Saturday, October 21, 2017

सरदार हरिहर सिंह की नजर में श्रीबाबू

बिहार में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे डा. श्रीकृष्ण सिंह के बारे में तरह -तरह के लोग तरह -तरह के विचार रखते हैं।ऐसा स्वाभाविक ही है क्योंकि उन्होंने आजादी के बाद व पहले की कांग्रेसी राजनीति व शासन को काफी प्रभावित किया था।

   पर एक अन्य मुख्य मंत्री सरदार हरिहर सिंह की नजरों से डा.श्रीकृष्ण सिंह को देखना अधिक महत्वपूर्ण बात होगी।सरदार साहब सन 1969 में बिहार के मुख्य मंत्री बने थे।

डा.श्रीकृष्ण सिंह यानी श्रीबाबू के बारे में सरदार साहब ने लिखा है कि ‘आजादी की लड़ाई के दिनों  श्रीबाबू खास तौर पर युवकों के नेता थे।ऐसे तो वे संपूर्ण जनता के नेता थे,पर अपने उग्र राष्ट्रीय विचारों के कारण वे युवकों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते थे।उनके अपने स्वतंत्र विचार थे।वे किसी के ‘हिज मास्टर्स वायस’ नहीं थे।उनका अपना स्टैंड होता था,इसलिए वे हमारे जैसे युवकों के लिए ग्राह्य और प्रिय थे।

  सरदार हरिहर सिंह खुद भी एक महत्वपूर्ण हस्ती थे और आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उनका नाम सरदार पड़ा था।

   सरदार साहब ने लिखा है कि श्रीबाबू सन 1930 से पहले मुंगेर जिले की राजनीति तक अपने को सीमित रखे हुए थे।वे राज्य के नेतृत्व में भाग लेते थे,लेकिन मुंगेर को अपना मुख्य केंद्र बना कर चलते थे।नमक सत्याग्रह के बाद वे बिहार के राजनीतिक क्षितिज पर छा गये।

तब से लेकर मरते दम तक छाये रहे।याद रहे कि डा.राजेंद्र प्रसाद व डा.अनुग्रह नारायण सिंह सहित कई नेतागण चंपारण सत्याग्रह के समय ही गांधी के साथ हो लिये थे।

  बिहार के  अत्यंत महत्वपूर्ण नेता  डा.अनुग्रह नारायण सिंह को लोग बाबू साहब कहते थे।बाबू साहब के  बारे में सरदार साहब ने लिखा है कि अनुग्रह बाबू से मेरा संबंध 1916 से था।हमारा उनका व्यक्तिगत संबंध था।
हम बाबू साहब के बहुत करीब थे।उनके साथ मेरा घनिष्ठ संबंध था,पर राजनीतिक स्तर पर हम श्रीबाबू से संबंधित थे।राजेंद्र बाबू और बाबू साहब सुधारवादी व नरमपंथी विचार के थे।उस जमाने के लिहाज से श्रीबाबू प्रगतिशील और उग्र विचार के थे।इसी कारण श्रीबाबू को युवको का समर्थन मिला।बहुत से उग्रवादी नेता जैसे राम विनोद सिंह,श्यामा बाबू ,योगेंद्र शुक्ल आदि श्रीबाबू के साथ जाना पसंद करते थे और साथ चले भी।याद रहे सरदार साहब ने क्रांतिकारियों के लिए अपने लेख में उग्रवादी शब्द का इस्तेमाल किया है।

   राजनीति में शालीनता के बारे में हरिहर सिंह ने लिखा कि उस समय के लोगों की सबसे बड़ी बात थी कि  राजनीति में शालीनता थी।श्रीबाबू का अपना स्टैंड जरूर होता था,लेकिन इसका मतलब दूसरे के प्रति अनादर और दुश्मनी नहीं थी।

बाबू साहब हों या राजेंद्र बाबू वे सबका आदर करते थे और सबको सम्मान देते थे।प्रारंभ में बाबू कष्ण बल्लभ सहाय बाबू साहब के साथ थे।उन्होंने 1937 में श्रीबाबू का विरोध किया।उसके बाद वे श्रीबाबू के संपर्क में आये।सहाय जी 1952 में श्रीबाबू के साथ थे।पर 1957 के चुनाव उन्होंने श्रीबाबू को हराने का असफल प्रयास किया।तब बिहार कांग्रेस विधायक दल के नेता पद का चुनाव श्रीबाबू और बाबू साहब के बीच हुआ था।श्रीबाबू जीते।

   उन दिनों की राजनीति की शालीनता का एक और उदाहरण देते हुए सरदार साहब ने लिखा कि एक बार श्रीबाबू महेश प्रसाद सिंह को मंत्री बनाना चाहते थे और बाबू साहब  दीप नारायण सिंह को।एक बार तो लगा कि दोनों में से कोई एक ही मंत्री बनंेगे।क्योंकि दोनों नेता एक ही जिले के थे।पर ंदोनों मंत्री बने । इसमें यह खूबी रही कि डा.अनुग्रह नारायण सिंह ने   महेश प्रसाद सिंह का नाम प्रस्तावित किया और डा.श्रीकृष्ण सिंह ने  दीप नारायण सिंह का।श्रीबाबू के मंत्रिमंडल में अनुग्रह बाबू हमेशा मुख्य मंत्री के बाद दूसरे स्थान पर रहे।

