बुधवार, 28 जुलाई 2021

    अपनी संवैधानिक ताकत को पहचानें विधायकगण

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 आज के दैनिक भास्कर(पटना) में प्रकाशित कुछ खबरों के शीर्षक इस प्रकार हैं।

‘‘इतिहास में न तो विधायिका इतनी कममजोर हुई,न हम विधायक।’’

‘‘अफसर हावी, तभी मंत्री ने कहा था चपरासी तक नहीं सुनता है।’’

  ‘‘सी.एम.बोले--विधायकों की सुनें मंत्री, वे चाहें तो हमसे भी मिलें।’’

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इन शीर्षकों को ही पढ़ने से लगता है कि अनेक जन प्रतिनिधि काफी असंतुष्ट हैं।

उनमें से कई आए दिन यह आरोप लगाते रहते हैं कि बिहार में अफसरशाही हावी है।

अफसर हमारी बात नहीं सुनते।

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  पर जन प्रतिनिधि यह नहीं बताते कि जनहित का कौन सा काम करने को किस अफसर से कहा और उसने ध्यान नहीं दिया।

ऐसी कोई शिकायत हो तो जनहित के उस काम का विवरण मीडिया के जरिए आम लोगों तक भी पहंुचना चाहिए।

उससे जन प्रतिनिधि की ही लोकप्रियता बढ़ेगी।

अफसरों के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ेगा।

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सन 1977 से सन 2001 तक संवाददाता के रूप में मैंने विधान सभा व विधान परिषद की रिपोर्टिंग की है।

जब तक सदन में अपेक्षाकृत शांति रहा करती थी,तब तक अपने सवालों के जरिए कई विधायक, मंत्रिमंडल व अफसरशाही पर एक हद तक अंकुश रखते थे।

  वे राज्य व क्षेत्र के जनहित के कई काम सदन के जरिए भी सरकार से करा लेते थे।

पक्ष-विपक्ष के कई विधायकगण प्रश्न काल, ध्यानाकर्षण सूचना,शून्य काल तथा आधे घंटे की चर्चा आदि के जरिए प्रभावकारी भूमिका निभाते थे।

किंतु अब ????

काम कम,शोर अधिक।

यही हाल संसद का भी है।

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अब तो आम लोगों की भी, सब नहीं किंतु, कई जन प्रतिनिधियों से शिकायत रहती है।

लोगबाग चाहते हैं कि हमारे जन प्रतिनिधि, विधायक-सांसद फंड में कमीशनखोरी के खिलाफ कारगर आवाज उठाएं।

आंदोलन करें।

जन प्रतिनिधि गण इस बात की भी शिकायत-चर्चा उचित फोरम पर या फिर मीडिया के जरिए उठाएं कि अंचल कार्यालयों व थानों में जनता के कितने काम मुफ्त में हो जाते हैं कितने नजराना-शुकराना देकर।

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विधायकांे के पास संवैधानिक ताकत बहुत है।

वे ही तो सरकार बनाते और बिगाड़ते हैं।

वे यदि विधायक के रूप में मिले अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल भरपूर करें तो अफसरशाही टेकुआ की तरह सीधी हो जाएगी।

  किंतु इसके लिए विधायकगण संविधान से मिली अपनी ताकत को पहचानें।

दरअसल हनुमान जी को उनकी खुद की ताकत का भान नहीं होता था तो दूसरे लोग उन्हें याद दिलाते थे।

ऐसी अनाधिकार चेष्टा के लिए माननीय विधायकों से क्षमाप्रार्थी  हूं।

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--सुरेंद्र किशोर

27 जुलाई 21

 


     राजनीति के राष्ट्रीय फलक पर ममता 

     बनर्जी की भूमिका अत्यंत सीमित

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     फिर भी भूमिका की तलाश में 

    वह इन दिनों दिल्ली में हैं    

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       --सुरेंद्र किशोर--

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पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी अभी दिल्ली में हैं।

खबर है कि वह राष्ट्रीय फलक पर अपने लिए भूमिका की तलाश में हैं।

   इसमें किसी को भला क्या एतराज हो सकता है ! 

