शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

 शराब बंदी को लेकर मुख्य मंत्री 

 की दृढ इच्छा सराहनीय

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सुरेंद्र किशोर

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मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कल कहा कि 

‘शराबंदी खत्म नहीं होने देंगे।’

मैंने पिछले कुछ दशकों में अपने पेशे के साथ-साथ विभिन्न पेशों के अनेक परिचितों को शराब के अति सेवन के कारण अकाल मृत्यु को प्राप्त होते देखा है।

  कई प्रतिभाशाली पत्रकार शराब-सिगरेट-गलत खानपान के कारण अपने परिवारों को रोते-कलपते छोड़ असमय गुजर गए।

 सीमित आय वाला व्यक्ति जब शराब पीकर समय से पहले गुजर जाता  है तो अधिकतर मामलों में उसके परिवार को 

भारी कष्ट उठाना पड़ता है।

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  जो लोग यह कहते हैं कि बिहार में शराब बंदी विफल है,उनसे मैं पूछना चाहता हूं कि इस ढीले-ढाले लोकतंत्र में कौन सा अन्य कानून पूरी तरह सफल है ?

 आई.पी.सी.के तहत के अपराधों में सजा की दर इस देश में 56 प्रतिशत है।

बिहार में हत्या के मामले में सजा की दर तो बहुत ही कम है।

तो क्या दफा-302 को समाप्त कर दिया जाना चाहिए ?

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मेरे अनुमान के अनुसार बिहार में शराबबंदी की सफलता की दर लगभग उतनी है जितनी आई.पी.सी.के तहत के अपराधों में सजाओं की दर है।

इस बात का भी अनुमान करिए कि शराब बंदी के कारण नए पियक्कड़ों की ंसंख्या में पहले जैसी बढ़ोत्तरी़ अब नहीं हो रही है।

आम तौर पर कोई पैसे वाला मित्र किसी कम धनी मित्र को अपने पैसे से शराब पिलाना सिखाता है,आगे उसका साथ देने के लिए।

अब तस्करी वाली शराब इतनी हंगी पड़ रही है कि दूसरों को भी पिलाना अब अधिक महंगा शौक बन चुका है।

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3 फरवरी 23 


गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

     कामराज योजना से 1967 के चुनाव में 

  कांग्रेस को नहीं हुआ था फायदा ,

  जानिए कहां चूकी थी सरकार


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        सुरेंद्र किशोर

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सन 1963 की चर्चित कामराज योजना के तहत केंद्रीय मंत्री मोरारजी देसाई से तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि ‘‘आपको इस्तीफा दे देना चाहिए।’’

  उस पर बिना कोई देर किए देसाई ने कहा कि ‘‘मुझे इस्तीफा देकर खुशी होगी।किंतु आप चंदभानु गुप्त से इस्तीफा न लें। 

क्योंकि इससे लोगों को लगेगा कि चूंकि आप उन्हें नापसंद करते हैं,इसलिए उन्हें हटना पड़ा।’’

  प्रधान मंत्री  नेहरू ने मोरारजी देसाई की सलाह नहीं मानी और 

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री चंद्रभानु गुप्त को भी अंततः पद छोड़ना ही पड़ा।

   योजना बनी थी कि देश के कुछ प्रमुख सत्ताधारी सरकार से निकल कर कांग्रेस संगठन को मजबूत बनाएं।

 कई प्रमुख सत्ताधारियों को केंद्र व राज्य सरकारों से हटा कर संगठन के काम में लगाया गया।

फिर भी 1967 के चुनाव में उसका कोई लाभ कांग्रेस को नहीं मिला ।

लोक सभा में कांग्रेसी सदस्यों की संख्या सन 1962 की अपेक्षा 1967 में घट गई।

बाद में यह चर्चा चली कि राजनीतिक विरोधियों को रास्ते से हटाने के लिए शीर्ष नेतृत्व ने कामराज योजना लाई थी।के. कामराज तब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।

  याद रहे कि संसद का सत्र समाप्त हो जाने के बाद सन 1963 के मध्य में प्रधान मंत्री नेहरू कश्मीर गये थे।

वहां बीजू पटनायक से उनकी मुलाकात हुई थी।वहां से लौटने के बाद श्री पटनायक ने मोरारजी देसाई को जवाहर लाल जी के साथ हुई मुलाकात की बात बताई थी।

