मंगलवार, 8 सितंबर 2026

 ‘माही’ नदी से ‘मरीन’ ड्राइव तक-

न सिर्फ नदी का नाम गलत ,बल्कि 

नदी किनारे की सड़क का नाम भी गलत !

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार के सारण जिले की मही नदी के तटबंध इस बार टूटे तो

उस नदी का नाम अखबारों में खूब छपा।

पर,मही नदी नहीं, बल्कि माही नदी छपा।

यह अंग्रेजी का असर है।

(ध्यान रहे कि मही नदी मेरे पुश्तैनी गांव से होकर बहती है।

मेरे गांव की जमीन के नक्शे में मही नदी ही लिखा हुआ है।उसकी फोटो काॅपी प्रस्तुत है।)

इसी तरह जेपी गंगा पथ को हम अखबारों के जरिए मरीन ड्राइव जानने लगे हैं।यह गलत अंग्रेजी का असर है।

क्योंकि मरीन का अर्थ समुद्रीय होता है, नदी शब्द से इसका कोई संबंध नहीं।

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एक समय था जब मैं अन्य अनेक पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ दैनिक नईदुनिया (इन्दौर)के लिए भी बिहार से लिखता था।

एक बार उसके यशस्वी संपादक राजेंद्र माथुर ने मुझे पत्र लिखा।

उन्होंने लिखा कि ‘‘आप बिहार के हर जिला और तहसील शहर के सही नाम लिख कर भेज दें।ज्यादा से ज्यादा चार सौ नाम होंगे।’’

मैंने भेज दिया था।(याद रहे कि नईदुनिया की एक गलती पर पाठकों के औसतन 13 पत्र संपादक को मिलते थे।इसलिए संपादक जागरूक रहते थे।मैं भूल रहा हूं--राजेंद्र यादव या नामवर सिंह--इन्हीं में से किसी ने इन्दौर के इस अखबार को देखकर कहा था कि देश का सबसे अच्छा हिन्दी अखबार इन्दौर से निकलता है।)  

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दरअसल अंग्रेजी न्यूज एजेंसियां जो समाचार नई दुनिया को भेजती थीं,उनमें मुंगेर,कहलगांव और पलामू आदि की अंग्रेजों द्वारा दी गई स्पेलिंग कुछ अजीब होती थीं।उसके देवनागरीकरण में नईदुनिया अक्सर गलती करता था।मैंने उस ओर माथुर साहब उर्फ रज्जू बाबू का ध्यान आकृष्ट किया तो उन्होंने मुझे एक महत्वपूर्ण काम दे दिया था।यह 1981 की बात है।तब मैं दैनिक ‘आज’ के पटना संस्करण में काम करता था।

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8 सितंबर 26



 सास याद रखें कि वे भी कभी बहू थीं।

साथ ही, अपनी दुलरुई बेटी को भी ध्यान में रखिए

जो कहीं पतोहू बन कर गई है।


 यदि 90 प्रतिशत गेहूं के आटे में 10 प्रतिशत उजले पत्थर को पीस कर 

मिला दिया जाए और उसकी रोटियां बनाकर रोज खाया जाए तो 

शरीर पर उन रोटियों का कैसा असर पड़ेगा ?

   --- सुरेंद्र किशोर

(इन दिनों इस तरह की भी मिलावट जारी है।) 

7 सितंबर 26



बुधवार, 2 सितंबर 2026

 दोहरा मापदंड

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‘गोदी मीडिया’ के मौजूदा शोर के बीच

नेहरू-इंदिरा दौर की कुछ भूली- बिसरी यादें

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सुरेंद्र किशोर

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प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने दिल्ली के एक बड़े अखबार के संपादक दुर्गा दास को उनके पद से हटवा दिया था। नेहरू के निजी सचिव ने अखबार के मालिक का फोन करके हटवा दिया।

दुर्गादास प्रधान मंत्री नेहरू की आलोचना लिख रहे थे।

(नेहरू के निजी सचिव एम.ओ.मथाई ने यह बात अपनी संस्मरणात्मक किताब में लिखी है।)

प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने उसी अखबार के संपादक पद से बी.जी.वर्गीज को हटवा दिया था।बाद में वर्गीज को रामनाथ गोयनका ने इंडियन एक्सपे्रस का संपादक बना दिया था।  

साठ के दशक में तब के कांग्रेसी मुख्य मंत्री के.बी.सहाय ने पटना के दैनिक सर्चलाइट के संपादक टी.जे.एस. जार्ज को भारत 

रक्षा कानून के तहत जेल भिजवा दिया था।नेहरू के साथ 13 साल तक उनके निजी सचिव रहे एम.ओ.मथाई के अनुसार ही टाइम्स आॅफ इंडिया और इलेस्टे्रटेड वीकली आॅफ इंडिया का तीन मूत्र्ति भवन यानी प्रधान मंत्री आवास में प्रवेश वर्जित था। 

ऐसे में उन दिनों के मीडिया को गोदी मीडिया बना देने में तो कोई दिक्कत नहीं आने वाली थी।दिक्कत आई भी नहीं।

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अब कोई मुझे बताए कि मोरारजी देसाई,अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी ने अपने प्रधान मंत्रित्व काल में किन-किन संपादकों को उनके पदों से हटवाया ?

