बुधवार, 30 नवंबर 2022

    वैद्य मेलबोर्न में

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     सुरेंद्र किशोर

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राॅयल कालेज आॅफ सर्जन, मेलबाॅर्न, आॅस्ट्रेलिया के परिसर में प्राचीन भारतीय शल्य चिकित्सक सुश्रुत की दिव्य मूर्ति आज भी विराजमान है।

ईसा से 800 साल पहले सुश्रुत का जन्म वाराणसी में हुआ था।

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इस तथ्य को लेकर यदि आपको शक हो तो गुगुल गुरु से पूछ लीजिएगा।

वहां सचित्र सबूत मौजूद है।

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जब इस देश के तक्षशिला और नालंदा विश्व विद्यालयों में दुनिया भर से छात्र आकर पढ़ते थे, कहते हैं कि यूरोप में तब अधिकतर लोग जंगलों में रहते थे।

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हमारी प्राचीन सभ्यता कैसी थी ?

उन सभ्यताओं को किन आक्रांताओं ने समय- समय पर नष्ट किया ?

किन स्वेदशी योद्धाओं ने बहादुरी से उनका भरसक मुकाबला किया ?

 किन आक्रांताओं ने यहां मेकाॅलेवाद लागू किया ?

इन सब के बारे में यदि नई पीढ़ी को पढाया जाए तो क्या उसे इतिहास को बदलना कहा जाएगा ?

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इंडोनेशिया की जल सेना का ध्येय 

वाक्य है--‘‘ जलेष्वेव जयामहे’’

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कोलंबो विश्वविद्यालय,श्रीलंका का ध्येय वाक्य है-

बुद्धिःसर्वत्र भ्राजते

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पुनश्चः-

न तो प्राचीन काल की सारी बातें अच्छी हैं और न सारी बातें गलत हैं।

अर्वाचीन की न तो सारी बातंे अच्छी हैं और न ही सारी

बातें गलत हैं।

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बल्कि, समय की शिला पर पटका-झटका खाकर जो

तथ्य खरे सोने की तरह उभरे-चमके हैं,वे ही सही हैं।

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30 नवंबर 22


 पहले केरल में कम्युनिस्ट सरकार के मंत्री

 और बाद में सुप्रीम कोर्ट के जज

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      सुरेंद्र किशोर

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वी.आर. कृष्णा अय्यर सन 1957-59 में सी.पी.आई.नेता नम्बूदरीपाद मंत्रिमंडल के सदस्य थे।

अय्यर साहब साठ के दशक मेें केरल हाई कोर्ट के जज हुए।

1973 में सुप्रीम कोर्ट के जज बने।

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बहरूल इस्लाम सन 1962 और 1968 मंे कांग्रेस के टिकट पर राज्य सभा के सदस्य बने। 

सन 1972 में हाईकोर्ट जज बने।

1980 में सुप्रीम कोर्ट जज बने।

1983 में जज पद से इस्तीफा देकर कांग्रेस के टिकट पर फिर राज्य सभा के सदस्य बन गए।

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इन दिनों जजों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच तनातनी जारी है।

इसी संदर्भ में मैंने उपयुक्त तथ्यों से आपको अवगत कराया।

वैसे इस तरह के अन्य उदाहरण भी आपको मिल सकते हैं।

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सुरेंद्र किशोर

29 नवंबर 22 


मंगलवार, 29 नवंबर 2022

 चुनावी तथा राजनीतिक खर्चे

कम करके नेता और राजनीतिक दल आदर्श उपस्थित करंे

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अन्यथा, सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचारों पर 

काबू पाने की प्रधान मंत्री तथा अन्य की कोशिश

कत्तई सफल नहीं होगी

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सुरेंद्र किशोर 

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कई दशक पहले की बात है।

पटना के सालिमपुर अहरा स्थित पार्टी आॅफिस में पीलू मोदी 

एक ‘इजी चेयर’ पर पसरे हुए थे।

उनके अगल-बगल कर्पूरी ठाकुर और मैं था।

उन दिनों कर्पूरी ठाकुर और पीलू मोदी 

एक ही दल यानी संभवतः भारतीय लोक दल में थे।

कर्पूरी जी ने पीलू साहब से विनम्रता से कहा,

‘‘मोदी जी,यदि हमारी बिहार पार्टी के लिए आप एक हेलिकाॅप्टर का प्रबंध कर दें तो हम बिहार में विधान सभा की आधी सीटें जीत जाएंगे।’’

  उस पर हंसोड़ पीलू ने कहा,

‘‘मिस्टर कर्पूरी, मैं दो हेलिकाॅप्टर का प्रबंध कर देता हंू,सारी सीटें जीत जाओ।अरे भई,हेलिकाॅप्टर से चुनाव नहीं जीता जाता।’’

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खुद कर्पूरी ठाकुर किसी हेलिकाॅप्टर की मदद के बिना बिहार में दो बार मुख्य मंत्री बन गए।एक बार उप मुख्य मंत्री बने थे।

उन दिनों के किसी दल के नेता का चुनावी खर्च आज जैसा नहीं था।

पीलू मोदी गुजरात के गोधरा से एम.पी.हुआ करते थे।

किंतु पिछले अनुभवों के विपरीत आज के गुजरात के चुनाव में हो रहे खर्चे का एक नमूना 

यहां पेश है।

कल के दैनिक भास्कर में छपी एक खबर के अनुसार इस बार गुजरात में भाजपा,कांगे्रस और आप के नेता सिर्फ भाड़े के विमानों पर करीब 100 करोड़ रुपए खर्च करेंगे।बुकिंग हो चुकी है।यह सिर्फ विमानों का खर्च है।अन्य खर्चों की कल्पना कर लीजिए।

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उधर सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी परेशान व चिंतित रहते हैं।

उन्होंने जांच एजेंसियों को सख्त निदेश दिया है कि वे नाजायज ढंग से पैसे कमाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें।

  इन दिनों ऐसी सख्त कार्रवाइयां हो रही हैं जैसी इस देश में इससे पहले कभी नहीं हुई थी।इससे आम जनता खुश है।

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किंतु भाजपा,कांग्रेस तथा अन्य दलों को चाहिए कि राजनीतिक व चुनावी खर्चे कम करके आदर्श उपस्थित करें।

इससे मौजूदा व अगली पीढ़ियों में नाजायज धनोपार्जन की लालसा आज जैसी तीव्र नहीं रहेगी।

ऐसा नहीं करने से सरकारों तथा अन्य जगहों के भ्रष्टाचार पर काबू पाने में मोदी सरकार को दिक्कतें आएंगी।

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14 नवंबर 22 


   सन्नाटा बनाम भारी भीड़

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 जिस दौड़ में भीड़ कम,प्रतिस्पर्धी कम,

    वहां जीत का चांस बेहतर !

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    --सुरेंद्र किशोर

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किसी ने ठीक ही कहा है कि

यदि आप शीर्ष पर पहुंचना चाहते हो,तो ऐसी दौड़ में 

ही शामिल होओ जिसमें भीड़-भाड़ यानी प्रतिस्पर्धी यानी होड़ बहुत ही कम हों।

  भ्रष्टाचारियों की बड़ी जमात में से हर व्यक्ति एक दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है।

वहां भीड़ बेशुमार है।

नाजायज तरीके से अधिक से अधिक धनोपार्जन की आपसी गलाकाट होड़ है।

यानी, धन-दौलत की लूट है,लूट सके सो लूट !!

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किंतु ईमानदार लोगों की (अघोषित) आपसी प्रतिस्पर्धा में कोई खास भीड़-भाड़़ नहीं है।

कई क्षेत्रों में तो भारी सन्नाटा है।

जहां प्रतिस्पर्धी कम हों,वहां से उभर कर शीर्ष पर पहुंचने का चांस भी काफी बेहतर हैै।

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  27 नवंबर 22


    जन सेवा किशोर कुणाल (अवकाशप्राप्त 

    आई.पी.एस.)के स्वाभाव में है

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     सुरेंद्र किशोर-

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मैंने आज पत्नी से कहा कि 

कुणाल साहब के पुत्र की शादी के बाद का स्वागत-समारोह उसी वेटनरी काॅलेज के मैदान में होने जा रहा है,जहां कभी तुम्हारा स्कूल हुआ करता था।

पत्नी ने देर किए बिना कह दिया,

‘‘आपको वहां जरूर जाना चाहिए।’’

मैंने कहा कि तुम जानती हो कि मैं अभी अस्वस्थ हूं ।

 कहीं जा नहीं जा रहा हूं।फिर भी तुमने यह कैसे कह दिया !

उसने कहा--अरे हां !!

पर,उसका कारण उसने बताया।

नब्बे के दशक की बात है।

मेरी पत्नी हमारे एक रिश्तेदार मुखिया जी की पत्नी के साथ  बाबा धाम,देवघर गई थी।

लौटती में पटना रेलवे जंक्शन पर रात साढ़े नौ बज गए थे।

पत्नी ने बताया कि तब हमलोग मजिस्ट्रेट काॅलोनी में रहते थे।

उन दिनों पटना में रात-विरात चलने से लोग बचते थे।

 इसी सोच-विचार में मेरी पत्नी महावीर मंदिर की सीढ़ी पर बैठी हुई थी।

क्या किया जाए ?

स्टेशन प्लेटफार्म पर रुक जाया जाए,या आॅटो पकड़ा जाए ?

इसी बीच कुणाल साहब (यानी, किशोर कुणाल) वहां पहुंच गए।

उन्होंने दो महिलाओं को अकेला देखकर पूछा कि ‘‘आपलोग कहां से आई हैं और कहां जाना है ?’’

मेरी पत्नी ने कहा कि ‘‘हमलोग बाबा धाम से आ रहे हैं।

मजिस्ट्रेट काॅलोनी जाना है।’’

उसके बाद उसी सीढ़ी पर कुणाल साहब भी बगल में बैठ गए।

उन्होंने अपनी दोनांे तलहथियां सामने फैलाते हुए कहा कि प्रसाद दे दीजिए।

उन्हें प्रसाद दिया गया।

उसके बाद उन्होंने आॅटो रिक्शावाले को पास बुलाया।

कहा कि तुम अपना लाइसेंस मुझे दे दो।

उसने दे दिया।

कुणाल साहब ने कहा कि इन लोगों को मजिस्ट्रेट काॅलोनी पहुंचा कर यहां आ जाओ और अपना लाइसेंस मुझसे ले लेना।

आॅटो वाला जब पत्नी को लेकर गतव्य स्थान की ओर चला तो पूछा कि कुणाल साहब आपके कौन हैं ?

