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सोमवार, 11 नवंबर 2013

हरि अनंत लालू कथा अनंता


लालू कथा कहां से शुरू की जाये ? उस समय से जब वे पटना भेटनरी काॅलेज में 15 रुपये रोज पर दैनिक मजदूरी करते थे ? या, उस समय से जब वे मुख्यमंत्री बने थे ?

  वहां से जब 1969 में लालू प्रसाद बिहार प्रदेश युवजन सभा के संयुक्त सचिव चुने गये थे या वहां से जब वे पटना विश्व विद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गये थे ?

   जहां से भी शुरू की जाए, पर एक बात तय है कि लालू प्रसाद की कहानी दिलचस्प और नाटकीय रही है। अब भी है। कहानी में सस्पेंस है, हाॅरर है। उतार और चढ़ाव है। हास्य रस है तो रौद्र रस भी है। सहानुभूति है तो जुगुप्सा भी। बहादुरी है तो कायरता भी। उनमें रोबदाब की तो कभी कोई कमी नहीं रही। हास्य रस तो इतना है कि इस देश की राजनीति में शायद उसका कोई जोड़ा हो। एक राजद सांसद के अनुसार ‘अभी हमारा शेर खंदक में गिर गया है। पर शेर तो शेर ही होता है।’

   पूरे राजनीतिक जीवन में उन पर आरोप तो थोक भाव से लगे, पर लालू पर  संयम, शालीनता, शुचिता और अनुशासन के आरोप कभी नहीं लगे। आर्थिक संयम से दूर और किसी राजनीतिक सिद्धांत के सम्यक ज्ञान से वंचित लालू प्रसाद को मदांध सत्ताधारी होने का जो नुकसान हो सकता था, वही सब हुआ है। नुकसान उन कमजोर वर्ग के लोगों को भी हुआ जिन्हें लालू ने कभी सम्मान के साथ जीना व सीना तान कर चलना सिखाया था। यह और बात है कि तने सीने के नीचे जो एक पेट होता है, उसमें डालने के लिए लालू ने अन्न के दाने का प्रबंध नहीं किया। जिनके लिए उन्होंने सत्ता -सुख व आलीशान जीवन का प्रबंध किया भी तो, उनकी जमात सीमित रही। आम तौर से वह जमात आज भी उनके साथ है।

   आजादी के बाद राजनीति और सत्ता से नाजायज पैसे निकालकर इस देश के अधिकतर नेताओं ने अपनी संपत्ति बनाई और अपने लगुए-भगुए को अमीर बनवाया। पर, इस तरह संपत्ति बनाने वालों में से अधिकतर लोगों ने सावधानी बरती। पर इस काम में लालू प्रसाद व उनके अनेक करीबियों ने किसी तरह की सावधानी नहीं बरती। इसीलिए लालू को यह दिन देखना पड़ रहा है।  

  अपने भाषणों में लोहा सिंह के चर्चित भोजपुरी नाटक के मशहूर व दिलचस्प संवादों के सफल दोहराव के कारण लालू प्रसाद पटना विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच लोकप्रिय हुए थे। छात्राओं के बीच उनकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यह था कि कालेज बस में छात्राओं को छेड़ने वाले छात्रों की लालू अच्छी तरह खबर  लेते थे। पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने जाने के बाद वे मशहूर बने। बाद में तो एक से एक ऊंचाइयां चढ़ते चले गये।

   कुल मिलाकर वे अच्छे कामों की अपेक्षा विवादास्पद कामों के लिए ही अधिक चर्चा में रहे। अंततः लालू प्रसाद सजा से इसलिए नहीं बच सके क्योंकि उन्होंने कभी ईमानदारी को अपनी राजनीति का आधार बनाया ही नहीं। वे मानते थे कि आजादी के बाद के अधिकतर सवर्ण नेताओं ने भी यही काम किया। यानी इधर का माल उधर और उधर का माल इधर किया, और वे बचते चले गये। इसलिए हमारे लोग भी यह सब कर रहे हैं तो इसमें किसी को एतराज क्यों होना चाहिए ?

क्या इसलिए एतराज होना चाहिए क्योंकि हम पिछड़े समुदाय से आते हैं ?

  चुनावी धांधली के बारे में भी लालू प्रसाद की यही राय रही है। इसीलिए उन्होंने अपने आसपास बाहुबलियों का जमावड़ा भी जुटाए रखा। जहां बाहुबली व माफिया होंगे, वे कोई सत्संग तो करेंगे नहीं। उनके शासन काल में लालू -संरक्षित कई बाहुबलियों ने राज्य में अपना इलाका बांट लिया था। वहां के एस.पी. और डी.एम. उन माफियाओं की जेब में होते थे। इस तरह शासन ध्वस्त होता गया। पटना हाईकोर्ट ने एक बार यहां तक कह दिया था कि जंगलराज का भी कुछ कायदा होता है, पर यहां तो वह भी नहीं।

   दरअसल लालू प्रसाद को लगता था कि परंपरागत सत्ता संरक्षित सवर्ण बाहुबलियों व माफियाओं के कारगर मुकाबले के लिए यह जरूरी है अन्यथा वे गरीबों-पिछड़ों का वास्तविक राज होने ही नहीं देंगे। उनको इस बात की शिकायत थी कि राज्य के कई चुनाव क्षेत्रों में कांग्रेसी उम्मीदवार पुलिस की मदद से बाहुबलियों से बूथ कंट्रोल कराकर ही चुनाव जीतते हैं जबकि सामाजिक न्याय वाले मतदाताओं की संख्या अधिक है। एक बार इन पंक्तियों के लेखक ने उनके अपने कुछ खास बाहुबलियों के बारे में उनसे चर्चा की थी। उस पर सत्ता मद में चूर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भोजपुरी में कहा  था -‘के बाहुबली बा हो ? तोहरा लोग के माथा खराब हो गएल बा ! अरे भई, वे लोग स्वाभिमानी युवक हैं। केकरा पर केस ना होखेला ?’

दूसरी ओर उन बाहुबलियों ने पटना सहित बिहार के अधिकांश हिस्से में छोटे-बड़े व्यापारियों, पैसे वालों और कई बार राह चलते लोगों का भी जीना मुहाल कर दिया था। व्यापारी बिहार छोड़ कर भाग रहे थे।

  जब पूर्णिया इलाके में पप्पू यादव का आतंक था, उस समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने 1994 में एक बड़े पत्रकार से कहा था कि ‘एक बार पप्पू यादव से जरूर मिलिए। वह बहुत शालीन लड़का है।’ बाद में जब पप्पू से उनका मतभेद हुआ तो खुद लालू ने कहा कि पप्पू यादव क्रिमिनल है। दूसरी ओर राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने 24 जून 1997 को यह आरोप लगाया था कि लालू के साथ अब ठेकदार व गुंडे की टीम ही बची है।’

   उन्हीं दिनों एक अन्य पत्रकार अनिल शुक्ल के साथ भेंट वार्ता में लालू ने कहा था कि ‘जनता ने जिसको वोट दिया, वह कहां का अपराधी ?’

   रांची की निचली अदालत और बाद में हाईकोर्ट के फैसलों के बाद अब भी राजद यह कह रहा है कि लालू जी को साजिश के जरिए फंसा दिया गया। हम जनता की अदालत में जाएंगे। अदालती फैसले के बाद भी ऐसी टिप्पणी ? क्या यह उन अदालतों की अवमानना नहीं है जिसने लालू को सजा दी है ? पर इसकी परवाह किसे है ?

 यानी राजद को न्यायिक फैसले की अपेक्षा चुनावी फैसले पर अब भी अधिक यकीन है। यानी उस दल की की चिंतन धारा में निरंतरता जारी है।

  पशुपालन घोटाले में जब लालू प्रसाद का नाम पहली बार आया तो एक पत्रकार ने उनसे पूछा था कि क्या आप मोरल ग्राउंड पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे ?

इसका जो कुछ जवाब उन्होंने दिया, उससे एक बार फिर यह साबित हो गया कि नैतिकता जैसे  मामले में उनकी राय क्या है। उन्होंने तब प्रति प्रश्न किया था, ‘यह मोरल ग्राउंड क्या होता है ? ई कौन ग्राउंड है ? इहां तो दो ही ग्राउंड हैं। एक मिलर स्कूल ग्राउंड और दूसरा गांधी मैदान ग्राउंड। मोरल ग्राउंड कुछ नहीं होता। प्रमुख होती है राजनीति।’ उनकी यह उक्ति उसी तरह की थी जब उन्होंने कहा था कि  ‘विकास से वोट नहींं मिलता। सामाजिक समीकरण से वोट मिलता है।’

   इस तरह जब अपराध और भ्रष्टाचार के बारे में लालू प्रसाद की यही राय थी तो उन्हें एक न दिन उसका खामियाजा भुगतना ही था।अब देखना है कि अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट इस केस में क्या रुख अपनाता है। इस बात पर भी उनका राजनीतिक कैरियर निर्भर करेगा।

  कुछ लोग महान यानी चांदी के चम्मच के साथ ही पैदा होते हैंं। कुछ अन्य लोग अपने त्याग, तपस्या और कर्मों के जरिए महान बनते हैं। और कुछ दूसरे लोग ऐसे होते हैं जिन पर महानता थोप दी जाती है। 1990 के बाद के लालू के क्रियाकलापों को देख कर यही लगता है कि लालू प्रसाद पर महानता थोप दी गयी। इस काम में पहले देवी लाल -शरद यादव की भूमिका रही जिन्होंने लालू प्रसाद को कर्पूरी ठाकुर का उत्तराधिकारी बनवा दिया। बाद में आरक्षण विरोधी आतुर सवर्णों की।

हालांकि शरद यादव ने बाद में कहा कि लालू को मुख्यमंत्री बनवाना मेरी भूल थी।

 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर के बीच के राजनीतिक झगड़े का लाभ भी लालू को मिला था। अंत में मंडल आरक्षण के समय आतुर सवर्णों ने लालू को अनजाने में राजनीतिक तौर पर महाबली बना दिया यानी पिछड़ों को लालू के करीब ला दिया।

  1990 में बिहार जनता दल विधायक दलके नेता पद का चुनाव हो रहा था। देवीलाल-शरद यादव के उम्मीदवार लालू प्रसाद थे। वी.पी. सिंह के उम्मीदवार रामसुंदर दास थे। चंद्र शेखर खेमे को लगा कि शायद वी.पी. का उम्मीदवार जीत जाएगा, इसलिए उन्होंने दास का वोट काटने के लिए रघुनाथ झा को खड़ा करा दिया। नतीजतन लालू प्रसाद जीत गये। हालांकि किसे कितने मत मिले, इसकी विधिवत घोषणा तो नहीं की गई। पर पत्रकार श्रीकांत के अनुसार लालू प्रसाद को 58, राम सुंदर दास को 54 और रघुनाथ झा को 14 मत मिले।

  मुख्यमंत्री बनने के थोड़े दिनों बाद तक तो लालू प्रसाद सहमे -सहमे रहे। इसलिए भी क्योंकि उनकी अल्पमत सरकार उसी तरह भाजपा व कम्युनिस्टों के सहारे चल रही थी जिस तरह उन दिनों केंद्र में वी.पी. सिंह की सरकार भाजपा व कम्युनिस्टों की बैसाखी पर जिंदा थी।

  पर इस बीच मंडल और मंदिर विवाद शुरू हो गया। मंडल आरक्षण विरोधियों ने वी.पी.-लालू के खिलाफ बिहार की सड़कों पर आरक्षण के विरोध का नंगा नाच किया। उन लोगों ने शालीनता की सारी हदें तोड़ दीं। आरक्षण विरोधी गाली गलौज व हिंसा पर उतर आये थे।

