शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

 


 भ्रष्टाचार-अपराध के ऊंटों को पहाड़ के नीचे लाने के लिए धन्यवाद--सुरेंद्र किशोर

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चर्चित गैंगेस्टर मुख्तार अंसारी जैसा अपराध जगत का ऊंट अब पहाड़ के नीचे आ गया है।

उधर भ्रष्टाचार जगत के ऊंटों के ‘‘आदेशपालक’’ पुलिस अफसर सचिन वाझे भी 

जांच एजेंसी के मजबूत शिकंजे में हैं।

  यह इस देश की अदालतों की महिमा है कि इतने बड़े -बड़े ‘‘ऊंट’’ भी पहाड़ के नीचे आते जा रहे हैं। अब इनके आका और  लगुए-भगुए भी देर -सवेर कठघरों में होंगे।

 कतिपय शीर्ष नेताओं की मदद से मुख्तार अंसारी दशकों से उत्तर प्रदेश में अपनी बादशाहत चला रहे थे।

  कोई उन्हें छूने वाला नहीं था।

छूने वाले अफसर ही शीर्ष सत्ता द्वारा छूमंतर कर दिए जाते थे।अब स्थिति बदल रही है।

उन्हें दिन में तारे देखने होंगे।

 इसके लिए सुप्रीम कोर्ट का, शांतिप्रिय लोग,न्यायपालिका 

 के शुक्रगुजार रहेंगे।

उधर सचिन वाझे की स्वीकारोक्तियों के कारण महाराष्ट्र के बड़े- बड़े नेताओं के असली चेहरे जल्द ही सामने आएंगे।

  अदालतों की सक्रियता के कारण ही इस देश के कई विवादास्पद नेता व माफिया विभिन्न राज्यों के जेलों में पहले से कैद हैं। 

कुछ अन्य गंभीर आरोपों में मुकदमों का सामना कर रहे हैं।

उनमें से कई जेल के रास्ते में हैं। 

  अदालतें इसी तरह भेदभावरहित होकर सक्रिय रहीं तो सार्वजनिक धन के  बाकी बचे अन्य लुटेरों को भी इसी तरह बुरे दिन देखने पड़ेंगे।

सार्वजनिक धन, आमजन से प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप से वसूले गए टैक्स के पैसों से ही, एकत्र होता है।

सार्वजनिक धन में से अपार राशि शासकों की मदद से कुछ थोड़े लोग यदि लूट लें तो देश का विकास कैसे होगा ?

गरीबों की गरीबी दूर कैसे होगी ?

आंतरिक और बाह्य सुरक्षा बल को मजबूत करने के लिए साधन कैसे जुटेगा ?

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  देश में धन का केंद्रीकरण

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इस देश में अरबपतियों की संख्या बढती जा रही है।

यह संख्या एक साल में 102 से 140 हो गई।

दुनिया के अरबपतियों की सूची में भारत का स्थान तीसरा है।

यानी, इस विकासशील देश में धन का संकेंद्रीकरण हो रहा है।

संविधान निर्माताओं को इस स्थिति का अंदेशा था।

इसीलिए संविधान के नीति निदेशक तत्वों वाले अध्याय में इसकी चर्चा की गई है।

   अनुच्छेद-39 (ग)में यह कहा गया है कि 

देश की ‘‘आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन ओर उत्पादन के साधनों का अहितकारी संकेंद्रण न हो।’’

 अधिकतर सार्वजनिक उपक्रमों की विफलता के कारण भी पूंजीवाद मजबूत हुआ है।

पूंजीवाद धीरे -धीरे एकाधिकार पूंजीवाद में बदलने लगा है।

 आजादी के बाद केंद्र सरकार ने मिश्रित अर्थ -व्यवस्था को बढ़ावा देने की कोशिश की थी।

  इसलिए एक तरफ जहां अनेक निजी उपक्रमों का सरकारीकरण हुआ,वहीं सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों की बड़े पैमाने पर स्थापना की।

 इनमें से कई सार्वजनिक उपक्रम अब भी बढ़िया काम कर रहे हैं।

पर अधिकतर उपक्रम भ्रष्टाचार और काहिली के शिकार हो गए।

   दरअसल जब राजनीति में सदाचार का लोप होने लगा तो उसका कुपरिणाम सार्वजनिक उपक्रमों पर पड़ना ही था।

  यदि अब से भी भ्रष्टाचार और काहिली के खिलाफ सरकारें कठोर हो जाएं तो सार्वजनिक उद्यम बढ़ेंगे।

मिश्रित अर्थ व्यवस्था विकसित होगी । आज जैसा धन का संकेंद्रण नहीं होगा।

क्या ऐसा हो पाएगा ?

