Friday, June 22, 2018

--देर हो जाने से पहले भ्रष्टाचार पर नये ढंग से सोचे यह देश-



बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के पूर्व अध्यक्ष तथा कुछ अन्य घोटालेबाज अभी जेल में ही हैं।इसके बावजूद इस साल गोपाल गंज से यह खबर आई कि  वहां से करीब  42 हजार उत्तर पुस्तिकाएं गायब हैं।
अन्य मामलों में राज्य के कई नेता और अफसर जेल में हैं, इसके बावजूद यह खबर आई कि सिर्फ 14 प्रतिशत सीमेंट मिलाकर बांध बना दिया गया।ऐसे बांध को टूटना ही है और लोगों को मरना ही है।यह भी तो हत्या ही है।
  जस्टिस  उदय सिंहा जांच आयोग की रपट के अनुसार 2002 से 2006 के बीच बिहार में सिर्फ एक मद में 216 करोड़ रुपए का घोटाला हुआ था।
‘काम में बदले अनाज योजना’ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी।
यह इस बात के बावजूद हुआ कि तब तक बिहार के कुछ घोटालों के सिलसिले में बड़े अफसर भी जेल जा चुके थे।
 ये 216 करोड़ रुपए यदि गरीब मजदूरों तक पहुंचते तो उनमें से अनेक मजदूरों को कुपाषण व भुखमरी से बचाया जा सकता था।कोई भी सरकार भुखमरी की घटना को तो स्वीकार नहीं करती।न करे !
पर कुपोषण जनित बीमारी तो होती ही है।ऐसे गरीब बीमार के लिए कई सरकारी अस्पतालों में दवाएं तक नहीं होतीं।
उनमें से कई बीमारों की जान भी चली जाती है।
यह परोक्ष हत्या नहीं है तो क्या है ?  
 यानी क्या ऐसा घोटाला किसी हत्या से कम  है ?
फिर सजा साधारण अपराध मान कर क्यों ?
  ऐसे ‘गरीब मारक घोटाले’ इस गरीब देश  में जब -तब जहां -तहां होते ही रहते हैं।गिरफ्तारियों व अदालती सजाओं के बावजूद उनकी पुनरावृति भी होती रहती है।इस देश में अधिकतर छोटे-बड़े घोटालेबाज जितने निडर,बेशर्म और मुंहजोड़ होते हैं,उतने शायद ही किसी अन्य देश में होंगे।
यहां जेल यात्राओं और सजाओं का कोई भय घोटालेबाजों को नहीं डरा पा रहा है।क्या सजाएं कम हैं इसलिए डर भी नहीं है ? सबक सिखाने लायक सजा कब मिलेगी ?क्या विधि आयोग और हमारे हुक्मरान इस बिंदु पर कभी विचार करेंगे ?
वैसे भी यदि भ्रष्टाचार के कारण किसी की जान जाती है तो भ्रष्टाचारियों के लिए फांसी का ही प्रावधान तो होना ही चाहिए।न्याय की मंशा तो यही कहती है।जिस देश में अपराधियांें को तौल कर सजा नहीं मिलती,वहां की अगली पीढि़यों का भविष्य भी असुरक्षित हो जाता है।
  क्या हमारे रहनुमा कभी इस स्थिति पर गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे ?क्या अगली पीढि़यां उनके ध्यान में हैं ?
ठीक ही कहा गया है कि ‘नेता अगला चुनाव देखता है और ‘स्टेट्समैन’ अगली पीढ़ी।’ 
--पनामा पेपर्स की नयी किस्त--
दो साल पहले पनामा पेपर्स का मामला चर्चित हुआ था।
पनामा पेपर्स की नयी किस्त के बारे में आज भी एक खबर आई है।
याद रहे कि पनामा के एक फर्म से संबंधित यह मामला है।
वह फर्म भारत सहित अनेक देशों के अमीरों को अपने देश में टैक्स चुराने में मदद करता है।
दो साल पहले भी कुछ टैक्स चोर भारतीयों के नाम आए थे।इस बार के पनामा पेपर्स में भी कुछ भारतीयों के नाम हैं।
यदि टैक्स चोर भारत सरकार को कर अदा कर देते तो उन पैसों से कुछ और अस्पताल व स्कूल यहां खोले जा सकते थे।
--नेहरू के अधूरे सपने को पूरा करें मोदी--
 मौजूदा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को चाहिए कि वह देश के प्रथम प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू के अधूरे सपने को अब तो पूरा कर दें !
  आजादी के तत्काल बाद नेहरू जी ने कहा था कि ‘काला बाजारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका देना चाहिए।’जहां तक मेरी जानकारी है कि नेहरू की इस राय का किसी ने विरोध नहीं किया था। फांसी के खिलाफ अभियान चलाने वालों ने भी नहीं।
वैसे काला बाजार की अपेक्षा काफी अधिक जघन्य काम आज हो रहे हैं।
नीरव मोदी पर तो 12 हजार करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप है।
