शुक्रवार, 18 जून 2021

     पटना के ‘आॅक्सीजन मैन’ के बारे में दो शब्द

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गौरव राय को कोविड-19 विपत्ति के दौर में बिहार, खासकर पटना के लोग ‘आॅक्सीजन मैन’ के नाम से जानते हैं।

वैसे उन्होंने दो-चार आॅक्सीजन सिलिंडर दिल्ली भी भिजवाए थे जब वहां त्राहि -त्राहि मची हुई थी। 

 कोविड काल में अपनी कार से सुबह से ही न जाने 

कितनी काॅलोनियों में जरूरतमंदों के घर निःस्वार्थ व निःशुल्क  आॅक्सीजन सिलिंडर पहुंचाने निकल जाते रहे।

 नेक काम के लिए ये और इनकी जीवन साथी अपने वेतन का बड़ा हिस्सा तो खर्च करते  हैं।

  मध्य पटना के निवासी गौरव जी का व्यवहार अपने पड़ोस के साथ भी मिलनसार है।

  18 गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए भी अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं।

खुद नियमित रक्तदान भी करते हैं।

   ऐसे समाजसेवी गौरव राय से जब मेरी मुलाकात हुई तो मुझे बहुत अच्छा लगा।

 ऐसे कितने लोग आज हैं हमारे समाज में ?

हैं किंतु बहुत कम।

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--सुरेंद्र किशोर

  18 जून 21

 


 राजद्रोह के मामलों में सतर्कता जरूरी

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  --सुरेंद्र किशोर--

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केदारनाथ सिंह बनाम बिहार सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी, 1962 को अपना ऐतिहासिक जजमेंट दिया था।

राजद्रोह के संबंध में लिखा गया वह जजमेंट आज भी लागू है।

मौजूदा सुप्रीम कोर्ट भी उस पर कायम है।

हाल के दिनों में राजद्रोह को लेकर इस देश में कई जजमेंट हुए हैं।

ताजा निर्णयों को देखकर इस बात की जरूरत महूसस की जा रही  है कि सन 1962 के उस जजमेंट की काॅपी उन सब लोगों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए जो लोग अपनी -अपनी जगह से इस देश में क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को कारगर बनाए रखने की कोशिश में लगे हुए रहते हैं।

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कानोंकान,

प्रभात खबर

पटना 

18 जून 21

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केदारनाथ सिंह बनाम बिहार सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 

20 जनवरी 1962 को कहा था कि 

‘देशद्रोही भाषणों और अभिव्यक्ति को सिर्फ तभी दंडित किया जा सकता है,जब उसकी वजह से किसी तरह की हिंसा, असंतोष या फिर सामाजिक असंतुष्टिकरण बढ़े।’

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यह तो उस जजमेंट का लघुत्तम अंश है।

पर, यह उसका सार है।

पूरे जजमेंट को पढ़िए।

गुगल पर भी मिल जाएगा।

इन दिनों राजद्रोह के केस हो रहे हैं।

उन पर अदालतों के निर्णय भी आ रहे हैं।

1962 के मूल जजमेंट से आज के अदालती फैसलों को मिलाइए।

फिर किसी नतीजे पर पहंुचिए।

सवाल है कि आज के निर्णय और 1962 के निर्णय के बीच एकरूपता है या नहीं। 

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18 जून 21


 राम विलास पासवान की विरासत

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विरासत कौन संभालेगा ? !

पु़त्र व भाई में होड़ है।

अभी दावे के साथ कुछ कहना पक्षधरिता होगी।

ऐसे मामलों में भूतकाल में इस देश में दोनों तरह के उदाहरण देखे गए हैं।

कुछ उदाहरण मैं यहां दे रहा हूं।

बाकी के लिए फेसबुक फंे्रड से गुजारिश है।

सुप्रीमो ने जिसे चाहा, हर मामले में उसे ही वोटरों ने  उत्तराधिकारी नहीं माना।

हां, अधिकतर मामलों में माना।

  हालांकि मेरे राजनीतिक -सामाजिक काॅमनसेंस के अनुसार चिराग पासवान का ही पलड़ा भारी लग रहा है।

