शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

 बाबू जी की पुण्य तिथि पर

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पंडित ओम व्यास ओम ने ठीक ही लिखा है कि 

‘पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।’

मुझे याद नहीं कि बाबू जी ने कभी हमें बचपन में एक थपड़ भी मारा हो।

दरअसल उनकी उपस्थिति मात्र से हम सब भाई अनुशासित रहते थे।

वैसी कद-काठी का शायद ही कोई व्यक्ति जवार में हो !

मेरे परमानंद मामा (जमशेद पुर में बस गए हैं) उनके बारे में कहते थे कि मेरे बहनाई शेर हैं।

  स्वाभाविक ही है कि उनके जीवनकाल में तो हमें उनके महत्व का उतना पता नहीं चल सका।

पर, न रहने पर हम सोचते रहे कि शायद हम लोग उनसे परंपरागत विवेक को लेकर कुछ अधिक सीख सकते थे।

उनकी स्कूली शिक्षा तो नहीं थी,

किंतु वे रामायाण पढ़ते थे,

कैथी लिखते थे।

जमींदारी की रसीद काटते थे।

गांव- जवार में पंचायती करने जाते थे।

हां,वे मुकदमे के सिलसिले में अक्सर पटना-छपरा 

जाते रहते थे।

कहा करते थे कि पटना हाईकोर्ट भवन के आसपास पहले धान की खेती होती थी जिसेे उन्होंने देखा था।

विधायक काॅलोनी तो बाद में बनी।

  बाबूजी का 19 जनवरी 1986 को निधन हो गया।

मेरी बेटी अमृता ने फेसबुक पर आज उन्हें पहले याद किया।

बाद में मैं।

  ओम व्यास ओम की कविता के जरिए हमें पिता के पूरे महत्व का एहसास हुआ।

आपके साथ साझा कर रहा हूं।

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पिता

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पिता  जीवन है, संबल है, शक्ति है।

पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है।

पिता अंगुली पकड़े बच्चे का सहारा है।

पिता कभी खारा तो कभी मीठा है।

पिता पालन पोषण है,परिवार का अनुशासन है।

पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।

पिता रोटी है, कपड़ा है,मकान है।

पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है।

पिता अप्रदर्शित अनंत प्यार है।

पिता है तो बच्चों को इंतजार है।

पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं।

पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं।

पिता से प्रतिपल राग है।

पिता से ही मां की बिंदी और सुहाग है।

पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ति है।

पिता गृहस्थाश्रम में उच्च स्थिति की भक्ति है।

पिता अपनी इच्छाओं का हनन परिवार की पूत्र्ति है।

पिता रक्त में दिए हुए संस्कारों की मूत्र्ति है।

पिता एक जीवन को जीवन का दान है।

पिता दुनिया दिखाने का अहसास है।

पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हाथ है।

पिता नहीं तो बचपन अनाथ है।

पिता  से बड़ा अपना नाम करो।

पिता  का अपमान नहीं, अभिमान करो।

क्योंकि मां-बाप की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता।

ईश्वर भी इनके आशीषों को काट नहीं सकता।

दुनिया में किसी भी देवता का स्थान दूजा है।

मां-बाप की सबसे बड़ी पूजा है।

वो खुशनसीब होते हैं, मां-बाप जिनके साथ होते हैं।

       --  पंडित ओम व्यास ओम

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 डिजिटल प्लेटफार्म के लिए भी फिल्म सेंसर बोर्ड जैसी व्यवस्था अब जरूरी-सुरेंद्र किशोर

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इस देश के केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड ने 

प्रमाण पत्र देने के कुछ नियम बहुत पहले से तय कर रखे हैं।

ऐसा माना जाता रहा है कि जो फिल्म उन नियमों पर खरी उतरेगी,उसे ही पास किया जाएगा।

   कई दशक पहले तक तो इसका आम तौर से पालन होता था।

नतीजनत ,तब ऐसी फिल्में बनती थीं जिन्हें लोग सपरिवार देख सकते थे।यानी साफ-सुथरी और शालीन।शिक्षाप्रद व प्रेरक भी। 