   सरदार साहब के अनुसार श्रीबाबू के भाइयों ने जब आजादी की लड़ाई के दिनों उनका साथ छोड़ दिया था तो महेश प्रसाद सिंह ने श्रीबाबू का साथ दिया था।डा.श्रीकष्ण सिंह का जीवन तो निष्कलंक था,पर महेश प्रसाद सिंह को लेकर कुछ लेागों ने डा.श्रीकृष्ण सिंह  को बदनाम करने की कोशिश की।पर श्रीबाबू ने उपकार का बदला व्यावहारिक ही नहीं,बल्कि सांस्कतिक स्तर पर भी महेश बाबू को चुकाया।जब श्रीबाबू ने अपनी सबसे प्रिय निधि यानी अपनी पुस्तकों को मुंगेर के श्रीकृष्ण सेवा सदन को सौंपा तो उस पुस्तकालय का नाम कमला-महेश पुस्तकालय रखा।लेकिन महेश प्रसाद सिंह ने डा.श्रीकृष्ण सिंह  की उदारता और व्यक्तिगत संबंध का उपयोग अपने को राजनीति में स्थापित करने तथा आगे बढ़ाने में किया।

  अपने खुद के  कटु अनुभव की चर्चा करते हुए सरदार हरिहर सिंह ने लिखा कि सन 1957 के चुनाव में टिकट को लेकर सत्य नारायण सिंह और महेश प्रसाद सिंह ने मेरे नाम का विरोध किया।इसके परिणामस्वरूप मुझे टिकट नहीं मिला।इससे मैं कुछ खिन्न था।बाद की राजनीतिक स्थिति को देखकर मुझे तकलीफ हुई।श्रीबाबू के निधन के कुछ समय पहले मैंने एक दिन कुछ दुःखी होकर कह दिया--‘मरने के वक्त आप भूमिहार हो गये और मैं राजपूत।नहीं तो कोई नहीं जानता था कि हम दोनों एक ही जाति के नहीं हैं।’यह सुनते ही श्रीबाबू रो पड़े।न कोई शब्द थे और न कोई सफाई।मात्र अश्रु धार मेरे सवाल का जवाब दे रहे थे।

(श्रीबाबू के जन्म दिन के अवसर पर विशेष)

Thursday, October 19, 2017

भ्रष्टाचारियों से सार्वजनिक धन बचाने की समस्या

मेरी समझ से भ्रष्टाचार इस गरीब देश की सबसे बड़ी समस्या है। इसी समस्या से अन्य अनेक तरह की समस्याएं पैदा होती रहती  हैं।

मैं 1967 से लगातार सरकारों और नेताओं को कभी नजदीक और कभी दूर से देखने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं।पहले राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप में और बाद में पत्रकार की भूमिका  में।

भ्रष्टाचारवाद यानी पैसावाद यानी धन लोलुपतावाद  ने सभी राजनीतिक विचारधाराओं और वादों को लगभग पछाड़ दिया है।यदि यह जारी रहा तो भविष्य में भ्रष्टाचार और भी घृणित खेल दिखाएगा।

अपवादस्वरूप कई ईमानदार नेताओं को भी देखा है,पर पूरी व्यवस्था में आम तौर पर वे कारगर नहीं हो पाते।क्योंकि वे अल्पमत में होते हैं। चूंकि हर जाति और समुदाय में अच्छे -बुरे लोग हैं,इसीलिए भ्रष्ट लोगों में भी हर जाति और समुदाय के लोग हैं।

आम लोगों में से जो लोग अपनी अगली पीढि़यों के लिए एक बेहतर देश और समाज छोड़कर जाना चाहते हैं,उन्हें मेरी राय में एक काम जरूर करना चाहिए। राष्ट्री स्तर पर  और हर राज्य के पांच सबसे भ्रष्ट नेताओं की पहचान कर उनके खिलाफ अभियान चलाना चाहिए।और इसी तरह पांच सबसे कम भ्रष्ट या ईमानदार नेताओं को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि वे जनहित में और भी अच्छे काम कर सकें।

यदि ऐसा हुआ तो बीच के नेता खुद ही सबक ले लेंगे। यदि नेता सुधर गए तो उसका असर ब्यूरोक्रेसी और अर्थ जगत पर भी पड़ेगा।

 दरअसल ब्यूरोक्रेसी घोड़ा है और सत्ताधारी नेता सवार। सत्ताधारी जमात  किसी भ्रष्ट अफसर को सजा दे सकती है,पर कोई अफसर किसी भ्रष्ट मंत्री को उसके पद से नहीं हटा सकता।

भ्रष्टाचार नामक गंभीर बीमारी के कुछ प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं-

1.-सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि भ्रष्टाचार तो विश्व व्यापी है,इसलिए यदि इस देश में भी है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।उन्होंने यह भी कहा था कि मेरे पिता संत थे,पर मैं पालिटिशियन हूं।

2.-अस्सी के दशक में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि दिल्ली से सौ पैसे चलते हैं,पर उसमें से गांव में जनता तक सिर्फ 15 पैसे ही पहुंचते हैं। 85 पैसे बिचैलिए खा जाते हैं।

3.-नब्बे के दशक में जैन हवाला कांड हुआ था।कम्युनिस्टों को छोड़ कर लगभग सभी दलों के दर्जनों नामी -गिरामी  नेताओं ने हवाला कारोबारियों से रिश्वत ली।वही हवाला कारोबारी कश्मीरी आतंकवादियों को भी पैसे पहुंचाते थे।उन्हें नेताओं का संरक्षण चाहिए था,इसलिए उन्होंने रिश्वत दी थी। नेताओं को मिली अधिकत्तम राशि 10 करोड़ और न्यूनत्तम राशि 25 हजार रुपए थी। लाभान्वितों में एक पूर्व प्रधान मंत्री और कई पूर्व व वर्तमान केंद्रीय मंत्री शामिल थे।

सी.बी.आई.ने इस केस को रफा -दफा कर दिया।करना पड़ा क्योंकि इतने बड़े नेताओं पर वह कैसे कार्रवाई करती।सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में मन मसोस कर रह गया।

4.-कोई भी राजनीतिक दल आज चुनाव आयोग को अपने राजनीतिक चंदे का पूरा हिसाब देने को तैयार नहीं है।अधूरा देते हैं।यहां तक कि कम्युनिस्ट पार्टियां भी पूरा हिसाब नहीं देतीं।आखिर क्यों भाई ?

