Friday, September 21, 2018

परीक्षाओं में कदाचार रोकने के लिए नोडल एजेंसी जरूरी-सुरेंद्र किशोर



माफिया-नेता-अफसर गंठजोड़ पर वोहरा समिति की रपट 1993 में आई  थी।उस रपट में समिति  ने  केंद्र सरकार को एक महत्वपूर्ण  सलाह दी थी।सलाह यह थी कि  गृह मंत्रालय के तहत एक  नोडल एजेंसी  बननी चाहिए। देश मेंे जो भी गलत काम हो रहे हैं ,उनकी सूचना वह एजेंसी एकत्र करे।ऐसी व्यवस्था की जाए ताकि सूचनाएं लीक नहीं हों।क्योंकि सूचनाएं लीक होने से राजनीतिक दबाव पड़ने लगता हैं ।इससे  ताकतवर लोगों के खिलाफ कार्रवाई खतरे में पड़ जाती है।
वोहरा समिति की सिफारिश को तो लागू नहीं किया गया।नतीजतन उसका खामियाजा यह देश आज भी भुगत रहा है। 
पर कम से कम इसी तरह की एक गंभीर समस्या से लड़ने के लिए नोडल एजेंसी बननी चाहिए।कम से कम बिहार में पहले बने।
  माफिया-नेता-अफसर गंठजोड़ की तरह ही एक देशव्यापी ताकतवर व शातिर गंठजोड़ बिहार सहित देश भर की परीक्षाओं में  चोरी करवाने के काम में निधड़क संलिप्त  है।
 अपवादों कोछोड़ दें तो आज शायद ही किसी बड़ी या छोटी  परीक्षा की पवित्रता बरकरार है।चाहे मेडिकल, इंजीनियरिंग कालेजों में दाखिले के लिए परीक्षाएं हो रही हों या छोटी -बड़ी नौकरियों के लिए।
सामान्य परीक्षाओं का तो कचरा बना दिया गया है।अपवादों की बात और है।
कदाचार परीक्षाओं का अनिवार्य अंग है।
उसकी रोक थाम के लिए एक ताकतवर नोडल एजेंसी तो बननी ही चाहिए। एजेंसी  हर परीक्षा की निगरानी  करे।एजेंसी का अपना खुफिया तंत्र हो।साथ में अर्ध सैनिक बल भी।
सामान्य दिनों में भी एजेंसी सक्रिय रहे।
एजेंसी के पास अपना धावा दल हो।
इस पर जो भी खर्च आएगा,वह व्यर्थ नहीं जाएगा।
कल्पना कीजिए कि चोरी से  पास करके कोई व्यक्ति सरकारी,अफसर,डाक्टर या इंजीनियर बन जाए।
वैसे अयोग्य लोग जहां भी तैनात होंगे तो वे निर्माण योजनाओं और मानव संसाधन को  नुकसान ही तो पहुंचाएंगे ।
 उस भारी नुकसान को बचाने के लिए किसी ताकतवर व सुसज्जित नोडल एजेंसी पर होने वाले खर्चे का बोझ उठाया जा सकता है।
 आए दिन यह खबर आती रहती है कि परीक्षा केंद्रों पर परीक्षा के समय सी.सी.टी.वी.कैमरा काम ही नहीं कर रहे थे।
कहीं जैमर बंद थे तो कहीं से गार्ड गायब।कहीं परीक्षा केंद्र के आसपास अवांछित तत्वों का जमावड़ा है।
नोडल एजेंसी के धावा दल परीक्षा केद्रों पर दौरा कर उस बिगड़ी स्थिति को संभाल सकते हंै।
 मान लीजिए कि राज्य में प्रतियोगिता परीक्षाएं सौ केंद्रों में हो रही हैं।
उनमें से दस केंद्रों पर भी नोडल एजेंसी के धावा दल अचानक पहुंच जाएं तो बाकी नब्बे केंद्रों पर भी हड़कंप मच जाएगा।
क्योंकि तब तक सचेत करने के लिए मोबाइल फोन अपना कमाल दिखा चुके होंगे।
 ़--यौन अपराधियों को लेकर गोपनीयता--   
इस देश में एक नया काम हो रहा है।काम तो बहुत अच्छा है।
यौन अपराधियों की नेशनल रजिस्ट्री तैयार की जा रही है।
नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो को यह जिम्मेदारी दी गयी है।
देश भर के सजायाफ्ता यौन अपराधियों के बारे में पूरा विवरण एक जगह उपलब्ध रहने पर देश की जांच एजेंसियों के काम आसान हो जाएंगे।
यौन अपराधियों के नाम,फोटो,पता,फिंगर प्रिंट,डी.एन.ए.नमूना,पैन और आधार नंबर क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो के पास होंगे।
 पर इसमें एक कमी रहेगी।