 पर आज स्थिति बदल चुकी है।

आज उन नियमों का व्यवहार में इसका कितना पालन होता है,यह जांच का विषय है।

  डिजिटल प्लेटफार्म के लिए तो अभी ऐसा कोई नियम बना ही नहीं।

नतीजतन वाणी की स्वतंत्रता के नाम पर सोशल मीडिया में भारी अराजकता है। 

सेंसर बोर्ड का एक नियम यह है कि ‘‘जातिगत,धार्मिक या अन्य समूहों के लिए अवमाननापूर्ण दृश्य नहीं प्रदर्शित किए जाएंगे।

साथ ही अवमाननापूर्ण शब्द भी उच्चारित नहीं किए जाएंगे।’’

   चूंकि वेब सिरिज ‘‘तांडव’’ किसी सेंसरशिप प्रक्रिया से नहीं गुजरा,इसलिए तांडव जन भावना को गलत ढंग से उभारने वाला साबित हुआ है।यह चिंताजनक स्थिति है।

क्रिएटिव फ्रीडम के नाम पर तांडव के आपत्तिजनक दृश्यों-शब्दों का बचाव भी हो रहा है।

तांडव पर आपत्ति करने वालों का गुस्सा इसलिए बढ़ गया है क्योंकि तांडव का बचाव करने वाले लोग इसी तरीके से किसी अन्य समुदाय की भावना पर चोट पहुंचने पर विभिन्न मंचों से जोर -जोर से चिल्लाने लगते हैं।

  हां, यहां एक बात कहनी जरूरी है।

ओवर द टाॅप प्लेटफार्म यानी ओटीटी पर नकेल कसने के लिए

जो भी बोर्ड या समिति  बने उसे उस तरह न संचाालित किया जाए जिस तरह लुंजपुज तरीके से मौजूदा फिल्म सेंसर बोर्ड को चलाया जा रहा है। 

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फिल्म सेंसर बोर्ड की 

विवादास्पद कार्य प्रणाली 

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‘तांडव’ के बहाने फिल्म सेंसर बोर्ड पर एक बार फिर  सरसरी नजर डालने की जरूरत है।

इन दिनों की अधिकतर फिल्में सेंसर बोर्ड के अपने ही नियमों की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

 मेरे सामने बोर्ड के करीब एक दर्जन नियमों की एक लिस्ट है।

 उसे जब मैं देखता हूं तो ऐसा लगता है कि बोर्ड अपना काम नहीं कर रहा है।

 या तो वहां अब भी भ्रष्टाचार है या फिर किन्हीं माफियाओं का उस पर भारी असर है।

  नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद लगा था कि बोर्ड की स्थिति में फर्क आएगा।

किंतु लगता है कि अन्य अधिक जरूरी कामों के दबाव में केंद्र सरकार को उस ओर ध्यान देने की फुर्सत नहीं है।

2014 के अगस्त में सेंसर बोर्ड के सी.इ.ओ.राकेश कुमार को घूस लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

गिरफ्तारी के बाद राकेश कुमार ने यह रहस्योद्घाटन किया था कि बड़ी -बड़ी फिल्मों को भी बोर्ड में चढ़ावा देना पड़ा था।

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    सेंसर नियमों की बानगी

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 1.-मानवीय संवेदनाओं को चोट पहुंचाने वाली अशिष्टता,अश्लीलता और दुराचारिता वाले दृश्य न दिखाए जाएं।

2.-अपराध करने के लिए प्रेरित करने वाले दृश्य न दिखाए जाएं।

अपराधियों की कार्य प्रणाली न दिखाई जाए।

3.-महिलाओं को बदनाम करने वाला कोई भी दृश्य न दिखाया जाए।

 किसी भी प्रकार से महिलाओं का तिरस्कार करने वाला दृश्य न दिखाया जाए।

4.-उत्पीड़न या लैंगिक हिंसा के दृश्य न दिखाए जाएं।

यदि जरूरी हो तो अत्यंत संक्षेप में दिखाया जाए।

5.-हिंसा को उचित ठहराने वाले दृश्य फिल्म में न हों।

सेंसर बोर्ड के इस तरह के अन्य कई नियम व कसौटियां हैं।

फिर भी क्या उनका पालन आज की फिल्मों में हो रहा है ?

