सोमवार, 27 मई 2024

  

वो भी क्या दिन थे !

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1957 के आम चुनाव होने वाले थे।

कांग्रेस के केंद्रीय प्रेक्षक बनकर मोरारजी देसाई पटना पहुंचे थे।

कट्टर गांधीवादी मोरारजी अन्य बातों के अलावा उम्मीदवारों के पहनावे के बारे में भी कड़ाई से पूछते थे।

सन 1952  में सांसद चुनी जा चुकीं तारकेश्वरी सिंन्हा एक बार फिर उम्मीदवार थीं।

 मोरारजी देसाई ने उनसे पूछा कि 

’‘तुम लिपस्टिक लगाती हो,कीमती कपड़े पहनती हो ?’’

तारकेश्वरी जी को गुस्सा आ गया।

उन्होंने कहा कि

 ‘‘ हमारे यहां चूड़ियां पहनना 

अपात्रता नहीं बल्कि क्वालिफिकेशन माना जाता है।

आप जो शहतूूश की बंडी पहने हैं,इसकी कीमत से 

मेरी छह कीमती साड़ियां आ सकती हैं।’’

उसके बाद तारकेश्वरी सिन्हा ने प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू को चिट्ठी लिखी कि ‘‘आप कैसे -कैसे प्रेक्षक भेजते हैं ?’’

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बाद में केंद्रीय वित मंत्रालय के तहत तारकेश्वरी सिन्हा, मोरारजी देसाई की डिपुटी बना दी गयीं।

कालक्रम में तारकेश्वरी सिन्हा ने एक बार कहा था कि 

‘‘रात के अंधेरे में भी मोरारजी के कमरे में जाकर कोई जवान और सुंदर महिला सुरक्षित वापस लौटकर आ सकती है।’’

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बात 1957 के चुनाव के समय की ही है।

पटना में मोरारजी को एक उम्मीदवार के बारे में बताया गया कि वे छुआछूत मानते हैं।

 संभवतः दूसरी बार विधान सभा टिकट के उस उम्मीदवार से देसाई ने पूछा--‘‘पंडत,सुना है, तुम छुआछूत मानते हो ?’’

पूर्वात्तर बिहार के उस पंडितजी से मोरारजी भाई ने कहा कि कांग्रेस तो छुआछूत के खिलाफ है।तुमको तो टिकट नहीं मिलेगा।

पंडित जी ने कहा कि ‘‘रखिए अपना टिकट अपने पास।

मैं चला।’’

यह कहते हुए पंडित जी चले गये।

भले पंडित जी का सिद्धांत सही नहीं था।

पर,जो भी था,विधान सभा की सदस्यता के लिए उन्होंने उसे नहीं छोड़ा।

याद रहे कि उन दिनों कांग्रेस के टिकट का मतलब था जीत की गारंटी।

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आज टिकट और सिद्धांत के बीच कौन नेता, कौन सा विकल्प चुनेगा ?

कल्पना कर लीजिए।

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वो भी क्या दिन थे !

फिल्म नजराना (1961)का गाना है--

एक वो भी दिवााली थी,एक ये भी दिवाली है,(सिद्धांतोे के मामले में) उजड़ा

हुआ गुलशन है,रोता हुआ माली

(सिद्धांतप्रिय आम जनता)है।

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 कश्मीर की (लोकतांत्रिक) जीत हमारी है

अब पश्चिम बंगाल की बारी है !

