गुरुवार, 31 अगस्त 2023

 ताजा संदर्भ--भारत के भूभाग पर चीन का दावा

..............................

सन 1962 के युद्ध में भारत की पराजय के तत्काल बाद लिखी गयी  राष्ट्रकवि दिनकर की एक कविता याद आ गयी।

वे लोग यह जरूर पढ़ें जो चंद्रायण-3 तक का श्रेय जवाहरलाल नेहरू को भी दे रहे हैं।

वही लोग चीन के हाथों भारत की पराजय का दोषी सिर्फ तब के रक्षा मंत्री वी.केे.कृष्ण मेनन को मानते हैैं।

डा.राममनेाहर लोहिया ने कहा था कि दुनिया की कौन सी कौम है जो अपने सबसे बडे़ देवता यानी महा देव शिव को दूसरे देश में स्थापित करती है ?

उनका आशय कैलास मान सरोवर से था।

...............................

रामधारी सिंह दिनकर ने कभी नेहरू को ‘‘लोक देव नेहरू’’ लिखा था। पर,जब उन्होंने उनकी नाकामयाबी देखी तो निम्न लिखित कविता लिख दी।

तब वे राज्य सभा के सदस्य थे।

इस कविता के बाद उनकी राज्य सभा की सदस्यता का नवीनीकरण नहीं हुआ।

वे भी जानते थे कि इसके बाद नहीं होगा।

दरअसल तब वैसे लोग हमारे बीच कुछ अधिक ही थे जो देश के लिए पद को कुर्बान कर देने के लिए तैयार रहते थे।

पर,आज तो हमारे बीच वैसे लोगों की भरमार है जो पद के लिए राष्ट्र को भी अपूरणीय क्षति पहुंचाने के लिए काम करते रहते हैं।

पता नहीं,इस देश को क्या होगा ?

..............................

  परशुराम की प्रतीक्षा से 

  ...............................

घातक है जो देवता सदृश दिखता है,

लेकिन,कमरे में गलत हुक्म लिखता है,

जिस पापी को गुण नहीं,गोत्र प्यारा है,

समझो,उसने ही हमें यहां मारा है।

...............................

जो सत्य जानकार भी न सत्य कहता है,

जो किसी लोभ के विवश मूक रहता है,

उस कुटिल राजतंत्री कदर्य को धिक् है,

यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं,वधिक है।

.............................

चोरों के जो हेतु ठगों के बल हैं,

जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,

जो छल-प्रपंच ,सबको प्रश्रय देते हैं,

या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं,

यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,

भारत अपने घर में ही हार गया है।

........................

कह दो प्रपंचकारी,कपटी ,जाली से,

आलसी ,अकर्मण्य ,काहिल,हड़ताली से,

सीले जुबान ,चुपचाप काम पर जाये

हम यहां रक्त वे घर में स्वेद बहाये

जो कहो पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में

या आगे सुलगती रही प्रजा के मन में

तमस यदि बढ़ता गया ढकेल प्रभा को

निर्बंध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को

रिपु नहीं,यही अन्याय हमें मारेगा

अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।

    ---रामधारी सिंह दिनकर

..............................

 चीनी हमले के समय के हालात और तब के शीर्ष 

शासन की विफलता, अदूरदर्शिता,अक्षता,

अव्यावहारिकता पर अब दो शब्द। 

...............................

देश के प्रमुख पत्रकार मन मोहन शर्मा के अनुसार,

‘‘एक युद्ध संवाददाता के रूप में मैंने चीन के हमले को कवर किया था।

  मुझे याद है कि हम युद्ध के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे।

 हमारी सेना के पास अस्त्र,शस्त्र की बात छोड़िये,कपड़े तक नहीं थे।

 नेहरू जी ने कभी सोचा ही नहीं था कि 

चीन  हम पर हमला करेगा।

एक दुखद घटना का उल्लेख करूंगा।

अंबाला से 200 सैनिकों को एयर लिफ्ट किया गया था।

उन्होंने सूती कमीजें और निकरें पहन रखी थीं।

उन्हें बोमडीला में एयर ड्राप कर दिया गया

जहां का तापमान माइनस 40 डिग्री था।

वहां पर उन्हें गिराए जाते ही ठंड से सभी बेमौत मर गए।

  युद्ध चल रहा था,मगर हमारा जनरल कौल मैदान छोड़कर दिल्ली आ गया था।

ये नेहरू जी के रिश्तेदार थे।

इसलिए उन्हें बख्श दिया गया।

हेन्डरसन जांच रपट आज तक संसद में पेश करने की किसी सरकार में हिम्मत नहीं हुई।’’

.......................................

नोट-अपनी इस रपट की पुष्टि करने के लिए शर्मा जी अब भी हम लोगों के बीच मौजूद हैं।

हाल तक फेसबुक पर सक्रिय थे।

चीनी हमले से ठीक पहले सेना ने केंद्र सरकार से जरूरी खर्चे के लिए एक करोड़ रुपए की मांग की थी।

पर,केंद्र सरकार ने नहीं दिया।

...........................

सुरेंद्र किशोर

30 अगस्त 23






 देश कहां जा रहा है ?!!

..............................

गठबंधन ‘इंडिया’’ के बैठक स्थल पर 1610 रु.में 

एक प्लेट नाश्ता,485 रुपए में एक कप चाय और 

550 रु.में एक कप काॅफी मिलती है

.........................................

कुछ अन्य राजनीतिक दलों का भी यही हाल है।

आम लोगों से कितना कट चुके हैं हमारे नेतागण ?

...................................

सुरेंद्र किशोर

.................................. 

‘‘इंडिया’’से जुड़े नेता गण आज मुम्बई के ग्रैंड हयात सितारा होटल में बैठक कर रहे हैं।

गरीब देश के इन नेताओं में से अधिकतर अमीर नेता चार्टर्ड विमान से यात्रा किया करते हैं।

अब उस होटल के खर्चे की एक झलक देखिए।

गुगल में जाकर उसका मेनू खोजिए।

पता चलेगा कि वहां एक कप चाय की कीमत 485 रुपए है।

काॅफी की कीमत 550 रुपए और नाश्ता 1610 रुपए में मिलेगा।

होटल के अन्य खर्चों का अनुमान लगा लीजिए।

.......................

अब इधर इस देश की हालत पर जरा गौर कीजिए।

आज के ही अंग्रेजी दैनिक ‘द हिन्दू’ में छपा है कि(यू.एन.रिपोर्ट के अनुसार) भारत के 74 प्रतिशत लोगांे को स्वस्थकर भोजन नसीब नहीं है।

अस्सी करोड़ लोगों को तो केंद्र सरकार लगभग मुफ्त अनाज दे रही है ताकि वे अपने पेट की, अपनी पीठ से दूरी बनाए रखें।   

जो नेतागण मुम्बई में आज बैठक कर रहे हैं ,वे उन्हीं 74 प्रतिशत लोगों के असली प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं।महंगी और गरीबी का रोना रोते हैं।

पिछले कुछ दशकों में देखते -देखते इस देश में नेताओं और आम लोगों के बीच का अंतर कितना अधिक बढ़ गया !!!

मैं तो सन 1966-67 से ही, पहले राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में और बाद में पत्रकार के रूप में सब कुछ देखता-समझता रहा हूं।

हाल के वर्षों में राजनीतिक खर्चों में हुई अपार बढ़ोत्तरी करने में सिर्फ उन्हीं नेताओं का हाथ नहीं है जो आज बैठक कर रहे हैं ।

बल्कि उनका भी थोड़ा-बहुत हाथ है जो आज केंद्र में सरकार चला रहे हैं।थोड़ा-बहुत इसलिए लिखा क्योंकि उन पर अब तक अरबों-करोड़ों रुपए के घोटाले का आरोप नहीं लगे हंै।

उम्मीद की गयी थी कि महाबली प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी राजनीतिक गतिविधियों पर हो रहे अपार खर्चे को अपने प्रभाव से घटाएंगे।पर, निराशा हुई।

वे तो सांसद फंड भी बंद नहीं कर सके जो देश के शासकीय भ्रष्टाचार का रावणी अमृत कुंड है।

याद रहे कि जनसंघ अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय की जब हत्या हुई, तब वे टे्रन मंे अकेले ही यात्रा कर रहे थे।

संभवतः पार्टी पर अपने एक सहयात्री के भी खर्चे का बोझ नहीं डालना चाहते थे उपाध्याय जी।

यदि उनके साथ उस दिन कोई एक व्यक्ति भी रहा होता तो शायद उपाध्याय जी की हत्या नहीं होती।

पर,उस उपाध्याय के मूल्यों को भी अधिकतर भाजपाई भूल गए। 

............................

ये अपार पैसे राजनीति करने वालों के पास आज आते कहां से हैं ?

समान्यतः उन्हीें लोगों के यहां से आते हैं जो लोग इस देश को दोनों हाथों से लूट रहे हैं और जो इस देश को गरीब बनाए रखने के लिए जिम्मेदार  हैं।

अपवादों की बात और है।

..................................

डा.राम मनोहर लोहिया के सादा जीवन और उच्च विचार से प्रभावित होकर छात्र जीवन में ही मैं उनकी पार्टी से जुड़ा था।

डा.लोहिया ने न तो घर बसाया,न मकान बनाया और न ही निजी कार खरीदी।इसके बावजूद देश, राजनीति व समाज पर अपना प्रभाव छोड़ने में उनका अर्थाभाव बाधक नहीं बना।

याद रहे कि आज कई लोग अपनी कमी  छिपाने के लिए कहा करते  हैं कि पैसे के बिना राजनीति आज नहीं होगी।

अधिक दिन नहीं हुए जब माले के महेंद्र प्रसाद सिंह और माकपा के वासुदेव सिंह जैसे नेता अपार पैसे के बिना भी चुनाव जीतते थे।वैसे आज भी देश में कई लोग होंगे।

 याद रहे कि पचास के दशक में पार्टी के महा सचिव के रूप में लोहिया ने अपने दल के विधायकों को लिखा था कि आप  अपना जीवन स्तर नहीं बढ़ाएं ताकि जनता का आपसे लगाव बना रहे।आज तो अनेक नेतागण  बड़ी -बड़ी ए.सी.गाड़ियों के काफिले के साथ जनता के पास जाते हैं तो  आम लोगों में से कुछ को उबकाई आने लगती है।

जो नेता लोग यह कहते हैं तामझाम के साथ जनता के बीच जाने पर ही नेता का प्रभाव बढ़ता है, वे धोखा देते हैं।हां,तामझाम का प्रभाव स्थानीय दलालों व लगुए-भगुए पर जरूर पड़़ता है। 

1967 में जब बिहार में संसोपा यानी लोहिया की पार्टी सत्ता में थी तब एक बार लोहिया दिल्ली से ट्रेन से दिल्ली से भागलपुर आए । 

भागलपुर से स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से दुमका गये।

चाहते तो वे अपने किसी मंत्री से कार का प्रबंध करवा कर उससे दुमका जाते।

दिल्ली में भी डा.लोहिया यदाकदा पैदल ही चलते थे जैसा कि मुझे वरिष्ठत्तम पत्रकार मन मोहन शर्मा ने बताया था।

जब तक लोहिया जी जीवित थे,तब तक मैं भी पार्टी में पूरे मन से रहा।कर्पूरी जी के रहते आधे मन से रहा।पर,अंततः मन उचट गया तो राजनीति का अलविदा करके पत्रकारिता में आ गया।

लोहिया-कर्पूरी का नाम जपने वाले नेता लोग आज क्या कर रहे हैं ?

