शुक्रवार, 19 अप्रैल 2024

     मोदी व भाजपा को उनके विरोधियों ने अपनी 

     अदूरदर्शिता के कारण अधिक ताकत पहुंचाई 

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               सुरेंद्र किशोर

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मशहूर चुनाव विश्लेषक संजय कुमार ने लिखा है कि

 ‘‘चुनाव में राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व अब केंद्रीय मुद्दा बन गए हैं।’’

(दैनिक भास्कर--19 अप्रैल,2024)

हालांकि उन्होंने महंगी और बेरोजगारी को भी अहम मुद्दा माना है, लेकिन केंद्रीय मुद्दा नहीं।

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लेखक के अनुसार, ‘‘सी.एस.डी.एस.-लोकनीति के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से निष्कर्ष निकलता है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़े पैमाने पर वोट खींचने वाला फैक्टर आज पार्टी की छवि नहीं,बल्कि उसका शीर्ष नेतृत्व यानी मोदी फैक्टर बन चुका है।’’

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इस अवसर पर मैं एक पुराना वाकया दुहरा दूं।

 1990-91 के मंडल आरक्षण विवाद के दौरान लालू प्रसाद सामाजिक न्याय के हीरो बनकर उभरे थे।

उनके हीरों बनने में खुद उनका जितना योगदान था,उससे काफी अधिक योगदान तब के आरक्षण विरोधियों का था।

बाद के वर्षों में यदि लालू प्रसाद ने पैसा-परिवार को लेकर संयम बरता होता तो वे पिछड़ों के नेता के साथ-साथ उनके मसीहा भी बन गये होते।

आज तो वे पिछड़ों में भी तब की अपेक्षा एक छोटे समूह के नेता रह गये हैं।

याद रहे कि मंडल आरक्षण, केंद्र की वी.पी.सिंह सरकार का न सिर्फ संविधान सम्मत कदम था,बल्कि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भीं उस पर मुहर लगा दी।

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आजादी के तत्काल बाद के वर्षों में कांग्रेस को बिहार में भी जब -जब पूर्ण बहुमत मिला,तब -तब उसने सिर्फ सवर्णों को ही मुख्य मंत्री बनाया।

  उस पर किसी सवर्ण नेता या बुद्धिजीवी ने कभी आवाज उठाई ?

हां,आज जब 1990 से लगातार पिछड़ी जातियों के नेता ही बिहार के मुख्य मंत्री बन रहे हैं तो उन्हंे उस पर एतराज हो रहा है।

अरे भाई,जो आपने बोया है,वही तो काट रहे हैं। 

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अब आप देश की मौजूदा स्थिति की समीक्षा करिए।

हिन्दुत्व और सनातन विरोधी राजनीतिक दलों और शक्तियों ने भाजपा व उसके नेता नरेंद्र मोदी को अनजाने में हीरो बना दिया है।(मोदी की ईमानदार छवि भी लोगों को आकर्षित करती है।)

  जिस राम मंदिर के पक्ष में अंततः सुप्रीम कोर्ट का भी निर्णय आया,उस मंदिर के खिलाफ 

अनेक भाजपा-राजग  विरोधी दलों ने दशकों तक न जाने कैसे -कैसे अभियान चलाये !

वह सब मुस्लिम वोट को खुश करने के लिए हुआ।

इस विरोध के खिलाफ बड़े हिन्दू समूह की गोलबंदी होनी ही थी।सो हुई।

जिस तरह 90 के दशक में पिछड़ों की 52 प्रतिशत आबादी के साथ हो रहे न्याय को कुछ लोगों ने बर्दाश्त नहीं किया ,उसी तरह देश की कुल आबादी के करीब अस्सी प्रतिशत हिन्दुओं की भावना का 

राजग विरोधी दलों ने ध्यान नहीं रखा।

ऐसा उन लोगों ने अल्पसंख्यक वोट के लोभ में किया।उसका परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा।

  आज राहुल गांधी नायनाड में किसके भरोस चुनाव लड़ रहे हैं ?

