शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

    कृतज्ञता एक विरल गुण

   .........................................

कई दशक पहले की बात है।

यह कहानी सच्ची है।

एक लोक सभा सदस्य ने अपने चुनाव क्षेत्र

के एक बड़े गांव के एक दबंग परिवार के चार 

बेरोजगारों को 

बारी -बारी से नौकरी दिलवा दी।

  पर,सांसद महोदय उस परिवार के पांचवें सदस्य 

को नौकरी नहीं दिलवा सके।

हालांकि कोशिश में लगे हुए थे। 

इस बीच चुनाव आ गया।

कोशिश में देरी के कारण तब तक वह दबंग परिवार सांसद महोदय पर सख्त नाराज हो चुका था।

नतीतजन नाराजगी में उस दबंग परिवार ने सासंद के खिलाफ ऐसा चुनाव अभियान चलाया कि थोड़े मतों से सांसद महोदय हार गए।

...........................................

यह बात अन्य क्षेत्रों में भी कमोवेश लागू होती है।

अत्यंत थोड़े से अपवादों की बात और है। 

यानी,कृतज्ञता आज उसी तरह एक विरल गुण है जिस तरह आर्थिक मामलों में ईमानदारी का गुण।

.......................................

--सुरेंद्र किशोर-

  24-2 -2021 


शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

 


रोहिणी आयोग की सिफारिश के लागू होने से ही समरूप लाभ संभव-सुरेंद्र किशोर

....................................

डा.राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि आरक्षण लागू होने के बाद उसका अधिक लाभ मजबूत पिछड़े ही पहले उठाएंगे।

आरक्षण के समर्थक डा.लोहिया को शायद उम्मीद रही होगी कि बाद के वर्षों में कमजोर पिछड़ों को भी आरक्षण का लाभ मिलने लगेगा।

  किंतु उनका अनुमान सही नहीं निकला।

केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए मंडल आरक्षण 1993 में लागू हुआ था।

  पर ढाई दशक के बाद भी जब देश की करीब एक हजार पिछड़ी जातियां केंद्रीय सेवाओं में मंडल आरक्षण के लाभ से वंचित रहीं तो आरक्षण के उप वर्गीकरण की मांग उठी।

उस पर विचार करने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने 2017 में रोहिणी न्यायिक आयोग बनाया।

हाल में आयोग ने यह सिफारिश की है कि 27 प्रतिशत आरक्षण को चार श्रेणियों को बांट दिया जाना चाहिए।

...............................................

   आयोग ने की वंचितों की पहचान 

  ...........................................................

   महीनों के सर्वेक्षण के बाद रोहिणी आयोग ने यह पाया कि 

केंद्रीय सूची में शामिल कुल 2633 पिछड़ी जातियों में से करीब एक हजार जातियों के उम्मीदवारों को मंडल आरक्षण का अब तक कोई लाभ मिला ही नहीं।

  इसलिए रोहिणी आयोग ने केंद्र सरकार से सिफारिश की है कि केंद्र सरकार की सूची में शामिल 2633 में से 97 अपेक्षाकृत सपन्न पिछड़ी जातियों के लिए 27 में से 10 प्रतिशत आरक्षण तय कर दिया  जाए।

  बाकी 17 प्रतिशत आरक्षण को तीन हिस्सों में बांट कर विभिन्न पिछड़ी जातियों को मंडल आरक्षण का लाभ दिया जाए।

यदि केंद्र सरकार ने आयोग की रपट को स्वीकार कर लिया तो पिछड़ों में से अति पिछड़ों व पूर्णतः वंचित पिछड़ों को भी मंडल आरक्षण का समुचित लाभ मिलने लगेगा।

  इस सिफारिश का बड़ा सामाजिक व राजनीतिक महत्व है।      ...........................................

    आरक्षण का औचित्य बरकरार

   .......................................

जो लोग सरकारी नौकरियों में पिछड़ों 

के प्रतिनिधित्व के आंकड़े पर गौर नहीं करते,वही लोग समय -समय पर आरक्षण को समाप्त या पुनर्विचार करने की मांग करते रहते हैं।

इस मांग की प्रतिक्रिया होती है।उससे पिछड़ों के बीच के अतिवादी राजनीतिक तत्वों को एक बार फिर मजबूती मिल जाती है।

1990 में मंडल आरक्षण का विरोध करके उसी तरह की ताकत 

जाने-अनजाने पहुंचाई गई थी।

 मंडल आरक्षण से पहले केंद्र सरकार के विभागों में पिछड़ों का कितना प्रतिनिधित्व था,उसका एक नमूना यहां पेश है।

 1990 में भारत सरकार के आठ विभागों में पिछड़ी जाति का एक भी क्लास वन अफसर नहीं था।

अन्य नौ विभागों में से प्रत्येक में क्लास वन अफसरों की संख्या एक से पांच तक ही थी।

 लोकतंत्र में समुचित प्रतिनिधित्व की उम्मीद तो हर वर्ग के लोग करते ही हैं।

 हां,एक बात और !

