शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

 ‘‘पी.एफ.आई.-केंद्र सरकार मुठभेड’’़ के पक्ष-विपक्ष में 

वस्तुपरक ढंग से बयान दें सेक्युलर राजनीतिक दल

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सुरेंद्र किशोर

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यदि इस देश के सेक्युलर दल अपनी चुनावी खैरियत चाहते हैं तो वे ‘‘केंद्र बनाम पी एफ आई मुठभेड़’’पर सोच -समझकर और वस्तुपरक ढंग से बयान दें।

अन्यथा,उनका वही हाल होगा जो हाल सिमी के पक्ष में बयान देने के कारण कुछ सेक्युलर दलों का हुआ है।

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सलमान खुर्शीद तो सुप्रीम कोर्ट में सिमी के वकील थे।अभी उत्तर प्रदेश विधान सभा में कांगेस के दो विधायक हैं।़

सिमी के लोगों ने पी.एफ.आई. बनाया है।इसका घोषित उद्देश्य सन 2047 तक भारत को हथियारों के बल पर इस्लामिक देश बना देना है।

मैंने मुंठभेड़ इसलिए लिखा क्योंकि इस संघर्ष में न तो मोदी सरकार जल्दी मानने वाली है और न ही पी.एफ.आई.।

यानी, निर्णायक लड़ाई की आशंका है।चाहे उसका जो नतीजा हो।

हालांकि राजसत्ता की अपार ताकत के सामने वह संगठन अधिक दिनों तक टिक नहीं पाएगा।

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अब प्रतिबंधित सिमी के हौसलों की बानगी नीचे पढ़िए।

इसके बावजूद इस देश के अधिकतर सेक्युलर दलों ने कहा था कि सिमी छात्रों का एक निर्दोष संगठन है।   

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9 अप्रैल 2008 के हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार सिमी के नागौरी ने कहा था कि ‘‘हमारा लक्ष्य जेहाद के जरिए भारत में इस्लामिक शासन कायम करने का है।

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टाइम्स आॅफ इंडिया के अनुसार सिमी के अहमदाबाद के जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने कहा था कि ‘‘जब भी हम सत्ता में आएंगे तो हम इस देश के सभी मंदिरों को तोड़ देंगे और वहां मस्जिद बनवाएंगे।’’.......30 सितंबर 2001 

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23 सितंबर 22



रविवार, 18 सितंबर 2022

    प्रशांत किशोर से क्षमा याचना सहित

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      प्रशांत किशोर बिहार में अपना 

      बहुमूल्य समय बर्बाद कर रहे 

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          सुरेंद्र किशोर

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  प्रशांत किशोर बड़ी उम्मीद के साथ बिहार में सक्रिय हैं।

उनकी मेहनत देखकर मैं प्रभावित हूं।

पर, इनकी सक्रियता देख कर मुझे डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी की सक्रियता याद आ रही है।

नब्बे के दशक में डा.स्वामी भी बिहार में सक्रिय हो गए थे।

   उन्होंने मध्य पटना में एक मकान भी खरीद लिया था।

उसमें उनकी पार्टी का आॅफिस था।

डा.स्वामी ने निश्चय किया था कि वे बिहार की तत्कालीन सरकार को उखाड़ फंेकेंगे।

उस राज को पटना हाई कोर्ट ने ‘जंगल राज’ कहा था।

   जब डा.स्वामी अपने काम में सफल नहीं हुए तो वे मकान बेच कर बिहार से चले गए।

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क्यों सफल नहीं हुए ?

क्योंकि उन्हें बिहार की जमीनी राजनीति, समाज नीति और राजनीति तथा समाज के बीच के संबंधों  की कोई खास समझ नहीं थी।

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पर डा.स्वामी को जिस बात की समझ थी,उस काम में वे अधिक तन्मयता से लग गए।उसमें वे सफल भी हुए।

उन्होंने पत्र-पत्र पत्रिकाआंे में विस्फोटक इंटरव्यू दे-देकर और लोकहित याचिकाओं के जरिए जय ललिता तथा देश के कई अन्य राजनीतिक हस्तियों को उनकी औकात बता दी।