एस.डी.पी.आई.के भरोसे।

एस.डी.पी.आई.क्या है ?

यह पी.एफ.आई.का राजनीतिक विंग है।

पी.एफ.आई.क्या है ?

यह प्रतिबंधित संगठन है।

प्रतिबंधित क्यों है ?

क्योंकि उसके पास जो भूमिगत साहित्य मिला है,उसके अनुसार वह संगठन हथियारों के बल पर 2047 तक भारत को इस्लामिक देश बना देने के लिए दिन रात प्रयत्नशील है। 

यह सब अब छिपी हुई बात नहीं है।

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देश की सीमाओं को सुरक्षित रखना,घुसपैठियों को बाहर ढकेलना,जेहादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना हर राष्ट्रवादी देशवासी का कर्तव्य है।

 दुनिया के अन्य सारे देशों के लोग अपने जरूरत पड़ने पर ऐसा ही करते रहे हैं।इन दिनों चीन भी कर रहा है।

पर वोट बैंक और दूसरे लोभ में भाजपा को छोड़कर इस देश के लगभग सभी अन्य दलों ने राष्ट्र की सुरक्षा का यह काम सिर्फ भाजपा के जिम्मे छोड़ दिया।

ऐेसे में इस देश के राष्ट्रवादी लोगों का समर्थन भाजपा व उसके सहयोगी दलों को चुनाव में नहीं मिलेगा तो क्या वोट बैंक के सौदागरों को मिलेगा ?

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आज सी ए ए -एन आर सी-यू सी सी का समर्थन राष्ट्रवाद है।

आज घुसपैठियों का विरोध राष्ट्रवाद है।

इस बार का लोक सभा चुनाव रिजल्ट बता देगा कि अधिकतर मतदाताओं ने किसे राष्ट्रवादी माना और किसे नहीं माना।

यदि चीन सरकार अपने देश के जेहादी उइगर मुसलमानों के खिलाफ अभूतपूर्व सख्ती बरत रही है तो वह अपनी राष्ट्रवादी 

भूमिका ही तो निभा रही है।

पर,अपने देश के वैसे लोग अपने यहां ऐसे मामले में क्या कर रहे हैं जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का अक्सर गुणगान करते रहते हैं ?

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कुल मिलाकर स्थिति यह है कि मोदी को महाबली बनाने में खुद मोदी व भाजपा का जितना बड़ा हाथ है,उससे कई गुणा बड़ा योगदान वोट बैंक के सौदागरों की गतिविधियों व रणनीतियों का है।

जिस तरह मंडल आरक्षण के विरोधियों में से अनेक लोग बाद में अपने विरोध के निर्णय पर पछताए,उसी तरह कुछ खास वोट के लिए राष्ट्र के हितों का बलिदान करने वाले दल इस लोक सभा चुनाव का रिजल्ट आ जाने के बाद संभवतः पछताएंगे।

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19 अप्रैल 24


गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

    एक अखबार समूह का 

  आर्थिक प्रबंधन ऐसा भी था

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कई दशक पहले की बात है।

एक अखबार समूह के मालिक को लगा कि 

यदि प्रेस की स्वतंत्रता बनाए रखनी है तो

अखबार के घाटे को पाटने के लिए आय का 

वैकल्पिक स्रोत भी बनाना पड़ेगा।

क्योंकि सिर्फ सरकारी विज्ञापनों के भरोसे अखबार नहीं 

निकाला जा सकता है।

कई बार कुछ स्वतंत्र अखबारों को कुछ सरकारें ‘‘अभियानी मीडिया’’कहने लगती हैं।

हालांकि अभियानियों की एक अलग प्रजाति आज भी है।

फिर उसे सरकारी विज्ञापन नाम मात्र का ही मिलता है।

या, नहीं मिलता रहा है।

वैसे अभियानी अखबारों को सरकार से उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए।