कर्पूरी जी को तो आम चुनाव में प्रचार के लिए भी कभी एक हेलीकाॅप्टर तक उपलब्ध नहीं हो सका,चार्टर्ड विमान की बात कौन कहे।इसके बावजूद वे दो बार मुख्य मंत्री और एक बार उप मुख्य मंत्री बने।

मुझे तो आज के अधिकतर नेताओं के कारण अगली पीढ़ियों के भविष्य पर भी प्रश्न-चिन्ह लगा प्रतीत होता है।

क्योंकि वे वोट के लिए यानी तात्कालिक उपलब्धि के लिए देश की अनेक मूल व गंभीर समस्याओं की या तो उपेक्षा कर रहे हैं या उन समस्याओं को और अधिक गंभीर बनाने में मददगार बन रहे हैं।

....................................

31 अगस्त 23

.........................

पुनश्चः-इस देश के नेतागण अपना राजनीतिक व व्यक्तिगत खर्च जरूर बढ़ाएं ,पर वह देश के आम लोगों की बढ़ती आय के अनुपात में ही हो। 


मंगलवार, 29 अगस्त 2023

 चर्चित पुस्तक ‘‘आपातकाल एक डायरी’’ से

..........................

26 अगस्त 1975

.............................

सांसदी केस में जब सुप्रीम कोर्ट के जज कृष्णा अय्यर ने  

पी.एम. को (पूरी) राहत नहीं दी तो पी.एम.ने 

जज के आई.ए.एस. साढ़ू को दी गयी राहत तुरंत वापस ले ली

........................................

सुरेंद्र किशोर

.................................

प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के संयुक्त सचिव बिशन टंडन अपनी डायरी (भाग-2) में लिखते हैं

(सुप्रीम कोर्ट के जज कृष्णा अय्यर के साढ़ू )‘‘आई.ए.एस.शंकरण का दिल्ली में टर्म समाप्त हो चुका है।

पर,श्रम मंत्री उसे रखना चाहते हैं।

बोर्ड के सामने मामला गया तो उसने सिफारिश की कि शंकरण को वापस (तमिलनाडु काॅडर) जाना चाहिए।

प्रधान मंत्री ने भी पहले बोर्ड की सिफारिश मान ली।

इतना हो जाने के बाद रजनी पटेल ने प्रधान मंत्री को बताया कि शंकरण जस्टिस कृष्णा अय्यर के साढ़ू है।

 कृष्णा अय्यर की पत्नी की मृत्यु के बाद शंकरण के परिवार से उनको बड़ी सहायता मिलती है।

शंकरण के दिल्ली रहने से कृष्णा अय्यर को बड़ी मदद मिलेगी।

कृष्णा अय्यर प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की स्टे याचिका सुनने वाले थे।(याद रहे कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी की लोक सभा की सदस्यता 12 जून 1975 को रद कर दी थी।)

यह जान कर प्रधान मंत्री ने आदेश दे दिया कि शंकरण श्रम मंत्रालय में (यानी दिल्ली में)रुक सकते हैं।

  पर,उधर जस्टिस कृष्णा अय्यर ने बिना शर्त लगाए स्टे नहीं दिया।(अपने जजमेंट में कह दिया कि प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी सदन की बैठकों में शामिल तो हो सकती हैं,पर,सदन में वह मतदान नहीं कर सकतीं।)

उसके बाद प्रधान मंत्री ने आदेश दे दिया कि ‘‘शंकरण को फौरन वापस जाना चाहिए।’’

................................. 

26 अगस्त 23 


 भिखारी ठाकुर पर किरण कांत वर्मा की पुस्तक पठनीय 

.......................................

सुरेंद्र किशोर

..................................

कवित्त,रंगमंच और सिनेमा से जुड़े किरण कांत वर्मा ने भिखारी ठाकुर की रचनाओं पर एक पुस्तक लिखी है जिसका नाम है--

‘‘कहत भिखारी ठाकुर: पिया गईले कलकतवा।’’

पुस्तक लीक से हट कर लगी,पठनीय भी।

------------

किरण कांत जी की पुस्तक का इसी माह लोकार्पण हुआ।

 मुख्यतः सामाजिक समस्याओं को आधार बना कर लेखन करने वाले भिखारी ठाकुर को राहुल सांकृत्यायन ने ‘‘भोजपुरी का शेेक्सपीयर’’ कहा था।

आई.सी.एस.अधिकारी जगदीशचंद्र माथुर ने भिखारी ठाकुर को ‘‘अनगढ़ हीरा’’ कहा था।

आमलोगों में भिखारी ठाकुर कितना लोकप्रिय थे,उसका विवरण एक ंसंस्मरण के जरिए यहां प्रस्तुत है।

यह संस्मरण मुझे रामदयाल सिंह ने सुनाया था।

   रामदयाल सिंह प्रतिबद्ध समाजवादी नेता थे । 

सन 1977 में भोजपुर जिले के संदेश क्षेत्र से जनता पार्टी के विधायक भी बने थे।

 वे एक दफा राम दयाल बाबू कर्पूरी ठाकुर के साथ उत्तर बिहार से पटना लौट रहे थे।

पहलेजा घाट (सारण जिला)पहुंचने पर उन लोगों को पता चला कि रात का अंतिम स्टीमर जा चुका है।(तब तक गांधी सेतु बना नहीं था।)

 रात में पहलेजा घाट पर पुआल पर दोनों सो गए।

जाड़े की रात थी।

सुबह उठकर कर्पूरी जी शौच के लिए दूर खेत में चले गए।

इस बीच ‘घूरा’ यानी  आग के पास कुछ ग्रामीणों से राम दयाल बाबू बातंे करने लगे।

कर्पूरी जी के प्रति रामदयाल जी के श्रद्धा भाव को देखकर एक ग्रामीण को लगा कि यह जरूर कोई बड़े आदमी हैं।

ग्रामीण- ‘‘इ के बाड़न ?’’

राम दयाल जी-‘‘कर्पूरी ठाकुर हैं।’’

ग्रामीण - ‘‘कहां के हैं और कौन जात हैं ?’’

राम दयाल बाबू-‘‘बिहार के मुख्य मंत्री रह चुके हैं।

हज्जाम में इतना बड़ा व्यक्ति कोई और नहीं हुआ ?’’

ग्रामीण-‘‘भिखारियो ठाकुर से बड़का आदमी़ बाड़न ! ?’’

अब इस पर राम दयाल बाबू क्या बोलते !

 वैसे भी तब तक कर्पूरी जी पास आते दिखाई पड़ गए थे। 

.........................................

‘कहत भिखारी ठाकुर -पिया गईले कलकतवा’

लेखक-किरण कांत वर्मा

मो.-9934604362

........................................  

29 अगस्त 23


                               

 


सोमवार, 28 अगस्त 2023

 नीतीश कुमार के अंध विरोधी गण ! 

इस पोस्ट के 

लिए कृपया मुझे माफ कर दीजिएगा 

.................................

सुरेंद्र किशोर

..............................

यदि नरेंद्र मोदी विरोधी गठबंधन नीतीश कुमार को राष्ट्रीय संयोजक बना दे तो एनडीए के खिलाफ ‘‘इंडिया’’ के चुनावी अभियान में गंभीरता आ   जाएगी।

  (अन्यथा,‘‘इंडिया’’सी.बी.आई.-ई.डी.झेल रहे नेताओं का गठजोड़ मात्र बन कर रह जाएगा जिसके भावी नेता जनता में राहुल गांधी माने जा सकते हैं।

वह भाजपा के लिए अत्यंत अनुकूल स्थिति होगी।)

 कम से कम तीन मामलांे में नीतीश कुमार ,नरेंद्र मोदी की बराबरी करने की स्थिति में हैं।

वे हैं रुपए-पैसों के मामलों में व्यक्तिगत ईमानदारी, परिवारवाद-वंशवाद से दूरी तथा आम विकास को लेकर कल्पनाशीलता।

नीतीश कुमार के अलावा ‘‘इंडिया’’ का कोई भी अन्य नेता,जो पी.एम.पद का घोषित या अघोषित उम्मीदवार है, अपने विवादास्पद कैरियर के कारण, नरेंद्र मोदी के मुकाबले हल्का ही साबित होगा।चुनाव में गंभीरता आ जाने पर वोट बैंक के बाहर वाले मतदाताओं को निर्णय करने में सुविधा हो जाती है।

..............................

नीतीश कुमार के बावजूद ‘‘इंडिया’’ सन 2024 के लोस चुनाव में विजयी ही हो जाएगा,यह भविष्यवाणी करने की स्थिति अभी नहीं है।

वैसे तमाम चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के अनुसार तो , कुल मिलाकर अभी  नरेंद्र मोदी का ही ‘अपर हैंड’ लगता है।

आजकल चुनाव पूर्व सर्वेक्षण पहले की अपेक्षा अधिक सही साबित हो रहे हैं।जिन्हें मेरी इस बात में शक हो ,वे हाल के वर्षों के सर्वेक्षणों के आंकड़े निकाल कर देख लें।

...........................

बिहार में 2024 के चुनाव में क्या होगा ?

यदि सिर्फ ‘गणित’ काम करेगा तब तो यहां ‘‘इंडिया’’ का पलड़ा भारी रहेगा।

पर,साथ-साथ यदि ‘रसायन’ भी काम कर गया तब तो कुछ भी रिजल्ट संभव है।

फिलहाल दो संकेतक, हम  विश्लेषणकर्ताओं को राह दिखाते हैं।

हाल में बिहार के गोपालगंज और कुढ़हनी विधान सभा उप चुनावों में भाजपा जीत गयी।

मोकामा में हार गयी ।पर,वह तो बिहार का एक विशेष क्षेत्र है।वहां कोई सामान्य फार्मूला लागू नहीं होता।

..............................

गत साल उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ और रामपुर में लोक सभा उप चुनाव हुए।

दोनों सपा की सीटंे थीं।

दोनों में इस बार एनडीए जीत गया।

सुना कि वहां ‘रसायन’ काम कर गया।

...........................

