मंगलवार, 24 मार्च 2026

 केरल से लेकर बिहार तक देश की शिक्षा-परीक्षा पर

लंबा प्रश्न चिन्ह खड़ा है !

------------------

सुरेंद्र किशोर

----------------

पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं।

जो राज्य सरकार परीक्षा में कदाचार रोकती है,वह अगला चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हो जाती है।

इसलिए सत्ता कौन गंवाना चाहेगा ??

फिर उपाय क्या है ?

समझदार लोग चिंता करें और चिंतन भी।

कोई रास्ता निकालें !

    ..................................................

 सन 1992 में कल्याण सिंह सरकार ने नकल विरोधी कानून बनाया।

मुलायम सिंह की सरकार ने 1994 में उस कानून को रद कर दिया।

दरअसल यू.पी.बोर्ड की परीक्षा में कदाचार पूरी तरह रोक देने के कारण कल्याण सिंह की सरकार 1993 के चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई।

1992 में बाबरी ढांचा गिराने के कारण उत्पन्न भावना को भंजाने का चुनावी लाभ तक भाजपा को नहीं मिल सका था।

(राम मंदिर से अधिक महत्वपूर्ण साबित हुई थी परीक्षा में कदाचार की छूट)

मुलायम सिंह यादव कदाचारी विद्यार्थियों व उनके अभिभावकों के ‘हीरो’ बन गए थे।

--------------------

   यानी,मुझे यह लगने लगा है कि  चुनाव लड़ने वाली कोई भी सरकार आम परीक्षाओं में नकल नहीं रोक सकती।

उसके लिए शायद किसी तानाशाह शासक की जरूरत पड़ेगी।

या फिर कोई सरकार चुनाव जीतने के प्रथम साल से ही शिक्षा-परीक्षा माफियाओं पर नकल कसना शुरू कर दे तो शायद कुछ  बात बने।

 कम से कम तकनीकी संस्थानों की हालत तो सुधरे !

  आज उद्योग जगत कहता है कि सिर्फ 27 प्रतिशत इंजीनियर ही ऐसे हैं जिन्हें नौकरी पर रखा जा सकता है।

 हमारे स्वास्थ्य की देखरेख करने वाले ‘‘धरती के भगवान’’ तो ठीकठाक पढ़- लिखकर निकलें।

................................

जब-जब शिक्षा -परीक्षा के ध्वस्त होने की बात होती है,तब -तब कई लोग अपनी -अपनी राजनीतिक ‘सुविधा’ के अनुसार अपना ‘टारगेट’ तय करके आरोप का गोला दागने लगते हैं।

पर 1963 से इस संबंध में मैंने जो कुछ अपनी  आंखों से देखा है,उसे संक्षेप में शेयर करता हूं।

1.-राजनीति और प्रशासन में गिरावट के अनुपात में शिक्षा में भी गिरावट होनी ही थी।

हुई भी।

2.-पहले परीक्षाओं में ‘सामंतवाद’ था।सन 1967 से उसमें ‘समाजवाद’ आ गया।

3.-इमरजेंसी में माक्र्स के आधार पर बिहार में लाखों सरकारी शिक्षक बहाल हुए।तब की सरकार ने जेपी आंदोलन को कमजोर करने के लिए यह काम किया था।

4.-सरकारी नौकरियां देने के लिए कत्र्तव्यनिष्ठ उच्च पदस्थ अफसरों व सेना की देखरेख में उम्मीदवारों की कदाचारमुक्त प्रतियोगी परीक्षाएं हों।या फिर उच्च न्यायालयों और जिला जजों की देखरेख में परीक्षाएं हों।जनहित याचिका के बाद बिहार में 1996 में वैसा हुआ था।नतीजतन बिहार इंटर बोर्ड परीक्षा में 85 प्रतिशत परीक्षार्थी फेल कर गये थे।मैट्रिक परीक्षा का रिजल्ट भी ऐसा ही रहा था।

------------------- 

छोटी -छोटी टुकड़ियों में सालों भर बड़े हाॅल में ऐसी परीक्षाएं होती रहें।

तभी सिर्फ योग्य लोग ही सेवाओं में आ सकेंगे।

अब भी योग्य लोग सेवा में हैं,पर काफी कम संख्या में।

..........................

