बुधवार, 2 सितंबर 2026

 दोहरा मापदंड

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‘गोदी मीडिया’ के मौजूदा शोर के बीच

नेहरू-इंदिरा दौर की कुछ भूली- बिसरी यादें

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सुरेंद्र किशोर

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प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने दिल्ली के एक बड़े अखबार के संपादक दुर्गा दास को उनके पद से हटवा दिया था। नेहरू के निजी सचिव ने अखबार के मालिक का फोन करके हटवा दिया।

दुर्गादास प्रधान मंत्री नेहरू की आलोचना लिख रहे थे।

(नेहरू के निजी सचिव एम.ओ.मथाई ने यह बात अपनी संस्मरणात्मक किताब में लिखी है।)

प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने उसी अखबार के संपादक पद से बी.जी.वर्गीज को हटवा दिया था।बाद में वर्गीज को रामनाथ गोयनका ने इंडियन एक्सपे्रस का संपादक बना दिया था।  

साठ के दशक में तब के कांग्रेसी मुख्य मंत्री के.बी.सहाय ने पटना के दैनिक सर्चलाइट के संपादक टी.जे.एस. जार्ज को भारत 

रक्षा कानून के तहत जेल भिजवा दिया था।नेहरू के साथ 13 साल तक उनके निजी सचिव रहे एम.ओ.मथाई के अनुसार ही टाइम्स आॅफ इंडिया और इलेस्टे्रटेड वीकली आॅफ इंडिया का तीन मूत्र्ति भवन यानी प्रधान मंत्री आवास में प्रवेश वर्जित था। 

ऐसे में उन दिनों के मीडिया को गोदी मीडिया बना देने में तो कोई दिक्कत नहीं आने वाली थी।दिक्कत आई भी नहीं।

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अब कोई मुझे बताए कि मोरारजी देसाई,अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी ने अपने प्रधान मंत्रित्व काल में किन-किन संपादकों को उनके पदों से हटवाया ?

सबूत के साथ कोई उदाहरण मिलेगा तो मैं उस पर भी लिखूंगा।

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दूसरी ओर, जब मोरारजी देसाई से किसी ने पूछा कि आर.के करंजिया की अभियानी साप्ताहिक पत्रिका ‘ब्लिट्ज’ आपकी इतनी अधिक आलोचना करता रहता है,फिर भी आप उस पर कार्रवाई क्यों नहीं करते ?

देसाई ने कहा कि मैं तो उसे पढ़ता ही नहीं।

 बिहार के मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंह से जब किसी ने पूछा तो उन्होंने इसी तरह की बात कही थी--‘‘मैं तो सर्चलाइट पढ़ता ही नहीं।किसी अखबार के खिलाफ इससेे बड़ी कार्रवाई नहीं हो सकती।’’

याद रहे कि उसके संपादक एम.एस.एम.शर्मा अपने काॅलम में श्रीबाबू के खिलाफ किसी सबूत के बिना अत्यंत आपत्तिजनक बातें लिखा करते थे।

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दूसरी ओर, आज नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ भी छपता रहता है।टी.वी.चैनलों पर बैठकर कोई कुछ भी बोलता रहता है।

आजादी के तत्काल बाद के वर्षों की बात है।

बिहार विधान सभा में साठी लैंड रिस्टोरेशन विधेयक पर व्यापक चर्चा हुई थी।

(दरअसल आजादी के तत्काल बाद बेतिया राज की जमीन की बड़े- बड़े सत्ताधारियों ने आपस में बंदरबांट कर ली।केंद्र सरकार को शिकायत गई तो गृह मंत्री सरदार पटेल ने बिहार सरकार को निदेश दिया कि जमीन वापस करो।उस वापसी के लिए साठी लैंड रिस्टोरेशन विधेयक बिहार विधान सभा से पारित हुआ।

पर चर्चा के दौरान लाभान्वितों व उनके समर्थकों ने अपने लोभ के स्वर बहस में भी मुखरित कर ही दिये।) 

