सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

 


मिलावटखोरों से लोगों को बचाने के लिए कड़े उपाय जरूरी

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार सहित पूरे देश में मिलावटखोरी की विकराल समस्या के समक्ष सरकारी उपाय बौने साबित हो रहे हैं।

अनेक लोग इस समस्या पर चिंता प्रकट करते रहे हंै।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का ध्यान अभी नशीले पदार्थों के सौदागरों के खिलाफ अधिक है।वह भी एक बहुत जरूरी काम है।पर,उसके बाद खाद्य,भोज्य पदार्थों तथा दवाओं में मिलावट की समस्या की ओर गृह मंत्री का ध्यान जाना चाहिए।

 महात्मा गांधी खाद्य पदार्थों में मिलावट को समाज के विरुद्ध एक खतरनाक कृत्य मानते थे।दोषियों के खिलाफ वे कड़ी कार्रवाई के पक्षधर थे।

पर,अब तो समय के साथ मिलावट की समस्या बहुत अधिक बढ ़गई  है।लोक स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ रहा है।

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अपराध घातक ,सजा काफी कम

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संसद में पेश की गई रपट के अनुसार, सन 2025-26 में बिहार में खाद्य मिलावट खोरी के मामले में किसी को सजा नहीं हुई।

राष्ट्रीय स्तर पर भी पिछले तीन वर्षों में सिर्फ 3614 मामलों में मिलावटखारों के दोष साबित हो सके और उन्हें सजा दी गई।

पर,सजा भी सबक सिखाने लायक नहीं।क्योंकि कानून में कम ही सजा का प्रावधान किया गया है।अधिकतर मामलों में आर्थिक दंड का प्रावधान है। 

  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सन 2011 में कहा था कि मिलावटखोरों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का इस्तेमाल किया जा सकता है।

यह अच्छी बात है कि हाल के महीनों में बिहार सरकार ने मिलावटखारों के खिलाफ कार्रवाइयां तेज की हैं।नमूने एकत्र किये जा रहे हैं।

उम्मीद की जाती है कि नमूने प्रयोग शाला जाने के रास्ते में बदल न जाएं।यह भी देखना होगा कि दोषियों को सबक सिखाने लायक सजा दिलवाई जाती है या नहीं।अन्यथा, आगे भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।   

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उम्मीदवारों की संपत्ति का व्योरा

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यदि कोई चुनाव उम्मीदवार अपने शपथ पत्र के साथ गलत जानकारी दे तो उस पर कोई आम नागरिक भी अब मुकदमा दायर कर सकता है।पहले यह प्रावधान नहीं था।

यह महत्वपूर्ण फैसला सुप्रीम कोर्ट का है जो हाल ही में आया है।

हां,फैसले में यह भी कहा गया है कि किसी चुने हुए उम्मीदवार के खिलाफ यदि व्यक्ति कोई झूठा केस करता है,तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी।

  ध्यान रहे कि संसद या विधान मंडल की सदस्यता के लिए चुनाव के सिलसिले में उम्मीदवारों को नामांकन पत्र के साथ तीन तरह के विवरण भी देने होते हैं।संपत्ति का व्योरा,शैक्षणिक योग्यता और  मुकदमे हांे तो उनका विवरण।

  कई बार यह शिकायत आती है कि कुछ उम्मीदवार जानबूझ कर गलत जानकारियां देते हैं।या अपूर्ण जानकारियां देते हैं।

 सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय के बाद शायद अब फर्क आए।

पर,एक खास तरह की मांग पर भी संबंधित पक्षों का गौर करना चाहिए।उम्मीदवार संपत्ति का व्योरा तो दे देते हैं ।पर अपनी आय का स्त्रोत नहीं बताते। अभी वह बताने की कोई कानूनी मजबूरी भी नहीं है।

क्या सुप्रीम कोर्ट खुद इस संबंध में अपनी ओर से पहल करके संपत्ति का स्त्रोत भी बताने के लिए उम्मीदवारों को 