  उस बातचीत में पटनायक ने जवाहर लाल जी को एक योजना सुझाई जो बाद में ‘कामराज योजना’ के नाम से मशहूर हुई।कामराज ने अपनी ओर से वह योजना 1963 के जून के अंत या जुलाई में प्रस्तुत की।’

  उसी दौरान लाल बहादुर शास्त्री  ने मोरारजी देसाई से कहा था कि मैंने स्वयं ही पद मुक्त होने का आग्रह किया है।

 इसलिए मैं तो मुक्त होऊंगा ही। पर आपको इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं है।

आपके ऊपर यह योजना लागू नहीं होनी चाहिए।’’

मोरारजी देसाई के अनुसार ‘‘दूसरे दिन जवाहर लाल जी ने मुझे बुलाकर ं बातचीत की।उन्होंने कहा कि इस योजना के अंतर्गत अब मैं और आप दो ही वरिष्ठ बच रहे हैं।जिनमें से एक को तो जाना ही चाहिए।

मैं पद से न हटंू ,ऐसा सबका आग्रह है।इसलिए मुझे लगता है कि संगठन के काम के लिए आपको ही पदमुक्त हो जाना चाहिए।आखिर मोरार जी मुक्त हुए भी। ये बातें पूर्व प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने अपनी जीवनी में लिखी हंै।

याद रहे कि ‘कामराज योजना’ के तहत जिन नेताओं को सरकार से हटा कर पार्टी के कामों में लगाया गया,उनमें बीजू पटनायक और मोरारजी देसाई भी शामिल थे।

 सन 1962 में चीन के हाथों भारत की पराजय के बाद यह धारणा बन रही थी कि जनता के बीच कांग्रेस का प्रभाव कम हो रहा था।

फिर से जनता से कांग्रेस को मजबूती से जोड़ने के लिए कुछ बड़े नेताआंे को संगठन के काम में लगाने का निर्णय हुआ था।

मूल योजना यह थी कि दो-तीन मुख्य मंत्रियों और राज्यों के कुछ मंत्रियों को उनके पदों से हटाया जाए।

पर बाद में उस सूची में छह केंद्रीय मंत्रियों के नाम भी जोड़ दिए गए।

 केंद्रीय मंत्रिमंडल से जो नेता हटाए गए,उनमें लाल बहादुर शास्त्री,मोरारजी देसाई,एस.के.पाटील,जगजीवन राम और गोपाल रेड्डी शामिल थे।

इनके अलावा जिन मुख्य मंत्रियों से इस्तीफा लिया गया उनमें कामराज (मद्रास),बी.आर.मंडलोई(मध्य प्रदेश)विनोदानंद झा(बिहार)चंद्र भानु गुप्त(उत्तर प्रदेश)शामिल  थे।

इसके साथ ही एक अनोखी राजनीतिक घटना भी हुई।

उस समय नेशनल कांफ्रेंस के नेता गुलाम मुहम्मद बख्शी कश्मीर के मुख्य मंत्री थे।

यानी, वे कांग्रेस में नहीं थे।

 फिर भी उन्होंने कहा कि ‘चूंकि इस योजना के तहत किसी मुसलमान नेता का इस्तीफा नहीं लिया जा रहा है,इसलिए मैं मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा देता हूं ताकि देश में अच्छा संदेश जाए।’

साथ ही, वे कांग्रेस में शामिल भी हो गए।

उसी दौरान मोरारजी देसाई और लाल बहादुर शास्त्री के बीच की एक दिन हुई बातचीत भी उल्लेखनीय है।

 शास्त्री जी ने मोरार जी देसाई से कहा कि मैंने स्वयं ही पद मुक्त होने का आग्रह किया है । इसलिए मैं तो मुक्त होऊंगा ही। पर आपको इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं है।

आपके ऊपर यह योजना लागू नहीं होनी चाहिए।

कामराज योजना के लागू होने के बाद सबसे पहला आम चुनाव सन 1967 में हुुआ। उस समय तक लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक ही साथ होते थे।कुछ हलकों में यह उम्मीद की गयी थी कि कामराज योजना से कांग्रेस को चुनाव लाभ मिलेगा।पर ऐसा हुआ नहीं। 

