शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

 ‘‘पी.एफ.आई.-केंद्र सरकार मुठभेड’’़ के पक्ष-विपक्ष में 

वस्तुपरक ढंग से बयान दें सेक्युलर राजनीतिक दल

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सुरेंद्र किशोर

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यदि इस देश के सेक्युलर दल अपनी चुनावी खैरियत चाहते हैं तो वे ‘‘केंद्र बनाम पी एफ आई मुठभेड़’’पर सोच -समझकर और वस्तुपरक ढंग से बयान दें।

अन्यथा,उनका वही हाल होगा जो हाल सिमी के पक्ष में बयान देने के कारण कुछ सेक्युलर दलों का हुआ है।

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सलमान खुर्शीद तो सुप्रीम कोर्ट में सिमी के वकील थे।अभी उत्तर प्रदेश विधान सभा में कांगेस के दो विधायक हैं।़

सिमी के लोगों ने पी.एफ.आई. बनाया है।इसका घोषित उद्देश्य सन 2047 तक भारत को हथियारों के बल पर इस्लामिक देश बना देना है।

मैंने मुंठभेड़ इसलिए लिखा क्योंकि इस संघर्ष में न तो मोदी सरकार जल्दी मानने वाली है और न ही पी.एफ.आई.।

यानी, निर्णायक लड़ाई की आशंका है।चाहे उसका जो नतीजा हो।

हालांकि राजसत्ता की अपार ताकत के सामने वह संगठन अधिक दिनों तक टिक नहीं पाएगा।

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अब प्रतिबंधित सिमी के हौसलों की बानगी नीचे पढ़िए।

इसके बावजूद इस देश के अधिकतर सेक्युलर दलों ने कहा था कि सिमी छात्रों का एक निर्दोष संगठन है।   

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9 अप्रैल 2008 के हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार सिमी के नागौरी ने कहा था कि ‘‘हमारा लक्ष्य जेहाद के जरिए भारत में इस्लामिक शासन कायम करने का है।

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टाइम्स आॅफ इंडिया के अनुसार सिमी के अहमदाबाद के जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने कहा था कि ‘‘जब भी हम सत्ता में आएंगे तो हम इस देश के सभी मंदिरों को तोड़ देंगे और वहां मस्जिद बनवाएंगे।’’.......30 सितंबर 2001 

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23 सितंबर 22



रविवार, 18 सितंबर 2022

    प्रशांत किशोर से क्षमा याचना सहित

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      प्रशांत किशोर बिहार में अपना 

      बहुमूल्य समय बर्बाद कर रहे 

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          सुरेंद्र किशोर

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  प्रशांत किशोर बड़ी उम्मीद के साथ बिहार में सक्रिय हैं।

उनकी मेहनत देखकर मैं प्रभावित हूं।

पर, इनकी सक्रियता देख कर मुझे डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी की सक्रियता याद आ रही है।

नब्बे के दशक में डा.स्वामी भी बिहार में सक्रिय हो गए थे।

   उन्होंने मध्य पटना में एक मकान भी खरीद लिया था।

उसमें उनकी पार्टी का आॅफिस था।

डा.स्वामी ने निश्चय किया था कि वे बिहार की तत्कालीन सरकार को उखाड़ फंेकेंगे।

उस राज को पटना हाई कोर्ट ने ‘जंगल राज’ कहा था।

   जब डा.स्वामी अपने काम में सफल नहीं हुए तो वे मकान बेच कर बिहार से चले गए।

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क्यों सफल नहीं हुए ?

क्योंकि उन्हें बिहार की जमीनी राजनीति, समाज नीति और राजनीति तथा समाज के बीच के संबंधों  की कोई खास समझ नहीं थी।

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पर डा.स्वामी को जिस बात की समझ थी,उस काम में वे अधिक तन्मयता से लग गए।उसमें वे सफल भी हुए।

उन्होंने पत्र-पत्र पत्रिकाआंे में विस्फोटक इंटरव्यू दे-देकर और लोकहित याचिकाओं के जरिए जय ललिता तथा देश के कई अन्य राजनीतिक हस्तियों को उनकी औकात बता दी।

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इधर प्रशांत किशोर के जो विचार सामने आते रहे हैं,उससे मुझे यह लगता है कि बिहार के बारे में प्रशांत की समझदारी का स्तर भी डा.स्वामी जैसा ही है।

इसलिए मेरी समझ के अनुसार प्रशांत किशोर बिहार में अपना बहुमूल्य समय खराब कर रहे हैं।

  मुझसे पूछेंगे तो मैं उन्हें कहूंगा कि यदि आपको बिहार में ही रहना है तो किसी न किसी संगठित दल में शामिल होकर उसमें अनुशासित ढंग से रहिए और काम करिए।अपनी ‘बारी’ का इंतजार करिए।

अन्यथा, आप डा.स्वामी का मार्ग अपना कर जीवन को सार्थक बनाएं।देश में भ्रष्टाचार अज सबसे बड़ी समस्या है।अन्य राष्ट्रीय समस्याओं से लड़ने में भी भ्रष्टाचार बाधक बन रहा है।

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उनकी तमाम उछल -कूद के बावजूद मैं डा.स्वामी के जीवन को सार्थक मानता हूं।

उन्होंने न सिर्फ देश के सर्वाधिक भ्रष्ट मुख्य मंत्री को जनहित में बर्बाद कर दिया,बल्कि भ्रष्टों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए अन्य जनहितकारी लोगों को भी एक बहुत बड़ा कानूनी हथियार थमा दिया।

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डा.स्वामी की याचिका पर ही सुप्रीम कोर्ट यह आदेश दे चुका है कि कोई आम नागरिक कोर्ट में याचिका दायर कर किसी बड़ी से बड़ी भ्रष्ट हस्ती के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की 

जांच करवा सकता है।

उसके लिए उसे कोई सरकारी अनुमति नहीं चाहिए।

इस कानूनी सुविधा का इस्तेमाल करके कोई व्यक्ति जनता का हीरो बन सकता है।

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हाल में प्रशांत किशोर के आॅफिस से मुझे फोन आया था। कहा गया कि प्रशांत जी आपसे मिलना चाहते हैं।

मैं अशिष्ट न होते हुए कह दिया कि मैं घर से निकलने की स्थिति में नहीं हूं।

वैसे भी इमरजेंसी छोड़कर मैं घर से नहीं निकलता।

निकलने की अब मुझे कोई जरूरत भी नहीं रही।न कोई ‘इच्छा’ बची है।

मेरा पुस्तकालय -संदर्भालय ही मेरा सबसे बढ़िया दोस्त है।

  दरअसल प्रशांत जी से मैं यदि मिलता तो मुलाकात के बाद उन्हें भी लगता कि उनका समय बर्बाद हुआ।

क्योंकि बिहार के बारे में समझदारी को लेकर हम दोनों ‘‘किशोर’’ दो छोर पर हैं।  

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फेसबुक वाॅल से 

16 सितंबर 22


 


गुरुवार, 8 सितंबर 2022

 कल मेरे यहां तीन-चार रिश्तेदार आए।

उनके साथ घंटों बातचीत हुई।

उस बीच किसी ने 

अपने स्मार्ट फोन का इस्तेमाल नहीं किया।

कई मााह पहले दिन चार अतिथि आए थे।

चारों अपने- अपने स्मार्ट फोन पर शुरू हो गए।

वैसे में मैं क्या करता !

मैं भी फेसबुक पर सक्रिय हो गया था।

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सुरेंद्र किशोर

8 सितंबर 22


सोमवार, 29 अगस्त 2022

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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काले धन की तलाश में केंद्र और बिहार सरकार की सक्रियता से लोगबाग खुश

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शासन में शुचिता के आग्रही लोगों के लिए यह संतोष की बात है। 

वह यह कि बिहार सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक की जांच एजेंसियां उन लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाइयां कर रही हंै जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं।

   गत जुलाई में पश्चिम बंगाल के पूर्व मंत्री और उनकी महिला मित्र के यहां करीब 50 करोड़ रुपए बरामद किए गए।

बिहार सरकार के एक इंजीनियर के दलाल के पास हाल में तीन करोड़ रुपए पाए गए।

न्यायप्रिय लोगों के लिए यह खुशी की बात है कि बिहार में गठबंधन बदल जाने के बावजूद भ्रष्ट लोगों के खिलाफ जांच एजेंसी की कार्रवाई नहीं रुकी है। 

 मनी लाउंडरिंग एक्ट की दो धाराओं पर सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है।एक आरोपित ने उन धाराओं की कठोरता कम करने की अदालत से गुहार की है।ध्यान रहे कि इन धाराओं की कठोरता के कारण ही जांच एजेंसी को अधिक सफलता मिल रही है।

यदि सुप्रीम कोर्ट ने उसकी कठोरता कम नहीं की तो भ्रष्टों के खिलाफ कारगर कार्रवाई जारी रहेगी।

बिहार सरकार भी यही संकेत दे रही है कि ‘‘भ्रष्टों और अपराधियों को न फंसाएंगे और न बचाएंगे।’’ 

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10 फीसद के पास 50 फीसद संपत्ति

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सन 2019 के नेशनल सेम्पल सर्वे के अनुसार इस देश के सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों के पास देश की 50 प्रतिशत भौतिक और वित्तीय संपत्ति है।

 संपत्ति के संकंेद्रण में भ्रष्टाचार का बड़ा योगदान है।

उधर भ्रष्टाचार कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है।

कालेधन के खिलाफ कार्रवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सन 2011 में एस.आई.टी.गठित करने का केंद्र सरकार को आदेश दिया था। 

उस आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील सन 2014 के मार्च में अदालत ने खारिज कर दी।

उसके कई महीने बाद एस.आई.टी गठित हुई।

पर हाल में जब मनी लाउंडरिंग एक्ट को कारगर बनाया गया तो छिपे काले धन तेजी से बाहर आने लगे।

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लाउड स्पीकरों का शोर

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आखिर लाउड स्पीकरों के कानफाड़ू शोर से बच्चों और बूढ़ों को कौन बचाएगा ?