उस चर्चा के दौरान कांग्रेस के एक प्रमुख नेता ने,जो बाद में बिहार के मुख्य मंत्री बने थे,कहा था कि ‘‘सन 1857 के विद्रोह को दबाने में जिन भारतीयों ने अंग्रेजों का साथ दिया था,अंग्रेजों ने उन्हें जमीन जायदाद ,जमीन्दारी ,राय बहादुर -खान बहादुर की पदवी आदि देकर सम्मानित किया था।हमने और हमारे परिजन ने भी आजादी लड़ाई में बहुत कुछ खोया,उसकी क्षतिपूत्र्ति के रूप में यदि हमने साठी की जमीन(बेतिया महाराज की जमीन)की बंदोबस्ती ली तो कौन सा अन्याय किया।’’

मैंने उस रिपोर्ट के लिए पहले स्थानीय अखबारों की फाइलें देखीं।मुझे वह खबर नहीं मिली।फिर मैं विधान सभा लाइब्रेरी में जाकर तब की विधान सभा की कार्यवाही पर तैयार किताब देखी।उसमें यह विवरण मिला।

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 नेहरू के शासन काल के सबसे बड़े घोटाले 80 लाख रुपए के जीप घोटाले,(यानी इस देश के बीज घोटाले )की कोई खोजपूर्ण रिपोर्टिंग नहीं हुई थी जबकि उस घोटाले में शीर्ष सत्ताधारी का सीधा हाथ था।इसीलिए कृष्ण मेनन को सजा देने के बदले उनको प्रमोशन मिला था।यानी हाई कमिश्नर के बाद केंद्रीय मंत्री बने थे।

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1962 में चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय के कारणों की जांच के लिए हैंडरसन -बु्रक्स-भगत समिति बनी।उसकी रिपोर्ट आई जिसके जरिए भारत सरकार की आपराधिक विफलताएं सामर्ने आइं।

पर उस समिति की रिपोर्ट भारत के तत्कालीन गोदी मीडिया में नहीं छपी।

बल्कि विदेशी पत्रकार नेविल मैक्सवेल ने प्रकाशित की।

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सन 1967 के चुनाव के लिए एक दल को छोड़ कर इस देश के सभी प्रमुख दलों ने विदेशों से नाजायज तौर पर पैसे लिये थे।उस शर्मनाक रिश्वतखोरी की रिपोर्ट भारतीय मीडिया में नहीं बल्कि न्यूयार्क टाइम्स में छपी।पूंजीवादी देश ने कम्युनिज्म के विरोध के लिए भारतीय दलों व नेताओं को पैसे दिए और कम्युनिस्ट देशों ने कम्युनिज्म के प्रचार-प्रसार के लिए। 

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इमर्जेंसी में इंदिरा सरकार ने मीडिया का क्या हाल किया था,उसकी पराकाष्ठा का एक नमूना देखिए।

अस्वस्थता के कारण आपातकाल के बीच में ही जेपी रिहा कर दिए गए थे।

जब जेल से बाहर आए तो सरकार ने मीडिया को निदेश दिया--जेपी कहां जाते हैं,किससे मिलते हैं,इसकी खबर नहीं छपेगी।नहीं छपी।गोदी मीडिया का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है ?

(ये तो नमूने के तौर पर थोड़े से उदाहरण हैं।ऐसी सारी कहानियों को एकत्र करेंगे तो मोटी किताब बन जाएगी।)

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2 सितंबर 26  



  


गुरुवार, 27 अगस्त 2026

 सी.ए.ए.और एन.आर.सी.पर प्रशांत किशोर

 की राय अब बदली है या वही है ?

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सुरेंद्र किशोर

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सन 2019 में प्रशांत किशोर को जदयू ने अपनी पार्टी से निकाल दिया था।

मुददा था-जदयू सी.ए.ए.का समर्थन कर रहा था और प्रशांत 

किशोर उसका विरोध।

प्रशांत किशोर ने तब एन.आर.सी.का भी विरोध किया था।

इस मुद्दे पर प्रशांत किशोर ने कैबिनेट स्तर के पद की सुविधा को भी 

लात मार दी थी।यानी यह मुद्दा उनके लिए इतना अधिक महत्वपूर्ण था।

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 प्रशांत किशोर की इन दो मुद्दों पर अब क्या राय है ? 