 5.-हमारे देश के प्रभावशाली नेतागण सांसद क्षेत्र विकास फंड को बंद करने के लिए तैयार नहीं हैं जबकि प्रशासनिक सुधार आयोग इसे खत्म करने की बहुत पहले सिफारिश कर चुका है।यह फंड राजनीति को दूषित करने वाला एक प्रमुख कारक बना हुआ है। 

6 - इस  देश के अधिकतर सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों के लिए दवाएं और रूई -पट्टी तक उपलब्ध नहीं है क्योंकि सरकार के पास पैसे नहीं हैं। गरीब लोग एम्बुलेंस के अभाव में अपने परिजन की लाश  ठेला और कंधे पर ढोकर ले जाने को मजबूर हैं। क्योंकि एम्बुलेंस खरीदने के लिए सरकार के पास  पैसे नहीं हैं।पर यहां  के सासंद अपने वेतन-भत्ते खुद ही बढ़ा लिया करते हैं । जहां के अधिकतर नेतागण गरीब जनता की मूलभूत समस्याओं के प्रति भी ऐसे संवेदनहीन हों,वहां भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या होगी ही।
          अब तो आम लोगों के पास भी सोशल मीडिया की ताकत उपलब्ध है। उन्हें जाति ,सम्प्रदाय और विचारधारा से ऊपर उठकर भ्रष्टाचार के राक्षसों को पहले पराजित करने की कोशिश करनी चाहिए।इस बात की परवाह किए बिना कि वे सफल होंगे या नहीं।  भले सफल नहीं हुए, पर 1857 में इस देश के बहादुर लोगों ने विदेशी ताकतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी न !
         भ्रष्टाचारियों के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ लड़ाई पूरी हो जाने के बाद  फरिया लीजिएगा कि इस देश में समाजवादी व्यवस्था चलेगी ,साम्यवादी व्यवस्था या पूंजीवादी।
        अभी तो भ्रष्टाचार के गिद्धों के चंगुल से देश के संसाधनों को बचाने की समस्या प्रमुख है।इसे बचाने की ईमानदार कोशिश नहीं करने पर अगली पीढि़यां हमें माफ नहीं करेंगी। 

एक बार फिर निकलेगा बंद बोफर्स का जिन्न ?


बोफर्स तोप खरीद घोटाले से संबंधित बंद केस सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर खुलने जा रहा है।राजनीतिक महत्व के इस केस को  बंद कर देने का निर्णय 2005 में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया था।तब की सरकार ने सी.बी.आई. को अपील की अनुमति नहीं दी थी।
 अजय अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली हाई कोर्ट के उस निर्णय को चुनौती दी है।सुप्रीम कोर्ट जल्द ही उस मामले की सुनवाई करेगा।
 इस बीच निजी जासूस माइकल हर्शमैन ने इसी महीने इस घोटाले के संबंधित कुछ नये और सनसनीखेज खुलासे किए हैं।हर्शमैन ने बोफर्स घोटाले का संबंध पाकिस्तान से भी जोड़ दिया है।
 यदि केस आगे बढ़ा  तो यह सवाल भी उठेगा कि उसे आखिर बंद ही क्यों किया गया था ? किसे बचाने के लिए यह काम किया गया था ?
  यह सवाल  भी उठेगा  कि 2005 में केंद्र  सरकार  ने जांचकत्र्ता सी.बी.आई.के हाथ  क्यों बांध दिए थे ?
   भारत सरकार के ही आयकर न्यायाधिकरण ने 2010 में यह कह दिया था कि बोफर्स के  दलाल ‘क्वात्रोच्चि और बिन चड्ढा को बोफर्स तोप खरीद की  दलाली के 41 करोड़ रुपए मिले थे।ऐसी आय पर भारत में उन पर टैक्स की देनदारी बनती है।’
तो फिर  तब सरकार ने उनसे टैक्स क्यों नहीं वसूला ? 
 बोफर्स एक अच्छी तोप है,पर इससे भी बेहतर तोप फ्रंास की सोफ्मा खरीद के लिए तब उपलब्ध थी।क्या सोफ्मा को छोड़कर बोफर्स की खरीद इसलिए हुई क्योंकि सोफ्मा कंपनी दलाली नहीं देती थी ? 
सी.बी.आई. ने स्विस बैंक की लंदन शाखा में बोफर्स की दलाली के पैसे का पता लगा लिया था।वह क्वात्रोचि के खाते में था।
उस खाते को गैर कांग्रेसी शासन काल में सी.बी.आई.ने जब्त करवा दिया  था।पर बाद में मन मोहन सिंह सरकार के एक अफसर ने लंदन जाकर उस खाते को क्यों खुलवा दिया ? न सिर्फ क्वात्रोचि को भारत से भाग जाने दिया गया,बल्कि उसने लंदन बैंक से अपने खाते से वे पैसे भी निकाल लिए ।ऐसा किसकी साठगांठ से हुआ ? इसके पीछे कोई उच्चस्तरीय साजिश थी ?
इस तरह के कई अन्य सवाल भी उठेंगे।
बोफर्स तोप खरीद घोटाले के शोर के बीच  1989 में हुए लोक सभा चुनाव में कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हो गयी थी।
 क्या उस केस के फिर से खुलने पर उस का असर अगले चुनावों में पर भी पड़ेगा ?  