 न सिर्फ बीमार,बल्कि परीक्षार्थी भी 

अनेक जगहों में शोर से परेशान रहते हैं।

पर,प्रशासन कहता है कि यह नाजुक मामला है।इसमें हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

 दरअसल सभी समुदायों के धर्म स्थलों के लाउड स्पीकरों के खिलाफ समान रूप से कार्रवाई हो तो किसी को कोई शिकायत नहीं रहेगी।

  उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने पहले गोरखनाथ मंदिर से अनावश्यक लाउड स्पीकर हटवा दिए थे।उसके बाद ही अन्य धर्म स्थलों से हटवाए गए।

नतीतजन कोई नाराज नहीं हुआ।

लाउड स्पीकरों की आवाज यदि धर्म स्थल परिसर से बाहर न जाने दिया जाए तो अनेक लोग रोज -रोज पीडित होने से  बचेंगे।

वैसे कितनी ऊंची आवाज में लाउड स्पीकर बजे,इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का आदेश मौजूद है।

कम से कम उसे तो सरकार लागू करे।

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सदनों में अशांति की समस्या

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संसद के दोनों सदनों में कैसे शांतिपूर्वक कामकाज हो,इसको लेकर संबंधित पक्ष इन दिनों कुछ अधिक ही चिंतित हैं।

जाहिर है कि पीठासीन पदाधिकारी और नरेंद्र मोदी सरकार कोई राह तलाश रहे हैं। 

संसद सदस्यों के लिए नई आचार संहिता बनाने के प्रस्ताव पर भी विचार हो रहा है।

किंतु सवाल है कि जिन राज्यों में भाजपा प्रतिपक्ष में है,वहां के सदनों में शांति बनाए रखने में भाजपा के विधायकों की कितनी रूचि रहती है ?

बेहतर हो कि पहले खुद भाजपा उन राज्यों की विधायिकाओं में आदर्श संसदीय आचरण का नमूना पेश करे।

फिर उसे संसद में शालीनता लाने में सुविधा होगी।

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   पिछड़ी जातियों का उप वर्गीकरण

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उत्तर प्रदेश में ओ.बी.सी. की 79 जातियां हैं।राज्य में ओ. बी. सी. की आबादी 45 प्रतिशत है।  

राज्य सरकार की नौकरियों में ओ.बी.सी.जातियों का अलग -अलग कितना प्रतिनिधित्व है ?

यह आंकड़ा जुटाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने सर्वे शुरू कर दिया है।जानकार सूत्र बताते हैं कि आंकड़े आ जाने के बाद राज्य सरकार ओ.बी.सी.जातियों का उप वर्गीकरण कर सकती है।उप-वर्गीकरण का उद्देश्य यह होगा कि जिन कमजोर पिछड़ी जातियों का राज्य सरकार की नौकरियों में प्रतिनिधित्व कम है या नहीं है,उन्हें वाजिब प्रतिनिधित्व दिया जाए। 

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भूली-बिसरी याद

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बिटिश सीक्रेट डाॅक्यूमेंट्स के अनुसार,सन 1942 में जयप्रकाश नारायण ने अंग्रेजी सेना के भारतीय सैनिकों की सहायता से भारत में सशस्त्र संघर्ष करने की योजना बनाई थी।

सैनिक और खुफिया विभाग से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर डा.मदन भट्ट ने 

सन 1988 में एक साप्ताहिक पत्रिका में लिखा कि जयप्रकाश नारायण ने भारत में छापामारों के एक संगठन का पूरी बारीकी से निर्माण किया था।

 उसे सैनिक विद्रोह का सहायक अंग माना गया था।दस्तावेज के अनुसार सेना के भारतीय अफसरों से जयप्रकाश नारायण के संबंध थे।

इनमें से कई अफसर उनकी सहायता के लिए तैयार भी थे।

सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द सेना ने भारत के सैनिकों में देश भक्ति की नई चेतना जगा दी थी।

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और अंत में

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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने सन 2020 में कहा था कि ‘वन नेशन ,वन इलेक्शन’ पर सोच-विचार जरूरी है।

यानी, देश में लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक ही साथ हों।

ताजा जानकारी यह है कि केंद्र सरकार ‘‘वन नेशन ,वन इलेक्शन’’ को कार्य रूप देने के लिए गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श शुरू करने जा रही है।

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प्रभात खबर,पटना-29 अगस्त 22

  


सोमवार, 22 अगस्त 2022

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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बिहार के मंत्रियों के लिए जारी ‘आचार संहिता’ एक सकारात्मक पहल

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राज्य के उप मुख्य मंत्री तेजस्वी यादव ने अपने दल यानी राजद के मंत्रियों के लिए छह सूत्री ‘आचार संहिता’ जारी की है।

इस तरह उन्होंने मंत्रियों के लिए ‘लक्ष्मण रेखा’ खींच दी है।

  मौजूदा राजनीतिक माहौल में यह एक अत्यंत सराहनीय पहल है।

हालांकि इसे जारी करना जितना आसान है, लागू करना उतना ही मुश्किल काम है।

पर,उम्मीद की जानी चाहिए कि राजद का शीर्ष नेतृत्व उसे लागू कराने के लिए अपनी कठोर इच्छा शक्ति का इस्तेमाल करेगा।उसे लागू करने से राजद का

जन समर्थन बढ़ सकता है।

साथ ही,राजद को ‘‘ए टू जेड’’ की पार्टी बनाने में भी उसे मदद मिल सकती है।

  पर, इसके साथ ही राजद के शीर्ष नेतृत्व को एक और बात का ध्यान रखना होगा।

 कोई मंत्री या प्रवक्ता बिना किसी ठोस सबूत के अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से कोई आरोप न लगाए।

हांलाकि यह बात अन्य दलों के नेताओं और प्रवक्ताओं पर भी समान रूप से लागू होती है। 

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चांसलर पद पर विचार

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कुछ राज्य सरकारें विश्व विद्यालयों के चांसलर पद से 

राज्यपाल को मुक्त कर देने की प्रक्रिया अपना रही हैं।

कुछ लोगों की राय है कि यह काम बिहार सरकार को भी कर ही देना चाहिए।

 विश्व विद्यालयों पर द्वैध शासन का प्रयोग अब विफल हो रहा है।केंद्र और राज्यों में अलग -अलग दलों के शासन होने के कारण चांसलर के काम कठिन हो रहे हैं।

  यदि विश्वविद्यालयों के चांसलर मुख्य मंत्री ही रहेंगे तो उच्च शिक्षा क्षेत्र की सफलताओं का श्रेय मुख्य मंत्री को ही मिलेगा।विफलताओं के लिए भी मुख्य मंत्री को जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा।

 अभी तो इस मामले में कई बार एक दूसरे पर दोषारोपण होते रहते हैं।दूसरी तरफ उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार 

की दिशा में काम नहीं हो पाते।  

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प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की गुणवत्ता

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बिहार में नए- नए और बड़े -बड़े निजी और सरकारी अस्पताल खुल रहे हैं।

फिर भी अस्पतालों पर मरीजों का बोझ घट ही नहीं रहा है।बल्कि बढ़ता जा रहा है।बड़े अस्पतालों में मेला के दृश्य नजर आते हैं।

 इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण अस्पतालों की भारी 

कमी है।अधिकतर प्राथमिक चिकित्सालयों में बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।इस समस्या से कैसे निपटा जाए,यह बड़ी समस्या सामने है।

  बिहार में उद्योग लगाने पर जोर दिया जा रहा है।

 यदि इस काम में सफलता मिलती है तो बड़ी अच्छी बात है।

राज्य सरकार को इच्छुक उद्योगपतियों से एक आग्रह करना चाहिए।वह यह कि उद्योगपति अपने कार्य क्षेत्र में एक गुणवत्तापूर्ण स्कूल  और एक बेहतर अस्पताल की भी स्थापना करंे।जो उद्योगपति ऐसा करते हैं,उन्हें सरकार करों में कुछ रियायत दे।

इससे उन उद्योगों के कर्मचारी व उनके बाल-बच्चे भी तो बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर पाएंगे।

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भूमि -अधिग्रहण का उद्देश्य

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‘‘पटना में सुव्यवस्थित आवासीय काॅलोनी के निर्माण के लिए’’ बिहार सरकार ने सत्तर के दशक में दीघा में 1024 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया  था।

  बाद के वर्षों में उस जमीन के अधिकांश पर भू माफियाओं ने कब्जा कर उसे बेच दिया।

 यह अच्छी बात है कि पटना हाईकोर्ट के निदेश पर बिहार सरकार उन माफियाओं के खिलाफ इन दिनों सख्त कार्रवाई कर रही है। 

उन 1024 एकड़ में से जो अंश माफियाओं के चंगुल में जाने से बच गया,उसे शासन सरकारी दफ्तरों के लिए इस्तेमाल कर रही है।

  पर, 1981 में जिन 11 हजार लोगों से आवास बोर्ड ने अग्रधन वसूले थे,उन्हें सरकार व बोर्ड ने निराश किया।

हाई कोर्ट को इस सवाल पर भी विचार करना चाहिए कि जिस उद्देश्य से दीघा जमीन का अधिग्रहण किया गया,उस उद्देश्य की पूत्र्ति क्यों नहीं की गई।क्या अब से भी उन 11 हजार आवेदकों में से कुछ लोगों को वहां जमीन दी जा सकती है ?

  आवास बोर्ड ने पिछले वर्षों में उन 11 हजार लोगों में से अधिकतर लोगों के पैसे लौटा दिए।किंतु अब भी कई लोग बचे हैं जिन्होंने अपने पैसे आवास बोर्ड से नहीं लिए हैं।

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गुणवत्तापूर्ण कैमरे जरूरी 

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पटना के तीन सौ जगहों में ढाई हजार सी.सी.टी.वी.कैमरे लगाने का शासन का फैसला सराहनीय है।

इससे अपराध पर काबू पाने में सुविधा होगी ।

साथ ही, देर-सवेर सड़क दुर्घटनाओं में भी कमी आ सकती हैं।

किंतु ऐसे कैमरे लगाने के बाद भी एक दिक्कत अक्सर सामने आती रहती है।

कई बार कैमरे घटिया गुणवत्ता वाले होते हैं।तो कई बार उनके रख-रखाव में आपराधिक लापरवाही बरती जाती है।

अब उम्मीद की जाती है कि ढाई हजार कैमरों को लेकर वैसी लापारवाही और अनियमितता नहीं होगी।

यदि सार्वजनिक धन लगता है तो उसका लाभ भी लोगों को मिले। 

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और अंत में

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पिछले दिनों बिहार के एक जिले के एक प्रखंड मुख्यालय परिसर में आयोजित जन सुशासन शिविर में अजीब दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य उपस्थित हो गया।

वहां अफसर और पूर्व विधायक के बीच जम कर तू -तू मैं -मैं का दृश्य उपस्थित हो गया।

पर, उस बीच मौजूदा जन प्रतिनिधि चुप रहे।

यह गंभीर व चिंताजनक सवाल है कि सरकारी कार्यों में जिन घोटालों की खबरें मीडिया और पूर्व जन प्रतिनिधियों तक पहुंच जाती हैं, वैसी ही खबरें मौजूदा जन प्रतिनिधियों तक क्यों नहीं पहुंच पातीं ?

