बुधवार, 27 मई 2026

 



आर्थिक रूप से कमजोर पद्म अवार्डीज को मासिक मानदेय देने के बारे में

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गत फरवरी में प्रभारी मंत्री विजय चैधरी ने मानदेय देने का आश्वासन बिहार 

विधान परिषद में दिया था

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सुरेंद्र किशोर

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मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी ने कल कहा  कि पद्म पुरस्कार पाने वालों ने अपने असाधारण योगदान से न केवल अपने क्षेत्र को गौरवान्वित किया ,बल्कि भारत की प्रतिभा,संस्कृति व सामथ्र्य को विश्व मंच पर नई पहचान दिलाई।’’

  ‘‘भोजपुरी लोक संगीत की अमूल्य परम्परा को जीवंत रखने वाले भरत सिंह भारती,ख्यात कृषि वैज्ञाानिक स्व.डा.गोपाल जी त्रिवेदी तथा नृत्य गुरु स्व.विश्व बंधु जी को मिला सम्मान ,आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।’’

  ध्यान रहे कि ये तीन हस्तियां बिहार से रही हैं।

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इससे पहले गत 25 फरवरी, 26 को बिहार विधान परिषद में जदयू के नीरज कुमार ने पद्म अवार्डियों के लिए मासिक मानदेय देने का प्रावधान करने के लिए बिहार सरकार का ध्यानाकर्षित किया था।

ध्यानाकर्षण सूचना के जवाब में प्रभारी मंत्री विजय कुमार चैधरी ने सदन में  आश्वासन देते हुए कहा था कि ‘‘राज्य सरकार पद्म सम्मानित हस्तियों को मासिक मानदेय या आर्थिक सहायता देने पर विचार करेगी।’’

श्री चैधरी ने सदन में यह भी कहा कि उन पद्म आर्डियों ने बिहार का सम्मान बढ़ाया है तो राज्य सरकार भी उनके लिए यथायोग्य करेगी।

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याद रहे कि सन 2014 में सत्ता संभालने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने आम तौर से प्रचार से दूर नेपथ्य में रह कर असाधारण काम करने वालों को भी जब पद्म सम्मान देना शुरू किया तो यह पता चलने लगा कि उनमें से कई अवार्डी  फटेहाल हैं और उनकी मासिक आय सरकार की न्यूनत्तम मजदूरी से भी कम है।

 पद्म सम्मानित व्यक्तियों को केंद्र सरकार कोई मासिक मानदेय नहीं देती।

किंतु उनकी फटेहाली को ध्यान में रखते हुए निम्न लिखित चार राज्य सरकारें मासिक मानदेय देती हैं--

1.-ओडिशा सरकार --30 हजार रुपए मासिक

2.-तेलांगना सरकार--25 हजार रुपए मासिक

(इसके अलावा 30 लाख रुपए एकमुश्त)

3.-हरियाणा सरकार--10 हजार रुपए मासिक

4.-छत्तीस गढ़ सरकार --10 हजार रुपए मासिक

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हिन्दुस्तान के रांची संस्करण में प्रकाशित समाचार के अनुसार ‘‘पद्म पुरस्कार विजेताओं को सम्मान राशि देगी झारखंड सरकार’’

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मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले आम तौर पर ऐसी हस्तियों को पद्म सम्मान दिए जाते थे जिन्हें गुजारे के लिए मानदेय की जरूरत नहीं पड़ती थी।

 2014 के बाद बिहार के जिन लोगों को पद्म अवार्ड मिले उनमें से कुछ को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। कुछ ऐसे पद्मश्री अवार्डीज भी हैं जिनकी पक्की मासिक आय 5 हजार रुपए से भी कम है।ऐसे कई अन्य हस्तियां भी हो सकती हैं।इसलिए बिहार सरकार वैसे पद्म अवार्डीज को आर्थिक मदद करने पर विचार कर ही सकती है जो आयकर नहीं देते।

या फिर भारत सरकार ही इस दिशा में कोई कदम उठाये ताकि इस मामले में पूरे देश में समरुपता रहे।

क्योंकि यह जरूरी नहीं कि हर राज्य सरकार का इस मामले में दिल पसीजे ही।

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देश के कुछ विपन्न पद्म अवार्डीज की कहानियां--याद रहे कि पद्मश्री अवार्ड देश का चैथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।

कल्पना कीजिए जिसे आप इतना बड़ा सम्मान लायक समझते हैं,उनकी निजी आय न्यूनत्तम मजदूरी से भी कम हो !!