Wednesday, October 18, 2017

विभाजित मीडिया के बीच पाठक-श्रोता बेचारा !

इन दिनों पाठकों और दर्शकों की ओर से इस बात की अक्सर  शिकायतें मिलती रहती हैं कि कुछ  मीडिया समूह खास कर कुछ इलेक्ट्राॅनिक मीडिया संस्थान एकतरफा हो गये हंै। उनमें से एक उत्तर है तो दूसरा बिलकुल दक्षिण।पेशेवर निष्पक्षता का अभाव है। हालांकि  अनेक  मीडिया संस्थान अब भी अपनी निष्पक्षता बनाए रखने की कोशिश करते  हैं।

पर सवाल है कि ऐसा कब नहीं था ? कमोवेश पहले भी था।
पहले कम था।अब अधिक है। आजादी के तत्काल बाद तो कुछ अत्यंत बड़े सत्तासीन नेताओं के  अपने -अपने कुछ खास  करीबी पत्रकार थे। वे तब के बड़े पत्रकारों में  थे।

कुल मिलाकर मीडिया के एक हिस्से का एकतरफा व्यवहार थोड़ा- बहुत पहले भी था। पचास के दशक में सत्ताधारियों पर यदि मुख्य धारा का मीडिया आम तौर पर मोहित था तो उसका  कारण भी था।उन लोगों  ने आजादी जो दिलाई थी।वे देश के हीरो थे। उनकी कुछ गलतियांे को भी मीडिया के एक हिस्सा समय -समय पर नजरअंदाज  कर देता था।
पर साठ -सत्तर के दशकों से इस मामले में  फर्क आने लगा।

 साठ-सत्तर के दशकों में मैं तीन साप्ताहिक पत्रिकाएं अक्सर पढ़ता था - ब्लिट्ज, दिनमान और करंट।

ब्लिट्ज वामपंथी था तो करंट दक्षिणपंथी।‘दिनमान’ मध्यमार्गी - डा.राम मनोहर लोहिया के प्रति सहानुभूति से भरा हुआ। तब एक बार तो ‘दिनमान’ में एक पाठक की चिट्ठी छपी थी- ‘आप अपनी पत्रिका का नाम दिनमान के बदले लोहियामान क्यों नहीं रख देते ?’

सच्चिदानंद वात्स्यायन तब संपादक थे।संपादक की टिप्पणी भी उस पत्र के साथ छपी थी।याद रहे कि दिनमान में उनका पूरा नाम नहीं छपता था।
उनका पूरा नाम था-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय। 
खैर,मेरे जैसे सजग पाठक तीनों पत्रिकाओं के अध्ययन के बाद देश-विदेश और राजनीति का पूरा हालचाल जान लेते थे।

पर समय बीतने के साथ बाद के दशकों में और फर्क आने लगा। वह फर्क कुछ सत्ताधारी नेताओं के मीडिया के प्रति अति संवदेनशील और रुखा हो जाने के कारण हुआ ।

 जवाहरलाल नेहरू और मोरारजी देसाई जैसे नेता मीडिया के प्रति आम तौर पर निरपेक्ष थे।दुर्गादास जैसे एक -दो घटनाएं अपवाद जरूर थीं।मशहूर स्तम्भकार दुर्गादास के खिलाफ प्रधान मंत्री ने एक अखबार के मालिक से शिकायत की थी।

वैसे नेहरू जी का प्रिय अखबार ‘हिंदू’ था।

कतिपय कारणों से कुछ दिनों के लिए नेहरू जब ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ और उसी ग्रूप के साप्ताहिक ‘द इलेस्टे्रटेड विकली आॅफ इंडिया’ से नाराज थे तो उन्होंेने तीन मूत्र्ति भवन में टाइम्स आॅफ इंडिया और ‘विकली’ मंगवाना बंद करवा दिया था।पर उन्होंने अखबार की आर्थिकी को क्षति पहुंचाने के लिए कोई  कार्रवाई  की, ऐसी कोई खबर नहीं है।
वामपंथी ‘ब्लिट्ज’ मोरारजी देसाई के खिलाफ अभियान चलाता था।उस पर मोरारजी की यही प्रतिक्रिया होती थी कि ‘मैं तो ब्लिट्ज पढ़ता ही नहीं।’

 एम.एस.एम.शर्मा के संपादकत्व में जब पटना के चर्चित दैनिक ‘सर्चलाइट’ ने बिहार के तत्कालीन मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंह के खिलाफ आपत्तिजनक खबरें परोसनी शुरू कीं तो जनसंपर्क विभाग के एक अफसर ने मुख्य मंत्री से कहा कि आप कार्रवाई क्यों नहीं करते ?

अफसर उम्मीद करता था कि मुख्य मंत्री सर्चलाइट को मिल रहा सरकारी विज्ञापन बंद करा देंगे।

पर,मुख्य मंत्री ने कहा कि मैंने तो बहुत कठोर कार्रवाई कर दी है।अफसर ने कहा कि हमारे यहां तो ऐसा कोई आपका निदेश अभी आया  नहीं है।इस पर मुख्य मंत्री ने कहा कि मैंंने सर्चलाइट पढ़ना ही बंद कर दिया है।किसी अखबार के खिलाफ इससे बड़ी कार्रवाई और कौन सी हो सकती है ?
दरअसल नेहरू, मोरारजी और श्रीबाबू जैसे नेताओं को यह लगता था कि जब जनता हमारे साथ है तो अखबारों के कुछ लिख देने से कोई  फर्क नहीं पड़ जाएगा।