इस विवरण को सार्वजनिक नहीं किया जा सकेगा।हालांकि अमेरिका में ऐसी सूचनाओं को सार्वजनिक कर दिया  जाता है।
 सार्वजनिक करने से कई लाभ हैं।एक तो ऐसे अपराधी जब सजा भुगत कर जेल से बाहर आएंगे तो उनसे लोगबाग सावधान रहेंगे।
दूसरी बात यह भी होगी कि उस अपराधी घर के  आसपास के लोगों का उसके परिवार पर मानसिक दबाव पड़ेगा।
उससे ऐसी सामाजिक शक्तियां भी सामने आ सकती हैं जो सामाजिक दबाव बना कर ऐसे अपराधों को रोकने में शायद मदद करें।
बदनामी के डर से ऐसी प्रवृति वालों के परिजन ऐसे अपराधियों का बहिष्कार भी कर सकते हैं।
अब केंद्र सरकार बताएगी कि ऐसी सूचनाएं सार्वजनिक करने का नुकसान किसे होगा।
दरअसल हमारे यहां ऐसी बातों में भी गोपनीयता बरती जाती है जिनमें बरतने की कोई जरूरत नहीं है।
 राजनीतिक दल अपने  चंदे का पूरा विवरण जनता को नहीं देते हैं। चंदे के एक हिस्से का तो देते हैं ,पर  बाकी का छिपा लेते हैं।
1967 में आई.बी.की रपट थी कि भारत के अधिकतर राजनीतिक दलों ने यहां चुनाव लड़ने के लिए विदेशों से पैसे लिए।
पर उस रपट को केंद्र सरकार ने सार्वजनिक नहीं होने दिया।
माफिया-नेता-अफसर गंठजोड़ पर वोहरा कमेटी की  1993 की रपट  भी गोपनीय ही रही।
यहां तक कि 2002 में जब चुनाव आयोग ने कहा कि उम्मीदवार  शैक्षणिक योग्यता,आपराधिक रिकाॅर्ड और संपत्ति का विवरण नोमिनेशन पेपर के साथ पेश करें तो तत्कालीन सरकार ने उसका विरोध कर दिया। पर सुप्रीम कोर्ट ने जब सख्त आदेश दिया तो वैसा करना पड़ा।     
   --‘टिस’ पर ही निर्भरता-- 
मुम्बई स्थित टाटा इंस्टीच्यूट आॅफ सोशल साइंसेस यानी ‘टिस’ की फील्ड एक्शन टीम ने हाल में बिहार के आसरा गृहों की जांच रपट पेश करके तहलका मचा दिया।
उस इंस्टीच्यूट में ‘सोशल वर्क’ विषय  की भी पढ़ाई होती है।
वहां समाज व लोगों के प्रति निष्ठावान होना सिखाया जाता है।
 सोशल वर्क की पढ़ाई बिहार में भी होती है।पर बहुत कम स्थानों में ।वह भी आधे मन से। 
 इस राज्य के एक नामी विश्व विद्यालय में तो सोशल वर्क विभाग के प्रधान पद पर सोशियोलाॅजी के शिक्षक तैनात हैं।
  हाल में बिहार लोक सेवा आयोग ने काॅलेज शिक्षकों की नियुक्ति के लिए जो विज्ञापन निकाले, उसमें सोशल वर्क विषय शामिल ही नहीं था।
   बिहार सरकार अन्य विभागों की भी सोशल आॅडिट कराना चाहती है।
 यहां तो सोशल आॅडिट की अधिक जरूरत है भी।
इसलिए इस बात की भी जरूरत है कि ‘टिस’ की तरह बिहार के विश्व विद्यालयों में  भी सोशल वर्क विभागों को स्थापित किया जाए।जहां विभाग पहले से हैं,उन्हें मजबूत किया जाए।
इन संस्थानों से डिग्रियां लेकर जन सेवा की भावना से ओतप्रोत होकर जब विद्यार्थी निकलेंगे तो सोशल आॅडिट के लिए बिहार को मुम्बई के टिस का रुख नहीं करना पड़ेगा। 
    -- भूली बिसरी याद--
 आजादी के तत्काल बाद विश्व विद्यालय में किस तरह खोज-खोज कर विद्वान 
प्राध्यापकों की बहाली की गयी,उसका वर्णन डा.नागेश्वर प्रसाद शर्मा ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘बिहार के ढहते विश्व विद्यालय’ में की है।
उन्होंने लिखा है कि ‘सर सी.पी.एन.सिंह की  नेपाल के राजदूत पद पर नियुक्ति के बाद सारंगधर सिंह पटना विश्व विद्यालय के वाइस चांसलर बने।वे 1949 से 1952 तक वाइस चांसलर रहे।