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ओड़िशा के ‘‘लोक कवि रत्न’’ हलधर नाग को सन 2016 में पद्म श्री अवार्ड लेने के लिए नई दिल्ली बुलाया गया तो लोक कवि ने केंद्र सरकार को लिख दिया--‘‘साहब,मेरे पास दिल्ली आने के लिए पैसे नहीं हैं। इसलिए अवार्ड को डाक से भिजवा दीजिए।’’

बाद में उनके जाने का प्रबंध हुआ और उन्होंने अवार्ड ग्रहण किया।

ऐसी घटना से द्रवित होकर ओड़िशा सरकार ने अपने राज्य के पद्म अवार्डियों को मासिक 30 हजार रुपए मानदेय देने का निर्णय किया। वह उन सब पद्म अवार्डियों को मिल रहा है जो ओड़िशा के निवासी हैं।

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सन 2022 में तेलांगना के पद्म सम्मानित  

दर्शनम मुगोलैया को जब वहां की राज्य सरकार ने हैदराबाद में मजदूरी करते पाया तो तेलांगना सरकार ने अपने राज्य के पद्म अवार्डियों के लिए मासिक 25 हजार रुपए मानदेय देना शुरू कर दिया।

साथ ही, उन्हें एकमुश्त 25 लाख रुपए भी दिये।

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इसी तरह हरियाणा और छत्तीस गढ़ की सरकारें अपने राज्य के साधनहीन पद्म आवार्डियों को मासिक मानदेय 10 हजार रुपए देती है।

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गत साल रांची से यह खबर आई कि 90 साल के पद्म श्री अवार्डी सिमोन उरांव पैरालिसिस अटैक के बाद बिस्तर पर हैं।उनके इलाज की उचित व्यवस्था नहीं हो पा रही है।बाद में उनका क्या हुआ,यह पता नही चल सका।

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इस बार जनवरी ,2026 में जिन लोगों को पद्म अवार्ड दिए जाने की घोषणा हुई,उनकी सूची वाली खबर के साथ प्रभात खबर ने सटीक हेडिंग लगाई थी 

‘‘गुमनाम चेहरे,असाधारण काम,सेवा से बनी पहचान।’’

इस सूची को भी सरसरी तौर पर देखने से लगता है कि संभव है इनमें भी कुछ मोगलैया,सिमोन उरांव और हलधर नाग हो सकते हैं।ऐसे लोगों की सुध कौन और कब लेगा ?यह पता लगाना केंद्र और राज्य सरकारों के लिए आसान होगा कि इनमें से कितने ऐसे अवार्डीज हैं जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं और जो आयकर नहीं देते।

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27 मई 26

 


  

 


मंगलवार, 26 मई 2026

  हजारों जेपी सेनानियों  को सम्मान-सहारा मिला होता 

तो बाद की पीढ़ियां भी सार्वजनिक कामों में जुटतीं।पर 

अपवादों को छोड़कर अब भाड़े पर ही कार्यकर्ता उपलब्ध

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क्योंकि सत्ता की मलाई तो नेताओं के वंशजों-परिजनों 

 के लिए रिजर्व होती जा रही है

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करीब तीन साल पहले बिहार में जब एक नया दल बना तो

उस दल के नेता ने हर जिले में वेतन पर कार्यकर्ता रखा।

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क्योंकि आम तौर पर कोई मुफ्त में काम करने को तैयार नहीं है,अपवादों की बात और है।

क्योंकि चुनावी टिकट भी तो अब आम तौर पर पहले से स्थापित नेता 

के परिजन और धनवानों को मिलने लगे हैं।

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सन 2025 के आंकड़े के अनुसार बिहार के 24 हजार 905 स्वतंत्रता सेनानियों व उनके आश्रितों को पेंशन मिल रही है।

पर कितने जेपी सेनानी बिहार में पेंशन पा रहे हैं ?

