बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

 भूली-बिसरी यादें

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ऐसे थे चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषन

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टी.एन.शेषन ने मेरे प्रश्न का जवाब देने के बदले कहा था--

‘‘तुम पर मंगल ग्रह है।’’ 

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सुरेंद्र किशोर

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पटना राज भवन में चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषन का प्रेस कांफ्रेंस था।

संवाददाता के रूप मैं भी मौजूद था-अगली ही पक्ति मंे।

मैंने उनसे एक सवाल पूछा।पर जवाब देने के बदले मुझसे कहा--‘‘तुम पर मंगल ग्रह है।’’

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बाद में भी मैंने किसी से नहीं पूछा कि मंगल ग्रह क्या होता है ?

व्यक्ति पर उसका कैसा असर पड़ता है ?

यह शुभ है या अशुभ ?

ग्रह को शांत करने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है ?

अब भी कोई जानकार व्यक्ति मुझे बता दें,तो अच्छा लगेगा।

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ऐसे जवाब को लेकर शेषन के बारे में भी अनुमान लगा लें।

वैसे मतदाता पहचान पत्र उन्होंने बिहार में जबरन बनवाया।पहले तो लालू प्रसाद डरे हुए थे।उन्हें उसमें कोई षड्यंत्र लग रहा था।

बनवाने के लिए तैयार ही नहीं हो रहे थे।कहा कि सरकार के पास पैसे नहीं है बनवाने के लिए।

पर जब शेषन ने धमकाया कि ‘‘नो पहचान पत्र, नो चुनाव।’

उसके बाद पहचान पत्र बने।

पर चुनाव नतीजे के बाद लालू प्रसाद ने कहा कि 

उससे हमें लाभ मिला।गरीब लोग मतदान कर सके।

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14 अक्तूबर 26


मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

 यह आंदोलन नहीं, आक्रमण है !

‘‘कसाब एनर्जी’’ के साथ ?!

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भारत में तख्ता पलट का सपना यानी 

मैया, मोरे चांद खिलौना लैहों ?!

पर,याद रहे, भारत कोई ‘बनाना रिपब्लिक’ 

(यानी ढीला-ढाला व भ्रष्ट शासन वाला 

देश)नहीं है।

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सुरेंद्र किशोर

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तख्ता पलट वहीं संभव है जहां का शासन तंत्र भ्रष्ट हो

और सुरक्षा-व्यवस्था ढीली हो।मोदी राज में वैसा नहीं।

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राहुल गांधी और प्रतिपक्ष को चाहिए कि वह अपना चाल,चरित्र और चिंतन में सुधार करके पहले बहुमत जनता का विश्वास जीते।

सड़कों पर हंगामा करने और महिला सिपाहियों के साथ अश्लील हड़कतें करने से कोई राजनीतिक लाभ नहीं होने वाला।

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बालक अपनी मां से कह रहा है--

‘‘मैया,मैं तो चांद खिलौना लैहों।’’ 

यानी, मइया मुझे बिना चुनाव जीते, बल्कि लगातार 99 चुनाव हारने के बावजूद ‘‘चांद खिलौना’’ यानी मोदी वाली कुर्सी चाहिए।

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चुनाव में जीत के बिना कुर्सी कैसे मिलेगी बालक बुद्धि !?

हां, मइया यही कर सकती है कि वह थाली में पानी रखकर 

उसमें कुर्सी की छवि तुमको दिखा दे।

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जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह की मांग करने वाले वकील प्रशांत भूषण देश में तख्तापलट की सिफारिश कर रहे हैं।

दशकों तक एक से एक आधुनिक हथियार चमका कर नक्सल-माओवादी परास्त हो चुके हैं।

आप किस खेत की मूली हैं ?

हाल में इस देश के एक पूर्व सेनाध्यक्ष कह चुके हैं--‘‘हम अब इतने ताकतवर हैं कि हम एक साथ ढाई मोरचे(पाक,बांग्लादेश और आंतरिक दुश्मन)पर लड़ सकते हैं।’’

  नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले 12 वर्षों में सेना को काफी मजबूत और साधन संपन्न कर दिया है।मोदी ,नेहरू नहीं है जो शांति के कबूतर उड़ा रहे थे और चीन हमारी 38 हजार वर्ग मील जमीन पर कब्जा कर रहा था।