पचास-साठ के दशकों में पालन जरूर होता था।

तब लोग परिवार के साथ भी फिल्में देखा करते थे।

आज की कितनी फिल्मों को परिवार के साथ देखा जा सकता है ?

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  यू.पी.में फिल्म सिटी का निर्माण शुरू

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इस बीच यह अच्छी खबर आई है कि गौतम बुद्ध नगर में 

प्रस्तावित फिल्म सिटी का निर्माण कार्य शुरू हो गया है।

इस साल वहां फिल्मों की शूटिंग भी शुरू कर देने की योजना है।

यदि योजनानुसार काम चला तो वहां एक दिन देश की सबसे

 बड़ी फिल्म सिटी बनेगी। 

  ऐसे में सेंसर बोर्ड का मुख्यालय इसी प्रस्तावित फिल्म सिटी में रखा जाना चाहिए।

इससे मुम्बई के विवादास्पद लोगों के हाथों में सेंसर बोर्ड की  

नकेल नहीं रहेगी।

फिल्मी दुनिया पर से निहितस्वार्थी तत्वों का एकाधिकार समाप्त हो जाएगा।

  वैसे सेंसर बोर्ड में ऐसे लोगों को रखा जाना जरूरी है जो नियमों के अनुसार काम करने के अभ्यस्त हों।

देश में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है।

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  गन्ना किसानों की परेशानी 

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बिहार के सीतामढ़ी जिले की रीगा चीनी मिल गत मई 

से बंद है।

मजदूर और किसान परेशान हैं।

आसपास के गन्ना किसानों से कहा गया है कि वे गोपालगंज ,सिधवलिया और मझौलिया चीनी मिलों में अपना गन्ना पहुंचाएं।

गन्ना पहुंचाने में जिन्हें घाटा हो रहा है,वे किसान गन्ना जला रहे हैं।

संयुक्त किसान संघर्ष मोरचा ने मुख्य मंत्री नीतीश कुमार से अपील की है कि वे गन्ना मूल्य और के.सी.सी.के 140 करोड़ रुपए का भुगतान करवाने का प्रबंध करें।

   और अंत में 

  ’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

आर्यभट्ट की नगरी खगौल ज्ञान -विज्ञान के लिए मशहूर रही।

 बिहार के दानापुर के पास स्थित खगौल में दो काॅलेज चलते हैं।

पर, उनमें से किसी में भी स्नातकोत्तर की पढ़ाई तक नहीं होती।रिसर्च वगैरह की बात कौन कहे !

क्या इस पर कभी किसी ने सोचा ?

यदि नहीं, तो क्या नीति निर्धारक लोग अब तो सोचेंगे !

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साप्ताहिक काॅलम ‘कानोंकान,’

प्रभात खबर ,पटना ,

22 जनवरी 21


बुधवार, 20 जनवरी 2021

         हम होंगे कामयाब एक दिन !!

         --सुरेंद्र किशोर--

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याज्ञवल्क्य ने कहा था कि 

‘‘अपराधी कोई भी हो,सजा समान होनी चाहिए।’’

काश ! आजादी के बाद अपने देश में भी ऐसा ही हुआ होता।

पर, इसके बदले हो गया --

‘‘प्रथम ग्रासे , मक्षिका पात !’’

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यह घटना तब की है जब 

सरदार पटेल जीवित थे।

एक केंद्रीय मंत्री के पुत्र से उत्तर प्रदेश में एक 

हत्या ‘हो गई !’