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प्रभात खबर-पटना- 22 अगस्त 22


सोमवार, 15 अगस्त 2022

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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अदालती सजा-दर बढ़ाने के लिए गवाहों-अभियोजकों की सुरक्षा जरूरी 

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इस देश में अदालती सजा की दर बढ़ाए बिना आपराधिक न्याय व्यवस्था को बेहतर बनाने का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।

  देश में गवाहों को पोख्ता सुरक्षा प्रदान किए बिना सजा की दर बढ़ाना मुश्किल होगा।

सन 2018 में सरकार ने गवाह सुरक्षा स्कीम बनाई।

पर वह नाकाफी है।

  याद रहे कि अमेरिका और जापान में अदालती सजा की दर लगभग 99 प्रतिशत है।जबकि, भारत में करीब 60 प्रतिशत।

अमेरिका में गवाहों की सुरक्षा की पक्की व्यवस्था है।

 भारत में जितने लोगों के खिलाफ अदालतों में आरोप पत्र दाखिल किए जाते हैं,उनमें से सिर्फ 60 प्रतिशत आरोपितों को ही अदालतें सजा दे पाती हैं।इसके कई कारण हैं।

 पर, अनेक मामलों में भयवश गवाह अदालत में उपस्थित ही नहीं होते।या फिर अपने पिछले बयान से वे पलट जाते हैं।

  इसमें प्रलोभन भी भूमिका निभाता है।

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 अभियोजकों की सुरक्षा

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  अभियोजकों की समस्या भी इस देश में गंभीर है।

वैसे यदा कदा खुद अभियोजक भी ‘‘प्रभाव’’ में आ जाते हैं।

कई बार राजनीतिक कारणों से भी अभिभोजक अपनी जिम्मेदारी निभा नहीं पाते।

लेकिन कुछ अभियोजक दुर्दांत अपराधियों और माफियाआंे के खिलाफ भी निष्पक्षतापूर्वक अभियोजन चलाते हैं।यदि उन मामलों में उन्हें सजा हो जाती है, तो अभियोजकों की जान पर उनके रिटायर होने के बाद भी खतरा बना रहता है।

याद रहे कि खतरा झेलने वाले ऐसे लोगों को उनके सेवाकाल में तो सुरक्षा प्रदान की जाती है।

किंतु रिटायर हो जाने के बाद उनकी सुरक्षा वापस ले ली जाती है।

यदि ऐसे संवेदनशील मामलों में सरकार ने रिटायर लोगों को भी सुरक्षा देने को लेकर नियम नहीं बनाया तो 

संभव है कि एक दिन अनेक अभियोजक अपनी ड्यूटी में खतरा नहीं उठाएगा।

 इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का एक ताजा निर्णय उनके लिए चिंताजनक है।अदालत ने कहा है कि ‘‘हर सेवानिवृत पुलिस अफसर को चैबीसों घंटे सुरक्षा मुहैया कराना संभव नहीं।’’ 

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वादों की जगह काम देखिए

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चुनाव से पहले किस दल ने मतदाताओं से क्या -क्या वायदे किए थे,उसकी चर्चा सरकार बनने के बाद होती रहती है।

होनी भी चाहिए।

 किंतु उस चर्चा से अधिक जरूरी बातें कुछ और भी हैं।

उनमें से महत्वपूर्ण बात यह है कि नई सरकार के कामकाज कैसे हो रहे हैं।

निर्माण,विकास और कल्याण से संबंधित योजनाओं पर सरकार कैसा काम कर रही है ?

कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार हो रहा है या नहीं ?

दरअसल इन कसौटियों पर किसी सरकार को कसा जाना चाहिए।

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 भूली-बिसरी याद

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सत्तर के दशक में इस देश के एक

मशहूर व्यापारिक घराने के बारे में एक खास बात कही जाती थी।

वह बात अयोग्य स्टाफ के बारे में होती थी।

जिन कर्मचारियों से प्रबंधन नाराज हो जाता था।

ऐसे कर्मियों को भी है वह घराना एकबारगी नौकरी से निकाल नहीं देता था।

वैसे कर्मियों को वह पहले की अपेक्षा बहुत अधिक वेतन के साथ अधिक ऊंचे पदों पर बैठा देता था।  

उन्हें आरामदायक चेम्बर और आदेशपाल दे दिया जाता था।

किंतु वह कुछ ही महीनों के लिए।

उसके बाद उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता था।

वैसे पदच्युत बेचारे उतनी ही बड़ी कुर्सी के लिए अन्य घरानों में आवेदन पत्र पहुंचाने लगते थे।

उससे छोटी कुर्सी अब उन्हें नहीं चाहिए।बड़ी कुर्सी तो मिलने से रही।

 अंत में निराश होकर वे घर बैठ जाते थे।

इसी तरह का हाल इन दिनों राजनीति में भी यदाकदा देखा जा रहा है। 

 किसी नेता को एक बार संसद या विधान मंडल का सदस्य बना दिया गया तो उसमें ताउम्र उस सदस्यता को बनाए रखने की उत्कंठा तीव्र हो जाती है।यह बात उच्च सदनों की सदस्यता पर अधिक लागू होती है।

मूल पार्टी से उसका नवीकरण नहीं हुआ तो वह विभिन्न दलों

की चैखटों पर बारी -बारी से सिर नवाने लगता है।

उन में से कुछ नेता तो अंततः विफल ही होते हैं।

इस तरह उनके राजनीतिक कैरियर का अंत हो जता है।

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और अंत में

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स्वास्थ्य,शिक्षा और व्यक्तिगत सुरक्षा की समस्याएं व्यापक हैं।  इनके हल के लिए सिर्फ सरकारों पर ही निर्भर नहीं रहा जा सकता।सरकारों से तो जो कुछ बन पाता है,वे करती ही रहती  हैं।

  पर,साथ-साथ, इन समस्याओं को हल करने के लिए नागरिकों को भी अपनी तरफ से कुछ पहल करनी होगी।खासकर वैसे नागरिक को, जो आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत समर्थ हैं।यानी,वे अन्य मदों की अपनी फिजूलखर्ची कम करके भी इन तीन मदों में पहले की अपेक्षा अब अधिक खर्च करें।व्यक्तिगत सुरक्षा भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

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प्रभात खबर,पटना 15 अगस्त 22


    


 भारत की आजादी का अमृत महोत्सव

-एक पुनरावलोकन

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सुरेंद्र किशोर

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  आजादी के तत्काल बाद के हमारे शासक ‘सुशिक्षित’ थे।

आज के शासक तो कुछ कांग्रेसी नेताओं के शब्दों में अनपढ़-गंवार व चाय बेचने लायक योग्यता रखने वाले हैं।

नीच हैं।  

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आजादी के बाद के हमारे शासक जिन्होंने 

कैम्ब्रिज में शिक्षा पाई थी--

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जवाहरलाल नेहरू(प्रधान मंत्री),

सरदार वल्लभ भाई पटेल,

उप प्रधान मंत्री(लंदन में वकालत की पढ़ाई की)

सी.डी.देशमुख(वित्त मंत्री) 

मोहन कुमार मंगलम(केंद्रीय मंत्री) 

एल.के. झा (रिजर्व बैंक के गवर्नर)

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जिन्होंने आॅक्सफोर्ड में शिक्षा पाई--

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इंदिरा गांधी(प्रधान मंत्री),

जाॅन मथाई(वित्त मंत्री) 

एच.एम.पटेल(वित्त सचिव व वित्त मंत्री)

वी.के.कृष्ण मेनन(लंदन स्कूल आॅफ इकोनाॅमिक्स में शिक्षित )

आदि आदि आदि..............।

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मैंने सिर्फ 1985 के पहले के प्रमुख शासकों की चर्चा की है।

इनके सत्ता में रहते सौ पैसे घिसकर 15 पैसे रह गए।

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यदि किसी अन्य व्यक्ति ने कहा होता तो उसकी मंशा पर सवाल उठ जाता।

किंतु सन 1985 में प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा कि दिल्ली से हमारी सरकार 100 पैसे भेजती है,किंतु लोगों तक सिर्फ 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं।

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यानी, जब नींव में ही घुन लग गया,तो अंजामे गुलिश्ता.......!!!!

अब बताइए,हमारे पढ़े-लिखे शासकों ने हमारे 85 पैसे लूट में चले जाने का अघोषित प्रबंध कर दिया था।

यह शासन का कुप्रबंधन था या शासकों की बेईमानी ?

(चीन में कभी यह कहा गया था कि भारत सरकार अपने बजट का पैसा ऐसे लोटे में रखती है,जिसमें अनेक छेद हैं।)

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आजादी के बाद के भारतीय शासकों की ‘नीयत’ का एक नमूना--

आजादी के तत्काल बाद बिहार विधान सभा में 

साठी लैंड रिस्टोरेशन विधेयक पर चर्चा चल रही थी।

(आजादी के तत्काल बाद (साठी)चम्पारण जिले की सैकड़ों एकड़ जमीन की प्रमुख कांग्रेसियों ने आपस में बंदरबांट कर ली थी।

बहुत बदनामी हुई तो गृह मंत्री सरदार पटेल ने उस जमीन की वापसी का बिहार सरकार को सख्त निदेश दिया।बिल उसी उद्देश्य से लाया गया था।किंतु नेता की मंशा बहस में ही प्रकट हो गई थी।यह भी कि आगे क्या होने वाला है !) 