मेरी पत्नी ने कहा कि वे मेरे भाई हैं।

लगे हाथ यह भी बता दूं कि कुणाल साहब मुझे सन 1983 से ही जानते थे।

बाॅबी कांड को लेकर वे आम लोगों में भी लोकप्रिय हो चुके थे।

पर, जब महावीर मंदिर की सीढ़ी पर मेरी पत्नी से मुलाकात हुई तो मेरी पत्नी ने उन्हें मेरा नाम बता कर कोई परिचय नहीं दिया था।

कुणाल साहब ने भी महिलाओं से कोई परिचय नहीं पूछा।

बस वे यही समझ रहे थे कि रात में महिलाओं को रास्ते में कोई परेशानी न हो जाए,इसलिए ड्राइवर का लाइसेंस ले लेना जरूरी था।

याद रहे कि तब वहां कोई पे्रस संवाददाता भी मौजूद नहीं था जिसे वे अपना सेवा भाव का सबूत दे रहे थे।

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29 नवंबर 22


रविवार, 27 नवंबर 2022

      गाय,गंगा और गीता

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      सुरेंद्र किशोर

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सोेनपुर मेले में एक फ्रांसीसी पर्यटक से एक भारतीय टी.वी.संवाददाता ने पूछा,

‘‘यहां आपको वह कौन सी पसंदीदा चीज लगी है जिसे आप अपने कैमरे में कैद कर अपने देश ले जाना और उसे वहां दिखाना पसंद करेंगे ?

पर्यटक ने कोई देर किए कहा--गंगा नदी।

(यह संवाद मैंने अभी-अभी यू ट्यूब पर देखा-सुना है।)

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मैं खुद गांव में बचपन से ही बुजुर्गों से गाय,गीता और गंगा का महत्व सुनता रहा हूं।

  गंगा नदी के जल में जो औषधीय गुण मौजूद हंै,उसकी जानकारी उस फं्रासीसी पर्यटक को है या सिर्फ नदी के विस्तार पर वह मोहित है,यह स्पष्ट नहीं है।

किंतु हम अपने देश के हुक्मरानों की तरफ देखते हैं तो पता चलता है कि उन लोगों ने गाय व गंगा के पुराने स्वरूप को विकृत करने के लिए जाने-अनजाने कोई कोर-कसर उठा नहीं रखा।

 गीता चूंकि एक पुस्तक है,इसलिए उसे नुकसान नहीं पहंुचा सके हैं।

  भारत में गाय का मतलब है-देसी गाय।

देसी गाय के दूध में जो औषधीय गुण है ,वह जर्सी आदि गायों में कत्तई नहीं।

 गंगा को धीरे -धीरे प्रदूषित करने में आजादी के बाद की सरकारों का पूर्ण योगदान रहा है।

मुगलों और अंग्रेजों के राज में गंगा अविरल और निर्मल थी।

साठ के दशक तक मैंने अपने गांव के निकटत्तम दिघवारा में स्थित गंगा को अविरल और निर्मल पाया था।

तब एक बार मैं अपनी बुआ के साथ गंगा स्नान करने

सुबह-सुबह ‘‘गंगा जी’’ गया था।

दातुन करके जैसे ही मैंने उसके चीरे को गंगा में फेंकने का  

उपक्रम किया,मेरी बुजुर्ग बुआ ने मुझे डांटते हुए कहा कि उसे गंगा जी में मत फेंको।बालू पर फेंको।मैंने वही किया।


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26 नवंबर 22 


 तीन अच्छी खबरें

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सुरेंद्र किशोर

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1.-मुुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने नशाबंदी के प्रति एक बार फिर अपनी प्रतिबद्धता दिखाई।यह कदम सराहनीय है।

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बिहार में नशाबंदी के कारण खुद मेरे कतिपय नीयर-डियर दारूबाज होने से बच गए।

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शादी-ब्याह,दुर्गा -सरस्वती विसर्जन जुलूस के साथ अब पटना की सड़कों पर पियक्कड़ों की गंुडागर्दी दिखाई नहीं पड़ती।

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किंतु मेरी शुरू से यह सलाह रही है कि मेडिकल आधार पर कुछ लोगों को शराब खरीदने और पीने की छूट मिलनी चाहिए।

सन 1977 की नशाबंदी के समय मोरारजी देसाई सरकार ने ऐसी छूट दे रखी थी।इसीलिए विरोध का स्वर आज जैसा तब तीखा नहीं था।

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2.--राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने जगदानंद सिंह को प्रदेश राजद अध्यक्ष पद पर सक्रिय करके अपने दल के हित में अच्छा काम किया है।

 उनकी अनुपस्थिति में जगदानंद सिंह जैसे अनुशासन प्रिय और ईमानदार नेता को बिहार राजद की कमान सौंपना उनकी पार्टी के हक में है।

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3.-प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि 

‘‘राष्ट्र को अधिक ऊंचाई पर ले जाने के लिए संविधान के मौलिक कत्र्तव्यों का पालन करना हम सभी की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।’’ 

कल मैंने भी उन संविधान में दर्ज मौलिक कत्र्तव्यों की सूची अपने फेसबुक वाॅल पर पोस्ट कर दी थी।

मेरा मानना है कि यदि मौलिक कत्र्तव्यों का पालन हो तो इस देश की अनेक समस्याओं का हल हो जाएगा।

दूसरी ओर, आज के विभिन्न राजनीतिक दल के नेता गण और एकतरफा सोच वाले बुद्धिजीवी अपने राजनीतिक और विवादास्पद हितों की पूर्ति के लिए देश के सामने भारतीय संविधान की अलग -अलग व्याख्याएं प्रस्तुत करते रहते हैं।

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27 नवंबर 22 


शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

    एक वो भी जमाना था !!

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  सुरेंद्र किशोर उर्फ सुरेंद्र अकेला

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 मैंने पटना से प्रकाशित ‘जनता’ साप्ताहिक में संपादक के नाम एक पत्र (11 नवंबर, 1973) लिखा था।

उसमें इस बात की शिकायत की गई थी कि डाक से भेजी जाने वाली पत्रिकाओं को ग्राहकों तक पहुंचाने के बदले कुछ डाक कर्मी उन्हें अपने घर ले जाते हैं।

उनमें से कुछ पढ़ने के लिए ले जाते हैं तो कुछ अन्य उसे चूल्हे में झोंकने के लिए।

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तब का शासन तंत्र अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील था।

 उस पत्र के जवाब में बिहार अंचल के महा डाकपाल ने जनता साप्तहिक को ,जहां मैं सहायक संपादक के रूप में कार्यरत था,एक पत्र लिखा।

लिखा कि ‘‘मैं आपकी शिकायतों की पूरी छानबीन कर रहा हूं और शीघ्र दुबारा आपको सूचित करूंगा।’’

(दोनों की स्कैन काॅपी यहां पेश है।)

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सन 1976 में मेरी पत्नी की सरकारी स्कूल में सहायक शिक्षिका के रूप में बहाली हुई थी।

सारण के डी.एस.ई.आॅफिस ने उसकी ऐसी जगह एक सुदूर गांव में पोस्टिंग कर दी जहां दो नदियों को पार कर जाना पड़ता था।

   मैंने इस सबंध में दैनिक ‘सर्चलाइट’ में संपादक के नाम पत्र लिखा।वह छपा भी।ं

पटना सचिवालय ने उस पत्र की कटिंग के आधार पर फाइल खोली।

नतीजतन मेरी पत्नी का मेरे गांव के नजदीक के स्कूल में स्थानांतरण हो गया।

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1977 में जब कर्पूरी ठाकुर मुख्य मंत्री बने तो उन्होंने अपने अफसरों को निदेश दिया कि वे अखबारों में छप रहे संपादक के नाम पत्र जरूर पढें़,उनमें लिखी गई समस्याओं पर ध्यान दें।समुचित कार्रवाई करें।

इस क्रम में कर्पूरी जी ने दैनिक ‘जनशक्ति’ का खास तौर पर जिक्र किया था।

‘जनशक्ति’ सी.पी.आई. से जुड़ा अखबार था।

सी.पी.आई.उन दिनों जनता सरकार की कट्टर विरोधी थी।

जनशक्ति में उसकी झलक साफ दिखाई पड़ती थी।

याद रहे कि कर्पूरी जी ‘‘निंदक नियरे राखिए’’ वाला सिद्धांत मानते थे। 

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यह सब मैंने क्यों लिखा ?

अब इसे आप ही समझिए और गुणिए ।

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25 नवंबर 22

  

 


गुरुवार, 24 नवंबर 2022

  जिस देश में ऐसे -ऐसे नेता सत्ता में ,

 उस देश में लोकतंत्र का भविष्य कैसा ?

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    सुरेंद्र किशोर

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  ममता बनर्जी ने बंगलादेशी घुसपैठिया समर्थक वाम मोरचा सरकार का विरोध करके पश्चिम बंगाल में सन 2011 में सत्ता में आईं ।

  सत्ता में आने के बाद अब मुख्य मंत्री ममता बनर्जी उन घुसपैठियों को शरणार्थी बता रही हैं।

ममता उनसे कह रही है कि वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वा लो अन्यथा केंद्र सरकार तुम्हें डिटेंशन कैंप में भेज देगी।

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  4 अगस्त, 2005 को ममता बनर्जी ने लोक सभा के स्पीकर के टेबल पर कागज का पुलिंदा फेंका।

उसमें अवैध बंगला देशी घुसपैठियों को (पश्चिम बंगाल के वाम मोरचा सरकार द्वारा) मतदाता बनाए जाने के सबूत थे।

उनके नाम गैरकानूनी तरीके से मतदाता सूची में शामिल करा दिए गए थे।जबकि उनके नाम बांग्ला देश के वोटर लिस्ट में भी थे।

तब ममता ने सदन में कहा कि घुसपैठ की समस्या राज्य में महा विपत्ति बन चुकी है।

इन घुसपैठियों के वोट का लाभ वाम मोर्चा उठा रहा है।

ममता ने उस पर सदन में चर्चा की मांग की।

चर्चा की अनुमति न मिलने पर ममता ने सदन की सदस्यता

 से इस्तीफा भी दे दिया था।

 चूंकि एक प्रारूप में विधिवत तरीके से इस्तीफा तैयार नहीं था,

इसलिए उसे मंजूर नहीं किया गया।

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अब वही बंगलादेशी घुसपैठिए ममता के विपत्ति के बदले वरदान बन चुके हैं।उनकी चुनावी जीत का मूलाधार वही हैं।

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इधर लगता है कि केंद्र सरकार घुसपैठियों के खिलाफ कोई अभियान चलाने वाली है। एक पूर्व अफसर को 

पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाए जाने से यह संकेत मिल रहा है।संभव है कि ममता जी को अलग से इस संबंध में कोई

खास सूचना मिली हो।

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दूसरा दृश्य

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कांग्रेसी भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के नेतृत्व में आदोलन चला कर उससे मिली लोकप्रियता के कारण आम आदमी पार्टी सत्ता में आईं।

अब वही पार्टी तिहाड़ जेल में कैद अपने मंत्री सत्येंद्र जैन से इस्तीफा तक नहीं ले रही है।जबकि, जैन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं।

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   जिस देश में ऐसे -ऐसे नेता सत्ता में आ -आकर देश का कचरा करते रहते हैं,उस देश में लोकतंत्र कितने दिनों को मेहमान है ?