पर, सवाल यह है कि वह पश्चिम बंगाल से जन समर्थन की कितनी बड़ी पूंजी लेकर दिल्ली पहुंची हैं ?

  गत विधान सभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 48 दशमलव 8 प्रतिशत मत मिले थे।

   एक अनुमान के अनुसार इसमें अल्पसंख्यकों के 32 प्रतिशत वोट थे। 

  कांग्रेस नेता अधिरंजन चैधरी ने

चुनाव नतीजे के तत्काल बाद कहा था कि हमारे दल के मुस्लिम समर्थकों ने भी तृणमूल को ही वोट दे दिए।

  चैधरी के अनुसार सी.पी.एम. ने अपने वोट भी तृणमूल को दिलवा दिए।

  यानी, पहली बार मुस्लिम वोट का अभूतपूर्व एकत्रीकरण हुआ।

  ऐसा क्यों हुआ ?

इसलिए हुआ क्योंकि ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से कह रखा था कि यदि पश्चिम बंगाल में सी ए ए और एन आर सी लागू करने की कोशिश होगी तो खून की नदियां बह जाएंगी।

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 केरल के मुख्य मंत्री ने भी ऐसा ही आश्वासान वहां के मुसलमानों को दिया था।

 नतीजतन राहुल गांधी अपनी लोस सीट के नीचे वाले सारे विधान सभा क्षेत्रों में भी इस बार हार गए।यानी, वहां कांग्रेेस हार गई।

वहां भी मुस्लिम वोट का अभूतपूर्व ध्रुवीकरण हो गया।

यानी शाहीन बाग प्रकरण के बाद के विधान सभा चुनावों में मुख्यतः एन.आर.सी.--सी ए ए प्रकरण ही हावी रहे।

आगे के चुनावों में भी हावी रहेंगे,ऐसा लगता है।

ममता बनर्जी एन.आर.सी.-सी ए ए विरोधी अभियान की प्रतीक बन गई हैं।

  फिर भी उनका प्रतीक बनना राष्ट्रीय स्तर पर उनके दल के फैलाव में कितना सहायक होगा ?

 लगता तो नहीं है।

  जहां सपा जैसा कट्टर ‘‘शाहीनबाग’’ समर्थक दल पहले से ही मौजूद है,वहां ममता की क्या उपयोगिता ?

अखिलेश यादव ने शाहीनबाग में धरना पर बैठी महिलाओं की तुलना झांसी की रानी से की थी। 

   यदि 2024 के लोक सभा चुनाव में भी सी. ए. ए.और एन आर सी मुद्दा बना, और बनेगा ही, तो ममता बनर्जी उस चुनाव में पूरे  देश के पैमाने पर कितना कारगर हो पाएंगी ?

यदि करगर नहीं होंगी तो प्रधान मंत्री पद की उम्मीदवार कैसे बनेंगी ?

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 अब पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मिले मतों का विश्लेषण करें।

  टीएमसी को 48.8 प्रतिशत वोट मिले।

इसमें 32 प्रतिशत वोट घटा दीजिए।

कितना बचा ?

16.8 प्रतिशत।

  इसमें से ब्राह्मण वोट का अधिकांश निकाल दीजिए।

फिर कितना बचा ?

 उतने ही वोट ममता को गैर मुसलमान समुदायों से मिले।

 ब्राह्मण वोट इसलिए मैंने कहा क्योंकि इस देश में जिस किसी जाति का व्यक्ति प्रधान मंत्री या मुख्य मंत्री होता है,उसे उसकी जाति का अधिकांश वोट बिना मांगे भी मिल जाता है।

   इस तरह एक अनुमान लग गया कि बंगाल की भी गैर मुस्लिम आबादी में ममता की कितनी पैठ है ?

