शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

    एक वो भी जमाना था !!

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  सुरेंद्र किशोर उर्फ सुरेंद्र अकेला

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 मैंने पटना से प्रकाशित ‘जनता’ साप्ताहिक में संपादक के नाम एक पत्र (11 नवंबर, 1973) लिखा था।

उसमें इस बात की शिकायत की गई थी कि डाक से भेजी जाने वाली पत्रिकाओं को ग्राहकों तक पहुंचाने के बदले कुछ डाक कर्मी उन्हें अपने घर ले जाते हैं।

उनमें से कुछ पढ़ने के लिए ले जाते हैं तो कुछ अन्य उसे चूल्हे में झोंकने के लिए।

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तब का शासन तंत्र अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील था।

 उस पत्र के जवाब में बिहार अंचल के महा डाकपाल ने जनता साप्तहिक को ,जहां मैं सहायक संपादक के रूप में कार्यरत था,एक पत्र लिखा।

लिखा कि ‘‘मैं आपकी शिकायतों की पूरी छानबीन कर रहा हूं और शीघ्र दुबारा आपको सूचित करूंगा।’’

(दोनों की स्कैन काॅपी यहां पेश है।)

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सन 1976 में मेरी पत्नी की सरकारी स्कूल में सहायक शिक्षिका के रूप में बहाली हुई थी।

सारण के डी.एस.ई.आॅफिस ने उसकी ऐसी जगह एक सुदूर गांव में पोस्टिंग कर दी जहां दो नदियों को पार कर जाना पड़ता था।

   मैंने इस सबंध में दैनिक ‘सर्चलाइट’ में संपादक के नाम पत्र लिखा।वह छपा भी।ं

पटना सचिवालय ने उस पत्र की कटिंग के आधार पर फाइल खोली।

नतीजतन मेरी पत्नी का मेरे गांव के नजदीक के स्कूल में स्थानांतरण हो गया।

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1977 में जब कर्पूरी ठाकुर मुख्य मंत्री बने तो उन्होंने अपने अफसरों को निदेश दिया कि वे अखबारों में छप रहे संपादक के नाम पत्र जरूर पढें़,उनमें लिखी गई समस्याओं पर ध्यान दें।समुचित कार्रवाई करें।

इस क्रम में कर्पूरी जी ने दैनिक ‘जनशक्ति’ का खास तौर पर जिक्र किया था।

‘जनशक्ति’ सी.पी.आई. से जुड़ा अखबार था।

सी.पी.आई.उन दिनों जनता सरकार की कट्टर विरोधी थी।

जनशक्ति में उसकी झलक साफ दिखाई पड़ती थी।

याद रहे कि कर्पूरी जी ‘‘निंदक नियरे राखिए’’ वाला सिद्धांत मानते थे। 

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यह सब मैंने क्यों लिखा ?

अब इसे आप ही समझिए और गुणिए ।

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25 नवंबर 22

  

 


गुरुवार, 24 नवंबर 2022

  जिस देश में ऐसे -ऐसे नेता सत्ता में ,

 उस देश में लोकतंत्र का भविष्य कैसा ?

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    सुरेंद्र किशोर

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  ममता बनर्जी ने बंगलादेशी घुसपैठिया समर्थक वाम मोरचा सरकार का विरोध करके पश्चिम बंगाल में सन 2011 में सत्ता में आईं ।

  सत्ता में आने के बाद अब मुख्य मंत्री ममता बनर्जी उन घुसपैठियों को शरणार्थी बता रही हैं।

ममता उनसे कह रही है कि वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वा लो अन्यथा केंद्र सरकार तुम्हें डिटेंशन कैंप में भेज देगी।

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  4 अगस्त, 2005 को ममता बनर्जी ने लोक सभा के स्पीकर के टेबल पर कागज का पुलिंदा फेंका।

उसमें अवैध बंगला देशी घुसपैठियों को (पश्चिम बंगाल के वाम मोरचा सरकार द्वारा) मतदाता बनाए जाने के सबूत थे।

उनके नाम गैरकानूनी तरीके से मतदाता सूची में शामिल करा दिए गए थे।जबकि उनके नाम बांग्ला देश के वोटर लिस्ट में भी थे।

