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सोमवार, 1 जून 2020

1975 के जून में हुई थी देश को झकझोरने वाली कई घटनाएं




सुरेंद्र किशोर
सन् 1975 के जून में देश को झकझोरने वाली एक साथ एक से अधिक घटनाएं हुईं। उतनी बड़ी राजनीतिक घटनाएं कभी किसी एक महीने में इस देश में शायद ही उससे पहले हुई। 

सबसे प्रमुख राजनीतिक घटना 25 और 26 जून के बीच की रात में हुई । उस रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। एक लाख से अधिक राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं तथा अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। उस महीने की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का लोकसभा का चुनाव अदालत ने खारिज कर दिया। किसी प्रधानमंत्री का चुनाव पहली बार खारिज हुआ।आपातकाल उस अदालती निर्णय का परिणाम बताया गया।

उसी महीने गुजरात विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी हार गयी। 12 जून को एक साथ तीन खबरें आईं। तीनों खबरें प्रधानमंत्री के लिए बुरी थीं। राजदूत डी.पी. धर का निधन, गुजरात में कांग्रेस की हार और इलाहाबाद हाईकोर्ट का प्रतिकूल निर्णय। दिवंगत धर इंदिरा जी के विश्वासपात्र  थे।

चुनाव कराने की मांग पर जोर डालने के लिए उससे पहले 1975 के अप्रैल में मोरारजी देसाई ने नई दिल्ली में अनशन किया था। उनकी मांग प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मान ली और चुनाव करा दिया गया। याद रहे कि गुजरात में एक साल से चुनाव टाला जा रहा था। वहां राष्ट्रपति शासन था। 9 फरवरी, 1974 तक चिमन भाई पटेल मुख्य थे। चुनाव के बाद जनता मोर्चा के नेता बाबू भाई पटेल मुख्यमंत्री बने।

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने जब इंदिरा गांधी का चुनाव खारिज कर दिया तो एक बड़े वकील ने टिप्पणी की कि इंदिरा गांधी पर ट्रैफिक रूल्स के उलंघन जैसा कसूर था।

इस निर्णय पर देश में राजनीतिक तहलका मच गया।

याद रहे कि 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में सोशलिस्ट नेता राज नारायण को हराया था। हाईकोर्ट ने चुनाव रद करने के दो कारण बताए थे। एक तो इंदिरा जी की चुनावी सभा के मंच का निर्माण सरकारी साधनों से किया गया था। दूसरा कारण गजटेड अफसर यशपाल कपूर को लेकर बना। अदालत के अनुसार इंदिरा गांधी ने चुनाव में यशपाल कपूर की मदद ली थी। यह साबित हो गया था।

उस निर्णय के बाद प्रधानमंत्री के पक्ष में देश में जहां—तहां नारे लगने लगे, नुक्कड़ सभाएं होने लगीं। उधर जय प्रकाश नारायण तथा प्रतिपक्षी दलों ने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग शुरू कर दी। 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में इस सवाल पर जयप्रकाश नारायण की बड़ी सभा हुई। इस बीच इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सबसे बड़ी अदालत ने हाईकोर्ट के निर्णय को स्टे कर दिया, पर इंदिरा जी को लोकसभा के किसी मत विभाजन में भाग लेने से रोक दिया। यह प्रधानमंत्री के लिए यह अपमानजनक स्थिति थी।

उन्होंने 25 और 26 जून के बीच की रात में देश में आपातकाल घोषित कर देने की राष्ट्रपति से सिफारिश कर दी और राष्ट्रपति ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी। साथ ही जयप्रकाश नारायण सहित देश के करीब एक लाख से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में राजनीतिक कर्मियों की गिरफ्तारी की वह आजाद भारत की पहली घटना थी।