 1990 में आरक्षण विरोधियों को उनके आरक्षण विरोधी आंदोलन के कारण उन्हें लाभ के बदले नुकसान ही हुआ था।यानी, ऐसे लोग सत्ता में मजबूत हो गए जो विकास के बदले सामाजिक समीकरण में विश्वास रखते थे।

उसी तरह यदि मजबूत पिछड़ी जातियां रोहिणी आयोग की रपट का विरोध करेंगी तो उन्हें भी उसका उसी तरह नुकसान हो सकता है।

  वैसे इस संदर्भ में एक बात खास तौर पर प्रासंगिक है।

करीब दो साल पहले एक आंकड़ा प्रकाश में आया था।वह यह कि केंद्रीय सेवाओं में मंडल आरक्षण के तहत मिल रहे  आरक्षण का प्रतिशत औसतन 15 ही है।

यानी, 27 प्रतिशत में से औसतन 12 प्रतिशत सीटें अब भी नहीं भर पा रही हैं।

1993 के बाद अनेक मंडल मसीहा केंद्र सरकार में रहे।आश्चर्य है कि उन सीटों को भरने का उपाय उन्होंने नहीं किया।  

..................................

तमिलनाडु से सीखो

....................................

एक समय था जब दक्षिण भारत के एक हिस्से में द्रविड पृथकतावादी आंदोलन चल रहा था।

कई कारणों से वह अधिक दिनों तक नहीं चल सका।

कहते हैं कि भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बाद वह आंदोलन ढीला पड़ गया।

किंतु इसके साथ एक और कारण रहा।

1962 में जब चीन ने भारत पर चढ़ाई करके हमारे बहुत बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया तो द्रविड पृथकतावादी के एक हिस्से की भावना बदली।

उसने सोचा कि रक्षा के लिए एक बड़े देश के रूप में हमें एकजुट बने रहना चाहिए।इस देश के एक दिन मजबूत हो जाने की गुंजाइश रहेगी। याद रहे कि चीनी सैनिक जब असम के कुछ हिस्से में  घुस गए तो तत्कालीन प्रधान मंत्री ने रेडियो पर यह संदेश दिया कि हम असम को बचा नहीं पा रहे हैं,इसका हमें दुख है। 

 खालिस्तान की मांग करने वालों को 1962 से पहले के तमिल

पृथकतावादियों से सीख लेनी चाहिए।

 कल्पना की कीजिए कि पंजाब एक अलग देश बन गया।फिर क्या होगा ?

क्या वह पंजाब अकेले पाकिस्तान के ‘लश्करों’ का मुकाबला कर पाएगा ?

   ...........................................

और अंत मंे

.....................

पटना नगर निगम क्षेत्र में आधुनिक शौचालयों की व्यवस्था की गई है।

इससे आम लोगों ,खासकर महिलाओं की असुविधाएं घटी हैं।

हालांकि जरूरत के अनुपात में अब भी शौचालयों की संख्या कम है।साथ ही,उसे साफ-सुथरा बनाए रखने की समस्या अलग से है।

 पर उसी तरह राज्य की जिला व अनुमंडल अदालतों के परिसरों में भी पर्याप्त संख्या में शौचालयों की स्थापना की सख्त जरूरत है।

  अदालतों में रोज सैकड़ों लोेग आसपास के क्षेत्रों से आते हैं।

पर्याप्त संख्या में स्वच्छ शौचालयों के अभाव में कई लोग रोग्रस्त भी होते हैं।

 यानी शासन शौचालयों पर खर्च नहीं करेगा तो उसे अस्पतालों पर अधिक खर्च करना पड़ेगा। 

....................................

प्रभात खबर,पटना-19 फरवरी 21


 


बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

 


.............................................

विदेशी धन का खतरनाक दखल

.......................................................

    --सुरेंद्र किशोर-

.........................................................

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में जिस नए ढंग 

की एफ.डी.आइ.के खतरे की ओर इशारा किया,

उसके पीछे विदेशी धन की ताकत है।

.............................................