तब ममता ने सदन में कहा कि घुसपैठ की समस्या राज्य में महा विपत्ति बन चुकी है।

इन घुसपैठियों के वोट का लाभ वाम मोर्चा उठा रहा है।

ममता ने उस पर सदन में चर्चा की मांग की।

चर्चा की अनुमति न मिलने पर ममता ने सदन की सदस्यता

 से इस्तीफा भी दे दिया था।

 चूंकि एक प्रारूप में विधिवत तरीके से इस्तीफा तैयार नहीं था,

इसलिए उसे मंजूर नहीं किया गया।

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अब वही बंगलादेशी घुसपैठिए ममता के विपत्ति के बदले वरदान बन चुके हैं।उनकी चुनावी जीत का मूलाधार वही हैं।

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इधर लगता है कि केंद्र सरकार घुसपैठियों के खिलाफ कोई अभियान चलाने वाली है। एक पूर्व अफसर को 

पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाए जाने से यह संकेत मिल रहा है।संभव है कि ममता जी को अलग से इस संबंध में कोई

खास सूचना मिली हो।

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दूसरा दृश्य

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कांग्रेसी भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के नेतृत्व में आदोलन चला कर उससे मिली लोकप्रियता के कारण आम आदमी पार्टी सत्ता में आईं।

अब वही पार्टी तिहाड़ जेल में कैद अपने मंत्री सत्येंद्र जैन से इस्तीफा तक नहीं ले रही है।जबकि, जैन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं।

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   जिस देश में ऐसे -ऐसे नेता सत्ता में आ -आकर देश का कचरा करते रहते हैं,उस देश में लोकतंत्र कितने दिनों को मेहमान है ?

‘आप’ और टी.एम.सी.के अलावा भी ऐसे उदाहरण आपको इस अभागे देश में मिल जाएंगे।


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24 नवंबर 22  


 


सोमवार, 21 नवंबर 2022

   एक नयी वैचारिक पहल 

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सुरेंद्र किशोर

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मौजूदा संरचनात्मक स्वरूप को बनाए रखते हुए

क्यों न राज्य सभा के सदस्यों का कार्यकाल 

छह साल से घटा कर पांच साल कर दिया जाए ?

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क्यों न दोनों सदनों का कार्यकाल एक साथ 

शुरू हो और एक ही साथ अंत भी हो जाए ?

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क्यों न राज्य सभा का कार्यकाल भी लोक सभा की तरह ही पांच साल का कर देने के प्रस्ताव पर विचार किया जाए ? 

दोनों सदनों का गठन भी एक ही साथ हो।

राज्य सभा के ‘‘स्थायी स्वरूप’’ को क्यों न समाप्त कर दिया जाए ?

हां, राज्य सभा के मौजूदा संरचनात्मक स्वरूप को 

बनाए रखा जाना चाहिए।

ताकि, जिन लोगों का प्रतिनिधित्व लोक सभा में नहीं हो पाता,उनका प्रतिनिधित्व राज्य सभा के जरिए संसद में हो सके।और बेहतर तरीके से हो।

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ऐसा मैं क्यों कह रहा हूं ?

कई जानकार लोगों की राय है कि ‘‘देश की एकता-अखंडता को बनाए रखने के लिए ऐसा करना जरूरी हो गया है।

इन दिनों इस देश के कुछ राज्यों में ऐसे राष्ट्र विरोधी तत्वों को पनपने और उन्हें मजबूत होने का अवसर मिल रहा है,जिन पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो 

देश पर देर-सबेर बड़ा संकट आ सकता है।’’

 जाहिर है कि उन पर काबू पाने के लिए कुछ राज्य सरकारों को भंग कर वहां राष्ट्रपति शासन लागू करना जरूरी है।क्योंकि राज्यों के पास उतने साधन नहीं हैं जिनसे वे उन तत्वों से निपट सकें।

पर, चूंकि सत्ताधारी दल को राज्य सभा में बहुमत नहीं है,इसलिए राष्ट्रपति शासन संभव नहीं हो पा रहा है।

