Saturday, February 23, 2019

यह प्रचार मुझे गलत लगता है कि फिरोज गांधी मुस्लिम थे।
मेरी जानकारी के अनुसार उनका जन्म गुजरात के  भरूच के एक पारसी परिवार में हुआ था।उनके पिता का नाम था-फरिदून जहांगीर घंडी।
जन्म के समय फिरोज का नाम पड़ा था-
फिरोज जहांगीर घंडी।
यह ‘घंडी’ शब्द गांधी में कैसे बदल गया,यह मैं नहीं जान सका हूं।
यानी फिरोज गांधी कैसे कहलाए ?
खैर नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता।वे एक बहुत अच्छे सासंद थे।

Friday, February 22, 2019

--सतत निगरानी के बिना सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ मिलना मुश्किल--


जब कोई पत्रकार पूछता है कि आपके अस्पताल में मरीजों के लिए ब्लड का बोतल टांगने के लिए स्टैंड तक नहीं है तो संबंधित अफसर जवाब देता है कि ‘अच्छा तो देखता हूं।प्रबंध करा दूंगा।’
जब कोई मीडिया मैन पूछता है कि मैन होल का ढक्कन क्यों नहीं है तो अफसर कहता है कि ‘जानकारी देने के लिए धन्यवाद ।ढक्कन लगवा दूंगा।’
 इसी तरह जब संबंधित अफसर को यह बताने के लिए कोई पत्रकार उसके पास जाता है कि ‘आप के आॅफिस के ठीक बाहर ड्राइविंग लाइसेंस बनाने के लिए खुलेआम रिश्वत ली जा रही है’ तो अफसर अपनी अनभिज्ञता प्रकट कर देता है।
ऐसे अनेक उदाहरण आपको कहीं न कहीं मिल जाएंगे।
ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकारी सेवा व विकास के कार्यों की आम तौर पर मोनिटरिंग ठीक से नहीं होती।यदि कोई अफसर निगरानी करने के लिए तैनात भी है तो वह शुकराना-नजराना लेकर सब कुछ ठीकठाक होने की कागजी खानापूत्र्ति करता रहता है।
मुजफ्फर पुर शेल्टर होम कांड इसका ताजा उदाहरण है।
यदि राज्य सरकार ने टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान,मुम्बई  के  लड़कों से  उसकी जांच नहीं करवाई  होती तो वहां अब तक  वही सब अमानवीय  कुकर्म होता रहता।
 ईमानदार निगरानी से किस तरह भ्रष्टाचार पकड़े जा सकते हैं,उसका एक नमूना हाल में सामने आया है।
 मुख्य सचिव ने विकास आयुक्त को स्थल निरीक्षण के लिए हाल में सारण भेजा था।
विकास आयुक्त सुभाष शर्मा छपरा पहुंच कर सरकारी सहायता से खोले गए बकरी पालन केंद्र का स्थल निरीक्षण करना चाहते थे।
 चूंकि सब कुछ कागज पर चल रहा था,इसलिए सारण जिला  पशु पालन पदाधिकारी  शर्मा की टीम को स्थल निरीक्षण से रोकने के लिए बहाने बनाने लगा।
पर सुभाष शर्मा कुछ दूसरे ढंग के अफसर हैं।उन्होंने स्थल निरीक्षण किया ।उन्होंने पाया कि जिस बकरी पालन केंद्र के लिए लाखों रुपए सरकार ने दिए हैं ,स्थल पर उसका कोई नामो निशान तक नहीं था।
शर्मा ने जिलाधिकारी से  कहा कि संबंधित दोषियों के खिलाफ एफ.आई.आर.दर्ज करिए।
अब इस बात की भी निगरानी करनी पड़ेगी कि प्राथमिकी दर्ज हुई या नहीं।हुई तो उस केस की प्रगति क्या है।स्वाभाविक है कि दोषी लोगों को बचाने में कुछ शक्तियां लग गई होंगी।
  सुभाष शर्मा जैसे अफसरों से निरंतर  स्थल निरीक्षण नहीं करवाया जा सकता ?इसके लिए कोई तंत्र विकसित नहीं किया जा सकता ?