किंतु आने वाले समय में ही बातें साफ हो पाएंगी।

रामविलास जी ने भी अपने पुत्र को ही अपना उत्तराधिकारी

माना-बनाया था।

  एन.टी.रामाराव तो संभवतः अपनी पत्नी लक्ष्मी पार्वती को चाहते थे।

उनके अभिनेता पुत्र हरिकृष्णा भी राज्य सभा में थे।

किंतु इस बीच एन.टी.आर.के दामाद चंद्रबाबू नायडू ने पूरी पार्टी का ही ‘अपहरण’ कर लिया।

 शिवपाल यादव ने बहुत कोशिश की।

पर पिता मुलायम सिंह यादव के लिए ‘‘बेटा तो बेटा ही होता है।’’

बिहार में तो कोई खास दिक्कत हुई नहीं।

 लालू प्रसाद ने जो चाहा,वही हुआ।ठीक ही चाहा।

आगे का हाल कौन जानता है !

  एम.जी.रामचंद्रन के बाद लोगों ने उनकी पत्नी जानकी को जरूर मुख्य मंत्री बना दिया गया था,किंतु तमिलनाडु की जनता जानती थी कि एम.जी.आर.की पसंद तो जयललिता ही थी।

 नतीजतन बाद में उन्हें ही लंबे समय तक राज करने का मौका मिला।

खैर, बिहार में राज करने का मौका तो लोजपा के किसी गुट  को नहीं मिलने वाला।

 ंपर, दही के जामन की भूमिका भी कौन गुट सफलतापूर्वक निभा पाएगा,आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा।

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--सुरेंद्र किशोर      

16 जून 21


सोमवार, 14 जून 2021

मोदी सरकार के सात वर्षों के कार्यकाल पर टीवी पर एक भी ऐसा कार्यक्रम नहीं देखा, जिसमें सरकारी कामकाज का संतुलित विश्लेषण होता।

    या तो सरकारी उपलब्धियों का ढोल पीटने वाली जन संपर्क जैसी कवायद हुई या अंधविरोध की भावना से प्रेरित कार्यक्रम परोसे गए।

   निश्चित रूप से इस स्थिति के बीच मध्यमार्ग भी है।

अफसोस की बात है कि निष्पक्षता ध्रवीकरण के हाथों भेंट चढ़ गई।

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---संदीप घोष

दैनिक जागरण

14 जून 21


शुक्रवार, 11 जून 2021

 दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ने 

2014 में अपने बेटे के दस्तारबंदी समारोह का आयोजन

 किया था।

उन्होंने तब पाकिस्तान के प्रधान मंत्री नवाज शरीफ को तो निमंत्रण भेजा,किंतु भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को 

न्योता नहीं दिया था।

  यह और बात है कि पाक प्रधान मंत्री नहीं आए थे।

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पर, जरूरत पड़ी तो अहमद बुखारी ने हाल में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। 

 उनसे गुजारिश की कि जामा मस्जिद का हिस्सा भारी वर्षा के कारण क्षतिग्रस्त हो गया है,उसकी मरम्मत करवा दीजिए।

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--सुरेंद्र किशोर

10 जून 21  


 


खाद्य मिलावट से संबंधित अपराध को गैर जमानती बनाने की जरूरत--सुरेंद्र किशोर

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खाद्य मिलावट से संबंधित अपराधों पर इसी महीने सुप्रीम कोर्ट ने भारी चिंता व्यक्त की है।

 अदालत ने मिलावट के एक मामले में आरोपियों को अग्रिम जमानत देने से साफ मना कर दिया।

साथ ही, अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि

 ‘‘सिर्फ भारत में हम स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के प्रति उदासीन हैं।’’

पिछली अनेक घटनाएं बताती हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने बिलकुल सही कहा है।

  यदि सरकार व संसद को चिंता रही होती तो ऐसे अपराध को गैर जमानती अपराधों की सूची में अब तक डाल दिया गया होता।

 उम्मीद है कि अन्य बड़े -बड़े काम कर चुकी नरेंद्र मोदी  सरकार इस दिशा में भी ठोस पहल करेगी।

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      निर्भीक मिलावटखोर

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  मिलावटखोरों की निर्भीकता तो देखिए !