याद रहे कि राष्ट्रपति शासन की दोनों सदनों से पुष्टि जरूरी होती है।

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आजादी के बाद इस देश में 115 बार विभिन्न राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा चुका है।

पर आज सख्त जरूरत रहने के बावजूद नरेंद्र मोदी सरकार किसी तत्संबंधित राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू नहीं कर पा रही है।

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लोक सभा और राज्य सभा का गठन यदि एक साथ हो तो दोनों सदनों में सत्ताधारी दल का बहुमत संभव है।

पर,दोनों सदनों में बहुमत के अभाव में सत्ताधारी दल न तो अपने चुनाव घोषणा पत्र को पूरी तरह लागू कर पाता है और न ही आपाद स्थिति में देश की सुरक्षा के लिए कोई कड़ा कदम उठा सकता है।

यदि राज्य सभा का कार्यकाल बदल जाए तो आज उसका लाभ भाजपा को होगा।

 कल उसका लाभ सत्ता में आने वाला कोई गैर भाजपा दल उठा सकता है।

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  संविधान निर्माताओं ने जब राज्य सभा की रचना की तो यह सोच कर उसका ऐसा स्वरूप बनाया ताकि वह लोक सभा से अलग तरह की विशिष्टता लिए हुए हो।

  पर, समय के साथ जब अधिकतर मामलों में,यहां तक कि हंगामा करने के मामले में भी,दोनों सदनों का चरित्र एक ही जैसा हो गया है तो फिर उसका यानी राज्य सभा का कार्यकाल अलग क्यों रहे ?

संविधान के अनुच्छेद-80 के अनुसार ‘‘राज्य सभा राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करेगी।’’

साथ ही, विशेष ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव रखने वालों को राष्ट्रपति मनोनीत करेंगे।

  क्या अपवादों को छोड़कर इन दोनांे प्रावधानों का पालन आज हो रहा है ?

 पहले राज्य सभा को लोग एक शालीन और विद्वान सदन के रूप में जानते-पहचानते  थे।

लोक सभा के सदस्य जनता से सीधे चुने हुए थे,इसलिए कोई जरूरी नहीं कि वे विद्वान भी हों।

क्या इस मामले में आज दोनों सदनों में कोई अंतर रह

 गया है ?

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दूसरी ओर, जो दिक्कतें आ रही हैं,उनकी कल्पना संविधान निर्माताओं को नहीं थी।

तब संभवतः यह माना जा रहा था कि एक ही दल या दल समूह का दोनों सदनों में लगातार बहुमत रहता रहेगा।

 कुछ दशकों तक ऐसा हुआ भी।

 पर,समय बीतने के साथ कई बार ऐसा हुआ कि लोक सभा में बहुमत हासिल कर लेने के बावजूद सरकार देशहित के  अपने महत्वपूर्ण नीतियों -कार्यक्रमों को लागू नहीं कर सकी।

क्योंकि राज्य सभा में उसका बहुमत नहीं था।

  लोक सभा चुनाव में भारी बहुमत से आम जनता से मिले  जनादेश के बावजूद कई बार राजनीतिक दल बहुत से अच्छे काम नहीं कर पाते।

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एक अन्य तरह की समस्या भी

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सन 1977 के बाद कई बार ऐसा हुआ कि सरकार के बदल जाने के बावजूद राज्य सभा के उप सभापति के पद पर वही व्यक्ति बने रह गए जो पिछली सरकार के कार्यकाल में चुने गए थे।

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राम निवास मिर्धा मार्च, 1977 से 1980 तक राज्य सभा के उप सभापति थे।

उप सभापति बनने से पहले वे कांग्रेस में थे।

मार्च, 1977 में मोरारजी देसाई की गैर कांग्रेसी सरकार बन गई।

किंतु कांग्रेस ने मिर्धा को उस पद पर बने रहने दिया।

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कांग्रेस की नजमा हेपतुल्ला 1988 में उप सभापति बनीं।

वह सन 2004 तक उस पद पर रहीं।

उस बीच लंबे समय तक अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी।

कांग्रेस ने नजमा से इस्तीफा नहीं दिलवाया।

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कांग्रेस के पी.जे.कुरियन सन 2012 से सन 2018 तक उप सभापति रहे।