 सिर्फ 3354 जेपी सेनानी।

 फरार स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भी कांग्रेसी सरकार ने पेंशन की व्यवस्था कराई।पर फरार जेपी सेनानी कौन कहे,जेल गए और आपातकाल में अपार कष्ट सहे जेपी सेनानी भी पेंशन के लिए अब भी तरस रहे हैं।

धन्यवाद नये मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी को जिन्होंने जेपी सेनानियों की सुध लेनी शुरू की है।

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याद रहे कि अंग्रेजों ने अपने शासन काल में स्वतंत्रता सेनानियों के ‘‘जीने का अधिकार’’ नहीं छीना था।पर आपातकाल में इंदिरा गांधी सरकार ने भारत के लोगों के जीने का संवैधनिक अधिकार तक छीन लिया था।यह बात आपातकाल में सरकारी वकील ने सुप्रीम कोर्ट मेें साफ -साफ कह दिया था।

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मैं भी आपातकाल का एक अदना भुक्तभोगी रहा हूं।

 मैं सबूत के तौर पर अपना खुद का अनुभव संक्षेप में बताता हूं।

मुझे बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में जब सी.बी.आई.बेचैनी से खोज रही थी तो तब के बिहार के मुख्य मंत्री सचिवालय में तैनात मेरे एक मित्र ने मुझे आगाह कर दिया ।मैं मेरे मित्र राम बिहारी सिंह की मदद से भूमिगत हो गया।

 बिहार में जब अधिक दिनों तक भूमिगत रहना मेरे लिए संभव न हो सका तो मैं मेघालय जाकर अपने एक रिश्तेदार के यहां छिप गया।वहां कांग्रेस की सरकार नहीं थी,इसलिए आपातकाल के भीषण अत्याचार से वह राज्य बचा हुआ था।

वैसे आपातकाल में जो जेल गये,उन्हें तो भोजन आदि मिल पा रहे थे,पर मुझे कितना अपार कष्ट हुआ,वह सब मैं अपनी जीवनी में लिखूंगा।राह चलते मुझे देख लेने पर भी मेरे मित्र -परिचित मुझसे मुंह फेर लेते थे।उन्हें डर था कि मुझसे बात करते सी.आई.डी.देख लेगी तो उन्हें भी जेल जाना पड़ सकता है।

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जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद और लालू-नीतीश राज में भी मैंने कोई मुआवजा नहीं मांगा--पत्रकारिता के पेशे में जाकर जीवन यापन करने लगा।

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पर,जिन भुक्तभोगी जेपी सेनानियों को अब भी कुछ नहीं मिला,उनकी उम्मीदें 

सम्राट चैधरी पर टिकी है।

  आजादी के बाद जेपी आंदोलन बिहार का सबसे बड़ा जन आंदोलन था।

हजारों पेंशन वंचित जेपी आंदोलनकारियों को कुछ मिला होता तो सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले नौजवान आज भी उपलब्ध होते।

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इस पृष्ठभूमि में प्रभात खबर में आज प्रकाशित मेरा काॅलम पढ़िए।

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 पेंशन के लिए प्रतीक्षारत जेपी सेनानियों की उम्मीद जगी

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   सुरेंद्र किशोर

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जानकार सूत्रों के अनुसार मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी ने पेंशन के लिए वर्षों से प्रतीक्षा रत जेपी सेनानियों की उम्मीद जगा दी है।

खबर है कि जेपी सेनानी सम्मान योजना की सलाहकार पर्षद का जल्द ही पुनर्गठन होने वाला है।

  उसके बाद पेंशन के लिए एकत्र किए गए हजारों आवदेन पत्रों पर विचार होगा।

 करीब 21 हजार ऐसे जेपी सेनानियों के आवेदन पत्र विचाराधीन हैं,जिन्होंने सन 1974 से लेकर 1977 तक जेल यातना सही या फरार रहे।या उन्हें यातनाएं दी गईं।

इनमें से करीब 450 आवेदन पत्रों की जांच हो चुकी है।

ऐसे आवेदन पत्रों पर सलाहकार पर्षद की अनुशंसा अपेक्षित है।

जानकारी मिली है कि मुख्य मंत्री श्री चैधरी ने उन सेनानियों के प्रति अत्यंत सकारात्मक रुख अपनाया है जिन्होंने जेपी आंदोलन और आपातकाल में अपार कष्ट सहे थे।

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     पेंशन पर कांग्रेस का एतराज

