Wednesday, April 25, 2018

--- डा.आम्बेडकर चाहते थे मंत्रियों को मिले पर्याप्त वेतन---



  
   डा.बी.आर.आम्बेडकर चाहते थे कि इस देश के मंत्रियों को पर्याप्त वेतन मिले तभी प्रतिभाएं इस पद के लिए सामने  आएंगी।उन्होंने बम्बई विधान सभा में सन 1937 में अपने भाषण में यह बात कहीं। तब वे बम्बई लेजिस्लेटीव एसेम्बली के सदस्य थे।
  यह हमेशा ही विवादास्पद मुददा रहा है कि इस गरीब देश में मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के लिए  कितना वेतन तय किया जाना चाहिए।
याद रहे कि विधायक और सांसद ही अपने तथा मंत्रियों के लिए  वेतन -भत्ता विधायिका में पेश तत्संबंधी विधेयक के जरिए तय करते हैं। इस सिलसिले में सदन में चर्चा होती है।इस संबंध में पेश विधेयक आम तार पर सर्वसम्मति से ही पास होता है।
    इस विषय में एक पक्ष यह कहता है कि भारत के आम लोगों की औसत आय के अनुपात में ही जन प्रतिनिधियों के वेतन-भत्ते भी तय होने चाहिए।दूसरा पक्ष यह कहता है कि काम और पद की जरूरतों के अनुसार वेतन तय होने चाहिए।
   इस संबंध में डा.आम्बेडकर के विचार जानना महत्वपूर्ण है।याद रहे कि डा.आम्बेडकर बाद में संविधान सभा की ड्राफिटंग समिति के अध्यक्ष भी बनाये गये थे।
   नब्बे के दशक में ए.के.राय ने सांसदों -विधायकों के लिए धुंआधार वेतन-भत्ते बढ़ोत्तरी की प्रवृति की तीखी आलोचना की थी।धनबाद से सांसद रहे माक्र्सवादी मजदूर नेता ए.के. राय ने लिखा था कि जब देश आजाद हुआ था,उस समय औसत आय के मामले में बिहार को देश में पांचवां स्थान प्राप्त था।अभी बिहार इस मामले में देश में 26 वें स्थान पर है।उस समय देश के अन्य राज्यों की तरह ही यहां के विधायकों को भी सीमित सुविधाएं प्राप्त थीं।इसके बाद जैसे -जैसे बिहार की आम जनता की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती गई,वैसे-वैसे यहां केे विधायकों की स्थिति और बेहतर होती गई।यहां राजनीतिक दलों के बीच आपसी दूरी कम हुई और जनता और विधायकों के बीच दूरी बढ़ी।राजनीतिक दलों के बीच दूरी घटने का प्रमाण यह है कि विधायकों की सुविधाओं वाले विधेयकों में मुख्य मंत्री और विरोधी दल के नेता एकमत रहे हैं।इस अपवित्र सहमति ने लोकतांत्रिक संस्था और देश के भविष्य के सामने एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है।संविधान में निहित अभिप्राय का इस प्रकार का घोर उलंघन पीडि़त जनता को हतवाक कर दिया है।’ इस महौल में विधायकों के लिए वेतन बढाना जनता के घाव पर नमक छिड़कने जैसा है।
    पर इससे ठीक विपरीत  डा.आम्बेडकर ने कहा था कि किसी मंत्री के लिए मात्र पांच सौ रुपये का वेतन समुचित नहीं है।
    डा.आम्बेडकर के भाषण और ए.के. राय के लेख के सामने आने के बाद 
 इस मामले में यह देश काफी आगे बढ़ चुका है।अर्जुनसेन गुप्त समिति की रपट के अनुसार जहां की 77 प्रतिशत आबादी की रोज की औसत आय मात्र बीस रुपये हैं,वहां के प्रति सांसद पर हर माह लाख रुपये से भी अधिक सरकार खर्च कर रही है।कई राज्यों के विधायकों को भी इस तरह की सुविधाएं मिल रही हैं।ऐसे में डा.आम्बेडकर के तर्कों को जानना -पढ़ना महत्वपूर्ण होगा।
   डा.आम्बेडकर ने कहा था कि मैं अपनी स्थिति स्पष्ट करना चाहता हूं।क्योंकि पांच सौ रुपये के वेतन को बहुत कम बताने से मुझे गलत समझा जा सकता है।मेरा यह कहना नहीं है कि अंतरिम मंत्रिपरिषद द्वारा सुझाया गया चार हजार रुपये अथवा तीन हजार रुपये का वेतन मानक वेतन था।मैं स्वयं को किसी आंकड़े तक सीमित नहीं करना चाहता।मैं तो केवल इतना कहना चाहता हूं कि एक मंत्री के लिए पांच सौ समुचित वेतन नहीं है।
   उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन में लोगों का विश्वास हम जगाना चाहते हैं तो मेरे अनुसार यह उचित नहीं है कि मंत्री गलियों में अधूरे कपड़े पहन कर जाएं।अपना शरीर प्रदर्शन करें।सिगरेट के स्थान पर बीड़ी पिएं।अथवा तीसरे दर्जे या बैलगाड़ी से यात्रा करें।
@ शाजी जोसेफ के संपादकत्व में प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका ‘पब्लिक एजेंडा’ में छपे मेरे लेख का छोटा अंश@ 
   