नरेंद्र मोदी को चाहिए कि वे अगले 15 अगस्त को  लाल किले से यह घोषणा कर दें  कि हम भ्रष्टाचारियों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान करने जा रहे हैं ।यदि वे करेंगे तो  किसी  सरकार विरोधी संगठन , नेता या व्यक्ति को उसका विरोध करने का नैतिक हक नहीं होगा।क्योंकि वे अब भी नेहरू की उस राय के खिलाफ न बोलते हैं और न ही लिखते हैं।
  कुछ साल पहले यू.पी.के पूर्व डी.जी.पी. प्रकाश सिंह ने एक रिसर्च के हवाले से कहा था कि ‘जब एक हत्यारे को फांसी होती है तो हत्या करने के लिए उठे अन्य  सात हाथ अपने -आप रुक जाते हैं।’  
  -- कश्मीर पर सुप्रीम कोर्ट की राय--
17 दिसंबर, 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि
जम्मू कश्मीर की भारतीय संविधान के बाहर  और अपने संविधान के अंतर्गत रत्ती भर भी संप्रभुता नहीं है। उसके नागरिक सबसे पहले भारत के नागरिक हैं।
 सर्वोच्च अदालत ने जम्मू कश्मीर  हाई कोर्ट के एक तत्संबंधी निष्कर्ष को पूरी तरह गलत करार देते हुए यह टिप्पणी की।
हाई कोर्ट ने कहा था कि राज्य को अपने स्थायी नागरिकों की अचल संपत्तियों के संबंध में उनके अधिकार से जुड़े कानूनों को बनाने में पूर्ण संप्रभुता है।
 न्यायमूत्र्ति कूरियन जोसेफ और  न्यायमूत्र्ति आर.एफ.नरीमन के पीठ ने कहा कि जम्मू कश्मीर को भारतीय संविधान के बाहर और अपने संविधान के तहत रत्ती भर भी संप्रभुता नहीं है।राज्य का संविधान भारत के संविधान के अधीनस्थ है।
पीठ ने कहा कि उसके निवासियों का खुद को एक अलग और विशिष्ट के रूप में बताना पूरी तरह गलत है। 
   --जेटली की सदाशयता--
किडनी प्रत्यारोपण के बाद नई  दिल्ली के एम्स से लौटे अरूण जेटली ने वहां के रेजिडेंट डाक्टरों को व्यक्तिगत पत्र लिख कर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की।
किसी मंत्री ने अपने इलाज के बाद किसी सरकारी अस्पताल के डाक्टरों के प्रति ऐसी कृतज्ञता जाहिर की है,यह मैंने पहली बार सुना।शायद मंत्री समझते हैं कि डाक्टरों की तो यह ड्यूटी ही है।
पर, जेटली से  व्यक्तिगत  पत्र पाकर रेजिडेंट ने कैसा महसूस किया होगा,उसकी कल्पना कीजिए।
मेरी तो राय है कि कोई सामान्य मरीज भी किसी सरकारी या गैर सरकारी अस्पताल से चंगा होकर निकले तो उसे घर जाकर अस्पताल को एक पत्र लिख देना चाहिए।
इससे चिकित्सकों का मनोबल और आत्म विश्वास बढ़ेगा और वे और भी अधिक तत्पर रहने की कोशिश करेंगे।
ऐसा नहीं है कि चिकित्सक इलाज में लापरवाही या गड़बडि़यों नहीं करते। पर अनेक चिकित्सक अपने काम बहुत अच्छे ढंग से करते हैं।
--‘टिस’ की सराहनीय भूमिका--
‘टिस’ यानी टाटा इंस्टिच्यूट आॅफ सोशल साइसेंस।
मुम्बई के इस प्रतिष्ठित संस्थान की आडिट रिपोर्ट में 
यह बताया गया था कि मुजफ्फर पुर स्थित बालिका गृह में यौन हिंसा और  शोषण जारी है।
 शासन ने उस रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की।
बालिका गृह के संरक्षणकत्र्ता सहित कई जेल भेजे गए।
मुकदमे कायम किए गए।
लगता है कि उससे पहले सब कुछ ऊपरी मेलजोल या अनदेखी से हो रहा था।
 इस देश में ‘टिस’ जैसे कुछ संगठन अब भी बचे हैं जहांं के लोगों पर आप जिम्मेदारी देंगे तो वे विपरीत परिस्थितियों में भी अपने काम ईमानदारी व निर्भीकतापूर्वक करेंगे।
      -- और अंत में--
उत्तर प्रदेश में सिपाही भत्र्ती परीक्षा, 2018  में पास कराने के लिए बिहार से ‘साॅल्वर’ बुलाये गये थे।
वे  पकड़े गए।
पता नहीं, उन्हें यू.पी.में सजा हो पाएगी या नहीं।पर बिहार सरकार चाहे तो उन्हें राज्य में प्रवेश करने से रोक ही सकती है।यदि इस संबंध में कोई नियम नहीं है तो बनाना चाहिए।
यदि अपराधियों को ‘जिला बदर’ किया जा सकता है तो 
परीक्षा नकल के माफियाओं को राज्य से बाहर क्यों नहीं किया जाना चाहिए ?यह कचरा बाहर ही रहे तो बिहार को ठीक -ठाक करने में सुविधा होगी।
@ 22 जून, 2018 को प्रभात खबर -बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@