उनकी पहुंच से आमजन कौन कहे,  प्रधान मंत्री  भी बाहर नहीं हंै।

     सन 1999 में तत्कालीन प्रधान मंत्री अटलबिहारी 

वाजपेयी पटना आए थे।

उन्हें परोसे जाने वाले खाद्य व पेय पदार्थों में से मिनरल वाटर नकली पाया गया था।

  इसी तरह की घटना सन 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ कानपुर में हुई।

उन्हें परोसे जाने वाले मूंग की दाल और खरबूजे के बीज अशुद्ध व मिलावटी पाए गए।

 इन दो घटनाओं के बावजूद ऐसे अपराध को गैरजमानती  बनाने की पहल नहीं की गई।

मिलावटखोरों की ताकत तो देखिए !

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     हमारी उदासीनता की हद 

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कई साल पहले भारत की  संसद में यह आवाज उठाई गई  कि अमेरिका की अपेक्षा हमारे देश में तैयार हो रहे कोल्ड ड्रिंक में रासायनिक कीटनाशक दवाओं का प्रतिशत काफी 

अधिक है।

  इसपर सरकार ने कह दिया कि ‘‘यहां कुछ अधिक की अनुमति है।’’

  हाल की खबर है कि इस देश में बिक रहे 85  प्रतिशत दूध मिलावटी है।

जितने दूध का उत्पादन नहीं है,उससे अधिक की आपूत्र्ति हो रही है।  

  सवाल यह भी है कि इस देश में अन्य कौन सा खाद्य व भोज्य पदार्थ कितना शुद्ध है ?

यह जानलेवा समस्या है और बहुत पुरानी भी है।

विभिन्न सरकारें लोक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए क्या -क्या करती हंै ?

 कितने दोषियों को हर साल सजा हो पाती है ?

मिलावट का यह कारोबार जारी रहा तो कुछ दशकों के बाद हमारे यहां कितने स्वस्थ व कितने अपंग बच्चे पैदा होंगे ?

पीढ़ियों के साथ इस  खिलवाड़ को आप क्या कहेंगे ?

क्या सबके मूल मंे भष्टाचार नहीं है ?   

बिहार विधान परिषद की विशेष समिति ने सन 2002 में ही यह कह दिया था कि ‘‘पूरा समाज  मिलावटी कारोबार करने वालों की दया पर निर्भर हो गया है।’’

  यहां तक कि बिहार विधान सभा का कैंटीन भी मिलावट के मामले में अछूता नहीं रहा।

पटना की कई प्रतिष्ठित किराना दुकानों को भी समिति ने मिलावट के मामले में अपवाद नहीं माना था।

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स्पीड ब्रेकर लगाने की छूट मिले

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सड़कों पर स्पीड ब्रेकर लगाने की सरकार की ओर से मनाही है।

सही भी है।उसके अपने तर्क हैं।

पर यह नियम सभी तरह की सड़कों पर लागू नहीं होना चाहिए।

जहां के उदंड वाहन चालकों के स्पीड पर कोई प्रशासनिक व पुलिसिया रोक नहीं है,वहां के वाशिंदों को अपनी जान बचाने की सुविधा तो मिलनी ही चाहिए।

खासकर आबादी वाले इलाकों में और जहां स्कूल या अन्य संस्था अवस्थित हों।

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काॅमन सर्विस सेंटर के पैसों की लूट

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बिहार में काॅमन सर्विस सेंटर के संचालकों से आए दिन लाखों-लाख रुपए लूट लिए जाते हैं।

कई बार लूटपाट के क्रम में हत्या भी हो जाती है।

कई साल पहले एक खबर आई थी।

खबर भारी धनराशि की सुरक्षा को लेकर थी।

शासन की ओर से कहा गया था कि यदि किसी व्यक्ति को 25 हजार रुपए से अधिक बैंकों से निकाल कर लाना है तो उसे पुलिस की सुरक्षा दी जाएगी।

  पता नहीं,यह नियम अब भी लागू है या नहीं।

यदि नहीं तो काॅमन सर्विस सेंटर के संचालकों की प्राणरक्षा के लिए इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

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वेंकैया साहब की बड़ी बात

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अखिल भारतीय सचेतक सम्मेलन का

उद्घाटन करते हुए केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू 

ने 2014 में कहा था  कि हमारी संसद और राज्य विधान सभाओं की कार्य प्रणाली को लेकर जन साधारण में चिंता है।