हां, वह आय का वैकल्पिक स्रोत तो खड़ा कर सकता है। 

 खैर, उसकी बातें जिनकी चर्चा मैंने शुरू की थी।

 इसीलिए उस मालिक ने देश के कुछ बड़े नगरों में अपनी बहुमंजिली इमारतें बनवाईं।

इमारत के कुछ स्थानों में अखबार के प्रेस व आॅफिस वगैरह रहे।

 बाकी को किराए पर उठा दिया ।

किराए के पैसों से अखबार का घाटा पूरा होने लगा।

हालांकि अखबार में आज जैसी शाहखर्ची नहीं थी।

मालिक गोयनका अपनी फियट के खुद ही ड्रायवर थे।

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18 अप्रैल 24

    


बुधवार, 17 अप्रैल 2024

 इमर्जेंसी (1975-77) में इंदिरा सरकार ने 

इस तरह उड़ाई थी संविधान की धज्जियां

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सुरेंद्र किशोर

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आपातकाल की घोषणा (25 जून 1975)के साथ ही संजय गांधी यह चाहते थे कि तमाम हाईकोर्ट अगले दिन बंद कर दिए जाएं ।

 अखबारों की बिजली काट दी जाए।

   पश्चिम बंगाल के मुख्य मंत्री  सिद्धार्थ शंकर राय इस राय के नहीं थे।

 याद रहे कि हालांकि देश में आपातकाल लगाने की सलाह सिद्धार्थ शंकर राय ने ही तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को दी थी।श्रीमती गांधी की लोक सभा सदस्यता बचाने का यही एक उपाय उन्हें नजर आया थ।

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   आपात काल की घोषणा के संबंध में रेडियो पर पढ़ने के लिए प्रधान मंत्री का जो भाषण तैयार हुआ था,उसे डी.के.बरूआ और सिद्धार्थ शंकर राय के साथ मिल कर इंदिरा गांधी ने तैयार किया था।बरूआ ने नारा दिया था--

‘‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा।’’

   आपातकाल की भीषण ज्यादतियों की,जिसका शिकार इन पंक्तियों का लेखक भी हुआ था,जांच के लिए मोरारजी देसाई के नेतृत्ववाली जनता पार्टी सरकार ने 1977 में शाह आयोग का गठन किया था।

  आयोग ने 1978 में जो अपनी रपट तैयार की थी,उसमें उस समय की राजनीतिक व प्रशासनिक हलचलों का विवरण इन शब्दों में दिया गया,

‘‘ भाषण तैयार करने के बाद जब श्री राय कमरे से बाहर आ रहे थे  तो वे श्री ओम मेहता (केंद्रीय गृह राज्य मंत्री)से यह सुनकर आश्चर्यचकित हो गये कि अगले दिन उच्च न्यायालयों को बंद करने तथा सभी समाचार पत्रों को बिजली की सप्लाई बंद करने के आदेश दे दिए गए हैं।

ऐसा आदेश संजय की सलाह पर दिया गया था।’’

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   आज जब यह कहा जा रहा है कि देश की स्थिति आपातकाल के ठीक पहले जैसी ही हो रही है और जारी चुनाव के बाद संविधान बदल दिया जाएगा, तो एक बार फिर उस काले  आपातकाल की  कहानी दुहरा लेना मौजूं होगा।

याद रहे कि सन 1975 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक निर्णय से सख्त नाराज थीं जिसके तहत रायबरेली से उनके लोस चुनाव को रदद कर दिया गया था।इंदिरा गांधी पर चुनाव में सत्ता के दुरूपयोग का आरोप साबित हो गया था।

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    शाह आयोग की रपट की चर्चा कर ली जाए।

