शराबबंदी पर गांधी और लोहिया
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गांधी ने कहा था कि ‘‘भले पैसे के अभाव में स्कूल बंद कर देने पड़े,पर मैं चाहता हूं कि देश में फिर भी पूर्ण शराबबंदी लागू हो।’’
लोहिया भी थे नशाबंदी के पक्ष मंे
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सुरेंद्र किशोर
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साठ के दशक की बात है।
रांची में डा.राम मनोहर लोहिया के दल
की बैठक थी।
बैठक में एक ऐसा व्यक्ति शामिल था जिसके भोजनालय में शराब भी परोसी जाती थी।
किसी समाजवादी कार्यकत्र्ता ने डा.लोहिया से शिकायत की कि एक शराब बिक्रेता भी इस बैठक में है।
डा.लोहिया ने उसे पास बुलाया।
पूछा, क्या तुम शराब बेचते हो ?
उसने कहा कि मेरा भोजनालय है जिसमें शराब भी बिकती है।
इस पर डा.लोहिया ने कहा कि हमारा दल नशाबंदी का पक्षधर है।
कोई ऐसा व्यक्ति हमारे दल का सदस्य नहीं हो सकता जो शराब पीता है या फिर शराब के कारोबार में है ।
वह व्यक्ति बैठक स्थल से चला गया।
पर, कुछ घंटे के बाद लौटा।
उसने डा. लोहिया से कहा कि मैंने अपने भोजनालय में से शराब हटवा दी है।
अब मैं शराब नहीं बेचूंगा।
उसके बाद उसे बैठक में शामिल होने की अनुमति मिल गयी।
इसे कहते हैं राजनीति का समाज पर असर।
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दरअसल डा.लोहिया मूलतः गांधीवादी थे।
उनका समाजवाद गांधीवाद का ही विस्तार या संशोधित रूप था।
उस जमाने में दूसरे दलों के अच्छी मंशा वाले अग्रसोचू नेतागण भी डा.लोहिया की ही तरह समाज को प्रभावित किया करते थे।
पर अब राजनीति का जमाना बदल गया।
नशाबंदी के कट्टर समर्थक गांधीवादी इस संबंध में एक खास बात कहा करते हैं।
किसी ने गांधी जी से कहा था कि आबकारी टैक्स से मिले पैसों से ही सरकारी स्कूल चलते हैं।
उसके जवाब में गांधी जी ने कहा था कि ‘‘भले पैसे के अभाव में स्कूल बंद कर देने पड़े,पर मैं चाहता हूं कि देश में फिर भी पूर्ण शराबबंदी लागू हो।’’
यदि आजादी के बाद के हमारे शासकों ने गांधी और डा.लोहिया की बातों को अमली जामा पहनाया होता तो हमारा देश बेहतर होता।
समाज बेहतर होता।
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अब जब शराबखोरी से समाज में विषम पस्थितियां पैदा होने लगीं हैं तो कुछ राज्य बारी-बारी से शराबबंदी करने को बाध्य हो रहे हैं।
या फिर उस पर विचार कर रहे हैं।
(बिहार में शराबबंदी का राज्य पर अच्छा असर पड़ा है ,कोई सर्वेक्षण चाहे जो कुछ कहे।)
शराबखोरी से पैदा होने वाली सामाजिक बुराइयों से लोगबाग परिचित रहे हैं।
कहां तो राजनीति देश भर में धीरे-धीरे शराबखोरी बंद कराती और कहां शराब के बिक्रेता अब राजनीति में आकर राजनीति को और समाज को खराब कर रहे हैं।
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कई साल पहले की बात है।
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तब सरकार मनमोहन सिंह की थी।
उन दिनों विजय माल्या राज्य सभा के सदस्य थे।
आश्चर्य है कि उन्हें नागरिक विमानन मंत्रालय की सलाहकार समिति का सदस्य भी बना दिया गया था।
जबकि पहले इस बात का ध्यान रखा जाता था कि जिस सांसद का जिस मंत्रालय में व्यावसायिक स्वार्थ हो,उस मंत्रालय की संसदीय समिति में उसे सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए।
उस समिति में माल्या ने एक प्रस्ताव रखा।
उनका प्रस्ताव था कि घरेलू उड़ानों में भी शराब परोसने की इजाजत मिलनी चाहिए।
वह प्रस्ताव पास भी हो गया।
मुझे नहीं मालूम कि वह लागू हुआ या नहीं !
क्योंकि मुझे हवाई यात्रा का कोई अनुभव नहीं है।
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क्या कभी - कभी ही सही, गांधी का नाम लेने वाली कांग्रेस पार्टी से ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए थी ?
यदि गांधी के सपनों की सरकार होती तो ऐसा प्रस्ताव पास होता ?
भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले चैप्टर में लिखा हुआ है कि ‘‘सरकार नशाबंदी करने का प्रयास करेगी।’’
उसी को ध्यान में रखते हुए गांधीवादी प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने सन 1977 में नशाबंदी की शुरूआत की थी।
हर साल शराब की एक चैथाई
दुकानों को बंद करना था।
पर यह काम कई कारणों से पूरा नहीं हो सका।
बाद की केंद्र सरकारों ने नशाबंदी के काम को जरूरी नहीं समझा।
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लोहियावादियों को शराब पीते
देख मुझे सदमा लगा था।
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आपातकाल में जार्ज फर्नांडिस के बलावे पर मैं बंगलोर गया था।
एक होटल के कमरे में हम तीन लोग टिके थे।कई दिन रहे।
उनमें से एक बाद में मुख्य मंत्री बने।दूसरे राज्य सभा के सदस्य।मैं खुद पत्रकार बन गया।
दिन में हमलोग सिनेमा देखते।अंधेरा हो जाने पर एक खास तरह की टे्रनिंग के लिए हम उस पहाड़ी पर जाते जहां शोले की शूटिंग हुई थी।
रात में भावी मुख्य मंत्री,भावी राज्य सभा सदस्य और एक स्थानीय वकील शराब पीने बैठ जाते थे।मैं टुकुर -टुकुर उन्हें देखता रहता था और कूढ़ता रहता था।
(मैं आज तक शराब का स्वाद नहीं जानता।)
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14 अगस्त 2026