Sunday, December 10, 2017

भारत के राष्ट्रपति बनते -बनते रह गए थे सी.राज गोपालाचारी



    
सी.राज गोपालाचारी यानी राजा जी कई बातों के लिए याद किए जाते हैं।
वे न सिर्फ आजाद भारत के पहले और आखिरी भारतीय गवर्नर जनरल थे बल्कि उन्होंने 1959 में एक ऐसी गैर कांग्रेसी पार्टी यानी स्वतंत्र पार्टी बनाई जिसे 1967 में  लोक सभा में 44 सीटें मिलीं।
तब तक इतनी अधिक सीट किसी अन्य प्रतिपक्षी पार्टी को नहीं मिल सकी थी।
  आजादी के बाद तब के गवर्नर जनरल लाॅर्ड माउंट बेटन वापस जाने लगे तो सवाल उठा कि उनकी जगह कौन लेगा।
 कांग्रेस पार्टी  की राय सरदार बल्लभ भाई पटेल के पक्ष में थी ।किंतु प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू की जिद पर राज गोपालाचारी गवर्नर जनरल बने।उससे पहले राजा जी पश्चिम बंगाल के गवर्नर रह चुके थे।
 सन 1950 में जवाहरल लाल जी, राजा जी को राष्ट्रपति बनवाना चाहते थे।पर , सरदार पटेल की जिद पर डा.राजंेद्र प्रसाद बने।
 सरदार पटेल के निधन के बाद राजा जी देश के गृह मंत्री बने थे।पर नेहरू के साथ सैद्धांतिक मतभेद के कारण वे उस पद से 10 महीने में ही हट गए।
हालांकि बाद में भी राजा जी मद्रास के मुख्य मंत्री बने।
वे 1937-39 में भी वहां के मुख्य मंत्री यानी प्रीमियर रह चुके थे।
पर कभी उन्होंने अपने विचारों से समझौता नहीं किया।
राजा जी खुली अर्थ व्यवस्था के कट्टर समर्थक थे।
इसीलिए जब उन्होंने स्वतंत्र पार्टी बनाई तो उससे बड़े -बड़े उद्योगपति व राजा महाराजा जुड़े।फिर भी कुछ कारणवश जवाहर लाल नेहरू उन्हें पसंद करते थे।
राजा जी 1952 से 1954 तक मद्रास के मुख्य मंत्री थे।उनके ही मुख्य मंत्रित्व काल में मद्रास से अलग होकर 1953 में भाषा के आधार पर आंध्र प्रदेश अलग राज्य बना।
  गांव के स्कूल से अपनी शिक्षा प्रारंभ करने वाले राजा जी विद्वान लेखक ,वकील और राज नेता थे ।उन्होंने ऊंची शिक्षा हासिल की थी।राजा जी का जन्म मद्रास प्रेसिडेंसी के एक गांव में 10 दिसंबर 1878 को हुआ था।उनका निधन 25 दिसंबर 1972 को हुआ।
उन्होंने बाल गंगाधर तिलक के प्रभाव में आकर 1911 में सार्वजनिक जीवन की शुरूआत की।
सन 1919 में वे गांधी जी से जुड़े।
वे गांधी जी से पारिवारिक रूप से जुड़ गए थे।
राजा जी की बेटी लक्ष्मी की शादी महात्मा गांधी के चैथे पुत्र देव दास गांधी से हुई थी।देवदास गांधी हिन्दुस्तान टाइम्स के प्रबंध संपादक  थे।
देव दास गांधी -लक्ष्मी के पुत्र राज मोहन गांधी, राम चंद्र गांधी और गोपाल कृष्ण गांधी हुए।राम चंद्र गांधी का 2007 में निधन हो गया।गोपाल कृष्ण गांधी पश्चिम बंगाल के गवर्नर थे।
  राजा जी हमेशा ही स्वतंत्र विचार के राज नेता रहे ।
वे जो ठीक समझते थे,वही करते थे।उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया था।उनके अपने तर्क थे जो गांधी जी से नहीं मिलते थे।
इसीलिए जब जवाहरलाल नेहरू ने उन्होंने राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव किया तो कांग्रेस पार्टी ने उनका कड़ा विरोध कर दिया।
विरोध इसी आधार पर हुआ कि जिस व्यक्ति ने कांग्रेस की सबसे कठिन लड़ाई में हमारा साथ नहीं दिया ,उन्हें हम राष्ट्रपति कैसे बनाएं।
  हालांकि दूसरी ओर अपने निधन से पहले राजाजी ने एक बार सार्वजनिक रूप से कहा था कि आजादी के बाद यदि जवाहर लाल नेहरू की जगह सरदार पटेल प्रधान मंत्री बने होते तो देश के लिए बेहतर  होता।
@ फस्र्टपोस्ट हिंदी में 10 दिसंबर 2017 को प्रकाशित मेरा लेख@
   ं