पता नहीं।

जिस देश के अधिकतर नेताओं और अफसरों के बीच ‘‘पैसे से  सत्ता और सत्ता से पैसे बनाने की होड़ मची हो,उस देश में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के विकास की संभावना कम ही है।

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  पश्चिम बंगाल का चुनाव बाद परिदृश्य

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पश्चिम बंगाल के साथ -साथ केरल से भी चुनावी हिंसा की खबरें आती रही हैं।

आरोप लगा कि कोझिकोड में मंगलवार को सी.पी.एम.कार्यकत्र्ताओं ने मुस्लिम लीग के एक कार्यकत्र्ता की हत्या कर दी।

  पश्चिम बंगाल से तो आम दिनों में भी अनेक हत्याओं की खबरें आती रही हैं।

पर दोनों हत्याओं में अधिक नहीं तो थोड़ा फर्क जरूर है।

2012 की मई में केरल सी.पी.एम. के इडुकी जिला सचिव एम.एन.मणि ने कहा था कि ‘‘हम अपने राजनीतिक विरोधियों की हत्या करवा देते हैं।’’

उनका यह बयान देश भर के अखबारों में छपा था।

  पर, पश्चिम बंगाल की चुनावी हिंसा उसी तरह की है जिस तरह की हिंसा बिहार में अस्सी-नब्बे के दशकों में हुआ करती थी।

   अभी तो रिजल्ट आना बाकी है।इसलिए यह कहना संभव नहीं है कि बंगाल में अगली सरकार किसकी बनेगी।

मिल रहे अनुमानों के अनुसार किसी पक्ष की सरकार बन सकती है।

ममता बनर्जी की सरकार यदि फिर बन जाए तब तो हिंसा के मामले में भी किसी परिवत्र्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती।

किंतु भाजपा की बनी तो कुछ उम्मीद की जा सकती है।

  हालांकि नजर आने लायक परिवत्र्तन तभी होगा जब पिछली सत्ता से जुड़े बाहुबली, अगली सत्ता के हिस्सा न बन जाएं।

 पिछले दशकों में यही होता रहा है।

पश्चिम बंगाल में 1972 -77 की कांग्रेस सरकार ने नक्सलियों  के सफाए के लिए बाहुबली दस्ते तैयार किए थे।

पर जब 1977 में वाम मोर्चा की सरकार बनी तो उनमेंसे अनेक बाहुबली वाम मोर्चा में शामिल हो गए।

बाद में वही लोग ममता बनर्जी की पार्टी की शोभा बढ़ाने लगे। 

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और अंत में

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बिहार के ताजा मैट्रिक रिजल्ट की मेधा सूची देखी।

92 टाॅपरों में से सिर्फ 14 विद्यार्थियों के नाम के साथ जाति सूचक उपनाम हैं।

खैर, नाम तो उनके अभिभावक ने रखे हैं।

यह किस बात का संकेत है कि अधिकतर लोग जातीय पहचान का प्रदर्शन अब नहीं चाहते।

ऐसा पहले नहीं था।

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कानोंकान,प्रभात खबर

पटना-9 अप्रैल 21



रविवार, 4 अप्रैल 2021

 पश्चिम बंगाल चुनाव 

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ममता बनर्जी द्वारा मुसलमान मतदाताओं को एकजुट रखने की अपील सांप्रदायिकता नहीं है।

लेकिन हिन्दू वोटर एका की अपील सांप्रदायिक हो जाती है।

.......यह कौन सा मेकनिज्म है !