 केंद्रीय मंत्री, त्राहिमाम करते प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के पास गए।

नेहरू ने कोई मदद करने से साफ मना कर दिया।

पर एक अन्य ताकतवर केंद्रीय मंत्री काम आ गए।

पुत्र को जेल से रिहा करवा कर विदेश भेज दिया गया।

भले विदेश जाकर उसने बहुत अच्छा काम किया-लौटकर अपने देश के लिए भी।

   पर, उस घटना से यह तो तय हो गया कि आजाद भारत में कानून सबके लिए बराबर नहीं होगा।

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आजादी के प्रारंभिक वर्षों में ही नेहरू मंत्रिमंडल के सदस्य सी.डी.देशमुख ने प्रधान मंत्री से कहा था कि मंत्रियों में बढ़ रहे भ्रष्टाचार की खबरें मिलने लगी हैं।

आप एक ऐसी उच्चस्तरीय एजेंसी बना दें जो भ्रष्टाचार की उन शिकायतों को देखे।

इस पर नेहरू ने कहा कि ऐसा करने से मंत्रियों में पस्तहिम्मती आएगी।

उसका विपरीत असर सामान्य सरकारी कामकाज पर पड़ेगा।

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जार्ज फर्नांडिस ने आरोप लगाया था कि 1971 के लोक सभा चुनाव में बंबई में मुझे हरवाने के लिए प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने वहां के माफियाओं की मदद ली।

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सन 1962 में जे.बी.कृपलानी को वी.के. कृष्ण मेनन से हरवाने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने सिर्फ फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार की मदद ली थी।

(दिलीप कुमार की जीवनी में यह बात दर्ज है।)

पर, उनकी पुत्री और आगे बढ़ गईं।

(नब्बे के दशक में ही वोहरा कमेटी की रपट ने

यह बता दिया था कि हमारे हुक्मरानों ने देश की हालत कैसी बना रखी है !)

इंदिरा जी ने कहा था कि 

‘‘मेरे पिता संत थे।

पर,मैं तो राजनेत्री हूं।’’

उनके पिता ने कोई निजी संपत्ति खड़ी नहीं की।

पर इंदिरा जी के वसीयतनामे में (इलेस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया-19 मई, 1985)

मेहरौली के फार्म हाउस के अलावे भी बहुत सी बातें हैं।

अपवादों को छोड़कर आज के नेता तो विंस्टन चर्चिल के शब्दों में ‘‘पुआल के पुतले’’ मात्र हैं !

इस देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार के बारे में

इंदिरा जी ने कहा था कि यह तो वल्र्ड फेनोमेना है।

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अब आज के नेताओं के बारे में क्या कहना !!!

जब स्वतंत्रता सेनानियों का यह हाल था !

अपवाद पहले भी थे,अपवाद आज भी हैं।

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पर इस बीच देश की हालत क्या बन गई है ?

ऐसे -ऐसे लोग बहुत ताकतवर हो गए

हैं जो पैसे व वोट के लिए देश का सौदा कर रहे हैं।

देश के बचाने व बांटने पर अमादा लोगों के बीच

अघोषित ‘युद्ध’ चल रहा है।

पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद वह तेज होगा।

आजादी के बाद ही देश की ऐसी कमजोर अधारशीला  बना दी  गई कि लड़ाई अब कठिन हो गई है।

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यानी, याज्ञवल्क्य तो नहीं बचा सके ,अब शायद भगवान ही बचा लंे अपने देश को तो बहुत है ! 

देश को बचाने की कोशिश में लगी शक्तियां हांफ रही हैं।

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---सुरेंद्र किशोर --19 जनवरी 21 


सोमवार, 18 जनवरी 2021

      राजनीतिक त्रिदोष ग्रस्त दलों का अस्तित्व खतरे में 

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      --सुरेंद्र किशोर--

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लगता है कि राजनीतिक त्रिदोष ग्रस्त तृणमूल के सत्ता से बाहर जाने की अब बारी है।

   कफ,पित्त और वायु को आयुर्वेद में त्रिदोष कहा गया है।

दूसरी ओर राजनीति के त्रिदोष हैं-भ्रष्टाचार, परिवारवाद और 

तुष्टिकरण।

    राजनीतिक त्रिदोष से ग्रस्त कई तथाकथित सेक्युलर दल 

अब काफी दुबले हो चुके हैं।

उनमें से अधिकतर की सत्ता भी छिन गई।

इस बार वहां के विधान सभा चुनाव से ठीक पहले पश्चिम बंगाल से भी वैसे ही संकेत मिल रहे हैं।

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  पिछले कुछ महीनों में जितनी बड़ी संख्या में प्रमुख नेताओं ने  ममता बनर्जी का साथ छोड़ा है,वह एक रिकाॅर्ड है।

दरअसल पहले जनता किसी दल का साथ छोड़ती है और बाद में राजनीति के मौसमी पक्षी !

