Monday, November 11, 2013

हरि अनंत लालू कथा अनंता


लालू कथा कहां से शुरू की जाये ? उस समय से जब वे पटना भेटनरी काॅलेज में 15 रुपये रोज पर दैनिक मजदूरी करते थे ? या, उस समय से जब वे मुख्यमंत्री बने थे ?

  वहां से जब 1969 में लालू प्रसाद बिहार प्रदेश युवजन सभा के संयुक्त सचिव चुने गये थे या वहां से जब वे पटना विश्व विद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गये थे ?

   जहां से भी शुरू की जाए, पर एक बात तय है कि लालू प्रसाद की कहानी दिलचस्प और नाटकीय रही है। अब भी है। कहानी में सस्पेंस है, हाॅरर है। उतार और चढ़ाव है। हास्य रस है तो रौद्र रस भी है। सहानुभूति है तो जुगुप्सा भी। बहादुरी है तो कायरता भी। उनमें रोबदाब की तो कभी कोई कमी नहीं रही। हास्य रस तो इतना है कि इस देश की राजनीति में शायद उसका कोई जोड़ा हो। एक राजद सांसद के अनुसार ‘अभी हमारा शेर खंदक में गिर गया है। पर शेर तो शेर ही होता है।’

   पूरे राजनीतिक जीवन में उन पर आरोप तो थोक भाव से लगे, पर लालू पर  संयम, शालीनता, शुचिता और अनुशासन के आरोप कभी नहीं लगे। आर्थिक संयम से दूर और किसी राजनीतिक सिद्धांत के सम्यक ज्ञान से वंचित लालू प्रसाद को मदांध सत्ताधारी होने का जो नुकसान हो सकता था, वही सब हुआ है। नुकसान उन कमजोर वर्ग के लोगों को भी हुआ जिन्हें लालू ने कभी सम्मान के साथ जीना व सीना तान कर चलना सिखाया था। यह और बात है कि तने सीने के नीचे जो एक पेट होता है, उसमें डालने के लिए लालू ने अन्न के दाने का प्रबंध नहीं किया। जिनके लिए उन्होंने सत्ता -सुख व आलीशान जीवन का प्रबंध किया भी तो, उनकी जमात सीमित रही। आम तौर से वह जमात आज भी उनके साथ है।

   आजादी के बाद राजनीति और सत्ता से नाजायज पैसे निकालकर इस देश के अधिकतर नेताओं ने अपनी संपत्ति बनाई और अपने लगुए-भगुए को अमीर बनवाया। पर, इस तरह संपत्ति बनाने वालों में से अधिकतर लोगों ने सावधानी बरती। पर इस काम में लालू प्रसाद व उनके अनेक करीबियों ने किसी तरह की सावधानी नहीं बरती। इसीलिए लालू को यह दिन देखना पड़ रहा है।  

  अपने भाषणों में लोहा सिंह के चर्चित भोजपुरी नाटक के मशहूर व दिलचस्प संवादों के सफल दोहराव के कारण लालू प्रसाद पटना विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच लोकप्रिय हुए थे। छात्राओं के बीच उनकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यह था कि कालेज बस में छात्राओं को छेड़ने वाले छात्रों की लालू अच्छी तरह खबर  लेते थे। पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने जाने के बाद वे मशहूर बने। बाद में तो एक से एक ऊंचाइयां चढ़ते चले गये।

   कुल मिलाकर वे अच्छे कामों की अपेक्षा विवादास्पद कामों के लिए ही अधिक चर्चा में रहे। अंततः लालू प्रसाद सजा से इसलिए नहीं बच सके क्योंकि उन्होंने कभी ईमानदारी को अपनी राजनीति का आधार बनाया ही नहीं। वे मानते थे कि आजादी के बाद के अधिकतर सवर्ण नेताओं ने भी यही काम किया। यानी इधर का माल उधर और उधर का माल इधर किया, और वे बचते चले गये। इसलिए हमारे लोग भी यह सब कर रहे हैं तो इसमें किसी को एतराज क्यों होना चाहिए ?

क्या इसलिए एतराज होना चाहिए क्योंकि हम पिछड़े समुदाय से आते हैं ?

  चुनावी धांधली के बारे में भी लालू प्रसाद की यही राय रही है। इसीलिए उन्होंने अपने आसपास बाहुबलियों का जमावड़ा भी जुटाए रखा। जहां बाहुबली व माफिया होंगे, वे कोई सत्संग तो करेंगे नहीं। उनके शासन काल में लालू -संरक्षित कई बाहुबलियों ने राज्य में अपना इलाका बांट लिया था। वहां के एस.पी. और डी.एम. उन माफियाओं की जेब में होते थे। इस तरह शासन ध्वस्त होता गया। पटना हाईकोर्ट ने एक बार यहां तक कह दिया था कि जंगलराज का भी कुछ कायदा होता है, पर यहां तो वह भी नहीं।