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सुरेंद्र किशोर

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सन 2017 का एक चित्र और सन 2024 की एक अखबारी खबर।

अंग्रेजी साप्ताहिक आउटलुक(1 मई 2017)में प्रकाशित कश्मीर के पत्थरबाजों का चित्र गौर से देखिए।

उन दिनों ऐसे चित्र अक्सर अखबारों में छपते थे और इलेक्ट्रानिक मीडिया में आते रहते थे।

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26 मई 2024 के दैनिक जागरण की खबर का शीर्षक है--

‘‘बारामुला के बाद अनंतनाग -राजौरी में भी लोकतंत्र का भव्य उत्सव।’’

 कश्मीर में आए परिवर्तन को लेकर अब यहां और कुछ कहने की जरूरत नहीं है।

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 उधर ‘कश्मीर’ बनते पश्चिम बंगाल से आए दिन हिंसा के डरावने चित्र आते रहते हैं।

 कुछ लोग यह अपशकुन कर रहे हैं कि लगता है कि पश्चिम बंगाल भारत के हाथों से निकलता जा रहा है।घटनाएं व ममता बनर्जी के बयानों से तो यह लगता है कि वह संघीय ढांचे में लोकतांत्रिक तरीके से केंद्र से नहीं लड़ रही हैं,मानो किसी दूसरे देश से युद्ध लड़ रही हैं।

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हालांकि अब देर नहीं होगी।

लोक सभा चुनाव के तत्काल बाद मोदी सरकार को कुछ ठोस कदम उठाने होंगे यदि पश्चिम बंगाल की स्थिति को बिगड़ने से रोकना है तो।

1.- राष्ट्रपति शासन

2.-पश्चिम बंगाल का तीन हिस्सों में विभाजन

और 

3-पांच साल के लिए योगी आदित्यनाथ जैसे किसी दृढ निश्चयी राष्ट्रवादी की राज्यपाल पद पर तैनाती।

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 27 मई 24


शनिवार, 25 मई 2024

 जब उनके राष्ट्रहित की बात आती है तो इजरायल और चीन किसी दबाव में नहीं आते।मोदी सरकार भी उसी राह पर है।

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सुरेंद्र किशोर

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इजरायल ने युद्ध रोकने के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के आदेश को मानने से साफ इनकार कर दिया है।

इजरायल ने न्यायालय को साफ-साफ कह दिया है कि ‘‘हमास से अपने देश की रक्षा का हमें हक है।’’(दुर्भाग्य है कि भारत के जेहादी संगठन पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के प्रति मोदी सरकार और यहां के कुछ सेक्युलर दलों की राय अलग- अलग हैं।)

इससे पहले इजरायल, अमेरिका तथा कुछ अन्य देशों की ऐसी ही सलाह को ठुकरा दिया चुका है।

  इजरायल ने यह भी कहा है कि ‘‘हमास के खात्मे तक हमारा युद्ध जारी रहेगा।’’

इजरायल जेहादी संगठन हमास की मनोवृति को अच्छी तरह जानता है।इजरायल समझता है कि चाहे हम नहीं रहेंगे या हमास।

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इसी तरह के करीब 2 करोड़ जेहादियों से चीन सरकार शिनजियांग प्रांत में लंबे समय से संघर्षरत है।

चीन सरकार ने एक बार कहा था कि जेहादियों के खिलाफ सफल युद्ध कोई लोकतांत्रिक देश नहीं लड़ सकता है।(क्या  चीन का इशारा भारत की ओर था ?)यानी,चीन का यह आशय था कि सिर्फ चीन जैसा एकाधिकारवादी देश ही लड़ सकता है जहां न तो नेताओं को वोट बैंक की चिंता है और न मीडिया से कोई डर है।

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सन 2018 में संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि ‘‘चीन ने अतिवाद विरोधी केंद्रों में कम से कम 10 लाख उइगरों (अतिवादी उइगर मुसलमानों) को हिरासत में लिया।

  शिनजियांग प्रांत के बड़े पैमाने पर मुस्लिम जातीय समूह के साथ चीन सरकार का व्यवहार बीजिंग के साथ अंतरराष्ट्रीय तनाव का स्रोत बन गया है।चीन इस बात पर जोर देता है कि वह नरसंहार के आरोप के आरोपी चरमपंथ से निपट रहा है।’’

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दुनिया देख रही है कि किसी मुस्लिम देश की हिम्मत नहीं है कि वह चीन की इस दमनकारी नीति के खिलाफ आवाज उठाये।

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जो काम इजरायल और चीन जिस कड़ाई से कर पा रहा है,वही काम भारत क्यों नहीं कर पा रहा है ?