आपातकाल लगाने के बाद प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संदेश में प्रतिपक्षी दलों के बारे में कहा कि ‘......बहुत दिनों से इन घटनाओं को हम अत्यधिक धैर्य से देखते रहे। अब हमें इनके नये कार्यक्रमों का पता चला है जिनसे सारे देश में सामान्य कार्य में बाधा डालने के उद्देय से कानून व व्यवस्था को चुनौती दी गयी है। क्या कोई भी सरकार जो सरकार है, देश के स्थायित्व को ऐसे खतरे में पड़ने दे सकती है? कुछ लोग हमारे सशस्त्र सैनिकों व पुलिस को विद्रोह के लिए उकसाने लगे हैं।’

आपातकाल के साथ प्रेस पर कठोर सेंसरशीप लगा दी गयी। प्रतिपक्ष की राजनीतिक गतिविधियां पूरी तरह ठप हो गयीं। आजाद भारत के लिए यह एक अजूबी घटना थी। किसी नेता के अनशन के दबाव पर किसी विधानसभा का चुनाव हो, वैसी अनूठी घटना भी जून 1975 में गुजरात में  हुई थी।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

कांग्रेस सरकार बनाम रामनाथ गोयनका वाला ‘इंडियन एक्सप्रेस’

भूली-बिसरी याद


इंडियन एक्सप्रेस अखबार समूह के मालिक रामनाथ गोयनका का दो -दो बार कांग्रेस सरकारों से भीषण संघर्ष हुआ था। किसी अन्य मीडिया समूह से केंद्र सरकार की शायद ही कभी वैसी भिड़त हुई होगी! पहली बार इंदिरा गांधी सरकार से और दूसरी बार राजीव गांधी सरकार से।

इन भिड़ंतों के परिणामस्वरूप गोयनका व एक्सप्रेस समूह पर शासन ने समय -समय पर अनगिनत मुकदमे लादे। विकली के संपादक प्रीतीश नंदी से लंबी बातचीत में आर.एन.जी. यानी रामनाथ गोयनका ने एक बार कहा था कि आई.पी.सी. में जितनी धाराएं हैं, उन सबके तहत हम पर मुकदमे हो चुके हैं।

आर.एन.जी.स्वतंत्रता सेनानी भी थे। संविधान सभा के सदस्य थे। दो बार लोकसभा के लिए भी चुने गए थे। गोयनका जी जयप्रकाश नारायण के मित्र थे। उन्होंने जेपी आंदोलन का समर्थन किया था। आपातकाल में इंदिरा सरकार ने एक्सप्रेस समूह के निदेशक मंडल को भंग करके उसके प्रधान पद पर एक दूसरे अखबार समूह के मालिक को बैठवा दिया था।

एक दिन गुस्से में लाल रामनाथ गोयनका तत्कालीन सूचना व प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल के आफिस में गए। उन्हें इतनी कड़ी बातें कह कर आ गए जितनी कड़ी बातें किसी अखबार मालिक ने कभी किसी केंद्रीय मंत्री को सामान्य दिनों में भी नहीं कही होगी, वह तो आपातकाल था।

स्वतंत्र चेता लोगों के लिए आपातकाल में भय-आतंक का ऐसा माहौल सरकार ने बना रखा था जैसा अंग्रेजों के राज में भी नहीं था। जानकारों के अनुसार गोयनका जी लौटते समय सोच रहे थे कि पहुंचने के साथ ही मैं गिरफ्तार कर लिया जाऊंगा। पर उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई।

गोयनका जी को बाद में महसूस हुआ कि उसका कारण क्या था। फिरोज गांधी कभी एक्सप्रेस के प्रबंधक निदेशक थे। गोयनका के पास के उस परिवार से संबंधित कुछ सनसनीखेज दस्तावेज थे।
गिरफ्तारी के बाद उनके लीक हो जाने का भय था।



गोयनका जी की सरकार से दूसरी भिड़ंत राजीव गांधी के शासनकाल में हुई। राजीव के शासन काल के प्रारंभिक दिनों में तो गोयनका राजीव से खुश थे। तब तक राजीव की छवि ‘मिस्टर क्लीन’ की थी। संभवतः इसीलिए राजीव से दोस्त सुमन दूबे को एक्सप्रेस का संपादक बना दिया गया था।