   दरअसल लालू प्रसाद को लगता था कि परंपरागत सत्ता संरक्षित सवर्ण बाहुबलियों व माफियाओं के कारगर मुकाबले के लिए यह जरूरी है अन्यथा वे गरीबों-पिछड़ों का वास्तविक राज होने ही नहीं देंगे। उनको इस बात की शिकायत थी कि राज्य के कई चुनाव क्षेत्रों में कांग्रेसी उम्मीदवार पुलिस की मदद से बाहुबलियों से बूथ कंट्रोल कराकर ही चुनाव जीतते हैं जबकि सामाजिक न्याय वाले मतदाताओं की संख्या अधिक है। एक बार इन पंक्तियों के लेखक ने उनके अपने कुछ खास बाहुबलियों के बारे में उनसे चर्चा की थी। उस पर सत्ता मद में चूर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भोजपुरी में कहा  था -‘के बाहुबली बा हो ? तोहरा लोग के माथा खराब हो गएल बा ! अरे भई, वे लोग स्वाभिमानी युवक हैं। केकरा पर केस ना होखेला ?’

दूसरी ओर उन बाहुबलियों ने पटना सहित बिहार के अधिकांश हिस्से में छोटे-बड़े व्यापारियों, पैसे वालों और कई बार राह चलते लोगों का भी जीना मुहाल कर दिया था। व्यापारी बिहार छोड़ कर भाग रहे थे।

  जब पूर्णिया इलाके में पप्पू यादव का आतंक था, उस समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने 1994 में एक बड़े पत्रकार से कहा था कि ‘एक बार पप्पू यादव से जरूर मिलिए। वह बहुत शालीन लड़का है।’ बाद में जब पप्पू से उनका मतभेद हुआ तो खुद लालू ने कहा कि पप्पू यादव क्रिमिनल है। दूसरी ओर राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने 24 जून 1997 को यह आरोप लगाया था कि लालू के साथ अब ठेकदार व गुंडे की टीम ही बची है।’

   उन्हीं दिनों एक अन्य पत्रकार अनिल शुक्ल के साथ भेंट वार्ता में लालू ने कहा था कि ‘जनता ने जिसको वोट दिया, वह कहां का अपराधी ?’

   रांची की निचली अदालत और बाद में हाईकोर्ट के फैसलों के बाद अब भी राजद यह कह रहा है कि लालू जी को साजिश के जरिए फंसा दिया गया। हम जनता की अदालत में जाएंगे। अदालती फैसले के बाद भी ऐसी टिप्पणी ? क्या यह उन अदालतों की अवमानना नहीं है जिसने लालू को सजा दी है ? पर इसकी परवाह किसे है ?

 यानी राजद को न्यायिक फैसले की अपेक्षा चुनावी फैसले पर अब भी अधिक यकीन है। यानी उस दल की की चिंतन धारा में निरंतरता जारी है।

  पशुपालन घोटाले में जब लालू प्रसाद का नाम पहली बार आया तो एक पत्रकार ने उनसे पूछा था कि क्या आप मोरल ग्राउंड पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे ?

इसका जो कुछ जवाब उन्होंने दिया, उससे एक बार फिर यह साबित हो गया कि नैतिकता जैसे  मामले में उनकी राय क्या है। उन्होंने तब प्रति प्रश्न किया था, ‘यह मोरल ग्राउंड क्या होता है ? ई कौन ग्राउंड है ? इहां तो दो ही ग्राउंड हैं। एक मिलर स्कूल ग्राउंड और दूसरा गांधी मैदान ग्राउंड। मोरल ग्राउंड कुछ नहीं होता। प्रमुख होती है राजनीति।’ उनकी यह उक्ति उसी तरह की थी जब उन्होंने कहा था कि  ‘विकास से वोट नहींं मिलता। सामाजिक समीकरण से वोट मिलता है।’

   इस तरह जब अपराध और भ्रष्टाचार के बारे में लालू प्रसाद की यही राय थी तो उन्हें एक न दिन उसका खामियाजा भुगतना ही था।अब देखना है कि अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट इस केस में क्या रुख अपनाता है। इस बात पर भी उनका राजनीतिक कैरियर निर्भर करेगा।

  कुछ लोग महान यानी चांदी के चम्मच के साथ ही पैदा होते हैंं। कुछ अन्य लोग अपने त्याग, तपस्या और कर्मों के जरिए महान बनते हैं। और कुछ दूसरे लोग ऐसे होते हैं जिन पर महानता थोप दी जाती है। 1990 के बाद के लालू के क्रियाकलापों को देख कर यही लगता है कि लालू प्रसाद पर महानता थोप दी गयी। इस काम में पहले देवी लाल -शरद यादव की भूमिका रही जिन्होंने लालू प्रसाद को कर्पूरी ठाकुर का उत्तराधिकारी बनवा दिया। बाद में आरक्षण विरोधी आतुर सवर्णों की।

