त हो जाती है,वह भी चुन लिया जाता है। यदि अस्सी -नब्बे प्रतिशत मतदाता मतदान करने लगे तो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंकों के सौदागर अत्यंत कम वोट पाकर भी चुनाव नहीं जीत पाएंगे।भारत में आम तौर पर किसी चुनाव क्षेत्र में किसी धार्मिक या जातीय समूह की आबादी 20-25 प्रतिशत से अधिक नहीं है।अपवादस्वरूप कुछ ही क्षेत्र ऐसे हैं जहां बात इसके विपरीत है। यदि कोई जातीय या धार्मिक समूह अधिकतर चुनाव क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं होंगे तो नेतागण भी सिर्फ सांप्रदायिक या जातीय आधारपर ही अपनी पूरी राजनीति और रणनीति तय नहीं करेंगे।इससे देश का भी भला होगा।आज तो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक की खातिर अनेक नेता इस देश को तोड़ने पर भी अमादा हैं।

सड़क किनारे नाला भी
कई दशक पहले की बात है।बिहार के एक शहरी इलाके वाले विधान सभा क्षेत्र से एक ईमानदार नेता किसी तरह चुनाव जीत गया। उसने अपने क्षेत्र में सरकार से कह कर सीमेंटी सड़कें बनवा दीं। अगली बार वह बेचारा चुनाव हार गया। जीत हुई एक भ्रष्ट नेता की जिनका ‘पेट’ कुछ ज्यादा ही बड़ा था।उन्होंने उस सीमेंटी सड़क को तोड़वा कर फिर से अलकतरायुक्त सड़क बनवा दी। पूछने पर उन्होंने कहा कि पिछले विधायक मूर्ख थे।उन्होंने ठेकेदारों के पेट पर लात मार दी थी।इसीलिए वे हार भी गए।हर साल सड़क नहीं टूटेगी तो हमारा ठेकेदार तो बेरोजगार हो ही जाएगा, हमें चंदे के भी लाले पड़ जाएंगे ? अब इस बात को आज के संदर्भ में फिट कीजिए। नीतीश कुमार की सरकार पटना में सड़कों ंका बड़े पैमाने पर पुनरूद्धार करा रही है।साथ ही, सड़कों के किनारे नालियां भी बनवाई जा रही हैं। अब बरसात में सड़कों पर जल -जमाव के कारण अलकतरायुक्त सड़कें नहीं टूटंेगीं।कोसी के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में भी सड़कों का जो पुनरूद्धार होगा, उन सड़कों के किनारे भी नालियां बनाने का निर्णय बिहार सरकार ने किया है।देखना है कि टिकाउ सड़कों के कारण सत्ताधारी दलों को अगले चुनाव में कोई नुकसान होता है या नहीं ! वैसे भी बिहार में अब ‘बात’ थोड़ी बदली लगती है।

कम होती दुल्हनें
अभी पंजाब जैसी स्थिति तो नहीं है, पर शिशु कन्या भ्रूण हत्या का कुपरिणाम बिहार में भी अब धीरे -धीरे परिलक्षित होने लगा है। इन दिनों मध्यम वर्ग के कई अभिभावक यह रोना रोते हैं कि उनके कुंवारे पुत्र की शादी के लिए बहुत ही कम आॅफर आ रहे हंै।‘हमारे जमाने’ में तो काफी आते थे। पर सवाल है कि ऐसी स्थिति क्यों आ गई है कि योग्य वरों के लिए भी कन्याओं के अभिभावकों की पहले जैसी भीड़ अब नहीं लग रही है ? पहले तो ऐसा नहीं था।दरअसल इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हाल ही में गांवों से निकल कर शहरों में बसे अनेकानेक परिवारों के संपर्क सूत्र अब कम हो गए है।शहरों का जीवन वैसी सामाजिकता वाली नहीं रह गई है कि एक व्यक्ति दूसरे के यहां कन्या के पिता को भेजे।भेजने वालों की कमी है।उधर गांवों से पुश्तैनी संबंध लगभग टूट ही चुका है।कई नव शहरी परिवारों की स्थिति त्रिशंकु जैसी हो चुकी है। पर, दूसरा कारण भी कम दमदार नहीं है। मध्यम वर्ग के परिवारों में शिशु कन्या भ्रूण हत्याओं का चलन बढ़ा है।वर पक्षों के हाथों बधू पक्षों के अमानवीय व्यवहारों के कारण भी शिशु कन्या हत्याओं की घटनाएं बढ़ी हैं।सास-बहू संबंधों को बेहतर बनाए बिना इस समस्या का हल फिलहाल दिखाई नहीं पड़ रहा है। यदि ससुरालों में बधुओं की स्थिति नहीं सुधरी तो कुछ वर्षों के बाद तो वर पक्षों को शादी के प्रस्ताव का और भी अधिक इंतजार करना पड़ेगा।

