शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

    संसद (सन 2001)जैसे हमले की पाक 

    साजिश पर भी भारत के ‘सेक्युलर’ दलों 

     व बुद्धिजीवियों की खतरनाक चुप्पी 

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  स्थानीय पलिस को सूचना दिए बिना 

   मुम्बई से एक आतंकी को दिल्ली 

   पुलिस ने किया गिरफ्तार

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      --सुरेंद्र किशोर--

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 पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइ.एस.आइ.के आतंकियों से हाल में पूछताछ की गई।

उससे यह पता चला कि इस देश में संसद जैसे हमले की उनकी एक और साजिश थी।

   उस साजिश को पुलिस ने विफल कर दिया है।

यानी, लगता है कि सरकार देश की सुरक्षा के लिए कारगर कदम उठा रही है।

यह भी लगता है कि खुफिया जानकारी एकत्र करने के लिए सरकार जो राशि आबंटित करती है,उसका अब बेहतर इस्तेमाल हो रहा है।

  किंतु क्या किसी राजग विरोधी दल के किसी नेता ने

इस साजिश के लिए पाकिस्तान व उसकी खुफिया एजेंसी की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है ?

हां,कुछ अखबारों ने इस साजिश के खिलाफ संपादकीय जरूर लिखा है।

यहां तक कि दिल्ली पुलिस के विशेष कोषांग ने महाराष्ट्र से एक आतंकी जान मोहम्मद शेख को गिरफ्तार किया।

ऐसा करने से पहले दिल्ली पुलिस ने महाराष्ट्र पुलिस को कोई जानकारी नहीं दी।

क्यों नहीं दी ?

इस पर अटकलें लगाई जा रही हैं।

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किसी ने ठीक ही कहा है कि कुछ राजग विरोधी दल पाक के खिलाफ ऐसे अवसर पर कोई बयान कैसे दे सकते हैं जबकि अगले साल यहां कई राज्यों में चुनाव होेने वाला है ?

 क्या आप पाकिस्तान में जाकर वहां के मुसलमानों से कह सकते हैं कि आप लोग मोदी को हराइए ?

शायद नहीं।

पर, पाक पहुंच कर कांग्रेस नेता मणिशंकर अयर ने 2015 में एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल से बातचीत करते हुए कह दिया था कि ‘‘पहले तो मोदी को सत्ता से निकालो।’’

  ऐसा वही नेता कह सकता है जो यह समझता या जानता है कि भारत के चुनाव में पाक के लोगों की भी परोक्ष भूमिका होती है।

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16 सितंबर 21


बुधवार, 15 सितंबर 2021

    16 वीं सदी का चित्तौड़ और

    आज का अफगानिस्तान !

    कितना फर्क-कितनी समानता ???

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--सुरेंद्र किशोर--

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16 वीं सदी में चित्तौड़ की तीन हजार महिलाओं ने

एक साथ खुद को जला लिया था।

उसे जौहर कहा गया।

  अफगानिस्तान में महिलाओं के साथ आज जो अत्याचार तालबानी कर रहे हैं,उसकी तस्वीरें टी.वी. पर देख कर

 चित्तौड़ की महिलाओं के बलिदान का कारण समझ में नहीं आया ? !!!

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तब कथित ‘‘महान अकबर’’ ने चित्तौड़ गढ़ के किले को घेर

रखा था।

 राजपूत महिलाएं समझ गईं थी कि यदि वे जिंदा रह गईं तो उनके साथ आतताई क्या-क्या करेंगे।

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जिन लोगों के हाथों में तलवारें थीं,उनकी महिलाओं को तो जौहर करना पड़ा था।

मुगल काल में इस देश के जिन आम लोगों के पास हथियार नहीं थे,उनके व उनके परिवार के साथ क्या-क्या हुआ था ?