Thursday, June 21, 2018



स्वामी रामदेव यानी पतंजलि के बिस्किट
की अपेक्षा मुझे श्रीश्री रविशंकर के बिस्किट 
बेहतर लगे।हालांकि पतंजलि के बिस्किट खराब नहीं हैं।
  कुछ अन्य लोगों को भी बेहतर लगे होंगे।
यह खबर जब पतंजलि प्रबंधन तक पहुंचेगी तो वह  अपने बिस्किट को बेहतर बनाने की शायद कोशिश करेगा ,ऐसी उम्मीद है।पर लगता है कि  पतंजलि की शिकायत शाखा अभी बहुत कमजोर है।बिस्किट तो एक उदाहरण है।अन्य सामग्री पर भी देर -सवेर यह बात लागू हो सकती है।
  जहां एक तरफ इस देश में सरकारी अफसरों-कर्मचारियों  की मदद से देश भर में खाद्य,भोज्य पदार्थ,दवा तथा अन्य उपभोक्ता सामग्री को अधिक से अधिक मिलावटी व जहरीला बनाने की होड़ लगी हुई  है,वहीं रामदेव और रवि शंकर मानवता की सेवा कर रहे हैं।
मैंने कभी नहीं कहा कि रामदेव योग गुरू से व्यापारी-उद्योगपति बन गए हैं।यही बात मैं श्री श्री के बारे में भी नहीं कह सकता।
 आप मिलावटी , जहरीली सामग्री खा-पीकर जितना भी योग प्रणायाम करेंगे,आपको कोई लाभ नहीं मिलेगा।
मुझे लगता है कि राम देव और रवि शंकर इसी बात को ध्यान में रखकर उत्पादन के इस क्षेत्र में आए हैं।
यदि उत्तर प्रदेश सरकार ने नियम को शिथिल करके नोयडा में स्वामी राम देव की कंपनी को मेगा फूड पार्क के लिए जमीन दे दी है तो उसकी सराहना होनी चाहिए न कि आलोचना। मेगा फूड पार्क से आसपास के किसानों को भी लाभ होगा।
एक बात तो तय है कि स्वामी राम देव पटना जंक्शन के  दूध मार्केट की तरह कभी जहरीली पनीर तो नहीं ही बेचेंगे।
पर हां,पतंजलि प्रबंधन जो सामग्री आउटसोर्स करके तैयार करवाता है,उसकी गुणवत्ता पर उसे तत्काल ध्यान देना चाहिए।क्योंकि पतंजलि का एलोवेरा,जो मैं रोज लेता हूं, मुझे  पहले जैसा अब अच्छा नहीं लगता।
पतंजलि का आटा लेना तो मैंने पहले ही छोड़ दिया है।
पर जो अन्य सामग्री मैं लेता हूं,उसके बारे में कोई शिकायत नहीं है।
   

