Friday, February 23, 2018

बरात वाहनों के चालकों पर नजर रखने की जरूरत



तूफान केवट की बरात सोमवार को धूम धाम से निकली,पर वह गंतव्य स्थान तक नहीं पहुंच सकी।बरातियों से भरी बस दुर्घटनाग्रस्त हो गयी।
नौ  लोगों की दर्दनाक मौत हो गयी।
पटना जिले के गौरी चक में हुई यह बस दुर्घटना 
न कोई पहली घटना है और न ही आखिरी।
आम तौर पर चालक नशे में होता है।इस हादसे में भी यही कारण बताया गया।
चालक के साथ  बस मालिक पर भी तो कुछ कार्रवाई होनी चाहिए !
ऐसी खबरें लगन  में  आती ही रहती है।
चालक कभी  नशे में होता है तो कभी आधी नींद में।
  
कई बार ऐसी घटनाएं सरकार व प्रशासन के लिए भी सिरदर्द बन जाती हैं।
  इसके बावजूद न तो प्रशासन इसे रोकने के लिए कदम उठाता है न ही खुद वे लोग जो बरात साज कर निकलते हैं।
इस संबंध में कुछ नियम जरूरी है।दुर्घटना होने पर बरात ढोने वाले बसों के पियक्कड़ ड्रायवरों के साथ-साथ बस मालिकों के लिए भी सजा का प्रावधान होना चाहिए।या कम से कम उस बस का परमिट रद हो।
साथ ही बराती पक्ष  भी स्थानीय थाने को पहले ही यह लिख कर दे दे कि बरात में शामिल वाहनों के चालकों में से  कोई शराबी नहीं है।
यदि बाद में यह वादा गलत साबित हो तो वर पक्ष के अभिभावक को भी घटना के लिए जिम्मेदार बनाया जाए।
यदि पुलिस थानों को समय मिले तो बरात ढो रहे वाहनों को रोक कर कभी उनके चालकों की जांच कर ले कि उसने शराब तो नहीं पी रखी है।
 --- अफसरों के साथ कर्पूरी जी का व्यवहार---
दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश ने आरोप लगाया है कि ‘आप विधायकों ने केजरीवाल के सामने मुझे पीटा।’
लोकतंत्र के इतिहास में यह पहली  घटना है कि किसी चीफ सक्रेर्टी की मुख्य मंत्री के सामने ही पिटाई हो जाए।
इस सनसनीखेज व शर्मनाक आरोप की सच्चाई की जांच तो होगी ही।
पर आखिर अब ऐसा आरोप क्यों लगने लगा है ?
यदि केजरीवाल ईमानदार हैं और वे समझते हैं कि उनके अफसर बेईमान हैं तो उस समस्या से निपटने का यह कोई रास्ता नहीं है।
  अफसरों का यथा योग्य सम्मान किए बिना कहीं कोई सरकार नहीं चल सकती।
कर्पूरी ठाकुर देश के  किसी भी अन्य ईमानदार मुख्य मंत्री से कम ईमानदार नहीं थे।
उनके जमाने में भी कुछ अफसर बेईमान थे।
पर वे उनको अपमानित नहीं करते थे।
एक घटना मुझे याद है।
तब कर्पूरी ठाकुर विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे।मुख्य मंत्री रह चुके थे। देर शाम हो चुकी थी।एक  पैरवीकार  किसी आई.ए.एस अफसर को फोन करवाने की जिद कर बैठा।
 कर्पूरी जी उसे समझा रहे थे कि किसी बड़े अफसर को देर शाम फोन करना उचित नहीं है।उनका भी पारिवारिक जीवन है।वे काम से थके घर लौटे होंगे।उन्हें आराम करने दीजिए।कल फोन कर दूंगा।
पैरवीकार ने बड़ी जिद की।पर कर्पूरी जी नहीं माने।
 पर केजरीवाल के यहां तो मुख्य सचिव को आधी रात को बुलाकर अपमानित किया गया।क्या आधी रात को बुलाने की कोई इमरजेंसी थी ?इमरजेंसी में तो किसी अफसर को कभी भी बुलाया जा सकता है।
 ----एक कहानी सिंगा पुर की--- 
 बजट जब सरप्लस हुआ तो सिंगा पुर सरकार ने बचे हुए पैसे इस साल आम जनता में बांट देने का निर्णय  किया।
 अपने इस देश में तो क्वोत्रोचि,माल्या और नीरव मोदी जैसे आधुनिक ‘वारेन हेस्ंिटग्सों’से देश को लूटने की छूट दे दी जाती है और उसकी भरपाई के लिए जनता पर टैक्स बढ़ा दिया जाता है।
अपने देश के लोगों को सिंगापुर की ताजा कहानी सुनकर 
अजीब लगेगा।
पर क्या हमारे नये -पुराने हुक्मरानों को शर्म आएगी ?
सिंगा पुर को ऐसा किसने बना दिया जो वहां सरकार का बजट सरप्लस हो जाए ?
उस देश को ऐसा बनाने वाले का नाम था ली कुआन यू @1923-2015@।
ली कुआन कहा करते थे कि भारत में अपार संभावनाएं हैं ।पर उसे घिसे -पिटे समाजवादी नीतियों से बाहर निकलना होगा।