पर जब बोफोर्स तथा एक पर एक अन्य घोटालों के दलदल में राजीव सरकार फंसती चली गई  तो एक्सप्रेस समूह से सरकार का टकराव हो गया। नतीजतन एक्सप्रेस समूह परिसर में छापामारी के लिए सरकारी एजेंसियों को लगा दिया गया।

नई दिल्ली स्थित एक्सप्रेस बिल्डिंग के एक हिस्से को ध्वस्त करने का उप राज्यपाल जगमोहन ने आदेश जारी कर दिया। पर अंततः सुप्रीम कोर्ट में गोयनका की जीत हुई।

इस बीच गोयनका के एक्सप्रेस समूह पर एकतरफा पत्रकारिता का आरोप लगता रहा। पर अंततः दोनों मामलों में यह बात साबित हुई कि गोयनका व एक्सप्रेस सही थे। सही बातें कहने के सिलसिले में कोई एकतरफा भी नजर आता है तो इस देश की अधिकतर जनता उसे पसंद करती है। किया भी।

इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए लोस चुनाव में न सिर्फ इंदिरा सरकार सत्ता से बाहर हो गई, बल्कि खुद इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी लोकसभा की अपनी सीटें भी हार गए।

अस्सी के दशक के बोफोर्स आदि विवाद के बाद राजीव गांधी की कांग्रेस पार्टी की ऐसी हार हुई कि उसके बाद कांग्रंस को कभी लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका।


  ---सुरेंद्र किशोर-28 अप्रैल 2020     

  

बुधवार, 30 जनवरी 2019

जॉर्ज फर्नांडिस : जान हथेली पर लेकर इमरजेंसी का मुकाबला किया था


इमरजेंसी में ‘न्यूजविक’ ने भारत पर एक स्टोरी की थी। उस स्टोरी के साथ जयप्रकाश नारायण और जॉर्ज फर्नांडिस की तस्वीरें थीं। पत्रिका के अनुसार भारत में दो तरह से आपातकाल के खिलाफ संघर्ष हो रहा है। जेपी का अहिंसक तरीका है और जॉर्ज फर्नांडिस का डाइनामाइटी।

शब्द भले डायनामाइटी न था, पर आशय गैर अहिंसक होने का था। जेपी, जॉर्ज के तरीके से असहमत थे। आपातकाल में जॉर्ज और उनके साथियों पर बड़ौदा डायनामाइट षड्यंत्र केस चला।
जेल में उन्हें व उनके साथियों को यातनाएं दी गयी थीं। मुकदमा तब उठा जब 1977 में मोरारजी की सरकार बनी।

25 जून, 1975 को जब देश में आपातकाल लगा तो उस समय जॉर्ज फर्नांडीस ओडिशा में थे। अपनी पोशाक बदलकर 5 जुलाई को जॉर्ज पटना आये और तत्कालीन समाजवादी विधान पार्षद रेवतीकांत सिन्हा के पटना के आर. ब्लॉक स्थित सरकारी आवास में टिके।


इन पंक्तियों का लेखक भी उनसे मिला जो उन दिनों जॉर्ज द्वारा संपादित चर्चित साप्ताहिक पत्रिका 
‘प्रतिपक्ष’ का बिहार संवाददाता था। जॉर्ज दो—तीन दिन पटना रहकर इलाहाबाद चले गये।

बाद में उन्होंने मध्य प्रदेश के प्रमुख समाजवादी नेता लाड़ली मोहन निगम को इस संदेश के साथ पटना भेजा कि वे मुझे और शिवानंद तिवारी को जल्द विमान से बंगलुरू लेकर आयें। शिवानंद जी तो उपलब्ध नहीं हुए। पर मैं निगम जी के साथ मुम्बई होते हुए बंगलुरू पहुंचा। वहां जॉर्ज के साथ तय योजना के अनुसार रामबहादुर सिंह, शिवानंद तिवारी, विनोदानंद सिंह, राम अवधेश सिंह और डॉ. विनयन को लेकर मुझे कोलकाता पहुंचना था।

