सोमवार, 17 जून 2024

 ‘पितृ दिवस’ के अवसर पर 

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बिन मांगे मोती मिले,मांगे मिले ना भीख !

(संदर्भ पद्मश्री सम्मान)

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काम के प्रति यदि एकाग्र निष्ठा हो तो बड़ी सफलता

 के लिए भी कमजोर पृष्ठभूमि बाधक नहीं

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सुरेंद्र किशोर

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  महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि आपने कितनी बड़ी उपलब्धि हासिल की हैं,बल्कि मेरी समझ से यह अधिक 

महत्वपूर्ण है कि आप कहां से उठकर कहां तक पहुंचे हैं।

    पटना के जिलाधिकारी शीर्षत कपिल अशोक ने परसों राष्ट्रपति प्रदत्त पद्मश्री सम्मान मेरे आवास पर आकर मुझे सौंपा ।

 कुुछ ही घंटों बाद यानी आज ‘‘पितृ दिवस’’ आ गया। 

  ऐसे अवसर पर यह बताना जरूरी है कि मेरे किसान पिता ने परिवार की नई पीढ़ी को शिक्षा का महत्व ठीक ढंग से समझाया था।

उन्होंने हर तरह का सहयोग दिया।जबकि खुद सिर्फ साक्षर थे।कोई स्कूली शिक्षा नहीं हुई थीं।

पर, उन्होंने समाज में सम्मान पाने के लिए हमारी शिक्षा को जरूरी समझा।कहते थे कि तुम लोगों को कहीं झगड़ा-झंझट में नहीं फंसना है।

‘‘आन-बान शान’’ वाली सामाजिक पृष्ठभूमि हमें कई बार उस ओर खींचती है। उस पृष्ठभूमि को शिक्षा में बाधक नहीं बनने देना है।

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मुझसे पहले मेंरे परिवार में किसी ने मैट्रिक तक पास नहीं किया था।

घर में कोई अखबार तक नहीं आता था।हमारे घर में सिर्फ रामचरित मानस,शुकसागर और आल्हा -ऊदल किताबें थीं।कोर्स के अलावा,अन्य कोई पठन सामग्री नहीं थी।

खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।

मैं किताबों के लिए तरस जाता था।

पिता ने परिवार में शिक्षा जो बीजारोपण किया,वह अब फल-फूल रहा है।

आज मेरे परिवार के एक से अधिक सदस्य अब अपने -अपने क्षेत्रों में प्रादेशिक -राष्ट्रीय स्तर पर जाने जाते हैं।

मेरे बचपन में हमारी खेती-बारी तो अच्छी थी,पर कोई ऊपरी आय नहीं थी।खेतिहरों की हालत आज भी लगभग वही है।

आजादी के बाद केंद्र सरकार ने यदि पब्लिक सेक्टर की अपेक्षा सिंचाई का प्रबंध करके खेती के विकास पर अधिक

ध्यान दिया होता तो रोजगार के भी अवसर बढ़ते।

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शहर में रखकर दो पुत्रों को काॅलेज में पढ़ानें के लिए जमीन बेचनी जरूरी थी।

उसमें बाबू जी ने कभी कोई हिचक नहीं दिखाई।

तब स्थानीय मुखिया ने जब एक बार बाबू जी कहा था कि ‘आप सोना जैसी जमीन बेचकर लड़कंों को पढ़ा रहे हैं,पर पढ़-लिखकर वे आपको पूछेंगे भी नहीं।शहर में जाकर बस जाएंगे।’’

बाबू जी ने जवाब दिया --‘‘तोरा ने इ बात बूझाई।सोना जइसन जमीन बेच के हीरा गढ़त बानी।ने पूछिहन स, तबो कवनो बात नइखे,हमरा खाए-पिए कवन कमी बा !?’’