 जिन छह राज्यों के मुख्य मंत्रियों को इस योजना के तहत हटाया गया था, उन राज्यों में भी सन 1967 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता से हट गयी। वैसे कुल नौ राज्यों में तब कांग्रेस हार गयी थी।

1963 के बाद कांग्रेस या किसी अन्य दल ने ‘कामराज योजना’ जैसी कोई योजना नहीं चलाई।

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वेबसाइट मनी कंट्रोल हिन्दी (20 जनवरी 2023 )पर प्रकाशित 

    

 

 


मंगलवार, 31 जनवरी 2023

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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दोहरे शासन की समाप्ति के बिना विश्व विद्यालयों में सुधार कठिन

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बिहार के विश्व विद्यालयों में शिक्षा-परीक्षा की हालत दयनीय है।

इसके लिए राज्य सरकार, राज भवन को और राज भवन राज्य सरकार को जिम्मेवार मानता रहा है।

चूंकि विश्व विद्यालयों पर द्वैध शासन है ,इसलिए एक दूसरे पर जिम्मेदारी थोपना आसान हो गया है।

ऐसे में अब यह जरूरी हो गया है कि विश्व विद्यालयों की पूरी जिम्मेदारी, संबंधित कानून में संशोधन करके,  बिहार सरकार खुद अपने हाथों में ले ले।

राजनीतिक कार्यपालिका के लोग चुनाव लड़ते हैं,जनता के पास उन्हें जाना पड़ता है।उनसे मतदातागण सवाल पूछते हैं कि शिक्षा क्यों चैपट होती जा रही है ?

  इस देश के कुछ राज्यों में वहां की राज्य सरकारों ने राज्यपालों को, कुलाधिपति के पद से मुक्त कर दिया है।शायद ऐसा करने का उनका उद्देश्य अलग है।

पर,यहां तो शिक्षा-परीक्षा को पटरी पर लाने की समस्या है।

लालजी टंडन जब बिहार के राज्यपाल थे तो मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था कि 

‘‘विश्व विद्यालय ठीक से चलें,यह अधिकार और जिम्मेदारी मेरे पास हैं।’’

पर, उससे पहले के पहले के राज्यपाल  देवानंद कुंवर के कार्यकाल में एक शर्मनाक घटना हो गई थी।

जब कुंवर जी बिहार विधान मंडल के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित कर रहे थे तो कांग्रेस की ही विधान पार्षद श्रीमती ज्योति ने अपनी ऊंची आवाज में सदन में ही राज्यपाल से पूछ दिया कि ‘‘आजकल आपके यहां वी.सी.बहाली का क्या रेट चल रहा है ?’’

  एक अन्य मामले में जब राज्य सरकार ने एक भ्रष्ट वी.सी.के खिलाफ कार्रवाई की तो राज भवन ने राज्य सरकार को लिख दिया कि आपने हमारी अनुमति के बिना उस वी.सी.के खिलाफ कार्रवाई क्यों की ?

दशकों पहले इस देश में जब राज्यपालों को विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति बनाने का निर्णय हुआ था तो इस बात की कल्पना तक नहीं थी कि कोई व्यक्ति, किसी राज्यपाल से पूछेगा कि ‘‘क्या रेट चल रहा है।’’

अब समय आ गया है कि राज्य सरकार खुद विश्व विद्यालयों की जिम्मेदारी ले अन्यथा बिहार की शिक्षा देर-सबेर पूरी तरह चैपट हो जाएगी।

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समझ में आने वाला अनुवाद

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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चंद्रचूड़ ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की प्रतियां शीघ्र ही हिन्दी सहित अन्य क्षेत्रीय

भाषाओं में मिलेंगी।

यह सराहनीय व उपयोगी कदम है।

किंतु इस सिलसिले में एक खास बात पर ध्यान रखने की जरूरत पड़ेगी।

वह यह कि अनुवाद इतना सरल हो जो आसानी से समझ में आ जाए।

यहां यह इसलिए कहा जा रहा है कि भारतीय संविधान का हिन्दी अनुवाद सरल भाषा में नहीं हो सका है।