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याद रहे कि अगले किसी चुनाव में सी.ए.ए.-एन.आर.सी.विरोधी मुसलमान अलग -अलग राज्यों में अलग -अलग पार्टी को एकजुट होकर वोट देंगे।

 जैसे वे यू.पी.में सपा या बसपा को देंगे।

बिहार में राजद के नेतृत्व वाले गठबंधन को देंगे।

पूर्वोत्तर बिहार में वे ओवैसी को देंगे या नहीं, यह देखना होगा।

  अन्य राज्यों में से कहीं अल्पसंख्यक मतदाताओं के लिए कांग्रेस अनुकूल होगी तो कोई अन्य राजग विरोधी दल।

इस स्थिति में ममता बनर्जी की भूमिका अत्यंत सीमित रहेंगी।

   फिर उनके लोग जो 2024 में उन्हें प्रधान मंत्री के पद पर देखना चाहते हैं उसकी संभावना का अनुमान लगा लीजिए।

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27 जुलाई 21


शनिवार, 24 जुलाई 2021

 


 सुप्रीम कोर्ट ही सुलझा सकता है राजनीति के अपराधीकरण की समस्या --सुरेंद्र किशो

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   सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ही कहा है कि 

‘‘लगता है कि अपराधियों को राजनीति में आने और चुनाव लड़ने से रोकने के लिए विधायिका कुछ नहीं कर सकती।’’

   वैसे भी जिस देश की राजनीति,सरकार और विधायिका आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के संपत्ति-शिक्षा-आपराधिक मामलों का विवरण सार्वजनिक करने के खिलाफ रही हो,वह राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ कैसे जा सकती है !

    ठीक उसी तरह विवादास्पद सांसद-विधायक फंड को समाप्त करने में भी इस देश की सरकारें असमर्थ हैं।

उसकी बुराइयों को देखते हुए यह काम भी देर-सवेर सुप्रीम कोर्ट को ही करना पड़ेगा।

  जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने उलझे हुए अयोध्या विवाद को हल किया,उम्मीद की जाती है कि उसी तरह वह इन दोनों मामलों को भी एक दिन जरूर देखेगा।

  ये दो चीजें राजनीति और शासन को घुन की तरह खा रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट न सिर्फ विधायक-सांसद फंड को समाप्त करने का सख्त निदेश दे बल्कि उसे चुनाव आयोग को भी एक खास निदेश देना चाहिए।

 हत्या, बलात्कार और राजद्रोह जैसे संगीन मामलों के आरोपियों के नामांकन पत्रों को चुनाव आयोग अस्वीकार कर दे,ऐसा प्रबंध सुप्रीम कोर्ट करे। 

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    कानून-व्यवस्था की विफलता की देन है 

    राजनीति का अपराधीकरण

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राजनीति का अपराधीकरण, कानून-व्यवस्था की विफलता का मुख्य कारण है।

  इसके लिए क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को बेहतर बनाना होगा।

  इस दिशा में भी सुप्रीम कोर्ट को ही पहल करनी होगी।

कई बार ऐसा होता है कि प्रशासन, पुलिस व अदालतें जब न्याय नहीं दे पातीं तो पीड़ित व्यक्ति कई बार बाहुबलियों की शरण में चलेे जाते हैं।

एकपक्षीय ही सही, लेकिन बाहुबली कई बार उन्हें त्वरित न्याय दिलाता है।

इस तरह वह अनेक लोगों का चहेता बनता जाता है।

उनमें से कुछ बाहुबलियों को एक दिन लोग  विधायक या सांसद भी बना देते हैं।

  अब सवाल है कि क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम बेहतर कैसे होगा ?