बिल पर बहस के दौरान एक कांग्रेसी नेता ने,जो बाद में मुख्य मंत्री तक बने थे,बिल का विरोध करते हुए कहा कि 

‘‘हमने आजादी की लड़ाई में बहुत कष्ट सहे थे। 

जिन लोगों ने सन 1857 के विद्रोह के समय अंग्रेजों का साथ दिया था,अंग्रेजों ने उन्हें तरह -तरह के ‘इनाम’-धन संपत्ति  दिए थे।

हम भी चाहते हैं कि हम अपने बाल -बच्चों के लिए कोई सिलसिला बनाएं।’’

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जो लोग कहते हैं कि आरक्षण से गिरावट आती है,वे आॅक्सब्रिज शिक्षित शासकों के बारे में क्या कहेंगे जिनके राज में 85 प्रतिशत सार्वजनिक संसाधन लूट लिए गए ?

सरकारें सारे विकास व कल्याण पैसों से ही तो करती हैं।

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दरअसल सवाल नीति और शासकों के सुशिक्षित होने या न होने का नहीं हैं,बल्कि सवाल हमारे हुक्मरानों की नीयत का है।

इस कहानी का ‘मोरल’ यह है कि ईमानदार नेता किसी भी जाति -समुदाय-अधिक शिक्षित-कम शिक्षित समूह में हो सकते हैं।

 भरसक उन्हें ही सत्ता में बैठाने का प्रबंध मतदाताओं को करना चाहिए जो सरकारी पैसों का रक्षक बने न कि लुटेरा। 

अब सवाल यह भी है कि जिन्हें आप अनपढ़-गंवार व चाय बेचने लायक योग्यता रखने वाला, नीच कहते हैं,उसके राज में सौ पैसे घिसकर कितना रह जाता है ?

वैसे तो घिस तो अब भी रहा है।

किंतु क्या 100 से घटकर 15 हो जा रहा है ?   

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15 अगस्त 2022   


मंगलवार, 9 अगस्त 2022

 पार्थ व अर्पिता के बैंक खातों से तीन साल में 700 करोड़ रुपये का लेन देन

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आज के दैनिक जागरण में जो अभूतपूर्व खबर छपी है,उसका शीर्षक यही है।

मैंने अभूतपूर्व इसलिए लिखा क्योंकि ऐसी खबर मैंने इससे पहले नहीं पढ़ी थी।

आपने पढ़ी हो तो मेरा ज्ञानवर्धन कीजिए।

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एक प्रदेश में कैबिनेट मंत्री रहे नेता का यह हाल है।

यह तो एक नमूना है।

  इस देश में ऐसे-ऐसे  अनेक लुटेरे सक्रिय हैं जो मध्य युग और ब्रिटिश शासन काल के लुटेरों से भी आगे निकल गए हैं।

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आजादी के बाद के कुछ वर्षों तक राजनीति सेवा थी।

हालांकि कुछ सत्ताधारी नेतागण तो आजादी के तत्काल बाद से ही लूटने लगे थे।

उनका तर्क यह था कि हमने आजादी की लड़ाई के दिनों में बहुत कष्ट झेले थे। अब हम अपने बाल-बच्चों के लिए कुछ

सिलसिला बनाना चाहते हैं।(बिहार विधान सभा के वाद-विवाद से )

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आजादी के तत्काल बाद राजनीति सेवा थी।

 बाद में वह नौकरी हो गई जब पूर्व सांसदों के लिए पेंशन का प्रावधान किया गया।

समय बीतने साथ राजनीति काॅमर्स हो गई।

अंततः राजनीति अब उद्योग है।

हालांकि अब भी राजनीति में दो-चार प्रतिशत लोग ईमानदार हैं।

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जब किसी नेता के बैंक खातों से तीन साल में 700 करोड़ रुपयों का लेन देन होने लगे तो उस नेता को आप नेता कहेंगे  या उद्योगपति ?

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यह देश जिन दो समस्याओं से सर्वाधिक पीड़ित है,वे हैं सरकारी भ्रष्टाचार और आतंकवाद।

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सुरेंद्र किशोर

9 अगस्त 22     


बुधवार, 3 अगस्त 2022

 मुम्बई के बेघरों के साथ अन्याय

करने के आरोप में संजय राउत तो जेल में हैं 

पटना( दीघा )में जमीन के लिए पैसे जमा करने वाले 11 हजार 260 आवेदकों के साथ हुए अन्याय का क्या होगा ?

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सुरेंद्र किशोर

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मुम्बई के 672 बेघरों के पुनर्वास में बाधा बनने के 

आरोप में राज्य सभा सदस्य संजय राउत जेल में हैं।

पर,पटना के 11 हजार 260 बेघरों के साथ धोखाधड़ी करने वालों को अब तक कोई सजा नहीं हुई।

  धोखाधड़ी करने वालों में बिहार राज्य आवास बोर्ड, बिहार पुलिस,राज्य के सत्ताधारी और प्रतिपक्षी नेतागण और भू माफिया शामिल हैं।

 सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि दीघा की 1024 एकड़ भूमि आवास बोर्ड की है। 

  सन 2002 में पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार के उच्च अधिकारियों को कोर्ट में बुलाकर सख्त निदेश दिया था कि वे आवास बोर्ड की दीघा भूमि से अतिक्रमण हटाएं अन्यथा आप पर हम कार्रवाई करेंगे। 

उसके बाद अतिक्रमण हटाने के सवाल पर मुख्य सचिव और डी.जी.पी. में मतभेद हो गया।डी.जी.पी.अतिक्रमण हटाने के पक्ष में नहीं थे।

उस पर मुख्य सचिव ने नौकरी से इस्तीफे की धमकी दे दी।

फिर भी कुछ नहीं हुआ।बात आई-गई हो गई।

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दीघा में भूखंड देने के लिए आवास बोर्ड ने सन 1981 में 11 हजार 260 लोगों से अग्रधन लिए।

पर,निहित स्वार्थी तत्वों ने किसी को भूखंड नहीं लेने दिया।

उधर भू माफियाओं ने पुलिस,प्रशासन, आवास बोर्ड और पक्ष-विपक्ष के नेताओं की मदद से 1024 एकड़ मंें से अधिकांश जमीन नाजायज तरीके से बेच दी।

उन 11260 आवेदकों से आवास बोर्ड ने कहा कि आप पैसे वापस ले लें।हम आपको जमीन नहीं दे सकते।

अधिकतर लोगों ने वापस ले लिए।कुछ लोगों ने पैसे वापस नहीं लिए।

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आज  की राज्य सरकार पटना हाई कोर्ट के निदेश का पालन करना चाहती है।

पटना हाईकोर्ट भी अब काफी सख्त है। 

हाईकोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा है कि आवास बोर्ड के अफसरों और स्थानीय थानेदारों ने रिश्वत लेकर अतिक्रमण करवाया है।

हाईकोर्ट के न्यायाधीश संदीप कुमार ने कह दिया है कि थानेदारों और आवास बोर्ड पर कार्रवाई नहीं हुई तो हाईकोर्ट उन्हें नहीं छोड़ेगा।

अदालत को यह भी निदेश देना चाहिए कि जिन लोगांे ने 1981 में आवास बोर्ड में दीघा में जमीन के लिए जमा अपना अग्रधन वापस नहीं लिया है,उन्हें भूखंड देेने पर आवास बोर्ड विचार करे।

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3 अगस्त 22

   


मंगलवार, 2 अगस्त 2022

 राजनीतिक क्षेत्र का ‘चंद्रमा’ कभी -कभी खुद को ‘सूर्य’ समझने लगता है।

नतीजा क्या होता है ?

चंद्रमा सूर्य तो बन नहीं सकता,चंद्रमा भी नहीं रह जाता।

पिछले कुछ दशकों में बिहार में भी ऐसा कई बार हो चुका है।

तारे बने कई चंद्रमा, अब भी जहां-तहां,यदा-कदा टिमटिमाते रहते हैं।

फिर भी कुछ आतुर नेतागण अपने कैरियर की कीमत पर यह सब दोहराते रहते हैं।

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सुरेंद्र किशोर

2 अगस्त 22


शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

 नोटों के पहाड़ पर पार्थो चटर्जी !

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सुरेंद्र किशोर

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सार्वजनिक क्षेत्र मंे गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा किसी भी गरीब देश की संवेदनशील सरकार की प्राथमिकता में रहनी चाहिए।

 क्योंकि शिक्षा के निजी क्षेत्र उनके लिए है जिनके पास पैसे हैं।

    पर जब स्कूली शिक्षकों की बहाली के एवज में 

कोई शिक्षा मंत्री अपने ठिकानों पर नोटों का पहाड़ खड़ा कर ले तो गरीबों के बच्चे उन अयोग्य शिक्षकों से कैसी शिक्षा हासिल कर पाएंगे ?

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बहाली में भीषण भ्रष्टाचार के कारण शिक्षा की गुणवत्ता के क्षरण की समस्या बिहार सहित देश के अनेक राज्यों में भी है।

क्या पार्थो चटर्जी जैसे धनलोलुप मंत्री गरीबों के घरों के नौनिहालों के भविष्य, प्रकारांतर से देश के भविष्य, के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे और देश मूक दर्शक बना रहेगा ?

कोलकाता में अर्पिता के घरों में नोटों के पहाड़ देख कर भले आज देश गुस्से में है। 

किंतु स्कूली शिक्षा या फिर पूरी शिक्षा व्यवस्था के बर्बाद होते जाने की समस्या इस देश में दशकों पुरानी है।अब भी चेत जाने का समय है।

सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है।केंद्र और राज्य सरकारें कैंसर जैसी इस समस्या पर मिल बैठकर विचार करे। 

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29 जुलाई 22


  नरेंद्र मोदी से नाराज डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी भी 2024 में 

 भाजपा की ही जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं

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सुरेंद्र किशोर

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जी हिन्दुस्तान टी.वी चैनल से बातचीत करते हुए डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने आज कह दिया कि सन 2024 के लोक सभा चुनाव में भी भाजपा ही जीतकर एक बार फिर केंद्र में सत्ता में आएगी।

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खबर मिलती रही है कि डा.स्वामी इन दिनों नरेंद्र मोदी से नाराज चल रहे हैं।

क्योंकि भाजपा ने उनका भी ‘आडवाणीकरण’ कर दिया है।

(सन 2024 की भविष्यवाणी उनका वस्तुपरक आकलन है या भाजपा से उनकी फिर पटरी बैठने वाली है ?!!

