बुधवार, 4 नवंबर 2026

 ‘‘अच्छी कीमत के लोभ में अपने गांव की जमीन किसी 

अनजान या संदिग्ध व्यक्ति के हाथों न बेचें।

अन्यथा,देर-सबेर आपके इलाके की शांति भंग हो सकती है।’’

       --- एक जानकार व्यक्ति ने मुझे सचेत किया है।  

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पता नहीं,यह कितना सच है !! शासन को पता लगाना चाहिए।

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4 जनवरी 26


शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

 रवीन्द्र किशोर सिन्हा नहीं रहे

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पत्रकार,बिजनेसमैन,सांसद और दोस्तपरस्त 

 आर.के.सिन्हा को भावभीनी श्रद्धांजलि 

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सुरेंद्र किशोर

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रवीन्द्र जी की शानदार पत्रकारिता से प्रभावित होकर उनके नाम का किशोर मैंने अपने नाम के साथ भी जोड़ लिया

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यह सत्तर के दशक की बात है।तब वे सर्चलाइट-प्रदीप और बाद में इलाहाबाद से प्रकाशित मासिक ‘‘माया’’ के लिए काम करते थे।बाद में वे बिजनेसमैन और राज्य सभा सदस्य बने।

1973-74 में मैं समाजवादियों की साप्ताहिक पत्रिका ‘जनता’

में सहायक संपादक के रूप में काम करता था।

मेरा नाम ‘जनता’ के प्रिंटलाइन में सुरेंद्र अकेला छपता था।

हमारे संपादक थे--समाजवादी पार्टी के एम.एल.सी.रेवतीकांत सिन्हा।

‘जनता’ का प्रकाशन जेपी ने शुरू किया था।उसके प्रथम संपादक थे स्वनामधन्य रामवृक्ष बेनीपुरी।

जब मैंने प्रिंटलाइन में अपना नाम सुरेंद्र किशोर किया तो रेवती बाबू ने मुझे समझाया--आप सुरेंद्र अकेला के नाम से देश    

में जाने जाते हैं।नये नाम के प्रचार में बहुत समय लगेगा।

खैर, मैं तो रवीन्द्र किशोर से प्रभावित था।

मैंने अपना निर्णय नहीं बदला।

1977 के प्रारंभ में ही मैं दैनिक ‘आज’ के पटना ब्यूरो में शामिल हो गया था।

 एक दिन इलाहाबाद के एक मशहूर साहित्यकार गुप्त जी पटना आकर मुझसे मिले।वे चर्चित मासिक ‘माया’ समूह से जुड़े हुए थे।

उन्होंने कहा कि हमारे यहां बिहार से एक जनसंघी लिखता है।उसे हटाकर हमलोग चाहते हैं कि आपसे लिखवाऊं।

मैंने कहा कि ‘‘वह जनसंघी’’ बहुत अच्छा लिखता है।

उतना अच्छा मैं नहीं लिख पाऊंगा। 

‘माया’ वाले ने जिद की।कहा कि ‘आज’ अखबार से आपको बहुत अधिक पैसे मिलेंगे।

किंतु मैंने टाल दिया। वह जनसंघी रवीन्द्र किशोर ही थे।वैसे बता दूं कि उनकी खोजपूर्ण रपटों पर जनसंघ का कोई प्रभाव नहीं होता था।

 तब तक भी रवींद्र जी से मेरा परिचय नहीं हुआ था।

किंतु दूर से उनको वाॅच जरूर करता रहा।

विभिन्न सीढ़ियां चढ़ते हुए रवीन्द्र किशोर उर्फ रवीन्द्र्र किशोर सिन्हा उर्फ आर.के.सिन्हा कहां पहुंचे थे,उसका पूरा विवरण इंडिया टूडे (हिन्दी) के पुराने अंक (30 नवंबर 2022)में पढ़िए।

 संभवतः सन 2015 में देश के नामी पत्रकार-लेखक व जेपी आंदोलन के प्रथम मीसा बंदी राम बहादुर राय ने आर.के.सिन्हा को बताया कि आपसे ही प्रेरित होकर सुरेंद्र जी ने किशोर शब्द अपने नाम के साथ जोड़ा है।