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इधर प्रशांत किशोर के जो विचार सामने आते रहे हैं,उससे मुझे यह लगता है कि बिहार के बारे में प्रशांत की समझदारी का स्तर भी डा.स्वामी जैसा ही है।

इसलिए मेरी समझ के अनुसार प्रशांत किशोर बिहार में अपना बहुमूल्य समय खराब कर रहे हैं।

  मुझसे पूछेंगे तो मैं उन्हें कहूंगा कि यदि आपको बिहार में ही रहना है तो किसी न किसी संगठित दल में शामिल होकर उसमें अनुशासित ढंग से रहिए और काम करिए।अपनी ‘बारी’ का इंतजार करिए।

अन्यथा, आप डा.स्वामी का मार्ग अपना कर जीवन को सार्थक बनाएं।देश में भ्रष्टाचार अज सबसे बड़ी समस्या है।अन्य राष्ट्रीय समस्याओं से लड़ने में भी भ्रष्टाचार बाधक बन रहा है।

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उनकी तमाम उछल -कूद के बावजूद मैं डा.स्वामी के जीवन को सार्थक मानता हूं।

उन्होंने न सिर्फ देश के सर्वाधिक भ्रष्ट मुख्य मंत्री को जनहित में बर्बाद कर दिया,बल्कि भ्रष्टों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए अन्य जनहितकारी लोगों को भी एक बहुत बड़ा कानूनी हथियार थमा दिया।

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डा.स्वामी की याचिका पर ही सुप्रीम कोर्ट यह आदेश दे चुका है कि कोई आम नागरिक कोर्ट में याचिका दायर कर किसी बड़ी से बड़ी भ्रष्ट हस्ती के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की 

जांच करवा सकता है।

उसके लिए उसे कोई सरकारी अनुमति नहीं चाहिए।

इस कानूनी सुविधा का इस्तेमाल करके कोई व्यक्ति जनता का हीरो बन सकता है।

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हाल में प्रशांत किशोर के आॅफिस से मुझे फोन आया था। कहा गया कि प्रशांत जी आपसे मिलना चाहते हैं।

मैं अशिष्ट न होते हुए कह दिया कि मैं घर से निकलने की स्थिति में नहीं हूं।

वैसे भी इमरजेंसी छोड़कर मैं घर से नहीं निकलता।

निकलने की अब मुझे कोई जरूरत भी नहीं रही।न कोई ‘इच्छा’ बची है।

मेरा पुस्तकालय -संदर्भालय ही मेरा सबसे बढ़िया दोस्त है।

  दरअसल प्रशांत जी से मैं यदि मिलता तो मुलाकात के बाद उन्हें भी लगता कि उनका समय बर्बाद हुआ।

क्योंकि बिहार के बारे में समझदारी को लेकर हम दोनों ‘‘किशोर’’ दो छोर पर हैं।  

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फेसबुक वाॅल से 

16 सितंबर 22


 


गुरुवार, 8 सितंबर 2022

 कल मेरे यहां तीन-चार रिश्तेदार आए।

उनके साथ घंटों बातचीत हुई।

उस बीच किसी ने 

अपने स्मार्ट फोन का इस्तेमाल नहीं किया।

कई मााह पहले दिन चार अतिथि आए थे।

चारों अपने- अपने स्मार्ट फोन पर शुरू हो गए।

वैसे में मैं क्या करता !

मैं भी फेसबुक पर सक्रिय हो गया था।

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सुरेंद्र किशोर

8 सितंबर 22


सोमवार, 29 अगस्त 2022

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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काले धन की तलाश में केंद्र और बिहार सरकार की सक्रियता से लोगबाग खुश

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शासन में शुचिता के आग्रही लोगों के लिए यह संतोष की बात है। 

वह यह कि बिहार सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक की जांच एजेंसियां उन लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाइयां कर रही हंै जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं।

   गत जुलाई में पश्चिम बंगाल के पूर्व मंत्री और उनकी महिला मित्र के यहां करीब 50 करोड़ रुपए बरामद किए गए।

