Friday, April 28, 2017

नरेंद्र मोदी के किए से अधिक का भरोसा दे पाएगा प्रतिपक्ष !

लोकतंत्र के लिए यह अच्छी बात है कि भाजपा विरोधी दल गोलबंद होने की कोशिश कर रहे हैं। पर क्या सिर्फ गोलबंदी ही काफी होगी? या फिर गोलबंदी मुद्दा आधारित भी होगी ? सिर्फ गोलबंदी का नतीजा यह देश देख चुका है।

सिर्फ गोलबंदी से मधु कोड़ा (झारखंड) और मनमोहन सिंह (केंद्र) जैसी सरकारें बनती हैं।

भाजपा वैसी राजनीति को पराजित कर चुकी है। गोलबंदी की कोशिश में लगे राजनीतिक दलों के नेताओं को अपनी पिछली हार के असली कारणों को पहले समझना होगा। उनसे शिक्षा लेनी होगी। इसके साथ ही जो काम नरेंद्र मोदी की सरकार भी नहीं कर पा रही है, उसे करने का पक्का भरोसा जनता को देना होगा ?

हालांकि अधिकतर भाजपा विरोधी नेताओं की साख इतनी खराब हो चुकी है कि सवाल उठेगा कि कितने लोग उन पर भरोसा करेंगे ? खैर जो हो, कोशिश करने में क्या दिक्कत है ?

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री सचिवालय और अपने मंत्रिमंडल तक भ्रष्टाचार को अब तक फटकने नहीं दिया है।
पर सरकारी आॅफिसों में फिर भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। जनता उससे तंग -ओ- तबाह है। क्या उस स्तर से भी प्रतिपक्ष भ्रष्टाचार को दूर करने का वायदा करेगा? केंद्र और कुछ भाजपा शासित राज्य सरकारें गोरक्षक गिरोहों की गुंडागर्दी खत्म नहीं कर पा रही हंै।

प्रतिपक्ष से यह उम्मीद की ही जा सकती है कि वह उसे खत्म कर देगा। पर सवाल है कि गो हत्या के समर्थकों पर भी समान रूप से कार्रवाई करने का प्रतिपक्ष वादा करेगा? क्या प्रतिपक्ष अपनी पिछली गलतियों के लिए माफी मांगते हुए जनता से यह वादा करेगा कि वह अगली बार भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देगा? क्या प्रतिपक्ष ढांेगी, असंतुलित और एकतरफा ‘धर्म निरपेक्षता’ की नीति पर अब नहीं चलने का भरोसा देगा ?

यदि प्रतिपक्ष सिर्फ सामाजिक समीकरण, दलीय गठबंधन और सांप्रदायिक वोट बैंक के बल पर
सरकार बनाएगा तो वह मनमोहन सरकार की सिर्फ कार्बन काॅपी होगी। वैसा शायद अब नहीं चलेगा। क्योंकि अनेक लोगों को एक अलग ढंग की मोदी सरकार देखने की आदत हो बन  है।


कुंवर सिंह को जरूरत नहीं ‘भारत रत्न’ की

 
 ‘भारत में अंग्रेजी राज’ नामक अपनी चर्चित पुस्तक में पंडित सुंदर लाल ने लिखा है कि ‘कंुवर सिह का व्यक्तिगत चरित्र अत्यंत पवित्र था। उसका जीवन परहेजकारी का था।उसके राज में कोई मनुष्य इस डर से कि कहीं कुंवर सिंह देख न ले ,खुले तौर पर तम्बाकू तक न पीता था।उसकी सारी प्रजा उसका बड़ा आदर करती थी और उससे प्रेम करती थी। युद्ध कौशल में वह अपने समय में अद्वितीय था।’

सुंदर लाल ने यह भी विस्तार से लिखा है कि ‘कंुवर सिंह ने किस तरह बारी -बारी से छह युद्धों में अंग्रेजों को हराया था। अंग्रेजों को छह-छह युद्धों में हराने वाले किसी अन्य योद्धा के बारे में मैंने कहीं नहीं पढ़ा है। वीर कुंवर सिंह से हारने के बाद एक अंग्रेज अफसर ने युद्ध में अपनी दुर्दशा का मार्मिक विवरण लिखा था। उसने लिखा  कि ‘जो कुछ हुआ, उसे लिखते हुए मुझे अत्यंत लज्जा आती है। लड़ाई का मैदान छोड़कर हमने जंगल में भागना शुरू कर दिया। शत्रु हमें बराबर पीछे से पीटता रहा। हमारे सिपाही प्यास से मर रहे थे। एक निकृष्ट गंदे छोटे से पोखर को देखकर वे उसकी तरफ लपके। इतने में कुंवर सिंह के सवारों ने हमें पीछे से आ दबोचा। इसके बाद हमारी जिल्लत की कोई हद न रही।

हमारी विपत्ति चरम सीमा को पहुंच गयी। हम में से किसी को शर्म तक न रही। जहां जिसकी कुशल दिखाई दी, वह उसी ओर भागा। चारों ओर आहांे, श्रापों और रोने के सिवा कुछ सुनाई न देता था। मार्ग में अंग्रेजों के गिरोह के गिरोह मारे गए। हमारे अस्पताल पर कुंवर सिंह ने पहले ही कब्जा कर लिया था।इसलिए किसी को दवा मिल सकना भी असंभव था। कुछ वहीं गिर कर मर गये, बाकी को शत्रु ने काट डाला। हमारे कहार डोलियां रख-रख कर भाग गए। सोलह हाथियों पर केवल हमारे घायल साथी लदे हुए थे।

स्वयं जनरल लीग्रैंड की छाती में एक गोली लगी और वह मर गया। हमारे सिपाही अपनी जान लेकर पांच मील से ऊपर दौड़ चुके थे। उनमें बंदूक उठाने तक की शक्ति नहीं बची थी। सिखों ने हमसे हाथी छीन लिये और वे हमसे आगे भाग गये। (अंग्रेजी फौज में सिख सैनिक भी थे।)

गोरों का किसी ने साथ नहीं दिया। 199 गोरों में से 80 ही इस संहार में जिंदा बच सके। हमारा इस जंगल में जाना ऐसा ही हुआ जैसा पशुओं का कसाईखाने में जाना। हम वहां केवल बध के लिए गए थे।’

भले वीर कुंवर सिंह की बहादुरी के ऐसे किस्से आजादी के बाद जन -जन तक नहीं पहुंचाए गए, पर एक बड़े इलाकों में ऐसी गाथाएं पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं।

वीर कुंवर सिंह को याद करने वालों की इस मांग का मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने समर्थन किया कि उन्हें ‘भारत रत्न’ मिलना चाहिए। पर क्या ऐसा वीर ‘भारत रत्न’ का मोहताज है ? इस देश में भारत रत्न तथा पद्म पुरस्कारों का अवमूल्यन तथा राजनीतिकरण हो चुका है।

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन देश की आजादी का सबसे बड़ा आंदोलन था। उस आंदोलन का विरोध करने वाले को भी ‘भारत रत्न’ मिल चुका है !

 
एक संपादक की पठनीय पुस्तक 

नामी संपादक एस.के. राव की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘अ जर्नलिस्ट रिफ्लेक्ट्स’ पढ़ने का अवसर मिला। पत्रकारिता और राजनीति के इतिहास के विद्यार्थियों के लिए यह उपयोगी किताब लगी। राव ने अपने समकालीन नेताओं और संपादकों के बारे में लिखा है। पटना में दैनिक सर्चलाइट के संपादक रह चुके राव साहब ने लखनऊ, कराची और मद्रास में भी पत्रकार के रूप में काम किया था।

राव साहब पत्रकारों के संगठन एन.यू.जे. के संस्थापक महासचिव भी थे। अब वह इस दुनिया में नहीं हैं। पटना के राजनीतिक और पत्रकारिता जगत के पुराने लोग राव साहब को याद करते हैं।

मुख्यमंत्री डाॅ. श्रीकृष्ण सिन्हा के कार्यकाल में सर्चलाइट के एक चर्चित संपादक हुआ करते थे -‘एम. एस. एम. सरमा’। राव साहब ने उनके बारे में लिखा है कि ‘शालीन पत्रकारिता के जमाने में भी सरमा जी स्टंट में विश्वास करते थे।’ वैसे मैंने अलग से सरमा जी के बारे में बुजुर्गों से सुन रखा था। सरमा जी तत्कालीन मुख्यमंत्री के बारे में अक्सर आपत्तिजनक बातें लिखा करते थे।

