मंगलवार, 10 मई 2022

   पूजा सिंघल के पास मनरेगा 

  घोटाले के कितने पैसे ?

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  73 हजार करोड़ रुपए के बजट वाले 

   मनरेगा को किसानों से जोड़ने की मांग 

   को अब नरेंद्र मोदी पूरा करें

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सुरेंद्र किशोर

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अब जाकर पता चल रहा है कि मनमोहन सिंह सरकार ने 

मनरेगा को किसानों से क्यों नहीं जोड़ा !

यदि जोड़ दिया होता तो पूजा सिंघल के पास इतने अधिक रुपए नहीं आ पातेे।

याद रहे कि मनमोहन सिंह सरकार के कृषि मंत्री शरद पवार ने अपने प्रधान मंत्री को यह लिखित राय दी थी कि मनरेगा के मजदूरों को किसानों से जोड़ दीजिए।

 मजदूर को किसान कुछ पैसे दें और बाकी सरकार दे दे।

इससे सरकारी धन भी बचेगा।

  शरद पवार ऐसे नेता नहीं हैं जिन्हें भ्रष्टाचार से नफरत है।

उन्हें चिंता इस बात की रही है कि किसानों को मजदूर अब कम मिल रहे हैं।

क्योंकि भारी जालसाजी के बावजूद उन्हें मनरेगा के तहत फिर भी कुछ मजदूरी तो मिल ही जाती है।

बाकी पैसे भले लूट लिए जाते हैं।

  याद रहे कि वित्तीय वर्ष 2022-23 का मनरेगा का बजट 73 हजार करोड़ रुपए है।

अब तो 80 करोड़ लोगों को केंद्र सरकार अनाज भी दे रही है।

  आरेाप है कि मनरेगा का जाली बिल बनाकर पूजा सिंघल जैसे अफसर और अनेक नेता लोग अपना हिस्सा ले रहे हैं।

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केंद्र सरकार देश के हर राज्य के कम से कम एक जिले के मनरेगा में लग रहे धन में हो रहे घोटाले की जांच कराए।

 उसकी रपट आने के बाद मुझे पूरी उम्मीद है कि मनमोहन सिंह ने शरद पवार की जिस सलाह को ठुकरा दिया,उसे नरेंद्र मोदी जरूर मान लेंगे।

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10 मई 22 


शनिवार, 7 मई 2022

      कर्पूरी ठाकुर चाहते थे कि उनका 

      पुत्र अंतरजातीय विवाह करे

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        सुरेंद्र किशोर

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सन 1972 की अपनी निजी डायरी मैं आज पलट रहा था।

तब मैं एक समाजवादी कार्यकर्ता की हैसियत से 

कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था।

तब कर्पूरी जी विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे।

कोई गंभीर काम करने के लिए वे पटना के कोशी रेस्ट हाउस चले जाते थे।

8 जून, 1972 को मैंने अपनी डयरी में लिखा,

‘‘कर्पूरी जी ने रिक्शे पर (कोशी रेस्ट हाउस से आवास आते समय)लौटते समय मुझसे कहा कि आप रामनाथ से कहिए कि वह अंतरजातीय शादी करे।’’

   मुझे याद नहीं कि मैंने रामनाथ ठाकुर से यह बात कही थी या नहीं।कहीं ही होगी।क्योंकि कर्पूरी जी का निदेश था।

 किंतु आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे उस सलाह में कर्पूरी ठाकुर की उदारता नजर आती है।

  आज भी कितने नेता अपनी संतान से कह सकते हैं कि वह अंतरजातीय शादी करे ?

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मेरे फेसबुक वाॅल से

7 मई 22 


बुधवार, 4 मई 2022

 मुक्तिबोध ने पूछा था,

‘‘पार्टनर,तुम्हारी पालिटिक्स क्या है ?’’

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पिछड़ा आरक्षण पर आपकी क्या राय है प्रशांत किशोर जी ? 

