हजारों जेपी सेनानियों को सम्मान-सहारा मिला होता
तो बाद की पीढ़ियां भी सार्वजनिक कामों में जुटतीं।पर
अपवादों को छोड़कर अब भाड़े पर ही कार्यकर्ता उपलब्ध
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क्योंकि सत्ता की मलाई तो नेताओं के वंशजों-परिजनों
के लिए रिजर्व होती जा रही है
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करीब तीन साल पहले बिहार में जब एक नया दल बना तो
उस दल के नेता ने हर जिले में वेतन पर कार्यकर्ता रखा।
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क्योंकि आम तौर पर कोई मुफ्त में काम करने को तैयार नहीं है,अपवादों की बात और है।
क्योंकि चुनावी टिकट भी तो अब आम तौर पर पहले से स्थापित नेता
के परिजन और धनवानों को मिलने लगे हैं।
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सन 2025 के आंकड़े के अनुसार बिहार के 24 हजार 905 स्वतंत्रता सेनानियों व उनके आश्रितों को पेंशन मिल रही है।
पर कितने जेपी सेनानी बिहार में पेंशन पा रहे हैं ?
सिर्फ 3354 जेपी सेनानी।
फरार स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भी कांग्रेसी सरकार ने पेंशन की व्यवस्था कराई।पर फरार जेपी सेनानी कौन कहे,जेल गए और आपातकाल में अपार कष्ट सहे जेपी सेनानी भी पेंशन के लिए अब भी तरस रहे हैं।
धन्यवाद नये मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी को जिन्होंने जेपी सेनानियों की सुध लेनी शुरू की है।
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याद रहे कि अंग्रेजों ने अपने शासन काल में स्वतंत्रता सेनानियों के ‘‘जीने का अधिकार’’ नहीं छीना था।पर आपातकाल में इंदिरा गांधी सरकार ने भारत के लोगों के जीने का संवैधनिक अधिकार तक छीन लिया था।यह बात आपातकाल में सरकारी वकील ने सुप्रीम कोर्ट मेें साफ -साफ कह दिया था।
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मैं भी आपातकाल का एक अदना भुक्तभोगी रहा हूं।
मैं सबूत के तौर पर अपना खुद का अनुभव संक्षेप में बताता हूं।
मुझे बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में जब सी.बी.आई.बेचैनी से खोज रही थी तो तब के बिहार के मुख्य मंत्री सचिवालय में तैनात मेरे एक मित्र ने मुझे आगाह कर दिया ।मैं मेरे मित्र राम बिहारी सिंह की मदद से भूमिगत हो गया।
बिहार में जब अधिक दिनों तक भूमिगत रहना मेरे लिए संभव न हो सका तो मैं मेघालय जाकर अपने एक रिश्तेदार के यहां छिप गया।वहां कांग्रेस की सरकार नहीं थी,इसलिए आपातकाल के भीषण अत्याचार से वह राज्य बचा हुआ था।
वैसे आपातकाल में जो जेल गये,उन्हें तो भोजन आदि मिल पा रहे थे,पर मुझे कितना अपार कष्ट हुआ,वह सब मैं अपनी जीवनी में लिखूंगा।राह चलते मुझे देख लेने पर भी मेरे मित्र -परिचित मुझसे मुंह फेर लेते थे।उन्हें डर था कि मुझसे बात करते सी.आई.डी.देख लेगी तो उन्हें भी जेल जाना पड़ सकता है।
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जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद और लालू-नीतीश राज में भी मैंने कोई मुआवजा नहीं मांगा--पत्रकारिता के पेशे में जाकर जीवन यापन करने लगा।
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पर,जिन भुक्तभोगी जेपी सेनानियों को अब भी कुछ नहीं मिला,उनकी उम्मीदें
सम्राट चैधरी पर टिकी है।
आजादी के बाद जेपी आंदोलन बिहार का सबसे बड़ा जन आंदोलन था।
हजारों पेंशन वंचित जेपी आंदोलनकारियों को कुछ मिला होता तो सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले नौजवान आज भी उपलब्ध होते।
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इस पृष्ठभूमि में प्रभात खबर में आज प्रकाशित मेरा काॅलम पढ़िए।
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पेंशन के लिए प्रतीक्षारत जेपी सेनानियों की उम्मीद जगी
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सुरेंद्र किशोर
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जानकार सूत्रों के अनुसार मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी ने पेंशन के लिए वर्षों से प्रतीक्षा रत जेपी सेनानियों की उम्मीद जगा दी है।
खबर है कि जेपी सेनानी सम्मान योजना की सलाहकार पर्षद का जल्द ही पुनर्गठन होने वाला है।
उसके बाद पेंशन के लिए एकत्र किए गए हजारों आवदेन पत्रों पर विचार होगा।
करीब 21 हजार ऐसे जेपी सेनानियों के आवेदन पत्र विचाराधीन हैं,जिन्होंने सन 1974 से लेकर 1977 तक जेल यातना सही या फरार रहे।या उन्हें यातनाएं दी गईं।
इनमें से करीब 450 आवेदन पत्रों की जांच हो चुकी है।
ऐसे आवेदन पत्रों पर सलाहकार पर्षद की अनुशंसा अपेक्षित है।
जानकारी मिली है कि मुख्य मंत्री श्री चैधरी ने उन सेनानियों के प्रति अत्यंत सकारात्मक रुख अपनाया है जिन्होंने जेपी आंदोलन और आपातकाल में अपार कष्ट सहे थे।
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पेंशन पर कांग्रेस का एतराज
