जैसा संस्कार,सदन में वैसा ही आचरण !
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किसी ने पूछा--भाई, इन दिनों संसद में क्या हो रहा है ?
कौन क्या कर रहा है ?
जवाब मिला--जिसने जो कुछ सीख रखा है,जिसका जैसा संस्कार है,वह वैसा आचरण संसद में कर रहा है।
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सुरेंद्र किशोर
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एक पुराना किस्सा जानिए --
एक बार हंसोड़ पीलू मोदी ने संसद में कहा था-
‘‘प्याज खाने वाला यहां प्याज दिखा रहा
और चप्पल खाने वाला यहां चप्पल दिखा रहा’’
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बहुत पहले की बात है।
लोक दल के रामेश्वर सिंह एक दिन प्याज की माला पहन कर राज्य सभा पहुंच गए।
इस तरह वे महंगी के खिलाफ सदन में शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे।
सत्ता पक्ष यानी कांग्रेस के अदमनीय नेता कल्पनाथ राय ने अपनी चप्पल अपने हाथ में ले ली और उसे रामेश्वर सिंह की ओर दिखाने लगे।
इस पर सदन हंगामा हो गया।
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उस पर पीलू मोदी ने इन शब्दों में सदन के तनाव को हल्का किया--
‘‘प्याज खाने वाला प्याज दिखा रहा है और चप्पल खाने वाला चप्पल दिखा रहा है।’’
शुक्र है कि उसके बाद भी सदस्य गण सदन में आपस में हाथापाई पर नहीं उतरे।
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अब आगे यह कहने की जरूरत नहीं है कि जिस सदस्य ने जो ‘‘विद्या’’ अपने बाल्यकाल से लेकर जवानी तक सीखी है,उसी का तो प्रदर्शन वे संसद व विधान सभाओं में और उसके बाहर भी इन दिनों कर रहे हैं।
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दूसरी ओर ,साठ-सत्तर के दशकों के पढ़ाकू नेतागण जो जनता की समस्याओं के प्रति गंभीर थे, क्या-क्या करते थे ?
समाजवादी नेता मधु लिमये --संसद से समय बचता था तो मधु जी आॅटो रिक्शा से लाइब्रेरी चले जाते थे।(किसी व्यापारी को इशारा कर देते तो उनके लिए कार-ड्रायवर का तुरंत प्रबंध हो जाता।पर,उनके आवास में भी न तो ए.सी. और न ही फ्रीज।जब सांसद नहीं रहे तो अखबारों में लेख लिखकर गुजारे लायक पैसा कमाते थे।
एक संपादक ने मुझसे कहा था कि जब पारिश्रमिक भेजने में देर हो जाती थी तो मधु जी फोन कर देते थे।
जब दिन के फस्र्ट हाफ में कोई नेता या कार्यकर्ता उनसे मिलने जाते थे तो मधु जी उनसे कह देते थे कि शाम में आइएगा।यह मेरे लिखने का समय है।इसी के पैसे से मेरा खर्च चलता है।
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पर, जब संसद में मधु लिमये बोलने के लिए खड़ा होते थे तो सत्ता बेंच पर बैठे मंत्रियों को सिहरन होने लगती थी।पता नहीं,आज किस मंत्री की बारी है !!क्योंकि उनके पास तथ्य होते थे -संसदीय ज्ञान भी।
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सदन में गला फाड़ने,कनखी मारने ,पी.एम. से गला मिलने,सदन में ही सो जाने या अशिष्ट व्यवहार करने वाला वह जमाना नहीं था।तब माकपा के ज्योतिर्मय बसु,प्रसपा के नाथ पै ,भाकपा के हीरेन मुखर्जी तथा भारतीय जनसंघ के भी कई सांसद,सदन में अपनी प्रभावशाली भूमिका निभाते थे।
उस कारण समाज भी लोग उनकी इज्जत करते थे।ज्योतिर्मय बसु के आवास स्थित लाइब्रेरी में उन दिनों प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जाया करते थे, बसु साहब को मदद करने के लिए।
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मधु लिमये और बसु के अलावा भी अन्य कई सांसद थे जो बोलने के लिए खड़े होते थे तो पूरा सदन उन्हें सुनता था।
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आज क्या होता है ?
कुछ साल पहले कांग्रेस की एक महिला सांसद को सदन में यह कहते मैंने सुना था--‘‘मैं तो यहां बोलना चाहती हूं,पर मेरी पार्टी के नेता कहते हैं कि हंगामा करो।’’
लोक सभा को ‘‘हंगामा सभा’’(मैं यहां इससे अधिक कठोर शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं।) में बदल देने के कारण नये सांसदों को सीखने का अवसर नहीं मिलता।संसदीय लोकतंत्र के लिए यह अच्छी बात नहीं है कि अपवादों को छोड़ कर देश के किसी भी सदन में न तो कार्य संचालन नियमावली का पालन हो रहा है और न ही अखिल भारतीय पीठासीन सम्मेलनों की सिफारिशों का।
इतिहास एक दिन पूछेगा कि इसके लिए कौन अधिक और कौन कम जिम्मेदार रहा ?
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24 जुलाई 26