किसी ने कहा है--
‘‘भारत में बसा पाकिस्तान सरकता हुआ तुम्हारी तरफ आ
रहा है।
तुम तो जिन्दगी गुजार लोगे ,खून के आंसू रोएगी
तुम्हारी आने वाली पीढ़ियां।’’
किसी ने कहा है--
‘‘भारत में बसा पाकिस्तान सरकता हुआ तुम्हारी तरफ आ
रहा है।
तुम तो जिन्दगी गुजार लोगे ,खून के आंसू रोएगी
तुम्हारी आने वाली पीढ़ियां।’’
दो कविता संग्रह मिले
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1.-हटो व्योम के मेघ
--कुमार अनुपम
2.-बोध-अबोध
--सतीश कुमार
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कुमार अनुपम परिचय के मोहताज नहीं।
जेपी के सहयोगी रहे।
एक साथ कई क्षेत्रों में सक्रिय
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सतीश कुमार पेशे से इंजीनियर और कैलिफोर्निया(अमेरिका)में कार्यरत।
इसके बावजूद भारत स्थित परिवार और यहां की ‘जमीन’ से जीवंत सपर्क।
सतीश जी ने कुछ समय तक टाइम्स आॅफ इंडिया(पटना)के
लिए खोजपूर्ण स्टोरी भी की थी जब वे भारत में थे।
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इसलिए मैं उनकी इस ताजा कविता को,जो इस संग्रह में शामिल है,
गंभीरता से लेते हुए यहां उधृत कर रहा हूं।
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पत्रकारिता
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आजकल बहुधा
पत्रकारिता धरती से छूटे हुए,
नीयत से टूटे हुए,
धंधे से लुटे हुए
बेचैन लोगों की ‘‘सभ्य’’ आत्म कथा है !
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कुमार अनुपम के कविता संग्रह की भूमिका
डा.अनिल सुलभ ने ‘‘शुभाशंसा’’
के तौर पर लिखी है।
बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा.सुलभ ने लिखा है कि
‘‘कुमार अनुपम एक ऐसे जाग्रत कवि हैं,जिनकी कविताएं लोक केंद्रित हैं।
इनकी कविताएं सामाजिक स्थितियों ,परिस्थितियों और उसकी दशा-दिशा का तात्विक
चित्रण करती हैं और समाज को सचेत करती हैं।............’’
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--सुरेंद्र किशोर
हजार फूल खिलने दो
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इतिहास से सबक लो
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सुरेंद्र किशोर
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लोकतंत्र,राजनीतिक दल और देश को बचाना है तो विभिन्न
धर्मों और जातियों के बीच संतुलन बनाये रखिए।
न तो हिन्दू राष्ट्र के विचार को समर्थन मिले न ही इस्लामी राष्ट्र को।
न सवर्णों का वर्चस्व कायम हो न ही पिछड़ों का।
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हजार फूल खिलने दो
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आजादी के तत्काल बाद कौन किस पद पर था ?
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जवाहरलाल नेहरू के दौर का सामाजिक असंतुलन
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राष्ट्रपति --डा.राजंेद्र प्रसाद --कायस्थ
प्रधान मंत्री --जवाहरलाल नेहरू--ब्राह्मण
उप राष्ट्रपति--डा.एस.राधाकृष्णन--ब्राह्मण
लोक सभा के स्पीकर--जी.वी.मावलंकर--ब्राह्मण
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश--एम.पी.शास्त्री--ब्राह्मण
आदि आदि .........