कांग्रेस ने उनसे इस्तीफा नहीं मागा।

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

जदयू के हरिवंश नारायण सिंह सन 2018 में उप सभापति बने।

अब भी उस पद पर है।

इस बीच जदयू ने भाजपा से संबंध तोड़ लिया।

  किंतु 17 अगस्त, 2022 को जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह ने अपने प्रेस बयान में कहा कि हरिवंश नारायण सिंह को उप सभापति पद छोड़ने की जरूरत नहीं है।

हरिवंश जी के बारे में जदयू में ताजा सोच-विचार क्या है,यह मुझे नहीं मालूम।

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रामनिवास मिर्धा,नजमा हेपतुल्ला,पी.जे.कुरियन और हरिवंश नारायण सिंह शालीन व्यक्तित्व के धनी रहे हैं।

इन्हें किसी अन्य दल की सरकार के कार्यकाल में भी उप सभापति बने रहने में कोई दिक्कत नहीं हुई।

किंतु संबधित दलों के सारे नेता और कार्यकर्ता एक ही तरह से तो नहीं सोच सकते।

 कुछ दलीय नेताओं के लिए यह असहज स्थिति हो सकती है।

यदि राज्य सभा का कार्यकाल पांच साल का हो जाए तो ऐसी असहजता की नौबत भी नहीं आएगी।

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मेरे फेसबुक वाॅल से 

20 नवंबर 22


 


  नेहरू के चुनाव क्षेत्र फूलपुर से 1967 के बाद 

  उस परिवार से किसी ने चुनाव नहीं लड़ा

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सुरेंद्र किशोर

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  उत्तर प्रदेश के फूल पुर लोक सभा चुनाव क्षेत्र से प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लगातार तीन बार चुनाव जीता था।

सन 1964 में उनके निधन के बाद उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित दो बार वहां से सांसद चुनी गईं।

प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मतभेद के कारण विजयलक्ष्मी पंडित ने अपने कार्यकाल के बीच में ही यानी 1969 में लोक सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।

  उसके बाद हुए उप चुनाव में उस नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य ने वहां से चुनाव नहीं लड़ा।

 प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव जीतती रहीं।

वह उनके पति फिरोज गांधी का चुनाव क्षेत्र था।

संजय गांधी अमेठी से सांसद बने थे।

  फूलपुर लोक सभा क्षेत्र कई मामलों में विशेष रहा ।

 उस क्षेत्र में उप चुनावों को मिलाकर कुल 20 बार अब तक चुनाव हो चुके हैं।

पर वहां से सिर्फ सात बार ही कांग्रेस विजयी हो सकी।

अंतिम बार 1984 में कांग्रेस से रामपूजन पटेल चुने गए थे।

मौजूदा लोक सभा में वहां से भाजपा के केशव देवी पटेल  सदस्य हैं।

  इस क्षेत्र में सन 1962 में जवाहर लाल नेहरू का दिलचस्प चुनावी मुकाबला डा.राम मनोहर लोहिया से  हुआ था।सन 1977 में यहां से हेमवती नंदन बहुगुणा की पत्नी कमला बहुगुणा जनता पार्टी की सांसद बनी थीं।

 उससे पहले सन 1969 में हुए उप चुनाव में संसोपा के जनेश्वर मिश्र ने कांग्रेस के दिग्गज नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री के.डी.मालवीय को हराया था।

इतने महत्वपूर्ण व चर्चित क्षेत्र से सन 2004 में सपा ने अपने वोट बैंक के बूते विवादास्पद बाहुबली अतीक अहमद को सांसद बनवा दिया था।

 फूल पुर लोक सभा क्षेत्र के भीतर पांच विधान सभा क्षेत्र पड़ते हैं।इनमें इलाहाबाद शहर के दो विधान सभा क्षेत्र भी शामिल हैं।

  सन 1962 में डा.लोहिया यहां से नेहरू के खिलाफ समाजवादी युवक रजनी कांत वर्मा को उम्मीदवार बनाना चाहते थे।