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अब आम भाषा में सी.ए.ए. और एन.आर सी.को समझें।

सी.ए.ए.के खिलाफ तब दिल्ली शाहीन बाग में धरना हुआ था।

धरना देने वालों ने यह बात फैलाई कि सी.ए.ए.लागू होने से मुसलमानों की नागरिकता ले ली जाएगी।

जबकि सी.ए.ए. है पड़ोस के देशों से प्रताड़ित होकर भारत आए गैर मुस्लिमों को नागरिकता देने का कानून।

सी.ए.ए. अब लागू है।उन पीड़ित लोगों को नागरिकता दी जा रही है।पर किसी भारतीय मुस्लिम की नागरिकता नहीं ली गई।

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एन.आर.सी.यानी नेशनल रजिस्टर आॅफ सिटिजन्स।

पाकिस्तान में भी एन आर सी है।

पर भारत में निहित स्वार्थी लोग इसे नहीं बनने दे रहे हैं।उनको आशंका है कि वे  फिर घुसपैठियों के नाम हम उस रजिस्टर में कैसे शामिल करा पाएंगे ?

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27 अगस्त 26

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 1990 के मंडल आरक्षण का विरोध करने का नुकसान

मंडल विरोधियों की ही भगतना पड़ा था

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मौजूद आरक्षण विरोधी आन्दोलन का नुकसान भी अंततः 

उन्हें ही होगा जो आरक्षण का विरोध कर रहे हैं।

लाभ सिर्फ उन अराजक तत्वों को मिलेगा जो इस देश 

को तोड़ना चाहते हैं।

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सुरेंद्र किशोर

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क्योंकि ये सब आरक्षण भारत के संविधान के अनुच्छेद-340, 341 और 342 प्रदत्त हैं।इनमें फेरबदल करने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा।

आने वाली भी किसी भारतीय संसद की जातीय बनावट ऐसी नहीं होगी 

जो संसद इस संबंध में आरक्षण विरोधियों के अनुकूल संविधान का संशोधन 

कर सके।

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इसलिए आज के आरक्षण विरोध के नतीजे के परिणामस्वरूप देश में सिर्फ अराजकता फैलेगी।और उस अराजकता का लाभ सिर्फ देशी-विदेशी जेहादियों को मिल सकता है।

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1990 के मंडल आरक्षण के विरोधी सवर्णों से मैं तब कहा करता था कि विरोध करने से अंततः लालू प्रसाद को ही राजनीतिक मजबूती मिलेगी।आपको कुछ नहीं मिलेगा।(मेरी वह बात पूर्व कांग्रेसी विधायक हरखू झा को अब भी याद है।गवाही देने के लिए झा जी अब भी हमारे बीच हैं।)

  वही हुआ भी।लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन काल में मंडल विरोधी समुदायों  की जो दुर्गति हुई ,वह सब वही लोग जानते हैं।

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विवादास्पद यू.जी.सी.निदेशों का मामला भी आप लोग सुप्रीम कोर्ट पर ही छोड़ दीजिए।उसी को फैसला करने दीजिए।अन्यथा वह भी आपके लिए प्रति उत्पादक साबित हो सकता है।

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27 अगस्त 26


  


बुधवार, 26 अगस्त 2026

 


याद आएंगे ‘‘विचारधारा के सेनापति’’ व आई.बी.के

 पूर्व अधिकारी राम नरेश प्रसाद सिंह 

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सुरेंद्र किशोर

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 बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य हरेन्द्र प्रताप और भाजपा नेता

सुधीर शर्मा के फेबुक पोस्ट से पता चला कि आई.बी.(भारत सरकार)के पूर्व 

अधिकारी राम नरेश प्रसाद सिंह नहीं रहे।

पिछले दिनों जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भारत वामपंथी उग्रवाद से अब मुक्त है तो सहसा रामनरेश बाबू याद आ गए।