मोदी राज में 100 सरकारी पैसों में से 85 पैसे बिचैलिए नहीं खाते।सन 2014 में जहां भारत सरकार का कर राजस्व करीब 10 लाख करोड़ रुपए था,वहीं आज करीब 42 लाख करोड़ रुपए है।

इन पैसों के घोटाले में जाने की खबर नहीं है बल्कि ये पैसे देश के विकास,कल्याण और सबसे बढ़कर आंतरिक-बाह्य सुरक्षा प्रबंध पर खर्च हो रहे हैं।मोदी-शाह जानते हैं कि हमें एक दिन बाहरी-भीतरी दुश्मनों से एक साथ लड़कर उन्हें पराजित करना पड़ेगा। 

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जनता द्वारा चुनी गई इंदिरा सरकार का जब अत्यंत दमनकारी इमरजेंसी में भी सेना ने विरोध नहीं किया तो आज तो भाजपा जनता में काफी लोकप्रिय है।और मोदी सरकार ने कोई इमरजेंसी भी नहीं लगाई है।सेना यहां एक अनुशासित जमात है और चुनी हुई सरकार का कहना मानती रही है।(सेना में विद्रोह के बिना भारत में कोई तख्ता पलट कैसे कर सकता है ?विद्रोह संभव नहीं।)भारत सरकार के पूर्व साॅलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने कहा है कि ‘‘भारत में हो रहे कुछ विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग और बाहरी दखल है।’’

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हाल में देश के कई राज्यों में हुए चुनावों में भाजपा व सहयोगी संगठनों की भारी जीत

हुई है।उसका विवरण पढ़ लीजिए।

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1.-हाल में भाजपा ने राजस्थान के शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में शानदार बहुमत हासिल किया।कई नगर निगमों व बोर्डों पर चुनाव के जरिए कब्जा जमाया। 

2.-त्रिपुरा में भी स्थानीय निकाय चुनावोंमें बीजेपी-एनडीए गठबंधन को बड़ी जीत मिली।

3-हरियाणा के नगर निकाय चुनावों (जैसे अंबाला,सोनीपत और पंचकूला नगर निगमों)में मेयर के पदों पर बीजेपी ने जीत हासिल की।

4.-असम (नगांव लोक सभा सीट),पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में हुए उप चुनावों में भी एनडीए और बीजेपी उम्मीदवारों ने जीत हासिल की।

 74 प्रतिशत मुस्लिम बहुल रेजी नगर (पश्चिम बंगाल)विधान सभा सीट पर भी भाजपा ने जीत हासिल की है।

अब बंगाल के कई इलाकों में मुस्लिम शांतिपूर्वक जीना चाहते थे।ममता राज में हिंसा ही हिंसा थी।

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5.-आश्चर्य है कि हाल में जब दिल्ली,पंजाब,मंगलोर और केरल में छात्र संघों के चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जीत हासिल की तो कांग्रेस ने यह आरोप नहीं लगाया कि वहां चुनावी धांधली हुई है।

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वोट चोरी के आरोप की असलियत

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जहां कांग्रेस जीते,वहां वोट चोरी

नहीं।पर जहां राजग जीते,वहां वोट चोरी ?!!

ऐसे तर्क से भला कौन सहमत होगा ?

लोग असहमत हैं,तभी हाल के चुनावों में

भी कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई है।

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30 सितंबर 26 के दैनिक जागरण में राजीव सचान ने लिखा है--‘‘बिहार में एस.आई.आर.के खिलाफ छेड़े गए अभियान की हवा कांग्रेस नेता शकील अहमद के इस बयान ने भी निकाली थी कि यदि 65 लाख वोटरों के नाम गलत तरीके से काटे गए तो 65 लोग भी सड़कों पर यह कहने क्यों नहीं आए कि वे जीवित हैं, वैध मतदाता हैं और फिर भी उनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए ?’’

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प्रतिपक्ष आरोप लगा रहा है कि 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।

अधिकृत प्रवक्ता के अनुसार,

इनमें से साढ़े नौ करोड़ मतदाता गैर हाजिर,कहीं दूसरी जगह गए या एस.आई.आर.के दौरान किसी अन्य कारण से अपने मूल स्थान पर नहीं मिले।

 2 करोड़ 70 लाख मतदाताओं के नाम इसलिए सूची से हटा दिए गए क्योंकि उनके निधन की पक्की जानकारी मिली।एक करोड़ मतदातओं के नाम एक से अधिक जगह दर्ज पाए गए।

पिछला एस.आई.आर 2002 और 2004 के बीच हुआ था।

इतने वर्षों में ऊपर का आंकड़ा कोई असामान्य बात नहीं है।

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राहुल गांधी आरोप लगा रहे हैं कि 13 करोड़ वास्तविक मतदाताओं के नाम जानबूझ कर हटा दिए गए।

इस तर्क पर कौन विश्वास करेगा ?