हालांकि शरद यादव ने बाद में कहा कि लालू को मुख्यमंत्री बनवाना मेरी भूल थी।

 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर के बीच के राजनीतिक झगड़े का लाभ भी लालू को मिला था। अंत में मंडल आरक्षण के समय आतुर सवर्णों ने लालू को अनजाने में राजनीतिक तौर पर महाबली बना दिया यानी पिछड़ों को लालू के करीब ला दिया।

  1990 में बिहार जनता दल विधायक दलके नेता पद का चुनाव हो रहा था। देवीलाल-शरद यादव के उम्मीदवार लालू प्रसाद थे। वी.पी. सिंह के उम्मीदवार रामसुंदर दास थे। चंद्र शेखर खेमे को लगा कि शायद वी.पी. का उम्मीदवार जीत जाएगा, इसलिए उन्होंने दास का वोट काटने के लिए रघुनाथ झा को खड़ा करा दिया। नतीजतन लालू प्रसाद जीत गये। हालांकि किसे कितने मत मिले, इसकी विधिवत घोषणा तो नहीं की गई। पर पत्रकार श्रीकांत के अनुसार लालू प्रसाद को 58, राम सुंदर दास को 54 और रघुनाथ झा को 14 मत मिले।

  मुख्यमंत्री बनने के थोड़े दिनों बाद तक तो लालू प्रसाद सहमे -सहमे रहे। इसलिए भी क्योंकि उनकी अल्पमत सरकार उसी तरह भाजपा व कम्युनिस्टों के सहारे चल रही थी जिस तरह उन दिनों केंद्र में वी.पी. सिंह की सरकार भाजपा व कम्युनिस्टों की बैसाखी पर जिंदा थी।

  पर इस बीच मंडल और मंदिर विवाद शुरू हो गया। मंडल आरक्षण विरोधियों ने वी.पी.-लालू के खिलाफ बिहार की सड़कों पर आरक्षण के विरोध का नंगा नाच किया। उन लोगों ने शालीनता की सारी हदें तोड़ दीं। आरक्षण विरोधी गाली गलौज व हिंसा पर उतर आये थे।

   इसी तरह का विरोध 1978 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का भी हुआ था जब बिहार सरकार की नौकरियों में पिछड़ों के लिए कर्पूरी सरकार ने आरक्षण कर दिया था। कर्पूरी ठाकुर तो शालीन व्यक्ति थे।उन्होंने सब कुछ बर्दास्त किया।

 पर इसके विपरीत लालू प्रसाद और उनके समर्थकों ने आरक्षण विरोधियों का सड़कों पर उतर कर जोरदार जवाब दिया। खुद लालू प्रसाद ने भी भाषा की सारी मर्यादाएं तोड़ दीं। इससे भीषण जातीय तनाव पैदा हुआ। पिछड़ों को लगा कि जो चीज उन्हें सदियों से नहीं मिली, वे मिल रही हंै तो मुट्ठी भर सुविधासंपन्न सवर्ण लोग हमारा हक मारना चाहते हैं और हमारे बचाव में लालू प्रसाद मजबूती से खड़े हैंं। फिर क्या था, लालू प्रसाद पिछड़ों के एकछत्र नेता बन गये। बिहार में पिछड़ांे की आबादी, कुल आबादी का करीब 52 प्रतिशत है।

 यहां एक बात याद रखने की है। इस पिछड़ा बहुल प्रदेश में आजादी के बाद कांग्रेस ने किसी पिछड़ा नेता को कभी मुख्यमंत्री नहीं बनाया। सन् 1970 में दारोगा प्रसाद राय को बनाया भी तो तब जब खुद कांग्रेस को विधानसभा में अपना पूर्ण बहुमत हासिल नहीं था।

 यहां एक और बात कहने लायक है। कांग्रेस न सिर्फ राजनीति में बल्कि सरकारी नौकरियों व ठेकदारी वगैरह के कामों में भी आजादी के बाद पिछड़ों की उपेक्षा करती रही जबकि पिछड़े भी कांग्रेस को वोट देते रहे। तब सारण जिले में तो राजपूत-यादव राजनीतिक गठबंधन था। इस पृष्ठभूमि में पिछड़ों को लालू के महत्व का पता चला।

    इसी बीच रथ यात्री एल.के. आडवाणी को लालू सरकार ने समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया।इससे अल्पसंख्यकों का लगभग पूरा समर्थन लालू प्रसाद को मिल गया। तब लालू की लोकप्रियता चरम पर थी।
इसी बीच 1991 में लोकसभा चुनाव हुआ। लालू प्रसाद की लोकप्रियता के बल अविभाजित बिहार में जनता दल को 54 में 31 सीटें मिलीं। सन 1990 के विधानसभा चुनाव में जनता दल को जहां 24.65 प्रतिशत मत मिले थे, वही 1991 के लोकसभा चुनाव में उसे 34.19 प्रतिशत मत मिले।