   पिछले दिनों प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एफडीआइ

की एक नई परिभाषा दी।

 उन्होंने कहा कि एफडीआइ यानी फाॅरेन डिस्ट्रक्टिव आइडियोलाॅजी।

देखा जाए तो देश में इसकी नींव सन 1967 में ही पड़ गई थी।

तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री यशवंत राव चव्हाण ने तब लोक सभा में कहा था कि 

‘‘जिन दलों और नेताओं को विदेशों से धन मिले हैं,उनके नाम जाहिर नहीं किए जा सकते,क्योंकि उससे उनके हितों को नुकसान पहुंचेगा।’’

 उनके बयान के बाद विदेश से मिले नाजायज धन को लेकर इस देश के अनेक नेताओं ,संगठनों और दलों की झिझक समाप्त हो गई।

    उसके दुष्परिणाम आज तक नजर आ रहे हैं।

  याद रहे कि तब धन पाने वालों में कांग्रेस सहित कई प्रमुख दल शामिल थे।

समय बीतने के साथ इस देश की राजनीति एवं अन्य क्षेत्रों में विदेशी पैसों का दखल बढ़ता चला गया।

पहले विदेशी धन का उद्देश्य सीमित था।

अब न सिर्फ व्यापक हो गया,बल्कि खतरनाक भी बन गया है।

पहले विचारों को प्रभावित करने के लिए और लोगों को अपनी ओर मोड़ने के लिए विदेशी तत्वों ने भारत में पैसे झोंके।

पर अब तो देश को तहत -नहस करने ,अशांति फैलाने और अततः देश को तोड़ने की कोशिश में विदेशी पैसों का इस्तेमाल हो रहा है।

 यह देश के खिलाफ अघोषित युद्ध जैसा है।

इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए तदनुसार सख्त कानून बनाने की ओर अभी केंद्र सरकार का ध्यान नहीं है।

नतीजतन हमारी अदालतें भी इस नई एफडीआइ के वाहकों के खिलाफ वांछित सख्ती नहीं बरत पा रही हैं।

   हालांकि सन 2014 के बाद एनजीओ के बहाने गलत उद्देश्यों की पूत्र्ति के लिए आने वाले धन पर काफी हद तक रोक लगी है।

पर हवाला चैनलों पर प्रभावकारी रोक लगना अब भी बाकी है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस नए ढंग की एफडीआइ के खतरे की ओर इशारा किया है ,उसके पीछे विदेशी धन की ताकत है।

 अब यह बात छिपी हुई नहीं है कि कुछ देसी-विदेशी शक्तियों का घोषित और अघोषित उद्देश्य इस देश को तोड़ना है।

काश ! सन 1967 में ही इस स्त्रोत पर प्रभावी रोक लगा दी गई होती तो आज स्थिति इतनी नहीं बिगड़ती।

 चिंताजनक बात यह है कि बाद के वर्षों में भी विदेशी धन की आवक पर कारगर रोक नहीं लग सकी।

    अब जरा हम सन 1967 में चलें।

तब आम चुनाव के बाद देश के नौ राज्यों से (सात राज्यों से आम चुनाव के जरिए और दो से दल बदल के जरिए)कांग्रेस सत्ताच्युत हो गई।

लोक सभा में भी कांग्रेस का बहुमत घट गया।

इस हार से चिंतित तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने अनुमान लगाया कि शायद विदेशी पैसों ने चुनाव नतीजे पर असर डाला है।

(तब इंदिरा जी को लगा था कि विदेशी पैसों का चुनाव में इस्तेमाल सिर्फ गैर कांग्रेसी दलों ने कांग्रेस के खिलाफ किया।)

   इंदिरा जी ने (विदेश से मिले)चुनावी चंदे के बारे में खुफिया एजेंसी से जांच कराई।

उसकी रपट के अनुसार तब कांग्रेस सहित कई प्रमुख दलों ने (सिर्फ एक दल अपवाद था)चुनाव लड़ने के लिए किसी न किसी देश से धन लिया था।

(जब खुफिया रपट में सरकार ने कांग्रेस का भी नाम देखा तो उस रपट को दबा दिया गया।

 किंतु ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने उसे छाप दिया।

उस अमरीकी अखबार की खबर इस देश में फैल गई।) 

   लोक सभा में यह मांग की गई कि सरकार उन दलों व व्यक्तियों के नाम बताए।(दिलचस्प बात यह रही कि उन दलों के नेता भी मांग कर रहे थे जिन दलों ने पैसे लिए थे।)

पर चव्हाण ने वह मांग नहीं मानी।

 तब दुनिया में शीत युद्ध का दौर था।

भारत सहित अनेक देशों में अमरीका और सोवियत संघ अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाने की कोशिश में लगे हुए थे।

