शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

 मैं जानता हूं कि मेरी बात कोई नहीं सुनेगा।

पर, चेतावनी देना मैं अपना नागरिक कत्र्तव्य समझता हूं।

कल यह तो कोई नहीं कहेगा कि पहले चेताया क्यों नहीं था ! 

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सुरेंद्र किशोर

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घर का ही बनाया खाइए।

अपनी जमीन हो तो घर का ही उपजाया खाइए।

बाकी तो कदम- कदम पर खतरा है--

डेग- डेग पर कैंसर है ।

सरकारें दूसरे कामों में व्यस्त हैं।

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समस्या की गंभीरता को देखते हुए सरकारों को चाहिए कि वे मिलावट को रोकने के लिए एक अलग विभाग बनाए।

जिस तरह बाहर के दुश्मनों को रोकने के लिए रक्षा मंत्रालय बनाया गया है।

मिलावट खोरों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान हो।

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12 अगस्त 26 


शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

 आपातकाल के काले दिन 

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बिशन टंडन की डायरी से

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23 जुलाई 1975

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...........प्रधान मंत्री का प्रजातंत्र बचाने का पाखंड झूठे प्रचार पर ही तो अधारित है।

शारदा (प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार एच.वाई.शारदा प्रसाद)का अन्तर व्यथित है।

पर,झूठे तर्क को उसके विभिन्न रूपों में उसे लिखना पड़ रहा है।

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हर महत्वपूर्ण नियुक्ति के लिए प्रधान मंत्री, संजय गांधी की राय लेती हैं।

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शारदा, जिस प्रकार संेसर का कार्य किया जा रहा है,उससे भी बहुत असंतुष्ट व खिन्न है।

उसका कहना है कि प्रधान मंत्री इस संबंध में कुछ उदारता दिखाने के पक्ष में हैं,पर संजय व अन्य लोग जो प्रधान मंत्री निवास से सब बातों पर नियंत्रण रख रहे हैं,कठोर संेसर के पक्ष में हैं।

पिछले रविवार को मंत्रि परिषद की बैठक में सेंसर आदि पर बातें हुईं।

उसमें प्रधान मंत्री ने कहा कि यदि प्रतिपक्ष संसद में वाक-आउट करे तो उसे समाचार पत्रों में छपने देना चाहिए।

  प्रायः सभी मंत्रियों की यही राय थी।

पर बाद में महल के सिपहसालारों का निर्णय दूसरा हुआ।

(आज जो लोग अक्सर गोदी मीडिया की बातें करते हैं,उन्हें यह पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए।साथ ही, यह भी बताना चाहिए के आज के गांधी परिवार की मानसिकता इमरजेंसी की इंदिरा गांधी की मानसिकता से कितनी भिन्न है ?)

आज लोक सभा में मीसा का संशोधन प्रस्तुत किया गया।

मावलंकर ने उसका विरोध किया।

पर,होता क्या है इस विरोध से ?

..... कल के जगजीवन राम के भाषण का आकाशवाणी ने पूरा प्रसारण किया।उसके विपक्ष में जो कुछ कहा गया,वह बिलकुल नहीं बताया गया।

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आज (मशहूर वकील )पालकीवाला प्रधान मंत्री से मिले।

प्रधान मंत्री से पहले वे शेषन से मिले।

आजकल जो कुछ हो रहा है,उससे उन्हें (पालकीवाला को )बहुत क्लेश पहुंचा है।

उनकी राय है कि हमारा संविधान नष्ट हो गया।

 इस सबकी आवश्यकता नहीं थी।

बात करते- करते उनकी आंखें भर आईं।

भ्विष्य बड़ा अंधकारमय है।

पालकीवाला तो दो साल से यही कह रहे हैं कि हमारे संविधान को विकृत किया जा रहा है।

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(आई.ए.एस.अफसर बिशन टंडन आपातकाल में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के संयुक्त सचिव थे।

रिटायर होने के बाद टंडन साहब बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक बने।मैं कुछ साल तक उस फाउंडेशन की ज्यूरी का मेम्बर था।--सुरेंद्र किशोर) 

 


 

 


शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

 बवानी इमली हत्याकांड

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अंग्रेजों ने सन 1858 में यू.पी. के 52 स्वतंत्रता सेनानियों को 

एक साथ इमली के पेड़ पर लटका कर फांसी दे दी थी।

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हमारे देश के किस इतिहासकार ने इस घटना का पूरा व्योरा

लिखा है ?