Tuesday, April 24, 2018

पुण्य तिथि पर ‘दिनकर’ की याद में
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 24 अप्रैल 1974 को  राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का  निधन हुआ  था।
 उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु ने तत्काल उन पर एक कविता लिखी।कविता जेपी आंदोलन की पृष्ठभूमि में लिखी गयी थी।
प्रस्तुत है वह ऐतिहासिक  कविता जो ‘दिनमान’ के 5 मइर्, 1974 के अंक में छपी थी। 
 ‘हां,याद है।
उच्चके जब मंचों से गरज रहे थे
हमने उन्हें प्रणाम किया था
पहनाया था हार।
भीतर प्राणों में काट रहे थे हमें
हमारे वे पाप
हमारी बुझी ज्वाला को धधका कर
हमें अग्निस्नान करा कर पापमुक्त
खरा बनाया।
पल विपल हम अवरुद्ध जले
धारा ने रोकी राह,हम विरुद्ध चले
हमें झकझोर कर तुमने जगाया था
‘रथ के घर्घर का नाद सुनो.........’.
‘आ रहा देवता जो, उसको पहचानो....’
‘अंगार हार अरपो  रेे........’.
वह आया सचमुच, एक हाथ में परशु
और दूसरे में कुश लेकर
किंतु..... तुम ही रूठ कर चले गये।
विशाल तम तोम और चतुर्दिक घिरी
घटाओं की व्याकुलता से अशनि जनमी,
धुओं और उमस में छपप्टाता हुआ प्रकाश
खुल कर बाहर आया।
किंतु तुम.........?
अच्छा ही किया , तुम सप्राण
नहीं आये।नहीं तो, पता नहीं क्या हो जाता ?
यहां,     
जवानी का झंडा उड़ाते 
कालकूट पिये और भाल पर अनल किरीट लिये
कृपाण, त्याग, तप,साधना, यज्ञ, जप को टेरते 
गरजते, तरंग से भरी आग भड़काते
तुम्हारे बाग के असंख्य अनल कुसुम 
तुम्हारी अगुआनी में आंखें बिछाकर
प्रस्तुत थे............
उनकी जवानियां लहू में तैर तैर कर
नहा रही थीं।
ऐसे में तुम आते 
तो पता नहीं, और क्या क्या होता,
पता नहीं ,अब तक क्या क्या हो जाता,
और, तब तुमको फासिस्ट और चीनी 
और अमेरिकी और देसी सेठों की दलाली
और देशद्रोह के जुर्म में 
निश्चय ही देश से बाहर निकाल दिया जाता।
पता नहीं कहां.....किस देश ..

किस हिमालय और गंगाविहीन देश में
अच्छा ही किया ,चले गये
उत्तर की दिव्य ,कंचन काया को 
दक्षिण की माटी माता की गोद में छोड़
बाहर ही बाहर ,भले गये।
हमें क्षमा करना,कविवर विराट्।
हम तुम्हारी आत्मा की शांति के बदले 
उसको अपनी काया की एकांत और पवित्र 
कोने में 
प्रतिष्ठित करने की कामना करते हैं।
ताकि ,जहां कहीं भी अनय हो उसे रोक सकें,
जो करें पाप शशि सूर्य भी,उन्हें टोक सकें
हमारे भीतर जो एक नया अंगार भर रहा है।
बस वही एक आधार है हमारा।
कपट शोकातुर मुखौटा लगा
रुआंसी आवाज में ,गले को कंप कंपा
तुमको श्रद्धांजलि देने का नाटक
हम नहीं करेंगे।
तुम तो जीवित हो,जीवित रहोगे हमारे बीच
तेजोदीप्त।
मरने को हमेशा दोपहरी के तिमिर
तुम्हारे दुश्मन ही मरेंगे।
इस बार जब गांव जाकर ,
उत्तर की ओर निहारूंगा 
हिमालय के स्वर्ण शिखरों में देखूंगा
एक और नया शिखर
निश्चय ही--दिनकर।
इसे क्या संयोग ही कहेंगे ?
तुम्हारी शव यात्रा से लौटकर बैठा ही था
कि पड़ोस में कहीं रेडियोग्राम पर
साधक गायक हरींद्रनाथ का भावाकुल कंठस्वर-
‘सूर्य अस्त हो गया
गगन मस्त हो गया,सूर्य अस्त हो गया।’ 