ऐसा नहीं है कि सुभाष शर्मा जैसे कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर उपलब्ध हैं ही नहीं।मौजूद हैं। यह और बात है कि  कम संख्या में हैं।
पर उतने ही अफसर  सरकारी धन के लुटेरों पर भारी पड़ेंगे।
   --प्रस्तावित शेर पुर-दिघवारा गंगा पुल-- 
हाल में मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की  कि शेर पुर-दिघवारा गंगा पुल बन कर तैयार हो जाने के बाद दिघवारा से नया गांव तक ‘नया पटना’ बन जाएगा।
 ताजा खबर यह है कि छह लेन के प्रस्तावित शेर पुर-दिघवारा पुल के लिए डी.पी.आर.तो बनवाई जा रही है।पर 
साथ ही यह भी सूचना  है कि 
इसके बन कर तैयार होने में दस साल लग सकते हैं।
प्रस्तावित ‘नया पटना’ जितना जल्द बस जाता,उतनी ही जल्दी पटना महानगर से आबादी का बोझ घट जाता।
या फिर बोझ बढ़ने की रफ्तार काफी कम हो जाती।
 यदि दस साल में पुल ही बनेगा तो नया पटना बसेगा कब ?
इस बीच भूजल और पर्यावरण की दृष्टि से प्रादेशिक राजधानी की स्थिति और भी खराब  हो जा सकती है।
  --जमीन पर विरोध तो आसमान में सड़क--  
दाना पुर से बिहटा तक अब एलिवेटेड सड़क बनेगी।
पहले इसकी जगह कोइलवर और पटना के बीच सतह पर 
नेशनल हाईवे प्रस्तावित था।वह पटना-बक्सर रोड का हिस्सा था।
पहले के प्रस्ताव के अनुसार कोइलवर -पटना रोड को एम्स होते हुए बेऊर की ओर जाना था।
अब एम्स-बेऊर की ओर जाने वाले हिस्से को रद करने के लिए बिहार सरकार ने नेशनल हाईवे आॅथोरिटी को पत्र लिख दिया है।
  दानापुर -बिहटा सड़क को ऊपर उठा कर बनाने की जरूरत क्यों पड़ी ?
दरअसल बिहटा के आसपास भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों के साथ सरकार सहमति नहीं बना पा रही थी।
 संरेखन यानी एलाइनमेंट को लेकर भी जमीन वालों की ओर से विरोध के स्वर उठ रहे थे।मुआवजे को लेकर भी परेशानियां थीं। 
अब जब एलिवेटेड सड़क बनने जा रही है तो किसानों व सड़क के किनारे के लोगों को अपना नुकसान नजर आ रहा है।
एक तो आम तौर से जो भी मुआवजा मिल रहा था,वह बाजार दर से अधिक था।
साथ ही एलिवेटेड बनने के बाद सड़क के आसपास के विकास की संभावना  कम हो जाएगी।
चार लेन एन.एच.होता तो सड़क के दोनों तरफ के इलाके विकसित होते।नए -नए उद्योग,स्कूल और अस्पताल आदि
खुलते।उनसे किसानों को भी अधिक लाभ होता।
  खबर है कि एलिवेटेड बनाने के निर्णय से अनेक किसानों को अफसोस हो रहा है।
  पर अब क्या हो सकता है ?
अन्य स्थानों के लिए भी यह चेतावनी है।
अब तो लगता है कि  जमीन अधिग्रहण को लेकर जहां भी विवाद  होगा,सरकार एलिवेटेड सड़क बनवा देगी।
--‘आप’ से दोस्ती को तैयार नहीं कांग्रेस-- 
मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि हम कांग्रेस से कह -कह कर थक गए,पर वह हमसे चुनावी तालमेल करने को तैयार ही नहीं है।
 आश्चर्य है ! कांग्रेस  अन्य राज्यों में इस काम के लिए बेेचैन है ।पर दिल्ली में क्यों नहीं ?
 क्या कांग्रेस को लगता है कि वह इतनी ताकतवर हो चुकी है कि दिल्ली की सभी लोस सीटें अकेले ही जीत लेगी ?