  इसके लिए ऐन केन प्रकारेण अदालती सजाओं का प्रतिशत बढ़ाना होगा।

इस दिशा में शासन को सुप्रीम कोर्ट खास-खास निदेश दे सकता है।

किंतु उससे पहले खुद सुप्रीम कोर्ट को कम से कम दो काम करने होंगे।

 वह आरोपियों के नार्को टेस्ट,पाॅलिग्राफी, ब्रेन मैपिंग और डी.एन.ए.टेस्ट कराने की अनुमति जांच एजेंसी को दे दे।

अभी तो सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश लागू है जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरोपी की मर्जी के बिना उसके ऐसे टेस्ट नहीं हो सकते।

  यह सुविधा जब जांच एजेंसियों को मिल जाएगी तो सजा का प्रतिशत बढ़ जाएगा।

  साथ ही, पहले से जारी इस ‘न्याय शास्त्र’ को बदलना होगा  कि ‘‘भले 99 दोषी  छूट जाएं, किंतु किसी एक निर्दोष को भी सजा नहीं होनी चाहिए।’’

  अब यह नीति शास्त्र अपनाना होगा कि ‘‘किसी भी कीमत पर एक भी दोषी छूटने न पाए।’’

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  मुठभेड़ों की जरूरत ही क्यों ?

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यदि अदालती सजाओं का प्रतिशत बढ़ जाए तो पुलिस मुठभेड़ों की जरूरत ही नहीं रहेगी। 

 अभी तो कुछ राज्यों की पुलिस इसे रामवाण दवा मान रही है।आम पब्लिक तब खुश होती है जब कोई खूंखार अपराधी पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मारा जाता है। 

असम पुलिस की गोलियों से गत दो माह में करीब डेढ़ दर्जन  अपराधी और आतंकवादी मारे गए।

 मानवाधिकार आयोग ने स्वतः इन मामलों का संज्ञान लिया है।वैसे मुख्य मंत्री हिमंता विश्वसरमा ने कहा है कि अपराधियों के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति के तहत हमारी पुलिस ने यह कदम उठाया है।

 हालांकि मुख्य मंत्री ने सिर्फ पैर में ही गोली मारने का निदेश दे रखा है।

   इससे पहले उत्तर प्रदेश से यह खबर आई कि 2017 में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद राज्य में कुल 139 अपराधी पुलिस के साथ मुठभेड़ों में मारे जा चुके हैं।

उस दौरान 13 पुलिसकर्मी भी उन मुठभेड़ों में मारे गए।

  यह भी खबर है कि कुछ लोगों को छोड़ दें तो यू.पी.के आम लोग ऐसी मुठभेड़ों से खुश हैं।

  लगता है कि असम के नये मुख्य मंत्री,  योगी आदित्यनाथ की राह पर है।

वैसे भी बिहार के अनेक लोग यह कहते सुने जाते हैं कि बिहार पुलिस को भी इस मामले में उत्तर प्रदेश जैसा कदम उठाना चाहिए।किंतु बिहार की नीतीश सरकार ने सन 2005  में सत्ता संभालने के बाद अपराधकर्मियों के खिलाफ जिस तरह की कार्रवाइयां शुरू की थीं,उसी शैली को ही दुहराना जाना चाहिए।

  सन 2005 के बाद के कुछ वर्षों तक बिहार के छोटे -बड़े अपराधी सहमे हुए थे।

 अब वह बात नहीं है।

इसे बदलना पड़ेगा।

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मुकदमों का रिकाॅर्ड 

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यह एक रिकाॅर्ड है।

इन दिनों इस देश की बड़ी हस्तियों के खिलाफ भ्रष्टाचार व अपराध के मुकदमे चल रहे हैं।उनकी संख्या एक रिकाॅर्ड है।

इतनी अधिक संख्या में एक साथ पहले कभी मुकदमे नहीं चले।

  ये मुकदमे नेताओं,व्यापारियों तथा अन्य प्रमुख लोगों के खिलाफ चल रहे हैं।

इनमें से कुछ विदेश भाग गए।कुछ जेल में हैं।कुछ अन्य जमानत पर हैं।

 अब इसमें एक और नाम जुड़ गया है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुशर््ीद की पत्नी लुइस खुर्शीद के खिलाफ गिरफ्तारी का गैर जमानती वारंट जारी हुआ हैं।

उत्तर प्रदेश के फरूखाबाद कोर्ट ने वारंट जारी किया है।

पूर्व विधायक श्रीमती खुर्शीद के खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप है।