क्योंकि चीन ताकतवर है और इजरायल राष्ट्रवादी देश है।

हमारे देश को कुछ लोग धर्मशाला समझते हैं।

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हमारे देश में क्या होता रहा ?

2001 में जब जेहादियों ने संसद भवन पर हमला किया तो हमारी सेनाएं पाक सीमा पर भेज दी गयी थी।

पर, किसी न किसी दबाव में आकर अटल सरकार ने उसे वापस बुला लिया।

तब पाक की सेना भी भारतीय सीम पर पहुंचा दी गयी थी।

उसे भी वापस किया गया।

उस पर भारत के ही एक बड़े सेक्युलर नेता ने बयान दिया--‘‘पाक सरकार को अपनी सेना की आवाजाही में जो अनावश्यक खर्च करना पड़ा है,उसकी भरपाई भारत सरकार करे।’’ 

क्या दुनिया में कोई ऐसा देश है जहां इस सेक्युलर नेता जैसा नेता बसता है ?

वैसे नेता आज भी भारत में सक्रिय हैं।

शायद इस लोस चुनाव रिजल्ट के बाद उन्हें अपनी स्थिति पर विचार करना पड़ेगा।

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2008 में जब पाक जेहादियों ने मुम्बई पर हमला करके सैकड़ों लोगों को मार दिया तो मनमोहन सरकार को सलाह दी गई कि वह पाक के खिलाफ कार्रवाई करे।उस पर कांग्रेस ने कहा कि 2009 में लोक सभा चुनाव है।हमला करने पर हमें मुस्लिम वोट नहीं मिलेंगे।

इतना ही नहीं, एक कांग्रेस नेता ने कह दिया कि मुम्बई पर हमला आर एस एस ने करवाया।इस आशय की किताब लिखी गयी जिसका विमोचन दिग्गी राजा नं किया था।

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मोदी के सत्ता में आने के बाद पुरानी स्थिति में तेजी से बदलाव आ रहा हैं ।हमलों का यहां से जवाब भी मिल रहा है।क्योंकि भारत का कर राजस्व गत दस साल में बढ़कर तीन गुणा हो चुका है। बढ़ता जा रहा है।क्योंकि भ्रष्टाचार कम हुआ है। अमीर,अमीर होता देश किसी अन्य देश के दबाव में नहीं आता।

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25 मई 24  


शुक्रवार, 24 मई 2024

    ग्राम रक्षा दलों का गठन कर उनके प्रधान 

  के पदों पर प्रशिक्षित अग्निवीरों को बैठाओ

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इस तरह खूंखार अपराधियों,आतंकियों और जेहादियों से आम लोगों की रक्षा का प्रबंध संभव हो सकेगा 

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सुरेंद्र किशोर

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प्रशिक्षित अग्निवीरों में से 25 प्रतिशत तो सेना में शामिल कर लिये जाएंगे।पर बचे 75 प्रतिशत क्या करेंगे ?

मेरी राय में उन्हें ग्राम रक्षा के काम में लगाया जाना चाहिए।

आतंकियों,अपराधियों और जेहादियों से देश को जो आंतरिक खतरा उत्पन्न हो गया है,उन खतरों से आम जनता को आखिर कौन बचाएगा ?

हर स्तर पर ग्राम रक्षा दल का गठन हो।

उनके प्रधान के पद पर प्रशिक्षित अग्निवीरों को बैठाया जाए जब तक उन्हें कोई अन्य बेहतर काम नहीं मिल जाता।

हमारे गांव अभी आम तौर पर असुरक्षित हैं।उतने पुलिसकर्मी हैं नहीं।लोगों के पास आत्म रक्षा के लिए हथियारों की भारी कमी है।

