शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

 नोटों के पहाड़ पर पार्थो चटर्जी !

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सुरेंद्र किशोर

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सार्वजनिक क्षेत्र मंे गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा किसी भी गरीब देश की संवेदनशील सरकार की प्राथमिकता में रहनी चाहिए।

 क्योंकि शिक्षा के निजी क्षेत्र उनके लिए है जिनके पास पैसे हैं।

    पर जब स्कूली शिक्षकों की बहाली के एवज में 

कोई शिक्षा मंत्री अपने ठिकानों पर नोटों का पहाड़ खड़ा कर ले तो गरीबों के बच्चे उन अयोग्य शिक्षकों से कैसी शिक्षा हासिल कर पाएंगे ?

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बहाली में भीषण भ्रष्टाचार के कारण शिक्षा की गुणवत्ता के क्षरण की समस्या बिहार सहित देश के अनेक राज्यों में भी है।

क्या पार्थो चटर्जी जैसे धनलोलुप मंत्री गरीबों के घरों के नौनिहालों के भविष्य, प्रकारांतर से देश के भविष्य, के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे और देश मूक दर्शक बना रहेगा ?

कोलकाता में अर्पिता के घरों में नोटों के पहाड़ देख कर भले आज देश गुस्से में है। 

किंतु स्कूली शिक्षा या फिर पूरी शिक्षा व्यवस्था के बर्बाद होते जाने की समस्या इस देश में दशकों पुरानी है।अब भी चेत जाने का समय है।

सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है।केंद्र और राज्य सरकारें कैंसर जैसी इस समस्या पर मिल बैठकर विचार करे। 

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29 जुलाई 22


  नरेंद्र मोदी से नाराज डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी भी 2024 में 

 भाजपा की ही जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं

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सुरेंद्र किशोर

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जी हिन्दुस्तान टी.वी चैनल से बातचीत करते हुए डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने आज कह दिया कि सन 2024 के लोक सभा चुनाव में भी भाजपा ही जीतकर एक बार फिर केंद्र में सत्ता में आएगी।

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खबर मिलती रही है कि डा.स्वामी इन दिनों नरेंद्र मोदी से नाराज चल रहे हैं।

क्योंकि भाजपा ने उनका भी ‘आडवाणीकरण’ कर दिया है।

(सन 2024 की भविष्यवाणी उनका वस्तुपरक आकलन है या भाजपा से उनकी फिर पटरी बैठने वाली है ?!!

पता नहीं।अभी तो वस्तुपरक ही मान लें)

यदि डा.स्वामी भी नरेंद्र मोदी की तीसरी जीत देख रहे हैं तो इसके साथ ही  प्रतिपक्षी नेता गण 2024 के बाद का अपना राजनीतिक व कानूनी भविष्य का अनुमान लगा लें।

खासकर देश भर के वैसे नेतागण अपना हश्र जान लें जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में मुकदमे चल रहे हैं या केंद्रीय एजेंसियों द्वारा उनकी जांच चल  रही है।

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2024 में भाजपा एक बार फिर सत्ता में आ जाएगी तो 2029 तक तो सारी जांचें अपनी तार्किक परिणति तक पहुंच ही जाएंगी।

उसके बाद इस देश के कितने नेतागण चुनाव

चुनाव लड़ने लायक रह जाएंगे ?

वे अपने केस की गंभीरता के अनुपात में अपना भविष्य अभी से जान लें।

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इस देश के अधिकतर आम लोग,जो किसी जातीय या सांप्रदायिक वोट बैंक के हिस्सा नहीं हैं, तरह -तरह के आर्थि और बौद्धिक भ्रष्टाचारियों से ऊब रहे हैं।

ऐसे में आगे का अनुमान लगाइए।

जब एक राज्य के एक मंत्री पार्थों चटर्जी के अत्यंत करीबी के पास  21 करोड़ रुपए नकद मिले हैं तो पार्थों की अपेक्षा इस देश के अधिक ताकतवर नेताओं ने इस गरीब देश को कितना लूटा है ,उसका अनुमान मुश्किल नहीं।

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ताजा खबर के अनुसार सिर्फ ई. डी. ने घोटालेबाजों की एक लाख चार हजार 702 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की है।अन्य एजेंसियां अलग हैं।

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26 जुलाई 22

  


 शेरपुर-दिघवारा गंगा पुल की निविदा जारी 

होने के बाद अब दिघवारा-नयागांव के 

‘न्यू पटना’ बनने की संभावना बढ़ी

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सुरेंद्र किशोर

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मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कुछ महीने पहले कहा था कि शेरपुर-दिघवारा गंगा पुल के बनकर तैयार हो जाने के बाद दिघवारा से नया गांव तक का इलाका ‘न्यू पटना’ बन जाएगा।

    प्रस्तावित पुल के निर्माण के लिए अब निविदा जारी कर दी गई है।

  पटना में गंगा नदी पर यह पांचवां पुल होगा।

  इसके बनकर तैयार हो जाने पर सारण जिले के एक बड़े इलाके का तेजी से विकास होगा।

विकास के कुछ सरकारी प्रयास होंगे किंतु अधिक निजी प्रयास होंगे।

 पिछले कुछ महीनों से इस पुल की आहट थी।

कुछ साल पहले पटना के पास गंगा नदी पर जेपी सेतु के बनकर तैयार हो जाने के बाद से ही पटना के डेवलपर्स परमानंदपुर और आसपास के इलाके में सक्रिय हो गए हैं।

हाल में पता चला कि शेरपुर-दिघवारा पुल की प्रत्याशा में दिघवारा-भेल्दी रोड के  किनारे डेरनी तक जमीन की खरीद-बिक्री तेज हो गई है।

जमीन खरीदने के इच्छुक लोग बाहर से भी वहां जा रहे हैं। 

   एक कहावत है कि अमेरिका ने सड़क बनाई और सड़क ने अमेरिका को बना दिया।

  दिघवारा -भेल्दी स्टेट हाईवे स्थित एक बाजार में जमीन की कीमत अब लगभग एक करोड़ रुपए प्रति कट्ठा हो गई है।इस स्टेट हाईवे का चैड़ीकरण होना है।

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शेरपुर दिघवारा पुल के बनकर तैयार हो जाने के बाद पटना पर से आबादी का बोझ घटेगा।

क्योंकि दिल्ली के यमुनापार की तर्ज पर यहां गंगा पार कालोनियां भी विकसित हो सकती हैं।

यदि कोई तकनीकी बाधा न हो तो शेरपुर -दिघवारा पुल की प्रस्तावित निर्माण अवधि को थोड़ा कम किया जाना चाहिए।

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29 जुलाई 22

 


सोमवार, 25 जुलाई 2022

 जेल जाने के बावजूद मंत्री ??!!