पता नहीं।अभी तो वस्तुपरक ही मान लें)

यदि डा.स्वामी भी नरेंद्र मोदी की तीसरी जीत देख रहे हैं तो इसके साथ ही  प्रतिपक्षी नेता गण 2024 के बाद का अपना राजनीतिक व कानूनी भविष्य का अनुमान लगा लें।

खासकर देश भर के वैसे नेतागण अपना हश्र जान लें जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में मुकदमे चल रहे हैं या केंद्रीय एजेंसियों द्वारा उनकी जांच चल  रही है।

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2024 में भाजपा एक बार फिर सत्ता में आ जाएगी तो 2029 तक तो सारी जांचें अपनी तार्किक परिणति तक पहुंच ही जाएंगी।

उसके बाद इस देश के कितने नेतागण चुनाव

चुनाव लड़ने लायक रह जाएंगे ?

वे अपने केस की गंभीरता के अनुपात में अपना भविष्य अभी से जान लें।

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इस देश के अधिकतर आम लोग,जो किसी जातीय या सांप्रदायिक वोट बैंक के हिस्सा नहीं हैं, तरह -तरह के आर्थि और बौद्धिक भ्रष्टाचारियों से ऊब रहे हैं।

ऐसे में आगे का अनुमान लगाइए।

जब एक राज्य के एक मंत्री पार्थों चटर्जी के अत्यंत करीबी के पास  21 करोड़ रुपए नकद मिले हैं तो पार्थों की अपेक्षा इस देश के अधिक ताकतवर नेताओं ने इस गरीब देश को कितना लूटा है ,उसका अनुमान मुश्किल नहीं।

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ताजा खबर के अनुसार सिर्फ ई. डी. ने घोटालेबाजों की एक लाख चार हजार 702 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की है।अन्य एजेंसियां अलग हैं।

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26 जुलाई 22

  


 शेरपुर-दिघवारा गंगा पुल की निविदा जारी 

होने के बाद अब दिघवारा-नयागांव के 

‘न्यू पटना’ बनने की संभावना बढ़ी

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सुरेंद्र किशोर

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मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कुछ महीने पहले कहा था कि शेरपुर-दिघवारा गंगा पुल के बनकर तैयार हो जाने के बाद दिघवारा से नया गांव तक का इलाका ‘न्यू पटना’ बन जाएगा।

    प्रस्तावित पुल के निर्माण के लिए अब निविदा जारी कर दी गई है।

  पटना में गंगा नदी पर यह पांचवां पुल होगा।

  इसके बनकर तैयार हो जाने पर सारण जिले के एक बड़े इलाके का तेजी से विकास होगा।

विकास के कुछ सरकारी प्रयास होंगे किंतु अधिक निजी प्रयास होंगे।

 पिछले कुछ महीनों से इस पुल की आहट थी।

कुछ साल पहले पटना के पास गंगा नदी पर जेपी सेतु के बनकर तैयार हो जाने के बाद से ही पटना के डेवलपर्स परमानंदपुर और आसपास के इलाके में सक्रिय हो गए हैं।

हाल में पता चला कि शेरपुर-दिघवारा पुल की प्रत्याशा में दिघवारा-भेल्दी रोड के  किनारे डेरनी तक जमीन की खरीद-बिक्री तेज हो गई है।

जमीन खरीदने के इच्छुक लोग बाहर से भी वहां जा रहे हैं। 

   एक कहावत है कि अमेरिका ने सड़क बनाई और सड़क ने अमेरिका को बना दिया।

  दिघवारा -भेल्दी स्टेट हाईवे स्थित एक बाजार में जमीन की कीमत अब लगभग एक करोड़ रुपए प्रति कट्ठा हो गई है।इस स्टेट हाईवे का चैड़ीकरण होना है।

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शेरपुर दिघवारा पुल के बनकर तैयार हो जाने के बाद पटना पर से आबादी का बोझ घटेगा।

क्योंकि दिल्ली के यमुनापार की तर्ज पर यहां गंगा पार कालोनियां भी विकसित हो सकती हैं।

यदि कोई तकनीकी बाधा न हो तो शेरपुर -दिघवारा पुल की प्रस्तावित निर्माण अवधि को थोड़ा कम किया जाना चाहिए।

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29 जुलाई 22

 


सोमवार, 25 जुलाई 2022

 जेल जाने के बावजूद मंत्री ??!!

सुप्रीम कोर्ट इस पर स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लेता ?

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सुरेंद्र किशोर

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महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नवाब मलिक जेल जाने के बावजूद मिनिस्टर बने रहे थे।

दिल्ली के मंत्री जैन साहब भी जेल में हैं।

इसके बावजूद वे मंत्री भी हैं।

 पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री पार्थ चटर्जी जेल गए।फिर भी मंत्री बने हुए हैं।

यह कैसी परंपरा डाली जा रही है ?

इससे पहले तो नेता लोग जेल जाने से पहले मंत्री या मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे देते थे।

 मीडिया ट्रायल से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ताजा टिप्पणी समयोचित है।

उस पर उन्हें कोई जजमेंट भी दे ही देना चाहिए।कोई मार्ग दर्शन जारी करना चाहिए। 

किंतु जेल में भी कोई मंत्री पद पर बना रहे,इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं करेगा ?  

क्या इसे संविधान की धज्जियां उड़ाया जाना नहीं कहेंगे ?

सुप्रीम कोर्ट के रहते संविधान की धज्जियां उडं़े ?

यदि कोई सरकारी कर्मी जेल चला जाए तो वह तुरंत सेवा से निलंबित हो जाता है।

किंतु नेता जेल जाते ही अपने लिए पहले अस्पताल का इंतजाम कर लेता है।

साथ ही, घटिया व बेशर्म राजनीति के इस दौर में वह मंत्री भी बना रहता है।

   बेचारे लालू यादव और जय ललिता का क्या 

  कसूर था जो उन्हें जेल जाने के लिए मुख्य 

   मंत्री पद छोड़ना पड़ा था ???!!!

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25 जुलाई 22



 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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मिलावटों की आशंका कम करने के लिए दवाओं की कीमतंे घटानी जरूरी 

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केंद्र सरकार कुछ महत्वपूर्ण दवाओं की भारी कीमतों में कमी लाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है।कीमतों में सत्तर प्रतिशत कमी का प्रस्ताव है।

यदि सरकार ने अंततः सचमुच ऐसा कोई निर्णय कर लिया तो उससे  दवाओं में मिलावट की आशंका भी कम होगी।

ध्यान रहे कि जो महंगी दवाओं में मिलावट अधिक होती है।

सस्ती दवाओं में मिलावट कम होती है।

क्योंकि सस्ती दवाओं में मिलावट के धंधे में मुनाफा काफी कम होता है।

‘आयुष्मान भारत’ की दवाओं की कीमतें काफी कम हैं।

इसलिए उसमें कोई मिलावट करके भला कोई कितना कमाएगा ?

 पुराने जमाने में सार्वजनिक क्षेत्र के आई.डी.पी.एल. कारखानों में निर्मित अत्यंत सस्ती दवाएं काफी असरदार होती थीं।क्योंकि उनमें मिलावट नहीं होती थी।

पर, जब उसी कम्पोजिशन वाला टेबलेट ब्रांडेड कंपनी भारी कीमत में बेचे तो जाहिर है कि उसमें मिलावट से समाजविरोधी तत्वों को काफी फायदा होगा।

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    ठंडे पेय पदार्थों में कीटनाशक

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दवाआंें के साथ-साथ केंद्र सरकार ठंडे पेय पदाथों में  कीटनाशक दवाओं की भारी मौजूदगी पर भी ध्यान दे।

उससे भी बीमारियां हो रही हैं। 

 कई साल पहले भारत की  संसद में प्रतिपक्षी सदस्य ने सवाल पूछा था कि अमेरिका की अपेक्षा हमारे देश में तैयार हो रहे कोल्ड ड्रिंक में रासायनिक कीटनाशक दवाओं का प्रतिशत काफी अधिक क्यों है ?

इस पर केंद्र सरकार ने संसद को बताया था कि यहां कुछ अधिक की अनुमति है।

तब यह सवाल उठा था कि कोल्ड डिं्रक बनाने वाली अमरीकी कंपनी अपने देश में तो कीटनाशक की मौजूदगी के खिलाफ है। किंतु वही कंपनी भारत के लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ क्यों करती है ?

पिछली सरकारें भले यह बर्दाश्त करती रहीं।किंतु क्या मौजूदा केंद्र सरकार भी उसी लीक पर चलेगी ?

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छापेमारी में दुस्साहस 

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बालू, पत्थर, कोयले और पशु के काले धंधे में काफी काला धन है।

इस धंधे में लगे माफियाओं को देश भर में शासन के एक हिस्से का गुप्त संरक्षण मिलता रहा है।

जगजाहिर है कि 

इस काम में निचले व मझोले स्तरों के अफसरों की उनसे साठगांठ रहती है।

  इसीलिए धंधेबाज समय -समय पर पुलिसकर्मियों को अपनी गाड़ियों से कुचलते रहे हैं।उन्हें लगता है कि उनका कुछ बिगड़नेवाला नहीं।

इस धंधे को निर्मूल करने की कोशिशें भी होती रहती हैं।पर,वह कभी सफल नहीं होती।

  कोशिश सफल हो,उससे पहले उनकी गाड़ियों से कुचलने वाले अफसरों की जानें कैसे बचाई जाएं ?

इस पर बड़े अफसरों को विशेष तौर पर ध्यान देना होगा।कभी- कभी यह सवाल भी उठता है कि माफियाओं को रोकने के लिए कुछ अफसर अकेले या बहुत कम फोर्स के साथ मैदान में क्यों चले जाते हैं ?

क्या इस संबंध में शासन का कोई खास निदेश नहीं है ?

क्यों वे अफसर अति उत्साही हो जाते हैं ?

या माफियाओं के समक्ष अकेले चले जाने के पीछे उनका उद्देश्य कुछ और होता है ?