(अच्छी बात है--अब गृह मंत्री और प्रधान मंत्री को जेहादी उग्रवाद और दिमागी नक्सलियांे से भी देश को मुक्त करने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा।

एक अच्छा संकेत है ।वह यह कि इस देश के अधिकतर गैर राजग राजनीतिक दल वोट के लिए जब तक हिन्दुओं को गालियां देते रहेंगे और जेहादियों से साठगांठ जारी रखेंगे,तब तक उनके चुनाव जीतने का कोई चांस मुझे नजर नहीं आता--भले अस्थायी उतार-चढ़ाव किसी को नजर आए।)

  अमित शाह की घोषणा के बाद मुझे रामनरेश बाबू के साथ-साथ कभी जहानाबाद में डी.एम.रहे प्रत्यय अमृत की बातें भी याद आ गईं।

  जब बिहार में भी नक्सलियों का बोलबाला था तो मेरी राय हुआ करती थी कि 

विकास की कमी और समाज के कुछ समूहांे के प्रति व्यवस्थागत अन्याय के कारण 

नक्सली पनपे हैं।इन समस्याओं के हल के साथ ही नक्सल समस्या हल हो जाएगी।

इस समस्या पर रामनरेश बाबू से भी चर्चा होती रहती थी।

पर,वे मुझसे सहमत नहीं होते थे।

अंततः रामनरेश बाबू सही साबित हुए --प्रत्यय अमृत भी।

अस्सी के दशक में नक्सलियों द्वारा किए गए एक जन संहार की रिपोर्टिंग करने मैं जहानाबाद गया था।संयोग से घटनास्थल पर ही तत्कालीन जिलाधिकारी प्रत्यय अमृत सेे मुलाकात हो गयी।उनकी राय भी रामनरेश बाबू से मिलती -जुलती थी।हालांकि तब तक मेरा उनसे परिचय नहीं था।

मैं तब भी जिलाधिकारी महोदय से सहमत नहीं हुआ था।पर आज दोनों से सहमत हूं।रामनरेश बाबू ने कई पुस्तकें लिखी हैं ।उनकी अधिकतर पुस्तकें मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में हंै।उन पुस्तकों की एक -एक लाइन शोधपूर्ण व तथ्यपरक है।

   माननीय हरेंद्र प्रताप के अनुसार रामनरेश बाबू सचमुच विचारधारा के सेनापति थे।

आज उनकी कमी खल रही है जब भारत सहित पूरी दुनिया में ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ तेज हो गया है।    

नब्बे के दशक में अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुएल पी.हंटिंगटन 

की एक किताब आई थी।

उसका नाम है ‘‘सभ्यताओं का संघर्ष।’’

उस पुस्तक के जरिए लेखक ने यह कहा था कि 

‘‘शीत युद्धोत्तर संसार में लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान ही संघर्षों का मुख्य कारण होगी।’’

भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में वैसा संघर्ष इन दिनों जारी भी है जो भयानक रूप लेता जा रहा है।

हमारे देश की कुछ तथाकथित सेक्युलर और वोट लोलुप शक्तियों को छोड़कर पूरी दुनिया उस भयानकता को अच्छी तरह समझ रही है।

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26 अगस्त 26


शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

 शराबबंदी पर गांधी और लोहिया

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गांधी ने कहा था कि ‘‘भले पैसे के अभाव में स्कूल बंद कर देने पड़े,पर मैं चाहता हूं कि देश में फिर भी पूर्ण शराबबंदी लागू हो।’’

लोहिया भी थे नशाबंदी के पक्ष मंे

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सुरेंद्र किशोर

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साठ के दशक की बात है।

रांची में डा.राम मनोहर लोहिया के दल 

की बैठक थी।

बैठक में एक ऐसा व्यक्ति शामिल था जिसके भोजनालय में शराब भी परोसी जाती थी।

किसी समाजवादी कार्यकत्र्ता ने डा.लोहिया से शिकायत की कि एक शराब बिक्रेता भी इस बैठक में है।

डा.लोहिया ने उसे पास बुलाया।

पूछा, क्या तुम शराब बेचते हो ?