कानून की किताबों के अनुवाद भी ऐसे जटिल हैं कि उन्हें समझ पाना कठिन होता है।

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भूली-बिसरी याद

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सन 1973 में इलाहाबाद नगर महा पालिका ने डा.राम मनोहर लोहिया की आदमकद प्रतिमा स्थापित कर दी।

 पूर्व मुुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर को अनावरण के लिए आमंत्रित किया गया था।

कर्पूरी जी वहां जाने ही वाले थे।

किंतु उस बीच उत्तर प्रदेश के कुछ लोहियावादियों ने, जिन्होंने डा.लोहिया के साथ काम किया था,कर्पूरी जी से अपील की कि आप यह काम मत कीजिए।

क्योंकि यह काम खुद डा.लोहिया की इच्छा के खिलाफ है।

डा.लोहिया ने कहा था कि किसी व्यक्ति की मूर्ति या उसके नाम पर स्मारक स्थापित करने का काम उसके निधन के तीन सौ साल बाद ही होना चाहिए।

 तब तक उस व्यक्ति के बारे में आम लोग पूर्वाग्रह रहित होकर इस नतीजे तक पहुंच चुके होते हैं कि उस व्यक्ति का वास्तविक योगदान क्या था।

निधन के तत्काल बाद तो ख्याति से लोगबाग मोहित रहते हैं।समय बीतने के बहुत बाद यह तय हो पाता है कि उसकी ख्याति क्षणिक थी या स्थायी।उसका वास्तविक योगदान क्या था ?

याद रहे कि डा.लोहिया की मृत्यु सन 1967 में हुई थी।

डा.लोहिया की मूर्ति की स्थापना का विरोध करने वालों को यह नहीं पता था कि मूर्ति की स्थापना में लगे नेता व अन्य लोग लोहिया को उनकी मूर्ति तक ही सीमित कर देना चाहते थे।क्योंकि लोहिया की जीवन शैली,नीतियों और कार्य शैली का अनुकरण करना तो उनके वश में नहीं था।

ऐसे में कम से कम वे मूर्ति स्थपित करके उनको याद करने की औपचारिकता पूरी कर रहे थे।याद रहे कि विरोध के कारण कर्पूरी ठाकुर मूर्ति का अनावरण करने इलाहाबाद नहीं गए थे।    

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और अंत में

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बिहार में करीब आठ साल पहले जैविक खेती की शुरूआत हुई थी।

अब तो ऐसी खेती का काफी विस्तार हुआ है।

मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने अब मोटे अनाज के उत्पादन पर भी जोर दिया है।मोटे अनाज को सुपर फूड कहा जाता है।

पर,जैविक खेती में एक समस्या आ रही है।

व्यावसायिक ढंग से शुद्ध जैविक खेती करने पर उत्पाद काफी महंगा 

पड़ता है।

उदाहरणाथर्, एक लीटर शुद्ध जैविक सरसांे तेल की कीमत 389 रुपए है जबकि सामान्य सरसों तेल 225 रुपए प्रति लीटर की दर से बिक रहा है।अन्य उत्पाद की कीमत भी इसी तरह है।

सरकारी सब्सिडी की जरूरत महसूस हो रही है।अन्यथा,ऐसा न हो कि जैविक खेती के प्रति किसानों का उत्साह समय के साथ कम हो जाए।


    ‘‘इंडिया टूडे’’ के इस प्रशंसक पाठक का हाल

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      सुरेंद्र किशोर 

लगता है कि इंडिया टूडे के ‘‘हुक्मरानों’’ को अपने प्रकाशन के प्रसार में कोई खास रूचि नहीं है।

मैं पहले ‘दिनमान’ को पसंद करता था।

अब मेरी पसंदीदा पत्रिका है--‘इंडिया टूडे’।

क्योंकि इसकी विश्वसनीयता अपेक्षाकृत अधिक है।

मेरे निजी पुस्तकालय में सन 1982 से ‘इंडिया टूडे’ के अंक मौजूद है।

 पहले अंग्रेजी संस्करण और बाद में हिन्दी संस्करण।

2015 से जब मैं पटना के बगल के गांव में रहने लगा,तब से मुझे ‘इंडिया टूडे’ मिलने में काफी दिक्कत होने लगी।