सारंगधर बाबू जमींदार परिवार से आते थे और पटना के खड्ग विलास प्रेस के मालिक भी थे।इसी प्रेस ने  भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनाएं छापी थीं।
सारंगधर बाबू  स्वतंत्रता सेनानी  थे।कांग्रेस  से जुड़े हुए  थे।
1952 और 1957 में वे पटना से लोक सभा के सदस्य भी चुने गए थे।
सारंगधर बाबू ख्यातिप्राप्त शिक्षाविद् नहीं होते हुए भी ,विश्व विद्यालय के शैक्षणिक स्तरोन्नयन के प्रति सजग और दृढप्रतिज्ञ थे।
उनकी दूरदर्शिता,कर्मठता और पटना विश्व विद्यालय के प्रति सत्यनिष्ठता का प्रमाण है कि उनके कार्यकाल में उनके द्वारा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वानों की नियुक्ति यहां  हुई।जिनकी नियुक्ति हुई,उनके नाम हैं डा.ए.एस.अल्टेकर, डा.बी.आर.मिश्र, वी.के.एन.मेनन, पी.एस.मुहार, एम.जी.पिल्लई, डा.के.सी.जकारिया और डा.एम.एम.फीलिप।’
       --और अंत में-
उत्तर प्रदेश के पूर्व लोक निर्माण मंत्री शिवपाल यादव  प्रदेश में सपा से  अलग एक समानांतर राजनीतिक शक्ति खड़ी करना चाहते हैं।
 पर संकेत हैं कि सपा के अधिकतर लोग अखिलेश के साथ ही रहेंगे।
क्योंकि मुलायम सिंह यादव  का आशीर्वाद अखिलेश को ही मिलता रहा है।नेता जी  का दिमाग शिवपाल के साथ है,पर  दिल अखिलेश के साथ।
 बिहार में भी ऐसा होगा।जिसे राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद का आशीर्वाद मिला है,उनके वोटर भी अंततः उसे ही  उत्तराधिकारी मानेंगे।
तमिलनाडु में भी स्टालिन को ही करूणानिधि का आशीर्वाद मिला था।
दूसरे पुत्र को अंततः  आत्म समर्पण करना पड़ा।ऐसे अन्य उदाहरण भी हैं।
@कानोंकान-प्रभात खबर-बिहार-21 सितंबर 2018@


  


   

1974 के बिहार छात्र आंदोलन के संचालन के लिए 
बिहार राज्य छात्र संघर्ष संचालन समिति का गठन किया गया था।जेपी के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा था।
संचालन समिति के सदस्यों की सूची नई दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ के 18 अगस्त 1974 के अंक में छपी थी।
वह इस प्रकार है-
1.-लालू प्रसाद यादव-पटना विश्व विद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष,
2.-सुशील कुमार मोदी-पटना विश्व विद्यालय छात्र संघ के महा मंत्री,
3.-राम बहादुर राय-अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के महा मंत्री,
4.-वशिष्ठ नारायण सिंह-बिहार प्रदेश युवा कांग्रेस @संगठन@,
5.-शिवानंद तिवारी-समाजवादी युवजन सभा,
6.-रघुनाथ गुप्त-समाजवादी युवजन सभा,
7.-मिथिलेश कुमार सिंह-युवा कांग्रेस-संगठन के राज्य संयोजक,
8.-राम जतन सिन्हा-पटना विश्व विद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष,
9.-नरेन्द्र कुमार सिंह-पटना विश्व विद्यालय छात्र संघ के पूर्व महा मंत्री,
10.-भवेश चन्द्र प्रसाद-छात्र संघर्ष समिति के कार्यालय सचिव,
11.-नीतीश कुमार-पटना इंजीनियरिंग काॅलेज छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष,
12.-विक्रम कुंवर-बिहार युवा संघ के अध्यक्ष,
13.-गोपाल शरण सिंह-पटना शहर के निर्दलीय युवा नेता,
14.-अक्षय कुमार सिंह,
15.-विजय कुमार सिन्हा,
16.-रघुवंश नारायण सिंह,
17.-उदय कुमार सिन्हा,
18.-अरूण कुमार वर्मा,
19.-रवीन्द्र प्रसाद 
20.- अशोक कुमार सिंह।
सवाल उठ सकता है कि आज यह सूची देने का क्या
 औचित्य है।
दरअसल समय- समय पर कुछ लोग पूछते रहते हैं कि छात्र आंदोलन के नेता कौन -कौन थे ?