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जवहरलाल नेहरू राष्ट्रपति पद पर राजेंद्र बाबू के बदले सी.राजगोपालाचारी (ब्राह्मण )को बैठाना चाहते थे,पर सरदार पटेल की जिद्द के कारण राजेंद्र बाबू बने।
याद रहे कि राज गोपालाचारी ने सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरेाध किया था।वे महात्मा गांधी के समधी थे।
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नरेंद्र मोदी के दौर का सामाजिक संतुलन
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राष्ट्रपति--द्रोपदी मुर्मू--अदिवासी
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी --अति पिछड़ा
उप राष्ट्रपति -सह राज्य सभा के सभापति--
सी.पी राधाकृष्णन--ओबीसी
लोक सभा के स्पीकर --ओम बिड़ला-ब्राह्मण
राज्य सभा के उप सभापति--हरिवंश--राजपूत
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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश--सूर्यकंात--ब्राह्मण
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आजादी के तत्काल बाद राज्यों के शासन तंत्र में भी भारी सामाजिक
असंतुलन था।बिहार में तो लगता था कि तब दो ही जातियों भूमिहार
और राजपूतों का शासन है।
सन 1967 तक कांग्रेस ने बिहार में किसी पिछड़ा को मुख्य मंत्री
नहीं बनने दिया।
अन्य राज्यों की स्थिति भी लगभग वही थी।
1990 में पिछड़ा आरक्षण का कांग्रेस ने विरोध किया।उसके बाद
कांग्रेस को लोक सभा में बहुमत मिलना बंद हो गया।
अब अंध मुस्लिम भक्ति के कारण कांग्रेस राष्ट्रीय दल से क्षेत्रीय
पार्टी बन गई।तकनीकी रूप से भले वह राष्ट्रीय दल है।
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इतने बड़े देश में सभी दलों का यह कत्र्तव्य है कि विभिन्न जातियों और धर्मों
के प्रति संतुलन कायम रखिए।
सब तरह के अतिवादियों का विरोध करिए।तभी दल भी बचेंगे,लोकतंत्र भी बचेगा और देश भी।
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17 जून 26
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ताकतवर नेताओं की सुरक्षा
बनाम असुरक्षित आम जनता
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सुरेंद्र किशोर
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बात उस समय की है जब गांधीवादी देव नारायण यादव बिहार विधान सभा के अध्यक्ष (1995--2000) थे।
सदन की कार्यवाही चल रही थी।संवाददाता के रूप में मैं भी दर्शक दीर्घा में मौजूद था।
अचानक एक साथ कई विधायक खड़े हो गये।वे मांग करने लगे--‘‘अध्यक्ष महोदय, मेरी जान पर खतरा है।मेरी जान पर खतरा है।मेरी सुरक्षा का प्रबंध कराइए।मेरी सुरक्षा का प्रबंध कराइए।’’
कुछ देर तक हंगामा होता रहा।स्पीकर महोदय सुनते रहे।
अंत में गांधीवादी और शालीन स्पीकर यादव जी ने कहा--‘‘मेरी जान पर तो कोई खतरा नहीं।क्योंकि मैंने किसी की हत्या नहीं की है।’’
इस टिप्पणी के बाद सदन में शांति छा गई थी।
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दूसरा दृश्य
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एक अन्य अवसर पर माकपा के विधायक अजित सरकार अचानक सदन के बीच में जाकर चिल्लाने
लगे--कुछ लोग मेरी हत्या करना चाहते हैं।यह कहते हुए उन्होंने अपना कुर्ता खोलकर जमीन पर फेंक दिया।उन्होंने गंजी नहीं पहनी थी।
उसके बाद उनके हाथ पायजामे की डोरी की तरफ बढ़े ।
वे पूर्णतः नग्न होना चाहते थे।उससे पहले कि वे पायजामा खोल पाएं ,सुरक्षाकर्मियों व कुछ विधायकों ने उन्हें रोक दिया।
उस समय भी मैं संवाददाता के रूप में उस ऐतिहासिक दृश्य का चश्तदीद गवाह बना।
अजित सरकार को अपनी जान पर जिससे
खतरा था,उसनेे अंततः अजित सरकार की जान ले ही ली।हत्यारे को सजा नहीं हुई।
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जिस देश और राज्य में अपराधियों को तौल कर सजा नहीं मिलेगी,उस राज्य में कोई किसी को नहीं बचा सकता,चाहे आप कितनी भी सुरक्षा के बीच रहें।
इन दिनों के अखबारों को ध्यान से पढ़िए--कितनी हत्याएं होती रहती हैं ?
कितने हत्यारे को फांसी पर चढ़ाया जाता है ?
हमारी सबसे अदालत कहती हैं--बेल नियम और जेल अपवाद।
नतीजतन हत्या आम, और सजा विरल !