तृणमूल छोड़ने वाले नेताओं में अधिकतर मौसमी पक्षी ही हैं। 

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   त्रिदोषग्रस्त तृणमूल कांग्रेस की ‘‘पिता-पुकार’’ भी बेकार गई।

तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय ने सी.पी.एम.और कांग्रेस से अपील की  कि वे तृणमूल कांग्रेस से मिलकर पश्चिम बंगाल के अगले विधान सभा चुनाव में भाजपा का मुकाबला करें।

पर,कांग्रेस-सी.पी.एम.ने सौगत राय के इस आॅफर को ठुकरा दिया है।

लगता है कि तृणमूल का त्रिदोष एडवांस स्टेज में है।

कोई ‘वैद्य’ काम नहीं आ रहा है।

देश में अब भी सक्रिय ऐसे अन्य त्रिदोषग्रस्त राजनीतिक दल अब भी चेत जाएं।

चेत जाएंगे तो लोकतंत्र का भला होगा।

 अन्यथा, देश अघोषित रूप से एकदलीय शासन की ओर बढ़ जा सकता है

जो सही नहीं होगा।

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--15 जनवरी 21


       मुझे जानने वालों से दो बातेें

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कई बार मेरे कुछ लेखों पर व मेरे यहां किसी बड़ी हस्ती के आने पर कुछ लोग अटकलें लगाने लगते हैं।

मेरे फेसबुक वाॅल पर भी ऐसी बातें हुई हैं।

जागरूक मित्र व मेरे हितंिचंतक रामनंदन बाबू ने जो बात लिखी है,उसका जवाब देना मैंने जरूरी समझा।

यह जवाब अन्य लोगों को भी संबोधित है।

वह जवाब आप भी पढ लीजिए- 

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रामनंदन जी,

आपने तो शालीन ढंग से मेरे लिए सदिच्छा प्रकट की है।

आभारी हूं।

कई लोग तो मुझे अपमानित करने के लिए मेरे नाम के साथ -साथ राज्य सभा-विधान परिषद आदि -आदि शब्द जोड़ते रहते हैं।

  जो जैसा होता है,उसका दिमाग उसी ओर जाता है।

मैंने जीवन में अपने लिए कभी किसी से कुछ नहीं मांगा।

  एक अपवाद को छोड़कर जब मैंने 1977 में मशहूर पत्रकार जितेंद्र सिंह से कहा था कि आप दैनिक ‘आज’ के पारस बाबू से कहिए कि वे मुझे टेस्ट परीक्षा में बैठने दें।

‘आज’ के पटना ब्यूरो के लिए सीमित बहाली के लिए परीक्षा होनी थी।

मैं बैठा और सफल हुआ।

यदि यह कुछ मांगना हुआ तो आप मुझे दोषी मान सकते हैं।

बाकी राजनीति (1966 से 1977 तक )व पत्रकारिता में मुझे जो कुछ मिला है,वह लोगों ने बुला-बुला कर दिया ,मैंने मांगा नहीं।

बल्कि इस बीच समय-समय पर कई आॅफर मैंने ठुकराए भी।

जहां तक विधान परिषद व राज्य सभा का सवाल है ,उन जगहों के लिए मैं खुद को योग्य नहीं मानता।

क्योंकि उसके लिए मेरी कोई अर्हता (क्वाॅलिफिकेशन)नहीं है।

जो व्यक्ति जिस जगह के लिए योग्य नहीं है,उसे उसके बारे में सोचना भी नहीं चाहिए।

  वैसे जो काम मैं करता रहा हूं,कर रहा हूं ,उससे मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं।

किसी को मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं है।

हां, मुझसे जलने वाले या मुझसे अलग विचार रखने वाले लोग यदि मेरे मरने के बाद भी जीवित रहें तो तब मेरा आकलन वे करें,तो बेहतर होगा।

स्वाभाविक है कि जो कोई भी मतदान करता है,उसका कोई न कोई राजनीतिक विचार होगा ही।

  हां, जो यह समझते हैं कि चूंकि मैं उनकी विचारधारा को नहीं मानता तो मैं मनुष्य नहीं बल्कि राक्षस हूं तो मैं वैसे लोगों की कोई मदद नहीं कर सकता।

   वैसे लोग मुझे श्राप देते रहें,काल्पनिक बातों की चर्चा करते रहें !