आरोप-प्रत्यारोपों के बीच सच्चाई का कत्ल
जो समस्या आतंकवाद से निपटने को लेकर इस देश में आ रही है, कुछ वैसी ही समस्या ठाकरे बनाम उत्तर भारतीयों के बीच तनाव को समाप्त करने को लेकर आ रही है। जब कोई व्यक्ति ‘मुस्लिम आतंकवाद’ का सवाल उठाता है तो दूसरा ‘हिंदू आतंकवाद’ का मुद्दा खड़ा कर बराबरी कर देता है और आतंकवाद की समस्या ज्यों की त्यों बनी रह जाती है। आज जब देश के पिछड़े राज्यों के पिछड़ेपन से पीडि़त लोग रोजी रोटी के लिए महाराष्ट्र जाते हैं तो राज ठाकरे जैसे नेता मराठियों के लिए रेलवे में नौकरियों का सवाल खड़ा कर देते हैं। समस्य ज्यों की त्यों बनी रह जाती है। आजादी के बाद बने रेल भाड़ा समानीकरण नियम का लाभ महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने उठाया।उन राज्यों ने तरक्की कर ली । और अब, जब इस कारण बिहार जैसे राज्य पिछड़ गए और बिहारी मानुष नौकरी और रोजगार के लिए महाराष्ट जा रहे हैं तो उनके साथ हिंसा हो रही है।कल्पना कीजिए कि रेल भाड़ा समानीकरण नियम नहीं होता तो अविभाजित बिहार का कितना अधिक औद्योगिक विकास हो चुका होता !आजादी के बाद जब केंद्र सरकार के नए शासकों ने यह देखा कि अविभाजित बिहार में देश के कुल खनिज पदार्थों का करीब आधा पाया जाता है तो उसने रेल भाड़ा समानीकरण नियम बना दिया । केंद्र सरकार ने अन्य राज्यों में उद्योग लगाने के लिए सुविधा प्रदान कर दी।समानीकरण का मतलब यह था कि झरिया से जितने रेल भाड़ा में पटना कोयला जा सकता था,उतने ही भाड़ा में बंबई पहुंच सकता था। नतीजतन आजादी के बाद बिहार का विकास नहीं हुआ तो यहां के बेरोजगार लोग अन्य राज्यों में जाएंगे ही। हालांकि अब समानीकरण नियम नहीं है। एक और बात हुई। कुछ बड़ी कंपनियां ने अपने कारखाने तो झारखंड में लगाए, पर अपना मुख्यालय बंबई में रखा।फिर तो उस कंपनी से मिले सरकार को टैक्स का लाभ महाराष्ट्र को मिला।उस लाभ का कुछ हिस्सा झारखंड के बेरोजगार मांग रहे हैं तो यह ठाकरे को नागवार क्यों लग रहा है ?
तापमान (नवंबर, 2008)

रविवार, 18 जनवरी 2009

बंगाल का चुनावी फार्मूला बिहार में !

बंगाल में 1977 में सत्ता में आने के बाद ज्योति बसु सरकार ने करीब 16 लाख बटाईदारों को कानूनी हक दिलवा दिया । वाम मोर्चा बाद के हर चुनाव में उन बटाइदारों को यह हिदायत देती रहती है कि कहीं कांग्रेस फिर सत्ता में आ गई तो वह आपको इस हक से वंचित कर देगी।अब भला बटाईदार क्यों कांग्रेस को वोट देंगे ? हाल में जदयू के प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने कहा है कि ‘राजद के आरोप पत्र के मुताबिक बिहार में नीतीश शासन काल में दो लाख 40 हजार शिक्षकों की बहालियां फर्जी डिग्रियों के आधार पर हुई हैं।श्री तिवारी ने कहा कि यदि लालू प्रसाद की चली तो इन शिक्षकों को वे बर्खास्त कर देंगे।’ ऐसा कह कर श्री तिवारी ने जोरदार तीर चलाया है।सन् 2010 तक कुल मिलाकर नीतीश सरकार करीब 5 लाख बेरोजगारों को नौकरियां देने की योजना बना रही है। श्री तिवारी के बयान से यह लगता है कि अगले विधान सभा चुनाव में एन।डी.ए.की ओर से मतदाताओं से यही कहा जाएगा कि राजद यदि फिर से सत्ता में आएगा तो वह इन पांंच लाख लोगों को फिर से बेरोजगार बना देगा।