वैसे अभी सन 2024 के चुनाव में महीनों की देर है।

अभी का कोई भी पूर्वानुमान अंततः अधकचरा साबित हो सकता है।

क्योंकि पता नहीं, कल देश-प्रदेश में क्या होगा ?

..........................

27 अगस्त 23

 


रविवार, 27 अगस्त 2023

 बांग्ला देश युद्ध और चंद्रायण-3 अभियान 

के दौरान इंदिरा और मोदी का फर्क

..................................

सुरेंद्र किशोर

.............................

बांग्ला देश युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने क्या किया ?

चंद्रायण -3 के सफल अभियान के बाद प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने क्या किया ?

इन दोनों घटनाओं में फर्क आपको इंदिरा और मोदी का अंतर बता देंगे।

................................

नरेंद्र मोदी बेंगलुरू पहुंच कर इसरो के वैज्ञानिकों से कहा कि ‘‘मैं जल्द से जल्द आपके दर्शन कर आपको नमन करना चाहता था।’’

.......................

दूसरी ओर, बांग्ला देश विजय के बाद तीन दिग्गजों में श्रेय लेने की होड़ मच गयी थी।

प्रधान मंत्री और रक्षा मंत्री उस विजय के लिए सेना प्रमुख मानेक शाॅ को तनिक भी श्रेय देने को तैयार नहीं हुए।

इंदिरा गांधी को उनकी पार्टी ने ‘दुर्गा’ की उपाधि दे दी।साथ ही, इंदिरा सरकार ने इंदिरा गांधी को भारत रत्न दे दिया।

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

जनरल मानेक शाॅ को कुछ नहीं मिला तो वे नाराज हुए।बाद में उन्हें फिल्ड मार्शल बनाकर संतुष्ट करना पड़ा।

हां,रक्षा मंत्री जगजीवन राम तो असंतुष्ट ही रहे।

.............................

पूरी कहानी

..........................

 बांग्ला देश को लेकर भारत-पाक युद्ध में भारत की विजय का श्रेय देने के सवाल पर तब के तीन महा रथियों के बीच अच्छी -खासी खींचतान चली थी।

आंध्र प्रदेश से एक कांग्रेसी सासंद ने प्रधान मंत्री को ‘दुर्गा’ कहा था। अधिकतर सत्ताधारी नेता गण तो पूरा श्रेय तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को ही दे रहे थे।

 पर रक्षा मंत्री जगजीवन राम और सेना प्रमुख मानेक शाॅ इसे मानने को तैयार नहीं थे।

युद्ध में विजय के बाद जब इंदिरा गांधी को ‘भारत रत्न’ से अलंकृत  किया गया तो सेना में प्रतिक्रिया हुई।

उसे शांत करने के लिए सेना प्रमुख सैम मानिक शाॅ को ‘फील्ड मार्शल’ का ओहदा दिया गया।

  बंाग्ला देश युद्ध के बाद एक खेमे की ओर से यह सवाल भी उठाया गया  कि सन 1962 में  चीन से शर्मनाक पराजय के लिए इस देश के रक्षा मंत्री वी.के.कृष्ण मेनन जिम्मेदार थे,प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू नहीं, तो

 पाकिस्तान पर जीत के लिए प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को श्रेय क्यों दिया जाना चाहिए ?

 उधर रक्षा मंत्री जगजीवन राम कुछ कारणवश मानिक शाॅ से नाराज रहा करते थे। 

 अब इस संबंध में तत्कालीन रक्षा मंत्री जग जीवन राम ने 1977 में कहा था कि 

 ‘‘1971 के युद्ध में भारत की विजय का बड़ा कारण यह था कि सेना के तीनों अंगों का सही और परस्पर पूरक सह कार्य और रक्षा सामग्री के उत्पादन से लेकर हर मोर्चे पर मेरा स्वयं जाकर सेना का हौसला बढ़ाना।

इसके अतिरिक्त निदेशन में सामंजस्य होना भी एक महत्व की बात थी।’’

इसके विपरीत बांग्ला देश युद्ध के समय भारतीय सेनाध्यक्ष   मानिक  शाॅ ने सन 1974 में लंदन में साफ- साफ कह दिया था कि ‘‘अगर मैं उस युद्ध में पाकिस्तान का सेनाध्यक्ष होता तो विजय पाकिस्तान की ही होती।’’

  मानिक  शाॅ की इस गर्वोक्ति पर  जगजीवन राम की टिप्पणी महत्वपूर्ण थी।

उन्होंने कहा कि ‘‘मैं शाॅ को नकली फील्ड मार्शल मानता हूं।वह इस योग्य नहीं थे।’’

जगजीवन राम को युद्ध के लिए अपनी तैयारी पर पूरा विश्वास था।उन्होंने कहा कि ‘‘उस युद्ध को तो जीता ही जाना था भले ही जनरल कोई और होता। क्योंकि हमने तैयारी ही इतनी अधिक कर ली थी।’’

  उनकी यह भी राय थी कि यदि किन्हीं प्रकार के दबाव में आकर किसी को फील्ड मार्शल बना दिया जाए ,तोभी वह नकली फील्ड मार्शल ही होगा।

मानेक शाॅ पैरवी और खुशामद से फील्ड मार्शल बने थे।

जगजीवन बाबू की स्पष्ट राय थी कि उस समय जो भी सेनाध्यक्ष होता, वही युद्ध जीतता भले ही वह इस योग्य नहीं होता।

   उन्होंने यह भी कहा कि प्रजातांत्रिक प्रणाली में जिस ढंग से निर्णय किये जाते हैं,उसके अंतर्गत विजय का श्रेय किसी व्यक्ति विशेष को नहीं दिया जा सकता।

   लगता है कि जगजीवन बाबू इस बात से सहमत नहीं थे कि बंाग्ला देश युद्ध में विजय का सारा श्रेय इंदिरा गांधी को दिया जाए।

  मानेक शाॅ के बारे में बात होने पर जगजीवन राम तीखे हो जाते थे।

 उन्होंने  कहा था कि वे तीनों सेना प्रमुखों में से खुद को सर्वोच्च दिखाने की कोशिश करते 

थे,लेकिन हो नहीं सके।

  नीति निर्धारण समिति की बैठकों मंे कई बार मानेक शाॅ अन्य दोनों सेनाध्यक्षों की बातों का विरोध करते थे ।

 उनके बीच खुद को सर्वोच्च दिखाने की कोशिश करते थे।पर,हम इस मान्यता के नहीं रहे कि तीनों सेनाओं का एक अध्यक्ष हो।

  यह पूछे जाने पर कि क्या कभी आपसे उनका नीतिगत मतभेद रहा ,उन्होंने कहा कि ऐसा साहस वह नहीं कर सकते थे।

वैसे उनकी ख्वाहिश मनमानी करने की भी रहती थी,पर वे कर नहीं सकते थे। 

मानेक शाॅ की राय भी कुछ नेताओं के बारे में बहुत खराब थी।

मानेक शाॅ ने एक बार कहा था कि ‘‘मुझे शक है कि उस नेता को मोर्टार और मोटर के बीच के फर्क का पता तक नहीं होगा जिसे देश का रक्षा मंत्री बना दिया जाता है।’’

  मानिक शाॅ बांग्ला देश युद्ध में विजय का श्रेय भी  प्रधान मंत्री या रक्षा मंत्री देने के बदले खुद ही लेना चाहते थे। 

 मानिक शाॅ ने बाद मेें कहा कि भारतीय फौज की जीत का खांका मैंने खींचा था।

याद रहे कि मानिक शाॅ पांच युद्धों में हिस्सा ले चुके थे।मानिक शाॅ ने बंगला देश संकट के शुरूआती दौर में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में  प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से साफ -साफ कह दिया था कि हमारी सेना अभी युद्ध के लिए तैयार नहीं है।प्रधान मंत्री को यह बुरा लगा था।

................................

27 अगस्त 23

    


बुधवार, 23 अगस्त 2023

 कितने दूरदर्शी थे आजादी के तत्काल 

बाद वाले हमारे हुक्मरान ?

...............................................

सुरेंद्र किशोर

....................................

पीपल 

.............

  पर्यावरण विशेषज्ञ बताते हैं कि जहां हर पांच सौ मीटर की दूरी पर पीपल का एक वृक्ष हो, आॅक्सीजन की वहां कोई कमी नहीं रहेगी।

स्कंद पुराण में एक श्लोक है जिसका अर्थ है--

‘‘एक पीपल, एक नीम, एक वट वृक्ष ,दस इमली, तीन खैर, तीन बेल, तीन आंवला और पांच आम का वृक्ष लगाने वालों को नरक का मुंह नहीं देखना पड़ता है।’’

  ध्यान दीजिए, यहां भी पहला नाम पीपल का ही है।

 यदि आजादी के तत्काल बाद से ही केंद्र व राज्य सरकारें पीपल का पौधरोपण करवातीं तो हमारे यहां पर्यावरण असंतुलन की समस्या ही नहीं रहती।

  कुछ ही साल पहले बिहार सरकार ने अपने साधनों से पीपल के पौधे लगवाने शुरू किए हैं।

यहां भी सरकारी स्तर से पहले यह काम नहीं होता था।

.....................................

इसी गुण के कारण परंपरागत विवेक वाले इस देश के लोग पीपल की पूजा करते रहे।

आजादी के तत्काल बाद वाली सरकारों ने संभवतः यह सोचा होगा कि सरकारी खर्चे पर जगह -जगह पीपल वृक्ष यानी पूजा स्थल बनाना धर्म निरपेक्षता के खिलाफ काम होगा।

...................................

गंगा नदी

..................

गंगा नदी में ऐसे औषधीय और बैक्टेरिया रोधी गुण हैं जो दुनिया की किसी अन्य नदी के जल में नहीं है।

इसीलिए लोग गंगा को मां कहते हैं।

सन 1955-56 में मैं गांव से अपने परिजन के साथ दिघवारा के पास गंगा स्नान करने जाता था।

नदी में घुटना भर पानी में भी मेरे पैर की अंगुलियां साफ-साफ नजर आती थी।

यानी,तब तक पानी इतना स्वच्छ और निर्मल था।

विदेशी शासकों ने भी गंगा को प्रदूषित नहीं किया था। 

कहीं मैंने पढ़ा था कि बादशाह अकबर गंगा नदी का पानी ही मंगवाकर रोज पीता था।

पर,आजादी के बाद की सरकार ने तरह -तरह के ‘उपायों’ से गंगा नदी को इतना प्रदूषित कर दिया है कि अब तो कई जगह उसे छूने से भी रोग पनपने का खतरा है।

गंगा को स्वच्छ करने वाले अब तक के सारे सरकारी उपाय भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं।

यदि आजादी के तत्काल बाद की सरकार गंगा की स्वच्छता-निर्मलता-अविरलता बनाए रखने की कोशिश करती तो उसकी धर्म निरपेक्षा छवि को शायद नुकसान पहुंचता।

..............................