  खाने -पीने की तो कोई कमी नहीं थी,पर कई जरूरी व बुनियादी खर्चे पूरे नहीं हो पाते थे।एक मकई का बाल ले जाकर देने पर दुकानदार एक दियासलाई दे देता था।

 हाईस्कूल की पढ़ाई तक मेरे पैरों में चप्पल तक नहीं होती थी।उसी अनुपात में अन्य तरह के अभाव भीं।कुर्सी-टेबुंल तो हमारे लिए लक्जरी थी।

काॅलेज जाना शुरू करने के बाद ही जूता-चप्पल का  

प्रबंध हो सका।तीन किलोमीटर रोज पैदल चलकर हम लोग गांव से दिघवारा स्कूल जाते थे।मेरा छोटा भाई नागेंद्र मुझसे एक साल जूनियर था।

सन 1961 में मेरे लिए 98 रुपए में एवन साइकिल खरीदी गयी।वह भारी उपलब्धि मानी गयी थी।

मेरे पास के गांव में तब तक सिर्फ अपर प्राइमरी स्कूल ही था। 

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पर,अभाव ग्रस्त पृष्ठभूमि के बावजूद हमने शुरू से आज तक जो भी काम किया,एकाग्र निष्ठा से किया।

आप जो भी अच्छा-बुरा काम करते हैं,वह किसी से छिपा नहीं रहता है।

पूर्वाग्रह विहीन व होशियार लोग तुलनात्मक आकलन करके आपके बारे में ठोस राय बना लेते हैं।

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 पद्म सम्मान के लिए मैंने किसी से कभी कोई आग्रह नहीं किया।

 यह ऐसा सम्मान है जिसके लिए कोई अन्य व्यक्ति भी हर साल 15 सितंबर से पहले आपका नाम भारत सरकार को भेज सकते हैं।

 उसके साथ आपके व्यक्तिगत गुणों व उपलब्धियों विवरण  होना चाहिए।

  उसके बाद भारत सरकार आपके बारे में अनेक सरकारी और गैर सरकारी स्त्रोतों से पता लगवाती है।

यदि आप उस कसौटी पर खरे उतरते हैं,तो वह सम्मान आपको मिलेगा ही।

  बहुत पहले एक मित्र ने मुझसे कहा था कि मैंने आपका नाम पद्म सम्मान के लिए भेजा है।

 तब मैं मुस्कराकर रहा गया था।

न हां कहा और न ही ना।

मुझे लगा था कि मुझे सरकार भला क्यों देगी !

मैं खुद इस बारे में आश्वस्त नहीं था कि मैं इसके काबिल हूं भी या नहीं।

  लगे हाथ बता दूं कि संपादक बनने के करीब आधा दर्जन आॅफर के बावजूद मैंने वह पद कभी स्वीकार नहीं किया। क्योंकि मैं समझता हूं कि मैं उस पद के ‘लायक’ नहीं हूं।

 खैर,पद्म सम्मान के नामों के चयन का समय आने पर मैंने पाया कि मौजूदा प्रधान मंत्री कार्यकाल में चयन की शैली अब बिलुकल बदल गयी है।

अब अनेक उम्मीदवारों की योग्यता-क्षमता-उपलब्धियों को अनेक कसौटियों परं कसा जाता है।कोई पैरवी नहीं चलती।

इसीलिए इस साल भी पद्म सम्मानित लोगों की सूची देखकर आपको लगा होगा कि आपने पहले उनके नाम नहीं सुने थे।

  क्योंकि वे प्रचार से दूर रहकर सरजमीनी स्तर पर अपने ढंग के अनोखे काम कर रहे हैं ताकि लोगों का कल्याण हो।

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ऐसे अवसर पर मैंने बाबू जी की दूरदृष्टि के महत्व को एक बार फिर समझा।

क्योंकि पुश्तैनी जमीन बेचकर बच्चों को पढ़ाना किसी किसान के लिए बहुत बड़ी बात होती है।मेरी जानकारी के अनुसार हमारे यहां तो ऐसा कोई करता नहीं था।यदि हमारी जमीन नहीं बिकती तो हमलोग अधिक से अधिक मैट्रिकुलेट बनकर रह गये होते।

बता दूं कि अपर प्राइमरी स्कूल,खानपुर में पढ़ते समय मैं क्लास रूम में बिछाने के लिए रोज अपना बोरा अपने साथ ले जाया करता था।

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इधर हाल में कहीं पढ़ा कि कर्पूरी ठाकुर जब सी.एम.काॅलेज,दरभंगा में पढ़ते थे तो वे नंगे पैर ही काॅलेज जाते थे। 

यानी, कोई जूता -चप्पल नहीं।

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किसी जानकार व्यक्ति ने मुझे बताया कि बिहार से काम कर रहे किसी बिहारी पत्रकार को पहली बार पद्म श्री सम्मान मिला है और वह आपको मिला है।

यदि यह बात सच है तो उसके साथ यह भी जोड़ा जाना चाहिए कि एक किसान परिवार के सदस्य को मिला है जो कभी ं नंगे पांवं स्कूल जाता था।