पटना लौटने पर मैंने उपर्युक्त नेताओं की तलाश की। पर इनमें से कुछ जेल जा चुके थे या फिर गहरे भूमिगत हो चुके थे। सिर्फ डॉ. विनयन उपलब्ध थे। उनके साथ मैं धनबाद गया।

याद रहे कि आपातकाल में कांग्रेस विरोधी राजनीतिक नेताओं-कार्यकर्ताओं पर सरकार भारी आतंक ढा रही थी। राजनीतिककर्मियों के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना तक कठिन था।भूमिगत जीवन जेल जीवन की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद था।

धनबाद में समाजवादी लाल साहेब सिंह से पता चला कि राम अवधेश तो कोलकाता में ही हैं तो फिर हम कोलकाता गये। वहां जॉर्ज से हमारी मुलाकात हुई। पर वह मुलाकात सनसनीखेज थी।

जॉर्ज ने दक्षिण भारत के ही एक गैरराजनीतिक व्यक्ति का पता दिया था। उस व्यक्ति का नाम तीन अक्षरों का था। जॉर्ज ने कहा था कि इन तीन अक्षरों को कागज के तीन टुकड़ों पर अलग -अलग लिखकर तीन पाॅकेट में रख लीजिए ताकि गिरफ्तार होने की स्थिति में पुलिस को यह पता नहीं चल सके कि किससे मिलने कहां जा रहे हो। यही किया गया। पार्क स्ट्रीट के एक बंगले में मुलाकात हुई। दक्षिण भारतीय सज्जन ने कह दिया था कि बंगले के मालिक के कमरे में जब भी बैठिए, उनसे हिन्दी में बात नहीं कीजिए। अन्यथा उन्हें शक हो जाएगा कि आप मेरे अतिथि हैं भी या नहीं।


मनमोहन रेड्डी नामक उस दक्षिण भारतीय सज्जन ने हमें जॉर्ज से मुलाकात करा दी। हम एक बड़े चर्च के अहाते में गये। जॉर्ज उस समय पादरी की पोशाक में थे। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। चश्मा बदला हुआ था और हाथ में एक विदेशी लेखक की मोटी अंग्रेजी किताब थी। जॉर्ज,  विनयन और मुझसे देर तक बातचीत करते रहे। फिर हम राम अवधेश की तलाश में उल्टा डांगा मुहल्ले की ओर चल दिये। वहीं की एक झोपड़ी में हम टिके भी थे। फुटपाथ पर स्थित नल पर नहाते थे और बगल की जलेबी-चाय दुकान में खाते-पीते थे।

उल्टा डांगा का वह पूरा इलाका बिहार के लोगों से भरा हुआ था। जॉर्ज के साथ टैक्सी में हमलोग वहां पहुंचे थे। मैंने जॉर्ज को उस चाय की दुकान पर ही छोड़ दिया और राम अवधेश की तलाश में उस झोपड़ी की ओर बढ़े। पर पता चला कि राम अवधेश जी भूमिगत कर्पूरी ठाकुर के साथ कोलकाता में ही कहीं और हैं।

चाय की दुकान पर बैठे जॉर्ज ने इस बीच चाय पी थी। जब हम लौटे और जॉर्ज चाय का पैसा देने लगे तो दुकानदार उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। उसने कहा, ‘हुजूर हम आपसे पैसा नहीं लेंगे।’ इस पर जॉर्ज थोड़ा घबरा गये। उन्हें लग गया कि वे पहचान लिये गये। अब गिरफ्तारी में देर नहीं होगी। जॉर्ज को परेशान देखकर मैं भी पहले तो घबराया, पर मुझे बात समझने में देर नहीं लगी। मैंने कहा कि जॉर्ज साहब, चलिए मैं इन्हें बाद में पैसे दे दूंगा। मैं यहीं टिका हुआ हूं।

फिर अत्यंत तेजी से हम टैक्सी की ओर बढ़े जो दूर हमारा इंतजार कर रही थी। फिर हमें बीच कहीं छोड़ते हुए अगली मुलाकात का वादा करके जॉर्ज कहीं और चले गये।