क्योंकि अखबारों के हाॅकर यहां नहीं पहुंचाते।

इसलिए मैंने सोचा कि इंडिया टूडे के मुख्यालय से ही पत्र-व्यवहार करके शुल्क भेज कर डाक से उसे मंगवाने का प्रबंध करूं।

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  मैंने सबसे पहले एक सज्जन पत्रकार को मेल भेजा।

वे अब इंडिया टूडे -हिन्दी के संपादकीय विभाग में बड़े पद पर हैं।

उन्होंने मेरे मेल का जवाब तक नहीं दिया।

 जबकि, कुछ साल पहले मना करने के बावजूद नगर से दूर स्थित मेरे आवास पर आ गए थे।

 उन्होंने मेरा लंबा इंटरव्यू लिया था।सहृदय व्यक्ति लगे थे।

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पटना के मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र कहा करते हैं कि दिल्ली वालों का यही हाल है।

उन्हें सिर्फ अपने काम से मतलब होता है।

इसीलिए यदि उनका कोई काम होता है तो मैं उसके बदले पहले ही भरपूर पैसे उनसे ले लेता हूं। 

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मैंने इंडिया टूडे के प्रसार विभाग के व्हाट्सेप्प पर भी संदेश भेजा।कोई जवाब नहीं मिला।

तीन दिन पहले इ मेल पर एक संदेश भेजा।

अब तक कोई जवाब नहीं।

अब इसका क्या अर्थ लगाया जाए ?!!

मैं चाहता था कि मेरे निजी-पारिवारिक पुस्तकालय में 

इंडिया टुडे की आवक बनी रहे ताकि हमारी अगली पीढ़ियां भी देखंे कि हमारे यहां एक अच्छी पत्रिका भी उपलब्ध है।

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31 जनवरी 23


सोमवार, 30 जनवरी 2023

   चुनावी आंकड़ों के जानकार प्रशांत किशोर ने जातिगत जन गणना का विरोध कर दिया है।

साथ ही, उन्होंने इस गणना के पीछे की मंशा पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि ‘‘समाज को जातीय गुटांें में बांटने की तैयारी है।’’

 मेरी समझ से ऐसा कहकर प्रशांत किशोर ने बिहार की 52 प्रतिशत आबादी से खुद को काट लिया है।

  इस राज्य में पिछड़ों की आबादी, कुल आबादी का 52 प्रतिशत है।

 मुझे तो पिछड़ी जाति का कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो जातिगत गणना का विरोध कर रहा हो।

क्या प्रशांत किशोर की उनकी बिहार यात्रा के दौरान पिछड़ी जाति का कोई ऐसा व्यक्ति उन्हें मिला ?

बिहार में राजनीति करने के लिए पहले यहां की सामाजिक स्थिति को समझना होगा।

सिर्फ चुनावी आंकड़ों का विशेषज्ञ होने से काम नहीं चलेगा।

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सुरेंद्र किशोर

27 जनवरी 23


   जातिगत गणना का विरोध 

 खुद सवर्णों के हक में नहीं

 मंडल आरक्षण को लेकर 

यह बात साबित हो चुकी है  

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सुरेंद्र किशोर

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सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी, 2023 को ठीक ही सवाल किया  कि ‘‘जातिगत गणना के बिना आरक्षण की नीति सही तरीके से कैसे लागू होगी ?’’

संविधान के अनुच्छेद16(4) के अनुसार , ‘‘पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है,राज्य नियुक्तियों या पदों के आरक्षण का प्रावधान करेगा।’’

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क्या ऐसा प्रावधान करते समय संविधान निर्माताओं का उद्देश्य 

हिन्दू समाज को बांटना था ?

संविधान निर्माताओं में अधिकतर लोग तो ऊंची जातियों के ही तो थे।दरअसल वे उदारमना थे।

सन 1931 तक तो जाति के आधार पर गणना हुई ही थी।

क्या उससे तब हिन्दू समाज बंट गया ?