  

Saturday, December 9, 2017

  इन दिनों इस देश के अनेक बुद्धजीवी एक बात को 
लेकर  चिंतित लग रहे हैं।
उनकी चिंता है कि प्रतिपक्ष कमजोर होता जा रहा है।यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
व्यक्तिगत रूप से मेरी भी यही राय है।
 इस समस्या का समाधान आखिर कौन करेगा ?
  वही करेगा जिसने प्रतिपक्ष को कमजोेर किया है।
मेरा मानना है कि प्रतिपक्ष ने खुद ही प्रतिपक्ष को कमजोर किया है।
 आज का प्रतिपक्ष जब  सत्ता में था तो उनमें से बहुलांश   पर लगातार घोटालों और महा घोटालों के आरोप लगते रहे।
उन पर यह आरोप भी था कि उसने अल्पसंख्यकों के बीच के अतिवादियों का तुष्टिकरण किया।अल्पसंख्यकों को लेकर खुद कांग्रेस की ए.के.एंटोनी कमेटी की रपट में भी इस तरह की  बात कही गयी है।
  इन दो बातों का भाजपा ने पूरा लाभ उठाया।
  अब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बनने जा रहे हैं।
बल्कि कहिए कि बन ही चुके हैं।घोषणा बाकी है।
क्या राहुल जी  उपर्युक्त कारणों से सहमत हैं ?
यदि नहीं तो अपनी पार्टी की लगातार हार के असली कारणों
का वे खुद पता लगाएं और लगवाएं। जरूरत समझें तो देश-विदेश की किसी निष्पक्ष एजेंसी से जांच करवा लें।
चिंतित बुद्धिजीवी उन्हें इस काम में मदद करें।सब मिल कर उन कारणों को दूर करने के गंभीर उपाय करें।
उसके बाद  ही वे मतदाताओं से उम्मीद करें कि वे उन्हें दोबारा मजबूत करेंगे।
  यह मान कर चलें कि मतदाता कभी गलत नहीं होते।
मेरी समझ से गत विधान सभा चुनाव में न पंजाब के मतदाता गलत थे और न ही उत्तर प्रदेश के ।
आम मतदाताओं को बेहतर सरकार चाहिए।यहां वैसे मतदाताओं की बात नहीं की जा रही है जो धर्म और जाति के नशे में डूबे रहते हैं।
 इसे नहीं भूलना चाहिए कि सोफ्मा जैसी ज्यादा अच्छी तोप को छोड़कर जब केंद्र सरकार ने कम अच्छी तोप बोफर्स खरीद ली तो जनता नाराज हो गयी थी। इसीलिए 1989 में कांग्रेस हार गयी।जनता सब जानती है। 
  
     


