सोमवार, 28 सितंबर 2026

 पितृ पक्ष (26 सितंबर--10 अक्तूबर) के 

अवसर पर पिता की यादें

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वह जमाना कब का गुजर गया जब इस देश के 

लोग अपने पिता के पैरों में 

स्वर्ग देखते थे !

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--सुरेंद्र किशोर--

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अपवादों को छोड़ दें तो इन दिनों अधिकतर मामलों 

में पुत्र का समय अपने पिता से 

यह कहते हुए बीतता है कि 

‘‘ आपने मेरे लिए किया ही क्या ? ’’

ऐसा कह कर एक तरफ पुत्र अपनी नाकामियों को छिपाता है तो दूसरी ओर कूढ़न में पिता की आयु कम होती जाती है।

पिता के गुजर जाने तक यह सब चलता रहता है।

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पुत्र यह कहना चाहता है कि जो भी उपलब्धि मैंने पाई,वह खुद अपने बल पर।

और, मेरे जीवन में जो भी कमी रह गई,

वह पिता के असहयोग कारण।

वैसे सच तो यह है कि सिर्फ एक पिता को ही अपने पुत्र की तरक्की से कभी ईष्र्या नहीं होती।बाकी सबको होती है।

(मैं खुद इस बात का गवाह हूं।)

यानी, पिता दिल से चाहता है कि उसका पुत्र उससे भी अधिक तरक्की करे।

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समय बीतते देर नहीं लगती।

तब तक पुत्र भी पिता बन चुका होता है ।

और, उसे भी अपने पुत्र से यही सब सुनना पड़ता है।

इस तरह इतिहास का पहिया न जाने कब से 

घर्र -घर्र करते आगे बढ़ता जा रहा है।

एक बार फिर कह दूं।

इस नियम के कुछ अपवाद भी होते हैं।

पर, कुछ ही होते हैं।

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जीवन काल में पिता की उपेक्षा करने वाले उनके निधन के बाद कुछ अधिक ही पितृपक्ष मनाने लगते हैं।

दाढ़ी के बाल बढ़ा लेंगे,

थोड़ा उदास दिखने की कोशिश करेंगे और उनमें से कुछ गया में पिंडदान करने भी चले जाएंगे।

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अंध विश्वास है या यथार्थ ?

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आप इसे मेरा अंध विश्वास मान सकते हैं।

पर,यह तो मेरे साथ घटित हुआ है !

जब तक मेरे परिवार ने गया में पिंडदान नहीं किया,

तब तक मेरे बाबू जी 

(शिव नन्दन सिंह,ग्राम-भरहापुर,अंचल-दरियापुर,जिला-सारण,बिहार।)

अक्सर मेरे सपनों में आते थे।

पिंडदान के बाद नहीं आते।कभी नहीं आये।

  गया (अब गयाजी)का बहुत महत्व रहा है ।बताते हैं कि राम-सीता ने अपने पूर्वज की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था।

 खैर, इस अवसर पर कुछ दूसरी बातें भी।

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मेरे किसान पिता ने पिता की जिम्मेदारी 

बेहतर ढंग से निभाई।

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 जब मैंने सन 1963 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक(साइंस) पास किया ,उस पर बाबू जी मुझसे बहुत खुश थे।तब इक्के-दुक्के छात्र ही प्रथम श्रेणी में पास होते थे।

  बाबू जी मुझे जूनियर इंजीनियर बनाना चाहते थे।कहते थे कि पांच साल इंजीनियरिंग पढ़ाने का हमें धैर्य और साधन नहीं है।

पर, मेरी लाइन ही अलग थी।मैं सामाजिक -राजनीतिक क्षेत्र में जाना चाहता था।इसलिए बाद में मुझसे मेरे पिता काफी निराश हुए।

फिर भी कहते थे कि ‘‘जो मन में आए,करो।पर कभी -कभी गांव आ जाया करो--मुझे देखने के लिए नहीं तो खुद को मुझे दिखाने के लिए।’’

उनकी इच्छा के अनुसार मेरे छोटे भाई नागेंद्र ने पटना विश्व विद्यालय के लाॅॅ कालेज से   

कानून की डिग्री ली।

बड़े भाई को मुजफ्फर पुर में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हेड मास्टर पृथ्वीनाथ त्रिपाठी (बी बी काॅलेजिएट स्कूल)के घर रखकर पढ़ाने की कोशिश की।

पर उनके लगातार अस्वस्थ रहने के कारण उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई।

त्रिपाठी जी बहुत ही अच्छे शिक्षक थे।बी.बी.काॅलेजिएट स्कूल के प्राचार्य थे।

मेरे ही गांव के थे।मेरे बाबू जी के देास्त थे।

  यानी अपनी संतान को शिक्षित बनाने की एक किसान की तीव्र इच्छा तो देखिए।

मेरे पिता ने अपनी जमीन बेच कर शिक्षा पर खर्च किया।आने वाले जमाने का उन्हें पूर्वानुमान था।