इस पर सरकारों को उच्च स्तर पर विचार करके कोई कठोर दिशा निदेश जारी करना चाहिए।

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जेल में फिर भी मंत्री

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नवाब मलिक जब तक जेल में रहे,मिनिस्टर भी बने रहे।

दिल्ली के मंत्री जैन साहब जेल में हैं।इसके बावजूद अब तक ऐसी कोई खबर नहीं है कि उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है।

पश्चिम बंगाल के मंत्री पार्थ चटर्जी जेल गए।पिछली खबर मिलने तक वे भी मंत्री बने हुए हैं।

यह कैसी परंपरा डाली जा रही है ?

इससे पहले तो नेता लोग जेल जाने से पहले मंत्री या मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे देते थे।

 मीडिया ट्रायल से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ताजा टिप्पणी समयोचित है।

उस पर उन्हें कोई जजमेंट भी देना चाहिए। किंतु जेल में भी मंत्री पद पर बना रहे,इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं करेगा ?    

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भूली-बिसरी याद

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जस्टिस हंसराज खन्ना सन 1982 में ज्ञानी जैल सिंह के खिलाफ प्रतिपक्ष की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थे।सुप्रीम कोर्ट के चर्चित जज रहे खन्ना साहब ने राष्ट्रपति की भूमिका पर अपनी राय दी थी जो आज भी मौजूं है।

जस्टिस खन्ना ने कहा था कि ‘‘राष्ट्रपति देश का प्रतीक होता है।

उसके आचार-विचार का समाज पर असर पड़ता है।

हालांकि उसे कड़ाई से संविधान के अंतर्गत ही कार्य करना होता है।

परंतु मैं समझता हूं कि इसी सीमा के भीतर वह देश के नैतिक पतन को रोकने में एक अच्छी भूमिका निभा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि वह शासक दल से टकराव की स्थिति पैदा करेगा।

टकराव की तो असल में कोई संभावना ही नहीं है।

खास कर उस स्थिति में ,जबकि राष्ट्रपति देश के नैतिक पर्यावरण को साफ करने के प्रति चिंतित हो।

 अपनी स्थिति की सीमाओं के भीतर ही उसे अपनी सक्रियता तय करनी होगी।’’

   जस्टिस खन्ना की टिप्पणियां न्यायपूर्ण थी।

हाल में  राष्ट्रपति चुनाव हुआ।उसके उम्मीदवार यशवंत सिन्हा तथा कुछ अन्य प्रतिपक्षी नेताओं की टिप्पणियों की जरा जस्टिस खन्ना की टिप्पणियों की तुलना करके देख लें।

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 और अंत में

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जिन राज्यों में एक दलीय शासन है,वहां के मुख्य मंत्री यदि ईमानदार हैं,तो वे अपने मंत्रियों पर चैकस नजर रख सकते हैं।किंतु जहां मिली जुली सरकारें हैं,उन राज्यों के मुख्य मंत्रियों के सामने दिक्कतें हैं।

 ऐसी दिक्कतें कैसे दूर हों ?

इस पर तो संबंधित दलीय हाईकमान को ही विचार करना होगा। 

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कानोंकान 

प्रभात खबर

पटना

25 जुलाई 22


 


शनिवार, 23 जुलाई 2022

       

मुझे लगता है कि ओमप्रकाश राजभर और शिवपाल सिंह यादव जैसे नेताओं की मूल समस्या उनके बेटों की राजनीतिक उच्चाकांक्षाएं हैं।

उन्हें किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द किसी न किसी सदन में भेजने की जल्दीबाजी है।

  देखना है कि बेचारे उन नेता पुत्रों की इच्छी कब पूरी हो पाती है।

 राजभर और शिवपाल जैसी इच्छा रखने वाले नेताओं की इस देश में कोई कमी नहीं है।

पुत्रों की उच्चाकांक्षा पूरी कराने के चक्कर में कई दल धीरे -धीरे बर्बाद होते जा रहे हैं।

पर, यह ऐसी इच्छा है जो मरती ही नहीं।

 हाल में बेचारे शरद यादव की ऐसी ही इच्छा राजद पूरी नहीं कर सका।

देखना है कि राजभर और शिवपाल की इच्छा किस दल से कब पूरी होती है।

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23 जुलाई 22

  

 














शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

 भूली-बिसरी याद

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25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा के बाद संजय गांधी के ही कहने पर केंद्र सरकार अनेक फैसले कर रही थी।

  शाह आयोग की रपट में उसका विवरण आया है।

रपट के पेज नं.-21 पर लिखा है, 

‘‘....जब श्री रे (सिद्धार्थ शंकर राय)कमरे के दरवाजे से बाहर जा रहे थे तो वे (केंद्रीय गृह राज्य मंत्री )ओम मेहता से यह सुनकर आश्चर्य चकित हो गए कि अगले दिन (यानी 26 जून 1975 को)उच्च न्यायालयों को बन्द करने के आदेश दे दिए गए है।

सभी समाचार पत्रों को बिजली सप्लाई बन्द करने के भी आदेश दिए गए हैं।’’

   श्री राय इस बात के विरोधी थे।

 वे इस फैसले को प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर रद करवाना चाहते थे।

दरअसल यह फैसला संजय गांधी का था जो किसी पद पर नहीं थे।

  इस बीच संजय गांधी ने अत्यंत बदतमीजी और गुस्ताखी से कहा कि आप (यानी श्री राय)नहीं जानते कि देश पर शासन कैसे किया जाता है।

अंततः सिद्धार्थ शंकर राय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मिले और उन्होंने दोनों आदेशों को रद करवाया।दरअसल आपातकाल लगाने की सलाह श्री राय की ही थी।

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आपातकाल में एक विधेयक तैयार किया गया था।

उसमें इस बात का प्रावधान था कि राष्ट्रपति,प्रधान मंत्री और लोक सभा के स्पीकर के खिलाफ आजीवन कोई मुकदमा दायर नहीं हो सकता।

पर, किसी ने राजनीतिक कार्यपालिका को समझाया कि ऐसा अनर्थ मत कीजिए।उसके बाद वह उस विधेयक पर काम आगे नहीं बढ़ा।

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22 जुलाई 22 


गुरुवार, 21 जुलाई 2022

 अपनी मदद खुद कीजिए।

कार्बाइड युक्त आम से अपने लीवर, किडनी और 

दिल को बचाइए

शासन आपकी मदद इस बार भी नहीं करेगा

विधान मंडल में भी कोई प्रतिपक्षी इस पर हंगामा नहीं करेगा

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सुरेंद्र किशोर 

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कच्चा आम खरीद कर उसे घर में ही पकाइए ।

पकाइए,यानी स्वाभाविक रूप से उसे पकने दीजिए।

उसे ही खाइए अन्यथा बाजार से लाए गए पके 

आम से आपके दिल, किडनी और लीवर को गंभीर 

खतरा है।

  जानकार लोग लगातार चेतावनी देते रहे हैं।

अब भी चेत जाइए।

सरकार आपको ‘‘कार्बाइड माफिया’’ से नहीं बचाएगी।

सरकार के अंग तो रिश्वत वसूलने में व्यस्त रहते हैं।

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इस साल भी मैंने अपने घर में स्वाभाविक रूप से पके आम खाए।

बाद में कई बार विभिन्न बाजारों से पके आम मंगवाए।

पके आम में मैंने बड़ी मात्रा में कार्बाइड पाया।

आम को मीठा के बदले 

तीता पाया।

खाने में एक ही दिन देर से कार्बाइड युक्त आम सड़ने लगे।

दुर्गंध भी था।

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कार्बाइड युक्त आम के जानलेवा जहर से आपको 

बचाने की हर बार सरकार वादा करती है।

पर कभी बचाती नहीं। 

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इसलिए अपनी मदद खुद कीजिए।

याद रहे ,जानलेवा कार्बाइड सिर्फ आम में ही नहीं है।

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20 जुलाई 22.



 ख्चाहिशों का मोहल्ला बहुत बड़ा होता है।

बेहतर है, हम जरूरतों की गली में मुड़ जाएं

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समय से पहले और तकदीर से ज्यादा कभी 

किसी को कुछ नहीं मिलता

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पिछले कुछ दशकों में मैंने अनेक पदाकांक्षी राजनीतिक कर्मियों को पदतृष्णा की पूर्ति के अभाव में कलटते-कलपते और पद-दाताओं को गरियाते देखा-सुना है।

उनमें से कई गुजर गए।

कई अन्य अब भी मृगतृष्णा के पीछे हैं।

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दरअसल आप कितने महत्वपूर्ण हैं,यह तो आप जानते हैं।

किंतु अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘‘पद-दाताओं’ की नजर में कुल मिलाकर आपकी कितनी उपयोगिता है।

उसके ‘स्केल’ पर आप का स्थान कितना ऊंचा या नीचा है।

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कुछ न पाने का अफसोस क्यों ?