  पर, अब स्थिति यह है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद के दल को बिहार में सिर्फ 19.30 प्रतिशत मत मिले। लालू अपनी राजनीतिक पूंजी संभाल नहीं सके। ऐसा उनकी गलत रणनीतियों व लालच के कारण हुआ। लोकसभा की सिर्फ चार सीटों पर ही 2004 में राजद को जीत हासिल हो सकी। बिहार विधानसभा में राजद के अब 22 विधायक हैं। सन 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू की भारी जीत के पीछे रामविलास पासवान का मुख्य योगदान था।

   लालू का राजनीतिक ग्राफ क्यों गिरा ? इसमें चारा घोटाला का हाथ तो था ही, यह बात भी थी कि लालू प्रसाद को जिन गरीब- गुरबा ने राजनीतिक तौर पर महाबली बनाया था, उनकी आर्थिक लाचारी को कम करने की लालू ने कोशिश नहीं की। की भी तो अपने परिजन व परिवार के बाहर की एक छोटी जमात की।

   दरअसल महाबली बनने के बाद उन्होंने शुरुआत ही गलत कर दी थी। 1991 की जीत के बाद वे पहले  सिर्फ यादव-मुसलमान-दलित वोट बैंक पर खुद का ध्यान सीमित कर लिया। उसके बाद वे सिर्फ एम-वाई यानी यादव-मुस्लिम तक सिमट गये।

  उनके एक सहकर्मी के अनुसार 1991 के चुनाव रिजल्ट के बाद लालू प्रसाद ने एक रणनीति बनाई। उन्होंने तय किया कि सरकार के जरिए राज्य का आम विकास नहीं करना है। अन्यथा इसका अधिकांश लाभ सवर्णों को ही मिल जाएगा जो उनके राजनीतिक तौर पर विरोधी हैं। पिछड़ों नहीं मिलेगा।

  अब यादवों को आर्थिक, राजनीतिक और बाहुबल से संपन्न बना देना है। मुसलमानों के लिए, उनकी प्राण रक्षा के सिवा, विकास का कोई काम करने की जरुरत नहीं। दलितों के लिए इंदिरा आवास योजना के तहत केंद्र के मिले पैसों से पक्का मकान बनवा देना है। किसी भी ग्रामीण के जीवन में पक्का मकान का बड़ा महत्व है। इन तीनों समुदायों यानी यादव-मुस्लिम- दलित की मिली जुली आबादी 42 प्रतिशत है। इतने वोट हमें मिल जाएंगे। बाकी वोट कई भागों में बंट जाएंगे। इस तरह हम बीस साल तक राजा की तरह राज करेंगे। पर इंदिरा आवास योजना भ्रष्टाचार में फंस गया।

   यानी 2000 के विधानसभा चुनाव के साथ ही लालू के राजनीतिक अश्वमेध यज्ञ में व्यवधान पड़ना शुरु हो गया। उससे पहले चारा घोटाले में 1997 में पहली बार विचाराधीन कैदी के रुप में लालू जेल जा चुके थे। बदनामी की चर्चा तेज हो गई थी।

  सन 2000 में बिहार विधानसभा चुनाव में राजद को बहुमत नहीं मिला। उसे कांग्रेस की मदद से सरकार बनानी पड़ी। कांग्रेस की शर्त बिहार के बंटवारे की थी। लालू प्रसाद इसके लिए भी तैयार हो गये जबकि कुछ ही समय पहले लालू ने सार्वजनिक रुप से यह घोषणा की थी कि झारखंड मेरी लाश पर बनेगा। पर सत्ता की चाह जो न कराए !

   उधर लालू -राबड़ी राज मेंं अपहरण, गुंडागर्दी, नरसंहार, यानी कुल मिलाकर जंगलराज चल रहा था। उन दिनों बिहार पूरी दुनिया में उपहास का विषय बना हुआ था।

  उस शासन के कम से कम दो किस्से आज मौजूं होंगे।

लालू मंत्रिमंडल में 72 मंत्री थे। इन पंक्तियों के लेखक ने लालू सरकार के एक मंत्री से पूछा कि एक गरीब राज्य में इतने अधिक मंत्रियों के खर्चे का सरकारी खजाने पर इतना बोझ क्यों ?

मंत्री का जवाब था, ‘अभी तो यहां कुछ और मंत्रियों की जरुरत है।क्योंकि हमारे यहां ब्लाॅक आफिस काम नहीं करता। अनुमंडल दफ्तर काम नहीं करता। जिला और कमीश्नरी आॅफिस काम नहीं करते। इसलिए जनता के काम तो मंत्रियों को ही  करना है।

    उसी मंत्री से एक और सवाल पूछा गया। बिक्री कर के मद में आपकी सरकार मात्र 1800 करोड़ रुपये सालाना वसूल पाती है जबकि आंध्र प्रदेश में इस मद में करीब छह हजार करोड़ रुपये से भी अधिक मिलते हैं। आंतरिक संसाधनों की कमी को आधार बनाकर योजना आयोग बिहार की विकास योजना का आकार छोटा कर देता है। नतीजतन विकास के काम रुके हुए हैं। इससे नक्सली समस्या बढ़ रही है। यहां तक कि सरकारी  कर्मचारियों के वेतन के लाले पड़े रहते हैं। आप लोग ईमानदारी से टैक्स क्यों नहीं वसूलते ?