जमींदारी जा चुकी थी।समय बदल रहा था।

आजाद भारत में शिक्षा का महत्व बढ़ा रहा था।

बाबू जी लंबे-चैड़े कसरती शरीर के स्वामी थे।बातचीत में दबंग थे।

लघुत्तम जमींदार थे।एक बड़े जमींदार के तहसीलदार भी थे।

उनका जन्म 1898 और निधन 1986 में हुआ।

 मेरे जन्म के समय बाबू जी  22 बीघा जमीन के मालिक थे।

स्कूल में पढ़ने लगा तो देखा कि घर में दो नौकर

दो गाय,दो या तीन बैल ,एक भैंस रहते थे।

सघन आबादी वाले सारण जिले में इतनी जमीन-जायदाद  होने पर हमारे आसपास के गांवों के अन्य किसान संतुष्ट थे।

खेत बेच कर अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में उन लोगों ने सोचा भी नहीं।

उल्टे वे मेरे बाबू जी के इस काम को अदूरदर्शी मानते थे।

पर,अब जब कभी गांव जाता हूं तो देखता हूं कि हमारे बराबर जमीन के मालिक की  हम उम्र संतान  आज भी किसानी करती  है और अच्छी हालत में नहीं हैं।

 एक बार मेरे एक स्कूल सहपाठी गया राय (रामपुर जैंती)ने कहा कि तू लोग त पहले भी जमींदार थे और पढ़ाई -लिखाई के कारण अब भी जमींदार हो।

इस तुलनात्मक अध्ययन से लगता है कि मेरे बाबू जी कितने दूरदर्शी थे।

यदि वैसा नहीं होते तो हम भी आज गांव में किसानी ही कर रहे होते।

किसानी की हालत यह है कि हमारे सामूहिक परिवार का एक सदस्य यानी मेरा भतीजा जो गांव पर रहता है,वह सारी जमीन में खेती नहीं कर पाता।क्योंकि अधिक खेती यानी अधिक घाटा।

अब भी हमारे संयुक्त परिवार के पास बेच -बाच कर नौ-दस बीघा जमीन बची है।

पर जो हैं,सब पक्की सड़क पर है।हालांकि अब हमलोग बेच रहे हैं।अन्यत्र पूंजी निवेश कर रहे हैं।

  यानी बाबू जी की अन्य बातों के साथ -साथ शिक्षा के प्रति उनकी तीव्र लालसा की याद आती है।

इस कहानी का मेारल यह है कि अभिभावकों को चाहिए कि वे तकलीफ उठाकर भी अपने बच्चों को शिक्षित जरुर करें।

(पर देश -प्रदेश का दुर्भाग्य है कि शिक्षण-परीक्षण का स्तर बिलकुल नीचे गिर चुका है।)

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बाबू जी की याद में

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पंडित ओम व्यास ओम ने ठीक ही लिखा है कि 

‘पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।’

मुझे याद नहीं कि बाबू जी ने कभी हमें बचपन में एक थपड़ भी मारा हो।

दरअसल उनकी उपस्थिति मात्र से हम सब भाई अनुशासित रहते थे।

वैसी कद-काठी का शायद ही कोई व्यक्ति जवार में हो !

मेरे परमानंद मामा उनके बारे में कहते हैं कि मेरे बहनाई शेर हैं।परमा मामा मुम्बई में पुत्र के साथ रहते हैं।

  स्वाभाविक ही है कि मेरे पिता के जीवनकाल में तो हमें उनके महत्व का उतना पता नहीं चल सका।

पर, न रहने पर हम सोचते रहे कि शायद हम लोग उनसे परंपरागत विवेक को लेकर कुछ अधिक सीख सकते थे।

उनकी स्कूली शिक्षा तो नहीं थी,

किंतु वे रामायण पढ़ते थे,

कैथी लिखते थे।

जमींदारी की रसीद काटते थे।

गांव- जवार में पंचायती करने जाते थे।

हां,वे मुकदमे के सिलसिले में अक्सर पटना-छपरा 

जाते रहते थे।अच्छे किसान है तो मुकदमा तो रहेगा ही।

कहा करते थे कि पटना हाईकोर्ट भवन के आसपास पहले धान की खेती होती थी जिसेे उन्होंने देखा था।

विधायक काॅलोनी तो बाद में बनी।

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  ओम व्यास ओम की कविता के जरिए हमें पिता के पूरे महत्व का एहसास हुआ।

आपके साथ साझा कर रहा हूं।

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पिता

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पिता  जीवन है, संबल है, शक्ति है।

पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है।

पिता अंगुली पकड़े बच्चे का सहारा है।

पिता कभी खारा तो कभी मीठा है।

पिता पालन पोषण है,परिवार का अनुशासन है।

पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।

पिता रोटी है, कपड़ा है,मकान है।

पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है।

पिता अप्रदर्शित अनंत प्यार है।

पिता है तो बच्चों को इंतजार है।

पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं।

पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं।

पिता से प्रतिपल राग है।

पिता से ही मां की बिंदी और सुहाग है।

पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ति है।

पिता गृहस्थाश्रम में उच्च स्थिति की भक्ति है।

पिता अपनी इच्छाओं का हनन परिवार की पूत्र्ति है।

पिता रक्त में दिए हुए संस्कारों की मूत्र्ति है।

पिता एक जीवन को जीवन का दान है।

पिता दुनिया दिखाने का अहसास है।

पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हाथ है।

पिता नहीं तो बचपन अनाथ है।

पिता  से बड़ा अपना नाम करो।

पिता  का अपमान नहीं, अभिमान करो।

क्योंकि मां-बाप की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता।

ईश्वर भी इनके आशीषों को काट नहीं सकता।

दुनिया में किसी भी देवता का स्थान दूजा है।

मां-बाप की सबसे बड़ी पूजा है।

वो खुशनसीब होते हैं, मां-बाप जिनके साथ होते हैं।

       --  पंडित ओम व्यास ओम

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28 सितंबर 26

  