‘आप’ और टी.एम.सी.के अलावा भी ऐसे उदाहरण आपको इस अभागे देश में मिल जाएंगे।


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24 नवंबर 22  


 


सोमवार, 21 नवंबर 2022

   एक नयी वैचारिक पहल 

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सुरेंद्र किशोर

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मौजूदा संरचनात्मक स्वरूप को बनाए रखते हुए

क्यों न राज्य सभा के सदस्यों का कार्यकाल 

छह साल से घटा कर पांच साल कर दिया जाए ?

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क्यों न दोनों सदनों का कार्यकाल एक साथ 

शुरू हो और एक ही साथ अंत भी हो जाए ?

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क्यों न राज्य सभा का कार्यकाल भी लोक सभा की तरह ही पांच साल का कर देने के प्रस्ताव पर विचार किया जाए ? 

दोनों सदनों का गठन भी एक ही साथ हो।

राज्य सभा के ‘‘स्थायी स्वरूप’’ को क्यों न समाप्त कर दिया जाए ?

हां, राज्य सभा के मौजूदा संरचनात्मक स्वरूप को 

बनाए रखा जाना चाहिए।

ताकि, जिन लोगों का प्रतिनिधित्व लोक सभा में नहीं हो पाता,उनका प्रतिनिधित्व राज्य सभा के जरिए संसद में हो सके।और बेहतर तरीके से हो।

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ऐसा मैं क्यों कह रहा हूं ?

कई जानकार लोगों की राय है कि ‘‘देश की एकता-अखंडता को बनाए रखने के लिए ऐसा करना जरूरी हो गया है।

इन दिनों इस देश के कुछ राज्यों में ऐसे राष्ट्र विरोधी तत्वों को पनपने और उन्हें मजबूत होने का अवसर मिल रहा है,जिन पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो 

देश पर देर-सबेर बड़ा संकट आ सकता है।’’

 जाहिर है कि उन पर काबू पाने के लिए कुछ राज्य सरकारों को भंग कर वहां राष्ट्रपति शासन लागू करना जरूरी है।क्योंकि राज्यों के पास उतने साधन नहीं हैं जिनसे वे उन तत्वों से निपट सकें।

पर, चूंकि सत्ताधारी दल को राज्य सभा में बहुमत नहीं है,इसलिए राष्ट्रपति शासन संभव नहीं हो पा रहा है।

याद रहे कि राष्ट्रपति शासन की दोनों सदनों से पुष्टि जरूरी होती है।

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आजादी के बाद इस देश में 115 बार विभिन्न राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा चुका है।

पर आज सख्त जरूरत रहने के बावजूद नरेंद्र मोदी सरकार किसी तत्संबंधित राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू नहीं कर पा रही है।

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लोक सभा और राज्य सभा का गठन यदि एक साथ हो तो दोनों सदनों में सत्ताधारी दल का बहुमत संभव है।

पर,दोनों सदनों में बहुमत के अभाव में सत्ताधारी दल न तो अपने चुनाव घोषणा पत्र को पूरी तरह लागू कर पाता है और न ही आपाद स्थिति में देश की सुरक्षा के लिए कोई कड़ा कदम उठा सकता है।

यदि राज्य सभा का कार्यकाल बदल जाए तो आज उसका लाभ भाजपा को होगा।

 कल उसका लाभ सत्ता में आने वाला कोई गैर भाजपा दल उठा सकता है।

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  संविधान निर्माताओं ने जब राज्य सभा की रचना की तो यह सोच कर उसका ऐसा स्वरूप बनाया ताकि वह लोक सभा से अलग तरह की विशिष्टता लिए हुए हो।

  पर, समय के साथ जब अधिकतर मामलों में,यहां तक कि हंगामा करने के मामले में भी,दोनों सदनों का चरित्र एक ही जैसा हो गया है तो फिर उसका यानी राज्य सभा का कार्यकाल अलग क्यों रहे ?

संविधान के अनुच्छेद-80 के अनुसार ‘‘राज्य सभा राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करेगी।’’

साथ ही, विशेष ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव रखने वालों को राष्ट्रपति मनोनीत करेंगे।

  क्या अपवादों को छोड़कर इन दोनांे प्रावधानों का पालन आज हो रहा है ?

 पहले राज्य सभा को लोग एक शालीन और विद्वान सदन के रूप में जानते-पहचानते  थे।

लोक सभा के सदस्य जनता से सीधे चुने हुए थे,इसलिए कोई जरूरी नहीं कि वे विद्वान भी हों।

क्या इस मामले में आज दोनों सदनों में कोई अंतर रह

 गया है ?

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दूसरी ओर, जो दिक्कतें आ रही हैं,उनकी कल्पना संविधान निर्माताओं को नहीं थी।

तब संभवतः यह माना जा रहा था कि एक ही दल या दल समूह का दोनों सदनों में लगातार बहुमत रहता रहेगा।

 कुछ दशकों तक ऐसा हुआ भी।

 पर,समय बीतने के साथ कई बार ऐसा हुआ कि लोक सभा में बहुमत हासिल कर लेने के बावजूद सरकार देशहित के  अपने महत्वपूर्ण नीतियों -कार्यक्रमों को लागू नहीं कर सकी।

क्योंकि राज्य सभा में उसका बहुमत नहीं था।

  लोक सभा चुनाव में भारी बहुमत से आम जनता से मिले  जनादेश के बावजूद कई बार राजनीतिक दल बहुत से अच्छे काम नहीं कर पाते।

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एक अन्य तरह की समस्या भी

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सन 1977 के बाद कई बार ऐसा हुआ कि सरकार के बदल जाने के बावजूद राज्य सभा के उप सभापति के पद पर वही व्यक्ति बने रह गए जो पिछली सरकार के कार्यकाल में चुने गए थे।

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राम निवास मिर्धा मार्च, 1977 से 1980 तक राज्य सभा के उप सभापति थे।

उप सभापति बनने से पहले वे कांग्रेस में थे।

मार्च, 1977 में मोरारजी देसाई की गैर कांग्रेसी सरकार बन गई।

किंतु कांग्रेस ने मिर्धा को उस पद पर बने रहने दिया।

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कांग्रेस की नजमा हेपतुल्ला 1988 में उप सभापति बनीं।

वह सन 2004 तक उस पद पर रहीं।

उस बीच लंबे समय तक अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी।

कांग्रेस ने नजमा से इस्तीफा नहीं दिलवाया।

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कांग्रेस के पी.जे.कुरियन सन 2012 से सन 2018 तक उप सभापति रहे।

कांग्रेस ने उनसे इस्तीफा नहीं मागा।

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

जदयू के हरिवंश नारायण सिंह सन 2018 में उप सभापति बने।

अब भी उस पद पर है।

इस बीच जदयू ने भाजपा से संबंध तोड़ लिया।

  किंतु 17 अगस्त, 2022 को जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह ने अपने प्रेस बयान में कहा कि हरिवंश नारायण सिंह को उप सभापति पद छोड़ने की जरूरत नहीं है।

हरिवंश जी के बारे में जदयू में ताजा सोच-विचार क्या है,यह मुझे नहीं मालूम।

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रामनिवास मिर्धा,नजमा हेपतुल्ला,पी.जे.कुरियन और हरिवंश नारायण सिंह शालीन व्यक्तित्व के धनी रहे हैं।

इन्हें किसी अन्य दल की सरकार के कार्यकाल में भी उप सभापति बने रहने में कोई दिक्कत नहीं हुई।

किंतु संबधित दलों के सारे नेता और कार्यकर्ता एक ही तरह से तो नहीं सोच सकते।

 कुछ दलीय नेताओं के लिए यह असहज स्थिति हो सकती है।

यदि राज्य सभा का कार्यकाल पांच साल का हो जाए तो ऐसी असहजता की नौबत भी नहीं आएगी।

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मेरे फेसबुक वाॅल से 

20 नवंबर 22


 


  नेहरू के चुनाव क्षेत्र फूलपुर से 1967 के बाद 

  उस परिवार से किसी ने चुनाव नहीं लड़ा

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सुरेंद्र किशोर

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  उत्तर प्रदेश के फूल पुर लोक सभा चुनाव क्षेत्र से प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लगातार तीन बार चुनाव जीता था।

सन 1964 में उनके निधन के बाद उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित दो बार वहां से सांसद चुनी गईं।

प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मतभेद के कारण विजयलक्ष्मी पंडित ने अपने कार्यकाल के बीच में ही यानी 1969 में लोक सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।

  उसके बाद हुए उप चुनाव में उस नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य ने वहां से चुनाव नहीं लड़ा।