   सलमान खुर्शीद ने कहा है कि उनकी पत्नी को एक साल पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट से अंतरिम जमानत मिल चुकी है। 

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 और अंत में

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इस देश के जिन किसान परिवारों का कोई भी सदस्य सरकारी नौकरी में नहीं है,उस परिवार के उम्मीदवार के लिए 

नौकरी में आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए।

किसानों की आय बढ़ाने का यह परोक्ष, किंतु ठोस उपाय साबित हो सकता है।

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कानोंकान

प्रभात खबर

पटना 

23 जुलाई 21



गुरुवार, 22 जुलाई 2021

    जयप्रकाश नारायण का एकाकीपन

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किशन पटनायक -

जब से केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी है,क्या उसके लोग आपसे पूछते रहते हैं कि क्या -क्या काम देश में करना चाहिए ?

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जयप्रकाश नारायण-

जब से दिल्ली में सरकार बनी है,(तब से)

आज तक क्या सरकार और उसके किसी आदमी ने मुझसे सलाह नहीं ली है।

न बिहार की सरकार ने ली है और न दिल्ली की सरकार ने।

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जयप्रकाश नारायण-

जो कहिए,हमसे उनका कोई संपर्क ही नहीं है,सलाह लेने की बात उठती नहीं है।

     दिल्ली में रहता तो शायद कुछ होता लेकिन बिहार सरकार भी कुछ खास सलाह लेती है,ऐसा नहीं है।

   सलाह देेने का न कोई मेरा अधिकार है ,न इसके बारे में मेरी कोई शिकायत है।

ऐसे तो बीच-बीच में लोग मुझसे मिलते रहते है।

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 यह बातचीत ‘सामयिक वात्र्ता’ नामक पाक्षिक पत्रिका( 16 अगस्त, 1977) में छपी थी।

समाजवादी विचारक व नेता तथा पूर्व लोक सभा सदस्य किशन पटनायक उस पत्रिका के संपादक थे।

दिवंगत पटनायक ने 4 अगस्त, 1977 को जेपी से लंबी बातचीत की थी।

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जेपी आंदोलन,आपातकाल और 1977 का लोक सभा चुनाव मैंने करीब से देखा था।

कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से पहली बार उखाड़ फेंकने का सबसे अधिक श्रेय जेपी को जाता है।

इसके बावजूद जेपी की ऐसी उपेक्षा !!!!!!

दरअसल सत्ता हासिल कर लेने के बाद अधिकतर नेताओं की मानसिकता बदल जाती है।

सब की नहीं।

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--सुरेंद्र किशोर

22 जुलाई 21


    समुचित इलाज के अभाव में मरे थे लोहिया

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   विदेश में आॅपरेशन के लिए वे मात्र 

  12 हजार रुपए नहीं जुटा पाए थे।

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  --सुरेंद्र किशोर--

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‘‘रोगाणु विनाशक व्यवस्था के ना होने तथा डाॅक्टरों और अधिकारियों की लापारवाही और बेफिक्री के कारण डा.राम मनोहर लोहिया की मृत्यु हुई।’’

   इंदिरा सरकार और बाद की जनता पार्टी सरकार 

की ओर से नियुक्त जांच समिति का उपर्यक्त निष्कर्ष था।

याद रहे कि प्रोस्टेट ग्लैंड के आॅपरेशन के लिए डा.लोहिया दिल्ली के वेलिंगटन अस्पताल में भर्ती हुए थे ।

आॅपरेशन हुआ।

किंतु समुचित चिकित्सा व लापरवाही के कारण उनका 12 अक्तूबर, 1967 को निधन हो गया।

उस समय वे लोक सभा के सदस्य थे।

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अब सवाल है कि डाक्टरों -अधिकारियों की लापरवाही के लिए किसी को सजा दी गई ?