सबूत के साथ कोई उदाहरण मिलेगा तो मैं उस पर भी लिखूंगा।

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दूसरी ओर, जब मोरारजी देसाई से किसी ने पूछा कि आर.के करंजिया की अभियानी साप्ताहिक पत्रिका ‘ब्लिट्ज’ आपकी इतनी अधिक आलोचना करता रहता है,फिर भी आप उस पर कार्रवाई क्यों नहीं करते ?

देसाई ने कहा कि मैं तो उसे पढ़ता ही नहीं।

 बिहार के मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंह से जब किसी ने पूछा तो उन्होंने इसी तरह की बात कही थी--‘‘मैं तो सर्चलाइट पढ़ता ही नहीं।किसी अखबार के खिलाफ इससेे बड़ी कार्रवाई नहीं हो सकती।’’

याद रहे कि उसके संपादक एम.एस.एम.शर्मा अपने काॅलम में श्रीबाबू के खिलाफ किसी सबूत के बिना अत्यंत आपत्तिजनक बातें लिखा करते थे।

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दूसरी ओर, आज नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ भी छपता रहता है।टी.वी.चैनलों पर बैठकर कोई कुछ भी बोलता रहता है।

आजादी के तत्काल बाद के वर्षों की बात है।

बिहार विधान सभा में साठी लैंड रिस्टोरेशन विधेयक पर व्यापक चर्चा हुई थी।

(दरअसल आजादी के तत्काल बाद बेतिया राज की जमीन की बड़े- बड़े सत्ताधारियों ने आपस में बंदरबांट कर ली।केंद्र सरकार को शिकायत गई तो गृह मंत्री सरदार पटेल ने बिहार सरकार को निदेश दिया कि जमीन वापस करो।उस वापसी के लिए साठी लैंड रिस्टोरेशन विधेयक बिहार विधान सभा से पारित हुआ।

पर चर्चा के दौरान लाभान्वितों व उनके समर्थकों ने अपने लोभ के स्वर बहस में भी मुखरित कर ही दिये।) 

उस चर्चा के दौरान कांग्रेस के एक प्रमुख नेता ने,जो बाद में बिहार के मुख्य मंत्री बने थे,कहा था कि ‘‘सन 1857 के विद्रोह को दबाने में जिन भारतीयों ने अंग्रेजों का साथ दिया था,अंग्रेजों ने उन्हें जमीन जायदाद ,जमीन्दारी ,राय बहादुर -खान बहादुर की पदवी आदि देकर सम्मानित किया था।हमने और हमारे परिजन ने भी आजादी लड़ाई में बहुत कुछ खोया,उसकी क्षतिपूत्र्ति के रूप में यदि हमने साठी की जमीन(बेतिया महाराज की जमीन)की बंदोबस्ती ली तो कौन सा अन्याय किया।’’

मैंने उस रिपोर्ट के लिए पहले स्थानीय अखबारों की फाइलें देखीं।मुझे वह खबर नहीं मिली।फिर मैं विधान सभा लाइब्रेरी में जाकर तब की विधान सभा की कार्यवाही पर तैयार किताब देखी।उसमें यह विवरण मिला।

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 नेहरू के शासन काल के सबसे बड़े घोटाले 80 लाख रुपए के जीप घोटाले,(यानी इस देश के बीज घोटाले )की कोई खोजपूर्ण रिपोर्टिंग नहीं हुई थी जबकि उस घोटाले में शीर्ष सत्ताधारी का सीधा हाथ था।इसीलिए कृष्ण मेनन को सजा देने के बदले उनको प्रमोशन मिला था।यानी हाई कमिश्नर के बाद केंद्रीय मंत्री बने थे।

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1962 में चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय के कारणों की जांच के लिए हैंडरसन -बु्रक्स-भगत समिति बनी।उसकी रिपोर्ट आई जिसके जरिए भारत सरकार की आपराधिक विफलताएं सामर्ने आइं।

