Friday, June 23, 2017

भ्रष्टों के खिलाफ स्टिंग आॅपरेशन में क्यों नहीं लगते ईमानदार लोग !

कल्पना कीजिए कि कुछ उत्साही और ईमानदार लोग मिलकर एक ऐसा संगठन बना लें जो भ्रष्टाचार व अपराध के खिलाफ सिर्फ स्टिंग आपरेशन करें यानी ‘डंक अभियान’ चलाए ? जाहिर है कि वह संगठन रातोंरात देश में लोकप्रिय हो जाएगा।

क्योंकि आज बिहार सहित पूरे देश में आम लोग सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचार से काफी परेशान हैं। आज हर क्षेत्र के भ्रष्ट लोग इतने अधिक ताकतवर हो चुके हैं कि उनके खिलाफ अधिकतर मामलों में शासन की ओर से निर्णायक और सबक सिखाने वाली कार्रवाई नहीं हो पा रही है। ईमानदार मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री भी भ्रष्ट सरकारी अफसरों और कर्मियों पर काबू पाने में कई बार खुद को असमर्थ पाते हैं।

अपने मुख्यमंत्रित्व काल के प्रारंम्भिक वर्षों में नीतीश कुमार ने अपने दल के लोगों  से अपील की थी कि वे भ्रष्ट सरकारी कर्मियों को पकड़ने में निगरानी ब्यूरो की मदद करें। पर ऐसा नहीं हो सका। क्योंकि अपवादों को छोड़ दें तो आज अधिकतर राजनीतिक दलों में ऐसे ही कार्यकर्ताओं की भरमार है जो बिना कुछ किए रातोंरात कुछ पा लेना चाहते हैं। 

दरअसल स्टिंग आपरेशन वही लोग चला सकते हैं जो निःस्वार्थ समाज सेवा की भावना से ओतप्रोत हों। कुछ निजी चैनल के पत्रकार ‘डंक अभियान’ चलाते रहते हैं। उस अभियान का सकारात्मक असर भी पड़ता है। कई बार सरकार और विधायिका भी डंक अभियान पर कार्रवाई करने को बाध्य हो जाती है। 2005 में संसद ने अपने 11 सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने भी बाद में संसद के उस फैसले पर अपनी मुहर लगायी। उन सांसदों पर सदन में प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत लेने का आरोप था। उनमें से राज्य सभा के एक सदस्य पर तो सांसद फंड के बदले में घूस लेने का आरोप था। ये सभी सांसद एक स्ंिटग आपरेशन में पकड़ में आ गए थे। पर इस देश में भ्रष्टाचार की भीषण समस्या की व्यापकता को देखते हुए इस काम में अधिकाधिक लोगों के लग जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। अन्यथा देर हो जाएगी। 

अपनी सरकार में भ्रष्टाचार से परेशान एक राज्य के मुख्यमंत्री ने कई साल पहले अपने उत्साही और सिद्धांतवादी युवकों से अपील की कि वे भ्रष्टों के खिलाफ ‘डंक अभियान’ चलाएं। पर दूसरे ही दिन उस राज्य के बड़े अफसरों के संगठन ने प्रेस कांफ्रेंस करके मुख्यमंत्री की इस अपील का खुलेआम विरोध कर दिया। मुख्यमंत्री ने फिर अपनी बात नहीं दुहरायी।

इससे भी समझा जा सकता है कि यह समस्या कितनी गहरी है और उसके सामने ईमानदार नेता भी कितने लाचार हैं। हालांकि आम नेताओं में ईमानदारी तो और भी तेजी से घटती जा रही है। सरकारी भ्रष्टाचार के कारण देश के विकास की गति धीमी है।

कई बार अपने ड्राइंग रूम की बातचीत में कुछ लोग यह रोना रोते हैं कि भले लोगों के लिए राजनीतिक दलों में कोई जगह ही नहीं है। उनमें से कई अच्छी मंशा वाले लोग भी होते हैं। वैसे लोग डंक अभियान को परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से मदद कर सकते हैं। 

हां, इस मामले में सरकार को भी डंक अभियान के बारे में स्पष्ट गाइडलाइन जारी करनी चाहिए। यदि सरकारों की मंशा अच्छी है तो उसे ऐसे अभियानों से मदद ही मिलेगी। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में कुछ बंधनों के साथ स्टिंग आपरेशन की पूरी छूट है। इसे कानून के कार्यान्वयन की दिशा में विधिसम्मत तरीका माना जाता है। 2003 में  भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी डंक अभियान पर कुछ दिशा निदेश दिए थे। उससे ठीक पहले एक केंद्रीय मंत्री का मीडिया द्वारा स्टिंग आपरेशन हुआ था। उस घूसखोर मंत्री को यह कहते हुए कैमरे पर पकड़ा गया था कि ‘पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा की कसम, खुदा से कम भी नहीं।’

अदालत के दिशा निर्देश का मूल तत्व यही है कि आम आदमी या पत्रकार व्यापक जनहित में ऐसा कर सकते हैं। पर किसी के भयादोहन के लिए इस तरीके का इस्तेमाल नहीं हो सकता। जाहिर है कि उस समय की अपेक्षा देश में भ्रष्टाचार बढ़ा है।



जी.एस.टी. के बेहतर नतीजों का इंतजार 

आर्थिक इतिहासकार अंगस मेडिसन के अनुसार पहली सदी से लेकर दसवीं सदी तक भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। पहली सदी में विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में भारत का योगदान 32 दशमलव 9 प्रतिशत था।

संभवतः भारत को सोने की चिडि़या जानकर ही अनेक विदेशी हमलावरों ने समय समय पर इस देश पर हमला किया। पंद्रहवी सदी में भारत का योगदान करीब 25 प्रतिशत था। सन् 1820 में यह आंकड़ा घटकर 16 प्रतिशत रह गया।

सन् 1950 में दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान सिर्फ 3 प्रतिशत रह गया था। यानी विदेशी लुटेरों ने पूरा दोहन किया। अब करीब छह प्रतिशत है। आजादी के बाद यह और भी बढ़ता, पर देसी लुटेरे भी कम नहीं हैं।
केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि जी.एस.टी. लागू हो जाने के बाद केंद्र और राज्यों का राजस्व बढ़ेगा। अब देखना है कि वह कितना बढ़ता है। राजस्व के बढ़ने का सीधा और सकारात्मक असर विकास पर होगा।

वैसे कोई कितनी भी अच्छी व्यवस्था बनाए, उसमें छेद करने का रास्ता भ्रष्ट लोग निकाल ही लेते हैंं। जी.एस.टी. एक अच्छी व्यवस्था मानी जा रही है। पर, भगवान इसे भ्रष्टों की नजर से बचाएं !



क्या हुआ महेश शाह की घोषणा का ?

गुजरात के एक बिंिल्ंडग व्यवसायी महेश शाह गत साल 30 सितंबर को अहमदाबाद स्थित आयकर कार्यालय गये। उन्होंने स्टेचुरी फार्म जमाकर अपने पास नकद 13 हजार 860 करोड़ रुपए होने की जानकारी दे दी। आयकर विभाग ने उनका फार्म स्वीकार कर लिया। यानी विभाग ने उनकी घोषणा को मान लिया।

पर दिसंबर, 2016 में  शाह ने कह दिया कि ‘कुछ व्यवसायियों और नेताओं ने उनका इस्तेमाल किया। नेता और व्यवसायी पीछे हट गए। इसलिए मैं पहली किस्त नहीं दे पाया।’ शाह को गिरफ्तार भी किया गया था। पर बाद में आयकर महकमे ने शाह के साथ क्या सलूक किया, यह पता नहीं चल सका। आयकर विभाग को चाहिए कि वह अब भी शाह के उस दावे और पीछे हटने के बारे में पूरा विवरण देश को बता दे। 

 केंद्र सरकार काला धन और बेनामी संपत्ति की खोज खबर के काम में गंभीरता से लगी हुई है। इस काम पर अधिकतर लोग सरकार से खुश हंै। यदि लोगों को महेश शाह के बारे में भी बता दिया जाता तो वे और भी खुश होते। क्योंकि अधिकतर लोग अब यह समझने लगे हैं कि प्रभावशाली लोगों के पास जो बेनामी संपत्ति या काला धन है, वह आम जनता का हक मार कर ही जुटाए गए हैं।  



 मजदूरी मद में किसानों को सब्सिडी देने का सुझाव

सन 2012 में तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने सुझाव दिया था कि  सरकार खेतिहर मजदूरों की मजदूरी के मद में 50 प्रतिशत सब्सिडी किसानों को देने का प्रावधान करे। आत्महत्याओं की घटनाओं को ध्यान में रखते हुए उन्होंने यह सिफारिश की थी। पर मनमोहन सरकार ने उस सिफारिश पर ध्यान नहीं दिया। वह तो दूसरे ही कामों में व्यस्त थी। वैसे मनरेगा कार्यक्रम को किसानों की खेती से जोड़ने की भी सलाह दी गयी थी।

याद रहे कि दिनानुदिन खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है। उसे उबारने के लिए सुझाव तो बहुत हैं, पर उन पर अमल कम ही होता है। एक बार फिर कर्ज माफी का दौर जारी है। यह भी जरूरी काम है। पर यह स्थायी हल नहीं है। किसानों को राहत देने के लिए कुछ स्थायी काम करने होंगे।पता नहीं यह कौन सरकार करेगी ! 