 प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव जीतती रहीं।

वह उनके पति फिरोज गांधी का चुनाव क्षेत्र था।

संजय गांधी अमेठी से सांसद बने थे।

  फूलपुर लोक सभा क्षेत्र कई मामलों में विशेष रहा ।

 उस क्षेत्र में उप चुनावों को मिलाकर कुल 20 बार अब तक चुनाव हो चुके हैं।

पर वहां से सिर्फ सात बार ही कांग्रेस विजयी हो सकी।

अंतिम बार 1984 में कांग्रेस से रामपूजन पटेल चुने गए थे।

मौजूदा लोक सभा में वहां से भाजपा के केशव देवी पटेल  सदस्य हैं।

  इस क्षेत्र में सन 1962 में जवाहर लाल नेहरू का दिलचस्प चुनावी मुकाबला डा.राम मनोहर लोहिया से  हुआ था।सन 1977 में यहां से हेमवती नंदन बहुगुणा की पत्नी कमला बहुगुणा जनता पार्टी की सांसद बनी थीं।

 उससे पहले सन 1969 में हुए उप चुनाव में संसोपा के जनेश्वर मिश्र ने कांग्रेस के दिग्गज नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री के.डी.मालवीय को हराया था।

इतने महत्वपूर्ण व चर्चित क्षेत्र से सन 2004 में सपा ने अपने वोट बैंक के बूते विवादास्पद बाहुबली अतीक अहमद को सांसद बनवा दिया था।

 फूल पुर लोक सभा क्षेत्र के भीतर पांच विधान सभा क्षेत्र पड़ते हैं।इनमें इलाहाबाद शहर के दो विधान सभा क्षेत्र भी शामिल हैं।

  सन 1962 में डा.लोहिया यहां से नेहरू के खिलाफ समाजवादी युवक रजनी कांत वर्मा को उम्मीदवार बनाना चाहते थे।

पर समाजवादी नेताओं, कार्यकत्र्ताओं  और जनता के एक हिस्से की  मांग के कारण बाद में लोहिया खुद ही वहां से उम्मीदवार बन गए।

  इस चुनावी संघर्ष का काफी प्रचार विदेशी मीडिया में भी हुआ था।

नेहरू को हराना तो अकल्पनीय बात थी।पर डा.लोहिया को  पांच में से दो विधान सभा क्षेत्रों में नेहरू से अधिक मत मिले थे।नेहरू को एक लाख 18 हजार और लोहिया को 54360 वोट मिले।

 बाद में डा.लोहिया ने कहा था कि नेहरू को मैं हरा तो नहीं सका ,पर यथास्थितिवाद की चट्टान में मैंने दरार जरुर डाल दी।उन्होंने यह भी कहा था कि मुझे पराजय का दुःख है,पर इस बात की खुशी है कि भारतीय जनता में जीवन है और वह अंधी नहीं है।

दो विधान सभा क्षेत्रों में नेहरू को प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार की अपेक्षा कम वोट मिलना भी आश्चर्यजनक बात थी।

नेहरू कभी इस देश के युवाओं के ‘हृदय सम्राट’ कहे जाते थे।सन 1952 में संत प्रभुदत्त ब्रहमचारी ने गो वध की समस्या को लेकर नेहरू के खिलाफ फूलपुर में चुनाव लड़ा था।पर नेहरू की चुनावी सेहत पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। 

नेहरू को 2 लाख 33 हजार और ब्रह्मचारी को 56 718 वोट मिले थे।

नेहरू के निधन  और विजय लक्ष्मी पंडित के इस्तीफे के बाद फूल पुर पर भी कांग्रेस का एकाधिकार बना नहीं रह सका

जबकि कभी इलाहाबाद कांग्रेस का राष्ट्रीय मुख्यालय हुआ करता था।इसका यह अर्थ हुआ कि फूल पुर में कांग्रेस पार्टी का नहीं बल्कि नेहरू परिवार का असर था।

  बाद में सिर्फ 1971 और 1984 में खास माहौल में फूल पुर से कांग्रेसी उम्मीदवार विजयी हो सके थे।

वैसे फूल पुर संसदीय क्षेत्र में  दिलचस्प मुकाबला 1969 के उप चुनाव में हुआ।मुख्य मुकाबला कांग्रेस के के.डी.मालवीय और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के जनेश्वर मिश्र के बीच था।के.डी.मालवीय नेहरू मंत्रिमंडल में रह चुके थे। संसोपा के जनेश्वर मिश्र सन 1967 में भी विजय लक्ष्मी पंडित के खिलाफ

चुनाव लड़ चुके थे।पर, तब वह करीब 36 हजार मतों से हार गये थे।पर जब विजय लक्ष्मी पंडित ने सीट छोड़ी तो युवा जनेश्वर को मौका मिल गया।

सन 1967 के आम चुनाव में जनसंघ बस्ती जिले में मालवीय को हरा चुका था।इलाहाबाद के ही मूल निवासी मालवीय उससे पहले कभी इलाहाबाद से चुनाव नहीं लड़े थे।उन्होंने इलाहा बाद में खूब नाता -रिश्ता जोड़ा।वह वामपंथी विचारधारा के थे । इस आधार पर भी उनका प्रचार चल रहा था।मालवीय ने यह भी प्रचार किया कि इस क्षेत्र से नेहरू के प्रियपात्र को ही चुन कर भेजा जाना चाहिए।फिर भी उन्हें इसका कोई चुनावी लाभ नहीं मिला। 

  उधर जनेश्वर मिश्र का कहना था कि देश के सामने यथास्थितिवाद,कलह की राजनीति और अनैतिक आचरण तीन खतरे हैं।

तीनों कांग्रेस में हैं।इसे तोड़ना जरुरी है।

  उप चुनाव में पहली बार किसी  गैर कांग्रेसी नेता की फूलपुर में 1969 में जीत हुई।मालवीय को करीब 62 हजार और 36 वर्षीय जनेश्वर को करीब 83 हजार मत मिले।

इस चुनाव के साथ उत्तर प्रदेश विधान सभा का भी मध्यावधि चुनाव हो रहा था।

फूल पुर के नीचे की पांच में से चार विधान सभा सीटें संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को मिलीं और  कांग्रेस को सिर्फ एक सीट पर संतोष करना पड़ा।

 उन दिनों जनेश्वर मिश्र एक आदर्शवादी युवक थे।उन्हें ‘छोटे लोहिया’ कहा जाता था।उन्हें फूल पुर में नेहरू के प्रभाव  का तिलस्म तोड़ने का श्रेय मिला।

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वेबसाइट ‘मनीकंट्रोल हिन्दी’ से साभार

21 नवंबर 22 


रविवार, 20 नवंबर 2022

    एक काल्पनिक सवाल !

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यदि सन 2024 में केंद्र में सरकार बदल गई तो किसी नई 

सरकार के लिए कितना आसान होगा बड़े- बड़े नेताओं के खिलाफ जारी मुकदमों को वापस लेना ?

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सुरेंद्र किशोर

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सन 2024 के लोक सभा चुनाव के नतीजे की 

कल्पना कीजिए।

यदि उस चुनाव में भाजपा हार गई और नरेंद्र मोदी सरकार हट गई !

तो क्या देश भर के दर्जनों प्रमुख नेताओं के खिलाफ तथाकथित ‘‘बदले की भावना’’ से शुरू किए मुकदमे वापस हो जाएंगे ?

जरूर हो जाएंगे,किंतु इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल एक बड़ी शर्त लगा दी।शर्त पूरी हो जाएगी तो मुकदमे भी वापस हो जाएंगे।

  सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त, 2021 में यह आदेश (तत्संबंधी आदेश वाली खबर की स्कैन काॅपी इस पोस्ट के साथ प्रस्तुत है।)जारी किया कि 

संबंधित राज्य के हाई कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना किसी सांसद या विधायक के खिलाफ जारी मुकदमे वापस नहीं लिए जा सकते।

  अब आप ही अंदाज लगा लीजिए कि कितने गंभीर मामलों में कितने उच्च न्यायालय मुकदमे वापस लेने का आदेश पारित करेंगे ?

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यहां मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सन 2024 के लोक सभा चुनाव के बाद केंद्र में किसकी सरकार बनेगी।

क्योंकि मुझे पूरे देश के मतदाताओं के मानस का अभी कोई अनुमान नहीं।(एक राज्य की

राजधानी में बैठा कोई व्यक्ति अनुमान नहीं,बल्कि सिर्फ अपनी इच्छा ही बता सकता है।अभी मैं अपनी इच्छा क्यों बताऊ ?)

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याद रहे कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा -321 में यह प्रावधान किया गया है कि पी.पी.या ए.पी.पी.संबंधित अदालत की अनुमति से जनहित में कोई मुकदमा वापस ले सकता है।

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पिछले प्रकरण

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सन 1979 में कांग्रेस के समर्थन से केंद्र में चरण सिंह की सरकार बनी थी।

कांग्रेस ने चरण सिंह पर यह दबाव डाला कि वे संजय गांधी के खिलाफ जारी मुकदमों को वापस ले लें।

चरण सिंह राजी नहीं हुए।

नतीजतन चरण सिंह सरकार गिरा दी गई।

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सन 1990 में कांग्रेस की मदद से चंद्रशेखर प्रधान मंत्री बने।

चंद्र शेखर को यह संदेश भिजवाया गया कि बोफोर्स केस वापस कर लिया जाए।

चंद्रशेखर ने मना कर दिया।

कांग्रेस ने चंद्र शेखर की सरकार गिरा दी।

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तब की एक अपुष्ट चर्चा--

बाद में चंद्र शेखर के एक मित्र से किसी ने पूछा कि  

 इतने कम दिनों के लिए वे प्रधान मंत्री क्यों बने ?

मित्र ने कहा कि कोई हिमालय पर्वतारोही, शिखर पर जाकर अपना घर थोड़े ही बनाता है !!

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19 नवंबर 22

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नोट-वैसे मेरा अनुमान है कि मोदी सरकार ही दुबारा सत्ता में आएगी।

---20 नवंबर 22


शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

 सी.वी.आनंद बोस पश्चिम बंगाल के राज्यपाल नियुक्त किए गए हैं।

एक आई.ए.अफसर को एक समस्याग्रस्त प्रदेश का राज्यपाल बनाए जाने के पीछे क्या उस प्रदेश के लिए कोई खास राजनीतिक संकेत है ?