सुप्रीम कोर्ट इस पर स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लेता ?

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सुरेंद्र किशोर

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महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नवाब मलिक जेल जाने के बावजूद मिनिस्टर बने रहे थे।

दिल्ली के मंत्री जैन साहब भी जेल में हैं।

इसके बावजूद वे मंत्री भी हैं।

 पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री पार्थ चटर्जी जेल गए।फिर भी मंत्री बने हुए हैं।

यह कैसी परंपरा डाली जा रही है ?

इससे पहले तो नेता लोग जेल जाने से पहले मंत्री या मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे देते थे।

 मीडिया ट्रायल से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ताजा टिप्पणी समयोचित है।

उस पर उन्हें कोई जजमेंट भी दे ही देना चाहिए।कोई मार्ग दर्शन जारी करना चाहिए। 

किंतु जेल में भी कोई मंत्री पद पर बना रहे,इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं करेगा ?  

क्या इसे संविधान की धज्जियां उड़ाया जाना नहीं कहेंगे ?

सुप्रीम कोर्ट के रहते संविधान की धज्जियां उडं़े ?

यदि कोई सरकारी कर्मी जेल चला जाए तो वह तुरंत सेवा से निलंबित हो जाता है।

किंतु नेता जेल जाते ही अपने लिए पहले अस्पताल का इंतजाम कर लेता है।

साथ ही, घटिया व बेशर्म राजनीति के इस दौर में वह मंत्री भी बना रहता है।

   बेचारे लालू यादव और जय ललिता का क्या 

  कसूर था जो उन्हें जेल जाने के लिए मुख्य 

   मंत्री पद छोड़ना पड़ा था ???!!!

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25 जुलाई 22



 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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मिलावटों की आशंका कम करने के लिए दवाओं की कीमतंे घटानी जरूरी 

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केंद्र सरकार कुछ महत्वपूर्ण दवाओं की भारी कीमतों में कमी लाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है।कीमतों में सत्तर प्रतिशत कमी का प्रस्ताव है।

यदि सरकार ने अंततः सचमुच ऐसा कोई निर्णय कर लिया तो उससे  दवाओं में मिलावट की आशंका भी कम होगी।

ध्यान रहे कि जो महंगी दवाओं में मिलावट अधिक होती है।

सस्ती दवाओं में मिलावट कम होती है।

क्योंकि सस्ती दवाओं में मिलावट के धंधे में मुनाफा काफी कम होता है।

‘आयुष्मान भारत’ की दवाओं की कीमतें काफी कम हैं।

इसलिए उसमें कोई मिलावट करके भला कोई कितना कमाएगा ?

 पुराने जमाने में सार्वजनिक क्षेत्र के आई.डी.पी.एल. कारखानों में निर्मित अत्यंत सस्ती दवाएं काफी असरदार होती थीं।क्योंकि उनमें मिलावट नहीं होती थी।

पर, जब उसी कम्पोजिशन वाला टेबलेट ब्रांडेड कंपनी भारी कीमत में बेचे तो जाहिर है कि उसमें मिलावट से समाजविरोधी तत्वों को काफी फायदा होगा।

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    ठंडे पेय पदार्थों में कीटनाशक

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दवाआंें के साथ-साथ केंद्र सरकार ठंडे पेय पदाथों में  कीटनाशक दवाओं की भारी मौजूदगी पर भी ध्यान दे।

उससे भी बीमारियां हो रही हैं। 

 कई साल पहले भारत की  संसद में प्रतिपक्षी सदस्य ने सवाल पूछा था कि अमेरिका की अपेक्षा हमारे देश में तैयार हो रहे कोल्ड ड्रिंक में रासायनिक कीटनाशक दवाओं का प्रतिशत काफी अधिक क्यों है ?

इस पर केंद्र सरकार ने संसद को बताया था कि यहां कुछ अधिक की अनुमति है।

तब यह सवाल उठा था कि कोल्ड डिं्रक बनाने वाली अमरीकी कंपनी अपने देश में तो कीटनाशक की मौजूदगी के खिलाफ है। किंतु वही कंपनी भारत के लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ क्यों करती है ?

पिछली सरकारें भले यह बर्दाश्त करती रहीं।किंतु क्या मौजूदा केंद्र सरकार भी उसी लीक पर चलेगी ?

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छापेमारी में दुस्साहस 

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बालू, पत्थर, कोयले और पशु के काले धंधे में काफी काला धन है।

इस धंधे में लगे माफियाओं को देश भर में शासन के एक हिस्से का गुप्त संरक्षण मिलता रहा है।

जगजाहिर है कि 

इस काम में निचले व मझोले स्तरों के अफसरों की उनसे साठगांठ रहती है।

  इसीलिए धंधेबाज समय -समय पर पुलिसकर्मियों को अपनी गाड़ियों से कुचलते रहे हैं।उन्हें लगता है कि उनका कुछ बिगड़नेवाला नहीं।

इस धंधे को निर्मूल करने की कोशिशें भी होती रहती हैं।पर,वह कभी सफल नहीं होती।

  कोशिश सफल हो,उससे पहले उनकी गाड़ियों से कुचलने वाले अफसरों की जानें कैसे बचाई जाएं ?

इस पर बड़े अफसरों को विशेष तौर पर ध्यान देना होगा।कभी- कभी यह सवाल भी उठता है कि माफियाओं को रोकने के लिए कुछ अफसर अकेले या बहुत कम फोर्स के साथ मैदान में क्यों चले जाते हैं ?

क्या इस संबंध में शासन का कोई खास निदेश नहीं है ?

क्यों वे अफसर अति उत्साही हो जाते हैं ?

या माफियाओं के समक्ष अकेले चले जाने के पीछे उनका उद्देश्य कुछ और होता है ?

इस पर सरकारों को उच्च स्तर पर विचार करके कोई कठोर दिशा निदेश जारी करना चाहिए।

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जेल में फिर भी मंत्री

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नवाब मलिक जब तक जेल में रहे,मिनिस्टर भी बने रहे।

दिल्ली के मंत्री जैन साहब जेल में हैं।इसके बावजूद अब तक ऐसी कोई खबर नहीं है कि उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है।

पश्चिम बंगाल के मंत्री पार्थ चटर्जी जेल गए।पिछली खबर मिलने तक वे भी मंत्री बने हुए हैं।

यह कैसी परंपरा डाली जा रही है ?

इससे पहले तो नेता लोग जेल जाने से पहले मंत्री या मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे देते थे।

 मीडिया ट्रायल से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ताजा टिप्पणी समयोचित है।

उस पर उन्हें कोई जजमेंट भी देना चाहिए। किंतु जेल में भी मंत्री पद पर बना रहे,इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं करेगा ?    