और अंत में

एक फेसबुक मित्र ने टिप्पणी की है कि ‘हे ईश्वर, मुझे कभी इतना बड़ा आदमी मत बनाना ताकि निहितस्वार्थवश मैं साहुकार को साहुकार और चोर को चोर कह पाने का साहस खो दूं!’


(23 जून 2017 को प्रभात खबर में प्रकाशित)

जून में देश के साथ-साथ बिहार की राजनीति भी रहेगी गरम

1975 के जून में इस देश की राजनीति में दूरगामी परिणामों वाली घटनाएं हुई थीं। वैसी बड़ी तो नहीं, पर कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं की आहट इस जून में भी जरूर सुनाई दे रही हैं।

बिहार में राजद और भाजपा के कुछ बड़े नेताओं के बीच गंभीर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। आरोप भ्रष्टाचार को लेकर हैं। पता नहीं, इस मामले मंे आगे क्या-क्या होने वाला है। रोज नये-नये खुलासे हो रहे हैं। यदि इन आरोप-प्रत्यारोपों में कोई बड़ा मोड़ आ गया तो वह राजनीति और कुछ नेताओं के लिए यादगार बन सकता है। बिहार की जनता के लिए भी।

  इस बार की बिहार इंटर परीक्षा के रिजल्ट ने भी देश  का ध्यान खींचा है। दो-तिहाई परीक्षार्थी फेल कर गए हैं। इसको लेकर पीडि़त छात्र उद्वेलित हैं। राज्य सरकार उनकी समस्या के समाधान का भरोसा दिला रही है। देखना है कि वैसे परीक्षार्थियों की वाजिब मांगों का समाधान कब तक होता है ! जितनी जल्द हो जाए,उतना ही अच्छा है।

इस महीने यह भी देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव में दलीय जोड़तोड़ को लेकर बिहार के महागठबंधन के नेतागण राष्ट्रीय स्तर पर कैसी भूमिका निभाते हैं! जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए अभी होने वाली दलीय गोलबंदी, 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए पूर्व पीठिका का काम कर सकती है।

यह महीना कश्मीर को लेकर भी काफी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान ने पूरा जोर लगा दिया है। भारतीय सेना पहले की अपेक्षा अधिक ताकत से भारत विरोधी ताकतों को जवाब दे रही है। केंद्र सरकार ने जरूरत के अनुसार फौजी कार्रवाइयां करने की पूरी छूट सेना को दे दी है। ऐसा कम ही होता है जब सेना को पूरी छूट मिल जाए !

हाल में पशु बाजारों में वध के लिए मवेशियों की खरीद-बिक्री पर केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। इसको लेकर ‘सेक्युलर दल’ और उनकी राज्य सरकारें रोष में हैं। इससे ध्रुवीकरण का खतरा भी सामने है। हालांकि ताजा खबर के अनुसार केंद्र सरकार इस मामले में कुछ सहूलियत देने को तैयार लग रही है।

खबर यह भी आ रही है कि यू.पी.ए. सरकार के कार्यकाल में दिग्विजय सिंह ने जाकिर नाइक को कानूनी परेशानियों से बचाया था। हालांकि जाकिर ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके साथ किसी देशभक्त की सहानुभूति हो सकती है। भारत के कई मुस्लिम धर्म गुरू भी जाकिर की कार्यशैली के खिलाफ रहे हैं।

याद रहे कि पुलिस ने जाकिर नाइक की आपत्तिजनक गतिविधियों के लिए उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रस्ताव किया था। उस पर धर्म परिवर्तन का आरोप है। वह सार्वजनिक रूप से अन्य धर्मों की निंदा करता है।
इन दिनों वह इस देश की पुलिस के डर से फरार है। पर सवाल है कि यह दिग्विजय सिंह भी कैसे नेता हैं जिनका नाम ऐसे विवादास्पद लोगों से यदाकदा जुड़ता रहता है ? या फिर ऐसे लोगों से श्री सिंह खुद को जोड़ लेते हैं ?
कपिल मिश्र जैसे अपने ही पूर्व सहयोगी द्वारा अरविंद केजरीवाल तथा उनके सहकर्मियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों से एक नयी शैली की राजनीति के पतन की आहट मिल रही है। किसी ने अनुमान भी नहीं लगाया होगा कि जनलोकपाल आंदोलन के जरिए 2011 में अन्ना हजारे के साथ उभरे अरविंद केजरीवाल की सरकार पर कुछ ही वर्षों में इतने संगीन आरोप लगेंगे।

यह बात और है कि आरोपों को अभी साबित किया जाना है। पर आरोप लग ही क्यों रहे हैं ? ऐसे आरोपों से स्वच्छ राजनीति की उम्मीद में बैठे आम नागरिकों को झटका लगता है। लगता है कि इसी जून में अरविंद मंडली पर लग रहे आरोपों को उनकी तार्किक परिणति तक पहुंचा दिया जाएगा।



जरा याद कर लें जून 1975 भी !

5 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण ने पटना के गांधी मैदान की सभा में ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया था। यह और बात है कि वह सपना भी पूरा नहीं हुआ। 12 जून 1975 को  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रायबरेली से लोकसभा का चुनाव खारिज कर दिया। अदालत ने लोकसभा में वोट देने का प्रधानमंत्री का अधिकार भी समाप्त कर दिया। उसी दिन यह खबर आई कि गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी हार गयी।

जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी से मांग की कि वह अब प्रधानमंत्री पद छोड़ दें। उस मांग पर जोर डालने के लिए 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी ने जनसभा की। सभा बड़ी थी। स्वतःस्फूर्त भी। उसी रात देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गयी। देश के लगभग सारे गैर कांग्रेसी नेता जेलों में बंद कर दिए गए। अखबारों पर कठोर सेंसरशीप लगा दी गयी। किसी एक महीने में एक साथ इतनी बड़ी घटनाएं संभवतः कभी नहीं हुईं जितनी जून 1975 में हुईं। 



देश बचाने के लिए कठोर कार्रवाई जरूरी 

गत 29 मई 2017 को यह खबर आई कि कश्मीर में अलगाववादियों को मिल रही वित्तीय मदद के तार दिल्ली के हवाला कारोबारियों से जुड़े होने के सबूत एन.आई.ए. को मिले हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। क्योंकि हमारे देश का तंत्र चुस्त नहीं है। हवाला कारोबारियों पर कारगर कार्रवाई नहीं हो पाती। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हमारे देश के अनेक नेताओं और बड़े अफसरों का हवाला कारोबारियों से करीबी संबंध हैं।

नब्बे के दशक में वह संबंध उजागर हुआ था। तभी दोषियों को सजा हो गयी होती तो संभवतः आज कश्मीर के आतंकवादियों व अलगाववादियों को हवाला करोबारियों की ‘सेवाएं’ नहीं मिल पातीं।

27 मार्च 1991 में जे.एन.यू. का एक छात्र शहाबुददीन गोरी लाखों रुपए के साथ पकड़ा गया था। वे पैसे कश्मीर के आतंवादियों के लिए थे। इसी तरह के राष्ट्रविरोधी धंधे में लगा हिजबुल मुजाहिद्दीन का अशफाक लोन उन्हीं दिनों गिरफ्तार हुआ था। इन लोगों से मिले सुराग के बाद पांच हवाला कारोबारी  गिरफ्तार हुए।