   इस पर मंत्री का  अजीब जवाब था-टैक्स के जो पैसे  लोगों के पास सरकार छोड़ देती है, वही पैसे इस राज्य की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ हैं।

  ऐसे तर्कों -कुतर्काे के आधार पर लालू-राबड़ी की सरकार चल रही थी।

विकास की भले कमी हो, पर सरकारी घोटालों की कोई कमी नहीं थी। चारा घोटाला के अतिरिक्त उस शासन काल के कुछ अन्य बड़े घोटालों के नाम एक बार फिर याद कर लेना भी मौजंू होगा--अलकतरा घोटाला, दवा घोटाला, भूमि घोटाला, वन घोटाला, आॅडिट घोटाला, अतिरिक्त निकासी घोटाला, असमायोजित राशि घोटाला, मंत्रिपरिषद खर्च घोटाला, व्याख्याता नियुक्ति घोटाला और न जाने कितने अन्य छोटे -बड़े घोटाले !

  इन घोटालों में से कुछ की भी जांच तभी हो सकी जब अदालत ने ऐसा आदेश दिया। अन्यथा उसकी लीपापोती की ही कोशिश होती रही। चारा घोटाले में भी यही हुआ था। घोटाले का आरोप सामने आ जाने के बाद लालू सरकार ने चारा घोटाले की जांच के लिए राज्य सरकार के बड़े अफसरों की जो समिति बनाई थी, उस समिति के तीनों अफसर खुद चारा घोटालेबाज थे। वे जांच के बदले लीपापोती कर रहे थे। सी.बी.आइ. ने उन्हें भी बाद में जेल भेजा। उन्हें अदालतें अब सजा भी दे रही हैं। यह तो होना ही था।

 नब्बे के दशक में एक दिन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने मीडिया से कहा कि ‘राबड़ी जी रुसल बाड़ी। बैगन के भर्ता मांगला पर टमाटर के चटनी दे देत बाड़ी। ऊ अपना भाई के एम.एल.सी. बनावे के कहत बाड़ी।’

आखिर एक दिन साधु यादव एम.एल.सी. बना दिये गये। उनके दूसरे साले सुभाष यादव को भी बनाया गया। दोनों संसद के भी सदस्य बने। जब सब कुछ ठीक ठाक था तो राबड़ी या लालू अपने सालों की कोई शिकायत सुनने का तैयार नहीं थे।

पर टिकट के सवाल पर जब सालोें ने जीजा से विद्रोह कर दिया तब खुद राबड़ी देवी ने मार्च, 2009 में सार्वजनिक रुप से यह स्वीकार किया कि ‘हमारी पार्टी को मेरे भाइयों से सिर्फ बदनामी ही मिली। हमारे भाई नमकहराम निकले।’

  इसी तरह लालू प्रसाद व उनके दल को  जब- जब चुनावी झटके लगते थे, वे सार्वजनिक रुप से लालू अपनी गलतियों को दोहराते थे। कहते थे कि अब आगे से ऐसी गलती नहीं होगी। पर कोई चुनावी विजय मिलने पर दोबारा वही गलती दोहराने लगते थे।

  चारा घोटाले के केस में अंततः लालू प्रसाद को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलती है या नहीं, इस सवाल का जवाब तो भविष्य के गर्भ में है। उन्हें सजा होने पर उन्हें सहानुभूति मत मिलेंगे और एक बार फिर राजद बिहार की सत्ता में आएगा,इस  बात जवाब भी भविष्य ही देगा। पर, कुल मिलाकर आज यह बात जरुर कही जा सकती है कि जिन पिछड़ों और दबे कुचले लोगों ने लालू प्रसाद पर उम्मीद लगाई थी, उस उम्मीद को पूरा करने में वे विफल रहे।

दरअसल वे महान होने के लायक ही नहीं थे जैसी महानता उन पर थोप दी गई थी। इतिहास इसी रुप में उनको याद करेगा।  

 (इस लेख का संपादित अंश हिंदी साप्ताहिक पत्रिका द पब्लिक एजेंडा के 31 अक्तूबर 13 के अंक में प्रकाशित।)
         

Monday, November 4, 2013

मोदी के भाषण-लेखक की योग्यता पर सवाल !