कड़ी धूप में कच्ची सड़क से स्कूल से लौटते समय गर्म धूल से बचने के लिए वह छात्र किनारे की घास की ठंडी पड़त ढूंढ़ता रहता था।कभी मिलता था और कभी नहीं मिलता था।  

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16 जून 24

  


 

   


गुरुवार, 13 जून 2024

 नेहरू और मोदी की तुलना करने से पहले 

रजनीकांत पुराणिक की पुस्तक ‘‘नेहरू’ज

97 मेजर ब्लंडर्स’’ पढ़ लीजिए।

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सुरेंद्र किशोर

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एक काल्पनिक कहानी।

एक किसान के पास 100 एकड़ जमीन थी।

कुप्रबंधन और ऐयाशी के कारण उस किसान ने 100 में से 85 एकड़ जमीन बेच दी।

किसान के बेटे ने अपने पिता को घर से निकाल दिया।

(राजनीति में ऐसा नहीं होता।इस देश के दुर्भाग्य का यही मुख्य कारण है।)

नतीजतन 15 एकड़ जमीन बच गयी।उसमें बेहतर प्रबंधन के जरिए बेटे ने बाद में तरक्की कर ली।

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सन 1985 में तब के प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि हम दिल्ली से 100 पैसे भेजते हैं,पर उसमें से 15 पैसे ही गांवों तक पहुंच पाते हैं।

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अब सवाल है कि आजादी के तत्काल बाद से ही 85 प्रतिशत की लूट कौन करता था ?

कौन लूट की छूट देता था ?

इसका जवाब 

राजीव गांधी ने नहीं दिया।

पर,जाहिर है कि राजीव के पहले जो -जो नेता प्रधान मंत्री पद पर थे,उन्होंने ही अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई।लूट की छूट दी।

जीप घोटाले से शुरुआत हुई।

भारत में लूट की छूट सरकार की ओर से ही क्यों दी गई ,उसका जवाब लेखक पाॅल आर.ब्रास ने अपनी किताब में दिया है।

अमरीकी समाजशास्त्री पाॅल आर. ब्रास ने सन् 1966 में ही यह लिख दिया था कि 

‘‘भारत में भीषण भ्रष्टाचार की शुरूआत आजादी के बाद के सत्ताधारी नेताओं 

ने ही कर दी थी।’’

उससे पहले ब्रास ने उत्तर प्रदेश में रह कर भ्रष्टाचार की समस्या का गहन अध्ययन किया था।

आज देश में सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचारों के अपार मामलों को देखते हुए यह लगता है कि यदि ब्रास ने बिहार का अध्ययन किया होता तो यहां भी  वह उसी नतीजे पर पहुंचते।

याद रहे कि इन बीमारू प्रदेशों के कई बड़े नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते रहे हैं।

  इस अध्ययन के बाद लिखी गयी  अपनी किताब ‘‘ फैक्सनल पाॅलिटिक्स इन एन इंडियन स्टेट: दी कांग्रेस पार्टी इन उत्तर प्रदेश ’’ में वाशिंगटन विश्व विद्यालय के समाजशास्त्र के प्रोफेसर  ब्रास ने लिखा कि ‘‘कांग्रेसी मंत्रियों द्वारा अपने अनुचरों को आर्थिक लाभ द्वारा पुरस्कृत करना गुटबंदी को स्थायी बनाने का सबसे सबल साधन है।’’ अपने शोध कार्य के सिलसिले में ब्रास ने उत्तर प्रदेश के दो सौ कांग्रेसी और गैर कांग्रेसी नेताओं और पत्रकारों से लंबी बातचीत की थी।

  ध्यान रहे कि आजादी के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों के कांग्रेस संगठनों और सरकारों में गुटबंदी तेज हो गयी थी।हालांकि थोड़ी -बहुत गुटबंदी पहले से भी थी।

 अपने विस्तृत अध्ययन के बाद ब्रास ने यह पाया कि ‘‘जिलों में अधिकार और पुरस्कार बांटने के महत्वपूर्ण विभाग हैं गृह ,शिक्षा , सहकारिता  और उद्योग विभाग।

  मौका पर मिलने पर होम मिनिस्ट्री के जरिए विरोधी गुट के नेताओं को सबक सिखाया जाता है।अपने लोगों को फायदा देने के लिए शिक्षा विभाग सबसे अधिक सशक्त विभाग है।