बिहार सरकार के एक इंजीनियर के दलाल के पास हाल में तीन करोड़ रुपए पाए गए।

न्यायप्रिय लोगों के लिए यह खुशी की बात है कि बिहार में गठबंधन बदल जाने के बावजूद भ्रष्ट लोगों के खिलाफ जांच एजेंसी की कार्रवाई नहीं रुकी है। 

 मनी लाउंडरिंग एक्ट की दो धाराओं पर सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है।एक आरोपित ने उन धाराओं की कठोरता कम करने की अदालत से गुहार की है।ध्यान रहे कि इन धाराओं की कठोरता के कारण ही जांच एजेंसी को अधिक सफलता मिल रही है।

यदि सुप्रीम कोर्ट ने उसकी कठोरता कम नहीं की तो भ्रष्टों के खिलाफ कारगर कार्रवाई जारी रहेगी।

बिहार सरकार भी यही संकेत दे रही है कि ‘‘भ्रष्टों और अपराधियों को न फंसाएंगे और न बचाएंगे।’’ 

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10 फीसद के पास 50 फीसद संपत्ति

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सन 2019 के नेशनल सेम्पल सर्वे के अनुसार इस देश के सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों के पास देश की 50 प्रतिशत भौतिक और वित्तीय संपत्ति है।

 संपत्ति के संकंेद्रण में भ्रष्टाचार का बड़ा योगदान है।

उधर भ्रष्टाचार कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है।

कालेधन के खिलाफ कार्रवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सन 2011 में एस.आई.टी.गठित करने का केंद्र सरकार को आदेश दिया था। 

उस आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील सन 2014 के मार्च में अदालत ने खारिज कर दी।

उसके कई महीने बाद एस.आई.टी गठित हुई।

पर हाल में जब मनी लाउंडरिंग एक्ट को कारगर बनाया गया तो छिपे काले धन तेजी से बाहर आने लगे।

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लाउड स्पीकरों का शोर

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आखिर लाउड स्पीकरों के कानफाड़ू शोर से बच्चों और बूढ़ों को कौन बचाएगा ?

 न सिर्फ बीमार,बल्कि परीक्षार्थी भी 

अनेक जगहों में शोर से परेशान रहते हैं।

पर,प्रशासन कहता है कि यह नाजुक मामला है।इसमें हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

 दरअसल सभी समुदायों के धर्म स्थलों के लाउड स्पीकरों के खिलाफ समान रूप से कार्रवाई हो तो किसी को कोई शिकायत नहीं रहेगी।

  उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने पहले गोरखनाथ मंदिर से अनावश्यक लाउड स्पीकर हटवा दिए थे।उसके बाद ही अन्य धर्म स्थलों से हटवाए गए।

नतीतजन कोई नाराज नहीं हुआ।

लाउड स्पीकरों की आवाज यदि धर्म स्थल परिसर से बाहर न जाने दिया जाए तो अनेक लोग रोज -रोज पीडित होने से  बचेंगे।

वैसे कितनी ऊंची आवाज में लाउड स्पीकर बजे,इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का आदेश मौजूद है।

कम से कम उसे तो सरकार लागू करे।

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सदनों में अशांति की समस्या

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संसद के दोनों सदनों में कैसे शांतिपूर्वक कामकाज हो,इसको लेकर संबंधित पक्ष इन दिनों कुछ अधिक ही चिंतित हैं।

जाहिर है कि पीठासीन पदाधिकारी और नरेंद्र मोदी सरकार कोई राह तलाश रहे हैं। 

संसद सदस्यों के लिए नई आचार संहिता बनाने के प्रस्ताव पर भी विचार हो रहा है।

किंतु सवाल है कि जिन राज्यों में भाजपा प्रतिपक्ष में है,वहां के सदनों में शांति बनाए रखने में भाजपा के विधायकों की कितनी रूचि रहती है ?

बेहतर हो कि पहले खुद भाजपा उन राज्यों की विधायिकाओं में आदर्श संसदीय आचरण का नमूना पेश करे।

फिर उसे संसद में शालीनता लाने में सुविधा होगी।

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   पिछड़ी जातियों का उप वर्गीकरण

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उत्तर प्रदेश में ओ.बी.सी. की 79 जातियां हैं।राज्य में ओ. बी. सी. की आबादी 45 प्रतिशत है।  

राज्य सरकार की नौकरियों में ओ.बी.सी.जातियों का अलग -अलग कितना प्रतिनिधित्व है ?