मुझे नहीं मालूम।

 किसी अन्य को मालूम हो तो वे जरूर बताएं।

तब राजनीतिक हलकों में यह चर्चा थी कि दोषी व्यक्ति एक बहुत बड़े नेता का काफी करीबी निकल गया था,इसलिए उसे बख्श दिया गया।

क्या यह सच है ?

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सवाल यह भी है कि उस अस्पताल में एंटी बाॅयटिक न रहने के बावजूद  आॅपरेशन क्यों किया गया ?

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डा.लोहिया जर्मनी में यह आॅपरेशन कराना चाहते थे।

जर्मनी के एक विश्व विद्यालय ने व्याख्यान के लिए उन्हें बुलाया था।

आने-जाने का खर्च विश्वविद्यालय वहन कर रहा था।

पर आॅपरेशन का खर्च खुद उठाना था।

लोहिया ने अपने दल के एक प्रमुख सहकर्मी से कहा था कि वह 12 हजार रुपए का प्रबंध करे।

पर,इस काम के लिए चंदा उन राज्यों से एकत्र न करे जहां की सरकारों में हमारी पार्टी यानी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि शामिल हैं।

याद रहे कि तब बिहार ,उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश सहित देश के नौ राज्यों गैर कांग्रेसी सरकारें चल रही थीं।

बिहार में तो संसोपा नेता कर्पूरी ठाकुर उप मुख्य मंत्री, वित्त मंत्री और शिक्षा मंत्री थे।

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डा.लोहिया को लगता था कि सत्ता वाले राज्य से पैसे आएंगे तो उससे हमारी सरकार की बदनामी हो सकती है।

जिन्हें दल से जुड़े मजदूरों से पैसे लेने का जिम्मा दिया गया था,वह नेता समय पर पैसे नहीं जुटा सके।

इस बीच आॅपरेशन जरूरी हो गया ।

 लोहिया को दिल्ली के अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।

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डा.लोहिया का जन्म 1910 में हुआ था।

 मात्र 57 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई।

वह भी पैसे के अभाव व सरकारी लापारवाही के चलते।

स्वतंत्रता सेनानी व समाजवादी नेता व विचारक लोहिया कितने महत्वपूर्ण हस्ती थे,यह बात यह देश अब जान गया है।

   देश के इतने महत्वपूर्ण नेता के जीवन के साथ भी ऐसी लापरवाही ?

फिर भी दोषियों को कोई सजा नहीं !

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--सुरेंद्र किशोर-

14 जुलाई 21


     पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हत्या,

    बलात्कार और विस्थापन के संबंध में    

     ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में मानवाधिकार 

      आयोग की रपट प्रकाशित     

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     --सुरेंद्र किशोर-

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क्या पश्चिम बंगाल इसी देश का एक अंग है जिस देश के बारे में यह कहा जाता है कि यहां संविधान व कानून का शासन है ?

  ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में इस महीने कई किस्तों में प्रकाशित रपटों से इस दावे पर आपको कुछ संदेह हो सकता है।

  राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी कहा है कि पश्चिम बंगाल में शासकों का कानून चलता है न कि वहां कानून का शासन है।

 इससे पहले कोलकाता हाईकोर्ट ने आयोग को निदेश दिया था कि वह पश्चिम बंगाल में हुई चुनाव बाद हिंसा की जांच करे।

आयोग ने जांच की और रपट अदालत को दे दी ।

और, कहा कि अपराध के मामलों की जांच सी.बी.आई.करे।

साथ ही, आयोग ने अदालत से यह भी गुजारिश की है कि  हत्या,बलात्कार,आगजनी  व विस्थापन आदि से संबंधित मुकदमों की सुनवाई पश्चिम बंगाल से बाहर के किसी राज्य में कराई जाए।

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जिनके लिए संभव है वे 16 जुलाई से 20 जुलाई, 2021 तक के इंडियन एक्सप्रेस को पढ़ लें।

उन्हें मौजूदा बंगाल की एक झलक मिल जाएगी।

  उनमें मानवाधिकार आयोग की रपट का विवरण छपा है जो रपट कोलकाता हाईकोर्ट को सौंपी गई है।