इसके लिए वे पैसे खर्च कर रहे थे।

कम्युनिस्ट देश भारत में भी कम्युनिस्टों पर निर्भर सरकार चाहते थे।

 दूसरी ओर, अमेरिका ऐसी किसी कोशिश को विफल कर देना चाहता था।

यानी, यहां के.जी.बी.और सी.आइ.ए.दोनों सक्रिय थे।

  देश में ‘सोवियत सक्रियता’ का ठोस सबूत तब मिला जब  वहां की खुफिया एजेंसी के.जी.बी.की भारत में गतिविधियों पर लिखित पुस्तक ‘द मित्रोखिन अर्काइव-दो’ सन 2005 में सामने आई।

इसके अनुसार के.जी.बी.ने भारत में विचारधारा के प्रचार और सरकारी नीतियों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए पैसे बांटे थे।

 बाद में जैन हवाला कांड ने तो विदेशी धन के आगमन को और भी आसान बना दिया।

 पुलिस ने 25 मार्च, 1991 को श्रीनगर में अशफाक हुसैन लोन को गिरफ्तार किया।

वह हिजबुल मुजाहिद्दीन का सदस्य था।

उसके पास से 16 लाख रुपए बरामद किए गए।

वे रुपए कश्मीर में आतंकवादियों को बांटे जाने थे।

उससे पूछताछ के आधार पर पुलिस ने जे.एन.यू. के एक शोध छात्र शहाबुद्दीन गौरी को गिरफ्तार किया।

उससे मिली जानकारी के आधार पर सी.बी.आई.ने हवाला व्यापारी जैन बंधुओं के यहां छापा मारा।

उसमें भारी रकम के अलावा एक डायरी भी मिली।

छानबीन से पता चला कि उन्होंने देश के 115 बड़े नेताओं (पैसे पाने वालों में कोई कम्युनिस्ट नेता शामिल नहीं था)

और अफसरों को कुल 64 करोड़ रुपए दिए थे।

 तब के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के अनुसार चुनाव फंड में पारदर्शिता न होने के कारण हवाला कांड जैसे कांड होते हैं।

पर सवाल यह भी उठा कि क्या कोई व्यक्ति आपको पैसे देने आएगा तो बिना उसका कुल-गोत्र जाने उससे आप पैसे ले लेंगे ?

उसका असल परिचय जानने की कोशिश भी नहीं करेंगे ?

यदि तब सही से जांच हो जाती तो और कुछ बड़ी हस्तियों को जेल की हवा खानी पड़ती तो आज नई एफडीआइ की चर्चा नहीं हो रही होती।

(एक बड़े नेता ने हवाला व्यापारी से तब 60 लाख रुपए लिए थे।

30 लाख अपने दल को और 30 लाख अपने दामाद को दे दिए।) 

   माना जाता है कि राजनीतिक हित सध जाने के बाद हवाला कांड में लीपापोती करा दी गई।

  यह लीपापोती ऐसे कांड में हुई जिसमें आतंकवाद का तत्व भी जुड़ा हुआ था।

साफ है कि हवाला कारोबारियों पर शुरू से ही कड़ी नजर रखी गई होती तो आज इस देश के टुकड़े -टुकड़े गिरोह को विदेशी पैसे मिलने में दिक्कत आती।

 हालांकि आतंकवाद के प्रति मौजूदा शासकों का रवैया हाल के वर्षों में काफी बदला जरूर है। (नरेंद्र मोदी के लिए जन समर्थन बढ़ने का यह एक बड़ा कारण है।)पर,अभी बहुत कुछ करना बाकी है।

  आज कृषि कानून विरोधी आंदोलन के बहाने जो कुछ लोग राज सत्ता को चुनौती दे रहे हैं,उनमें से कतिपय के विदेशी कनेक्शन हैं।

कुछ ‘आंदोलनजीवियों’ के तो विदेशी कनेक्शन हैं ही।

कैसे कोई एक ही व्यक्ति जो कभी जेएनयू में आतंकी अफजल गुरु की बरखी मनाने वालों के साथ होता था,वही कृषि कानून विरोधी आंदोलन के साथ दिखता है।

वही शख्स शाहीन बाग में भी भीड़ को बौद्धिक खुराक देता नजर आता था।

  तोड़फोड़ एवं देशद्रोही नारे लगाने वाले तत्व बारी -बारी से तीनों जगह पाए गए हैं।

  इससे पता चलता है कि आज हमारे देश के सामने कितने बड़े -बड़े खतरे मौजूद हैं।

उनसे हमें मुकाबला करना ही होगा।

इसके लिए यह जरूरी है कि हमारा देश आर्थिक रूप से काफी मजबूत हो जाए।

.............................

17 फरवरी 21

...........................

 (कोष्ठक में लिखी गई बातें दैनिक जागरण में इस लेख के छपने के बाद जोड़ी गई है ताकि बातें और स्पष्ट हो सकें।)

 

  

 



  

      



 रोहिणी न्यायिक आयोग

...............................