गृह राज्य मंत्री ओम मेहता की बात पर सिद्धार्थ शंकर राय को इसलिए आश्चर्य हुआ क्योंकि उन्होंने इंदिरा गांधी से कहा था कि आपात स्थिति में भी जब तक नियम नहीं बनाये जाते हैं,तब तक कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है।

 श्री राय ने शाह आयोग को बताया कि वहां उपस्थित व्यक्तियों से उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालयों को बंद करना तथा समाचार पत्रों की बिजली काटना,बिलकुल संभव नहीं है।

  वे वहां रुके रहे क्योंकि वे श्रीमती गांधी को अपनी प्रतिक्रिया बताना चाहते थे।उन्होंने कहा कि मैं यहां से हटने के लिए तैयार नहीं हूं जब तक कि श्रीमती गांधी मुझसे मिल नहीं लेतीं।

  क्योंकि जो कुछ भी हो रहा था,वह बहुत महत्वपूर्ण था।श्रीमती गांधी को लौटने में देर हुई और जब वे वहां इंतजार कर रहे थे तो श्री संजय गांधी बहुत ही उत्तेजित और क्रोधित अवस्था में उनसे मिले और अत्यंत ही बदतमीजी और गुस्ताखी से कहा कि वे (श्री राय)यह नहीं जानते कि देश पर शासन कैसे किया जाता है।

 सिद्धार्थ शंकर राय ने गुस्सा न करके संजय गांधी को समझाया कि उनको अपने काम से काम रखना चाहिए और जो उनका क्षेत्र नहीं है,उसमें टांग नहीं अड़ानी चाहिए।(हालांकि वे नहीं माने।पूरे आपालकाल में संजय गांधी संविधानेत्तर सत्ता के केंद्र बन कर ज्यादतियां करते रहे।)

बाद में श्रीमती गांधी आईं और श्री राय ने उनसे कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए। 

श्रीमती गांधी ने भी कहा कि हाईकोर्ट बंद नहीं होना चाहिए और अखबारों की बिजली नहीं कटनी चाहिए।

    यह और बात है कि संजय गांधी के प्रभाव में काम कर रहे हरियाणा के मुख्य मंत्री बंसी लाल ने अपने राज्य के अखबार की बिजली कटवा दी।

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इमर्जेंसी के अत्याचारों की कहानियां अनंत हैं।पर एक महत्वपूर्ण बात कहनी जरूरी है।वह यह कि इंदिरा सरकार ने तब बोलने -लिखने का अधिकार कौन कहे,लोगों के जीने तक का अधिकार भी छीन लिया था।यह बात केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को साफ-साफ बता दी थी।भयभीत सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार के इस कदम को स्वीकार कर लिया था।

पूरे देश को जेलखाने में परिणत कर दिया गया था।

 ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ था क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी की संसद की संदस्यता भ्रष्टाचरण के आरोप में रद कर दिया था।

 जिस दल ने खुद 1975-77 में संविधान की धज्जियां उड़ाईं,उसे यह आंशका हो रही है कि कहीं मोदी सरकार भी वैसा ही कुछ कर न दे।

भय स्वाभाविक है।

क्योंकि भीषण भ्रष्टाचार और देश तोड़क जेहादी गतिविधियों की समस्याओं से भारत की रक्षा के लिए इस चुनाव के बाद मोदी सरकार को कुछ बड़े और अभूतपूर्व कदम तो उठाने ही पड़ंेगे।चाहे उन कदमों के बुलडोजर के नीचे जो भी आ जाए !