गाय

...............

देसी गाय के दूध में औषधीय गुण है जो हाइब्रिड गायों में नहीं है।

गाय की इसीलिए पूजा होती है।

बचपन में मैंने देखा है कि जब मेरे घर की गाय मरती थी तो 

मेरी मां उसी तरह रोती थी तानो परिवार का कोई सदस्य मर गया हो।  

पर,ऐसी स्थिति पैदा कर दी गयी कि देसी गाय की संख्या कम होने लगी।

............................

जैविक खाद

.......................

मैं बचपन में गोबर खाद से उपजाए गए गेहूं के छोटे -छोटे दानों से बनी रोटी खाता था।

उस रोटी में जो  मिठास थी,वह बाद की ‘हरित क्रांति’ वाले गेहूं में तो कत्तई नहीं।

उधर रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं से मिट्टी भी खराब हो रही है।

साथ ही, उसके जरिए उपजे अनाज और आलू वगैरह में आर्सेनिक पाया जाने लगा है।

पंजाब में रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं का सर्वाधिक इस्तेमाल होता है।

वहां की मिट्टी खराब हो रही है।भूजल आर्सेनिक युक्त हो रहा है।

काफी पहले मैंने इंडियन एक्सप्रेस में पढ़ा था कि रासायनिक खाद-दवां के दुष्प्रभाव से अनेक लोग गांव छोड़ रहे है।अखबार के संवाददाता ने पंजाब के कुछ गांवों का भ्रमण कर रिर्पोटिंग की थी।

.........................

भटिंडा-बिकानेर ट्रेन को बोलचाल में ‘कैंसर मेल’ कहा जाने लगा है।उस ट्रेन में 40 प्रतिशत कैंसर मरीज होते हैं।

बिकानेर में आचार्य तुलसी के नाम पर एक कैसर अस्पताल है जिसमें मुफ्त चिकित्सा होती है।

......................

पूरे देश में अब जैविक खेती की होड़ शुरू हुई है।

पर,मांग के अनुपात में आपूर्ति बहुत कम है।

साथ ही, जैविक उत्पाद काफी महंगा है।

सरकारों को चाहिए कि वे उस पर सब्सिडी दें।

जिसने दर्द दिया,वही तो दवा देगा !! 

  ......................

23 अगस्त 23

 




 


सोमवार, 21 अगस्त 2023

 हर चुनाव में दलों व उम्मीदवारों की ही नहीं,

बल्कि मीडिया की भी परीक्षा हो जाती है

-----------

सुरेंद्र किशोर

..................................

इस देश में हर चुनाव के समय मीडियाकमियों की भी अघोषित परीक्षा हो जाती है।

लोगबाग जान जाते हैं कि कौन कितना निष्पक्ष है और कौन नहीं है।

अगले कुछ महीनों तक देश में चुनाव का ही गर्मागर्म माहौल रहेगा।

इसमें मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ी हुई रहेगी।

उम्मीद है कि मीडिया का अधिकांश इस परीक्षा में खरा उतरेगा।

.........................................

मीडिया के किसी अभियान का चुनाव नतीजे पर निर्णायक असर नहीं पड़ता,ऐसा मैंने पिछले कई दशकों से देखा-समझा है।

.....................

कुछ कारणवश सन 1971 के लोक सभा चुनाव के समय अपवादों को छोड़कर मीडिया का अधिकांश 

प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ था।

इसके बावजूद इंदिरा गांधी की पार्टी जीत गयी।

...........................

1977 के लोक सभा चुनाव से ठीक पहले तक मीडिया इंदिरा गांधी के पक्ष में था।

यूं कहिए कि इमरजेंसी के कारण उसका गला दबा दिया गया था।

चुनाव की घोषणा के बाद कुछ खुलापन आया।

पर,इमरजेंसी के आतंक का असर फिर भी मीडिया पर था।

इसके बावजूद इंदिरा गांधी का पार्टी बुरी तरह हार कर सत्ता से बाहर हो गयी।

..............................

सन 1995 के बिहार विधान सभा के चुनाव के समय बिहार क्या देश का मीडिया मुख्य मंत्री लालू प्रसाद के सख्त खिलाफ था।

मंडल आरक्षण का भी असर था।

जहां तक मुझे याद है कि सिर्फ सुरेंद्र प्रताप ंिसंह ने द टेलिग्राफ में साफ-साफ लिखा कि लालू प्रसाद दुबारा सत्ता में आ रहे हैं।

आए भी।

.......................................

जब मीडिया का जब चुनाव नतीजे पर सीमित असर है तो काहे को अपनी साख को दंाव पर लगाया जाए !!!

....................................

पैसे,जाति,विचार धारा तथा अन्य दृश्य-अदृश्य बंधनों के हाथों कुछ मजबूर लोगों को छोड़कर मीडिया के बाकी लोग यानी अधिकांश भरसक अगले चुनाव की वस्तुपरक रिपोर्टिंग करके अपनी साख बढ़ाएं या कायम रखें,मेरी तो यही सलाह रहेगी।

................................

सन 1984 के लोक सभा चुनाव के समय एक राष्ट्रीय अखबार के कर्ताधर्ता ने अपने संवादाताओं को यह संदेश भिजवा दिया कि कांगेस को 

हरवा दो।

यानी,ऐसी रिपोर्टिंग करो कि लगे कि कांग्रेस जीतने वाली नहीं है।

पर,कांग्रेस की अभूतपूर्व जीत हो गयी।

दूसरी ओर, वह अखबार ही हार गया।

उसका प्रसार इतना घटने लगा कि 

फिर वह उठ नहीं सका।

....................................   

20 अगस्त 23


रविवार, 20 अगस्त 2023

 अभियान चले अति-भोजन के खिलाफ

------------------

सुरेंद्र किशोर

........................

मैंने अनेक लोगों को अति भोजन और अनुचित भोजन करके असमय

बीमार होकर मरते देखा है।

इससे न सिर्फ सार्वजनिक स्वास्थ्य-व्यवस्था पर बोझ बढ़ता है बल्कि 

जो परिवार असमय अपना प्रिय खो देता है,उसकी स्थिति भी खराब हो जाती है।

.......................................

हमारे ऋषि -मुनियों ने इस संबंध में सूत्र दे रखा है-

गांव में हमारे बड़े-बुजुर्ग इसे यदाकदा दुहराते थे।

पर,एकल परिवार के इस युग में बुजुर्ग तो पुराने रेडियो सेट की तरह एक कोने में रख दिए गए हैं।

नयी पीढ़ी खुद को बहुत ‘समझदार’ समझती है।उसे किसी की सलाह की कोई जरुरत नहीं।

.................................

ऐसे में सरकारें ही यह काम करें।

सरकार ने स्वच्छता अभियान चलाया।

लोगों से यह भी अपील की कि वे खुले में शौच न जाएं।आदि आदि।

उसी तरह अति भोजन के खिलाफ वे अभियान चलाएं।

...........................

हित् भुक्

मित भुक्

ऋत भूक् 

......................

यानी, जो व्यक्ति शरीर के लिए हितकारी भोजन ले,

भूख से कम खाए और

मौसम के अनुसार ही भोजन करे ,

वह व्यक्ति ही नीरोग रह सकता है।

....................................

इस देश के कई लोकप्रिय नेताओं ने मांस-मदिरा आदि(आदि को लेकर आप अपने अनुमान के घोड़े दौड़ा सकते हैं।) के चक्कर में खुद के स्वास्थ्य को बर्बाद कर लिया।

यह भी नहीं सोचा कि उसके न रहने पर उसके प्रशंसकों-समर्थकों की क्या हालत होगी।

20 अगस्त 23

........................................

पुनश्चः,

मैंने कई मीडिया कर्मियों से कहा कि आप नब्बे साल से अधिक उम्र के लोगों का इंटरव्यू करिए।

उनसे पूछिए कि वे किस तरह का संयम रखते हैं।

यदि उनके भोजन आदि का प्रचार हो तो वह जनहित में होगा। क्योंकि उससे जो प्रेरणा लेना चाहेगा,वह लेकर खुद भी स्वस्थ और दीर्घायु रह सकेगा।

..........................

पर,आज के युग में कौन किसकी सलाह मानता-सुनता है !!! 


बुधवार, 16 अगस्त 2023

 किसी बेहतर छवि के नेता को ‘‘इंडिया’’ 

का संयोजक बनाने में हिचक क्यों ?

...................

इसका कारण कई लोग बताने लगे हंै

......................

सुरेंद्र किशोर

.......................

क्या भाजपा विरोधी दलों को सन 2024 के चुनाव के बाद ऐसा प्रधान मंत्री चाहिए जो सरकार बनते ही भ्रष्टाचार के सारे मुकदमे उठवा ले ?

याद रहे कि भाजपा विरोधी 8 दलों के 32 नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार

 के गंभीर आरोपों के तहत मुकदमे चल रहे हैं।  

उनमें से किसी को अदालत से राहत नहीं मिल रही है।

.....................

कांग्रेस समर्थन वापस लेने के लिए मजबूर हो गयी थी जब प्रधान मंत्री चरण सिंह (1979)और प्रधान मंत्री चंद्र शेखर(1990) ने गांधी परिवार के विरुद्ध जारी  मुकदमे वापस लेने से इनकार कर दिया था

.................................

कहीं प्रधान मंत्री बनने के बाद कोई ईमानदार नेता ‘‘चरण सिंह और चंद्र

शेखर की कहानी’’ दुहराने लगे तो क्या होगा ?

इसलिए लगता है कि ‘‘इंडिया’’ को या तो कोई दूसरा मनमोहन सिंह चाहिए जिन्होंने अपने शासन काल में लाखों करोड़ रुपए के घोटाले होने दिए थे।

या फिर खुद इंदिरा गांधी की तरह कोई ‘‘आयरन हस्ती’’ चाहिए जिन्होंने मुकदमे के परिणाम से बचने के लिए 1975 में इमरजेंसी लगा दी थी।

.....................................

मोदी विरोधी यानी एन.डी.ए.विरोधी गठबंधन ‘‘इंडिया’’ यह योजना बना रहा है कि वह 450 लोक सभा क्षेत्रों में राजग के खिलाफ कोई एक ही उम्मीदवार उतारेगा।

 इससे राजग की गत चुनाव की अपेक्षा इस बार सौ सीटें कम हो जाएंगी।

फिर तो ‘‘इंडिया’’ की सरकार बन जाएगी।

सारे आपसी मतभेद और पुराने शिकवे शिकायत भुलाकर राजग विरोधी दलों ने मुख्यतःएक ही उद्देश्य से ‘इंडिया’का गठन किया है।

बड़े -बडे़ प्रतिपक्षी नेताओं को उन गंभीर प्रकृति के मुकदमों में होने वाली सजा से बचाना है।

यदि मोदी तीसरी बार सत्ता में आ गए तो उन नेताओं के कैरियर पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे।बची-खुची संपति भी जब्त हो जाएगी।

.....................................