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मशहूर पुलिस अफसर प्रकाश सिंह ने एक अध्ययन को उधृत करते हुए कहा था कि एक हत्यारे को फांसी पर चढ़ा देने के बाद हत्या के लिए उठे 7 हाथ अपने आप रुक जाते हैं।
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सजा न होने के कारणों के बारे में यहां कुछ बताने की कोई जरूरत नहीं।कारण सब जानते हैं।
हां,एक बात कहना चाहता हूं।
यदि सुप्रीम कोर्ट नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग और डी.एन.ए.टेस्ट आदि की इजाजत जांच एजेंसियों को दे दे तो सजाओं का प्रतिशत बढ़ जाएगा।पर,इस देश का दुर्भाग्य यह है कि किसी की जान की अपेक्षा सुप्रीम कोर्ट के लिए हत्यारे के मानवाधिकार की अधिक ंिचता रहती है।
भारत में आपराधिक मामलों में सजा की दर औसतन 40 प्रतिशत है जबकि जापान में 98 प्रतिश्ता और अमेरिका में 93 प्रतिशत।
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निष्कर्ष
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जिस देश में हत्यारे को सजा दिलाने वाली शक्तियंा कमजोर और बचाने वाली शक्तियां मजबूत हैं,वहा उसी की जान बची हुई है जिसे मारने में किसी की कोई रूचि नहीं है।बाकी सब असुरक्षित हैं ,चाहे आप अपने आसपास सुरक्षा की जितनी भी मजबूत दीवाल क्यों न खड़ी कर लें।
इसलिए बड़े नेताओं का भी कल्याण इसी बात में है कि वे सुरक्षा के लिए आम माहौल बनाएं न कि खास -खास किले खड़ा कर लें अपने आसपास।
माहौल बनाने के लिए प्राथमिक शर्त यह है कि राजनीति में अपराधियों को आगे मत बढ़ाओ।उनका सशक्तीकरण मत करो।अच्छे लोग हर जाति में हैं।
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और अंत में
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कुछ दशक पहले की बात है,बिहार के एक बाहुबली जातीय नेता अपने दलीय सुप्रीमो के यहां गये।कहा--फलां को एम.एल.सी.बना दीजिए।
सुप्रीमो ने कहा कि आप अपनी ही जाति को बनवाना चाहते हैं तो इसके बदले उसी जाति के फलां को ले आइए, बनवा दूंगा।
चूंकि फलां अच्छा आदमी था,इसलिए बाहुबली ने उसके लिए पैरवी नहीं की भले वह उसी की जाति का था।
सुप्रीमो और बाहुबली के बीच का संवाद जो अफसर सुन रहा था,उसने यह संवाद ‘‘फलां’’ को उसके घर जाकर दूसरे दिन सुनाया था।
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7 जून 26
आजादी के तत्काल बाद की सरकार ने रासायनिक
खाद के जरिए देश की मिट्टी को जहरीला बनाया,
मौजूदा सरकार के समक्ष ‘‘खेत बचाओ’’ की समस्या
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सुरेंद्र किशोर
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सन 1960--केंद्र सरकार ने किसानों से अपील की थी और उन्हें निदेश दिया था कि वे अधिक से अधिक रासायनिक खाद-
कीटनाशक का उपयोग अपने खेतों में करें।
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कुपरिणाम से अनजान किसानों ने अधिक पैदावार के लोभ में वैसा किया भी।
नतीजतन इस देश की मिट्टी बड़े पैमाने पर जहरीली हो गई।भूजल आर्सेनिकयुक्त हुआ।करोड़ों लोग कैंसर से ग्रस्त होने लगे
तो ‘‘अब पछताए होत का.जब चिड़िया चुग गई खेत !!
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सन 2026--आज के अखबारों में सरकार ने एक बड़ा विज्ञापन छपवाया है।उसका शीर्षक है---
खेत बचाओ अभियान।प्राकतिक खेती,उर्वर मिट्टी,सुरक्षित भविष्य।
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यानी, मौजूदा सरकार मानने लगी है कि आज की पीढ़ी का भविष्य -स्वास्थ्य सुरक्षित नहीं है।ऐसा क्यों हुआ ?
क्योंकि 1960 के दशक में आयातित रासायनिक उर्वरकों का व्यापक उपयोग राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया।
वैसा कांग्रेस के अदूरदर्शी नेतृत्व के कारण हुआ।क्योंकि सर्वोच्च नेतृत्व जमीन से पूरी तरह कटा हुआ था।
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क्या इसलिए हुआ ताकि कुछ लोग आयात के जरिए से नाजायज कमाई करके अमीर बन सके !पता नहीं !