उन्होंने यह भी कहा कि इन संस्थाओं की विश्वसनीयता घटी है।

 याद रहे कि वंेकैया साहब अब उप राष्ट्रपति व राज्य सभा के पदेन सभापति हैं।

 उन्होंने तब कहा था कि राजनीति के अपराधीकरण,बढ़ते धन बल,बैठकों की संख्या में कमी ,व्यवधान व स्थगन के चलते इन महत्वपूर्ण संस्थानों की विश्वसनीयता घटी है।

  उम्मीद है कि वेंकैया साहब अपने इस पुराने विचार को याद करेंगे और कोविड विपत्ति के गुजर जाने के बाद इस समस्या पर उच्चस्तरीय चर्चा की पहल करेंगे।

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  और अंत में

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अपने देश में भी अजब-गजब तरह के लोग हैं।

बांग्ला देशी और रोहिग्या घुसपैठियों को इसी देश में बसा देने की मांग करते हुए अब तक सुप्रीम कोर्ट में 18 लोकहित याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं।

  पर,एक याचिका 5 करोड़ ऐसे घुसपैठियों को निकाल बाहर करने के लिए भी सबसे बड़ी अदालत में दायर की गई है।

मांग की गई है कि पहले उनकी पहचान हो।

फिर उन्हें रोक रखा जाए।अंत में उन्हें निर्वासित किया जाए।

इस एक याचिका पर अदालत ने केंद्र व राज्य सरकारों से राय मांगी है।

संभवतः अश्विनी उपाध्याय की इस याचिका पर अगले महीने सुनवाई हो।

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गुरुवार, 10 जून 2021

 


जार्ज फर्नांडिस के जन्म दिन ( 3 जून ) पर

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   मार्च, 1977 में दैनिक ‘आज’ (वाराणसी) में छपी मेरी यह रिपोर्ट यहां प्रस्तुत है जिसे मैंने मुजफ्फरपुर लोस चुनाव क्षेत्र के दौरे के बाद लिखी थी।

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मुजफ्फरपुर, 13 मार्च, 1977।

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  जनता पार्टी के उम्मीदवार जार्ज फर्नांडिस के यहां सशरीर उपस्थित नहीं रहने के बावजूद लाखों मतदाताओं की जुबान पर वे छाए हुए हैं।

  जेल में बंद रहने के कारण लोगों में सर्वत्र उनके प्रति अतिरिक्त समर्थन और सहानुभूति देखी जा रही है।

   पिंजरे में बंद उनके पुतले तथा हथकड़ियों में जकड़े उनके चित्र वाले पोस्टर शासक दल के प्रति लोगों में गुस्सा पैदा कर रहे हैं।

    मुजफ्फरपुर संसदीय क्षेत्र के सघन दौरे के बाद यह संवाददाता इस नतीजे पर पहुंचा है कि जार्ज फर्नांडिस के चुनाव अभिकत्र्ता शारदा मल्ल के इस दावे में काफी दम है कि 

  ‘‘सवाल जीत -हार का नहीं बल्कि इस बात का है कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट उम्मीदवारों की जमानत भी बच पाती है या नहीं।’’

   पर, जनता पार्टी के कार्यकत्र्ताओं के समक्ष एक और सवाल है कि लोगों की सद्भावना को 16 मार्च को पूरे तौर पर वोट में कैसे बदला जाए और इस सवाल का जवाब ही जनता पार्टी के भाग्य का फैसला करेगा।

   एक कांग्रेसी बुद्धिजीवी के अनुसार 

  ‘‘भावनाओं से अधिक वस्तुगत स्थिति अधिक प्रभावकारी होगी।’’

   चुनाव की वस्तुगत स्थिति समझाते हुए जार्ज फर्नांडीस के सहयोगी प्रो.विनोद ने कहा कि ‘‘मुजफ्फरपुर संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत 6 विधानसभा क्षेत्रों में से कुढहनी, बोचहा और सकरा से पिछले कई चुनावों से समाजवादी विधायक विजयी होते रहे हैं।