सरकारें आम लोगों को हथियार के लाइसेंस देने में काफी 

कड़ाई बरतती है।

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उधर आए दिन अखबारों में यह खबर आती रहती है कि जेहादी संगठन पी.एफ.आई.इस देश के विभिन्न हिस्सों में हथियारबंद कातिलों के दस्ते तैयार कर रहा है।उन्हें हथियार बांटे जा रहे हैं।हथियारों के बल पर पी.एफ.आई.2047 तक इस देश को इस्लामिक देश बना लेना चाहता है।पी.एफ.आई.के राजनीतिक संगठन एस.डी.पी.आई.से इस देश के कई राजनीतिक दलों का तालमेल है।

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28 अक्तूबर, 2023 को यह खबर आई थी कि केरल के इर्नाकुलम में (भरोसा न हो तो गुगल देख लीजिए)बड़ी संख्या में बी.टेक इंजीनियरों ने सरकारी आॅफिसेज के चपरासी के पद के लिए आवेदन दिये।उसके लिए वे साइकिल चलाने का टेस्ट देते फोटो में नजर आ रहे थे।

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न तो उन इंजीनियरों को चपरासी की नौकरी के टेस्ट में कोई जबर्दस्ती बैठा रहा था और न ही भारतीय सेना किसी को जबरन अग्निवीर बना रही है।

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कई देशों में सबके लिए अनिवार्य सैनिक ट्रेंनिंग का प्रावधान है।इस देश में वैसा प्रावधान किया जाये तो इस देश के ‘‘गैर राष्ट्रवादी तत्व’’(राजनीतिक व बौद्धिक तत्व) न जाने कितना बड़ा हंगामा खड़ा कर देंगे !

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24 मई 24

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पुनश्चः

मैंने प्रशिक्षित अग्निवीरों के लिए ग्राम रक्षा दल के गठन का यूं ही अपनी ओर से प्रस्ताव दिया है।

हो सकता है कि भारत सरकार के पास इस बात की योजना पहले से ही हो।संभव है कि कहीं मैंने उस योजना के बारे में कहीं सुना हो और वह मेरे मानस पटल पर बैठ गया हो।

क्योंकि केंद्र सरकार जानती है कि जरूरत के बावजूद इस देश की कुछ शक्तियां यहां अनिवार्य सैनिक शिक्षा का प्रावधान नहीं होने देंगी।

  


गुरुवार, 23 मई 2024

 चुनावी भविष्यवाणी करना कोई 

राजदीप सरदेसाई से सीखे

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चुनाव विश्लेषणकर्ताओं और नतीजों को 

लेकर भविष्यवाणी करने वालों से 

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2014 का लोक सभा चुनाव

2019 का लोक सभा चुनाव

2017 का उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव

2022 का उत्तर प्रदश विधान सभा चुनाव

2023 का मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव

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पिछले दस साल के सिर्फ इन 5 चुनावों को ही लेता हूं।

आप भाजपा समर्थक हों या भाजपा विरोधी,उससे मुझे कोई मतलब नहीं।

  हर व्यक्ति किसी न किसी का समर्थक होगा ही।वोट तो किसी न किसी को सब देते ही हैं।

किसी एक ही दल को तो देते हैं।

उस क्रम में पक्षधरता तो आ ही जाती है।

पर,पेशेगत ईमानदारी भी कोई चीज होती है।

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आपने हाल के उन पांच प्रमुख चुनावों के भावी नतीजों को लेकर तब क्या-क्या भविष्यवाणियां की थीं ?

यानी, अपनी कलम से किसे ‘जितवाया’ था और किसे ‘हरवाया’ था ?

वास्तव में कौन जीता और कौन हारा ?

आपकी पांच में से कितनी भविष्यवाणियंा सच साबित हुईं थीं ?

क्या पांच में दो चुनावों को लेकर भी आपकी भविष्यवाणियां  सच साबित र्हुइं थीं ?