विश्व विद्यालय और निजी शिक्षण संस्थानांें पर शिक्षा मंत्री का नियंत्रण रहता है।

उनकी आर्थिक सहायता और सैकड़ों विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति उन्हीं की कृपा दृष्टि पर निर्भर करती है।

यू.पी. के हर जिले में अलग -अलग गुट के नेताओं ने अपनी -अपनी शिक्षण संस्थाएं स्थापित कर ली हैं।इस प्रकार उन्हें व्यवस्थापकों और छात्रों का बना -बनाया संगठन मिल जाता है।’’

पाॅल ने लिखा कि दो विरोधी गुटों के मंत्रियों की हमेशा चेष्टा रहती है कि वह किस प्रकार एक जिले में अपने समर्थकों को मजबूत और अपने प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर कर सकें।

 इस चेष्टा को सफल बनाने के लिए समय -समय पर मंत्रियों के सरकारी दौरे सहायक सिद्ध होते हैं।परिणामस्वरूप कई बार जिलों में प्रशासनिक अधिकारी भी गुटबंदी से ग्रसित हो जाते हैं।इसका प्रशासन तंत्र पर प्रतिकूल असर पड़ता है।’’

पाॅल ब्रास का अध्ययन काफी पुराना है।

पर यह बात पुरानी नहीं है कि भ्रष्टाचार के आरोपियों को  सजा देने-दिलाने  में इस देश में आजादी के बाद से ही शासन का ढीला-ढाला रवैया रहा है।

नतीजतन हर स्तर के भ्रष्ट लोंगों का मनोबल समय बीतने के साथ बढ़ता चला गया, साथ ही लूट के माल के आकार-प्रकार में भी बेशुमार वृद्धि होती चली गयी।

  नतीजतन आज के अनेक नेतागण  और उनके परिजन अरबों से खेल रहे हैं।

पर जब कार्रवाई होती है तो वे सामाजिक न्याय और धर्म निरपेक्षता के मंत्र का जोर -जोर से जाप करने लगते हैं।



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दूसरी ओर, इस बात का पता लगाइए कि भारत सरकार का कुल राजस्व सन 2013-14 वित्तीय वर्ष में कितना था ?

2023-24 में कितना हुआ ?

गुगल गुरु से मदद लीजिए।

क्या शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार आज भी उतना ही है जितना मनमोहन सिंह के शासन काल में था ?

यह कह सकता हूं कि निचले स्तर पर भ्रष्टाचार में मोदी राज में भी कोई कमी नहीं आई है।

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सन 1963 में ही तत्कालीन कांग्रेस  अध्यक्ष डी.संजीवैया को  इन्दौर के अपने भाषण में यह कहना पड़ा  कि ‘‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे।( 1963 के एक करोड़ की कीमत आज कितनी होगी ?)

गुस्से में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने  यह भी कहा था कि ‘‘झोपड़ियों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’’ 

  नेहरू सरकार के वित मंत्री रहे सी.डी.देशमुख ने नेहरू को सलाह दी थी कि सरकार में जारी भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए उच्चाधिकार प्राप्त ट्रिब्यूल गठित कीजिए।

नेहरू ने यह कह कर मांग ठुकरा दी कि उससे प्रशासन में पस्तहिम्मती आएगी।(पुराणिक की पुस्तक का पेज नंबर-209 ) 

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13 जून 24

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पुनश्चः-- श्री पुराणिक की पुस्तक को पुस्तक महल ने प्रकाशित किया है। उम्मीद है कि इसका हिन्दी संस्करण भी उपलब्ध होगा।

    




 


 


   न्यूटन का तीसरा नियम अब चुनावी 

  राजनीति में भी लागू होने लगा है। 

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सुरेंद्र किशोर

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यह कितनी बड़ी विडंबना है कि आप जिसे हराने के लिए लामबंद होकर वोट करते हैं,बाद में उसी से मंत्रिपरिषद में हिस्सेदारी की मांग करते हैं।

   ----अमिताभ अग्निहोत्री

         वरिष्ठ टी.वी.पत्रकार,

 दैनिक जागरण,12 जून 24

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अब लामबंदी पर न्यूटन के तीसरे नियम का इस्तेमाल हो रहा है।

यानी, हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है।

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कर्नाटका और तेलांगना में गत साल विधान सभाओं के चुनाव हुए।

 कर्नाटका में अधिकतर मुसलमान मतदाताओं ने जेडी एस को छोड़ कर कांग्रेस के पक्ष में एकमुश्त मतदान किया।