श्रीबाबू के समर्थकों ने एक बार उनसे कहा कि इस संपादक के खिलाफ आपको सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। इसपर मुख्यमंत्री ने कहा कि मैंने तो सर्वाधिक सख्त कार्रवाई कर दी है। मैंने तो उनका अखबार पढ़ना ही छोड़ दिया है।


हार के अपने-अपने बहाने 
आधुनिक राजनीति की एक पुरानी कहावत है। चुनाव जीतने वाला सीटें गिनता है और हारने वाला अपना वोट परसेंटेज। हारने वाले नेताओं की एक और प्रजाति भी है। सन 1971 की हार के बाद जनसंघ नेता बलराज मधोक ने कहा था कि इंदिरा गांधी ने सोवियत संघ से एक खास तरह की अदृश्य स्याही मंगाकर उसे मत पत्रों पर अपने पक्ष में पहले ही लगवा दिया था। कुछ घंटों बाद अदृश्य स्याही उग जाती थी।
मुहरों पर जो दृश्य स्याही गैर कांग्रेसी दलों के उम्मीदवारों के नाम के आगे लगायी जाती थी, वह कुछ घंटांे के बाद स्वतः गायब हो जाती थी। अरविंद केजरीवाल अपनी हार का बहाना  इ.वी.एम. मशीनों में ढूंढ़ लिया है।

और अंत में

राजनीति पहले सेवा थी। आजादी की लड़ाई के दौरान और आजादी के कुछ साल बाद तक भी अधिकतर नेता सेवाभाव से ओतप्रोत थे। पर सन 1976 में जब सासंदों के लिए पेंशन की व्यवस्था हुई तो राजनीति नौकरी हो गयी।

सन 1993 में जब सांसद क्षेत्र विकास फंड का प्रावधान किया गया तो राजनीति व्यापार बन  गयी। जब इस देश में महाघोटालों का दौर चला तो वह उद्योग हो गयी।

अब जब पैसे लेकर चुनावी टिकट बांटे जाने लगे तो राजनीति ने खुदरा व्यापार के क्षेत्र में भी अपने पांव जमा दिये। हालांकि सेवा वाले जमाने में भी कुछ नेता अपवाद थे और आज ‘मेवा’ वाले दौर में भी अपवाद हैं।
पर अपवादों से तो किसी देश का काम नहीं चलता !

( 28 अप्रैल 2017 के प्रभात खबर के बिहार संस्करण में इस कालम का संशोधित अंश प्रकाशित)

Friday, April 7, 2017

सक्रिय सरकारी सहयोग के बिना पटना का नियोजित विकास असंभव

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शहरों के अनियोजित विकास पर नाराजगी जाहिर की है। पटना सहित राज्य के अनेक शहरों का अनियोजित विकास दरअसल नाराजगी के साथ -साथ चिंता का कारण भी बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में इसके कई नुकसान सामने आएंगे।

शहरों को विकसित करने का काम सिर्फ निजी हाथों में छोडा़ नहीं जा सकता है। बड़े बिल्डर्स व डेवलपर्स तो अभी यहां आने से रहे। मझोले और छोटे बिल्डर्स की अपनी सीमाएं हैं। उनमें से कुछ में कमजोरियां भी हैं। शिकायतें भी आती रहती हैं।

ऐसे व्यापारियों से आम लोगों को राहत दिलाने की जिम्मेदारी सरकार पर है। पर बिहार सरकार ने दशकों से अपनी यह जिम्मेदारी छोड़ रखी है। राजेंद्र नगर और लोहिया नगर जैसे कई नियोजित मुहल्ले राज्य सरकार की एजेंसी ने ही बसाए थे। कुछ मकान बनाये गये तो कुछ भूखंड विकसित कर लोगों के बीच बांटे गए।

पर राज्य सरकार अपनी ही गलती से दीघा में जाकर फंस गयी। आवास बोर्ड ने व्यवस्थित ढंग से लोगों को बसाने के लिए सत्तर के दशक में पटना के दीघा में 1024 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। पर उच्च स्तरीय दबाव में आकर शासन ने उस में से एक पूर्व मुख्य सचिव की 4 एकड़ जमीन को अधिग्रहण से मुक्त कर दिया। इस पर दीघा के जमीन  मालिकों और अन्य लोगों ने मिलकर उस सरकारी योजना को लगभग विफल कर दिया। यानी करीब आधी जमीन पर अवैध कब्जा हो गया।

स्थानीय पुलिस की मदद से आज भी यह गलत काम हो रहा है।

अब जबकि पटना वास्तव में महानगर बनने की प्रक्रिया में है तो राज्य सरकार को चाहिए कि वह खुद भी जहां-तहां जमीन का अधिग्रहण  करे। उसे विकसित करे फिर भू खंडों को जरूररतमंद लोगों में वितरित करे।
कुछ अन्य राज्यों में ऐसा अब भी होता है।

निजी बिल्डर्स और डेवलपर्स तो आम तौर से अधिक से अधिक पांच-दस-बीस एकड़ जमीन का इंतजाम कर सकते हैं। पर सरकार चाहे तो मुख्य पटना के आसपास के इलाकों में सौ-पचास एकड़ जमीन के टुकड़ों का अधिग्रहण कर सकती है। इसके बिना पटना का सुव्यवस्थित विकास नहीं हो पाएगा। पर साथ ही ऐसे मामलों में सरकार को दीघा जैसी लापरवाही नहीं बरतनी होगी।

किसी भी जमीन के अधिग्रहण के व्यय के साथ-साथ उस जमीन पर चहारदीवारी बनाने का खर्च का भी पहले से ही इंतजाम कर लेना होगा।

 इस बीच यदि राज्य सरकार अपने प्रस्तावित रिंग रोड पर काम भी शुरू कर दे तो शहर को व्यवस्थित ढंग से बसाने में सुविधा होगी।

याद रहे कि नये मास्टर प्लान के तहत दीघा-शाहपुर -सरारी-भुसौला-नेवा-सरैया-फतेह पुर-सोनवां रिंग रोड का प्रस्ताव है।

इस प्रस्तावित रोड के आसपास भी बड़े पैमाने पर जमीन अधिग्रहण की गुंजाइश बनेगी। अन्य स्थानों में भी सरकार जमीन की तलाश कर सकती है।


अदालती फैसले को विफल करने की कोशिश

सुप्रीम कोर्ट ने इसी 31 मार्च को यह आदेश दिया कि नेशनल और स्टेट हाईवे पर 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानें नहीं होंगी। याद रहे कि खुद केंद्र सरकार दशकों से इस बात पर चिंता जाहिर करती रही है कि हाईवे पर शराब पीकर गाड़ियां चलाने से दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। और मौतों की संख्या भी।

पर जब सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया तो देश की 11 राज्य सरकारें इस आदेश को विफल करने पर अड़ गयीं। राज्य सरकारों ने नेशनल हाईवे को स्टेट हाईवे और स्टेट हाईवे को जिला सड़क बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है ताकि वे सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से बच सकें।

संभव है कि केंद्र सरकार भी राज्यों के दबाव में आ जाए। पर सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले से पीछे हटेगा? या फिर कायम रहेगा? इस तरह के कई दूसरे मामलों में सुप्रीम कोर्ट अपने फैसलों पर कायम रहा है।

राज्य सरकारें शराब की बिक्री बंद होने से राजस्व घटने को लेकर चिंतित हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिंदगी शराब से अधिक कीमती है। सवाल है कि सरकारों की आबकारी कर पर इतनी अधिक निर्भरता क्यों है?  इस देश में आयकर, बिक्री कर, सेवाकर तथा इस तरह के दूसरे टैक्सों की वसूली की हालत लचर है।

बिहार में भी जितने व्यापारी बिक्री कर देते हैं, उनकी अपेक्षा कई गुणा अधिक व्यापारी टैक्स की खुलेआम चोरी करते हैं। यही हाल आयकर, सर्विस टैक्स तथा दूसरे करों की है।

केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे टैक्स के दायरे से बाहर वाले कर चोरों पर कार्रवाई करें और आमदनी बढ़ाएं न कि सुप्रीम कोर्ट के एक अच्छे फैसले को विफल करने की कोशिश करें।  

कसूर किसका और सजा किसे ? 

इस वैज्ञानिक युग में कन्या का जन्म देने के कारण कोई पत्नी को तलाक दे देता है तो कोई उसकी हत्या तक कर देता है। यह काम एक वैज्ञानिक सत्य को दरकिनार करके हो रहा है। डॉक्टर बताते हैं कि शिशु कन्या के लिए पत्नी नहीं बल्कि पति जिम्मेदार होता है। इस बात का वैज्ञानिक आधार है।

इस तथ्य का प्रचार सरकारी और गैर सरकार संचार माध्यमों के जरिए सरकारों को करना चाहिए। कम से कम इस तथ्य से अनजान लोग तो अपनी पत्नियों को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराएंगे !

लालू सही हकदार

राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद 11 जून को दीघा-पहलेजा सड़क पुल का समारंभ करेंगे। इस काम के लिए लालू प्रसाद सही हकदार भी हैं। इस पुल को मौजूदा स्थल पर ही बनवाने में लालू प्रसाद की महत्वपूर्ण भूमिका थी। हालांकि प्रो. रामानुज प्रसाद के नेतृत्व में हुए आंदोलन का भी योगदान है।

उस समय आंदोलनकारियों पर पुलिस फायरिंग में अभिषेक नामक छात्र मारा गया था। यह घटना जुलाई 1996 की है। तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा ने सोनपुर में 22 दिसंबर 1996 को इस पुल के निर्माण के लिए सर्वेक्षण कार्य का शिलान्यास किया।

हालांकि इस पुल के निर्माण का वास्तविक कार्यारम्भ तीन फरवरी 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया।

पर प्रारंभिक दिनों में तत्कालीन रेलमंत्री रामविलास पासवान गांधी सेतु से पूरब इस रेल पुल को बनवाना चाहते थे ताकि वैशाली जिला को इसका अधिक लाभ मिले।

पर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की जिद से मौजूदा स्थल पर उसका निर्माण हुआ। इसलिए यदि वह सड़क पुल का समारंभ करेंगे तो यह उनका स्वाभाविक हक बनता है।

अन्य दल लें नसीहत 

भाजपा ने महिला विधायक से अभद्र व्यवहार करने के आरोप में अपने विधान पार्षद लालबाबू प्रसाद को पार्टी के निलंबित कर दिया। हाल ही में  जब जदयू के पूर्व विधायक सूर्यदेव सिंह पर हत्या का आरोप लगा तो पार्टी ने उन्हें दल से बर्खास्त कर दिया है।

इससे पहले भी इस तरह के मामलों में राजनीतिक दलों में मतभेद रहा है। कुछ दल कहते हैं कि हम तभी कार्रवाई करेंगे जब हमारे किसी सदस्य को सुप्रीम कोर्ट से सजा हो जाए।

 काश ! अन्य दल भी भाजपा-जदयू की तरह अपने-अपने दलों के ऐसे ही नेताओं के खिलाफ ऐसी ही कार्रवाई करते।

और अंत में

दशकों के लगन, तपस्या और त्याग का जीवन अपनाने के बाद ही किसी नेता की छवि बनती है। पर उसे बिगड़ने में अधिक समय नहीं लगता।

दूसरी ओर बिगड़ी हुई छवि वाले नेता चाहते हुए भी अपनी छवि नहीं सुधार पाते। आधुनिक राजनीति में लुटेरा रत्नाकर से ऋषि वाल्मीकि बनते शायद ही किसी ने कहीं देखा हो।

अच्छी छवि वाले कुछ नेताओं को भी अधेड़पन में बिगड़ते हुए जरूर देखा जाता है। इसलिए लोगबाग यही उम्मीद रखते हैं कि जिन नेताओं के लिए उनके दिल में सम्मान है, वैसे नेता किसी भी कीमत पर अपनी अच्छी छवि को बनाये रखें।

( 7 अप्रैल 2017 के प्रभात खबर, बिहार में प्रकाशित)

Thursday, April 6, 2017

महागठबंधन की राह के कांटें

बिहार जैसा महागठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बनाने की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सलाह मौजूं है। उत्तर प्रदेश की चुनावी हार के बाद प्रतिपक्ष इन दिनों पस्तहिम्मत है। इस पृष्ठभूमि में यदि महागठबंधन बनाने का गंभीर प्रयास भी शुरू हो जाए तो उससे गैर राजग दलों में एक नयी ऊर्जा का संचार हो सकता है।

वैसे भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह ठीक नहीं है कि छितराये प्रतिपक्षी दल अधिक दिनों तक पस्तहिम्मत बने रहें। प्रतिपक्ष की पस्तहिम्मती के माहौल में सत्ताधारी जमात द्वारा मनमानी किए जाने का खतरा बढ़ जाता है।

  नीतीश कुमार की यह सलाह भी सही है कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट महागठबंधन बनाने की दिशा में पहल करें। इससे पहले मणि श्ांकर अय्यर तथा कुछ अन्य नेताओं ने भी ऐसी ही सलाह दी है।

पर नीतीश कुमार की सलाह का महत्व अधिक इसलिए भी है क्योंकि उनके नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार कुछ कठिनाइयों और शिकायतों के बावजूद आराम से चल रही है। इस चर्चा के बीच कि नीतीश राजग में ंजा सकते हैं, बिहार के मुख्यमंत्री की ताजा सलाह प्रतिपक्ष का हौसला बढ़ाने वाली है।

पर अब सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय स्तर पर बिहार जैसा कोई महागठबंधन बनाना आज की स्थिति में संभव भी है ? अभी तो असंभव जरूर लगता है। पर यदि इसके लिए गंभीर और ईमानदार प्रयास अभी से शुरू हो जाएं तो आने वाले दिनों में शायद एक हद तक यह कल्पना साकार रूप ग्रहण कर ले।

यह नरेंद्र मोदी की सरकार अपने लोकलुभावन कामों के जरिए अपनी लोकप्रियता बढ़ाती जा रही है। उसे देशव्यापी दलीय गठजोड़ के जरिए पराजित करने के विचार को एक ठोस राजनीतिक पहल की संज्ञा दी जा सकती है। पर सवाल यह भी है कि क्या मोदी सरकार अगले दो साल में नोटबंदी और बेनामी संपत्ति पर हमला जैसे अपने अन्य चौंकाने वाले कामों से आगे निकल जाती है या प्रतिपक्ष महागठबंधन बना कर 2019 के लोकसभा चुनाव में राजग को मात दे देता है।  

पर, किसी भी महागठबंधन के निर्माण में मुख्यतः तीन कठिनाइयां सामने आ सकती हैं। महागठबंधन का नेता कौन होगा? कुछ दल चाहेंगे कि यह बात पहले ही तय हो जाए।

महागठबंधन को नीति -रीति कैसी होगी? राज्यों के परस्पर विरोधी क्षत्रपों को एक मंच पर कैसे लाया जा सकेगा? प्रतिपक्ष के लिए एक और कठिनाई नरेंद्र मोदी सरकार इस बीच पैदा कर सकती है।

संभव है कि अगले लोकसभा चुनाव के पहले तक मोदी सरकार कुछ ऐसे चौंकाने वाले काम कर दे ताकि महागठबंधन के निर्माण के बावजूद राजग  अपराजेय रहे।

याद रहे कि हाल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राजग को 325 सीटें मिलीं। जबकि उसे 2014 के लोकसभा चुनाव में विधानसभा की 328 सीटों पर बढ़त मिली थी। यानी उसकी 3 सीटें ही घटीं। आम तौर पर लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में विजयी दलों की सीटें काफी घट जाती हैं।

1977 में उत्तर प्रदेश में जनता पार्टी को 425 में से 352 सीटें मिल सकी थीं जबकि उससे तीन ही महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी को लोकसभा की सभी 85 सीटें मिल गयी थीं।

यानी अनेक मतदाताओं के अनुसार नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पौने तीन साल के कार्यकाल में अच्छे काम किये। उतने काम 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय तक लोगों को नजर नहीं आए थे। दूसरी बात वहां महागठबंधन का भी कमाल था।

वैसे आरक्षण की समीक्षा की मांग करते हुए चुनाव की पूर्व संध्या पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के आए तीन बयानों ने भी बिहार में महागठबंधन के काम और भी आसान कर दिया था। आरक्षण पर खतरे का शोर तो उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान भी राजग विरोधी दलों ने किया था। पर उसका असर नहीं हुआ। क्योंकि मतदाताओं के दिलो दिमाग पर वहां अन्य तत्व अधिक हावी थे।

क्योंकि एक तो मोदी सरकार के काम और मंशा लोगों को पसंद आए, दूसरी बात यह भी हुई कि सांप्रदायिक तत्व भी चुनाव प्रचार के साथ जुड़ गये। अब गैर राजग दलों को इस बात भी विचार करना होगा कि वे नरेंद्र मोदी के लोकलुभावन कामों का मुकाबला कैसे करेंगे ?