सी.बी.आई. ने 3 मई 1991 को 20 स्थानों पर एक साथ छापे मारे। जिन स्थानों में छापामारी की गई, उनमें  जे.के. जैन का परिसर भी था। उसके यहां से सनसनीखेज डायरी मिली। उस डायरी में दर्ज था कि देश के कई दलों के 115 अत्यंत ताकवर नेताओं और बड़े अफसरों को हवाला के पैसों में से लाखों-करोड़ों रुपए दिए गए।

नेताओं में कई पूर्व केंद्रीय मंत्री भी थे। यानी जो कश्मीर के आतंकवादियों को पैसे दे रहे थे, वही इस देश के बड़े नेताओं को भी खुश कर रहे थे। जांच हुई, पर सी.बी.आई. नामक तोता ने उसे रफादफा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने भी कहा था कि इस जैन हवालाकांड की तो सी.बी.आई. ने कोई जांच ही नहीं की।



और अंत में

किसी ने ठीक ही कहा है कि ‘कफन में जेब नहीं होती।’ पर इस देश के अनेक नेताओं की तरह ही पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत जयललिता भी इस उक्ति का मर्म नहीं समझ सकीं थीं। कौन सी संपत्ति लेकर परलोक गयीं हैं जयललिता ? ताजा खबर यह है कि तमिलनाडु सरकार ने जयललिता की निजी संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। याद रहे कि अदालत ने जायज आय से अधिक संपत्ति जब्त करने का आदेश दे रखा है। 

जयललिता ने कुल कितनी संपति बनाई थी, उसके बारे में तो हमेशा अटकलों का बाजार ही गर्म रहा है। पर सवाल है कि उन्होंने किसके लिए संपत्ति बनाई ? शशिकला जिस केस में जेल की सजा भुगत रही हैं, उसी केस की मुख्य आरोपित जयललिता थीं।

बंगलुरू की विशेष अदालत ने 27 सितंबर 2014 को जयललिता को 4 साल की कैद और एक अरब रुपए का जुर्माना किया था। उन्हें जेल जाना पड़ा था। जयललिता पहले से ही अस्वस्थ चल रही थीं। जेल की  अव्यवस्था ने उनकी बीमारी को और भी गंभीर बना दिया था। नतीजतन उनका असामयिक निधन हो गया।

( दो जून 2017 को प्रभात खबर में प्रकाशित)

प्रकृति से गांधी की निकटता से सीख लेंगे आज के नेता ?

दक्षिण अफ्रीका में वकालत करते समय मोहनदास करमचंद गांधी पेट की बीमारी से ग्रस्त हो गये थे। उन्होंने दवाएं खाईं। पर कोई लाभ नहीं हुआ। वेजिटेरियन सोसायटी के एक मित्र ने उन्हें एक किताब दी। एडोल्फ जस्ट लिखित ‘रिटर्न टू नेचर’ उन्होंने ध्यान से पढ़ी। उस पुस्तक ने गांधी को बड़ी सीख दी। गांधी प्रकृति के करीब हो गए।

उन्होंने अपने आहार में बदलाव किया। उन्होंने महसूस किया कि मिट्टी, पानी, धूप और हवा मंे बड़ी ताकत है। ये चीजें शरीर को खुद-ब-खुद स्वस्थ होने और रखने में बड़ी मदद करती हैं। यह भारत जैसे देश के लिए भी अनुकूल है जहां के अधिकतर लोग गांवों में यानी प्रकृति के पास रहते हैं।

खुद महात्मा गांधी अपना इलाज धूप स्नान, पेट और शरीर पर मिट्टी की लेप तथा इसी तरह के अन्य प्राकृतिक उपायों से करते रहे। उसका उन्होंने जीवन भर पालन किया। उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र की स्थापना भी की। उनके आश्रम के अन्य सहवासी भी प्राकृतिक जीवन जीते थे। नतीजतन आजादी की लड़ाई में लगे अधिकतर गांधीवादी नेता और कार्यकर्ताओं ने लंबा जीवन जिया। 

देश गांधी के चम्पारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष मना रहा है। क्या आज के नेतागण गांधी की तरह ही भरसक प्राकृतिक जीवन जीने का संकल्प लेंगे? कुछ आधुनिक नेतागण तो प्राकृतिक जीवन से काफी दूर हैं। थोड़े से लोग पालन करते हैं। 

बढ़ते प्रदूषण और जानलेवा मिलावट के इस दौर में यह और भी जरूरी है कि लोग प्रकृति के करीब जाएं। नेता इस मामले में भी देश को नेतृत्व दे सकते हैं। इस संदर्भ में भी आज के कई बड़े नेताओं के बारे में अच्छी खबरें नहीं आतीं। सुना जाता है कि साठ-सत्तर की उम्र में ही बीमार रहने लगते हैं। उन्हें देश-विदेश के अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ते हैं। इससे खुद उन्हें, उनके परिजन और उनके समर्थकों -प्रशंसकों में निराशा फैलती है। इनमें से तो कुछ नेता समाज के एक बड़े हिस्से में बड़े लोकप्रिय होते हैं। उन्हें कोई अधिकार नहंीं है कि वे खानपान,  रहन- सहन और आहार -विहार में अतिशय कुसंयम अपनाकर अपने प्रश्ंासकों को निराश करें।
आज के नेता यदि चाहें तो प्राकृतिक जीवन और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति अपना कर वे इस चम्पारण शताब्दी वर्ष में बापू को बेहतर श्रद्धांजलि दे सकते हैं।
   
क्यों बार-बार टूट जाता है पीपा पुल 

खबर है कि दानापुर के पास गंगा नदी पर बना पीपा पुल गत चार महीनों में तीसरी बार विसंधित हो गया यानी टूट गया। नदी में पानी कम होने पर हर साल पीपा पुल बनता है। डेढ़ करोड़ रुपए की लागत आती है। इतने अधिक खर्च के बावजूद निर्मित पुल को आंधी से बचाने का कोई उपाय क्यों नहीं है, यह बात समझ में नहीं आती। क्या हर साल नये पीपे का निर्माण कराया जाता है ?

गांधी सेतु के जर्जर हो जाने की स्थिति में दानापुर का यह अस्थायी पुल लाखों लोगों को राहत देता है। इसके बावजूद इसके निर्माण और रखरखाव में इतनी बड़ी लापरवाही ? आश्चर्य होता है।

अच्छा तो होता कि दानापुर से दिघवारा के बीच गंगा नदी पर स्थायी पुल के निर्माण पर सरकार विचार करती। उससे पटना महानगर के विस्तार में भी सुविधा होती। पर जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक ऐसा पीपा पुल तो बने जो आंधियों को झेल सके !



कोयला सचिव को तो सजा, पर कोयला मंत्री ? 

दिल्ली की विशेष अदालत ने गत 22 मई को पूर्व केंद्रीय कोयला सचिव तथा दो अन्य कार्यरत आई.ए.एस. अफसरों को दो -दो साल की सजा सुनाई है। इस मामले में कुछ अन्य संबंधित लोगों को भी सजा दी गयी है। अदालत ने यह अच्छा किया है। हालांकि सजा कम लगती है। बड़े अफसरों को इस तरह सजा होगी तो शायद देश के संसाधनों की लूट कम होगी। क्योंकि यदि बड़े अफसरगण सरकारी भ्रष्टाचार के धंधे में पूरी हिम्मत से असहयोग करने लगें तो सत्ताधारी नेतागण देश को लूट नहीं सकेंगे।

हालांकि खबर तो यह भी आती रहती है कि पहले से लगभग ईमानदार रहे मंत्रियों को भी कुछ घाघ अफसर ही लूटने का मंत्र सिखा देते हैं। पर इस मामले में एक बड़ा सवाल देश के सामने है। सिर्फ अफसरों को ही क्यों सजा दी जाए?