27 प्रतिशत मंडल आरक्षण को चार 

हिस्सों में बांट देने की सिफारिश

................................

मजबूत पिछड़ों को 27 में से 10 प्रतिशत मिलेगा

................................

जे.ए.यू.राष्ट्रद्रोह मुकदमे की सुनवाई 15 मार्च से शुरू होगी

..........................................

     --सुरेंद्र किशोर-

..................................... 

रोहिणी न्यायिक आयोग ने मंडल आरक्षण के तहत निर्धारित 

27 प्रतिशत आरक्षण को चार भागों में बांट देने की 

सिफारिश केंद्र सरकार से की है।

   यदि सिफारिश मान ली गई तो केंद्र की सूची में शामिल 97 मजबूत पिछड़ी जातियों को 27 में 10 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा।

  1674 जातियों को दो प्रतिशत, 534 जातियों को 6 प्रतिशत और 328 जातियों को 9 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा।

  वर्षों से यह एक संवदनशील मामला रहा है।

आरोप लगता रहा है कि आरक्षण का अधिक लाभ मजबूत पिछड़ी जातियों को ही मिलता रहा है।

रोहिणी आयोग ने भी पाया कि कुल 2633 पिछड़ी जातियों में से करीब 1000 जातियों को तो आज तक आरक्षण को कोई लाभ मिला ही नहीं।

  याद रहे कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2017 में रोहिणी आयोग बनाई थी।

.....................................

दूसरी खबर

................

जेन.एन.यू.राष्ट्रद्रोह केस की सनवाई,जिसमें कन्हैया कुमार तथा अन्य नौ आरोपित हैं, 15 मार्च 21 से दिल्ली कोर्ट में 

शुरू हो जाएगी।

  उन पर आरोप है कि इन्होंने 2016 में जे.एन.यू. में अफजल गुरू की बरखी मनाई और इस देश को 

 टुकड़े -टुकड़े करने के पक्ष में नारे लगाए।

मामले की सुनवाई देर से शुरू हो रही है।

क्योंकि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने मुकदमा चलाने की अनुमति देने में काफी देर कर दी।

पहले तो राजनीतिक कारणों से अनुमति देने से ही इनकार कर दिया था,किंतु सबूतों की गंभीरता देखर केजरीवाल सरकार को अनुमति देनी पड़ी।

 .............................

इन दोनों खबरों का खास राजनीतिक महत्व है।

.............................

16 फरवरी 21

  

   


मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

 


  जन प्रतिनिधियों को चाहिए कि वे सम्मान ‘कमांड’ करें न कि डिमांड -सुरेंद्र किशोर 

    ....................................................

बिहार विधान सभा शताब्दी वर्ष समारोह में कुछ नेताओं ने  कहा कि 

‘‘सरकारी अफसर विधायकों से मिलने के समय खड़े भी नहीं होते।

प्रोटोकल व शिष्टाचार का पालन नहीं हो रहा है।’’

  विधायकों की यह शिकायत सही है।यह शिकायत आम है।

पर, सवाल है कि ऐसा अब होता क्यों है ?

कुछ दशक पहले तक तो ऐसी शिकायत इक्की-दुक्की ही थी।

इसके लिए क्या सिर्फ अफसर जिम्मेदार हैं ?

  कुछ कारण तो समझ में आता है।

बाकी के बारे में खुद विधायकों को आत्म चिंतन करना होगा।

आजादी के तत्काल बाद के वर्षों में आम तौर पर राजनीति ‘सेवा’ थी।

  दूसरी ओर, सरकारी सेवक आम तौर पर ‘नौकरी’ करते थे।

दोनों के बीच तब भी अपवाद थे और आज भी हैं।

  समय बीतने के साथ आम तौर पर राजनीति भी ‘नौकरी’ की तरह होती गई।

  अब तो पेंशन का भी प्रावधान है।

संविधान निर्माताओं ने तो पेंशन के बारे में सोचा भी नहीं था।

 फिर तो दोनों यानी नेता व अफसर बराबरी के स्थान पर आ गए।

विधायक -सांसद फंड ने राजनीति की गरिमा को  और  भी घटा दिया।

 विधायक -सांसद फंड में जारी घोटालों के खिलाफ खुद सांसदों-विधायकों को उठ खड़ा होना होगा।

एक बार फिर बता दूं कि अब भी राजनीति में सेवाभाव वाले लोग मौजूद हैं।

पर, बहुत थोड़े।

  इस गरिमा की वापसी कैसे होगी ?

