गुरुवार, 13 मई 2021

 2019 के लोक सभा चुनाव में पश्चिम बंगाल के संदर्भ में अपने एग्जिट पोल के नतीजे के मामले में प्रदीप भंडारी सही साबित हुए थे।

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देखना है कि इस बार के एग्जिट पोल में वे सही साबित होते हैं या नहीं !!

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प्रदीप भंडारी के नेतृत्व वाली ‘जन की बात’(चुनाव विश्लेषण कत्र्ता)

ने 2019 के लोक सभा चुनाव के समय एक्जिट पोल कराया था। 

पश्चिम बंगाल के बारे में जन की बात का आकलन था-

भाजपा को 18 से 20 सीटें मिलेंगी।

टी.एम.सी.को 13 से 22 के बीच सीटें मिलेंगी।

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तब सीटें मिलीं थीं--टी.एम.सी.-22

और भाजपा को 18

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यानी, 2019 में ‘जन की बात’ का लगभग सटीक आकलन रहा।

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इस बार पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के समय जन की बात द्वारा किए गए एग्जिट पोल

का नतीजा है-- 

भाजपा--162 से 185 के बीच

तृणमूल कांग्रेस--104-121

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इंडिया न्यूज चैनल पर आज प्रदीप भंडारी ने यह भी भविष्यवाणी की है कि ममता बनर्जी नंदीग्राम में हार रही हैं।

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देखना है कि इस बार प्रदीप भंडारी सही साबित होते हैं या नहीं।

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--सुरेंद्र किशोर

29 अप्रैल 21











 मौत के सौदागरों से निपटने के लिए   

 तीन सूत्री बदलाव की सलाह

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     --सुरेंद्र किशोर--

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मौत के सौदागरों , क्रूर अपराधियों , बड़े -बड़े भ्रष्टाचारियों और  माफियाओं के लिए सबक सिखाने लायक सजा सुनिश्चित करनी है ?

यदि हां तो  

इस देश में कम से कम 

तीन काम तुरंत करने होंगे।

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1.-अदालतें इस मुहावरे पर पुनर्विचार करे कि 

‘‘बेल इज रूल एंड जेल इज एक्सेप्सन।’’

यानी, जमानत नियम है और जेल अपवाद।

अब बेल अपवाद हो और जेल नियम।

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2.-इस न्याय शास्त्र को बदला जाए कि

 ‘‘जब तक कोई व्यक्ति अदालत से दोषी सिद्ध नहीं हो

 जाता, तब तक उसे निर्दोष ही माना जाए।’’

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अब होना चाहिए इससे ठीक उलट।

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3.-सुप्रीम कोर्ट ने यह कह रखा है कि किसी आरोपी का

डी.एन.ए.,पाॅलीग्राफी व ब्रेन मैपिंग टेस्ट उसकी मर्जी के बिना नहीं कराया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि करीब दस साल पहले के अपने इस निर्णय को वह बदल दे।

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सुप्रीम कोर्ट तथा दूसरी अदालतांे ने कोरोना काल में विभिन्न सरकारों को अच्छी -खासी फटकार लगाई है।

अच्छा किया।

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पर, उपर्युक्त तीन काम यदि हो जाए तो मौत के सौदागरों का हौसला पस्त होगा।

और, किसी भी सरकार को कोरोना जैसी महा विपदा से लड़ने में सुविधा होगी।

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कोरोना काल में इस देश व विश्व के लोगों को जो अभूतपूर्व विपदा झेलनी पड़ी है और पड़ रही है,उसके लिए दो तरह के तत्व जिम्मेदार हैं।

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एक तत्व ‘आसमानी’ है।

दूसरा सुलतानी !

आसमानी पर तो विश्व की किसी भी सरकार का कोई वश नहीं चल रहा है।

   भारत जैसी जर्जर व्यवस्था वाली सरकारों का भला क्या चलेगा ।

आजादी के बाद से ही इस व्यवस्था को जर्जर ,भ्रष्ट व पक्षपातपूर्ण बना दिया गया।

यह भ्रष्टों के लिए स्वर्ग माना जाता है।

अपवादों की बात और है।

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पर, इस देश की सरकारें जितना कर सकती थीं,उतना भी नहीं कर पाई तो उसके दो कारण हैं।

वे कारण आसमानी नहीं बल्कि ‘सुलतानी’ हैं।

इनमें तो बदलाव व सुधार हो ही सकता है।

कुछ ईमानदार सत्ताधारी

उसकी कोशिश करते भी रहे हैं।

किंतु सफलता सीमित है।

एक तो भारी भ्रष्टाचार के कारण आजादी के बाद से ही अपवादों को छोड़कर इस देश के सिस्टम को ध्वस्त और शासन व सेवा तंत्र के अधिकांश को निकम्मा व लापारवाह बना दिया गया।