कोयला मंत्री को क्यों नहीं ? सचिव के प्रस्ताव पर कोयला ब्लाॅक के आवंटन का अंतिम आदेश तो कोयला मंत्री का ही था ! उन दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही तो कोयला मंत्री भी थे। शायद इस मामले में ऊपरी अदालत मंे अपील होगी तो यह सवाल उठेगा कि कोयला मंत्री कैसे सजा से बच सकते हैं ? यह मामला मध्य प्रदेश में गलत ढंग से कोयला खान आवंटन का था।

वैसे तो देश भर में ऐसे घोटाले हुए थे। सी.ए.जी. ने कहा था कि इस तरह के आवंटन से सरकारी खजाने को एक लाख 86 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। हालांकि वास्तविक नुकसान और अधिक था। 24 सितंबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने 214 कोल ब्लाॅक के आवंटन को रद कर दिया था। अब सवाल है कि 214 कोल ब्लाॅक के आवंटन में घोटाला सिर्फ सचिव स्तर के अफसरों की मिलीभगत से संभव है ?

 जब यह घोटाला सामने आया था तो चर्चा यह थी कि इस घोटाले में परदे के पीछे बड़ी हस्तियां शामिल थीं। पर उम्मीद है कि ऊपरी अदालत उन लोगों को भी सजा देगी जिन सत्ताधारियों के दस्तखत से कोयला घोटाले को अंजाम दिया गया।



त्रिशंकु शत्रुघ्न सिन्हा

 
अन्य लाखों लोगों के साथ -साथ मैं भी कुछ बातों को लेकर शत्रुघ्न सिन्हा का प्रशंसक रहा हूं। आगे भी रहूंगा। वह एक अच्छे कलाकार हैं। कैरियर के शुरुआती दौर में उन्होंने विलेन के रूप में भी दर्शकों की तालियां बटोरी थी। यह एक नयी बात थी। जब पूरे देश में बिहारियों को उपहास की नजर से देखा जाता था, उस समय भी उन्होंने खुद को ‘बिहारी बाबू’ कहलाना पसंद किया।

जब फिल्मी दुनिया के लोग आम तौर पर प्रतिपक्षी राजनीति का दामन नहीं थामते थे, शत्रुघ्न सिन्हा ने सत्ता के खिलाफ जेपी का साथ दिया था। पर अनेक शालीन हलकों में शत्रुघ्न सिन्हा की मौजूदा राजनीतिक भूमिका अच्छी नहीं मानी जा रही है। कायदे की राजनीति की मांग तो यही है कि या तो भाजपा बिहारी बाबू को पार्टी से निकाल दे या फिर वह खुद ही पार्टी छोड़ दें। खुद दल छोड़ने में उन्हें दिक्कत हो सकती है। क्योंकि तब उनकी लोकसभा की सदस्यता चली जाएगी। पर कार्रवाई करने में पार्टी को क्या दिक्कत है ? यह बात अनेक लोगों की समझ से बाहर है।



और अंत में

बिहार भाजपा के मंत्री ऋतुराज सिन्हा ने कहा है कि शत्रुघ्न सिन्हा को ख्याल रखना चाहिए कि वह भाजपा के चुनाव चिह्न पर सांसद बने हैं। ऋतुराज ने ठीक ही कहा है। पर सवाल है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की शत्रुघ्न सिन्हा के बारे में क्या राय है ? क्या शाह जी ने बिहारी बाबू को कभी इस बात की याद दिलाई कि वे भाजपा के सांसद हैं ? यदि दिलाई भी होगी तो इस बात का पता आम लोगों को नहीं है।

दरअसल ‘शत्रु जी’ फिल्म में तो विलेन से हीरो बने थे।

राजनीति में वे विपरीत दिशा में चल रहे हैं। कम से कम भाजपा के लिए तो विलेन ही बन  गये हैं। हां, भाजपा विरोधी दलों के लिए शत्रुघ्न सिन्हा जरूर हीरो बने हुए हैं। टेढ़े-मेढ़े और परोक्ष-प्रत्यक्ष बयानों के जरिए अपनी ही पार्टी को सार्वजनिक रूप से जितनी परेशानी में बिहारी बाबू ने डाला, वह भी एक रिकाॅर्ड है।
अभी और क्या - क्या करेंगे, वह सब देखना दिलचस्प होगा।


(26 मई 2017 को प्रभात खबर में प्रकाशित)

Saturday, May 20, 2017

अंततः फायदे में नहीं रहते राजनीति में हिंसा का सहारा लेने वाले

 जयप्रकाश नारायण ने 14 जून 1974 को बिहार विधानसभा के स्पीकर हरिनाथ मिश्र को लिखा था कि ‘विधानसभा के सामने छात्रों के सत्याग्रह के सिलसिले में कुुछ विधायकों के साथ दुव्र्यवहार किये जाने और उनके विरूद्ध भद्दे नारे लगाये जाने की सूचना मुझे मिली है। रिपोर्ट परस्पर विरोधी है, पर यह लगता है कि कुछ भद्दे नारे तो सत्याग्रहियों ने भी दुहराये। पर कुर्ता फाड़़ना, रिक्शे से नीचे खींचना आदि दुष्कृत्य दर्शकों में से ही कुछ लोगों ने किये। पर चाहे जिन लोगों ने ऐसा किया हो, मुझे घटना के लिए बहुत खेद है। जिन विधायकों के साथ ऐसा दुव्र्यवहार किया गया, उनके प्रति मैं क्षमाप्रार्थी हूं। आप मेरी यह भावना उन सभी विधायकों तक पहुंचा दें और मेरा यह पत्र विधानसभा में पढ़कर सुना देने की कृपा करें। मैं आभार मानूंगा।’

  इस पत्र को आज के संदर्भ में देखें। बुधवार को पटना के वीरचंद पटेल पथ पर जो कुछ हुआ, उससे जेपी की आत्मा कराह रही होगी। इसलिए भी राजद और भाजपा के आज के शीर्ष नेतागण 1974 के उस आंदोलन में सकिय थे जिसका नेतृत्व जेपी ने किया था। कुछ लोग कह सकते हैं कि क्या राजनीति के सतयुग की बात आज के ‘कलियुग’ में लेकर बैठ गए! पर राजनीति के ‘कलियुग’ का एक उदाहरण यहां पेश है।

नब्बे के दशक की बात है। सी.बी.आई. चारा घोटाले की जांच कर रही थी। सी.बी.आई. के संयुक्त निदेशक डाॅ. यू.एन. विश्वास के खिलाफ राजद ने पटना राजभवन के सामने तलवार जुलूस निकाला था। विश्वास के पुतले को तलवार से काटा गया था। पर क्या ऐसे प्रदर्शन से राजद को कोई लाभ मिला? न तो कानूनी लाभ मिला और राजनीतिक लाभ।

चारा घोटाले के केस में क्या हो रहा है, यह सबको मालूम है। साथ ही जिस लालू प्रसाद ने अपने बल पर 1995 के चुनाव में विधानसभा में पूर्ण बहुमत लाया था, उनके दल ने सन 2000 के चुनाव में बहुमत खो दिया। कांग्रेस की मदद से राबड़ी देवी की सरकार बन सकी थी।

मंगलवार को आयकर महकमे ने लालू प्रसाद से जुड़े लोगों के ठिकानों पर छापे मारे। लोकतांत्रिक देश में अच्छा तो यह होता कि राजद के लोग उसका मुकाबला कानूनी तरीके से करते। लाठी-डंडे के साथ प्रतिबंधित क्षेत्र में शक्ति प्रदर्शन से न नब्बे के दशक में उन्हें लाभ मिला था और न ही अब मिलने की उम्मीद है। उधर भाजपा के लोगों ने बुधवार को राजद के प्रदर्शनकारियों के मुकाबले के सिलसिले में कोई आदर्श उपस्थित नहीं किया।

जेपी आंदोलन में यही लोग यह नारा लगा रहे थे कि ‘हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा।’ पर वीरचंद पटेल पथ पर कुछ भाजपाइयों के हाथों में भी लाठियां और पत्थर देखे गये थे। यदि बिहार में सुशासन है तो वह एक बार फिर कसौटी पर है। यदि बुधवार को पटेल पथ पर अशोभनीय और हिंसंक दृश्य उपस्थिति करने वालों दोनों पक्षों के उपद्रवियों पर कार्रवाई करनी होगी। हालांकि यह बात छिपी नहीं रही कि पहल तो राजद से जुड़े लोगों ने ही की थी।   