पर समाजवादी नेताओं, कार्यकत्र्ताओं  और जनता के एक हिस्से की  मांग के कारण बाद में लोहिया खुद ही वहां से उम्मीदवार बन गए।

  इस चुनावी संघर्ष का काफी प्रचार विदेशी मीडिया में भी हुआ था।

नेहरू को हराना तो अकल्पनीय बात थी।पर डा.लोहिया को  पांच में से दो विधान सभा क्षेत्रों में नेहरू से अधिक मत मिले थे।नेहरू को एक लाख 18 हजार और लोहिया को 54360 वोट मिले।

 बाद में डा.लोहिया ने कहा था कि नेहरू को मैं हरा तो नहीं सका ,पर यथास्थितिवाद की चट्टान में मैंने दरार जरुर डाल दी।उन्होंने यह भी कहा था कि मुझे पराजय का दुःख है,पर इस बात की खुशी है कि भारतीय जनता में जीवन है और वह अंधी नहीं है।

दो विधान सभा क्षेत्रों में नेहरू को प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार की अपेक्षा कम वोट मिलना भी आश्चर्यजनक बात थी।

नेहरू कभी इस देश के युवाओं के ‘हृदय सम्राट’ कहे जाते थे।सन 1952 में संत प्रभुदत्त ब्रहमचारी ने गो वध की समस्या को लेकर नेहरू के खिलाफ फूलपुर में चुनाव लड़ा था।पर नेहरू की चुनावी सेहत पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। 

नेहरू को 2 लाख 33 हजार और ब्रह्मचारी को 56 718 वोट मिले थे।

नेहरू के निधन  और विजय लक्ष्मी पंडित के इस्तीफे के बाद फूल पुर पर भी कांग्रेस का एकाधिकार बना नहीं रह सका

जबकि कभी इलाहाबाद कांग्रेस का राष्ट्रीय मुख्यालय हुआ करता था।इसका यह अर्थ हुआ कि फूल पुर में कांग्रेस पार्टी का नहीं बल्कि नेहरू परिवार का असर था।

  बाद में सिर्फ 1971 और 1984 में खास माहौल में फूल पुर से कांग्रेसी उम्मीदवार विजयी हो सके थे।

वैसे फूल पुर संसदीय क्षेत्र में  दिलचस्प मुकाबला 1969 के उप चुनाव में हुआ।मुख्य मुकाबला कांग्रेस के के.डी.मालवीय और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के जनेश्वर मिश्र के बीच था।के.डी.मालवीय नेहरू मंत्रिमंडल में रह चुके थे। संसोपा के जनेश्वर मिश्र सन 1967 में भी विजय लक्ष्मी पंडित के खिलाफ

चुनाव लड़ चुके थे।पर, तब वह करीब 36 हजार मतों से हार गये थे।पर जब विजय लक्ष्मी पंडित ने सीट छोड़ी तो युवा जनेश्वर को मौका मिल गया।

सन 1967 के आम चुनाव में जनसंघ बस्ती जिले में मालवीय को हरा चुका था।इलाहाबाद के ही मूल निवासी मालवीय उससे पहले कभी इलाहाबाद से चुनाव नहीं लड़े थे।उन्होंने इलाहा बाद में खूब नाता -रिश्ता जोड़ा।वह वामपंथी विचारधारा के थे । इस आधार पर भी उनका प्रचार चल रहा था।मालवीय ने यह भी प्रचार किया कि इस क्षेत्र से नेहरू के प्रियपात्र को ही चुन कर भेजा जाना चाहिए।फिर भी उन्हें इसका कोई चुनावी लाभ नहीं मिला। 

  उधर जनेश्वर मिश्र का कहना था कि देश के सामने यथास्थितिवाद,कलह की राजनीति और अनैतिक आचरण तीन खतरे हैं।

तीनों कांग्रेस में हैं।इसे तोड़ना जरुरी है।

  उप चुनाव में पहली बार किसी  गैर कांग्रेसी नेता की फूलपुर में 1969 में जीत हुई।मालवीय को करीब 62 हजार और 36 वर्षीय जनेश्वर को करीब 83 हजार मत मिले।