उस पर सेवाभाव वाले नेतागण गंभीर विचार करें ।

उपाय कीजिए।

उस काम में सफल होइए।

फिर आप आदर-सम्मान ‘कमांड’ करेंगे।

आपको देखते लोगों के मन में आदर का भाव उमड़ आएगा।

आपको ‘डिमांड’ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

इस दिशा में एक ठोस  कदम पर विचार करें।

बेहतर तो यह होगा कि खुद सांसद और विधायकगण क्रमशः सांसद और विधायक फंड की समाप्ति की मांग करें यदि घोटाला -कमीशनखोरी न रोक पाते  हांे तो।

  अपवादों को छोड़कर  आज देश में सांसद व विधायक फंडों के खर्चे के सिलसिले में क्या-क्या हो रहा है,यह किसी से छिपा हुआ है ?   

  जन प्रतिनिधि गण मिलने पर अफसरों को खड़ा होने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

क्योंकि वैसा नियम है।

पर, इसके बदले अपना व्यक्तित्व ऐसा बनाइए ताकि अफसर का दिल कहे कि आपको देखते ही उसे खड़ा हो जाना चाहिए। 

 कल्पना कीजिए कि कर्पूरी ठाकुर किसी अफसर के आॅफिस में जाते तो क्या अफसर उठकर खड़ा नहीं हो जाता ?

आप कहेंगे कि सब लोग कर्पूरी ठाकुर नहीं बन सकते।

पर,बनने की कोशिश तो कीजिए।

...............................

    विरोध,विरोध और सिर्फ 

     अतार्किक विरोध !

   .............................................

प्रधान मंत्री  नरेंद्र मोदी ने कहा है कि नए कृषि कानून किसी के लिए बंधन नहीं,बल्कि विकल्प हैं।

इसलिए इसके विरोध का कोई कारण नहीं है।

उन्होंने ठीक ही कहा है।

किंतु जो प्रतिपक्ष सी.ए.ए.के विरोध में हुई भीषण हिंसा करने वालों का भी समर्थन कर सकता है, उससे विवेकपूर्ण राजनीति की उम्मीद करना ही फिजूल है।

याद रहे कि सी.ए.ए.के जरिए इस देश के बाहर से यहां आए लोगों को नागरिकता देनी है।

यहां के किसी वैध नागरिक की नागरिकता पर उस कानून का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ने वाला है।

  फिर भी सी.ए.ए.के खिलाफ कुछ महीना पहले इस देश में भीषण दंगे कराए गए।

  उसी तरह एन.आर.सी.से भी इस देश के असली नागरिकों को कोई नुकसान नहीं पहुंचने वाला है।

फिर भी कुछ खास लोग एन.आर.सी.के खिलाफ खड्गहस्त हैं।

  जबकि चीन और पाकिस्तान सहित हर सार्वभौम देश में नागरिकों का रजिस्टर रखा जाता है।

पर,हमारे यहां के जो लोग इस देश को देश नहीं,बल्कि धर्मशाला मानते हैं,वे सी.ए.ए.और एन.आर.सी.का विरोध करते हैं।

  ऐसे लोगों को क्या किया जाए ?

आम लोगों को सोचना है।

..................................

छोटी नदियों पर चेक डैम 

...................................

बिहार की छोटी नदियों पर चेक डैम बनाने की जरूरत बताई जाती रही है।

पर पता नहीं,इसका क्रियान्वयन क्यों नहीं हो पाता।

खबर है कि इस संबंध में कई महीने पहले एक सामाजिक कार्यकत्र्ता ने मुख्य मंत्री नीतीश कुमार को चिट्ठी लिखी थी।

मुख्य मंत्री ने उस चिट्ठी को अपने निदेश के साथ संबंधित विभाग को भेज भी दिया।

पर,बात अभी आगे नहीं बढ़ी है।

  जानकार लोग बताते हैं कि यदि छोटी-छोटी नदियों पर

कुछ -कुछ दूरी पर चेक डैम बन जाएं तो रुके हुए पानी से सिंचाई का प्रबंध हो पाएगा।

इससे भूजल स्तर के गिरने की समस्या कम होगी।

 उस पानी को साफ करके  पीने के काम में भी इस्तेमाल हो सकता है।

यदि राज्य में उद्योग-धंधे बढं़े तो उनमें इस्तेमाल करने के लिए भी  जल की कमी नहीं रहेगी।   

.............................

  और अंत में

.........................