कोई भी ईमानदार व देशभक्त सरकार इस देश को धर्मशाला बनते नहीं देख सकती।

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17 अप्रैल 24


 16 अप्रैल 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ही कहा --

‘‘बैलेट से चुनाव में क्या होता था,आप भूल गए होंगे पर हमें याद है।’’

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सुरेंद्र किशोर

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सुप्रीम कोर्ट की बात की पुष्टि करेगी सन 1999 की यह खबर।

(हिन्दुस्तान में छपी उस खबर की स्कैन काॅपी यहां दी जा रही है।)

वैसे यह तो एक नमूना मात्र है।

उन दिनों जब भी मतदान होता था,दूसरे दिन अखबारों में ऐसी ही भयावह खबरें छपती थीं।

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26 सितंबर, 1999 के दैनिक हिन्दुस्तान,पटना के पहले पेज पर छपी खबर का शीर्षक है--

‘‘जमकर बूथ कब्जा और मत पत्रों की लूट के बीच नौ मरे’’

बिहार के 19 संसदीय क्षेत्रों में हुए दूसरे चरण के मतदान में हिंसा की घटना पहले चरण के मुकाबले कम रही।

लेकिन बूथ कब्जा ,मत पत्रों की छपाई(यानी बैलेट पेपर्स छीन कर उन पर अपनी पसंद की पार्टी के पक्ष में ठप्पे लगाने की घटनाएं )की खबरें प्राय सभी स्थानों से प्राप्त हुई है।’’

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जाहिर है कि मतपत्रों के जरिए मतदान की उस व्यवस्था के कारण ही इतने बड़े पैमाने पर धांधली हुआ करती थी।

ऐसी ही धांधलियों को रोकने के लिए ही इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों के जरिए मतदान का प्रावधान शुरू किया गया।

उसके बाद कितना फर्क आया है,यह बताने की जरूरत नहीं।

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पर,अब कई दल यह मांग कर रहे हैं कि फिर से मतपत्रों के जरिए ही मतदान हो।

जाहिर है कि इस मांग के पीछे की मंशा क्या है।

वे फिर से उन्हीं धांधलियों को दुहरा कर चुनाव जीतना चाहते हैं।

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हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को ठुकरा कर शांतिप्रिय मतदाताओं के पक्ष में निर्णय किया है।

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17 अप्रैल 24


 संवैधानिक प्रावधानों की रक्षा के लिए 

संविधान में संशोधन !

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संविधान के अनुच्छेद-356 की प्रासंगिकता बनाये रखने के लिए यह जरूरी है कि राष्ट्रपति शासन की संपुष्टि राज्य सभा से भी कराने की बाध्यता न रहे

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सुरेंद्र किशोर

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इस देश के किसी प्रदेश में यदि संवैधानिक तंत्र विफल हो जाए ,तो क्या होगा ?

 यदि केंद्रीय मंत्रिमंडल को संसद के दोनों सदनों में बहुमत हासिल नहीं हैं तो केंद्र सरकार  

संबंधित राज्य में चाहते हुए भी राष्ट्रपति शासन लागू नहीं कर सकती।

यानी, संविधान के अनुच्छेद-356 की मौजूदगी के बावजूद एक बड़े भूभाग में संविधान निरर्थक साबित होगा।

यानी वहां अराजकता छा जाएगी।

अपने देश के कुछ राज्यों में ऐसी नौबत आने वाली है।

एक हद तक आ भी चुकी है।मौजूदा मोदी सरकार को राज्य सभा में बहुमत हासिल नहीं है।

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संभवतः संविधान निर्माताओं ने इस बात की कल्पना ही नहीं की थी कि इस देश में ऐसा समय भी आएगा जब किसी दल को लोक सभा में तो बहुमत रहेगा ,उसकी सरकार रहेगी,पर राज्य सभा में वह अल्पमत में रहेगा।

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सन 1999 में केंद्र सरकार ने बिहार में राष्ट्रपति लागू कर दिया।पर, राज्य सभा से उसका अनुमोदन नहीं हुआ तो राज्य मंत्रिमंडल पुनर्जीवित हो उठा।

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निदान क्या है ?