उसकी कल्पना आज के अफगानिस्तान को देख कर आसानी से की ही जा सकती है।

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कुछ देशी-विदेशी शक्तियां भारत में भी ‘तालिबान सदृश्य शासन कायम करने की कोशिश में हैं।

हमारे यहां के वोटलोलुप नेतागण व कुछ खास विचार धारा के बुद्धिजीवी व इतिहास लेखक उनकी ऐसी घृणित कोशिश को जाने-अनजाने दशकों से बल पहुंचाते रहे हैं।

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अब समझ लीजिए कि यहां भी क्या-क्या  हो सकता है !

यदि आप संभले नहीं ,सचेत नहीं हुए और वैसे तत्वों का डटकर विरोध नहीं किया तो एक बार फिर ‘जौहर’ करना पड़ेगा।

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अफगानिस्तान में हो रहे अत्याचारों पर आज के भी कुछ भारतीय

नेता व बुद्धिजीवी पर्दा डाल रहे हैं।

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ठीक उसी तरह जिस तरह तीन हजार महिलाओं को जौहर करने पर मजबूर कर देने वाले शासक को भारत के कुछ इतिहासकारों व वोटलोलुप नेताओं ने ‘महान’ बताया।

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15 सितंबर 21


मंगलवार, 14 सितंबर 2021

     खाद्य सामग्री में आर्सेनिक

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    --सुरेंद्र किशोर--

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दैनिक ‘प्रभात खबर’,पटना ने यह खबर दी है कि बक्सर से भागलपुर तक गेहूं -आलू में आर्सेनिक के असर की पुष्टि की गई है।

इंडो -यूके रिसर्च प्रोजेक्ट में यह खुलासा हुआ है।

  अत्यधिक भू-जल दोहन को आर्सेनिक के बढ़ते असर की वजह बताया गया है।

 आर्सेनिक दिल,गुर्दा,फेफड़े पर असर करता है।

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पर्यावरण विज्ञानी और बिहार राज्य प्रदूषण बोर्ड के अध्यक्ष डा.अशोक कुमार घोष इस संबंध में बताते हैं कि 

‘‘डोर टू डोर जाकर लिए गए सैंपल के बाद यह पहली बार खुलासा हुआ है कि बिहार के विभिन्न इलाकों में पहुंच रहे गेहूं और आलू में आर्सेनिक मौजूद है।

 यह सामान्य लिमिट से अधिक है।

सैंपल में लिये गए गेहूं या आलू बिहार से बाहर से आए बताए जाते हैं।

फिलहाल इस संबंध में घबराने की जरूरत नहीं है।

व्यापक जागरूकता की जरूरत है।

हमें अत्यधिक गहराई वाले नलकूप खनन को हतोत्साहित करने की जरूरत है।’’

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रिसर्च प्रोजेक्ट, डा.घोष और प्रभात खबर को धन्यवाद।

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पर, उससे हटकर मेरी समझ से बिहार में इस पर और अधिक जांच करने की जरूरत है।

पंजाब में आर्सेनिक और उससे बढ़ रहे कैंसर की समस्या बहुत अधिक है।देश में सबसे अधिक।

वहां की एक रपट के अनुसार किसान रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं का बहुत ही अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं।

वहां भी भूजल दोहन की गंभीर समस्या है।

पंजाब से आ रही खबर के अनुसार वहां भूजल दोहन के कारण पानी के साथ नीचे से निकल कर बालू जमीन की सतह पर आ जा रहा है।

उससे जमीन अनुर्वर होती जा रही है।

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निष्कर्ष--हमें ‘हरित क्रांति’ से पहले वाले जमाने में फिर से लौटना होगा।

यानी, जैविक खाद का इस्तेमाल करना होगा।

मैंने बचपन में गोबर खाद से उपजाए गए देसी गेहूं की रोटी खाई है।

 उसकी मिठास अब दुर्लभ है भले उसके दाने छोटे होते थे। 

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13 सितंबर 21 


 आमने-सामने की बातचीत हो 

या सोशल मीडिया पर चर्चा !