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भूली-बिसरी याद

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जस्टिस हंसराज खन्ना सन 1982 में ज्ञानी जैल सिंह के खिलाफ प्रतिपक्ष की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थे।सुप्रीम कोर्ट के चर्चित जज रहे खन्ना साहब ने राष्ट्रपति की भूमिका पर अपनी राय दी थी जो आज भी मौजूं है।

जस्टिस खन्ना ने कहा था कि ‘‘राष्ट्रपति देश का प्रतीक होता है।

उसके आचार-विचार का समाज पर असर पड़ता है।

हालांकि उसे कड़ाई से संविधान के अंतर्गत ही कार्य करना होता है।

परंतु मैं समझता हूं कि इसी सीमा के भीतर वह देश के नैतिक पतन को रोकने में एक अच्छी भूमिका निभा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि वह शासक दल से टकराव की स्थिति पैदा करेगा।

टकराव की तो असल में कोई संभावना ही नहीं है।

खास कर उस स्थिति में ,जबकि राष्ट्रपति देश के नैतिक पर्यावरण को साफ करने के प्रति चिंतित हो।

 अपनी स्थिति की सीमाओं के भीतर ही उसे अपनी सक्रियता तय करनी होगी।’’

   जस्टिस खन्ना की टिप्पणियां न्यायपूर्ण थी।

हाल में  राष्ट्रपति चुनाव हुआ।उसके उम्मीदवार यशवंत सिन्हा तथा कुछ अन्य प्रतिपक्षी नेताओं की टिप्पणियों की जरा जस्टिस खन्ना की टिप्पणियों की तुलना करके देख लें।

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 और अंत में

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जिन राज्यों में एक दलीय शासन है,वहां के मुख्य मंत्री यदि ईमानदार हैं,तो वे अपने मंत्रियों पर चैकस नजर रख सकते हैं।किंतु जहां मिली जुली सरकारें हैं,उन राज्यों के मुख्य मंत्रियों के सामने दिक्कतें हैं।

 ऐसी दिक्कतें कैसे दूर हों ?

इस पर तो संबंधित दलीय हाईकमान को ही विचार करना होगा। 

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कानोंकान 

प्रभात खबर

पटना

25 जुलाई 22


 


शनिवार, 23 जुलाई 2022

       

मुझे लगता है कि ओमप्रकाश राजभर और शिवपाल सिंह यादव जैसे नेताओं की मूल समस्या उनके बेटों की राजनीतिक उच्चाकांक्षाएं हैं।

उन्हें किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द किसी न किसी सदन में भेजने की जल्दीबाजी है।

  देखना है कि बेचारे उन नेता पुत्रों की इच्छी कब पूरी हो पाती है।

 राजभर और शिवपाल जैसी इच्छा रखने वाले नेताओं की इस देश में कोई कमी नहीं है।

पुत्रों की उच्चाकांक्षा पूरी कराने के चक्कर में कई दल धीरे -धीरे बर्बाद होते जा रहे हैं।

पर, यह ऐसी इच्छा है जो मरती ही नहीं।

 हाल में बेचारे शरद यादव की ऐसी ही इच्छा राजद पूरी नहीं कर सका।

देखना है कि राजभर और शिवपाल की इच्छा किस दल से कब पूरी होती है।

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23 जुलाई 22

  

 














शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

 भूली-बिसरी याद

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25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा के बाद संजय गांधी के ही कहने पर केंद्र सरकार अनेक फैसले कर रही थी।

  शाह आयोग की रपट में उसका विवरण आया है।

रपट के पेज नं.-21 पर लिखा है, 

‘‘....जब श्री रे (सिद्धार्थ शंकर राय)कमरे के दरवाजे से बाहर जा रहे थे तो वे (केंद्रीय गृह राज्य मंत्री )ओम मेहता से यह सुनकर आश्चर्य चकित हो गए कि अगले दिन (यानी 26 जून 1975 को)उच्च न्यायालयों को बन्द करने के आदेश दे दिए गए है।

सभी समाचार पत्रों को बिजली सप्लाई बन्द करने के भी आदेश दिए गए हैं।’’

   श्री राय इस बात के विरोधी थे।

 वे इस फैसले को प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर रद करवाना चाहते थे।

दरअसल यह फैसला संजय गांधी का था जो किसी पद पर नहीं थे।

  इस बीच संजय गांधी ने अत्यंत बदतमीजी और गुस्ताखी से कहा कि आप (यानी श्री राय)नहीं जानते कि देश पर शासन कैसे किया जाता है।

अंततः सिद्धार्थ शंकर राय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मिले और उन्होंने दोनों आदेशों को रद करवाया।दरअसल आपातकाल लगाने की सलाह श्री राय की ही थी।

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आपातकाल में एक विधेयक तैयार किया गया था।

उसमें इस बात का प्रावधान था कि राष्ट्रपति,प्रधान मंत्री और लोक सभा के स्पीकर के खिलाफ आजीवन कोई मुकदमा दायर नहीं हो सकता।

पर, किसी ने राजनीतिक कार्यपालिका को समझाया कि ऐसा अनर्थ मत कीजिए।उसके बाद वह उस विधेयक पर काम आगे नहीं बढ़ा।

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22 जुलाई 22 


गुरुवार, 21 जुलाई 2022

 अपनी मदद खुद कीजिए।

कार्बाइड युक्त आम से अपने लीवर, किडनी और 

दिल को बचाइए

शासन आपकी मदद इस बार भी नहीं करेगा

विधान मंडल में भी कोई प्रतिपक्षी इस पर हंगामा नहीं करेगा

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सुरेंद्र किशोर 

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कच्चा आम खरीद कर उसे घर में ही पकाइए ।

पकाइए,यानी स्वाभाविक रूप से उसे पकने दीजिए।

उसे ही खाइए अन्यथा बाजार से लाए गए पके 

आम से आपके दिल, किडनी और लीवर को गंभीर 

खतरा है।

  जानकार लोग लगातार चेतावनी देते रहे हैं।

अब भी चेत जाइए।

सरकार आपको ‘‘कार्बाइड माफिया’’ से नहीं बचाएगी।

सरकार के अंग तो रिश्वत वसूलने में व्यस्त रहते हैं।

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इस साल भी मैंने अपने घर में स्वाभाविक रूप से पके आम खाए।

बाद में कई बार विभिन्न बाजारों से पके आम मंगवाए।

पके आम में मैंने बड़ी मात्रा में कार्बाइड पाया।

आम को मीठा के बदले 

तीता पाया।

खाने में एक ही दिन देर से कार्बाइड युक्त आम सड़ने लगे।

दुर्गंध भी था।

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कार्बाइड युक्त आम के जानलेवा जहर से आपको 

बचाने की हर बार सरकार वादा करती है।

पर कभी बचाती नहीं। 

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इसलिए अपनी मदद खुद कीजिए।

याद रहे ,जानलेवा कार्बाइड सिर्फ आम में ही नहीं है।

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20 जुलाई 22.