1959 से 1990 तक ली कुआन सिंगा पुर के प्रधान मंत्री थे।उन्होंने दूरदर्शिता और कठोर परिश्रम से सिंगा पुर को एक अमीर देश बना दिया।वे कहा करते थे कि व्यक्तिगत अधिकारों से अधिक जरूरी है सार्वजनिक कल्याण।उन्होंने थोड़ी कड़ाई जरूर की ,पर उनमें कम्युनिस्ट तानाशाह वाली क्रूरता नहीं थी।एक विश्लेषणकत्र्ता के अनुसार 
 सिंगा पुर का उदाहरण देख कर भारत को यह तय करना होगा कि वह  आधुनिक ‘वारेन हेस्टिंग्सों’ को लूट की छूट देता  रहेगा या सिंगा पुर की तरह कुछ कड़ाई करके उन्हें रोकेगा ? 
---कुछ न करने के बहुत बहाने--
2015 में ली कुआन यू के निधन के बाद अपने देश के राजनीतिक  विश्लेषकों ने तरह -तरह के लेख लिखे।
लिखा गया कि सिंगा पुर जैसे छोटे देश में ही ऐसा चमत्कार संभव है।भारत में नहीं।
सवाल है कि केरल में क्यों आरोपितों में से 77 प्रतिशत अपराधियों  को अदालतांंे से सजा दिलवा दी जाती है,पर पश्चिम बंगाल में यह प्रतिशत मात्र 11 है ?
क्यों दशकों के कम्युनिस्ट शासन के बावजूद कोलकाता के ग्रेट इस्टर्न होटल को निजी हाथों में दे देने को ज्योति बसु सरकार मजबूर हो गयी थी  ?
क्यों इसी देश में एक बस से शुरू करके निजी आपरेटर कुछ ही साल में दर्जनों बसों का मालिक हो जाता है और राज्य पथ परिवहन घाटे में रहता है ?दरअसल करने के बहुत रास्ते होते हैं औ न करने के अनेक बहाने ! 
--- एक भूली बिसरी याद---
मशहूर कम्युनिस्ट नेता जगन्नाथ सरकार ने लिखा था कि  राज कुमार पूर्वे के संस्मरणों से गुजरना एक दिलचस्प अनुभव है।दिवंगत पूर्वे की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘स्मृति शेष’ का एक प्रकरण में सामान्य पाठकों 
की भी दिलचस्पी हो सकती है।
यह प्रकरण है भारत पर चीन के हमले का प्रकरण।
स्वतंत्रता सेनानी व विधायक रहे दिवंगत पूर्वे के अनुसार, चीन ने भारत  पर 1962 में आक्रमण कर दिया।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने आक्रमण का विरोध किया।
पार्टी में बहस होने लगी।
कुछ नेताओं का कहना था कि चीनी हमला हमें पूंजीवादी सरकार से मुक्त कराने के लिए है।दूसरों का कहना था कि माक्र्सवाद हमें यही सिखाता है कि क्रांति का आयात नहीं होता।
देश की जनता खुद अपने संघर्ष से पूंजीवादी व्यवस्था और सरकार से अपने देश को मुक्त करा सकती है।
पार्टी  के अंदर एक वर्ष से कुछ ज्यादा दिनों तक बहस चलती रही।
लिबरेशन या एग्रेशन का ?
इसी कारण कम्ुयनिस्ट पार्टी, जो राष्ट्रीय धारा के साथ आगे बढ़ रही थी और विकास कर रही थी, पिछड़ गयी।
लोगों में देश पर चीनी आक्रमण से रोष था।
यह स्वाभाविक था ,देशभक्त ,राष्ट्रभक्त की सच्ची भावना थी।
यह हमारे खिलाफ पड़ गया।कई जगह पर हमारे राजनीतिक विरोधियों ने लोगों को संगठित कर हमारे आॅफिसों और नेताओं पर हमला भी किया।
हमें चीनी दलाल कहा गया।
आखिर में उस समय 101 सदस्यों की केंद्रीय कमेटी में से 31 सदस्य पार्टी से 1964 में निकल गए।
उन्होंने अपनी पार्टी का नाम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी@माक्र्सवादी @रखा।सिर्फ भारत में ही नहीं,कम्युनिस्ट पार्टी के इस अंतर्राष्ट्रीय फूट ने पूरे विश्व में पार्टी के बढ़ाव को रोका और अनेक देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों में फूट पड़ गयी।
    ----- और अंत में---
  उत्तर प्रदेश के खूंखार अपराधी अब पुलिस की गोली खाने के बदले जेल की खिचड़ी खाना पसंद कर रहे हैं।उन्हें लगता है कि वहां जाने पर कम से कम जान तो बच जाएगी।
क्योंकि वहां की सरकार ने पुलिस बल को निदेश दे दिया है कि वह खुद पहल करके अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करे।ऐसा न हो कि अपराधी पहल करें और आप उसका सिर्फ जवाब भर दें।बिहार में पुलिस पहल कब करेगी ?
@ 23 फरवरी, 2018 को प्रभात खबर-बिहार -में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@