बिहार में भी नरेंद्र मोदी ने अपने दल के लिए हवा जरुर बना दी है, पर, राहुल गांधी को लगातार राजनीतिक मात देते लग रहे मोदी अपने पटना भाषण के तथ्योें को लेकर नीतीश कुमार से मात खा गये।

  जाहिर है कि बिहार में उनका मुकाबला किसी पप्पू से नहीं है। 27 अक्तूबर की पटना की हंुकार रैली में नरेंद्र मोदी का भाषण जोरदार रहा। उन्होंने अपने मुग्ध श्रोताओं को उन्होंने खूब रिझाया। पर, जब 29 अक्तूबर को नीतीश कुमार ने जदयू के राजगीर शिविर में नरेंद्र मोदी के आरोपों का सिलसिलेवार जवाब दिया तो अनेक लोगों को यह लगा कि नरेंद्र मोदी को अपना भाषण लेखक बदल लेना चाहिए।

नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के भाषणों के राजनीतिक पक्षों को नजरअंदाज भी कर दें तो तथ्यों की दृष्टि से नरेंद्र मोदी एक साथ पप्पू और फेंकू दोनों लगे।

एक ऐसा नेता जिसे आज बड़ी संख्या में श्रोता मिल रहे हैं, और जो प्रधानमंत्री पद का गंभीर उम्मीदवार है, उसे अपने भाषणों के तथ्यों की पहले सावधानीपूर्वक जांच कर लेनी चाहिए। क्योंकि नरेंद्र मोदी को नीतीश कुमार ही नहीं बल्कि पूरा देश आज सुन रहा है।

  अब मोदी और नीतीश के ताजा भाषणों पर एक नजर डाल ली जाए। नीतीश कुमार ने राजगीर में कहा कि ‘मैं टी.वी. देख रहा था। चंद्रगुप्त को गुप्त वंश का कहा गया जबकि चंद्रगुप्त मौर्य वंश के संस्थापक थे। तक्षशिला को भी बिहार में ही बता दिया गया जबकि वह पाकिस्तान में है।

सिकंदर को गंगा किनारे पहुंचा दिया गया जबकि सिकंदर तो सतलज के पास से ही भाग गया था।’
   अब पढि़ए कि नरेंद्र मोदी ने अपने पटना भाषण में क्या कहा था। मोदी ने बिहार की गौरव गाथा सुनाते हुए कहा कि ‘अगर रामायण काल को याद करें तो माता सीता की याद आती है। महाभारत काल की याद करें तो कर्ण की याद आती है। गुप्तकाल में चंद्रगुप्त की राजनीति प्रेरणा देती है। नालंदा की बात करें तो विक्रमशिला और तक्षशिला की याद आती है।’

   तथ्यों की भूल के अलावा नरेंद्र मोदी ने पटना के अपने जोशीले भाषण में एक सांस्कृतिक गलती भी कर दी। उन्होंने न सिर्फ भगवान कृष्ण को एक जाति विशेष के साथ जोड़ दिया बल्कि उन्होंने चुनावी राजनीति में जातीय पुट भी दे दिया।

   इस संबंध में उन्होंने दिलचस्प मोदी -लालू संवाद का विवरण भी जनसभा में पेश किया। नरेंद्र मोदी ने कहा कि लालू प्रसाद मुझे गाली देने का कोई मौका नहीं छोड़ते। कहते थे कि मोदी को पी.एम. बनने नहीं दूंगा। लालू जी का एक्सीडेंट हो गया। मैंने लालू जी को फोन किया। उनका हालचाल पूछा। मैंने मीडिया को नहीं बताया। मैंने सोचा पर्सनल बात है, इसको मीडिया को क्यों बताया जाये। पर लालू जी ने मीडिया को बुलाया। मीडिया से उन्होंने कहा कि मैं जिसे गाली देता हूं, देखो वो मुझे फोन करता है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मोदी ने कहा कि ‘लालू जी,यदुवंश के राजा द्वारिका में ही बसे थे। आपको कुछ हो जाए तो हमारी चिंता स्वाभाविक है। मैं द्वारिका से आशीर्वाद लेकर आया हूं। अब आपके यदुवंशी समाज की चिंता का जिम्मा मैं लेता हूं। कृष्ण के काम को अब हम सब मिलकर करेंगे।’

  मोदी की इस जातिवादी टिप्पणी पर नीतीश कुमार ने मंंगलवार को कहा कि ‘रैली में खुलेआम जाति का नाम लिया गया। कृष्ण तो सबके भगवान हैं। लेकिन उन्हें भी जाति में बांध दिया गया।’

  मोदी और नीतीश की बातों से एक और बात निकलती है। दरअसल कृष्ण को यादवों के साथ जोड़ देने के बाद क्षत्रिय भगवान श्रीराम और ब्राह्मण भगवान परशुराम पर दावा कर सकते हैं। कुछ अन्य जातियां किन्हीं अन्य भगवान पर अपना दावा ठोक सकती हैं। यदि इस बात को कोई और आगे बढ़ाया जाएगा तो एक दिन कोई सनकी यह भी कह सकता है कि चूंकि हम ऊंची जाति के हैं, इसलिए मेरा भगवान तेरे भगवान से ऊंचा है। इस मुददे पर आपसी संघर्ष भी हो सकता है।फिर भाजपा की हिन्दू एकता का क्या होगा ? हाल ही में  भाजपा नेता  डा.सुब्रहमण्यम स्वामी ने कहा है कि हम चाहते हैं कि हिन्दुओं मेंें एकता कायम हो और मुस्लिम समुदाय में अनेकता हो। ऐसे में डा. स्वामी नरेंद्र मोदी को अब कैसी सलाह देंगे ?