   इसी तरह का विरोध 1978 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का भी हुआ था जब बिहार सरकार की नौकरियों में पिछड़ों के लिए कर्पूरी सरकार ने आरक्षण कर दिया था। कर्पूरी ठाकुर तो शालीन व्यक्ति थे।उन्होंने सब कुछ बर्दास्त किया।

 पर इसके विपरीत लालू प्रसाद और उनके समर्थकों ने आरक्षण विरोधियों का सड़कों पर उतर कर जोरदार जवाब दिया। खुद लालू प्रसाद ने भी भाषा की सारी मर्यादाएं तोड़ दीं। इससे भीषण जातीय तनाव पैदा हुआ। पिछड़ों को लगा कि जो चीज उन्हें सदियों से नहीं मिली, वे मिल रही हंै तो मुट्ठी भर सुविधासंपन्न सवर्ण लोग हमारा हक मारना चाहते हैं और हमारे बचाव में लालू प्रसाद मजबूती से खड़े हैंं। फिर क्या था, लालू प्रसाद पिछड़ों के एकछत्र नेता बन गये। बिहार में पिछड़ांे की आबादी, कुल आबादी का करीब 52 प्रतिशत है।

 यहां एक बात याद रखने की है। इस पिछड़ा बहुल प्रदेश में आजादी के बाद कांग्रेस ने किसी पिछड़ा नेता को कभी मुख्यमंत्री नहीं बनाया। सन् 1970 में दारोगा प्रसाद राय को बनाया भी तो तब जब खुद कांग्रेस को विधानसभा में अपना पूर्ण बहुमत हासिल नहीं था।

 यहां एक और बात कहने लायक है। कांग्रेस न सिर्फ राजनीति में बल्कि सरकारी नौकरियों व ठेकदारी वगैरह के कामों में भी आजादी के बाद पिछड़ों की उपेक्षा करती रही जबकि पिछड़े भी कांग्रेस को वोट देते रहे। तब सारण जिले में तो राजपूत-यादव राजनीतिक गठबंधन था। इस पृष्ठभूमि में पिछड़ों को लालू के महत्व का पता चला।

    इसी बीच रथ यात्री एल.के. आडवाणी को लालू सरकार ने समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया।इससे अल्पसंख्यकों का लगभग पूरा समर्थन लालू प्रसाद को मिल गया। तब लालू की लोकप्रियता चरम पर थी।
इसी बीच 1991 में लोकसभा चुनाव हुआ। लालू प्रसाद की लोकप्रियता के बल अविभाजित बिहार में जनता दल को 54 में 31 सीटें मिलीं। सन 1990 के विधानसभा चुनाव में जनता दल को जहां 24.65 प्रतिशत मत मिले थे, वही 1991 के लोकसभा चुनाव में उसे 34.19 प्रतिशत मत मिले।

  पर, अब स्थिति यह है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद के दल को बिहार में सिर्फ 19.30 प्रतिशत मत मिले। लालू अपनी राजनीतिक पूंजी संभाल नहीं सके। ऐसा उनकी गलत रणनीतियों व लालच के कारण हुआ। लोकसभा की सिर्फ चार सीटों पर ही 2004 में राजद को जीत हासिल हो सकी। बिहार विधानसभा में राजद के अब 22 विधायक हैं। सन 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू की भारी जीत के पीछे रामविलास पासवान का मुख्य योगदान था।

   लालू का राजनीतिक ग्राफ क्यों गिरा ? इसमें चारा घोटाला का हाथ तो था ही, यह बात भी थी कि लालू प्रसाद को जिन गरीब- गुरबा ने राजनीतिक तौर पर महाबली बनाया था, उनकी आर्थिक लाचारी को कम करने की लालू ने कोशिश नहीं की। की भी तो अपने परिजन व परिवार के बाहर की एक छोटी जमात की।

   दरअसल महाबली बनने के बाद उन्होंने शुरुआत ही गलत कर दी थी। 1991 की जीत के बाद वे पहले  सिर्फ यादव-मुसलमान-दलित वोट बैंक पर खुद का ध्यान सीमित कर लिया। उसके बाद वे सिर्फ एम-वाई यानी यादव-मुस्लिम तक सिमट गये।

  उनके एक सहकर्मी के अनुसार 1991 के चुनाव रिजल्ट के बाद लालू प्रसाद ने एक रणनीति बनाई। उन्होंने तय किया कि सरकार के जरिए राज्य का आम विकास नहीं करना है। अन्यथा इसका अधिकांश लाभ सवर्णों को ही मिल जाएगा जो उनके राजनीतिक तौर पर विरोधी हैं। पिछड़ों नहीं मिलेगा।

  अब यादवों को आर्थिक, राजनीतिक और बाहुबल से संपन्न बना देना है। मुसलमानों के लिए, उनकी प्राण रक्षा के सिवा, विकास का कोई काम करने की जरुरत नहीं। दलितों के लिए इंदिरा आवास योजना के तहत केंद्र के मिले पैसों से पक्का मकान बनवा देना है। किसी भी ग्रामीण के जीवन में पक्का मकान का बड़ा महत्व है। इन तीनों समुदायों यानी यादव-मुस्लिम- दलित की मिली जुली आबादी 42 प्रतिशत है। इतने वोट हमें मिल जाएंगे। बाकी वोट कई भागों में बंट जाएंगे। इस तरह हम बीस साल तक राजा की तरह राज करेंगे। पर इंदिरा आवास योजना भ्रष्टाचार में फंस गया।

   यानी 2000 के विधानसभा चुनाव के साथ ही लालू के राजनीतिक अश्वमेध यज्ञ में व्यवधान पड़ना शुरु हो गया। उससे पहले चारा घोटाले में 1997 में पहली बार विचाराधीन कैदी के रुप में लालू जेल जा चुके थे। बदनामी की चर्चा तेज हो गई थी।

  सन 2000 में बिहार विधानसभा चुनाव में राजद को बहुमत नहीं मिला। उसे कांग्रेस की मदद से सरकार बनानी पड़ी। कांग्रेस की शर्त बिहार के बंटवारे की थी। लालू प्रसाद इसके लिए भी तैयार हो गये जबकि कुछ ही समय पहले लालू ने सार्वजनिक रुप से यह घोषणा की थी कि झारखंड मेरी लाश पर बनेगा। पर सत्ता की चाह जो न कराए !

   उधर लालू -राबड़ी राज मेंं अपहरण, गुंडागर्दी, नरसंहार, यानी कुल मिलाकर जंगलराज चल रहा था। उन दिनों बिहार पूरी दुनिया में उपहास का विषय बना हुआ था।

  उस शासन के कम से कम दो किस्से आज मौजूं होंगे।

लालू मंत्रिमंडल में 72 मंत्री थे। इन पंक्तियों के लेखक ने लालू सरकार के एक मंत्री से पूछा कि एक गरीब राज्य में इतने अधिक मंत्रियों के खर्चे का सरकारी खजाने पर इतना बोझ क्यों ?

मंत्री का जवाब था, ‘अभी तो यहां कुछ और मंत्रियों की जरुरत है।क्योंकि हमारे यहां ब्लाॅक आफिस काम नहीं करता। अनुमंडल दफ्तर काम नहीं करता। जिला और कमीश्नरी आॅफिस काम नहीं करते। इसलिए जनता के काम तो मंत्रियों को ही  करना है।

    उसी मंत्री से एक और सवाल पूछा गया। बिक्री कर के मद में आपकी सरकार मात्र 1800 करोड़ रुपये सालाना वसूल पाती है जबकि आंध्र प्रदेश में इस मद में करीब छह हजार करोड़ रुपये से भी अधिक मिलते हैं। आंतरिक संसाधनों की कमी को आधार बनाकर योजना आयोग बिहार की विकास योजना का आकार छोटा कर देता है। नतीजतन विकास के काम रुके हुए हैं। इससे नक्सली समस्या बढ़ रही है। यहां तक कि सरकारी  कर्मचारियों के वेतन के लाले पड़े रहते हैं। आप लोग ईमानदारी से टैक्स क्यों नहीं वसूलते ?

   इस पर मंत्री का  अजीब जवाब था-टैक्स के जो पैसे  लोगों के पास सरकार छोड़ देती है, वही पैसे इस राज्य की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ हैं।

  ऐसे तर्कों -कुतर्काे के आधार पर लालू-राबड़ी की सरकार चल रही थी।

विकास की भले कमी हो, पर सरकारी घोटालों की कोई कमी नहीं थी। चारा घोटाला के अतिरिक्त उस शासन काल के कुछ अन्य बड़े घोटालों के नाम एक बार फिर याद कर लेना भी मौजंू होगा--अलकतरा घोटाला, दवा घोटाला, भूमि घोटाला, वन घोटाला, आॅडिट घोटाला, अतिरिक्त निकासी घोटाला, असमायोजित राशि घोटाला, मंत्रिपरिषद खर्च घोटाला, व्याख्याता नियुक्ति घोटाला और न जाने कितने अन्य छोटे -बड़े घोटाले !

  इन घोटालों में से कुछ की भी जांच तभी हो सकी जब अदालत ने ऐसा आदेश दिया। अन्यथा उसकी लीपापोती की ही कोशिश होती रही। चारा घोटाले में भी यही हुआ था। घोटाले का आरोप सामने आ जाने के बाद लालू सरकार ने चारा घोटाले की जांच के लिए राज्य सरकार के बड़े अफसरों की जो समिति बनाई थी, उस समिति के तीनों अफसर खुद चारा घोटालेबाज थे। वे जांच के बदले लीपापोती कर रहे थे। सी.बी.आइ. ने उन्हें भी बाद में जेल भेजा। उन्हें अदालतें अब सजा भी दे रही हैं। यह तो होना ही था।

 नब्बे के दशक में एक दिन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने मीडिया से कहा कि ‘राबड़ी जी रुसल बाड़ी। बैगन के भर्ता मांगला पर टमाटर के चटनी दे देत बाड़ी। ऊ अपना भाई के एम.एल.सी. बनावे के कहत बाड़ी।’

आखिर एक दिन साधु यादव एम.एल.सी. बना दिये गये। उनके दूसरे साले सुभाष यादव को भी बनाया गया। दोनों संसद के भी सदस्य बने। जब सब कुछ ठीक ठाक था तो राबड़ी या लालू अपने सालों की कोई शिकायत सुनने का तैयार नहीं थे।

पर टिकट के सवाल पर जब सालोें ने जीजा से विद्रोह कर दिया तब खुद राबड़ी देवी ने मार्च, 2009 में सार्वजनिक रुप से यह स्वीकार किया कि ‘हमारी पार्टी को मेरे भाइयों से सिर्फ बदनामी ही मिली। हमारे भाई नमकहराम निकले।’

  इसी तरह लालू प्रसाद व उनके दल को  जब- जब चुनावी झटके लगते थे, वे सार्वजनिक रुप से लालू अपनी गलतियों को दोहराते थे। कहते थे कि अब आगे से ऐसी गलती नहीं होगी। पर कोई चुनावी विजय मिलने पर दोबारा वही गलती दोहराने लगते थे।

  चारा घोटाले के केस में अंततः लालू प्रसाद को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलती है या नहीं, इस सवाल का जवाब तो भविष्य के गर्भ में है। उन्हें सजा होने पर उन्हें सहानुभूति मत मिलेंगे और एक बार फिर राजद बिहार की सत्ता में आएगा,इस  बात जवाब भी भविष्य ही देगा। पर, कुल मिलाकर आज यह बात जरुर कही जा सकती है कि जिन पिछड़ों और दबे कुचले लोगों ने लालू प्रसाद पर उम्मीद लगाई थी, उस उम्मीद को पूरा करने में वे विफल रहे।