 ख्चाहिशों का मोहल्ला बहुत बड़ा होता है।

बेहतर है, हम जरूरतों की गली में मुड़ जाएं

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समय से पहले और तकदीर से ज्यादा कभी 

किसी को कुछ नहीं मिलता

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पिछले कुछ दशकों में मैंने अनेक पदाकांक्षी राजनीतिक कर्मियों को पदतृष्णा की पूर्ति के अभाव में कलटते-कलपते और पद-दाताओं को गरियाते देखा-सुना है।

उनमें से कई गुजर गए।

कई अन्य अब भी मृगतृष्णा के पीछे हैं।

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दरअसल आप कितने महत्वपूर्ण हैं,यह तो आप जानते हैं।

किंतु अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘‘पद-दाताओं’ की नजर में कुल मिलाकर आपकी कितनी उपयोगिता है।

उसके ‘स्केल’ पर आप का स्थान कितना ऊंचा या नीचा है।

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कुछ न पाने का अफसोस क्यों ?

राजनीति के अलावा भी बहुत से क्षेत्र हंै जहां जाकर आप अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं,जन सेवा कर सकते हैं।

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मेरी बातें उन पर लागू नहीं होतीं जो अपने अपार पैसों के 

बल पर जीवन में कुछ भी हासिल कर लते हैं।

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सुरेंद्र किशोर

21 जुलाई 22


मंगलवार, 19 जुलाई 2022

 


इंटेलिजेंस ब्यूरो की ही तरह ‘स्पेशल ब्रांच’ को भी 

कार्य कुशल बनाने की जरूरत 

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सुरेंद्र किशोर

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केंद्रीय इंटेलिजेंस ब्यूरो और राज्य पुलिस के स्पेशल ब्रांच की सतर्कता और गुणवत्ता में भारी फर्क है।

देश-प्रदेश के समक्ष उपस्थित मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए 

राज्य पुलिस के ‘स्पेशल ब्रांच’ को भी आई.बी.की तरह ही दक्ष  बनाने की आज सख्त जरूरत है। 

 दोनों संगठनों की कार्य क्षमता में फर्क का सबसे बड़ा कारण यह बताया जाता है कि इन संगठनों को उपलब्ध साधनों में भी काफी फर्क है।जबकि, काम लगभग एक जैसे करने होते हैं।

  इस फर्क को शीघ्र कम करने की जरूरत है।

यह भी देखने की जरूरत है कि जितने साधन स्पेशल ब्रांच  को उपलब्ध हैं,वह सही जगह ही खर्च हो।

  आई.बी. का काॅडर प्रबंधन बेहतर है।

 आई.बी.के लिए अलग से बहाली होती है।उन्हें समुचित प्रशिक्षण दिया जाता है।

 कई कारणों से आई.बी.की विश्वसनीयता अधिक है।

 इसीलिए कई बार बिहार में हुई किसी बड़ी घटना की खबर आई.बी.को पहले मिल जाती है और स्पेशल ब्रांच को बाद मंे।

कई बार तो स्पेशल ब्रांच को मिलती ही नहीं।

अस्सी और नब्बे के दशकों में एक संवाददाता के रूप में मेरा भी यही अनुभव रहा।

उन दिनों बिहार में आए दिन नर संहार हो रहे थे।

 हाल ही में पटना के पास के फुलवारीशरीफ में जारी देश विरोधी गतिविधियों की जानकारी आई.बी.ने बिहार पुलिस को दी। 

उसके बाद ही बिहार पुलिस कार्रवाई कर सकी।

हालांकि इस बात की सराहना होनी चाहिए कि बिहार पुलिस इस मामले में अब पेशेवर ढंग से काम कर रही है।

  वह दिन कब आएगा जब बिहार पुलिस का स्पेशल ब्रांच कार्य कुशलता मंे आई.बी. की बराबरी कर पाएगा ?

 इसके लिए यह जरूरी होगा कि बिहार सरकार स्पेशल ब्रांच को सचमुच ‘स्पेशल’ बनाने के लिए कुछ खास प्रयास करे।

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चैकसी की नियमित जांच जरूरी 

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पिछले दिनों दिल्ली पुलिस के विशेष कोषांग ने दिल्ली के भीड़भाड़ वाले इलाकों में 30 डमी बम रख दिए थे।

उसे यह देखना था कि पुलिस

कितनी सतर्क रहती है।

इन में से सिर्फ 12 बमों का ही पता लग सका।

दिल्ली पुलिस,प्रायवेट सुरक्षा गार्ड और आम जन की नजरें सिर्फ  12 बमों पर ही पड़ीं।

यदि बम असली होते तो बाकी 18 जगहों में भी विस्फोट हो चुके होते। 

 दिल्ली का जब यह हाल है तो राज्यों की राजधानियों में सतर्कता का क्या हाल होगा ,उसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

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पावती पर अब लघु हस्ताक्षर नहीं

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बिहार सरकार ने अपने अधिकारियों को यह आदेश दिया 

है कि आम लोगों से मिले आवेदन पत्रों की पावती पर अब लघु हस्ताक्षर नहीं चलेगा।

इतना ही नहीं, पूरे हस्ताक्षर के साथ पावती देने से इनकार करने वाले सरकारी कर्मियों 

के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

  डाक से आए आवेदनों की पावती डाक से ही भेजी जाएगी।

     बिहार सरकार यदि अपने इस आदेश को लागू कराने में सफल हो गई तो इससे पीड़ित लोगों को भारी राहत मिलेगी।

 पर, समस्या सिर्फ पावती न मिलने की ही नहीं है।

मुख्य सवाल यह है कि सरकारी कार्यालयों में 

उन लोगों के आवेदन पत्रों का क्या हश्र होता है जो संबंधित कर्मियों को खुश करने की स्थिति में नहीं होते ?

  बिहार सरकार के समक्ष,देश की अन्य सरकारांे के समक्ष भी, हमेशा से ही यह बड़ी चुनौती रही है कि कैसे जनता को रिश्वतखोरी से राहत दिलाई जा सके।

  इन दिनों भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ जितने बड़े पैमाने पर बिहार में कार्रवाइयां हो रही हैं,उतने बड़े पैमाने पर पहले कभी नहीं हुई।इसके बावजूद बिहार के सरकारी कार्यालयों में रिश्वतखेारी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है।क्या इसलिए कि रिश्वतखोर अब भी यह समझ रहे हैं कि ‘‘मारने वालों से अधिक ताकतवर अंततः बचाने वाला होता है ?’’