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  ---मीनाक्षी जोशी

  दैनिक जागरण

   4 अप्रैल 21

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संदर्भ 

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मुमहम्मद पुर,बेनी पट्टी ,मधुबनी में एक ही 

परिवार के पांच लोगों का सामूहिक संहार

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यह बात एक बार फिर साबित हुई है।

किस सामाजिक समूह के नर संहार के बाद प्रतिक्रियास्वरूप  किस संगठन,किस नेता और किस बुद्धिजीवी को क्या बोलना 

है,कितना बोलना है या चुप रहना है,यह सब पहले से ही निर्धारित रहता है।

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चुनाव में हारने वाले नेता

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सन 1969 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया।

जनता ने खुश होकर इंदिरा जी को 1971 के लोक सभा चुनाव में भारी बहुमत से जिता दिया।

उस पर जनसंघ अध्यक्ष बलराज मधोक ने कहा कि मतपत्र पर रसियन स्याही का उपयोग किया गया था।यानी , इंदिरा गांधी की जीत फर्जी है।

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इन दिनों जब कांग्रेस को अपने लिए कोई चुनावी उम्मीद 

नजर नहीं आ रही है तो पियंका गांधी कह रही हैं कि 

‘‘चुनाव आयोग ने अपनी रूल बुक से निष्पक्षता वाले पेज को फाड़कर फेंक दिया है।’’

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अपनी गलतियों से नहीं सीख रही कांग्रेस

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17 नवंबर, 2015 को मणिशंकर अय्यर ने पाकिस्तानियों से अपील की थी कि आप नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाओ।

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सन 2019 के लोकसभा चुनाव में अधिक बहुमत 

से मोदी सरकार सत्ता से आ गई।

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गत शुक्रवार को राहुल गांधी ने एक अमरीकी से कहा कि भारत में 2014 के बाद लोकतंत्र बचा नहीं है।फिर भी अमरीका चुप है।

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अब देखना है कि राहुल के इस बयान का कांग्रेस पर कुप्रभाव 

उसी तरह पड़ता है या नहीं जिस तरह का असर मणिशंकर के 2015 के बयान का पड़ा था !

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--सुरेंद्र किशोर-

4 अप्रैल 21


शनिवार, 3 अप्रैल 2021

 समय से पहले और तकदीर से ज्यादा,

कभी किसी को कुछ नहीं मिलता।

रे मनुआ ! निराशा कैसी ?

समय आने पर पूरा मिलेगा,

जो तकदीर में बदा है,वह सब मिलेगा।

          --- अज्ञात 

मार्च 2021


   42 देशों को हथियार बेच रहा है भारत,

   अमेरिका भी लाइन में 

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रक्षा मंत्रालय की रपट के अनुसार भारत फिलहाल 42 देशों को रक्षा सामग्री निर्यात कर रहा है।

 इस देश के आयुध कारखानों द्वारा इस्रायल ,स्वीडन,यूएइ ,ब्राजील, बांग्लादेश, बुलगारिया देशों को हथियारों की बिक्री की जा रही है।

     कतर, लेबनान, इराक, इक्वेडोर व जापान जैसे देशों 

को भारत बाॅडी प्रोटेक्टिंग उपकरण निर्यात कर रहा है।

यू ए इ ने भारत से सर्वाधिक खरीद की है।

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--प्रभात खबर,पटना-

2 अप्रैल 21

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अब सवाल उठता है कि 2014 से पहले आयुध निर्यात की स्थिति क्या थी ?

तब क्या हम सिर्फ आयात ही करते थे या निर्यात भी ?

निर्यात भी तो कितने देशों को ?

क्या यह बात सच है कि हथियारों का आयात जारी रखने व उसे बढ़ाते रहने में 2014 से पहले सत्ताधारियों,पेशेवर दलालों व कुछ बिचैलिए मीडियाकर्मियों का निहितस्वार्थ था ?

क्या जानबूझकर हमारे अपने देश के आयुध कारखानों का विकास-विस्तार  नहीं किया गया ?

क्या इसके पीछे कमीशनखोरी की सुविधा बरकरार रखने की मंशा थी ?

आज हमारे यहां जितने हथियारों का उत्पादन हो रहा है,उसमें बढ़ोत्तरी की भी योजना है ?