वैसे राज्य में नेता तो इनके अलावा भी अनेक लोग थे।पर इस सूची से कम से कम प्रमुख नेताओं की एक झलक तो मिल ही जाती है।
‘प्रतिपक्ष’ की काॅपी पुराने कागजों में आज मिल गयी तो सोचा कि आपसे शेयर करूं।
पर यह अगस्त, 1974 की स्थिति थी।बाद के महीनों में संचालन समिति में कोई फेरबदल हुआ होगा तो वह इसमें शामिल नहीं है।  

पटना में जारी ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ के संदर्भ में
करीब छह साल पहले का सुप्रीम कोर्ट का एक निर्णय प्रासंगिक है।
महा नगरों में अवैध निर्माण की समस्या पर वह निर्णय था।
न्यायाधीश जी.एस.सिंघवी और न्यायाधीश एस.जे.मुखोपाध्याय के खंडपीठ ने 10 अक्तूबर, 2012 को कहा कि ‘अवैध निर्माण रोकने के लिए इसे ध्वस्त करने का आदेश ही काफी नहीं है,बल्कि ऐसे लोगों को दंडित करना भी जरूरी है।
अवैध निर्माण न सिर्फ योजनागत विकास की अवधारणा को चैपट करता है बल्कि पानी, बिजली और सिवरेज की बुनियादी सुुविधाओं पर भी असहनीय बोझ डालता है।
खंडपीठ ने अपना कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि इससे सिर्फ कानून का ही उलंघन नहीं होता बल्कि कई संवैधानिक और मौलिक अधिकारों का भी हनन होता है।ऐसी इमारतें लोगों के लिए खतरा तो है ही ,इनसे ट्राफिक की समस्या भी पैदा होती है।महा नगरों की आॅथरिटीज का यह फर्ज है कि वे न केवल ऐसी इमारतें ध्वस्त करंे ,बल्कि उन्हें बनाने वालों पर कठोर जुर्माना भी लगाए।
@20 सितंबर 18@

Thursday, September 20, 2018

उस पर हमले कम होंगे यदि पुलिस अपना नैतिक बल बढ़ाए--सुरेंद्र किशोर



मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने ठीक ही कहा है कि असामाजिक तत्वों द्वारा पुलिस पर हमला असहनीय है और हमलावरों के खिलाफ सख्त व त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए।
 जब मुख्य मंत्री ने ऐसी चिंता जताई है तब कार्रवाई तो होगी ही।
पर ऐसी  कार्रवाइयों में स्थायित्व आए,इसके बारे में भी अलग से सोच - विचार होना चाहिए।
 दरअसल  पुलिस पर माफिया तत्व कभी- कभी दिन -दहाड़े भी हमला कर  देते हैं । कई बार तो वे पुलिस बल को  खदेड़ भी देते हंै। 
पर, जब वे ऐसा करते हैं तो अनेक शांतिप्रिय  लोगों को यह लगता है कि माफिया ‘सत्ता के तख्त’ पर हमला कर रहे हैं।
क्योंकि गांव-गांव में तैनात चैकीदार से लेकर थानेदार तक को पटना सचिवालय से ताकत मिलती है।वे सरकार के ही तो प्रतिनिधि हैं।
जब पुलिस का ही यह हाल हो जाता है तो जो निरीह जनता पुलिस को अपना रक्षक मानती है,उसका क्या हाल होता होगा ! इस बात को वे लोग समझें जिन पर कानून -व्यवस्था कायम रखने का भार है।अन्यथा सत्ता का इकबाल समाप्त हो जाएगा।इसका असर दूसरे क्षेत्रों पर भी पड़ेगा।
 कई साल पहले की बात है।आशियाना-दीघा रोड पर पुलिस अतिक्रमण हटाने गयी  थी।
अतिक्रमणकारियों ने पुलिस पार्टी पर हमला कर दिया।
बाद में एक अतिक्रमणकारी से मैंने पूछा कि आपने ऐसा क्यों किया ?