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साठ के दशक की तीन-चार बातें
1.-आजादी के समय हमारे देश के करीब मात्र 20 प्रतिशत खेतों के लिए सिंचाई जल उपलब्ध था।जैविक खाद यानी गोबर खाद का इस्तेमाल होता था।
डा.लोहिया ने नेहरू सरकार ने अपील की थी कि 700 करोड़ रुपए की फेज वाईज योजना बनाकर पूरे देश में सिंचाई का प्रबंध करिए।
उसके बदले केंद्र सरकार ने रासायनिक खाद और उन्नत बीज के नाम पर खेतों में जहर फैलाया और पुराने पौष्टिक अनाज को दरकिनार किया।हाईब्रिड के नाम पर पुराने पौष्टिक अन्न को समाप्त किया।उस जमाने के छोटे -छोटे दाने वाले गेहूं से बनी रोटी का बेहतरीन स्वाद मुझे याद है।वह आज उपलब्ध नहीं है।
2.-साठ के दशक में आचार्य रजनीश का पटना में भाषण मैं सुन रहा था।एक खास प्रसंग में उन्होंने कहा कि अमेरिका में
दुकानों में अनाज के बोरे में ऊपर तख्ती लगी होती है जिस पर लिखा रहता है--यह अनाज जैविक खाद के जरिए उपजाया हुआ है।
यानी, अमेरिका के लोग जब रासायनिक खाद की बुराइयांें को पहचान कर सावधान हो चुके थे ,उस समय हमारी सरकार ने मिट्टी को जहरीला बनाने का काम शुरू किया।आज स्थिति ऐसी है कि यह कहना कठिन है कि कहां की मिट्टी जहरीली है और कहां की नहीं है।
3.-मेरे पुश्तैनी गांव वाले चुनाव क्षेत्र गड़खा (सारण)से 1969 में कांग्रेस के जगलाल चैधरी विधायक थे।वे गांव -गांव जाकर किसानों से भोजपुरी में कहते थे--आप लोग रासायनिक खाद खेत में मत डालिए।इससे खेत खराब और फसल जहरीला हो जाएगा।मैंने उनको हमारे दरवाजे पर भी यही बात मेरे किसान पिता से कहते सुना था।चैधरी जी चैथे वर्ष तक एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई कलकत्ता मेडिकल काॅलेज में पढ़ चुके थे।उसी बीच पढाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे।
चैधरी जी ने जो कहा,वही दुष्परिणाम हमारे अदूरदर्शी नेताओं के कारण हमारा देश झेल रहा है।
कैंसर के मरीजों के संख्या तेजी से बढ़ रही है।
गैर सरकारी स्तर पर भी अनेक संगठन ,खासकर सद्गुरु जग्गी वासुदेव (इशा फाउंडेशन )मिट्टी बचाओ अभियान चला रहे हैं।
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2 जून 26
आर्थिक रूप से कमजोर पद्म अवार्डीज को मासिक मानदेय देने के बारे में
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गत फरवरी में प्रभारी मंत्री विजय चैधरी ने मानदेय देने का आश्वासन बिहार
विधान परिषद में दिया था
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सुरेंद्र किशोर
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मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी ने कल कहा कि पद्म पुरस्कार पाने वालों ने अपने असाधारण योगदान से न केवल अपने क्षेत्र को गौरवान्वित किया ,बल्कि भारत की प्रतिभा,संस्कृति व सामथ्र्य को विश्व मंच पर नई पहचान दिलाई।’’
‘‘भोजपुरी लोक संगीत की अमूल्य परम्परा को जीवंत रखने वाले भरत सिंह भारती,ख्यात कृषि वैज्ञाानिक स्व.डा.गोपाल जी त्रिवेदी तथा नृत्य गुरु स्व.विश्व बंधु जी को मिला सम्मान ,आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।’’
