20 लाख किताबों वाली निजी लाइ्रब्रेरी के मालिक
को इस साल का पद्म श्री सम्मान
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बेंगलुरु से प्रभाकर मणि तिवारी की एक बहुत ही अच्छी,प्रेरणादायक खबर
दैनिक भास्कर में छपी है।
खबर के शीर्षक और उप शीर्षक से ही पूरी कहानी आप जान जाएंगे।
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उपलब्धि - कर्नाटका के एन.के.गौड़ा को अनूठे काम के लिए
(सन 2026 का ) पद्म श्री सम्मान दिया जाएगा
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80 प्रतिशत वेतन किताबों पर खर्च कर बनाई देश की सबसे बड़ी
निजी लाइब्रेरी
घर में 20 लाख किताबें , फर्श पर सोते हैं।
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लाइब्रेरी में कुछ किताबें दो से तीन सौ साल पुरानी
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यहां पुराण,उपनिषदों और कुरान,दो से तीन सौ साल पुरानी इतिहास की किताबों के
अलावा रामायण और महाभारत के तीन -तीन हजार संस्करण हंै---आदि आदि
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मेरे पास भी पटना में एक संपन्न निजी लाइब्रेरी है।
पर एन.के गौड़ा के मुकाबले यह कुछ भी नहीं।
उनके पास तो बहुमूल्य हीरा है।
पर, मैं अपने अनुभवों के आधार पर यह कल्पना कर सकता हूं कि किसी संपन्न लाइब्रेरी
का रख-रखाब कितना
कठिन श्रम,एकाग्रता और साधन खोजता है।
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मेरे निजी पुस्तकालय सह संदर्भालय में अब करीब तीन दर्जन आलमारियां हैं।पर,मेरी लाइब्रेरी अनमोल
पुस्तक आधारित नहीं बल्कि साठ-सत्तर-अस्सी के दशकों के अब अप्राप्य पत्रिकाएं आधारित हैं।मेरे पास कुछ सौ अच्छी
किताबों के अलावा ऐसे सैकड़ों विषयवार लिफाफे हैं जिनमें संबंधित विषयों की अखबारी कतरनें भरी पड़ी हैं।जिस विषय की
कल्पना कीजिएगा ,उम्मीद है,उस विषय से संबंधित कटिंग यहां मिल जाएंगी।ऐसी कटिंग्स तैयार करने
के लिए मैं दिल्ली और पटना के एक दर्जन अखबार खरीदता हूं।
यह सब अखबारी लेखन और अब पुस्तक लेखन में सहायक होते हैं।
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अपवादों को छोड़ दें तो मोदी सरकार इन दिनों एन.के.गौड़ा जैसे अनूठे काम करने
वालों को ही पद्म सम्मान से
सम्मानित करती है।हां, अपवाद स्वरूप कुछ नेता भी राजनीतिक कारणों से पद्म सम्मान
पा रहे हैं।
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यदि एन.के.गौड़ा साहब ओड़िशा के मूल निवासी होते तो उन्हें वहां की सरकार हर माह
30 हजार रुपए मानदेय देती जिससे उन्हें
अपने अनोखे लाइब्रेरी के रख-रखाव में सुविधा होती।वह सरकार तथा देश के तीन अन्य
राज्य सरकारें अपने
यहां के पद्म अवार्डियों को मासिक मानदेश देती है।
पर, याद रहे कि पदम् अवार्डीज को न तो भारत सरकार कोई मानदेय देती है और न ही चार राज्य सरकारों
को छोड़ कर इस देश की कोई अन्य राज्य सरकार।
इसे विरोधाभास ही कहेंगे।मेरा मानना है कि या तो कोई सरकार मानदेय
न दे या सारे राज्य सरकार दें।या, खुद केंद्र सरकार देना शुरू करे।
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करीब दो दशक पहले प्रभाष जोशी और डा.नामवर सिंह मेरे पटना स्थित आवास पर आये थे।
मेरी लाइब्रेरी में तब सिर्फ 15 आलमारियां थीं।उनमें रखी सामग्री को देखकर प्रभाष जोशी ने कहा था
कि ‘‘मेेरी जानकारी के अनुसार देश के किसी अन्य पत्रकार के पास इतनी संपन्न निजी लाइबे्ररी नहीं है।’’
डा.नामवर सिंह ने दिनमान (1965 से आखिरी अंक तक-बीच के कुछ अंक गायब हैं।)को देखकर कहा था-
‘‘सुरेंद्र जी,आपने तो हीरा संजो कर रखा है।’’
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अब तो आलमारियों की संख्या तीस हो चुकी है।बढ़ती ही जा रही हैं।
मेरे सामने समस्या है--मेरी निजी पक्की आय सिर्फ 1261 रुपए मासिक है--पीएफ.पेंशन।
बाकी अखबारों में लिखकर कमाता हूं।
गांव में खेती कराने जा रहा हूं।वहां से कुछ आय हो सकती है।
मेरी लाइब्रेरी को अपडेट करते जाने में समय,साधन और एकाग्रता की जरूरत रहती है।
मेरी उम्र भी बढ़ रही है।सहायक की जरूरत महसूस होती है।अपने लेखन के काम को भी
जारी रखना है।वैसे मेरे बाद मेरे परिवार में एकाधिक सदस्य हंै जो इस लाइब्रेरी को ंसंभाल सकते हैं।
उनकी रूचि भी है और उनका पेशा भी इसके अनुकूल है।प्रतिभा भी है।
मेरी पहली पुस्तक की सफलता के बाद दूसरी किताब की तैयारी में लग गया हूं।
देखे आगे- आगे क्या होता है !
अल्ला जाने क्या होगा आगे ??
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अंत में एन.के. गौड़ा साहब को सलाम !
प्रभाकर मणि तिवारी और दैनिक भास्कर को धन्यवाद जिन्होंने ऐसी बहुमूल्य जानकारी दी।
पद्म श्री चयन समिति को भी धन्यवाद जिसने गौड़ा के रूप में एक और मोती
चुन लिया है।
पर यदि गौड़ा इच्छा प्रकट करें तो उनके लिए कुछ आर्थिक साधन का भी प्रबंध करंे केंद्र व राज्य सरकारें।
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1 फरवरी 26
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