पत्रकारिता के शीर्ष पुरूष राजेंद्र माथुर से 1983 में
हुई मेरी बातचीत का एक छोटा अंश मैं यहां प्रस्तुत 
कर रहा हूं।
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मैं -- आपका अखबार दब्बू है। आप इंदिरा गांधी के खिलाफ नहीं लिख सकते ।
माथुर साहब - यू आर मिस्टेकन।मेरा अखबार दब्बू नहीं है।
आप इंदिरा गांधी के खिलाफ जो भी खबर लाएं, मैं जरूर छापूंगा।पर इंदिरा जी में कई अच्छाइयां भी हैं।मैं उन्हें भी छापूंगा।मेरा अखबार अभियानी नहीं है।
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आज  मैं देखता हूं कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा एक तरफ है तो दूसरा बड़ा हिस्सा दूसरी तरफ।दोनों के अपने -अपने तर्क भी हैं।
पर, मैं ऋषि तुल्य राजेंद्र माथुर के इस विचार को पत्रकारिता के लिए आदर्श मानता हूं।
आप इस पर क्या सोचते हैं ?   

Thursday, February 22, 2018

अररिया लोक सभा उप चुनाव नतीजे से तय होगी बिहार की अगली राजनीति की दशा-दिशा



           
अररिया लोक सभा उप चुनाव नतीजा बिहार की राजनीति की दशा-दिशा लगभग तय कर देगा।
 वहां 11 मार्च को उप चुनाव होगा।राजद के मोहम्मद तसलीमुद्दीन के निधन के कारण यह सीट खाली हुई है।उसके साथ उसी दिन दक्षिण बिहार के दो विधान सभा चुनाव क्षेत्रों में भी उप चुनाव होने हैं।वे क्षेत्र हैं जहानाबाद और भभुआ।ये सीटें भी जिला मुख्यालय की हैं।
  ये उप चुनाव बिहार में राजनीतिक समीकरण बदलने के बाद हो रहे हैं।गत साल जदयू ने लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले राजद का साथ छोड़कर 
राजग का दामन थाम लिया था।
 इस बीच लालू प्रसाद दूसरी बार चारा घोटाले में सजा पाकर जेल चले गए हैं।यानी, लालू प्रसाद चुनाव प्रचार के लिए उपलब्ध नहीं हैं।उनकी जगह उनके पुत्र तेजस्वी यादव ने  कमान संभाल ली है।वे बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता भी हैं।
राजद ने इस बार भी यह दावा किया है कि लालू प्रसाद के जेल  जाने के बाद आम जनता में राजद के प्रति समर्थन बढ़ा है।
सन् 2013 में जब लालू प्रसाद को चारा घोटाले के ही एक अन्य केस में सजा हुई थी तो राजद ने तब भी कहा था कि सहानुभूति के कारण बिहार में राजद लोक सभा की सभी 40 सीटें जीतेगा।
पर उसे 2014 के लोक सभा चुनाव में सिर्फ 4 सीटें मिलीं।देखना है कि इस बार राजद के लिए यह चुनाव  कैसा रहता है। 
 उप चुनाव नतीजे उस दावे की असलियत बता देंगे।
 याद रहे कि 2015 के  बिहार विधान सभा चुनाव के समय जदयू राजद के साथ था।
अब जदयू भाजपा के साथ है।सन 2014 के लोक सभा चुनाव में  तीनों दल अलग -अलग चुनाव लड़े थे।
दलीय समीकरण में आए बदलाव का सरजमीन पर कैसा असर पड़ा है ? उप चुनाव नतीजे इस सवाल का भी जवब दे दंेगे।
वैसे राजद ने जब सन 2010 में लोजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा तो उसे बिहार विधान सभा की कुल 243 सीटों में से सिर्फ 23 सीटें मिली थीं।लोजपा की 2 सीटें मिलीं।इन  ताजा उप चुनावों में राजद के साथ कांग्रेस है।भभुआ सीट पर कांग्रेस लड़ेगी।भभुआ कांग्रेस के आधार वोट वाली सीट मानी जाती है।