आपातकाल में जॉर्ज और उनके साथियों पर बड़ौदा डायनामाइट षडयंत्र केस को लेकर मुकदमा चला। सी.बी.आई. का आरोप था कि पटना में जुलाई 1975 मेें जॉर्ज फर्नाडीस, रेवतीकांत सिंह, महेंद्र नारायण वाजपेयी और इन पंक्तियों के लेखक यानी चार लोगों ने मिलकर एक राष्ट्रद्रोही षड्यंत्र किया। षड्यंत्र यह रचा गया कि डायनामाइट से देश के महत्वपूर्ण संस्थानों को उड़ा देना है और देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर देनी है।

सन 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनने पर यह केस उठा लिया गया।  

@--फस्र्टपोस्टहिन्दी-29 जनवरी 2019@



      

शनिवार, 1 दिसंबर 2018

असली इमरजेंसी और ‘अघोषित इमरजेंसी’ का फर्क

नरेंद्र मोदी विरोधी राजनीतिक व गैर राजनीतिक लोग लगातार कह रहे हैं कि इन दिनों इस देश में ‘अघोषित इमरजेंसी’ है। मैं पहले बता दूं कि लगभग सारी सरकारें कुछ अच्छे काम करती हैं तो कुछ गलतियां भी करती हैं। मनमोहन और मोदी सरकारें भी अपवाद नहीं हैं।

पर चुनाव के समय अधिकतर जनता यदि इस नतीजे पर पहुंचती है कि मौजूदा सरकार के अधिकतर काम गलत ही हैं तो उसे चुनाव में हरा देती है। इससे उलट भी होता है। आम तौर पर यही होता रहा है। 2019 में मोदी सरकार के साथ भी यही लोकतांत्रिक सलूक होगा।

पर इस बीच ‘अघोषित इमरजेंसी’ की चर्चा खूब हो रही है। इससे हमारे जैसे लोगों को बड़ी पीड़ा होती है जिन्होंने इमरजेंसी देखी और झेली है। अब जरा असली इमरजेंसी को याद कर लें। जस्टिस खन्ना के एक सवाल के जवाब में 15 दिसंबर 1975 को एटॉर्नी जनरल नीरेन डे ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि आज यदि शासन गैर कानूनी तरीके से किसी की जान भी ले ले तो उस अपराध के खिलाफ अदालत की शरण लेने की सुविधा हासिल नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश ए.एन. राय की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय पीठ ने बहुमत से नीरेन डे की बात को सही माना। सिर्फ जस्टिस खन्ना ने अपनी असहमति प्रकट की। इसे कहते हैं असली इमरजेंसी। उससे पहले इंदिरा सरकार ने कई जजों की वरीयता को दरकिनार करके ए.एन. राय को मुख्य न्यायाधीश बनाया था।

क्या आज ऐसा कोई जजमेंट संभव है? आज के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका देख लीजिए।

दूसरी ओर आज तो ‘अघोषित इमरजेंसी’ में हालत यह है कि  एक खबर के अनुसार हाईकोर्ट ने पी. चिदम्बरम को गिरफ्तारी से सातवीं बार बचा लिया जबकि उनपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। संभव है कि यह  विश्व रिकॉर्ड हो।

इतना ही नहीं, कोल ब्लॉक आवंटन मामले में पूर्व कोयला  सचिव एच.सी. गुप्त को तो सजा मिलती जा रही है, पर उनसे कोई सवाल नहीं पूछा जा रहा है जिन्होंने भावी आवंटियों के नाम की पर्चियां भेजीं और जिन्होंने आवंटन का आदेश दिया।

मंगलवार, 26 जून 2018

इमरजेंसी 1975 : दिल्ली के बड़े अफसरों की रिपोर्ट— हालात खराब थे ऐसी कभी बात तक नहीं हुई ...