इस संबंध में कोई जानकार व्यक्ति हमारा ज्ञान बढ़ाए तो हथियारों की उपलब्धता के बारे में देश की मौजूदा स्थिति का भी पता चलेगा।   

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  --सुरेंद्र किशोर-

2 अप्रैल 21


 जम्मू एंड कश्मीर के डी.जी.पी.रहे शेष पाॅल वैद्य ने लिखा 

 है कि 

‘‘भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगने के एक हफ्ते बीत जाने के बाद भी महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने अब तक इस्तीफा नहीं दिया है।

   यदि वह पुलिस या डी.जी.पी.होते तो इस तरह के आरोप लगने के एक घंटे के अंदर बाहर कर दिए गए होते।

  अफसोस कि हमारे देश के नेताओं में जवाबदेही नाम की कोई चीज नहीं रह गई है।

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2 अप्रैल 21

  


 


 अंचलकर्मियों की घूसखोरी रोकने में सरकार 

ले विधायकों की मदद--सुरेंद्र किशोर 

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बिहार के वैशाली जिले के हाजीपुर अंचल के प्रभारी राजस्व निरीक्षक पर 9 करोड़ 70 लाख रुपए की अवैध कमाई का मामला दर्ज हुआ है।

 एक मामूली पद की इतनी अधिक नाजायज कमाई ? !!

  एक आम धारणा है।

अधिकतर कर्मी जायज काम के लिए भी आम लोगों से जबरन वसूली करते रहते हैं।

 ऐसे कर्मी अपने लिए व अपने से ऊपर-नीचे के कर्मियों के लिए भी पैसे बनाते हैं।हालांकि सारे कर्मी ऐसा नहीं करते।

अपवादों को छोड़कर इस काम में ऊपर व नीचे के कर्मियों का भी सहयोग रहता है।

कानून यह भी बनना चाहिए कि पकड़ में आए कर्मियों के कंट्रोलिंग अफसरों की संपत्ति की भी साथ- साथ जांच हो।

 अधिकतर विधायकों तक ऐसे गोरखधंधे की खबरें पहुंचती रहती हंै।

पर,वे आम तौर पर चुप रहते हैं।

उसके कई कारण होते हैं।

कहते हैं कि विधायकों की शिकायत के बावजूद कई बार सरकार ऐसे भ्रष्ट कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती।

उधर आम लोग रोज-रोज थाने-अंचल कार्यालयों से प्रताड़ित होते रहते है।अपवादों को छोड़ दें तो उनके जायज काम भी नजराने-शुकराने  के बिना नहीं होते।

  यदि राजनीतिक कार्यपालिका चाहे तो अपने विधायकों से भ्रष्टाचार कम करने में ठोस सहयोग ले सकती है।

तय हो जाए कि जो विधायक जिला व अंचल स्तर के भ्रष्ट सरकारी कर्मियों के भ्रष्टाचार की गुप्त रूप से अधिक से अधिक ठोस सूचना देंगे,उन्हें अगली बार टिकट मिलने की अधिक गुंजाइश रहेगी।

यदि जानकारी रहने के बावजूद सूचना नहीं दें तो टिकट कटने के अधिक चांस रहेंगे।

क्या राजनीतिक दल ऐसा कर पाएंगे ?

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घूसखोरी कम तो सरकार की बेहतर छवि 

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  हाजीपुर के राजस्व कर्मचारी की नाजायज कमाई की भारी   मात्रा देखकर यह साफ है कि घूस के लिए आम लोगों को उसने कितना प्रताड़ित किया होगा।

 आम जनता का ऐसे छोटे पदों पर बैठे कर्मियों से ही अधिक पाला पड़ता है।

इनके भ्रष्टाचार के कारणा आमलोगों में सरकार की छवि खराब होती है।

क्योंकि नीचे स्तर के भ्रष्ट कर्मी सच या झूठ कहते रहते हैं कि हमें तो ऊपर भी देना होता है। 

   यदि स्थानीय विधायक आम लोगों को भ्रष्ट अफसरों से बचाएं या बचाने की कोशिश करें तो उनकी लोकप्रियता भी न सिर्फ बनी रहेगी,बल्कि बढ़ेगी भी।

अब राज्य स्तर के नेतृत्व पर यह जिम्मेदारी आती है।वे अपने विधायकों से कहें कि वे अपने क्षेत्र में ऊपरी आय वाले सरकारी पदों पर बैठे कर्मियों व अफसरों पर निगरानी रखें।

 ताकि, वे जनता में सरकार की छवि और अधिक खराब न कर सकें।क्या ऐसा हो पाएगा ?