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जेपी सेनानियों के लिए नीतीश सरकार ने सन 2009 में पेंशन योजना शुरू की।तब कांग्रेस तथा कुछ अन्य दलों ने इसका विरोध किया था।पर मुख्य मंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी ने जेपी सेनानियों और उनके परिजनों के अपार कष्टों की चर्चा करते हुए उसका औचित्य बताया।

जिन सेनानियों को पेंशन की राशि अभी मिल रही है,उनकी संख्या कम है।

बहुत सारे आवेदन लंबित हैं जिन पर फैसला होगा।जेपी सेनानियों के लिए यह संतोष की बात होगी कि मुख्य मंत्री चैधरी ने खुद ही उनकी समस्या को हल करने में रूचि दिखाई है।

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राष्ट्रीय स्तर पर सेनानी

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  जेपी सेनानी सम्मान योजना की सलाहकार पर्षद के तत्कालीन अध्यक्ष व बिहार सरकार के  पूर्व राज्य मंत्री मिथिलेश कुमार सिंह ने

सन 2015 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिखा था। दिवंगत सिंह ने लिखा था कि जेपी सेनानियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पेंशन स्वीकृत करने पर केंद्र विचार करें।

दरअसल कुछ भाजपा शासितत राज्य सरकारें जेपी सेनानियों को

अपने यहां सम्मान पेंशन तो दे देती है।पर जैसे ही वहां कांग्रेस की सरकार बन जाती है तो उसे वह बंद कर देती है।

इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में पहल होनी चाहिए।  

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  न बांस रहेगा,न बजेगी बांसुरी

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 लगता है कि डी.जे.और लाउड स्पीकर की आवाज को नियंत्रित 

करना इस देश के

शासन तंत्र के वश में नहीं है।नियंत्रण के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की लगातार उपेक्षा होती रहती है।

  दरअसल अब डी.जे. के उत्पादन पर ही प्रतिबंध लगा देने के बारे में विचार करना चाहिए।

क्योंकि यह फसाद की जड़ भी बनता जा रहा है।आए दिन तेज आवाज वाले डी.जे.के कारण हिंसा होती है और लोगों की जानें भी जाती हैं।बूढ़े और बच्चों के स्वाथ्य पर तेज आवाज का बहुत बुरा असर पड़ता है।

इसी तरह लाउड स्पीकर के निर्माण के समय ही उसमें ऐसा यांत्रिक प्रबंध हो जाए ताकि उसकी आवाज उसी सीमा तक रहे जो सीमा सुप्रीम कोर्ट ने तय की है।ऊंची आवाज वाली लाउड स्पीकर मशीन का निर्माण सिर्फ पुलिस-प्रशासन के लिए सीमित संख्या में हो।

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ग्रामीण बाजारों का संपर्क मार्ग

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बिहार में संपर्क मार्ग को लेकर राज्य सरकार का काम सराहनीय है। मुख्य मंत्री ग्राम संपर्क योजना के तहत व्यापक स्तर पर काम हो रहे हैं। मुख्य मार्गों से संपर्क विहीन बसावटों को जोड़ना है।ऐसी सड़कें हर मौसम में काम करंेगी।

इस सिलसिले में एक खास बात पर ध्यान देने की जरुरत है।

विभिन्न गांवों को पास के बाजारों से भी गांवों को जोड़ने की दिशा में प्राथमिकता के आधार पर काम होना चाहिए।

उदाहरणार्थ सारण जिले के दरियापुर अंचल के खानपुर-भरहापुर बाजार की चर्चा प्रासंगिक होगी।

इस बाजार से पश्चिम की ओर सखनौली गांव की ओर जा रही सड़क की हालत वर्षों से खराब है।

  नदी किनारे से गुजर रही इस महत्वपूर्ण सड़क के मजबूतीकरण से बाजार का भी विकास होगा और स्थानीय स्तर पर ही लोगों के रोजगार के अवसर बढ़ जाएंगे।  

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भूली-बिसरी यादें

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यह बात सन 1969 की है।इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में मोरारजी देसाई उप प्रधान मंत्री और वित्त मंत्री थे।

प्रधान मंत्री श्रीमती गांधी ने देसाई को विश्वास में लिए बिना उनसे लेकर खुद वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाल लिया।साथ ही 

प्रधान मंत्री ने मोरारजी देसाई से कहा कि आप उप प्रधान मंत्री बने रहें।

देसाई ने इसे अपनी तौहीन समझी और केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

उससे पहले प्रधान मंत्री ने देसाई को लिखा था कि चूंकि आपकी आर्थिक नीति हमारे विचारों से मेल नहीं खाती,इसलिए क्यों न आपको वित्त मंत्री पद से मुक्त कर दिया जाये ?