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Monday, April 23, 2018

----कांग्रेस ने तो 1993 में महाभियोग से साफ बचा लिया था जज रामास्वामी को ----


        
1993 में जब कांग्रेस के पास संसद में बहुमत था,तब तो कपिल सिबल और कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के एक जज को   महाभियोग से साफ बचा लिया था।
पर अब जब बहुमत नहीं है तो प्रचार के लिए महाभियोग प्रस्ताव पेश कर दिया।
जबकि आज न्यायिक क्षेत्र का बहुमत मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग के पक्ष में नहीं  है।
इस बीच  राज्य सभा के सभापति ने उसे 
रिजेक्ट कर दिया है।
  आज का प्रचार भी राजनीतिक फायदे के लिए ही है।सन 1993 का बचाव भी राजनीतिक लाभ के लिए था।
सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश वी.रामास्वामी के खिलाफ संसद में पेश महाभियोग को विफल इसलिए किया गया क्योंकि  कांग्रेस को दक्षिण भारत के एक खास समुदाय के वोट से वंचित होने का खतरा था।  आरोप है कि इस बार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अभियान इसलिए चलाया जा रहा है  ताकि उससे कांग्रेस का  वोट बढ़े।   
एक तरफ जहां रामास्वामी के खिलाफ आरोप इतने गंभीर थे कि एक को छोड़कर तब सुप्रीम कोर्ट के कोई भी जज रामास्वामी के साथ बंेच में बैठने तक को तैयार नहीं थे।
आज जब मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव राज्य सभा के सभापति के समक्ष पेश किया गया तो सभापति ने यह कह कर उसे अस्वीकार कर दिया कि पहली नजर में ही देखने पर कोई केस नहीं बनता।   
 सन 1993 में रामास्वामी के बचाव में कपिल सिबल ने वकील के रूप में संसद में लगातार छह घंटे तक बहस की थी।
आज वही कपिल सिब्बल कांग्रेस नेता के रूप में मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ जारी अभियान के अगुआ हैं।
  याद रहे कि  ग्यारह मई, 1993 को लोक सभा में जस्टिस वी.रामास्वामी के खिलाफ पेश महाभियोग प्रस्ताव इसलिए गिर गया क्योंकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के 205 सदस्यों ने सदन में चर्चा के दौरान उपस्थित रहते हुए भी मतदान में भाग ही नहीं लिया। प्रस्ताव के पक्ष में मात्र 196 मत पड़े। ध्यान देने लायक बात यह रही कि महाभियोग प्रस्ताव के विरोध में एक भी मत नहीं पड़ा।यानी जिन सदस्यों ने मतदान में भाग नहीं लिया,वे लोग भी रामास्वामी के पक्ष में खड़े होने का नैतिक साहस नहीं रखते थे।
दरअसल अन्य कारणों से कांग्रेस ने पहले ही यह फैसला कर लिया था कि रामास्वामी को बचाना है।याद रहे कि वी.रामास्वामी के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें अंततः बचा ही लिया।
   माक्र्सवादी सांसद सोमनाथ चटर्जी द्वारा  प्रस्तुत महाभियोग प्रस्ताव पर लोक सभा में दस मई, 1993 को सात घंटे तक बहस चली।रामास्वामी पर लगाये गये आरोपों के बचाव में  कपिल सिब्बल ने  मुख्यतः यह बात कही कि खरीदारी का काम जस्टिस रामास्वामी ने नहीं बल्कि संबंधित समिति ने किया था। महाभियोग पर लोक सभा में इस चर्चा को दूरदर्शन के जरिए प्रसारित किया जा रहा था। ग्यारह मई को फिर इस पर नौ घंटे की बहस चली।सोमनाथ चटर्जी ने चर्चा का जवाब दिया।रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग के मामले में ऊपरी तौर पर तो कांग्रेस ने अपने सदस्यों को विवेक के आधार पर मतदान करने की छूट दे दी,पर भीतर -भीतर उन्हें कह दिया गया कि रामास्वामी को बचा लेना है।इसके कई प्रमाण सामने आये। क्या एक ही साथ सभी कांग्रेसी सांसदों के विवेक ने कहा कि रामास्वामी के खिलाफ वोट मत करो ? इतना ही नहीं,लोक सभा मंे ंजब -जब रामास्वामी के वकील कपिल सिब्बल ने कोई जोरदार तर्क पेश किया तो कांग्रेसी सदस्यों ने खुशी में मेजें थपथपाईं। विधि मंत्री हंस राज भारद्वाज टोका टोकी के बीच कपिल सिब्बल का ही पक्ष लेते रहे।
    लोक सभा तो रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव नहीं पास कर सका,पर सुप्रीम कोर्ट के अधिकतर  साथी जजों ने रामास्वामी के साथ  बेंच मेें बैठने से इनकार कर दिया। आखिरकार 14 मई 1993 को रामास्वामी ने अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी। 
 जिन न्यायमूत्र्ति को कांग्रेस व कपिल सिबल ने बचाया था,उनके खिलाफ  आरोपों पर गौर करें । नवंबर, 1987 और अक्तूबर 1989 के बीच पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में वी.रामास्वामी ने अपने आवास व कार्यालय के लिए सरकारी निधि से पचास लाख रुपये के गलीचे और फर्नीचर खरीदे।यह काम निविदा आमंत्रित किए बिना और नकली तथा बोगस कोटेशनों के आधार पर किया गया।दरअसल ये फर्नीचर खरीदे ही नहीं गये थे।पर कागज पर खरीद दिखा दी गई।यह खर्च राशि, खर्च सीमा से बहुत अधिक  थी।
  जस्टिस वी.रामास्वामी ने चंडीगढ़ में अपने 22 महीने के कार्यकाल में गैर सरकारी फोन काॅलों के लिए आवासीय फोन के बिल के 9 लाख 10 हजार रुपये का भुगतान कोर्ट के पैसे से कराया।मद्रास स्थित अपने आवास के फोन के बिल का भी पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट से भुगतान कराया।वह बिल 76 हजार 150 रुपये का था।इसके अलावा भी कई अन्य गंभीर आरोप वी.रामास्वामी पर थे। 
  रामास्वामी  ऐसे जज थे जिन्हें तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने आतंकवादियों के खिलाफ मुकदमे निपटाने के लिए मुख्य न्यायाधीश बनवा कर चंडीगढ़ भेजा था।ऐसा संवेदनशील काम जिसके जिम्मे हो,उस ऐसा आरोप ? पर उन्होंने वहां चीफ जस्टिस के रूप में भी आतंकवादियों के मुकदमों को लेकर कोई उल्लेखनीय काम नहीं किए।वे जब तक रहे टाडा के अभियुक्त धुआंधार जमानत पाते रहे। 
  --- सुरेंद्र किशोर--23 अप्रैल 2018 