उसने कहा कि इस पुलिस का चरित्र आप नहीं जानते।एक दिन तो वह रिश्वत वसूलने आती है और वही पुलिस दूसरे दिन अतिक्रमण हटाने आ धमकती  है।
  हमारी धारणा बनती है कि रिश्वत की राशि बढ़ाने के लिए ही वह अतिक्रमण हटाने का नाटक करती है।इसलिए हमें गुस्सा आ जाता है।
  आशियाना -दीघा रोड के उस अतिक्रमणकारी की बात बालू माफिया,शराब माफिया तथा इस तरह के कुछ अन्य कानून तोड़कों पर भी लागू होती है।
 इस स्थिति को कैसे बदला जाए ? इसे बदलना तो कठिन है,पर इसकी गंभीर कोशिश तो होनी ही चाहिए।
   अक्सर अधूरी तैयारी के साथ ही पुलिस व प्रशासन के लोग माफियाओं पर धावा बोल देते हैं।
इस स्थिति को बदलना पड़ेगा।क्योंकि जब -जब ऐसे माफियाआंें द्वारा हमारी पुलिस खदेड़ दी जाती है तब -तब शांतिप्रिय लोगों का दिल बैठ जाता है।  
 --माल्या और संसद की सदस्यता--
केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने कहा है कि ‘विजय माल्या ने राज्य सभा सदस्य के रूप में अपने विशेषाधिकार का गलत इस्तेमाल करके संसद भवन के गलियारे में मुझे रोक कर बात करने की कोशिश की थी।’
  जेटली साहब को भी मालूम है कि दरसल ये अरबपति लोग सांसद बनते ही हैं मुख्यतः इसी काम के लिए।संसद की सदस्यता का इस्तेमाल करके वे कभी अपने व्यापार को बढ़ाते हैं तो कभी अपने  व्यापार पर आए संकट को दूर करने की कोशिश करते हैं।
  ऐसे अरबपतियों को सांसद बनाने में अधिकतर दल उन्हें समय-समय पर मदद करते हैं।जेटली जैसे नेताओं को यह बात पहले ही सोचनी चाहिए थी।
 इस मामले में  माल्या अकेले नहीं हंै।हां, अपने काम में अनोखा जरूर हंै।माल्या प्रकरण के बाद राजनीतिक दल सोच -विचार करे। अधिकतर  दलों को इस   प्रश्न पर विचार करना होगा कि  व्यापारिक हितों के लिए पैसे के बल पर सासंद बनने वालों को राज्य सभा तक पहुंचने से कैसे रोका जाए ?
 माल्या ने मन मोहन  शासन काल में ऐसा कुछ कर दिया था जैसा पहले नहीं हुआ ।
 माल्या नागरिक उड्डयन मंत्रालय की  संसदीय सलाहकार समिति के सदस्य बन गए थे।
नियम  है कि जिस सदस्य का जिस मंत्रालय से व्यापारिक हित जुड़ा  हो ,वह उस मंत्रालय की समिति का सदस्य नहीं बनेगा।
उस समिति के अन्य सदस्यों में  कुलदीप नैयर भी थे।
दिवंगत नैयर के अनुसार माल्या की पहल पर संसदीय समिति ने अभूतपूर्व प्रस्ताव पारित किया।
समिति ने  सरकार से  सिफारिश 
की थी कि आंतरिक उड़ानों में भी विमानों में शराब परोसी जानी चाहिए।
  याद रहे कि माल्या का विमान और शराब दोनों मामलों में व्यापारिक हित निहित था।यह और बात है कि मन मोहन सरकार ने उस सिफारिश को नहीं माना। 
   --बड़े नेताओं के स्वास्थ्य-- 
जिन बड़े नेताओं की ओर लाखों-करोड़ों लोग उम्मीद भरी 
नजरों से देखते हैं,उन्हें खुद कोशिश करनी चाहिए कि वे दीर्घायु हों।
 खानपान और आहार -विहार में संयम बरतने से दीर्घायु हुआ जा सकता है।
 नेताओं के साथ दिक्कत यह होती है कि उनसे मिलने वाले अनेक समर्थक व सहकर्मी नेता गण अपने सर्वोच्च नेता के दैनिक रूटीन को भंग करने की कोशिश करते रहते हैं।