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बेहतर है कि बहस हार जाओ,पर दोस्त मत ‘हारो’।

   यानी, 

दोस्त मत छोड़ो।संबंध खराब मत करो।

बहस में जीतने के चक्कर में कई लोग, कई बार संबंध 

खराब कर लेते हैं।

बीच का रास्ता यह है कि ‘अनफंे्रड’ कर दो।

इससे यह होगा कि कभी मिलोगे तो शर्मिंदा नहंीं होना पड़ेगा।

सबको अपनी -अपनी राय रखने व उस पर अड़े रहने का पूरा अधिकार है।

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लोकतंत्र में हर पांच साल पर जनता किसी को गलत व किसी को सही साबित कर ही देती है।

मैंने दशकों से देखा है कि अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर इस देश के मतदाता अक्सर सही ही होते हैं।

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--सुरेंद्र किशोर

14 सितंबर 21   


सोमवार, 13 सितंबर 2021

     महाराणा प्रताप के बारे में 

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  (एक खास संदर्भ में )‘‘.......डूंगरपुर के महारावल ने पत्र लिखकर प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू को याद दिलाया था कि

 ‘‘राजस्थान के सभी राजा, (महाराणा प्रताप के परिजन) महाराणा को शाष्टांग नमस्कार करते हैं।

 जनता में उनका जितना मान है,वह तो भारत सरकार ने भी राज्यों के अधिमिलन के समय उनको देश का एकमात्र ‘महा राज प्रमुख’ बनाकर स्वीकार किया था।’’

( तब अन्य राजा ‘राज प्रमुख’ बने थे।)

   महारावल ने यह भी लिखा कि 

‘‘अंग्रेजी सरकार ने भी उनके विशिष्ट स्थान को स्वीकार कर 

उन्हें ब्रिटिश सम्राट् जार्ज पंचम के दिल्ली दरबार में ,जहां भारतीय राजाओं को अंग्रेज महाराजाधिराज के सामने झुककर उन्हें नजराना देना पड़ा था, हाजिर होने से बरी कर दिया था।’’(जबकि महाराणा उस दिन दिल्ली में ही थे।उन्होंने कोई उपहार भी जार्ज पंचम को नहीं भेजा था।

यह तो मानी हुई बात है कि उनके पूर्वज महाराणा प्रताप ने कभी मुगल यानी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की थी।)

याद रहे कि महारावल के पत्र के बाद नेहरू ने युवक महाराणा को दिल्ली आमंत्रित किया और उन्हें प्रधान मंत्री आवास में ठहराया।   

(--उपर्युक्त विवरण के मुख्य अंश एम.ओ.मथाई की पुस्तक ‘नेहरू के साथ तेरह वर्ष’ से साभार ।)

  आजादी के बाद नेहरू सरकार ने इतिहासकारों को निदेश दे दिया था कि छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप के शौर्य व वीरता का बखान करते हुए कोई इतिहास न लिखा जाए क्योंकि उससे हिन्दुत्व फैलेगा।

सेक्युलर व वामपंथी इतिहासकारों ने उस निदेश का पालन किया।

   दूसरी ओर, मुगल शासकों के सिर्फ अच्छे गुणों को उभारा गया और देसी राजाओं की सिर्फ कमियों का बखान किया गया।

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उस विकृत इतिहास का भारतीय जन मानस पर आज भी इतना अधिक असर है कि यदि आप महाराणा प्रताप के पक्ष में कोई सकारात्मक पोस्ट भी लिखें तो लाइक करने वाले मात्र एक-डेढ़ दर्जन से अधिक लोग नहीं होंगे।

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जबकि इधर यह खबर भी आई है कि वियतनाम के शासक की समाधि पर लिखा हुआ है कि 

‘‘यह महाराणा प्रताप के शिष्य की समाधि है।’’