जब वीर कुंवर सिंह से लगातार सात लड़ाइयां हार गई थीं कंपनी की फौजें


         
 ईस्ट इंडिया कंपनी की फौजें  सात युद्धों में जिस  भारतीय राजा से हार गयी थी ,उस राजा का नाम था बाबू वीर कुंवर सिंह ।वीर कुंवर सिंह की याद में बिहार में बड़े पैमाने पर 23 अप्रैल को विजयोत्सव मनाया जाता है।
बिहार के जगदीश पुर के कंुवर सिंह जब अंग्रेजों से लड़ रहे थे, तब उनकी उम्र 80 साल  थी।यह बात 1857 की है।
  याद रहे कि  भोज पुर जिले के जगदीश पुर नामक पुरानी राजपूत रियासत के प्रधान  को सम्राट् शाहजहां ने  राजा की उपाधि दी थी।
  मशहूर पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज’ के यशस्वी लेखक पंडित सुंदर लाल ने उन सात युद्धों का विस्तार से विवरण लिखा है।
  लेखक के अनुसार ‘जगदीश पुर के राजा कुंवर सिंह आसपास के इलाके में अत्यंत सर्वप्रिय थे।कुवंर सिंह 1857 के बिहार के क्रांतिकारियों का प्रमुख नेता और  सबसे ज्वलंत व्यक्तियों में थे।
बिहार में 1857 का संगठन अवध और दिल्ली जैसा तो न था,फिर भी उस प्रांत में क्रांति के कई बड़े -बड़े केंद्र थे।
 पटना में जबर्दस्त केंद्र था जिसकी शाखाएं चारों ओर फैली  थीं।पटना के क्रांतिकारियों के मुख्य नेता पीर अली को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया।
 पीर अली की मृत्यु के बाद दाना पुर की देशी पलटनों ने स्वाधीनता का एलान कर दिया।ये पलटनें  जगदीश पुर की ओर बढ़ीं।
बूढ़े कुंवर सिंह ने तुरंत महल से निकल कर शस्त्र उठाकर इस सेना का नेतृत्व सम्भाल लिया। इतिहासकार के अनुसार कुंवर सिंह आरा पहुंचे।
उन्होंने  आरा में अंग्रेजी खजाने पर कब्जा कर लिया।
जेलखाने के कैदी रिहा कर दिए गए।
अंग्रेजी दफ्तरों को गिरा कर बराबर कर दिया गया।
    29 जुलाई को दाना पुर के कप्तान डनवर के अधीन करीब 300 गोरे सिपाही और 100 सिख सैनिक आरा की ओर मदद के लिए चले।
आरा के निकट एक आम का बाग था।कुंवर सिंह ने अपने कुछ आदमी आम के वृक्षों की टहनियों में छिपा रखे थे।
रात का समय था।जिस समय सेना ठीक वृक्षों के नीचे पहुंची,अंधेरे में ऊपर से गोलियां बरसनी शुरू हो गयीं।
सुबह तक 415 सैनिकों में से सिर्फ 50 जिंदा बच कर दाना पुर लौटे।डनवर भी मारा गया था।
इसके बाद मेजर आयर एक बड़ी सेना और तोपों सहित आरा किले में घिरे  अंग्रेजों की सहायता के लिए बढ़ा।
2 अगस्त को आरा के बीबी गंज में आयर और कुंवर सिंह की सेना के बीच संग्राम हुआ।
इस बार आयर विजयी हुआ।उसने 14 अगस्त को जगदीश पुर के महल पर भी कब्जा कर लिया।
कुंवर सिंह 12 सौ सैनिकों व अपने महल की स्त्रियों को साथ लेकर जगदीश पुर से निकल गए।
18 मार्च, 1858 को दूसरे क्रांतिकारियों के साथ कुंवर सिंह आजम गढ़ से 25 मील दूर अतरौलिया में डेरा डाला। 
मिलमैन के नेतृत्व में अंग्रेज सेना ने 22 मार्च 1858 को कुंवर सिंह से मुकाबला किया।मिलमैन हार कर भाग गया।
28 मार्च को कर्नल डेम्स के नेतृत्व में एक बड़ी सेना ने कुंवर सिंह पर हमला किया।इस युद्ध में भी कुंवर सिंह विजयी रहे।
कुंवर सिंह ने आजम गढ़ पर कब्जा किया।किले को दूसरों के लिए छोड़कर कुंवर सिंह बनारस की तरफ बढ़े।
लार्ड केनिंग उस समय इलाहाबाद में था।
इतिहासकार मालेसन लिखता है कि बनारस पर कुंवर सिंह की चढ़ाई की खबर सुन कर कैनिंग घबरा गया।
  उन दिनों कंुवर सिंह जगदीश पुर से 100 मील दूर  बनारस के उत्तर थे।लखनऊ से भागे कई क्रांतिकारी कुंवर सिंह की सेना में आ मिले।
लार्ड कैनिंग ने लार्ड मारकर को सेना और तोपों के साथ कुंवर ंिसंह से लड़ने के लिए भेजा।
किसी ने उस युद्ध का विवरण इन शब्दों में लिखा है,‘
उस दिन 81 साल का बूढ़ा कुंवर सिंह अपने सफेद घोड़े पर सवार ठीक घमासान लड़ाई के अंदर बिजली की तरह इधर से उधर लपकता हुआ दिखाई दे रहा था।’
अंततः लार्ड मारकर हार गया।
उसे पीछे हटना पड़ा।
कुंवर सिंह की अगली लड़ाई सेनापति लगर्ड के नेतृत्व वाली सेना से हुई।कई अंग्रेज अफसर व सैनिक मारे गए।
कंपनी की सेना पीछे हट गयी।
कुंवर सिंह गंगा नदी की तरफ बढ़े।वे जगदीश पुर लौटना चाहते थे।
एक अन्य सेनापति डगलस के अधीन सेना कुंवर से लड़ने के लिए आगे बढ़ी।
नघई नामक गांव के निकट डगलस और कुंवर सिंह की सेनाओं में संग्राम हुआ।
अंततः डगलस हार गया।
कुंवर सेना के अपनी साथ गंगा की ओर बढ़े।
कुंवर सिंह गंगा पार करने लगे।बीच गंगा में थे।
अंग्रेजी सेना ने उनका पीछा किया।
एक अंग्रेजी सैनिक ने गाली चलाई।गोली  कुंवर सिंह को लगी।
गोली दाहिनी कलाई में लगी।
विष फैल जाने के डर से कुंवर सिंह ने बाएं हाथ से तलवार खींच कर अपने दाहिने हाथ को कुहनी पर से काट कर गंगा में फेंक दिया।
22 अप्रैल को कंुवर सिंह ने वापस जगदीश पुर में प्रवेश किया।आरा की  अंग्रेजी सेना 23 अप्रैल को लीग्रंैड के अधीन जगदीश पुर पर हमला किया।
इस युद्ध में भी कुंवर सिंह विजयी रहे।
पर घायल कुंवर सिंह की 26 अप्रैल, 1858 को मृत्यु हो गयी।
23 अप्रैल को कुंवर की याद में विजयोत्सव मनाया जाता है।
---सुरेंद्र किशोर   
@फस्र्टपोस्ट हिंदी.. 23 अप्रैल 2018@                                      