या क्या कांग्रेस यह मानती है कि जेएनयू राष्ट्रद्रोह केस में अभियोजन की अनुमति नहीं देकर दिल्ली सरकार ने गलत काम किया है और उसका खामियाजा ‘आप’ को चुनाव में भुगतना पड़ेगा ? पता नहीं।
  --भूली बिसरी याद--
पटना हाईकोर्ट के ताजा आदेश से जिन पूर्व मुख्य मंत्रियों को सरकारी बंगले छोड़ने पड़ेंगे,उनमें एक ऐसे नेता भी हैं जिन्हें कुछ दशक पहले भी जबरन निकाला गया था।वे अनधिकृत रूप से सरकारी बंगले में रह रहे थे।
उन्हें एक बार पटना के सरकारी बंगले से तो दूसरी बार  दिल्ली के बंगले से निकाला गया।
 इस बार तो खैर कानून के तहत उन्हें पटना में बंगला मिला था।हाईकोर्ट के आदेश के बाद उसे खाली करना पड़ेगा।
पर, पिछली बार तो वे अवैध ढंग से रह रहे थे।
  हालांकि वैसे नेता देश भर में भरे पड़े हैं।
बहुत पहले सुप्रीम कोर्ट ऐसे अवैध कब्जादारों के खिलाफ जनहित याचिका पर विचार कर रहा था।देश भर के कब्जादारों के मामले सुप्रीम कोर्ट के सामने थे।
निष्कासन के लिए सुप्रीम कोर्ट बार-बार विभिन्न सरकारों को आदेश दे रहा था,पर उन्हें मकानों से हटाया नहीं जा रहा था।
  एक बार तो क्षुब्ध होकर सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कह दिया था कि जब सरकारें हमारी बात ही नहीं मान रही है तो इस मामले की सुनवाई से क्या फायदा ?
1994 में पटना के 768 सरकारी आवासों पर अनधिकृत कब्जा था।उनमें 60 नेता व शीर्ष अफसर शामिल थे।
अब तो उतनी खराब स्थिति नहीं है।पर कोई आदर्श स्थिति भी नहीं है।
        --और अंत में-
बिहार विधान परिषद में बुधवार को स्कूटर पर सांड ढोने की एक पुरानी घटना की चर्चा हुई।
भाजपा सदस्य ने राजद पर तंज कसते हुए कहा कि ‘स्कूटर पर सांड ढोने का जमाना अब नहीं रहा।’
भाजपा सदस्य जरा अपनी जानकारी बढ़ा लें।
स्कूटर पर सांड ढोने की घटना 6 दिसंबर, 1985 को हुई थी।
सी.ए.जी.की रपट के अनुसार रांची से घाघरा 4 सांड एक ही स्कूटर पर ‘चढ़ कर’ गए थे।वाहन का बिल बना था --1285 रुपए। 1985 में बिहार में राजद की सरकार नहीं  थी ।
कांग्रेस की सरकार थी।
  मेहरबानी करके राजद पर इतना मामूली आरोप तो मत लगाइए !!
  --kanokan --22 Feb 19--Prabhat khaba
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़     

  बात उस समय की है जब आंध्र प्रदेश की राजनीति में
‘तेलुगु बिड्डा’ एन.टी.रामा राव का उदय हुआ था।
इनाडु मीडिया समूह ने एनटीआर के स्वर मेें स्वर में मिलाकर तेलुगु स्वाभिमान को जगाया और एनटीआर की सरकार बनी।
मेरी खबर के अनुसार एनटीआर के साथ-साथ तेलुगु अखबार इनाडु का सर्कुलेशन भी काफी  बढ़ गया था।
  उसके कई साल बाद उत्तर  के एक राज्य के एक अखबार के प्रधान संपादक चिंतित थे कि उनका अखबार तो स्थानीय सरकार के अच्छे कामों की खबरें खूब छाप रहा है,पर क्या यह सब पाठकों को अच्छा लग रहा होगा ?
  मैंने उनसे पूछा कि आपके अखबार का प्रसार बढ़ रहा है या घट रहा है ?