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सुरेंद्र किशोर

18 नवंबर 22


गुरुवार, 17 नवंबर 2022

     कर्पूरी की कहानी

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यदि कोई नेता कर्पूरी ठाकुर जैसा स्वच्छ छवि का हो तो उसकी छोटी-मोटी गलती को सुप्रीम कोर्ट का जज भी नजरअंदाज कर देता है।

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किंतु आज जैसे ही किसी सर्वज्ञात महा भ्रष्ट नेता के खिलाफ भी एजेंसियां कार्रवाई शुरू करती हंै तो एक तरफ वह ‘‘बदले की भावना’’ वाला रटा-रटाया आरोप लगा देता है तो दूसरी तरफ बदजुबानी के साथ-साथ जातीय समर्थन की अपनी ताकत का भी सड़कों पर भांेड़ा प्रदर्शन करने लगता है।

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ऐसे में मुधोलकर आयोग की रपट का एक अंश यहां प्रस्तुत है।

महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार(1967-68)के मंत्रियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज जे.आर.मुधोलकर के नेतृत्व में गठित न्यायिक जांच आयोग ने जांच की थी।

जांच रपट जनवरी, 1969 में आ गई।

(अय्यर और मुधोलकर आयोगों की रपटों की काॅपियां मैंने 

गुलजारबाग,पटना स्थित सरकारी प्रेस से मंगवाई थीं।

मेरा मानना है कि आजादी के तत्काल बाद किस तरह बिहार को यहां के तब के हुक्मरानों ने बर्बाद किया,वह कहानी आपको अय्यर कमीशन की रपट में मिलेगी।

किस तरह आजादी के तत्काल बाद के वर्षों में राष्ट्रीय सत्ताधारी नेताओं ने देश को गलत रास्ते पर चलाया ,उसकी सच्ची कहानी आपको एम.ओ. मथाई की दो किताबों में मिल जाएंगी।

मथाई 13 साल तक प्रधान मंत्री नेहरू का निजी सचिव था।

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  याद रहे कि कर्पूरी ठाकुर महामाया सरकार में उप मुख्य मंत्री,वित्त मंत्री और शिक्षा मंत्री थे।

कुछ अन्य विभाग भी उनके पास थे। 

 कर्पूरी ठाकुर के बारे में मुधोलकर आयोग ने अपनी रपट में लिखा था कि 

‘‘हैड मिस्टर कर्पूरी ठाकुर नाॅट इज्वाएड अ हाई रिपुटेशन ऐज अ क्लीन एंड औनेस्ट पोलिटिकल लीडर आॅफ कंन्ट्री ,आई वुड एभ बीन इनक्लाइंड टू टेक अ वेरी सिरियस भीउ आॅफ द पार्ट ही प्लेड इन दिस साॅरी अफेयर।

   बट ऐज थिंग्स स्टैंड्स एंड ऐज हि ऐपीयर्स टू हैव हिप्टोनाइज्ड हिमसेल्फ इन्टू द बिलिफ दैट साह(कुशेश्वर साह)इज अ डिजर्विंग मैन एंड अ नीडी पाॅलिटिकल सफरर ,आई विल कन्टंेट माइसेल्फ सेइंग दैट हिज ऐक्शन वेयर इम्प्रोपर।’’-पेज नंबर-247 

याद रहे कि यह मामला समस्तीपुर कोर्ट परिसर में स्वतंत्रता सेनानी कुशेश्वर साह को एक स्टाॅल आबंटित करने का था।

आबंटन से पहले नियमों का पालन नहीं किया गया था।

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सुरेंद्र किशोर

17 नवंबर 22



बुधवार, 16 नवंबर 2022

    निजी चैनलों पर सार्थक बहस की दरकार

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      सुरेंद्र किशोर

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प्रश्न-

सार्थक डिबेट के लिए सर्वोत्तम निजी चैनल और सर्वश्रेष्ठ ऐंकर के नाम बताइए।

उत्तर-

चैनल का नाम है सी एन बी सी आवाज।

और ऐंकर हैं नीरज वाजपेयी।

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आज ही मैं सी.एनबी.सी.पर नीरज वाजपेयी के ‘‘ऐंकरत्व’’ में काॅलेजियम बनाम एन.जे.ए.सी.पर अत्यंत सार्थक बहस सुनकर आ रहा हूं।

मैं अपने व्यस्त रूटीन से समय निकाल कर जितने भी चैनल मैं देख पाता हूं,उनमें से मैंने यह चयन किया है।

संभव है कि किसी अन्य अच्छे चैनल में भी अच्छे ऐंकर हों

और जहां सार्थक बहस होती हो।

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अच्छे ऐंकर के लिए मेरी कुछ कसौटियां हैं।

वे हैं-

1-.जो ऐंकर ऐसे सर्वज्ञात गुंडा टाइप के आदतन अशिष्ट अतिथियों को आमंत्रित न करें जो बहस को डिरेल करने के लिए जाने जाते हैं।

कुत्ते की तरह भौंकते रहते हैं और कभी -कभी मारपीट पर भी उतारू हो जाते हैं।

2.-जिन अतिथियों ने कभी डिबेट में गाली-गलौज की  हो,मारपीट की हो या उसकी नौबत ला दी हो,उन्हें तो न बुलाए।

3.-एक साथ कई अतिथियों को बोलने -चिल्लाने का अवसर न दे।

4.-अपनी बारी से पहले बोलने वाले किसी उदंड अतिथि की आवाज तुरंत बंद कर देने की पक्की तकनीकी व्यवस्था कर दे।आदि आदि......

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16 नवंबर 22 


 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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कुछ बड़े सरकारी संस्थानों को मुख्य नगर 

के पास स्थानांतरित करना अब जरूरी 

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यह बहुत अच्छी बात है कि प्रशासन

ने पटना की मुख्य सड़कों से अतिक्रमण हटाने का काम इस बार कड़ाई से करने का निर्णय किया है।

इससे पहले भी समय-समय पर ऐसे अभियान चले हैं।

पर, हमेशा अतिक्रमणकारी ही अंततः शासन पर भारी पड़े।

उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार शासन तंत्र नियम-कानून तोड़कों पर भारी पड़ेगा।

ऐसे अतिक्रमण विरोधी अभियान बिहार के अन्य नगरों में भी चलाए जाने की सख्त जरूरत है।

हाल के वर्षों में पटना में कई फ्लाई ओवर बने हैं।

जाम की समस्या की विकटता थोड़ा कम करने में फ्लाई ओवर 

महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

फिर भी बढ़ते अतिक्रमणों के कारण समस्या भी साथ-साथ बढती़ जा रही है।

इससे पर्यावरण में प्रदूषण भी बढ़ रहा है।

 अब तक यह धारणा रही है कि अतिक्रमणकारी इतने अधिक ताकतवर हैं कि राज्य सरकार उन पर निर्णायक कार्रवाई नहीं करना चाहती।

पर,शासन के ताजा संकल्प देखकर उम्मीद की जाती है कि इस बार यह धारणा टूटेगी।

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     मुख्य नगर में ही बड़े संस्थान

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 पटना की मुख्य भूमि में ही कई बड़े सरकारी संस्थान अवस्थित हैं।

बिहार के अन्य अधिकतर नगरों का भी यही हाल है।

इनमें से कम से कम एक या दो संस्थानों को मुख्य पटना से हटाकर प्रादेशिक राजधानी के पास ही किसी देहाती इलाके में राज्य सरकार स्थापित कर सकती है।

इससे जाम की समस्या कम होगी। 

वे संस्थान हंै पटना विश्व विद्यालय, पटना मेडिकल काॅलेज और अस्पताल , पटना कलक्टरी और जिला अदालत।

यह तो अच्छा हुआ कि कुछ साल पहले केंद्र सरकार ने पटना के पास फुलवारी शरीफ अंचल के एक गांव में एम्स की स्थापना की।

उस इलाके का तेजी से विकास भी हो रहा है।

कांेई नहीं कह रहा है कि एम्स मुख्य पटना से दूर क्यों ?

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  विचाराधीन कैदी और मतदान

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 कानून की एक विसंगति पर अगले महीने सुप्रीम कोर्ट विचार करेगा।

लोक प्रतिनिधित्व कानून ,1951 की धारा -62 (5) को एक लोकहित याचिका के जरिए चुनौती दी गई है।

इस धारा के अनुसार विचाराधीन कैदी चुनाव के लिएं मतदान में भाग नहीं ले सकता।

  किंतु यह देखा गया है कि यदि सजायाफ्ता व्यक्ति जमानत पर छूटा हुआ हो तो वह मतदान कर सकता है।यह विरोधाभास है।

इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से उसकी राय मांगी है।

एक अन्य विसंगति भी है।

लगता है कि उसकी ओर  याचिकाकर्ता का ध्यान नहीं गया है।

वह यह कि एक विचाराधीन कैदी को

तो जेल से चुनाव लड़ने की तो छूट है किंतु विचाराधीन कैदी को मतदान करने की छूट नहीं है।

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केंद्रीय सचिवालय की शाखाएं

राज्यों में कब स्थापित होंगी 

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सन 2018 में केंद्र सरकार ने यह योजना बनाई थी कि केंद्रीय सचिवालय की शाखाएं हर राज्य मुख्यालय में स्थापित की जाएंगी।

इसके जरिए केंद्र सरकार देश की जनता से और भी करीब से जुड़ना चाहती थी।

योजना अच्छी है।

किंतु इस संबंध में पिछले 4 वर्षों में क्या हुआ,यह पता नहीं चल सका है। 

यदि ऐसा हो जाता तो नई दिल्ली पर से भी आबादी का बोझ थोड़ा कम होता।

आबादी कम होने से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की हवा को स्वच्छ बनाए रखने में सुविधा होती।

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  क्षेत्र के बीच में हो थाना मुख्यालय 

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बिहार में ऐसे कुछ पुलिस थाने हैं जो थाना क्षेत्र की एक छोर पर दूर स्थित हैं।

दूसरी छोर तक पहुंचने में पुलिस को काफी समय लगता है।

इस कारण न तो ठीक से गश्त संभव है और न ही अपराध नियंत्रण।

खबर है कि पुलिस आउट पोस्ट की अवस्थिति को लेकर बिहार सरकार कुछ सकारात्मक निर्णय करने जा रही है।

ऐसे में थाना भवन की अवस्थिति को देखते हुए भी निर्णय होना चाहिए।

यानी,यदि किसी एक थाना क्षेत्र में दो आउट पोस्ट हैं तो वे वैसी जगह अवस्थित हों जहां से दूर-दराज इलाकों में भी पुलिस की मौजूदगी का लोगों को आभास होता रहे। .