मजबूर करेगा ?यदि करे तो राजनीति में स्वच्छता लाने में सुविधा होगी। 

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भूली-बिसरी यादें

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राजेंद्र माथुर अंग्रेजी के प्राध्यापक थे।किंतु वे हिन्दी पत्रकारिता में आए।प्रभाष जोशी पहले इंडियन एक्सप्रेस के स्थानीय संपादक थे।उन्हें हिन्दी पत्रकारिता में आने के लिए राजेंद्र माथुर ने ही प्रेरित किया।एक मशहूर अंग्रेजी पत्रिका ‘वीकली ’के चर्चित संपादक रहे प्रीतिश नंदी ने सन 1986 में लिखा--‘‘काश ! मुझे हिन्दी आती।’’

 उन्होंने लिखा कि हर बार मैंने हिंदी की शक्ति को महसूस किया।हिंदी पट्टी के नेताओं में हर कोई एक अद्भुत व्यक्तित्व है

और सबकी प्रतिभाएं अनूठी है।यह अलग बात है कि मेरी पीढ़ी के 

दंभी पत्रकारों ने इन प्रतिभाओं को या तो अनदेखा छोड़ दिया

या सिर्फ  उनका मजाक ही उड़ाया।जब भी मैं अपना टेप रिकार्डर लेकर हिंदी क्षेत्र की राजनीति के रहस्यों को समझने के लिए निकला हूं,हर बार मैंने हिंदी की शक्ति को महसूस किया है।

इन राजनेताओं की बारीकियों को समझने का जितना अधिक मुझे मौका मिला, उतना ही मैंेने अपने भगवान को कोसा है कि क्यों न उसने अड़तीस साल पहले मेरा जन्म स्थान कुछ मील पश्चिम,उत्तर या दक्षिण की ओर तय किया ! 

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और अंत मेें

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सोनपुर-छपरा नेशनल हाईवे पर बीच-बीच में गांवों और बाजारों के नामों के साइनबोर्ड लगे हुए हैं।साइन बोर्ड तो अच्छे हैं,किंतु उनमें से कुछ स्थानों के नाम गलत लिखे गये हैं।उन गलतियों से राज्य की छवि अच्छी नहीं बनती।

एक जगह डुमरी बुजुर्ग अंग्रेजी में तो ठीक लिखा गया है,पर हिन्दी में है--‘‘डुमारी बुजुर्ग।’’

 उसी तरह अंग्रेजी में शीतलपुर तो सही है,किंतु हिन्दी में लिखा गया है--सीतलपुर जो गलत है।

स्थान के नाम के साइन बोर्ड लिखे जाने से पहले स्थानीय लोगों से उनके सही -सही नाम पूछ लिये जाने चाहिए। 

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(23 अक्तूबर 2026 के दैनिक प्रभात खबर,पटना में प्रकाशित मेरे अनियतकालीन काॅलम यदाकदा से)  




 मेरी दूसरी पुस्तक ‘‘सियासत के अनकहे किस्से’’

 भी आज से बाजार में

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पहली पुस्तक ‘‘सियासत की दास्तान’’ इसी साल 

के प्रारंभ में छप कर आई थी

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सुरेंद्र किशोर

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आज ही के शुभ दिन पर मुझे सूचना मिली कि मेरी दूसरी पुस्तक ‘‘सियासत के अनकहे’’ किस्से छप कर पटना पहुंच चुकी है।

मेरी पहली पुस्तक ‘‘सियासत की दास्तान’’ इस साल के प्रारंभ में बाजार मे आई थी।

  अमेजन आदि पर मेरी ये दोनों पुस्तकें बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।

साथ ही, मैं प्रभात प्रकाशन के पटना केंद्र का पता यहां दे रहा हूं।हालांकि प्रभात प्रकाशन की पुस्तकों के लिए पटना में अन्य कई बिक्री केंद्र भी उपलब्ध हैं।   

मुख्य वितरण केंद्र

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प्रभात प्रकाशन,

जी-15, ग्रैंड प्लाजा,

डाक बंगला चैराहा,पटना के निकट


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अन्य बिक्री केंद्रों में शामिल हैं--

पटना सेंट्रल माॅल और

बी.एम.दास रोड, पटना

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20 अक्तूबर 26


 पेंशन को लेकर टेंशन जारी !