मोरारजी देसाई सरकार ने आपातकाल में हुई ज्यादतियों की जांच के लिए शाह आयोग का गठन किया था। 25 और 26 जून 1975 के बीच की रात में घोषित आपातकाल को लेकर शाह आयोग की रपट में दर्ज कुछ पंक्तियां यहां उधृत की जा रही हैं।

  ‘प्रधानमंत्री के सचिव श्री पी.एन.धर ने अपने बयान में बताया कि उन्हें 25 जून 1975 को 11.30 बजे रात प्रधानमंत्री निवास बुलाए जाने पर ही इस बारे में पता चला, जब उन्हें आकाशवाणी पर प्रधानमंत्री द्वारा दिए जाने वाले भाषण का मसौदा पढ़ने को दिया गया।’


  कैबिनेट सेक्रेटरी श्री बी.डी. पांडेय को 26 जून को सुबह 4.30 बजे प्रधानमंत्री निवास से फोन मिला और कहा गया कि उस दिन सुबह 6 बजे मंत्रिमंडल की बैठक होनी है। आपात स्थिति की घोषणा के बारे में सबसे पहले उन्हें सूचना उसी सुबह मिली। वे आश्चर्यचकित थे कि किसने और कैसे 25 और 26 जून के बीच की रात को इतनी संख्या में गिरफ्तारियां कराईं।


सामान्यतः इतनी जल्दी कार्रवाई के लिए निदेश गृह मंत्रालय के जरिए भेजे जाते हैं जिनके पास संचार की अपनी व्यवस्था होती है।’


‘बी.डी. पांडेय के अनुसार 26 जून के पहले किसी भी मंत्रिमंडल की बैठक में आपात स्थिति की घोषणा की आवश्यकता या देश में ऐसी किसी परिस्थिति के बारे में, जिसमें ऐसी घोषणा आवश्यक हो, कोई बात नहीं हुई थी।’


आसूचना ब्यूरो के निदेशक श्री आत्मा जयराम ने कहा कि 26 जून को कार्यालय जाने के बाद उन्हें आपातस्थिति की घोषणा के बारे में पता चला।’


श्री एस.एल. खुराना, जो भारत सरकार के गृह सचिव थे, 26 जून की सुबह मंत्रिमंडल की बैठक के बाद ही इसके बारे में जान पाए, जिसके लिए उन्हें सूचना 6 बजे ही मिली थी। तदनुसार, वे मंत्रिमंडल की बैठक में सुबह 6.30 बजे ही आ पाए जबकि बैठक खत्म हो चुकी थी।

शुक्रवार, 30 जून 2017

इमरजेंसी के बहाने नागार्जुन के बारे में कुछ खट्टी-मीठी बातें

एक व्यक्ति ने एक जगह हाल में लिखा कि नागार्जुन ने ‘इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आपको’ वाली चर्चित कविता इमरजेंसी में ही लिखी थी। शायद वह यह कहना चाहते थे कि इमरजेंसी में भी प्रधानमंत्री की आलोचना करने की छूट थी।

इमरजेंसी और नागार्जुन को इतना कम जानने वाले लोग भी इस बार आपातकाल पर हुई चर्चाओं में शामिल हो गए।


याद रहे कि 25 जून 1975 की रात में इस देश में इमरजेंसी लगी थी। 25 जून को हर साल इमरजेंसी पर कुछ चर्चाएं होती हैं। कुछ लेख अखबारों में छपते हैं। संयोग से 30 जून बाबा नागार्जुन का जन्मदिन भी है। पर इस बीच के दशकों में इमरजेंसी लगाने वाली पार्टी और इमरजेंसी भुगतने वाले दल सत्ता के लिए आपस में मिलते-बिछुड़ते रहे। इसलिए नयी पीढि़यां इमरजेंसी के असली स्वरूप से पूरी तरह अवगत नहीं हो सकी। उनमें से अधिकतर लोगों के पास इस संबंध में जानकारी अधकचरी है या एकतरफा है। दरअसल उन्हें बताने वालों की ही कमी पड़ गयी।


अब नागार्जुन की उस चर्चित कविता के बारे में कुछ बातें।

नागार्जुन की कविता की कुछ पंक्तियां यूं हैं --
इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको ?
सत्ता की मस्ती में भूल गयीं बाप को !
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को।