जयप्रकाश नारायण अपने जीवन के प्रारंभिक वर्षों में माक्र्सवादी थे।

बाद के वर्षों में ‘लोकतांत्रिक समाजवादी’ बने।

उसके बाद सर्वोदयी हुए।

अंत में कांग्रेस सरकार के विरोध में जारी आंदोलन का सफल नेतृत्व किया।

डा.राम मनोहर लोहिया कभी कम्युनिस्टों के खिलाफ थे।

किंतु साठ के दशक में उन्होंने जनसंघ के साथ-साथ कम्युनिस्टों से भी राजनीतिक तालमेल किया।

 यानी इन नेताओं ने देश,काल और पात्र के भले को ध्यान में रखते हुए अपना राजनीतिक व वैचारिक रुख-रवैया तय किया।

उन बदलाव में जेपी-लोहिया का खुद का कोई निजी स्वार्थ नहीं था।

वे कभी सत्ता के पीछे नहीं दोड़े।

एक  सवाल आज खास तौर पर जेपी व लोहिया के अनुयायियों से है।

कल्पना कीजिए कि आज जेपी और लोहिया हमलोगों के बीच होते तो आज की स्थिति में उनकी कैसी राजनीतिक भूमिका होती ? 

.......................................

प्रभात खबर,पटना ,12 फरवरी 21


 सुरेंद्र किशोर के फेसबुक वाॅल से

.............................................

सुषमा स्वराज के जन्म दिन( 14 फरवरी ) पर

 ............................................................

1977 में हरियाणा सरकार में मंत्री पद का 

कामकाज संभालने 

से पहले सुषमा स्वराज जेपी का 

आशीर्वाद लेने पटना आई थीं

................................

--सुरेंद्र किशोर--

..................................

पटना रेलवे जंक्शन स्टेशन पर सुषमा स्वराज ने मुझे देखते ही कहा था कि ‘‘बड़ौदा डायनामाइट केस के एफ.आई.आर.में कई जगह आपका नाम आया है।’’

   याद रहे कि आपातकाल में उस केस के सिलसिले में मुझे भी सी.बी.आई.बेचैनी से खोज रही थी।

पर, मैं फरार हो गया था।

मैं मेघालय में अपने रिश्तेदार के यहां छिपकर रहता था।

पकड़ा नहीं जा सका।

 पटना जंक्शन पर ही सुषमा जी से मेरी पहली मुलाकात थी।

हालांकि उससे पहले मुजफ्फरपुर में जार्ज के चुनाव प्रचार 

में उनके ओजस्वी व प्रभावशाली भाषण मैंने सुने थे।

 उनके पति स्वराज कौशल मुझे जार्ज के जरिए पहले से जानते थे।

वे भी समाजवादी आंदोलन में जार्ज के साथ थे।

बड़ौदा डायनामाइट केस के, जिसके जार्ज फर्नांडिस मुख्य आरोपित थे,स्वराज दंपत्ति वकील थे।

  उन दिनों डायनामाइट केस के आरोपी का वकील बनना भी बहुत साहस की बात थी।

 हरियाणा में मंत्री बनने के बाद सुषमा जेपी का आशीर्वाद लेने पटना आई थीं।  

तब तक मैं दैनिक ‘आज’ का संवाददाता बन गया था।

 स्वराज कौशल ने मुझे दिल्ली से फोन किया कि ‘‘आप जेपी से हमारी मुलाकात तय करा दीजिए।

मंत्री पद का कार्य भार संभालने से पहले सुषमा जेपी का आशीर्वाद लेना चाहती हैं।’’

मैंने जेपी के यहां से समय ले लिया। 

स्वराज दंपत्ति नियत समय पर ट्रेन से पटना पहुंचे।

हम तीन जन उन्हें रिसिव करने के लिए स्टेशन पर गए थे।

छायाकार कृष्ण मुरारी किशन, मेरे मित्र व अंग्रेजी दैनिक ‘सर्चलाइट’ के संवाददाता लव कुमार मिश्र और मैं।

   हमलोग जेपी के आवास कदम कुआं पहुंचे।

 वहां प्रारंभिक दिक्कत के बाद दंपत्ति की जेपी से मुलाकात हो गई।

  दरअसल जेपी के निजी सचिव सच्चिदानंद,जो जेपी के स्वास्थ्य का बहुत ध्यान रखते थे, इस जिद पर अड़े थे कि जेपी से आशीर्वाद लेने सिर्फ सुषमा ऊपर-यानी

चरखा समिति की पहली मंजिल पर जेपी के पास जाएंगी।

मुझे उन्हें इस बात पर सच्चिदा बाबू को राजी करने में काफी समय लग गया कि कम से कम उनके साथ स्वराज कौशल को भी ऊपर जाने दीजिए।हम भले न जाएं।

खैर,यह तो यूं ही प्रसंगवश कह दिया।

 सुषमा स्वराज उत्कृष्ट वक्ता व समझदार

 नेत्री थीं।

गत साल जब उनका असमय निधन हुआ तो उनके अनेक राजनीतिक विरोधियों को भी दुख हुआ।

वह केंद्रीय मंत्री रह चुकी थीं।

लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता थीं।

 नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर आ जाने से पहले तक सुषमा जी को प्रधान मंत्री मेटेरियल माना जाता था। 

  हरियाणा सरकार में भी उनकी तेजस्विता-योग्यता देखते हुए उन्हें आठ  विभाग मिले थे।

बाद में पता चला था कि ओम प्रकाश चैटाला के अलग ढंग के व्यवहार को देखते हुए 

सुषमा जी का राज्य की राजनीति से जल्द ही मन उचट गया।

वैसे भी हरियाणा सुषमा जी के लिए छोटी जगह थी।

...................