अपना पिछला रिकाॅर्ड देख लीजिए या ठीक से याद कर लीजिए।

यदि पांच में से दो भविष्यवाणियां सच साबित हुईं थीं तो भी कोई बात नहीं।

कोई हर्ज नहीं।

इस बार के चुनाव यानी 2024 के लोक सभा चुनाव की भविष्यवाणी करने का आपको पूरा नैतिक अधिकार है।

यदि पांच में से आपकी एक भी भविष्यवाणी सच साबित नहीं हुई थी तो अपनी इस भूमिका के बारे में फिर से सोचिए।

यदि चुनावी भविष्यवाणी के इस काम को करते रहना चाहते हैं और अपनी साख को बनाये रखना है तो पहले राजदीप सरदेसाई से कुछ सीख लीजिए।

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मैंने कुछ साल पहले लगातार राजदीप की तीन चुनावी भविष्यवाणियां हिन्दुस्तान टाइम्स में पढ़ी थीं।

तीनों चुनाव में कांटे की टक्कर वाले थे।

फिर भी तीनों के बारे में राजदीप की भविष्यवाणी सच साबित हुई थीं।भाजपा जीत गयी।

ं जबकि,आम धारणा है कि राजदीप सरदेसाई मोदी-भाजपा विरोधी हैं।

उनके बारे में मेरा अनुमान भी यही है।

यदि वैसा हैं भी तो रहा करें।

  इस लोकतंत्र में सबको ऐसा करने का अधिकार है।

पर,अपने पेशे के प्रति राजदीप ईमानदार रहे ,कम से कम उन तीन चुनावी भविष्यवाणियों को लेकर।

तीनों में उनका अनुमान भाजपा की ही जीत का था।

  मैं सिर्फ उन तीन चुनावों को ध्यान में रखकर राजदीप के बारे में यह सकारात्मक बात कह रहा हूं।बाकी बातों को लेकर नहीं।उन सबसें से मेरा कोई मतलब नहीं।

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ंइधर कुछ महीनों से मैं हिन्दुस्तान टाइम्स नहीं पढ़ रहा हूं।अपने यहां मंगाये जाने वाले अखबारों की संख्या अब मैंने काफी कम कर दी है।क्योंकि दूसरे काम में लग गया हूं।

इसलिए नहीं कह सकता कि राजदीप ने हाल में क्या लिखा है।

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23 मई 24


 कांग्रेस की पुरानी ‘गति’ जारी !

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बार-बार स्वीकृति,फिर -फिर पुनरावृति !!

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अब पछताए होत का जब चिड़िया चुग गयी खेत ?

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सुरेंद्र किशोर

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2019 के लोक सभा चुनाव की पृष्ठभूमि

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5 सितंबर, 2018 को कुरुक्षेत्र में ब्राह्मण सम्मेलन को संबंोधित 

करते हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था कि 

‘‘कांग्रेस के डी.एन.ए.में ब्राह्मण समाज का खून है।’’

उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘कांग्रेस सत्ता में आई तो ब्राह्मणों को आरक्षण दिया जाएगा।’’

(--अमर उजाला)

सुरजेवाला साहब को लगा था कि कांग्रेस से ब्राह्मण वोट खिसक जाने के कारण ही भाजपा सन  2014 में केंद्र की सत्ता में आ गयी।

सुरजेवाला यह समझ नहीं पाये कि अपवादों को छोड़कर कुल मिलाकर ब्राह्मण एक विवेकशील 

समुदाय है।उसने देशहित में काम किया।

पहले यू.पी.के ब्राह्मणों को मुख्य मंत्री योगी आदित्यराज के प्रति आशंकाएं थीं।

पर जब उन लोगों ने देखा कि योगी अच्छा कर रहे हैं तो ब्राह्मणों ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया।

कम ही लोग जानते हैं कि आजादी की लड़ाई में यू.पी में किसी अन्य जाति की अपेक्षा ब्राह्मण ही अधिक संख्या स्वतंत्रता सेनानी थे।

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2024 के लोक सभा चुनाव की पृष्ठभूमि