  पर बाद के दशकों में जब कुछ विवादास्पद  नेता सत्ता में आने लगे तो उन्होंने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि उनके कुकर्माें की चर्चा अखबारों में न हो।होने पर अखबारों का भयादोहन शुरू हो गया।प्रेस पर अंकुश लगाने के लिए बारी- -बारी से बिहार और केंद्र सरकारों ने प्रेस विधेयक भी लाए। यदाकदा अखबारों के सरकारी विज्ञापन बंद होने लगे।

संपादक गिरफ्तार होने लगे। नेताओं  के कहने पर पत्रकार नौकरी से निकाले जाने लगे। या उनका तबादला होने लगा। इसका सीधा  असर अखबार की आर्थिकी पर पड़ा।

अखबार तो व्यवसायी ही निकालते हैं।जब राजनीति में ही गिरावट आने लगी तो व्यापारियों ने  समाज सुधार का ठेका तो ले नहीं रखा था। इसलिए रामनाथ गोयनका जैसे कुछ अत्यंत थोड़े से अपवादों  को छोड़कर अधिकतर अखबार मालिकों ने सरकारों के साथ तालमेल रखने में ही अपने उद्योग धंधे , अखबार तथा उसके स्टाफ का भला  समझा। 

मालिकों के साथ -साथ अधिकतर संपादकों को भी अखबार की आर्थिकी का ध्यान रखना पड़ा।संपादक ध्यान रखेंगे तो संपादकीय स्टाफ को भी रखना ही पड़ेगा। सरकार के खिलाफ खबरें आम तौर पर नहीं रुकीं,पर अभियानी पत्रकारिता पर काफी हद तक अंकुश लगा।

इलेक्टा्रॅनिक मीडिया के इस दौर में तो मीडिया के संचालन का खर्च बेशुमार बढ़ गया। अपवादों को छोड़ दें तो सबको कहीं  से भी पूंजी लाने, बचाने और बढ़ाने की चिंता रहने लगी। इस स्थिति में मीडिया के बड़े हिस्से के समक्ष संबंधित सरकार से सह अस्तित्व बना कर चलने की मजबूरी रही है।

इस देश में मीडिया का एक हिस्सा ऐसा भी है जो प्रतिपक्ष के एक हिस्से से तालमेल बैठाए हुए है ताकि जब वे सत्ता में आएंगे तो इनके भी अच्छे दिन आ जाएंगे।कुछ मामलों में विचारधारा भी हावी है।

एक जमाने में एक पेशवर यानी निष्पक्ष मीडिया के एक बड़े अधिकारी ने कहा था कि ‘यदि दुनिया में कहीं कम्युनिज्म आ रहा है तो हम उसे रोकने की कोशिश नहीं करेंगे।या कहीं से जा रहा है तो उसे बचाने की भी चेष्टा नहीं करेंगे।हम सिर्फ रिपोर्ट करेंगे कि फलां देश में आ रहा है और फलां देश से जा रहा है।’

अब ऐसी बात आम तौर से नहीं है।अपवादों की बात और है। कुल मिलाकर मोटा -मोटी यही स्थिति है।इसे ही स्वीकारना है।पाठकों -श्रोताओं के पास कोई और रास्ता भी नहीं है। रास्ता वही है जो मैं साठ -सत्तर के दशकों में करता था। सभी पक्षों की सुनिए,पर अपने मन की करिए। यानी आज के मीडिया के बीच के ‘ब्लिट्ज’, ‘दिनमान’ और ‘करंट’ तीनों को  वाॅच  करते रहिए। फिर किसी नतीजे पर पहुंचिए।