उन्होंने कहा कि वह तो बहुत बढ़ रहा है।
फिर मैंने कहा कि फिर क्या चिंता है ?इनाडु की तरह 
आपका अखबार भी जनता  के साथ है।
 आज जब  2019 का लोस  चुनाव सामने है तो मीडिया का बड़ा हिस्सा दो  खेमों में बंट गया दिखता है।
  जिस खेमे  को पाठक -श्रोता अपेक्षाकृत अधिक पसंद कर रहे हैं,उसे मोटा -मोटी यह समझ लेना चाहिए कि उसकी पसंदीदा पार्टी की ही सरकार बनने वाली है। 



फुलगांवा कांड पर कुछ फुटकर  टिप्पणियां
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  फुलवामा कांड के कारण उत्पन्न देशव्यापी गुस्से व गम के माहौल में 
केंद्र सरकार को जो करना चाहिए,वह तो कर  रही है।कुछ और करने भी जा रही है।
पर, आम देशभक्त व शांतिप्रिय लोगों को भी इस देश के भीतर के  उन वोटलोलुप और जेहादी तत्वों को भी इस अवसर पर एक बार फिर याद करके उन्हें ठीक से पहचान लेना चाहिए। 
  1.-जेएनयू में कुछ लोगों ने ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्ला इंशा अल्ला’ का नारा लगाया।पर उनके खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया गया तो दिल्ली राज्य की सरकार मुकदमा चलाने की अनुमति ही नहीं दे रही है।
   2.-अतिवादी प्रतिबंधित संगठन सिमी के अहमदाबाद के जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने 29 सितंबर 2001 को कहा था कि ‘जब हम सत्ता में आएंगे तो सभी मंदिरों को नष्ट कर देंगे।यह बयान 30 सितंबर 2001 के अखबार में छपा था।
अहमदाबाद धमाकों के बाद पकड़े गए सिमी सदस्य अबुल बशर ने बताया था कि ‘सिमी की इस नीति से प्रभावित हूं कि लोकतांत्रिक तरीके से यहां इस्लामिक शासन संभव नहीं है। उसके लिए एकमात्र रास्ता जेहाद है।’
जब सिमी ने ‘इस्लाम के जरिए भारत की मुक्ति’ का नारा दिया तो जमात ए इस्लामी ने उससे अपना संबंध तोड़ लिया।
 2001 में केंद्र सरकार ने सिमी पर प्रतिबंध लगाया तो सिमी के लोगों ने मिल कर 2002 में इंडियन मोजाहिद्दीन नामक नया आतंकवादी संगठन बना लिया।
इस पर एक राष्ट्रीय दल से जुड़े पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि गुजरात दंगे के विरोध में इंडियन मुजाहिददीन का गठन हुआ।
 उसी दल के एक दूसरे पूर्व केंद्रीय मंत्री  सिमी पर से प्रतिबंध हटाने के लिए दायर याचिका के मुख्य वकील थे। 
 दूसरी ओर हिन्दी इलाके के तीन क्षेत्रीय दलों के शीर्ष नेताओं ने बयान दिया कि सिमी छात्रों का एक निर्दोष संगठन है।
इन सब बातों से क्या देश-विदेश के आतंकवादियों का मनोबल नहीं बढ़ेगा ?
3.-2008 में मुम्बई पर हुए आतंकी हमले के बाद दो पूर्व मुख्य मंत्रियों ने कहा कि इसमें आर.एस.एस.का हाथ है।
बटाला हाउस मुंठभेड़ के बाद भी एक बड़े नेता ने,जो मुख्य मंत्री भी रह चुके हैं, बयान दिया कि मुंठभेड़ फर्जी थी।
4.-कई साल पहले आतंक के आरोप में एक भारतीय मुस्लिम जब आस्ट्रेलिया में गिरफ्तार हुआ तो इस देश के प्रधान मंत्री ने कहा था कि इस गिरफ्तारी से मुझे पूरी रात नींद नहीं आई।यह पता लगाने से पहले कि वह गिरफ्तार व्यक्ति दोषी था या निर्दोष, प्रधान मंत्री की ओर से ऐसा बयान आ गया।
ऐसे बयानों से किसका मनोबल बढ़ता है ?