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समयबद्ध निपटारे का बंधन

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कल्पना कीजिए कि एक  किसान दशकों से अपनी दस बीघे जमीन की मालगुजारी  रसीद कटवाता रहा था।

 अब कर्मचारी कहता है कि आपको आठ बीघे जमीन की ही रसीद कटेगी।जबकि दस बीघा जमीन हमेशा उसके शांतिपूर्ण कब्जे में रही है।

संबंधित आॅफिस में उसे यह बताया जाता है कि आठ बीघे को पहले जैसा दस बीघा बनाने के लिए अब आपको 50 हजार रुपए देने पड़ेंगे।

वह इतना पैसा देने की स्थिति में नहीं है।

  यदि इस संबंध में किसान कोई आवेदन पत्र देकर सवाल पूछता है कि है तो अब

पूरे दस्तखत के साथ पावती रसीद तो उसे मिल सकेगी ।

किंतु उसे उसके सवाल का जवाब भी तीन महीने के भीतर मिल जाए कि उसका दो बीघा कम क्यों हो गया ?

  यदि तीन महीने में जवाब नहीं मिलता है तो वह कहां दौड़ेगा ?

उसके लिए और ऐसे अन्य पीड़ितों के लिए अंचल कार्यालयों 

में समय- समय पर जिले के  उच्च अफसरों के शिविर लगे।

 उसमें यह फैसला हो कि दो बीघा कम करने का दोषी कौन है ? 

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और अंत में 

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 फुलवारीशरीफ में खतरनाक और देश विरोधी आतंकी संरचना यानी टेरर माड्यूल का हाल ही में पता चला है।

इस ‘टेरर माड्यूल’के बारे में विभिन्न राजनीतिक दलों की क्या राय हैं ?

उधर अधिकतर निरपेक्ष जनता की इस मोड्यूल पर क्या राय है ?

क्या अधिकतर जनता की राय और राजनीतिक दलों की राय  के बीच कोई आपसी तालमेल है ?

यदि हां,तब तो ठीक है।

यदि नहीं तो कुछ दलों को  अपने चुनावी भविष्य की चिंता अभी से कर लेनी चाहिए।

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18 जुलाई 22 के

दैनिक प्रभात खबर,

(पटना) में प्रकाशित 


सोमवार, 18 जुलाई 2022

      कल और आज !

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(अपवादों को छोड़कर)पहले की नई पीढ़ियों कहती थीं--

‘‘मैं आज जो कुछ भी हूं ,वह माता-पिता 

और गुरुजन की कृपा से।’’

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(अपवादों को छोड़कर)आज की नई पीढ़ी कहती है कि मैंने सिर्फ अपने बल पर उपलब्धियां हासिल की हैं।

यदि माता-पिता का सहयोग मिल गया होता तो मैं अपने जीवन में और भी आगे बढ़ जाता।

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किसी ने ठीक ही कहा है कि आज की पीढ़ी(अपवादों को छोड़कर)

अपने बुजुर्ग माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से भागने के लिए ही यह कहती है कि उन्होंने मेरे लिए किया ही क्या था,मेरी उपेक्षा के सिवा !!

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सुरेंद्र किशोर

18 जुलाई 22  


सोमवार, 11 जुलाई 2022

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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नेताओं की सिफारिश पर अफसरों की महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती जनहित में नहीं

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बिहार के पिछले अनुभव बताते हैं कि नेताओं,विधायकों और मंत्रियों की सिफारिशों के आधार पर जिलों में छोटे-बड़े अफसरों की तैनाती उन राज्य सरकारों व आम लोगों के लिए हितकारी साबित नहीं हुई।

जाहिर है कि जिस नेता की सिफारिश पर कोई अफसर किसी महत्वपूर्ण पद पर तैनात होगा,वह सरकारी काम काज में उस नेता को तरजीह देगा।

 अपवादों को छोड़कर आम तौर पर किसी नेता का हित प्रतिस्पर्धी नेता के हित से टकराता रहता है।

कई बार तो नेता का हित आम जनता के हित से टकराने लगता है।

  वैसी स्थिति लोकतांत्रिक शासन के हक में कत्तई नहीं है।

क्या उससे सत्ताधारी दल को भी राजनीतिक लाभ होगा ?

क्या उससे राज्य सरकार की छवि जनता में बेहतर बनेगी ?

अंचल कार्यालयों और थानों के कार्यकलापों से किसी राज्य सरकार की छवि बनती या बिगड़ती है।

 बिहार में अंचल कार्यालयों और थानों की मौजूदा कार्य पद्धति में भारी से सुधार की जरूरत है।

इसके लिए जरूरी यह है कि सी.ओ. और थानेदारों की तैनाती में पेशेवर दक्ष और यथासंभव ईमानदार अफसरों को ही तरजीह मिले।

  कई बार जन प्रतिनिधियों को उन अफसरों की दक्षता-ईमानदारी का पता नहीं होता जिसकी वे सिफारिश कर रहे होते हैं।

  इसलिए किसी अफसर की दक्षता-ईमानदारी की जांच  निरपेक्ष,ईमानदार और पेशेवर सरकारी अफसरों की टीम से ही 

उनके सर्विस रिकाॅर्ड देखकर

कराई जानी चाहिए।

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        सिफारिश की परंपरा पुरानी

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  पिछले अनुभव बताते हैं कि  अपने मन लायक अफसर की तैनाती का लोभ विधायक से लेकर मंत्री तक संवरण नहीं कर पाते।

  1977 में बिहार सरकार के मुख्य सचिव रहे पी.एस.अप्पू ने अपना संस्मरण लिखा है।

 ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ अफसर रहे दिवंगत अप्पू ने लिखा कि ‘‘सन 1977 की बिहार सरकार के अधिकतर मंत्री अपनी जाति के अफसर को विभागीय सचिव बनाना चाहते थे। उनकी जाति के ईमानदार अफसर नहीं बल्कि सबसे बेईमान अफसर उन्हें चाहिए था।’’

   दूसरी ओर, सन 1977 की बिहार सरकार में दबंग मंत्री रहे एक नेता ने बाद में मुझे अपना अनुभव सुनाया था।

उन्होंने कहा कि ‘‘जब मैं मंत्री था और फाइल पर कोई नोट लिखता था तो बड़े अफसर कहते थे कि सर, आपकी टिप्पणयों में श्रीबाबू (बिहार के प्रथम मुख्य मंत्री) की नोटिंग का स्तर देखने को मिलता है।’’