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कुछ राज्यों में तो मिल रहे,किंतु देश की राजधानी 

के माननीय रिटायर पत्रकार और सम्मानित पद्मश्री 

अवार्डी सम्मान पेंशन से अब तक वंचित हैं

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सुरेंद्र किशोर

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मिल रही पेंशन राशि को लेकर विभिन्न राज्योें के बीच 

मासिक राशि में एकरुपता क्यों नहीं ?

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कल मुझे दिल्ली के एक रिटायर व सम्मानित पत्रकार से यह जान कर आश्चर्य हुआ कि वहां से रिटायर पत्रकारों को न तो दिल्ली सरकार पेंशन देती है और न ही केंद्र सरकार।

दिल्ली के पद्मश्री अवार्डीज भी पेंशन से वंंिचत हैं।

दिल्ली के साधन-सपन्न और चिकने-चुपड़े दिख रहे पत्रकारों को देख कर संभवतः सरकारें समझती हैं कि इस जमात को  पेंशन की जरूरत नहीं।उनके जीवन में दस-बीस हजार रुपए से कोई फर्क नहीं पड़ता।कुछ थोड़े से लोगों के लिए भले यह बात सही हो।

पर, यह अर्ध सत्य ही है।सबके लिए यह सही नहीं है।

जितने पत्रकार -संवाददाता आदि के रूप में रोज-ब-रोज नेताओं के आसपास दिखाई पड़ते हैं,उनसे कई गुना अधिक पत्रकार -गैर पत्रकार कर्मी नींव की ईंट बन कर दिन -रात अपने -अपने मीडिया संस्थान के कार्यालयों और स्टूडियोज में सेवा करते रहते है।

  हर जगह अन्य अनेक पेशों की तरह मीडिया में भी कई ‘‘हथ-लपक’’ लोग मौजूद हैं।उन्हें कोई आर्थिक कष्ट नहीं है। पर मीडिया में तो सबसे अधिक संख्या में वैसे लोग हैं,जिनकी कोई ऊपरी आय नहीं है। पारिवारिक जिम्मेदारी उठाने के बाद उनके पास रिटायर होते -होते बुढापे के लिए कुछ नहीं बचता।

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यह अमानवीय है कि उनके लिए न तो कभी केंद्र सरकार ने सोचा और न ही दिल्ली सरकार ने।

अब तो सोचो भाई ! सिर्फ सांसद क्षेत्रीय विकास फंड को पांच करोड़ से बढ़ाकर चैगुना कर देने से देश का काम नहीं चलने वाला।

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इस बीच यह खबर आई है कि 19 नवंबर 2026 को कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के सेंट्रल बोर्ड आॅफ ट्रस्टीज की बैठक होने वाली है।

पेंशनर्स संगठन की मांग है कि न्यूनत्तम मासिक 1000 रुपए ईपीएफ पेंशन को बढ़ाकर 7500 रुपए कर दिया जाए।

यदि ऐसा हो गया तो उससे मीडिया से रिटायर पत्रकारों -गैर पत्रकारों को भी लाभ होगा।

क्योंकि मीडिया संस्थान के कर्मचारी गण को ईपीएफ पेंशन राशि मिलती है जो अत्यल्प है।

दुनिया में इतनी कम पेंशन राशि कहीं नहीं है।इसकी राशि कम होने के कारण इसे गिनीज बुक आॅफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में शामिल करने के लिए भेजा जा सकता है।

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25 अक्तूबर 26



   


 


गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

 इस देश के कुछ न्यूज चैनल्स अपने कार्यक्रमों में 

यदि शालीनता बरतेंगे तो उनकी ही प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

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(सारे चैनल्स एक जैसे नहीं हैं।)

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सुरेंद्र किशोर

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इस देश के कुछ न्यूज चैनल्स के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि वे अपने डिबेट शो आदि में शालीनता बरतें।

(याद रहे कि मीडिया का मूल काम सूचना देना,शिक्षित करना और मनोरंजन करना है।पर लगता है कि कुछ चैनल्स सस्ता मनोरंजन ही अधिक कर रहे हैं।)

यानी,ऐंकर कम चिल्लाएं और अपने ‘भाषण’ की अवधि कम कर दें।

एक साथ दो गेस्ट को बोलने देना और दोनों के चित्रों के बीच बनाम लगा देने का क्या मतलब है ?