1963 में मैं मैट्रिक की परीक्षा दे रहा था।

जिला स्कूल में केंद्र था।

उस जिले के सबसे अधिक प्रभावशाली सत्ताधारी नेता के परिवार के एक सदस्य के लिए चोरी की छूट थी।

केंद्र में किसी अन्य के लिए वह ‘सुविधा’ उपलब्ध नहीं थी।

   मैं बी.एससी.पार्ट वन की परीक्षा दे रहा था।

संयोग से उस काॅलेज के प्राचार्य के पुत्र की सीट मेरे ही हाॅल में पड़ी थी।

नतीजतन पूरे हाॅल को चोरी की छूट थी।

उसी केंद्र में किसी अन्य हाॅल में कोई छूट नहीं थी।

  ..........................

उन दिनों मेडिकल - इंजीनियरिंग काॅलेजों में माक्र्स के आधार पर दाखिला हो जाता था।

प्रैक्टिकल विषयों में कुल 20 में उन्नीस अंक मिल जाने पर कम तेज उम्मीदवार भी डाक्टर या इंजीनियर आसानी से बन जाते थे।

  संयोग से मेरा रूम मेट ही इन 250 रुपयों को इधर से उधर करता था।

न जाने कितनों को उसने डाक्टर-इंजीनियर बनवा दिया।

एक दिन मुझसे उसने पूछा, 

‘का हो सुरिंदर,तुमको भी नंबर चाहिए।

तुमको कुछ कम ही पैसे लगेंगे।’’दो सौ में वह काम हो रहा था।

मैंने कहा कि मुझे कोई नौकरी नहीं करनी है।

मेरा वह रूम मेट खुद हाई स्कूल का शिक्षक बना।

ऐसे गोरखधंघे के कारण ही माक्र्स के आधार पर दाखिला बाद में बंद हो गया।

..........................

  1967 के चुनाव के बाद परीक्षाओं में धुंआधार चोरी शुरू हो गई।

कहा भी जाने लगा कि ‘चोरी में समाजवाद’ आ गया।

महामाया सरकार ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की।

छात्रगण महामाया बाबू के ‘जिगर के टुकड़े’ जो थे ! 

के.बी.सहाय की सरकार को चुनाव में हराने में छात्रों की बड़ी भूमिका थी।

1967 के आम चुनाव से पहले बड़ा छात्र और जन आंदोलन हुआ था।

छात्रों पर भी जमकर पुलिस दमन हुआ था।

मैं भी तब एक छात्र कार्यकत्र्ता था।

मैंने खुद परीक्षा छोड़ दी थी क्योंकि आंदोलन के कारण मेरी तैयारी नहीं हो पाई थी।

............................

1972 में केदार पांडेय की सरकार ने नागमणि और आभाष चटर्जी जैसे कत्र्तव्यनिष्ठ आई.ए.एस.अफसरों की मदद से परीक्षा में चोरी को बिलकुल समाप्त करवा दिया।

  पर सवाल है कि अगले ही साल से ही फिर चोरी किसने होने दी ?

............................

1996 में पटना हाईकोर्ट के सख्त आदेश और जिला जजों की निगरानी में मैट्रिक व इंटर परीक्षाआंे  में कदाचार पूरी तरह बंद कर दिया गया।शिक्षा मंत्री जयप्रकाश नारायण यादव ने प्रेस को बताया कि ‘‘शिक्षा माफिया को समाप्त कर दिया गया।’’

..........................

पर, अगले ही साल से कदाचार फिर क्यों शुरू करवा दिया गया ?

किसने शुरू करवाया ?शिक्षा माफिया के दबाव में तब की लालू सरकार ने करवाया।क्योंकि छात्र नहीं मिलने के कारण अधिकतर निजी काॅलेज बंद होने लगे थे।

क्या कदाचार की इस महामारी के लिए आप किसी एक दल एक सरकार या एक नेता या फिर किसी एक समूह को जिम्मेवार मान कर खुश हो जाना चाहते हैं ?

.............................

 याद रहे कि सन 1996 में बिहार इंटर विज्ञान परीक्षा में 85 प्रतिशत परीक्षार्थी फेल कर गये थे।

----------------------------

सन 2026 में बिहार इंटर विज्ञान परीक्षा में 96 प्रतिशत परीक्षार्थी पास कर गये।यह चमत्कार कैसे हुआ ?