आज किस जाति का उचित प्रतिनिधित्व नहीं ,यह जानने के लिए तरह -तरह की गणनाएं करनी ही पड़ेंगी।

उससे यह भी पता चलेगा कि सवर्णों में भी किसे कितनी सरकारी मदद की जरूरत है।

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1990 तक भारत सरकार में कैसा प्रतिनिधित्व था,उसके लिए आंकड़ा यहां प्रस्तुत है। 

इस आंकड़े के बावजूद मंडल आरक्षण का 1990 में कड़ा विरोध हुआ था।

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1990 में केंद्र सरकार के विभागों में पिछड़ी जातियों के कर्मियों की संख्या

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विभाग    ---  कुल क्लास वन अफसर ---- पिछड़ी 

                                          जाति 

-----------------------------------राष्ट्रपति सचिवालय --- 48  -------  एक भी नहीं

प्रधान मंत्री कार्यालय--  35 ------      1

परमाणु ऊर्जा मंत्रालय--  34   ------    एक भी नहीं 

नागरिक आपूत्र्ति-----  61  -------  एक भी नहीं 

संचार    ------    52  ------    एक भी नहीं

स्वास्थ्य -------- 240   -------  एक भी नहीं 

श्रम मंत्रालय------   74  --------एक भी नहीं

संसदीय कार्य----    18   ---         एक भी नहीं

पेट्रोलियम -रसायन--  121    ----   एक भी नहीं 

मंत्रिमंडल सचिवालय--   20  ------      1

कृषि-सिंचाई-----   261   -------   13

रक्षा मंत्रालय ----- 1379   ------      9

शिक्षा-समाज कल्याण--  259 -----      4

ऊर्जा ----------  641 -------- 20

विदेश मंत्रालय  ----- 649 -------- 1

वित्त मंत्रालय----    1008 ---------1

गृह मंत्रालय----      409  --------13

उद्योग मंत्रालय--     169----------3

सूचना व प्रसारण--    2506  ------124

विधि कार्य--         143   --         5

विधायी कार्य ---    112    ------ 2

कंपनी कार्य --       247      ------6

योजना---           1262 -----    72

विज्ञान प्रौद्योगिकी ----101  ---     1

जहाज रानी-           103 --        1

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----1990 के दैनिक ‘आर्यावत्र्त’ से साभार 

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( 27 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान के बावजूद केंद्रीय सेवाओं में अब भी यानी 2023 में भी पिछड़ों का प्रतिनिधित्व औसतन सिर्फ 19 प्रतिशत है।यह भी देखना चाहिए कि कमजोर पिछड़ों का हक मजबूत पिछड़े तो नहीं मार ले रहे हैं। यह भी गणना से ही तो पता चलेगा।जो गणना अभी बिहार में हो रही है,उससे अलग ढंग की सघन गणना भी करानी पड़े तो करानी ही चाहिए।) 

  1990 का ऊपर लिखित आंकड़़ा उनके लिए भी है जो लोग यह मानते हैं कि 1993 में लागू मंडल आरक्षण

इस देश की अनेक समस्याओं की जड़ में है।

यह आंकड़ा उस समय का है जब ओ.बी.सी. के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण लागू नहीं था।

जहां प्रत्येक को  वोट का समान अधिकार है,वहां 52 प्रतिशत पिछड़ी आबादी के लिए शासन में उतना ही प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए था जो ऊपर का 1990 या 2023 का आकंड़ा बता रहा है ?

वह भी आजादी के 76 साल बाद भी ?

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मंडल आयोग ने सन 1931 की जातीय जन गणना को आधार बनाया था।

1990 में आरक्षण विरोधियों ने इसे भी अपने विरोध का एक आधार बनाया।

सवाल उठाया कि 1931 के पुराने आंकड़े के आधार पर आज कोई निर्णय कैसे हो सकता है ?

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फिर तो 1931 की तरह आज भी जातीय गणना जरूरी है।

लेकिन जब गणना होने लगती है तो विरोध शुरू हो जाता है।

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वी.पी.सिंह की सरकार ने सन 1990 में जब 27 प्रतिशत आरक्षण किया तो देश में हंगामा खड़ा हो गया।

बिहार में पक्ष और विपक्ष में काफी संघर्ष भी हुए।

इस संघर्ष से लालू प्रसाद जैसे सामान्य नेता पिछड़ों के महाबली नेता बन गए।

मेरी समझ से इसका श्रेय आरक्षण विरोधियों को ही जाता है।

विरोध नहीं हुआ होता तो सामान्य ढंग की राजनीति पहले जैसी ही चलती रहती।कोई सवर्ण मुख्य मंत्री भी बन जाता।