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यदि आप बिहार में अपनी राजनीतिक गतिविधियां  

शुरू करना चाहते हैं तो लोग आपसे यदा कदा एक सवाल पूछ सकते हैं।

वह यह कि 

‘‘पिछड़ा आरक्षण पर आपकी क्या राय है।’’

  क्योंकि बिहार की राजनीति का अब यह एक मूल तत्व है।

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चूंकि राजनीतिक और समाजिक मामलों में आपकी खुद की स्पष्ट राय आनी अभी बाकी है,इसलिए उपर्युक्त सवाल जरूरी है।

 पिछड़ा आरक्षण पर लोगों की अलग -अलग राय रही है।

 कुछ लोग चाहते हैं कि 

1.-आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए।

2.-कुछ अन्य लोग चाहते हैं कि आरक्षण के प्रावधान को ही समाप्त कर देना चाहिए।

3.-कुछ लोग चाहते हैं कि इसे और अधिक लाभकारी बनाने के लिए इसकी समीक्षा होनी चाहिए।

4.-यह राय भी है कि आरक्षण का लाभ कुछ ही मजबूत जातियों तक सिमटा न रहे , इसका भी उपाय हो।

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आपकी अपनी भी कोई स्पष्ट राय जरूर होगी,भले वह कम से कम मुझे नहीं मालूम।

 अब आपको उस राय को सार्वजनिक रूप में घोषित करना पड़ेगा।

तभी आपके बारे में बिहार के जागरूक लोग अपनी राय 

स्थिर करेंगे।

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सुरेंद्र किशोर

4 मई 22


मंगलवार, 3 मई 2022

     प्रशांत किशोर की उच्चाकांक्षा का भविष्य !

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        सुरेंद्र किशोर

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प्रशांत किशोर अपनी अगली योजना की

घोषणा परसों करेंगे।

 यदि वे अपनी राजनीतिक पार्टी बनाते हैं तो वह उनका अधिकार है।जरूर बनाएं।

इस देश में कुल 2293 राजनीतिक दल पहले से हैं ही।

  एक और दल सही !

राजनीतिक दल बनाना और चुनाव लड़ना आसान है।

अब तो उम्मीदवारों से भारी भरकम चंदा भी पार्टी को मिल जाता है।

 किंतु अकेले बल पर सीटें जीत पाना बहुत मुश्किल है।

प्रशांत यदि अपने दल को लोक सभा और विधान सभा के अगले चुनावों में उतारेंगे तो उनकी काबलियत की असलियत की भी जांच हो जाएगी।

  प्रशांत के उन प्रशंसकों के इस दावे की तो खास तौर पर  जांच हो जाएगी कि ंप्रशांत किशोर, अब तक मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्री बनाते रहे हैं।

यह काम यानी दल बनाने को काम, जितनी जल्द हो जाए,उतना ही अच्छा।

अपने बल पर अकेले चुनाव लड़ने के बाद यदि उन्हें कोई उल्लेखनीय उपलब्धि मिल गई तो मैं प्रशांत के बारे में अपनी राय बदल लूंगा।

  इस देश-प्रदेश का अगला कोई भी चुनाव मुकाबला मुख्यतः

दो दलों या फिर दो गठबंधनों के बीच ही होगा।

तीसरे दल के लिए बहुत कम ही गुंजाइश बचेगी ।

क्योंकि अगले दो साल में राजनीति व समाज का अच्छा-खासा धु्रवीकरण हो चुका होगा।

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एक लघुत्तम दल के बड़े नामी-गिरामी  नेता डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कुछ दशक पहले मुख्य पटना में अपने दल के आॅफिस के लिए एक बड़ा मकान खरीद लिया था।

 तब उनकी घोषणा थी कि वे ‘लालू राज’ को उखाड़ फेकेंगे।

  पर,स्वामी के उस संकल्प का क्या हुआ ?

हुआ यह कि किदवई पुरी के उस मकान को स्वामी जी ने अंततः बेच दिया।

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वैसे स्वामी जी की एक बड़ी उपलब्धि रही है।इस मामले में मैं उनका भारी प्रशंसक रहा हूं।

उन्होंने पी.आई.एल.करके बड़े -बड़े भ्रष्ट नेताओं को जेल भिजवाया।

सिर्फ वही काम वे बेहतर ढंग से कर भी सकते हैं।

क्योंकि जिस दल में रहे,वहां के बड़े नेताओं के सिर पर ही .........................।

.पर, पता नहीं,उन्होंने एक जन कल्याणकारी व अच्छा-खासा  काम भी क्यों छोड़ दिया !