5.-अतिवादी संगठन पोपुलर फं्रट आॅफ इंडिया पर कतिपय राज्य में प्रतिबंध है।केरल की वाम सरकार की भी राय में यह सिमी का ही नया रूप है।
पर उसके कार्यक्रम में एक पूर्व उपराष्ट्रपति शामिल हुए थे।
5.-इन दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया के हिस्से के जरिए इस देश में फैले आतंकियों के अंडरग्रांउड लड़ाकों के पक्ष में आतंकियों के ओवरग्राउंड समर्थक खुलेआम प्रचार करते रहते हैं।इससे अनेक नौजवानों को प्रेरणा मिलती होगी।
आश्चर्य है कि कुछ टी.वी चैनल आखिर क्यों इसकी अनुमति देते हैं ?
कुछ माह पहले लाइव चर्चा में टी.वी.पर एक मौलाना को यह कहते हुए मैंने 
सुना कि हम जब 18 करोड़ थे तो पाकिस्तान बना था।अब हमलोग फिर 18 करोड़ हो गए हैं।
पर इस देश के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि अधिकतर मुस्लिम आबादी आतंकियों की मानसिक गिरफ्त से अभी बाहर लगती है।
यहां तक कि असदुददीन ओवैसी जैसे एकपक्षीय व अतिवादी नेता को भी बगदादी के संगठन की ओर से जान से मारने की धमकी मिली हुई है।
  यह भी खबर है कि पाकिस्तान की नई पीढ़ी के  अनेक युवा वहां के अतिवादियों के डिक्टेशन मानने को तैयार नहीं हैं।  
  

21 फरवरी 2019 के नव भारत टाइम्स की एक खबर
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टाइम्स मेगा पोल
84 प्रतिशत लोग चाहते हैं,मोदी फिर बनें पी.एम.
टाइम्स मेगा पोल के जरिए जनता की नब्ज टटोली
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इस पोल में शामिल करीब तीन चैथाई लोगों ने कहा कि आज चुनाव हो तो पीएम पद के लिए नरेंद्र मोदी पहली पसंद होंगे।
  करीब इतने ही यूजर्स ने माना कि चुनाव के बाद भी मोदी की ही सरकार बनेगी।
  टाइम्स ग्रूप के वेबसाइटों पर 11 से 20 फरवरी तक सर्वे में 5 लाख से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया था।
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अभी तो चुनाव से पहले तक अनेक सर्वे रपटें आएंगी।
जाहिर है कि टाइम्स मेगा पोल  पढ़े -लिखे लोगों के बीच का सर्वे है।
इसलिए इसे पूर देश के मूड का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।
पर कुछ संकेत तो मिल रहे हैं।
टाइम्स ग्रूप को मैं उन थोड़े से मीडिया समूहों में मानता हूं जिनका कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं है।
इसलिए इस सर्वे नतीजे को मैंने पोस्ट किया।
यदि इसके विपरीत भी कोई सर्वे रपट आएगी तो मैं उसे भी पोस्ट करूंगा।
  दरअसल इन दिनों अनेक लोगों में अगले चुनाव को लेकर छोटी -छोटी बातें भी जानने की उत्सुकता देखी जा रही है।

Wednesday, February 20, 2019

-- सही टैक्स वसूली से कम नहीं पड़ेंगे विकास-कल्याण के लिए पैसे--


बिहार सरकार के पास आज न तो विकास के लिए पैसों की पहले जैसी कमी है और न ही कल्याण के लिए।
राज्य के बजट और सरकारी घोषणाओं से तो यही लगता है।
इस राज्य में एक समय ऐसा भी था जब सरकारी कर्मचारियों को समय पर वेतन  भी नहीं मिल पा रहे थे।
2004 में केंद्र सरकार ने बिहार सरकार से कहा था कि केंद्रीय मदद के पैसों का इस्तेमाल  वेतन बांटने के काम में नहीं होना चाहिए।
  टैक्स वसूली के काम में ईमानदारी इसी तरह बढ़ती जाए तो आगे बिहार  की आर्थिक स्थिति और भी अच्छी हो सकती है।
हालांकि अब भी कर वसूली में कोताही है।भ्रष्टाचार है।उसका कारण भी सब जानते हैं।उसे दूर किया जाना चाहिए।