    मीना पुर और गायघाट में कांग्रेस पार्टी का प्रभाव रहा है।

 परंतु मुजफ्फरपुर नगर कम्युनिस्टों का कार्य क्षेत्र है।  फिर भी कुल मिलाकर इन तीन क्षेत्रों में भी जनता पार्टी कांग्रेस और कम्युनिस्ट उम्मीदवारों से आगे है।’’ 

  प्रोफेसर विनोद के अनुसार कई स्थानों पर प्रतिपक्षियों द्वारा चुनाव में जोर-जबरदस्ती की भी आशंका है, जिसका जनता समुचित जवाब देगी। 

       पर, जनता पार्टी चुनाव कार्यालय के प्रभारी श्री नरेंद्र ने जिलाधिकारी को पत्र लिखकर मांग की है कि शहर के सर्किट हाउस के निकट निजी मकानों पर टंगे जनता पार्टी के झंडों को काजी मुहम्मदपुर थाने के दारोगा द्वारा जबरदस्ती उतरवाने तथा लोगों को झंडे टांगने से मना करने की घटना की जांच करायी जाये।

 ऐसी घटनाओं को रोका जाये। श्री नरेंद्र ने भाकपा कार्यकर्ताओं द्वारा चंदवारा मुहल्ले में जनता पार्टी के झंडों को जलाने की घटना की भी निंदा की है। 

       जनता पार्टी के प्रवक्ता के अनुसार 

  ‘‘कम्युनिस्टों की बौखलाहट इसलिए है कि जाॅर्ज फर्नांडिस की उम्मीदवारी से मजदूरों के बीच उनका प्रभाव लगभग समाप्त हो गया है।’’

 सचमुच जार्ज फर्नांडिस को डाक-तार विभाग के भाकपा प्रभावित लोगों को छोड़कर शहर के लगभग सभी मजदूर संघटनों का समर्थन प्राप्त है। भाकपा से विद्रोह कर चुनाव लड़नेवाले निर्दलीय उम्मीदवार ने परंपरागत कम्युनिस्ट वोट को भी छिन्न-भिन्न कर दिया है। 

यह उम्मीदवार जिले भर के कार्यकर्ताओं में लोकप्रिय हैं। मीनापुर क्षेत्र में उनका विशेष प्रभाव है।

 उनके सहयोगियों का तो यह भी दावा है कि उन्हें भाकपा उम्मीदवार रामदेव शर्मा से अधिक मत प्राप्त होंगे। 

        दूसरी ओर, माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के श्री नन्दकिशोर शुक्ल अपने दल-बल के साथ श्री फर्नांडिस के लिए काम कर रहे हैं।

   कई इलाकों में श्री शुक्ल का प्रभाव है।

   उन्होंने इस संवाददाता को बताया कि श्री फर्नांडिस जैसे मजदूर नेता के विरुद्ध भाकपा मजदूरों के समक्ष तर्कहीन हो गयी है। 

फिर भी शहरी क्षेत्र में भ्रमण के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि भाकपा वहां एक ताकत है, जो भले श्री फर्नांडिस से पीछे हो, पर कांग्रेस से आगे है। 

शहर में कांग्रेस का कोई नामलेवा नजर नहीं आता। 

      तिलक मैदान स्थित कांग्रेस पार्टी के कार्यालय में जब यह संवाददाता पहुंचा, तो देखा कि वहां श्मशान की शांति थी। 

  न कोई गाड़ी, न कार्यकर्ता, न ही चुनाव-कार्यों की चहल-पहल। 

  एक कांग्रेसी नेता ने मरे स्वर में कहा,

 ‘‘ पता नहीं क्या हो गया है पार्टी को।’’ 

 तभी समस्तीपुर से फोन आया। 

  जिला कांग्रेस कामेटी के अध्यक्ष श्री रामसंजीवन ठाकुर ने फोन उठाया, 

 ‘‘ हलो, क्या हाल है।’’

 उधर से आवाज आई,  

 ‘सन् 67 से भी बदतर हाल है।’

 श्री ठाकुर के फोन रख देने के बाद एक अन्य कांग्रेसी नेता ने अपना अनुभव सुनाते हुए कहा, 

 ‘‘ मैं एक गांव में अपने समर्थक के यहां गया, उसकी मैंने काफी मदद की थी। उससे वोट के बारे में बातें कीं। उसने कहा कि 