यह आंकड़ा जुटाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने सर्वे शुरू कर दिया है।जानकार सूत्र बताते हैं कि आंकड़े आ जाने के बाद राज्य सरकार ओ.बी.सी.जातियों का उप वर्गीकरण कर सकती है।उप-वर्गीकरण का उद्देश्य यह होगा कि जिन कमजोर पिछड़ी जातियों का राज्य सरकार की नौकरियों में प्रतिनिधित्व कम है या नहीं है,उन्हें वाजिब प्रतिनिधित्व दिया जाए। 

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भूली-बिसरी याद

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बिटिश सीक्रेट डाॅक्यूमेंट्स के अनुसार,सन 1942 में जयप्रकाश नारायण ने अंग्रेजी सेना के भारतीय सैनिकों की सहायता से भारत में सशस्त्र संघर्ष करने की योजना बनाई थी।

सैनिक और खुफिया विभाग से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर डा.मदन भट्ट ने 

सन 1988 में एक साप्ताहिक पत्रिका में लिखा कि जयप्रकाश नारायण ने भारत में छापामारों के एक संगठन का पूरी बारीकी से निर्माण किया था।

 उसे सैनिक विद्रोह का सहायक अंग माना गया था।दस्तावेज के अनुसार सेना के भारतीय अफसरों से जयप्रकाश नारायण के संबंध थे।

इनमें से कई अफसर उनकी सहायता के लिए तैयार भी थे।

सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द सेना ने भारत के सैनिकों में देश भक्ति की नई चेतना जगा दी थी।

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और अंत में

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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने सन 2020 में कहा था कि ‘वन नेशन ,वन इलेक्शन’ पर सोच-विचार जरूरी है।

यानी, देश में लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक ही साथ हों।

ताजा जानकारी यह है कि केंद्र सरकार ‘‘वन नेशन ,वन इलेक्शन’’ को कार्य रूप देने के लिए गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श शुरू करने जा रही है।

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प्रभात खबर,पटना-29 अगस्त 22

  


सोमवार, 22 अगस्त 2022

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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बिहार के मंत्रियों के लिए जारी ‘आचार संहिता’ एक सकारात्मक पहल

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राज्य के उप मुख्य मंत्री तेजस्वी यादव ने अपने दल यानी राजद के मंत्रियों के लिए छह सूत्री ‘आचार संहिता’ जारी की है।

इस तरह उन्होंने मंत्रियों के लिए ‘लक्ष्मण रेखा’ खींच दी है।

  मौजूदा राजनीतिक माहौल में यह एक अत्यंत सराहनीय पहल है।

हालांकि इसे जारी करना जितना आसान है, लागू करना उतना ही मुश्किल काम है।

पर,उम्मीद की जानी चाहिए कि राजद का शीर्ष नेतृत्व उसे लागू कराने के लिए अपनी कठोर इच्छा शक्ति का इस्तेमाल करेगा।उसे लागू करने से राजद का

जन समर्थन बढ़ सकता है।

साथ ही,राजद को ‘‘ए टू जेड’’ की पार्टी बनाने में भी उसे मदद मिल सकती है।

  पर, इसके साथ ही राजद के शीर्ष नेतृत्व को एक और बात का ध्यान रखना होगा।

 कोई मंत्री या प्रवक्ता बिना किसी ठोस सबूत के अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से कोई आरोप न लगाए।

हांलाकि यह बात अन्य दलों के नेताओं और प्रवक्ताओं पर भी समान रूप से लागू होती है। 

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चांसलर पद पर विचार

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कुछ राज्य सरकारें विश्व विद्यालयों के चांसलर पद से 

राज्यपाल को मुक्त कर देने की प्रक्रिया अपना रही हैं।

कुछ लोगों की राय है कि यह काम बिहार सरकार को भी कर ही देना चाहिए।

 विश्व विद्यालयों पर द्वैध शासन का प्रयोग अब विफल हो रहा है।केंद्र और राज्यों में अलग -अलग दलों के शासन होने के कारण चांसलर के काम कठिन हो रहे हैं।