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सरकार से अदालत के सवाल

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सन 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि  संसदीय राजनीति में अपराधियों के प्रवेश को रोकने के लिए संसद कानून बनाए।

  पर,अब तक कुछ नहीं हुआ।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने मार्च, 2019 में केंद्र सरकार से एक महत्वपूर्ण सवाल पूछा था।

सवाल यह था कि जन प्रतिनिधियों की बेतहाशा बढ़ती संपत्ति पर निगरानी रखने के लिए केंद्र सरकार ने अब तक कोई निगरानी तंत्र क्यों नहीं बनाया ?

इस पर भी केंद्र सरकार ने अब तक क्या-क्या किया,इस संबंध में कोई जानकारी सामने नहीं आई है।कुछ दशक पहले के जागरूक प्रतिपक्षी सांसदगण ऐसे सवालों को प्रश्न काल में उठाया करते थे।उनके जवाब भी आते रहते थे।

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और अंत में

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नेशनल पेमेंट काॅरपोरेशन आॅफ इंडिया के सर्वर से बैंक खातों  को लिंक नहीं किए जाने के कारण पी.एम.किसान सम्मान निधि का भुगतान बिहार के किसानों को नहीं हो पा रहा है।

खबर मिल रही है कि यह समस्या पूरे बिहार में है।

इस कारण दो किश्तें नहीं मिल पाई हैं।

उम्मीद है कि शासन तंत्र इस समस्या का समाधान जल्द कर लेगा।

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प्रभात खबर,पटना-14 नवंबर 22


सोमवार, 14 नवंबर 2022

 यदि आपका रसोइया 100 में से 85 रोटियां जला दे 

तो क्या आप उसे नौकरी में फिर भी बनाए रखेंगे ?

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सुरेंद्र किशोर

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एक परपोता के परदादा के पास 100 एकड़ पुश्तैनी जमीन थी।

परदादा जी के निधन के बाद उनके बेटे और पोते उनकी बरखी व जयंती मनाते रहे।

किंतु जब परपोते को पता चला कि परदादा जी ने ऐयाशी और भ्रष्टाचरण के कारण 100 एकड़ पुश्तैनी जमीन में से 85 एकड़ जमीन बेच दी थी तो परपोते ने अपने परदादा जी की जयंती कौन कहे,बरखी मनाना भी बंद कर दिया।

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थोड़ा कहना ,बहुत समझना !!!

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14 नवंबर 22


   

अखिल भारतीय पीठासीन पदाधिकारी सम्मेलन ने विधान 

सभा के स्पीकर धनिक लाल मंडल की सराहना की थी

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   सुरेंद्र किशोर

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बात सन 1968 के प्रारंभ की है।

बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार गिरने ही वाली थी।

तत्कालीन स्पीकर धनिक लाल मंडल ने अविश्वास प्रस्ताव 

पर चर्चा की तारीख तय कर दी थी।

दल-बदल का खेल चल रहा था।

गैर कांग्रेसी सरकार के सत्ताधारी गठबंधन की ओर से 33 विधायकों ने दल बदल कर लिया था।

दलबदलुओं में सी.पी.आई.के विधायक से लेकर जनसंघ तक के विधायक शामिल थे।सर्वाधिक संख्या में संसोपा के विधायकों ने दल बदला था।(बाद की बी.पी.मंडल सरकार में सारे के सारे दलबदलू विधायक मंत्री बना दिए गए थे।)

महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व वाली सत्ताधारी जमात यह चाहती थी कि स्पीकर साहब अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की तारीख थोड़ा आगे बढ़ा दें।

  ताकि, विधायकों के ‘‘जुगाड’’़ के लिए उन्हें समय मिल जाए।

सत्ताधारी जमात को उम्मीद थी कि उससे सरकार बच सकती है।

  धनिक लाल मंडल सन 1967 में फुलपरास से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक बने थे।

इसके बावजूद मंडल जी ने तारीख नहीं बढ़ाई।

नतीजतन महामाया सरकार समय से पहले गिर गई।

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इस राजनीतिक घटना के बाद जब पीठासीन पदाधिकारियों का अखिल भारतीय सम्मेलन हुआ तो सम्मेलन ने प्रस्ताव पास करके धनिक लाल मंडल के उपर्युक्त निर्णय की सराहना की।

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याद रहे कि 94 साल की उम्र में मंडल जी का कल निधन हो गया।

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14 नवंबर 22


शनिवार, 12 नवंबर 2022

 


   पत्रकार गणेश मंत्री पर हरिवंश जी के संस्मरण

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      सुरेंद्र किशोर

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राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश ने ‘धर्मयुग’ के प्रधान संपादक रहे गणेश मंत्री पर अपनी पुस्तक आज मुझे दी।

  इस पुस्तक की संपादक हैं डा.अनुपमा कुमारी।

 अत्यंत प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ की प्रसार संख्या जब छह लाख थी,तब गणेश मंत्री ने धर्मयुग(अब प्रकाशन बंद) ज्वाइन किया था।

  हरिवंश जी भी कभी धर्मयुग के संपादकीय विभाग में मंत्री जी के सहकर्मी थे।

  बाद में मंत्री जी उस पत्रिका के प्रधान संपादक बने।

  गणेश मंत्री जैसे विचारवान,चरित्रवान और मूल्यपरक पत्रकार के बारे में कुछ भी पढ़कर मुझे अच्छा लगेगा।इसे मैं पढ़ूंगा। 

 और, जब गणेश मंत्री के व्यक्तित्व-कृतित्व पर हरिवंश जी के व्यक्तिगत संस्मरणों के साथ इसमें वैचारिक पक्ष की भी विस्तृत व्याख्या है तब तो और भी अच्छा लगेगा। 

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एक बात यह भी

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गणेश मंत्री के पिता राजस्थान सरकार में मंत्री थे।

पर,उनकी सरकारी गाड़ी का उपयोग करने से गणेश मंत्री ने इनकार कर दिया था।

इससे यह बात साबित होती है कि गणेश मंत्री मानते थे कि  पत्रकार के लिए नैतिकता और चरित्र बल का कितना अधिक महत्व होता है।

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6 नवंबर 22



 अनुच्छेद-142 का बेहतर इस्तेमाल करे सुप्रीम कोर्ट

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राजीव गांधी के हत्यारों की सजा घटाने के लिए संविधान के जिस अनुच्छेद का अदालत ने सहारा लिया है,उसी अनुच्छेद का इस्तेमाल अब वह भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों के खिलाफ करे।

अन्यथा, देर-सबेर या तो तानाशाही आ जाएगी या फिर देश गुलाम हो जाएगा।

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सुरेंद्र किशोर

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  भारतीय संविधान के अनुच्छेद -142 ने सुप्रीम कोर्ट को जो विशेष अधिकार दे रखा है,उसी का सहारा लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने राजीव गांधी के हत्यारों की सजा कल कम कर दी।

  सुप्रीम कोर्ट से, जो यह कह रहा है कि ‘‘भ्रष्ट लोग देश को तबाह कर रहे हैं’’ मेरा एक निवेदन है।

  निवेदन यह है कि मामले उसके विचारार्थ आने पर वह भ्रष्टाचार के आरोपितों की सजा बढ़ा दिया करे।

उदाहरणार्थ, यदि किसी आरोपित के खिलाफ कम से कम दस करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप है,तो उसे फांसी की सजा देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट दे दिया करे।

  (याद रहे कि अनुच्छेद- 142 मौजूदा कानूनों से परे जाकर भी आदेश देने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को देता है।

दरअसल संविधान निर्माताओं ने यह पूर्वानुमान कर लिया था कि इस देश की राजनीति व प्रशासन  पर एक दिन ऐसे- ऐसे सत्ताधारी छा जाएंगे जो अपने स्वार्थ के लिए कानूनों को आए दिन तोड़ने लगेंगे और अपराध को कारगर ढंग से रोकने के लिए कोई कड़ा कानून भी नहीं बनाएंगे।उस दिन इस अनुच्छेद के जरिए सुप्रीम कोर्ट देश को बचा सकता है।) 

 याद रहे कि भ्रष्टाचार न सिर्फ देश को तबाह कर रहा है,बल्कि एक बार फिर एक अन्य तरह की गुलामी की पृष्ठभूमि भी तैयार कर रहा है।

  ऐसे अनेक उदाहरण आते रहते हैं कि जब इस देश के कतिपय नेताओं ,अफसरों और अन्य लोगों को राष्ट्रविरोधी और देश तोड़क शक्तियां पैसे देकर खरीद ले रही हैं।

1.-नब्बे के दशक में जैन हवाला कांड के तहत हमारे देश के जिन शीर्ष नेताओं ने भारी पैसे लिए,वे पैसे कहां से आए थे ?

वे पैसे हवाला के जरिए विदेशी जेहादी ताकतों ने कश्मीर के आतंकियों के लिए भेजे थे।

उन्हीं पैसों में से देश के प्रमुख 55 नेताओं व अफसरों को भारी पैसे मिले थे।

वे नेतागण तब देश की राजनीति के ‘‘हू इज हू’’ थे।

उन नेताओं में से कुछ ने इस देश में सक्रिय आतंकियों को मुकदमों से बचाये भी थे।

ऐसी खबर तब इंडिया टूडे में छपी थी।

इंडिया टूडे का वह अंक मेरे पास भी है।

2.-नब्बे के दशक में जब दाउद इब्राहिम ने समुद्र के रास्ते बड़ी मात्रा में विस्फोटक बंबई को दहलाने के लिए भिजवाए तो तट पर रक्षा में लगे सरकारी मुलाजिमों ने रिश्वत लेकर डोंगियों पर लदे विस्फोटक उतरने दिए थे।

इस काम के लिए उन घूसखोरों ने सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक रिश्वत की मांग आतंकियों ंसे की थी।

क्योंकि सरकारी कर्मियों को लग गया था कि डांेगियों में विस्फोटक पदार्थ हैं।उन्हें अपेक्षाकृत अधिक रिश्वत मिली भी थी।

ऐसे अन्य अनेक उदाहरण समय -समय पर मिलते रहते रहते हैं।

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12 नवंबर 22


गुरुवार, 3 नवंबर 2022

 पाक के भाइयो ! या तो आप धार्मिक लक्ष्य हासिल कीजिए

या भौतिक लक्ष्य,एक साथ दोनों हासिल होना असंभव है

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सुरेंद्र किशोर

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पाकिस्तान के पूर्व प्रधान मंत्री इमरान खान ने कहा है कि 