पूर्वोत्तर के पीडि़त हिंदी भाषी
महाराष्ट्र के हिंदीभाषियों की पीड़ा को लेकर बिहार के नेताओं ने तो एकजुटता दिखाई,पर लगता है कि इसी देश के पूर्वोत्तर राज्यों के हिंदीभाषियों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। भाजपा नेता हरेंद्र प्रताप हाल में पूर्वोत्तर के प्रवास पर थे।उन्होंने बताया कि वहां हर रोज चार- पांच हिंदी भाषी मारे जा रहे हैं।वे इसलिए मारे जा रहे हैं क्योंकि वे हिंदी भाषी हैं।असम सरकार ऐसी घटनाओं में मृतकों को तीन लाख रुपए सरकारी मुआवजा देती है।पर हिंदी भाषी मृतकों के परिजनों को वह भी मुआवजा नहीं मिल रहा है। पूर्वोंत्तर के हिंदीभाषियों की हत्याओं में कई मामलों में उन लोगों का हाथ रहता है जो बंगला देशी घुसपैठिए हैं।क्या बिहार के तथाकथित सेक्युलर नेता उन हिंदीभाषियों की सुध इसलिए नहीं ले रहे हैं,क्योंकि इससे उनके खास वोट बैंक के नाराज होने का खतरा है ?

संपादक नीतीश
कई साल पहले की बात है।एक विवाह समारोह में पटना के चर्चित पत्रकार, मंच से सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश कर रहे थे।श्रोताओं में विधान परिषद तत्कालीन सभापति प्रो।जाबिर हुसेन भी थे।जाबिर साहब ने टिप्पणी की कि इस पत्रकार महोदय की यदि नौकरी छूट भी जाए तो भी इन्हें रोजी-रोटी की तकलीफ नहीं होगी। अब इसी तरह की बात मुख्य मंत्री नीतीश कुमार के बारे में भी कही जा सकती है।यदि नीतीश कुमार कभी राजनीति से उब जाएं तो वे एक सफल संपादक बन सकते हैं।अपनी सरकार के तीन साल पूरा होने से पहले ही जब उपलब्धियों के दस्तावेज इकट्ठे किए जा रहे थे तो यह खबर आई थी कि रिपोर्ट कार्ड का संपादन खुद नीतीश कुमार कर रहे हैं।रिपोर्ट कार्ड जब छप कर आ गया तो पता चला कि नीतीश कुमार एक अच्छे संपादक भी हैं। 48 पेज के रिपोर्ट कार्ड के विभिन्न पन्नों के ले आउट और छपाई मनोहारी हैं।फोटोग्राफ का प्रस्तुतीकरण शालीन और ग्राफ आसानी से समझ में आ जाने वाले हैं। मध्य प्रदेश में अस्सी के दशक में जब अर्जुन सिंह मुख्य मंत्री और अशोक वाजपेयी संस्कृति सचिव थे तो उस राज्य के सरकारी प्रकाशन भी ऐसे ही शालीन,सूचनाप्रद और मनोहारी हुआ करते थे।

भगत सिंह बनाम कायर
अमर शहीद सरदार भगत सिंह और आज के उन अन्य लोगों मंे कितना फर्क है जो आज के भगत सिंह बनना चाहते हैं ?बहुत फर्क है।भगत सिंह ने संेट्रल एसेम्बली में बम फेंका तो उन्होंने स्वीकार भी किया कि उन्होंने ऐसा किया। वे कायर नहीं थे।उन्होंने इस तरह का अन्य काम भी किया तो उसे स्वीकार किया। ंवे इसका कानूनी नतीजा भी भुगतने के लिए तैयार रहे।क्योंकि वे बहादुर थे।परिणाम स्वरूप उन्हें अमर शहीद का दर्जा मिला। पर आज तथाकथित शहीद बनने वाले कायर लोग क्या कर रहे हैं ? तरह- तरह की धार्मिक आस्थाओं व अनास्थाओं के नाम पर वे भारी हिंसा तो कर रहे हैं। वे छिप कर निर्दोष लोगों की जान तो ले रहे हैं,पर पकड़े जाने पर खुद को निर्दोष बता कर साफ रिहा हो जाने और अपनी जान बचा लेने का बहाना भी कर रहे हैं।दरअसल वे क्रांतिकारी नहीं बल्कि कायर हैं।उनके राजनीतिक मददगार तो और भी घटिया जीव हैं।