Saturday, October 14, 2017

स्वच्छ भारत के लिए सफाई का ‘सूरत माॅडल’ जरूरी



प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि चाहे जितने महात्मा गांधी और  नरेंद्र मोदी आ जाएं, जब तक व्यापक जन भागीदारी नहीं होगी ,देश में स्वच्छता नहीं लाई जा सकती।
  इस तरह प्रधान मंत्री ने यह स्वीकार किया कि उनका महत्वकांक्षी 
स्वच्छ भारत अभियान फिल्हाल  विफल रहा।
 पर इस संबंध में उम्मीद की किरण खुद गुजरात के सूरत से आती रही है।उसे खुद प्रधान मंत्री ने भी नजरअंदाज कर दिया है।
यदि उन्होंने पूरे देश में सफाई का ‘सूरत माॅडल’ लागू करवाने का प्रयास किया होता तो शायद उनका स्वच्छता अभियान इस तरह विफल नहीं होता।
 एक बात तो समझ ही लेनी चाहिए । पूरे देश में स्वच्छता अभियान की सफलता के लिए यह जरूरी है कि पहले नगरों और महा नगरांे की सफाई हो।बाद में अन्य स्थानों के लोग उससे सबक और प्रेरणा लेंगे।
  अन्यथा वह दिन दूर नहीं कि  नगरों-महा नगरों में महामारी फैल सकती है जैसा भारी गंदगी के कारण मई, 1995 में सूरत में फैला  था।
 तब वहां प्लेग से 52 लोगों की मृत्यु हो गयी थी।सूरत से लोगों का पलायन होने लगा था।
 पर इस स्थिति को बदलने मंे एक आई.ए.एस.अफसर, एस.आर.राव ने ऐतिहासिक काम किया था।
 थोड़े ही समय में उन्होंने सूरत को गुजरात का सर्वाधिक स्वच्छ नगर बना दिया।पूरे देश में भी तब से सूरत को नमूने के रूप में पेश किया जाने लगा ।
इस काम के लिए उस अफसर की इतनी तारीफ हुई कि लोगबाग उनका आॅटोग्राफ लेने लगे थे।
  श्री राव  सूरत के नगरपालिका आयुक्त थे।
राव ने सबसे पहले  अपने अधीनस्थ अफसरों को ए.सी.दफ्तरों से बाहर निकाल पर सड़कों पर खड़ा कर दिया।उन्हें उस काम में लगा दिया जिस काम के लिए उन्हें वेतन मिलता था।
 साथ ही उन्होंने बड़े -बड़े नेताओं और बिल्डरों की नाराजगी की परवाह किए बिना नगर से अतिक्रमण हटवा दिया।जो अमीर लोग अधिक गंदगी  फैलाते थे,उन पर सबसे पहले कार्रवाई हुई।
इसके अलावा भी उन्होंने कई कदम उठाए।
ऐसे कदमों के कारण न सिर्फ जनता वाहवाह कह उठी,बल्कि उसे अफसर को बाद में जन भागीदारी का भी पूरा लाभ मिला।  क्या प्रधान मंत्री जी राज्य सरकारों की मदद से देश के कम से कम एक दर्जन नगरों में ‘सूरत माॅडल’ नहीं दुहरा सकते हैं ? शुरूआत छोटे पैमाने पर ही  हो।बाकी बाद में करने लगेंगे।
 तमाम गिरावट के बावजूद अब भी इस देश में एस.आर.राव जैसे कुछ अफसर मिल जाएंगे ।पर शत्र्त है कि निहितस्वार्थियों के कोप से ऐसे अफसरों को  बचाना सरकार का काम है।
  यदि पटना, वाराणसी और दिल्ली जैसे महा नगरों को सफाई के मामले में ‘सूरत’ बना दिया गया तो छोटी जगहों के लोगबाग भी उसका अनुसरण करेंगे।
 लोगों से सफाई की अपील करने से  पहले सरकारों को चाहिए कि वे अपने महा पालिकाओं के अफसरों और कर्मचारियों को टाइट करें।जरूरत के अनुसार उनकी संख्या बढ़ाएं।
आप देश के नगर और महा पालिकाओं के अधिकतर अफसरों 
को जनता के पैसे लूटने की छूट दिए रहेंगे और जनता से कहेंगे कि वह सफाई करे तो यह तो जनता के प्रति अन्याय है।
 भगवान भी उसी की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करता है।पहल तो शासन को ही करनी होगी।
  अतिक्रमणकारियों का अमानवीय रवैया
पूरे बिहार के शहरी क्षेत्रों में मुख्य सड़कों पर भी अतिक्रमणकारियों का ही राज चलता है।उन्हें पुलिस और नगर निकायों के भ्रष्ट अफसरों से  पूरा सहयोग मिलता है।
‘गरीबों की रोजी -रोटी’ के बहाने सरकार भी उन पर कभी कड़ाई नहीं करती। वैकल्पिक व्यवस्था का आश्वासन भी पूरा नहीं किया जाता।बेचारी अदालत भी लाचार नजर आती है।
 स्मार्ट सिटी के शोर के बीच दरअसल अतिक्रमणकारियों ने न सिर्फ नगरों की सूरत बिगाड़ कर रख दी  है बल्कि वाहन चालकों के लिए  तो रोज ही ‘मरण’ का दिन होता है।
  भारी अतिक्रमणों से  लगातार हो रहे जाम के कारण कई बार न तो गंभीर मरीज समय पर अस्पताल जा पाते हैं और न छात्र-शिक्षक स्कूल -कालेज।
 सरकारी कमियों के लिए भी यह एक अच्छा -खासा बहाना मिल गया है।लेट पहुंचने पर वे अपने नियंत्रक पदाधिकारी  से आसानी कह देते  हैं कि ‘क्या करें सर, जाम में फंस गए थे।’ सड़कों की हालत देखकर अफसरों को भी उनकी बात मान लेनी पड़ती है।
जब अतिक्रमणकारी शासन से  लड़कर भी अपनी जगह पर बने रहते हैं तो अन्य कानून तोड़कों का भी मनोबल बढ़ता है।इस तरह शासन का दबदबा  कम होता है।इसका असर आम कानून-व्यवस्था पर भी पड़ता है। 
 इतनी बड़ी कीमत चुका कर सरकार अतिक्रमणकारियों के प्रति नरम बनी हुई है।ऐसा करके वह गरीबों की रोजी- रोटी की रक्षा कर रही है।अरे भई, उनके लिए कोई अन्य वैकल्पिक उपाय भी ढंूढ़े जा सकते हैं।यदि आपने शहर बसाया है तो क्या उस पर सिर्फ अतिक्रमणकारियों का ही राज चलेगा ? अन्य आम बांशिंदे कब तक कष्ट झेलते रहेंगे ?
     संघ प्रमुख का समयोचित आह्वान
  आर.एस.एस.प्रमुख मोहन भागवत ने आरा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय  धर्म सम्मेलन के मंच से एक अच्छी बात कही है।उन्होंने आह्वान किया है कि  लोगों को उंच-नीच की भावना से उपर उठकर जाति विहीन भारत का निर्माण करना चाहिए।
   संघ प्रमुख के इस आह्वान को कार्य रूप देने की दिशा में खुद संघ कई तरह से महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
 दरअसल संघ के कुछ प्रमुख नेता समय-समय पर पिछड़ों के लिए सरकारी नौकरियों में दिए गए जारी आरक्षण को लेकर तरह-तरह के बयान देते रहते हैं।हालांकि संघ दावा करता  है कि वह आरक्षण के खिलाफ नहीं है।वह उसमें सुधार चाहता है।
पर ऐसे बयानों से आरक्षण के दायरे में आने वाले समूहों को यह नाहक आशंका होने लगती है कि संघ आरक्षण पर ही पुनर्विचार के पक्ष में है।पिछड़ों -दलितों के लिए आरक्षण का प्रावधान भी जातीय भेदभाव कम करने की दिशा में एक छोटा सा कदम ही है।यह एक संवैधानिक प्रावधान है जिस पर 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी मुहर लगा दी है।
  इसलिए संघ यदि अपने परिवार के राजनीतिक संगठन  भाजपा को उलझन में नहीं डालना चाहता है तो उसके बड़े नेताओं को चाहिए कि वे आरक्षण पर कोई विचार व्यक्त करने से खुद को अलग ही रखें।   
       एक भूली बिसरी याद
  दिल्ली के एडिशनल चीफ मेट्रोपाॅलिटन मजिस्ट्रेट आर.दयाल ने 4 अक्तूबर 1977 को आरोपों को अपर्याप्त बताते हुए इंदिरा गांधी को तुरंत रिहा करने का आदेश दे दिया।उन्हें एक दिन पहले सी.बी.आई.ने गिरफ्तार किया था।
इस रिहाई पर तत्कालीन कें्रदीय गृह मंत्री चरण सिंह ने कहा था कि 
‘जिन आरोपों के तहत उन्हें गिरफ्तार किया गया था,वे गंभीर हैं।जांच के बाद कुछ और सबूत मिलेंगे।’
जय प्रकाश नारायण ने इस गिरफ्तारी पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया था।उन दिनों खबर थी कि इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी को लेकर मोरारजी सरकार के मंत्रियों के बीच मतभेद था।पर गृह मंत्री जल्दबाजी में थे।जल्दीबाजी में सी.बी.आई. ने आधे मन से केस तैयार किया था।
पर गिरफ्तारी और रिहाई का राजनीतिक असर पड़ा।सत्ता में वापसी की इंदिरा गांधी की राह कुछ आसान हो गयी।बाद की कुछ अन्य राजनीतिक घटनाओं ने तो 1980 में इंदिरा गांधी को एक बार फिर सत्ता में पहुंचा ही दिया।  
   और अंत में
 केंद्र सरकार उन मुखबिरों को 15 लाख से एक करोड़ रुपए तक का इनाम देने की तैयारी में है जो उसे बेनामी संपत्ति रखने वालों के खिलाफ खुफिया जानकारी देंगे।
  यह एक सराहनीय पहल है।पर इसमें थोड़ा संशोधन की जरूरत है।
एक करोड़ रुपए की अधिकत्तम सीमा  के बदले उद्घाटित बेनामी संपत्ति की कुल कीमत  का एक खास प्रतिशत खुफिया जानकारी देने वालों को मिलना चाहिए।तब यह पहल अधिक कारगर होगी।
@प्रभात खबर-- बिहार-- में 6 अक्तूबर 2017 को प्रकाशित मेेरे कानोंकान काॅलम से@ 