  



शनिवार, 26 सितंबर 2026

 इंदिरा जी से कुछ सीखिए राहुल जी

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सुरेंद्र किशोर

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आपातकाल में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने आर.एस.एस. और जमात ए इस्लामी दोनों पर एक साथ प्रतिबंध लगाया था।

यदि उन्होंने सिर्फ आर.एस.एस. पर प्रतिबंध लगाया होता तो वह सन 1980 में फिर से सत्ता में नहीं आ पातीं।

पर, राहुल गांधी ने इंदिरा गांधी से भी कुछ नहीं सीखा।राहुल के कुछ भी सीखने से इनकार करने का खामियाजा कांग्रेस भुगत रही है।

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 राहुल गांधी इस्लाम,इस्लामत्व या जेहाद के खिलाफ कभी कुछ नहीं बोलते।पर हिन्दुओं के बारे में लगातार कहते रहते हैं--‘‘जो लोग खुद को हिन्दू कहते हैं,वे 24 घंटे हिंसा,घृणा और असत्य की बात करते हैं।’’

    बाद में राहुल गांधी ने कहा कि मेरा बयान पूरे हिन्दू समाज के लिए नहीं बल्कि भाजपा और आरएसएस के लिए था।

  सन 2024 के लोक सभा चुनाव में 23 करोड़ 59 लाख लोगों ने भाजपा को वोट दिए थे।

क्या भारत के 23 करोड़ 59 लाख लोग 24 घंटे हिंसा,घृणा और असत्य की बात करते हैं ?

किसी देश में इतने अधिक लोग वैसे हो जाएं तो उस देश में एक मिनट के लिए भी 

शांति बनी रहेगी ?

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राहुल गांधी को यह समझाने वाला कोई व्यक्ति नहीं है कि देश की 70-80 प्रतिशत आबादी की भावना को ठेस पहुंचाते रहिएगा तो कभी लोक सभा में बहुमत नहीं पाइएगा --चाहे मुख्य चुनाव आयुक्त पद पर ज्ञानेश कुमार हों या एस.वाई.कुरैशी हों।

  1977 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने बिना इमरजेंसी हटाए ही लोक सभा चुनाव करवाया था-सिर्फ इमरजेंसी में ढील देकर।जार्ज फर्नांडिस ने तब कहा था कि हमें चुनाव का बहिष्कार करना चाहिए क्योंकि हमें इंदिरा चुनाव जीतने नहीं देगी।पर जेपी जन भावना समझ गये थे।उन्होंने जार्ज की बात को नजरअंदाज कर दिया।

सत्ता के पूरे तंत्र पर कब्जा रहने के बावजूद फिर भी इंदिरा 1977 में सत्ता से बाहर हो गईं।उनके द्वारा बहाल चुनाव आयुक्त भी उन्हें नहीं बचा सके।

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ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त रहते केरल विधान सभा चुनाव हाल में हुआ।

वहां मुस्लिम अतिवादियों की पसंद का मुख्य मंत्री बना है।वहां उनकी सरकार ने अपने एजेंडा पर काम करना शुरू कर दिया।राहुल जिसे मुख्य मंत्री बनवाना चाहते थे,नहीं बनवा सके।केरल से देश के लिए अपशकुन आने लगे हैं।

 भाजपा सरकार और ज्ञानेश कुमार के हाथ में केरल का रिजल्ट पलटना होता तो मोदी सरकार केरल में जेहादियों को ताकतवर बनने देती ?

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2014 के लोक सभा चुनाव के समय कांग्रेस की पसंद का ही तो चुनाव आयोग था।

फिर भी नरेंद्र मोदी की सरकार बन गई।

सोनिया गांधी ने हार के कारणों की जांच का भार ए.के.एंटोनी को दिया।

एंटोनी ने अन्य बातों के अलावा अपनी रिपोर्ट में यह साफ- साफ लिखा कि हम इसलिए हारे क्योंकि मतदाताओं को लगा कि कांग्रेस मुसलमानांे की तरफ झुकी हुई है।

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पहले तो झुकी हुई थी।राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस मुसलमानों वह भी अतिवादी मुसलमानों से सटी हुई है।

सबूत देख लीजिए --तेलांगना के मुख्य मंत्री ए.रेवंत रेड्डी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ‘‘कांग्रेस का मतलब मुसलमान और मुसलमान का मतलब कांग्रेस।’’

क्या भाजपा ने कभी ऐसा कहा ?