----पीने वालों से अधिक बेचने-बेचवाने वालों पर कड़ी नजर रखे शासन --सुरेंद्र किशोर---


मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कठोर शराब बंदी कानून में कुछ संशोधन का कल संकेत दिया है।याद रहे कि 2 नवंबर, 2016 को भी मुख्य मंत्री ने कहा था कि ‘इस कानून को कुछ लोग  तालीबानी कानून तो जरूर कहते हैं ,पर मांगने पर भी वे इसमें ऐसे किसी संशोधन के लिए कोई सुझाव नहीं देते ताकि इसे कारगर भी बनाये रखा जाए और इससे किसी को नाहक परेशान भी नहीं होना पड़े।’
 दरअसल अब ऐसे किसी संशोधन से पहले राज्य सरकार को इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट  के निर्णय का इंतजार है।उससे पहले 
 इस कानून के क्रियान्वयन में आ  रही  समस्याओं को लेकर 
राज्य सरकार खुद भी विचार -मंथन करती रही है।
किसी भी अच्छी मंशा वाली सरकार को ऐसा करना ही चाहिए।
 शराबबंदी अच्छी मंशा से उठाया गया एक सही कदम हैं।इसके लाभ अधिक हैं।इस कानून का कुछ लोगों द्वारा  दुरूपयोग भी हो रहा है।पर,इससे पीछे नहीं जाया जा सकता है।
  स्वाभाविक ही है कि कुछ भ्रष्ट अधिकारी व कर्मचारी ऐसे कठोर कानून का स्वार्थवश दुरूपयोग करें।
  अनुभवों से सीख कर राज्य सरकार उस कानून में संशोधन करना चाहती है तो उसका स्वागत होना चाहिए।
कुछ संशोधनों  से इस कानून का सार्थकता बढ़ सकती है।
 पहला काम तो यह होना चाहिए कि यह कानून शराब बिक्रेताओं की ओर अपेक्षाकृत अधिक मुखातिब हो।
फिर शासन के उन लोगों की ओर जो लोग बिक्रेताओं की मदद कर रहे हैं।
 शराबियों पर भी कार्रवाई हो ,पर अधिक ध्यान उन दो लोगों पर रहे।वैसे भी यदि शराब को दुर्लभ वस्तु बना दिया जाए तो वह शराबियों तक कितनी पहुंच पाएगी ?
 यह आम चर्चा  है कि शराबबंदी के बाद अनेक पुलिसकर्मियों की आय बढ़ गयी है। 
 एक खबर के अनुसार गुजरात में दवा के नाम पर 61 हजार लोगों को शराब पीने का परमिट मिला हुआ है।
बाहर से गुजरात जाने वालों को भी अस्थायी परमिट मिलता है।पर ऐसे परमिट की कुछ शत्र्तें हैं।डाक्टर का प्रमाण पत्र चाहिए  जिसमें यह लिखा होता है कि ‘इनकी शारीरिक- दिमागी हालत ऐसी है कि इनके लिए शराब पीना जरूरी है।’
 सन 1977 में देश में शराबंदी लागू हुई थी।उस समय बिहार में भी हमने देखा था कि डाक्टरों की सिफारिश पर शासन  परमिट जारी करता था।
 बिहार में 2016 में जब शराबबंदी लागू की गयी तो इन बातों का ध्यान नहीं रखा गया।यहां तक कि दवा के नाम पर भी कोई छूट नहीं रही जैसी मोरारजी देसाई -कर्पूरी ठाकुर के शासन काल में भी थी।
  शराबबंदी के निर्णय को उलटना तो और भी नुकसानदेह होगा।हालांकि बहुत से लोग यही चाहते हैं।पर विभिन्न पक्षों के लोगों को कुछ राहत देकर इसे आसानी से लागू करने का रास्ता बनाया जा सकता है।अभी तो जो खबरें आ रही हैं,उनके अनुसार बिहार में शराबबंदी है भी और नहीं भी है।हां,पियक्कडों ने सड़कों पर हंगामा काफी कम कर दिया है।
 पहले तो बारात जुलूस,सरस्वती मूत्र्ति विसर्जन ,दुर्गा पूजा आदि के अवसरों पर सड़कों पर निकलना कठिन था। 
  हां, इस कानून से ऐसे लोगों को राहत देने की सख्त जरूरत है जिनके पास जमानत देकर छूटने का साधन तक नहीं।
 हां,आदतन शराबियोंं को,जो यदाकदा शराब पीकर सार्वजनिक स्थानों पर हंगामा करते हैं,परिजन को प्रताडि़त करते हैं,सजा स्वरूप कुछ सरकारी सुविधाओं से वंचित करने के बारे में विचार किया जा सकता है।
@---प्रभात खबर - बिहार - 7 जून, 2018@ 

