शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

 शराबबंदी पर गांधी और लोहिया

---------------------

गांधी ने कहा था कि ‘‘भले पैसे के अभाव में स्कूल बंद कर देने पड़े,पर मैं चाहता हूं कि देश में फिर भी पूर्ण शराबबंदी लागू हो।’’

लोहिया भी थे नशाबंदी के पक्ष मंे

-------------------

सुरेंद्र किशोर

-------------

साठ के दशक की बात है।

रांची में डा.राम मनोहर लोहिया के दल 

की बैठक थी।

बैठक में एक ऐसा व्यक्ति शामिल था जिसके भोजनालय में शराब भी परोसी जाती थी।

किसी समाजवादी कार्यकत्र्ता ने डा.लोहिया से शिकायत की कि एक शराब बिक्रेता भी इस बैठक में है।

डा.लोहिया ने उसे पास बुलाया।

पूछा, क्या तुम शराब बेचते हो ?

उसने कहा कि मेरा भोजनालय है जिसमें शराब भी बिकती है।

इस पर डा.लोहिया ने कहा कि हमारा दल नशाबंदी का पक्षधर है।

कोई ऐसा व्यक्ति हमारे दल का सदस्य नहीं हो सकता जो शराब पीता है या फिर शराब के कारोबार में है ।

  वह व्यक्ति बैठक स्थल से चला गया।

पर, कुछ घंटे के बाद लौटा।

उसने डा. लोहिया से कहा कि मैंने अपने भोजनालय में से शराब हटवा दी है।

अब मैं शराब नहीं बेचूंगा।

उसके बाद उसे बैठक में शामिल होने की अनुमति मिल गयी।

   इसे कहते हैं राजनीति का समाज पर असर।

........................................................

दरअसल डा.लोहिया मूलतः गांधीवादी थे।

उनका समाजवाद गांधीवाद का ही विस्तार या संशोधित रूप था।

उस जमाने में दूसरे दलों के अच्छी मंशा वाले अग्रसोचू नेतागण भी डा.लोहिया की ही तरह समाज को प्रभावित किया करते थे।

पर अब राजनीति का जमाना बदल गया।

नशाबंदी के कट्टर समर्थक गांधीवादी इस संबंध में एक खास बात कहा करते हैं।

किसी ने गांधी जी से कहा था कि आबकारी टैक्स से मिले पैसों से ही सरकारी स्कूल चलते हैं।

उसके जवाब में गांधी जी ने कहा था कि ‘‘भले पैसे के अभाव में स्कूल बंद कर देने पड़े,पर मैं चाहता हूं  कि देश में फिर भी पूर्ण शराबबंदी लागू हो।’’

यदि आजादी के बाद के हमारे शासकों ने गांधी और डा.लोहिया की बातों को अमली जामा पहनाया होता तो हमारा देश बेहतर होता।

समाज बेहतर होता।

..................................................

अब जब शराबखोरी से समाज में विषम पस्थितियां पैदा होने लगीं हैं तो कुछ राज्य बारी-बारी से शराबबंदी करने को बाध्य हो रहे हैं।

या फिर उस पर विचार कर रहे हैं।

(बिहार में शराबबंदी का राज्य पर अच्छा असर पड़ा है ,कोई सर्वेक्षण चाहे जो कुछ कहे।)

  शराबखोरी से पैदा होने वाली सामाजिक बुराइयों से लोगबाग परिचित रहे हैं।

कहां तो राजनीति देश भर में धीरे-धीरे शराबखोरी बंद कराती और कहां शराब के बिक्रेता अब राजनीति में आकर राजनीति को और समाज को खराब कर रहे हैं।

---------------

कई साल पहले की बात है।

-------------------

तब सरकार मनमोहन सिंह की थी।

उन दिनों विजय माल्या राज्य सभा के सदस्य थे।

आश्चर्य है कि उन्हें नागरिक विमानन मंत्रालय की सलाहकार समिति का सदस्य भी बना दिया गया था।

जबकि पहले इस बात का ध्यान रखा जाता था कि जिस सांसद का जिस मंत्रालय में व्यावसायिक स्वार्थ हो,उस मंत्रालय की संसदीय समिति में उसे सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

 उस समिति में माल्या ने एक प्रस्ताव रखा।

उनका प्रस्ताव था कि घरेलू उड़ानों में भी शराब परोसने की इजाजत मिलनी चाहिए।

वह प्रस्ताव पास भी हो गया।

मुझे नहीं मालूम कि वह लागू हुआ या नहीं !