ध्यान रहे कि ये तीन हस्तियां बिहार से रही हैं।
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इससे पहले गत 25 फरवरी, 26 को बिहार विधान परिषद में जदयू के नीरज कुमार ने पद्म अवार्डियों के लिए मासिक मानदेय देने का प्रावधान करने के लिए बिहार सरकार का ध्यानाकर्षित किया था।
ध्यानाकर्षण सूचना के जवाब में प्रभारी मंत्री विजय कुमार चैधरी ने सदन में आश्वासन देते हुए कहा था कि ‘‘राज्य सरकार पद्म सम्मानित हस्तियों को मासिक मानदेय या आर्थिक सहायता देने पर विचार करेगी।’’
श्री चैधरी ने सदन में यह भी कहा कि उन पद्म आर्डियों ने बिहार का सम्मान बढ़ाया है तो राज्य सरकार भी उनके लिए यथायोग्य करेगी।
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याद रहे कि सन 2014 में सत्ता संभालने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने आम तौर से प्रचार से दूर नेपथ्य में रह कर असाधारण काम करने वालों को भी जब पद्म सम्मान देना शुरू किया तो यह पता चलने लगा कि उनमें से कई अवार्डी फटेहाल हैं और उनकी मासिक आय सरकार की न्यूनत्तम मजदूरी से भी कम है।
पद्म सम्मानित व्यक्तियों को केंद्र सरकार कोई मासिक मानदेय नहीं देती।
किंतु उनकी फटेहाली को ध्यान में रखते हुए निम्न लिखित चार राज्य सरकारें मासिक मानदेय देती हैं--
1.-ओडिशा सरकार --30 हजार रुपए मासिक
2.-तेलांगना सरकार--25 हजार रुपए मासिक
(इसके अलावा 30 लाख रुपए एकमुश्त)
3.-हरियाणा सरकार--10 हजार रुपए मासिक
4.-छत्तीस गढ़ सरकार --10 हजार रुपए मासिक
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हिन्दुस्तान के रांची संस्करण में प्रकाशित समाचार के अनुसार ‘‘पद्म पुरस्कार विजेताओं को सम्मान राशि देगी झारखंड सरकार’’
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मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले आम तौर पर ऐसी हस्तियों को पद्म सम्मान दिए जाते थे जिन्हें गुजारे के लिए मानदेय की जरूरत नहीं पड़ती थी।
2014 के बाद बिहार के जिन लोगों को पद्म अवार्ड मिले उनमें से कुछ को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। कुछ ऐसे पद्मश्री अवार्डीज भी हैं जिनकी पक्की मासिक आय 5 हजार रुपए से भी कम है।ऐसे कई अन्य हस्तियां भी हो सकती हैं।इसलिए बिहार सरकार वैसे पद्म अवार्डीज को आर्थिक मदद करने पर विचार कर ही सकती है जो आयकर नहीं देते।
या फिर भारत सरकार ही इस दिशा में कोई कदम उठाये ताकि इस मामले में पूरे देश में समरुपता रहे।
क्योंकि यह जरूरी नहीं कि हर राज्य सरकार का इस मामले में दिल पसीजे ही।
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देश के कुछ विपन्न पद्म अवार्डीज की कहानियां--याद रहे कि पद्मश्री अवार्ड देश का चैथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
कल्पना कीजिए जिसे आप इतना बड़ा सम्मान लायक समझते हैं,उनकी निजी आय न्यूनत्तम मजदूरी से भी कम हो !!