मैंने अपने पोस्ट की अंतिम लाइन में  वी.पी.सिंह को उधृत करते हुए यह लिखा  है कि ‘मैंने कभी यह आरोप नहीं लगाया कि राजीव गांधी को पैसे मिले हैं।’
 दरअसल 1989 के लेास चुनाव में कांग्रेस इसलिए हार गयी क्योंकि वी.पी.सिंह बोफर्स के दलालों पर आरोप लगा रहे थे और राजीव और उनके दल के लोग दलालों का बचाव कर रहे थे।
मतदाताओं ने समझा कि जरूर दाल में कुछ काला है।इसलिए कांग्रेस हार गयी। 1988 में पटना के एक प्रेस कांफंे्रस में मैंने वी.पी.सिंह से यह सवाल किया था कि ....तब आप राजीव गांधी से इस्तीफा की मांग क्यों नहीं करते ? इस पर उन्होंने कहा कि आप कोई सिरियस सवाल कीजिए।
  जहां तक जल्दीबाजी में केस के निपटारे का सवाल है, तो उसके बारे में कुछ बातें।
2 दिसंबर, 1989 को वी.पी.प्रधान मंत्री बने और 22 जनवरी को 
बोफर्स में प्राथमिकी दर्ज कर दी गयी।
जिस घोटाले का अतंरराष्ट्रीय विस्तार हो,उसमें आखिर कितनी जल्दीबाजी हो सकती थी ?
एक बात और थी।कांग्रेस के अलावा भी कुछ दूसरे दलों के बड़े -बड़े नेता भी इस केस को दबाने में लगे थे।देश -विदेश की अदालतों में तरह -तरह की अपील करके मामले को लंबा खींचा जा रहा था।
जब -जब कांग्रेस या कांग्रेस समर्थित सरकारें आईं  , केस को कमजोर करने के काम हुए।
  इसके बावजूद  अटल सरकार के कार्यकाल में  1999 में  आरोप पत्र दाखिल किया गया।आरोप पत्र के सेकेंड काॅलम में आरोपित के रूप में राजीव गांधी का भी नाम है।  
   मृतक आरोपित का नाम उसी कालम में होता हैं।यदि वी.पी.सिंह और जांच एजेंसियों ने सारे संबंधित सबूत एकत्र नहीं किए होते तो आरोप पत्र कैसे तैयार होता ? केस इतना मजबूत था कि कांग्रेस सरकार भी कोर्ट में ट्रायल का सामना करने को कभी तैयार नहीं हुई।वह केस वापस ही कर रही थी। 
 बिहार के तब के एक कांग्रेसी विधायक ने इस संबंध में मुझे एक सनसनीखेज बात बताई थी।उस विधायक को राजीव जी के कारण ही  1985 ं टिकट दिया गया था।वह अब भी राजीव के कट्टर प्रशंसक हैं।राजीव से बातचीत के  आधार पर  बोफर्स पर उस विधायक @अब पूर्व@ ने किताब लिखी है।वह किताब मेरे पास भी है।
  उसमें यह कहा गया है कि बोफर्स सौदे में दलाली राष्ट्र हित के एक खास काम के लिए  ली गयी थी।वह राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित  काम था।
वह गुप्त काम था।
 उस गुप्त काम की चर्चा उस किताब में है।पर मैं  उसे जाहिर करना नहीं चाहता।
पूर्व विधायक के अनुसार उसे राजीव जी देशहित में सार्वजनिक नहीं कर सकते थे चाहे उनकी गददी ही क्यों न चली जाए।इसीलिए उन्होंने लगातार क्वात्रोचि का बचाव किया। 


  


  मेरे आवास के पास में ही सरकारी मिडिल स्कूल है।
स्कूल से  प्रार्थना और राष्ट्रगीत की आवाज मुझे रोज सुनाई पड़ती है।
  कल उसी स्कूल की एक छात्रा मेरे घर के पास से गुजर रही थी कि इसी बीच स्कूल में राष्ट्र गान शुरू हो गया।छात्रा जहां थी, तत्काल सावधान की मुद्रा में सड़क पर ही खड़ी हो गयी।
जब राष्ट्रगान समाप्त हुआ, तभी वह आगे बढ़ी।
मैं उसे जानता नहीं।पर उस छात्रा में यह अनुशासन और संस्कार देख कर मुझे अच्छा लगा।स्वाभाविक है कि इसमें परिवार के साथ-साथ संबंधित स्कूल का भी योगदान है।