एक कहावत है कि झूठ के पांव नहीं होते।इसलिए ऐसे झूठ के आधार पर कोई वास्तविक जनांदोलन नहीं चल सकता।

हां,अराजकता की बात और है।पर अराजकता पर तो कई पक्षों को कीमत चुकानी पड़ेगी।

  ऐसी अराजकता को रोकना मोदी सरकार और सुरक्षाकर्मियों का संवैधानिक दायित्व है जिसका वे पालन करेंगे।

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राहुल गांधी के नेतृत्व में तेलचट्टों ,वामपंथियों और जेहादियों तथा विदेशी शक्तियों का यह अभियान कोई जन आन्दोलन नहीं है ,बल्कि इंडियन स्टेट के खिलाफ युद्ध है।राहुल गांधी 2025 में ही कह चुके हैं--‘‘हम भारतीय राज्य से भी लड़ रहे हैं।’’

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बांग्ला देश के तख्ता पलट के तत्काल बाद कांग्रेस के दो प्रमुख नेता सलमान खुर्शीद और मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि जो कुछ बांग्ला देश में हुआ,वैसा ही भारत में भी होगा।’’

लगता है कि राहुल गांधी ने देशी-विदेशी शक्तियों की मदद से वह दिन ला दिया है।पर सबको उसके परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट को नये राजनीतिक विकास को ध्यान में रखते हुए

अलग ढंग से सोचना चाहिए न कि लकीर का फकीर बनना चाहिए।

संविधान निर्माताओं ने ऐसी ही विशेष परिस्थितियों से मुकाबले  के लिए संविधान में अनुच्छेद-142 के जरिए सुप्रीम कोर्ट को विशेषाधिकार दे रखा है।उम्मीद है कि इस संकट की घड़ी में सुप्रीम कोर्ट भी अपनी तद्नुसार अपनी भूमिका निभाएगा।

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12 अक्तूबर 26


शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

 मक्खियां 118 पुलिसकर्मियों को घायल

 नहीं कर सकती !!!!

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कल की आशंकित हिंसा का मुकाबला करने के लिए

दिल्ली पुलिस को सुप्रीम कोर्ट की ओर से 

खुली छूट मिलनी चाहिए थी।

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सुरेंद्र किशोर

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 क्योंकि आशंका है कि राष्ट्रद्रोही तत्व आंदोलन की आड़ में कल ऐसी हिंसा कर सकते हैं जिसका चेन रिएक्शन पूरे देश में हो सकता है जैसा इन दिनों फ्रांस में हो रहा है।

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केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट को इस बात पर ध्यान देना

चाहिए कि प्रतिपक्ष की ओर से कल नई दिल्ली में होने वाले प्रदर्शन के दौरान वैसी विषम स्थिति पैदा न हो जाए जो कुछ आज फ्रांस के विभिन्न नगरों में जारी है।कल भी सुप्रीम कोर्ट उस पर नजर रखे।जरूरत के अनुसार निदेश दे।

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 बेहतर तो यह होता कि सुप्रीम कोर्ट कल की स्थिति को संभालने का पूरा भार दिल्ली पुलिस और आम प्रशासन को सौंप देता।

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किंतु ऐसा नहीं हुआ।यह दुर्भाग्यपूण है और इससे कई तरह के अपशकुन हो रहे हैं।

कोक्रोच जनता पार्टी के प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि ‘‘मक्खी मारने के लिए हथौड़ा न चलायें।’’

सुप्रीम कोर्ट भूल गया कि इन्हीं तेलचट्टों की ओर से 

गत जुलाई में हुई हिंसा में दिल्ली पुलिस के छोटे -बड़े 118 पुलिसकर्मी घायल हो गये थे।वह अभूतपूर्व घटना थी।वे मक्खी नहीं हैं। जो शक्तियां कल दिल्ली में आंदोलनरत होने वाली हैं,उनकी मंशा के  बारे में आई.बी. जानकारी सुप्रीम कोर्ट को 

