भोला पासवान शा़स्त्री के जन्म दिन पर
-----------------------
(21 सितंबर, 1914--10 सितंबर ,1984)
-----------------------
स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व मुख्य मंत्री भोला पासवान शास्त्री से
सन 1967 में मेरी संक्षिप्त किंतु दिलचस्प मुलाकात
-------------------
सुरेंद्र किशोर
----------
सन 1967 की बात है।
तब मैं संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का कार्यकर्ता था।मैं छपरा में सक्रिय था।
उस दल के नेता अम्बिका प्रसाद सिंह ‘दादा’ के साथ पटना आया था।आदरणीय अम्बिका दादा सारण जिले के मूल निवासी थे।
तब के उप मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर से मिलने के बाद ‘दादा’ भोला पासवान शास्त्री से मिलने उनके सरकारी आवास पर गये।मैं भी उनके साथ था।शास्त्री जी तब कोढ़ा से कांग्रेसी विधायक थे।
अम्बिका दादा ने शास्त्री जी से मेरा परिचय कुछ इस तरह कराया--‘‘ये हैं सुरेंद्र अकेला।हमारे दल के अच्छे कार्यकर्ता हैं।’’
शास्त्री जी ने छूटते ही कहा--‘‘एक अकेला (महावीर प्रसाद अकेला)तो सत्येंद्र बाबू (सत्येंद्र नारायण सिन्हा )के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं।आप किसके खिलाफ लड़िएगा ?’’(याद रहे कि महावीर प्रसाद अकेला सी.पी.आई.के नेता थे।)
मैंने कहा--इस संबंध में तो अभी कुछ सोचा नहीं है।
हम तीनों के बीच कुछ देर तक बातें हुईं।उस बीच शास्त्री जी का नौकर हमारे लिए चाय लेकर आया।उसके बाद हम वहां से निकल गये।
उन दिनों रिक्शे से ही हम चलते थे।
रिक्शे पर मैंने अम्बिका दादा से पूछा--क्या शास्त्री जी के साथ उनका परिवार नहीं रहता ?
दादा ने कहा कि पहले पत्नी ने शास्त्री जी को छोड़ा।बाद में शास्त्री जी ने पत्नी को छोड दिय़़ा।
(दरअसल अम्बिका दादा आजादी की लड़ाई में पूर्णिया इलाके मंे ही अधिक सक्रिय रहते थे।इसलिए शास्त्री जी सहित वहां के सारे प्रमुख नेताओं को अच्छी तरह जानते थे।उनसे घुले-मिले हुए थे।)
मैंने जब कारण पूछा तो अम्बिका दादा ने बताया--शास्त्री जी की शिक्षा-दीक्षा काशी विद्यापीठ में हुई थी।
उनकी शादी अच्छे परिवार मंे हुई।चूंकि शास्त्री जी अक्सर जेल
में ही रहते थे,इसलिए उनकी पत्नी मायके में जाकर रहने लगीं।बुलाने पर भी नर्हीं आइं।
जब आजादी हुई तो शा़स्त्री जी के पास पत्नी आना चाहती थीं।पर शास्त्री जी ने कहा कि जब मेरे संकट की घड़ी में उसने मेरा साथ नहीं दिया तो मैं अब उसे नहीं बुलाऊंगा।नहीं बुलाया--दादा ने बताया।
अम्बिका दादा की बात पर अविश्वास करने का मेरे पास कोई कारण नहीं था।
ऐसी बातों की तब आम नेता लोग चर्चा भी नहीं करते थे जिस तरह आज होती है।तब राजनीति का स्तर आज की तरह गिरा हुआ नहीं था।न तो शास्त्री जी ने अपना जातीय वोट बैंक बनाने की कोशिश की और न ही राजनीति को पैसा कमाने का जरिया बनाया।
-------------------
शास्त्री जी तीन बार बिहार के मुख्य मंत्री रहे--1968, 1969 और 1971 में।
वे इंदिरा गांधी सरकार में मंत्री भी रहे।सन 1978 में भोला पासवान शास्त्री राज्य सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे। तब केंद्र में मोरारजी देसाई की सरकार थी।
शास्त्री जी कभी विवादों में नहीं रहे।
साफ-सुथरी छवि के नेता थे।
पक्ष-विपक्ष के नेता लोग भी उनका बड़ा सम्मान करते थे।
-------------------
21 सितंबर 26