भूली-बिसरी यादें
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‘‘गैर-गोदी पत्रकारिता’’ के खतरे
तलवार की धार पर चलने जैसा !
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सुरेंद्र किशोर
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बात अस्सी के दशक की है।
जो राजनीतिक शक्तियां तब सत्ता में थीं,वही आज
मीडिया के एक बड़़े हिस्से पर ‘‘गोदी मीडिया’’ बन जाने का आरोप लगा रही है।
पर,उसने खुद 80 के दशक में क्या-क्या किया,प्रेस बिल लाने के अलावा भी ! ?
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एक नमूना देखिए।
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तब मैं दैनिक ‘जनसत्ता’ का बिहार संवाददाता था।
मैंने बिहार से जाने वाले एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री के बारे में एक असुविधाजनक
खबर लिखी।छपी भी।तब तक राज्य में ‘‘जंगल राज’’ नहीं आया था।
(‘जंगल राज’ में तो दो बार मेरी जान जाते -जाते बची थी।मैं उन दिनों दो स्टेनगन धारी की छत्रछाया में चलता था।)
वह मंत्री, प्रधान मंत्री का अत्यंत करीबी था।
उस मंत्री के पटना स्थित एक ‘‘लठैत’’ने फोन किया।तब तक मोबाइल फोन का जमाना नहीं आया था।
मेरी पत्नी ने फोन उठाया।लठैत ने रोष भरे शब्दों में कहा कि अपने पति से कह दीजिए कि होश में रहें।आपका लड़का कहां पढ़ने जाता है,मैं वह भी जानता हूं।आपको भी उठवा लिया जाएगा।
मेरी पत्नी बोल्ड है।जेपी आंदोलन में तीन बार जेल जा चुकी थी।उसने उस लठैत से कहा कि ‘‘गाड़ी लेकर आइए।मुझे उठा लीजिए।मैं आपके साथ चलने को तैयार हूं।’’
लठैत ने बाद में फोन किया तो मैंने फोन उठाया--उसने धमकाया--
‘‘जिस तरह हमने रियाज अजीमाबादी (ब्लिट्ज के पटना संवाददाता )को रेप केस में फंसा दिया था,उसी तरह तुमको भी फंसा दूंगा।होश में रहो।’’
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मैं मुकदमे से तो नहीं डरता।न जेल जाने से डरता हूं।मैं समाजवादी आंदोलन के सिलसिले में तिहाड़ जेल में भी रह चुका हूं।इमरजेंसी में जार्ज फर्नांडिस का साथ देने के कारण मैं कई महीने तक फरार रहा।फरारी जीवन में अपार कष्ट सहे।मुकदमा करना किसी का भी अधिकार है।मैं उसका स्वागत करता हूं,पर धमकी, वह भी परिवार व महिला-बच्चांे को ? वह बर्दाश्त नहीं।यह कायर का काम है।
कितु मैं भी रेप केस में फंस जाने से डर गया।
मैंने डी.जी.पी.को पत्र लिख कर कार्रवाई की उनसे मांग की ।याद रहे कि फोन करने वाले ने अपना नाम भी बता दिया था।यहां किसी का नाम लेना ठीक नहीं ।ऐसे लोग अधिकतर सत्ताधारियों के आसपास रहते हैं या रखे जाते हैं।
डी.पी.पी.ने उस व्यक्ति को खोजवाना शुरू कर दिया। उस समय मेरे स्वजातीय ही मुख्य मंत्री थे।वे मुझे जानते भी थे।उन्होंने डी.जी.पी.को बुलाया और कहा कि इस केस को बंद कीजिए।यह पत्रकार बहुत झूठ लिखता है।केस बंद हो गया।
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कहानी का मोरल
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अब आप अंदाज लगाइए कि जब गद्दी का स्वार्थ हो कोई मुख्य मंत्री या प्रधान मंत्री भी स्वजातीय के साथ भी न्याय नहीं करता।
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दूसरी बात यह कि कांग्रेस आज गोदी मीडिया की चर्चा बहुत करती है।कहती रहती है कि गोदी मीडिया से नरेंद्र मोदी को बहुत सहारा मिल रहा है।
पर,जब कांग्रेस खुद दिल्ली और पटना में सत्ता थी तो उसके नीेचे से ऊपर तक के सत्ताधारी नेताओं और उसके लठैत ने मेरे जैसे निरीह -निहत्थे पत्रकार और उसके परिवार के साथ कैसा सलूक किया ?
लिखने में मैं गलती कर सकता हूं।उसका उपाय यह है कि मुझ पर मानहानि का केस कर दिया जाए।लेकिन रेप और अपहरण की धमकी ?!
अन्यथा, गोदी मीडिया बन जाओ।
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एक और कहानी
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सरकारी धन में से 40 प्रतिशत लूट लेने वाले के खिलाफ मैंने बम्बई की एक पत्रिका में लंबी रिपोर्ट लिखी।उसने हम पर मानहानि का केस कर दिया।
मैं तो हर तारीख पर हाजिर होता था,(केस हो जाने पर कोई साथ नहीं देता।ऐसे लेख छपने पर जरूर लोग तालियां बजाते हैं।)पर जब ‘‘मिस्टर 40 प्रतिशत’’ ने संपादक के खिलाफ कुर्की -जब्ती का वारंट भिजवा दिया तो संपादक ने मुझे फोन किया।कहा कि मैंने अभी-अभी बम्बई में मकान बनवाया है।मैं नहीं चाहता कि उसकी कुर्की हो जाए।
इसलिए आप उससे समझौता कर लीजिए।मैं लक्ष्मी साहु और पी.के.सिन्हा के साथ उस व्यक्ति के यहां गया।
वह बहुत ही स्पष्टवादी था और विनम्र था।
अब वह इस दुनिया में नहीं है।उसने कहा कि मैं पटना के पत्रकारों को जानता हूं।आपको भी जानता हूं।आप ईमानदार है। पर,आपके अखबार का मालिक ईमानदार नहीं हो सकता।मैं भी ईमानदार नहीं हूं।मैं 40 प्रतिशत चोर हूं और 60 प्रतिशत ईमानदार हूं।राजीव गांधी कहते हंै कि सौ में 85 पैसे लूट लिए जाते हैं।आपको तो मेरे पक्ष में लिखना चाहिए था कि मेरा अनुपात 85 बनाम 15 का नहीं बल्कि 40 बनाम 60 का है ।वह भी इसलिए कि कि मुझे कई सरकारी-गैर सरकारी लोगों को ‘‘चटाना’’पड़ता है।
आपने जो कुछ मेरे बारे में लिखा है,वह अक्षरशः सत्य है।पर,मैं जानता हूं कि आपके पास एक अक्षर का भी कागजी सबूत नहीं है।पत्रकार सियार का जात होता है।एक पत्रकार कुछ लिखता है तो दूसरा भी हुंआ -हुंआ करने लगता है।मैंने आपके खिलाफ इसलिए केस किया ताकि मेरे खिलाफ लिखने वालों का तांता न लग जाए।फ्लड गेट न खुल जाए !
खैर, समझौता हो गया,पर मैंने यह शिक्षा ग्रहण की कि --‘‘लिखने से पहले पोख्ता सबूत अपने हाथ में रख लो।’’
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13 जुलाई 26