पर,इंडिया के सामने यक्ष प्रश्न है कि किस ऐसे ‘‘अति साहसी’’ नेता को प्रधान मंत्री बनाया जाए जो जरुरत पड़े तो देश में एक बार फिर इमरजेंसी लगा कर भी हमें मुकदमों से बचा ले।

इस पृष्ठभूमि में ‘‘इंडिया’’ के वैसे नेता का भविष्य अनिश्चित हो गया है जो ऐसे मामले में ‘‘कम साहसी’’ रहे हैं।

......................................

ऊपर लिखी बातें गठबंधन ‘‘इंडिया’’

के सूत्रों से मिली जानकारियों या काॅमन सेंस के आधार पर लिखी गयी हैं।

चुनाव में जाने वाला कोई भी गठबंधन यह नहीं कहता कि हम सत्ता में नहीं आएंगे।

उसी तरह राजग कैसे कहेगा कि हम सत्ता से इस बार दूर हो जाएंगे जबकि उसके पास नरेंद्र मोदी जैसे अत्यंत लोक्िरपय नेता हंै।

.......................................

हाल के जनमत संग्रहों के नतीजे तो मोदी के ही पक्ष में हैं।

आज कल जनमत संग्रह के नतीजे आम तौर पर सही ही साबित होते रहे हैं।

पर, अभी तो अगले कई महीनों में पता नहीं क्या-क्या होने वाला है और उसका किस गठबंधन पर कैसा नतीजा होने वाला है।

-------------

16 अगस्त 23

   


सोमवार, 14 अगस्त 2023

  रणदीप सुरजेवाला के ताजा बोल इंदिरा 

 गांधी की इमरजेंसी मानसिकता का ही विस्तार

 .....................................

सुरेंद्र किशोर

............................

आज करोड़ों लोगों को राक्षसी प्रवृति वाला बताने

और आपातकाल में लाख से अधिक लोगों को जेलों 

में बंद कर देने में कितना फर्क है ?

..........................................

तब की प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने तब के अपने राजनीतिक विरोधियों को विघटनकारी कहा था।

सुरजेवाला राक्षसी प्रवृति वाला बता रहे हैं।

राक्षसी प्रवृति वाले अधिक सजा के हकदार है या विघटनकारी ? 

    .................................. 

5 सितंबर, 1918 को रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि ‘‘कांग्रेस ऐसी पार्टी है जिसके खून में ब्राह्मण समाज का डी.एन.ए.है।’’

.......................

चूंकि खुद सुरजेवाला ब्राह्मण समाज से आते हें,इसलिए वे समझते हैं कि उन्हें श्राप या वरदान देने का पूरा अधिकार है। 

........................

14 अगस्त, 23 को उसी कुरुक्षेत्र की धरती से रणदीप सुरजेवाला ने जन सभा में उन लोगों को श्राप दिया जो भाजपा के समर्थक हैं या मतदाता हैं।

उन्होंने कहा कि भाजपा के समर्थक और मतदाता राक्षसी प्रवृति के हैं।

........................

ब्राह्मण डी.एन.ए.वाले बयान पर कांग्रेस हाईकमान ने सुरजेवाला के खिलाफ कुछ नहीं कहा।

दरअसल सुरजेवाला हाईकमान के बहुत करीबी हैं।माना जाता है कि वे हाईकमान की इच्छा को ही अभिव्यक्त करते रहते हैं।

...............................

अभी तो सुरजेवाला का दल केंद्र की सत्ता में नहीं हैं।

जिस दिन उनकी पार्टी कांग्रेस, केंद्र में सत्ता में आ जाएगी तो राक्षसी प्रवृति वाले लोगों को वह क्या दंड देगी ?

.............................

1975-77 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने क्या दंड दिया था ?

एक लाख से अधिक लोगों को अदालती सुनवाई की सुविधा से वंचित करके जेलों में डाल दिया था।

 पूरे देश को एक बड़े जेलखाने में परिवर्तित कर दिया था।

25 जून 1975 को इमर्जेंसी की घोषणा के साथ इंदिरा गांधी ने यह भी कहा था कि देश में ‘‘विधटनकारी तत्व पूर्ण रूप से सक्रिय हैं।साम्प्रदायिक भावनाएं उभारी जा रही है।’’

........................

उसी इमरजेंसी वाली प्रवृति से प्रेरित होकर सुरजेवाला ने आज कहा है कि भाजपा के वोटर और समर्थक राक्षसी प्रवृति के हंै।

................................

भाजपा के वोटरों और समर्थकों की संख्या करोड़ों में है।क्या इतने अधिक लोग आज राक्षसी प्रवृति के हैं ?

प्राचीन ग्रंथों के राक्षस जो -जो काम करते थे ,क्या वही सब काम आज भाजपा के करोड़ों वोटर और समर्थक कर रहे हैं ?

.................................

इंदिरा गांधी ने 1975 में जिन्हें विघटनकारी कहा था ,उनकी संख्या कितनी थी जो पुलिस-सेना आदि के कंट्रेाल में नहीं आ सकते थे ?

............................

दरअसल दोनों अवसरों पर मूल कारण दूसरे रहे।

  बहाना कुछ और बनाया गया।

1975 में इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का जो जजमेंट आया था ,उससे पार पाने के लिए इमरजेंसी लगाना उनके लिए जरूरी हो गया था।

.................................

आज सोनिया-राहुल-राबर्ट वाड्रा के खिलाफ जो गंभीर मुकदमे चल रहे हैं,उनसे निजात पाना सामान्य दिनों में असंभव काम है।

क्योंकि कोर्ट एक हद से अधिक इस परिवार की मदद नहीं कर सकता है।

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

क्या सुरजेवाला को यह लगता है कि उनका ‘इंडिया’ गठबंधन 2024 के लोकसभा के चुनाव में जीत कर केंद्र की सत्ता में आ जाएगा ?

क्या भावी कांग्रेस नीत सरकार इमरजेंसी जैसा कोई काम करेगी जो काम इंदिरा गांधी ने 1975 में किया था ?

इंमरजंेसी लगाने से कई महीने पहले इंदिरा गांधी ने जेपी पर ऐसा आरोप लगाया था जिस तरह का आरोप उस संत के खिलाफ उससे पहले या बाद में किसी ने नहीं लगाया था।

यानी, इंदिरा जी का उद्देश्य था कि जेपी और उनके समर्थकों को पहले बदनाम कर दिया जाए और बाद में इमरजेंसी लगा दी जाए।

............................

क्या सुरजेवाला भाजपा समर्थकों को राक्षस कह कर उसी उद्देश्य से पहले से ही उन्हें बदनाम कर रहे हैं ?

इंदिरा गांधी के शब्द विधटनकारी से अधिक कड़ा शब्द राक्षसी प्रवृति है।

इंदिरा गाधी के खिलाफ 1975 वाला जजमेंट जितना नुकसानदेह था,उससे अधिक नुकसान देह उन मुकदमों के फाइनल नतीजे होंगे जो सोनिया-राहुल-वाड्रा पर चल रहे हैं।

इसलिए शब्द भी उसी अनुपात में अधिक कटु हंै।

....................................

14 अगस्त 23

  

ं 


  

 


शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

 भूली-बिसरी यादें 

..................................

15 अप्रैल, 1980 को सीताराम केसरी के साथ 

कांग्रेस सांसद संजय गांधी पटना में थे 

--------

दैनिक ‘आज’ के लिए मैंने उनके पत्रकार सम्मेलन 

की रिपोर्टिंग भेंटवार्ता की तरह की थी !

यानी लीक से थोड़ा हटकर।

......................................

सुरेंद्र किशोर

.....................

चर्चित कांग्रेस नेता संजय गांधी ने उस दिन अन्य बातों के अलावा यह भी कहा था कि ‘‘जार्ज फर्नांडिस को पुल उड़ाने के अलावा और क्या आता है ?’’

(याद रहे कि इमरजेंसी में जार्ज और उनके साथियों के खिलाफ यह केस चलाया गया था कि वे डायनामाइट से पुल उड़ा रहे थे।)

..............................

सन 1980 के लोक सभा चुनाव के बाद इंदिरा गांधी सत्ता में आ चुकी थीं।

बिहार में विधान सभा का चुनाव होने वाला था।

संजय गांधी राज्यों का दौरा कर रहे थे।कांग्रेस के पक्ष में हवा थी।

इंदिरा गांधी के बाद कांग्रेस के वे सर्वाधिक ताकवर नेता थे।

मुख्य मंत्री और केंद्रीय मंत्री स्तर के नेता उनके लिए कुर्सी उठाकर लाते थे तो कोई उनकी चच्पल उठाकर उनके पांव तक पहुंचाता था।

उनके प्रेस कांफे्रंस को कवर करना भी अपने आप में एक अलग ढंग का अनुभव होता था।

मेरेे लिए तो विशेष अनुभव था क्योंकि बड़ौदा डायनामाइट केस में मुझे भी सी.बी.आई.खोज रही थी।हालंाकि जनता पार्टी के शासन काल में उस केस को उठा लिया गया था।

खैर,पत्रकार सम्मेलन में उनसे हुई बतचीत का पूरा विवरण यहां प्रस्तुत है--

याद रहे कि सवाल -जवाब के रूप में लिखे मेरे विवरण के छपने के बाद कोई खंडन नहीं आया था।

 उसे लिखने में मुझे विश्ेाष सावधानी और एकाग्रता रखनी पड़ी थी।

क्योंकि मैं शाॅर्ट हैंड राइंिटग नहीं जानता था।

उन दिनों मैंने अन्य बड़े नेताओं के प्रेस कांफ्रेंस की रिपोर्टिग भी इसी तर्ज पर की थी।लोगों से सराहना मिली थी।

............................

प्रश्न-आपकी बिहार यात्रा कैसी रही ?

संजय गांधी--बहुत अच्छी। 

प्रश्न--कल (पटना)हवाई अड्डे पर जो उपद्रव हुए ,उनमें किन लोगों का हाथ हो सकता है ?

संजय गांधी-कोई ऐसे वैसे लोग नहीं थे।

भीड़ बहुत थी।

इसलिए अनियंत्रित हो गयी।

प्रश्न-प्रधान मंत्री पर हमले के पीछे किनका हाथ था ?

सं.गां.--मैं तो दिल्ली में नहीं था।

जांच चल रही है।

निराश लोगों का ही यह काम हो सकता है।

प्रश्न-विधान सभा के चुनाव मं इंदिरा कांग्रेस का क्या भविष्य है ?