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सुरेंद्र किशोर

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अंग्रेजों ने 28 अप्रैल ,1858 को यू.पी.के फतेहपुर में ठाकुर जोधा सिंह 

सहित बावन स्वतंत्रता सेनानियों को इमली के पेड़ पर लटका कर 

फांसी दे दी थी।

एक महीने तक लाशें पेड़ पर ही लटकी रहीं।अंग्रेजों ने उन्हें 

उतारने नहीं दिया ताकि अंग्रेजों का दबदबा कायम रहे और 

भयवश उसके खिलाफ कोई सिर न उठा सके ।

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क्या इस घटना का जिक्र किसी पाठ्य पुस्तक में हुआ है ?

किस इतिहासकार ने अलग से इस पर विस्तार से लिखा है ?

 ऐसी जघन्य घटना दुनिया के इतिहास में अन्यत्र भी हुई है या

भारत में ही यह अनोखी घटना हुई--

यानी 52 लोगों को एक साथ पेड़ पर लटका कर फांसी देने 

की अनोखी घटना !

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31 जुलाई 26


बुधवार, 29 जुलाई 2026

 एक सामान्य नागरिक की सलाह

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देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा कायम रखने 

के लिए संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण बंद हो।

क्योंकि संसदीय कार्य संचालन नियमावली का उलंघन 

करने वाले सदस्यों की संख्या अब काफी बढ़ गई है।

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सुरेंद्र किशोर

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बेहतर यह होगा कि संपादित करने के बाद ही एक दिन

 बाद ही कार्यवाही का टी.वी.पर प्रसारण हो।

या, एक दूसरा उपाय भी है।

संसद में सदस्य जो कुछ बोलते हैं,उसको लेकर कोर्ट में उन 

पर केस नहीं हो सकता।जब संसद में शालीन व नियम पालक

सदस्यों की संख्या अधिक थी,तब यह छूट दी गई थी।

  यदि सीधा प्रसारण जारी रखना हो तो उस छूट को यथाशीघ्र 

समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

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29 जुलाई 26 


शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

   जैसा संस्कार,सदन में वैसा ही आचरण !

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 किसी ने पूछा--भाई, इन दिनों संसद में क्या हो रहा है ?

कौन क्या कर रहा है ?

जवाब मिला--जिसने जो कुछ सीख रखा है,जिसका जैसा संस्कार है,वह वैसा आचरण संसद में कर रहा है।

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सुरेंद्र किशोर

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एक पुराना किस्सा जानिए --

एक बार हंसोड़ पीलू मोदी ने संसद में कहा था- 

    ‘‘प्याज खाने वाला यहां प्याज दिखा रहा 

   और चप्पल खाने वाला यहां चप्पल दिखा रहा’’

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बहुत पहले की बात है।

लोक दल के रामेश्वर सिंह एक दिन प्याज की माला पहन कर राज्य सभा  पहुंच गए।

इस तरह वे महंगी के खिलाफ सदन में शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे।

सत्ता पक्ष यानी कांग्रेस के अदमनीय नेता कल्पनाथ राय ने अपनी चप्पल अपने हाथ में ले ली और उसे रामेश्वर सिंह की ओर दिखाने लगे।

 इस पर सदन हंगामा हो गया।

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उस पर पीलू मोदी ने इन शब्दों में सदन के तनाव को हल्का किया--

‘‘प्याज खाने वाला प्याज दिखा रहा है और चप्पल खाने वाला चप्पल दिखा रहा है।’’

  शुक्र है कि उसके बाद भी सदस्य गण सदन में आपस में हाथापाई पर नहीं उतरे।

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अब आगे यह कहने की जरूरत नहीं है कि जिस सदस्य ने जो ‘‘विद्या’’ अपने बाल्यकाल से लेकर जवानी तक सीखी है,उसी का तो प्रदर्शन वे संसद व विधान सभाओं में और उसके बाहर भी इन दिनों कर रहे हैं।

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 दूसरी ओर ,साठ-सत्तर के दशकों के पढ़ाकू नेतागण जो जनता की समस्याओं के प्रति गंभीर थे, क्या-क्या करते थे ?

समाजवादी नेता मधु लिमये --संसद से समय बचता था तो मधु जी आॅटो रिक्शा से लाइब्रेरी चले जाते थे।(किसी व्यापारी को इशारा कर देते तो उनके लिए कार-ड्रायवर का तुरंत प्रबंध हो जाता।पर,उनके आवास में भी न तो ए.सी. और न ही फ्रीज।जब सांसद नहीं रहे तो अखबारों में लेख लिखकर गुजारे लायक पैसा कमाते थे।

एक संपादक ने मुझसे कहा था कि जब पारिश्रमिक भेजने में देर हो जाती थी तो मधु जी फोन कर देते थे।

जब दिन के फस्र्ट हाफ में कोई नेता या कार्यकर्ता उनसे मिलने जाते थे तो मधु जी उनसे कह देते थे कि  शाम में आइएगा।यह मेरे लिखने का समय है।इसी के पैसे से मेरा खर्च चलता है।    