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राष्ट्रहित के महत्वपूर्ण मामले को लेकर कोई निर्णय हो तो उसका अनुमोदन राज्य सभा से प्राप्त करने की बाध्यता समाप्त कर दी जानी चाहिए।

इस देश के जिन राज्यों में विधान परिषदें नहीं हैं ,वहां भी काम तो चल ही रहा है।

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इसके लिए संविधान में संशोधन एक न एक दिन करना ही पड़ेगा ताकि संविधान के अनुच्छेद-356 को निरर्थक न होने दिया जाये।

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16 अप्रैल 24


सोमवार, 15 अप्रैल 2024

 


मेरे लिए राष्ट्रीय स्तर के एक सम्मान की घोषणा से तहे दिल से खुश होने वालों में नेत्र रोग विशेषज्ञ व मेरे करीबी रिश्तेदार डा.सुनील कुमार सिंह प्रमुख हैं।

  सौभाग्यवश आज डाक्टर साहब से मुलाकात हुई।

वे अत्यंत व्यस्त व सफल चिकित्सक हैं।

उनसे अनेक बातें हुईं।

किदवईपुरी,पटना के संजीवनी नेत्र चिकित्सालय एवं शोध संस्थान के संचालक डा.सिंह समाजसेवा में भी रूचि लेते हैं।

 डा.साहब से मैंने अपने पुश्तैनी गांव के बाजार (भरहा पुर-खानपुर बाजार,दरियापुर,सारण)के विकास की संभावना के बारे में बातचीत की।

मैंने उन्हें बताया कि उस प्रस्तावित न्यू पटना इलाके में अच्छे स्कूल और विश्वसनीय अस्पताल की काफी गुंजाइश है। 

उन्होंने कुछ बहुमूल्य सुझाव दिये।

इस पर आगे भी उनसे बातचीत होगी।

--सुरेंद्र किशोर

14 अप्रेल 24

 

  

 


शनिवार, 13 अप्रैल 2024

   एक परिवार से एक ही टिकट

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सुरेंद्र किशोर

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करीब दो साल पहले उत्तर प्रदेश विधान 

सभा का चुनाव हुआ।

उस चुनाव में भाजपा नेतृत्व ने किसी ऐसे भाजपा नेता के परिजन को टिकट नहीं दिया जो नेता खुद पहले से किसी न किसी सदन के सदस्य थे।

  इस तरह कई के टिकट कट गये।

पार्टी में असंतोष फैला तो प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जिन्हें टिकट नहीं मिला है,उस फैसले के लिए मैं जिम्मेदार हूं।

यानी, किसी और पर गुस्सा मत कीजिए।

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किसी ने सवाल किया--राजनाथ सिंह के पुत्र को तो टिकट मिल गया।

जवाब आया कि इस नियम के लागू होने से पहले से जो विधायक थे,उन्हें अपवाद माना गया।

वैसे यदि अपवाद न माना जाता तो बेहतर होता।

पर, इतना तो मानिएगा कि परिवारवाद-वंशवाद के राजनीतिक समुद्र में इस देश में टापू की तरह एक पार्टी ऐसी भी मौजूद है जो अब एक परिवार से एक ही व्यक्ति को सदन मंे पहुंचा रही है।चाहे कोई खुश रहे या नाराज ! 

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यदि भाजपा कभी अपने ही इस नियम को तोड़े तो जरूर लोगों को बताइएगा।

क्योंकि नियम बनाना तो आसान है,पर उस पर कायम रहना बड़ा मुश्किल है।

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इस नियम को आज कितने अन्य दल अपनाने को तैयार हैं ?

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इसके विपरीत इस देश में ऐसे-ऐसे  परिवारवादी -वंशवादी राजनीतिक दल हैं जिनके सुप्रीमो के परिवार का जो भी सदस्य सदन में जाना चाहता है,उसके लिए राह बना दी जाती है।

इस परिवारवाद के कारण ही कांग्रेस की हालत आज सबसे खराब है।

ऐसे अन्य दलों का भी देर -सबेर वही हश्र होने वाला है।

समय रहते अपने राजनीतिक विरोधी से कम से कम एक सबक तो सीख लो। 

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13 अप्रैल 24