‘‘अबकी बार छोड़ दिअउ, माफ कर दिअउ, उन्नीस महीने में बड़ जुलुम भेलई हअ।’’ 

  कांग्रेस पार्टी के दफ्तर में भी जनता पार्टी की बड़ी- बड़ी चुनाव सभाओं की चर्चा होने लगी।

  एक ने कहा कि ‘लोग भी उसी तरह की बातें सुनना पसंद करते हैं।पता नहीं लोगों को क्या हो गया है।’

  जिला कांग्रेस कमेटी के सचिव शकूर अंसारी से जब हमने इस पर बातें की तो उन्होंने कहा कि ‘शहर में कांग्रेस पार्टी जरूर उदास है,उसके कारण हैं क्योंकि यहां तो कालाबाजारी,मुनाफाखोर और भ्रष्ट व्यापारी रहते हैं और वे सब के सब जनता पार्टी के साथ हैं।

  गांवों में हमारी स्थिति अच्छी है और प्रतिदिन स्थिति मजबूत होती जा रही है।’

  पर अन्य सूत्रों से प्राप्त सूचनाओं के अनुसार जिला कांग्रेस पार्टी भीतर -भीतर दो खेमों में बंट गई है और कांग्रेसी उम्मीदवार नीतीश्वर प्रसाद सिंह कार्यकत्र्ताओं का अभाव महसूस कर रहे हैं।

  कांग्रेस के एक व्यक्ति ,जिसका अपनी जाति में काफी प्रभाव माना जाता है,टिकट न मिलने के कारण क्षुब्ध है और तथा वे भीतर ही भीतर कांग्रेस उम्मीदवार नीतीश्वर प्रसाद सिंह के विरूद्ध काम कर रहे हैं।

  बोचहा और सकरा के दोनों हरिजन विधायक रमई राम और हीरालाल पासवान ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है।

  वे जनता पार्टी के लिए समर्थन जुटाने में लग गए हैं।

  इसके अतिरिक्त मुजफ्फर पुर जिले के कई भूतपूर्व सांसदों,विधायकों और युवा कांग्रेस के अनेक कार्यकत्र्ताओं ने दल से इस्तीफा दे दिया है और जनता पार्टी के उम्मीदवार के लिए काम करना प्रारंभ कर दिया है।

   छात्र आंदोलन के दौरान विश्व विद्यालय की नौकरी से निकाले गए आठ शिक्षक और दर्जनों छात्र जनता पार्टी की जीत के लिए दिन रात काम कर रहे हैं।

  इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र से शरद राव, दिल्ली से सुषमा कौशल ,उत्तर प्रदेश से जगदीश लाल श्रीवास्तव, कलकत्ता से अशोक सेकसरिया अपने दर्जनों सहयोगियांे के साथ चुनाव कार्य में लगे हुए हैं।

  इसके अतिरिक्त श्री फर्नांडिस की मां एलिस फर्नांडिस ने महिलाओं का ध्यान आकृष्ट किया है।

  कांपती हुई बूढ़ी एलिस फर्नांडिस का हाथ जोड़ अपने तीन बेटों की रिहाई की खातिर वोट मांगना प्रभावोत्पादक दृश्य उपस्थित करता है।

   श्री फर्नांडिस का चुनाव कार्यालय बहुत ही चुस्त और कार्यकुशल दिखाई पड़ा।

श्री फर्नांडिस ने बड़ी संख्या में चुनाव साहित्य बंटवाए हैं।

श्री फर्नांडिस भले रिहा नहीं किए गए,पर वे अपने सहयोगियों से निरंतर संपर्क बनाए हुए हैं।

   एक सूचना के अनुसार श्री फर्नांडिस ने देश भर में फैले अपने प्रशंसकों और शुभचिंतकों को मुजफ्फर पुर चुनाव क्षेत्र में जाकर काम करने के लिए जेल से ही पत्र लिखे हैं।

  उन्होंने जनता पार्टी तथा जनतांत्रिक कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेताओं को पत्र लिख कर मुजफ्फर पुर पहुंचने का आग्रह किया है।

  यही कारण है कि मुजफ्फर पुर में जनता पार्टी की ओर से न तो बड़ी -बड़ी आम सभाओं की कमी हुई,न कार्यकत्र्ताओं की और न साधनों की।