तेलांगना में मुसलमानों ने सत्ताधारी बी.आर.एस.को छोड़कर कांग्रेस को एकमुश्त मतदान किया।

नतीजतन दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बन गयीं।

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उसकी प्रतिक्रिया हुई।

लोक सभा के ताजा चुनाव में कुछ राज्यों में गैर मुस्लिम मतों की भाजपा के पक्ष में लामबंदी हो गयी।नतीजतन,

कर्नाटका में भाजपा-जेडीएस गठबंधन को लोस की 19 सीटें मिलीं।कांग्रेस को सिर्फ नौ सीटें हासिल हुईं।

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तेलांगना में भाजपा और कांग्रेस को 8-8 सीटें मिलीं।

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संकेत हैं कि भविष्य में भी एक पक्ष की लामबंदी की क्रिया की 

प्रतिक्रिया भी हो सकती है।

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हालांकि यह सब नहीं होना चाहिए।

पर, इस उपदेश का उनके लिए कोई मतलब नहीं जो सरकार के अच्छे कामों के आधार पर नहीं बल्कि अपने किसी अन्य ‘‘लक्ष्य’’ को ध्यान में रखते हुए वोट करते हैं।

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12 जून 24

   


मंगलवार, 11 जून 2024

  यह मत कहो कि भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है

बल्कि यह कहो कि इसे इस्लामिक देश बनने से रोकना है

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    सुरेंद्र किशोर

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किसी को यह नहीं कहना चाहिए कि भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है,बल्कि उसकी जगह यह कहना चाहिए कि भारत के इस्लामिक देश बन जाने से रोकना है।

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  सेक्युलर दलों और उनके सहयोगी बुद्धिजीवियों को छोड़कर सब जानते हैं कि प्रतिबंधित जेहादी संगठन पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया तथा कुछ अन्य ‘‘इस्लामिक भारत’’ बनाने के लिए बड़े पैमाने पर कातिलों के हथियारबंद दस्ते तैयार कर रहे हैं।पुलिस जांच में इसके सबूत मिले हैं।

यहां तक कि कुछ साल पहले केरल के डी.जी.पी.ने पी.एफ.आई.पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश अपनी राज्य सरकार से की थी।किंतु वोट लोलुप सी.पी.एम.सरकार ने डी.जी.पी.की बात नहीं मानी।

अब पी.एफ.आई.और उसकेे राजनीतिक संगठन एस.डी.पी.आई.ने  केरल में सी.पी.एम.को छोड़कर कांग्रेस को मदद करना शुरू कर दिया है।

  कुछ राजनीतिक दल, जो राज्यों में सत्ता में हैं ,बांग्लादेशियों और रोहिंग्या को बड़े पैमाने पर भारत में प्रवेश दिलाकर उन्हें बसा रहे हैं और इस तरह पी.एफ.आई.का काम आसान कर रहे हैं।उसके बदले उन्हें पी.एफ.आई.से हाल के चुनाव में बड़ा उपहार मिला है--यानी मुस्लिम मतों का कुछ और अधिक एकत्रीकरण हुआ है।(हालांकि इस देश के शांतिप्रिय मुस्लिम पी.एफ.आई.से सहमत नहीं है।पी.एफ.आई. को इस बात का दुख है कि हमारे साथ 10 प्रतिशत मुसलमान भी नहीं हैं।) 

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तकलीफ की बात है कि राजग में शामिल कुछ तथाकथित सेक्युलर दल भी इस्लामीकरण की गंभीर कोशिश के खतरे की गम्भीरता को नहीं समझ पा रहे हंै।जेहादी स्लीपर सेल की खबर छापने पर एक सेक्युलर मुख्य मंत्री ने कुछ साल पहले एक पत्रकार की हल्की झिड़की दी थी।

जबकि उनको उस खबर से खुश होना चाहिए था।कार्रवाई करनी चाहिए थी।

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केंद्र सरकार के विभागों के वितरण से यह साफ हुआ है कि सहयोगी दलों से भाजपा यह उम्मीद कर रही है कि वे अपने राज्य के विकास पर अधिक ध्यान दें।

केंद्र के जो मुख्य काम हैं--मुख्यतःभ्रष्टाचारियों और जेहादियों के खिलाफ समझौतारहित कार्रवाई ---उन्हें केंद्र सरकार को करने की पूरी छूट दें।