  



आरक्षण की जगह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से सबकी भलाई---


जिन लोगों ने आरक्षण के विरोध में 10 अप्रैल को ‘भारत बंद’ का आह्वान किया था,उन्हें इसके बदले भ्रष्टाचार के खिलाफ 
इस देश में कोई बड़ा आंदोलन करना चाहिए।उनमें आंदोलन की क्षमता तो है ही।मेरी समझ से उस क्षमता का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है।
क्योंकि 10 अप्रैल के भारत बंद से ही यह लग गया कि वे कोई बड़ा आंदोलन भी चला सकते हैं।
आरक्षण के विरोध में कोई आंदोलन कई कारणों से इस देश में प्रति-उत्पादक यानी काउंटर प्रोडक्टिव ही साबित होगा।
1990 में ऐसा देखा गया।
हालांकि 10 अप्रैल को भारत बंद आयोजित करने वाले लोगों की मूल समस्याओं पर इस देश की विभिन्न सरकारों को गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा।एक बड़ी आबादी को लंबे समय तक असंतुष्ट नहीं रखा जा सकता।
उनकी मुख्य समस्या बेरोजगारी  है।
सरकार साधनों के अभाव में रोजगार के अवसर नहीं बढ़ा पा रही है।अवसर बढ़ भी रहे हैं तो जरूरतों के अनुपात में बहुत कम हैं।साधनों की कमी के कारण न तो खाली सरकारी पद भरे जा रहे हैं और न ही जरूरत रहने पर भी नये पद सृजित हो रहे हैं।
आबादी व जरूरतों के अनुसार हर जगह पदों की भारी कमी है।अधिक पद यानी रोजगार के अधिक अवसर।सबके लिए अवसर।आरक्षित व अनारक्षित सभी के लिए।
सरकार के पास साधन इसलिए भी कम हैं कि इस देश में बड़े पैमाने पर विभिन्न तरह के टैक्सों चोरी हो रही है।ऐसा भारी प्रशानिक व राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण हो रहा है।
नये -नये छोटे -बड़े उद्योगों की स्थापना की राह में भी सरकारी लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार बाधक हैं।कानून -व्यवस्था की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है।
अपवादों को छोड़ दें तो हर स्तर पर सरकारी सेवक उद्यमियों से पूछते हैं कि ‘इसमें मुझे क्या मिलेगा ?’
यदि नहीं तो फिर कहते हैं कि ‘फिर मेरा क्या,उद्योग लगे या न लगे  !’
ऐसे लोगों की ‘दवाई’ कोई बड़ा जनांदोलन ही कर सकता है।
बड़े पैमाने पर ‘स्टिंग आपरेशन’ की भी जरूरत है।
सरकार की ताकत भ्रष्टाचारियों की ताकत के सामने  कम पड़ रही है।
यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा जनांदोलन देश में शुरू होगा तो सरकार को भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए  की अतिरिक्त ताकत मिलेगी।या फिर मजबूरी होगी।यदि फिर भी सरकारों ने कड़े कदम नहीं उठाए तो सरकारें बदल जाएंगी।
   10 अ्रपैल को बंद कराने वाले आम तौर पर कृषक परिवारों से आते हैं।देश कृषि-संकट से जूझ रहा है।
खेती में मुनाफा कम, घाटा ही अधिक है।
किसानों के लिए खेती से अपना जरूरी खर्च 
चलाना भी मुश्किल हो रहा है।किसान अपनी उन शिक्षित  बेरोजगार संतानों का क्या करें जो खेती भी नहीं कर सकते ? 
सरकारों को चाहिए कि वेे खेती को कृषि आधारित उद्योगों से जोड़े।मनरेगा को किसानों से जोड़े जैसी सलाह तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने मन मोहन सरकार के कार्यकाल में दी थी।
 यानी मनरेगा के मजदूरों को आधी मजदूरी सरकार और आधी किसान दें।इससे खेती पर से लागत खर्च का बोझ घटेगा।
  आरक्षण विरोधी 1990 से सबक लें---
1990 में जब केंद्र की वी.पी.सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफरारिशों के आधार पर केंद्रीय सेवाओं में पिछड़ों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया तो पूरे देश में कुछ लोगों द्वारा भारी विरोध किया गया।
बिहार में विरोध व प्रति-विरोध अलग ढंग का था।सघन व तीखा  था।तत्कालीन मुख्य मंत्री लालू प्रसाद ने आरक्षण विरोधियों का अपने दल व सरकारी साधनों के बल पर अपनी भदेस शैली में  जम कर विरोध किया।समाज में घर्षण हुआ।इसमें लालू को पिछड़ों को जगाने और उसका श्रेय लेने का  सुनहरा मौका मिल गया।
तब कुछ विवेकशील लोग आरक्षण विरोधियों से अपील कर रहे थे कि विरोध छोड़ो। गज नहीं फाड़ेगे तो थान हारना पड़ेगा।वे नहीं माने।