इमरजेंसी में पुलिस किसी को ऐसी कविता गुनगुनाते हुए भी देख लेती तो उसकी जगह जेल होती। दरअसल यह कविता इमरजेंसी से पहली लिखी गयी थी। जेपी आंदोलन के दौरान की जनसभाओं और नुक्कड़ सभाओं में बाबा इस कविता का भी अक्सर पाठ करते थे। बल्कि यह कविता इमरजेंसी से पहले ही पटना के एक दैनिक अखबार में छप भी चुकी थी। 




फर्नांडिस ने किया था कविता पर मीठा एतराज़

1974 के जेपी आंदोलन के दौरान वैशाली जिले के महनार मेंं जनसभा हो रही थी। मुख्य वक्ता जार्ज फर्नांडिस थे। ऐसी सभाओं के लिए नागार्जुन की तब बड़ी मांग थी। स्वाभाविक था कि वहां बाबा भी थे। एक रिपोर्टर के रूप में मैं भी था।

पहले बाबा ने मंच से अपनी यह मशहूर कविता पढ़ी। खूब तालियां बजीं। पर जब बोलने के लिए जार्ज खड़े हुए तो बाबा की इस कविता से ही अपनी बात शुरू की। जार्ज ने कहा कि ‘इंदु जी इंदु क्या हुआ आपको और भूल गयीं बाप को’, यह लाइन सही नहीं है। दरअसल इनके बाप भी ऐसे ही थे। हालांकि श्रोताओं में जार्ज की इस बात की ग्राह्यता उतनी नहीं थी जितनी बाबा की उस कविता की। खैर यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि बाबा जेपी आंदोलन में थे। जेपी उनका बड़ा ख्याल रखते थे।


उस दौरान बाबा जेल भी गए। आंदोलन पर पुलिस दमन के विरोध स्वरूप बाबा ने  बिहार सरकार से मिल रही मासिक पेंशन को भी लेने से मना कर दिया था। हालांकि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। पेंशन मना करने वालों में रेणु भी थे। 4 नवंबर 1974 को जब पटना में जेपी पर पुलिस ने लाठी चलाई तो उसके विरोध में फणीश्वरनाथ रेणु ने तो पद्मश्री लौटा दी थी।


खैर बाबा का बाद के दिनों में जेपी आंदोलन से मन उचट गया था। दरअसल आंदोलन में शामिल कुछ अनुशासनहीन छात्रों से बाबा अधिक दुःखी थे। ऐसे उदंड आंदोलनकारियों से बाबा का बक्सर जेल में पाला पड़ गय़ा था। कुछ अन्य बातें भी रही होंगी।


बाद में उन्होंने आंदोलन से अलग होकर उस जेपी आंदोलन के खिलाफ भी एक जोरदार कविता लिख दी थी। जेपी आंदोलन में शामिल कुछ लोगों ने बाद के दशकों में जैसे-जैसे गुल खिलाए, उनपर बाबा की वह कविता सटीक बैठती है।


हालांकि सारे आंदोलनकारी वैसे ही नहीं साबित हुए।




जरा ढंग से हो पैथ लैब की जांच

एक अच्छी खबर है। पटना हाईकोर्ट के आदेश पर राज्य सरकार पैथ लैब की जांच कर रही है। कई फर्जी पाए गए। फर्जी लैब और फर्जी पैथोलाॅजिकल जांच से अनेक मरीजों का बड़ा नुकसान हो जाता है। कई मामलों में ऐसा नुकसान जिसकी कभी भरपाई नहीं हो पाती।

सवाल है यह कि जांच सिर्फ पंजीयन और तकनीकी स्टाफ की मौजूदगी की ही हो रही है या पैथोलाॅजिकल जांच की गुणवत्ता की भी जांच हो रही है ?