----------------------

  दिल्ली विश्वविद्यालय में सन 2022 से पहले प्राप्तांकों के आधार पर नामांकन होते थे।

यानी, राज्यों के स्कूली बोर्ड्स की परीक्षाओं में मिले अंकों के आधार पर।

  यह देखा गया कि केरल तथा कुछ दूसरे राज्यों की बोर्ड परीक्षाओं में असामान्य ढंग से 100 प्रतिशत अंक मिल रहे हैं ताकि दिल्ली विश्वविद्यालयों के विभिन्न प्रतिष्ठित काॅलेजों में उनका दाखिला हो जाये।

उसके बाद सन 2022 से दाखिला के लिए टेस्ट परीक्षा होने लगी।

     --------------

   टेस्ट परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले केरल के 1672 छात्रों को दिल्ली विश्व विद्यालय में दाखिला मिल गया  था।

प्रतियोगी परीक्षा के बाद केरल से वह संख्या घटकर 350 रह गयी।

  दूसरी ओर, जहां पहले यानी 2021 में बिहार के 556 विद्यार्थियों को दाखिला मिला था ,वहीं टेस्ट शुरू होने के बाद 1280 बिहारी विद्यार्थी 2022 में दिल्ली यूनिवर्सिटी .में दाखिला के योग्य पाए गए।

--------------

उधर केरल में सन 2002 में ही शिक्षा का क्या हाल हो चुका था,उसके बारे में टाइम्स आॅफ इंडिया ने एक खबर दी थी। 

14 नवंबर 2002 को छपी खबर चैंकानेे वाली थी।

चूंकि खबर केरल के बारे थी,इसलिए और भी चैंकाती थीं।उस राज्य के बारे में यह कहा जाता रहा है कि वहां सर्वाधिक साक्षरता है।माना जा रहा था कि लोग पूर्ण साक्षर हंै तो सुशिक्षित और कुशल भी होंगे।पर ,सब सुशिक्षित व कुशल वहां भी नहीं हैं।कुछ जरूर होंगे जैसे अन्य राज्यों में भी होते हैं।

  केरल के सार्वजनिक क्षेत्र के एक संस्थान ने क्लर्क आदि पद पर बहाली के लिए 2002 में विज्ञापन निकाला।करीब 13500 आवेदन आये।

उनमें से 5 हजार उम्मीदवार हाईली क्वालिफायड थे।उनमें 20 इंजीनियर और दो डाक्टर्स भी थे।

-----------

वैसे शिक्षा-परीक्षा को लेकर बिहार की आदर्श स्थिति नहीं है।बहुत सुधार की जरूरत है।

किंतु केरल के बारे में यह सब जान-सुनकर किसी को सिर्फ बिहार को ‘‘सिंगल आउट’’ करने का नैतिक हक नहीं है। 

---------------

और अंत में

------

1963 में मैंने साइंस विषयों के साथ मैट्रिक फस्र्ट डिविजन से पास किया था।

आसपास के गांव के कई लोग मुझे देखने आये थे।

2026 में जो विद्यार्थी फेल कर गए हैं ,उन्हें देखने कुछ लोग गए होंगे !

कैसा परीक्षार्थी निकला जो बहती गंगा में भी हाथ

 नहीं धो पाया !

-----------------

24 मार्च 26 





सोमवार, 9 मार्च 2026

    पद्म सम्मान लेने मैं राष्ट्रपति भवन इसलिए नहीं गया

----------------------------------

   सुरेंद्र किशोर

------------------------

कई लोग यह सवाल पूछते रहे हैं कि मैं पद्म सम्मान लेने राष्ट्रपति भवन मैं क्यों नहीं गया था ?

वह अकारण नहीं था।उसका कारण मैं आपको पहली बार बताता हूं।

पद्म सम्मान की स्थापना के बाद पहली बार सन 2024 में बिहार में कार्यरत किसी बिहारी पत्रकार को,यानी मुझे यह सम्मान मिला-वह भी बिन मांगे।

मेेरी इसकी न तो कभी इच्छा रही और न ही मैंने इसके लिए किसी से याचना की।

मैंने अपने परिवार की खुशी के लिए इसे स्वीकार भी कर लिया।

मुझे मिला यह सम्मान बिहार की पत्रकारिता का भी सम्मान था।

एक ऐसे व्यक्ति को मिला जो अपने परिवार का पहला मैट्रिकुलेट हैं।किसान परिवार से आता है।गांव में पला-बढ़ा।घर में राम चरित मानस-आल्हा उदल पर पुस्तक  के अलावा पढ़ने के लिए भी कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं थी।

,न्यूज सेंस भी यही कहता है कि बिहार की मुख्य धारा की पत्रकारिता की ओर से मुझसे पूछा जाता कि यह उपलब्धि आपने कैसे हासिल की ?