लगता तो नहीं है,पर कोशिश करने में क्या हर्ज है !

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नाम के साथ पद्मश्री 

लगाना नियम विरूद्ध


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 सरकार जिस नियम को लागू नहीं कर पा रही होती है,उसे समाप्त ही कर देना चाहिए।

  नियम है कि भारत रत्न व पद्म सम्मान प्राप्त व्यक्ति उसका इस्तेमाल अपने नाम के साथ टाइटिल के रूप में नहीं कर सकता।

पर, इस देश के अनेक सम्मानित लोग इस नियम की धज्जियां उड़ाते पाए जाते हैं।

  2013 में तेलुगु फिल्मों की हस्तियों मोहनबाबू और ब्रह्मानंदम का मामला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में गया था।

उन पर आरोप था कि वे पद्मश्री शब्द अपने नामों के साथ जोड़ते हैं।

  23 दिसंबर, 2013 को हाईकोर्ट ने गृह मंत्रालय को निदेश दिया कि वह इनके पद्म पुरस्कार को वापस लेने के लिए राष्ट्रपति से सिफारिश करे।

 इन हस्तियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सुप्रीम कोर्ट से कहा गया कि वे नियम की जानकारी के अभाव में ऐसा कर रहे थे।

अब नहीं करेंगे।

  इस आश्वासन पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को स्थगित कर दिया।

  इस प्रकरण के बाद भी आज देश के अनेक महानुभाव अपने नाम के आगे या पीछे पद्मश्री जोड़ लेते हैं।

कुछ सज्जन तो अपने मकान के नेम प्लेट में भी ऐसा ही लिखवा लेते हैं।

अखबारों में उनके बयान और लेख भी कई बार पद्मश्री सहित उनके नाम के साथ छपते हैं।

 लेटरहेड, निमंत्रण पत्र, पोस्टर, किताब आदि में इसका इस्तेमाल  करते रहते हैं।

  यदि शासन इसे नहीं रोक सकता तो ऐसे नियम को बनाए रख कर सरकार अपना उपहास क्यों कराती रहती है ?

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  पीठासीन पदाधिकारी सम्मेलन 

  बुलाने की जरूरत

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किसान विधेयक पर राज्य सभा में गत वर्ष अभूतपूर्व व अशोभनीय हंगामा हुआ।

पिछले दिनों कर्नाटका विधान परिषद के उप सभापति को कई विधान पार्षदों ने मिलकर टांगा और उन्हें उनकी कुर्सी से हटा दिया।

हाल में बिहार विधान सभा के भीतर व बाहर जिस तरह के शर्मनाक दृश्य उपस्थित हुए,वह आम 

लोगों ने भी अपने टी.वी.चैनलों पर देखा।

इस देश की विधायिकाओं का यह हाल देखकर नई पीढ़ी शर्मसार होती रहती है।

क्या अब समय नहीं आ गया है कि हमारे हुक्मरान लोकतांत्रिक 

संस्थाओं को और अधिक शर्मसार करने वालों से लोकतंत्र के मंदिर को यथाशीघ्र बचा लें ?

  अखिल भारतीय पीठासीन पदाधिकारियों का विशेष सम्मेलन बुलाकर उसमें पतन को रोकने के उपाय ढूंढे़ जाने चाहिए।

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और अंत में

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गत साल अगस्त में शिवसेना नेता संजय राऊत ने कहा था कि दुनिया मुम्बई पुलिस की क्षमता को जानती है।

इसकी तुलना स्काॅटलैंड यार्ड (लंदन पुलिस )से की जाती है।

यदि संजय राऊत की टिप्पणी का तब पता चला होगा तो उस समय तो लंदन पुलिस को यह तुलना शायद अच्छी लगी होगी।

किंतु अब मुम्बई पुलिस के निलंबित अधिकारी सचिन वाझे के सनसनीखेज कारनामों की खबरें सुनकर लंदन पुलिस को कैसा लग रहा होगा ?