कुछ बड़े नेता तो खुद ही भंग करते हैं।यदि प्रशंसक,समर्थक और सहकर्मी चाहते हैं कि हमारे नेता दीर्घायु हों तो वे उनके खाने -पीने और सोने के समय में उन्हें डिस्टर्व करने की कोशिश न करें।
आजादी की लड़ाई में गांधी जी के साथ काम कर चुके अनेक नेता दीर्घायु हुए।
क्योंकि खुद गांधी की प्रेरणा से वे भरसक संयमित जीवन जीते थे।
  पर आजादी के बाद खासकर ‘अर्थ युग’ की शुरूआत के साथ स्थिति बदलने लगी।
आम लोगों के बीच के भी अनेक धनी -मानी लोगों के आहार -विहार में बदलाव आया।शारीरिक श्रम कम होने लगे।
नेताओं के लिए भी आर्थिक सुविधाएं बढ़ने लगीं।
उसका असर भी खान पान पर पड़ा।  
  देश के ऐसे कई नेताओं को हमने असमय दिवंगत होते देखा जिनकी अधिक जरूरत देश या फिर उनके समाज को थी। 
 एक बड़े कम्युनिस्ट नेता से मिलने की मेरी  बड़ी इच्छा रहती थी।
पर जब जाओ तो वे सिगरेट पीते रहते थे।जब मैं अपनी नाक पर रूमाल रख लेता था तो वे बुझा देते थे।पर पांच मिनट के बाद फिर सुलगा लेते थे।यानी चेन स्मोकर थे।
वे असमय गुजर गए।
यदि वे जीवित रहते तो कम्युनिस्ट आंदोलन को ढीला -ढाला नहीं होने देते।वे इस देश की कुछ बुनियादी समस्याओं को भी बेहतर ढंग से पहचानते थे।वैसी समझ कम ही कम्युनिस्टों में होती है। 
      --भूली बिसरी याद--
 अपनी जिन्दगी के बारे में बताते हुए फिल्मों के हास्य अभिनेता महमूद ने हनीफ झवेरी से कहा था कि ‘ अगर सिनेमा की दुनिया को स्वार्थों की दुनिया कहें तो  गलत नहीं होगा।लोग आपके साथ तभी तक हैं जब तक आप स्टार के रूप में चमक रहे हों।जैसे ही आपकी चमक खत्म हुई ,आप अंधेरे में धकेल दिए जाते हैं।’
  महमूद जिस क्षेत्र में  थे,वहां के बारे में वे कह रहे थे।अन्य क्षेत्रों का भी कमोवेश वही हाल है।खैर, महमूद के मुंह से यह सब सुनना दिलचस्प है।
  महमूद ने यह भी कहा कि ‘अगर इस उद्योग में कहीं मानवीयता होती तो किसी जमाने के मशहूर कैमरामैन राजेन्द्र मलोनी और शकीला बानू भोपाली जैसे लोग दर्दभरी और दुखी मौत नहीं मरते।कई लोगों ने मेरा कैरियर बर्बाद कर देने की कोशिश की ।स्टार कुछ और तरह से जीते हैं,पर मैंने वैसा कभी नहीं किया।
कई स्टार्स ने मेरे साथ काम करने से इनकार कर दिया था,पर इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा।मैंने अपना पूरा ध्यान अपने काम में लगाया।
  धर्मों की चर्चा करते हुए महमूद ने कहा था कि मैं सभी धर्मों का आदर करता हूं सिर्फ मेरे धर्म इस्लाम का ही नहीं।
मैंने अपने मन में संकल्प लिया था कि मेरी फिल्म ‘कंुवारा बाप’ हिट हो गयी तो मैं वैष्णो देवी जाउंगा और मैं गया भी। 
     ---और अंत में--
 खबर है कि पटना रेलवे स्टेशन के पास के  न्यू मार्केट की भीतरी सड़क की चैड़ाई अब 
40 फीट हो गयी है।अतिक्रमण हटाए जाने के बाद ऐसा संभव हुआ है।
 उसी सड़क पर मैंने 1972 में पूर्व मुख्य मंत्री भोला पासवान शास्त्री को रिक्शा पर चलते हुए देखा था।उस समय अतिक्रमण नहीं था। 
 पर, बाद के वर्षों में पुलिस व नगर निगम के धन लोलुप लोगों ने अपनी नाजायज आय के लिए अतिक्रमण करवाना शुरू कर दिया।