मेरी शुभकामना है !

यह सब करके वे खुश रहें।

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--सुरेंद्र किशोर--17 जनवरी 21


 


केरल -तमिलनाडु से अपराध नियंत्रण का गुर सीखे बिहार-पश्चिम बंगाल-सुरेंद्र किशोर

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बिहार में अपराध पर काबू पाने के लिए जारी सरकारी कोशिश को और तेज करने की जरूरत है।

उससे भी अधिक महत्वपूर्ण काम है अदालती सजा की दर को बढ़ाना।

इस बात का पता लगाना जरूरी है कि किन कारणों से केरल में सजा की दर 85 प्रतिशत है और बिहार में सिर्फ 

16 प्रतिशत ?

हत्या के मामलों में तो बिहार में यह दर बहुत ही कम है।

 यदि तमिलनाडु में सजा का प्रतिशत 63 है तो क्यों पश्चिम बंगाल में दर मात्र 13 प्रतिशत है ?

जबकि राष्ट्रीय औसत दर 46 है।

एक ही देश के विभिन्न प्रदेशों में इतना अंतर क्यों ?

जबकि, अखिल भारतीय सेवा के पुलिस अफसर ही हर राज्य में  तैनात हैं।

ऊपर दिया गया आंकड़ा आई.पी.सी.के तहत दायर मुकदमों का है।

यानी, बिहार में जिन सौ मुकदमों में पुलिस अदालतों में आरोप पत्र दायर करती है,उनमेंसे सिर्फ 16 मामलों में ही वह अदालतों से सजा दिलवा पाती है।

  सी.बी.आई.के मामलों में सजा की दर 69 है तो एन.आई.ए.के मामलोें में करीब नब्बे है।

  इतना अंतर क्यों ?

बिहार सरकार यदि चाहे तो वह केरल और तमिलनाडु अपनी विशेषज्ञ टीमें भेज कर अधिक सजाओं के कारणों का पता लगवा सकती है।

यदि संभव हो तो उन उपायों को बिहार में भी लागू कर सकती है।

एन.आई.ए. को विशेष सुविधाएं मिलती हैं।

जरूरी भी है।

देश की रक्षा का सवाल जो है ! 

किंतु राज्य पुलिस बेहतर सुविधाओं के लिए क्यों तरसे ?

गवाहों व पीड़ितों की सुरक्षा कैसे हो  ?

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 एन.आई.ए. की सफलता  

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आतंक से संबंधित मामलों को देखने के लिए नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी का गठन किया गया है।

जिन मामलों को एन.आई.ए.अपने हाथों में लेती है,उसकी बेहतर जांच के लिए एजेंसी को शासन से विशेष सुविधाएं मिली होती है।

यहां तक कि नार्को टेस्ट तथा ब्रेन मैपिंग की सुविधा भी उस एजेंसी को अक्सर अदालत से मिल जाती है।

  दूसरी ओर, आई.पी.सी.से संबंधित मुकदमों को देख रही राज्य पुलिस को ऐसी सुविधा अत्यंत विरल मामलों में ही अदालत देती है।

  इस बीच गत माह सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को यह निदेश दिया है कि हर पुलिस स्टेशन में सी.सी.टी.वी.कैमरे लगाएं जाएं।

यानी थाने में जोर जबर्दस्ती करके जुर्म कबूलवाने की गुंजाइश अब  कम ही रहेगी।नार्को टेस्ट की सुविधा है नहीं।

 इस पृष्ठभूमि में बिहार जैसे राज्यों की सरकारें इस बात पर विचार करे कि सजा की दरें बढ़ाने के लिए वह पुलिस का सशक्तीकरण कैसे करे ?