(वैसे मैं अभी इस खबर की पुष्टि नहीं कर रहा हूं।हालांकि यह खबर तार्किक है।)

याद रहे कि अमेरिका के साथ युद्ध में वियतनाम के लोगों ने महाराणा प्रताप की युद्ध शैली अपनाई थी।

अमेरिका वियतनाम छोड़कर भाग गया था।

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  हमें यू.पी.के पूर्व राजा सुहलदेव की वीरता का पता भी तब चला जब वहां के एक पिछड़ा नेता ने उनके नाम पर एक राजनीतिक दल बना लिया।

याद रहे कि राजा सुहेलदेव ने सन 1033 में मुस्लिम हमलावर 

गाजी सल्लार मसूद को बहराइच में हुए युद्ध में 

हराया और उसे मार डाला था।

ऐसी बहुत सारी दबी हुई कहानियां हंै जिन्हें 1947 के बाद आम लोगों को जानबूझ कर नहीं बताया गया। 

याद रहे कि सुहेलदेव व महाराणा प्रताप जैसे राजाओं के समक्ष भी वैसी ही परिस्थितियां थीं जैसी परिस्थिति से आज अफगानिस्तान में है।

हालांकि हमारे सेक्युलर व नेहरूपंथी इतिहासकार लिख रहे थे कि तब राजा भूभाग के फैलाव के लिए आपस में लड़ रहे थे ।उन लड़ाइयों में कोई दूसरा तत्व नहीं था।  

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    सन 2005 में पश्चिम बंगाल की बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने ललित सूरी गू्रप को कोलकाता का ग्रेट ईस्टर्न होटल मात्र 52 करोड़ रुपए में आखिर क्यों बेच दिया ?

सार्वजनिक क्षेत्र के भारी समर्थक वाम मोर्चा को ऐसा क्यों करना पड़ा ?

 इतने सस्ते में क्यों बेचा ?

मैं नहीं मानता कि इसके बदले किसी वाम नेता को कोई रिश्वत मिली होगी या उन्होंने ली होगी।

 इस देश की राजनीति में भारी नैतिक गिरावट के बावजूद अब भी सामान्यतः वाम दलों के अधिकतर लोग अन्य अधिकतर राजनीतिक दलों के नेताओं की अपेक्षा अधिक ईमानदार हैं,रुपए पैसे के मामलों में।

  राष्ट्रहित के बारे में भले न हों !

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दरअसल मेरा अनुमान है कि ग्रेट ईस्टर्न होटल के प्रबंधन में ईमानदारी व कार्य कुशलता लाने में विफल वाम सरकार औने -पौने दाम में बेचने बेच देने को मजबूर हो गई।

ग्रेट ईस्टर्न होटल को बनाए रखने का अर्थ था-रोज -रोज सरकारी खजाने से घाटा पूरा करना।

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नब्बे के दशक में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने जब बड़े पैमाने पर विनिवेश शुरू किया अटल सरकार ने उसे जारी रखा तो उनके सामने भी वैसी ही मजबूरी थी।

मौजूदा मोदी सरकार के समक्ष भी वैसी ही मजबूरी है।

हां,मोदी सरकार जो कर रही है ,उसे ‘लीज’ करण कहते हैं न कि बिक्रीकरण।

बिक्रीकरण वही लोग बोल रहे है जो या तो अनजान हैं या राजनीतिक रूप से बेईमान। 

--सुरेंद्र किशोर

13 सितंबर 21

  

 


शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

     मीडिया क्या करे और क्या न करे ?