क्योंकि मुझे हवाई यात्रा का कोई अनुभव नहीं है।

....................................................

  क्या कभी - कभी ही सही, गांधी का नाम लेने वाली कांग्रेस पार्टी से ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए थी ?

यदि गांधी के सपनों की सरकार होती तो ऐसा प्रस्ताव पास होता ?

भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले चैप्टर में लिखा हुआ है कि ‘‘सरकार नशाबंदी करने का प्रयास करेगी।’’

उसी को ध्यान में रखते हुए गांधीवादी प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने सन 1977 में नशाबंदी की शुरूआत की थी।

हर साल शराब की एक चैथाई 

दुकानों को बंद करना था।

पर यह काम कई कारणों से पूरा नहीं हो सका।

बाद की केंद्र सरकारों ने नशाबंदी के काम को जरूरी नहीं समझा।

...............................................

लोहियावादियों को शराब पीते 

देख मुझे सदमा लगा था।

----------------------

आपातकाल में जार्ज फर्नांडिस के बलावे पर मैं बंगलोर गया था।

एक होटल के कमरे में हम तीन लोग टिके थे।कई दिन रहे।

उनमें से एक बाद में मुख्य मंत्री बने।दूसरे राज्य सभा के सदस्य।मैं खुद पत्रकार बन गया।

दिन में हमलोग सिनेमा देखते।अंधेरा हो जाने पर एक खास तरह की टे्रनिंग के लिए हम उस पहाड़ी पर जाते जहां शोले की शूटिंग हुई थी।

रात में भावी मुख्य मंत्री,भावी राज्य सभा सदस्य और एक स्थानीय वकील शराब पीने बैठ जाते थे।मैं टुकुर -टुकुर उन्हें देखता रहता था और कूढ़ता रहता था।

(मैं आज तक शराब का स्वाद नहीं जानता।)

-----------

14 अगस्त 2026

  


    

 सन -1931 की जातीय जन गणना के अनुसार बिहार

-ओडिशा की विभिन्न प्रमुख जातियों की कुल संख्या

    -----------------

तब के आंकड़े देखकर मोटा-मोटी अनुमान लगा लीजिए।

आज के आंकड़े का अनुमान सटीक तो नहीं ही होगा।

पर,मोटा-मोटी अनुमान लगाने में इससे मदद मिलेगी। 

-----------------

   सुरेंद्र किशोर

...................................   

 सन 1931 में आखिरी बार जातियों के आधार पर देश में जनगणना हुई थी।

दूसरे विश्व युद्ध के कारण भारत में सन 1941 में जनगणना

नहीं हो सकी।

1947 में देश आजाद हुआ तो स्वतंत्र भारत की सरकार ने जातियों के आधार पर गणना बंद कर दी।

कुछ लोगों को आरोप रहा है कि बंद करने के पीछे उस सरकार का निहितस्वार्थ रहा।

   ..........................................

मेरे पास पूरे देश का तो नहीं किंतु सन 1931 की जनगणना के अनुसार बिहार-ओडिशा की प्रमुख जातियों की संयुक्त जनसंख्या का विवरण उपलब्ध है।

1931 में ओड़िशा भी बिहार का ही अंग था।झारखंड तो था ही।

(स्रोत--मुंगेरी लाल नीत पिछड़ा वर्ग आयोग की रपट--

16 फरवरी, 1976)

........................................

बिहार-ओड़िशा--1931 जनगणना

.............................................