पर उस समिति की रिपोर्ट भारत के तत्कालीन गोदी मीडिया में नहीं छपी।

बल्कि विदेशी पत्रकार नेविल मैक्सवेल ने प्रकाशित की।

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सन 1967 के चुनाव के लिए एक दल को छोड़ कर इस देश के सभी प्रमुख दलों ने विदेशों से नाजायज तौर पर पैसे लिये थे।उस शर्मनाक रिश्वतखोरी की रिपोर्ट भारतीय मीडिया में नहीं बल्कि न्यूयार्क टाइम्स में छपी।पूंजीवादी देश ने कम्युनिज्म के विरोध के लिए भारतीय दलों व नेताओं को पैसे दिए और कम्युनिस्ट देशों ने कम्युनिज्म के प्रचार-प्रसार के लिए। 

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इमर्जेंसी में इंदिरा सरकार ने मीडिया का क्या हाल किया था,उसकी पराकाष्ठा का एक नमूना देखिए।

अस्वस्थता के कारण आपातकाल के बीच में ही जेपी रिहा कर दिए गए थे।

जब जेल से बाहर आए तो सरकार ने मीडिया को निदेश दिया--जेपी कहां जाते हैं,किससे मिलते हैं,इसकी खबर नहीं छपेगी।नहीं छपी।गोदी मीडिया का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है ?

(ये तो नमूने के तौर पर थोड़े से उदाहरण हैं।ऐसी सारी कहानियों को एकत्र करेंगे तो मोटी किताब बन जाएगी।)

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2 सितंबर 26  



  


गुरुवार, 27 अगस्त 2026

 सी.ए.ए.और एन.आर.सी.पर प्रशांत किशोर

 की राय अब बदली है या वही है ?

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सुरेंद्र किशोर

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सन 2019 में प्रशांत किशोर को जदयू ने अपनी पार्टी से निकाल दिया था।

मुददा था-जदयू सी.ए.ए.का समर्थन कर रहा था और प्रशांत 

किशोर उसका विरोध।

प्रशांत किशोर ने तब एन.आर.सी.का भी विरोध किया था।

इस मुद्दे पर प्रशांत किशोर ने कैबिनेट स्तर के पद की सुविधा को भी 

लात मार दी थी।यानी यह मुद्दा उनके लिए इतना अधिक महत्वपूर्ण था।

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 प्रशांत किशोर की इन दो मुद्दों पर अब क्या राय है ? 

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अब आम भाषा में सी.ए.ए. और एन.आर सी.को समझें।

सी.ए.ए.के खिलाफ तब दिल्ली शाहीन बाग में धरना हुआ था।

धरना देने वालों ने यह बात फैलाई कि सी.ए.ए.लागू होने से मुसलमानों की नागरिकता ले ली जाएगी।

जबकि सी.ए.ए. है पड़ोस के देशों से प्रताड़ित होकर भारत आए गैर मुस्लिमों को नागरिकता देने का कानून।

सी.ए.ए. अब लागू है।उन पीड़ित लोगों को नागरिकता दी जा रही है।पर किसी भारतीय मुस्लिम की नागरिकता नहीं ली गई।

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एन.आर.सी.यानी नेशनल रजिस्टर आॅफ सिटिजन्स।

पाकिस्तान में भी एन आर सी है।

पर भारत में निहित स्वार्थी लोग इसे नहीं बनने दे रहे हैं।उनको आशंका है कि वे  फिर घुसपैठियों के नाम हम उस रजिस्टर में कैसे शामिल करा पाएंगे ?

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27 अगस्त 26

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 1990 के मंडल आरक्षण का विरोध करने का नुकसान

मंडल विरोधियों की ही भगतना पड़ा था

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मौजूद आरक्षण विरोधी आन्दोलन का नुकसान भी अंततः 

उन्हें ही होगा जो आरक्षण का विरोध कर रहे हैं।

लाभ सिर्फ उन अराजक तत्वों को मिलेगा जो इस देश 

को तोड़ना चाहते हैं।

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सुरेंद्र किशोर

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क्योंकि ये सब आरक्षण भारत के संविधान के अनुच्छेद-340, 341 और 342 प्रदत्त हैं।इनमें फेरबदल करने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा।

आने वाली भी किसी भारतीय संसद की जातीय बनावट ऐसी नहीं होगी 

जो संसद इस संबंध में आरक्षण विरोधियों के अनुकूल संविधान का संशोधन 

कर सके।

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इसलिए आज के आरक्षण विरोध के नतीजे के परिणामस्वरूप देश में सिर्फ अराजकता फैलेगी।और उस अराजकता का लाभ सिर्फ देशी-विदेशी जेहादियों को मिल सकता है।