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      --सुरेंद्र किशोर--

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सन 1997 में पटना के जिस दैनिक अखबार का दाम 

ढाई रुपए था,वह अखबार आज 5 रुपए में बिक रहा है।

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1997 में गेहूं की कीमत प्रति क्ंिवटल 510 रुपए थी।

2021 में 1975 रुपए है।

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यानी, 24 साल में अखबार की कीमत बढ़कर सिर्फ दोगुनी हुई,पर अनाज की कीमत लगभग चैगुनी।

इस तरह अखबार प्रबंधन ने अपने दाम को आम मूल्य वृद्धि के अनुपात में बढ़ने नहीं दिया।

जबकि अखबार का लागत खर्च भी तो इस बीच बहुत बढ़ा।

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दुनिया में अखबार ही ऐसा उत्पाद है जो लागत खर्च से कम पर बिकता है।

दरअसल अखबार का घाटा विज्ञापनों से पूरा होता है।

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विाज्ञापन कौन देता है ?

सरकारी और निजी विज्ञापनदाता।

अखबार की बिक्री से भी कुछ राजस्व मिल जाता है।

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अब इस देश के कुछ राजनीतिक ,गैर राजनीतिक व बौद्धिक  ‘‘क्रांतिकारी’’ लोग यह चाहते हैं कि 

उनके बदले व उनके लिए अखबार ही ‘क्रांति’ कर दे।

जो काम क्रांतिकारी लोग नहीं कर सके,वह काम अखबार 

अपने विज्ञापनदाताओं को नाराज करने की कीमत पर भी उनके लिए करके दिखाए।

अन्यथा,वह ‘गोदी मीडिया’ है।

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मीडिया का कत्र्तव्य क्या है ?

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वही है जो बात नब्बे के दशक में बी.बी.सी.के एक पदाधिकारी ने बताई थी।

   नब्बे के दशक में मैंने पटना के दैनिक ‘इंडियन नेशन’ में सिंगापुर डेटलाइन से बीबीसी. के उप प्रधान की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी पढ़ी थी।

 उनसे पूछा गया था कि बी.बी.सी. की साख का राज 

क्या है ?

उन्होंने बताया कि 

‘‘यदि दुनिया के किसी देश में कम्युनिज्म आ रहा है तो हम यह सूचना लोगों को देते हैं कि आ रहा है।

उसे रोकने की कोशिश नहीं करते।

दूसरी ओर, यदि किसी देश से कम्युनिज्म जा रहा है तो हम रिपोर्ट करते हैं कि जा रहा है।

हम उसे बचाने की भी कोशिश नहीं करते।

 यही हमारी साख का राज है।’’

   (यह और बात है कि लगता है कि बी बी सी का इस बीच पुराना ध्येय बदल चुका है।)

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एक और बात।

सन् 1983 के जून की बात है।

  मैं नई दिल्ली में  नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर के आॅफिस में बैठा हुआ था।

एक खास संदर्भ में मैंने उनसे कह दिया कि आपका अखबार दब्बू है।

 वह इंदिरा गांधी के खिलाफ नहीं लिख सकता।

इस पर उन्होंने कहा कि ‘‘ नहीं सुरेंद्र जी , यू आर मिस्टेकन।

मेरा अखबार दब्बू नहीं है।

 आप इंदिरा जी के खिलाफ जितनी भी कड़ी खबरें  लाकर मुझे दीजिए, मैं उसे जरूर छापूंगा।

पर इंदिरा जी में बहुत से गुण भी हैं।

मैं उन्हें भी छापूंगा।

 एक बात समझ  लीजिए।

मेरा अखबार अभियानी भी नहीं है।’’

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और अंत में 

मेरी टिप्पणी--थोड़ा लिखना,अधिक समझना !!!

मेरा मानना है कि मीडिया यदि बीबीसी के तब के उप प्रधान व राजेंद्र माथुर की राह पर चले तो कोई भी विवेकशील व्यक्ति उसे 

गोदी मीडिया नहीं कहेगा।

(अविवेकशील लोगों की कोई जिम्मेवारी नहीं ले सकता।)  

न ही कोई सरकार उसका विज्ञापन बंद या कम करेगी।

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10 सितंबर 21