क्या जहां-जहां गैर राजग दलों की सरकारें बची हुई हैं, वहां वे सुशासन व विकास की रफ्तार को तेज करेंगे ? क्या बिहार में भी सुशासन की ढीली होती लगाम को ठीक ढंग से कसा जा सकेगा ?

क्योंकि सिर्फ दलीय या फिर जातीय समीकरण ही हर जगह राजग का मुकाबला नहीं कर पाएगा।

महागठबंधन के निर्माण में सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम को एक मंच पर कैसे लाया जाए ? क्या मायावती 1995 में हुए लखनऊ गेस्ट हाउस का कांड भूल जाएंगी ? तब सपा के बाहुबलियों ने उनके कमरे में जबरन घुस कर उस मायावती के साथ काफी बदतमीजी की थी।

मायावती भूल सकती हैं यदि उन्हें अपनी ताजा चुनावी हार उस कांड की अपेक्षा अधिक पीड़ादायक लग रही हो।
याद रहे कि उत्तर प्रदेश के ताजा चुनाव में राजग की अपेक्षा कांग्रेस-सपा- बसपा को कुल मिलाकर दस प्रतिशत अधिक वोट मिले।

लगभग यही समस्या पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और कम्युनिस्टों के बीच आएगी। इन दोनों के कार्यकर्ताओं के बीच यदाकदा खूनी झड़पें होती  रही हैं। क्या ममता वह कांड भूल जाएगी जिसमें उनपर वाम मोर्चे की सरकार की पुलिस ने निर्मम प्रहार किया था और ममता को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा था ?

तमिलनाडु में क्या होगा ? क्या अन्नाद्रमुक और द्रमुक को कभी एक मंच पर लाना संभव होगा? 1989 में जयललिता तमिलनाडु विधानसभा में प्रतिपक्ष की नेता थीं। के. करूणानिधि मुख्य मंत्री थे। एक सवाल पूछने पर कुछ द्रमुक सदस्यों ने जयललिता को सदन के अंदर ही इस कदर अपमानित किया जैसा अपमान शायद ही किसी महिला नेत्री का कभी किसी सदन में हुआ हो।

जयललिता अंत-अंत तक वह अपमान भूल नहीं पायी थीं। क्या उनके उत्तराधिकारी उस घटना को भुला कर द्रमुक से समझौता कर लेंगे?

ऐसी  समस्याएं कुछ अन्य राज्यों में भी है।

इस तरह सारे गैर राजग दलों को एक मंच पर लाना असंभव नहीं तो  अत्यंत कठिन जरूर है। इस महती काम को संभव बनाने के लिए कुशल मध्यस्थों की जरूरत पड़ेगी। फिर भी इस काम में काफी समय लग सकता है।
लोकसभा के अगले चुनाव के सिर्फ दो साल बाकी हैं। यह समय देखते -देखते बीत जाएंगे। इसलिए गैर राजग दल इस काम में यदि अभी से लग जाएं तो पूर्ण नहीं तो कम से कम शायद आंशिक सफलता मिल जाए!
एक मजबूत विकल्प तैयार करने में यदि प्रतिपक्ष विफल रहता है तो वह उसकी विफलता है। जनता की नहीं। गत 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता के तो करीब 61 प्रतिशत वोट राजग के खिलाफ पड़े थे।

(इस लेख का संपादित अंश ‘प्रभात खबर’ के 6 अप्रैल 2017 के अंक में प्रकाशित)

Friday, March 31, 2017

जहां कोर्ट-सेना निष्पक्ष, वहां हिंदू राष्ट्र का कोई खतरा नहीं

जिन लोगों ने राजनीतिक स्वार्थ और वैचारिक-रणनीतिक जकड़न के कारण भाजपा को सत्ता में आने से रोकने की वास्तविक कोशिश नहीं की, वही लोग आज यह शोर मचा रहे हैं कि संघ परिवार देश में हिंदू राष्ट्र-राज्य कायम करना चाहता है। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह शोर तेज हो गया है। कुछ लोगों को आपातकाल की पुनरावृत्ति की भी आशंका हैं।

शायद उनके इस शोर में भी कोई स्वार्थ छिपा हुआ है। क्योंकि अब भी वे ऐसा कोई ठोस काम नहीं कर रहे हैं जिनसे भाजपा कमजोर हो। सिर्फ वोट बैंक और घिसे-पिटे नारों से ही काम चला लेना चाहते हैं।

धर्म निरपेक्ष देश को हिंदू राष्ट्र-राज्य में परिणत करने में आने वाली बाधाओं पर पहले चर्चा कर ली जाए।
भारतीय संविधान के मूल ढांचे को बदले बिना यहां किसी तरह का धार्मिक शासन कायम नहीं किया जा सकता।
क्या यह संभव है ?

24 अप्रैल 1973 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सिकरी की अध्यक्षता में 13 सदस्यीय संविधान पीठ ने ऐतिहासिक जजमेंट दिया था। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मुकदमे में पीठ ने कहा था कि ‘भारतीय संविधान के अंतर्गत संसद ‘सुप्रीम’ नहीं है। संसद संविधान के बुनियादी ढांचे और विशेषताओं को बदल नहीं सकती।’

जो नरेंद्र मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट की इच्छा के बगैर न्यायाधीशों की बहाली तक नहीं कर पाती, वह हिंदू राष्ट्र कैसे स्थापित करेगी ? उसकी ऐसी किसी मंशा के संकेत भी नहीं हैं।

क्या ऐसे किसी दुःसाहसी कदम में सरकार को सेना का साथ मिलेगा? सेना धर्म निरपेक्ष और अराजनीतिक है।
दरअसल ऐसे शोर मचाने वाले कुछ लोग तो अपने वैचारिक खोखलेपन और रणनीतिक जकड़ता को बरकरार रखना चाहते हैं ताकि  उनके विचार समय पार साबित न होने पाए।

इस श्रेणी के राजनीतिक कर्मी हिंदू राष्ट्र राज्य का शोर मचाकर वोट बैंक को मजबूत भी रखना चाहते हैं।
हालांकि वे भूल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कुछ मुस्लिम महिलाओं ने भी भाजपा को वोट दिए क्योंकि भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वह तीन तलाक के खिलाफ है। उधर शाहबानो केस में कांग्रेस सरकार ने क्या किया था?
   


ऐसे किया जा सकता है भाजपा को कमजोर


जिन कारणों से भाजपा केंद्र और उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई है, उन कारणों को दूर किया जाए तो भाजपा कमजोर हो ही सकती है। पर क्या गैर भाजपा दल इस बात के लिए तैयार हैं ? क्या उन्हें अपनी हार का असली कारण कभी समझ में आएगा भी ? पता नहीं।

गैर राजग दलों को 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद ही चेत जाना चाहिए था। कांग्रेस के पास तो ए.के. एंटोनी की एक हद तक  वस्तुपरक रिपोर्ट भी थी जिसमें हार का कारण बताया गया था।

पर, लगता है कि उन लोगों ने उत्तर प्रदेश के ताजा चुनाव नतीजे से भी सबक नहीं लिया।

शायद सबक लेना ही नहीं चाहते। यदि उनका रुख-रवैया ऐसा ही रहेगा तो उन्हें आने वाले दिनों में और भी चुनावी पराजयों का सामना करना पड़ सकता है। स्थानीय कारणों से पंजाब जैसी छिटपुट जीत से इठलाते रहेंगे तो और मात खाते रहेंगे।

भाजपा की जीत के निष्पक्ष राजनीतिक पंडित तीन मुख्य कारण बताते हैं।

पहला कारण अधिकतर भाजपा विरोधी दल और उनकी सरकारें भीषण भ्रष्टाचार में डूबी रही हैं। अपवादों की बात और है। जबकि इस गरीब देश के लोग भष्टाचार से काफी पीड़ित हैं। भ्रष्टाचार से विकास-कल्याण कार्यों की गति धीमी होती है। बढ़ती आबादी के बीच लोगों को सुखी-संपन्न बनाने की बात कौन कहे, खिलाने-पिलाने के लिए भी सरकार के पास कोई ठोस नीतियां नहीं हैं। उधर अधिकतर नेताओं की अमीरी बढ़ती जा रही है। असंतोष बढ़ रहा है।

दूसरा कारण वंशवाद है और तीसरा कारण अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण है।

कई जगह अयोग्य वंशज वैसे ही शासन-दल चला रहे हैं जैसे लर्नर लाइसेंस लेकर कोई एक्सप्रेसवे पर गाड़ी चलाए।