संगां-बहुत अच्छा।

प्रश्न-चुनाव में किस तरह के लोगों को टिकट मिलेगा ?

सं.गां.-पिछले तीन वषो्रं में जो लोग पूर्ण वफादारी से पार्टी के साथ रहे हैं,जो जेल गये है,और  जिनकी जीत की संभावना होगी।

 जो लोग इस अवधि में हमारा विरोध करते रहे हैं,उन्हें टिकट नहीं मिलेगा।

प्रश्न-क्या विधायक दल को नेता कोई बाहरी व्यक्ति भी हो कसता है ?

सं.गां.-इसके लिए कानून में कोई पाबंदी नहीं है।

कर्पूरी जी और श्री रामनरेश यादव तो बाहरी व्यक्ति ही थे।(यानी लोक सभा के सदस्य थे।)

प्रश्न-कुछ लोग कहते हैं कि सरकार को चलाने में आपकी सक्रिय भूमिका है।

सं.गंा.-कौन कहता है ?

उसका नाम तो बताएं।

सिर्फ अखबार वाले कहते हैं।

प्रश्न-जार्ज फर्नांउिस कहते हैं।

सं.गां.-उन्हें पुल उड़ाने के अलावा और क्या आता हे ?

वे सरकार चलाना क्या जानें ?

प्रश्न-आप संगठन का ही काम देखेंगे या सरकार में भी शामिल होंगे ?

सं.गां.-क्या यह मेरी इच्छा पर निर्भर है ?

प्रश्न-आॅफर मिले तो  ?

सं.गां.-कौन आॅफर दे रहा है ?

प्रश्न-प्रधान मंत्री !

सं.गां.-उनसे पूछिए।

प्रश्न- क्या असम आंदोलन में विदेशी शक्तियां सक्रिय हैं ?

सं.गां--जैसे ही 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी,विदेशी ताकतों की बन आई।

किंतु अब वे असुविधा महसूस कर रहे हैं,अतः उपद्रव मचा रहे हैं।

विदेशी शक्तियां भारत को मजबूत देखना नहीं चाहतीं।

इसलिए वे देश में आर्थिंक संकट पैदा करना चाहती हैं।

किंतु भारत सरकार समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के लिए कृतसंकल्प है।

इस दिशा में प्रयास जारी हैं।

आशा है,जल्दी ही कोई समाधान नहीं निकल आएंगा।

 प्रश्न-क्या आप असम जाएंगे ?

सं.गां.-यदि मेरे जाने से समस्या का समाधान हो सके तो मैं जाऊंगा।

 प्रश्न-क्या नशाबंदी समाप्त होनी चाहिए ?

सं.गां.-मैं नशाबंदी के विरुद्ध हूं।इससे भ्रष्टाचार बढ़ता है।

क्योंकि इसे पूर्णतः लगू नहीं किया जा सकता।

प्रश्न-क्या आप पांच सूत्री कार्यक्रम को पुनः चलाना चाहते हैं ?

सं.गां.-हां,किंतु परिवार नियोजन को छोड़कर।

क्योंकि मैंने यह अनुभव किया कि देश की जनता परिवार नियोजन नहीं चाहती,जबकि इसके बिना देश की समस्याओं का समाध्धान नहीं होगा।

प्रश्न-क्या आप परिवार नियोजन की जरूरत समझते हें ?

सं.गां.-हमने परिवार नियोजन करा लिया है।

प्रश्न-क्या आप मारुति कारखाने को पुनर्जीवित करना चाहते हैं ?

.....................................

इस इंटरव्यू को दुबारा पढ़ने और आज राहुल गांधी के बातों को सुनने से यह लगता है कि संजय गांधी सुलझे हुए विचार के नेता थे।राहुल गांधी उनके सामने नहीं टिकते। 

  ............................ 

 


 


    2024 का लोक सभा चुनाव

   ...............................................

   बेशुमार काले धन के इस्तेमाल की आशंका

     --सुरेंद्र किशोर--

    ............................................

अगले लोक सभा चुनाव (सन 2024) में काले धन का जितना अधिक इस्तेमाल होगा,उतना अब तक कभी नहीं हुआ था।

क्यांेकि उस चुनाव के नतीजे ऐतिहासिक और युगांतरकारी होंगे।

  उन नतीजों पर न सिर्फ इस देश का भविष्य निर्भर करेगा बल्कि कई बड़े नेताओं व राजनीतिक-गैर राजनीतिक संगठनों के भविष्य का भी फैसला हो जाएगा।

...............................

सन 1972 में बिहार में एक लोक सभा क्षेत्र में उप चुनाव हुआ था।

उसमें एक उम्मीदवार ने रिकाॅर्ड खर्च (करीब 32 लाख रुपए)किया था।

उसके बाद तो चुनावी खर्च बढ़ते चले गये।

1990 के नंदियाल लोक सभा उप चुनाव के लिए तो सिर्फ एक शेयर दलाल ने एक नेता जी को एक करोड़ रुपए दिए थे।

चुनाव खर्चे में बढ़ोत्तरी के साथ साथ 

उसी अनुपात में अधिकतर नेताओं की संपत्ति भी बढ़ती जा रही है।

संपत्तिवानों को बुला-बुला कर चुनावी टिकट दिए जाने लगे हैं।

जेनुइन राजनीतिक कार्यर्ताओं की पूछ घट गयी है।

क्योंकि अधिकतर मामलों में एम.पी.-विधायक फंड के ठेकेदार ही कार्यकर्ता की भूमिका भी निभाने लगे हैं।अनेक नेताओं ने भी देखा कि यदि हम वास्तविक राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बढ़ावा देंगे तो वे टिकट के उम्मीदवार बन जाएंगे।

जबकि, हमें टिकट तो अपने परिवार में ही बनाए रखना है।

..................................

हाल के वर्षों में राजनीति में पैसे की भूमिका बहुत बढ़ गयी है।

अब तो कई राजनीतिक दल खुलेआम टिकट बेच रहे हैं। 

हाल के कर्नाटका विधान सभा चुनाव में करीब 400 करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक को,जो उम्मीदवार भी थे, प्रत्येक मतदाता को दो-दो हजार रुपए के नोट थमाते टी.वी.चैनलों पर देखा गया था।वे जीत भी गये।

उस नेता का कुछ नहीं बिगड़ा।

....................................

अगले लोस चुनाव में देसी से अधिक विदेशी पैसे लगंेगे,ऐसे संकेत हैं ।

मीडिया में भारी विदेशी पैसे के ‘आयात’ की खबर आ ही रही है। 

वैसे भी इस देश के सैकड़ों नेतागण अरबपति हो चुके हैं।

...............................

अब देखना है कि सरकारें, चुनाव आयोग या अन्य एजेंसियां चुनाव में पानी की तरह पैसे बहाने की प्रवृति व जिद पर कब तक रोक लगा पाती है।

वैसे तो उम्मीद की कोई रोशनी नजर नहीं आ रही।

जो सिस्टम , संसद व विधान सभाओं के अनवरत हंगामे को नहीं रोक सकता,वह इस तरह के और काम भी नहीं ही कर सकता।

....................................

सुरेंद्र किशोर

11 अगस्त 23



बुधवार, 9 अगस्त 2023

 हर रंग की साम्प्रदायिकता का विरोध जरुरी

.....................................

जेहादी पी.एफ..आई. पर चुप्पी और हिन्दू अतिवाद के

खिलाफ हंगामा करके कोई दल मोदी को कमजोर नहीं कर सकता 

...................................

गोधरा टे्रन कार सेवक दहन कांड पर चुप्पी और प्रतिक्रिया में हुए  दंगे पर हंगामा करने से ही मोदी राजनीति के महाबली बने थे

..........................................

सुरेंद्र किशोर

.............................

नरेंद्र मोदी विरोधी राजनीतिक दल आज भी अपनी वही गलतियां लगातार दुहरा रहे हैं जिन गलतियों के कारण नरेंद्र मोदी आज सत्ता में हैं।ताजा सर्वेक्षण बता रहे हंै कि आगे भी वही रहेंगे।

जो दल वास्तव में मोदी को कमजोर करना चाहते हैं वे दोनों संप्रदायों के बीच के अतिवादी तत्वों का समान रूप से विरोध करंे।

प्रतिबंधित जेहादी संगठन पाॅपुलर

फं्रट आॅफ इंडिया के बारे में आज के दैनिक जागरण में एक सनसनीखेज खबर छपी है।

उस खबर का शीर्षक है--

‘‘युवाओं को बरगला सेना बना रहा था पी एफ आई,

एन.आई की जांच से खुलासा,देश विरोधी षड्यंत्र के लिए सीमा पार की साजिश,

विदेशों से आ रहा था धन’’

 .......................................

ध्यान रहे कि पाॅपुलर फं्रट आॅफ ने यह लक्ष्य तय किया है कि वह 

हथियारों के बल पर सन 2047 तक भारत को इस्लामिक देश बना देगा।इस काम के लिए वह हथ्यिार बांट भी रहा है।

प्रतिबंध के बावजूद उसकी भूमिगत गतिविधियां जारी हैं।

अनेक शांतिपिय लोग डरे हुए हैं।

गृह युद्ध की आशंका है।

कई लोग पूछते हैं कि गृह युद्ध की स्थिति में जेहादियों की सशस्त्र सेना से हमें कौन बचाएगा ?

इस बीच एक अच्छा संकेत है।

 पी.एफ.आई.मुसलमान आबादी के बीच से कम से कम 10 प्रतिशत समर्थन मंाग रहा है।

पर, उतना भी उसे अभी नहीं मिल रहा।

पर,हथियारबंद थोड़े भी क्या कर सकते हैं,यह इतिहास बताता है।

ओवैसी को छोड़कर कोई दूसरा मुस्लिम संगठन पी.एफ.आई. के खिलाफ खुलकर नहीं बोल रहा है।

.........................................

दैनिक जागरण की इस सनसनीखेज खबर पर किसी राजनीतिक दल ने पी.एफ.आई.की सार्वजनिक रूप से आलोचना अब तक नहीं की है।

  पी.एफ.आई.पर भाजपा का रुख तो लोगों को मालूम है किंतु अन्य दलों का रुख क्या है ?

इस सवाल का समय रहते जवाब सभी दलों की ओर से मिल जाए तो अगले लोक सभा चुनाव के लिए मन बनाने में लोगों को और भी सुविधा हो जाएगी।

............................................