तब सिन्हा साहब राज्य सभा के सदस्य थे।

एक दिन वे पटना से थोड़ी दूर स्थित गांव के मेरे आवास पर पहुंच गये।

मेरी लाइबे्ररी देखी तो रवीन्द्र किशोर जी ने कहा कि आपके परिसर में जमीन है ही।

आपकी लाइब्रेरी बड़ी होती जा रही है।कहिए तो मैं सांसद फंड से आपकी लाइब्रेरी के लिए एक उप भवन बनवा देता हूं।मैंने कहा कि यह मेरी निजी लाइब्रेरी है।सरकारी पैसे लगेंगे तो उस पर आम जनता का अधिकार बन जाएगा।मैं अपनी निजता भंग नहीं होने देना चाहता।

दिवंगत रवीन्द्र किशोर जी की अनेक उपलब्धियां रहीं ,पर दो बातों को लेकर मैं खास तौर पर उनसे प्रभावित रहा।

पैसे तो बहुत लोगों के पास होते हैं,पर आर.के.सिन्हा जिस उदारता से अपने जरूरतमंद दोस्तों पर खर्च करते थे,वैसा कम ही होता है।दूसरी बात, जैविक उत्पादन के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

वह अद्भुत व समयोचित काम है।

ऐसा करके वे अनेक लोगों को कैंसर से बचा रहे हैं।

आम लोग रासायनिक खाद -कीटनाशक दवाओं के जरिए उपजाए गए अनाजों के घातक प्रभाव से अनभिज्ञ हंै।

सिन्हा के ‘‘आद्या फूड’’ का मैं भी एक छोटा उपभोक्ता हूं।

वैसे काफी महंगा पड़ता है,पर मैं कैंसर को अपने पास फटकने से यथासंभव रोकना चाहता हूं।(सरकारों को चाहिए कि वे जैविक उत्पादों पर सब्सिडी दे।उससे होगा यह कि कैंसर के अस्पतालों पर सरकारी खर्च घटेगा।)

  रवीन्द्र किशोर सिन्हा को भूल जाना संभव नहीं है।

मेरे लिए तो और भी नहीं क्योंकि उनका किशोर मेरे नाम से जुड़ चुका है।

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30 अक्तूबर 26

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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

 स्फुट विचार

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  हित भुक्, मित भुक्, ऋत् भुक्

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 भूख से थोड़ा कम खाने वाला

 शरीर के लिए हितकारी भोजन वाला

मौसम के अनुकूल भोजन वाला

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स्वस्थ रहता है

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सुरेंद्र किशोर

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भूख के कारण दुनिया में जितने लोग मरते हैं,उससे अधिक लोग

अति भोजन यानी शरीर की जरुरत से ज्यादा खाने के कारण 

लोग मरते हैं।

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अब तो एक और तत्व लोगों के समय से पहले मरने का कारण बन रहा है--वह है मिलावटयुक्त भोजन।रासायनिक खाद व कीटनाशक की अधिकता वाले अनाज आदि का सेवन।

आॅनलाइन मंगाया गया डिब्बा-पैकेटबंद खाद्य-पेय पदार्थ।

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पंजाब के ड्रग्स की बड़ी चर्चा होती है,पर उतना ही खतरनाक हैं वहां के खेतों में डाले जा रहे अत्यधिक मात्रा में रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाएं।

इसके लिए वहां के अढ़तिया और मंडी के दलाल कसूरवार है।वे 

किसी सरकार से अधिक ताकतवर हैं।

किसान बिल के खिलाफ वे लोग ही आंदोलन कर रहे थे।केंद्र की मोदी सरकार उनके सामने झुक गई।

 उसके कारण कैंसर बहुत बढ़ रहा है।

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और अंत में

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राजनीतिक तथा अन्य तरह की महत्वाकांक्षाएं कई लोगों को असमय मार रही हैं।