नतीजतन लालू प्रसाद ने सिर्फ आरक्षण विरोधियों के विरोध की अपनी एक मात्र राजनीतिक पूंजी के बल पर कारण 15 साल तक राज किया।उस ‘राज’ में सबसे अधिक नुकसान सवर्णों का ही हुआ।बाद में कुछ आरक्षण विरोधियों ने यह महसूस किया था कि उनका विरोध गलत था।वह प्रति -उत्पादक साबित हुआ।
पर आरक्षण विरोधियों की आज की नयी पीढ़ी लगता है कि उस इतिहास से अनभिज्ञ है ।इसीलिए  इतिहास को दुहराया जा रहा है।यदि आरक्षण विरोध अब भी बंद नहीं हुआ तो एक और लालू के पैदा होने का  आधार तैयार हो जाएगा।
पर भ्रष्टाचार विरोध के आंदोलन में सबको लाभ मिलेगा।
हालंाकि उसके कारण ज्यादा लाभ सवर्णों को ही होगा।क्यांेकि 
सरकारी सुविधाओं का फायदा उठाने की क्षमता,प्रतिभा, बुद्धि,कौशल और योग्यता उनमें अपेक्षाकृत अधिक है।
 याद रहे कि भ्रष्टाचार कम होने से सरकारें धनवान -साधनवान होंगी।सरकारी पैसे से विकास का लाभ गांवों तक पहुंचेगा।
   चुनाव पूर्व जातीय आंदोलन---
कांग्रेस  अनुसूचित जाति संभाग के अध्यक्ष नितिन राउत ने कहा है कि दलितों का गुस्सा अगले चुनाव के बाद राहुल गांधी को प्रधान मंत्री बनाएगा।
यानी कुछ नेताओं ने गुस्सा पैदा होने की  स्थिति इसीलिए  
तैयार की ताकि इसके बल पर सत्ता बदली जा सके।
पर ऐसी जातीय भावनाएं उभार कर कोई सत्ता हासिल करके देश का कितना भला कर पाएगा ?
इससे पहले भी जातीय भावनाएं उभार कर सत्ता हासिल करके लोगों ने किसका भला किया ?सब जानते हैं कि किसका भला हुआ।
आम तौर पर अपना और अपने परिवार और एक हद तक अपनी जाति कव ही तो !
 क्या इससे देश बनेगा ? न अब तक बना है और न आगे बनेगा।ऐसे आंदोलनों से खुद उस आंदोलन के मौजूदा नेताओं को कुछ लाभ भले हो जाए,पर उनकी ही आगे वाली पीढि़यां उन्हें कोसेंगी।
    एक भूली बिसरी याद---
1990 में तत्कालीन वी.पी.सिंह सरकार ने केंद्रीय सेवाओं 
में पिछड़ों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया।
तब के आरक्षण विरोधियों में मशहूर पत्रकार अरूण शौरी प्रमुख थे।
उन्होंने मंडल आरक्षण के विरोध में अनेक लेख लिखे और जगह जगह जाकर  भाषण दिए।
उनके एक लेख का एक अंश मौजूद स्थिति में मौजूं है।
उन्होंने लिखा था कि 
‘......मेधावी नौजवान अब सरकारी सेवा से दूर रहेगा।वह ऐसे पेशों मेें जाएगा जो इस तरह के विनिमयों से भद्दे और बेतुके नहीं हुए हैं।मेधावी नौजवान के लिए तो यह उतनी बुरी बात भी नहीं होगी।
जिस पेशे को वह त्याग रहा होगा--सरकारी सेवा-अब मुश्किल से ही ऐसा पेशा है जो वह बीस साल पहले हुआ करता था।उनमें न तो जीवंतता है और न ही तरक्की की संभावनाएं और न ही वह सचमुच ऐसे अवसर देता है जो महान जिम्मेदारियां निभाने के लिए सरकारी पद कभी देते थे।
जिन पेशों की तलाश में वह निकलेगा,वे विकासमान पेशे हैं,-उनमें अभिरूचियों और कौशल के व्यापकत्तम विन्यास के अवसर हैं।वे ऐसे पेशे हैं ,जिनमें पहलकदमी और युक्ति कौशल को तुरंत -फुरत मान्यता और पुरस्कार मिल सकता है।’लेकिन राज्य के लिए यह कोई तसल्ली नहीं है।सर्वाधिक प्रतिभावानों
 के राजकाज के तंत्र से दूर रहने का नतीजा यही हो सकता है कि वह और भी कमजोर होगा।’
    और अंत में--
 हर सांसद को हर साल एक गांव को गोद लेकर उसका 
विकास करना था।प्रधान मंत्री ने इस योजना में खास रूचि ली।
उसके लिए अलग से पैसे का प्रावधान नहीं किया गया।
देश में केंद्र व राज्य सरकारों की विकास व कल्याण की सैकड़ों योजनाएं चल रही हैं।उन्हीं योजनाओं के पैसों से उन आदर्श गांवों का विकास करना था।
पर, वे पैसे भी उन आदर्श गावों में नहीं लगे।इसलिए शायद ही इस विधि से शायद  कुछ ही गांवों का विकास हो सका।क्योंकि सरकारी-गैर सरकारी बिचैलिए दशकों से उन पैसों में से अधिकांश  पैसे खा जा रहे हैं।मौजूदा सरकार व सांसदों से भी अधिक ताकतवर वे  लुटेरे
साबित हुए हैं।उन्होंने अघोषित रूप से कह दिया कि हम उन पैसों को कहीं और नहीं लगाएंगे ।वे सिर्फ हमारी पाॅकेटों की शोभा बढ़ाएंगे।
अब बताइए कि भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी महा जन आंदोलन
की आज कितनी अधिक जरूरत है ? ऐसे आंदोलनों से किसी ईमानदार सरकार को बल ही मिलता है। 
--सुरेंद्र किशोर
@कानोंकान-12 अप्रैल 2018@
    