मतलब है कि चैनल्स समझता है कि मुर्गा या कुत्ता लडव़ाना उनके लिए फायदामंद है।पर, ऐसा नहीं है।

मुंहफट, उदंड और कुसंस्कारी गेस्ट्स के फेडर समय -समय पर डाउन करते रहिए। क्योंकि ऐसे लोगों के कुबोल से नई पीढ़ी को गलत दिशा मिलती है।

उधर टी.वी.चैनलों की साख नहीं बढत़ी।

क्या राजनीतिक दलों में शालीन व गैर-गालीबाज वक्ताओं का अकाल हो गया है ?

 या ‘‘तमीज रहित’’ लोगों को डिबेट शो में बुलाकर चैनल्स समझते हैं कि लोग उन्हें शाबासी देते होंगे ?!यदि ऐसा समझते हो तो सर्वे करा लो।

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खबरें पढ़ने वालों और वालियों की बोलने की गति सामान्य कर दें तो सारी खबरें लोगों को समझ में आती रहेंगी।अभी तो सीमित समय में यदि सौ-सौ खबरें पढ़नी हैं तो गति बुलेट ट्रेन जैसी ही होगी।एक शब्द दूसरे शब्द पर सवार होता जाएगा।दर्शकों के पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा। 

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कल एक टी.वी.चैनल पर एक गेस्ट बोल रहे थे कि ‘‘मैं एस.डी.एम.,डी.एम.और यहां तक कि एस.पी को भी पीट चुका हूं।’’

क्या ऐसे गेस्ट को बुला कर चैनल जाने-अनजाने देश में हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं ? हिंसा का अभी माहौल है भी।यानी आग में घी डालना इसे ही कहते हैं।

इस पर शासन को भी ध्यान देना चाहिए।

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सुरेंद्र किशोर

19 अक्तूबर 26   


बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

 भूली-बिसरी यादें

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ऐसे थे चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषन

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टी.एन.शेषन ने मेरे प्रश्न का जवाब देने के बदले कहा था--

‘‘तुम पर मंगल ग्रह है।’’ 

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सुरेंद्र किशोर

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पटना राज भवन में चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषन का प्रेस कांफ्रेंस था।

संवाददाता के रूप मैं भी मौजूद था-अगली ही पक्ति मंे।

मैंने उनसे एक सवाल पूछा।पर जवाब देने के बदले मुझसे कहा--‘‘तुम पर मंगल ग्रह है।’’

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बाद में भी मैंने किसी से नहीं पूछा कि मंगल ग्रह क्या होता है ?

व्यक्ति पर उसका कैसा असर पड़ता है ?

यह शुभ है या अशुभ ?

ग्रह को शांत करने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है ?

अब भी कोई जानकार व्यक्ति मुझे बता दें,तो अच्छा लगेगा।

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ऐसे जवाब को लेकर शेषन के बारे में भी अनुमान लगा लें।

वैसे मतदाता पहचान पत्र उन्होंने बिहार में जबरन बनवाया।पहले तो लालू प्रसाद डरे हुए थे।उन्हें उसमें कोई षड्यंत्र लग रहा था।

बनवाने के लिए तैयार ही नहीं हो रहे थे।कहा कि सरकार के पास पैसे नहीं है बनवाने के लिए।

पर जब शेषन ने धमकाया कि ‘‘नो पहचान पत्र, नो चुनाव।’

उसके बाद पहचान पत्र बने।

पर चुनाव नतीजे के बाद लालू प्रसाद ने कहा कि 

उससे हमें लाभ मिला।गरीब लोग मतदान कर सके।

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14 अक्तूबर 26


मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

 यह आंदोलन नहीं, आक्रमण है !

‘‘कसाब एनर्जी’’ के साथ ?!

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भारत में तख्ता पलट का सपना यानी 

मैया, मोरे चांद खिलौना लैहों ?!