हाल में कर्नाटका में विधान सभा का चुनाव हुआ।

पी.एफ.आई.के राजनीतिक संगठन एस.डी.पी.आई. ने पहले ही सार्वजनिक रूप से यह घोषणा कर दी थी कि उसका कांग्रेस से तालमेल है।(गूगल पर देख लीजिएगा।)

सन 2018 के विधान सभा चुनाव में भी दोनों दलों का आपसी तालमेल था।

  पी.एफ.आई. की महिला शाखा के सम्मेलन में शामिल होने के लिए पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी 2017 में केरल गये थे।

पी.एफ.आई.जिन अतिवादी संगठनों को मिलाकर बना है ,उसमें सिमी भी शामिल है।

सिमी पर जब प्रतिबंध लगा तो कई तथाकथित सेक्युलर दलों ने प्रतिबंध का विरोध किया था।

उ.प्र.कांग्रेस अध्यक्ष सलमान खुर्शीद तो सुप्रीम कोर्ट में सिमी के वकील  थे।

इस तरह के एकतरफा व्यवहार के अनेक उदाहरण हैं।

...........................

जेहादी संगठनों के साथ देश के अधिकतर तथाकथित सेक्युलर दलों की प्रत्यक्ष-परोक्ष एकजुटता से नरेंद्र मोदी की राजनीतिक ताकत बढ़ी है।

मोदी की दूसरी ताकत है कई दलों में फैले परिवारवाद और भीषण भ्रष्टाचार।

2014 में कांग्रेस की हार पर ए.के एंटोनी ने सोनिया गांधी को यह रिपोर्ट दी थी कि हम इसलिए हारे क्योंकि मतदाताओं को लगा कि हम अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों की तरफ कुछ अधिक ही झुके हुए हैं।

........................................

सेक्युलर दलों के लिए अब भी समय है।

वे राजनीतिक दल दोनों संप्रदायों के बीच के अतिवादियों का समान रूप से विरोध करंे।

यदि अब भी जेहादियों के पक्ष में कांग्रेस तथा अन्य दल खड़े दिखेंगे तो वे अपनी ही गलती से एक बार फिर नरेंद्र मोदी को तीसरी बार भी प्रधान मंत्री बनने का रास्ता साफ कर देंगे।

........................................... 

7 अगस्त 23





 आज के प्रभात खबर में प्रकाशित

......................................

यदाकदा

सुरेंद्र किशोर

................................

 फील्ड से रिटायर अफसर बता सकते हैं अपराध रोकने के उपाय

..........................................

बिहार के डी.जी.पी.,आर.एस.भट्टी ने हाल में एक प्रमंडलीय मुख्यालय में थानेदारों से साफ-साफ पूछा कि ‘अपराध नियंत्रण में आखिर दिक्कत क्या है ?’

ठीक ही किया कि पूछ लिया।

  वहां इस समस्या पर कैसी चर्चा हुई ?

पुलिस प्रमुख ने उन्हें क्या सलाह दी ,यह तो नहीं मालूम।

पर,इस गंभीर समस्या के सिलसिले में अनुभवी लोगों की एक राय है।

वह यह कि इस सवाल का बेहतर जवाब हाल में फील्ड से सेवा निवृत पुलिस अफसरों से भट्टी साहब को मिलेगा।

इसलिए फील्ड के काम से हाल में रिटायर पुलिस अफसरों से भी यदि डी.जी.पी.कारण पूछें तो उन्हें वास्तविक दिक्कतों ,उपयोगी जानकारियां और बेहतर सलाह मिल सकती हैं।पर,उनसे उन्हें अलग -अलग अकेले में बातें 

करनी होगी।

सेवारत अफसरों के सामने कुछ कठिनाइयां होती हैं।वे खुलकर सब कुछ नहीं बता पाते।

उनके अपने निहितस्वार्थ भी हो सकते हैं और कुछ मजबूरियां भीं।  

याद रहे कि हाल में मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने अपने दल के मौजूदा सांसदों के अलावा अलग से पूर्व सांसदों को भी बुला कर बारी -बारी से उनसे बातचीत की ।

चीजों को देखने के नजरिए में थोड़ा फर्क आ जाता है जब व्यक्ति सेवा निवृत हो जाता है।

..................................

 रुचि के अनुकूल पढ़ाई 

.................................... 

जिस छात्र को जो विषय पढ़ने में रुचि हो,उसी को पढ़कर वह जीवन में अच्छा कर सकेगा।

इसके विपरीत कुछ अभिभावकगण अपनी संतान को जबरन डाक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं चाहे उसकी रुचि वैसी पढ़ाई करने में हो या नहीं।

  छात्रों को दूर के शहरों के कोचिंग संस्थानों में पढ़ने के लिए भेज दिया जाता है।

मेडिकल-इंजीनियरिंग विषयों में गहरी रुचि रखने वाले छात्र तो लक्ष्य पाने में सफल हो जाते हैं।किंतु जिनकी रुचि नहीं होती है ,वे वहां पढ़ाई के भारी दबाव को कई बार सहन नहीं कर पाते।

उनमें से कुछ विद्यार्थी आत्म हत्या भी कर लेते हैं।इधर ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं।

राजस्थान के कोटा से हाल में यह खबर आई कि इस साल वहां अब तक 18 विद्यार्थी आत्म हत्या कर चुके हैं।

ऐसी आत्म हत्याएं रोकने में अभिभावकों की बड़ी भूमिका हो सकती है।

कोचिंग मंें भेजने से पहले वे अपनी संतान की रुचि की सही पहचान अच्छी तरह कर लें।अपना विचार उस पर न थोपंे।

डाक्टर या इंजीनियर बनना ही सब कुछ नहीं है।

जान है तो जहांन है !

अन्य अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहां आपकी संतान बेहतर कर सकती है।

इसलिए जिन विद्यार्थियों की गहरी रुचि डाक्टर-इंजीनियर बनने में है और जिन्हें आत्म विश्वास है कि वे कठिन पढ़ाई के दबाव का भी सामना कर पाएंगे,उन्हें ही वैसी पढ़ाई करने के लिए उनके अभिभावक बाहर भेजें।

............................

परीक्षा में कदाचार रुके

.................................

झारखंड विधान सभा ने हाल में झारखंड प्रतियोगी परीक्षा विधेयक, 2023 पारित किया है।उसे राज्यपाल के यंहां मंजूरी के लिए भेज दिया गया है।

इस में यह प्रावधान किया गया है कि परीक्षा में कदाचार करते पाए जाने पर एक से तीन साल तक कैद की सजा हो सकती है।

साथ ही,एक से तीन लाख रुपए तक के जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है।

झारखंड शासन का यह कदम सराहनीय है।परीक्षा में कदाचार ने लगभग पूरे देश में महामारी का रुप धारण कर लिया है।

इससे पीढ़ियों के साथ लगातार अन्याय हो रहा है।

क्योंकि पैसे वाले और प्रभावशाली परिवारों के लोगों को तो कदाचार करने की अधिक सुविधा मिल जाती है।अधिकतर मामलों मंे गरीब घरों के उम्मीदवारों की प्रतिभा का हनन हो जाता है।

    उत्तराखंड सरकार ने तो इसी साल वहां की विधान सभा से ऐसा कानून पास करवाया है जिसके तहत अत्यंत कड़ी सजा का प्रावधान है।

 वहां परीक्षा में कदाचार के खिलाफ उम्र कैद की सजा और 10 करोड़ रुपए के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

वह राज्य सरकार अपनी प्रतिभाओं के साथ अन्याय नहीं होने देना चाहती है। उस सरकार को इस बात की भी परवाह नहीं है कि कदाचारियों को सजा दिलवाने से उसके वोटर उनसे बिदक  जाएंगे। 

पर,इधर झारखंड से यह खबर आ रही है कि वहां कुछ राजनीतिक नेता गण झारखंड सरकार के नये विधेयक का विरोध कर रहे हैं।विरोध ठीक नहीं।

.................................

और अंत में

.........................

उदयकांत लिखित मुख्य मंत्री नीतीश कुमार की जीवनी में उनकी एक महत्वपूर्ण बात चतुर्भुज ज्योमेट्री के जरिए समझाई गयी है।

वह भी एक संवाद की शैली में।

वह बात यूं है-‘देखो ,चतुर्भुज की सबसे नीचे वाली लेटी लाइन होती है न,उसे बेस या आधार कहते हैं।

इसे तुम नीतीश के बाबूजी समझ लो।

वही नीतीश के जीवन के आधार हैं।

अब दूसरी ,सबसे ऊपर वाली ,लेटी हुई लाइन देखो।

यह हैं हमारे बापू  यानी महात्मा गांधी।

नीतीश की दुनिया में ही क्यों,पूरे मुल्क में इनसे ऊपर कुछ भी नहीं,कोई भी नहीं।

 अब बची चतुर्भुज की दो खड़ी लाइनें जो एक दूसरे से दूर खड़ी हैं।

 ये हैं लोहिया और जेपी।

इन दोनों को ऊपर से गांधी जी ने जोड़ रखा है।

अब एक ऐसा गोला बनाओ जो इन चारों लाइनों को अंन्दर से छुए।

यही सर्किल है अपना नीतीश।

उसमें चारों के गुण हैं।’

...........................................

8 अगस्त 23





सोमवार, 7 अगस्त 2023

   आइडिया आॅफ इंडिया !

   .........................................    

  सीमा पर बाड़ लगाने से कभी इस 

  देश की छवि खराब होती थी !

 ......................................................

 --सुरेंद्र किशोर--

 .......................................

   आजादी के बाद के हमारे हुक्मरानों ने 

ही इस देश को ‘धर्मशाला’ बनाना शुरू कर दिया था।

  अब बी.एस.एफ. के सशक्तीकरण का विरोध हो रहा है।

  ...............................................................

    जिस देश के कुछ राजनीतिक दलों के लिए घुसपैठिए ‘वोट बैंक’ हों वहां वही होगा जो आज हो रहा है।

..............................................................................

 कई साल पहले की बात है।

एक निजी टी.वी.चैनल पर मैं डिबेट 

सुन रहा था।

बांग्ला देशी घुसपैठियों पर चर्चा थी।

  एक तरफ सन 1958 बैच के भारतीय विदेश सेवा के एक अफसर थे।

 दूसरी ओर, शिव सेना के राज्य सभा सदस्य थे।

 उस अफसर ने कहा कि 

‘‘यदि हम सीमा पर बाड़ लगाएंगे तो दुनिया में हमारे देश की छवि खराब होगी।’’

  उस पर शिवसेना नेता ने उनसे सवाल किया,

‘‘आप भारत के विदेश सचिव थे या बांग्ला देश के  ?

बेचारे अफसर साहब कोई जवाब नहीं दे सके।

वे बेचारे आखिर क्या बोलते ?

वैसे भी वे व्यवहार में शालीन व्यक्ति हैं। 

आजादी के तत्काल बाद के हमारे हुक्मरानों ने उन जैसे अफसरों को यही निदेश दे रखा होगा।यही आदेश कि वे बाड़ लगाने का विरोध करें।

यही तो था ‘‘आइडिया आॅफ इंडिया का एक नमूना ।’’

 .......................................................