ग्वाला - 34 55 141

(इसमें अहीर,गोप व यादव शामिल हैं।)

..................................

ब्राह्मण - 21 01 287

.....................................

कुर्मी - 14 52 724

.................................

राजपूत --14 12 440

..........................................

कोइरी --13 01 988

चमार-- 12 96 001

...........................

दुसाध--12 90 936

...................

तेली --12 10 496

...............................0

(बाभन)भूमिहार-8 9 5 6 0 2

................................

कायस्थ --3 83 435 

................................

धानुक--5 47 308 

............................

धोबी- 4 14 221 

हजाम - 4 56 779

मल्लाह - 4 59 560

कहार- 5 24 030 

कान्दू- 5 06 384

केवट- 4 71 389

कुम्हार- 5 99 038

तांती - 6 89 791

बनिया- 2 20 071

बढई-3 63 794

.......................................

 नोट--ऊपर दी गई सूची पूर्ण नहीं है।

मैंने कुछ ही जातियों की तब की संख्या यहां लिखी है।

मुंगेरी आयोग की रपट में विस्तृत सूची है।

............................................. 

मंडल आयोग की सिफारिश लागू होने से ठीक पहले केंद्र के आखिरी कांग्रेसी मंत्रिमंडल के सदस्यों का जाति वार ब्योरा पढ़ लेना प्रासंगिक होगा।कांग्रेस ने चूंकि मंडल आयोग की रपट के आधार पर लागू आरक्षण का विरोध किया था,इसलिए उसे 

 बाद में कभी लोक सभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला।

......................................... 

सन 1988 के केंद्रीय मंत्रिमंडल में जातिगत स्थिति।

इसे देख कर कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति कह सकता है कि आरक्षण कितना जरूरी है।हालांकि मंत्रिमंडल में आरक्षण नहीं होता है,पर मंत्रिमंडल को बनाने वालों की मानसिकता का इससे पता चल जाता है।अन्य क्षेत्रों में भी लगभग यही होता रहा था तब। 

.....................................................

जब कांगे्रस की पूर्ण बहुमत वाली सरकारें केंद्र या राज्य में बनती थीं तो 

मंत्रिमंडल में विभिन्न जातियों को कितना -कितना प्रतिनिधित्व मिलता था,देखें ।

कम से कम एक सरकार का तो आंकड़ा मिला है।

राजीव गांधी मंत्रिमंडल का यह आंकड़ा 14 फरवरी, 1988 का है।

....................................................

  उस राजीव गांधी मंत्रिमंडल की जातिगत स्थिति

........................................................

ब्राह्मण-15

पिछड़ा--5

ईसाई-3

अनुसूचित जाति-9

मुसलमान-4

सिख-1

वनवासी-3

ठाकुर-2

अन्य ऊंची जाति-11

अन्य-6

............................................

1988 से अब तक राजनीतिक और सामाजिक स्थिति में देश में काफी परिवर्तन हुआ है।

काफी कुछ बदल गया है।

मौजूदा नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल के सदस्यों का जातीय विवरण इस प्रकार है।इससे कांग्रेस मंत्रिमंडल और मोदी मंत्रिमंडल के बीच का फर्क साफ नजर आएगा।

-------------

नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल --जातीय संख्या

------------

अन्य पिछड़ा वर्ग--27 मंत्री

सामान्य वर्ग--यानी उच्च जाति --28 मंत्री

अनुसूचित जाति--10 मंत्री

अनुसूचित जनजाति--5 मंत्री

अल्पसंख्यक--5 मंत्री

(कोई मुस्लिम नहीं )

---------

20 अगस्त 26 


 


 मेरे बारे में खुशखबरी,

ईश्वर करे , आपके बारे में भी ऐसी ही 

खुशखबरी मिलती रहे !