मैं कुछ बताता ताकि पत्रकारिता की अगली पीढ़ी को प्रेरणा मिले और उन्हें भी कभी पद्म सम्मान मिले।

पर, देखा कि मुख्य धारा की पत्रकारिता की इस बात में कोई रूचि नहीं थी यानी न्यूज सेंस पर ‘‘भावना’’ हावी हो गयी थी।

कुछ उल्टी-सीधी बातें भी सुनीं।इसलिए मैंने सोचा कि राष्ट्रपति भवन जाकर किसी की ‘‘भावना’’ को और अधिक आहत क्यों करूं ? 


शुक्रवार, 6 मार्च 2026

  बिहार का सी.एम.कैसा हो  ???

---------------------

बिहार का सी.एम.कैसा हो ?

योगी आदित्य नाथ जैसा हो।

चाहे जिस किसी ‘सामाजिक समूह’ से आता हो !

--------------

जिससे भी बात हो रही है,उसकी यही आवाज है।

दरअसल बिहार और यू.पी की समस्याएं 

लगभग समान रही हैं।भीषण और जटिल हैं।

जिन समस्याओं से योगी जूझ रहे हैं,बिहार के नये

 सी.एम. में भी उन समस्याओं से उसी तरह जूझने का यदि 

जज्बा हो तो नेपाल की सीमा पर बसे बिहार की 

रक्षा-सुरक्षा बेहतर ढंग से हो सकती है।

शांति रहेगी तो देश-विदेश से बिहार में और भी निवेश आएगा।

----------------- 

6 मार्च 26  


गुरुवार, 5 मार्च 2026

 मुख्य मंत्री नीतीश कुमार को 

उनके जन्म दिन पर हार्दिक बधाई !

--------------

सुरेंद्र किशोर

-------------

सत्तर के दशक में नीतीश कुमार ने मुझसे कहा था कि

‘‘मैं एक दिन मुख्य मंत्री जरूर बनूंगा।

मुख्य मंत्री बनकर अच्छा काम करूंगा।’’

उस समय तक वे 1977 का अपना पहला विधान 

सभा चुनाव हार चुके थे।

मैं तब ‘आज’ अखबार में काम कर रहा था।

हमलोग कभी -कभी काॅफी हाउस में मिलते थे।

तब मैं उनके इस आत्म विश्वास पर कुछ अचम्भित और कुछ सशंकित था।

लगा था कि यह तो इनका बड़बोलापन है।

लेकिन नीतीश सही साबित हुए और मैं गलत।

-------------

कहा तो था कि ‘‘अच्छा काम करूंगा’’, किंतु मुख्य मंत्री बन कर, कर दिए ‘‘बहुत सारे अच्छे काम।’’

(मैंने 1967 से अब तक बिहार के सारे मुख्य मंत्रियों को काम करते देखा है।इसलिए यह बात कहने की स्थिति में हूं।)

इसलिए भी नीतीश को डबल बधाई।

पर ,नीतीश कुमार का एक भटकाव भी रहा,हालांकि एक ही भटकाव।

प्रधान मंत्री बनने के लोभ में उन्होंने 

 राजग को दो बार छोड़ा।उन दिनों मुझसे पूछते तो मैं नीतीश जी को बताता कि कांग्र्रेस को सत्ता यदि मिलेगी भी तो वह आपको पी.एम.नहीं बनाएगी।वैसे तो मिलेगी नहीं क्योंकि देश अभी मोदी के साथ है।

आप तो किसी को ‘‘न तो बचाते हंै और न फंसाते हंै।’’

कांग्रेस को तो एक और मनमोहन सिंह चाहिए होगा।

  मेरे मित्र उदयकांत मिश्र ने नीतीश कुमार की जीवनी लिखी है।बहुत अच्छा लिखा है,उसमें सारी बातेें आ गई हैं।