भाजपा के साथ तो जदयू है।लोजपा जैसे कुछ अन्य सहयोगी दल भी राजग में हैं।
सन 2014 के लोक सभा के चुनाव में अररिया में राजद के मोहम्मद तसलीमुद्दीन को कड़े़ मुकाबले में करीब 4 लाख 7 हजार  मत मिले थे।
भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह को करीब 2 लाख 61  हजार और जदयू के विजय कुमार मंडल को करीब 2 लाख 21 हजार वोट मिले थे।
 इस बार अररिया में राजद और भाजपा के बीच  सीधा मुकाबला होगा।जदयू भाजपा का समर्थन कर रहा है।
 पिछले लोक सभा चुनाव में अररिया में प्रमुुख उम्मीदवारों को  मिले मतों को
ध्यान में रखें तो राजद के लिए यह सीट जीतना इस बार कठिन होगा।
पर इसके साथ कुछ अन्य तत्व भी चुनाव में काम कर सकते हैं।
लालू प्रसाद के परिवार की कानूनी परेशानियों से मतदाता कितने द्रवित होते हैं,यह देखना दिलचस्प होगा।या फिर उसका कोई असर नहीं पड़ता है ! यदि असर नहीं पड़ेगा तो राजद का राजनीतिक भविष्य अनिश्चित हो सकता है।
साथ ही केंद्र सरकार की उपलब्धियां भी कसौटी पर होंगी।
ताजा बैंक घोटाले को मतदाताओं ने किस रूप में लिया है ?
इस सवाल का भी जवाब इस उप चुनाव में मिल सकता है।  
तसलीमुद्दीन के पुत्र सरफराज आलम हाल तक जदयू के विधायक थे।उन्होंने अररिया लोक सभा उप चुनाव लड़ने के लिए विधान सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है।
अब वे राजद में हैं।आलम अररिया जिले के ही जोकीहाट विधान सभा क्षेत्र से विधायक थे।वे अररिया में राजद उम्मीदवार हैं।
 पिता के निधन के बाद पुत्र के पक्ष में सहानुभूति मत कितना मिलता है,यह देखना भी दिलचस्प होगा। 
  तसलीमुददीन दबंग नेता थे।प्रधान मंत्री एच.डी.देवगौड़ा के कार्यकाल में तसलीमुददीन गृह राज्य मंत्री बनाये गए थे।
पर विवादास्पद परिस्थितियों में उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
तसलीमुददीन  आठ बार विधायक और 5 बार सांसद थे।  
   दक्षिण बिहार के जहानाबाद से राजद विधायक मुन्द्रिका सिंह यादव के निधन के कारण वह विधान सभा  सीट खाली हुई ।
वहां राजद और राजग के बीच सीधा मुकाबला होने की संभावना है।भाजपा ने कहा कि इस सीट पर जदयू ल़ड़े।
मुंद्रिका यादव के पुत्र वहां राजद उम्मीदवार हैं। 
गत विधान सभा चुनाव में राजद ने रालोसपा के प्रवीण कुमार को करीब 30 हजार मतों से हराया था।
तब राजद और जदयू मिल कर चुनाव लड़ रहे थे।
रालोसपा राजग का घटक दल है।
अगला उप चुनाव नतीजा  वहां राजग की ताकत का हाल बता देगा।
 भभुआ में पिछले चुनाव में भाजपा के आनंद भूषण पांडेय ने जदयू के प्रमोद सिंह  को हराया था।
देखना है कि इस बार बदले समीकरण में कैसा नतीजा आता है।
इन चुनाव क्षेत्रों के सारे  उम्मीदवार तय हो जाने के बाद स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।
@मेरा यह लेख फस्र्टपोस्ट हिंदी पर प्रकाशित@