इस पत्र का जवाब मोरारजी देसाई लिखवा ही रहे थे कि उसी बीच उन्हें यह जानकारी मिली कि उनसे वित्त मंत्रालय ले लिया गया है।मोरारजी दसाई ने सिर्फ उप प्रधान मंत्री बने रहना ठीक नहीं समझा और मंत्रिमंडल से ही अपना इस्तीफा भेज दिया।

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और अंत में 

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इसी साल 14 फरवरी को बिहार पुलिस के आई.जी. जितेंद्र राणा ने अतिक्रमण के बारे में आयेजित बैठक में कहा था कि किसकी लापरवाही से पटना की सड़कों पर दोबारा अतिक्रमण हो जाता है,उसकी जवाबदेही तय होगी।

तीन महीने के बाद भी अब तक यह पता नहीं चल सका है कि इस मामले में किन-किन लोगों की जवाबदेही तय हुई है। 

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दैनिक प्रभात खबर,पटना में 25 मई 26 को प्रकाशित

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रविवार, 24 मई 2026

 मेरठ के पत्रकार राजेश 

अवस्थी ने की आत्म हत्या

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आर्थिक दुर्दशाग्रस्त पत्रकार की आत्म

हत्या की पृष्ठभूमि में देश के ईमानदार

 पत्रकारों की रक्षा कौन करेगा ? 

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सुरेंद्र किशोर

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मेरी पक्की आय 1231 रुपए मासिक(पी.एफ.पेंशन) है,परिवार का साथ नहीं होता तो क्या मैं भी अवस्थी की राह पर चले जाने को मजबूर हो जाता ?

पता नहीं !

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सुप्रीम कोर्ट के जज की सेवा निवृति की आयु 65 साल है।

आज भारतीयों की जीवन प्रत्याशा करीब 78 साल है।

1947 में जीवन प्रत्याशा 32 साल थी तो सरकारी सेवा से तब लोग 55 साल की उम्र में रिटायर करते

थे।आज उस अनुपात में अवकाश ग्रहण की आयु क्यों नहीं बढ़ रही है ?

मैं सन 2005 में अखबार की सेवा से रिटायर कर गया।पर आज भी मैं उतने ही घंटे काम करता हूं क्योंकि मैं अब भी शारीरिक रूप से सक्षम हूं।

भाजपा ने तो अपने लोगों के लिए अधिकत्तम आयु रखी है--75 साल।

 उसके बाद ही सलाहकार मंडल !!

पर सरकारी सेवक 60 साल की उम्र में ही रिटायर कर दिए जाते हैं।

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पत्रकार अवस्थी ने जब आत्म हत्या की,उस समय  उनकी उम्र 65 साल थी।

यदि वे सुप्रीम कोर्ट के जज होते तो 65 साल तक नौकरी करते।फिर तो उनके सामने आत्म हत्या करने की नौबत ही नहीं आती।क्योंकि तब तक वे अपनी पारिवारिक जिम्मेवारियां पूरी कर चुके होते।

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अवकाशप्राप्त पत्रकारों की पेंशन, प्रोविडेंट फंड से जुड़ी होती है।मुझे भी 1231 रुपए हर माह मिल जाते हैं।

इसमें कोई बढ़ोत्तरी नहीं।मुझे जो राशि सन 2005 में मिलनी शुरू हुई थी,वही राशि आज भी मिलती है।

मैंने 27 साल तक पी.एफ.वाली नौकरी की है।बिहार सरकार की ओर से मिल रही पेंशन के लिए आवदेन पत्र तैयार कर रहा हूं।

 देखना है कि मुझे पेंशन लायक समझा जाता है या नहीं !