हिंसक राजनीति की प्रयोगशाला का हाल

पश्चिम बंगाल हिंसक राजनीति की प्रयोगशाला रहा है। सन 1967 में नक्सलबाड़ी से हिंसक आंदोलन शुरू हुआ। उसे तत्कालीन सिद्धार्थ शंकर राय की सरकार ने पुलिस और बाहुबलियों के बल पर कुचला। 1977 में कांग्रेस चुनाव हार गयी।

वाम मोर्चा ने भी लंबे समय तक राज किया। पहले तो अपने कुछ गरीबपक्षी कामों से वाम मोर्चा सरकार ने जनता का समर्थन पाया।पर बाद के दिनों में जोर जबर्दस्ती से राज चलाया। राय सरकार के दौर के अनेक बाहुबली वाम में शामिल हो गये। ममता बनर्जी ने उनकी हिंसा का विरोध करके सत्ता पायी। पर अब वैसा ही आरोप बनर्जी सरकार पर भी लग रहा है। ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का भी आरोप है। नतीजतन वहां भाजपा बढ़ रही है।

देखना है कि दीदीगिरी कब तक चलती है। बाहुबल और जातीय सांप्रदायिक वोट बैंक के जरिए चुनाव जीतने के बदले लोकतंत्र में लोगों का दिल जीतना अधिक लाभदायक तरीका है।


शिक्षकों की हो परीक्षा

मंगलवार को पटना में बिहार के कुलपतियों और प्रतिकुलपतियों का सम्मेलन हुआ। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बिहार की गरिमा को पुनस्र्थापित करने की जरूरत बताई गयी। पर सवाल है कि इस काम की शुरुआत कहां से हो? 

मुझे कम से कम एक बात समझ में आती है। विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक पहले ऐसे शिक्षक तो बहाल हों जिन्हें अपने विषय का ज्ञान हो। खबर आती रहती है कि सब तो नहीं ,पर अधिकतर शिक्षक अयोग्य हैं। हाल में एक वी.सी. ने सार्वजनिक रूप से कहा कि पटना के सबसे प्रतिष्ठित काॅलेज में ऐसे शिक्षक भी आ गए हैं जिन्हें ‘प्रिंसिपल’ तक लिखना नहीं आता।

नब्बे के दशक की एक खबर के अनुसार, एक काॅलेज शिक्षक ने छुट्टी के आवेदन पत्र में लिखा कि मेरे स्टाॅमक में हेडेक है। उन्हीं दिनों मैंेने पटना के एक प्रतिष्ठित हाई स्कूल के प्राचार्य का हस्तलिखित आवेदन पत्र पढ़ा था। दस लाइन के आवेदन पत्र में कोई लाइन भी शुद्ध नहीं थी।

इस पृष्ठभूमि में मौजूदा शिक्षकों की प्रतिभा-योग्यता की टुकड़ों में बारी -बारी से जांच होनी चाहिए। यानी छोटे सौ -दो सौ के समूहों में शिक्षकों को बारी-बारी से बुलाकर ईमानदार अफसरों व पुलिकर्मियों की कड़ी निगरानी में जांच परीक्षा होनी चाहिए। जो पास करें,वे शिक्षक रहें और जो फेल करें उन्हें किन्हीं अन्य सरकारी कामों में लगा दिया जाए।

जो काॅलेज शिक्षक प्रिंसिपल शब्द शुद्ध नहीं लिख सकता है, उसके हाथों नई पीढि़यों का भविष्य क्यों सौंपा जाए? पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अजय कुमार त्रिपाठी ने भी कहा है कि शैक्षिक मुद्दों को आयरन हैंड से हैंडल करना होगा। यानी यदि अयोग्य शिक्षकों से छात्रों को मुक्त करने का कोई कड़ा प्रयास राज्य सरकार करेगी तो अदालत से भी समर्थन मिल सकता है।  

सरकारी मकान से मोह

केंद्र सरकार की पहल अच्छी है। वह नाजयज तरीके से सरकारी मकानों में वर्षों से रह रहे प्रभावशाली लोगों को शीघ्र निकाल बाहर करने का फैसला किया है। इसके लिए संबंधित नियमों में बदलाव किया जा रहा है।

पहले के नियम के अनुसार मकान खाली के करने के लिए सरकार सात सप्ताह का समय देती थी। इसे घटाकर अब तीन दिन किया जा रहा है। साथ ही मकान में बने रहने के लिए कोई निचली अदालत की शरण नहीं ले सकता है।
  
और अंत में

खबर छपी है कि पटना के पांच सफाई निरीक्षक निलंबित कर दिये गए। इस खबर को पढ़कर किसी ने सवाल पूछा कि क्या पटना में ऐसा कोई पद भी है ? उस पद कुछ लोग बैठे हुए भी थे ? क्या इन पांच के अलावा भी ऐसे कुछ और निरीक्षक भी हैं? आखिर वे करते क्या हैं ? क्या वे सिर्फ प्रभावशाली लोगों के यहां ही सफाई करवाते हैं ? 
(प्रभात खबर में प्रकाशित)

Wednesday, May 17, 2017

गैर राजग दलों के पास भी चाहिए एक डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी

कुछ गैर राजग दल इन दिनों परेशान हैं। उनकी शिकायत है कि नरंेद मोदी सरकार लालू प्रसाद और पी.चिदम्बरम सहित कई प्रतिपक्षी नेताओं को खामख्वाह परेशान कर रही है। एकतरफा कार्रवाइयां हो रही हैं। ऐसी ही कार्रवाइयांं विवादास्पद राजग नेताओं के खिलाफ नहीं हो रही हंै। जबकि गंभीर आरोप उन पर भी हैं।

पर जब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यू.पी.ए. की सरकार थी तो प्रतिपक्षी नेता डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ऐसी शिकायत करने की जगह लोकहित याचिकाओं का सहारा लिया। उन्होंने एक नागरिक के रूप में भी भ्रष्टाचार के किसी मामले में केस करने की अनुमति भी अदालत से ले रखी थी।

टू जी घोटाले से लेकर जयललिता तथा नेशनल हेराल्ड जैसे कई मामलों में अदालतों के जरिए अनेक नेताओं को डाॅ. स्वामी ने कठघरे में खड़ा कर दिया।

 लालू प्रसाद से जुड़े लोगों ंके खिलाफ आयकर महकमे की छापेमारियों के बाद राजद के कुछ नेताओं ने  एकतरफा कार्रवाइयों का आरोप लगाया। एक राजद प्रवक्ता ने तो भाजपा विधायक दल के नेता सुशील कुमार मोदी के खिलाफ व्यक्तिगत आरोप को लेकर सबूत भी मीडिया को दिखाए। पर सवाल है कि उन्हें अदालत जाने से कौन रोक रहा है ? क्या उनके अधकचरे सबूत उन्हें रोक रहे हैं ?

सरकारों द्वारा दरअसल एकतरफा कार्रवाइयों का आरोप कोई नया नहीं है। यह आरोप दशकों पुराना है। लगभग सभी दलों के नेतागण यह बात जानते हैं। इसलिए यदि आपके पास सी.बी.आई., आयकर, ईडी या फिर पुलिस नहीं है तो आप कोर्ट का सहारा तो ले ही सकते हैं।

पर इसके लिए दो बातें होनी होंगी। एक तो आप जिस पर आरोप लगा रहे हैं, उस पर ऐसे ठोस सबूत एकत्र करने होंगे जो अदालत में टिक सकें। दूसरी बात यह भी कि अपने बीच से एक ‘डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी’ खड़ा करना होगा।

देश के कानूनप्रिय लोग तो यही चाहते हैं कि राजग का स्वामी गैर राजग दलों के भ्रष्ट नेताओं को उनकी सही जगह पर पहुंचाए। उधर गैर राजग दलों का कोई स्वामी ऐसा ही सलूक राजग के भ्रष्ट नेताओं के साथ करे। तभी सभी दलों के सभी भ्रष्ट नेताओं के होश ठिकाने आ सकेंगे। इससे राजनीति की सफाई होगी। राजनीति की जब तक सफाई नहीं होगी, तब तक सरकारी अफसरों के बीच के भ्रष्ट तत्व सही रास्ते पर नहीं आएंगे। अन्य क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी तभी काबू पाया जा सकेगा।
यदि दोनों पक्षों के भ्रष्ट नेता राजनीति की मुख्य धारा से बाहर होंगे तो सरकारी साधनों की लूट बंद होगी। फिर लूट से बचे उन साधनों के जरिए इस देश की गरीबी कम करने में मदद मिलेगी। यदि दोनों पक्षों में ‘स्वामी’ सक्रिय नहीं होंगे तो पहले की ही तरह एकतरफा कार्रवाइयां होती रहेंगी।  
गैर राजग दलों के पास एक से एक बेहतरीन वकील हैं। राम जेठमलानी से लेकर कपिल सिब्बल तक। अभिषेक मनु सिंघवी से लेकर प्रशांत भूषण तक। पर वहां कोई ‘डा.स्वामी’ नजर नहीं आ रहा  है।