 मनमोहन सिंह जब प्रधान मंत्री थे तो उन्होंने कहा था कि ‘‘देश के सार्वजनिक संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है।’’

 नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य ने न तो मनमोहन सिंह के बयान का खंडन किया और न ही तेलांगना के सीएम के बयान का।यानी ‘‘मौनं स्वीकृतिः लक्षणम्’’ 

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राहुल गांधी सिर्फ भाजपा-संघ-हिन्दू-हिदुुत्व

की तीखी आलाचना करते रहते हैं,पर जमात ए इस्लामी से भी अधिक कट्टर इस्लामिक संगठनों से राहुल गांधी साठगांठ करते हैं और इन जेहादियों और उनकी हिंसा के खिलाफ एक शब्द नहीं बोलते।यह बात पूरा देश जानता है।

क्या राहुल गांधी ने कभी कहा कि हम इस्लाम के पक्ष में हैं,पर हम इस्लामवाद के खिलाफ हैं ं?

या हम राजनीतिक इस्लाम के खिलाफ हैं ?

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ऐसे में हिन्दू बहुल आबादी वाले इस देश में राहुल गांधी यह उम्मीद कैसे करते हंै कि उनकी पार्टी चुनाव जीत कर केंद्र की सत्ता प्राप्त कर लेगी ?

जहां -जहां मुसलमान जितवाने की स्थिति में हैं,वहां -वहां राहुल गांधी जीत ही रहे हैं।

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सिमी कभी जमात ए इस्लामी से जुड़ा हुआ छात्र संगठन था।

पर जब सिमी ने यह घोषणा कर दी कि हम हथियारों के बल पर भारत में इस्लामिक क्रांति करेंगे तो जमात ए इस्लामी ने सिमी से अपना संबंध तोड़ लिया।

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सिमी को कांग्रेस ने अपना लिया।

कैसे ?वह जानिए।

अटल बिहारी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने सिमी पर प्रतिबंध लगाया।सिमी ने कोर्ट में अपील की।सिमी के वकील थे सलमान खुर्शीद-कांग्रेस के प्रमुख नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री।

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बाद में प्रतिबंधित सिमी के लोगों तथा ऐसे अन्य अतिवादी इस्लामिक संगठनों ने मिलकर पी.एफ.आई.बनाया।पी.एफ.आई. ने कहा है कि हम 2047 तक हथियारों के बल पर भारत मंे इस्लामिक शासन कायम कर लेंगे।केरल उनका गढ़ है।

पी.एफ.आई. ने अपना राजनीतिक संगठन बनाया है--उसका नाम है-एस.डी.पी.आई.।कांग्रेस कर्नाटका में एस.डी.पी.आई.के साथ मिलकर चुनाव लड़ चुकी है।

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केरल में पी.एफ.आई.-एस.डी.पी.आई.-मुस्लिम लीग तथा इस तरह के इस्लामिक संगठनों का जोर है।उन्हीं संगठनों के बल पर पहले राहुल और बाद में प्रियंका केरल के एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र वायनाड से सांसद बने।केरल की कांग्रेस सरकार भी अतिवादी मुसलमानों के बल पर बनी है।ऐसे में कंाग्रेस, उन संगठनों व उनके कारनामों के खिलाफ एक शब्द का कभी उच्चारण कैसे कर सकती है ?

  उसके विपरीत राहुल दिन रात हिन्दुओं -हिन्दुत्व को भला -बुरा कहते रहते हैं।

दोनों में फर्क करने का नाटक करते हैं।क्या सूर्य और उसकी किरण अलग -अलग चीज है ?

क्या किरणों को सूर्य से अलग कर सकते हैं ?

यदि नहीं तो हिन्दुत्व को हिन्दुओं से अलग कैसे कर सकते हें ? 

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ऐसे में क्या राहुल गांधी ने भारत के बहुसंख्यक समाज को मूर्ख समझ रखा है कि वे कांग्रेस को केंद्र की सत्ता में पहंुचाएंगे ताकि वे हिन्दुत्व को समाप्त कर सकें ?

 यदि राहुल केंद्र की सत्ता में नहीं पहुंच रहे हैं तो राहुल चुनाव आयोग पर हमला कर रहे हैं।चुनाव आयोग से कोई शिकायत है तो उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाइए।पहले भी वहां जाकर लोग मुंह की खाए हैं।

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26 सितंबर 26


 अपनी सुरक्षा को लेकर इतिहास से 

नहीं सीख रहे हैं राहुल गांधी

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चेतावनी के बावजूद अपनी सुरक्षा के प्रति उनकी ही लापारवाही के कारण इंदिरा गांधी ,राजीव गांधी और महात्मा गांधी की जानें गई थीं।इतिहास से सबक लेना चाहिए था।

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सुरेंद्र किशोर

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महात्मा गांधी

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दिल्ली के बिड़ला भवन में महात्मा गांधी की प्रार्थना