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पर, जब संसद में मधु लिमये बोलने के लिए खड़ा होते थे तो सत्ता बेंच पर बैठे मंत्रियों को सिहरन होने लगती थी।पता नहीं,आज किस मंत्री की बारी है !!क्योंकि उनके पास तथ्य होते थे -संसदीय ज्ञान भी।  

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सदन में गला फाड़ने,कनखी मारने ,पी.एम. से गला मिलने,सदन में ही सो जाने या अशिष्ट व्यवहार करने वाला वह जमाना नहीं था।तब माकपा के ज्योतिर्मय बसु,प्रसपा के नाथ पै ,भाकपा के हीरेन मुखर्जी तथा भारतीय जनसंघ के भी कई सांसद,सदन में अपनी प्रभावशाली भूमिका निभाते थे। 

  उस कारण समाज भी लोग उनकी इज्जत करते थे।ज्योतिर्मय बसु के आवास स्थित लाइब्रेरी में उन दिनों प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जाया करते थे, बसु साहब को मदद करने के लिए।

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मधु लिमये और बसु के अलावा भी अन्य कई सांसद थे जो बोलने के लिए खड़े होते थे तो पूरा सदन उन्हें सुनता था।

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आज क्या होता है ?

कुछ साल पहले कांग्रेस की एक महिला सांसद को सदन में यह कहते मैंने सुना था--‘‘मैं तो यहां बोलना चाहती हूं,पर मेरी पार्टी के नेता कहते हैं कि हंगामा करो।’’

लोक सभा को ‘‘हंगामा सभा’’(मैं यहां इससे अधिक कठोर शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं।) में बदल देने के कारण नये सांसदों को सीखने का अवसर नहीं मिलता।संसदीय लोकतंत्र के लिए यह अच्छी बात नहीं है कि अपवादों को छोड़ कर देश के किसी भी सदन में न तो कार्य संचालन नियमावली का पालन हो रहा है और न ही अखिल भारतीय पीठासीन सम्मेलनों की सिफारिशों का।

इतिहास एक दिन पूछेगा कि इसके लिए कौन अधिक और कौन कम जिम्मेदार रहा ?

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24 जुलाई 26


बुधवार, 22 जुलाई 2026

 ताजा संदर्भ

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तेलचट्टा जनता पार्टी का ‘संसद चलो मार्च’

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सन 55 में पटना पुलिस की गोली से जब छात्र 

दीनानाथ पाण्डेय की मौत हुई तो तब के प्रधान मंत्री

नेहरू ने पटना आकर न सिर्फ प्रेस और भीड़ को भला

 -बुरा कहा,बल्कि न्यायिक जांच की मांग को ठुकरा 

दिया।

जेपी ने तो कहा था-‘‘नेहरू ने पटना प्रेस को गाली दी।’’

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सुरेंद्र किशोर

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यह बात सन् 1955 की है।पटना में पुलिस गोली कांड हुआ था। बी.एन.कालेज का छात्र दीनानाथ पांडेय मारा गया था।छात्रगण गोली कांड की न्यायिक जांच की मांग कर रहे थे।पर तत्कालीन मुख्य मंत्री डा़. श्रीकृष्ण सिंहा न्यायिक जांच के खिलाफ थे।

  जनता में इस गोली कांड को लेकर सरकार के खिलाफ रोष था जिसे शांत करने के लिए प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 30 अगस्त 1955 को पटना के गांधी मैदान में आम सभा को संबोधित किया।

  उस सभा में नेहरू ने प्रेस और भीड़ को भला -बुरा कहा और न्यायिक जांच की मांग को ठुकरा दिया।

    नेहरू के इस भाषण को उनका बेजोड़ अभिनय करार देते हुए जयप्रकाश नारायण ने एक कड़ा व लंबा  प्रेस बयान जारी किया।

जेपी का बयान 2 सितंबर 1955 के अखबारों में छपा।जेपी ने  कहा कि ‘‘यह एक ऐसी घटना है जिस पर चुप रहने का अर्थ होगा कि मैं अपने नागरिक कत्र्तव्य का पालन नहीं कर रहा हूं।अभी प्रधान मंत्री पटना आए।अपार भीड़ इस उम्मीद में जमा हुई कि ऐसे शब्द सुनने को मिलेंगे जिनसे उनका मन शांत हो सके।लेकिन प्रधान मंत्री ने उनके जख्मों पर नमक छिड़का।