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1990 के मंडल आरक्षण के विरोधी सवर्णों से मैं तब कहा करता था कि विरोध करने से अंततः लालू प्रसाद को ही राजनीतिक मजबूती मिलेगी।आपको कुछ नहीं मिलेगा।(मेरी वह बात पूर्व कांग्रेसी विधायक हरखू झा को अब भी याद है।गवाही देने के लिए झा जी अब भी हमारे बीच हैं।)

  वही हुआ भी।लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन काल में मंडल विरोधी समुदायों  की जो दुर्गति हुई ,वह सब वही लोग जानते हैं।

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विवादास्पद यू.जी.सी.निदेशों का मामला भी आप लोग सुप्रीम कोर्ट पर ही छोड़ दीजिए।उसी को फैसला करने दीजिए।अन्यथा वह भी आपके लिए प्रति उत्पादक साबित हो सकता है।

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27 अगस्त 26


  


बुधवार, 26 अगस्त 2026

 


याद आएंगे ‘‘विचारधारा के सेनापति’’ व आई.बी.के

 पूर्व अधिकारी राम नरेश प्रसाद सिंह 

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सुरेंद्र किशोर

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 बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य हरेन्द्र प्रताप और भाजपा नेता

सुधीर शर्मा के फेबुक पोस्ट से पता चला कि आई.बी.(भारत सरकार)के पूर्व 

अधिकारी राम नरेश प्रसाद सिंह नहीं रहे।

पिछले दिनों जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भारत वामपंथी उग्रवाद से अब मुक्त है तो सहसा रामनरेश बाबू याद आ गए।

(अच्छी बात है--अब गृह मंत्री और प्रधान मंत्री को जेहादी उग्रवाद और दिमागी नक्सलियांे से भी देश को मुक्त करने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा।

एक अच्छा संकेत है ।वह यह कि इस देश के अधिकतर गैर राजग राजनीतिक दल वोट के लिए जब तक हिन्दुओं को गालियां देते रहेंगे और जेहादियों से साठगांठ जारी रखेंगे,तब तक उनके चुनाव जीतने का कोई चांस मुझे नजर नहीं आता--भले अस्थायी उतार-चढ़ाव किसी को नजर आए।)

  अमित शाह की घोषणा के बाद मुझे रामनरेश बाबू के साथ-साथ कभी जहानाबाद में डी.एम.रहे प्रत्यय अमृत की बातें भी याद आ गईं।

  जब बिहार में भी नक्सलियों का बोलबाला था तो मेरी राय हुआ करती थी कि 

विकास की कमी और समाज के कुछ समूहांे के प्रति व्यवस्थागत अन्याय के कारण 

नक्सली पनपे हैं।इन समस्याओं के हल के साथ ही नक्सल समस्या हल हो जाएगी।

इस समस्या पर रामनरेश बाबू से भी चर्चा होती रहती थी।

पर,वे मुझसे सहमत नहीं होते थे।

अंततः रामनरेश बाबू सही साबित हुए --प्रत्यय अमृत भी।

अस्सी के दशक में नक्सलियों द्वारा किए गए एक जन संहार की रिपोर्टिंग करने मैं जहानाबाद गया था।संयोग से घटनास्थल पर ही तत्कालीन जिलाधिकारी प्रत्यय अमृत सेे मुलाकात हो गयी।उनकी राय भी रामनरेश बाबू से मिलती -जुलती थी।हालांकि तब तक मेरा उनसे परिचय नहीं था।

मैं तब भी जिलाधिकारी महोदय से सहमत नहीं हुआ था।पर आज दोनों से सहमत हूं।रामनरेश बाबू ने कई पुस्तकें लिखी हैं ।उनकी अधिकतर पुस्तकें मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में हंै।उन पुस्तकों की एक -एक लाइन शोधपूर्ण व तथ्यपरक है।

   माननीय हरेंद्र प्रताप के अनुसार रामनरेश बाबू सचमुच विचारधारा के सेनापति थे।

आज उनकी कमी खल रही है जब भारत सहित पूरी दुनिया में ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ तेज हो गया है।    

नब्बे के दशक में अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुएल पी.हंटिंगटन 

की एक किताब आई थी।

उसका नाम है ‘‘सभ्यताओं का संघर्ष।’’

उस पुस्तक के जरिए लेखक ने यह कहा था कि 

‘‘शीत युद्धोत्तर संसार में लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान ही संघर्षों का मुख्य कारण होगी।’’

भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में वैसा संघर्ष इन दिनों जारी भी है जो भयानक रूप लेता जा रहा है।

हमारे देश की कुछ तथाकथित सेक्युलर और वोट लोलुप शक्तियों को छोड़कर पूरी दुनिया उस भयानकता को अच्छी तरह समझ रही है।

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26 अगस्त 26