पर,याद रहे, भारत कोई ‘बनाना रिपब्लिक’ 

(यानी ढीला-ढाला व भ्रष्ट शासन वाला 

देश)नहीं है।

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सुरेंद्र किशोर

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तख्ता पलट वहीं संभव है जहां का शासन तंत्र भ्रष्ट हो

और सुरक्षा-व्यवस्था ढीली हो।मोदी राज में वैसा नहीं।

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राहुल गांधी और प्रतिपक्ष को चाहिए कि वह अपना चाल,चरित्र और चिंतन में सुधार करके पहले बहुमत जनता का विश्वास जीते।

सड़कों पर हंगामा करने और महिला सिपाहियों के साथ अश्लील हड़कतें करने से कोई राजनीतिक लाभ नहीं होने वाला।

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बालक अपनी मां से कह रहा है--

‘‘मैया,मैं तो चांद खिलौना लैहों।’’ 

यानी, मइया मुझे बिना चुनाव जीते, बल्कि लगातार 99 चुनाव हारने के बावजूद ‘‘चांद खिलौना’’ यानी मोदी वाली कुर्सी चाहिए।

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चुनाव में जीत के बिना कुर्सी कैसे मिलेगी बालक बुद्धि !?

हां, मइया यही कर सकती है कि वह थाली में पानी रखकर 

उसमें कुर्सी की छवि तुमको दिखा दे।

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जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह की मांग करने वाले वकील प्रशांत भूषण देश में तख्तापलट की सिफारिश कर रहे हैं।

दशकों तक एक से एक आधुनिक हथियार चमका कर नक्सल-माओवादी परास्त हो चुके हैं।

आप किस खेत की मूली हैं ?

हाल में इस देश के एक पूर्व सेनाध्यक्ष कह चुके हैं--‘‘हम अब इतने ताकतवर हैं कि हम एक साथ ढाई मोरचे(पाक,बांग्लादेश और आंतरिक दुश्मन)पर लड़ सकते हैं।’’

  नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले 12 वर्षों में सेना को काफी मजबूत और साधन संपन्न कर दिया है।मोदी ,नेहरू नहीं है जो शांति के कबूतर उड़ा रहे थे और चीन हमारी 38 हजार वर्ग मील जमीन पर कब्जा कर रहा था।

मोदी राज में 100 सरकारी पैसों में से 85 पैसे बिचैलिए नहीं खाते।सन 2014 में जहां भारत सरकार का कर राजस्व करीब 10 लाख करोड़ रुपए था,वहीं आज करीब 42 लाख करोड़ रुपए है।

इन पैसों के घोटाले में जाने की खबर नहीं है बल्कि ये पैसे देश के विकास,कल्याण और सबसे बढ़कर आंतरिक-बाह्य सुरक्षा प्रबंध पर खर्च हो रहे हैं।मोदी-शाह जानते हैं कि हमें एक दिन बाहरी-भीतरी दुश्मनों से एक साथ लड़कर उन्हें पराजित करना पड़ेगा। 

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जनता द्वारा चुनी गई इंदिरा सरकार का जब अत्यंत दमनकारी इमरजेंसी में भी सेना ने विरोध नहीं किया तो आज तो भाजपा जनता में काफी लोकप्रिय है।और मोदी सरकार ने कोई इमरजेंसी भी नहीं लगाई है।सेना यहां एक अनुशासित जमात है और चुनी हुई सरकार का कहना मानती रही है।(सेना में विद्रोह के बिना भारत में कोई तख्ता पलट कैसे कर सकता है ?विद्रोह संभव नहीं।)भारत सरकार के पूर्व साॅलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने कहा है कि ‘‘भारत में हो रहे कुछ विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग और बाहरी दखल है।’’

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हाल में देश के कई राज्यों में हुए चुनावों में भाजपा व सहयोगी संगठनों की भारी जीत

हुई है।उसका विवरण पढ़ लीजिए।

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1.-हाल में भाजपा ने राजस्थान के शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में शानदार बहुमत हासिल किया।कई नगर निगमों व बोर्डों पर चुनाव के जरिए कब्जा जमाया। 