दरअसल वे महान होने के लायक ही नहीं थे जैसी महानता उन पर थोप दी गई थी। इतिहास इसी रुप में उनको याद करेगा।  

 (इस लेख का संपादित अंश हिंदी साप्ताहिक पत्रिका द पब्लिक एजेंडा के 31 अक्तूबर 13 के अंक में प्रकाशित।)
         

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

अवांछित तत्वों से कांग्रेस को बचाने की समस्या

बिहार कांग्रेस के निर्वाची पदाधिकारी और सांसद डा. गिरीश संघी ने कहा है कि आपराधिक तत्वों को संगठन में स्थान नहीं मिलेगा।

डा. संघी ने ठीक ही कहा है। इससे पहले एक पूर्व सांसद ने सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगाया था कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी गुंडों की जमात है। दूसरी ओर, बिहार की राजनीति के कुछ खास बाहुबली तत्वों की ओर से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा की जान पर खतरे की खबर भी आती रही है। कहा जाता है कि खतरा दल के भीतर से ही है। हाल में आरा और छपरा में कांग्रेस की सभाओं में हुई हिंसक घटनाओं से भी यह लगा कि प्रदेश कांग्रेस पर आपराधिक मनोवृति वाले तत्व हावी होते जा रहे हैं। इस पष्ठभूमि में डा. संघी का यह आश्वासन उम्मीद जगाता है कि कांग्रेस में आपराधिक पष्ठभूमि वालों के लिए कोई जगह नहीं है।

दरअसल जब किसी दल पर आपराधिक तत्व हावी हो जातेे हैं तो देर-सवेर उस दल के सरकार में आने के बाद उस सरकार पर भी आपराधिक तत्वों का कब्जा हो जाता है। फिर तो आम शांतिप्रिय जनता का कष्ट बढ़ जाता है। अभी तो आपराधिक तत्वों से बिहार कांग्रेस के सभा स्थल ही पीड़ित हो रहे हैं। यदि खुदा न खास्ता कांग्रेस बिहार में सरकार में आ जाए तब तो उन आपराधिक तत्वों से आम जनता भी जहां-तहां रोज-ब-रोज पीड़ित होने लगेगी।

बिहार की निरीह जनता को सरकारी संरक्षण प्राप्त अपराधियों को झेलने का लंबा अनुभव रहा है। अब तो वैसी स्थिति नहीं है, पर वह पिछला कटु अनुभव एक दुःस्वप्न की तरह अब भी लोगों को कचोटता रहता है। डा. संघी जैसे समझदार नेताओं का यह कर्तव्य बनता है कि वह उस दुःस्वप्न की पुनरावृति नहीं होने दें। याद रहे कि कांग्रेस भी बिहार में अगले विधानसभा चुनाव के बाद अपनी सरकार बनाने का दावा कर रही है। सरकार किसकी बनेगी, यह तो मतदाताओं के हाथों में है। पर सरकार बनाने का दावा करने वाले दलों का यह कर्तव्य है कि वे अभी से ऐसा आचरण दिखाएं जिससे मतदाता साफ-साफ यह देख सकें कि कौन दल अपराधियों को गले लगाने वाला दल है और कौन दल अवांछित तत्वों को ‘गर्दनिया पासपोर्ट’ देकर अपने यहां से तत्काल भगा देने वाला दल है।

कांग्रेस की एक खूबी है कि वह आम तौर पर ऐसे किसी नेता को चुनावी टिकट नहीं देती जिसके खिलाफ किसी अदालत में आरोप पत्र दाखिल हो चुका होता है। यह बात कई अन्य दलों से कांग्रेस को भिन्न दिखाती है। इसका थेाड़ा बहुत लाभ भी कांग्रेस को मिलता रहा है।

पर अब कांग्रेस को बिहार में जब अपना प्रभाव कुछ और जमाना है तो उसे एक काम और करना चाहिए। उसे ऐसे लोगों को भी अगली बार चुनावी टिकट नहीं देना चाहिए जिनके कार्यकलाप ऐसे हैं जो आरोप पत्र के लायक बन सकते हैं। छपरा और आरा में जिन तत्वों ने कांग्रेस की सभाओं में हिंसा की, क्या वे आरोप पत्र के पात्र नहीं हैं ? क्या जरूरी है कि ऐसे उपद्रवी तत्वों व उन्हें संरक्षण देने वाले नेताओं के खिलाफ सचमुच किसी अदालत में आरोप पत्र दाखिल होने की कांग्रेस प्रतीक्षा करे ? यदि कांग्रेस पहले ही यह घोषित कर दे कि ऐसे लोगों को वह अगले विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं देगी तो ऐसे लोग दूसरे दलों का दामन पहले ही पकड़ लेंगे। कांग्रेस को आपराधिक पष्ठभूमि वालों से मुक्ति पाने में इससे सुविधा होगी।

गत लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बिहार कांग्रेस ने कई विवादास्पद छवि वालों को दूसरे दलों से बुलाकर टिकट दे दिया। ऐसे-ऐसे लोगों को भी टिकट मिले जिनका चरित्र कांगे्रस की आम राजनीतिक संस्कति से कतई मेल नहीं खाता। हालांकि ऐसे लोगों को टिकट देने का कोई ठोस चुनावी लाभ कांग्रेस को नहीं मिला। कांग्रेस पर अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप जरूर लगता रहा है, पर कांग्रेस अपराधियों की ही पार्टी है, ऐसा आरोप नहीं लगा। कांग्रेस की संस्कति आम तौर पर एक शालीन संस्कृति रही है। पर गत लोकसभा चुनाव के समय से उस संस्कृति को धक्का लगा है।

कांग्रेस और बिहार के हक में है कि काग्रेस इस आरोप से जल्दी मुक्ति पा ले कि उस सवा सौ साल पुराने दल पर कम से कम बिहार में धीरे-धीरे बाहुबली तत्वों का कब्जा होता जा रहा है। इस पष्ठभूमि में डा. संघी का बयान उम्मीद की एक किरण के रूप में सामने आया है। अंत में एक यह बात भी कह देनी जरूरी है कि कांग्रेस के जो कुछ लोग बाहुबलियों के बल पर बिहार में सत्ता पर कब्जा करने का ख्वाब देख रहे हैं, वे भारी गलतफहमी में हैं। क्योंकि एक तो बाहुबली मार्का दल कांग्रेस की अपेक्षा अधिक ताकत के साथ पहले से ही बिहार में मौजूद हैं। जिस किसी को बाहुबली मार्का दल को वोट देना होगा, वह असली बाहुबली दलों को छोड़ कर किसी कार्बन काॅपी को वोट क्यों देगा ? दूसरी बात यह भी है कि अब बिहार में इस तरह अपेक्षाकृत साफ सुथरे और शांतिपूर्ण ढंग से मतदान हो रहे हैं कि बाहुबलियों की किसी चुनाव में भूमिका अब अत्यंत सीमित हो चुकी है।


( दैनिक जागरण: पटना संस्करण में 6 अप्रैल 2010 को प्रकाशित )


शुक्रवार, 12 मार्च 2010

बिहार को मिला एक नया चुनावी मुद्दा

बिहार में विधान सभा का चुनाव इसी साल होना है। महिला आरक्षण एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन जाए तो यह कोई अजूबी बात नहीं होगी।

महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप के सबसे बड़े विरोधी नेताआंें में से एक नेता लालू प्रसाद इसी प्रदेश से हैं। विधान सभा चुनाव में मतदाता अन्य बातों के साथ -साथ इस बात पर भी अपना मत देंगे कि महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप का किस दल ने विरोध और किसने समर्थन किया।

लालू प्रसाद तथा अन्य विरोधियांे को तो यह लगता है कि चूंकि इस देश में पिछड़ों की आबादी अन्य समुदायों की अपेक्षा काफी अधिक है, इसलिए उन्हें इस आरक्षण के विरोध का चुनावी लाभ जरूर मिलेगा। पर क्या ऐसा हो पाएगा? इसका जवाब तो बिहार का अगला चुनाव नतीजा ही देगा।

हालांकि लालू-मुलायम से अलग राय रखने वाले लोग बताते हैं कि इस विरोध का नुकसान ही लालू प्रसाद को बिहार में होगा क्योंकि उनका विरोध पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं के हितों को ध्यान में रख कर कम बल्कि अपने कुछ खास चुनाव क्षेत्रों को महिलाओं से बचाने की समस्या को ध्यान में रख कर अधिक है।

लालू प्रसाद ने कहा है कि दुनिया के किसी देश में महिलाओं के लिए संसद में आरक्षण नहीं हैं। फिर यहीं क्यों ? उन्होंने यह भी कहा है कि यह पुरुष प्रधान समाज है। इसमें पति जहां वोट देने को कहता है, पत्नी वहीं वोट देती है। इसलिए इस विधेयक के पास हो जाने से कांग्रेस या भाजपा को महिलाओं के वोट नहीं बढ़ जाएंगे।

लालू प्रसाद ने यह कह कर समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति का वर्णन खुद ही कर दिया है। इससे भी शीघ्र महिला आरक्षण की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसे पुरुष प्रधान समाज में यदि आरक्षण देकर महिलाओं का सशक्तीकरण कर दिया जाए तो वे किसी को वोट देने के बारे में खुद निर्णय लेने की स्थिति में हो जाएंगी। लोकतंत्र के लिए यह जरूरी भी है। लोकतंत्र के लिए यह कोई अच्छी बात तो है नहीं कि एक बड़ी आबादी अपने पतियों के कहने पर ही मतदान किया करे !

महिला आरक्षण के मामले को गत 14 साल से लटका कर रखना कहां का लोकतंत्र है जबकि इस विधेयक के पक्षधर दलों व सांसदों की संख्या हमेशा ही विरोधियों की अपेक्षा अधिक रही है ? अब जब मौजूदा लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक के घोषित विरोधियों की संख्या और भी कम हो गई है तो लालू प्रसाद कहते हैं कि इस विधेयक के खिलाफ ‘युद्ध’ होगा। ऐसे ही युद्ध की घोषणा जब अल्पमत सवर्ण लोग सन 1990 में मंडल आरक्षण के खिलाफ कर रहे थे तो खुद लालू प्रसाद की उस पर कैसी प्रतिक्रिया थी ? यह भी याद रखने की जरूरत है कि वी.पी. सिंह की सरकार को जितने सांसद समर्थन कर रहे थे, उन सांसदों का बहुमत मंडल आरक्षण के खिलाफ ही था। फिर भी जरूरत समझ कर वी.पी. सिंह सरकार ने वह काम कर दिया था।

दरअसल लोकतंत्र का तकाजा यह है कि लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव यह कहते कि अभी तो मौजूदा स्वरूप में भले कांग्रेस इस विधेयक को पारित करा ले ,पर जब हमारे मत के लोग बहुमत में आएंगे तो हम आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान कर देंगे।

पर सवाल है कि पिछड़ा बहुल इस देश में लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं के दल संसद में बहुमत क्यों नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं ताकि वे आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान करा पाएं ? दरअसल वे इसलिए बहुमत नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि पिछड़े और अल्पसंख्यकों को भी उनकी कथनी और करनी पर अब कम ही भरोसा हो रहा है। पिछड़े वर्ग के एक नेता जी ने गत लोकसभा चुनाव में अपने दल के एक निवर्तमान अल्पसंख्यक सांसद का टिकट काट कर उनकी जगह अपने एक करीबी रिश्तेदार को टिकट देकर वहां से लोकसभा में पहुंचा दिया। वे नेताजी आज गला फाड़ कर यह ़कह रहे हंै कि मौजूदा महिला आरक्षण विधेयक अल्पसंख्यक विरोधी है।