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मुझे मालूम था कि पत्रकारों को 58 साल के बाद ‘‘कार सेवक’’ यानी ‘‘स्वयंसेवक’’ यानी ‘‘फ्रीलांसर’’ बनना पड़ेगा।इसीलिए मैंने बहुत पहले से ही अपना संपन्न पुस्तकालय-सह संदर्भालय विकसित करना शुरू कर दिया था।

उसके सहारे मैं फ्रीलांसर व पुस्तक लेखन के काम सफलतापूर्वक कर लेता हूं।पर, एक अखबार से जुड़े दलित-उपेक्षित  प्राणी का नाम है--फ्रीलांसर।

 एक अखबार के प्रबंधन ने बीस साल पहले मेरे प्रत्येक लेख का जो 1000 रुपए तय किया था,वही राशि आज भी मिलती है,बढ़ी नहीं।

अखबारों के बाकी लोगों के वेतन-भत्ते में इस बीच कितनी बढ़ोत्तरी हुई होगी,उसकी कल्पना कर लीजिए।

इसलिए भी मैं गांव की अपनी खेती को विकसित कर रहा हूं ताकि कुछ अतिरिक्त आय हो सके।

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प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव के शासन काल में अनोखी पी.एफ.पेंशन योजना शुरू हुई।इसमें बढ़ोत्तरी का कोई प्रावधान ही नहीं ।न्यूनत्तम हजार रुपए मासिक।

क्या इस पेंशन योजना का नाम किसी ने अब तक गिन्नीज बुक आॅफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में दर्ज 

करवाया या नहीं !

नहीं करवाया तो करवा ही दीजिए। 

प्रधान मंत्री नरसिंह राव पर शेयर दलाल हर्षद मेहता से एक करोड़ रुपए ले लेने का आरोप लगा था।

इससे उनकी काफी बदनामी हुई।

 उनकी बदनामी को प्रचारित करने में मीडिया का भी हाथ था।

क्या इसीलिए श्रमजीवी पत्रकारों के लिए इतनी कम पेंशन राशि राव साहब ने तय करा दी ताकि वे उस अनोखे प्रधान मंत्री को जीवन भर याद रखें ?

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हां,राव साहब ने सांसदों के लिए ,अपवादों को छोड़कर 

उनके प्रत्येक कार्यकाल के लिए एक करोड़ रुपए की अघोषित व्यवस्था जरूर करा दी।--यानी मेरी नाक एक करोड़ के लिए कटी तो तुम्हारी भी उतनी ही राशि के लिए कटे।

नरसिंह राव ने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के सख्त विरोध के बावजूद एक करोड़ रुपए सालाना का सांसद फंड शुरू किया।तब सरकारी कमीशन की राशि 20 प्रतिशत थी।

यानी अपवादों को छोड़कर प्रत्येक सांसद के पूरे कार्यकाल में एक करोड़ रुपए का इंतजाम।पर अब तो वह फंड 5 करोड़ रुपए सालाना का है।उस पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का बयान आ चुका है--कहते हैं कि सारे सांसद कमीशन लेते हैं,मैं भी लेता हूं।हालांकि मेरी खबर है कि कुछ सांसद आज भी नहीं लेते।

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बिहार सरकार ने पत्रकारों के लिए जो पेंशन योजना शुरू की,उसमें कड़ी शत्र्त है--कहीं अन्य से कोई राशि

मिल रही है तो पत्रकार पेंशन नहीं मिलेगी।

यह बंधन  पूर्व विधायक जो पूर्व शिक्षक भी रहे,पर लागू नहीं है।वे दोनांे जगहों से पेंशन लेते हैं।

जो एक दिन के लिए भी विधायक बना,उसे भी पूरी पेंशन मिलती है।पर 19 साल तक पत्रकार रहने के बावजूद बिहार सरकार उसे पेंशन नहीं देगी। उस 20 साल पूरा करना पड़ेगा।

मेरे एक मित्र पत्रकार को पत्रकार पेंशन इसलिए नहीं मिली क्योंकि उन्हें जेपी सेनानी पेंशन मिलती है।

2005 की फरवरी में बिहार विधान सभा का चुनाव हुआ था।

वह विधान सभा विधिवत गठित होने से पहले ही भंग हो गई।पर उसके पूर्व सदस्य भी पेंशन पाते हैं।

यह सब समानता के अधिकार के संवैधानिक प्रावधान के खिलाफ है।

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राजेश अवस्थी की आत्म हत्या के बाद मैं यह सब लिखने को बाध्य हो गया।