इंद्रदीप सिंहा एक प्रतिभाशाली छात्र


पटना विश्व विद्यालय जब अपना सौ साल पूरा करने
जा रहा है तो ऐसे समय में मुझे इस विश्व विद्यालय के 
एक अत्यंत मेधावी छात्र इंद्रदीप सिंहा की याद आ रही है।
 सच पूछिए तो कोई किसी विचार धारा का हो,पर यदि उसने 
समाज के लिए अपना सुखी जीवन छोड़ कर कष्टमय जीवन अपनाया,तो वैसे लोगों के प्रति मेरे मन में अत्यंत सम्मान का भाव रहता है।
इंद्र दीप सिंहा वैसे ही व्यक्तियों में थे।एक बेदाग जीवन जिए।
  उनसे मेरी कभी मुलाकात या बातचीत तो नहीं हुई ,किंतु मैं उनका प्रशंसक रहा हूं।
उन्होंने सन 1939 में जब पटना विश्व विद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए.पास किया था,तब विभागाध्यक्ष डा.ज्ञान चंद थे। डा.ज्ञान चंद जाने माने अर्थशास्त्री थे और आई.एम.एफ.और भारत सरकार के बड़े पदों पर भी रहे।इंद्रदीप सिंहा डा.ज्ञान चंद के छात्र थे।
  हां, तो इंद्रदीप सिंहा ने एम.ए.में विश्वविद्यालय में टाॅप किया था।कई वर्षों से किसी छात्र को अर्थशास्त्र में फस्र्ट क्लास भी नहीं मिला।
  इस उपलब्धि के बाद डा.ज्ञान चंद ने इंद्रदीप सिंहा से कहा कि तुम मेरा विभाग ज्वाइन कर लो।
लैक्चररशिप में तुमको हर माह 144 रुपए मिलेंगे।दो साल काम कर लो।बाद में तुम्हें फाॅरेन स्कालरशिप दिलाकर डाक्टरेट करने के लिए इंगलैंड भेज दूंगा।
इस पर इंद्रदीप सिंहा ने कहा कि नहीं,डाक्टर साहब मैंने स्कूली जीवन से  ही यह प्रण कर लिया है कि मुझे नौकरी नहीं करनी है।अंग्रेजी राज में तो नौकरी बिलकुल ही नहीं करनी है।
  इस तरह इंद्रदीप सिंहा ने राजनीति में कदम रखा।संघर्ष के पथ पर आगे बढ़ते चले गए।
बिहार सरकार में 1967-68 में राजस्व मंत्री रहे।राज्य सभा के सदस्य भी रहे।
भाकपा में भी बड़े पदों पर रहे।
अब वह इस दुनिया में नहीं हैं।
  