उसने कहा कि मेरा भोजनालय है जिसमें शराब भी बिकती है।

इस पर डा.लोहिया ने कहा कि हमारा दल नशाबंदी का पक्षधर है।

कोई ऐसा व्यक्ति हमारे दल का सदस्य नहीं हो सकता जो शराब पीता है या फिर शराब के कारोबार में है ।

  वह व्यक्ति बैठक स्थल से चला गया।

पर, कुछ घंटे के बाद लौटा।

उसने डा. लोहिया से कहा कि मैंने अपने भोजनालय में से शराब हटवा दी है।

अब मैं शराब नहीं बेचूंगा।

उसके बाद उसे बैठक में शामिल होने की अनुमति मिल गयी।

   इसे कहते हैं राजनीति का समाज पर असर।

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दरअसल डा.लोहिया मूलतः गांधीवादी थे।

उनका समाजवाद गांधीवाद का ही विस्तार या संशोधित रूप था।

उस जमाने में दूसरे दलों के अच्छी मंशा वाले अग्रसोचू नेतागण भी डा.लोहिया की ही तरह समाज को प्रभावित किया करते थे।

पर अब राजनीति का जमाना बदल गया।

नशाबंदी के कट्टर समर्थक गांधीवादी इस संबंध में एक खास बात कहा करते हैं।

किसी ने गांधी जी से कहा था कि आबकारी टैक्स से मिले पैसों से ही सरकारी स्कूल चलते हैं।

उसके जवाब में गांधी जी ने कहा था कि ‘‘भले पैसे के अभाव में स्कूल बंद कर देने पड़े,पर मैं चाहता हूं  कि देश में फिर भी पूर्ण शराबबंदी लागू हो।’’

यदि आजादी के बाद के हमारे शासकों ने गांधी और डा.लोहिया की बातों को अमली जामा पहनाया होता तो हमारा देश बेहतर होता।

समाज बेहतर होता।

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अब जब शराबखोरी से समाज में विषम पस्थितियां पैदा होने लगीं हैं तो कुछ राज्य बारी-बारी से शराबबंदी करने को बाध्य हो रहे हैं।

या फिर उस पर विचार कर रहे हैं।

(बिहार में शराबबंदी का राज्य पर अच्छा असर पड़ा है ,कोई सर्वेक्षण चाहे जो कुछ कहे।)

  शराबखोरी से पैदा होने वाली सामाजिक बुराइयों से लोगबाग परिचित रहे हैं।

कहां तो राजनीति देश भर में धीरे-धीरे शराबखोरी बंद कराती और कहां शराब के बिक्रेता अब राजनीति में आकर राजनीति को और समाज को खराब कर रहे हैं।

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कई साल पहले की बात है।

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तब सरकार मनमोहन सिंह की थी।

उन दिनों विजय माल्या राज्य सभा के सदस्य थे।

आश्चर्य है कि उन्हें नागरिक विमानन मंत्रालय की सलाहकार समिति का सदस्य भी बना दिया गया था।

जबकि पहले इस बात का ध्यान रखा जाता था कि जिस सांसद का जिस मंत्रालय में व्यावसायिक स्वार्थ हो,उस मंत्रालय की संसदीय समिति में उसे सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

 उस समिति में माल्या ने एक प्रस्ताव रखा।

उनका प्रस्ताव था कि घरेलू उड़ानों में भी शराब परोसने की इजाजत मिलनी चाहिए।

वह प्रस्ताव पास भी हो गया।

मुझे नहीं मालूम कि वह लागू हुआ या नहीं !

क्योंकि मुझे हवाई यात्रा का कोई अनुभव नहीं है।

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  क्या कभी - कभी ही सही, गांधी का नाम लेने वाली कांग्रेस पार्टी से ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए थी ?

यदि गांधी के सपनों की सरकार होती तो ऐसा प्रस्ताव पास होता ?

भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले चैप्टर में लिखा हुआ है कि ‘‘सरकार नशाबंदी करने का प्रयास करेगी।’’

उसी को ध्यान में रखते हुए गांधीवादी प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने सन 1977 में नशाबंदी की शुरूआत की थी।

हर साल शराब की एक चैथाई 

दुकानों को बंद करना था।

पर यह काम कई कारणों से पूरा नहीं हो सका।

बाद की केंद्र सरकारों ने नशाबंदी के काम को जरूरी नहीं समझा।

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लोहियावादियों को शराब पीते 

देख मुझे सदमा लगा था।

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आपातकाल में जार्ज फर्नांडिस के बलावे पर मैं बंगलोर गया था।

एक होटल के कमरे में हम तीन लोग टिके थे।कई दिन रहे।

उनमें से एक बाद में मुख्य मंत्री बने।दूसरे राज्य सभा के सदस्य।मैं खुद पत्रकार बन गया।

दिन में हमलोग सिनेमा देखते।अंधेरा हो जाने पर एक खास तरह की टे्रनिंग के लिए हम उस पहाड़ी पर जाते जहां शोले की शूटिंग हुई थी।

रात में भावी मुख्य मंत्री,भावी राज्य सभा सदस्य और एक स्थानीय वकील शराब पीने बैठ जाते थे।मैं टुकुर -टुकुर उन्हें देखता रहता था और कूढ़ता रहता था।

(मैं आज तक शराब का स्वाद नहीं जानता।)

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14 अगस्त 2026

  


    

 सन -1931 की जातीय जन गणना के अनुसार बिहार

-ओडिशा की विभिन्न प्रमुख जातियों की कुल संख्या

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तब के आंकड़े देखकर मोटा-मोटी अनुमान लगा लीजिए।

आज के आंकड़े का अनुमान सटीक तो नहीं ही होगा।

पर,मोटा-मोटी अनुमान लगाने में इससे मदद मिलेगी। 

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   सुरेंद्र किशोर

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 सन 1931 में आखिरी बार जातियों के आधार पर देश में जनगणना हुई थी।

दूसरे विश्व युद्ध के कारण भारत में सन 1941 में जनगणना

नहीं हो सकी।

1947 में देश आजाद हुआ तो स्वतंत्र भारत की सरकार ने जातियों के आधार पर गणना बंद कर दी।

कुछ लोगों को आरोप रहा है कि बंद करने के पीछे उस सरकार का निहितस्वार्थ रहा।

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मेरे पास पूरे देश का तो नहीं किंतु सन 1931 की जनगणना के अनुसार बिहार-ओडिशा की प्रमुख जातियों की संयुक्त जनसंख्या का विवरण उपलब्ध है।

1931 में ओड़िशा भी बिहार का ही अंग था।झारखंड तो था ही।

(स्रोत--मुंगेरी लाल नीत पिछड़ा वर्ग आयोग की रपट--

16 फरवरी, 1976)

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बिहार-ओड़िशा--1931 जनगणना

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ग्वाला - 34 55 141

(इसमें अहीर,गोप व यादव शामिल हैं।)

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ब्राह्मण - 21 01 287

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कुर्मी - 14 52 724

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राजपूत --14 12 440

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कोइरी --13 01 988

चमार-- 12 96 001

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दुसाध--12 90 936

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तेली --12 10 496

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(बाभन)भूमिहार-8 9 5 6 0 2

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कायस्थ --3 83 435 

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धानुक--5 47 308 

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धोबी- 4 14 221 

हजाम - 4 56 779

मल्लाह - 4 59 560

कहार- 5 24 030 

कान्दू- 5 06 384

केवट- 4 71 389

कुम्हार- 5 99 038

तांती - 6 89 791

बनिया- 2 20 071

बढई-3 63 794

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 नोट--ऊपर दी गई सूची पूर्ण नहीं है।