राजनीति के अलावा भी बहुत से क्षेत्र हंै जहां जाकर आप अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं,जन सेवा कर सकते हैं।

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मेरी बातें उन पर लागू नहीं होतीं जो अपने अपार पैसों के 

बल पर जीवन में कुछ भी हासिल कर लते हैं।

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सुरेंद्र किशोर

21 जुलाई 22


मंगलवार, 19 जुलाई 2022

 


इंटेलिजेंस ब्यूरो की ही तरह ‘स्पेशल ब्रांच’ को भी 

कार्य कुशल बनाने की जरूरत 

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सुरेंद्र किशोर

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केंद्रीय इंटेलिजेंस ब्यूरो और राज्य पुलिस के स्पेशल ब्रांच की सतर्कता और गुणवत्ता में भारी फर्क है।

देश-प्रदेश के समक्ष उपस्थित मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए 

राज्य पुलिस के ‘स्पेशल ब्रांच’ को भी आई.बी.की तरह ही दक्ष  बनाने की आज सख्त जरूरत है। 

 दोनों संगठनों की कार्य क्षमता में फर्क का सबसे बड़ा कारण यह बताया जाता है कि इन संगठनों को उपलब्ध साधनों में भी काफी फर्क है।जबकि, काम लगभग एक जैसे करने होते हैं।

  इस फर्क को शीघ्र कम करने की जरूरत है।

यह भी देखने की जरूरत है कि जितने साधन स्पेशल ब्रांच  को उपलब्ध हैं,वह सही जगह ही खर्च हो।

  आई.बी. का काॅडर प्रबंधन बेहतर है।

 आई.बी.के लिए अलग से बहाली होती है।उन्हें समुचित प्रशिक्षण दिया जाता है।

 कई कारणों से आई.बी.की विश्वसनीयता अधिक है।

 इसीलिए कई बार बिहार में हुई किसी बड़ी घटना की खबर आई.बी.को पहले मिल जाती है और स्पेशल ब्रांच को बाद मंे।

कई बार तो स्पेशल ब्रांच को मिलती ही नहीं।

अस्सी और नब्बे के दशकों में एक संवाददाता के रूप में मेरा भी यही अनुभव रहा।

उन दिनों बिहार में आए दिन नर संहार हो रहे थे।

 हाल ही में पटना के पास के फुलवारीशरीफ में जारी देश विरोधी गतिविधियों की जानकारी आई.बी.ने बिहार पुलिस को दी। 

उसके बाद ही बिहार पुलिस कार्रवाई कर सकी।

हालांकि इस बात की सराहना होनी चाहिए कि बिहार पुलिस इस मामले में अब पेशेवर ढंग से काम कर रही है।

  वह दिन कब आएगा जब बिहार पुलिस का स्पेशल ब्रांच कार्य कुशलता मंे आई.बी. की बराबरी कर पाएगा ?

 इसके लिए यह जरूरी होगा कि बिहार सरकार स्पेशल ब्रांच को सचमुच ‘स्पेशल’ बनाने के लिए कुछ खास प्रयास करे।

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चैकसी की नियमित जांच जरूरी 

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पिछले दिनों दिल्ली पुलिस के विशेष कोषांग ने दिल्ली के भीड़भाड़ वाले इलाकों में 30 डमी बम रख दिए थे।

उसे यह देखना था कि पुलिस

कितनी सतर्क रहती है।

इन में से सिर्फ 12 बमों का ही पता लग सका।

दिल्ली पुलिस,प्रायवेट सुरक्षा गार्ड और आम जन की नजरें सिर्फ  12 बमों पर ही पड़ीं।

यदि बम असली होते तो बाकी 18 जगहों में भी विस्फोट हो चुके होते। 

 दिल्ली का जब यह हाल है तो राज्यों की राजधानियों में सतर्कता का क्या हाल होगा ,उसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

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पावती पर अब लघु हस्ताक्षर नहीं

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बिहार सरकार ने अपने अधिकारियों को यह आदेश दिया 

है कि आम लोगों से मिले आवेदन पत्रों की पावती पर अब लघु हस्ताक्षर नहीं चलेगा।

इतना ही नहीं, पूरे हस्ताक्षर के साथ पावती देने से इनकार करने वाले सरकारी कर्मियों 

के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

  डाक से आए आवेदनों की पावती डाक से ही भेजी जाएगी।

     बिहार सरकार यदि अपने इस आदेश को लागू कराने में सफल हो गई तो इससे पीड़ित लोगों को भारी राहत मिलेगी।

 पर, समस्या सिर्फ पावती न मिलने की ही नहीं है।

मुख्य सवाल यह है कि सरकारी कार्यालयों में 

उन लोगों के आवेदन पत्रों का क्या हश्र होता है जो संबंधित कर्मियों को खुश करने की स्थिति में नहीं होते ?

  बिहार सरकार के समक्ष,देश की अन्य सरकारांे के समक्ष भी, हमेशा से ही यह बड़ी चुनौती रही है कि कैसे जनता को रिश्वतखोरी से राहत दिलाई जा सके।

  इन दिनों भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ जितने बड़े पैमाने पर बिहार में कार्रवाइयां हो रही हैं,उतने बड़े पैमाने पर पहले कभी नहीं हुई।इसके बावजूद बिहार के सरकारी कार्यालयों में रिश्वतखेारी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है।क्या इसलिए कि रिश्वतखोर अब भी यह समझ रहे हैं कि ‘‘मारने वालों से अधिक ताकतवर अंततः बचाने वाला होता है ?’’

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समयबद्ध निपटारे का बंधन

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कल्पना कीजिए कि एक  किसान दशकों से अपनी दस बीघे जमीन की मालगुजारी  रसीद कटवाता रहा था।

 अब कर्मचारी कहता है कि आपको आठ बीघे जमीन की ही रसीद कटेगी।जबकि दस बीघा जमीन हमेशा उसके शांतिपूर्ण कब्जे में रही है।

संबंधित आॅफिस में उसे यह बताया जाता है कि आठ बीघे को पहले जैसा दस बीघा बनाने के लिए अब आपको 50 हजार रुपए देने पड़ेंगे।

वह इतना पैसा देने की स्थिति में नहीं है।

  यदि इस संबंध में किसान कोई आवेदन पत्र देकर सवाल पूछता है कि है तो अब

पूरे दस्तखत के साथ पावती रसीद तो उसे मिल सकेगी ।

किंतु उसे उसके सवाल का जवाब भी तीन महीने के भीतर मिल जाए कि उसका दो बीघा कम क्यों हो गया ?

  यदि तीन महीने में जवाब नहीं मिलता है तो वह कहां दौड़ेगा ?

उसके लिए और ऐसे अन्य पीड़ितों के लिए अंचल कार्यालयों 

में समय- समय पर जिले के  उच्च अफसरों के शिविर लगे।

 उसमें यह फैसला हो कि दो बीघा कम करने का दोषी कौन है ? 

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और अंत में 

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 फुलवारीशरीफ में खतरनाक और देश विरोधी आतंकी संरचना यानी टेरर माड्यूल का हाल ही में पता चला है।

इस ‘टेरर माड्यूल’के बारे में विभिन्न राजनीतिक दलों की क्या राय हैं ?

उधर अधिकतर निरपेक्ष जनता की इस मोड्यूल पर क्या राय है ?

क्या अधिकतर जनता की राय और राजनीतिक दलों की राय  के बीच कोई आपसी तालमेल है ?

यदि हां,तब तो ठीक है।

यदि नहीं तो कुछ दलों को  अपने चुनावी भविष्य की चिंता अभी से कर लेनी चाहिए।

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18 जुलाई 22 के

दैनिक प्रभात खबर,

(पटना) में प्रकाशित 


सोमवार, 18 जुलाई 2022

      कल और आज !

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(अपवादों को छोड़कर)पहले की नई पीढ़ियों कहती थीं--

‘‘मैं आज जो कुछ भी हूं ,वह माता-पिता 

और गुरुजन की कृपा से।’’

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(अपवादों को छोड़कर)आज की नई पीढ़ी कहती है कि मैंने सिर्फ अपने बल पर उपलब्धियां हासिल की हैं।

यदि माता-पिता का सहयोग मिल गया होता तो मैं अपने जीवन में और भी आगे बढ़ जाता।

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किसी ने ठीक ही कहा है कि आज की पीढ़ी(अपवादों को छोड़कर)

अपने बुजुर्ग माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से भागने के लिए ही यह कहती है कि उन्होंने मेरे लिए किया ही क्या था,मेरी उपेक्षा के सिवा !!

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सुरेंद्र किशोर

18 जुलाई 22  


सोमवार, 11 जुलाई 2022

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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नेताओं की सिफारिश पर अफसरों की महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती जनहित में नहीं

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बिहार के पिछले अनुभव बताते हैं कि नेताओं,विधायकों और मंत्रियों की सिफारिशों के आधार पर जिलों में छोटे-बड़े अफसरों की तैनाती उन राज्य सरकारों व आम लोगों के लिए हितकारी साबित नहीं हुई।

जाहिर है कि जिस नेता की सिफारिश पर कोई अफसर किसी महत्वपूर्ण पद पर तैनात होगा,वह सरकारी काम काज में उस नेता को तरजीह देगा।

 अपवादों को छोड़कर आम तौर पर किसी नेता का हित प्रतिस्पर्धी नेता के हित से टकराता रहता है।

कई बार तो नेता का हित आम जनता के हित से टकराने लगता है।

  वैसी स्थिति लोकतांत्रिक शासन के हक में कत्तई नहीं है।

क्या उससे सत्ताधारी दल को भी राजनीतिक लाभ होगा ?

क्या उससे राज्य सरकार की छवि जनता में बेहतर बनेगी ?

अंचल कार्यालयों और थानों के कार्यकलापों से किसी राज्य सरकार की छवि बनती या बिगड़ती है।

 बिहार में अंचल कार्यालयों और थानों की मौजूदा कार्य पद्धति में भारी से सुधार की जरूरत है।

इसके लिए जरूरी यह है कि सी.ओ. और थानेदारों की तैनाती में पेशेवर दक्ष और यथासंभव ईमानदार अफसरों को ही तरजीह मिले।

  कई बार जन प्रतिनिधियों को उन अफसरों की दक्षता-ईमानदारी का पता नहीं होता जिसकी वे सिफारिश कर रहे होते हैं।

  इसलिए किसी अफसर की दक्षता-ईमानदारी की जांच  निरपेक्ष,ईमानदार और पेशेवर सरकारी अफसरों की टीम से ही 

उनके सर्विस रिकाॅर्ड देखकर

कराई जानी चाहिए।

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        सिफारिश की परंपरा पुरानी

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  पिछले अनुभव बताते हैं कि  अपने मन लायक अफसर की तैनाती का लोभ विधायक से लेकर मंत्री तक संवरण नहीं कर पाते।

  1977 में बिहार सरकार के मुख्य सचिव रहे पी.एस.अप्पू ने अपना संस्मरण लिखा है।

 ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ अफसर रहे दिवंगत अप्पू ने लिखा कि ‘‘सन 1977 की बिहार सरकार के अधिकतर मंत्री अपनी जाति के अफसर को विभागीय सचिव बनाना चाहते थे। उनकी जाति के ईमानदार अफसर नहीं बल्कि सबसे बेईमान अफसर उन्हें चाहिए था।’’

   दूसरी ओर, सन 1977 की बिहार सरकार में दबंग मंत्री रहे एक नेता ने बाद में मुझे अपना अनुभव सुनाया था।