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कानोंकान,प्रभात खबर,पटना, 2 अप्रैल 21


  



 



लोकतंत्र को शर्मसार करने के बदले अदालत जाना सम्मानजनक कदम-सुरेंद्र किशोर

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  बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक, 2021 को बिहार विधान मंडल ने पारित कर दिया।

अब उस विधेयक पर राज्यपाल की स्वीकृति भी मिल ही जाएगी।

फिर वह कानून का स्वरूप ग्रहण कर लेगा।

यदि प्रतिपक्ष को उस कानून पर एतराज है तो वह अदालत की शरण ले सकता है।

  अदालत जो भी फैसला करे, वह सबको मान्य होना चाहिए।

लेकिन उसको लेकर सदन के भीतर और बाहर हंगामा करने से न तो प्रतिपक्ष को कोई उपलब्धि हासिल हुई और न ही उसका सम्मान बढ़ा।

उल्टे अनेक लोगों को ‘जंगल राज’ की याद आ गई।

शांतिपूर्ण धरना,अनशन या सत्याग्रह में जितना नैतिक बल है,उतना तोड़-फोड़,हिंसा और गाली -गलौज में नहीं है।

यह बात कई बार साबित हो चुकी है।        

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     सी.पी.एम.ने किया था बंगाल 

     विधान सभा का बहिष्कार

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भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(माक्र्सवादी) ने पूरे पांच साल(1972-77) तक पश्चिम बंगाल विधान सभा का बहिष्कार किया था।

सन 1972 में वहां विधान सभा का चुनाव हुआ था।

सी.पी.एम.को सिर्फ 14 सीटें मिली थीं।जबकि, उसके पहले के आम चुनाव में सी.पी.एम.को 113 सीटें मिली थीं।

1967 से 1972 तक मिलीजुली सरकारें बनीं,बिगड़ीं।

पर ं1972 में बड़े बहुमत से कांग्रेस सत्ता में आई थी।

सिद्धार्थ शंकर राय मुख्य मंत्री बन गए।

सी.पी.एम. ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने चुनाव में धांधली की।जबकि दूसरे सूत्रों के कहा कि 

बांग्ला देश के निर्माण में कांग्रेस की केंद्र सरकार के योगदान का लाभ पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस को मिला।

  सी.पी.एम.के सभी 14 सदस्यों ने पूरे पांच तक विधान सभा का बहिष्कार किया।

तब यह सुना गया था कि चुने गए 14 सी.पी.एम. सदस्यों ने न तो विधान सभा सचिवालय में अपनी हाजिरी बनाई और न ही वेतन-भत्ता  उठाया।

यदि उन दिनों विधायक चुनाव क्षेत्र फंड का प्रावधान होता तो संभवतः उसका भी सी.पी.एम. बहिष्कार ही करती।तब राजनीति में शुचिता बाकी थी।

अब जब बिहार में राजद यह कह रहा है कि वह विधान सभा का बहिष्कार कर सकता है।

  क्या यह संभव है ?क्या यह उचित है ?क्या यह व्यावहारिक है ?अच्छा तो होगा कि राजद अपने रुख में बदलाव करे।

प्रतिपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है।

यदि बदलाव नहीं हुआ तो एक सवाल उठेगा।

आज किस दल के कितने विधायक उतना त्याग करने को तैयार होंगे जितना त्याग सी.पी.एम.विधायकों ने किया था ? 