बिहार विधानसभा के अगले चुनाव में महिला आरक्षण मुद्दा इस रूप में भी चर्चित हो सकता है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण के बहाने इस आरक्षण को अनंतकाल तक टाले रखना उचित है या फिर विधायिकाओं में महिलाओं को बड़ी संख्या में भेज कर उनका जल्द सशक्तीकरण जरूरी है ? यह मानी हुई बात है कि गाड़ी के दोनों पहिए यानी स्त्री-पुरुष समान रूप से मजबूत होंगे तो ही गाड़ी ठीक से चलेगी।

बिहार में पंचायतों व नगर निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान नीतीश सरकार ने किया। इन निकायों के चुनावों का अनुभव यह रहा कि ऐसी कुछ सामान्य सीटों से भी पिछड़ी जातियों की महिलाएं विजयी हुई जो सीटें सामान्य महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। संभवत इसी अनुभव के आधार पर नीतीश कुमार ने यह समझा है कि संसद में पेश महिला आरक्षण विधेयक के लागू हो जाने के बाद भी पिछड़े वर्ग की महिलाओं को कोई नुकसान नहीं होगा। यह जाहिर बात है कि जिस चुनाव क्षेत्र में जिस जाति की बहुलता होती है,उस क्षेत्र में उस जाति के उम्मीदवार की ही जीत की अधिक गुंजाइश रहती ही है चाहे उम्मीदवार महिला हो या पुरुष।

आजादी की लड़ाई के समय भी कुछ नेताओं ने ऐसे सवाल उठाए थे। कुछ दलित, अल्पसंख्यक व कमजोर वर्ग के नेतागण तब यह चाहते थे कि आजादी से पहले ही यह तय हो जाए कि आजाद भारत में उन समुदायों की स्थिति क्या होगी। उनकी बात सुनी जाती तो आज तक अंग्रेज यहीं रहते।

साभार: दैनिक जागरण पटना संस्करण (09 मार्च, 2010)

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

निंदक नियरे राखिए

चीन ने कहा है कि भारत, मिसाइल टैक्नोलाजी के मामले में, चीन से अभी दस साल पीछे है। संभव है कि यह बात चीन ने अपने लोगों का मनोबल बढ़ाने के लिए कही होगी! यह बात भी संभव है कि इसमें शायद सच्चाई भी हो। इस संबंध में अंतिम वाक्य तो कोई वैज्ञानिक ही बोल सकता है। याद रहे कि अग्नि -3 के सफल परीक्षण के बाद यह खबर आई थी कि चीन के सुदूर उत्तरी इलाके भी अब भारत के हमले की जद में हैं।

खैर जो हो, पर निंदक नियरे राखिए........वाली कबीर वाणी कम से कम कुछ मामलों में तो इस देश को माननी चाहिए। इससे पहले चीन ने यह भी कहा था कि ‘भारत में सरकारी भ्रष्टाचार इतना अधिक बढ़ चुका है कि विकास व कल्याण कार्यों के लिए आवंटित पैसों में से अधिकांश, वैसे ही जाया हो जाता है जिस तरह छेद वाले किसी लोटे में से उसका अधिकांश पानी नीचे गिर जाता है। ’याद रहे कि चीन में भ्रष्ट लोगों के लिए फांसी की व्यवस्था है जबकि भारत में जो जितना अधिक भ्रष्ट है, उस व्यक्ति के लिए उतना ही अधिक महत्वपूर्ण पद पर पहुंच जाने की गुंजाइश है।

चीन की इन बातों का मनन करके यदि भारत खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करे तो यह कोई हेठी की बात नहीं होगी। हमारे बाद आजाद हुए चीन ने अनेक मामलों में हमसे बेहतर ढंग से अपने देश को बनाया है तो उसे उपदेश देने का नैतिक अधिकार भी है।

सरकारी भ्रष्टाचार को कम करने के मामले में हमारे देश का यदि खराब रिकार्ड है तो इसके लिए हमारे हुकमरान ही जिम्मेदार रहे हैं। पर यह भ्रष्टाचार रक्षा खरीद मामलों में भी अपना असर दिखा रहा है जो देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक बात है। हाल में यह भी खबर आई थी कि मुम्बई के ताज होटल आदि पर हुए आतंकी हमले के समय हमारे पुलिस अफसरों ने जो बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखे थे, वे घटिया थे क्योंकि उसकी खरीद में घोटाला हुआ था। सोफमा जैसी बेहतर तोप को छोड़कर हमने बोफर्स तोप खरीदी थी, यह बात तो जगजाहिर है। पर इसके अलावा बहुत सी बातें जगजाहिर नहीं होतीं और बड़े बड़े घोटाले पलते रहते हैं। इससे हमारी रक्षा तैयारियां पीड़ित होती है।

भले अब हम सन 1962 की स्थिति में नहीं हैं जब हमारी चीन से शर्मनाक हार हुई थी। पर हमें जो चीन तक पहुंचना चाहिए था, हम वह काम भी नहीं कर पा रहे हैं तो इसके पीछे विभिन्न सरकारी स्तरों पर व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार ही है। इस समस्या के कोढ़ में खाज का काम करती है उस भीषण भ्रष्टाचार के प्रति हमारे यहां की विभिन्न सरकारों व नेताओं की भारी सहिष्णुता।

कई बार यह कहा जा चुका है कि रक्षा मामलों में हमारी बदतर तैयारियों ने इस देश को विदेशी हमलावरों के समक्ष लाचार भी बना दिया था।

मध्य युग में बाबर कीे फौज में तोप थी तो राणा सांगा के सैनिकों के पास महज तलवारें और भालें। युद्ध में बाबर की ओर से एक तोप चलती थी और अनेक राजपूत वीर , तत्काल वीर गति को प्राप्त कर जाते थे। एक बार फिर तोप के सामने तलवार लेकर खड़े हो जाने के लिए सैनिकों की जमात तैयार हो जाती थी।

बाद के दिनों में भी इस देश में शाहजहां ने ताज महल और विशाल किलों के निर्माण में समय, शक्ति व धन तो खूब लगाये जबकि उसे देश की हमलावरों से रक्षा के लिए नेवी पर भी खर्च करना चाहिए था। हमलावर समुद्री मार्ग से भारत आये थे।

आज जब भारत का अपने पड़ोस से अच्छा संबंध नहीं है तो हमारी तैयारी भी ऐसी होनी चाहिए ताकि दुश्मन हमारे खिलाफ कोई खिलवाड़ करने से पहले थोड़ा रुक कर सोंचें। परमाणु संपन्न देश बन जाने के कारण भारत की सैनिक धाक जरूर बढ़ी है। पर वही काफी नहीं है। हमें आर्थिक रूप से भी एक संपन्न देश बनना पड़ेगा। इसके लिए भ्रष्टाचार पर काफी हद तक काबू पाना होगा। भ्रष्टाचार कम होने से रक्षा तैयरियों में भी बेहतरी आएगी। साथ ही देश का आर्थिक स्वास्थ्य भी सुधरेगा। गांवों में भी जो व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न होता है, उसे उसके विरोधी भी जल्दी उससे नहीं उलझते।

चीन का मन इसलिए भी बढ़ा रहता है क्योंकि भारत ने आजादी के बाद खुद को बुलंद नहीं बनाया। अब भी यहां 84 करोड़ लोग औसतन बीस रुपये रोज पर किसी तरह पेट को पीठ से अलग रखने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरी ओर इस देश में धनपशुओं, कालाबाजारियों, करोड़पति-अरबपति नेताओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है। इस देश का भारी धन विदेशी बैंकों की शोभा बढ़ा रहे हैं। ऐसे में चीन की निंदा को कबीर तरह हम लें तो हमारा ही भला होगा।

(दैनिक ‘जागरण’ पटना संस्करण:16 फरवरी 2010 से साभार)

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

राजनयज्ञों की उठती पीढ़ी

इस देश में नेता कई तरह के होते हैं। अत्यंत थोड़े से राजनयज्ञ यानी स्टेटसमैन होते हैं। कुछ अन्य नेता होते हैं। कुछ कबीलाई सरदार होते हैं। कुछ शुद्ध माफिया व हत्यारे होते हैं जो राजनीति भी करते हैं। कुछ जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंकों के सौदागर होते हैं। कुछ अन्य कोटियां भी हैं जिनकी चर्चा यहां उचित नहीं।

जब देश की सत्ता राजनयज्ञों या कम से कम नेताओं के हाथों में आती है तो देश भरसक सुरक्षित माना जाता है। पर जब बाकी श्रेणियों के राजनीतिक कर्मियों के हाथों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सत्ता आ जाती है तो देश या प्रदेश असुरक्षित माना जाने लगता है।

इस देश के साथ परेशानी यह पैदा हो रही है कि यहां एक-एक करके राजनयज्ञ यानी स्टेटसमैन उठते जा रहे हैं। ज्योति बसु अब हमारे बीच नहीं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी और जार्ज फर्नांडीस बुरी तरह बीमार हैं और सक्रिय राजनीति से दूर जा चुके हैं। एल.के. आडवाणी को परिस्थितियों ने किनारे कर दिया। उनके अर्ध-संन्यास के लिए वे खुद कतई जिम्मेदार नहीं हैं। यदि पूरे देश के राजनीतिक नजारे को गौर से देखें तो स्टेटसमैन शायद ही कहीं नजर आएगा। यदि इक्के-दुक्के हैं भी तो उनकी संख्या इतनी कम है कि वे देश पर आने वाले किसी संकट में कोई निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं हैं।

नेताओं की नई नई पीढ़ियां आंदोलनों की आंच से तप कर निकलती हैं। अब परिवारवाद के घरौदों से राजनीति में नई पीढ़ियां जबरन निकाली जा रही हैं। और इस अभागे व गरीब देश पर थोपी जा रही है। परिवारवाद की कल्पना ही स्वार्थ व जातिवाद पर आधारित है। इसलिए आम तौर पर परिवारवादी राजनीति का स्वरूप भी वैसा ही बनता जा रहा है। शायद ही किसी परिवारवादी नेता ने देश का भला किया हो। अपवादों की बात और है।

ब्रिटेन के प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल को स्टटेसमैन कहा जाता है। स्टेटसमैन न सिर्फ देश व दुनिया के सामने मौजूद समस्याओं से मजबूती व होशियारी से लड़ता है बल्कि राजनीति का स्वरूप भविष्य में कैसा हो सकता है, इसका भी सही अनुमान रखता है। चर्चिल ने सफलतापूर्वक द्वितीय विश्व युद्ध का नेतृत्व किया था। साथ ही उसे यह भी पता था कि आजादी दे देने के बाद भारत के नेतागण उस देश के साथ क्या कर गुजरेंगे। उनकी यह भविष्यवाणी भारत में सही साबित हुुई है जिसकी यहां अक्सर चर्चा होती रहती है। हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि भारत को आजाद करना गलत था।ं

पर आज जब हम भारत में स्टटेसमैन की कमी की चर्चा करते हैं तो हमारे दिलोदिमाग में यह बात रहती है कि यदि देश के सामने कोई बहुत बड़ी व खतरनाक समस्या आ जाए तो हमारे नेतागण उससे कैसे निपटेंगे।