सभा होती थी।

20 जनवरी 1948 को बिड़ला भवन के पास बम विस्फोट हुआ।

दिल्ली के पुलिस अधीक्षक महात्मा गांधी जी के पास गये।उनसे कहा कि प्रार्थना सभा में आ रहे लोगों की तलाशी लेने की अनुमति दीजिए।गांधी नहीं माने।फिर डी.आई.जी.गये।गांधी नहीं माने।गृह मंत्री सरदार पटेल ने जाकर गांधी जी को देर तक समझाया।गांधी ने कहा कि आगंतुकों की तलाशी जैसे ही शुरू कराओगे मैं अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ जाऊंगा।निराश पटेल लौट गए।

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नतीजा

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नाथू राम गोडसे को मौका मिल गया।

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कुपरिणाम

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चूंकि नाथूराम चितपावन ब्राह्मण था,इसलिए महाराष्ट्र के कई शहरों में गांधी समर्थकों ने अनेक चितपावनों की जानें ले ली और उनके घर उजाड़े।

केंद्र सरकार ने चितपावनों पर हुए भीषण अत्याचार की खबरों को भी छपने नहीं दिया।विदेशी अखबार में कुछ खबर छपी।

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   2

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इंदिरा गांधी

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‘ब्लू स्टार आॅपरेशन’ की पृष्ठभूमि में आम सिखों में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ भारी आक्रोश था।   

तब के राॅ के प्रधान आर.एन.काव ने ,(जो प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार थे) बेअंत सिंह के संदेहास्पद होने की ताकीद की थी।

  इसी आधार पर उसका तबादला प्रधान मंत्री आवास से हटा कर दिल्ली पुलिस की सशस्त्र इकाई में कर दिया गया था।

कहते हैं कि इंदिरा गांधी उसे बेहद पसंद करती थीं और सरदार जी कहकर पुकारती थीं।

 उनकी(यानी, प्रधान मंत्री की)दखल पर वह (बेअंत)वापस (प्रधान मंत्री की सुरक्षा में )लौट आया।

 31 अक्तूबर 1984 की सुबह प्रधान मंत्री पर सबसे पहले उसी ने (यानी बेअंत ने )गोली चलाई।

 केहर और सतवंत ने उसका साथ दिया।

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खुद इंदिरा गांधी की लापरवाही का नतीजा हजारों बेगुनाह सिखों को भुगतना पड़ा।सिख मारे जा रहे थे और राष्ट्रपति जैल सिंह और संपादक खुशवंत सिंह का फोन न तो प्रधान मंत्री राजीव गांधी उठा रहे थे और न ही गृह मंत्री नरसिंह राव।ये दोनों अपने रिश्तेदारों की जान बचाने की गुहार सरकार से करना चाहते थे।जबकि खुशवंत सिंह को इंदिरा गांधी परिवार का ‘‘खुशामद सिंह’’कहा जाता था।खुद खुशवंत ंिसह ने लिखा है कि मुझे संजय गांधी ने हिन्दुस्तान टाइम्स का संपादक बनवाया था।(आज के खुशामदी लोगो, याद रख लो।समय आने पर, जरूरी नहीं है कि वह आपके काम आएगा ही ,जिसकी आप खुशामद कर रहे हैं।)

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   3

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राजीव गांधी

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दरअसल जब ‘मानव बम’ धनु राजीव गांधी की ओर बढ़ रही थी तो महिला सुरक्षाकर्मी(दारोगा ) अनुसूया डेजी आर्नेस्ट ने उसे आगे बढ़ने से दो बार रोका।

राजीव गंाधी यह सब दूर से देख रहे थे।उन्होंने उस महिला सुरक्षाकर्मी से कहा कि आप उसे आने दीजिए।

फिर जो कुछ हुआ,वह इतिहास है।

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  4

और अब 

राहुल गांधी

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लापरवाही जारी

इतिहास से कोई सबक नहीं।

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गत साल केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के सुरक्षा प्रमुख ने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर कहा है कि राहुल गांधी सुरक्षा मानकों को लगातार तोड़ रहे हैं।

सितंबर, 2025 में सुरक्षा अधिकारी ने लिखा कि राहुल गांधी ने नौ माह में नौ विदेश यात्राएं कीं।पर किसी भी यात्रा के संबंध में सुरक्षा अधिकारी को जानकारी नहीं दी गई।

  2017 में तब के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में कहा था कि राहुल गांधी अब तक 121 बार सुरक्षा नियमों का उलंघन कर चुके हैं।

वे अपनी विदेश यात्राओं में भी सुरक्षाकर्मी को नहीं ले जाते।

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ऐसी लापारवाही का नतीजा क्या होगा ?

पता नहीं क्या होगा ?!