  दिल्ली के उप राज्यपाल को ज्यादा शक्तियां देने वाले विधेयक को संसद ने पास कर दिया।

  आम आदमी पार्टी ने उसके खिलाफ अदालत की शरण लेने का निर्णय किया है।

‘आप’ का वह कदम संवैधानिक व सम्मानजनक है।

उसके बदले किसी विधेयक के खिलाफ दंगा करना और  सदन के बाहर-भीतर अशोभनीय कारनामे करना निदंनीय है।

इससे नई पीढ़ी के मन में मौजूदा राजनीति व लोकतंत्र के प्रति खराब धारणा बनती हेै।

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महिला आरक्षण का असर 

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बिहार सरकार की नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं।

इसका सकारात्मक असर कई हलकों पर पड़ा है।

किंतु प्रादेशिक राजधानी पटना में इसका स्पष्ट असर सड़कों पर दिख रहा है।

कुछ भौतिक और अधिक मनो वैज्ञानिक।

  अब अधिक संख्या में महिला सिपाही नगर के विभिन्न हिस्सांे में तैनात दिखाई पड़ती हैं।

  नतीजतन देर शाम नगर में निकलने वाली सामान्य महिलाएं भी अब खुद को पहले की अपेक्षा अधिक सुरक्षित महसूस करती हैं।

   हालांकि महिला सुरक्षाकर्मियों के सामने कुछ कठिनाइयां भी हैं।

 महिला कर्मियों के लिए नगर में शौचालयों की कमी है।

 शौचालय हैं जरूर,किंतु पर्याप्त संख्या में नहीं हैं।हाल में पटना में दर्जनों जगह शौचालय बनाए गए हैं।

किंतु उनकी संख्या और भी बढ़ाई जानी चाहिए।खासकर ट्रैफिक पोस्ट के आसपास।

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    अशिष्ट व्यवहार हानिकारक 

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इस देश-प्रदेश का समकालीन राजनीतिक इतिहास हमें एक खास तरह की सीख देता है।

वह सीख यह है कि जो नेता राजनीति में अशिष्टता,अश्लीलता और बाहुबल के इस्तेमाल को अपना हथियार बनाते हंै,उनकी राजनीति अधिक टिकाऊ नहीं होती।

इसके बावजूद अनेक लोग  वह सीख ग्रहण नहीं करते।यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति  है।

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 सोना तस्करी बना चुनावी मुद्दा

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राजनीति के इस ‘‘अर्थ युग’’ ऐसे -ऐसे नेताओं व दलों पर भी अब ऐसे -ऐसे आरोप लग रहे हैं जिस तरह के आरोप पहले नहीं लगते थे।

 केरल के वामपंथी मुख्य मंत्री पर 

चुनाव प्रचार के दौरान 

सोना तस्करों से संबंध रखने का आरोप लग रहा है।

कम्युनिस्ट खास कर सी.पी.एम.नेताओं पर भ्रष्टाचार के पहले इतने बड़े आरोप नहीं लगा करते थे।

अब लगने लगे हंै।

कम्युनिस्ट नेताओं का निजी जीवन आम तौर पर सादगीभरा होता रहा है।

दूसरे देश के कम्युनिस्टों से साठगांठ रखने के उनपर आरोप जरूर थे,किंतु निजी जीवन आम तौर ठीकठाक रहा।

पर, पश्चिम बंगाल में लंबे समय  तक सत्ता में रहने के कारण छिटफुट आरोप लगने लगे।

तत्कालीन मुख्य मंत्री ज्योति बसु अक्सर यह कहा करते थे कि पार्टी के भीतर के भ्रष्ट तत्वों पर हम कार्रवाई करेंगे।पर सबक सिखाने वाली कार्रवाई नहीं हो सकी।

नतीजतन अनेक राज्यों में स्थिति बिगड़ती चली गई।

अब मुख्य मंत्री पर तस्करों से सांठगांठ का आरोप लगा है।

ऐसे आरोपों से कम्युनिस्ट दल के छोटे- छोटे ईमानदार कार्यकत्र्ताओं का मनोबल टूटता है।

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और अंत में

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 पूणे स्थित सेरम इंस्टिट्यूट आॅफ इंडिया को उम्मीद है कि वह सन 2022 तक कोविड वैक्सीन का करीब चार बिलियन डाॅलर का सौदा करेगा।

  पिछले तीन महीने में कंपनी ने 80 देशों को करीब 250 मिलियन डाॅलर के वैक्सीन बेचे हैं।यह इस देश के लिए बड़ी उपलब्धि है।

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कानोंकान,प्रभात खबर,पटना

26 मार्च 21