  मनुष्य देहधारी तरह- तरह के गिद्धों को तो यह लगता है कि उन्हें तो कभी कोई सजा हो ही नहीं सकती।

अधिकतर मामलों में होती भी नहीं।

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एक तत्व यह भी है कि कोरोना की पहली

लहर के बाद सरकारें थोड़ी लापरवाह हो गईं।

दूसरी लहर के लिए वे कम ही तैयार थीं।

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एक छोटा उदाहरण --

दवा की कालाबाजारी व मिलावटखोरी पहले भी होती रही है।

इस बार आॅक्सीजन सिलेंडर व दवाओं की भीषण कालाबाजारी ने तो न जाने कितने मरीजों को यह दुनिया छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया।

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इन अपराधों में गिरफ्तार हो रहे गिद्धों को सबक सिखाने वाली सजा सुनिश्चित तभी हो सकती है जब ऊपर के तीन सूत्री बदलाव के लिए न्यायालय सरकार से मिलकर ठोस करें।

यदि यह बदलाव हो गया तो सरकारों को फटकार लगाने की 

जरूरत अदालतों को भरसक नहीं पड़ेगी। 

क्या कभी ऐसा हो पाएगा ?

पता नहीं !

भले न हो, पर कहना मेरा कत्र्तव्य है एक नागरिक के नाते।

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--सुरेंद्र किशोर

    8 मई 21


 ममता बनर्जी की असली ताकत

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सुरेंद्र किशोर

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पश्चिम बंगाल विधान सभा के गत चुनाव में ममता बनर्जी को यानी तृणमूल कांग्रेस को करीब 48 प्रतिशत मत मिले ।

  इस 48 प्रतिशत के घटक तत्व कौन -कौन हैं ?

इसमें लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम वोट है।

बाकी बचे 18 प्रतिशत।

ममता बनर्जी ने गत चुनाव प्रचार के दौरान अपना गोत्र भी बता दिया था।

उन्होंने यह नहीं कहा था कि मैं हिन्दू हूं।

इस देश में आजादी के बाद से ही मतदान का एक तरीका रहा है।

अपवादों को छोड़कर किसी भी प्रधानमंत्री या मुख्य मंत्री या उस पद के उम्मीदवार को उनकी जाति के अधिकतर वोट मांगे-बिन मांगे मिल जाते रहे हैं।

 यानी, बचे 18 प्रतिशत में ममता बनर्जी की जाति के अधिकतर लोग उन्हें मतदान किया होगा।

  अब बचे 15 प्रतिशत मत।

 इतने ही मत ममता बनर्जी को उनके कामों के आधार पर मिले होंगे।

हालांकि इस 15 प्रतिशत में भी गैर मुस्लिमों के बीच के कट्टर भाजपा विरोधी लोग भी रहे होंगे।

   चुनावी आंकड़ों के इस ब्रेक-अप को नजरअंदाज करके कोई भी सटीक राजनीतिक आकलन नहीं किया जा सकता।

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12 मई 21


 प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह तो रुपए पेड़ों पर नहीं उगा पाए !

पर, लगता है कि अब सोनिया जी यह चाहती हंै कि यह काम मौजूदा प्रधान मंत्री मोदी जी करके दिखाएं !!!

टैक्स वगैरह वसूलने की भला क्या जरूरत है ? !!

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  --सुरेंद्र किशोर--

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21 सितंबर, 2012 को तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि 

‘‘पैसे पेड़ों पर नहीं उगते।’’

वे डीजल आदि की मृल्य वृद्धि के अपने सरकारी निर्णय का बचाव कर रहे थे।

  अब जब कांग्रेस प्रतिपक्ष में है तो सोनिया गांधी कह रही  हैं कि कोविड के इलाज से संबंधित दवाओं व उपकरणों को जी.एस.टी.से मुक्त कर दिया जाए।

गत साल कांग्रेस ने पेट्रोल-डीजल की मूल्य वृद्धि के खिलाफ आंदोलन तक किया था।

  क्या सोनिया गांधी प्रकारांतर से नरेंद्र मोदी से कह रही हैं कि हमारे मनमोहन सिंह जो काम नहीं कर पाए, यानी पेड़ों पर रुपए नहीं उगा पाए, 

वह काम आप करिए ???

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दरअसल प्रतिपक्ष में रहने पर एक मापदंड और सत्ता में आ जाने पर ठीक विपरीत !