  यदि विश्वविद्यालयों के चांसलर मुख्य मंत्री ही रहेंगे तो उच्च शिक्षा क्षेत्र की सफलताओं का श्रेय मुख्य मंत्री को ही मिलेगा।विफलताओं के लिए भी मुख्य मंत्री को जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा।

 अभी तो इस मामले में कई बार एक दूसरे पर दोषारोपण होते रहते हैं।दूसरी तरफ उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार 

की दिशा में काम नहीं हो पाते।  

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प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की गुणवत्ता

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बिहार में नए- नए और बड़े -बड़े निजी और सरकारी अस्पताल खुल रहे हैं।

फिर भी अस्पतालों पर मरीजों का बोझ घट ही नहीं रहा है।बल्कि बढ़ता जा रहा है।बड़े अस्पतालों में मेला के दृश्य नजर आते हैं।

 इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण अस्पतालों की भारी 

कमी है।अधिकतर प्राथमिक चिकित्सालयों में बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।इस समस्या से कैसे निपटा जाए,यह बड़ी समस्या सामने है।

  बिहार में उद्योग लगाने पर जोर दिया जा रहा है।

 यदि इस काम में सफलता मिलती है तो बड़ी अच्छी बात है।

राज्य सरकार को इच्छुक उद्योगपतियों से एक आग्रह करना चाहिए।वह यह कि उद्योगपति अपने कार्य क्षेत्र में एक गुणवत्तापूर्ण स्कूल  और एक बेहतर अस्पताल की भी स्थापना करंे।जो उद्योगपति ऐसा करते हैं,उन्हें सरकार करों में कुछ रियायत दे।

इससे उन उद्योगों के कर्मचारी व उनके बाल-बच्चे भी तो बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर पाएंगे।

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भूमि -अधिग्रहण का उद्देश्य

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‘‘पटना में सुव्यवस्थित आवासीय काॅलोनी के निर्माण के लिए’’ बिहार सरकार ने सत्तर के दशक में दीघा में 1024 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया  था।

  बाद के वर्षों में उस जमीन के अधिकांश पर भू माफियाओं ने कब्जा कर उसे बेच दिया।

 यह अच्छी बात है कि पटना हाईकोर्ट के निदेश पर बिहार सरकार उन माफियाओं के खिलाफ इन दिनों सख्त कार्रवाई कर रही है। 

उन 1024 एकड़ में से जो अंश माफियाओं के चंगुल में जाने से बच गया,उसे शासन सरकारी दफ्तरों के लिए इस्तेमाल कर रही है।

  पर, 1981 में जिन 11 हजार लोगों से आवास बोर्ड ने अग्रधन वसूले थे,उन्हें सरकार व बोर्ड ने निराश किया।

हाई कोर्ट को इस सवाल पर भी विचार करना चाहिए कि जिस उद्देश्य से दीघा जमीन का अधिग्रहण किया गया,उस उद्देश्य की पूत्र्ति क्यों नहीं की गई।क्या अब से भी उन 11 हजार आवेदकों में से कुछ लोगों को वहां जमीन दी जा सकती है ?

  आवास बोर्ड ने पिछले वर्षों में उन 11 हजार लोगों में से अधिकतर लोगों के पैसे लौटा दिए।किंतु अब भी कई लोग बचे हैं जिन्होंने अपने पैसे आवास बोर्ड से नहीं लिए हैं।

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गुणवत्तापूर्ण कैमरे जरूरी 

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पटना के तीन सौ जगहों में ढाई हजार सी.सी.टी.वी.कैमरे लगाने का शासन का फैसला सराहनीय है।

इससे अपराध पर काबू पाने में सुविधा होगी ।

साथ ही, देर-सवेर सड़क दुर्घटनाओं में भी कमी आ सकती हैं।

किंतु ऐसे कैमरे लगाने के बाद भी एक दिक्कत अक्सर सामने आती रहती है।

कई बार कैमरे घटिया गुणवत्ता वाले होते हैं।तो कई बार उनके रख-रखाव में आपराधिक लापरवाही बरती जाती है।