 पर, एक खास कोण से नीतीश कुमार के बारे में अब भी लिखने की जरूरत है ताकि राजनीति में जो कुछ थोड़े से आदर्शवादी लोग मौजूद हैं या आना चाहते हैं, उन्हें प्रेरणा मिले।

वह कोण यह है कि इस ‘‘बीहड़’’ प्रदेश बिहार में ‘‘बहुत अच्छा काम’’ करने के सिलसिले में नीतीश कुमार को किन -किन परेशानियों-कठिनाइयों-बाधाओं-असुविधाओं आदि का सामना करना पड़ा और उन पर उन्होंने कैसे काबू पाया।क्या -क्या न कर पाने का अफसोस रहा ?

उस क्रम में कितनों की नाराजगी झेली।कितने खुश हुए।यदि नीतीश यह सब बातें बताना चाहंे तो ही।

 जाहिर हैं कि इस बारे में तभी कोई बात करना चाहेगा जब वह सब आॅफ द रिकाॅर्ड हो।वह भी तभी हो सकेगा जब शासकीय जिम्मेदारी के दौर मुक्ति पा ले। 

---------------

नीतीश कुमार से मेरा परिचय उस समय से हैं जब वे पटना इंजीनियरिंग काॅलेज के प्रथम वर्ष के छात्र थे।तब मैं लेहियावादी पार्टी का एक सामान्य पर सिरियस कार्यकर्ता था।नीतीश जी पटना के मुसल्लहपुर हाट के जिस कृष्णा लाॅज में रहते थे,उनके कमरे के बगल वाले कमरे में मेरा छोटा भाई नागेंद्र रहता था ।वह पटना लाॅ कालेज में छात्र था।

कहीं से पटना आने पर मैं नागेंद्र के कमरे में रुकता था।तब देखा था कि लोहिया और लोहियावादी राजनीति में तब से ही नीतीश जी गहरी रूचि थी।

-----------------

नीतीश जी को इसलिए भी बधाई क्योंकि वे राजनीति व प्रशासन में ‘‘भ्रष्टाचार की आंधी’’ और ‘‘परिवारवाद के तूफान’’ के बीच भी अविचलित होकर इन दोनों बुराइयों से कोसों दूर रहे।यह विरल है। 

-------------------

आम तौर पर पत्रकार किसी नेता खासकर सत्ताधारी नेता को इस तरह बधाई नहीं देता।पर नीतीश कुमार ने बिहार के लिए विशेष काम किया और अपने राजनीतिक जीवन के प्रारंभिक वर्षों में आर्थिक परेशानियां उठाने के बावजूद राजनीति में वे डटे रहे,इसलिए भी बधाई।

सक्रिय राजनीति में तो मैं भी करीब दस साल (1967-76) तक  था।पर उन परेशानियों को मैं नहीं झेल सका।सक्रिय पूर्णकालिक राजनीति से पलायन कर गया। पत्रकारिता में आ पहुंचा।यहां कम से कम पहले ही दिन से दोनों शाम भोजन लायक पैसे का इंतजाम हो गया।राजनीति में तो वह भी सुविधा नहीं थी।कल्पना कर सकता हूं कि नीतीश जी ने अपने वैसे दिन कैसे काटे होेंगे !

------------------ 

2 मार्च 26 

------------------

फेसबुक वाॅल से


रविवार, 1 मार्च 2026

 प्रखर श्रीवास्तव की पुस्तक ‘‘हे राम’’ के बारे में 

---------------------------

हमें किसी नेता,दल और विचारधारा को खुले 

मन-मिजाज से देखना -पढ़ना चाहिए।

सारे तथ्य हमारे सामने हों तो हमें कोई फैसला करने में 

सुविधा होती है।

क्योंकि न तो कोई व्यक्ति पूर्ण है और न कोई संस्था 

या विचारधारा-- न मैं, न आप और न वह।

--------------------

मेरी धारणा यह बनी है कि अपवादों को छोड़कर हमारे अधिकतर 

इतिहासकारों ने जितना जाहिर किया है,उससे अधिक छिपाया है।

----------------------

1--पहले मैं कहा करता था कि इस देश के नेताओं 

के चाल,चरित्र और चिंतन को बाहर-भीतर से जानना हो तो एम.ओ.मथाई(जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव)की दोनों किताबें पढ़िए।