-------------------

सुरेंद्र किशोर

------------

मैं हर साल अपनी विस्तृत पैथोलाॅजिकल जांच करवाता हूं।

ताजा जांच रिपोर्ट को देखकर एक बड़े डाक्टर ने अपनी राय दी--

‘‘रिपोर्ट बिल्कुल परफेक्ट है।

सिर्फ विटामिन -डी और बी -12 कम है।’’

डी नाॅर्मल करना मेरे बाएं हाथ का खेल है, 

डी ठीक करना दाएं हाथ का।

इसलिए फिकिर नाॅट !!

----------------

सन 2005 रिपीट 2005 में मैं नियमित सेवा से रिटायर कर गया।

तब से लगातार काम कर रहा हूं।नौकरी के समय से कुछ अधिक ही काम।

थकता नहीं हूं।थोड़ा संयम जरूर रखता हूं।

---------------

आप भी नियमित रूप से विस्तृत जांच कराते रहिए।

कोई रोग पल रहा होगा तो समय से पहले पकड़ में आ जाएगा और उसका इलाज भी हो जाएगा।

उदाहरण--किडनी का 70 प्रतिशत हिस्सा जब नष्ट हो चुका होता है,उसके बाद ही उस रोग का लक्षण प्रकट होता है।

उसके बाद तो जीवन खत्म !!

डायलिसिस पर कितने दिनों तक कोई रहेगा ?!

इसलिए यह मत कहिए कि मेरे शरीर में रोग का कोई लक्षण

 ही नहीं है तो जांच पर खर्च क्यों करूं ?

--------------------

18 अगस्त 26 


बुधवार, 19 अगस्त 2026

 18 अगस्त, 2026 के प्रभात खबर (पटना संस्करण) में प्रकाशित

------------------------------------

 12 टाउनशिप के लिए केंद्रीयकृत गुणवत्ता नियंत्रण प्रशाखा जरूरी 

----------------------------

सुरेंद्र किशोर

---------------

बिहार में प्रस्तावित 12 ग्रीन फील्ड सैटेलाइट टाउनशिप शहरी मेगा प्रोजेक्ट है।

इसके बन कर तैयार हो जाने के बाद यह एक युगांतरकारी योजना साबित होगी।

इसका श्रेय मौजूदा राज्य सरकार को मिलेगा।व्यवस्थित ढंग से बसने वाले इन शहरों में रहना अपने आप में एक सुखद अनुभव होगा।

यह टाउनशिप विकास का इंजन भी साबित होगा।इसी को ध्यान में रखकर इसकी योजना तैयार की जा रही है।

पर,एक समस्या भी है।निर्माण में गुणवत्ता की समस्या।

 12 टाउनशिप का गुणवत्तापूर्ण निर्माण सुनिश्चित किया ही जाना चाहिए।

गुणवत्ता नियंत्रण का काम तो इन दिनों और भी  कठिन हो गया है ,पर असंभव नहीं।  

 एक कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर के नेतृत्व में गुणवत्ता नियंत्रण प्रशाखा की स्थापना होनी चाहिए।

प्रशाखा निरंतर सभी 12 टाउनशिप के गुणवत्तापूर्ण निर्माण को सुनिश्चत करे।बात साफ है।यदि राज्य सरकार गुणवत्ता बनाए रखेगी तो उसे यश मिलेगा।यदि गुणवत्ता नहीं रहेगी तो अपयश मिल सकता है।

----------------

नक्सल आन्दोलन का चढ़ाव-उतार

------------------- 

  बिहार सरकार के गृह विभाग द्वारा सन 1982 में राज्य में नक्सल आंदोलन पर तैयार विस्तृत नोट में कहा गया था कि नक्सल  समस्या सिर्फ कानून -व्यवस्था की ही समस्या नहीं है,बल्कि यह सामाजिक -आर्थिक समस्या भी है।

तब तक अविभाजित बिहार के मात्र 13 जिलों के 47 प्रखंडोें में नक्सली सक्रिय हुए थे।

पर, बाद के वर्षों में बिहार और झारखंड मेें नक्सलियों का फैलाव काफी बढ़ा।

इस बीच नक्सल आंदोलन में कई उतार -चढ़ाव भी आये।

 केंद्र और राज्य की मौजूदा सरकारों ने नक्सल आंदोलन को एक अलग नजर से देखा और तदनुसार उससे मुकाबला किया। 