आज भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या सरकारी भ्रष्टाचार है। इसी से लगभग अन्य सभी समस्याएं पैदा हो रही हैं। आज की भीषण महंगाई की समस्या भी सरकारी भ्रष्टाचार से ही पैदा हुई है। महंगाई से जूझने में हमारे देश व प्रदेश के नेतागण विफल हैं। जबकि निष्पक्ष विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यदि ईमानदारी, दूरदर्शिता व कड़ाई से इस समस्या का समय पर समाधान कर दिया गया होता तो आज यह इतना भीषण रूप नहीं ले पाता। सरकारी भ्रष्टाचार की समस्या से सफलतापूर्वक जूझने के लिए ऐसे राजनयज्ञों की सख्त जरूरत है जो ईमानदारी से इस बीमारी पर हमला करे। इसके लिए यह जरूरी है कि वह राजनयज्ञ खुद भी ईमानदार हांे। वैसे भी व्यक्तिगत ईमानदारी के बिना कोई राजनयज्ञ का दर्जा पा ही नहीं सकता।

आज इस देश में कितने नेता बच गये हैं जिनकी व्यक्तिगत ईमानदारी ‘सीजर की पत्नी की तरह संदेह से परे’ है ? ऐसे माहौल में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जरूरी कदम कौन उठाएगा ? यह एक बड़ी समस्या है जो समय के साथ इस देश में बढ़ती ही जा रही है। यह बात सही है कि अटल बिहारी वाजपेयी, जार्ज फर्नांडीस और ज्योति बसु ऐसी सरकारों में रहे जो भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं थी। पर ये तीन नेता कम से कम ऐसे तो माने ही गये जो सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर अपने तथा अपने परिवार के घर नहीं भरते थे। ये नेता जिन पदों पर रहे, उन पदें को तो कम से कम पैसे कमाने की मशीन बनाने से उन्होंने रोके रखा। पर आज अधिकतर सत्ताधारी व प्रतिपक्षी नेताओं की हालत कैसी है? एम.पी.-विधायक फंड ने तो अधिकतर नेताओं की बखिया उधेड़ कर रख ही दी है।

इस माहौल में ज्योति बसु जैसे राज नेताओं का जाना अखरता है। राजनयज्ञों की दिनानुदिन घटती संख्या और भी अखरने वाली बात है। यह देश व इसके लोकतंत्र के भविष्य के लिए कतई शुभ नहीं है। आगे- आगे देखिए होता है क्या !

साभार दैनिक जागरण पटना

रविवार, 1 फ़रवरी 2009

नकली दवाओं का समंदर



युद्ध, आपसी झगड़े और आतंकी हमलों में कुल मिलाकर जितनी जानें जाती हैं, एक मोटे अनुमान के अनुसार उससे कहीं काफी अधिक जानें नकली और घटिया दवाओं के इस्तेमाल से जा रही हैं। नकली और घटिया दवाओं का मानव शरीर पर परोक्ष व प्रत्यक्ष असर पड़ता है। कुछ मामलों में असर देर से होता है और कुछ मामलों में जल्दी ही । अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कुछ देश जरूर अपवाद हैं, पर नकली दवाओं की यह बीमारी, तो लगभग पूरे विश्व में फैल चुकी है। सर्वाधिक खराब हालत भारत की है। इस मामले में भी बिहार इस देश में सर्वाधिक पीडि़त राज्य है। अमेरिका और ब्रिटेन सहित कुछ थोड़े से देशों ने नकली दवाओं के खिलाफ जरूर कारगर कार्रवाई की है, पर अन्य अनेक देशों के तो भगवान ही मालिक हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सन् 2007 में ही कहा था कि भारत के प्रमुख नगरों में जो दवाएं बिक रही हैं, उनमें से हर पांच दवा में एक दवा नकली है। गत दो साल में हालात और भी खराब हो चुके हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन्हें रोकने की प्रशासनिक कोशिश समस्या के अनुपात में ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है। रही-सही कसर व्यापक सरकारी भ्रष्टाचार पूरी कर देता है। इस सिलसिले में कुछ आंकड़े यहां पेश हैं। देश की राजधानी यानी नेशनल कैपिटल रिजन में हर साल करीब तीन सौ करोड़ रुपये की नकली दवाओं की बिक्री हो रही है। पूरी दुनिया में 32 बिलियन डालर की नकली दवाएं हर साल बिकती हैं। पूरे भारत की बात करें, तो किसी प्रदेश में यदि सर्वाधिक नकली दवाओं का इस्तेमाल कहीं होता है, तो वह बिहार ही है। वैसे भी दुनिया में जितनी भी नकली दवाओं की आपूर्ति होती है, उनमें से 75 प्रतिशत नकली दवाओं की आपूर्ति भारत, चीन और पाकिस्तान से ही की जाती है। अब भला बिहार में कौन नहीं जानता कि नकली दवाएं किन स्थानों में बनती हैं। हां, सिर्फ प्रशासन को पता नहीं होता। धांधलीबाज पकड़े भी जाते हैं, पर रिश्वत ले देकर छोड़ दिए जाते हैं। या फिर गवाहों को खरीद लिया जाता है। एन।सी.आर. के गाजियाबाद और चांदनी चैक इलाकों से कई बार नकली दवाएं बरामद की जा चुकी हैं, पर उन काले धंधों पर कारगर रोक नहीं लगती। वैसे भी नकली दवाओं की जांच के लिए भारत में सिर्फ सात ही प्रयोगशालाएं हैं। नकली दवाओं के कारोबारियों के खिलाफ पहले से मौजूद सन् 1940 के कानून में संशोधन करके उसे और कड़ा बनाने की केंद्र सरकार गंभीर कोशिश कर रही है, पर तत्संबंधी कानूनों को लागू करने की दिशा में सरकारी मंशा, समस्या के अनुपात में काफी लचर है। क्योंकि सरकारी मशीनरी में भ्रष्टाचार और काहिली की जंग लगी हुई है। नकली दवाएं चूंकि देर-सवेर मरीजों के प्राण हर लेती हैं, इसलिए इसके लिए कसूरवारों को फांसी की सजा तो मिलनी ही चाहिए। ऐसा कानूनी प्रावधान होना चाहिए।नकली व घटिया दवाओं के निर्माता तो सामूहिक नरसंहार के दोषी होते हैं। नकली दवाओं के कारण मरनेवालों का सही आंकड़ा यदि मिल जाए, तो वह सचमुच चैंकाने वाला ही होगा। क्योंकि नकली दवाएं कई तरह से मरीजों को मौत तक पहुंचाती हैं। एक चिकित्सक के अनुसार लगातार नकली दवाएं लेते रहनेवाले मरीजों के शरीर पर कुछ दिनों के बाद असली दवाएं भी काम करना बंद कर देती हैं। यदि कोई पूछे कि बिहार सरकार को कौन सा काम सबसे पहले करना चाहिए, तो उसका सटीक जवाब यही होगा कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के तर्ज पर ही नकली दवाओं की समस्या से निपटने के लिए भी राज्य सरकार को कोई कार्यनीति जल्दी बनानी चाहिए। क्योेंकि यह एक बहुत बड़ी आपदा है, जो भीतर- ही -भीतर बिना किसी शोर के बड़ी संख्या में जानें ले रही है। सड़क, पुल, स्कूल तथा विकास कार्य भी जरूरी है, पर मनुष्य यदि जिंदा रहेगा तभी तो वह उसका उपभोग कर पाएगा। जिस तरह कोई भी संवेदनशील सरकार कोसी जैसी बाढ़ के पानी में जनता के डूबने से बचाने के लिए भरसक कोशिश करती है, उसी तरह नकली दवाओं के समंदर में लाखों लोगों के डूब जाने से बचाने के लिए भी उसे कोशिश करनी चाहिए।


राष्ट्रीय सहारा, पटना (29 जनवरी, 2009)

आय में बढ़ते फर्क के खतरे

ओएनजीसी यानी तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम के अफसरों की इस माह के प्रारंभ में तीन दिनों की हड़ताल हुई। इससे पूरे देश में आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। अफसर अपने वेतन बढ़ाने के लिए हड़ताल पर थे। अब सवाल है कि उन्हें कितना वेतन मिलता है और वे उसमें कितनी वृद्धि की मंाग के लिए सरकार का भयादोहन कर रहे थे ? हड़ताली अफसरों के संघ के अध्यक्ष का मासिक वेतन हर माह एक लाख 29 हजार रुपए है। वे इसमें और वृद्धि के लिए हड़ताल पर चले गए थे। वे ओएनजीसी में अधीक्षण अभियंता हैं। संघ के उपाध्यक्ष का वेतन 99 हजार रुपए है। एक अन्य उपाध्यक्ष का वेतन एक लाख 26 हजार रुपए है। इसी तरह ओएनजीसी के अन्य अफसरों को भी भारी वेतन दिया जाता है। शुक्र है कि केंद्र सरकार ने कड़ा रुख अपनाया और हड़ताल समाप्त हो गई। गत 11 जनवरी को निगम ने अपने 64 हड़ताली अफसरों को सेवामुक्त कर दिया है।इस हड़ताल को उन कुछ नेताओं ने भी विवेकहीन हड़ताल बताया जो कामगारों के पक्ष में अक्सर उठ खड़े होते हैं। सवाल है कि इस गरीब देश के सरकारी कर्मियों को कितना वेतन मिलना चाहिए ? जाहिर है कि वेतन समितियां जो रकम तय करती हैं, उतनी रकम तो मिलनी ही चाहिए। पर क्या कुछ लोगों को उससे भी ज्यादा मिलना चाहिए ? अन्यथा वे देश का जरूरी काम काज भी ठप कर देंगे ? तेल का मामला तो देश की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। इन दिनों देश पर कई तरह के बाहरी -भीतरी खतरे मौजूद हैं। उनकी हड़ताल न सिर्फ मौजूदा कानून बल्कि भारत के संविधान की मंशा के भी खिलाफ थी।संविधान में दर्ज राज्य के नीति निदेशक तत्वों में से एक महत्वपूर्ण तत्व का विवरण अनुच्छेद-39 (ग) में दिया गया है। उसके अनुसार, ‘राज्य अपनी नीति का, विष्टितया, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रुप से आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन साधनों का सर्व साधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण नहीं हो।’ इस देश में 84 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनकी रोज की औसत आय मात्र बीस रुपए है। दरिद्र लोगों से भरे- पड़े ऐसे देश का कोई सरकारी अफसर कहे कि उसे हर माह मिलने वाले करीब सवा लाख रुपए से तो काम नहीं चलेगा,तो उसके साथ शासन का कैसा सलूक करना चाहिए ? वैसा ही जैसा शासन ने किया।पर, इस कड़े सलूक को नैतिक बल भी मिल जाता यदि खुद शासक वर्ग भी हर स्तर पर मितव्ययिता अपनाता और फिजूलखर्ची से बचता। गत साल यह खबर आई थी कि इस देश के एक सांसद पर सरकार हर माह औसतन दो लाख पैंतीस हजार रुपए खर्च करती है। जाहिर है कि सांसदी पूर्णकालिक काम नहीं है। एक सांसद के जिम्मे जितना भी काम है,उसे अधिकतर सांसद ठीक ढंग से नहीं कर रहे हैं। पिछले सत्र में आठ विधेयक सिर्फ सत्रह मिनट में पारित कर दिए गए। ओएनजीसी के अफसरों की यह शिकायत हो सकती है कि भारत सरकार के अधिकतर अफसर और मंत्री ओएनजीसी के साधनों का नाजायज तरीके से इस्तेमाल करते रहते हैं। सांसद जब चाहते हैं, अपना वेतन- भत्ता सदन में सर्वसम्मति से बढ़ा लेते हैं। पर इंजीनियरों व कामगारों के साथ ऐसी उदारता नहीं बरती जाती।ऐसा क्यों ? आजादी के तत्काल बाद जब मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के लिए वेतन तय हो रहा था तो तब के नेताओं ने इस बात को लेकर शिकायत नहीं की कि उनको आईएएस अफसरों से कम वेतन-भत्ते क्यों दिए जा रहे हैं। तब राजनीति सेवा थी, नौकरी या व्यापार नहीं। पर अब तो अफसरों को शिकायत है कि कुल मिलकर सांसदों -विधायकों पर उनकी अपेक्षा जनता के अधिक पैसे खर्च हो रहे हैं। क्या राजनीतिक वर्ग एक बार फिर अपनी नैतिक धाक कायम करने की दिशा में कुछ त्यागमय कदम उठाएगा ताकि ओएनजीसी के बर्खास्त अफसरों को कुछ कहने का मौका न मिले ? एक बात साफ -साफ समझ ली जानी चाहिए कि आय के बढ़ते अंतर के अपने भयंकर खतरे हैं। उन खतरों को सबसे अधिक नेताओं को ही झेलना पड़ेगा।
राष्ट्रीय सहारा (15 जनवरी, 2009)