अब उम्मीद की जाती है कि ढाई हजार कैमरों को लेकर वैसी लापारवाही और अनियमितता नहीं होगी।

यदि सार्वजनिक धन लगता है तो उसका लाभ भी लोगों को मिले। 

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और अंत में

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पिछले दिनों बिहार के एक जिले के एक प्रखंड मुख्यालय परिसर में आयोजित जन सुशासन शिविर में अजीब दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य उपस्थित हो गया।

वहां अफसर और पूर्व विधायक के बीच जम कर तू -तू मैं -मैं का दृश्य उपस्थित हो गया।

पर, उस बीच मौजूदा जन प्रतिनिधि चुप रहे।

यह गंभीर व चिंताजनक सवाल है कि सरकारी कार्यों में जिन घोटालों की खबरें मीडिया और पूर्व जन प्रतिनिधियों तक पहुंच जाती हैं, वैसी ही खबरें मौजूदा जन प्रतिनिधियों तक क्यों नहीं पहुंच पातीं ?

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प्रभात खबर-पटना- 22 अगस्त 22


सोमवार, 15 अगस्त 2022

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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अदालती सजा-दर बढ़ाने के लिए गवाहों-अभियोजकों की सुरक्षा जरूरी 

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इस देश में अदालती सजा की दर बढ़ाए बिना आपराधिक न्याय व्यवस्था को बेहतर बनाने का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।

  देश में गवाहों को पोख्ता सुरक्षा प्रदान किए बिना सजा की दर बढ़ाना मुश्किल होगा।

सन 2018 में सरकार ने गवाह सुरक्षा स्कीम बनाई।

पर वह नाकाफी है।

  याद रहे कि अमेरिका और जापान में अदालती सजा की दर लगभग 99 प्रतिशत है।जबकि, भारत में करीब 60 प्रतिशत।

अमेरिका में गवाहों की सुरक्षा की पक्की व्यवस्था है।

 भारत में जितने लोगों के खिलाफ अदालतों में आरोप पत्र दाखिल किए जाते हैं,उनमें से सिर्फ 60 प्रतिशत आरोपितों को ही अदालतें सजा दे पाती हैं।इसके कई कारण हैं।

 पर, अनेक मामलों में भयवश गवाह अदालत में उपस्थित ही नहीं होते।या फिर अपने पिछले बयान से वे पलट जाते हैं।

  इसमें प्रलोभन भी भूमिका निभाता है।

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 अभियोजकों की सुरक्षा

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  अभियोजकों की समस्या भी इस देश में गंभीर है।

वैसे यदा कदा खुद अभियोजक भी ‘‘प्रभाव’’ में आ जाते हैं।

कई बार राजनीतिक कारणों से भी अभिभोजक अपनी जिम्मेदारी निभा नहीं पाते।

लेकिन कुछ अभियोजक दुर्दांत अपराधियों और माफियाआंे के खिलाफ भी निष्पक्षतापूर्वक अभियोजन चलाते हैं।यदि उन मामलों में उन्हें सजा हो जाती है, तो अभियोजकों की जान पर उनके रिटायर होने के बाद भी खतरा बना रहता है।

याद रहे कि खतरा झेलने वाले ऐसे लोगों को उनके सेवाकाल में तो सुरक्षा प्रदान की जाती है।

किंतु रिटायर हो जाने के बाद उनकी सुरक्षा वापस ले ली जाती है।

यदि ऐसे संवेदनशील मामलों में सरकार ने रिटायर लोगों को भी सुरक्षा देने को लेकर नियम नहीं बनाया तो 

संभव है कि एक दिन अनेक अभियोजक अपनी ड्यूटी में खतरा नहीं उठाएगा।

 इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का एक ताजा निर्णय उनके लिए चिंताजनक है।अदालत ने कहा है कि ‘‘हर सेवानिवृत पुलिस अफसर को चैबीसों घंटे सुरक्षा मुहैया कराना संभव नहीं।’’ 

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वादों की जगह काम देखिए

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चुनाव से पहले किस दल ने मतदाताओं से क्या -क्या वायदे किए थे,उसकी चर्चा सरकार बनने के बाद होती रहती है।

होनी भी चाहिए।

 किंतु उस चर्चा से अधिक जरूरी बातें कुछ और भी हैं।

उनमें से महत्वपूर्ण बात यह है कि नई सरकार के कामकाज कैसे हो रहे हैं।

निर्माण,विकास और कल्याण से संबंधित योजनाओं पर सरकार कैसा काम कर रही है ?

कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार हो रहा है या नहीं ?

दरअसल इन कसौटियों पर किसी सरकार को कसा जाना चाहिए।

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 भूली-बिसरी याद

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सत्तर के दशक में इस देश के एक

मशहूर व्यापारिक घराने के बारे में एक खास बात कही जाती थी।

वह बात अयोग्य स्टाफ के बारे में होती थी।

जिन कर्मचारियों से प्रबंधन नाराज हो जाता था।

ऐसे कर्मियों को भी है वह घराना एकबारगी नौकरी से निकाल नहीं देता था।

वैसे कर्मियों को वह पहले की अपेक्षा बहुत अधिक वेतन के साथ अधिक ऊंचे पदों पर बैठा देता था।  

उन्हें आरामदायक चेम्बर और आदेशपाल दे दिया जाता था।

किंतु वह कुछ ही महीनों के लिए।

उसके बाद उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता था।

वैसे पदच्युत बेचारे उतनी ही बड़ी कुर्सी के लिए अन्य घरानों में आवेदन पत्र पहुंचाने लगते थे।

उससे छोटी कुर्सी अब उन्हें नहीं चाहिए।बड़ी कुर्सी तो मिलने से रही।

 अंत में निराश होकर वे घर बैठ जाते थे।

इसी तरह का हाल इन दिनों राजनीति में भी यदाकदा देखा जा रहा है। 

 किसी नेता को एक बार संसद या विधान मंडल का सदस्य बना दिया गया तो उसमें ताउम्र उस सदस्यता को बनाए रखने की उत्कंठा तीव्र हो जाती है।यह बात उच्च सदनों की सदस्यता पर अधिक लागू होती है।

मूल पार्टी से उसका नवीकरण नहीं हुआ तो वह विभिन्न दलों

की चैखटों पर बारी -बारी से सिर नवाने लगता है।

उन में से कुछ नेता तो अंततः विफल ही होते हैं।

इस तरह उनके राजनीतिक कैरियर का अंत हो जता है।

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और अंत में

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स्वास्थ्य,शिक्षा और व्यक्तिगत सुरक्षा की समस्याएं व्यापक हैं।  इनके हल के लिए सिर्फ सरकारों पर ही निर्भर नहीं रहा जा सकता।सरकारों से तो जो कुछ बन पाता है,वे करती ही रहती  हैं।

  पर,साथ-साथ, इन समस्याओं को हल करने के लिए नागरिकों को भी अपनी तरफ से कुछ पहल करनी होगी।खासकर वैसे नागरिक को, जो आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत समर्थ हैं।यानी,वे अन्य मदों की अपनी फिजूलखर्ची कम करके भी इन तीन मदों में पहले की अपेक्षा अब अधिक खर्च करें।व्यक्तिगत सुरक्षा भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

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प्रभात खबर,पटना 15 अगस्त 22


    


 भारत की आजादी का अमृत महोत्सव

-एक पुनरावलोकन

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सुरेंद्र किशोर

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  आजादी के तत्काल बाद के हमारे शासक ‘सुशिक्षित’ थे।

आज के शासक तो कुछ कांग्रेसी नेताओं के शब्दों में अनपढ़-गंवार व चाय बेचने लायक योग्यता रखने वाले हैं।

नीच हैं।  

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आजादी के बाद के हमारे शासक जिन्होंने 

कैम्ब्रिज में शिक्षा पाई थी--

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जवाहरलाल नेहरू(प्रधान मंत्री),

सरदार वल्लभ भाई पटेल,

उप प्रधान मंत्री(लंदन में वकालत की पढ़ाई की)

सी.डी.देशमुख(वित्त मंत्री) 

मोहन कुमार मंगलम(केंद्रीय मंत्री) 

एल.के. झा (रिजर्व बैंक के गवर्नर)