अगस्त 23

   

   


    अपने ही नियमों का पालन 

   करे फिल्म सेंसर बोर्ड

   .........................................

    सुरेंद्र किशोर

   .........................................

भाजपा के पूर्व राज्य सभा सदस्य आर.के. सिन्हा ने फिल्म सेंसर बोर्ड के काम काज पर सवाल उठाया है।

आज के दैनिक ‘आज’ में छपे अपने लेख में सिन्हा ने जो मुद्दे उठाए गए हैं,उन पर केंद्र सरकार  को ध्यान देना चाहिए।

केंद्र सरकार आम तौर पर कुल मिलाकर अच्छा काम कर रही है।

किंतु मुझे भी इस बात पर आश्चर्य होता है कि सेंसर बोर्ड से उनके ही नियमों का पालन क्यों नहीं करवा पा रही है !

.........................................  

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि 

‘‘सन 2014 से नरेंद्र मोदी के देश का प्रधान मंत्री बनने की अवधि को भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण काल के रूप में जाना जाएगा।’’

  गृह मंत्री की बात आंशिक रूप से ही सही है।

क्योंकि इस देश की फिल्मी दुनिया पर मोदी का कोई वैसा असर नहीं है।

 मैं फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड की चर्चा करूंगा।

  लगता है कि कि उस बोर्ड पर मोदी सरकार का तनिक भी सकारात्मक असर नहीं है।

इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं।

....................................

मैंने पहली बार सन 1961 में फिल्म देखी थी।

जवाहरलाल नेहरू-लाल बहादुर शास्त्री के शासन काल में ऐसी शालीन

और गरिमायुक्त फिल्म बनती थीं जिन्हें आप परिवार के साथ देख सकते थे।

  उसके बाद सत्तर के दशक में गिरावट शुरू हो गई।

सेक्स-हिंसा प्रधान फिल्में बनने लगीं।

भोजपुरी फिल्मों का तो आज और भी बुरा हाल है।

 .................................

नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के प्रारम्भिक वर्षों में सेंसर बोर्ड को सुधारने की कोशिश हुई थी।पर,सुधार नहीं हुआ।

लगता है कि मोदी सरकार ने हथियार डाल दिए।

क्या मुम्बई का फिल्मी जगत भारत में ही है न !!!

सेंसर बोर्ड का सिने मेटोग्राफी एक्ट, 1952 के तहत गठन हुआ था।

बोर्ड एक वैधानिक संस्था है।

.........................................

पचास और साठ के दशकों में बोर्ड के नियमों का पालन करते हुए ही फिल्में बनती थीं 

और उन्हें प्रमाण पत्र मिलते थे।

बहुत पहले मैंने प्रमाण पत्र देने के नियम पढ़े थे।

पूरा तो याद नहीं।

किंतु आज जो फिल्में बन रही हैं,उनमें से शायद ही कोई फिल्म नियम की कसौटियों पर वे खरी उतरती हों।

जहां तक मेरी जानकारी है,सेंसर के नियम बदले नहीं गए हैं।

(नियम गुगल पर उपलब्ध हैं।)हां कभी -कभी एक बात जरूर हो गई लगती है ।

वह यह कि मुम्बई के फिल्म जगत का अधिकांश इस देश की मूल स्थापनाओं को नष्ट-भष्ट करने वाली देसी-विदेशी  ताकतों के हाथों चला गया है।

अपवादस्वरूप ही अब अच्छी फिल्में बन रही हैं।

.................................................

इस बीच कुछ साल पहले एक फिल्ल्मी हस्ती आदिल हुसेन ने कहा था कि 

‘‘साठ के दशक में अच्छी फिल्में बना करती थीं।

फिल्मकारों की जिम्मेदारी है कि वे अब भी अच्छी फिल्में दें।’’

  आर्ट सिनेमा,बाॅलीवुड मेनस्ट्रीम सिनेमा और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में अपनी पहचान बनाने वाले आदिल ने कहा  कि ‘‘फिल्मकार यह बहाना न बनाएं कि हम दर्शकों की पसंद की फिल्में बना रहे हैं।’’

आदिल का तो आरोप है कि दर्शकों का मूड हम फिल्म मेकर्स ने ही बदला है।

..........................................

  इधर मेरा मानना है कि फिल्मकार सेंसर के उन नियमों का पालन भर करें जो नियम नेहरू के कार्यकाल में बने थे।

मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करे कि सेंसर बोर्ड में नियम पसंद,ईमानदार व निडर लोग ही रखें जाएं। 

‘‘नदिया के पार’’ और ‘‘बागवान’’ जैसी फिल्मों से कहां किसी को एतराज होता है !

 क्या यह उम्मीद की जाए कि कम से कम भाजपा की केंद्र सरकार 

अश्लीलता और अन्य तरह के भटकावों के इस प्रदूषण को रोकने की कोशिश करेगी ?

याद रहे कि यह प्रदूषण पीढ़ियों को बर्बाद कर रहा है।

यदि ऐसा ही जारी रहा कि अमित शाह की सदिच्छा मिट्टी में मिल जाएगी।

............................

6 अगस्त 23.



 


रविवार, 6 अगस्त 2023

  समस्याग्रस्त मणिपुर की 

एक कहानी यह भी !

  ........................................

1951 में मणिपुर में 11.84 प्रतिशत ईसाई थे।

2011 में यह संख्या बढ़कर 41.29 प्रतिशत हो गयी।

आज वह जनसंख्या कितनी है,उसका अनुमान लगा लीजिए।

...............................

सांसदों के दल ने वहां से लौट कर यह सूचना लोगों को दी ?

.....................................

सुरेंद्र किशोर

1 अगस्त 23 


   नूह से घुसपैठियों की 200 झोपड़ियों को उजाड़ा गया।

  बांग्लादेशियों-रोहिग्याओं की अबाध घुसपैठ जारी रही 

  तो हर प्रदेश में ऐसी पुलिसिया कार्रवाई करनी पड़ेगी

   यह इस देश पर भीषण हमला है जिसमें 

  वोट लोलुप नेतागण ‘बाहरी -भीतरी दुश्मनों के मददगार हैं

   ................................................................

      सुरेंद्र किशोर

  ....................................... 

हरियाणा के नूह से अवैध घुसपैठियों की करीब दो सौ झोपड़ियों को शासन ने विरोध के बीच कुछ घंटे पहले उजाड़ दिया।

हाल के साम्प्रदायिक उत्पातों में इन घुसपैठियों का बड़ा हाथ था।

  घुसपैठ की यह समस्या सिर्फ हरियाणा व दिल्ली में ही नहीं है,,बल्कि पूरे देश में है।

  बढ़ती जा रही है।

जिस तरह के साम्प्रदायिक उपद्रव हाल में हरियाणा में हुए,उसी तरह के उत्पातों की झड़ी लग जाएगी,यदि केंद्र सरकार जल्द कड़ी कार्रवाई नहीं करेगी।

सन 2021 में ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि सीमाओं की किलेबंदी अगले साल तक हो जाएगी।

पर,कई कारणों से यह काम अधूरा है।

  सर्वाधिक घुसपैठ पश्चिम बंगाल की सीमा से हो रही है और उस काम में ममता बनर्जी की सरकार सहायक है।

  सीमा पर तैनात केंद्रीय सुरक्षा बल भी क्यों लगभग विफल साबित हो रहा है,इसकी जांच केंद्र सरकार कराए।

  कुछ समय पहले यह खबर आई थी कि सीमा पर बाड़ लगाने के लिए ममता सरकार जमीन अधिग्रहण नहीं कर रही है।

क्या पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए यह कारण पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए, यदि सचमुच भूमि अधिग्रहण में सहयोग नहीं दे रही है ?

वैसे कारण और भी हैं।

  ............................... 

14 जुलाई, 2004 को तत्कालीन गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने संसद को बताया था कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों की संख्या 57 लाख है।

आज तो यह संख्या बहुत बढ़ चुकी है।

.............................................

 दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने 4 अगस्त, 2005 को लोक सभा में यह आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने 40 लाख बांग्ला देशी मुस्लिम घुसपैठियों को अवैध ढंग से पश्चिम बंगाल में मतदाता बना दिया है।

  ममता ने सदन में इस पर तुरंत चर्चा की मांग की।

जब उसकी इजाजत नहीं मिली तो ममता ने लोक सभा की सदस्यता से सदन में ही इस्तीफा दे देने की घोषणा कर दी।

उससे पहले इस समस्या पर ममता सदन में ही रो पड़ी थीं।

................................................

पर, जब ममता बनर्जी मुख्य मंत्री बनीं और वही अवैध  घुसपैठी मतदातागण ममता के दल को वोट देने लगे तो वह उनके पक्ष में चट्टान की तरह खड़ी हो गईं हैं।नोबल विजेता अमत्र्य सेन ममता बनर्जी को प्रधान मंत्री बनते देखना चाहते हैं।यदि बन गयीं तो इस देश का क्या होगा ?

 मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने कहा कि यदि घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई होगी तो खून की नदियां बहेंगीं।

...........................................

लगातार जारी घुसपैठ के कारण आजादी के बाद 

पूर्वी पाक-बांग्ला देश से सटे भारतीय इलाकों के कई जिलों 

की आबादी का सामाजिक अनुपात पूरी तरह बदल चुका है।

बदलता जा रहा है।

 उन राज्यों में आंतरिक-बाह्य सुरक्षा की भारी समस्या भी उत्पन्न हो चुकी है।गंभीर होती जा रही है।बिहार-झारखंड में भी समस्या बढ़ रही है।

.....................................

इस समस्या की जड़ में आजादी के तत्काल बाद की केंद्र सरकार का अदूरदर्शी रवैया रहा है।

  कुछ दशक पहले की बात है।

एक निजी टी.वी.चैनल पर घुसपैठ की समस्या पर चर्चा चल रही थी।

इस देश के विदेश सचिव पद पर रहे एक रिटायर आई.एफ.एस.अफसर ने कहा कि 

‘‘यदि हम बांग्ला देश सीमा पर बाड़ लगाएंगे तो दुनिया में भारत की छवि खराब होगी।’’

(मैं भी वह डिबेट सुन रहा था।)

इस पर शिव सेना के एक राज्य सभा सदस्य ने उस पूर्व सचिव से पूछा कि 

‘‘आप भारत के विदेश सचिव थे या

 बांग्ला देश के ?’’

वे चुप रह गए।

बेचारे उस शालीन पूर्व विदेश सचिव का भला क्या कसूर ?

नेहरू युग में विदेश सेवा में आए थे।

वे जवाहरलाल नेहरू के ‘‘आइडिया आॅफ इंडिया’’ नीति के तहत ही तो बोल रहे थे।

.................................

5 अगस्त 23