सोमवार, 26 जनवरी 2009

ऐसी ही सजा जरूरी

इससे बेहतर खबर कोई और नहीं हो सकती। खास कर जल प्रदूषण की समस्या से जूझनेवाले देश भर के लोग इससे गद्गद् होंगे। दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली जल बोर्ड के तीन बड़े अधिकारियों को इसी मंगलवार को तीन हफ्ते की सजा सुनाई है। उन पर यमुना नदी के पानी में गंदे नाले के दूषित जल के प्रवाहित होते रहने से रोकने की जिम्मेदारी दी गई थी। दिल्ली हाई कोर्ट के जज एस.एन. धींगरा ने सजा सुनाते समय कहा कि अब कोई बहाना नहीं चलेगा। इससे पहले बोर्ड के वकील, कोर्ट से यह कह रहे थे कि नालियों को ठीक करने के लिए नया टेंडर जारी किया गया है। कोर्ट ने कहा कि जो अफसर काम नहीें करना चाहते, उनके लिए तो बहाने मिल ही जाते हैं। जिन अफसरों को कोर्ट ने सजा दी है उनमें दिल्ली जल बोर्ड के पूर्व मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी अरुण माथुर, मुख्य अभियंता (ड्रेनेज) आर.के. जैन और कार्यपालक अभियंता पी. पंत शामिल हैं। इससे दो साल पहले बोर्ड के अफसरों ने कोर्ट को आश्वासन दिया था कि टूटे हुए नाले की मरम्मत करा दी जाएगी। पर कोर्ट को दिए गए इस स्पष्ट आश्वासन का भी जब पालन नहीं हुआ, तो नागरिकों ने कोर्ट से फिर गुहार लगाई। कोर्ट ने संबंधित अफसरों पर 20- 20 हजार रुपए जुर्माना करते हुए कहा कि यह इसी देश में होता है कि ऐसे मामले में भी नागरिकों को कोर्ट की शरण लेनी पड़ती है। उन्होंने कहा कि ये अफसर जुर्माने की राशि अपने वेतन से देंगे। अदालत ने कहा कि इन अफसरों का जेल जाना फिलहाल अगले तीन महीने तक स्थगित रहेगा, ताकि वे इस बीच नागरिकों की संबंधित शिकायत दूर कर दें। यह सजा गंगा नदी तथा देश की दूसरी नदियों को प्रदूषित करने में ‘मदद’ करने के काम में लगे देश के विभिन्न जल बोर्डों के अफसरों के लिए भी नसीहत साबित हो सकती है, यदि वे कोई नसीहत लेना चाहें। पटना में भी छोटे-बड़े अफसरों व सरकार की लापरवाही से कई गंदे नाले गंगा नदी को रोज -रोज और भी प्रदूषित करते जा रहे हैं। अब तो विशेषज्ञ बताते हैं कि पटना के निकट गंगा का पानी पीने और नहाने को कौन कहे, छूने लायक भी नहीं है। इस बीच केंद्र सरकार ने गंगा बेसिन आॅथारिटी बनाने का सराहनीय निर्णय किया है। गंगा जल को फिर से अमृत बनाने की दिशा में केंद्र सरकार चाहे, तो जल्दी ही जरूरी कदम उठा सकती है। वैसे भी चुनाव करीब है। उसके लिए पैसे आवंटित होंगे। अफसर तैनात होंगे, पर योजना को कार्यान्वित करने के लिए जिस कर्तव्यपरायणता की जरूरत है, उसे अफसरों और कर्मचारियों में पैदा करने के लिए शायद जस्टिस एस.एन. धींगरा जैसे जजों के निर्णय की चाबुक भी चाहिए। याद रहे कि कानपुर में गंगा जल को प्रदूषण से रोकने के लिए हाई कोर्ट का सख्त आदेश है, किंतु उस आदेश को लागू नहीं कराया जा रहा है। यदि वहां भी अदालत की अवमानना को लेकर याचिकाकर्ता सक्रिय हो जाएं, तो मां गंगा को बचाया जा सकता है। अन्यथा वहां तो चमड़े के कारखानों से निर्बाध निकल रहे अत्यंत ही गंदे व जहरीले पानी से गंगा नदी त्राहि -त्राहि कर ही रही है। मायावती जैसी दबंग मुख्यमंत्री का उस ओर ध्यान नहीं है, जो चाहें तो आसानी से दोषी लोगों के होश ठिकाने ला सकती हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी एक बार वायदा किया था कि वे पटना के पास गंगा नदी को प्रदूषित होते रहने से रोकने की कोशिश करेंगे। अब तो गंगा बेसिन आॅथारिटी बन रही है, जिसके सदस्य संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री भी होंगे। उम्मीद है कि बिहार के मुख्यमंत्री पहल करके राज्यों के चुनाव के शीघ्र बाद ऐसी आॅथारिटी के गठन की प्रक्रिया भी पूरी कराने के लिए केंद्र से कहेंगे। केंद्र सरकार की नजर में भी नीतीश कुमार एक गंभीर व काम करनेवाले मुख्यमंत्री हैं। उनकी बातों का असर होगा, ऐसी उम्मीद की जाती है। अन्यथा ऐसा न हो कि गंगा आॅथारिटी के निर्माण का काम घोषणा तक ही सिमट कर रह जाए। राष्ट्रीय सहारा, पटना (27-11-2008)

घुसपैठ रोकने के लिए भी कड़ाई जरूरी

आतंकी हमलों से मुकाबले के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी के गठन और नए कानून बनाने का फैसला सराहनीय है। देर आए,दुरूस्त आए। पर, इसके साथ ही इस देश में विदेशियों की बेरोकटोक घुसपैठ पर रोक भी उतनी ही जरूरी है।इस ओर अभी इस देश की विभिन्न सरकारों का पूरा ध्यान जाना बाकी है।कम से कम तीन स्थलोंं से आए दिन बेरोकटोक घुसपैठ की खबरें अक्सर आती रहती हैं।वे स्थल हैं नेपाल-भारत सीमा, बंगला देश बोर्डर और समुद्री रास्ते । इन तीनों स्थानों में तैनात विभिन्न सरकारों के संबंधित अधिकतर कर्मचारियों और अफसरों के बीच व्याप्त भारी भ्रष्टाचार, आतंकियों के लिए इंधन का काम करता है।इस राष्ट्रद्रोही भ्रष्टाचार पर कड़ाई से अंकुश लगाए बिना आतंकी घटनाओं पर काबू पाना कठिन होगा। सन् 1993 के बंबई विस्फोट कांड में कुछ सरकारी अफसरों और कर्मचारियों को भी अदालत ने सजा सुनाई ।उन पर आरोप था कि उन लोगों ने आर.डी.एक्स.की खेपों को समुद्री मार्ग से बंबई पहुंचाने में दाउद इब्राहिम के लोगों की मदद की।इसके बदले उन्हें रिश्वत के रूप में भारी धन राशि मिली थी।आज भी महाराष्ट्र में एक नेता दूसरे पर यह आरोप लगाता रहता है कि वह दाउद इब्राहिम की मदद करता है।यानी इस देश में कस्टम पुलिस और कोस्टल गार्ड को ऐसा बनाना पड़ेगा ताकि उसके अफसर व कर्मचारी रिश्वत लेकर हथियार,गोले बारूद या किसी घुसपैठी को भारतीय सीमा में घुसने का मौका नहीं दे ।क्या ऐसा कभी हो पाएगा ? दरअसल अभी इस देश में जो कड़ा कानून बन रहा है और जो केंद्रीय एजेंसी कायम हो रही है,वे भारत के भीतर पहुंच चुके आतंकियों से निपटने के लिए हैं।पर विदेशी आतंकवादी तो ‘शहीद’ होने के लिए ही बारी- बारी से इस देश में पहुंचते हैं। उन्हें अपने कारनामे करके मर जाना पसंद है। उनके लिए इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारत का कानून कितना कड़ा है या नरम।कोई भी कानून उन्हें फांसी से अधिक भला और क्या दे सकता है ! अधिक गंभीर सवाल तो यह है कि उन फिदाइनों को भारत की सीमा में प्रवेश करने से ही कैसे रोक दिया जाए। पर, यह तब तक नहीं रुकेगा जब तक हमारी सीमाएं भ्रष्ट कर्मियों के हाथों असुरक्षित रहंेगीं।सीमाएं सुरक्षित तब तक नहीं रहेंगी जब तक सीमाओं पर ऐसे अफसर व कर्मचारी तैनात किए जाते रहेंगे जिन्होंने मानव तस्करी तथा दूसरे प्रकार के सामान की तस्करी के धंधे को अपनी नियमित आय का जरिया बना लिया है।ऐसे भ्रष्ट लोक सेवकों को अक्सर उच्च अधिकारियों व सत्ताधारी नेताओं का भी संरक्षण प्राप्त रहता है।यह धंधा पहले तस्करी को संरक्षण देने के लिए चलता था।अब उन्हीं तस्करों ने आतंकियों और उनके लिए हथियारों की तस्करी के काम को भी अपना लिया है। बंगला देश की सीमा पर तैनात हमारे सुरक्षाकर्मियों के एक बड़े हिस्से पर यह आरोप लगता रहता है कि वे रिश्वत की मामूली रकम भी ले लेकर बंगला देशियों को भारत की सीमा में अवैध तरीके से प्रवेश कराते रहते हैं।याद रहे कि बंगला देश वैसे आतंकियों का गढ़ बना हुआ है जो भारत में आकर बड़ी -बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। अंत में नेपाल -भारत सीमा के बारे में भी कुछ ।यह सीमा तो बिलकुल खुली हुई है।इस सीमा से लगे अनेक पुलिस थानों में तैनाती के लिए रिश्वत की बोली लगती है।सीमा से सटे बिहार के जिलों के अधिकतर एस.पी.पर आए दिन यह आरोप लगता रहता है कि वे थाना प्रभारियों की तैनाती के लिए थानों की ‘बोली’ लगवाते हैं।पुलिस की उपरी आय इस मद में है कि तस्करी के माल और संदेहास्पद व्यक्तियों को कोई थाना प्रभारी कितना अधिक इधर से उधर टपवा देता है।यह विदेशी आतंकवादियों के लिए आदर्श स्थिति है।इस पर रोक लगाए बिना आतंकी घटनाओं पर रोक कैसे लगेगी ? राष्ट्रीय सहारा, पटना (18-12-2008)