‘‘भारत की विदेश नीति देखिए।

वो बिना किसी डर के रूस से तेल का आयात कर रहा है।पश्चिमी देशों का उस पर कोई दबाव नहीं है।

भारत अपने राष्ट्रीय हितों को प्रमुखता से आगे रखता है।

भारत एक स्वतंत्र और मजबूत राष्ट्र है,वहीं पाकिस्तानी शासक गुलाम हैं।’’

  इमरान साहब,भारत अपने संसाधनों का इस्तेमाल अपने देश को सैनिक तथा अन्य तरह से मजबूत बनाने के काम में लगा हुआ है।

 पिछले कुछ वर्षों में इस काम में तेजी आई है।

क्योंकि भ्रष्टाचार और महा घोटालों में सार्वजनिक धन अब पहले की अपेक्षा कम जाया हो रहा है।

दूसरी तरफ पाकिस्तान अपने संसाधनों का इस्तेमाल भ्रष्टाचार के अलावा भारत सहित दुनिया भर में हथियारों के बल पर इस्लाम के प्रचार के लिए करता रहा है।

  यहां तक कि विदेशों से मिली अनुग्रह राशि में से कुछ धन का इस्तेमाल भी पाक आतंकवाद को आगे बढ़ाने के लिए करता है।

सन 1947 के बाद पाक ने भारत पर चार बार हमला किया।

उसमें जो पैसे लगे,वे पाकिस्तान के विकास में लग सकते थे।

उससे पाक स्वावलंबी बन सकता था।

पर,दूसरी ओर यहां तक कि ओसामा बिन लादेन भी पाकिस्तान में ही शरण पाता है।

   इमरान साहब,जब तक पाकिस्तान व वहां के लोग अपना मुख्य लक्ष्य नहीं बदलेंगे,दूसरे देशों के इशारों पर उन्हें नाचना ही पड़ेगा।अभी तो और भी बुरे दिन आ सकते हैं।

यदि पाक के शासक व मदरसा शिक्षित वहां के अधिकतर लोग यह मानते हैं कि जीवन का एकमात्र लक्ष्य जेहाद है तो उसी में मगन रहिए।

उसमें आपको भारी आत्मिक सुख मिलेगा।

फिर तो भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की तरफ ललचाई नजरों से देखने या इसकी तरह बनने की कोशिश करने की जरूरत भी क्या है ?

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दोनों में से एक ही काम संभव है।

या तो भारत की तरह बनिए या ‘‘आत्मिक सुख’’ प्राप्त करिए।

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30 अक्तूबर 22


  

 


   समय रहते मतदातागण चेत जाएं,

  दल और नेता तो चेतने से रहे !

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   सुरेंद्र किशोर

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यदि आशंकित तानाशाही या अर्ध तानाशाही से इस देश को बचाना हो तो मतदातागण 

भ्रष्टाचारियों,

अपराधियों,

टुकड़े-टुकड़े गिरोहों के सदस्यों 

या उनके समर्थकों-मददगारों ,

वंशवादियों-परिवारवादियों को अपने बहुमूल्य वोट नहीं दें।

तानाशाही में सर्वाधिक कष्ट आम लोगों को ही होता है।

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किसी नेता के योग्य और ईमानदार पु़त्र(या पुत्री )यदि सक्रिय राजनीति में आना चाहे तो उस पर कोई एतराज नहीं होना चाहिए।

किंतु वैसी स्थिति में खुद पिता चुनावी-सत्ता की राजनीति 

से अलग हो जाएं।

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  राजनीति कौन कहे,फिल्म में भी कम योग्य संतानों को आगे बढ़ाने के चक्कर में फिल्मी परिवार भी दृश्य से बाहर होते चले जाते हैं।

कभी कपूर खानदान ‘राज’ करता था।

किंतु अब ??!

ऐसे अन्य उदाहरण भी हैं।

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ठाकरे परिवार ने उद्धव के बदले यदि राज ठाकरे और गांधी परिवार ने राहुल की जगह यदि वरूण को आगे बढ़ाया होता तो इन दलों की लोकप्रियता में संभवतः ऐसी ढलान नहीं आती।

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1 नवंबर 22  


बुधवार, 2 नवंबर 2022

 


पिछले कुछ दिनों से रोज ही इक्के -दुक्के सज्जन मुझसे फोन पर पूछते रहते हैं।

क्या बिहार की राजनीति में कोई और बड़ा भूकम्प आने वाला है ?

मैं कह देता हूं कि भई, मुझे कुछ भी मालूम नहीं।

वैसे कुछ भी और कभी भी हो सकता है।

वैसे आप हर स्थिति के लिए तैयार रहिए।

मैं पहले यदा कदा ऐसे राजनीतिक अनुमान लगाया करता था।

अक्सर वह सही साबित होता था।

पर,पिछले राजनीतिक भूकम्प को लेकर मेरा अनुमान गलत साबित हो गया।

इसलिए यह काम मैंने छोड़ दिया।

  वैसे भी इधर अपनी किताबों पर इन दिनों काम कर रहा हूं।

उधर क्या होने जा रहा है,उससे मेरा कोई खास मतलब नहीं है।

वैसे भी होनी को भला कौन टाल सकता है ???!!!!

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इस बीच सोशल मीडिया खास कर यूट्यूब पर निरंतर आ रही  चैंकाने वाली राजनीतिक खबरों का आप मजा लेते रहिए।

अनेक यूट्यूबर लगभग रोज ही चैंकाते रहते हैं।

जब नेतागण ही इन दिनों चैंकाने लगे हैं तो बेचारे यूट्यूबर क्यों पीछे रहें ? 

इन दिनों कई नेताओं के अधिकतर राजनीतिक फैसलों के पीछे राजनीतिक तर्क की जगह कुछ और ही होते हैं।

इसलिए भी पूर्वानुमान और भी मुश्किल हो गया है। 

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सुरेंद्र किशोर

1 नवंबर 22





 इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि की 

पूर्व संध्या पर

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31 अक्तूबर ,1984 की 

वह काली सुबह

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‘‘.......... ( राॅ के प्रधान रहे आर.एन.)काव ने ,(जो प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार थे) बेअंत सिंह के संदेहास्पद होने की ताकीद की थी।

  इसी आधार पर उसका तबादला दिल्ली पुलिस की सशस्त्र इकाई में कर दिया गया था।

कहते हैं कि इंदिरा गांधी उसे बेहद पसंद करती थीं और सरदार जी कहकर पुकारती थीं।

 उनकी(यानी, प्रधान मंत्री की)दखल पर वह (बेअंत)वापस (प्रधान मंत्री की सुरक्षा में )लौट आया।

 31 अक्तूबर की उस काली सुबह प्रधान मंत्री पर सबसे पहले उसी ने (यानी बेअंत ने )गोली चलाई।

 केहर और सतवंत ने उसका साथ दिया।

कुछ देर बाद बेअंत को ‘रहस्यमय’ कारणों से गोली मार दी गई।

 प्रधान मंत्री की हत्या के षड्यंत्र का वही मुख्य मोहरा था।

उसका बयान कई तथ्यों को उजागर कर सकता था।’’

---शशि शेखर,

प्रधान संपादक, 

हिन्दुस्तान,

30 अक्तूबर 2022

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(बेअंत की बिदाई और वापसी पर मैं खुद पहले कई बार लिख चुका हूं।पर शशि शेखर जी का लिखना अधिक माने रखता है।उन्होंने काव की चर्चा करके उस घटना को पुष्ट कर दिया है।(-सु.कि.)

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  राजीव गांधी की हत्या(1991)

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21 मई 1991 को तमिलनाडु के पेेरंबदुर में एक मानव बम विस्फोट में राजीव गांधी की मौत हो गई।

उस दिन के विस्फोट से पहले ‘ब्लू बुक’ में दर्ज सुरक्षा के उपायों का पालन नहीं किया गया था।

राजीव गांधी के पास जाने वालों की तलाशी होनी चाहिए थी।

पर, उस मानव बम की तलाशी नहीं हुई।

आखिर क्यों ?

पेरंबदुर के उस घटनास्थल पर तैनात पुलिस उप निरीक्षक अनुसूया डेजी अर्नेस्ट ने मानव बम धनु को राजीव के पास पहुंचने से रोकने की दो बार कोशिश की थी।

पर थोड़ी दूर से देख रहे राजीव ने सुरक्षाकर्मी से कहा कि  ‘‘सबको मेरे पास आने दो।’’

मानव बम धनु माला पहनाने के बहाने राजीव के पास गई और उसने विस्फोट कर दिया।

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     महात्मा गांधी की हत्या(1948)

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दिल्ली के बिड़ला भवन स्थित प्रार्थना स्थल के बाहर 20 जनवरी 1948 को बम विस्फोट हो चुका था।    

तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री सरदार पटेल ने कहा था कि 

‘‘ सुरक्षा सावधानियों को अधिक प्रभावकारी बनाने के लिए पुलिस का विचार था कि प्रार्थना सभा में शामिल होने वाले प्रत्येक अजनबी की परिसर में जाते समय तथा अन्य समय तलाशी ली जाए।

   नई दिल्ली के पुलिस अधीक्षक ने गांधी जी के स्टाफ के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था।

  लेकिन उन्हें बताया गया कि गांधी जी इससे असहमत  हैं।उप महा निरीक्षक ने भी गांधी जी के स्टाफ से संपर्क किया था।

 लेकिन परिणाम वही रहा।

तब डी.आई.जी.स्वयं व्यक्तिगत रूप से गांधी जी से मिले।

 उन्हें समझाया कि उनके जीवन पर खतरा है।

उन्हें सुरक्षा प्रबंध करने की  अनुमति दी जानी चाहिए।

अन्यथा कोई अप्रिय घटना होने पर उनकी बदनामी होगी।

लेकिन गांधी जी सहमत नहीं हुए।

उन्होंने कहा कि उनका जीवन ईश्वर के हाथ में है।

यदि उनकी मृत्यु आ गई है तो कोई सावधानी उन्हें नहीं बचा पाएगी।’

  पटेल ने कहा कि ‘मैंने स्वयं गांधी जी से पुलिस को उनकी रक्षा के लिए कत्र्तव्य पालन की अनुमति देने के लिए वकालत की।

परंतु हम असफल रहे।’

अंततः 30 जनवरी 1948 को नाथू राम गोडसे ने गांधी जी की हत्या कर दी।

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विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मौत(1980)

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संजय गांधी की जिस विमान

दुर्घटना में मौत हुई,उसे खुद वही चला रहे थे।

उस दुर्घटना के लिए मशीन जिम्मेदार थी या खुद चालक ?