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1
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ओड़िशा के ‘‘लोक कवि रत्न’’ हलधर नाग को सन 2016 में पद्म श्री अवार्ड लेने के लिए नई दिल्ली बुलाया गया तो लोक कवि ने केंद्र सरकार को लिख दिया--‘‘साहब,मेरे पास दिल्ली आने के लिए पैसे नहीं हैं। इसलिए अवार्ड को डाक से भिजवा दीजिए।’’
बाद में उनके जाने का प्रबंध हुआ और उन्होंने अवार्ड ग्रहण किया।
ऐसी घटना से द्रवित होकर ओड़िशा सरकार ने अपने राज्य के पद्म अवार्डियों को मासिक 30 हजार रुपए मानदेय देने का निर्णय किया। वह उन सब पद्म अवार्डियों को मिल रहा है जो ओड़िशा के निवासी हैं।
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2
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सन 2022 में तेलांगना के पद्म सम्मानित
दर्शनम मुगोलैया को जब वहां की राज्य सरकार ने हैदराबाद में मजदूरी करते पाया तो तेलांगना सरकार ने अपने राज्य के पद्म अवार्डियों के लिए मासिक 25 हजार रुपए मानदेय देना शुरू कर दिया।
साथ ही, उन्हें एकमुश्त 25 लाख रुपए भी दिये।
----------------
3
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इसी तरह हरियाणा और छत्तीस गढ़ की सरकारें अपने राज्य के साधनहीन पद्म आवार्डियों को मासिक मानदेय 10 हजार रुपए देती है।
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गत साल रांची से यह खबर आई कि 90 साल के पद्म श्री अवार्डी सिमोन उरांव पैरालिसिस अटैक के बाद बिस्तर पर हैं।उनके इलाज की उचित व्यवस्था नहीं हो पा रही है।बाद में उनका क्या हुआ,यह पता नही चल सका।
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इस बार जनवरी ,2026 में जिन लोगों को पद्म अवार्ड दिए जाने की घोषणा हुई,उनकी सूची वाली खबर के साथ प्रभात खबर ने सटीक हेडिंग लगाई थी
‘‘गुमनाम चेहरे,असाधारण काम,सेवा से बनी पहचान।’’
इस सूची को भी सरसरी तौर पर देखने से लगता है कि संभव है इनमें भी कुछ मोगलैया,सिमोन उरांव और हलधर नाग हो सकते हैं।ऐसे लोगों की सुध कौन और कब लेगा ?यह पता लगाना केंद्र और राज्य सरकारों के लिए आसान होगा कि इनमें से कितने ऐसे अवार्डीज हैं जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं और जो आयकर नहीं देते।
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27 मई 26
हजारों जेपी सेनानियों को सम्मान-सहारा मिला होता
तो बाद की पीढ़ियां भी सार्वजनिक कामों में जुटतीं।पर
अपवादों को छोड़कर अब भाड़े पर ही कार्यकर्ता उपलब्ध
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क्योंकि सत्ता की मलाई तो नेताओं के वंशजों-परिजनों
के लिए रिजर्व होती जा रही है
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करीब तीन साल पहले बिहार में जब एक नया दल बना तो
उस दल के नेता ने हर जिले में वेतन पर कार्यकर्ता रखा।
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क्योंकि आम तौर पर कोई मुफ्त में काम करने को तैयार नहीं है,अपवादों की बात और है।
क्योंकि चुनावी टिकट भी तो अब आम तौर पर पहले से स्थापित नेता
के परिजन और धनवानों को मिलने लगे हैं।
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सन 2025 के आंकड़े के अनुसार बिहार के 24 हजार 905 स्वतंत्रता सेनानियों व उनके आश्रितों को पेंशन मिल रही है।
पर कितने जेपी सेनानी बिहार में पेंशन पा रहे हैं ?
सिर्फ 3354 जेपी सेनानी।
फरार स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भी कांग्रेसी सरकार ने पेंशन की व्यवस्था कराई।पर फरार जेपी सेनानी कौन कहे,जेल गए और आपातकाल में अपार कष्ट सहे जेपी सेनानी भी पेंशन के लिए अब भी तरस रहे हैं।
धन्यवाद नये मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी को जिन्होंने जेपी सेनानियों की सुध लेनी शुरू की है।
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याद रहे कि अंग्रेजों ने अपने शासन काल में स्वतंत्रता सेनानियों के ‘‘जीने का अधिकार’’ नहीं छीना था।पर आपातकाल में इंदिरा गांधी सरकार ने भारत के लोगों के जीने का संवैधनिक अधिकार तक छीन लिया था।यह बात आपातकाल में सरकारी वकील ने सुप्रीम कोर्ट मेें साफ -साफ कह दिया था।