Wednesday, June 20, 2018



स्वामी रामदेव यानी पतंजलि के बिस्किट
की अपेक्षा मुझे श्रीश्री रविशंकर के बिस्किट 
बेहतर लगे।हालांकि पतंजलि के बिस्किट खराब नहीं हैं।
  कुछ अन्य लोगों को भी बेहतर लगे होंगे।
यह खबर जब पतंजलि प्रबंधन तक पहुंचेगी तो वह  अपने बिस्किट को बेहतर बनाने की शायद कोशिश करेगा ,ऐसी उम्मीद है।पर लगता है कि  पतंजलि की शिकायत शाखा अभी बहुत कमजोर है।बिस्किट तो एक उदाहरण है।अन्य सामग्री पर भी देर -सवेर यह बात लागू हो सकती है।
  जहां एक तरफ इस देश में सरकारी अफसरों-कर्मचारियों  की मदद से देश भर में खाद्य,भोज्य पदार्थ,दवा तथा अन्य उपभोक्ता सामग्री को अधिक से अधिक मिलावटी व जहरीला बनाने की होड़ लगी हुई  है,वहीं रामदेव और रवि शंकर मानवता की सेवा कर रहे हैं।
मैंने कभी नहीं कहा कि रामदेव योग गुरू से व्यापारी-उद्योगपति बन गए हैं।यही बात मैं श्री श्री के बारे में भी नहीं कह सकता।
 आप मिलावटी , जहरीली सामग्री खा-पीकर जितना भी योग प्रणायाम करेंगे,आपको कोई लाभ नहीं मिलेगा।
मुझे लगता है कि राम देव और रवि शंकर इसी बात को ध्यान में रखकर उत्पादन के इस क्षेत्र में आए हैं।
यदि उत्तर प्रदेश सरकार ने नियम को शिथिल करके नोयडा में स्वामी राम देव की कंपनी को मेगा फूड पार्क के लिए जमीन दे दी है तो उसकी सराहना होनी चाहिए न कि आलोचना। मेगा फूड पार्क से आसपास के किसानों को भी लाभ होगा।
एक बात तो तय है कि स्वामी राम देव पटना जंक्शन के  दूध मार्केट की तरह कभी जहरीली पनीर तो नहीं ही बेचेंगे।
पर हां,पतंजलि प्रबंधन जो सामग्री आउटसोर्स करके तैयार करवाता है,उसकी गुणवत्ता पर उसे तत्काल ध्यान देना चाहिए।क्योंकि पतंजलि का एलोवेरा,जो मैं रोज लेता हूं, मुझे  पहले जैसा अब अच्छा नहीं लगता।
पतंजलि का आटा लेना तो मैंने पहले ही छोड़ दिया है।
पर जो अन्य सामग्री मैं लेता हूं,उसके बारे में कोई शिकायत नहीं है।
   