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जिन्होंने आॅक्सफोर्ड में शिक्षा पाई--

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इंदिरा गांधी(प्रधान मंत्री),

जाॅन मथाई(वित्त मंत्री) 

एच.एम.पटेल(वित्त सचिव व वित्त मंत्री)

वी.के.कृष्ण मेनन(लंदन स्कूल आॅफ इकोनाॅमिक्स में शिक्षित )

आदि आदि आदि..............।

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मैंने सिर्फ 1985 के पहले के प्रमुख शासकों की चर्चा की है।

इनके सत्ता में रहते सौ पैसे घिसकर 15 पैसे रह गए।

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यदि किसी अन्य व्यक्ति ने कहा होता तो उसकी मंशा पर सवाल उठ जाता।

किंतु सन 1985 में प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा कि दिल्ली से हमारी सरकार 100 पैसे भेजती है,किंतु लोगों तक सिर्फ 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं।

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यानी, जब नींव में ही घुन लग गया,तो अंजामे गुलिश्ता.......!!!!

अब बताइए,हमारे पढ़े-लिखे शासकों ने हमारे 85 पैसे लूट में चले जाने का अघोषित प्रबंध कर दिया था।

यह शासन का कुप्रबंधन था या शासकों की बेईमानी ?

(चीन में कभी यह कहा गया था कि भारत सरकार अपने बजट का पैसा ऐसे लोटे में रखती है,जिसमें अनेक छेद हैं।)

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आजादी के बाद के भारतीय शासकों की ‘नीयत’ का एक नमूना--

आजादी के तत्काल बाद बिहार विधान सभा में 

साठी लैंड रिस्टोरेशन विधेयक पर चर्चा चल रही थी।

(आजादी के तत्काल बाद (साठी)चम्पारण जिले की सैकड़ों एकड़ जमीन की प्रमुख कांग्रेसियों ने आपस में बंदरबांट कर ली थी।

बहुत बदनामी हुई तो गृह मंत्री सरदार पटेल ने उस जमीन की वापसी का बिहार सरकार को सख्त निदेश दिया।बिल उसी उद्देश्य से लाया गया था।किंतु नेता की मंशा बहस में ही प्रकट हो गई थी।यह भी कि आगे क्या होने वाला है !) 

बिल पर बहस के दौरान एक कांग्रेसी नेता ने,जो बाद में मुख्य मंत्री तक बने थे,बिल का विरोध करते हुए कहा कि 

‘‘हमने आजादी की लड़ाई में बहुत कष्ट सहे थे। 

जिन लोगों ने सन 1857 के विद्रोह के समय अंग्रेजों का साथ दिया था,अंग्रेजों ने उन्हें तरह -तरह के ‘इनाम’-धन संपत्ति  दिए थे।

हम भी चाहते हैं कि हम अपने बाल -बच्चों के लिए कोई सिलसिला बनाएं।’’

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जो लोग कहते हैं कि आरक्षण से गिरावट आती है,वे आॅक्सब्रिज शिक्षित शासकों के बारे में क्या कहेंगे जिनके राज में 85 प्रतिशत सार्वजनिक संसाधन लूट लिए गए ?

सरकारें सारे विकास व कल्याण पैसों से ही तो करती हैं।

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दरअसल सवाल नीति और शासकों के सुशिक्षित होने या न होने का नहीं हैं,बल्कि सवाल हमारे हुक्मरानों की नीयत का है।

इस कहानी का ‘मोरल’ यह है कि ईमानदार नेता किसी भी जाति -समुदाय-अधिक शिक्षित-कम शिक्षित समूह में हो सकते हैं।

 भरसक उन्हें ही सत्ता में बैठाने का प्रबंध मतदाताओं को करना चाहिए जो सरकारी पैसों का रक्षक बने न कि लुटेरा। 

अब सवाल यह भी है कि जिन्हें आप अनपढ़-गंवार व चाय बेचने लायक योग्यता रखने वाला, नीच कहते हैं,उसके राज में सौ पैसे घिसकर कितना रह जाता है ?

वैसे तो घिस तो अब भी रहा है।

किंतु क्या 100 से घटकर 15 हो जा रहा है ?   

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15 अगस्त 2022