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मैं भी आपातकाल का एक अदना भुक्तभोगी रहा हूं।
मैं सबूत के तौर पर अपना खुद का अनुभव संक्षेप में बताता हूं।
मुझे बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में जब सी.बी.आई.बेचैनी से खोज रही थी तो तब के बिहार के मुख्य मंत्री सचिवालय में तैनात मेरे एक मित्र ने मुझे आगाह कर दिया ।मैं मेरे मित्र राम बिहारी सिंह की मदद से भूमिगत हो गया।
बिहार में जब अधिक दिनों तक भूमिगत रहना मेरे लिए संभव न हो सका तो मैं मेघालय जाकर अपने एक रिश्तेदार के यहां छिप गया।वहां कांग्रेस की सरकार नहीं थी,इसलिए आपातकाल के भीषण अत्याचार से वह राज्य बचा हुआ था।
वैसे आपातकाल में जो जेल गये,उन्हें तो भोजन आदि मिल पा रहे थे,पर मुझे कितना अपार कष्ट हुआ,वह सब मैं अपनी जीवनी में लिखूंगा।राह चलते मुझे देख लेने पर भी मेरे मित्र -परिचित मुझसे मुंह फेर लेते थे।उन्हें डर था कि मुझसे बात करते सी.आई.डी.देख लेगी तो उन्हें भी जेल जाना पड़ सकता है।
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जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद और लालू-नीतीश राज में भी मैंने कोई मुआवजा नहीं मांगा--पत्रकारिता के पेशे में जाकर जीवन यापन करने लगा।
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पर,जिन भुक्तभोगी जेपी सेनानियों को अब भी कुछ नहीं मिला,उनकी उम्मीदें
सम्राट चैधरी पर टिकी है।
आजादी के बाद जेपी आंदोलन बिहार का सबसे बड़ा जन आंदोलन था।
हजारों पेंशन वंचित जेपी आंदोलनकारियों को कुछ मिला होता तो सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले नौजवान आज भी उपलब्ध होते।
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इस पृष्ठभूमि में प्रभात खबर में आज प्रकाशित मेरा काॅलम पढ़िए।
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पेंशन के लिए प्रतीक्षारत जेपी सेनानियों की उम्मीद जगी
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सुरेंद्र किशोर
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जानकार सूत्रों के अनुसार मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी ने पेंशन के लिए वर्षों से प्रतीक्षा रत जेपी सेनानियों की उम्मीद जगा दी है।
खबर है कि जेपी सेनानी सम्मान योजना की सलाहकार पर्षद का जल्द ही पुनर्गठन होने वाला है।
उसके बाद पेंशन के लिए एकत्र किए गए हजारों आवदेन पत्रों पर विचार होगा।
करीब 21 हजार ऐसे जेपी सेनानियों के आवेदन पत्र विचाराधीन हैं,जिन्होंने सन 1974 से लेकर 1977 तक जेल यातना सही या फरार रहे।या उन्हें यातनाएं दी गईं।
इनमें से करीब 450 आवेदन पत्रों की जांच हो चुकी है।
ऐसे आवेदन पत्रों पर सलाहकार पर्षद की अनुशंसा अपेक्षित है।
जानकारी मिली है कि मुख्य मंत्री श्री चैधरी ने उन सेनानियों के प्रति अत्यंत सकारात्मक रुख अपनाया है जिन्होंने जेपी आंदोलन और आपातकाल में अपार कष्ट सहे थे।
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पेंशन पर कांग्रेस का एतराज
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जेपी सेनानियों के लिए नीतीश सरकार ने सन 2009 में पेंशन योजना शुरू की।तब कांग्रेस तथा कुछ अन्य दलों ने इसका विरोध किया था।पर मुख्य मंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी ने जेपी सेनानियों और उनके परिजनों के अपार कष्टों की चर्चा करते हुए उसका औचित्य बताया।
जिन सेनानियों को पेंशन की राशि अभी मिल रही है,उनकी संख्या कम है।
बहुत सारे आवेदन लंबित हैं जिन पर फैसला होगा।जेपी सेनानियों के लिए यह संतोष की बात होगी कि मुख्य मंत्री चैधरी ने खुद ही उनकी समस्या को हल करने में रूचि दिखाई है।
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राष्ट्रीय स्तर पर सेनानी
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जेपी सेनानी सम्मान योजना की सलाहकार पर्षद के तत्कालीन अध्यक्ष व बिहार सरकार के पूर्व राज्य मंत्री मिथिलेश कुमार सिंह ने