पद छूटते ही कई लोग बीमार हो जाते हैं।अपेक्षाकृत छोटे पद से बड़े पद पर जाने की महत्वाकांक्षा पूरी नहीं होने पर कई लोग ‘‘असामान्य’’ हो जाते हैं।कई शारीरिक रूप से कई अन्य मानसिक रूप से।कुछ नेता पद पाने में अधिक देर होने के कारण भी मानसिक रूप से बीमार होते देखे जा रहे हैं--अनर्गल प्रलाप करते रहते हैं।

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जब मैं सक्रिय पत्रकारिता में था तो हर साल नव वर्ष के अवसर पर मुझे करीब सौ -सवा सौ शुभकामना के फोन आते थे।अब रिटायर होने पर उनमें से कोई फोन नहीं करता।तो क्या मैं उस कारण बीमार हो जाऊं ?उदास हो जाऊ ?

मेरे पास तो इतने अधिक दूसरे काम हैं कि न तो बीमार होने की फुर्सत मिल रही है न ही ‘मरने’ की।चिंता करने की तो बिलकुल नहीं।क्योंकि जो काम कर रहा हंू उसमें पहले के काम की अपेक्षा अधिक संतोष मिल रहा है--भले पैसे कम हैं।

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रिटायर होने से पहले ही बाकी दिनों के लिए पहले सही प्लानिंग कर लेने से ठीक रहता है।पर हम जब पद पर होते हैं तो नकली सराहनाओं के काण सातवेें आसमान पर होते हैं।रिटायर होने के बाद अचानक आसमान से नीचे जमीन पर।

चिंता व तनाव में कुछ पत्रकारों को लकवाग्रस्त होते देखता रहा हूं।

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जो पत्रकार समझते हैं कि सेवाकाल में सैकड़ों फोन उन्हें नहीं आते बल्कि उनके पद को आते हैं,वे बाद में टेंशन में कततई नहीं रहते हैं।

मैं तो कभी नहीं रहा।क्योंकि मैं तब भी जानता था कि यह मुझे नहीं मेरे पद को फोन आ रहे हैं।

हम पत्रकार लोग भी किसी नेता

को उसके सत्ता से हट जाने पर कितना याद करते हैं ?!

उस बेचारे पर भी कुछ गुजरता होगा !!

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29 अक्तूबर 26


सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

 


मिलावटखोरों से लोगों को बचाने के लिए कड़े उपाय जरूरी

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार सहित पूरे देश में मिलावटखोरी की विकराल समस्या के समक्ष सरकारी उपाय बौने साबित हो रहे हैं।

अनेक लोग इस समस्या पर चिंता प्रकट करते रहे हंै।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का ध्यान अभी नशीले पदार्थों के सौदागरों के खिलाफ अधिक है।वह भी एक बहुत जरूरी काम है।पर,उसके बाद खाद्य,भोज्य पदार्थों तथा दवाओं में मिलावट की समस्या की ओर गृह मंत्री का ध्यान जाना चाहिए।

 महात्मा गांधी खाद्य पदार्थों में मिलावट को समाज के विरुद्ध एक खतरनाक कृत्य मानते थे।दोषियों के खिलाफ वे कड़ी कार्रवाई के पक्षधर थे।

पर,अब तो समय के साथ मिलावट की समस्या बहुत अधिक बढ ़गई  है।लोक स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ रहा है।

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अपराध घातक ,सजा काफी कम

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संसद में पेश की गई रपट के अनुसार, सन 2025-26 में बिहार में खाद्य मिलावट खोरी के मामले में किसी को सजा नहीं हुई।

राष्ट्रीय स्तर पर भी पिछले तीन वर्षों में सिर्फ 3614 मामलों में मिलावटखारों के दोष साबित हो सके और उन्हें सजा दी गई।

पर,सजा भी सबक सिखाने लायक नहीं।क्योंकि कानून में कम ही सजा का प्रावधान किया गया है।अधिकतर मामलों में आर्थिक दंड का प्रावधान है। 

  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सन 2011 में कहा था कि मिलावटखोरों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का इस्तेमाल किया जा सकता है।

यह अच्छी बात है कि हाल के महीनों में बिहार सरकार ने मिलावटखारों के खिलाफ कार्रवाइयां तेज की हैं।नमूने एकत्र किये जा रहे हैं।