एक ‘स्वामी’ खड़ा कीजिए और फिर देखिए कमाल! पर असली कमाल तो आपके पास का सबूत दिखाएगा। यदि है तो। यदि आप कोई स्वामी खड़ा नहीं कर पा रहे हैं तो इससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि आपके पास राजग नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के कोई ठोस सबूत नहीं हैं। ठोस सबूत नहीं रहने पर अदालतें उन्हें भी दोष मुक्त कर देती हैं जिन्हें सरकार कोर्ट में खड़ा करवाती है।

ऐसे कई उदाहरण हैं। मोरारजी देसाई के प्रधान मंत्रित्वकाल में सी.बी.आई. ने 3 अक्तूबर 1977 को इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करके दिल्ली के कोर्ट में पेश कर दिया था। पर जब आरोपों के मामले में सी.बी.आई.कोर्ट को संतुष्ट नहीं कर सकी तो ंअदालत ने इंदिरा गांधी को तुरंत रिहा कर देने का आदेश दे दिया।

 इसी तरह राजीव गांधी के शासनकाल में कांग्रेस के कुछ लोगों ने वी.पी. सिंह के पुत्र अजेय सिंह का सेंट किट्स के एक बैंक में जाली खाता खोलकर उसमें अपनी तरफ से काफी पैसा जमा करवा दिया। वी.पी. सिंह को बदनाम करने के लिए उस खाते का खूब प्रचार किया गया। पर अजेय सिंह का कुछ नहीं बिगड़ा। जबकि सरकार कांग्रेस की थी। खाता जाली निकला।
बिहार में भी कई बार विभिन्न दलों की सरकारों ने बारी -बारी से एकतरफा कार्रवाइयां कीं। पर अपवादों को छोड़ दें तो फंसने ही वाले ही फंसे, पर जिनके खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं थे, वे साफ बच गये। चारा घोटाले की सी.बी.आई. जांच लोकहित याचिका के कारण ही हुई थी। उस समय लालू प्रसाद के दल की सरकार केंद्र और बिहार में थी।

दोतरफा प्रयासों के अभाव में निष्पक्ष कार्रवाइयों के साथ -साथ इस देश में राजनीतिक कारणों से एकतरफा कार्रवाइयां भी चलती रहेंगी और अदालतें अपना काम भी करती रहेंगी। अदालतों की सक्रियता का लाभ यदि एक डाॅ. स्वामी उठा सकते हैं तो कोई अन्य ‘स्वामी’ क्यों नही ? यदि कोई नहीं उठा रहा है तो इसका लोगबाग यही मतलब लगाते हैं कि उनके पास सबूत नहीं हैं।

लालू परिजन के यहां आयकर महकमे ने छापे मारे हैं। यह मामला अंततः कोर्ट में भी जा सकता है। कुछ ठोस मिलेगा तो कार्रवाई होगी। राजद भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी के खिलाफ आरोप लगा रहा है। बेहतर तो यह होगा कि आरोप लगाने वाले अदालत की शरण लें। अदालत दूध का दूध और पानी का पानी कर देगी। निष्पक्ष मतदाता तो यही चाहता है कि चाहे जिस पक्ष के नेता पर आरोप लगे, उसकी सही जांच होनी चाहिए। बेहतर तो यह होगा कि अदालत की निगरानी में सी.बी.आई. जांच करे।
जाहिर है कि परंपरा के अनुसार सत्ताधारी दल प्रतिपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच कराएगा। पर अदालत का फैसला आने पर तो किसी सरकार को सत्ताधारी दल के नेताओं पर भी जांच करानी ही पड़ती है।

(इस विश्लेषण का संक्षिप्त अंश 17 मई 2017 के प्रभात खबर में प्रकाशित)



   

Friday, May 12, 2017

कठिन हो गया है योग्य उम्मीदवारों का मेडिकल कालेजों में दाखिला !

व्यापमं घोटाले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गत फरवरी में तीन सौ मेडिकल छात्रों के दाखिले को रद कर दिया। नाजायज तरीके से मध्य प्रदेश के मेडिकल कालेजों में दाखिला पाने का उनपर आरोप था।

इधर ‘नीट’ के प्रश्न पत्र आउट करने की कोशिश के आरोप में पटना में रविवार को परीक्षा माफिया  दस्ते के पांच  सदस्य पकड़े गये। माफिया का नेटवर्क पूरे देश मेें सक्रिय है। वे लोग 20 लाख रुपए में मेडिकल प्रतियोगिता परीक्षा पास कराने की गारंटी लेते हैं। करीब 10-15 साल पहले इस काम में 15 लाख रुपए लगते थे।

इस धंधे को उच्चस्तरीय संरक्षण हासिल है। इसीलिए यह लगातार जारी है। ऐसे धंधे को जिन सत्ताधारी नेताओं तथा अन्य लोगों का संरक्षण हासिल है, क्या उन्हें सजा नहीं मिलनी चाहिए ? अनेक सत्ताधीन नेताओं, बड़े अफसरों और धन पशुओं में अपनी संतानों को येन-केन प्रकारेण मेडिकल कालेजों में दाखिला कराने की होड़ मची रहती है। इसलिए भी माफियाओं को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण हासिल है।

अपार पैसों के बल पर देश भर में अयोग्य उम्मीदवारों का मेडिकल के डिग्री और पी.जी.पाठ्यक्रमों में दाखिला कराया जा रहा है। यानी अपवादों को छोड़ दें तो ऐसे-ऐसे डाक्टर तैयार किए जा रहे हैं, जो सामान्य मरीजों का भी ठीक से इलाज नहीं कर पाएंगे। विशेषज्ञता की तो बात ही और है।

कई मेडिकल कालेजों से खबर आती रहती है कि वार्षिक परीक्षाओं में भी बड़े पैमाने पर कदाचार हो रहे हैं। अयोग्य लोगों को दाखिला दिलाया जाएगा तो वे एम.बी.बी.एस. की वार्षिक परीक्षाएं भी चोरी करके ही तो पास कर पाएंगे।

भ्रष्ट तंत्र वाले इस देश में नेतागण और शासन तंत्र करोड़ों अभागे व गरीब मरीजों को साल दर साल अयोग्य डाक्टरों के हवाले कर रहे हैं। पर नेताओं व अफसरों में कुछ अपवाद भी हैं। पर अपवादों से देश नहीं चलता।
इस मारक स्थिति के लिए शासन व्यवस्था में व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार जिम्मेदार है।

भ्रष्टाचारियों का नेटवर्क काफी ताकतवर बन चुका है। उन पर राजनीति के बीच के सारे ईमानदार लोगों को मिलकर पूरी ताकत से हमला करना होगा। क्योंकि मुख्यतः राजनीति के बीच के ही बेईमान लोग इस नेटवर्क के मुख्य संरक्षक हैं।

सरकारी भ्रष्टाचार का कुप्रभाव समाज व सत्ता के विभिन्न क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है। इस बीच यदि किसी दल के किसी नेता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं कि वह दल आरोप लगाने वाले दल के किसी अन्य नेता पर भी ऐसे ही आरोप लगाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेता है।

यानी वे कहते हैं कि आरोप मुझ पर है तो तुम भी कौन दूध के धोये हुए हो ! आरोप-प्रत्यारोप के दो पाटों के बीच आम जनता पिस रही है। डाक्टरों को ‘धरती का भगवान’ कहा जाता है। क्या इस देश की राजनीति कभी इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार करके आम सहमति बनाने की कोशिश करेगी कि कम से कम ‘धरती के नकली भगवानों’ का तो निर्माण किसी भी कीमत पर तत्काल रोक दिया जाना चाहिए ? यदि देश के शिक्षा-परीक्षा माफियाओं को पक्ष विपक्ष के नेताओं और बड़े अफसरों का संरक्षण मिलना बंद हो जाए तो यह काम कतई असंभव नहीं।  


कौन मिटाएगा भ्रष्टाचार ?

  भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने 21 दिसंबर 1997 को भुवनेश्वर में कहा था कि ‘नैतिकता की उम्मीद केवल भाजपा से ही क्यों की जा रही है ? आप हमसे क्या अपेक्षा रखते हैं ? राजनीति के खेल में क्या दूसरे लगातार ‘फाउल’ करे और हम नियमों पर चलें ?’ दरअसल तब उनसे यह सवाल पूछा गया था कि आपने यू.पी. के भाजपा मंत्रिमंडल को गिरने से बचाने के लिए वहां के तमाम माफिया विधायकों को सरकार में क्यों शामिल करा दिया ? 

करीब 20 साल बाद ऐसा ही तर्क पूर्व राज्यसभा सदस्य शिवानंद तिवारी ने दिया है। उन्होंने कहा कि भाजपा मानती है कि सिर्फ वही सदाचारी है। बाकी सब कदाचारी हैं। भाजपा को लगता है कि लालू समाप्त हो जाएं तो देश की राजनीति सदाचारी हो जाएगी।’

ऐसे ही तर्क-वितर्क-कुतर्क के सहारे दशकों से इस देश की राजनीति चल रही है। पर सवाल है कि क्या भ्रष्टाचार का मसला सिर्फ राजनीतिक दलों और नेताओं के बीच का ही मामला है ?

इस बहस में भ्रष्टाचार से रोज-रोज पीडि़त हो रही आम जनता कहां है ? आखिर उसे भ्रष्टाचार के राक्षसों से मुक्ति कौन दिलाएगा ? याद रहे कि भ्रष्टाचार आज लोगों के जीवन- मरण का प्रश्न बन चुका है। भ्रष्टाचार के कारण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आज देश में कहीं न कहीं किसी न किसी की जान जा रही हैं। अब यह तर्क भी दिया जाने लगा है कि जब जनता ही भ्रष्ट और अपराधी लोगों को चुन लेती है तो कोई क्या कर सकता है?
पर सवाल है कि ऐसी नौबत लाई किसने ? सवाल है कि लुटेरों, माफियाओं और डकैतों को चुनावी टिकट कौन देता है ? यदि सारे दल अच्छे उम्मीदवार ही खड़ा कराएंगे तो जनता के सामने भी मजबूरी हो जाएगी कि वह उन्हीं अच्छों में से किसी एक अच्छे को चुने। आज तो उल्टा ही हो रहा है। जिस तरह अपने वेतन-भत्तों और सुविधाओं की बढ़ोत्तरी के मामले में सांसद-विधायक तुरंत सर्वदलीय सहमति बना लेते हैं, उसी तरह यदि वे चाहते तो सिर्फ गैर विवादास्पद लोगों को ही टिकट देने के मामले में भी आम सहमति बना सकते थे। पर वे ऐसा कत्तई नहीं चाहते।  

साठ के दशक में एक अमेरिकन प्रोफेसर ने उत्तर प्रदेश में अपने गहन रिसर्च के बाद लिखा था कि अपने स्वार्थवश सत्ताधारी नेताओं ने ही राज्य स्तर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार का बीजारोपण किया और फैलाया।
आम लोग तो भ्रष्टाचार के शिकार हैं। फिर भी कुछ नेता लोग यह चाहते हैं कि न तो स्कूटर पर सांड ढुलवाने वालों को कोई सजा हो और न ही यादव सिंह नामक महाभ्रष्ट इंजीनियर को संरक्षण देने वालों को।

इस देश में जैन हवाला घोटालेबाज भी बच जाते हैं और बोफर्स घोटालेबाज भी। भले बाजार से कर्ज लेकर केंद्र और राज्य सरकारें अपना खर्च चलाने को मजबूर हों, पर सार्वजनिक धन के अधिकतर लुटेरों पर कोई आंच नहीं आती है। आखिर यह सब कब तक चलेगा ?
अधिक दिनों तक नहीं।  


ऐसे शिकार बना रहा भ्रष्टाचार 

देश के अधिकतर नगर प्रदूषण और अतिक्रमण से कराह रहे हैं। प्रदूषण से कैंसर की बीमारी बढ़ रही है। वाहन और कल कारखाने प्रदूषण फैला रहे हैं। बाजार की अधिकतर सामग्री में मिलावट है। बटखरों का वजन कम है। पेट्रोल पंपों में चीप लगाकर कम तेल दिया जा रहा है। इस देश में इस तरह की अन्य अनेक गड़बडि़यां आए दिन सामने आती रहती हैं। पर इन पर निगरानी रखने वाले अधिकतर सरकारी अफसरों को सिर्फ रिश्वत चाहिए।
ऐसे भ्रष्ट निगरानी अफसरों को, उनसे पैसे लेकर, जो सत्ताधारी नेता-अफसर संरक्षण देते हैं, क्या उन्हें सजा नहीं होनी चाहिए ? उत्तर प्रदेश से यह खबर आई है कि यदि जिलों के एस.पी. थानेदारों से मासिक उगाही बंद कर दें तो अपराध काफी हद तक रुक जाएगा।

क्या ऐसी उगाही सिर्फ एक राज्य तक सीमित है ?

अभी तो भीषण भ्रष्टाचार से जनता पीडि़त और अधिकतर नेता लाभन्वित हो रहे हैं। हां,नेताओं की अगली पीढियां अन्य लोगों के साथ -साथ भ्रष्टाचार से अधिक पीडि़त हांेगी। तब उनके वंशज अपने पूर्वजों को ही गालियां देंगे। 


और अंत में

दुनिया के एक तिहाई गरीब भारत में रहते हैं। इस देश के 20 करोड़ लोग रोज भूखे पेट सो जाते हैं। 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि दिल्ली से हम जो सौ पैसे भेजते हैं, उनमें से 15 पैसे ही जनता तक पहुंच पाते हैं।

85 पैसे बिचैलिए लूट लेते हैं। इस मामले में 32 साल बाद भी कितना फर्क आया है ? 85 पैसे लूटने वालों और उन्हें सरंक्षण देने वाले कितने बड़े नेताओं और अफसरों को अब तक सजाएं मिल सकी हैं ?
( प्रभात खबर में 11 मई 2017 को प्रकाशित)

Sunday, May 7, 2017

किसानों की आय बढ़ाए बिना कैसे बढ़ेंगे उद्योग-धंधे !

गत लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने यह वादा किया था कि सत्ता में आने पर  उसकी सरकार किसानों की आय डेढ़ गुनी कर देगी। किसान उस दिन की अभी प्रतीक्षा कर रहे हैं। मोदी सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने यह भी कहा था कि सरकार 60 साल से अधिक उम्र के किसानों के लिए पेंशन योजना शुरू कर सकती है। वह भी नहीं हुआ।

इस साल के आर्थिक सर्वेक्षण में नरेंद्र मोदी सरकार से देश के प्रत्येक नागरिक को हर महीने एक तयशुदा आमदनी सुनिश्चित करने की सिफारिश की गयी है। पर सवाल है कि कर का दायरा बढ़ाये और टैक्स चोरी रोके बिना इसके लिए आर्थिक संसाधन कहां से आएंगे ?