पश्चिम बंगाल के बाहर के लोगों को जानना ही चाहिए कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में कैसी -कैसी अभूतपूर्व घटनाएं घट रही हैं।

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21 जुलाई 21 


 


शोरगुल से सदन स्थगित होने पर परेशानी से बच जाती है सरकार-सुरेंद्र किशोर

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संसद और बिहार विधान मंडल के सदनों की कार्यवाही इसी महीने शुरू होगी।

 आए दिन यह देखा जाता है कि सदन की कार्यवाही शुरू होते ही शोरगुल-हंगामा शुरू हो जाता है।कभी -कभी तो मारपीट भी।

  इससे जनता का भला होता है या सरकार का ?

 या प्रतिपक्षी नेताओं का जो आम तौर पर हंगामा शुरू करते हैं ?

किसी का नहीं।

हां,एक हद कत्र्तव्य विमुख सरकारी अफसर व मंत्री जरूर 

राहत महसूस करते हैं।

   दूसरी स्थिति क्या हो सकती है ?

यदि शांतिपूर्वक सदन चला करे तो मंत्रियों को पक्ष-विपक्ष सदस्यों के प्रश्नों व ध्यानाकर्षण सूचनाओं के जवाब देने होंगे।

   शून्य काल में जो मामले उठाए जाते हैं,उनका भी महत्व है।

आधे घंटे की चर्चा और आम वाद विवाद से भी जनता का भला होता है।

पर, इन सब कामों के लिए सदस्यों को अध्ययनशील व कुशल वक्ता बनना पड़ेगा।

  कितने सदस्य हैं जिन्हें जन समस्या व सरकारी कामकाज का अध्ययन करने की फुर्सत है ?

  कितने सदस्य सदन संचालन नियमावली के प्रावधानों का उपयोग करके अपनी दमदार व सोददेश्य उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं ?

हंगामा व मारपीट करने पर मीडिया में नाम

और चेहरे आ ही जाते हैं।

इसका एक नुकसान यह भी होता है कि शांतिप्रिय सदस्यों को अपनी बातें कहने का अवसर कम ही मिल पाता है।  

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 राज्य सभा में दलगत स्थिति

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राज्य सभा में राजग के 116 सदस्य हैं।

यू.पी.ए. के सदस्यों की संख्या 54 है।

अन्य दलों के 61 सदस्य हैं।

14 सीटें खाली हैं।

राजनीतिक रूप से जागरूक लोग इन दिनों अक्सर यह कहा करते हैं कि राज्य सभा में बहुमत न रहने के कारण ही मोदी सरकार पश्चिम बंगाल में

राष्ट्रपति शासन नहीं लगा पा रही है।

पता नहीं, इस बात में कितनी सच्चाई है !

किंतु यह भी सच है कि मोदी सरकार ने अपना बहुमत न रहने के बावजूद कई महत्वपूर्ण विधेयक राज्य सभा से भी हाल के महीनों में पास करवा लिए हैं।

वैसे यह उम्मीद की जा रही है कि अगले साल तक 

राजग को राज्य सभा में भी बहुमत मिल जाएगा।

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 तबादला सजा नहीं

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बिहार में बालू का अवैध खनन नहीं रुक रहा।

रोकने की जिन पर जिम्मेदारी रही,वे अपनी ड्यूटी में विफल रहे।

नतीजतन इस काम से संबंद्ध विभागों के अनेक अफसर बदल दिए गए।

पर, क्या तबादला कोई सजा है ?

बिलकुल नहीं।

ऐेसे कत्र्तव्य च्युत अफसरों व उनके करीबियों की संपत्ति की जांच भी होनी चाहिए।

  संभव है,उस जांच में कुछ अफसर पाक -साफ साबित हो जाएं।

  किंतु कुछ अन्य तो जरूर पकड़ में आ जाएंगे।

ऐसे तो उन सभी अफसरों पर संदेह के बादल मंड़रा रहे हंै

जिन्हें बदला गया है।

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    बिहार में टै्रक्टर की 

  खरीद में असामान्य वृद्धि

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सितंबर , 2019 में बिहार में 2725 टैक्टर बिके थे।

किंतु सितंबर , 2020 में इस राज्य में 5022 ट्रैक्टर बिके।

यानी, एक साल में 84 प्र्रतिशत की वृद्धि।

टैक्टर की खरीद में यहां इतनी वृद्धि क्यों ?