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अब राहुल गांधी को यह लगता है कि पिछड़ा वोट भी खिसक जाने से कांग्रेस की हालत पतली हो गयी है तो वे कह रहे हैं कि ‘‘देश का वर्तमान सिस्टम पिछड़ा वर्ग के खिलाफ है।’’   

इस पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि ‘‘शहजादे ने मान लिया है कि उनके पिता जी,उनकी दादी के समय में जो सिस्टम बना, वह एससी- एसटी ओबीसी का विरोधी रहा।’’

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दरअसल मोदी जी इस क्रम में प्रथम प्रधान मंत्री को भूल गये।

50 के दशक में ही जवाहरलाल नेहरू ने मुख्य मंत्रियों को लिख दिया था कि पिछड़ों के लिए कोई आरक्षण लागू नहीं होना चाहिए।

इंदिरा-राजीव सब उन्हीं की राह पर चल रहे थे।

नेहरू ंने काका कालेलकर आयोग की सिफारिश को भी मानने से इनकार कर दिया था।

इतना ही नहीं,नेहरू ने आजादी के तत्काल बाद यह कोशिश की थी कि राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री और उप राष्ट्रपति पदों पर एक ही जाति के नेताओं को बैठना चाहिए।

  राष्ट्रपति पद को लेकर जब कांग्रेस की उच्चस्तरीय बैठक हो रही थी तो नेहरू ने यह धमकी दे दी कि यदि सी.राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति नहीं बनाया जाएगा तो मैं प्रधान मंत्री पद से इस्तीफा दे दूंगा।याद रहे कि उप राष्ट्रपति के लिए डा.एस.राधाकृष्णन का नाम पहले ही तय हो चुका था।

पर,नेहरू की नहीं चली।

सरदार पटेल ने डा.राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनवा दिया।इसके पीछे की नेहरू व बाद के उनके परिवार की मनोवृति पहचानिये।

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आजादी के तत्काल बाद के दशकों में कांग्रेस ने बिहार और उत्तर प्रदेश की विधान सभाओं में पूर्ण बहुमत मिलने पर कभी किसी पिछड़ा को मुख्य मंत्री नहीं बनाया।

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अपनी गलती स्वीकार करना बड़प्पन माना जाता है यदि आपमें उसे सुधारने की भी प्रवृति हो।

पर,ऐसा कांग्रेस ने कभी नहीं किया।समय -समय पर वादा करके कांग्रेस पलटती रही।

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सुशासन का वादा किया गया था।पर,आजादी के तत्काल बाद से ही (जीप घोटाला पहला घोटाला)घोटाले शुरू हो गये।

1985 आते -आते राजीव गांधी के अनुसार 100 सरकारी पैसों में से 85 पैसे बीच में लूट लिए जाते हैं। 

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यह स्वीकारने व सत्ता के दलालों के खिलाफ अभियान चलाने की घोषणा(कांग्रेस के बंबई अधिवेशन में) के बावजूद प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने बोफोर्स दलाली तथा अन्य घोटालों में फंस कर गद्दी गंवा दी।

  उससे पहले प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा देकर 1971 में गरीब जनता से वोट ले लिया।पर सत्ता में आने के बाद 1971 में पहला महत्वपूर्ण काम हुआ सरकारी मदद से संजय गांधी के लिए मारूति कारखाने की स्थापना का काम।

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चरण सिंह को अक्सर लोग ‘‘जाट नेता’’ कहते या लिखते रहे।उन्हें बहुत बुरा लगता था।उन्होंने यह बात एक भेंट वार्ता में मुझे भी बताई थी।

मुझे भी यह अन्यायपूर्ण लगा।

उनके मंत्रिमंडल में सिर्फ एक ही जाट मंत्री अजय सिंह थे।

वह भी राज्य मंत्री।

अन्य प्रधान मंत्रियों के मंत्रिमंडलों में उनकी जाति के मंत्रियों को गिन लीजिए।

मध्य प्रदेश में तो मन लायक कोई नेता मुख्य मंत्री बनाने लायक नहीं मिल रहा था तो नेहरू जी ने विशेष विमान से इलाहाबाद से कैलाशनाथ काटजू को वहां भेज दिया।वहां हवाई अड्डे पर काटजू साहब को चेहरे से पहचानने वाले भी नहीं थे।  

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केंद्र सरकार के विभागों में उच्च पदों पर पिछड़े कर्मियों की संख्या यहां दी जा रही है।यह आंकड़ा सन 1990 का है।

1950 से 1990 तक केंद्र की सरकार में कौन -कौन प्रधान मंत्री थे ?