अपना आपा खोकर वे भीड़ पर चिल्लाए।

उन्होंने पटना प्रेस को गाली दी ।

 पुलिस जुल्म के विरूद्ध आवाज उठाने के लिए नागरिकों की भत्र्सना की।

  ब्रिटिश राज में जो लोग जुल्म की भत्र्सना करते थे उनका शुमार देश भक्तों में होता था।

लेकिन स्वराज में उन्हें गद्दारों की तरह देखा जाता है।’’

  जेपी ने कहा कि ‘‘प्रधान मंत्री कम्युनिस्टों पर बहुत से दोषारोपण करने में संलग्न हैं।कोई शक नहीं कि उन्हें बताया गया है कि सारे बखेड़े के जिम्मेदार कम्युनिस्ट हैं।पटना में हमारे बहादुर पुलिस वालों को, जो अपना ज्ञान तंतु खो चुके हैं,हर जगह एक कम्युनिस्ट बम लिए हुए नजर आता है। 

इसी ने इस कम्युनिस्ट कहानी को फैलाया है।जैसा कि सभी जानते हैं कि मैं कोई कम्युनिस्ट प्रशंसक नहीं हूं ।

लेकिन मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं हो रही है कि इस सारी उथल पुथल में उनकी भूमिका संयमित रही है।

कम्युनिस्टों के भीतर बहुत सी कमियां हैं।

लेकिन वे संगठित और अनुशासित लोग हैं।’’

  घटना के बारे में नेहरू के आकलन को चुनौती देते हुए जेपी ने कहा कि ‘‘नेहरू ने वही कहा जो उन्हें कहने को कहा गया। उनके कान इतनी चालाकी से भरे गए कि कुछ बाकी न रहा।

   मुझे सबसे अधिक धक्का इस बात से लगा कि प्रधान मंत्री के मन में यह शिष्टाचार तो है कि बी.एन.कालेज जाकर कहीं वे आयोग को कठिनाई में न डाल दें।

लेकिन गोली कांड की घटना पर बोलते समय उन्होंने इस भावना का परिचय नहीं दिया।उन्होंने जोर- जोर से और बार -बार विद्यार्थियों और नागरिकों के हुड़दंग की भत्र्सना तो की लेकिन दूसरे पक्ष के विरूद्ध आरोपों पर वे एक शब्द भी नहीं बोले।’’

  ‘‘बिहार में देश भक्तों की कमी नहीं है । मुझे नहीं लगता कि देश भक्ति पर श्री नेहरू ने हमें कोई प्रशंसनीय पाठ पढ़ाया है।

  देश भक्ति मात्र एक कपड़े के टुकड़े की पूजा में नहीं, बल्कि निश्चित राष्ट्रीय सदाचारों,जीवन के निश्चित मूल्यों ,जनता और सरकार के आचरण के निश्चित स्तरों में है।बहुत दुःखी मन से मैंने ये पंक्तियां लिखी हैं।मेरे लिए राजनीतिक आंदोलन के दिन समाप्त हो चुके हैं।किसी विवाद में पड़ने की अब मुझमें शक्ति नहीं है।पिछले कुछ दिनों में बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष सहित कई लोगों ने मुझ पर अनुचित हमला किया है।फिर भी मैं शांत रहा।

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शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

 यदि वैध कागजात मौजूद होने के बावजूद इस देश में कहीं 

भी मस्जिदों-मजारों को तोड़ा जा रहा है तो वह अन्याय है।

यदि बात उल्टी है तो किसी को धार्मिक भावना फैला कर 

देश में बद अमनी कायम करने का कोई हक नहीं है।

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सुरेंद्र किशोर

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इन दिनों देश के कुछ बड़े मुस्लिम नेता यह प्रचार कर रहे हैं कि उनकी 

मस्जिदें और मजारें उजाड़ी जा रही हैं।उनके साथ अन्याय हो रहा है।

क्या ऐसी मस्जिदें या मजारें भी उजाड़ी जा रही हैं जो वैध ढंग से 

खरीदी गई या दान में मिली जमीन पर बनी हुई हैं ?

या सिर्फ वैसी मस्जिदें-मजारें उजाड़ी जा रही हैं जो जबरन 

सरकारी या निजी जमीन पर कब्जा करके बनाई गई हैं ?

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यदि वैध ढंग से बनी मस्जिद -मजार को उजाड़ा जा रहा हैं तो

 उस उजाड़े जाने का विरोध हर धर्म के न्यायप्रिय लोगों को

 करना चाहिए।

साथ ही,तत्संबंधी मस्जिद-मजार वालों को वैध कागज के 

साथ कोर्ट जाना चाहिए।

लेकिन यदि उजाड़ी जा रही मस्जिद-मजार की जमीन का वैध

कागज किसी के पास नहीं है तब तो उजाड़ने का पूरा हक शासन 

को है।

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16 जुलाई 26