हालांकि हम तो चाहेंगे कि कुछ गलत न हो।

 





गुरुवार, 24 सितंबर 2026

   भोला पासवान शा़स्त्री के जन्म दिन पर

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(21 सितंबर, 1914--10 सितंबर ,1984)

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स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व मुख्य मंत्री भोला पासवान शास्त्री से 

सन 1967 में मेरी संक्षिप्त किंतु दिलचस्प मुलाकात

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1967 की बात है।

तब मैं संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का कार्यकर्ता था।मैं छपरा में सक्रिय था।

उस दल के नेता अम्बिका प्रसाद सिंह ‘दादा’ के साथ पटना आया था।आदरणीय अम्बिका दादा सारण जिले के मूल निवासी थे।

तब के उप मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर से मिलने के बाद ‘दादा’ भोला पासवान शास्त्री से मिलने उनके सरकारी आवास पर गये।मैं भी उनके साथ था।शास्त्री जी तब कोढ़ा से कांग्रेसी विधायक थे।

 अम्बिका दादा ने शास्त्री जी से मेरा परिचय कुछ इस तरह  कराया--‘‘ये हैं सुरेंद्र अकेला।हमारे दल के अच्छे कार्यकर्ता हैं।’’

  शास्त्री जी ने छूटते ही कहा--‘‘एक अकेला (महावीर प्रसाद अकेला)तो सत्येंद्र बाबू (सत्येंद्र नारायण सिन्हा )के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं।आप किसके खिलाफ लड़िएगा ?’’(याद रहे कि महावीर प्रसाद अकेला सी.पी.आई.के नेता थे।)

  मैंने कहा--इस संबंध में तो अभी कुछ सोचा नहीं है।

 हम तीनों के बीच कुछ देर तक बातें हुईं।उस बीच शास्त्री जी का नौकर हमारे लिए चाय लेकर आया।उसके बाद हम वहां से निकल गये।

उन दिनों रिक्शे से ही हम चलते थे।

रिक्शे पर मैंने अम्बिका दादा से पूछा--क्या शास्त्री जी के साथ उनका परिवार नहीं रहता ?

दादा ने कहा कि पहले पत्नी ने शास्त्री जी को छोड़ा।बाद में शास्त्री जी ने पत्नी को छोड दिय़़ा।

(दरअसल अम्बिका दादा आजादी की लड़ाई में पूर्णिया इलाके मंे ही अधिक सक्रिय रहते थे।इसलिए शास्त्री जी सहित वहां के सारे प्रमुख नेताओं को अच्छी तरह जानते थे।उनसे घुले-मिले हुए थे।)

 मैंने जब कारण पूछा तो अम्बिका दादा ने बताया--शास्त्री जी की शिक्षा-दीक्षा काशी विद्यापीठ में हुई थी।

उनकी शादी अच्छे परिवार मंे हुई।चूंकि शास्त्री जी अक्सर जेल

में ही रहते थे,इसलिए उनकी पत्नी मायके में जाकर रहने लगीं।बुलाने पर भी नर्हीं आइं।

  जब आजादी हुई तो शा़स्त्री जी के पास पत्नी आना चाहती थीं।पर शास्त्री जी ने कहा कि जब मेरे संकट की घड़ी में उसने मेरा साथ नहीं दिया तो मैं अब उसे नहीं बुलाऊंगा।नहीं बुलाया--दादा ने बताया।

 अम्बिका दादा की बात पर अविश्वास करने का मेरे पास कोई कारण नहीं था।

  ऐसी बातों की तब आम नेता लोग चर्चा भी नहीं करते थे जिस तरह आज होती है।तब राजनीति का स्तर आज की तरह गिरा हुआ नहीं था।न तो शास्त्री जी ने अपना जातीय वोट बैंक बनाने की कोशिश की और न ही राजनीति को पैसा कमाने का जरिया बनाया।

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शास्त्री जी तीन बार बिहार के मुख्य मंत्री रहे--1968, 1969 और 1971 में। 

वे इंदिरा गांधी सरकार में मंत्री भी रहे।सन 1978 में भोला पासवान शास्त्री राज्य सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे। तब केंद्र में मोरारजी देसाई की सरकार थी।

शास्त्री जी कभी विवादों में नहीं रहे।

 साफ-सुथरी छवि के नेता थे।

पक्ष-विपक्ष के नेता लोग भी उनका बड़ा सम्मान करते थे।

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  21 सितंबर 26

   

 

 


बुधवार, 23 सितंबर 2026

 समर शेष है,नहीं पाप का भागी केवल व्याध,

जो तटस्थ हंै,समय लिखेगा उनके भी अपराध।

  ---राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर

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आज भारत की जो स्थिति है,उसमें दिनकर की 

उपर्युक्त रचना सर्वाधिक मौजूं है।

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मुहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चैहान के बीच जयचंद तटस्थ रह गया था।मानसिंह तो अकबर का एक सेनापति बन कर महाराणा प्रताप से लड़ रहा था।

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पर,एक खास अर्थ में जयचंद का नाम आज भी अधिक ही लिया जाता है,मानसिंह का यदाकदा ही।जयचंद संज्ञा नहीं बल्कि विशेषण बन गया है।

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आज भी सनातन को समाप्त करने के लिए बाहर-भीतर की शक्तियां पूरी ताकत से लड़ रही हैं।दूसरी ओर, सनातन की रक्षा करने वाली शक्तियां बचाव के सारे उपाय कर रही हैं।

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पर,इस बीच भारत के अनेक लोग तटस्थ हैं।उन तटस्थों को पहचानने में आपको कोई दिक्कत नहीं होगी।

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आने वाली पीढ़ियां आज के तटस्थों को किस श्रेणी में रखेगी ??