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प्रशांत किशोर मूलतः आंकड़ा एकत्र करने और उसे विश्लेषित करने के काम में रहे हैं।

  कई लोग उन्हें इस काम में माहिर भी मानते हैं।

पहले मैं भी मानता था।

पर,उन्होंने हाल में जब कांग्रेस को यह सलाह दे डाली कि वह बिहार -उत्तर प्रदेश में अब अकेले ही चुनाव लड़े तो मुझे उनकी आंकड़ा विश्लेषण क्षमता पर भी संदेह हो गया।

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      3 मई 22 


सोमवार, 2 मई 2022

  विकास के नये मंदिर ‘पूर्णिया इथेनाॅल कारखाने’

 को आशंकित बुरी नजरों से बचाने का प्रबंध करे 

 बिहार सरकार

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यदि कृषि आधारित और भी नए-नए कारखाने खुलेंगे तो

 बिहार का पिछड़ापन कम होगा

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सुरेंद्र किशोर

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पूर्णिया में इथेनाॅल कारखाने की स्थापना हुई है।

कृषि प्रधान बिहार में यह एक युगांतरकारी घटना है।

वहां मक्का और धान से इथेनाॅल तैयार होगा।

 अब किसानों को उनकी फसल की बेहतर कीमत मिलेगी।

खेती-किसानी वैसे लोगों के लिए भी लाभकारी पेशा बनेगी,जो मजदूरों से खेती करवाते हैं,खुद नहीं करते।

  मैं खुद किसान परिवार से आता हूं।

हमारे यहां मजदूरों से खेती कराई जाती है।

अनुभव बताते हंै कि खेती कुल मिलाकर घाटे का सौदा है।

क्योंकि अनाज ही एक ऐसा उत्पाद है जिसकी कीमत ग्राहक तय करता है, उत्पादक नहीं।

ग्राहक लागत खर्च का ध्यान तक नहीं रखते।

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आजादी के तत्काल बाद चैधरी चरण सिंह जैसे जमीन के नेताओं ने तत्कालीन केंद्र सरकार को यह सुझाव दिया कि पहले कृषि का विकास कीजिए।

उसी से उद्योग के विकास में भी मदद मिलेगी।

क्योंकि किसानों की आय जब बढ़ेगी तो किसान परिवारों की करखनिया माल खरीदने की क्षमता भी बढ़ेगी।

उसी से उद्योग बढं़ेगे।

किंतु केंद्र सरकार ने कृषि के बदले लोक उपक्रमों पर अधिक जोर दिया।

आरोप लगा कि अधिकतर स्वतंत्रता सेनानियों को अपने बाल-बच्चों ,रिश्तेदारों और लगुए-भगुए को ‘‘सफेदपोश नौकरियां’’ दिलवाने की जल्दीबाजी थी।

इसीलिए भी लोक उपक्रमोें पर अधिक ध्यान दिया गया।

सरकार की एक दूसरी गलतफहमी थी।

वह यह कि हम अपने कारखानों के माल विदेश भेजेंगे और उन्हीं पैसों से विदेश से अनाज खरीद कर यहां के लोगों को खिलाएंगे। 

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खैर, देर आए दुरुस्त आए।

कृषि आधारित उद्योग को सरकार अब बढ़ावा दे रही है।

कृषि विधेयक लागू हो गया होता तो खेती का और भी अधिक विकास होता।यदि मनमोहन सिंह सरकार ने नीतीश सरकार को इथेनाॅल कारखाने लगाने की अनुमति दे दी होती तो अब तक कई ऐसे कारखाने लग चुके होते।

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दो और काम सरकारें करें।

एक तो केंद्र सरकार मनरेगा को किसानों से जोड़ दे।

ऐसी मांग तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से की थी।

पर आरोप है कि तब की सरकार ने यह काम इसलिए नहीं किया क्योंकि मनरेगा के पैसों को लूटने में प्रभु वर्ग को भारी असुविधा होती।आश्चर्य है कि नरेंद्र मोदी सरकार का भी इधर ध्यान नहीं है।

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अमृतसर जैसे धार्मिक स्थलों के आसपास नशे करना मना है।

उसी तरह विकास के नए मंदिर यानी पूर्णिया इथेनाॅल कारखाने के पास से वैसे तत्वों को दूर रखने का राज्य सरकार पक्का प्रबंध कर दे जिन तत्वों को घूस और रंगदारी से पैसे कमाने का नशा है।

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फेसबुक वाॅल से

 2 मई 22