 लेनी चाहिए।

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अब मंशा की झलक देखिए।

राहुल गांधी 15 जनवरी 2025 को यह कह चुके हैं कि मैं इंडियन स्टेट से लड़ रहा हंू।(इंडियन स्टेट से लड़ने का मतलब है भारत की इस देश की संवैधानिक व्यवस्था से लड़ना।) 

कल ‘‘भाई-बहन’’ ने दिल्ली की महिला पुलिस कर्मियों के साथ जैसी अश्लील हड़कतें कीं,वह किसी जिम्मेदार नेता को शोभा नहीं देता।वे जिम्मेदार नेता हैं भी नहीं,यह बार -बार साबित हो चुका है।

उनके दल के सलमान खुर्शीद और मणिशंकर अय्यर कह चुके हैं कि जो कुछ बांग्ला देश में (तख्ता पलट)हुआ,वैसा भारत में भी हो सकता है।

  कल जो लोग दिल्ली में आंदोलनरत होने वाले हैं उनकी, भारत विरोधी विदेशी शक्तियों से साठगांठ की खबरें आती रहती हैं।

ऐसी स्थिति में देश में कई तरह के अपशकुन हो रहे हैं।    

-----सुरेंद्र किशोर

       9 अक्तूबर 26

 


गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

 ‘अयोध्या’ में भाजपा की हार नहीं हुई

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टी.वी.चैनलों पर बैठ कर अनेक भाजपा विरोधी प्रवक्ता गण अक्सर यह झूठ परोसते रहते हैं कि अयोध्या में भी भाजपा हार गई।

  अयोध्या नाम से विधान सभा क्षेत्र है (न कि लोक सभा क्षेत्र) जिसमें राम मंदिर अवस्थित है,उस अयोध्या में भाजपा नहीं हारी।

पर इतनी मामूली जानकारी भाजपा प्रवक्ताओं को भी नहीं है,इसलिए वे चैनलों पर लगातार परोसे जा रहे इस झूठ का कभी खंडन नहीं करते।याद रहे अयोध्या नाम भावना से जुड़ा हुआ है,इसलिए इस पर भाजपा प्रवक्ताओं को सतर्क रहना चाहिए।

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सुरेंद्र किशोर

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सन 2024 के लोक सभा चुनाव में फैजाबाद लोक सभा क्षेत्र के 

भीतर के अयोध्या विधान सभा खंड में सपा की हार हुई थी।उस खंड में भाजपा की जीत हुई  थी।पर,अयोध्या में भाजपा की हार का झूठा प्रचार करके यह बात फैलाने की कोशिश की जाती है कि राम मंदिर आंदोलन का भी कोई लाभ भाजपा को नहीं मिला।

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सन 2019 के लोस चुनाव की अपेक्षा 2024 के लोस चुनाव में भाजपा को अखिल भारतीय स्तर पर अपेक्षाकृत अधिक वोट मिले।

सन 2019 के लोक सभा चुनाव में भाजपा को देश में कुल मिलाकर 22 करोड़ 90 लाख वोट मिले थे।

जबकि 2024 के लोक सभा चुनाव में देश में भाजपा को 23 करोड़ 59 लाख वोट मिले।

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याद रहे 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में नव निर्मित राम लला मंदिर का समारंभ हुआ था।

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देश बड़ा है या फैजाबाद ?

देश बड़ा या उत्तर प्रदेश ?

रामलला विराजमान को ध्यान में रखें तो भी सवाल उठता है कि भावनात्मक दृष्टि से अयोध्या बड़ी है या फैजाबाद ?

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यदि चुनावों में मिले मतों की संख्या ही राम भक्ति का आधार माना जाए तो अयोध्या विधान सभा चुनाव क्षेत्र में सपा भक्तों की अपेक्षा रामभक्तों की संख्या 4500 अधिक मानी जाएगीं।

2022 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भी अयोध्या विधान सभा क्षेत्र में भाजपा को अन्य दलों से अधिक वोट मिले थे।यानी रामलला की लगातार कृपा किस पर रही ?

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अयोध्या विधान सभा चुनाव क्षेत्र, फैजाबाद लोक सभा क्षेत्र का एक हिस्सा है।

फैजाबाद लोक सभा क्षेत्र में कुल मिलाकर सपा को करीब 49 प्र्रतिशत और भाजपा को 44 प्रतिशत वोट मिले।वहां भी सिर्फ पांच प्रतिशत का फर्क।

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2024 के लोस चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर एन.डी.ए.को प्रतिपक्षी दलों की अपेक्षा अधिक सीटें आईं ।

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  यदि राम मंदिर ही मुद्दा था तो इस रिजल्ट के 

क्या नतीजे निकलते हैं ?