 इस सवाल के जवाब के लिए आप अपने अनुमान के घोडे़ दौड़ा सकते हैं,यदि आप संजय गांधी की कार्य शैली से वाकिफ रहे थे।

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सवाल, निष्कर्ष और चेतावनी 

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  ऐसी घटनाओं को लेकर आपकी क्या राय है ?

इस देश के अनेक बड़े नेता अपनी सुरक्षा के प्रति इतने लापारवाह क्यों रहे हैं ?

याद रहे कि कई बार दुखद घटनाओं का दर्दनाक खामियाजा देश, जनता,समुदाय और संबंधित दलों को भुगतना पड़ता है।

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कुछ समय पहले केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में बताया था कि राहुल गांधी ने 21 बार अपनी सुरक्षा के नियमों का पालन करने से इनकार किया।

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सुरेंद्र किशोर

30 अक्तूबर 22 


   

आजादी की कहानी,सावित्री दीदी की 

जुबानी,‘दीदी’ में जिंदा हैं बापू

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--राजीव कांत मिश्र 

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भागलपुर के भीखनपुर में रहने वाला हमारा पूरा परिवार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी रहा है।

मेरे पिता जी स्वं.पंडित निशिकांत मिश्र,बड़े पिता जी स्व.बालकृष्ण मिश्र,मेरी मां संध्या मिश्र और बड़ी मां सवित्री मिश्र के अलावे परिवार के कई सदस्य अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में सक्रिय थे।

    जंग ए आजादी की लड़ाई लड़ने में हमारी दादी ने परिवार के सभी सदस्यों को प्रोत्साहित किया।

भागलपुर में भारतीय आजादी की लड़ाई को धार देने के लिए महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी से लेकर डा.राजेंद्र प्रसाद,सुभाष चंद्र बोस लाल लाजपत राय समेत देश के सभी बड़े क्रांतिकारी समय -समय पर आते रहे।

  मेरी बड़ी मां सावित्री मिश्र जिन्हें लोग सम्मान से ‘दीदी’ कह कर संबोधित करते हैं,उन्होंने महिला क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया था।

  आज भी जब वे अंग्रेजों के खिलाफ भागलपुर के लोगों के स्वतंत्रता संघर्ष की गाथा सुनाती हैं तो लगता है कि मानो हम चलचित्र देख रहे हैं और गांधी जी साक्षात हमारे सामने आ खड़े हुए मालूम पड़ते हैैं।

 स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं के बारे में मां और पिता जी को सुनते हुए हम बड़े हुए हैं।

आज भी जब बड़ी मां यानी सावित्री दीदी से ब्रिटिश  के खिलाफ अपने परिवार और भागलपुर के लोगों की वीरता और राष्ट्रभक्ति की कहानी सुनता हूं तो लगता है कि सुनता ही रहूं।

  दीदी में राष्ट्रपिता गांधी और आजादी की लड़ाई की घटनाएं पूरी तरह जीवंत हैं।

इस उम्र में उनकी उनकी यादाश्त शक्ति भी हतप्रभ कर देने वाली है।

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बाकी विवरण पढ़िए मासिक पत्रिका ‘‘भारत वार्ता’’(अक्तूबर 2022) के संबंधित पेज की स्कैन काॅपी में जो नीचे प्रस्तुत की गई है। 

   


       जेल में भी मंत्री बने रहे

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केजरीवाल सरकार के जेल मंत्री सत्येंद्र जैन महीनों से तिहाड़  जेल में हैं।

फिर भी अरविंद केजरीवाल की कृपा से मंत्री पद पर भी बने हुए हैं।

  यदि जेल जाने के बाद भी किसी आरोपी के मंत्री बने रहने में कोई कानूनी या संवैधानिक बाधा नहीं है तो किसी मुख्य मंत्री या प्रधान मंत्री के लिए भी कोई बाधा नहीं होगी।

  सत्येंद्र -अरविंद की इस करतूत को देखकर लालू प्रसाद के प्रति हमारा सम्मान बढ़ जाना चाहिए।

  सन 1997 में जेल जाने के लिए लालू को मुख्य मंत्री पद छोड़ देना पड़ा था।

वे भी तो सत्येंद्र जैन की तरह जेल से सरकारी काम कर सकते थे !! 

  याद रहे कि शरद पवार के दल के नबाब मलिक भी और ठाकरे सरकार के एक अन्य मंत्री भी लंबे समय तक मंत्री रहते हुए जेल में रहे।

क्या इस देश का लोकतंत्र घोर कलियुग के दौर से गुजर रहा है ?

  क्या मोदी सरकार इस मामले में संविधान या कानून में परिवर्तन करने पर विचार करेगी ?

भारत के लोकतंत्र को जग हंसाई से बचाने के लिए अब यह जरूरी है कि कोई आरोपी मंत्री,प्रधान मंत्री या मुख्य मंत्री जेल जाने के बाद अपने पद पर बना नहीं रहे।

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पुनश्चः

गुजरात के मोरबी पुल कांड के बारे में जान कर ऐसी धारणा बन रही है कि एक स्तर पर भ्रष्टाचार के मामले में गुजरात और अन्य राज्यों में कोई फर्क नहीं है।

  क्या अब भी भ्रष्टों के लिए इस देश में फांसी की सजा का कानूनी प्रावधान नहीं होगा ?

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सुरेंद्र किशोर

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2 नवंबर 22

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 बिना रुके-थके-हांफे छह मंजिला अपार्टमेंट 

की सीढ़ियों से मैं पहुंच गया था छत पर  

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सुरेंद्र किशोर

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इस बार मेरे परिवार ने पड़ोस में स्थित कौशिकी प्राइड अपार्टमेंट की छत पर छठ पूजा की।

 यह छह मंजिला अपार्टमंेट है।

जाहिर है कि इसमेें लिफ्ट भी है और सीढ़ियां भी।

मैंने सोचा कि क्यों न सीढ़ियों से ऊपर पहुंचा जाए।

मैं छत पर पहुंच गया।

बिना रुके बिना थके और बिना हांफे !

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किसी ने कहा कि इसका लक्षण यह है कि इस उम्र में भी आपका हर्ट स्वस्थ है।

मैंने कहा कि घुटने में भी तो कोई दर्द नहीं हुआ।

अब आप भी कुछ बताइए।

यानी, मुझे बढ़ावा दीजिए।

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2 नवंबर 22

 

 


मंगलवार, 1 नवंबर 2022

 मराठी के बाद अब जार्ज फर्नांडिस 

पर अंग्रेजी में किताब 

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      सुरेंद्र किशोर

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जार्ज फर्नांडिस का पूरा नाम क्या है ?

इसका जवाब कम ही लोगों के पास होगा।

मैं बताता हूं पूरा नाम।

वह है --जार्ज मैथ्यू इसाडोर फर्नांडिस।

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नालंदा से जब जार्ज लोक सभा का चुनाव लड़ रहे थे तो एक संवाददाता के रूप में मैं वहां गया था।

मैंने एक ग्रामीण से पूछा- आप किसको वोट देंगे ?

उसने कहा--जांडिस फ्रांडिस को।

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यानी, जार्ज के कई रूप थे।उनका नाम कुछ भी हो !!

उनके संपर्क क्षेत्र बहुत व्यापक थे।

यानी, उन्हें जानने वाले लोगों ने उन्हें कई रूपों में देखा है।

अधिकतर के पास उनको लेकर अनेकानेक रोमांचक व शौर्यपूर्ण कहानियां हैं।

उनमें से अधिकतर कहानियां गर्व करने वाली हैं।

उनके व्यक्तित्व का फलक विस्तृत था।

जार्ज के मित्र,उनके सहकर्मी, उनके समर्थक,उनके प्रशंसक ,उनके राजनीतिक विरोधी,इमरजेंसी में जान हथेली पर रखकर उनके साथ ,उनके निदेश पर काम करने वाले गुमनाम लोगों ने उनके अनेक रूप देखे हैं।

उन्हंे किसी एक पुस्तक में समेटना संभव नहीं है।

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फिर भी जार्ज पर एक नई किताब आज मुझे मिली है।

करीब साढे़ पांच सौ पन्नों की इस अंग्रेजी किताब को मैंने अभी पढ़ा नहीं है।

जार्ज को जिन जानने वालों ने इसे अब तक पढ़ा है,उनकी इस पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं हैं।

मैं एक ही बात कह सकता हूं कि बड़े लोगों पर हर नई किताब,एक और किताब की जरूरत बता देती है।

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मुम्बई के पत्रकार व जार्ज के समाजवादी  सहकर्मी रहे नीलू दामले ने जार्ज पर मराठी में पुस्तक लिखी है।

उसे लिखने से पहले नीलू ने करीब एक सप्ताह पटना स्थित मेरे आवास में रह कर मुझसे तथा बिहार के कुछ अन्य लोगों से विस्तृत जानकारियां व कागजात लिए थे।

याद रहे कि आपातकाल में जब जार्ज भूमिगत थे तो मैं उनसे पटना,बंगलौर,कलकत्ता और 

दिल्ली में बारी -बारी से मिला था।नीलू को यह मालूम था।इसीलिए उन्होंने मेरे यहां काफी समय बिताया।

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खुशी की बात है कि मेरी जानकारी के अनुसार मराठी (नीलू दामले)और अंग्रेजी(राहुल रामगंुडम) में उन पर

अच्छी पुस्तकें आ गई हैं।

अब हिन्दी में आनी चाहिए।ं कई छूट गईं बातें भी हिन्दी में आ जाएंगी।जार्ज में रूचि रखने वाले हिन्दी पट्टी में सर्वाधिक लोग हैं।

याद रहे कि जार्ज का अधिकांश राजनीतिक और संसदीय जीवन बिहार से ही जुड़ा रहा।

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सुरेंद्र किशोर

1 नवंबर 22