कश्मीर में पाकिस्तान अघोषित युद्ध लड़ रहा है।
कोई एक देश किसी दूसरे देश के खिलाफ घोषित या अघोषित युद्ध करता है 
तो दूसरे देश की सरकार और जनता क्या करती है ?
जम कर जवाब देती है।
पर अपने देश में क्या हो रहा है ?कौन क्या कर रहा है ?
यह गौर से  देखना है और उसके अनुसार अपनी रणनीतियां बनानी है।
दरअसल बंगला देश के निर्माण के बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फीकार अली भुट्टो ने कहा था कि भारत ने हमें एक घाव दिया है,हम उसे हजार घाव देंगे।
पाकिस्तान उसी लक्ष्य पर  काम करता रहा है।
 यदि वह कश्मीर में सफल हो गया तो उसका रुख केरल और पश्चिम बंगाल की ओर हो सकता है।
उन राज्यों में कुछ राजनीतिक दल पाकिस्तान के लिए अनुकूल पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं।
  भारत के देशप्रेमियों के साथ दिक्कत यह है कि उन्हें  एक साथ कई  मोर्चों पर लड़ना पड़ रहा है।
 भीतर के जयचंदों के खिलाफ भी और बाहर के हमलावरों के खिलाफ भी।
  ऐसे में इस देश को ‘टुकड़े-टुकड़े गिरोह’ से कैसे बचाना है,यह सोचना हर देशभक्त नागरिक का कत्र्तव्य है।यह एक कठिन समय है।ऐसे समय में ही अनेक लोगों की पहचान हो जाती है।
1962 में जब चीन ने हम पर हमला किया था,तब भी अनेक लोगों की पहचान हो गयी थी।


Tuesday, June 19, 2018

मेरे बाबू जी !

      