अपने देश की राजनीति की मुख्य पहचानों में यह एक है।

इसके उदाहरण अनेक हैं।

नमूना पेश है।

भाजपा जब प्रतिपक्ष में थी तो वह कहती थी कि संसद में हंगामा करना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही हिस्सा है।

पर,अब जब प्रतिपक्ष ने संसद को ‘हंगामा सभा’ में बदल दिया है तो भाजपा प्रतिपक्ष के रवैए की निंदा करती है।

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--सुरेंद्र किशोर

  11 मई 21


 जो इतिहास से नहीं सीखता,वह उसे दुहराने 

    को अभिशप्त होता है।

    और, जो  इतिहास पढ़े ही नहीं ?!!

   हमारे नेता कितना पढ़ते हैं इतिहास ?     

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       --सुरेंद्र किशोर--

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मुख्य मंत्री ममता बनर्जी को गत चुनाव में पराजित कर चुके भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी का आज के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लेख छपा है।

उनके लेख से पश्चिम बंगाल की राजनीति की ताजा व स्पष्ट तस्वीर सामने आती है।

  उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के काॅडर को कृतघ्न करार दिया है।

पश्चिम बंगाल विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता श्री अधिकारी लिखते हैं कि 

  ‘‘जिन कांग्रेस और सी.पी.एम. ने भाजपा को हराने के लिए खुद को शून्य बना लेने की कीमत पर भी तृणमूल कांग्रेस की  मदद की, उन दलों के बचे-खुचे दफ्तरों पर भी तृणमूल कार्यकत्र्ताओं ने हमले किए।’’

   दरअसल सुवेंदु अधिकारी का समकालीन इतिहास का ज्ञान तो अधूरा है ही,मध्यकालीन इतिहास का भी पूरा ज्ञान नहीं है।

  जो इतिहास से नहीं सीखता, वह उसे दुहराने को अभिशप्त होता है।

 मध्यकालीन इतिहास क्या कहता है ?

मुहम्मद गोरी ने जयचंद की तटस्थता का लाभ उठाकर तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चैहान को हरा दिया।

तराइन के प्रथम युद्ध में चैहान ने गोरी से हराया था।

पर गोरी ने उस कृतज्ञता का एहसान मानने की जगह बाद में जयचंद पर भी हमला कर दिया।

बचने के लिए जयचंद भागा।

भागने के क्रम में नदी में डूब कर मर गया।

(किसी इतिहासवेता को इस विवरण में कुछ संशोधन करना हो तो उनका स्वागत है)

   जिस तरह गोरी एक खास उद्देश्य के लिए लड़ रहा था,उसी तरह हमलावर तृणमूल कार्यकत्र्तागण भी एक बड़े उद्देश्य के लिए बंगाल में ‘युद्धरत’ हैं।

 जिन्हें उस उद्देश्य को समझना

 हो, वे समय रहते समझ लें, अन्यथा भुगतने को तैयार हो जाएं। 

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याद रहे कि सुवेंदु अधिकरी ने हाल में यह कहा था कि ममता बनर्जी पहली नेता हैं जो हार कर भी मुख्य मंत्री बन रही हैं।

जबकि, सच यह है कि इस तरह के पहले नेता मोरारजी देसाई थे जो 1952 के आम चुनाव में अपनी सीट हार गए थे।

फिर भी कांग्रेस ने उन्हें बंबई राज्य का मुख्य मंत्री बना दिया था।

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11 मई 21


  


सोमवार, 10 मई 2021

      बिहार की विधायिका पर एक 

     सर्वज्ञान विषयक किताब

     के ताजा संस्करण की जरूरत

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     --सुरेंद्र किशोर--

1982 में एक बहुत ही उपयोगी किताब प्रकाशित हुई थी।

उसका नाम है--‘‘ओरिजिन एंड डेवलपमेंट आॅफ बिहार लेजिस्लेचर।’’

उसे लिखा था बिहार विधान सभा के अध्यक्ष राधानंदन झा ने।

 बाद में बिहार विधान परिषद के सभापति प्रो.जाबिर हुसेन की सलाह पर उसका दूसरा संस्करण 1998 में छपा।

दूसरे संस्करण को तैयार करने में भी राधानंदन झा का योगदान था।

उनकी मदद की थी कि इंडियन नेशन व बाद में टाइम्स आॅफ इंडिया के नामी पत्रकार डी.एन.झा ने।  