उम्मीद की जाती है कि नमूने प्रयोग शाला जाने के रास्ते में बदल न जाएं।यह भी देखना होगा कि दोषियों को सबक सिखाने लायक सजा दिलवाई जाती है या नहीं।अन्यथा, आगे भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।   

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उम्मीदवारों की संपत्ति का व्योरा

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यदि कोई चुनाव उम्मीदवार अपने शपथ पत्र के साथ गलत जानकारी दे तो उस पर कोई आम नागरिक भी अब मुकदमा दायर कर सकता है।पहले यह प्रावधान नहीं था।

यह महत्वपूर्ण फैसला सुप्रीम कोर्ट का है जो हाल ही में आया है।

हां,फैसले में यह भी कहा गया है कि किसी चुने हुए उम्मीदवार के खिलाफ यदि व्यक्ति कोई झूठा केस करता है,तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी।

  ध्यान रहे कि संसद या विधान मंडल की सदस्यता के लिए चुनाव के सिलसिले में उम्मीदवारों को नामांकन पत्र के साथ तीन तरह के विवरण भी देने होते हैं।संपत्ति का व्योरा,शैक्षणिक योग्यता और  मुकदमे हांे तो उनका विवरण।

  कई बार यह शिकायत आती है कि कुछ उम्मीदवार जानबूझ कर गलत जानकारियां देते हैं।या अपूर्ण जानकारियां देते हैं।

 सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय के बाद शायद अब फर्क आए।

पर,एक खास तरह की मांग पर भी संबंधित पक्षों का गौर करना चाहिए।उम्मीदवार संपत्ति का व्योरा तो दे देते हैं ।पर अपनी आय का स्त्रोत नहीं बताते। अभी वह बताने की कोई कानूनी मजबूरी भी नहीं है।

क्या सुप्रीम कोर्ट खुद इस संबंध में अपनी ओर से पहल करके संपत्ति का स्त्रोत भी बताने के लिए उम्मीदवारों को 

मजबूर करेगा ?यदि करे तो राजनीति में स्वच्छता लाने में सुविधा होगी। 

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भूली-बिसरी यादें

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राजेंद्र माथुर अंग्रेजी के प्राध्यापक थे।किंतु वे हिन्दी पत्रकारिता में आए।प्रभाष जोशी पहले इंडियन एक्सप्रेस के स्थानीय संपादक थे।उन्हें हिन्दी पत्रकारिता में आने के लिए राजेंद्र माथुर ने ही प्रेरित किया।एक मशहूर अंग्रेजी पत्रिका ‘वीकली ’के चर्चित संपादक रहे प्रीतिश नंदी ने सन 1986 में लिखा--‘‘काश ! मुझे हिन्दी आती।’’

 उन्होंने लिखा कि हर बार मैंने हिंदी की शक्ति को महसूस किया।हिंदी पट्टी के नेताओं में हर कोई एक अद्भुत व्यक्तित्व है

और सबकी प्रतिभाएं अनूठी है।यह अलग बात है कि मेरी पीढ़ी के 

दंभी पत्रकारों ने इन प्रतिभाओं को या तो अनदेखा छोड़ दिया

या सिर्फ  उनका मजाक ही उड़ाया।जब भी मैं अपना टेप रिकार्डर लेकर हिंदी क्षेत्र की राजनीति के रहस्यों को समझने के लिए निकला हूं,हर बार मैंने हिंदी की शक्ति को महसूस किया है।

इन राजनेताओं की बारीकियों को समझने का जितना अधिक मुझे मौका मिला, उतना ही मैंेने अपने भगवान को कोसा है कि क्यों न उसने अड़तीस साल पहले मेरा जन्म स्थान कुछ मील पश्चिम,उत्तर या दक्षिण की ओर तय किया ! 