पूर्व अनुमान लगा लेना कठिन नहीं है।

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सुरेंद्र किशोर--23 सितंबर 26


रविवार, 20 सितंबर 2026

 ‘‘सत्ता के सिरहाने धूनी रमाने वाले पत्रकार’’

राम बहादुर राय पर तैयार पुस्तक का 

लोकार्पण 25 सितंबर, 26 को दिल्ली में होगा।

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सुरेंद्र किशोर

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देश के प्रमुख पत्रकार व लेखक राम बहादुर राय अस्सी के हो गये।

दिल्ली राजनीति की माया नगरी है।पत्रकारिता की भी।

 उस नगरी में लगातार दशकों तक रह कर भी राय साहब बहुसंख्य लोगों के सम्मान के पात्र अब भी बने हुए हैं।यह विरल है।

 ‘‘अस्सी के राय साहब’’ नामक पुस्तक (प्रभात प्रकाशन)का लोकार्पण 25 सितंबर, 2026 को दिल्ली के डा.आम्बेडकर इंटरनेशनल आॅडिटोरियम में शाम चार बजे होगा।

  वैसे तो पुस्तक में राय साहब पर सौ से अधिक लेख हैं, पर नामी पत्रकार कुमार आनन्द के लेख का शीर्षक ‘‘सत्ता के सिरहाने धूनी रमाने वाला योगी’’राय साहब के व्यक्तित्व को पूरी तरह प्रतिबिंबित करता है।

 पुस्तक में राय साहब पर मेरा भी एक लेख है।

सारे लेख पठनीय हैं--प्रेरणादायक हैं।

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19 सितंबर 26

  


मंगलवार, 15 सितंबर 2026

 सामान्य नागरिक संहिता 

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बताशे के लिए मंदिर तोड़ने की कोशिश जारी

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मुगल काल की पुनरावृति को रोकने की 

चेष्टा  है समान नागरिक संहिता यानी यू.सी.सी.

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सुरेंद्र किशोर

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 21 प्रदेशों में यू.सी.सी.लागू करके औरंगजेब शैली की मुगल सत्ता की यहां पुनरावृति को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।

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दरअसल मुगल काल की वापसी की आशंका को रोकने के लिए भारत में

यथाशीघ्र सामान्य नागरिक संहिता लागू करना अत्यंत अनिवार्य हो गया है।पर, मुझे नहीं मालूम कि आज महाराणा प्रताप-छत्रपति शिवाजी अंततः मजबूत पडं़ेगे या मान सिंह--जयचंद !

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 वोट लोलुप नेता इस बात को नजरअंदाज कर रहे हैं कि भारतीय  संविधान के अनुच्छेद-44 में सामान्य नागरिक संहिता का प्रावधान है।इस संविधान को संघियों-भाजपाइयों ने नहीं बनाया है,बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों ने बनाया है जिनमें कांगे्रेसियों का बहुमत था।क्या वे भी साम्प्रदायिक थे ?

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पर,आज के जो वोट लोलुप तथाकथित सेक्युलर नेता यू.सी.सी.का विरोध कर रहे हैं, वे दरअसल बताशे के लिए मंदिर तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, वे जाने-अनजाने जेहादियों की मनोकामना पूरी करने में मददगार बन रहे हैं।

ऐसे में आम गैर मुस्लिम जनता को यह चुनना है कि वे महाराणा प्रताप -छत्रपति शिवाजी बनेंगे या मान सिंह-जयचंद का अनुसरण करेंगे ?

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डा.जाकिर नाइक कहते हैं कि भारत में अब हिन्दुओं की आबादी सिर्फ 60 प्रतिशत रह गई है।(विश्वास न हो तो यूट्यूब खोल कर देख लीजिए।)

डा.नाइक ने एक बार कहा था कि हम केरल से ‘‘अपना काम’’ शुरू करेंगे।केरलम में आज वही सब हो रहा है।केरलम से आ रही खबरों पर खुले दिमाग से गौर करिए।

डा.नाइक मलेशिया में है।(बोफोर्स दलाल क्वोत्रोचि भी भाग कर मलेशिया ही गया था।)

यह संयोग नहीं कि राहुल-प्रियंका मलेशिया के प्रधान मंत्री से दिल्ली में मिले।

   मौलाना रशीदी कहते हैं कि मुसलमानों की आबादी भारत में अब 40 प्रतिशत हो चुकी है।

 सरकारी आंकड़ा बताता है कि भारत में हिन्दुओं की जनसंख्या की वृद्धि दर 16 दशमलव 8 प्रतिशत है जबकि मुसलमानों की आबादी की वृद्धि दर 24 दशमलव 6 प्रतिशत।(क्योंकि मुसलमानों को चार वीबियों और अनगिनत बच्चों की इस देश में छूट मिली हुई है।जबकि हिन्दू सिर्फ एक ही शादी कर सकते हैं।)

यह इसलिए संभव है क्योंकि मुसलमानों के लिए अलग कानून हैं।(ब्रिटेन सहित यूरोप के कई देश भी ऐसी ही समस्या से जूझ रहे हैं।)