सजा का डर होगा तभी  अपराध पर काबू पाया जा सकेगा।........................................

 सरकारी योजनाओं के नाम

घोषित किए जाएं

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बिहार में भी राज्य और केंद्र सरकारें विकास और कल्याण की सैकड़ों योजनाएं चलाती हंै।

अनेक प्रमुख योजनाओं के नाम तो लोगों की जुबान पर रहते हैं।

पर, कई योजनाएं ऐसी भी हैं जिनके नाम तक लोगों को नहीं मालूम।

इसका लाभ वे सरकारी कर्मी व दलाल उठाते हैं जिनका धंधा ही है जाली बिलों के जरिए सरकारी पैसे उठा लेने का।

  यदि समाचार पत्रों में सरकारें अपनी योजनाओं के नाम प्रकाशित करती रहे तो जागरूक लोग संबंधित अफसरों व दफ्तरों से पूछ सकेंगे कि इसका लाभ किन्हें मिल रहा है।

  यदि अखबारों में छपवाना संभव नहीं हो तो जिला और अंचल स्तर पर कार्यालयों के नोटिस बोर्ड पर उन सारी योजनाओं के नाम लिख कर टांगे जा सकते हैं।

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छोटी नदियों पर बने चेक डैम

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यदि बिहार की छोटी-छोटी नदियों पर चेक डैम बन जाएं तो कैसा रहेगा ?

जानकार बताते हैं कि उससे सिंचाई होगी।

भूजल स्तर का क्षरण रुकेगा।

जल शोधन करके पेय जल का इंतजाम भी हो सकता है। 

किंतु पता चला है कि सिंचाई विभाग के कुछ इंजीनियर व अफसर छोटी नदियों पर चेक डैम के पक्ष में नहीं हैं।

इसलिए अब यह राज्य सरकार पर है कि छोटी नदियों पर चेक डैम के गुण-दोष की एक बार समीक्षा करे।

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   अपराध-भ्रष्टाचार के समर्थक कौन ?

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जो लोग सांसद-विधायक फंड की समाप्ति के समर्थक नहीं हैं,वे भ्रष्टाचार के जारी रखने दोषी हैं।

क्योंकि अपवादों को छोड़कर इस फंड ने प्रशासन व राजनीति मंे कमीशनखोरी को संस्थागत रूप दे दिया है। 

जो आपराधिक और माफिया पृष्ठभूमि के लोगों को चुनावी टिकट देने के पक्ष में हैं,वे नहीं चाहते कि अपराध रुके।

जो लोग चुनावी टिकट की बिक्री और नीलामी के विरोध में नहीं हैं वे ही प्रजातंत्र के खात्मे व तानाशाही की स्थापना के दोषी माने जाएंगे,यदि तानाशाही कभी आई तो। 

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  ममता बनर्जी के लिए अपशकुन

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तृणमूल कांग्रेस ने सी.पी.एम.और कांग्रेस से अपील की है कि वे तृणमूल कांग्रेस से मिलकर पश्चिम बंगाल के अगले विधान सभा चुनाव में भाजपा का मुकाबला करें।

कांग्रेस-सी.पी.एम.ने तृणमूल सांसद सौगत राय के इस आॅफर को ठुकरा दिया है।

एक और सूचना !

पिछले कुछ महीनों में तृणमूल कांग्रेस से जितने अधिक नेता व कार्यकत्र्ता अलग हुए हैं,उतने आज तक किसी सत्ताधारी दल से अलग नहीं हुए थे।

  इतना ही नहीं,कांग्रेस की अपेक्षा सी.पी.एम. से निकल कर अधिक कायकत्र्ता भाजपा में शामिल हुए हैं।

  अब आप पश्चिम बंगाल विधान सभा के अगले रिजल्ट का अनुमान लगा लीजिए।

याद रहे कि पश्चिम बंगाल बिहार के बगल का प्रदेश है।आम लोगों का आपसी संबंध रहा है।

इसलिए उसका रिजल्ट बिहार को भी देर सवेर प्रभावित करेगा। 

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 और अंत में 

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कुछ लोग महान पैदा होते हैं।

कुछ अन्य लोग अपनी मेहनत,ईमानदारी और प्रतिभा से महान बनते हैं।

पर, कुछ अन्य लोगों पर महानता थोप दी जाती है।

  पर,ऐसा देखा गया है कि स्थायित्व उनमें ही अधिक है जिन्होंने अपनी मेहनत-ईमानदारी-प्रतिभा से सफलता हासिल की है। 