Wednesday, February 21, 2018

Morarjee Desai diet
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    Two litres of milk , in seven doses evenly spread over the day.
    Coconut water twice a day,
preferably in the morning at a three - hour interval.
  An early lunch at 9 .30 a.m.consisting of more milk, fruit, home made cottage cheese, butter from cow s milk, dates and something sweet.
   Dinner is the same ,with steamed ,not boiled ,vegetables substituted for fruit.
/ --The Telegraph magazine -- 26 Feb.1996 /


Tuesday, February 20, 2018

 यदि एम.ओ.मथाई की चर्चित  संस्मरणात्मक पुस्तक पर भरोसा करें तो इस देश में सार्वजनिक उपक्रम को चूना लगाने के लिए पहली बार जयंती शिपिंग कंपनी के मालिक धर्म तेजा ने ‘हनी ट्रैप’ का उपयोग किया था।
मथाई 13 साल तक प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू का 
निजी सचिव था। इससे अधिक मुझसे कुछ मत पूछिएगा।

---और भी खतरे हैं माल्या-मोदी के सिवा ----


31 जनवरी, 2018 के हिंदू में  मैंने मुर्गे को लेकर एक पेज की खोजपूर्ण रपट पढ़ी थी।
तभी सोचा था कि कभी बाजार जाउंगा तो देखूंगा कि 
मुर्गे की मोटाई का इन दिनों क्या हाल है।
निरामिष होने के कारण मैं मांस-मुर्गे की दुकान देख कर मुंह फेर लेता हूं।
  कुछ साल पहले तक कभी -कभी मुर्गे को करीब से देख लेता था।पर साठ साल की उम्र में निरामिष हो गया।
  आज बाजार में मुर्गे की एक दुकान के पास ठहर कर गौर से देखा।
मोटे -मोटे मुर्गे नजर आए।
 हिन्दू ने यही तो लिखा था।
 अखबार के अनुसार इन दिनों मुर्गों को कोलिस्टीन नामक सुपर एंटी बायोटिक दिया जा रहा है।
मुर्गा फार्म की साफ-सफाई पर  ध्यान नहीं दिया जाता।
इसलिए अनेक मुर्गे मरते रहते  थे।पर इस एंटीबायोटिक के चलन के बाद अब वे नहीं मरते। साथ ही जल्द ही वे वजनदार भी हो जाते हैं।
 पर जो लोग वैसे मुर्गे खाते हैं,बीमार होने पर खुद उन पर कोई एंटी बायोटिक दवा जल्द काम नहीं करती।
क्योंकि ‘लास्ट होप’ के नाम से चर्चित कोलिस्टीन तो मुर्गा को दिया जा चुका है जिसे आपने खाया है। 
दरअसल इस देश को सिर्फ विजय माल्या -नीरव मोदी से ही खतरा नहीं है।कोलिस्टीन देने वाले मुर्गा फार्म मालिकों से भी तो है ! वैसे लोगों से मुर्गा खाने वालों को कौन बचाएगा ?
क्या हिंदू अखबार का कुछ असर सरकारों पर पड़ा ?

एक तरफ हर्षद मेहता जेल में ही मर गया, उधर लक्खुभाई केस में भी रिहा हो गए नर सिंह राव