@ कानोंकान-14 सितंबर 2018-प्रभात खबर-बिहार@




‘विजय माल्या भगाओ अभियान’ में दो सरकारी संगठनों के कुछ अफसरों  की भूमिका संदिग्ध लग रही है।
वे संगठन हैं सी.बी.आई.और स्टेट बैंक आॅफ इंडिया।
 इनके संबंधित अफसरों का नार्को टेस्ट हो जाए तो पता चल जाएगा कि किस बड़ी हस्ती के कहने से या खुद अपने से उन अफसरों ने ऐसा काम किया ताकि विजय माल्या आसानी से देश छोड़ सके जिस पर बैंक का हजारों करोड़ रुपए लेकर नहीं लौटाने का आरोप है।
या फिर उन अफसरों का मात्र ‘एरर आॅफ जजमेंट’ था।
  पर कठिनाई यह है कि नार्को टेस्ट ,ब्रेन मैपिंग और लाई डिटेक्टर जांच पर सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में ही रोक लगा रखी है।
 मुख्य न्यायाधीश के.जी.बालकृष्णन और न्यायमूत्र्ति आर.वी.रवीन्द्रण के पीठ ने 6 मई 2010 को यह कहा कि ऐसी जांच व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ है और इस तरह गैर संवैधानिक है।
  सवाल है कि कोई व्यक्ति इस देश के खजाने का हजारों करोड़ रुपए लूट ले।उन रुपयों की कमी के कारण  देश के अनेक लोग भूख से व दवा के बिना मर जाएं।उनकी जीने की स्वतंत्रता की अपेक्षा  क्या माल्या जैसे लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता अधिक मूल्यवान है ?
सुप्रीम कोर्ट का ध्यान इस ओर दिलाया जाए तो शायद पुराने जजमेंट को वह उलट दे।सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई जजमेंट को हाल में पलटा भी है।
इस 2010 के आदेश में संशोधन के लिए किसी को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करनी चाहिए।क्योंकि 2010 के निर्णय ने क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को इस देश में बहुत नुकसान पहुंचाया है।
भले नार्को टेस्ट वगैरह की रिपोर्ट को कोर्ट सबूत के रूप में स्वीकार नहीं करता ,पर ऐसे टेस्ट से अन्य अपराधियों व सबूत तक पहुंचने  की राह कई बार जांच एजेंसी को मिल जाती है।
  अब इन सरकारी संगठनों के कारनामे देखिए।
1.-28 फरवरी, 2016 को स्टेट बैंक के विधि सलाहकार ने बैंक को सलाह दी कि एस.बी.आई.को चाहिए कि वह माल्या को देश छोड़ने से रोकने के लिए कोर्ट की शरण ले ।
 लेकिन स्टेट बैंक ने इस संबंध में कुछ नहीं किया।
उधर 2 मार्च 2016 को माल्या ने देश छोड़ दिया।
2.-सी.बी.आई.ने 16 अक्तूबर 2015 को लुक आउट सर्कुलर जारी करते हुए मुम्बई पुलिस को कहा कि वह विजय माल्या को भारत छोड़ने से रोके।
 पर,पता नहीं क्यों , 24 नवंबर 2015 को उसी सी.बी.आई.ने  मुम्बई पुलिस के स्पेशल ब्रांच को कहा कि वह माल्या के सिर्फ आगमन-प्रस्थान की सूचना दे।
इस बारे में बाद में कभी सी.बी.आई ने कहा कि एरर आॅफ जजमेंट था तो कभी कहा कि माल्या को गिरफ्तार करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे।
यह अच्छी बात है कि भारत सरकार माल्या को लंदन से वापस लाने के लिए ब्रिटेन के कोर्ट में जी- जान से लड़ रही है।
ऐसा कांग्रेस सरकार ने क्वत्रोचि के केस में कत्तई नहीं किया था जबकि उस पर आयकर भी बाकी था।