कई दशक पहले की बात है।
एक युवा समाजवादी नेता के साथ मैं एक सुबह पटना के र्हािर्डंग पार्क में टहल रहा था।
तब तक हार्डिंग पार्क का नाम वीर कुंवर सिंह पार्क पड़ चुका था।
पार्क के भीतर के एक वृक्ष के मजबूत तने पर टीन की एक पट्टी  ठोकी हुई थी।
उस पर लिखा था ‘वीर कुंवर सिंह पार्क।’
समाजवादी नेता उसे देखते ही आग -बबूला हो गए।‘एक सामंती के नाम पर पार्क का नाम ? मैं यह सब चलने नहीं दूंगा।’ तब तक मैंने भी कतिपय समाजवादियों का असली चेहरा नहीं देखा था,इसलिए मैंने भी उनकी हां में हां मिलाई।
उन्होंने तत्क्षण उस पट्टी को उखाड़ने की कोशिश की।पर उनके मजबूत हाथों से भी वह नहीं उखड़ सकी।
दूसरे दिन उन्होंने  अपने साथ एक लोहे का मोटा छनौटा लाया।उसकी मदद से उसे उखाड़ कर फेंक दिया।
   खैर, समय बीतता गया। नेता जी समाजवाद और कमजोर वर्ग के विकास के नारे लगाते -लगाते बारी -बारी से कई सदनों के सदस्य बने।
पैसे और प्रभाव के बल पर धीरे -धीरे खुद उनमें एक आधुनिक सामंत व व्यापारी उभरने लगा।
काफी पैसे बनाए।कभी साइकिल पर चलने वाले नेता जी ने अपने बाल -बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला कर समाज में अच्छी जगहें दिला दीं।
जिन कमजोर वर्ग की चिंता करते -करते वे आगे बढ़े थे,उन्हें यूं ही छोड़ कर खुद आधुनिक सामंत बन गए।
आज यदि वीर कुंवर सिंह के वंशज@हालांकि मैं वीर कुंवर सिंह के वंशजों के बारे में बहुत नहीं जानता।पर अनुमान जरूर लगा सकता हूं।@ और उस नेता जी के वंशज की हैसियत की तुलना की जाए,तो यह कहना कठिन होगा कि कौन कितना बड़ा सामंत है।@23 अप्रैल 2018@