          
शेयर दलाल हर्षद मेहता ने शपथ पत्र के जरिए तत्कालीन प्रधान मंत्री को घूस देने का आरोप सार्वजनिक रूप से लगाया था।
पर न तो झूठा आरोप लगाने के आरोप में हर्षद को सजा हुई और न ही घूस लेने के आरोप में नरसिंह राव को।
 नतीजतन इस देश में भ्रष्टाचार बढ़ता चला गया।
 हां, एक अन्य मामले में सजायाफ्ता हर्षद मेहता
2002 में जेल में ही मर गया।दूसरी ओर लक्खुभाई पाठक केस में नरसिंह राव 2003 में अदालत से बाइज्जत बरी हो गए थे।
   हर्षद मेहता ने 16 जून 1993 को मुम्बई के   प्रेस कांफ्रेंस में  यह आरोप लगाया था कि उसने प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव को एक करोड़ रुपये से भरा एक सूटकेस उनके दिल्ली स्थित आवास पर जाकर घूस के रूप में दिया।
 उस प्रेस कांफ्रंेस में मशहूर वकील राम जेठमलानी भी मेहता की मददगार के रूप में मौजूद थे।
  दूसरी ओर इस आरोप को झूठ का पुलिंदा बताते हुए कांग्रेस ने कहा था कि मेहता प्रधान मंत्री का ब्लैकमेल करने के लिए यह झूठा आरोप लगा रहा है।
इस सनसनीखेज आरोप पर होना तो यह चाहिए था कि या तो रिश्वत लेने के लिए नरसिंह राव के खिलाफ कार्रवाई होती या फिर झूठ बोलने के लिए हर्षद मेहता के खिलाफ ।पर कुछ भी नहीं हुआ।मामला यूं ही रफा -दफा हो गया।क्योंकि इसी में महा प्रभुओं को फायदा दिखा।
  पर, इसके साथ ही हर साल इस देश के बड़े -बड़े नेताओं पर बड़े- बड़े घोटालों के आरोप लगते रहते  हैं और मामला रफा -दफा होता रहता है।किसी घोटाले बाज अधिकतर नेताओं  का अंततः कुछ  
नहीं बिगड़ता।इसके साथ ही सरकारी भ्रष्टाचार इस देश में दिन दुनी रात चैगुनी बढ़ता जा रहा है।किसी के खिलाफ कार्रवाई हुई भी लोकहित याचिकाओं पर अदालतों के निदेशों  के कारण ही।
सत्ताधारी नेताओं ने शायद ही कभी खुद कार्रवाई की।अपवादों की बात और है।
  काश ! हर्षद मेहता या फिर नरसिंह राव में से किसी को भी सजा मिली होती तो बाद के घोटाले नहीं होते।
  इसी बहाने एक बार फिर नरसिंह राव-हर्षद प्रकरण याद कर लिया जाए।  
हर्षद मेहता ने तब यह आरोप लगाया था कि मैं अपने साथ प्रधान मंत्री आवास एक सूटकेस ले गया था।उसमें 67 लाख रुपये थे।उसे मैंेने प्रधान मंत्री के व्यक्तिगत सचिव राम खांडेकर को दे दिया।ऐसा मैंेने प्रधान मंत्री के कहने से किया।एक करोड़ देने की बात थी,पर उस दिन सुबह तक मैं 67 लाख का ही प्रबंध कर सका था।दूसरे दिन मैंने शेष रकम पहुंचा दी।