2--बिहार के नेताओं को,जो स्वतंत्रता सेनानी भी थे, जानना हो तो अय्यर कमीशन की रपट पढ़िए।

3.--अब मैं एक और किताब उसमें जोड़ता हूं।

नई पीढ़ी को चाहिए कि वह प्रखर श्रीवास्तव की हाल में आई पुस्तक

 ‘हे राम’ जरूर पढ़े।

  प्रखर श्रीवास्तव ने अद्भुत किताब लिखी है।पुस्तक हो तो ऐसी !

----------------

----सुरेंद्र किशोर

------------------------

1 मार्च 26

     


रविवार, 22 फ़रवरी 2026

   मैं भारतीय पहले, पत्रकार बाद में 

----------------------

सुरेंद्र किशोर

-------------

मैं पत्रकार हूं।

लेखक हूं।

किसान भी हूं।

गृहस्थ हूं।

पर,सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं इस देश का

नागरिक हूं।

एक नागरिक के रूप में मैं चाहता हूं कि यह देश 

लोकतांत्रिक बना रहे।पर दूसरी ओर देश-विदेश की हिंसक-अंिहंसक शक्तियां इसे इस्लामिक देश बनाने के लिए जी-जान से लगी हुई हैं।

कुछ लोग वोट के लिए और अन्य लोग ‘गजवा ए हिन्द’ के लिए

अपनी- अपनी शैली में प्रयत्नशील हैं।

कई जगह दोनों तत्व जाने-अनजाने एक दूसरे के मददगार

 बन रहे हैं।

-----------

मध्य युग की वापसी की कोशिश को रोकने का मेरा प्रयास है।भले यह

गिलहरी प्रयास है,पर जारी रहेगा।

ताकि, मेरे वंशज को भी सनातन धर्म-संस्कृति का शांतिपूर्वक पालन करने की अनंत काल तक सुविधा उपलब्ध रहे।

इस क्रम में बाकी बातें मेरे लिए कोई महत्वहीन हैं।

-------------

इसी बात को ध्यान में रखते हुए कोई व्यक्ति मेरे लेख या पोस्ट को पढ़े।

मुझसे जो बिलकुल सहमत नहीं हैं,उन्हें मेरा फेसबुक फें्रड बने रहने का कोई औचित्य नहीं है।

----------------- 

 22 फरवरी 26


 कितने दूरदर्शी थे अटल जी !

-----------------

वाजपेयी जी यह जानते थे कि भारत की एक पार्टी 

को बर्बाद करने की क्षमता किस व्यक्ति में है !

--------------------

सुरेंद्र किशोर

-------------

   प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जान गए थे कि अमेरिका में गिरफ्तार इसी व्यक्ति में अपनी ही पार्टी को नष्ट करने की पूरी क्षमता है।

वह क्षमता अकेली मेरी पार्टी में नहीं है।भाजपा को परोक्ष मदद चाहिए होगी !

  इसलिए उस व्यक्ति को तब के प्रधान मंत्री वाजपेयी ने अमरीकी सरकार पर अपने प्रभाव का उपयोग करके साफ रिहा करवा दिया।यानी गिरफ्तारी से संबंधित कागज-पत्र भी गायब करवा दिया।हालांकि वहां के अखबार में गिरफ्तारी की यह खबर छपी थी।

अटल जी का पूर्वानुमान सही साबित हो रहा है।

यहां अपनी पार्टी को बर्बाद करने का वह काम वे तेजी से कर रहे हैं।

सन 2015 में डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सार्वजनिक रूप से उस ‘‘क्षमतावान’’ व्यक्ति का नाम भी बताया था।

डा.स्वामी का वह बयान,जिसमंे नाम छपा था, 20 जून 2015 के दैनिक भास्कर में छपा था।

उस अखबार की कटिंग मेरे पास है।

पर,मैं नाम नहीं बताऊंगा।

अब आप कल्पना कीजिए कितने दूरदर्शी 

थे अटल जी !!!

अटल जी की मदद से व्यक्ति रिहा नहीं हुआ होता तो उसे अमेरिका के कानून के अनुसार वहां 25 साल की सजा हो गई होती।

------------

22 फरवरी 26