जेहादी लोग अब जल्दीबाजी में हैं।वे भारत सहित पूरी दुनिया पर कब्जा चाहते हैं।

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आबादी बढ़ाने के अलावा,लव जेहाद,जबरन या लोभ देकर धर्म परिवर्तन या हिन्दू बच्चों के अपहरण व घुसपैठ की घटनाओं की खबरें आती रहती हैं।

उसके साथ ही भारत में प्रतिबंधित जेहादी संगठन पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया ने घोषणा कर रखी है कि वह सन 2047 तक हथियारों के बल पर भारत को मुस्लिम देश बना देगा।इसके लिए वह हथियार जुटा रहा है।

पी.एफ.आई.के राजनीतिक संगठन एस.डी.पी.आई.से कांग्रेस का ठोस

गठबंधन है।इनकी बनवाई हुई केरलम में मिलीजुली सरकार है।

हाल में केरलम से एक वीडियो आया है जिसमें जेहादी मुस्लिमों की भीड़ नारा लगा रही है--हिन्दुओं को मार कर मंदिरों के पास टांग देंगे।

उधर ब्रिटेन में सड़कों पर निकल मुस्लिमों की भीड़ नारा लगाती  है--‘‘ईसाइयों,ब्रिटेन छोड़ो।’’घर तर के बड़ तर, आउर बड़ तर के घर तर ? 

केरलम सहित भारत के जिन- जिन हिस्सों में मुस्लिमों की आबादी बढ़ रही है,वहां से गैर मुसलमानों को या तो भगाया जा रहा है या उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है।या हत्या कर दी जा रही है।

असदुद्दीन कहते हैं--जब मोदी पहाड़ पर चले जाएंगे,योगी मठ में चले जाएंगे तो तुम्हें (यानी हिन्दुओं को )कौन बचाएगा ?

उनका छोटा भाई कह चुका है--15 मिनट के लिए पुलिस हटा लो तो दिखा देंगे कि तुम कितने हो और हम कितने हैं। 

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ऐसे में मोदी सरकार और उसके गृह मंत्री अमित शाह गैर मुसलमानों के खास कर हिन्दुओं के रक्षक के रूप में सामने आए हैं।मोदी-शाह को मालूम है कि 

‘‘अब नहीं तो कभी नहीं।बाद में काफी देर हो चुकी होगी !!’’

यू.सी.सी.लागू करने में देर करने पर भारत में देर-सबेर वैसा ही शासन कायम हो जाएगा जैसा पाक और बांग्ला देश में है।तब वे भी नहीं बचेंगे जो आज जयचंद और मान सिंह की भूमिका में हैं।पाक में न तो जोगेंद्र मंडल रह सके थे न मशहूर कम्युनिस्ट सज्जाद जहीर।जोगेंद्र मंडल ने पूर्वी पाकिस्तान से जिन दलितों को भारत आने से रोक लिया था,उन्हें पहले पाक व बाद में बंाग्ला देश के जेहादियों ने जबरन धर्म परिवर्तन करा कर या मार -मार कर समाप्त कर दिया।जोगेंद्र मंडल और सज्जाद जहीर भी जान बचा कर पाक से भारत आ गये थे।

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पाकिस्तान में सन 1947 में हिन्दुओं की जनसंख्या 14 प्रतिशत थी जो अब 1 दशमलव 61 प्रतिशत है।

1947 में बांग्ला देश में हिन्दुओं की जनसंख्या 28 प्रतिशत थी जो आज 7 दशमलव 9 प्रतिशत रह गई है।

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यदि भारत में कांग्रेस नीत सरकार फिर से आ गई तो इस देश को पाकिस्तान बनने से कोई रोक नहीं सकता।

भुट्टो का नारा था--हम भारत को हजार घाव देंगे।

1947 में जिन्ना वादियों का नारा था-‘‘हंस के लिया पाकिस्तान,लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान।’’

3 करोड़ मुसलमानों को बंटवारे के समय भारत में ही रोक कर नेहरू ने एक और पाक बनाने का रास्ता साफ कर दिया था।

संघ प्रमुख मोहन भागवत को बयान आया है--‘‘यू.जी.सी.सिर्फ प्रस्ताव है,न कानून बना, न बनेगा।’’

पर,यू.जी.सी.के विरोध के नाम पर बांकी पुर विधान सभा के लोगों ने एक सी.ए.ए.-एन.आर.आर.विरोधी प्रशांत किशोर को चुनाव जितवा दिया।

  क्या आप समझते हैं कि सी.ए.ए.-एन.आर.सी.विरोध का निहितार्थ क्या है ?

निहितार्थ बहुत खतरनाक है।

यह पी.एफ.आई.एजेंडा था शाहीन बाग धरने (2019)में परिलक्षित हुआ।वहां दंगा करवाया गया--53 लोगों की जान गई थीं।

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भारत के कई बड़े- बड़े सेक्युलर नेताओं ने भारत को लूट कर विदेशों में घर-दुकान-माॅल आदि खरीद लिये हैं।वे वहां जाकर बस जाएंगे।पर आम गैर मुस्लिम आबादी खासकर हिन्दुओं का क्या हाल होगा ?

आज बंटोगे तो कल कटोगे !!!कहीं भागने की जगह भी नहीं मिलेगी।

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     15 सितंबर 26