किंतु जब मैं मंत्री नहीं रहा और उन्हीं अफसरों को फोन करता था तो वे कभी फोन पर नहीं आते थे।’’

   याद रहे कि अस्सी और नब्बे के दशकों में कई मामलों में स्थानीय विधायकों और मंत्रियों की पसंद के डी.एम. और एस.पी.उनके जिलों में जाते थे।

  पर,उसका नतीजा उन सरकारों के लिए अच्छा नहीं हुआ।

  ऐसी पोस्ंिटग व पक्षपातपूर्ण शासन के कारण भी जनरोष बढ़ा और वे सत्ताधारी पार्टियां चुनाव हारती चली गईं। 

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रक्षा निर्यात में वृद्धि

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वित्तीय वर्ष 2021-22 में भारत ने करीब 13 हजार करोड़ रुपए के गोल-बारुद विदेशों को निर्यात किए।

सन 2014 की अपेक्षा छह गुनी रक्षा -सामग्री का निर्यात 

हुआ है। 

इसमें करीब 70 प्रतिशत योगदान निजी क्षेत्रों का है।बाकी सार्वजनिक क्षेत्र का।

जानकार सूत्रों के अनुसार सन 2025 तक 36 हजार 500 करोड़ रुपए की रक्षा सामग्री के निर्यात का लक्ष्य रखा गया है।

हथियारों के उत्पादन व निर्यात के मामलों में मजबूत होते जाने से अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत का महत्व इधर बढ़ा है।

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  आरक्षण के वर्गीकरण में देरी

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रोहिणी आयोग का कार्यकाल एक बार फिर बढ़ा दिया गया है।

उसका गठन 2017 में नरेंद्र मोदी सरकार ने किया  था।

इस बीच रोहिणी आयोग ने भी पाया कि कुल 2633 पिछड़ी जातियों में से करीब 1000 जातियों को तो आज तक आरक्षण का कोई लाभ मिला ही नहीं।

इसलिए 27 प्रतिशत आरक्षण को चार हिस्सों में बांट दिया जाना चाहिए।

  याद रहे कि मंडल आरक्षण का अधिक लाभ उन पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों का मिल जाता है जो अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध हैं।

  इस सिफारिश के बाद रोहिणी आयोग के जिम्मे अब कौन सा काम बाकी है,यह पता नहीं चल सका है।

केंद्र सरकार ने चार हिस्सों में बांटने वाली सिफारिश पर अब तक कोई निर्णय नहीं किया है।

  2017 के आंकड़े के अनुसार केंद्र सरकार की नौकरियों में पिछड़ी जातियों का औसतन कुल 20.26 प्रतिशत प्रतिनिधित्व है।

जबकि 27 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं।

जानकार बताते हैं कि उप वर्गीकरण के बाद शायद सीटें भरने लगेंगी।

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भूली-बिसरी याद

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कई बार कुछ लोग यह पूछ देते हैं कि सन 1950 में केंद्र

सरकार के कौन -कौन मंत्री थे ?

पुरानी पीढ़ियों के कुछ लोग तो बता भी देते थे।

पर,आज की पीढ़ी ?

उनसे यह जानने की क्यों उम्मीद की जाए ?

किंतु सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए यहां उनके नाम दिए जा रहे हैं।

वे थे-जवाहरलाल नेहरू(प्रधान मंत्री),सरदार वल्लभ भाई पटेल(उप प्रधान मंत्री),बी.आर.आम्बेडकर,रफी अहमद किदवई,सरदार बलदेव सिंह,अबुल कलाम आजाद,जाॅन मथाई,जगजीवन राम,राजकुमारी अमृत कौर,श्यामा प्रसाद मुखर्जी,खुर्शीद लाल,आर. आर. दिवाकर,मोहनलाल सक्सेना,एन.गोपाल स्वामी अयंगार,एन.वी.गाडगिल,के.सी.नियोगी,जयरामदास दौलतराम,के.संथानम,सत्यनारायण सिन्हा,

और बी.वी.केसकर(सभी मंत्री)।

याद रहे कि उससे पहले की अंतरिम केंद्र सरकार में डा.राजेंद्र प्रसाद और सी.राजगोपालाचारी भी कैबिनेट मंत्री रह चुके थे।

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और अंत में

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धरती के पास जितने साधन उपलब्ध हैं,उनसे वह करीब दो अरब लोगों की ही जरुरतों को पूरा कर सकती है।

किंतु दुनिया की आबादी बढ़कर करीब साढ़े सात अरब हो चुकी है। बढ़ती ही जा रही है।

अब कल्पना कर लीजिए कि हम अंततः 

अपने वंशजों के लिए क्या और कितना छोड़कर जाएंगे ?

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कानोंकान

प्रभात खबर

पटना

11 जुलाई 22


      श्रीलंका की घटनाओं से सबक लेने का वक्त

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       सुरेंद्र किशोर

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 राजनीति मंें परिवारवाद-भ्रष्टाचार  ने श्रीलंका को बर्बाद कर दिया।

पांच राजपक्षे भाइयों ने मिलकर देश को लूटा।

इस परिवार के पास देश की सरकार का 70 प्रतिशत बजट था।

वित मंत्री को ‘‘मिस्टर टेन परसेंट’’कहा जाता था।

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इस उदाहरण को देखते हुए भारत के परिवारवादी-वंशवादी राजनीतिक परिवारों का एक दिन क्या हाल होगा ?!!

यहां तो अब अत्यंत थोड़े से अपवादों के छोड़कर सिर्फ 10 प्रतिशत से तो किसी को संतोष ही नहीं है-चाहे नेता  परिवारवादी हो या नहीं हो।

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राजनीति का परिवारवाद यहां भी ढह रहा है।पर बहुत धीरे -धीरे ।

क्या पूरी तरह ढह जाने के पहले उन्हें कुछ और कारनामा करना है ?

पहले ही परिवारवाद-वंशवाद-भ्रष्टाचार से यह देश व खुद कुछ दल एक हद तक बर्बाद हो चुके हैं।

यहां भी किसी दल को जब जातीय-धार्मिक वोट बैंक की ताकत मिल जाती है तो वह सरकार में आने पर लूटने लगता है।

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अब जरा श्रीलंका पर आएं

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 श्रीलंका सरकार में एक ही परिवार(राजपक्षे परिवार) के पांच सदस्य शीर्ष पदों पर विराजमान थे।

वे थे--

1.-गोटाबाया राजपक्षे-राष्ट्रपति 

( रक्षा मंत्रालय इन्हीं के पास ।)

2.-महेंद्र राजपक्षे--प्रधान मंत्री

3.-बासिल राजपक्षे-वित्त मंत्री-

  (इन्हें बी. बी. सी. ने एक बार ‘मिस्टर 10 परसेंट’ कहा था।)

4.-चमल राजपक्षे-सिंचाई मंत्री

5.-नमल राजपक्षे--युवा व खेल मंत्री

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अब वे कहां हैं ? !!