उपर्युक्त अवधि में हरियाणा में 51 प्रतिशत और पंजाब में 

79 प्रतिशत ही वृद्धि हुई ?

क्या बिहार में टैक्टर की बिक्री में इतनी अधिक वृद्धि इसलिए हो रही है क्योंकि टैक्टर का इस्तेमाल बालू के अवैध व्यापार में हो रहा है ?

कौन लोग हैं जिनके नाम से टैक्टर खरीदे जा रहे हैं ?

उनके पास खेती की कितनी जमीन है ?

इन टैक्टरों का वे किस तरह का इस्तेमाल कर रहे हैं ?

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भूली -बिसरी याद

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अस्सी के दशक की बात है।

कर्पूरी ठाकुर ने लोक दल विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा दे दिया था।

 वे अपने ही दल के कुछ विधायकों के व्यवहार से दुखी रहते थे।

यह खबर छपी नहीं थी।

किंतु लोकदल खेमे में इस बात की दबे स्वर में

चर्चा हो रही थी।

पहले मैंने इस्तीफे की चिट्ठी की काॅपी हासिल कर ली।

 उन दिनों मैं दिल्ली के एक दैनिक अखबार का बिहार संवाददाता था।

मैंने वह खबर भेजी।

 वह पहले पेज पर छप गई।

कर्पूरी जी ने उस खबर का खंडन कर दिया।

उसके बाद मैंने वह इस्तीफा पत्र भी छपवा दिया।

फिर क्या था !

कर्पूरी जी चाहते तो कह सकते थे कि चिट्ठी जाली है।

किंतु उन दिनों के कुछ नेता आज जैसे नहीं थे।

कर्पूरी जी ने मुझे बुलवाया।

मैं बिहार विधान सभा स्थित उनके कमरे में पहुंचा।  

उन्होंने अन्य सारे लोगों को बाहर निकल जाने के लिए कहा।

कमरे में सिर्फ हम दोनों थे।

मैं अपनी पृष्ठभूमि बता दूं।

1972-73 में मैं समाजवादी कार्यकत्र्ता की हैसियत से उनके बुलावे पर कर्पूरी जी का निजी सचिव था।

  कर्पूरी जी को लगता था कि मैं उन्हें यह बता दूंगा कि उस चिट्ठी को किसने लीक किया।

  उन्होंने आग्रह के साथ पूछा कि आपको मेरी चिट्ठी किसने दी ?

वे बहुत ही विनयी स्वभाव के थे।

उनके व्यक्तित्व के प्रभाव मंे आकर एक क्षण तो मुझे लगा कि मैं बता दूं।

पर, तुरंत ही संभल गया।

मैंने उनसे कहा कि यदि बता दूंगा तो एक संवाददाता के रूप में मेरी साख समाप्त हो जाएगी।

  मैंने नहीं बताया।

वह भी मेरी मजबूरी समझ कर मान गए।

इस घटना की सीख यह है कि ऐसी खबर छापने से पहले उसका सबूत अपने पास रख लेना चाहिए।

वैसे सही सबूत को भी जाली करार दे देने का खतरा आज अधिक है।       

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और अंत में

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पहले से यह कहा जाता रहा है कि ‘‘चुनाव जीतने वाले अपनी सीटें गिनते हैं तो हारने वाले मतों का प्रतिशत।’’

अब हारने वाले एक और काम अगले चुनाव तक करते रहते हैं।

वे इस बात का प्रचार करते हैं कि मध्यावधि चुनाव होने ही वाला है।

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16 जुलाई 21

कानोंकान

प्रभात खबर

पटना