   यदि नरेंद्र मोदी द्वारा विवादास्पद बातंें नहीं बोली जातीं तोभी पटना में भाजपा की हुंकार रैली सकारात्मक संदेश दे जाती।

  नरेंद्र मोदी ने सांप्रदायिक सद्भाव और एकता की ठोस बात पटना रैली में कही।उन्होंने गरीब हिन्दुओं से सवाल किया कि क्या आप गरीबी से लड़ना चाहते हो या  मुसलमानों से ? उसी तरह उन्होंने गरीब मुसलमानों ये यह सवाल किया कि आप गरीबी से लड़ना चाहते हो या हिन्दुओं से ?

  इतना ही नहीं, सभा स्थल पर यहां तक कि मंच के आसपास हो रहे बम विस्फोटों के बीच भी हुंकार रैली में मंच से कोई उत्तेजक बातें नहीं कही गई। बल्कि बम विस्फोटों से भीड़ का ध्यान हटाने की ही सफल चेष्टा की गई। नरेंद्र मोदी सहित सभी भाजपा मंचासीन नेताओं ने अत्यंत उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में भी अभूतपूर्व संयम बरता। इसका भी भाजपा के पक्ष में सकरात्मक संदेश गया।मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने भी भाजपा नेताओं के इस संयम की सार्वजनिक रुप से सराहना की। पर यही संयम नरेंद्र मोदी के भाषण में भी देखी जाती तो वह प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार के व्यक्तित्व के अनुकूल होती।



राजा जी के अनुसार पटेल पी.एम.होते तो अच्छा होता


सरदार पटेल के जन्म दिन पर विशेष ( 31 अक्तूबर ) 


  राज गोपालाचारी ने सरदार पटेल के निधन के दो दशक बाद यह लिखा था कि यदि आजादी के बाद सरदार पटेल इस देश के प्रधानमंत्री और जवाहर लाल नेहरु विदेश मंत्री बने होते तो देश के लिए बेहतर होता।

 आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल राज गोपालाचारी उर्फ राजाजी ने इस बात के बावजूद यह बात लिखी कि जवाहर लाल नेहरु उन्हें यानी राजाजी को देश के प्रथम राष्ट्रपति बनवाना चाहते थे। पर सरदार पटेल राजेंद्र बाबू के पक्ष में थे ,इसलिए राजाजी नहीं बन सके।

  खुद की बनिस्पत देश के हित के बारे में अधिक सोचने वाले राजा जी का यह विचार आज के नेताओं के लिए सीख है। राजाजी चाहते थे कि उनके राजनीतिक विरोधी भी यदि योग्य हैं तो प्रधानमंत्री वही बनते तो देश के लिए अच्छा होता।

 उधर किस तरह राजा जी के मामले में जवाहर लाल नेहरु और सरदार पटेल के बीच कड़ी रस्साकसी चली थी, वह विवरण जानना दिलचस्प होगा।

       ‘यूं तो मैं जानता हूं कि राज गोपालाचारी का नाम उनके सन् 1942 के आंदोलन का विरोध करने के कारण, कांग्रेस वालों को बहुत अच्छा नहीं लगेगा, पर यदि विदेशी खिड़की से झांका जाए तो राजाजी का व्यक्तित्व बहुत ऊंचा है। उन्होंने गवर्नर जनरल के रूप में बहुत कुछ नाम कमाया है।’ 

कांग्रेस विधान पार्टी की बैठक में 1949 में जवाहर लाल नेहरू ने राजगोपालाचारी को देश का प्रथम राष्ट्रपति बनाने के लिए उपर्युक्त शब्दों में अपनी बात रखी थी। बैठक आरंभ होते ही जवाहर लाल जी ने कहा कि ‘राजेंद्र बाबू ने अपना नाम वापस ले लिया है और यह बड़े गौरव की बात इतिहास में जाएगी कि हमने प्रथम राष्ट्रपति को निर्विरोध चुन लिया।’ यह विवरण महावीर त्यागी की चर्चित पुस्तक ‘आजादी का आंदोलनःहंसते हुए आंसू’ में दर्ज है। त्यागी केंद्र में मंत्री भी रहे थे।