उन्होंने कहा कि ‘‘जब मैं मंत्री था और फाइल पर कोई नोट लिखता था तो बड़े अफसर कहते थे कि सर, आपकी टिप्पणयों में श्रीबाबू (बिहार के प्रथम मुख्य मंत्री) की नोटिंग का स्तर देखने को मिलता है।’’

किंतु जब मैं मंत्री नहीं रहा और उन्हीं अफसरों को फोन करता था तो वे कभी फोन पर नहीं आते थे।’’

   याद रहे कि अस्सी और नब्बे के दशकों में कई मामलों में स्थानीय विधायकों और मंत्रियों की पसंद के डी.एम. और एस.पी.उनके जिलों में जाते थे।

  पर,उसका नतीजा उन सरकारों के लिए अच्छा नहीं हुआ।

  ऐसी पोस्ंिटग व पक्षपातपूर्ण शासन के कारण भी जनरोष बढ़ा और वे सत्ताधारी पार्टियां चुनाव हारती चली गईं। 

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रक्षा निर्यात में वृद्धि

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वित्तीय वर्ष 2021-22 में भारत ने करीब 13 हजार करोड़ रुपए के गोल-बारुद विदेशों को निर्यात किए।

सन 2014 की अपेक्षा छह गुनी रक्षा -सामग्री का निर्यात 

हुआ है। 

इसमें करीब 70 प्रतिशत योगदान निजी क्षेत्रों का है।बाकी सार्वजनिक क्षेत्र का।

जानकार सूत्रों के अनुसार सन 2025 तक 36 हजार 500 करोड़ रुपए की रक्षा सामग्री के निर्यात का लक्ष्य रखा गया है।

हथियारों के उत्पादन व निर्यात के मामलों में मजबूत होते जाने से अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत का महत्व इधर बढ़ा है।

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  आरक्षण के वर्गीकरण में देरी

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रोहिणी आयोग का कार्यकाल एक बार फिर बढ़ा दिया गया है।

उसका गठन 2017 में नरेंद्र मोदी सरकार ने किया  था।

इस बीच रोहिणी आयोग ने भी पाया कि कुल 2633 पिछड़ी जातियों में से करीब 1000 जातियों को तो आज तक आरक्षण का कोई लाभ मिला ही नहीं।

इसलिए 27 प्रतिशत आरक्षण को चार हिस्सों में बांट दिया जाना चाहिए।

  याद रहे कि मंडल आरक्षण का अधिक लाभ उन पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों का मिल जाता है जो अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध हैं।

  इस सिफारिश के बाद रोहिणी आयोग के जिम्मे अब कौन सा काम बाकी है,यह पता नहीं चल सका है।

केंद्र सरकार ने चार हिस्सों में बांटने वाली सिफारिश पर अब तक कोई निर्णय नहीं किया है।

  2017 के आंकड़े के अनुसार केंद्र सरकार की नौकरियों में पिछड़ी जातियों का औसतन कुल 20.26 प्रतिशत प्रतिनिधित्व है।

जबकि 27 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं।

जानकार बताते हैं कि उप वर्गीकरण के बाद शायद सीटें भरने लगेंगी।

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भूली-बिसरी याद

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कई बार कुछ लोग यह पूछ देते हैं कि सन 1950 में केंद्र

सरकार के कौन -कौन मंत्री थे ?

पुरानी पीढ़ियों के कुछ लोग तो बता भी देते थे।

पर,आज की पीढ़ी ?

उनसे यह जानने की क्यों उम्मीद की जाए ?

किंतु सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए यहां उनके नाम दिए जा रहे हैं।

वे थे-जवाहरलाल नेहरू(प्रधान मंत्री),सरदार वल्लभ भाई पटेल(उप प्रधान मंत्री),बी.आर.आम्बेडकर,रफी अहमद किदवई,सरदार बलदेव सिंह,अबुल कलाम आजाद,जाॅन मथाई,जगजीवन राम,राजकुमारी अमृत कौर,श्यामा प्रसाद मुखर्जी,खुर्शीद लाल,आर. आर. दिवाकर,मोहनलाल सक्सेना,एन.गोपाल स्वामी अयंगार,एन.वी.गाडगिल,के.सी.नियोगी,जयरामदास दौलतराम,के.संथानम,सत्यनारायण सिन्हा,

और बी.वी.केसकर(सभी मंत्री)।

याद रहे कि उससे पहले की अंतरिम केंद्र सरकार में डा.राजेंद्र प्रसाद और सी.राजगोपालाचारी भी कैबिनेट मंत्री रह चुके थे।

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और अंत में

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धरती के पास जितने साधन उपलब्ध हैं,उनसे वह करीब दो अरब लोगों की ही जरुरतों को पूरा कर सकती है।

किंतु दुनिया की आबादी बढ़कर करीब साढ़े सात अरब हो चुकी है। बढ़ती ही जा रही है।

अब कल्पना कर लीजिए कि हम अंततः 

अपने वंशजों के लिए क्या और कितना छोड़कर जाएंगे ?

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कानोंकान

प्रभात खबर

पटना

11 जुलाई 22


      श्रीलंका की घटनाओं से सबक लेने का वक्त

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       सुरेंद्र किशोर

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 राजनीति मंें परिवारवाद-भ्रष्टाचार  ने श्रीलंका को बर्बाद कर दिया।

पांच राजपक्षे भाइयों ने मिलकर देश को लूटा।

इस परिवार के पास देश की सरकार का 70 प्रतिशत बजट था।

वित मंत्री को ‘‘मिस्टर टेन परसेंट’’कहा जाता था।

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इस उदाहरण को देखते हुए भारत के परिवारवादी-वंशवादी राजनीतिक परिवारों का एक दिन क्या हाल होगा ?!!

यहां तो अब अत्यंत थोड़े से अपवादों के छोड़कर सिर्फ 10 प्रतिशत से तो किसी को संतोष ही नहीं है-चाहे नेता  परिवारवादी हो या नहीं हो।

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राजनीति का परिवारवाद यहां भी ढह रहा है।पर बहुत धीरे -धीरे ।

क्या पूरी तरह ढह जाने के पहले उन्हें कुछ और कारनामा करना है ?

पहले ही परिवारवाद-वंशवाद-भ्रष्टाचार से यह देश व खुद कुछ दल एक हद तक बर्बाद हो चुके हैं।

यहां भी किसी दल को जब जातीय-धार्मिक वोट बैंक की ताकत मिल जाती है तो वह सरकार में आने पर लूटने लगता है।

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अब जरा श्रीलंका पर आएं

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 श्रीलंका सरकार में एक ही परिवार(राजपक्षे परिवार) के पांच सदस्य शीर्ष पदों पर विराजमान थे।

वे थे--

1.-गोटाबाया राजपक्षे-राष्ट्रपति 

( रक्षा मंत्रालय इन्हीं के पास ।)

2.-महेंद्र राजपक्षे--प्रधान मंत्री

3.-बासिल राजपक्षे-वित्त मंत्री-

  (इन्हें बी. बी. सी. ने एक बार ‘मिस्टर 10 परसेंट’ कहा था।)

4.-चमल राजपक्षे-सिंचाई मंत्री

5.-नमल राजपक्षे--युवा व खेल मंत्री

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अब वे कहां हैं ? !!

भागे-भागे फिर रहे हैं।

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10 जुलाई 22


सोमवार, 4 जुलाई 2022

 किसी भाषा से दुराव क्यों ?

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शेखर गुप्त और ए.जे.फिलिप की यादें

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सुरेंद्र किशोर

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दैनिक ‘जनसत्ता’ की बैठक के लिए मैं दिल्ली गया हुआ था।

हमारे संपादक अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि आपसे शेखर गुप्त मिलना चाहते हैं।

आप जाकर मिल लीजिए।

शेखर जी तब इंडियन एक्सपे्रस के संपादक थे।

   मैं उनसे मिला।

उन्होंने अन्य बातों के अलावा मुझसे यह भी कहा कि मैं अन्य किसी अंग्रेजी पत्रकार की अपेक्षा इस देश को बेहतर जानता हूं क्योंकि मैं हिन्दी अखबार भी पढ़ता हूं।

उन्होंने कहा कि आप हमारे एक्सप्रेस के लिए भी लिखिए।

मैंने कहा कि मैं अंग्रेजी जानता जरूर हूं किंतु मुझे लिखने का अभ्यास नहीं है।

 उन्होंने कहा कि मैं अनुवाद करवा लंूगा।

आप हिन्दी में ही लिखें।

मैंने पहले तो हिन्दी में ही लिखा।

पर,बाद में अंग्रेजी में लिखकर भेजने लगा।

एक्सप्रेस में मेरी कई रपटें छपी थीं।

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एक अन्य सम्मानित अंग्रेजी पत्रकार की हिन्दी के बारे में राय आपको उनकी इस चिट्ठी से मिल जाएगी जिसकी स्कैन काॅपी इस पोस्ट के साथ दी जा रही है।

 वे हैं द हिन्दुस्तान टाइम्स(पटना) के पूर्व सहायक 

संपादक ए.जे.फिलिप।

 बाद में तो वे बड़े -बडे़ अखबारों में बड़े पदों पर भी रहे।

पटना के ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में वे एक बहुत रोचक व पठनीय साप्ताहिक काॅलम लिखते थे।

 मैं उस काॅलम को जरूर पढ़ता था। 

 उन दिनों मैं दैनिक ‘आज’ के पटना संस्करण में मुख्य संवाददाता के रूप में काम कर रहा था।

1980 की बात है।

  मैंने फिलिप साहब को यह सलाह दी कि  आप अपने काॅलम में रेणु जी पर कभी लिखिए।

उन्होंने न सिर्फ लिखा,बल्कि मुझे हिन्दी में इस संबंध में पत्र भी लिखा।

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फिलिप साहब के भी व्यवहार में न तो अंग्रेजी भाषा में पत्रकारिता करने का कोई अतिरिक्त गुमान था और न ही यह बात थी कि किसी 

‘‘वर्नेक्युलर जनर्लिस्ट’’ की सलाह को सम्मान देने की भला क्या जरूरत है !  

फिलिप साहब का वह पत्र मुग्ध कर देने वाला था।

इसीलिए तो पिछले 42 साल से मेरे पास हैै।

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3 जुलाई 22