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और अंत मेें

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सोनपुर-छपरा नेशनल हाईवे पर बीच-बीच में गांवों और बाजारों के नामों के साइनबोर्ड लगे हुए हैं।साइन बोर्ड तो अच्छे हैं,किंतु उनमें से कुछ स्थानों के नाम गलत लिखे गये हैं।उन गलतियों से राज्य की छवि अच्छी नहीं बनती।

एक जगह डुमरी बुजुर्ग अंग्रेजी में तो ठीक लिखा गया है,पर हिन्दी में है--‘‘डुमारी बुजुर्ग।’’

 उसी तरह अंग्रेजी में शीतलपुर तो सही है,किंतु हिन्दी में लिखा गया है--सीतलपुर जो गलत है।

स्थान के नाम के साइन बोर्ड लिखे जाने से पहले स्थानीय लोगों से उनके सही -सही नाम पूछ लिये जाने चाहिए। 

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(23 अक्तूबर 2026 के दैनिक प्रभात खबर,पटना में प्रकाशित मेरे अनियतकालीन काॅलम यदाकदा से)  




 मेरी दूसरी पुस्तक ‘‘सियासत के अनकहे किस्से’’

 भी आज से बाजार में

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पहली पुस्तक ‘‘सियासत की दास्तान’’ इसी साल 

के प्रारंभ में छप कर आई थी

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सुरेंद्र किशोर

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आज ही के शुभ दिन पर मुझे सूचना मिली कि मेरी दूसरी पुस्तक ‘‘सियासत के अनकहे’’ किस्से छप कर पटना पहुंच चुकी है।

मेरी पहली पुस्तक ‘‘सियासत की दास्तान’’ इस साल के प्रारंभ में बाजार मे आई थी।

  अमेजन आदि पर मेरी ये दोनों पुस्तकें बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।

साथ ही, मैं प्रभात प्रकाशन के पटना केंद्र का पता यहां दे रहा हूं।हालांकि प्रभात प्रकाशन की पुस्तकों के लिए पटना में अन्य कई बिक्री केंद्र भी उपलब्ध हैं।   

मुख्य वितरण केंद्र

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प्रभात प्रकाशन,

जी-15, ग्रैंड प्लाजा,

डाक बंगला चैराहा,पटना के निकट


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अन्य बिक्री केंद्रों में शामिल हैं--

पटना सेंट्रल माॅल और

बी.एम.दास रोड, पटना

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20 अक्तूबर 26


 पेंशन को लेकर टेंशन जारी !

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कुछ राज्यों में तो मिल रहे,किंतु देश की राजधानी 

के माननीय रिटायर पत्रकार और सम्मानित पद्मश्री 

अवार्डी सम्मान पेंशन से अब तक वंचित हैं

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सुरेंद्र किशोर

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मिल रही पेंशन राशि को लेकर विभिन्न राज्योें के बीच 

मासिक राशि में एकरुपता क्यों नहीं ?

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कल मुझे दिल्ली के एक रिटायर व सम्मानित पत्रकार से यह जान कर आश्चर्य हुआ कि वहां से रिटायर पत्रकारों को न तो दिल्ली सरकार पेंशन देती है और न ही केंद्र सरकार।

दिल्ली के पद्मश्री अवार्डीज भी पेंशन से वंंिचत हैं।

दिल्ली के साधन-सपन्न और चिकने-चुपड़े दिख रहे पत्रकारों को देख कर संभवतः सरकारें समझती हैं कि इस जमात को  पेंशन की जरूरत नहीं।उनके जीवन में दस-बीस हजार रुपए से कोई फर्क नहीं पड़ता।कुछ थोड़े से लोगों के लिए भले यह बात सही हो।

पर, यह अर्ध सत्य ही है।सबके लिए यह सही नहीं है।

जितने पत्रकार -संवाददाता आदि के रूप में रोज-ब-रोज नेताओं के आसपास दिखाई पड़ते हैं,उनसे कई गुना अधिक पत्रकार -गैर पत्रकार कर्मी नींव की ईंट बन कर दिन -रात अपने -अपने मीडिया संस्थान के कार्यालयों और स्टूडियोज में सेवा करते रहते है।

  हर जगह अन्य अनेक पेशों की तरह मीडिया में भी कई ‘‘हथ-लपक’’ लोग मौजूद हैं।उन्हें कोई आर्थिक कष्ट नहीं है। पर मीडिया में तो सबसे अधिक संख्या में वैसे लोग हैं,जिनकी कोई ऊपरी आय नहीं है। पारिवारिक जिम्मेदारी उठाने के बाद उनके पास रिटायर होते -होते बुढापे के लिए कुछ नहीं बचता।