मणि शंकर अय्यर जी,
 आप गत लोक सभा चुनाव से ठीक पहले नरेंद्र मोदी के लिए प्रधान मंत्री पद की जगह  चाय की दुकान का स्थल दे रहे थे।
 आपके इस बयान से  लोक सभा चुनाव में कांग्रेस को कितना फायदा मिला ?
बाद में आपने पाकिस्तान जाकर वहां के लोगों से सार्वजनिक रूप से यह अपील की कि आप लोग मोदी की सरकार को हटवाइए।
 आपके इस बयान से उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को कितना लाभ मिला ?
अब आपने कहा कि नरेंद्र मोदी  नीच इनसान है।
गुजरात में इस बयान से कांग्रेस का कितना वोट बढ़ेगा ? 
   आप तो विदेश सेवा में थे।काफी प्रतिभाशाली हैं।राजीव के अत्यंत करीबी रह चुके हैं।आप जरूर सोच- समझ कर ही  बयान देते होंगे।बस उसके ,उददेश्य, कारण व परिणाम के बारे में भी कभी कुछ लोगों को बता दीजिएगा। 
@ 7 दिसंबर 2017@

  देश के नामी पत्रकार और समाजवादी विचारक राज किशोर
ने ‘राष्ट्रीय सहारा’ में  अपने साप्ताहिक काॅलम ‘परत दर परत’ में  राम जन्म भूमि मंदिर-मस्जिद विवाद पर कल निम्न लिखित बातें लिखी हैं।
उनका लेख तो लंबा है और उसमें पूरी पृष्ठभूमि का संक्षिप्त विवरण है।
पर, राज किशोर ने अपने लेख के अंत में देशहित में महत्वपूर्ण सुझाव दिए  हंै जो इस प्रकार हंै--
‘ मेरी अल्प बुद्धि के अनुसार विकल्प अब दो ही हैं।एक न्यायिक समाधान का है।लेकिन यह रास्ता कंटीला है।कोर्ट में बहस मंदिर-मस्जिद पर नहीं , इस पर होगी कि विवादित जमीन पर मालिकाना हक किसका है।
यहां बाबरी मस्जिद का पक्ष मजबूत दिखाई पड़ता है,तब हिंदुओं की ओर से देशव्यापी उपद्रव का नया सिलसिला शुरू हो सकता है।
तब हमें बहुसंख्यकवाद का तांडव देखने को मिलेगा।
     इसलिए दूसरा विकल्प ही व्यावहारिक है कि मुसलमान स्वेच्छा से विवादग्रस्त भूमि हिंदूवादियों को दे दें।
इसे समर्पण या अपमान का मामला न माना जाए।मुसलमान उदारता दिखाएंगे तो उनकी प्रशंसा ही होगी।
बेशक हिंदूवादी इसे उदारता के रूप में नहीं लेंगे।
विजय दिवस मनाएंगे,लेकिन मुसलमानों को जहर का घूंट इसलिए निगल लेना चाहिए कि पूरा देश हिंदूवादी नहीं हुआ है।
मेरा मानना है कि भारत की व्यापक जनता मुसलमानों की उदारता से बहुत प्रभावित होगी जिससे राम मंदिर अभियान की हवा निकल जाएगी।
 कभी -कभी झुक जाना भी बुद्धिमानी होती है।इसलिए यह प्रयोग करके देखने में कोई हर्ज नहीं।’
    कई साल पहले खुशवंत सिंह ने भी इसी तरह का सुझाव दिया था।उन्होंने कहा था कि दावा किया जाता  है कि मध्य काल में इस देश के करीब 4000 मंदिरों को तोेड़कर वहां मस्जिदें बनायी गयीं।
 दिवंगत सिंह के अनुसार हिंदुओं को 3997 मस्जिदों पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए।उधर मुसलमान पक्ष काशी ,मथुरा और अयोध्या के मामले में हिंदुओं को सहूलियत दें।
पर ऐसा नहीं हो सका।हालांकि संघ  परिवार के कुछ सदस्य यह कह चुके हैं कि उन्हें सिर्फ राम मंदिर से मतलब है,काशी-मथुरा से नहीं।जब कि काशी का ज्ञानवापी मस्जिद ,मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
यह भी कहा जाता है कि यदि खुशवंत की बात मान ली गयी होती तो  आज भाजपा की केंद्र में बहुमत वाली सरकार नहीं होती।
  क्या इस मामले में विभिन्न पक्षों की जिद के पीछे कोई अन्य बड़ा कारण या उद्देश्य है ?  पता नहीं !