2.-त्रिपुरा में भी स्थानीय निकाय चुनावोंमें बीजेपी-एनडीए गठबंधन को बड़ी जीत मिली।

3-हरियाणा के नगर निकाय चुनावों (जैसे अंबाला,सोनीपत और पंचकूला नगर निगमों)में मेयर के पदों पर बीजेपी ने जीत हासिल की।

4.-असम (नगांव लोक सभा सीट),पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में हुए उप चुनावों में भी एनडीए और बीजेपी उम्मीदवारों ने जीत हासिल की।

 74 प्रतिशत मुस्लिम बहुल रेजी नगर (पश्चिम बंगाल)विधान सभा सीट पर भी भाजपा ने जीत हासिल की है।

अब बंगाल के कई इलाकों में मुस्लिम शांतिपूर्वक जीना चाहते थे।ममता राज में हिंसा ही हिंसा थी।

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5.-आश्चर्य है कि हाल में जब दिल्ली,पंजाब,मंगलोर और केरल में छात्र संघों के चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जीत हासिल की तो कांग्रेस ने यह आरोप नहीं लगाया कि वहां चुनावी धांधली हुई है।

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वोट चोरी के आरोप की असलियत

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जहां कांग्रेस जीते,वहां वोट चोरी

नहीं।पर जहां राजग जीते,वहां वोट चोरी ?!!

ऐसे तर्क से भला कौन सहमत होगा ?

लोग असहमत हैं,तभी हाल के चुनावों में

भी कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई है।

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30 सितंबर 26 के दैनिक जागरण में राजीव सचान ने लिखा है--‘‘बिहार में एस.आई.आर.के खिलाफ छेड़े गए अभियान की हवा कांग्रेस नेता शकील अहमद के इस बयान ने भी निकाली थी कि यदि 65 लाख वोटरों के नाम गलत तरीके से काटे गए तो 65 लोग भी सड़कों पर यह कहने क्यों नहीं आए कि वे जीवित हैं, वैध मतदाता हैं और फिर भी उनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए ?’’

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प्रतिपक्ष आरोप लगा रहा है कि 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।

अधिकृत प्रवक्ता के अनुसार,

इनमें से साढ़े नौ करोड़ मतदाता गैर हाजिर,कहीं दूसरी जगह गए या एस.आई.आर.के दौरान किसी अन्य कारण से अपने मूल स्थान पर नहीं मिले।

 2 करोड़ 70 लाख मतदाताओं के नाम इसलिए सूची से हटा दिए गए क्योंकि उनके निधन की पक्की जानकारी मिली।एक करोड़ मतदातओं के नाम एक से अधिक जगह दर्ज पाए गए।

पिछला एस.आई.आर 2002 और 2004 के बीच हुआ था।

इतने वर्षों में ऊपर का आंकड़ा कोई असामान्य बात नहीं है।

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राहुल गांधी आरोप लगा रहे हैं कि 13 करोड़ वास्तविक मतदाताओं के नाम जानबूझ कर हटा दिए गए।

इस तर्क पर कौन विश्वास करेगा ?

एक कहावत है कि झूठ के पांव नहीं होते।इसलिए ऐसे झूठ के आधार पर कोई वास्तविक जनांदोलन नहीं चल सकता।

हां,अराजकता की बात और है।पर अराजकता पर तो कई पक्षों को कीमत चुकानी पड़ेगी।

  ऐसी अराजकता को रोकना मोदी सरकार और सुरक्षाकर्मियों का संवैधानिक दायित्व है जिसका वे पालन करेंगे।

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राहुल गांधी के नेतृत्व में तेलचट्टों ,वामपंथियों और जेहादियों तथा विदेशी शक्तियों का यह अभियान कोई जन आन्दोलन नहीं है ,बल्कि इंडियन स्टेट के खिलाफ युद्ध है।राहुल गांधी 2025 में ही कह चुके हैं--‘‘हम भारतीय राज्य से भी लड़ रहे हैं।’’

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बांग्ला देश के तख्ता पलट के तत्काल बाद कांग्रेस के दो प्रमुख नेता सलमान खुर्शीद और मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि जो कुछ बांग्ला देश में हुआ,वैसा ही भारत में भी होगा।’’