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तब बिहार विधान सभा के प्रेस रूम बैठकर मैं लगातार यह कहता रहा कि आरक्षण का विरोध नहीं होना चाहिए।(1993 में तो सुप्रीम कोर्ट ने मंडल आरक्षण पर अपनी मुहर भी लगा दी।)

 मैं आरक्षण विरोधियों से यह भी कहता था कि ‘‘गज नहीं फाड़िएगा तो थान हारना पड़ेगा।’’

कांग्रेस के पूर्व विधायक हरखू झा को थान हारने वाली मेरी वह बात आज भी याद है।वे हमारे बीच मौजूद हैं।शंका हो तो फोन पर पूछ लीजिएगा।

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अब सवाल है कि थान कैसे हारे ?

यदि मंडल आरक्षण का कड़ा विरोध नहीं होता तो बिहार में कोई सवर्ण योग्य नेता मुख्य मंत्री बनने से वंचित नहीं हो जाता।

यह संयोग नहीं है कि सन 1990 से अब तक कोई सवर्ण बिहार का मुख्य मंत्री नहीं बन सका।

वह भी संयोग नहीं था जब हमंे आजादी मिली तो कांग्रेस ऐसे मामले में अतिवादिता के दूसरे छोर पर थी।

याद कीजिए कांग्रेस को बिहार विधान सभा जब- जब अपने बल पर पूर्ण बहुमत मिला,उसने चुन-चुन कर सिर्फ सवर्णों को ही मुख्य मंत्री बनाया।

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और अंत में 

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चैधरी चरण सिंह ने बहुत पीड़ा के साथ एक बार कहा था कि ‘‘मुझे लोग जाट नेता कहते हैं।जबकि हमारे केंद्रीय मंत्रिमंडल में सिर्फ एक ही जाट था,वह भी राज्य मंत्री था।दूसरी ओर, राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में 15 ब्राह्मण कैबिनेट मंत्री  हैं।फिर भी उन्हें कोई जातिवादी नहीं कहता।’’     

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जहां तक प्रतिभा की बात है,आजादी के तत्काल बाद की सरकारों  में शामिल सत्ताधारी नेताओं में सारे प्रमुख नेता व अफसर आॅक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज में पढ़े थे।फिर भी सरकारी  1 रुपया घिसकर 1985 आते- आते सिर्फ 15 पैसे ही रह गया था।यानी 100 सरकारी पैसे दिल्ली से चलते थे,पर गांव तक पहुंचते-पहुंचते सिर्फ 15 पैसे रह जाते थे।

बाकी भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाते थे।

अन्य विफलताएं भी सामने आईं।

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21 जनवरी 23                                           




                                             



लालू प्रसाद का बड़प्पन

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   सुरेंद्र किशोर

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यह बात तब की है जब पिछली बार लालू प्रसाद पटना आए थे।

मेरे एक मित्र उनसे मिलने गए हुए थे।

लालू जी ने उनसे पूछा,‘‘सुरेन्दर भाई तोहरे बगल में रहते हैं ?’’

उन्होंने कहा कि ‘‘हां’’

लालू जी ने कहा कि ‘‘उनका के हमर सलाम कहीह !’’

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मुझे जब यह बात बताई गई तो मैंने सोचा कि सिंगापुर से जब वे लौटेंगे तो मैं उनसे मिलूंगा,यदि वे समय देंगे तो।

खैर, यह तो सामान्य शिष्टाचार वाली बात हुई।

इससे बड़ी बात आगे बताऊंगा जिसे मैं उनका बड़प्पन मानता हूं।

थोड़ी आपसी संबंध की पृष्ठभूमि बता दूं।

1969 से मैं लालू जी को जानता हूं।

उस साल बिहार समाजवादी युवजन सभा के जो तीन संयुक्त सचिव चुने गए थे उनमें मैं, लालू जी और शांति देवी (बेगूसराय)थीं।

शिवानंद तिवारी सचिव चुने गए थे।

बाद के वर्षों में भी यदाकदा लालू प्रसाद से मुलाकातें होती रहीं,खास कर जेपी आंदोलन के दिनांे में भी।

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 वे सन 1990 में मुख्य मंत्री बने ।