 1912 से 1998 तक की विधायिका पर यह सर्वज्ञान विषयक पुस्तक है।

  दूसरे संस्करण के आए करीब 23 साल हो चुके हैं।

यानी, इस बहुमूल्य पुस्तक का ताजा संस्करण अब जरूरी है।

एक उम्मीद तो की ही जा सकती है।

 वह यह कि इसका ताजा संस्करण ‘कोरोना काल’ के बाद जरूर छपे।

जिन्हें आज के भौतिक युग में भी पढ़ने -लिखने में रूचि हो,वे  इसकी जरूरत मौजूदा स्पीकर विजय कुमार सिन्हा के समक्ष रखें।

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यह पुस्तक गंभीर ढंग से पत्रकारिता या शोध कार्य करने वालों के लिए एक जरूरी दस्तावेज है।

मोटा -मोटी बता दें कि इस पुस्तक में 1912 से 1998 तक के बिहार विधान परिषद,विधान सभा के सदस्यों के नाम हैं।

बिहार से संविधान सभा,लोक सभा व राज्य सभा के सदस्यों के भी नाम हैं।

बड़े साइज में करीब सवा तीन सौ पेज की इस किताब में इसके अलावा भी बहुत सारी जानकारियां हैं।

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10 मई 21



    


   

      ममता से बेहतर लालू !

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      --सुरेंद्र किशोर--

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 मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने कल केंद्रीय चुनाव आयोग में बड़े सुधार की जरूरत बताई है।

  उन्होंने कहा है कि इस संस्था को यदि बचाना है तो बड़े सुधार जरूरी हंै।

  उनके अनुसार चुनाव आयोग निष्पक्ष होता तो भाजपा को पश्चिम बंगान विधान सभा में 30 से अधिक सीटें नहीं मिलतीं।

    अब सवाल है कि ममता जी कैसा सुधार चाहती हैं ?

क्या केंद्रीय स्तर पर भी वैसा ही चुनाव आयोग वह चाहती हंै जैसा राज्य स्तर पर होता है ?

2018 में पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनाव में तृणमूल के खिलाफ के करीब 20 हजार उम्मीदवारों को नामंाकन पत्र तक नहीं दाखिल करने दिया गया था।

तब नख-दंत विहीन राज्य चुनाव आयोग मूक दर्शक बना रहा था।

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2019 के लोक सभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में भाजपा को 42 में से 18 सीटें मिली थीं।

  उस अनुपात में या थोडा़ ही कम विधान सभा चुनाव में भी भाजपा को सीटें मिलनी चाहिए थीं।

पर उससे काफी कम मिलीं।

क्या 2019 के चुनाव में केंद्रीय चुनाव आयोग के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस ने कोई आरोप लगाया था ?

मुझे नहीं मालूम।

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ममता जी के अनुसार जो चुनाव आयोग उन्हें 294 में से 264 सीटें जितवाने का रास्ता साफ कर देता , वही आयोग निष्पक्ष माना जाएगा !!

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  नब्बे के दशक के अदमनीय मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषन ने आलमारी में धूल खा रही चुनाव नियमों वाली किताब को बाहर निकाला ।

  उन्होंने एक-एक कर उसके नियम लागू करने की कोशिश की। 

  उस पर देश के कई धांधली प्रिय नेताओं के साथ-साथ बिहार के मुख्य मंत्री लालू प्रसाद भी शेषन से नाराज हो गए। 

लालू प्रसाद को लगा कि अब वे शेषन के रहते चुनाव में धांधली नहीं करा पाएंगे।

  हालांकि उन्हें इस बात का भरोसा नहीं था कि इतनी बड़ी संख्या में जनता अब उनके साथ है कि धांधली की उन्हें कोई जरूरत ही नहीं है।

   उस चुनाव में लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले जनता दल को बिहार विधान सभा की कुल 324 में से 167 सीटें मिली ।

मंडल आरक्षण विवाद के बाद पिछड़े लालू के साथ गोलबंद हो गए थे।

  अनुकूल रिजल्ट के बाद लालू प्रसाद ने स्वच्छ-निष्पक्ष  चुनाव के लिए टी.एन.शेषण को सार्वजनिक रूप से धन्यवाद दिया था।

याद रहे कि शेषन के कारण कमजोर वर्ग के लोगों को भी वोट देने का अवसर मिला।उससे लालू खुश हुए।

किंतु ममता बनर्जी 294 में से 213 विधान सभा सीटें मिलने के बावजूद आयोग से खुश नहीं हैं।

यह उनकी खास तरह की प्रवृति का द्योतक है जो प्रवृति आने वाले दिनों में अनेक संकट पैदा कर सकती है।

कम से कम इस मामले में क्या आप लालू प्रसाद को ममता बनर्जी से अधिक लोकतांत्रिक नहींे मानेंगे ?

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9 मई 21