भागे-भागे फिर रहे हैं।

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10 जुलाई 22


सोमवार, 4 जुलाई 2022

 किसी भाषा से दुराव क्यों ?

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शेखर गुप्त और ए.जे.फिलिप की यादें

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सुरेंद्र किशोर

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दैनिक ‘जनसत्ता’ की बैठक के लिए मैं दिल्ली गया हुआ था।

हमारे संपादक अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि आपसे शेखर गुप्त मिलना चाहते हैं।

आप जाकर मिल लीजिए।

शेखर जी तब इंडियन एक्सपे्रस के संपादक थे।

   मैं उनसे मिला।

उन्होंने अन्य बातों के अलावा मुझसे यह भी कहा कि मैं अन्य किसी अंग्रेजी पत्रकार की अपेक्षा इस देश को बेहतर जानता हूं क्योंकि मैं हिन्दी अखबार भी पढ़ता हूं।

उन्होंने कहा कि आप हमारे एक्सप्रेस के लिए भी लिखिए।

मैंने कहा कि मैं अंग्रेजी जानता जरूर हूं किंतु मुझे लिखने का अभ्यास नहीं है।

 उन्होंने कहा कि मैं अनुवाद करवा लंूगा।

आप हिन्दी में ही लिखें।

मैंने पहले तो हिन्दी में ही लिखा।

पर,बाद में अंग्रेजी में लिखकर भेजने लगा।

एक्सप्रेस में मेरी कई रपटें छपी थीं।

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एक अन्य सम्मानित अंग्रेजी पत्रकार की हिन्दी के बारे में राय आपको उनकी इस चिट्ठी से मिल जाएगी जिसकी स्कैन काॅपी इस पोस्ट के साथ दी जा रही है।

 वे हैं द हिन्दुस्तान टाइम्स(पटना) के पूर्व सहायक 

संपादक ए.जे.फिलिप।

 बाद में तो वे बड़े -बडे़ अखबारों में बड़े पदों पर भी रहे।

पटना के ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में वे एक बहुत रोचक व पठनीय साप्ताहिक काॅलम लिखते थे।

 मैं उस काॅलम को जरूर पढ़ता था। 

 उन दिनों मैं दैनिक ‘आज’ के पटना संस्करण में मुख्य संवाददाता के रूप में काम कर रहा था।

1980 की बात है।

  मैंने फिलिप साहब को यह सलाह दी कि  आप अपने काॅलम में रेणु जी पर कभी लिखिए।

उन्होंने न सिर्फ लिखा,बल्कि मुझे हिन्दी में इस संबंध में पत्र भी लिखा।

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फिलिप साहब के भी व्यवहार में न तो अंग्रेजी भाषा में पत्रकारिता करने का कोई अतिरिक्त गुमान था और न ही यह बात थी कि किसी 

‘‘वर्नेक्युलर जनर्लिस्ट’’ की सलाह को सम्मान देने की भला क्या जरूरत है !  

फिलिप साहब का वह पत्र मुग्ध कर देने वाला था।

इसीलिए तो पिछले 42 साल से मेरे पास हैै।

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3 जुलाई 22

 



 



कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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विस्फोट की घटना ने बता दी बेहतर पुलिस प्रशिक्षण की जरूरत 

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पटना सिविल कोर्ट में गत शुक्रवार को बम विस्फोट हो गया।

विस्फोट किसी अपराधी ने नहीं किया।

अभियोजन आॅफिस के टेबल से गिर कर बम ब्लास्ट कर गया।विस्फोट से पुलिसकमर्मी सहित कई लोग

घायल हो गए।

पुलिस जिन्दा बम लेकर कोर्ट चली गई थी।

यानी पुलिस को इस बात का प्रशिक्षण नहीं मिला था कि कोर्ट ले जाने से पहले उस बम को डिफ्यूज कर या करा लेना चाहिए था।

यह बुनियादी सावधानी वह पुलिसकर्मी क्यों नहीं बरत सका जो बम लेकर कोर्ट गया था ?

इसका एक ही जवाब है कि कई स्तरों पर असवाधानी बरती जाती है।

 यदाकदा यह खबर भी आती रहती है कि गार्ड आॅफ आॅनर देते समय राइफल से फायर ही नहीं हो पाता।

यदि ऐसी गलती एक बार हो गई तो क्षम्य है।

 किंतु फायर न हो पाने की गलती बार-बार क्यों होती है ?

ऐसी गलतियों के बारे में संबंधित अधिकारियों को गंभीर रूप से सोचना-विचारना चाहिए। 

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    कार्रवाई में सावधानी जरूरी 

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केंद्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि वे अनुसूचित जाति और जनजाति के खिलाफ अपराध के मामलों में एफ.आई.आर.दर्ज करने में देरी नहीं करे।

  केंद्र सरकार की यह पहल अच्छी है।

किंतु इसमें एक सावधानी की जरूरत है।

क्योंकि एस.सी.-एस.टी.(अत्याचार निवारण)कानून के दुरुपयोग की खबरें आती रहती हैं।

 मायावती जी जब उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री थीं, तो उन्होंने दुरुपयोग रोकने के कुछ उपाय किए थे।

उस संबंध में राज्य मुख्यालय से एक निदेश राज्य के सारे आरक्षी अधीक्षकों को भेजा गया गया था।

उस निदेश की काॅपी अन्य राज्यों के पास भी होने चाहिए।

वह ऐसा निदेश था जिससे न तो उस कानून के दुरुपयोग की भरसक आशंका थी और न किसी अत्याचार के बच जाने की गुंजाइश थी।

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जिनके घर शीशे के हांे 

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इन दिनों एक खास बात कुछ अधिक ही देखी जा रही है।

प्रतिपक्षी दलों के जिन नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लंबित हैं,वे सत्ताधारी दल के समक्ष डट कर खड़ा नहीं हो पा रहे हंै।

ऐसी बात पहले भी छिटपुट होती थी।

 किंतु अब कुछ अधिक ही हो रही है।क्योंकि राजनीति में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है।

  हाल के उप चुनावों में एक चर्चित दल ने अपने उम्मीदवार खड़ा करने में एक खास बात का ध्यान रखा ।

वह यह कि उसने अपने उम्मीदवारों का फैसला इस तरह किया ताकि उससे सत्ताधारी दल को चुनावी लाभ मिल सके।