उसमें धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बाधा न पहुंचायें।

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संकेत हैं कि अब नीतीश कुमार को बिहार सरकार चलाने की पूरी छूट मिलेगी।जैसी छूट उन्हें 2005-13 में थी।

पिछले कुछ वर्षों में सहयोगी दलों के कुछ नेतागण जिस तरह नीतीश को अपने बयानों व कर्माें से परेशान कर रहे थे,वे अब वैसा नहीं करेंगे।लगता है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने उसका इंतजाम कर दिया है।

भाजपा ने कह दिया है कि 2025 के बिहार विधान सभा चुनाव में भी नीतीश के नाम पर राजग चुनाव लड़ेगा।

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उधर टी.डी.पी.को आंध्र विधान सभा में अपना ही बहुमत है।पर राजधानी अमरावती बनाने के बड़े काम तथा अन्य कामों के लिए नायडु को केंद्रीय सहायता पर निर्भर रहना पडे़गा।इसलिए उम्मीद है कि टी.डी.पी.भी शांति बनाये रखेगा।

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अटल बिहारी वाजपेयी वाला जमाना अब नहीं है,भले आज भी मिलीजुली सरकार है।

 तब सहयोगी दलों को रेलवे और संचार जैसे महत्वपूर्ण विभाग मिला करते थे।देने पड़ते थे।

रात विलास पासवान ने तो पहले रेलवे और बाद में संचार मंत्रालय छिन जाने के कारण 2004 के चुनाव में वाजपेयी सरकार को अपदस्थ करा दिया था।अब वैसा राजनीतिक समीकरण भी नहीं है।

 हालांकि वाजपेयी सरकार के अपदस्थ होने में द्रमुक का भी हाथ था जिसे छोड़ कर राजग ने जय ललिता को राजग में शामिल कर लिया था।

यानी, सबको पुराने अनुभवों से अब सीखना है।

एक बात तय मानिए।

संकेत हैं कि मोदी सरकार भ्रष्टाचारियों और जेहादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में कोई ढिलाई  नहीं करेगी।

ढिलाई करेगी तो यह देश नहीं बचेगा।

याद रहे भाजपा ‘इंडिया फस्र्ट’ वाली पार्टी है।और मोदी दूसरी ही मिट्टी का बना हुआ है।

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11 जून 24  


सोमवार, 10 जून 2024

 इंडिया गठबंधन को सत्ता में आने से रोककर

यह देश भारी विपत्ति से बच गया !

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‘‘सी.बी.आई.-इ.डी. बंद होने चाहिए’’

----सपा नेता अखिलेश यादव

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इंडियन एक्सप्रेस --क्या इंडिया गठबंधन की सरकार दूरगामी परिणाम वाला ऐसा कदम उठाएगी ?

अखिलेश यादव--यह मेरा प्रस्ताव है।मैं इंडिया गठबंधन के समक्ष रखूंगा।

----इंडियन एक्सप्रेस -19 मई 2024

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सुरेंद्र किशोर

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कल्पना कीजिए कि गत लोक सभा चुनाव के बाद देश में ‘‘इंडिया गठबंधन’’ की सरकार बन गयी होती !

फिर क्या होता ?

सपा नेता अखिलेश यादव सी.बी.आई.-ई.डी.की समाप्ति का प्रस्ताव गठबंधन सरकार के सामने रखते।

सी.बी.आई.-ई.डी.से परेशान नेताओं से भरे इंडिया गठबंधन

का नेतृत्व सपा नेता के इस प्रस्ताव को मंजूर करता या नामंजूर ?

कांग्रेस के पिछले इतिहास को ध्यान में रखें तो यह कहा जा सकता है कि मंजूर कर लेता।चाहे बाद में उसका जो नतीजा होता।

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सी.बी.आई.--ई.डी.की अनुपस्थिति में इस देश के घोटालेबाज लोग सार्वजनिक संपत्ति के साथ कैसा सलूक करते ?

अब तक कैसा सलूक करते रहे हैं ?

जिन नेताओं पर सी.बी.आई.-ई.डी.घोटाले के मुकदमे चला रहे हैं , उन घोटालेबाजोें को अदालतंे आम तौर पर कोई राहत नहीं दे रही है।क्योंकि सबूत ठोस हैं।

वैसे भी कांग्रेस का तो अदालतों को भी निष्क्रिय कर देने का इतिहास है। 

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अखिलेश यादव की उपर्युक्त टिप्पणी 19 मई 2024 के अखबार में छपी थी।

यानी, अखिलेश यादव की मंशा जान लेने के बावजूद उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने सपा को भारी विजय दिलाई।

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शुक्र है कि राजग को बहुमत मिल गया और मोदी प्रधान मंत्री बन गये।

 नहीं बने होते तो कल्पना कीजिए इंडिया गठबंधन वाले नेता लोग इस देश के साथ कैसा सलूक करते ?!