वैसे बीस साल पहले वाली स्थिति से राज्य काफी आगे निकल चुका है।
  1999-2000 वित्तीय वर्ष में वाणिज्य कर से बिहार सरकार की आय मात्र 1982 करोड़ रुपए थी।जबकि, उसी अवधि में इस मद में आंध्र प्रदेश को करीब 6 हजार करोड़ रुपए मिले थे।
 अब इस राज्य में इस मद में करीब 25 हजार करोड़ रुपए की आय है।
 इसमें और भी वृद्धि की गुंजाइश बनी हुई है।
विकास व कल्याण की अन्य कई योजनाओं के साथ- साथ बिहार सरकार इसी अप्रैल से मुख्य मंत्री वृद्धजन पेंशन योजना लागू करने का निर्णय किया है।
पहले की इस योजना में कुछ लोग छूट जाते थे।अब इसका लाभ सभी वर्गों के लोगों को मिलेगा।
हमारे यहां प्राचीन काल में ही एक विवेकपूर्ण बात कह दी गई थी।वह यह कि  जमीन की सतह का पानी वाष्प बन कर ऊपर जाता है।वही बाद में तपती धरती पर बरसात के रूप में राहत देता है।
  किसी अच्छी सरकार का भी यही काम है कि वह ईमानदारी से टैक्स वसूले और बाद में जनता के लिए  राहत की बरसात करे ।    
  --कब सुधरेगी बिजली आपूत्र्ति व्यवस्था--
इस देश में जितनी बिजली का उत्पादन होता है,उसमें से 
27 प्रतिशत बिजली चोरी और  ‘लाइन लाॅस’ में चली जाती है।
नतीजतन हर साल करीब एक लाख करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान होता है।यह दशकों से हो रहा है।
   जाड़े की सुबह जब मोटर से टंकी में पानी चढ़ाने के लिए पर्याप्त वोल्टेज नहीं मिलता तो अनेक लोगों को बिजली चोरों पर गुस्सा आता है।
सुबह -सुबह कुछ लोग हीटर पर खाना पकाने लगते हैं तो कुछ अन्य ब्लोअर चलाने लगते हैं।कई जगह धान उबालने का काम भी उसी पर होता है।
 खैर, ऐसे लोगों पर  नकेल कसने का उपाय सरकार कर रही है।
 मोटे -मोटे केबुल बिजली के खम्भों पर टांगे जा रहे हैं।हर घर में स्मार्ट मीटर लगाने का निर्णय हुआ है।
साथ ही पीक आवर में इस्तेमाल करने पर उपभोक्ताओं को अधिक पैसे देने होंगे।
पीक आवर में खपत का रिकाॅर्ड दर्ज हो जाएगा और उसी के हिसाब से चार्ज वसूला जाएगा।
कल्पना कीजिए उस दिन की।जब हमारे देश की सरकार के पास अतिरिक्त  एक लाख करोड़ रुपए उपलब्ध हो जाएंगे। उससे  अधिक स्कूल और अस्पताल खोले जा सकेंगे।
   --मेढक तौलने का करतब--
1967 से 1972 तक बिहार में कई मिलीजुली सरकारें बनीं और बिगड़ीं।
तब राजनीतिक हलकों में यह चर्चा होती थी कि मिली जुली सरकार चलाना यानी मेढ़क तौलना।
 एक मेढ़क को तराजू पर रखिए तो दूसरा उछल पड़ेगा।तीसरे को रखिए तो चैथा छलांग लगा देगा।
 उन दिनों  कुछ अन्य राज्यों में भी यही हो रहा था।
 1967 में हरियाणा में गया लाल  नाम के विधायक ने जब एक ही पखवाड़े में तीन बार दल बदला तो दलबदलुओं के लिए ‘आया राम, गया राम’ की कहावत प्रचलित हो गई। 
बाद के वर्षों में तो इस देश में राज्यों व केंद्र में ऐसी कई मिलीजुली सरकारें बनीं।
 अब  2019 का लोक सभा चुनाव सामने है । कहा जा रहा है कि इस बार मिलीजुली सरकार ही बनेगी।
अनेक लोग यह कह रहे हैं कि यह देश के लिए ठीक नहीं होगा।
इसलिए मतदाता किसी भी एक दल को पूर्ण बहुमत दे दे।
देखना है कि यह सदिच्छा पूरी होती है या नहीं।
पर एक बात तय है।
अपवादों को छोड़कर इस देश के अधिकतर मतदाता सयाने हो चुके है।
वे राजनीतिक दलों को बाहर -भीतर से अच्छी तरह पहचानने लगे हैं।
वे यह भी जानते हैं कि कौन सा दल सत्ता में आकर देश की आम जनता को अधिक लाभ पहुंचाएगा और कौन कम।
फिर क्या है ?