मौत का सौदागर कौन ?
एक नेता ने कुछ माह पहले नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा था। तब सोहराबुद्दीन नामक एक अभियुक्त की कथित पुलिस मुंठभेड़ में मौत हो गई थी।सोहराबुद्दीन, अब्दुल लतीफ का ड्रायवर था।लतीफ कभी गुजरात का अंडर वल्र्ड किंग था और वह दाउद इब्राहिम का गुजरात में बिजनेस मैनेजर था। लतीफ 1997 में गुजरात पुलिस की गिरफ्त से भागने की कथित कोशिश में पुलिस की गोली से मारा था।दाउद और लतीफ के हथियारों का जखीरा सहराबुदद्ीन ने उज्जैन के पास अपने गांव के कुएं में छिपा दिया था। कुएं से मिले हथियारों का यह जखीरा 1993 में मुम्बई बम ब्लास्ट के पहले विदेश से भारी मात्रा में लाए गए कुल हथियारों का एक छोटा हिस्सा था।सोहराबुद्दीन की कथित फर्जी मुंठभेड़ में कथित हत्या के खिलाफ मशहूर गीतकार जावेद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है।यह अकारण नहीं है कि उनकी अभिनेत्री पत्नी शबाना आजमी यह आरोप लगाती हैं कि मुम्बई में उन्हें मकान नहीं मिलता। अब जरा लतीफ और सहराबुद्दीन की कथित पुलिस मुंठभेड़ ‘हत्याओं’ की तुलना कर लें।इससे इस देश के नेताओं की ढांेगी धर्मनिरपेक्षता और आतंकवाद के प्रति उनके रवैए का पता चल जाएगा। लतीफ जब मारा गया था तब गुजरात में राष्ट्रीय जनता पार्टी के दिलीप पारीख मुख्य मंत्री थे और वह सरकार कांग्रेस के समर्थन से चल रही थी।तब की गुजरात सरकार,सत्ताधारी राजपा और कांग्रेसी नेताओं ने लतीफ की मौत को गुजरात पुलिस की भारी उपलब्धि माना था। तब के अखबारों मेंे उनके बयान सबूत के रूप में मौजूद हैं। संभव है कि इसके लिए तब संबंधित पुलिस अफसरों को सरकार ने इनाम भी दिया हो।पर जब सहाराबुद्दीन की मौत हुई तो गुजरात की सरकार नरेंद्र मोदी के हाथों में आ चुकी थी।सहराबुद्दीन की मौत पर कांगे्रस के शीर्ष नेताओं ने गुजरात सरकार व मोदी को मौत का सौदागर कहा।इस कांड में कई आई।पी.एस.अफसर जेल भिजवा दिए गए।वे मुकदमा झेल रहे हैं।धर्मनिरपेक्षता के झंडावरदार जावेद साहब अदालत तक पहुंच गए।अच्छा होता यदि इस देश के किसी राष्ट्रभक्त हिंदू या मुसलमान के साथ हुए पुलिस जुल्म पर जावेद कोर्ट जाते।

तिवारी प्रकरण एक चेतावनी
एन.डी. तिवारी-उज्वला प्रकरण वैसे नेताओं के लिए एक चेतावनी है जो ‘ बिन फेरे हम तेरे ’ फार्मूला में विश्वास रखते हैं। याद रहे कि उज्ज्वला सिंह के पुत्र रोहित शेखर ने यह दावा किया है कि आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एन.डी.तिवारी ही उनके पिता हैं। यदि यह दावा सही है तो यह तिवारी जी के प्रति उज्ज्वला का विश्वासघात ही माना जाएगा।क्योंकि उन्होंने तिवारी जी से शादी तो नहीं की थी।यूं ही सह जीवन के लिए तैयार हो गई हांेगी। यदि शादी की भी होंगी तो उसकी सूचना आम लोगों को नहीं थी।देश भर से छन -छन कर अक्सर यह खबर आती रहती है कि कई मशहूर नेता ‘बिन फेरे हम तेरे’ बने हुए हैं। क्या तिवारी प्रकरण ऐसे दिलफेंक नेताओं को यह सीख दे पाएगा कि उज्ज्वलाओं पर अब विश्वास करने में नुकसान है।आर्थिक भी और राजनीतिक भी।
तापमान (दिसंबर, 2008)