सन 2015 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिखा था। दिवंगत सिंह ने लिखा था कि जेपी सेनानियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पेंशन स्वीकृत करने पर केंद्र विचार करें।
दरअसल कुछ भाजपा शासितत राज्य सरकारें जेपी सेनानियों को
अपने यहां सम्मान पेंशन तो दे देती है।पर जैसे ही वहां कांग्रेस की सरकार बन जाती है तो उसे वह बंद कर देती है।
इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में पहल होनी चाहिए।
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न बांस रहेगा,न बजेगी बांसुरी
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लगता है कि डी.जे.और लाउड स्पीकर की आवाज को नियंत्रित
करना इस देश के
शासन तंत्र के वश में नहीं है।नियंत्रण के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की लगातार उपेक्षा होती रहती है।
दरअसल अब डी.जे. के उत्पादन पर ही प्रतिबंध लगा देने के बारे में विचार करना चाहिए।
क्योंकि यह फसाद की जड़ भी बनता जा रहा है।आए दिन तेज आवाज वाले डी.जे.के कारण हिंसा होती है और लोगों की जानें भी जाती हैं।बूढ़े और बच्चों के स्वाथ्य पर तेज आवाज का बहुत बुरा असर पड़ता है।
इसी तरह लाउड स्पीकर के निर्माण के समय ही उसमें ऐसा यांत्रिक प्रबंध हो जाए ताकि उसकी आवाज उसी सीमा तक रहे जो सीमा सुप्रीम कोर्ट ने तय की है।ऊंची आवाज वाली लाउड स्पीकर मशीन का निर्माण सिर्फ पुलिस-प्रशासन के लिए सीमित संख्या में हो।
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ग्रामीण बाजारों का संपर्क मार्ग
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बिहार में संपर्क मार्ग को लेकर राज्य सरकार का काम सराहनीय है। मुख्य मंत्री ग्राम संपर्क योजना के तहत व्यापक स्तर पर काम हो रहे हैं। मुख्य मार्गों से संपर्क विहीन बसावटों को जोड़ना है।ऐसी सड़कें हर मौसम में काम करंेगी।
इस सिलसिले में एक खास बात पर ध्यान देने की जरुरत है।
विभिन्न गांवों को पास के बाजारों से भी गांवों को जोड़ने की दिशा में प्राथमिकता के आधार पर काम होना चाहिए।
उदाहरणार्थ सारण जिले के दरियापुर अंचल के खानपुर-भरहापुर बाजार की चर्चा प्रासंगिक होगी।
इस बाजार से पश्चिम की ओर सखनौली गांव की ओर जा रही सड़क की हालत वर्षों से खराब है।
नदी किनारे से गुजर रही इस महत्वपूर्ण सड़क के मजबूतीकरण से बाजार का भी विकास होगा और स्थानीय स्तर पर ही लोगों के रोजगार के अवसर बढ़ जाएंगे।
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भूली-बिसरी यादें
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यह बात सन 1969 की है।इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में मोरारजी देसाई उप प्रधान मंत्री और वित्त मंत्री थे।
प्रधान मंत्री श्रीमती गांधी ने देसाई को विश्वास में लिए बिना उनसे लेकर खुद वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाल लिया।साथ ही
प्रधान मंत्री ने मोरारजी देसाई से कहा कि आप उप प्रधान मंत्री बने रहें।
देसाई ने इसे अपनी तौहीन समझी और केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।
उससे पहले प्रधान मंत्री ने देसाई को लिखा था कि चूंकि आपकी आर्थिक नीति हमारे विचारों से मेल नहीं खाती,इसलिए क्यों न आपको वित्त मंत्री पद से मुक्त कर दिया जाये ?
इस पत्र का जवाब मोरारजी देसाई लिखवा ही रहे थे कि उसी बीच उन्हें यह जानकारी मिली कि उनसे वित्त मंत्रालय ले लिया गया है।मोरारजी दसाई ने सिर्फ उप प्रधान मंत्री बने रहना ठीक नहीं समझा और मंत्रिमंडल से ही अपना इस्तीफा भेज दिया।
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और अंत में
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इसी साल 14 फरवरी को बिहार पुलिस के आई.जी. जितेंद्र राणा ने अतिक्रमण के बारे में आयेजित बैठक में कहा था कि किसकी लापरवाही से पटना की सड़कों पर दोबारा अतिक्रमण हो जाता है,उसकी जवाबदेही तय होगी।
तीन महीने के बाद भी अब तक यह पता नहीं चल सका है कि इस मामले में किन-किन लोगों की जवाबदेही तय हुई है।
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दैनिक प्रभात खबर,पटना में 25 मई 26 को प्रकाशित
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