आपके अनुसार आम जन को  जो अधिक लाभ पहुंचाने वाला हो,उसे ही वोट दीजिए।
  --कर्पूरी ठाकुर की विनम्रता--
17 फरवरी को कर्पूरी ठाकुर की पुण्यतिथि मनाई जाएगी।
उस अवसर पर उनके व्यक्तित्व के  खास पक्ष की याद आती है।
  कर्पूरी ठाकुर की लोकप्रियता में पचास प्रतिशत योगदान उनकी कठोर ईमानदारी और उनके अत्यंत शिष्ट व्यवहार का था।पचास प्रतिशत योगदान अन्य तत्वों का था।
 राजनीति में इन दिनों ये दोनों बातें विरल हैं।
अब तो गुस्सा,अशिष्टता,गाली गलौज और कभी कभी हिंसा भी। 
     --भूली बिसरी याद--
चुनाव के इस मौसम में टी.एन.शेषण को एक बार फिर याद करना मौजूं होगा।
मुख्य चुनाव आयुक्त शेषण ने चुनाव नियमों की किताब पर से धूल झाड़ कर उन्हें लागू करने की कारगर कोशिश की थी।
उन्होंने अपने कुछ ठोस कदमों के जरिए कानून तोड़कों में भय पैदा तो कर ही दिया था।
व्यापक पैमाने पर धांधली का उदाहरण देते हुए शेषण ने बिहार और उत्तर प्रदेश के 5 चुनाव क्षेत्रों के चुनाव रद कर दिए।
नेशनल फ्रंट ने इस कार्रवाई को पक्षपात पूर्ण करार दिया।
तब केंद्रीय मंत्री गैस और फोन कनेक्शन मनमाने ढंग से जारी कर रहे थे।शेषण ने उस पर आपत्ति की।मंत्री नाराज हुए।प्रधान मंत्री को बीच -बिचाव करना पड़ा।
शेषण ने  बिहार में चुनाव टालना चाहा।शेषन को काूनन -व्यवस्था को लेकर भी शिकायत थी।पर यह काम वे नहीं कर सके।
पहले तो लालू प्रसाद शेषन के खिलाफ थे।पर जब शेषन ने निष्पक्ष चुनाव करा दिया और लालू फिर सत्ता में आ गए तो लालू ने शेषण की तारीफ की।
 शेषण ने कुछ अन्य कड़े कदम उठाए।केंद्र सरकार ने शेषण पर नकेल कसने के लिए चुनाव आयोग को एक सदस्यीय से तीन सदस्यीय बना दिया।जो हो,शेषण अपने ढंग के अफसर थे। 
शेषन 1990 से 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे।
   --और अंत में --
बिहार के नए डी.जी.पी. प्रो-एक्टिव रोल में लग रहे हैं।
संभव है कि यह शुरुआती उत्साह हो।यह भी संभव है कि यह उनका स्थायी भाव साबित हो।
 इस अवसर पर एक बात कही जा सकती है ।वह यह कि  यदि स्थायी भाव है तो ऐसे अफसर को किसी आशंकित विभागीय साजिश व राजनीति से बचाया जाना चाहिए।
पुलिस ही क्यों,हर क्षेत्र में ईष्यालु और विघ्नसंतोषी लोगों की कभी कोई कमी नहीं रही है।
--kanokan--15 Feb.19
डा.नामवर सिंह की कुछ यादें 
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डा.नामवर सिंह एक पत्रिका का समारंभ करने के 
लिए पटना आए थे।
साथ में प्रभाष जोशी भी थे।
उस पत्रिका के प्रथम अंक में मैंने प्रभाष जोशी पर एक लेख लिखा था।