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जेपी सेनानियों के लिए नीतीश सरकार ने सन 2009 में पेंशन योजना शुरू की।तब कांग्रेस तथा कुछ अन्य दलों ने इसका विरोध किया था।पर मुख्य मंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी ने जेपी सेनानियों और उनके परिजनों के अपार कष्टों की चर्चा करते हुए उसका औचित्य बताया।
जिन सेनानियों को पेंशन की राशि अभी मिल रही है,उनकी संख्या कम है।
बहुत सारे आवेदन लंबित हैं जिन पर फैसला होगा।जेपी सेनानियों के लिए यह संतोष की बात होगी कि मुख्य मंत्री चैधरी ने खुद ही उनकी समस्या को हल करने में रूचि दिखाई है।
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राष्ट्रीय स्तर पर सेनानी
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जेपी सेनानी सम्मान योजना की सलाहकार पर्षद के तत्कालीन अध्यक्ष व बिहार सरकार के पूर्व राज्य मंत्री मिथिलेश कुमार सिंह ने
सन 2015 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिखा था। दिवंगत सिंह ने लिखा था कि जेपी सेनानियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पेंशन स्वीकृत करने पर केंद्र विचार करें।
दरअसल कुछ भाजपा शासितत राज्य सरकारें जेपी सेनानियों को
अपने यहां सम्मान पेंशन तो दे देती है।पर जैसे ही वहां कांग्रेस की सरकार बन जाती है तो उसे वह बंद कर देती है।
इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में पहल होनी चाहिए।
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न बांस रहेगा,न बजेगी बांसुरी
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लगता है कि डी.जे.और लाउड स्पीकर की आवाज को नियंत्रित
करना इस देश के
शासन तंत्र के वश में नहीं है।नियंत्रण के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की लगातार उपेक्षा होती रहती है।
दरअसल अब डी.जे. के उत्पादन पर ही प्रतिबंध लगा देने के बारे में विचार करना चाहिए।
क्योंकि यह फसाद की जड़ भी बनता जा रहा है।आए दिन तेज आवाज वाले डी.जे.के कारण हिंसा होती है और लोगों की जानें भी जाती हैं।बूढ़े और बच्चों के स्वाथ्य पर तेज आवाज का बहुत बुरा असर पड़ता है।
इसी तरह लाउड स्पीकर के निर्माण के समय ही उसमें ऐसा यांत्रिक प्रबंध हो जाए ताकि उसकी आवाज उसी सीमा तक रहे जो सीमा सुप्रीम कोर्ट ने तय की है।ऊंची आवाज वाली लाउड स्पीकर मशीन का निर्माण सिर्फ पुलिस-प्रशासन के लिए सीमित संख्या में हो।
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ग्रामीण बाजारों का संपर्क मार्ग
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बिहार में संपर्क मार्ग को लेकर राज्य सरकार का काम सराहनीय है। मुख्य मंत्री ग्राम संपर्क योजना के तहत व्यापक स्तर पर काम हो रहे हैं। मुख्य मार्गों से संपर्क विहीन बसावटों को जोड़ना है।ऐसी सड़कें हर मौसम में काम करंेगी।
इस सिलसिले में एक खास बात पर ध्यान देने की जरुरत है।
विभिन्न गांवों को पास के बाजारों से भी गांवों को जोड़ने की दिशा में प्राथमिकता के आधार पर काम होना चाहिए।
उदाहरणार्थ सारण जिले के दरियापुर अंचल के खानपुर-भरहापुर बाजार की चर्चा प्रासंगिक होगी।
इस बाजार से पश्चिम की ओर सखनौली गांव की ओर जा रही सड़क की हालत वर्षों से खराब है।
नदी किनारे से गुजर रही इस महत्वपूर्ण सड़क के मजबूतीकरण से बाजार का भी विकास होगा और स्थानीय स्तर पर ही लोगों के रोजगार के अवसर बढ़ जाएंगे।
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भूली-बिसरी यादें
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यह बात सन 1969 की है।इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में मोरारजी देसाई उप प्रधान मंत्री और वित्त मंत्री थे।
प्रधान मंत्री श्रीमती गांधी ने देसाई को विश्वास में लिए बिना उनसे लेकर खुद वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाल लिया।साथ ही
प्रधान मंत्री ने मोरारजी देसाई से कहा कि आप उप प्रधान मंत्री बने रहें।
देसाई ने इसे अपनी तौहीन समझी और केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।
उससे पहले प्रधान मंत्री ने देसाई को लिखा था कि चूंकि आपकी आर्थिक नीति हमारे विचारों से मेल नहीं खाती,इसलिए क्यों न आपको वित्त मंत्री पद से मुक्त कर दिया जाये ?
इस पत्र का जवाब मोरारजी देसाई लिखवा ही रहे थे कि उसी बीच उन्हें यह जानकारी मिली कि उनसे वित्त मंत्रालय ले लिया गया है।मोरारजी दसाई ने सिर्फ उप प्रधान मंत्री बने रहना ठीक नहीं समझा और मंत्रिमंडल से ही अपना इस्तीफा भेज दिया।
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और अंत में
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इसी साल 14 फरवरी को बिहार पुलिस के आई.जी. जितेंद्र राणा ने अतिक्रमण के बारे में आयेजित बैठक में कहा था कि किसकी लापरवाही से पटना की सड़कों पर दोबारा अतिक्रमण हो जाता है,उसकी जवाबदेही तय होगी।
तीन महीने के बाद भी अब तक यह पता नहीं चल सका है कि इस मामले में किन-किन लोगों की जवाबदेही तय हुई है।
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दैनिक प्रभात खबर,पटना में 25 मई 26 को प्रकाशित
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