  देश भर से छेाटी -छोटी रकम की मदद लगातार आ रही है।

  देश- विदेश के लगभग सभी समाचार पत्रों  ,संवाद समितियों तथा रेडियो-टेलीविजन संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने मुजफ्फर पुर का दौरा किया है।

   दुनिया भर के लोगों की आंखें मुजफ्फर पुर की ओर लगी हुई है जहां 16 मार्च को सुबह 7.30 बजे और शाम 4.30 बजे के बीच लगभग पौने सात लाख मतदाता बड़ौदा डायनामाइट मुकदमे के मुख्य अभियुक्त ,सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष तथा अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त मजदूर नेता श्री जार्ज फर्नांडिस के भाग्य का फैसला करेंगे।

  जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अब्दुला बुखारी ने श्री फर्नांडिस को लिखे पत्र में कहा है कि 

  ‘........हर सही सोचने वाला आदमी तुम्हारे कार्यों और जिस बहादुरी से तुम तानाशाह का सामना कर रहे हो,उसका आदर किए बिना नहीं रह सकता।तुम इस महान देश को दल -दल से निकालने की कोशिश कर रहे हो,तुम्हारी इस कोशिश में मैं तुम्हारे साथ हूं और तुम्हारी कामयाबी की कामना करता हूं।’

  श्री बुखारी के पत्र और पटना के उर्दू दैनिक ‘संगम’ के संपादक व ओजस्वी वक्ता श्री गुलाम सरवर के भाषणों का मुजफ्फर पुर की जनता खास कर अल्पसंख्यकों पर ,प्रभाव पड़ा है जिससे सी.पी.आइ.को क्षति पहुंची है।

  क्योंकि अब तक भाकपा को ही मुसलमानों के अधिकतर वोट मिलते रहे हैं।

  दूसरी ओर गंवई इलाकों में जातिवाद टूटा है।

  लोग छोटी -छोटी बातों से ऊपर उठकर परिवार नियोजन,पारिवारिक तानाशाही और आपातकाल की ज्यादतियों पर चर्चा करने लगे हैं।

 जनता पार्टी के प्रवक्ता ने बताया कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां जनता पार्टी की समर्थक भोली -भाली जनता को गाय बछड़ा और हंसिया बाल दिखा कर प्रचार कर रही है कि यही जनता पार्टी का चुनाव चिह्न है।

  प्रवक्ता के अनुसार जनता पार्टी के स्वयंसेवक इस भ्रम को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं।

 जनता पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि वे तिहाड़ जेल में बंद हैं और उनके समर्थकों ने इस स्थिति से सर्वाधिक लाभ उठाने की कोशिश की है।मुजफ्फर पुर निर्वाचन क्षेत्र में श्री फर्नांडिस के समर्थन में जारी किए गए पोस्टरों,परचों,पुस्तिकाओं और अन्य प्रचार सामग्री में उनके जेल जीवन को अधिकाधिक उभारा गया है।

  मतदाताओं पर इसकी अनुकूल प्रतिक्रियाएं हुई हैं।

  जेलनुमा पिंजरे में बंदी फर्नांडिस के हथकड़ी-बेड़ी लगे पुतले तथा पोस्टरों पर जेल में बंद हथकड़ी लगे दो हाथ लोगों का ध्यान अनायास अपनी ओर खींच लेते हैं।

  इससे जनता में उनके प्रति सहज सहानुभूति पैदा हो जाती है।

 इसके अतिरिक्त श्री फर्नांडिस की 66 वर्षीया बूढ़ी मां की मतदाताओं से मार्मिक अपील ,उनके भाई लाॅरेंस फर्नांडिस पर ढाए गए पुलिस जुल्म की खबर और स्वयं जार्ज फर्नांडिस द्वारा तिहाड़ जेल में अनिश्चितकालीन अनशन की खबर ने सामान्य जन जीवन को स्पर्श किया है जो धूम- धड़ाके के प्रचार से कहीं अधिक प्रभावकारी प्रतीत हो रहे हैं।

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जार्ज ने 1977 में कांग्रेस के नीतीश्वर प्रसाद सिंह को 3 लाख 34 हजार मतों से पराजित किया था।

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--सुरेंद्र किशोर

   3 जून 21