यदि गैर राजग शासित राज्यों में गरीब अल्पसंख्यकों के आर्थिक-शैक्षणिक बेहतरी के लिए ठोस काम हुए होते तो उससे कुल मिलाकर देश का ही भला होता।

पर, दरअसल वोटलोलुप दलों ने उनके बीच के वैसे तत्वों के तुष्टिकरण में ही अपनी शक्ति लगा रखी है जो राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय जेहादी तत्वों के प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थक रहे हैं।

इसके अनेक उदाहरण समय-समय पर मिलते रहते हैं।

ऐसे दलों को जेहादी तत्वों की इस देश में सक्रियता कोई समस्या नहीं लगती। बल्कि कुछ नेतागण आतंकी हमलों के समय ऐसे-ऐसे बयान देते हैं जिनसे कई लोगों को यह लगता है कि वे भूमिगत आतंकियों के सतह पर सक्रिय चेहरे हैं। गैर भाजपा दलों के ऐसे ही कारनामों का फायदा भाजपा उठा लेती है। उसे नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह के वोट मिलते हैं।

यदि अब से भी गैर भाजपा दल, जिन्हें ढोंगी धर्म निरपेक्ष दल भी कहा जाता है, अपनी उपर्युक्त गलतियों को सुधार लें तो भाजपा कमजोर होती चली जाएगी।

क्या उनमें खुद को सुधारने की ताकत बची भी है ?

दरअसल इस देश की आम जनता सब बात समझती है। सभी दलों की अच्छाइयों और कमजोरियों को भी। आम जनता आम तौर पर धर्म निरपेक्ष स्वभाव की है। अपवादों की बात और है।

वह हिन्दुत्व की सत्ता कायम करने के लिए भाजपा को वोट नहीं देती। इस सवाल पर भाजपा उन्हें गुमराह भी नहीं कर सकती। यह और बात है कि भाजपा और संघ परिवार में कुछ तत्व ऐसे जरूर हैं जो इस देश में हिन्दुत्व का एजेंडा लागू करना चाहते हैं। पर वैसे तत्व निर्णायक नहीं हैं।

कभी होंगे भी नहीं। अधिकतर जनता की यह समझ बनती जा रही है कि भाजपा ही जेहादी तत्वों से इस देश को बचा सकती है। यह भी कि भाजपा अपेक्षाकृत कम भ्रष्ट है। वंशवाद भाजपा में भी है। पर उसमें यह गुंजाइश नहीं है कि कोई नेता पुत्र सिर्फ इसीलिए प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ं बन जाए क्योंकि वह किसी खास नेता का पुत्र है। यानी जब बाजार में बेहतर माल उपलब्ध हों तो लोग बदतर क्यों खरीदेंगे?



आजम खान को दर किनार करना जरूरी

खबर है कि आजम खान सपा से दु‘खी हैं। स्वाभाविक ही है। यदि उनकी इच्छा रही हो कि वे विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता बनें तो इसमें कोई अस्वाभाविक बात भी नहीं है। वरीय हैं। समझदार हैं। पर वाचाल भी तो हैं।
बताया जाता है कि सपा की हार का एक कारण उनका बड़बोलापन भी रहा है। कल्पना कीजिए कि आजम खान विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता होते।
सदन में अक्सर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और आजम खान में नोंक-झोंक होती। कोई भी अंदाज लगा सकता है कि बहस में गर्मी बढ़ने पर दोनों कैसे-कैसे शब्दों का इस्तेमाल करते ! उससे समाज में तनाव बढ़ता। बढ़ने पर नुकसान किसे होता? सपा को होता।
शायद सपा के शीर्ष नेता इस बात को पहले ही समझ गए होंगे। इसीलिए आजम खान को प्रतिपक्ष का नेता नहीं बनाया। हालांकि संभव है कि न बनाने का कोई और भी कारण रहा हो।

और अंत में


राजनीतिक कर्मियों और विश्लेषकों के लिए एक अच्छी बात है। वह यह कि हमारे बीच डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेता उपलब्ध हैं। वह अपनी पार्टी की ‘असली लाइन’ से समय-समय पर लोगों को अवगत कराते रहते हैं। इससे अन्य दलों के नेताओं को अपनी राजनीतिक लाइन तय करने में सुविधा होती है।
देखना है कि रघुवंश बाबू के ताजा बयान के बाद जदयू कब अपनी राजनीतिक लाइन तय करता है! याद रहे कि राजद नेता का ताजा बयान यह है कि दो सांसदों वाले नेता को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भला कैसे बनाया जा सकता है !


(प्रभात खबर : बिहार के 31 मार्च 2017 के अंक में प्रकाशित)




Monday, March 13, 2017

नेक इरादों की प्रचंड जीत

इस देश में जब -जब किसी दल या नेता ने यह दिखाया कि  वह भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक जंग कर रहा है तो उसे मतदाताआंे ने जात-पांत से ऊपर उठकर वोट दिये। याद रहे कि भ्रष्टाचार कम होने के साथ गरीबी भी घटेगी।

कभी भ्रष्टाचार के साथ तानाशाही का तत्व जुड़ा तो कभी अपराध का। हां, यदि कभी पिछड़ा-दलित आरक्षण पर खतरा आया तो इन वर्गों के लोगों ने अन्य तत्वों को नजरअंदाज किया।

इस बार भाजपा ने यह भी प्रदर्शित किया कि वह देश की एकता-अखंडता को बचाने के लिए भी अन्य दलों की अपेक्षा अधिक समर्पित है। फिर क्या था! वही रिजल्ट होना था जो इस बार उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में  हुआ।

पंजाब में भी जनादेश मुख्यतः भ्रष्टाचार के ही खिलाफ था। अकाली सरकार के भ्रष्टाचार से लोग पीडि़त थे। भाजपा या नरेंद्र मोदी वहां निर्णायक स्थिति में नहीं थे। ‘आप’ को लोगों ने अधिक गंभीरता से नहीं लिया। अरविंद केजरीवाल एक ईमानदार और कर्मठ नेता जरूर हैं, पर उन्हें एक जिम्मेदार और प्रौढ़ नेता के रूप में उभरना अभी बाकी है।

देश में नोटबंदी का विरोध और राष्ट्र विरोधी तत्वों का यदाकदा प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन कुछ खास दलों व नेताओं को महंगा पड़ा।
उत्तर प्रदेश में जातिवाद, अपराध, परिवारवाद  और एकतरफा- -असंतुलित धर्म निरपेक्षता सपा के लिए घातक साबित हुए।
 याद रहे कि जिस नोटबंदी को कुछ राजनीतिक दल देश के लिए घातक मान रहे थे, उसे अधिकतर मतदाताओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के अभियान का एक हिस्सा माना।

 इससे यह भी साबित हुआ कि कुछ दल आम जनता से कितना कट चुके हैं। या फिर स्वार्थ में डूबे हुए हैं।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लोगों ने इसलिए भी विश्वास किया क्योंकि करीब तीन साल के प्रधानमंत्रित्व काल में उनके खिलाफ प्रतिपक्ष को  भ्रष्टाचरण का कोई सबूत नहीं मिला। साथ ही लोगों में यह भी धारणा बनी कि उन्हांेने केंद्रीय मंत्रिमंडल को घोटालों से मुक्त रखा।

वह अफसरों के स्तर से भ्रष्टाचार की समाप्ति की कोशिश में भी लगे हुए हैं। ऐसी अच्छी मंशा वाले प्रधानमंत्री यदि उत्तर प्रदेश जाकर कोई आश्वासन देता है तो लोग उस पर विश्वास करेंगे ही।

 ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।

1977 में इस देश के मतदाताओं ने जेपी यानी जय प्रकाश नारायण पर विश्वास करके जनता पार्टी को केंद्र में सत्ता में लाया था। याद रहे कि जेपी भ्रष्टाचार व तानाशाही के खिलाफ आंदोलन के प्रतीक बने थे।

लोगों को यह लगा था कि वह देश के लिए कष्ट सह रहे हैं। उन्हें खुद गद्दी पर नहीं बैठना है। यह और बात है कि जनता पार्टी की सरकार ने जेपी और आम लोगों की उम्मीदों को पूरा नहीं किया।

‘गरीबी हटाओ’ का नारा देकर 1971 में लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत पाई इंदिरा गांधी भी बाद में गरीबों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरी थीं।

पर उससे पहले उन्होंने 1969 में जब गरीबी हटाओ का नारा देकर 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था तो गरीबों को लगा था कि यह काम वह गरीबों के भले के लिए ही कर रही हैं। इंदिरा सरकार ने तब राजाओं के प्रिवी पर्स और  विशेषाधिकार समाप्त किये थे।