Friday, December 8, 2017

  दहेजमुक्त शादी में जो कुछ खास तरह की समस्याएं  आती हंै, आज मैं उनकी चर्चा करना चाहूंगा।
ऐसा नहीं है कि समाज के पास इन  समस्याओं का हल नहीं है।
पर, शत्र्त यह है कि समाज के कुछ जन सेवी लोगों को थोड़ा समय देना होगा।
  जातीय व सामाजिक संगठन इसमेें अच्छी भूमिका निभा सकते हैं।
कुछ तो निभाते भी हैं।पर, इसमें विस्तार की जरूरत है।
 फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर राजपूत समुदाय में जो एकता देखी जा रही है, उस एकता का सदुपयोग ऐसे  काम में हो सकता है।
   मेरे छोटे भाई नागेंद्र सन 1976 में बिहार सरकार में श्रम प्रवत्र्तन पदाधिकारी पद पर नियुक्त हुए थे।एक तो सरकारी नौकरी,दूसरे अपनी खेती-बारी और तीसरे लड़के का प्रभावशाली व्यक्तित्व।
  दहेज देने वालों की कमी नहीं थी।
पर, मेरा परिवार चाहता था कि हम दहेज के चक्कर में न पड़ें।अन्य बातों पर ध्यान दें।हमने 1979 में पटना जिले के बैकट पुर मंदिर में नागेंद्र की शादी आयोजित की।कोई दहेज नहीं ,कोई फालतू दिखावा नहीं।
 अच्छी शादी हुई।परिवार व रिश्तेदार अच्छे मिले।
   पर, उससे पहले मुझे 1978 में एक अजीब अनुभव हुआ। उन दिनों मैं दैनिक ‘आज’ के पटना ब्यूरो में काम करता था।एक विधि पदाधिकारी  मेरे एक रिश्तेदार को लेकर मेरे आॅफिस में  आए।आते ही उस पदाधिकारी ने मुझसे पूछा कि ‘आप भाई का कितना तिलक लीजिएगाा ?’
मैंने कहा कि हम लोग तिलक -दहेज नहीं लेते।
लड़की यदि पसंद आ जाएगी तो मुफ्त में शादी हो जाएगी।
 वे चले गए।उन्होंने लौटते समय मेरे रिश्तेदार से कहा कि लगता है कि लड़के में कोई दोष है,इसीलिए यह आदमी दहेज नहीं मांग रहा है।
   अब यहीं सामाजिक संगठन की भूमिका आती है।
संगठन ऐसे लोगों की सूची तैयार करें जो दहेजमुक्त और कम से कम खर्च में शादी करना चाहते हैं।
  मैरिज एक्सचेंज बनाएं।दोनों पक्षों को मिलाएं।वैसे लोग कम मिलेंगे,पर मिलेंगे जरूर।
 वैसी जातियों के समाजसेवी लोगों को यह काम पहले शुरू करना चाहिए जिन जातियों में दिखावे के लिए शादियों में अनाप -शनाप खर्च करने की परंपरा रही है।शादियों में फिजूलखर्ची के कारण कई परिवारों की आर्थिकी बिगड़ते मैंने देखा है।
   एक और कठिनाई है।
यदि किसी लड़की वाले से कहिए कि हम मंदिर में शादी करना चाहते हैं तो वे कहेंगे कि लोग क्या कहेंगे ?
बारात हमारे दरवाजे पर आनी चाहिए।
  ऐसी ही समस्या 1971 में कर्पूरी ठाकुर को भी झेलनी पड़ी थी।वे चाहते थे कि उनकी पुत्री की शादी देवघर मंदिर में हो,पर लड़की की मां की जिद पर शादी उनके गांव पितौझिया में हुई।