सत्तर के दशक में पटना विश्व विद्यालय


  इतिहासकार डा.ओम प्रकाश प्रसाद ने ठीक ही लिखा है कि पटना विश्व विद्यालय में दाखिला लेने से ही समाज में प्रतिष्ठा बढ़ जाती थी।
  हालांकि 1972 जब मैंने पटना लाॅ कालेज में दाखिला लिया,तब तक वैसी बात नहीं रह गयी थी। फिर भी चीजें उतनी बिगड़ी भी नहीं थी।कभी ‘पूरब का आॅक्सफोर्ड’ कहलाने वाले इस विश्व विद्यालय में मेरे जमाने में  क्लासेज होते थे और छात्रावासों में पढ़ने के समय छात्र सिर्फ पढ़ा करते  थे।
परिसर में अपेक्षाकृत शांति रहती थी।
हां, इस विश्व विद्यालय से जुड़े लाॅ कालेज में थोड़ी स्थिति भिन्न जरूर थी।थोड़ी उन्मुक्तता थी।
 फिर भी वहां भी रेगुलर क्लासेज होते थे ।यहां तक कि मूट कोर्ट भी।
  हां, मेरे जैसे कुछ छात्रों को पढ़ने में रूचि कम थी।राजनीति में अधिक थी।
इसलिए हाजिरी लगा कर हम पास की  चाय  दुकान पर अड्डा मारने और राजनीतिक गपशप करने चले जाते थे।
 इस काम में मुख्य तौर पर मेरे साथ होते थे दीनानाथ पांडेय जो इन दिनों कलिम्पांग में वकालत करते हैं।
  दरअसल तब तक मैं सक्रिय राजनीति में था और सोद्देश्य पत्रिकाओं के लिए लिखता भी था।
  मैंने लाॅ कालेज में दाखिला इसलिए भी कराया था ताकि जरूरत पड़ने पर रोजी -रोटी  के लिए वकालत कर सकूं।
  उससे पहले राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप में मैं छपरा के  वकील रवींद्र प्रसाद वर्मा के यहां रहता था।वर्मा जी एक समर्पित लोहियावादी थे और कम में ही गुजारा कर लेने की आदत मैंने उनसे सीखी थी।
अब वह नहीं रहे।पर मैं इतना कह सकता हूं कि वह यदि किसी बहुसंख्या वाली जाति से होते तो कम से कम विधायक तो जरूर ही हो गए होते ।
 खैर धीरे -धीरे  मैंने यह महसूस किया कि न तो राजनीति मेरे वश की बात है और न ही वकालत।इसलिए लाॅ कालेज में तीन साल पढ़ा जरूर , पर कोई परीक्षा नहीं दी।
प्रथम वर्ष की परीक्षा नहीं देने के बावजूद सेकेंड और बाद में थर्ड इयर में प्रवेश ले लेने की छूट थी।
 इस तरह मैं करीब तीन साल तक कभी के  ‘पूरब के आॅक्सफोर्ड’ कहलाने वाले विश्व विद्यालय का छात्र होने का सुख हासिल करता रहा। आपातकाल में सी.बी.आई.मेरी तलाश में लाॅ कालेज तक भी गयी थी।
सी.बी.आई. बड़ौदा डायनामाइट केस की जांच कर रही थी।उसे मेरे सिर्फ एक ही पक्के ठिकाने का पता चल सका था यानी पटना लाॅ कालेज। 
 लाॅ कालेज में  प्रेम प्रकाश सिंहा और महितोष मिश्र जैसे सिरियस छात्र भी मेरे मित्र थे और अक्षय कुमार सिंह जैसे छात्र नेता भी।
इन्हें राजनीति में गहरी रूचि थी।प्रेम प्रकाश तो शिक्षा अधिकारी बने थे,पर महितोष से बाद में कोई संपर्क नहीं रहा।
 कुछ अन्य  मित्र भी याद आते हैं जिनसे संपर्क नहीं रहा।वैसे लव कुमार मिश्र से लगातार संपर्क रहता है क्योंकि वह भी पत्रकारिता में ही हैं।
मेरे सहपाठी दुबले -पतले किंतु तेजस्वी अशोक जी
भी थे जो पटना हाईकोर्ट में वकालत करते हैं।कभी -कभी उनसे फोन पर बात हो जाती है।कभी देखना है कि वे अब भी उतने ही दुबले हैं क्या ?
अशोक जी  विदेशी लहजे में फर्राटे से अंग्रेजी बोलते थे।
तब लाॅ कालेज में बी.एन.श्रीवास्तव  प्राचार्य थे।पोद्दार साहब,प्रयाग सिंह  और हिंगोरानी जी प्रमुख  शिक्षकों में थे।
 1972 से पहले भी पटना विश्व विद्यालय के छात्रावासों में मैं जाता  था राजनीतिक चर्चाओं के लिए।
उन दिनों की एक खास बात मुझे याद है ,वह यह कि शाम में पढ़ाई के समय छात्रावासों में कोई बाहरी व्यक्ति जाकर गपशप नहीं कर सकता था।
  छात्रावासों के मेरे समाजवादी मित्र राम उदगार महतो,राम नरेश शर्मा ,राज किशोर सिंहा और सुरेश शेखर याद आते हैं।
 सुरेश प्रसाद सिंह उर्फ सुरेश शेखर ने 1966 में मैट्रिक में पूरे बिहार में टाॅप किया था।वह डा.लोहिया से प्रभावित थे।
 प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले सुरेश अत्यंत तेजस्वी और दबंग थे।
उन्होंने तब के युवा तुर्क चंद्र शेखर से प्रभावित होकर अपने नाम के साथ शेखर जोड़ा था।बाद में उन्हें राजनीति से निराशा हुई और रिजर्व बैंक की नौकरी में चले गये।अब वह इस दुनिया में नहीं रहे।वह नीतीश कुमार के दोस्त  थे।
  बातें तो बहुत है।फिलहाल इतना ही।
हां,एक इच्छा जरूर है । काश ! पटना विश्व विद्यालय में एक बार फिर कम से कम 1972 का भी माहौल कोई लौटा देता तो वह राज्य का बड़ा कल्याण करता।उससे पहले जाना तो बहुत कठिन काम है।