इस चुनाव के साथ उत्तर प्रदेश विधान सभा का भी मध्यावधि चुनाव हो रहा था।

फूल पुर के नीचे की पांच में से चार विधान सभा सीटें संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को मिलीं और  कांग्रेस को सिर्फ एक सीट पर संतोष करना पड़ा।

 उन दिनों जनेश्वर मिश्र एक आदर्शवादी युवक थे।उन्हें ‘छोटे लोहिया’ कहा जाता था।उन्हें फूल पुर में नेहरू के प्रभाव  का तिलस्म तोड़ने का श्रेय मिला।

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वेबसाइट ‘मनीकंट्रोल हिन्दी’ से साभार

21 नवंबर 22 


रविवार, 20 नवंबर 2022

    एक काल्पनिक सवाल !

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यदि सन 2024 में केंद्र में सरकार बदल गई तो किसी नई 

सरकार के लिए कितना आसान होगा बड़े- बड़े नेताओं के खिलाफ जारी मुकदमों को वापस लेना ?

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सुरेंद्र किशोर

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सन 2024 के लोक सभा चुनाव के नतीजे की 

कल्पना कीजिए।

यदि उस चुनाव में भाजपा हार गई और नरेंद्र मोदी सरकार हट गई !

तो क्या देश भर के दर्जनों प्रमुख नेताओं के खिलाफ तथाकथित ‘‘बदले की भावना’’ से शुरू किए मुकदमे वापस हो जाएंगे ?

जरूर हो जाएंगे,किंतु इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल एक बड़ी शर्त लगा दी।शर्त पूरी हो जाएगी तो मुकदमे भी वापस हो जाएंगे।

  सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त, 2021 में यह आदेश (तत्संबंधी आदेश वाली खबर की स्कैन काॅपी इस पोस्ट के साथ प्रस्तुत है।)जारी किया कि 

संबंधित राज्य के हाई कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना किसी सांसद या विधायक के खिलाफ जारी मुकदमे वापस नहीं लिए जा सकते।

  अब आप ही अंदाज लगा लीजिए कि कितने गंभीर मामलों में कितने उच्च न्यायालय मुकदमे वापस लेने का आदेश पारित करेंगे ?

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यहां मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सन 2024 के लोक सभा चुनाव के बाद केंद्र में किसकी सरकार बनेगी।

क्योंकि मुझे पूरे देश के मतदाताओं के मानस का अभी कोई अनुमान नहीं।(एक राज्य की

राजधानी में बैठा कोई व्यक्ति अनुमान नहीं,बल्कि सिर्फ अपनी इच्छा ही बता सकता है।अभी मैं अपनी इच्छा क्यों बताऊ ?)

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याद रहे कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा -321 में यह प्रावधान किया गया है कि पी.पी.या ए.पी.पी.संबंधित अदालत की अनुमति से जनहित में कोई मुकदमा वापस ले सकता है।

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पिछले प्रकरण

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सन 1979 में कांग्रेस के समर्थन से केंद्र में चरण सिंह की सरकार बनी थी।

कांग्रेस ने चरण सिंह पर यह दबाव डाला कि वे संजय गांधी के खिलाफ जारी मुकदमों को वापस ले लें।

चरण सिंह राजी नहीं हुए।

नतीजतन चरण सिंह सरकार गिरा दी गई।

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सन 1990 में कांग्रेस की मदद से चंद्रशेखर प्रधान मंत्री बने।

चंद्र शेखर को यह संदेश भिजवाया गया कि बोफोर्स केस वापस कर लिया जाए।

चंद्रशेखर ने मना कर दिया।

कांग्रेस ने चंद्र शेखर की सरकार गिरा दी।

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तब की एक अपुष्ट चर्चा--

बाद में चंद्र शेखर के एक मित्र से किसी ने पूछा कि  

 इतने कम दिनों के लिए वे प्रधान मंत्री क्यों बने ?

मित्र ने कहा कि कोई हिमालय पर्वतारोही, शिखर पर जाकर अपना घर थोड़े ही बनाता है !!