मैंने कुछ ही जातियों की तब की संख्या यहां लिखी है।

मुंगेरी आयोग की रपट में विस्तृत सूची है।

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मंडल आयोग की सिफारिश लागू होने से ठीक पहले केंद्र के आखिरी कांग्रेसी मंत्रिमंडल के सदस्यों का जाति वार ब्योरा पढ़ लेना प्रासंगिक होगा।कांग्रेस ने चूंकि मंडल आयोग की रपट के आधार पर लागू आरक्षण का विरोध किया था,इसलिए उसे 

 बाद में कभी लोक सभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला।

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सन 1988 के केंद्रीय मंत्रिमंडल में जातिगत स्थिति।

इसे देख कर कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति कह सकता है कि आरक्षण कितना जरूरी है।हालांकि मंत्रिमंडल में आरक्षण नहीं होता है,पर मंत्रिमंडल को बनाने वालों की मानसिकता का इससे पता चल जाता है।अन्य क्षेत्रों में भी लगभग यही होता रहा था तब। 

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जब कांगे्रस की पूर्ण बहुमत वाली सरकारें केंद्र या राज्य में बनती थीं तो 

मंत्रिमंडल में विभिन्न जातियों को कितना -कितना प्रतिनिधित्व मिलता था,देखें ।

कम से कम एक सरकार का तो आंकड़ा मिला है।

राजीव गांधी मंत्रिमंडल का यह आंकड़ा 14 फरवरी, 1988 का है।

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  उस राजीव गांधी मंत्रिमंडल की जातिगत स्थिति

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ब्राह्मण-15

पिछड़ा--5

ईसाई-3

अनुसूचित जाति-9

मुसलमान-4

सिख-1

वनवासी-3

ठाकुर-2

अन्य ऊंची जाति-11

अन्य-6

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1988 से अब तक राजनीतिक और सामाजिक स्थिति में देश में काफी परिवर्तन हुआ है।

काफी कुछ बदल गया है।

मौजूदा नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल के सदस्यों का जातीय विवरण इस प्रकार है।इससे कांग्रेस मंत्रिमंडल और मोदी मंत्रिमंडल के बीच का फर्क साफ नजर आएगा।

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नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल --जातीय संख्या

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अन्य पिछड़ा वर्ग--27 मंत्री

सामान्य वर्ग--यानी उच्च जाति --28 मंत्री

अनुसूचित जाति--10 मंत्री

अनुसूचित जनजाति--5 मंत्री

अल्पसंख्यक--5 मंत्री

(कोई मुस्लिम नहीं )

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20 अगस्त 26 


 


 मेरे बारे में खुशखबरी,

ईश्वर करे , आपके बारे में भी ऐसी ही 

खुशखबरी मिलती रहे !

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सुरेंद्र किशोर

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मैं हर साल अपनी विस्तृत पैथोलाॅजिकल जांच करवाता हूं।

ताजा जांच रिपोर्ट को देखकर एक बड़े डाक्टर ने अपनी राय दी--

‘‘रिपोर्ट बिल्कुल परफेक्ट है।

सिर्फ विटामिन -डी और बी -12 कम है।’’

डी नाॅर्मल करना मेरे बाएं हाथ का खेल है, 

डी ठीक करना दाएं हाथ का।

इसलिए फिकिर नाॅट !!

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सन 2005 रिपीट 2005 में मैं नियमित सेवा से रिटायर कर गया।

तब से लगातार काम कर रहा हूं।नौकरी के समय से कुछ अधिक ही काम।

थकता नहीं हूं।थोड़ा संयम जरूर रखता हूं।

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आप भी नियमित रूप से विस्तृत जांच कराते रहिए।

कोई रोग पल रहा होगा तो समय से पहले पकड़ में आ जाएगा और उसका इलाज भी हो जाएगा।

उदाहरण--किडनी का 70 प्रतिशत हिस्सा जब नष्ट हो चुका होता है,उसके बाद ही उस रोग का लक्षण प्रकट होता है।

उसके बाद तो जीवन खत्म !!

डायलिसिस पर कितने दिनों तक कोई रहेगा ?!

इसलिए यह मत कहिए कि मेरे शरीर में रोग का कोई लक्षण

 ही नहीं है तो जांच पर खर्च क्यों करूं ?

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18 अगस्त 26