लगता है कि राहुल गांधी ने देशी-विदेशी शक्तियों की मदद से वह दिन ला दिया है।पर सबको उसके परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट को नये राजनीतिक विकास को ध्यान में रखते हुए

अलग ढंग से सोचना चाहिए न कि लकीर का फकीर बनना चाहिए।

संविधान निर्माताओं ने ऐसी ही विशेष परिस्थितियों से मुकाबले  के लिए संविधान में अनुच्छेद-142 के जरिए सुप्रीम कोर्ट को विशेषाधिकार दे रखा है।उम्मीद है कि इस संकट की घड़ी में सुप्रीम कोर्ट भी अपनी तद्नुसार अपनी भूमिका निभाएगा।

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12 अक्तूबर 26


शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

 मक्खियां 118 पुलिसकर्मियों को घायल

 नहीं कर सकती !!!!

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कल की आशंकित हिंसा का मुकाबला करने के लिए

दिल्ली पुलिस को सुप्रीम कोर्ट की ओर से 

खुली छूट मिलनी चाहिए थी।

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सुरेंद्र किशोर

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 क्योंकि आशंका है कि राष्ट्रद्रोही तत्व आंदोलन की आड़ में कल ऐसी हिंसा कर सकते हैं जिसका चेन रिएक्शन पूरे देश में हो सकता है जैसा इन दिनों फ्रांस में हो रहा है।

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केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट को इस बात पर ध्यान देना

चाहिए कि प्रतिपक्ष की ओर से कल नई दिल्ली में होने वाले प्रदर्शन के दौरान वैसी विषम स्थिति पैदा न हो जाए जो कुछ आज फ्रांस के विभिन्न नगरों में जारी है।कल भी सुप्रीम कोर्ट उस पर नजर रखे।जरूरत के अनुसार निदेश दे।

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 बेहतर तो यह होता कि सुप्रीम कोर्ट कल की स्थिति को संभालने का पूरा भार दिल्ली पुलिस और आम प्रशासन को सौंप देता।

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किंतु ऐसा नहीं हुआ।यह दुर्भाग्यपूण है और इससे कई तरह के अपशकुन हो रहे हैं।

कोक्रोच जनता पार्टी के प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि ‘‘मक्खी मारने के लिए हथौड़ा न चलायें।’’

सुप्रीम कोर्ट भूल गया कि इन्हीं तेलचट्टों की ओर से 

गत जुलाई में हुई हिंसा में दिल्ली पुलिस के छोटे -बड़े 118 पुलिसकर्मी घायल हो गये थे।वह अभूतपूर्व घटना थी।वे मक्खी नहीं हैं। जो शक्तियां कल दिल्ली में आंदोलनरत होने वाली हैं,उनकी मंशा के  बारे में आई.बी. जानकारी सुप्रीम कोर्ट को 

 लेनी चाहिए।

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अब मंशा की झलक देखिए।

राहुल गांधी 15 जनवरी 2025 को यह कह चुके हैं कि मैं इंडियन स्टेट से लड़ रहा हंू।(इंडियन स्टेट से लड़ने का मतलब है भारत की इस देश की संवैधानिक व्यवस्था से लड़ना।) 

कल ‘‘भाई-बहन’’ ने दिल्ली की महिला पुलिस कर्मियों के साथ जैसी अश्लील हड़कतें कीं,वह किसी जिम्मेदार नेता को शोभा नहीं देता।वे जिम्मेदार नेता हैं भी नहीं,यह बार -बार साबित हो चुका है।

उनके दल के सलमान खुर्शीद और मणिशंकर अय्यर कह चुके हैं कि जो कुछ बांग्ला देश में (तख्ता पलट)हुआ,वैसा भारत में भी हो सकता है।

  कल जो लोग दिल्ली में आंदोलनरत होने वाले हैं उनकी, भारत विरोधी विदेशी शक्तियों से साठगांठ की खबरें आती रहती हैं।

ऐसी स्थिति में देश में कई तरह के अपशकुन हो रहे हैं।    

-----सुरेंद्र किशोर

       9 अक्तूबर 26