  मेरी अपनी शादी 1973 में सोन पुर में हुई।मैं भी चाहता था कि शादी मंदिर में हो।पर मेरी भावी पत्नी के पिता की अपनी समस्या थी।
उनकी बड़ी लड़की की दहेजमुक्त आदर्श शादी मंदिर में हुई थी।
इस बार मेरी ससुराल वाले चाहते थे कि उनके घर बारात जाए।
मेरी शादी दहेज मुक्त होनी थी।इसलिए समस्या थी कि बारात का खर्च कहां से आएगा ?
मैंेने बाबू जी को साफ मना कर दिया था कि बारात सजाने के लिए जमीन नहीं बिकेगी। 
हालांकि वे वैसा करने को तैयार थे।
 उन्होंने कहा कि जब मेरे रिश्तेदार और मित्र-परिचित बारात में नहीं जाएंगे तो मैं भी नहीं जाऊंगा।उन्हें मैं कैसे छोड़ दूं ? तुम जाओ शादी कर लो।
मुझे कोई एतराज नहीं।
 फिर क्या था ! मेरी शादी की ‘बारात’ में पटना  लाॅ कालेज  के मेरे  सहपाठी, युवजन सभा के  साथी और सोशलिस्ट नेता तथा  आधा दर्जन विधायक थे ।मेरे दोनों भाई जरूर शादी में थे।कर्पूरी ठाकुर ने एक तरह से समधी की भूमिका निभाई।
  रात में ही बारात के लोग पटना लौट आए।लगे हाथ बता दूं कि उसी साल मेरी अपनी शादी के कुछ ही दिन पहले मैं पटना के लाला लाजपत भवन में नीतीश कुमार के आदर्श विवाह में शामिल हुआ था।
मैंने अपने बड़े बेटे अमित की शादी भी उसी तरह से की।मेरे समधी उदय नारायण सिंह हजारीबाग में वकील हैं।
वे ही लोगों को बताते हैं कि ‘मुझसे  सुरेंद्र जी ने कोई दहेज नहीं ली।’
मेरे छोटे पुत्र अनुपम ने मुम्बई के टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंस से एम.एस.डब्ल्यू. किया है। उसने  ‘नेट’ भी कर लिया है।इन दिनों वह रांची में  एन. जी. ओ. में काम करता है।
उसने कहा है कि वह जब भी शादी करेगा, कोर्ट मैरिज ही करेगा।
कोई तामझाम नहीं।जाहिर है कि मुझे उसके फैसले पर गर्व है।
पर मेरा मानना है कि ऐसी शादियों के लिए जो भी और जहां भी तैयार हो, उन्हें समाज का बढ़ावा और सहयोग मिलना चाहिए ताकि ऐसे कदमों को  सामाजिक स्वीकृति मिले।
  जहां इस देश के अधिकतर सत्ताधारी नेताओं के यहां की  शादियों में अत्यंत कीमती उपहारों की झरी लगा दी जाती है, वहीं बिहार के उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी ने आज अपने पुत्र की दहेजमुक्त शादी करके मिसाल कायम की है।उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसी शादी  से अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिलेगी।
@ --सुरेंद्र किशोर--3 दिसंबर 2017@