  महावीर त्यागी ने बैठक के बारे मंे लिखा कि जब जवाहर लाल जी ने राजा जी के नाम का प्रस्ताव किया तो हमारी टोली के सदस्यों ने खड़े होकर जवाहर लाल जी के इस प्रस्ताव का विरोध कर दिया। पहले जस्पत राय कपूर बोले। फिर राम नाथ गोयनका ने बड़े गुस्से से चिल्ला कर कहा कि हमें यह बताइए कि हम राष्ट्रपति कांग्रेस वालों के लिए चुन रहे हैं या उनके विरोधियों के लिए? जब आप अपने मुंह से मान रहे हो कि राजाजी का नाम कांग्रेस वालों को पसंद नहीं आयेगा तो हम क्या कांग्रेसी नहीं हैं ? मैंने भी विरोध करते हुए कहा कि जवाहर लाल जी आपको यह क्या आदत पड़ गई है कि आप हमेशा विदेशी खिड़कियों में से झांकते हैं। फतेहपुर सिकरी के बुलंद दरवाजे में से देखो तो आप जानोगे कि राजेंद्र बाबू का व्यक्तित्व आसमान के बराबर ऊंचा है। इसी तरह सबने विरोध किया। 

बालकृष्ण शर्मा नवीन ने कहा कि मैं प्रस्ताव करता हूं कि यह प्रश्न जवाहर भाई के ऊपर छोड़ दिया जाए। इस पर एक सदस्य ने यह संशोधन पेश किया कि जवाहर लाल जी और सरदार पटेल दोनों मिलकर निर्णय लें। बस सबने ताली बजा दी।

  महावीर त्यागी के अनुसार ,अगले दिन सरदार पटेल ने बताया कि हम लोगों के जाते ही जवाहर लाल और वे एक कमरे में सलाह करने के लिए जा बैठे। जवाहर लाल जी ने कहा कि मेरी राय में तो यह अच्छा ही हुआ कि पार्टी ने यह सवाल हमारे ऊपर छोड़ दिया। राजेंद्र बाबू तो उम्मीदवार हैं नहीं। इसलिए हमें अपना निर्णय राज गोपालाचारी के पक्ष में दे देना चाहिए।

इसपर सरदार ने कहा कि प्रस्ताव के शब्दों के अनुसार हमें पार्टी की आवाज के अनुसार फैसला देना है। अपनी आवाज के अनुसार नहीं। पार्टी के अधिकतर लोग राजेंद्र बाबू को चाहते हैं। हमें अपनी राय नहीं बतानी, वह तो सबको पता है। हमको पंच फैसला देना है। क्या आपकी राय में बहुमत राजाजी को स्वीकार करेगा? इसको सुनकर जवाहर लालजी ने धीरे से कहा तो आप फैसला सुना दो कि हम दोनों की राय में राजेंद्र बाबू को ही राष्ट्रपति चुना जाना चाहिए। इस तरह राजेंद्र बाबू चुन लिये गये।

पर इससे पहले एक दिलचस्प किंतु प्रेरणादायक प्रकरण भी हुआ। इससे जवाहर लाल जी के तब के लोकतांत्रिक मिजाज और राजेंद्र बाबू सत्ता के प्रति निर्मोही रुख का पता चलता है।

  याद रहे कि कांग्रेस विधान पार्टी की बैठक में जवाहर लाल जी ने यहां तक कह दिया था कि यदि आप लोग राजा जी को राष्ट्रपति नहीं बनाएंगे तो आपको अपनी पार्टी का नया नेता भी चुनना होगा। जवाहर लाल जी पार्र्टी के नेता थे और प्रधानमंत्री भी।

पर अधिकतर सदस्य जब इस धमकी में भी नहीं आए तो जवाहर लाल जी राजेंद्र बाबू के यहां चले गये। उन्होंने राजेंद्र बाबू से पूछा कि क्या आप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं ? उन्होंने कहा कि मैं किसी पद का उम्मीदवार नहीं हूं। इस पर जवाहर लाल जी ने कहा कि राजेंद्र बाबू आपसे मेरी अपील है कि आप राजा जी को निर्विरोध चुना जाने दो। राजेंद्र बाबू के अनुसार ‘इस पर मैं लाजवाब हो गया और उनके कहे अनुसार यह लिख कर दे दिया कि राज गोपालाचारी के राष्ट्रपति चुने जाने पर मुझे कोई एतराज नहीं है और मैं इसका उम्मीदवार नहीं हूं।’

इसपर बाद में जब सरदार पटेल और राजेंद्र बाबू के समर्थकों ने राजेंद्र बाबू के सामने गुस्सा जाहिर किया तो राजेंद्र बाबू दोनों हाथों से सिर थाम कर बैठ गये और कहा कि गांधीवादी होते हुए मेरे लिए यह कैसे संभव था कि मैं बच्चों की तरह  पद के लिए जिद करता ?

   तब राजेंद्र बाबू के समर्थकों ने कहा कि एक बात हो सकती है। आप जवाहर लाल जी को एक पत्र लिख दें। आप लिखें कि मैं अपनी बात पर कायम हूं। पर पार्टी के साथियों से बिना परामर्श किये मैंने अपना नाम वापस लिया है। इसलिए मेरी प्रार्थना है कि आप पार्टी के प्रमुख सदस्यों को बुलाकर समझा दें कि वे मेरे वापस हो जाने पर चुनाव निर्विरोध हो जाने दें। उन्होंने तुरंत चिट्ठी लिख दी।

(जनसत्ता ः 31 अक्तूबर 2013)