  इससे नाराज होकर भले बिहार सरकार पेंशन वाले मेरे आवदेन पत्र को खारिज कर दे।

मुझे मंजूर होगा,पर राजेश अवस्थी व उनके आश्रितांे की पीड़ा मुझ पर फिलहाल हावी है।मैं अवस्थी में खुद को देखता हूं।

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24 मई 26


  


  

 


मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

    सुनील दत्त और नाना पाटेकर

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फिल्मी कलाकारों में कुल मिलाकर मुझे पहले सुनील दत्त श्रेष्ठ लगते थे।

     अब कुल मिलाकर नाना पाटेकर श्रेष्ठ लगते हैं।

ऐसा क्यों ?

मैं खुद इसका कारण नहीं बता सकता।

आप बता सकते हों तो मेरी जरा मदद कीजिए।

   ---सुरेंद्र किशोर

   23 अप्रैल 26

 


गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

 संदर्भ --निशांत कुमार पर नई जिम्मेदारी

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सुरेंद्र किशोर

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कहावत  है --‘‘आॅनेस्टि इज द बेस्ट पाॅलिसी’’

यह नहीं कहा गया है कि ’’आॅनेस्टि इज द बेस्ट वच्र्यू (गुण)।’’

आॅनेस्टि अपने साथ व्यक्ति में स्वयंमेव बहुत से गुण ला देती है।

क्या हुआ जो निशांत कुमार को शासन का अनुभव नहीं है।

उनके पास कठोर ईमानदारी की विरल पूंजी जो है।

वही पूंजी उन्हें सफल बनाएगी।

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जनशक्ति जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेज प्रताप यादव ने कहा है कि ‘‘निशांत कुमार को राजनीतिक अनुभव नहीं।उन्हें दांवपेच नहीं आता।’’

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इंदिरा गांधी सन 1966 में जब प्रधान मंत्री बनी थीं तो प्रतिपक्ष ने उन्हें

 ‘‘गूंगी गुड़िया’’ कहा था।

 उन्हंे तब इतना भी नहीं मालूम था कि यदि स्पीकर कुछ बोल रहे हों तो प्रधान मंत्री भी सदन नहीं छोड़ सकता।प्रधान मंत्री इंदिरा जी ने सदन छोड़ दिया था तो उन्हें स्पीकर से उन्हें माफी मांगनी पड़ी थी।यह 1966 की ही बात है। 

पर,बाद में इंदिरा जी ने अपने ढंग से राजपाट चलाया ही।यदि इंदिरा जी में  कठोर ईमानदारी होती तो वह और अधिक सफल होतीं।

किसी ने किसी संदर्भ में उनसे एक बार कहा था कि आपके पिता जी ईमानदार थे।

इंदिरा जी ने जवाब दिया--‘‘मेरे पिता जी संत थे।मैं पाॅलिटिशियन हूं।’’

दूसरी ओर, सब जानते हैं कि निशांत कुमार में यह खास व विरल गुण है --यानी  अपने पिता की तरह ही ईमानदारी और शालीनता।

   जिस व्यक्ति में इतनी ईमानदारी है कि पिता के दशकों तक शीर्ष सत्तासीन रहने के बावजूद इस पुत्र निशांत पर कोई छोटा दाग भी नहीं लगा,वह व्यक्ति जिस किसी पद पर कभी जाएगा,अपने आसपास ईमानदार लोगों को ही रखेगा।

उनकी और उन सबकी ईमानदारी ही निशांत को सफलता दिलाएगी।क्योंकि आॅनेस्टि इज द बेस्ट पाॅलिसी।

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मैं लंबे समय तक शीर्ष पर सत्तासीन रहे देश के किसी अन्य ऐसे नेता 

को नहीं जानता जिस मामले में 

‘‘सत्ताधारी  पिता’’ भी ईमानदार हो और ‘‘नेता पुत्र’’ भी ईमानदार हो।

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 8 अप्रैल 26


रविवार, 5 अप्रैल 2026

 प्रो.(डा.)एस.चद्रा --एक डाॅक्टर लीक से हटकर

एम.बी.बी.एस.करने के बाद होमियोपैथिक प्रैक्टिस

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सुरेन्द्र किशोर

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बहुत पहले की बात है।

मैंने पहली बार सुना कि सुमन चन्द्रा ने पहले एम.बी.बी.एस.पास किया।उसके बाद होमियोपैथ में उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण की।