इस बीच स्वामी रामदेव की पतंंजलि संस्था ने देश के कुछ किसानों की आमदनी जरूर बढ़ाई है। पर पतंजलि की अपनी सीमाएं हैं। पतंजलि का दावा है कि उसने देश के एक करोड़ किसानों को पतंजलि उद्योग से जोड़ा है। अगले कुछ समय में इस संख्या को बढ़ाकर पांच करोड़ करने की उनकी योजना है।

यानी कृषि उत्पाद को पतंजलि से जुड़े कारखानों में इस्तेमाल किया जा रहा है। पतंजलि दवाओं, खाद्य और पेय पदार्थों का बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रही है। पतंजलि के उत्पादों की बढ़ती मांग को देखते हुए कृषकों के लिए थोड़ी उम्मीद बन रही है।

पतंजलि किसान और संबंधित राज्य सरकारों के बीच ईमानदार तालमेल हो सके तो बड़ी संख्या में किसानों को उनके उत्पाद का उचित दाम मिल सकेगा। इससे किसानों की आत्महत्याएं कम होंगी। पर इसमें एक कठिनाई सामने आ रही है। अन्य अनेक लोगों की तरह ही मेरे परिवार में भी पतंजलि के अनेक उत्पादों का इस्तेमाल होता है। उसमें मिलावट और खराब गुणवत्ता का खतरा बहुत कम है।

पर हाल के दिनों में पतंजलि उत्पादों को लेकर छिटपुट शिकायतें भी मिलने लगी हैं।

मैंने भी पतंजलि दफ्तर को इसकी शिकायत भेजी और गुणवत्ता पर निगरानी रखने  की सलाह दी। पर कोई जवाब नहीं आया। न ही किसी तरह की जांच की कोई खबर मिली। यदि अपनी भारी तरक्की से मुग्ध पतंजलि संगठन क्वालिटी कंट्रोल की उपेक्षा करता रहा तो न तो किसानों की उम्मीदें पूरी होंगी और न ही उपभोक्ताओं का उस पर विश्वास बना रहेगा। इस स्थिति में सबसे अधिक खुशी पतंजलि के प्रतिद्वंद्वी बहुराष्ट्रीय संगठनों को होगी।

याद रहे कि मिलावटखोरों के सामने इस देश की सरकारें लगभग लाचार बनी हुई हैं। परोक्ष रूप से पतंजलि उन मानवद्रोहियों का मुकाबला कर रही है। 


किसानों के हितैषी चैधरी चरण सिंह

पूर्व प्रधानमंत्री चैधरी चरण सिंह किसानों के हित में देश का हित देखते थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में इस बात का लगातार प्रचार किया कि किसानों की आय बढ़ाये बिना कारखानों का विकास नहीं हो सकता। देश की अधिकतर आबादी गांवों में रहती है। वह खेती पर निर्भर है।

पर उनमें से अधिकतर किसानों की आय इतनी कम है कि वे अन्य जरूरी सामान के साथ-साथ अपने बच्चों के लिए भी न तो जरूरत के अनुसार कपड़े खरीद पाते हैं और न ही जूते। अधिकतर किसान परिवारों में स्कूली बैग और स्लेट-पेंसिल के भी लाले पड़े रहते हैं।

यदि उन किसानों और उनसे जुड़े लोगों की आय बढ़ेगी तभी जूते, छाते, स्कूली बैग, स्लेट -पेंसिल आदि के अधिक कारखाने लगेंगे। 

पर चरण सिंह से जुड़े नेताओं ने भी सत्ता में आने के बाद खेती की उपेक्षा की। नतीजतन अधिकतर किसानों के लिए आज भी खेती लाभ का पेशा नहीं है।  


आखिर क्यों बढ़ रही भाजपा !

भाजपा की लगातार चुनावी बढ़त से सेक्युलर दल चिंतित हैं। होना भी चाहिए। क्योंकि कोई दल यदि एकतरफा ढंग से बढ़ता जाएगा तो उसकी सरकार में तानाशाही की प्रवृत्ति पैदा हो सकती है। पर समस्या यह है कि तथाकथित सेक्युलर दलों को भाजपा की बढ़त के असली कारण समझ में नहीं आ रहे हैं। या फिर वे समझना नहीं चाहते ?

सेक्युलर दलों के लिए तथाकथित शब्द का इस्तेमाल जानबूझकर कर रहा हूं। क्योंकि अधिकतर सेक्युलर दल और नेता सांप्रदायिक सवालों और समस्याओं पर एकतरफा रवैया अपनाते हैं। इस रवैये से भी भाजपा को बढ़त मिलती है।

एक पुरानी राजनीतिक कथा याद आती है। वह कथा एक पत्रकार कामरेड ने 1977 में ही सुनाई थी। 1977 में लोकसभा का चुनाव प्रचार चल रहा था। जयप्रकाश नारायण और जनता पार्टी के नेताओं ने आपातकाल की ज्यादतियों को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाया था। तत्कालीन सरकार के भ्रष्टाचार और वंशवाद अधिकतर लोगों के लिए अहम मुद्दे थे।

पर इस देश के कम्युनिस्टों की एक जमात के नेतागण अपनी पार्टी की चुनाव सभाओं में कहते थे कि दियो गार्सिया द्वीप में अमेरिका अपना फौजी अड्डा बना रहा है। इससे भारी खतरा है। यानी जो मुद्दे अधिकतर भारतीय जनता को उद्वेलित कर रहे थे, उनको कम्युनिस्टों ने महत्व नहीं दिया था।

नतीजतन 1977 में मतदाताओं ने जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता सौंप दी। कांग्रेस के साथ-साथ अधिकतर कम्युनिस्टों की पराजय हुई। चुनाव के बाद कम्युनिस्ट नेताओं की बैठक में एक कामरेड ने चिढ़ाने के लिए अपने नेताओं से सवाल किया कि ‘कामरेड आजकल दियो गार्सिया का क्या हाल है?’ नेता चुप रहे। यानी कम्युनिस्टों ने एक ऐसे मुद्दे को चुनावी मुद्दा बना रखा था जिससे आम जनता का कुछ लेना-देना नहीं था।
कतिपय राजनीतिक प्रेक्षक बताते हैं कि यही हाल आज के अधिकतर सेक्युलर दलों का है। उनके नेता यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा क्यों जीत गयी। यह भी नहीं कि उसके बाद के अधिकतर चुनावों में वह क्यों विजयी होती जा रही है।

कुछ साल पहले पूर्व कंेद्रीय मंत्री शशि थरूर की मृत पत्नी सुनंदा पुष्कर के वेसरा को जांच के लिए भारत सरकार ने अमेरिका भेजा था। कोई हर्ज नहीं यदि सेक्युलर दल किन्हीं निष्पक्ष विदेशी एजेंसी से इस बात की जांच करा लें कि आखिर भाजपा लगातार चुनाव क्यों जीत रही है। यदि सेक्युलर दल सही नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहते तब तो कोई बात नहीं।

यह भी कहा जाता है कि अनेक सेक्युलर नेताओं को अपनी हार के असली कारणों का पता है। पर वे अपनी ‘आदतों’ से लाचार हैं। स्वार्थवश उन ‘आदतों’ को बदलने को वे तैयार नहीं हैं। अब वे गैर राजग दलों की महाएकता में अपने लिए राजनीतिक संजीवनी खोज रहे हैं।

प्रेक्षकों के अनुसार इस देश का पिछला राजनीतिक इतिहास यह बताता है कि अपनी आदतों और कमजोरियों को दूर किए बिना सिर्फ दलीय, जातीय और सांप्रदायिक एकता की संजीवनी राजनीतिक दलों को अधिक दिनों तक काम नहीं आती।


गलती मानना बड़प्पन

‘आप’ नेता अरविंद केजरीवाल ने पहले तो कहा कि ‘आप’ इवीएम के कारण हारी। पर अब वह कह रहे हैं कि हार के लिए हमारी गलतियां जिम्मेदार हैं। आज के जमाने में अपनी गलतियां स्वीकारना किसी नेता के लिए अजूबी बात है।

शायद ही कोई नेता अपनी गलती स्वीकारता है। यदि कभी किसी ने स्वीकारा भी तो उसे सुधारा नहीं। केजरीवाल ने अपनी गलती स्वीकार कर राजनीति को एक संदेश दिया है।

उम्मीद है कि अन्य नेतागण भी समय-समय पर अपनी गलतियां स्वीकारेंगे और उन्हें सुधारेंगे भी। यदि ऐसा हुआ तो लोकतंत्र के लिए अच्छा होगा।


और अंत में

भारतीय भाषाओं के लिए एक अच्छी खबर है। खासकर हिंदी भाषा भाषियों के लिए। सन 2021 तक अंग्रेजी में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या से अधिक संख्या उनकी होगी जो हिंदी में इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे।

एक ताजा आकलन के अनुसार अन्य भारतीय भाषाएं भी इस मामले में अगले चार साल में बढ़ेंगी। अगले चार साल में जितने लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे, उनमें से 75 प्रतिशत लोग भारतीय भाषाओं के होंगे।

(प्रभात खबर में 5 मई 2017 को प्रकाशित)