एक सलाह है। जो लोग इस जांच के काम में लगे हैं, वे नमूना के तौर पर एक व्यक्ति के खून के तीन नमूनों की जांच तीन लेबोरेटरी में करवा कर देखें। यदि जांच रिजल्ट समान आता है तो खुशी की बात है। यदि नहीं तो सरकार उस मर्ज का भी स्थायी इलाज करे। तभी मरीजों का पूरा कल्याण हो पाएगा।




पैरवीकारों के प्रकाशित हों नाम 

जो व्यक्ति सरकारी जमीन बेचने के आरोप में पहले ही जेल जा चुका हो, उसकी पटना में डी.सी.एल.आर के पद पर तैनाती हैरान करती है। पर जहां जिसके पैरवीकार ताकतवर लोग हों, वहां कुछ भी असंभव नहीं। अभी फरार डी.सी.एल.आर. मिथिलेश कुमार सिंह पर पटना के कंकड़बाग पावर सब स्टेशन की जमीन गैर कानूनी तरीके से बेचने का आरोप है। जाहिर है कि जमीन करोड़ों की है।


इससे पहले के वर्षों में भी मिथिलेश कुमार सिंह पर आरोप लगते रहे। पर उसके बावजूद वह महत्वपूर्ण जगहों पर पोस्टिंग पाते रहे। ऐसा उच्चस्तरीय पैरवी से ही संभव है। ऐसी पैरवी में नेता, बड़े अफसर और रिश्वत कारगर होते हैं। कुछ मामलों में तो तीनों एक साथ। यदि मिथिलेश को इस केस में अंततः अदालत से सजा हो जाती है तो राज्य सरकार को चाहिए कि वह उनके पैरवीकारों के नाम राज्य के मंत्रियों और अफसरों में वितरित करा दे ताकि अब से उनकी जायज पैरवी पर भी कोई मंत्री-अफसर ध्यान नहीं दे। अन्य मामलों में भी ऐसा ही हो। भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए यह कारगर तरीका बन सकता है। 




ऐसे संभव है किन्नरों की मदद

 किन्नरों के सामने भी बेरोजगारी की समस्या है। इनका उपयोग कर्ज और बकाया वसूली के काम में हो सकता है। देश भर में बैंक और नगर निकाय के समक्ष बकाया और टैक्स वसूली की समस्या मुंह बाए खड़ी रहती हैं।

 2006 में पटना नगर निगम ने किन्नरों को वसूली के काम में लगा कर ऐसा प्रयोग किया भी था। उन्हें कमीशन मिलता था। वसूली के काम में कुछ सफलता भी मिली थी। पर पता नहीं, उसे क्यों बंद कर दिया गया!

किन्नर गाना-बजाना करके कुछ ही देर में बकायएदारों के यहां से आसानी से पैसे वसूल लेते हैं। कल्पना कीजिए कि जो बैंकों के कर्ज की किश्तें जान बूझकर नहीं दे रहा है। उसके दरवाजे पर पुलिस की सुरक्षा में रोज दस-पांच किन्नर पहुंच जाएं। वे रोज तीन -चार घंटे उसके घर के सामने अपना कार्यक्रम चलाएं। उनसे कर्ज लौटाने की गुजारिश करे। फिर क्या होगा ? अधिकतर मामलों में तीन चार दिनों में ही पैसे निकलने लगेंगे। 



और अंत में

महागठबंधन के आंतरिक विवाद को लेकर जिस तरह की टिप्पणी की प्रतीक्षा थी, अंततः वह भी आ ही गयी। एक बड़े नेता ने कहा कि कोई मतभेद नहीं है। सब मीडिया की साजिश है। ऐसी टिप्पणी चुनाव के दिनों में अधिक सुनने को मिलती है।


जब कोई पार्टी चुनाव जीतती है, तब तो वह कहती है कि ऐसा हमारे पुण्य प्रताप से हुआ। पर जब हारती है तो कह देती है कि मीडिया ने कुप्रचार करके हरवा दिया। मीडिया के लोगों को ऐसी बातें सुनने की आदत सी पड़ गयी है। 


वैसे अच्छा हुआ कि महागठबंधन का झगड़ा सुलझ गया। उम्मीद है कि उसकी सरकार विकास और सुशासन के काम में नए उत्साह के साथ लग जाएगी।


(प्रभात खबर पटना में 30 जून 2017 को प्रकाशित )