लंदन में भी पढ़े।

 लंबे समय से पटना में होमियोपैथ चिकित्सा की प्रैक्टिस करते हैं।

उनसे मिलने की इच्छा थी ही।

    मशहूर पत्रकार स्वयं प्रकाश जी ने मुझे डा.चंन्द्रा से मिलवाया।

चन्द्रा साहब की जीवन संगिनी डा.अंजू चन्द्रा भी उनके साथ ही प्रैक्टिस करती हैं।

  डा.एस.चन्द्रा साहब आज सफलत्तम चिकित्सकों में एक हैं।उनके यहां भारी भीड़ रहती है।रहे भी क्यों नहीं !

मैं भी जिस किसी मर्ज के इलाज के लिए जब कभी उनसे मिला,मुझे उनके इलाज से उम्मीद से बेहतर मुझे राहत मिली ।

  डाॅक्टर, धरती के भगवान कहे जाते रहे हैं।

इस मामले में इधर स्थिति थोड़ी बदली जरूर है।

फिर भी जिन अनेक डाॅक्टरों को अब भी आप धरती का भगवान कह सकते हैं,उनमें डा.चन्द्रा प्रमुख हैं।मेरे लिए तो डा.चन्द्रा धरती के भगवान साबित भी हुए हैं। 

   ऐसे ‘धरती के भगवान’ यानी चन्द्रा दंपति के साथ मेरी और मेरी पत्नी रीता का ग्रूप फोटो हमारे लिए सौभाग्य की बात है।

(चित्र में डा.एस.चन्द्रा,सुरेन्द्र किशोर,रीता सिंह और डा.अंजू चन्द्रा)

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अगली बार के लिए उम्मीदवार न बनाये जाने के 

बावजूद हरिवंश जी की जुबान पर नीतीश कुमार 

के लिए अब भी प्रशंसा के ही शब्द आपको मिलेंगे।

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मौजूदा राजनीति में यह विरल है।

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सुरेंद्र किशोर

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राज्य सभा या विधान परिषद के टिकट से वंचित हो जाने या अगली बार फिर से नामांकित न होने पर अधिकतर नेताओं को दलीय सुप्रीमो के खिलाफ कटु शब्दों का इस्तेमाल करते और दल से नाता तोड़ते हुए दशकों से मैंने अनेक उदाहरण देखे-सुने हंै।

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चूंकि हरिवंश जी का मित्र होने का मुझे गौरव हासिल है,इसलिए मैं कुछ वैसी बातें भी जानता हूं जो सार्वजनिक नहीं हैं।

हरिवंश जी इस बात से काफी एहसानमंद रहे हैं कि नीतीश जी ने उन्हें बिन मांगे दो -दो बार राज्य सभा का सदस्य बनवाया।

हां, सन 2022 में हरिवंश जी काफी धर्म संकट में थे जब नीतीश जी राजग छोड़कर कांग्रेसनीत गठबंधन मेें शामिल हो गये थे।धर्म संकट यह था कि खुद हरिवंश जी को राज्य सभा के उप सभापति पद को छोड़ देना चाहिए या नहीं।

संभवतः राजनीतिक दूर दृष्टि वाले उनके किसी मित्र ने हरिवंश जी को बताया होगा कि खुद नीतीश जी कांग्रेस गठबंधन में अधिक दिनों तक नहीं टिकेंगे।इसलिए आपको उप सभापति का पद छोड़ने की जरूरत नहीं है। 

वही हुआ भी।

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कुछ संस्कारी लोग किसी का उपकार कभी नहीं भूलते।किंतु आज का यह जमाना ऐसा है कि मत पूछिए।

एक नमूना पेश है--

बिहार के भोजपुर इलाके के एक पूर्व एम.पी.से पूछा गया कि आप इस बार चुनाव कैसे हार गये ?

उनका जवाब था--

एक बड़े गांव के प्रभावशाली परिवार के चार बेरोजगार लड़कों को मैंने बारी -बारी से नौकरी दिलवाई।जब पांचवंे को नहीं दिलवाई तो वह परिवार मेरे खिलाफ हो गया और पूरे गांव का वोट हमारे विरोधी को दिलवा दिया।

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3 अप्रैल 26