यानी, यह देश भारी विपत्ति से फिलहाल बच गया।

वैसे बिल्ली अब भी दरवाजे के पास छिपकर घर वालों के लापारवाह होने की प्रतीक्षा कर रही है ताकि दूध पी सके।

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सिर्फ दो नमूने

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आपातकाल में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने एक विधेयक तैयार किया था।उसमें यह प्रावधान किया गया था कि प्रधान मंत्री और लोक सभा के स्पीकर के खिलाफ सामान्य अदालतों में मुकदमा नहीं चलेगा।

उसके लिए ़िट्रब्यूनल बनेगा।उसे संसद से पास करवाना था।पर,बाद में कुछ कारणवश विचार बदल गया और उसे पास नहीं करवाया गया।

पर मानसिकता तो देखिए। 

यू.पी.में जब सपा की सरकार थी तो उसने उन जेहादियों के खिलाफ जारी मुकदमों को उठा लिया था जिन पर धारावाहिक विस्फोट करके अनेक लोगों की हत्या करने का आरोप था।यह और बात है कि हाईकोर्ट ने सपा सरकार के उस आदेश का खारिज करके मुकदमा चलवाया और कई जेहादियों को फांसी की सजा हुई।

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 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चुनाव कानून की दो धाराओं के उलंघन के आरोप में इंदिरा गांधी की लोक सभा की सदस्यता 12 जून 1975 को रद कर दी।

उसके बाद इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी।देश को खुले जेलखाने में बदल दिया।

शीर्ष अदालत तक को पालतू बना लिया गया।

जन प्रतिनिधित्व कानून की उन धाराओं को संसद से बदलवा  दिया गया जिनके उलंघन के आरोप में इंदिरा गंांधी की सदस्यता गयी थी।उस संशोधन को पिछली तारीख से लागू करा दिया।डरे हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन संशोधनों को मान लिया।आम तौर से कानून पिछली तारीख से लागू नहीं किये जाते।

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10 जून 24 



 संकेत हैं कि नरेंद्र मोदी प्रतिपक्षी नेताओं के खिलाफ जारी मुकदमों में कोई राहत देंगे नहीं।

फिर सत्ता और प्रतिपक्ष में सामान्य सबंध 

का सवाल ही नहीं उठता !

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सुरेंद्र किशोर

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नई सरकार के गठन के बाद यह  

सवाल उठ रहा है कि नरेंद्र मोदी के अगले कार्यकाल (2024-29)में प्रतिपक्ष से सत्ता पक्ष का संबंध सामान्य हो पाएगा या नहीं ?

   मुझे तो इसकी कोई उम्मीद नहीं लगती।

संकेत हैं कि

पहले की ही तरह प्रतिपक्ष संसद को चलने नहीं देगा।

संसद के बाहर कुछ प्रतिपक्षी नेतागण 

अपमानजनक बयानबाजियां करते रहेंगे।

साथ ही, मानहानि के मुकदमे भी झेलते रहेंगे।

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कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से प्रतिपक्ष का संबंध सामान्य क्यों और कैसे रहा था ?

मेरा जवाब है कि मोदी, अटल जी जितना ‘‘उदार’’ नहीं हैं।

क्योंकि वैसी उदारता पार्टी की छवि खराब करती है।

अटल जी ने नेहरू-गांधी परिवार को लाभ पहुंचाने के लिए चर्चित बोफोर्स मुकदमे को 2004 में एक तरह से दफना दिया था।

नरेंद्र मोदी सरकार अभी चल रहे किसी भी केस में प्रतिपक्ष की कोई मदद नहीं करेगी।फिर सामान्य संबंध कैसे कायम होगा ?