  हम तीनों भाई उन्हें ‘बाबू जी’ ही कहते थे और वे हमें ‘बबुआ।’बड़का बबुआ।मझिला बबुआ और छोटका बबुआ।
मेरी मां के साथ भी उनका व्यवहार आदरपूर्ण था।
  अधिक पढ़े -लिखे तो नहीं थे,पर परंपरागत विवेक से परिपूर्ण थे।
साढ़े छह फीट के लंबा- चैड़ा कसरती शरीर और दबंग व्यक्तित्व।
मेरे जन्म के समय हमारे परिवार के पास 22 बीघा जमीन थी।
दो बैल, एक गाय और एक भैंस।
 दो नौकर ।खेत जोतने -जोतवाने में आस -पड़ोस के किसान एक दूसरे की मदद करते थे।हमारे हल-बैल कभी उनके खेत में तो कभी उनके बैल -हल  हमारे खेत में।
बाबू जी लघुत्तम जमींदार थे और एक बड़े जमींदार के तहसीलदार।जीवन में पहली बार कोई छपा हुआ कागज जो मैंने देखा था,वह अपनी जमींदारी की रसीद बही थी--उस पर  छपा था-‘मालिक बाबू शिवनंदन ंिसंह, साकिन -सखनौली टोले -भरहा पुर,जिला-सारण।’
रसीद के प्रत्येक पन्ने पर सारण के कलक्टर की मुहर लगी होती थी।
 बिक- बाक के अब तो हमारे संयुक्त परिवार के पास दस बीघा जमीन बच गयी है।
मेरे गांव के पृथ्वीनाथ त्रिपाठी मेरे बाबू जी के दोस्त थे।मुजफ्फर बी.बी.काॅलेजियट स्कूल में प्राचार्य थे।
मेरे राजेंद्र भैया मुजफ्फर पुर में उन्हीं के यहां रह कर पढ़ते थे।पर वे अधिक पढ़-लिख नहीं सके।दमा के मरीज थे।अब नहीं रहे।
मुझे और मेरे छोटे भाई नागेंद्र को बाबू जी खूब पढ़ाना चाहते थे।पढ़ाया भी।उसके लिए उन्हें जमीन भी बेचनी पड़ी।
गांव के बगल के एक मुखिया जी ने एक बार बाबू जी से कहा कि ‘सोना अइसन जमीन के बेच के लडि़कन के पढ़ावत बानी।इ सब पढ़ लिख के शहर में बस जइहन स।रउआ का मिली ?
बाबू जी बोले ,तोहरा ना बुझाई।सोना बेच के हीरा खरीदत बानी।
पढ़ जइहन स त संतोष होई।अच्छा लागी।आउर का चाहीं ?
हमरा खाए -पिए के काफी बा।
आज भी हमलोगों का परिवार एक ही साथ है।सब अपनी जिंदगी -नौकरी से संतुष्ट हंै।यह सब कुछ उनके ही कारण है जिन्होंने एक  किसान परिवार के स्वरूप की कायापलट  की आधारशिला रख दी थी।
  उन दिनों आसपास के किसी ऐसे किसान को मैं नहीं जानता था  जिसने अपनी जमीन बेच कर अपने बाल -बच्चों को पढ़ाया-लिखाया हो।
इस मामले में मेरे बाबू जी आदर्श थे।
रामायण पढ़ते थे।
मालगुजारी की रसीद कैथी भाषा में काटते थे।गांव -जवार की पंचायती में जाते थे।
हमें सिखाते थे कि केहू से उलझला के जरूरत नइखे।
छोट लकीर के सामने अपन बड़ लकीर खींच द।उ अपने छोट हो जाई।
बाबू जी अपना  फोटो खंींचवाने के खिलाफ थे।
पर आखिरी दिनों में  एक फोटो खींचवा लिया गया था।वह कहीं रखा हुआ  है।मिलेगा तो उसका भी कभी इस्तेमाल होगा।
  


 यहां थोड़े से अपवादों की बात नहीं कर रहा हूं।
जिस देश की मुख्य धारा की राजनीति व उसके अधिकतर राज नेताओं के समक्ष भ्रष्टाचार, जातिवाद,एकांगी  धर्मनिरपेक्षता   और वंशवाद के खिलाफ बोलना-लिखना  ईश-निंदा के समान हो  ।दूसरी ओर जहां सदाचार, ईमानदारी,जन सेवा  तथा  शुचिता के पक्ष में बोलने-लिखने  को बेवकूफी या कभी -कभी ‘अपराध’ की श्रेणी में रखा जाए,तो वहां की  लोकतांत्रिक व्यवस्था के  भविष्य को कितना सुरक्षित माना जाना चाहिए ? 
 संभव है कि यह सब अभी पूरी तरह खुलेआम नहीं हो रहा हो।पर, इसी तरह के कर्मों,बोलियों और मानसिकता  के संकेत मिलने शुरू हो चुके हैं। 
हां, इस बिगड़ती स्थिति के बावजूद अत्यंत थोड़े से अपवाद अब भी राजनीति में भी है और कुछ नेताओं में भी।क्या 1947 में किसी ने कल्पना की थी कि सौ साल पूरे होने से पहले ही इस देश की मुख्य धारा की राजनीति इतनी पतित हो जाएगी ?