 समाचार विश्लेषण

..............................

आगे की राजनीति हलचल भरी 

.................................

--सुरेंद्र किशोर-

  ...............................

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कल घोषणा

कर दी कि टीकाकरण खत्म होने के बाद सी.ए.ए.

लागू करेंगे।

 केंद्र सरकार के वकील सुप्रीम कोर्ट को पहले ही यह कह चुके हंै कि किसी भी सार्वभौम देश के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एन.आर.सी.जरूरी है। 

सी.ए.ए. के तहत शरणार्थी दर्जाप्राप्त गैर मुसलमानों को भारत की नागरिकता दी जाएगी।

इन शरणार्थियों मंे पश्चिम बंगाल के मतुआ समुदाय के लोग भी शामिल हंै।

यह एक ऐसा समुदाय है जो हिन्दू तो है,पर वर्ण व्यवस्था को नहीं मानता।

क्या इसीलिए उसे नागरिकता अब तक नहीं दी गई ?

  मतुआ लोग पश्चिम बंगाल के तीन जिलों के 21 विधान सभा क्षेत्रों के  चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

1947 में पूर्वी पाक से ये भारत आ गए थे।   

उन्हें मतदाता तो बना दिया गया किंतु नागरिकता नहीं दी गई।

 अब उनमें से अधिकतर भाजपा के साथ हैं।

   अब टी.एम.सी.के राज्य सभा सदस्य दिनेश त्रिवेदी ने भी तृणमूल कांग्रेस व राज्य सभा से इस्तीफा दे दिया।

गत डेढ़ साल में तृणमूल कांग्रेस के 6 सांसदों व 14 विधायकों ने भाजपा ज्वाइन किया है।

ऐसी लगभग  एकतरफा महा भगदड़ इससे पहले किस दल से और कब हुई है ?

इससे कम भगदड़ पर भी कई सरकारें चली गईं। 

  इस महा भगदड़ के विपरीत इस बीच किसी अन्य दल के किसी विधायक या सांसद ने टी.एम.सी ज्वाइन किया क्या ?

पता नहीं।

आपको पता चले तो बता दीजिएगा।

  अब समझिए कि हवा का रुख किधर है ?

वैसे यह हवा है या आंधी ? !!

उसका जवाब चुनाव नतीजा देगा।

  यदि अगले चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बन गई तो क्या -क्या होगा ?

  बंगलादेशी घुसपैठियों में से अनेक लोग वापस भागने की कोशिश करेंगे।

वैसे वे भागने भी लगे हैं।

खबर है कि भागने के लिए वे 

रिश्वत भी दे रहे हैं।

यानी रिश्वखोरी का नुकसान है तो फायदा भी।

  उन्हें डर है कि उन्हें कहीं किसी घेरेबंदी वाले परिसर में डाल न दिया जाए !

बाकी का क्या होगा ?

कम से कम मतदाता सूची से तो वे बाहर हो ही जाएंगे।

  खैर सी.ए.ए. के खिलाफ आप ‘शाहीन बाग’ का तमाशा देख चुके हैं।

  बंगाल चुनाव के बाद जब अमित शाह अपना वादा पूरा करने लगेंगे तो आशंका है कि देश में कई ‘शाहीनबाग’ बनेंगे।

इस देश के वोटलोलुप नेता भी वहां जमावड़ा लगाएंगे।

राजनीतिक व अन्य तरह का तनाव बढ़ेगा।

उस तनाव की पृष्ठभूमि में किस दल के वोट घटेंगे और किस दल के बढ़ंेगे ?

इस बारे में आप ही अनुमान लगाइए।

हालांकि पिछले अनुभव आपके सामने हैं।

इस पृष्ठभूमि में 2024 के लोक सभा चुनाव का क्या नतीजा होगा ?

एक विश्लेषक के अनुसार ‘‘यदि मोदी 2024 में भी आ गया तो कोई नहीं बचेगा।

इसलिए सब एक हो रहे हैं।’’

..................................

12 फरवरी 21