इसी महीने बिहार सरकार ने यह सूचना दी कि बिहार अब नक्सल मुक्त हो चुका है।हाल तक राज्य के 22 जिले नक्सल प्रभावित थे।अब कोई जिला वैसा नहीं है।

आने वाले दिनों में यह बात सामने आएगी कि सचमुच नक्सल समस्या से बिहार मुक्त हुआ है या नहीं।पर इससे अलग नक्सल अभियान को लेकर उस विचारधारा को मानने वालों में भी समय- समय पर मतभेद उभरा है।

 चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन माओ त्से तुंग ने सन 1967 में उनसे मिलने गये नक्सली नेता कानू सान्याल व तीन अन्य से कहा था कि ‘‘यहां आपने जो भी सीखा,उसे भूल जाएं और अपने देश की स्थिति के अनुसार 

वहां काम करें।’’

कभी भूमिगत अभियान में शामिल रहे माले (लिबरेान)के दिवंगत महेंद्र प्रसाद सिंह बाद में चुनाव प्रक्रिया में शामिल हुए।तीन बार बगोदर से विधायक बने।जब उन्होंने देखा कि आम जनता घूसखोरी से परेशान है तो उन्होंने सत्याग्रह के जरिए जन दबाव बना कर सरकारी कर्मियों को घूस के पैसे जनता को लौटाने को विवश करना शुरू किया।इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी।महंेद्र जी अपने जीवन काल में कभी चुनाव नहीं हारे।यह था देश और जनता की स्थिति के अनुसार काम करना।

----------------

 फुटपाथों पर बेलगाम अतिक्रमण

---------------

सुप्रीम कोर्ट ने गत जून में कहा कि सीमांकित फुटपाथों पर सुरक्षित रूप से चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-19 और 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है।

सरकार का कत्र्तव्य है कि वह नागरिकों के लिए सुरक्षित पैदल मार्ग प्रदान करे।

  कुछ साल पहले पटना हाई कोर्ट ने अदालत में मौजूद पटना के एक थानेदार से पूछा-‘‘सड़कों पर अतिक्रमण करा कर रोज कितना कमा लेते हो ?’’

  यानी, अतिक्रमण एक मुनाफे का ध्ंाधा रहा है।इसके बावजूद अदालतें फुटपाथों पर से अतिक्रमण हटाने का सख्त आदेश सरकारों को नहीं दे पा रही है ?

यह समस्या देशव्यापी है।

  फिलहाल अदालत सरकार को यह निदेश दे सकती है कि वह राज्य पुलिस के बदले अर्ध सैनिक बल के सहयोग से फुटपाथों पर से अतिक्रमण हटाए।

------------------

भूली-बिसरी यादें

--------

एक बार लोक सभा में कांग्रेस के भागवत झा आजाद ने कह दिया था कि ‘‘काबुल की सड़कों पर सिर्फ घोड़े ही नहीं होते,गधे भी होते हैं।’’

प्रतिपक्ष के अटल बिहारी वाजपेयी ने इस उक्ति पर एतराज किया और स्पीकर से कहा कि आप इस उक्ति को सदन की कार्यवाही से निकाल दें ।क्योंकि इससे पड़ोसी मित्र देश से संबंध बिगड़ सकते हैं।

 वाजपेयी की इस बात से सदन में हंसी फूट पड़ी।

हस्तक्षेप करते हुए भागवत झा आजाद ने कहा कि ‘‘चलिए आप कहते हैं तो बदल देता हूं।

मैं कह देता हूं कि बंबई की सड़कों पर घोड़े ही नहीं ,गधे भी होते हैं।

इससे पहले आजाद साहब ने अंग्रेजी में कहा था कि ‘‘मुझे अपना मंुह मत दीजिए,अपना कान दीजिए।’’

अटल जी ने कहा कि अभिव्यक्ति की यह भाषा उचित नहीं है।

इस पर आजाद जी ने कहा कि मेरा मतलब यह है कि ‘‘आप अपना मुंह बंद रखिए और अपने कान खुले रखें।’’   

 ( तब की अपेक्षा सदन में आज की चर्चा का स्तर देखिए और दुखी होइए।)

--------

और अंत में

-------

 सन 1962 में डा.राम मनोहर लोहिया ने प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खिलाफ चुनाव लड़ा।

किसी ने पूछा कि ऐसी जगह से क्यों लड़े जहां से आपकी हार तय थी ?