भ्रष्टों के लिए भी त्वरित अदालत जरूरी

मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने यह एक बड़ी अच्छी बात कही है कि जदयू के कार्यकत्र्ता आगे बढ़कर भ्रष्ट पदाधिकारियों को निगरानी दस्ते की गिरफ्त में दे दें।किसी मुख्य मंत्री से ऐसी बात सुनने के लिए बिहार की जनता तरस रही थी। मुख्य मंत्री की इस टिप्पणी से दो बातें सामने आती हैं। एक तो यह कि मुख्य मंत्री,राज्य प्रशासन से भ्रष्टाचार वास्तव में कम करना चाहते हैं।दूसरी बात यह है कि भ्रष्टाचार से लड़ने वाली परंपरागत प्रशासनिक व्यवस्था फेल हो रही है।इसीलिए तो किसी दल के कार्यकत्र्ताओं से ऐसी अपील की जा रही है। पर इस अपील में एक कमी है।इस अपील के साथ मुख्य मंत्री को यह भी कहना चाहिए था कि जो जदयू कार्यकत्र्ता भ्रष्ट अफसरों को गिरफ्तार करांएगे उन्हें आर्थिक पुरस्कार दिया जाएगा और राजनीतिक पद या चुनावी टिकट देते समय उनके नाम पर विशेष तौर पर विचार किया जाएगा।यदि राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं को ऐसे काम के लिए आर्थिक पुरस्कार मिलने लगे तो अन्य दलों के कुछ ईमानदार राजनीतिक कार्यकत्र्ता भी इस काम में हाथ बंटा सकते हैं।अभी तो किसी भी दल के ईमानदार कार्यकत्र्ताओं की आर्थिक हालत दयनीय ही है। एक आर्थिक अपराधी के बारे में केंद्र सरकार को गुप्त सूचना देने पर युवा तुर्क चंद्र शेखर को भी करीब चालीस साल पहले केंद्र सरकार ने भारी आर्थिक पुरस्कार दिया था।चंद्र शेखर बाद में प्रधान मंत्री भी बने थे।बिहार में ंऐसे छोटे छोटे आर्थिक पुरस्कार भी मिलने लगंे तो ईमानदार कार्यकत्र्ताओं का स्वाभिमान बचा रह जाएगा। इन दिनों राजनीति में ईमानदार कार्यकत्र्ता और नेता ढंूढ़ना कठिन है,पर कुछ तो जरूर हैं जो इस काम में सरकार की मदद कर सकते हैं। दरअसल बिहार का प्रशासनिक तंत्र भ्रष्टाचार में इस कदर डूबा हुआ है कि ब्रिटेन या किसी भी देश के विशेषज्ञ से प्रशासनिक सुधार में मदद ले लीजिए,पर जब तक भीषण भ्रष्टाचार कम नहीं होगा,सुधार का कोई मतलब नहीं रहेगा।योजना आयोग की अर्जुन सेनगुप्त रपट में कहा गया है कि भारत के 84 करोड़ लोग औसतन बीस रुपए प्रतिदिन पर ही गुजर करने को अभिशप्त हैं। आयोग की ही एक अन्य रपट में कहा गया है कि नक्सलवाद का मुख्य कारण गरीबी और विस्थापन है। इस बारे में भले लोगों के बीच अब यह आम सहमति बनती जा रही है कि इस देश में गरीबी का मुख्य कारण सरकारी भ्रष्टाचार ही है। आजादी के बाद के शासक तो कहते रहे कि मंत्रियों और अफसरों के भ्रष्टाचार पर कार्रवाई करोगे तो उनमें पस्तहिम्मती आएगी । उसके बाद के एक नेता की टिप्पणी थी कि क्या कीजिएगा,भ्रष्टाचार तो पूरी दुनिया में है।आज के कई नेता कह रहे हैं कि जनता ही चाहती है कि भ्रष्ट लोग चुनाव जीतें और शासन चलाएं। पर तीनों बातें गलत हैं।इस बीच चीन ने भ्रष्टाचारियों के लिए फांसी की सजा की व्यवस्था करके अपने देश को एक विकसित देश बना लिया। हमारे प्रदेश बिहार में पिछले तीन साल के भीतर करीब 25 हजार छोटे- बड़े अपराधियों को जब त्वरित अदालतों के जरिए सजाएं दिलवा दी गईं तो भीषण अपराध के कारण जारी भारी भय और आतंक का माहौल समाप्त हो गया ।यदि यही फार्मूला उन भ्रष्ट अफसरों और कर्मचारियों के खिलाफ भी लागू किया जाए जो घूस लेते रंगे हाथोंें पकड़े जा रहे हैं तो बिहार सरकार के दफ्तरों में भ्रष्टाचार भी कम होगा।आज स्थिति यह है कि राज्य सरकार के दफ्तरों में भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है जितना पहले कभी नहीं था।इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भ्रष्ट लोगांे को सजा नहीं मिल पा रही है।जबकि डी.जी.स्तर तक के पुलिस अफसर .और वरिष्ठ आई.ए.एस. अफसर भी भ्रष्टाचार के आरोप में बिहार में गिरफ्तार हो रहे हैं।दूसरी ओर, राज्य के प्रशासनिक अफसर संघ खुलेआम यह कह रहा हैं कि उसके सदस्यों के खिलाफ स्टिंग आपरेशन नहीं चलना चाहिए और एक अन्य सेवा संघ अपने उन सदस्यों के पक्ष में भी आंदोलन की धमकी सरकार को दे रहा है जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं।इनकी हिम्मत और बेशर्मी तो देखिए ! राज्य के भले के लिए ऐसे लोगों को रास्ते पर लाना बहुत जरूरी है। राष्ट्रीय सहारा, पटना (20-11-२०08)

रविवार, 18 जनवरी 2009

‘स्टिंग’ से भयभीत क्यों बासा ?

‘बासा’ ने स्टिंग आपरेशन के लिए मुख्य मंत्री के सुझाव का सार्वजनिक रूप से विरोध कर दिया है।मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने सोमवार को प्रखंड प्रमुखों को यह सुझाव दिया था कि वे भ्रष्ट अफसरों के कारनामों का भंडाफोड़ करने के लिए आधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करें।जो जन प्रतिनिधि बी.डी.ओ.पर दबाव डाल कर सिर्फ लेन -देन का रिश्ता नहीं बनाना चाहते होंगे, वे स्टिंग आपरेशन चला या चलवा सकते हैं। मुख्य मंत्री के सुझाव के बाद अब यह काम कुछ दूसरे लोग भी कर सकते हैं। इस ‘आपरेशन’ के शिकार कभी कुछ प्रखंड प्रमुख भी हो सकते हैं। बिहार प्रशासनिक सेवा संघ यानी बासा के अध्यक्ष अरूण चंद्र मिश्र ने कहा है कि मुख्य मंत्री के इस सुझाव से अफसरगण मानसिक रूप से परेशान हो जाएंगे। उनकी यह राय है कि भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ पहले से निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत ही कार्रवाई होनी चाहिए। सवाल है कि कोई ईमानदार अफसर किसी स्टिंग आपरेशन की आशंका मात्र से ही मानसिक रूप से क्यों परेशान हो जाएगा ? जो अफसर ईमानदारी पूर्वक अपनी ड्यूटी निभाता है और बिना रिश्वत लिए सरकारी काम करता रहता है,उसे किसी भी संभावित स्टिंग आपरेशन से क्यों परेशान हो जाना चाहिए ? पुराने तरीके से बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार पर काबू पाने में मदद नहीं मिल रही है। याद रहे कि सरकारी भ्रष्टाचार ही इस देश की भीषण गरीबी व अन्य अधिकतर समस्याओं का जनक है।चीन में भ्रष्ट लोगों के लिए फांसी की सजा की व्यवस्था है,इसीलिए वह देश आज अमेरिका से भी अधिक स्वर्ण पदक ओलम्पिक में जीत जा रहा है। पर, हम अपनी अधिकतर जनता को भूखे पेट सोने को मजबूर कर देते हैं।हालांकि इस देश की संसद व विधान सभाएं इतना अधिक पैसे का बजट हर साल जरूर पास कर देती हैं जिससे कोई भूखा पेट नहीं सोए।पर बिचैलिए लूट लेते हैं। हालांकि नीतीश कुमार ने भी इस बारे में जरूर अधूरी बात कही है।उन्हें साथ- साथ यह भी कहना चाहिए था कि राज्य के राजनीतिक कार्यकत्र्ता,जन प्रतिनिधि व जनता को चाहिए कि वे मंत्रियों तथा दूसरे अफसरों तथा अन्य क्षेत्रों के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ भी स्टिंग आपरेशन चलाएं।हां,यदि स्टिंग आपरेशन के जरिए कोई बड़े घोटाले का भंडाफोड़ होता है तो आपरेशन में लगे लोगों को राज्य सरकार भरपूर इनाम दे।साथ ही,ऐसे राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं को चुनावी टिकट में तरजीह मिले। स्टिंग आपरेशन कितना जरूरी है,यह बात बासा के अध्यक्ष के बयान के बाद और भी साफ हो गया है। क्योंकि स्टिंग आपरेशन की आशंका से ही मानसिक रूप से परेशान होने वाले अफसर मौजूद हैं। क्या स्टिंग आपरेशन के बिना दिल्ली के आर.के.आनंद जैसे बड़े वकील को बेनकाब करना संभव था ? संसद में सवाल पूछने के लिए जिन दर्जन भर सांसदों ने रिश्वत ली थी,उन्हें स्टिंग आपरेशन के बिना बेनकाब करके संसद से बाहर करवाना संभव था ? एक केंद्रीय मंत्री दिलीप सिंह जू देव के खिलाफ का एक सफल स्टिंग आपरेशन कौन भूल सकता है ? इस देश में गलत उद्देश्य से चलाए गए कुछ स्टिंग आपरेशनों की कोर्ट ने निंदा की है तो कुछ आपरेशनों की अदालत ने जरूरी भी बताया है। बिहार में ही हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में परंपरागत तरीके से भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई हुई है। क्या बासा अध्यक्ष दावा कर सकते हैं कि इससे राज्य के सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार कम हुआ है ?शायद स्टिंग के भय से भ्रष्टाचार कम हो ! क्या बासा अध्यक्ष यह बता सकते हैं कि बिहार के किस प्रखंड कार्यालय में रिश्वत के बिना जनता का कोई जायज काम भी होता है ? क्या उनके सदस्य ने बासा या राज्य सरकार को कभी यह लिख कर दिया है कि उनकी इच्छा के बिना भी उनके मातहत क्लर्क या अफसर जनता से रिश्वत ले रहे है ? जाहिर है कि सभी प्रखंड प्रमुख शुद्ध मन से ही भ्रष्ट बी.डी.ओ.या सी.ओ. के खिलाफ कार्रवाई की मांग नहीं करते। कई के अपने निजी एजेंडे होते हैं।शिक्षा नियुक्ति घोटालों ने बिहार के अनेक जन प्रतिनिधियों को भी बेनकाब कर दिया है।पर यदि बासा सभी तरह के भ्रष्टों के खिलाफ नई -नई तकनीकी के जरिए कार्रवाई नहीं करने देगा तो न तो उनके सदस्य खुद आने वाले दिनों में सुरक्षित रहेंगे और न ही अन्य लोगों के साथ साथ उनकी भी आने वाली पीढि़यां महफूज रहेंगीं।क्योंकि सरकारी भ्रष्टाचार के कारण विकास नहीं हो रहा है और विकास नहीं होने का सर्वाधिक लाभ बिहार में माओवादियों को मिल रहा है जो अपनी ताकत बढ़ाते जा रहे हैं। राष्ट्रीय सहारा, पटना (२८-०८-2008)