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19 नवंबर 22

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नोट-वैसे मेरा अनुमान है कि मोदी सरकार ही दुबारा सत्ता में आएगी।

---20 नवंबर 22


शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

 सी.वी.आनंद बोस पश्चिम बंगाल के राज्यपाल नियुक्त किए गए हैं।

एक आई.ए.अफसर को एक समस्याग्रस्त प्रदेश का राज्यपाल बनाए जाने के पीछे क्या उस प्रदेश के लिए कोई खास राजनीतिक संकेत है ?

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सुरेंद्र किशोर

18 नवंबर 22


गुरुवार, 17 नवंबर 2022

     कर्पूरी की कहानी

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यदि कोई नेता कर्पूरी ठाकुर जैसा स्वच्छ छवि का हो तो उसकी छोटी-मोटी गलती को सुप्रीम कोर्ट का जज भी नजरअंदाज कर देता है।

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किंतु आज जैसे ही किसी सर्वज्ञात महा भ्रष्ट नेता के खिलाफ भी एजेंसियां कार्रवाई शुरू करती हंै तो एक तरफ वह ‘‘बदले की भावना’’ वाला रटा-रटाया आरोप लगा देता है तो दूसरी तरफ बदजुबानी के साथ-साथ जातीय समर्थन की अपनी ताकत का भी सड़कों पर भांेड़ा प्रदर्शन करने लगता है।

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ऐसे में मुधोलकर आयोग की रपट का एक अंश यहां प्रस्तुत है।

महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार(1967-68)के मंत्रियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज जे.आर.मुधोलकर के नेतृत्व में गठित न्यायिक जांच आयोग ने जांच की थी।

जांच रपट जनवरी, 1969 में आ गई।

(अय्यर और मुधोलकर आयोगों की रपटों की काॅपियां मैंने 

गुलजारबाग,पटना स्थित सरकारी प्रेस से मंगवाई थीं।

मेरा मानना है कि आजादी के तत्काल बाद किस तरह बिहार को यहां के तब के हुक्मरानों ने बर्बाद किया,वह कहानी आपको अय्यर कमीशन की रपट में मिलेगी।

किस तरह आजादी के तत्काल बाद के वर्षों में राष्ट्रीय सत्ताधारी नेताओं ने देश को गलत रास्ते पर चलाया ,उसकी सच्ची कहानी आपको एम.ओ. मथाई की दो किताबों में मिल जाएंगी।

मथाई 13 साल तक प्रधान मंत्री नेहरू का निजी सचिव था।

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  याद रहे कि कर्पूरी ठाकुर महामाया सरकार में उप मुख्य मंत्री,वित्त मंत्री और शिक्षा मंत्री थे।

कुछ अन्य विभाग भी उनके पास थे। 

 कर्पूरी ठाकुर के बारे में मुधोलकर आयोग ने अपनी रपट में लिखा था कि 

‘‘हैड मिस्टर कर्पूरी ठाकुर नाॅट इज्वाएड अ हाई रिपुटेशन ऐज अ क्लीन एंड औनेस्ट पोलिटिकल लीडर आॅफ कंन्ट्री ,आई वुड एभ बीन इनक्लाइंड टू टेक अ वेरी सिरियस भीउ आॅफ द पार्ट ही प्लेड इन दिस साॅरी अफेयर।

   बट ऐज थिंग्स स्टैंड्स एंड ऐज हि ऐपीयर्स टू हैव हिप्टोनाइज्ड हिमसेल्फ इन्टू द बिलिफ दैट साह(कुशेश्वर साह)इज अ डिजर्विंग मैन एंड अ नीडी पाॅलिटिकल सफरर ,आई विल कन्टंेट माइसेल्फ सेइंग दैट हिज ऐक्शन वेयर इम्प्रोपर।’’-पेज नंबर-247 

याद रहे कि यह मामला समस्तीपुर कोर्ट परिसर में स्वतंत्रता सेनानी कुशेश्वर साह को एक स्टाॅल आबंटित करने का था।

आबंटन से पहले नियमों का पालन नहीं किया गया था।

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सुरेंद्र किशोर

17 नवंबर 22