  

Saturday, April 21, 2018

---सरकारी भूमि पर कब्जा करने वालों के नाम जग जाहिर करे सरकार ---


सवाल सिर्फ पटना के गोलक पुर का ही नहीं है।देश -प्रदेश के अनेक स्थानों में कानून को ठेंगा दिखा कर अनेक लोगों ने सरकारी जमीन पर पक्का निर्माण कर रखा है।
मुकदमे चलते हैं,सुनवाई होती है,पीढि़यां बीत जाती हैं।
इस बीच जमीन के अभाव में आम सरकारी विकास व कल्याण के अनेक काम जहां तहां रुके रहते हैं।
  सरकारों को चाहिए कि वे इस बीच अतिक्रमणकारियों के नाम -पता जग जाहिर करे।
लोगों को पता तो चले कि वे महानुभाव कौन हैं।उनमें से शायद कुछ लोगों को शर्म आए।उन्हें नहीं तो उनके वत्र्तमान व भावी रिश्तेदारों को शर्म आए।सभ्य समाज में उनकी ‘महिमा’ गाई  जाए!
उनके नाम मालूम हो जाएंगे तो अनेक लोग इस बात का भी अनुमान  लगा लेंगे कि उन्हें  मदद किन नेताओं से मिल रही है।
  यदि अतिक्रमणकारियों में कोई सरकारी या अर्ध सरकारी संस्थान में कर्मचारी है तो उसका वेतन -प्रमोशन वगैरह रोका जा सकता है।कानून इजाजत दे तो पेंशन भी।यदि इस मामले में कानून की कमी है तो उसे बनाया जाना चाहिए।
 यदि पटना के गोलक पुर का ही मामला लें तो दशकों पूर्व उस तीन एकड़ जमीन का अधिग्रहण  पास के इंजीनियरिंग काॅलेज के विकास के लिए हुआ था।
पर स्थानीय प्रशासन की साठगांठ या अनदेखी से उस पर अतिक्रमण होता चला गया।
विकास चंद्र उर्फ गुड्डू बाबा का भला हो जिन्होंने अपनी जान  हथेली पर लेकर इस संबंध में कानूनी लड़ाई शुरू की।
पर पटना हाई कोर्ट के सख्त आदेश के बावजूद प्रशासन लचर साबित हो रहा है।क्या प्रशासन विकास चंद्र से भी कमजोर है ? खैर, गोलक पुर का चाहे जो हश्र हो ,पर ऐसे अन्य अतिक्रमणकारियों के भी शुभ नाम तो अखबार पढ़कर लोग जान तो लें।
दशकों से यह मांग होती रही थी कि बैंकों से भारी कर्ज लेकर दबा लेने वालों के नाम सरकार उजागर करे।नहीं किया।नतीजतन इस बीच अनेक विजय माल्या और नीरव मोदी पैदा हो गए।  
साथ चुनाव से स्थानीय मुद्दे गौण नहीं---
क्या लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ होने से राज्यों से संबंधित स्थानीय मुद्दे गौण हो जाएंगेे ?
पिछला अनुभव तो यह नहीं बता रहा  है।
पर अनेक लोग इसी आधार पर इसका विरोध कर रहे हैं।
याद रहे कि 1967 में अंतिम बार लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ हुए थे।उस चुनाव में  लोक सभा में तो कांग्रेस को बहुमत मिल गया था ,पर सात राज्यों में कांग्रेस हार गयी थी।दो अन्य राज्यों में दल बदल के कारण गैर कांग्रेसी सरकारें बन गयीं।
बिहार के लोगों में भी स्थानीय कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार के कारण उसके खिलाफ भारी रोष था।
पर उतना ही रोष केंद्र की कांग्रेसी सरकार के खिलाफ नहीं था।
नतीजतन राज्य की कुल 53 लोक सभा सीटों में से 34 सीटें कांग्रेस को मिलीं।
यानी आधी से अधिक सीटेंे।
पर बिहार विधान सभा की आधी से अधिक सीटों पर कांग्रेस हार गयी थीं।दरअसल आज के कुछ नेता और दल यह चाहते हैं कि जितनी अधिक दफा चुनाव होंगे,तो उतना ही अधिक चंदा बटोरने का उन्हें अवसर मिलेगा।
उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है कि अधिक चुनाव यानी सरकार का अधिक खर्च।
अधिक चुनाव के कारण विकास भी रुकते हैं।
संभवतः अपने देश में जिस तरह के कुछ नेता हैं,वैसे शायद ही किसी अन्य देश में होंगे ! 
भारी घाटे के बावजूद विनिवेश का विरोध-
एयर इंडिया में अब तक करीब 50 हजार करोड़ रुपए का घाटा हो चुका है।
इसके अलावा उस पर 55 हजार करोड़ रुपए का कर्ज भी है।
इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने इसके 76 प्रतिशत शेयर को बचे देने का निर्णय किया है।पर उसका भी विरोध हो रहा है।इसी तरह घाटे में चल रहे कोलकाता के ग्रेट इस्टर्न होटल को ज्योति बसु सरकार ने बेचना चाहा तो विरोध हो गया।उनके ही दल से जुड़े सीटू ने विरोध किया।बिक्री रुक गयी।पर जब स्थिति और बिगड़ी तो आखिरकार बुद्धदेव सरकार ने उसका विनिवेश कर दिया।
उसी तरह अभी जो लोग एयर इंडिया के विनिवेश का विरोध कर रहे हैं,स्थिति के और बिगड़ने पर उन्हें उसका समर्थन करना पड़ेगा।
दरअसल इस गरीब देश में होना तो यह चाहिए था कि देश के विभिन्न मजदूर और सेवा संगठन अपने संस्थान में व्याप्त भ्रष्टाचार और काहिली का कारगर विरोध करते तो कहीं विनिवेश की नौबत ही नहीं आती।
निजी क्षेत्र का विस्तार नहीं होता जैसा हो रहा है।
  दिनकर की याद को  समर्पित रेणु की कविता---
 1974 के इसी महीने की 24 तारीख को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का  निधन हुआ  था।
 उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु ने तत्काल उन पर एक कविता लिखी।कविता थोड़ी लंबी है।जेपी आंदोलन की पृष्ठभूमि में लिखी गयी थी।
पर उस कविता का एक अंश यहां प्रस्तुत है। 
 हा,याद है।
उच्चके जब मंचों से गरज रहे थे
हमने उन्हें प्रणाम किया था
पहनाया था हार।
भीतर प्राणों में काट रहे थे हमें
हमारे वे पाप
हमारी बुझी ज्वाला को धधका कर
हमें अग्निस्नान करा कर पापमुक्त
खरा बनाया।
पल विपल हम अवरुद्ध जले
धरा ने रोकी राह,हम विरुद्ध चले
हमें झकझोर कर तुमने जगाया था
‘रथ के घर्घर नाद सुनो..........
आ रहा देवता जो,उसको पहचानो
अंगार हार अरपो रे.........
वह आया सचमुच,एक हाथ में परशु
और दूसरे में कुश लेकर
किंतु...तुम ही रूठ कर चले गये।
विशाल तम तोम और चतुर्दिक घिरी
घटाओं की व्याकुलता से अशनि जनमी,
धुओं और उमस में छपप्टाता हुआ प्रकाश
खुल कर बाहर आया।
किंतु तुम....?
अच्छा ही किया ,तुम सप्राण
नहीं आये,नहीं तो पता नहीं क्या हो जाता ?
      भूली-बिसरी याद--- 
धारावाहिक ‘रामायण’ के लिए हनुमान की भूमिका निभाने के
लिए किसी पहवान का चयन करना था।
इस किरदार के लिए कई पहलवान रामानंद सागर के पास पहुंचे थे।
इस प्रसंग का विवरण दारा सिंह ने अपनी जीवनी में कुछ इस तरह लिखा है, ‘पर रामानंद सागर के दिल-दिमाग में 
मेरी तस्वीर इस चरित्र को निभाने के लिए इस तरह दृढ़ता से जमी हुई थी कि दूसरा व्यक्ति उनको जमता ही नहीं था।
यह महाबली हनुमान की अपनी इच्छा थी जो सागर साहब को मेरे हक में प्रेरित करती रही होगी।
धारावाहिक रामायण चर्चित हो जाने के कारण सभी कलाकारों को बहुत लाभ हुआ।लोगों ने मरे चरित्र को ऐसे महसूस किया ,जैसे हनुमान जी प्रत्यक्ष आकर अदाकारी कर रहे हों।
मैं इस चरित्र को निभाने से पहले महाबली हनुमान जी आशीर्वाद मांगता था।
और मैं यह महसूस करता था कि उन्हें मुझे वरदान दिया है।तभी तो सारी जनता ने मेरे इस चरित्र को पसंद किया,वरामैं किस योग्य था !
दारा सिंह लिखते हैं कि बहुत से विद्वान और सयाने लोग मुझसे पूछते हैं कि हनुमान की भूमिका करते हुए मैंने कैसा महसूस किया ?
यह पत्रकारों ने भी पूछा।मैंने उनको महाबली में अपनी आस्था के बारे में बताया ।खास कर पहलवान लोग शक्ति के प्रतीक हनुमान जी को मानते हैं।
कुछ लोग यह भी मानते हैं कि हनुमान जी आज भी मृत्यु लोक में विचर रहे हैं।
  रामायण की शूटिंग के दौरान खान-पीने के बारे में भी 
दारा सिंह ने लिखा है कि ‘शूटिंग के दौरान खाने पीने में परहेज किया जाता था।
कई कलाकार दुःखी भी थे कि तपस्वियों वाले तौर तरीकों में रहना पड़ रहा है।पर जब वाहवाही मिलती तो खुश भी होते थे।
हालांकि बाद में कइयों ने खा-पीकर दंगे फसाद भी किए।
    और अंत में---
विवादास्पद आई.पी.एस.अधिकारी विवेक कुमार की कमाई की रफ्तार तो देखिए !
यदि इसी रफ्तार के साथ डी.जी.पी.पद तक पहुंच जाते तो 
इनके पास कितना धन संग्रह हो गया होता ?
उसका अनुमान तो मुश्किल
 है।पर एक बात जरूर होती ।हमारे देश के कुछ धन बटोरू नेतागण  ईष्र्यालु  जरूर हो गए होते।सोचते कि कहां नेता बने,आई.पी.एस.ही बन गए होते।हालांकि वह तो उनके वश में होता तो राजनीति में क्यों जाते ?