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‘कानांेकान’

प्रभात खबर

पटना

15 जनवरी 21


 


बिहार में आशंकित दल बदल

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जो चुनावी टिकट खरीदेगा,वह वहीं 

 रहेगा जहां अधिक मुनाफा हो !

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    --सुरेंद्र किशोर--

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नब्बे के दशक में केंद्रीय कृषि मंत्रालय से जुड़े संस्थान के   निदेशक पद पर तैनाती के लिए उम्मीदवार को दस लाख रुपए की रिश्वत देनी पड़ती थी।

(अब क्या स्थिति है,इसका पता नरेंद्र मोदी को लगाना चाहिए।)

  यह रहस्योद्घाटन तब के केंद्रीय कृषि मंत्री चतुरानन मिश्र ने अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक ‘मंत्रित्व के अनुभव’ में किया है। 

मिश्र जी 1996 से 1998 तक केंद्र में मंत्री थे।

तब संयुक्त मोर्चा की सरकार थी।

बारी -बारी से एच.डी.देवगौड़ा और आई.के.गुजराल प्रधान मंत्री थे।

 देश में पहली बार कम्युनिस्ट नेता केंद्र सरकार में शामिल हुए थे।

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केंद्र व राज्य सरकारों में रिश्वखोरी की तो 

इससे अधिक बड़ी कहानियां हैं।

पर जिसका सबूत मेरे पास है,चर्चा मैं उसी की 

कर सकता हूं।

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गत बिहार विधान सभा चुनाव से पूर्व व बाद में यह आम चर्चा रही कि चुनावी टिकट का भाव इस बार 12 लाख रुपए से एक करोड़ रुपए तक रहा।

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एक पूर्व राज्य मंत्री ने मुझसे कहा था कि एक -दो लाख चंदे में काम चल जाता तो मैं दे देता,पर मांग एक करोड़ रुपए की थी तो मैं क्या करता ?

मैं चुनाव नहीं लड़ सका।

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अब बताइए कि जिस  व्यक्ति ने एक करोड़ रुपए सिर्फ टिकट पर खर्च किए हंै,उसने चुनाव पर कितना किया होगा ?

यानी, वह जन सेवक नहीं बल्कि व्यापारी है।

अब उस नेता के वेश में व्यापारी से यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि वह विधायक बन कर सौ करोड़ रुपए कमाने लायक जगह नहीं चुनेगा।

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जिस तरह कृषि निदेशक से केंद्र सरकार उम्मीद नहीं कर रही थी

कि 10 लाख खर्च कर दो करोड़ रुपए नहीं कमाएगा।

यूं ही नहीं सन 1985 तक सौ पैसे घिसकर 15 पैसे हो जाते थे !

अब क्या स्थिति है ?

बेहतर जरूर है,किंतु छेद अब भी बहुत हैं।

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केंद्र व राज्य सरकारों को इस बात का खुफिया तौर पर पता लगाना चाहिए कि 30 प्रतिशत से कम कमीशन वाला कौन सा सरकारी काम इन दिनों इस देश में चल रहा है ?

सरकार के किन -किन अंचल कार्यालयों से ‘कट मनी’ जन प्रतिनिधियों को नहीं मिल रहे हैं ?

पिछले चुनाव में एक निवत्र्तमान विधायक को जब जदयू से  टिकट मिला तो वहां के मेरे एक परिचित ने फोन पर कहा कि ये जिले के एक मात्र विधायक हैं जो अंचल कार्यालय से ‘कट मनी’ नहीं लेते।अच्छा हुआ कि इन्हें टिकट मिला।

पर, दुर्भाग्यवश वे चुनाव हार गए।   

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--सुरेंद्र किशोर--12 जनवरी 21