उन्होंने इस स्थिति को बदलने के लिए क्या किया ?

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विभाग    ---  कुल क्लास वन अफसर ---- पिछड़ी 

                                          जाति 

-----------------------------------राष्ट्रपति सचिवालय --- 48  -------  एक भी नहीं

प्रधान मंत्री कार्यालय--  35 ------      1

परमाणु ऊर्जा मंत्रालय--  34   ------    एक भी नहीं 

नागरिक आपूत्र्ति-----  61  -------  एक भी नहीं 

संचार    ------    52  ------    एक भी नहीं

स्वास्थ्य -------- 240   -------  एक भी नहीं 

श्रम मंत्रालय------   74  --------एक भी नहीं

संसदीय कार्य----    18   ---         एक भी नहीं

पेट्रोलियम -रसायन--  121    ----   एक भी नहीं 

मंत्रिमंडल सचिवालय--   20  ------      1

कृषि-सिंचाई-----   261   -------   13

रक्षा मंत्रालय ----- 1379   ------      9

शिक्षा-समाज कल्याण--  259 -----      4

ऊर्जा ----------  641 -------- 20

विदेश मंत्रालय  ----- 649 -------- 1

वित्त मंत्रालय----    1008 ---------1

गृह मंत्रालय----      409  --------13

उद्योग मंत्रालय--     169----------3

सूचना व प्रसारण--    2506  ------124

विधि कार्य--         143   --         5

विधायी कार्य ---    112    ------ 2

कंपनी कार्य --       247      ------6

योजना---           1262 -----    72

विज्ञान प्रौद्योगिकी ----101  ---     1

जहाज रानी-           103 --        1

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----1990 के दैनिक ‘आर्यावत्र्त’ (पटना दैनिक )से साभार 

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मंडल आरक्षण की रपट सन 1980 में ही केंद्र सरकार को मिल गयी थी।

सन 1980  और सन 1990 के बीच इस रपट पर संसद में 3 बार लंबी-लंबी चर्चाएं हुईं।

कांग्रेस सरकार के गृह मंत्री ने हर बार यह साफ -साफ कह दिया कि इसे लागू नहीं किया जाएगा।

यही नहीं गृह मंत्री से राष्ट्रपति बनने के बाद आर.वेंकट रमण से जब यह गुजारिश की गयी कि आप डा.लोहिया के तैल चित्र का संसद के सेंट्रल हाॅल में लोकार्पण कर दें तो उन्होंने वैसा करने से इनकार कर दिया।

क्यों ?

इसलिए कि लोहिया ने मांग की थी कि पिछड़ों के लिए 60 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए।हालांकि लोहिया 60 प्रतिशत में हर जाति-समुदाय की महिलाओं के लिए भी आरक्षण चाहते थे।

इस इनकार के खिलाफ मधु लिमये ने वेंकट रमण को लंबा पत्र लिखा था।वह पत्र साप्ताहिक पत्रिका ‘‘संडे’’ कलकत्ता में पूरा का पूरा छपा था।

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ऐसी मनावृति वाली कांग्रेस पर अब भला कौन पिछड़ा भरोसा करेगा ?