  मैंेने मुलाकात के दौरान प्रधान मंत्री को यह भी बताया था कि शेयर बाजार में पैसे कमाना कितना आसान है।मैंने शपथ पत्र के जरिए प्रधान मंत्री को पैसे देने की बात कह दी है।
   जेठमलानी से पूछा गया था कि क्या हर्षद  की कही गई बातों को आप सिद्ध कर सकते हैं ? मशहूर वकील ने कहा था कि हमारे पास इतने प्रमाण हैं कि हम अग्नि परीक्षा से भी बखूबी गुजर सकते हैं।जरूरत पड़ेगी तो हम प्रमाणों को पेश कर देंगे।
  क्या हर्षद मेहता प्रधान मंत्री को ब्लैकमेल नहीं कर रहा है ?
इस सवाल के जवाब में जेठमलानी ने कहा कि सवाल यह है कि वह ऐसा भला क्यों करेगा ?वह एक सौ ग्यारह दिन पुलिस कस्टडी में रहते हुए ब्लैक मेल कर सकता था।किंतु तब तो उसने यह काम नहीं किया।
   इस संबंध में जब मशहूर वकील नानी पालकीवाला से पूछा गया कि मेहता के आरोप में कितनी सच्चाई है ?पालकीवाला ने कहा कि शपथ पत्र में दिए गए हर्षद के बयान में सच्चाई प्रतीत होती है।चारित्रिक रूप से हर्षद भले ही असामान्य व्यक्ति है,पर वह प्रधान मंत्री पर ऐसे आरोप लगाने की हिमाकत तभी कर सकता है ,जब उसके पास ठोस प्रमाण हो।
    अगर हर्षद का आरोप सच है तो प्रधान मंत्री को ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए ? इस पर पालकीवाला  ने कहा कि अगर आरोप सच है तो प्रधान मंत्री को इसे स्वीकार कर लेना चाहिए।लोक सभा का ऐसा कौन सा सदस्य है जिसने दूसरों की वित्तीय मदद के बिना चुनाव जीता हो ? कथनी और करनी में एकरूपता और अनुरूपता दिखाने का यही समय है।
  याद रहे कि प्रधान मंत्री पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने नंदियाल लोक सभा उप चुनाव में खर्च करने के लिए हर्षद मेहता से आर्थिक मदद ली थी।जब 1991 में वे प्रधान मंत्री बने थे तब वे संसद के किसी सदन के सदस्य नहीं थे।बाद में वे नंदियाल से जीत कर आये।लोक सभा में भी  तब कांग्रेस को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं था।तब झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को रिश्वत देकर नरसिंह राव ने अपनी सरकार बचाई थी।रिश्वत लेकर वोट देने का आरोप बाद में साबित भी हो गया ।पर उसको लेकर किसी को सजा इसलिए नहीं हो सकी क्यों कि वैसा करने का कोर्ट को अधिकार ही नहीं है।यह अधिकार कोर्ट को अब भी नहंी है।याद रहे कि संसद के भीतर के कामों के लिए किसी सांसद पर कोर्ट में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। 
@फस्र्टपोस्टहिंदी में 19 फरवरी 2018 को प्रकाशित मेरे काॅलम दास्तान ए सियासत से@