एकमुश्त मतदान की जरूरत

यदि दलीय नेता ही अवसर आने पर अपने दल के सभी सदस्यों की ओर से सदन में एकमुश्त मतदान कर दिया करें ं,तो ‘नोट के बदले वोट’ की नौबत शायद नहीं आएगी। यह बात अलग है कि दलीय नेता ही बिक जाएं।पर, ऐसी नौबत कम ही आती है।लोक सभा में गत 22 जुलाई को जो कुछ हुआ,उसे देखते हुए क्या इस सुझाव पर विचार करने का समय नहीं आ गया है ? पर, सदस्यों की ओर से संसदीय व विधायक दलों के नेताओं को ऐसा अधिकार दिया जाए, इसके लिए संबंधित नियम में परिवत्र्तन करना पड़ेगा। क्या लोकतंत्र मेंं पनपी एक शर्मनाक बुराई को रोकने के लिए नियमों में एक और परिवत्र्तन नहीं किया जाना चाहिए ? अधिक दिन नहीं हुए जब राज्य सभा चुनावों में अपने दलीय नेता या उनके प्रतिनिधि को मत पत्र दिखाकर वोट देने की बाध्यता कायम की गई।यानी सदस्यों को उनके मनोनुकूल मतदान करने का उनका अधिकार छीन लिया गया। उससे पहले बड़े पैमाने पर ऐसी शिकायत आ रही थी कि अनेक विधायक पैसे लेकर राज्य सभा के उम्मीदवारों को वोट दे रहे हैं। कल्पना कीजिए कि पहले से संसदीय दल के नेताओं को ही विश्वास प्रस्ताव पर अपने पूरे दल की ओर से एकमुश्त वोट देने का अधिकार होता तो कम से कम संगठित व बड़े दलों से तो कोई दल -बदल या पक्ष परिवत्र्तन नहीं होता।हां,निर्दलीय सदस्यों के बारे में भी अलग से विचार किया जा सकता है। निर्दलीय सदस्य जब चुन कर जाते हैं,उसी समय उनसे यह लिखवा कर स्पीकर रख लें कि वे पूरे पांच साल वे किस पक्ष में रहेंगे ? उन्हें पहले ही यह लिख कर दे देना चाहिए कि वे सत्ता दल के साथ रहेंगे या विपक्ष के साथ ? या फिर वे कभी भी किसी पक्ष की ओर से मतदान ही नहीं करेंगे।जब वे यह लिख कर दे देंगे तो उनके द्वारा किसी भी हालत में पक्ष बदलने की स्थिति में स्पीकर उनकी सदस्यता तत्काल समाप्त घोषित कर देंगे। ऐसा ही नियम बनाया जा सकता है। दलीय व निर्दलीय जन प्रतिनिधियों के लिए ऐसे नियम बन जाएं तो बिकने के लिए कोई जन प्रतिनिधि घोड़ामंडी में उपलब्ध ही नहीं रहेगा।यदि उपलब्ध ही नहीं रहेगा तो खरीदने वाले कैसे व कहां से खरीदेंगे ? यदि नहीं खरीद पाएंगे तेा लोकतंत्र शर्मसार होने से बच जाएगा।यानी भविष्य में कभी किसी मंत्रिमंडल के बारे में यह नहीं कहा जा सकेगा कि फलां मंत्रिमंडल तो खरीदे हुए सांसदों के ही बल पर वर्षो तक चला। इससे लोकतंत्र बदनाम होने से बचेगा और जनतंत्र मंंें आम जनता की आस्था समाप्त नहीं होगी।आस्था बनी रहेगी तो माओवादी जैसी जो शक्तियां इन दिनों मौजूदा लोकतंत्र को समाप्त करने की कोशिश में लगी हुई हैं,उन्हें जनता से अधिक ताकत नहीं मिलेगी। एक बार 1993 में सरकार बचाने के लिए कुछ सांसद बिके थे। इस बार भी सांसदों को खरीद कर ही मन मोहन सरकार बचाई गई, इस आरोप की जांच संसदीय समिति कर रही है।जांच का नतीजा जो भी आए , पर पूरे देश ने यह दृश्य कई बार अपने टी.वी.स्क्रीन पर देखा कि किस तरह सांसदों की घोड़ामंडी सजी।इस घृणित प्रकरण की चर्चा अभी चलती ही रहेगी।ऐसी शर्मनाक चर्चाओं पर विराम लगाने के उपाय किए जाने में यदि इस देश के प्रमुख दल रूचि रखते होंगे तो जरूर उपर दिए गए सुझाव या फिर इससे भी किसी बेहतर सुझाव पर अमल करेंगे।पर क्या इस देश के पक्ष विपक्ष की राजनीति के दिग्गज नेता लोग सचमुच चाहते हैं कि नोट के बदले वोट जैसे प्रकरणों से भारत का लोकतंत्र दुनिया भर में बदनाम होने से बचे ? या फिर इस घृणित व्यापार की सहूलियत उपलब्ध रहने पर उसका समय आने पर सभी दल सिर्फ लाभ ही उठाना चाहते हैं ? अभी लाभ यू.पीए. ने उठाया,कल होकर एन.डी.ए. उठाएगा। यह बात इसलिए कही जा रही है कि झामुमो रिश्वत कांड मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में ही यह कहा था कि यदि कोई सांसद घूस लेकर सदन में वोट देता है तो उसे सजा देने का अधिकार संसद को ही है,कोर्ट को नहीं।पर इस फैसले के दस साल बीत जाने के बावजूद ऐसे घूसखोर सांसदों को सजा देने के लिए संविधान के संबंधित अनुच्छेद में संशोधन करने का कोई उपाय न तो एन.डी.ए.ने किया और न ही यू.पी.ए. ने जबकि दोनों इस बीच लंबे समय तक बारी-बारी से सत्ता में रहे। राष्ट्रीय सहारा, पटना (१४-०८-2008)

आलोचना हो, पर कैसी ?

पचास के दशक की बात है। एक बार अनुग्रह बाबू के एक खास करीबी नेता एक खास उद्देश्य से लाल बहादुर शास्त्री से मिले।उन्होंने शास्त्री जी से कहा कि आप जेपी से कहें कि वे सार्वजनिक रूप से जवाहर लाल नेहरू की आलोचना नहीं करें।इससे होता यह है कि कांग्रेस के अंदर डा.अनुग्रह नारायण सिंह की स्थिति उलझनपूर्ण हो जाती है। याद रहे कि जेपी, अनुग्रह बाबू के काफी करीबी माने जाते थे। शास्त्री जी ने जवाब दिया कि ‘ऐसा मैं जेपी को नहीं कह सकता।दरअसल जेपी ही ऐसे एक व्यक्ति हैं जो किसी राग-द्वेष या लाभ-लोभ के बिना नेहरू जी की जनहित में सार्वजनिक रूप से आलोचना कर सकते हैं।ऐसी आलोचनाएं सत्ताधारी नेता को एकाधिकारवादी व निरंकुश होने से रोकती हैं। नेहरू की अपार लोकप्रियता के कारण उनमें एकाधिकार की प्रवृति पनपने का खतरा मौजूद है। तुलना तो थोड़ी बेमेल हो रही है,पर नीतीश कुमार के खिलाफ भाजपा नेता हरेंद्र प्रताप की हाल की सार्वजनिक आलोचना से वह प्रकरण याद आता है।नीतीश कुमार के जिस तरह जन समर्थन बढ़ने की खबर दी जा रही है, ऐसे में उनमें एकाधिकारवादी प्रवृति के पनपने के खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता।डी.एन.गौतम को डी.जी.पी.बनाने के पीछे भी संभवतः मुख्य मंत्री की यही आत्म विश्वासपूर्ण मानसिकता काम कर रही है कि अगले किसी चुनाव में उन्हें मतदाताओं को मतदान केंद्रों पर जाने से रोकने की जरूरत नहीं है बल्कि पुलिस की मदद से स्वच्छ मतदान कराने की जरूरत है। लोकतंत्र में राग-द्वेष व लोभ-लाभ से मुक्त होकर जन हित में सत्ता की जरूरत पड़ने पर कभी स्वस्थ आलोचना या फिर कभी तारीफ जरूरी भी है।एन.डी.ए.के भीतर से हरेंद्र प्रताप की ओर से संभवतः अब तक की सबसे कड़ी आलोचना सामने आई है। हरेंद्र प्रताप की ताजा आलोचना कैसी है ?इस पर मिली जुली प्रतिक्रियाएं हैं।इसके तरह-तरह के मतलब भी लगाए जा सकते हैं।ऐसे समय में जब कि इस देश के पक्ष- विपक्ष के नेताओं द्वारा आए दिन हो रही राजनीतिक बयानबाजियों से तथ्यपरकता व जन कल्याण की भावना लुप्त होती जा रही है,वहां हरेंद्र प्रताप के बयान में भी ऐसा कुछ तलाश करना अस्वाभाविक नहीं है।पर, हरेंद्र प्रताप की कुछ बातें तो गौर करने लायक हैं। बिहार के विश्व विद्यालय कर्मियों की हड़ताल से उपजी समस्या के प्रति हरेंद्र जी की चिंता सराहनीय है। इस सरकार के पीछे सरकारी विफलता भी है।पोटा के खिलाफ मुख्य मंत्री नीतीश कुमार के बयान पर हरेंद्र प्रताप की आलोचना में भी दम लगता है।क्योंकि आतंकवाद की समस्या को गैर राजनीतिक व पेशेवर ढंग से देखने वाले तमाम विशेषज्ञ कड़े कानून की जरूरत महसूस करते रहे हैं।दुनिया के अन्य अनेक देशों ने इस संदर्भ में हाल के वर्षों में अपने कानून कड़े कर दिए हैं। पर भागल पुर दंंगे के मुकदमों की फिर से सुनवाई के नीतीश सरकार के फैसले पर उंगुली नहीं उठाई जानी चाहिए।हरेंद्र प्रताप ने उंगुली उठाई है।यदि दंगाइयों को सजा नहीं मिलेगी तो भविष्य में दंगा करने वालों के हाथ रुकंेगे कैसे ? दंगा- फसाद नहीं रुकेगा तो दरिद्र बिहार का विकास कैसे होगा ? वैसे भी सांप्रदायिक मसलों पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का रूख समय के साथ बदल रहा है। पर, हरेंद्रजी, इस बीच बंगलादेशी घुसपैठियों की समस्या को आप कैसे भूल गए ? आप तो इस समस्या के विशेषज्ञ जानकार रहे हैं।यह समस्या बिहार सहित देश भर में अब भी बरकरार है।बल्कि बढ़ रही है।लोक सभा के पूर्व स्पीकार पी.ए.संगमा ने हाल ही मेंे कहा है कि ‘बंगला देश से और डेढ़ करोड़ शरणार्थियों @कुछ लोग उन्हें घुसपैठी कहते हैं।@के जल्दी ही भारत में प्रवेश करने की आशंका है।’एक अनुमान के अनुसार दो करोड़ बंगला देशी घुसपैठी पहले से ही भारत में अवैध ढंग से रह रहे हैं।इस देश में इन दिनों जारी आतंकवादी वारदातों में बंगला देश में सक्रिय जेहादियों का ही अधिक नाम लिया जा रहा है।इस देश में जहां तहां बसे बंगला देशियों की गैर कानूनी बस्तियों में उन जेहादियों के शरण मिलने की आशंका रहती है। जहां तक छोटे पार्टनर को भी प्रधान मंत्री और मुख्य मंत्री पद देने का सवाल है तो इस देश में ऐसे अनेक उदाहरण है। केंद्र में मोरारजी देसाई और राज्यों में चरण सिंह,महामाया प्रसाद सिंहा,अजय मुखर्जी,गोविंद नारायण सिंह तथा इस तरह कई नेताओं ने जब सरकार बनाई थी तो वे गठबंधन में शामिल दलों में सबसे बड़े घटक के नेता नहीं थे।यदि केंद्र में भाजपा को प्रधान मंत्री पद चाहिए तो राज्यों में उसे अपने सहयोगी दलों को तरजीह देनी ही पड़ेगी। राष्ट्रीय सहारा, पटना (०७-०८-2008)