डा. लोहिया ने कहा कि पार्टी के प्रचार के लिए लड़ा।साथ ही ,चट्टान को मैं तोड़ तो नहीं सका,पर उसमें दरार जरूर डाल दी। फूलपुर लोक सभा चुनाव क्षेत्र के भीतर पांच विधान सभा चुनाव क्षेत्र पड़ते थे।उनमें से नेहरू तीन क्षेत्रों में और लोहिया दो क्षेत्रों में विजयी हुए।

------------------

(अनियतकालीन काॅलम ‘यदाकदा’ से)



 


रविवार, 16 अगस्त 2026

 कितने लोगों को पसंद हैं राहुल गांधी 

की देह -भाषा और मौखिक भाषा ??

-----------------------

सुरेंद्र किशोर

-------------

राहुल गांधी की जो मौखिक भाषा है और उनकी जो देह भाषा है,वह 

देश देख रहा है।

संसद के भीतर या बाहर राहुल गांधी जिस तरह अपनी देह भाषा--मौखिक भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं,यदि किसी शालीन व्यक्ति के ड्राइंग रूम में जाकर वे वही सब करने लगें तो क्या वह शालीन व्यक्ति चाहेगा कि राहुल जी अगले दिन भी  उस व्यक्ति के घर जायें ?(यदि उस व्यक्ति को कांग्रेस का टिकट नहीं लेना हो तो।)

  जो लोग चाहेंगे कि राहुल जी घर के बाहर और भीतर,संसद के बाहर और भीतर  भी वही सब करते रहें,जो कुछ कर रहे हैं,

सिर्फ वैसे ही लोग राहुल को अगला प्रधान मंत्री देखना पसंद करंेेगे।

बाकी जनता ?

बाकी जनता कहेगी कि अपने आचरण से आप अपनी पार्टी को जिस तरह दिन प्रति दिन बर्बाद कर रहे हैं,वह करने का आपको पूरा अधिकार है,पर आपको इस देश के साथ छेड़छाड़ करने नहीं दिया जाएगा।

  इस देश को ‘‘केरल शैली का शासन’’ नहीं चाहिए।

(केरल में आज जो कुछ हो रहा है,वह बहुत चिंताजनक है,सारी बातें बाहर नहीं आ रही हैं।वहां के हिन्दू संगठन उद्वेलित हैं।विश्वास न हो तो गुगल की मदद लीजिए।)दूसरी ओर यू.पी.में तो कुछ मुस्लिम महिलाएं भी टी.वी.चैनलों पर कहती हैं कि बाबा के राज में हम अंधेरा होने के बाद भी घर से 

निकल कर सुरक्षित घर लौट सकती हैं।सन 2017 से पहले पहले ऐसा नहीं था।

बिहार में भी सन 2005 से पहले कोई व्यक्ति अंधेरा हो जाने के बाद सामान्य स्थिति में अपने घर से नहीं निकलता था।

पटना जंक्सन पर जब कोई व्यक्ति अंधेरा हो जाने के बाद कहीं बाहर से ट्रेन से पहुंचता था तो पटना स्थित अपने घर भयवश तत्काल नहीं चला जाता था।रात पटना स्टेशन पर ही गुजार देता था।अगली सुबह जाता था।   

---------------------

16 अगस्त 26


शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

 मैं जानता हूं कि मेरी बात कोई नहीं सुनेगा।

पर, चेतावनी देना मैं अपना नागरिक कत्र्तव्य समझता हूं।

कल यह तो कोई नहीं कहेगा कि पहले चेताया क्यों नहीं था ! 