याद रहे कि जनसत्ता छोड़कर तब मैंने दैनिक हिन्दुस्तान ज्वाइन कर लिया था।
 नामवर सिंह मेरा लेख पढ़ चुके थे।उन्होंने कहा कि ऐसा लेख किसी संवाददाता ने अपने संपादक के बारे में नहीं लिखा है।नामवर जी की यह टिप्पणी मेरे लिए महत्वपूर्ण थी।
इसी तरह की उनकी एक टिप्पणी मैंने  हेमंत शर्मा के बारे में सुनी थी।हेमंत शर्मा जनसत्ता के लखनऊ संवाददाता थे।उन्होंने कहा था कि इन दिनों सबसे अच्छा गद्य कोई हिन्दी साहित्यकार नहीं बल्कि एक पत्रकार हेमंत शर्मा लिख रहे हैं।यानी नए लोगों को प्रोत्साहित करना कोई उनसे सीखे।
 पटना में भी नामवर सिंह की 75 वीं जयती मनाई जा रही थी।प्रभाष जी ही आयोजक थे।
प्रभाष जी की शिकायत रहती थी कि मैं न तो किसी को खाने पर बुलाता हूं और न कहीं भोजन पर जाता हूंं।
उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा कि बड़े लोगों को घर बुलाने से आपके बच्चों में हीन भावना नहीं आएगी।
आप खाने पर बुलाइए। अब भला प्रभाष जी के आदेश को मैं कैसे ठुकरा सकता था।
मेरे आवास पर डा. नामवर सिंह, प्रभाष जोशी, चंद्र शेखर धर्माधिकारी तथा कुछ अन्य गणमान्य लोग आए।
 मेरे निजी पुस्तकालय की सामग्री देख कर नामवर जी ने कहा कि सुरेंद्र जी, आपने तो हीरा संजो कर रखा है।
यह सुन कर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था !
मैंने पूछा कि इसका बेहतर इस्तेमाल कैसे हो सकेगा,यह सोच कर कभी बताइएगा।खैर उसका अवसर उन्हें न मिला।
 डा.नामवर जी का  मैं कोई खास करीबी तो नहीं हो सका था,पर उनकी याद आती रहती थी।उनके करीबी रहे अजित राय को दिल्ली फोन करके कभी-कभी मैं नामवर जी के स्वास्थ्य के बारे में पूछता रहता था।
 टुकड़ों में कुछ घंटों की मुलाकातों से मुझे लगा कि वे एक स्नेहिल व्यक्ति हैं।अभिमानी कहीं से नहीं थे।अहंकारी तो बिलकुल नहीं।
 साथ ही, ग्रामीण पृष्ठभूमि के होते हुए भी शहरियों के बीच समान रूप से सहज थे।
 किसी भेंट वात्र्ता में उन्होंने एक बार कहा था कि मैं अपने पुत्र को अपनी गोद में खेलाने को तरस गया।क्योंकि गांव के संयुक्त परिवार में कोई अपने पुत्र को गोद नहीं लेता था।वह दूसरे के पुत्र को लेगा।उसके पुत्र को बच्चे के  चचा या दादा खेलाएंगे।
 नामवर जी जैसा अद्भुत वक्ता मैंने
नहीं देखा।आलोचक थे, पर किसी साहित्यकार से उनका कद ऊंचा था।
 मुझे यह देख कर और भी अच्छा लगा कि वे अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क थे।नाश्ते के साथ एक सेव लेते थे और भोजन के बाद वज्रासन पर बैठना नहीं भूलते थे।
वे बहुत याद आएंगे ।