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लगे हाथ बता दूं, तथाकथित अगड़ी जाति या पिछड़ी जाति के भरोसे जो राजनीतिक दल अभी चल रहे हैं, देर सबेर उनका भी वही हश्र होगा जो कांग्रेस का हो रहा है।

क्योंकि आज विकल्प में एक ऐसा दल खड़ा हो चुका है जो अगला-पिछड़ा-हिन्दू -मुसलमान सबको भरसक समान नजर से देखने की कोशिश कर रहा है।

4 जून को कई लोगों के दिमाग के कूड़े साफ हो जाएंगे।

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इस पृष्ठभूमि में राहुल गांधी की ताजा पिछड़ा समर्थक बयान पर भला कौन भरोसा करेगा ?

घड़ियाली आंसू भी बहुत देर से बहे !!!

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23 मई 24 


सोमवार, 20 मई 2024

 ईष्र्या और कुंठा !!

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कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता,

कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता !

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निदा फाजली ने इस गीत के जरिए बेचैन लोगों को तसल्ली देने की अच्छी कोशिश की है।

 एक हद तक वे इस काम में सफल भी रहे।

फिर भी राजनीति सहित ऐसे विभिन्न क्षेत्रों के अनेक लोग कुछ खास न पाने या दूसरों की अपेक्षा कम पाने के गम में कंुठित और ईष्र्यालु हुए जा रहे हैं।

खुद नहीं मिला तो कुंठा,दूसरे को मिल गया तो ईष्र्या !

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मैंने पिछले दशकों में विभिन्न क्षेत्रों के अनेक लोगों, खास कर राजनीतिक क्षेत्र के अनेक कंुठित और ईष्र्यालु लोगांे को समय से पहले परलोक सिधारते देखा है।

अरे भाई ,ऊपर के बदले जरा नीचे देखो।

और फिर ‘अमृत’ फिल्म के एक मशहूर गाने के इस मुखरे को ही गुनगुना लो--

‘‘दुनिया में कितना गम है,मेरा गम कितना कम है !.....’’

इससे थोड़ी तसल्ली मिलेगी।

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वैसे विभिन्न क्षेत्रों के ईष्यालुओं और कंुंिठत जन के लिए बड़े पेशेवर चिकित्सकों को भी कुछ सलाह जरूर देनी चाहिए।

ये अलग तरह की बीमारियां हैं।

 कंुठित और ईष्यार्लु होने के बाद , पहले से शरीर में पल रहे किस रोग में बढ़ोत्तरी हो जाती है ? 

कौन सा नया रोग शरीर में घर कर जाता है ?

आदि आदि।

ये सवाल तो हैं।

ईष्र्या-कंुठा से मुक्ति के लिए अलग से किसी टबलेट का इजाद हुआ है क्या ं?

यदि नहीं तो अब होना ही चाहिए।

क्योंकि इस रोग के बढ़ने के संकेत हैं।

 वैसी -वैसी हस्तियां भी इस मर्ज की शिकार हो रही हैं जिनके बारे में पहले सोचा तक नहीं गया था। 

नहीं हो तो कोरोना वैक्सीन की तरह युद्ध स्तर पर इजाद क्यों नहीं हो सकता ?

4 जून के बाद उसकी जरूरत बढ़ जाएगी।

कोरोना  वैक्सीन के साइड इफेक्ट की चर्चा इन दिनों है।

पर,सवाल है कि साइड इफेक्ट किस एलोपैथिक दवा में नहीं होता ?

उसमें भी होगा।

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ईष्र्या-कंुठा-जलन नामक त्रिदोष यदि बुजुंर्ग में है तो उनके बाल -बच्चे उन्हंे जरूर समझाएं।

कहें कि ऐसे मर्ज को दिल से न लगाओ।गंभीर बात है।लाइलाज है।

इससे आपकी आयु कम हो जाएगी तो हमें बड़ी तकलीफ होगी।

वैसे भी ईष्र्या-कुंठा-जलन से तो कोई भौतिक लाभ होता नहीं।

अच्छे-खासे  व्यक्तित्व में भी ओछापन जरूर आ जाता है।अपना अच्छा-खासा स्वास्थ्य गला लेते हैं सो अलग।

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17 मई 24