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यह अमानवीय है कि उनके लिए न तो कभी केंद्र सरकार ने सोचा और न ही दिल्ली सरकार ने।

अब तो सोचो भाई ! सिर्फ सांसद क्षेत्रीय विकास फंड को पांच करोड़ से बढ़ाकर चैगुना कर देने से देश का काम नहीं चलने वाला।

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इस बीच यह खबर आई है कि 19 नवंबर 2026 को कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के सेंट्रल बोर्ड आॅफ ट्रस्टीज की बैठक होने वाली है।

पेंशनर्स संगठन की मांग है कि न्यूनत्तम मासिक 1000 रुपए ईपीएफ पेंशन को बढ़ाकर 7500 रुपए कर दिया जाए।

यदि ऐसा हो गया तो उससे मीडिया से रिटायर पत्रकारों -गैर पत्रकारों को भी लाभ होगा।

क्योंकि मीडिया संस्थान के कर्मचारी गण को ईपीएफ पेंशन राशि मिलती है जो अत्यल्प है।

दुनिया में इतनी कम पेंशन राशि कहीं नहीं है।इसकी राशि कम होने के कारण इसे गिनीज बुक आॅफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में शामिल करने के लिए भेजा जा सकता है।

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25 अक्तूबर 26



   


 


गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

 इस देश के कुछ न्यूज चैनल्स अपने कार्यक्रमों में 

यदि शालीनता बरतेंगे तो उनकी ही प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

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(सारे चैनल्स एक जैसे नहीं हैं।)

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सुरेंद्र किशोर

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इस देश के कुछ न्यूज चैनल्स के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि वे अपने डिबेट शो आदि में शालीनता बरतें।

(याद रहे कि मीडिया का मूल काम सूचना देना,शिक्षित करना और मनोरंजन करना है।पर लगता है कि कुछ चैनल्स सस्ता मनोरंजन ही अधिक कर रहे हैं।)

यानी,ऐंकर कम चिल्लाएं और अपने ‘भाषण’ की अवधि कम कर दें।

एक साथ दो गेस्ट को बोलने देना और दोनों के चित्रों के बीच बनाम लगा देने का क्या मतलब है ?

मतलब है कि चैनल्स समझता है कि मुर्गा या कुत्ता लडव़ाना उनके लिए फायदामंद है।पर, ऐसा नहीं है।

मुंहफट, उदंड और कुसंस्कारी गेस्ट्स के फेडर समय -समय पर डाउन करते रहिए। क्योंकि ऐसे लोगों के कुबोल से नई पीढ़ी को गलत दिशा मिलती है।

उधर टी.वी.चैनलों की साख नहीं बढत़ी।

क्या राजनीतिक दलों में शालीन व गैर-गालीबाज वक्ताओं का अकाल हो गया है ?

 या ‘‘तमीज रहित’’ लोगों को डिबेट शो में बुलाकर चैनल्स समझते हैं कि लोग उन्हें शाबासी देते होंगे ?!यदि ऐसा समझते हो तो सर्वे करा लो।

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खबरें पढ़ने वालों और वालियों की बोलने की गति सामान्य कर दें तो सारी खबरें लोगों को समझ में आती रहेंगी।अभी तो सीमित समय में यदि सौ-सौ खबरें पढ़नी हैं तो गति बुलेट ट्रेन जैसी ही होगी।एक शब्द दूसरे शब्द पर सवार होता जाएगा।दर्शकों के पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा। 

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कल एक टी.वी.चैनल पर एक गेस्ट बोल रहे थे कि ‘‘मैं एस.डी.एम.,डी.एम.और यहां तक कि एस.पी को भी पीट चुका हूं।’’

क्या ऐसे गेस्ट को बुला कर चैनल जाने-अनजाने देश में हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं ? हिंसा का अभी माहौल है भी।यानी आग में घी डालना इसे ही कहते हैं।

इस पर शासन को भी ध्यान देना चाहिए।

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सुरेंद्र किशोर

19 अक्तूबर 26