फिर भी नरेंद्र मोदी सरकार इस बात की कठोरता से  जांच कराए कि सी.बी.आई.और स्टेट बैंक को किस राजनीतिक या गैर राजनीतिक हस्ती ने  प्रभावित करके माल्या को भाग जाने की भूमिका तैयार की।
यदि सही जांच हो जाएगी तो मोदी सरकार की साख बढ़ेगी अन्यथा अगले चुनाव में जनता को जवाब देना कठिन होगा।

राज्य सभा का उप सभापति बनने के बाद भी
हरिवंश जी अपने शैक्षणिक गुरु सुरेश गिरि से मिलने उनके  यहां गोदना मठिया गए।
बिहार के सारण जिले की  रिविलगंज नगर पंचायत के गोदना मठिया मुहल्ले में कबीर की पंक्ति दुहराते हुए हरिवंश ने कहा कि ‘गुरु का स्थान भगवान से भी ऊपर है।’ उप सभापति ने यह भी कहा कि ‘मैं पहले भी आशीर्वाद लेने यहां आता रहा हूं।आगे भी आता रहूंगा।
मेरे जीवन में गुरु का महत्वपूर्ण स्थान है।’
 हरिवंश जी का वहां जाना एक साथ कई संदेश देता है।
 सभी क्षेत्रों के एहसान फरामोश लोगों को यह संदेश है कि वे हरिवंश से सीखें।
शिष्यों को यह संदेश है कि वे गुरु को न भूलें।
गुरुओं को भी संदेश है कि वे ऐसा आदर्श गुरु बनें जिनको याद कर बड़े पदों पर पहुंचे  शिष्यों के सिर भी आदर से झुक जाएं। 

  

Wednesday, September 19, 2018

बिहार के राज्यपाल सह विश्व विद्यालयों के चांसलर मान्यवर लालजी टंडन का आज के ‘प्रभात खबर’ में इंटरव्यू छपा है।
 राज्यपाल महोदय ने कहा है कि बिहार में उच्च शिक्षा की हालत ठीक नहीं है।
जरूरत पड़ी तो वे इसके लिए कड़वी दवा देने से भी नहीं हिचकेंगे।
उन्होंने जो कुछ कहा है,उससे लग रहा है कि राज्यपाल को इस राज्य की उच्च शिक्षा को लगी असली बीमारी का पता चल गया है।
अब कड़वी दवा देने की बारी उनकी है।इसलिए कि साधारण दवा से काम चलने वाला नहीं है।इस इलाज में राज्यपाल को  नीतीश सरकार का पूरा सहयोग मिलेगा ,ऐसी
 उम्मीद की जाती है।
 कड़वी दवा से शिक्षा क्षेत्र के कत्र्तव्य विमुख लोगों को बड़ी पीड़ा होगी।पर उन्हें जितनी पीड़ा होगी,उसी अनुपात में 
आम लोग खुश होंगे।राज्यपाल को दुआ देंगे।
 दरअसल अमीर लोग तो अपने बाल -बच्चों को बिहार से बाहर भेज कर अच्छे शिक्षण संस्थानों में पढ़ा ही लेते हैं,पर यहां के सरकारी शिक्षण संस्थानों की दुर्दशा का सर्वाधिक नुकसान उन गरीब व पिछड़े वर्ग के परिवारों के विद्यार्थियों को होता है जो शिक्षा पर अधिक पैसे खर्च नहीं कर सकते।
  यदि यहां के उच्च सरकारी शिक्षण संस्थानों में पठन पाठन का माहौल बन गया तो न सिर्फ गरीबों को उसका लाभ मिलेगा ,बल्कि यहां के स्कूलों के लिए योग्य शिक्षक भी पैदा होने लगेंगे।
  ऐसा नहीं है कि यहां की शिक्षा में सुधार नहीं हो सकता। 1972 में तत्कालीन मुख्य मंत्री केदार पांडेय ने उच्च शिक्षा में सुधार किया था।
1996 में पटना हाई कोर्ट के सख्त आदेश से मैट्रिक व  इंटर की पूर्ण कदाचारमुक्त परीक्षाएं हुई थीं।उन सुधारों को तब आम लोगों का भारी समर्थन भी मिला था।
1972 में भी केंद्र व राज्य में एक ही दल की सरकारें थीं,इसलिए सुधार में कोई बाधा नहीं आई।आज भी दोनों जगह एक ही गठबंधन की सरकारें हैं।