  एक संवाददाता के रूप में मेरी उनसे मुलाकात होने लगी।

एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि ‘‘सहयोग कर।मिलजुल के राज चलावे के बा।’’

मैंने कुछ कहा नहीं।

दरअसल उन्हें इस बात का अनुमान नहीं था कि मेरी सक्रिय राजनीति में अब कोई रूचि नहीं है।

खैर, जब उनकी सरकार की कमियां मुझे नजर आने लगीं तो मैं ‘जनसत्ता’ में एक पेशेवर पत्रकार के रूप में लिखने लगा।

उसी अनुपात में वे मुझसे नाराज होने लगे।

हालांकि मंडल आरक्षण का लालू प्रसाद ने जिस तरह बचाव किया और आरक्षण विरोधियों के खिलाफ वे जिस तरह हमलावर रहे,उस काम के लिए मैं उनका प्रशंसक

रहा।मैं सामाजिक न्याय के लिए आरक्षण को जरूरी मानता रहा हूं।

तदनुसार मैं आरक्षण के पक्ष में लिखता रहा।किंतु मैं उनके अन्य विवादास्पद कामों का बचाव नहीं कर सकता था,नहीं किया।

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दरअसल जब कोई पत्रकार किसी नेता की गलतियों को उजागर करता है तो उस नेता के मन में

कई तरह के विचार आते हैं-

जैसे

 1.पत्रकार जातीय भावना से लिख रहा है।

2.-मेरा राजनीतिक विरोधी के इशारे पर लिख रहा है

3.-मेरा भयादोहन करके मुझसे कुछ पाना चाहता है।

आदि .....आदि

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2005 में लालू प्रसाद की पार्टी बिहार की सत्ता से हट गई।

उसके बाद के वर्षों में भी लालू प्रसाद मेरे बारे में जानते-सुनते रहे।

उन्होंने देखा कि अब भी सुरेंदर के चाल,चरित्र चिंतन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तो मेरे बारे में उनके विचार बदले।जिसमें बड़प्पन होता है,वह असलियत जान लेने के बाद अपना विचार बदल लेता है।

बदले हुए विचार के तहत लालू प्रसाद ने कई माह पहले मेरे बारे में जो विचार प्रकट किए,वह 

मेरे लिए ‘‘भारत रत्न’’ के समान है।

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एक पुस्तक लेखक लालू प्रसाद से मिलने रांची जेल में गये थे।

वे जेपी आंदोलन पर लिखना चाहते थे।

उनसे लालू जी ने कहा कि ‘‘यहां काहे  आ गए।पटना में सुरेंदर किशोर से बात कर लीजिए।

जेपी आंदोलन का सब कुछ वह जानता है।ईमानदारी से सब बात बता देगा ।उसमें किसकी कैसी भूमिका थी,वह सब जानता है।

अंत में लालू जी ने मेरे बारे में कहा कि ‘‘सुरेन्दर संत है,फकीर है , 24 कैरेट का सोना है।’’

(लगे हाथ यह भी बता दूं कि अधिकतर पत्रकार सहित समाज के अन्य मुखर वर्ग के लोगों के चाल,चरित्र,चिंतन के बारे में वह नेता सबसे अधिक जानता है जो कम से कम 5 साल तक भी राज्य का मुख्य मंत्री रह चुका हो।अधिक दिनों तक मुख्य मंत्री रह जाने वाला नेता तो और भी अधिक जानता है।)

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अभी वे स्वास्थ्य लाभ कर रहे है।

मैं लालू प्रसाद के दीर्घ जीवन की कामना करता हूं।

इसलिए कि वे बिहार को सतत विकसित होते हुए लंबे समय तक अपनी आंखों से देखें।

जिस तरह मेरे बारे में उनके विचार बदले,उसी तरह वे अपने एक पुराने विचार को भी बदल लें ।

जब वे सत्ता में थे तो उनका यह विचार था कि ‘‘विकास से वोट नहीं मिलते,बल्कि सामाजिक समीकरण से वोट मिलते हैं।’’

अब वे खुद देख लें कि किस तरह विकास से भी वोट मिलते हैं और सामाजिक समीकरण की भी उसमें भूमिका रहती है।

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29 जनवरी 23