लाभ मिला भी।

नुकसान उस विवादास्पद दल को और उसके नेतृत्व को हुआ।  

ठीक ही कहा गया है कि जिनके घर शीशे के हों,वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं मारते। 

  इस कहानी का सबक यह है कि यदि राजनीति में किसी नेता को अपनी साख बढ़ानी या जमानी है तो उसे भरसक भ्रष्टाचार से दूर रहना चाहिए।

अन्यथा दबे-दबे रहना पड़ेगा।

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 प्रोन्नति से पदावनति तक 

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राजनीति में भी कभी प्रोन्नति होती है तो कभी उसी व्यक्ति की पदावनति हो जाती है।

हाल में पूर्व मुख्य मंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ भी यही हुआ।

बिहार में तो बहुत पहले यह सब हो चुका है।

दारोगा प्रसाद राय सन 1970 में बिहार के मुख्य मंत्री थे।

सन 1973 में अब्दुल गफूर मंत्रिमंडल गठित हुआ तो दारोगा बाबू उस सरकार में वित्त मंत्री बनाए गए।

  केदार पांडेय सन 1972 में बिहार के मुख्यमंत्री  थे।

 किंतु पांडेय जी भी गफूर मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री बने थे।

 दारोगा बाबू से किसी ने इस पर सवाल किया था।उसके जवाब में उन्होंने कहा कि मान लीजिए कि मुझे जनता के काम के लिए दिल्ली जाना है।

उस दिन दिल्ली के लिए पटना से जहाज उपलब्ध नहीं है।

तो मैं ट्रेन से ही क्यों नहीं दिल्ली चला जाऊंगा ? 

हाल में महाराष्ट्र में एक पूर्व मुख्य मंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शिंदे मंत्रिमंडल में उप मुख्य मंत्री पद स्वीकार कर लिया,तो इस मामले पर देश में चर्चा शुरू हो गई।

पर,ऐसा तो महाराष्ट्र में भी पहले हो चुका है।

 पर,सबसे बड़ा उदाहरण तो चक्रवर्ती राज गोपालाचारी का है।

वह पहले देश के गवर्नर जनरल थे।

बाद में वे मद्रास प्रदेश के मुख्य मंत्री बने थे।

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विधायिकाओं में हंगामा चिंताजनक 

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कुछ खास सदस्यगण ही संसद या विधान सभा की कार्यवाही को बाधित करने के लिए आए दिन बाध्य कर देते हैं।

यदि किसी सदस्य के कारण एक साल में दस दिन सदन की कार्यवाही स्थगित हुई हो तो उस सदस्य के कुल कार्यकाल में से एक महीना घटा देना चाहिए।

इसके लिए कोई कानून बने।

एक महीना पहले उन्हें सदन की सदस्यता से रिटायर कर दिया जाए।

  इस कानून का लाभ हर दल को किसी न किसी राज्य में होगा।क्योंकि अधिकतर दल कहीं न कहीं सत्ता में हैं।हंगामे तो प्रतिपक्षी दल ही करते हैं।

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और अंत में 

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यह खबर गत जून महीने की है।

बिहार विधान सभा की कार्यवाही चल रही थी।

एक दिन कुल 5 घंटे की कार्यवाही में चार घंटे 9 मिनट तक हंगामा होता रहा।

विधान परिषद में भी वही दृश्य था।

सभापति ने कहा कि विपक्ष का रवैया सदन का अपमान माना जाएगा।

  हालांकि ऐसे दृश्य संसद से लेकर देश की विधान सभाओं तक में आए दिन देखे जाते हंै।

इसका कोई अंत नजर नहीं आता।

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कानोंकान

प्रभात खबर

पटना 

4 जुलाई 22


शनिवार, 2 जुलाई 2022

    ऐसे किसी ‘राजनीतिक अनुमान’ को 

   क्यों दुहराना जो वर्षों से लगातार

   गलत साबित हो रही है !

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सुरेंद्र किशोर

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इन दिनों देश के अलग-अलग हिस्सों से मेरे मित्रों और परिचितों के फोन आते रहते हैं।

उनका एक ही सवाल होता है।

क्या नीतीश कुमार की सरकार जा रही है ?

महाराष्ट्र की ताजा राजनीतिक घटना के बाद आज भी मुझे 

एकाधिक फोन आए।

  मैंने सोचा कि मैं इस मीडिया के जरिए इस संबंध में अपना

आकलन बता दूं।

सबके फोन के जवाब देना मुश्किल होता है।

वह भी एक ही बात कहने के लिए।

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बिहार में मौजूदा सरकार रहेगी या जाएगी,उसके बारे में सिर्फ तीन व्यक्तियों में से कोई एक पक्के तौर पर बता सकते हैं।

वे हैं-नरेंद्र मोदी, अमित शाह और नीतीश कुमार।

इन तीनों में से किसी ने परिवर्तन का कोई संकेत नहीं दिया है।

उल्टे केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने गत 29 जून को पटना में कहा कि 2025 का बिहार विधान सभा चुनाव राजग, नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ेगा।

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मेरा ‘राजनीतिक एंटेना’ भी यही कहता है कि नीतीश सरकार पर फिलहाल कोई खतरा नहीं है।

यदि मीडिया के एक हिस्से के पास चैंकाने वाली खबर नहीं मिल रही है तो मेरी राय है कि वह सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करके बिहार में चल रहे विकास व कल्याण से संबंधित सरकारी खबरें निकाले।

 वे न सिर्फ जनहित में हांेगी, बल्कि चैंकाने वाली भी होंगी।

ऐसा करने पर उसे पेशेवर संतुष्टि भी मिलेगी।

 उसकी जगह वर्षों से ऐसी एक खबर प्रसारित-प्रचारित करने से क्या फायदा जो लगातार गलत साबित हो रही हो !

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1 जुलाई 22 

   


    संपादित करके ही डिबेट्स 

   चैनलों पर दिखाए जाएं

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     सुरेंद्र किशोर

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नूपुर शर्मा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से

मेरी एक पुरानी मांग को बल मिलता है।

  एक दर्शक-श्रोता के नाते मेरी यह मांग रही है कि किसी डिबेट को संपादित करने के बाद ही टी.वी.चैनलों पर दिखाया जाना चाहिए।

  मेरी यह सलाह संसद की कार्यवाहियों के लिए भी रही है।

किंतु अभी मैं सिर्फ टी.वी.डिबेट्स पर ही खुद को सीमित रखता हूं।

  यदि संपादित नहीं होगा तो नूपुर शर्मा प्रकरण की पुनरावृति 

को रोका जाना मुश्किल होगा।

बेहतर तो यही होगा कि सुप्रीम कोर्ट ही संपादित करने के लिए चैनलों को देशहित में बाध्य कर दे।

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2 जुलाई 22

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