तत्कालीन सरकार ने यह दिखाया कि ये काम अमीरों से छीनकर गरीबों में बांटने की कोशिश में क्रम में हो रहे हंै।
ताजा नोटबंदी पर भी गरीबों ने यह समझा कि धनपतियों से कालाधन छीना जा रहा है। पर कुछ राजनीतिक दल जनता की इस समझ को समझ नहीं सके।

1987-89 के बोफर्स तोप घोटाले ने राजीव गांधी की सरकार को अपदस्थ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इससे साबित हुआ था कि आम लोग सरकारी भ्रष्टाचार को कितना बुरा मानते हैं।

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी गत के पीछे मनमोहन सरकार के महाघोटालों का सबसे बड़ा हाथ था। कांग्रेस की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति ने आग में घी का काम किया था।

सन 1952 के चुनाव में अधिकतर लोगों ने उसी पार्टी को वोट दिये जिसने आजादी दिलाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। यानी कांग्रेस। सन 1962 तक यही होता रहा। पुराने पुण्य प्रताप से कांग्रेस जीतती रही। पर जब कांग्रेसी सरकारें सत्ता के एकाधिकार के मद में अनर्थ करने लगीं और सरकारी भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ने लगा तो 1967 के चुनाव के बाद नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गईं।

1974 में इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ जेपी आंदोलन  एकाधिकारवाद, जातिवाद, परिवारवाद और भ्रष्टाचारवाद के खिलाफ था। आंदोलन को दबाने के लिए आपातकाल लगाया गया। अधिकतर लोगों ने जातपात से ऊपर उठकर 1977 में कांग्रेस को हरा दिया।

अधिकतर मतदाताओं ने जातपांत से ऊपर उठकर 1984 के लोकसभा चुनाव में भी ‘मिस्टर क्लीन’ यानी राजीव गांधी के दल को जिताया। हालांकि उस चुनाव पर इंदिरा गांधी की हत्या के कारण कांग्रेस खासकर राजीव के प्रति उपजी सहानुभति का तत्व भी हावी था।

उससे पहले कांग्रेस महासचिव के रूप में राजीव गांधी ने देश के तीन वैसे कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को पद से हटवाया था जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। उससे लगा था कि राजीव भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। यह और बात है कि राजीव से भी लोगों की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं।
क्या गैर भाजपा दल उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे से कोई सबक लेंगे ?

या फिर अन्य स्थानीय कारणों से दूसरी छोटी-मोटी चुनावी जीत में ही मगन रह कर अपनी पुरानी राह पर चलते रहेंगे ?
जानकार सूत्रों के अनुसार अभी मोदी सरकार आम लोगों के भले के लिए कुछ अन्य ऐसे काम भी करने वाली है जिनसे प्रतिपक्ष के और भी पस्त होने की संभावना है।

  उत्तर प्रदेश के चुनाव  के बाद केंद्र सरकार बेनामी संपत्ति के खिलाफ बड़ा अभियान चलाने का मन बना रही है। संशोधित बेनामी कानून गत साल पास भी हो चुका है। महिला आरक्षण विधेयक पास हो सकता है। इस तरह के चैंकाने वाले कुछ अन्य काम भी हो सकते हैं।

यह आम राय है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत दरअसल मोदी की ईमानदार मंशा की जीत है। ऐसी जीत के बाद भाजपा और राजग के भीतर के मोदी विरोधी तत्वों के भी होश  ठिकाने आ सकते हैं। इससे केंद्र सरकार के उन प्रशासनिक अधिकारियों के भी सही राह पर आने की संभावना है जो  मोदी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में दिल से साथ नहीं दे रहे हैं।

  नरेंद्र मोदी सरकार ने यदि महिला आरक्षण विधेयक पास करा दिया और बेनामी संपत्ति वालों के खिलाफ कारगर कार्रवाई शुरू करा दी तो 2019 का लोकसभा चुनाव नतीजा भी तय हो जाएगा। उससे पहले देश में दलीय समीकरण बदल सकते हैं।

उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे उन कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए संभवतः अंतिम चेतावनी है जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजों से कुछ नहीं सीखा। दरअसल वे दल
जातिवाद, भीषण भ्रष्टाचार, वंशवाद और वोट बैंक के तुष्टिकरण के काम में मगन रहे हैं। उन्हें यह सबक ले लेना चाहिए कि अधिकतर लोग अब स्वच्छ प्रशासन चाहते हैं और ऐसा कोई काम पसंद नहीें कर रहे हैं जो देश की एकता अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाला हो।

गैर भाजपा दलों के जो नेता यह कह रहे हैं कि भाजपा ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके चुनाव जीता है, उन्हें अब भी  भीषण भ्रष्टाचार, जातिवाद और वंशवाद की बुराइयों से तोबा करने की कोई जरूरत महसूस नहीं हो रही है। ऐसी सोच उनके भविष्य के लिए खतरनाक है।

यदि चुनाव पर ध्रुवीकरण के सीमित असर को मान भी लिया जाए तो उन नेताओं को आत्ममंथन करना चाहिए कि इस काम में उनका खुद का कितना योगदान रहा है!

(इस लेख का संपादित अंश दैनिक जागरण के 13 मार्च 2017 के अंक में प्रकाशित)

Friday, February 10, 2017

निगरानी ब्यूरो पहल करके भ्रष्टाचार पर हमले क्यों नहीं करता !

बिहार निगरानी अन्वेषण ब्यूरो खुद अपनी पहल पर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करता ? पहले तो करता था।

पुराने जानकार लोग बताते हैं कि निगरानी ब्यूरो के जब भी कोई ईमानदार अफसर प्रधान बने, उड़न दस्ते सक्रिय हो जाते थे। बिना किसी शिकायत के दस्ते छापामारी करते रहते थे।

अब क्या हो गया ? अब तो जो केस उसे सौंपे जाते हैं, उसी को ब्यूरो देखता है। यदि अपनी पहल पर निगरानी ब्यूरो कार्रवाई करता तो बिहार कर्मचारी चयन आयोग में जो कुछ हुआ,वह सब नहीं होता।

पहले ही रोक लग जाती।

 बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अभूतपूर्व और शर्मनाक घोटालों का पर्दाफाश तभी हो सका जब एक टीवी चैनल ने ‘प्रोटिकल गर्ल’  की योग्यता-क्षमता का पर्दाफाश किया।जिस लड़की को बोर्ड ने पूरे राज्य का  टाॅपर बना दिया था,उसे पालिटिकल साइंस के स्पेलिंग और उच्चारण भी मालूम नहीं थे।

 राज्य सरकार का यह तर्क सही हो सकता है कि बोर्ड के तब के अध्यक्ष की ललाट पर यह नहीं लिखा हुआ था कि वह घोटालेबाज है।पर क्या कर्मचारी चयन आयोग के कत्र्ताधत्र्ता के कारनामों के बारे में भी सरकार को  कोई पूर्व सूचना नहीं थी ?

  याद रहे कि इससे पहले भी गड़बडि़यों के कारण एक से अधिक बार आयोग की परीक्षाएं रद करनी पड़ी थीं।तभी राज्य सरकार क्यों नहीं जग गयी ?  इस पर सरकार का यह तर्क हो सकता है कि सरकार के पास और भी बहुत सारे काम होते हैं। तब सवाल यह है कि निगरानी अन्वेषण ब्यूरो को सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के अनुपात में सशक्त और प्रो एक्टिव क्यों नहीं बनाया जा सकता है ?