-------------------

सुरेंद्र किशोर

---------

घर का ही बनाया खाइए।

अपनी जमीन हो तो घर का ही उपजाया खाइए।

बाकी तो कदम- कदम पर खतरा है--

डेग- डेग पर कैंसर है ।

सरकारें दूसरे कामों में व्यस्त हैं।

----------------

समस्या की गंभीरता को देखते हुए सरकारों को चाहिए कि वे मिलावट को रोकने के लिए एक अलग विभाग बनाए।

जिस तरह बाहर के दुश्मनों को रोकने के लिए रक्षा मंत्रालय बनाया गया है।

मिलावट खोरों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान हो।

-----------

12 अगस्त 26 


शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

 आपातकाल के काले दिन 

..................................

बिशन टंडन की डायरी से

........................

23 जुलाई 1975

.........................

...........प्रधान मंत्री का प्रजातंत्र बचाने का पाखंड झूठे प्रचार पर ही तो अधारित है।

शारदा (प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार एच.वाई.शारदा प्रसाद)का अन्तर व्यथित है।

पर,झूठे तर्क को उसके विभिन्न रूपों में उसे लिखना पड़ रहा है।

......................

हर महत्वपूर्ण नियुक्ति के लिए प्रधान मंत्री, संजय गांधी की राय लेती हैं।

.......................

.....................

शारदा, जिस प्रकार संेसर का कार्य किया जा रहा है,उससे भी बहुत असंतुष्ट व खिन्न है।

उसका कहना है कि प्रधान मंत्री इस संबंध में कुछ उदारता दिखाने के पक्ष में हैं,पर संजय व अन्य लोग जो प्रधान मंत्री निवास से सब बातों पर नियंत्रण रख रहे हैं,कठोर संेसर के पक्ष में हैं।

पिछले रविवार को मंत्रि परिषद की बैठक में सेंसर आदि पर बातें हुईं।

उसमें प्रधान मंत्री ने कहा कि यदि प्रतिपक्ष संसद में वाक-आउट करे तो उसे समाचार पत्रों में छपने देना चाहिए।

  प्रायः सभी मंत्रियों की यही राय थी।

पर बाद में महल के सिपहसालारों का निर्णय दूसरा हुआ।

(आज जो लोग अक्सर गोदी मीडिया की बातें करते हैं,उन्हें यह पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए।साथ ही, यह भी बताना चाहिए के आज के गांधी परिवार की मानसिकता इमरजेंसी की इंदिरा गांधी की मानसिकता से कितनी भिन्न है ?)

आज लोक सभा में मीसा का संशोधन प्रस्तुत किया गया।

मावलंकर ने उसका विरोध किया।

पर,होता क्या है इस विरोध से ?

..... कल के जगजीवन राम के भाषण का आकाशवाणी ने पूरा प्रसारण किया।उसके विपक्ष में जो कुछ कहा गया,वह बिलकुल नहीं बताया गया।

...........................

...................

आज (मशहूर वकील )पालकीवाला प्रधान मंत्री से मिले।

प्रधान मंत्री से पहले वे शेषन से मिले।

आजकल जो कुछ हो रहा है,उससे उन्हें (पालकीवाला को )बहुत क्लेश पहुंचा है।

उनकी राय है कि हमारा संविधान नष्ट हो गया।

 इस सबकी आवश्यकता नहीं थी।

बात करते- करते उनकी आंखें भर आईं।

भ्विष्य बड़ा अंधकारमय है।

पालकीवाला तो दो साल से यही कह रहे हैं कि हमारे संविधान को विकृत किया जा रहा है।

...................................

(आई.ए.एस.अफसर बिशन टंडन आपातकाल में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के संयुक्त सचिव थे।

रिटायर होने के बाद टंडन साहब बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक बने।मैं कुछ साल तक उस फाउंडेशन की ज्यूरी का मेम्बर था।--सुरेंद्र किशोर)