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सन 2004 में दिल्ली हाईकोर्ट ने बोफोर्स से संबंधित केस को समाप्त कर देने का आदेश दे दिया था।

   हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सी.बी.आई. ने सुप्रीम कोर्ट मंे अपील तक नहीं की।

ऐसा उच्चस्तरीय संकेत 

 पर हुआ।तब अटल जी प्रधान मंत्री थे।

 4 फरवरी 2004 के हाईकोर्ट के उस अदालती निर्णय के खिलाफ अपील की अनुमति अटल सरकार ने सी.बी.आई.को नहीं दी।

  उसके बाद 22 मई 2004 को केंद्र में मन मोहन सिंह की सरकार गठित हो गयी।फिर तो अपील का सवाल ही नहीं उठता था।

अब समझ में आया कि प्रतिपक्ष अटल जी की तारीफ इन दिनों कुछ अधिक ही क्यों करता है ?

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8 जून 24


 पद ठुकराना और स्वीकारना 

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सुरेंद्र किशोर

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एन.सी.पी. नेता प्रफुल्ल पटेल ने राज्य मंत्री पद अस्वीकार कर दिया।

खैर, उनकी मर्जी !!

पर,बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री चंद्रशेखर सिंह जब केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हुए तो उन्हें वहां राज्य मंत्री का ही दर्जा मिला था।

  हालांकि अस्सी के दशक में राज्य मंत्री का पद ठुकराते हुए भागवत झा आजाद राष्ट्रपति भवन से शपथ ग्रहण समारोह छोड़कर पैदल ही आवास लौट आये थे।

नब्बे के दशक में संयुक्त मोर्चा के सारे नेता वी.पी.सिंह के ड्राइंग रूम में बैठे रह गये,राजा साहब अपने घर के पिछले दरवाजे से निकल गये।

उन्हें एक बार फिर प्रधान मंत्री बनाने के लिए नेतागण उनके आवास गये थे।

  संयुक्त मोर्चा ने प्रधान मंत्री पद के लिए ज्योति बसु का नाम तय कर दिया था।पर सी.पी.एम.के पाॅलिट ब्यूरो ने उन्हें यह पद नहीं लेने दिया।

सी.पी.एम.के एक बड़े नेता ने बताया था कि ई,एम.एस.नम्बूदरीपाद आम तौर पर पाॅलिट ब्यूरो की बैठक में शामिल नहीं होते थे।पर ज्योति बसु को पी.एम.बनने से रोकने के लिए वे भी उस बैठक में शामिल हुए।

पर जब सोमनाथ चटर्जी को लोक सभा का स्पीकर बनाना हुआ तो पाॅलिट ब्यूरो ने विरोध नहीं किया।

बाद में ज्योति बसु ने कहा कि मुझे अवसर न देकर पार्टी ने गलती की थी।

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सत्तर के दशक में दारोगा प्रसाद राय और केदार पांडेय बारी- बारी से बिहार के मुख्य मंत्री रह चुके थे।पर बाद की कांग्रेसी सरकार के राज्य मंत्रिंडल में वे दोनों शामिल हुए।कैबिनेट मंत्री बने।

किसी ने दारोगा बाबू से पूछा,ऐसा आपने क्यों किया।

उन्होंने विनोद के लहजे से कहा ,मान लीजिए कि मुझे दिल्ली तुरंत जाना जरूरी है।मेल या एक्सप्रेस ट्रेन उपलब्ध नहीं है।तो क्या मैं पेसेंजर ट्रेन नहीं चला जाऊंगा ?

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और अंत में

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जदयू महा सचिव के.सी.त्यागी ने कहा है कि नीतीश कुमार को पी.एम.पद का आॅफर मिला था।ठुकरा दिया।

कांग्रेसी नेता ने इस दावे का खंडन किया है।

जदयू नेता संजय झा ने भी खंडन किया है।

 सवाल है कि जब ‘‘इंडिया’’ ब्लाॅक से नीतीश को उम्मीद थी,तब तो कांग्रेस ने उन्हें नेता नहीं बनाया।अब ‘‘कंगाल बैंक’’ का मैनेजर बनाने का आॅफर मिलने की बात हो रही है।

पहले भी नीतीश कुमार को उस पद की उम्मीद नहीं करनी चाहिए थी।

मद्रास के मुख्य मंत्री रहे के.कामराज की प्रतिष्ठा कई पूर्व प्रधान मंत्रियों से अधिक रही है।

मुख्य मंत्री पद से नीतीश को संतोष करना चाहिए।अब कानून-व्यवस्था ठीक करने व भ्रष्टाचार कम करने के काम पर ध्यान दें।ज्वलनशील तत्वों की बातों को नजरअंदाज करें तो नीतीश की छवि कुल मिलाकर अच्छी है सिर्फ दो ‘‘भटकावों’’ को छोड़कर।

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10 जून 24