एक समय था जब गैर सरकारी व्यक्ति को भ्रष्टाचार निरोधक संगठन का प्रधान बनाया जाता था। संभवतः वह प्रयोग विफल रहा।पर किसी टाइम-टेस्टेड ईमानदार पूर्व उच्चाधिकारी को तो यह काम सौंपा ही जा सकता है।

बिहार में कुछ रिटायर आई.ए.एस. और आई.पी.एस. अफसरों की चर्चा होती रहती है जिन्होंने सरकार में रहते हुए कभी भी रिश्वतखोरी को बढ़ावा नहीं दिया।

 कम से कम ऐसे लोगों को शिक्षा और परीक्षा वाले सरकारी संगठनों के सर्वोच्च पदों पर तो बिठाकर स्थिति को सुधारने की कोशिश की ही जा सकती है।


   प्रधान मंत्री भी अफसरों के भ्रष्टाचार से दुःखी  

मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कई साल पहले लोगों से यह अपील की थी कि वे भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ स्टिंग आपरेशन चलाएं। इस पर बिहार प्रशासनिक सेवा संघ ने सख्त एतराज किया था। उस एतराज से ही यह साबित हो गया था कि अफसर अपनी शैली बदलना नहीं चाहते।यही रवैया पूरे देश के अधिकतर अफसरों का भी है। दिल्ली से भी यह खबर मिलती रहती है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भी
महत्वपूर्ण पदों पर काबिज कुछ बड़े अफसरों के भ्रष्टाचार से दुःखी रहते हैं।मोदी ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों को ‘वेतन पर काम करने की आदत’ लगा दी, पर अफसरों की  आदतें बदलने में विफल रहे।

मोदी मंत्रिमंडल के सदस्य जल की मछली की तरह कुछ पानी पी जा रहे होंगे तो बात कुछ और है।हालांकि वैसी  खबर अभी आम नहीं हुई है।घोटाले और महा घोटाले की खबर नहीं है जैसी खबरें मन मोहन सरकार के दौर में आती रहती थीं।

 पर सवाल  है कि व्यक्तिगत ईमानदारी के लिए चर्चित नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार जैसे नेता भी  भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक क्यों नहीं कर  सकते ?

दरअसल  गददी पर बैठे नेताओं को उनके कुछ शुभचिंतक यह सलाह देने लगते हैं कि ऐसा कोई खतरा मोल मत लीजिए जिससे गददी पर ही खतरा आ जाए।

क्योंकि आपको शासन में रहकर देश-प्रदेश के हित में अभी और भी बहुत  सारे महत्वपूर्ण काम करने हैं।
पर वे नहीं जानते कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक से अधिक महत्वपूर्ण काम आज कुछ और नहीं है।

   अरविंद केजरीवाल ने अपने 49 दिन के प्रथम  कार्यकाल में जब यह दिखा दिया कि भ्रष्टाचार के प्रति उनकी शून्य सहनशीलता है तो अगले चुनाव में दिल्ली की जनता ने ‘आप’ को सत्तर में से 67 सीटें दे दीं।
  जानकार लोग बताते हैं कि यदि नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार से लड़ते हुए सरकार गंवा भी दें तो अगले लोक सभा चुनाव में उन्हें जनता इतनी सीटें दे देगी जिससे वे हर क्षेत्र के भ्रष्टाचारियों को ठंडा करने की ताकत पा लेंगे।
यही बात किसी मुख्य मंत्री पर भी लागू होती है।

बिहार कर्मचारी चयन आयोग के शर्मनाक घोटालों को देखकर यही कहा जा सकता है कि जल्द कुछ कड़े कदम उठाने  की सख्त जरूरत है।अन्यथा देर हो जाएगी।

जिस राज्य व देश के लाखों प्रतिभाशाली और गरीब युवजन इस नतीजे पर पहुंच जाएंगे कि यहां हर पद बिकाऊ है, तो वहां कुछ भी अशुभ हो सकता है।

इस आशंका को निर्मूल करने की कूबत नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार में मौजूद है, ऐसा अनेक लोगों को लगता है।बस हनुमान को उनकी शक्ति का एहसास कराने की जरूरत है।


  ट्रम्प आखिर कैसे करें आतंकियों से अमेरिका की रक्षा 

 दुनिया के जो  लोग अपने देश को भारत की तरह धर्मशाला नहीं बनाना चाहते हैं, उन्हें  अमेरिका के राष्ट्रपति की तरह सोचने का पूरा हक है। पर डोनाल्ड ट्रम्प थोड़ा अतिवादी लगते  हैं।पर आखिर अमेरिका के लोगों ने उन्हें ही चुना है।परिस्थितियों के अनुसार भारत सहित कोई भी देश अलग-अलग स्वभाव का नेता चुनता है।

 अमेरिकी जनता ने ट्रम्प के अतिवाद को  पसंद करके ही तो उन्हें चुना है।आज दुनिया की स्थिति ही कुछ वैसी बना दी गयी है।खबर है कि कुछ अन्य देशों की जनता भी  इस मामले में अमेरिका की राह पर है।

 पर  खुद ट्रम्प को अब एक जिम्मेदार नेता के रूप में व्यवहार करना चाहिए। कुछ देशों के लोगों को अमेरिका प्रवेश से  रोकने से पहले उन्हें अंतरराष्ट्रीय फोरम पर अपनी आंतरिक सुरक्षा की  समस्या रखनी चाहिए थी।
उधर जिन लोगों को ट्रम्प की इस रोक पर एतराज है,उन्हें इस बात का वैकल्पिक उपाय बताना चाहिए कि आखिर किसी देश का शासक अपने नागरिकों को  आतंकी हमले से कैसे बचाये।यदि आप ट्रम्प की सिर्फ आलोचना करेंगे और उपाय नहीं सुझाएंगे तो आपकी मंशा पर अनेक लोगों को शक होगा।


   आतंकवाद पर भारत में गंभीरता की कमी

घुसपैठियों ने भारत को धर्मशाला समझ रखा है।बाहरी और भीतरी तत्वों की मदद से कई तरफ से विदेशी नागरिक भारत में प्रवेश करके बसते जा रहे हैं। उनमें से कुछ शरणार्थी जरूर हैं,पर अधिकतर अतिक्रमणकारी है।

उनमें कई आतंकी तत्वों को पनाह भी दे रहे हैं। पर वोट के लिए हमारे देश के अनेक नेता व दल उन घुसपैठियों के लिए राशन कार्ड का प्रबंध कर  रहे हैं और मतदाता सूची में उनके नाम दर्ज करवा रहे हैं।

इस मामले में पश्चिम बंगाल और असम की स्थिति बहुत  खराब रही है। खबर है कि बंगाल में तो एक और कश्मीर पल रहा है। कुछ तथाकथित सेक्युलर दल भाजपा के बड़े विरोधी है। ठीक ही है। विरोध होना भी चाहिए।पर क्या ऐसी राष्ट्रद्रोही गतिविधियों का विरोध करने का
काम सिर्फ भाजपा का है ? यदि यह काम सिर्फ उसी के जिम्मे आप छोड़ देंगे तो भाजपा जनता में और मजबूत होगी।

अब बताइए कि जाने-अनजाने भाजपा के मददगार आप बन रहे हैं या नहीं? देश की एकता-अखंडता की रक्षा करने की जिम्मेदारी हमारे संविधान ने सभी नागरिकों पर सौंपी है।


    और अंत में 

व्यापमं घोटाले की तरह का है ताजा बिहार कर्मचारी चयन आयोग घोटाला। इस घोटाले के आरोपी सचिव परमेश्वर राम हाल में एस.आई.टी.के सामने थे। पूछताछ हो रही थी। पर परमेश्वर के जवाब में एक अजीब हेंकड़ी और ऐंठ थी। कोई डर-भय नहीं। साफ लगता था कि परमेश्वर को किन्हीं बड़ी हस्तियों का संरक्षण मिला हुआ है।



Friday, January 20, 2017

तीन बार से अधिक दलबदल पर कम्प्यूटर ही कर दे नामांकन रिजेक्ट

जब-जब चुनाव निकट आता है, तो कुछ बातें खुलकर सामने आने लगती हैं। यह कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था एक साथ कितने बड़े-बड़े खतरे झेल रही है। यह खतरा मुख्यतः चुनावी भ्रष्टाचार, परिवारवाद, दलबदल और घोर सांप्रदायिक तत्वों से है। कुछ खतरे और भी हैं।

पर चुनाव समाप्त होने के साथ ही लोगबाग इन खतरों को भूल जाते हैं।

नेता भला क्यों याद रखेंगे? उनका उनमें निहितस्वार्थ जो है। जो कुछ नेता याद रखते भी हैं, उन्हें राजनीति की मुख्य धारा कुछ सकारात्मक करने से रोक देती है। जबकि हर चुनाव के साथ यह खतरा बढ़ता ही जा रहा है। कुछ खतरे तो साफ दिखाई पड़ते हैं। पर कुछ अन्य भीतर-भीतर पल रहे हैं।

 अगले कुछ साल तक यदि ऐसा ही चलता रहा तो उस लोकतंत्र की छवि पूरी तरह धूमिल और अराजक हो जाएगी जिसकी शुरुआत 1952 में यहां हुई थी।

 अराजक स्थिति के बीच इस बात की भी आशंका है कि किसी दिन कोई तानाशाह बचे-खुचे लोकतंत्र को पूरी तरह नष्ट ही न कर दे! कुछ दूसरे देशों में ऐसा हो चुका है।

    उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित पांच राज्य विधानसभाओं के चुनाव हो रहे हैं। इनमें से दो प्रमुख राज्यों के विभिन्न दलों के कुछ खास नेतागण कई मामलों में बेशर्मी की हद पार कर रहे हैं।  वे लोग संविधान निर्माताओं की आत्मा को चोट पहुंचा रहे हैं।
फिलहाल दलबदल के मामले को देखें। राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो इसका हल आसान है।
 वैसे भी चुनाव सुधार की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताजा पहल सराहनीय है। पर यह अभी पहल विचार और बोली के स्तर पर ही अधिक है। सवाल है कि उनकी सरकार उसे कब कार्यरूप देगी?
  कल्पना कीजिए कि किसी दिन देश की सारी लोकसभा व विधानसभा सीटों पर वही लोग चुनाव लड़ें और जीतें जिनके पूर्वज जनप्रतिनिधि रहे हों ! जो आदतन दल बदलू हों, जिनका माफियाओं से संबंध हो। जिन्होंने  नाजायज तरीके से अकूत संपत्ति एकत्र कर ली हो। जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हों और न्यायिक प्रक्रिया जिनके सामने फेल हो।
 इन समस्याओं से निपटने के लिए कहीं से शुरुआत तो करनी ही पड़ेगी। पहले कदम के तहत दल बदल कानून में ऐसा संशोधन होना चाहिए  ताकि कोई व्यक्ति तीसरी बार दल बदले तो वह चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाए।
  सबसे बड़ी पार्टी भाजपा इसकी पहल करके कमाल कर सकती है।
पहली बार केंद्र में एक ऐसी सरकार बनी है जिसकी मंशा बेहतर लग रही है। उसके पास बहुमत भी पर्याप्त है।
राजनीतिक व प्रशसनिक दिशा भी कुल मिलाकर ठीकठाक ही है।
पर आश्चर्य है कि चुनाव सुधार करने और उच्चस्तरीय प्रशासनिक भ्रष्टाचार समाप्त करने की दिशा में ठोस पहल क्यों नहीं हो रही है ?
शायद मोदी जी खंूखार भ्रष्टों और ताकतवर निहितस्वार्थियों पर निर्णायक हमला करने से डर रहे हैं। सरकार गिरने का डर है क्या ?
डरते रहने वालों की सरकारें और पहले गिर जाती हैं। निडर होकर सर्जिकल स्ट्राइक करने पर सरकार की आयु लंबी हो जाती है। सन 1969 की इंदिरा गांधी इसका उदाहरण है। 1969 में उनके दल का लोकसभा में बहुमत नहीं रह गया था। पर बैंक राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवी पर्स की समाप्ति के बाद हुए चुनाव में उन्हें लोस में बहुमत मिल गया।
कहावत है कि एक गलती भगवान भी माफ कर देता है। पर एक ही गलती। यानी एक से अधिक की माफी को भगवान भी गैर जरूरी मानता है। पर आज एक ही नेता को कितनी बार दल बदल की अनुमति दलीय सुप्रीमो देंगे ? याद रहे कि अपवादों को छोड़ दें तो दल बदल घटिया स्वार्थों की पूर्ति के लिए ही हो रहे हैं। ऐसे नेताओं की अब कमी नहीं है कि एक ही नेता अब तक पांच -छह बार दल बदल कर चुके हैं।
 चुनाव के लिए नामंाकन पत्र दाखिल करते के साथ ही कम्प्यूटर ऐसे उम्मीदवारों का नामांकन रिजेक्ट कर सकता है जो उससे पहले भी दो बार  अलग-अलग दलों के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हंांे।
यदि ऐसा कानून बना और कम्प्यूटर में प्रोग्रामिंग हुई तो कोई नेता अपने पूरे जीवन काल में दो बार से अधिक दल बदल नहीं कर सकेगा।
यदि सरकार सुधार करना चाहे तो उपाय तो बहुत हंै। न करने के बहाने अनेक हैं। कानून में ऐसे संशोधन की पहल करते ही भाजपा व मोदी की लोकप्रिता का ग्राफ और ऊपर चला जाएगा।


बोल ही नहीं, दल बदल के भी घृणित उदाहरण

साक्षी महाराज अपने कु-बोल ही नहीं बल्कि दल बदल के भी निंदनीय  उदाहरण हैं। उनके बोल अक्सर संविधान के प्रावधानों और भावनाओं के खिलाफ होते हैं। हालांकि इस देश में साक्षी ऐसे  अकेले नेता नहीं हैं। हर रंग की साम्प्रदायिक राजनीति में एक ‘साक्षी’ मौजूद  हंै। वे एक दूसरे से राजनीतिक टाॅनिक पाते रहते हैं। दोनों पर समान प्रहार जरूरी है।

साक्षी महाराज पहले सपा से राज्यसभा सदस्य थे। संासद फंड में से घूस लेने के आरोप मंे कुछ साल पहले उनकी सदस्यता चली गयी थी।

अब साक्षी भाजपा से लोकसभा सांसद हैं। ऐसे नेताओं को नीति -सिद्धांत से कुछ लेना देना नहीं होता है।


चुनावी खर्च बढ़ाओगे तो बदनामी होगी ही 

 चुनाव में काले धन के इस्तेमाल को लेकर वैसे नेताओं की भी बदनामी होती रहती है जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत संपत्ति बढ़ाने के लिए राजनीति या सत्ता का कभी इस्तेमाल नहीं किया।

आजकल नरेंद्र मोदी का नाम ‘सहारा’ वालों से पैसे लेने के आरोप के तहत आ रहा है।

 पूरी सच्चाई जांच के बाद ही आ पाएगी। पर अभी मान भी लें कि उन्हें पैसे दिए गए तो भी संकेत यही है कि उन पैसों का इस्तेमाल चुनावी खर्चे में ही किया गया होगा। निजी संपत्ति बढ़ाने के लिए नहीं। राजनीति से  बाहर का कोई निष्पक्ष व्यक्ति नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर शक नहीं करता।

पर सवाल है कि गत लोकसभा चुनाव के समय मोदी जी अपने सभा मंचों पर ही लाखों-करोड़ों रुपए क्यों खर्च कर रहे थे ? उनके दल के अनेक छोटे- बड़े नेता भी चार्टर विमान से यात्रा क्यों कर रहे थे ?

क्या वी.पी.सिंह इसी तरह के अनाप शनाप खर्च करके प्रधानमंत्री बने थे ?

कर्पूरी ठाकुर ने तो कभी हेलीकाॅप्टर से चुनाव प्रचार नहीं किया। फिर भी वे दो बार मुख्यमंत्री और एक बार उप मुख्यमंत्री बने। जबकि उन दिनों बिहार का क्षेत्रफल आज से बड़ा था।


महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य 

महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल की कहानी पूरे देश की कहानी है। आज तो नेता के गिरफ्तार होते ही उन्हें किसी अस्पताल में जगह दे दी जाती है। क्योंकि वे बीमार हो जाने का बहाना तुरंत बना लेेतेे हैं।
अपवाद की बात और है। इस मामले में फिल्म अभिनेता ऐसे नेताओं से अभिनय सीख सकते हैं।

  आम लोगों का इस सिस्टम पर गुस्सा बढ़ जाता है जब यह पता चलता है कि नेता जी को न तो उससे पहले कभी किसी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था और न ही जेल से वापस आने के बाद।

  पर ऐसे ही एक मामले में महाराष्ट्र के एक डाक्टर अदालत की नाराजगी का सामना कर रहे हैं। चर्चित नेता छगन भुजबल विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में हैं। अदालत ने उन्हें कुछ घंटोें के लिए अस्पताल जाने की अनुमति दी थी।

पर कुछ घंटे उनके लिए महीना बन गये। ऐसा मुम्बई के एक अस्पताल के डीन और जेल अधिकारी की साठगांठ से हुआ। भुजबल के प्रभाव के कारण ऐसा हुआ।

कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करते हुए ऐसा किया गया। डीन साहब अदालत की मर्जी के खिलाफ काम करने का मामला झेल रहे हैं।


और अंत में

  ईश्वर ने दो कान और दो आखें दी हैं। पर मुंह एक ही दिया है। यानी आदेश है कि जितना बोलिए, उसकी अपेक्षा पहले दुगुना सुनिए और देखिए। यानी चीजों को परखिए।पर हमारे अधिकतर नेता क्या करते हैं ? ईश्वर के अघोषित आदेश का रोज ही उलंघन करते हैं।
( प्रभात खबर के 20 जनवरी 2017 के अंक में प्रकाशित )