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उत्तर प्रदेश में लोक सभा की अपेक्षाकृत अधिक सीटें सपा को मिलीं।भाजपा को कम सीटें मिलीं।

यानी, राज्य स्तर पर राम मंदिर का जादू नहीं चला न ही मोदी का जादू चला।कोई दूसरा ही ‘जादू’ चल गया !!!

वह जार्ज सोरोस के पैसे का ‘जादू’ था।

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अब फैजाबाद लोक सभा सीट पर आइए।

सन 2024 का रिजल्ट इस प्रकार है--

सपा को 48.59 प्रतिशत मत मिले

भाजपा को 43.81 प्रतिशत मत मिले।

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यानी, फैजाबाद लोक सभा क्षेत्र कें करीब 44 प्रतिशत मतदातागण ही रामभक्त हैं,यदि चुनाव का मुद्दा राम मंदिर है तो।

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अयोध्या विधान सभा क्षेत्र

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सन 2024 के लोक सभा चुनाव में अयोध्या विधान सभा सेगमेंट में सपा की अपेक्षा भाजपा को 4500 वोट अधिक मिले।

यानी, रामजन्मभूमि में ,जहां रामलला विराजमान हैं,रामभक्तों की संख्या समाजवादी पार्टी के भक्तों की अपेक्षा, अधिक है।

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उपर्युक्त आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए जो भी नतीजा निकालना हो, आप खुद ही निकाल लीजिए।आप तो खुद ही चतुर सुजान हैं।

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और अंत में

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2024 के लोक सभा चुनाव में यू.पी. में भाजपा की अपेक्षा प्रतिपक्ष को अधिक सीटें मिलीं।

पर,नवंबर 2024 में यू.पी.के नौ विधान सभा क्षेत्रों में जो उप चुनाव हुए,उसमें किसे कितनी सीटें मिलीं ?

सपा को नौ में सिर्फ 2 सीटें मिलंीं।

राज को नौ में 7 सीटें मिलीं।


2027 के यू.पी.विधान सभा चुनाव नतीजे का पूर्वानुमान 2024 के लोक सभा चुनाव नतीजे को आधार बना कर किया  जाएगा या नंवबर, 2024 यानी बाद के उप चुनावों के नतीजों को आधार मान कर ?

विधान सभा का चुनाव मुख्यतः राज्य के मुद्दों पर लड़ा जाता है।लोक सभा चुनाव के मुद्दे अधिक राष्ट्रीय होते हंै।

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8 अक्तूबर 26 




मंगलवार, 29 सितंबर 2026

 देरी से असंतोष बढ़ता है

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अदालतों की तरह बढ रही है तारीख पर तारीख।

कब पूरा होगा गंगा पुलों के निर्माण का काम ?

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एक ही निर्माण एजेंसी को तीन-तीन गंगा पुलों के निर्माण 

का काम दे देने का खामियाजा आम जनता भुगत रही है

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सुरेंद्र किशोर

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क्या इस देश में साख वाली निर्माण एजेंसियों की इतनी कमी है कि बिहार सरकार को तीन गंगा पुल के निर्माण का भार एक ही एजेंसी को दे देनी पड़ी ?

या कोई और बात है  ?!

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दैनिक भास्कर ,पटना के अनुसार निर्माणाधीन गंगा पुलों के समय पर बन जाने के बाद उत्तर बिहार से आने-जाने वाले करोड़ों यात्रियों को महा जाम से मुक्ति मिल जाएगी।  

साथ ही, शेरपुर-दिघवारा गंगा सेतु चालू होते ही पटना रिंग रोड की परिकल्पना धरातल पर उतरेगी।

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दैनिक भास्कर की कल की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए क्या भविष्य में बिहार सरकार यह नियम बनाएगी कि किसी एक एजेंसी को दो से अधिक बड़ा काम नहीं ंमिलेगा ?

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करीब चार साल पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने राहुल गंाधी की तुलना ‘लाॅर्ड श्रीराम’ से की थी।कहा था कि राहुल जी अति मानव हैं और योगी की तरह तपस्या कर रहे हैं।

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सलमान साहब को अब बताना चाहिए कि राहुल जी अपनी तपस्या से कितना कुुछ हासिल कर सके हैं कांग्रेस के लिए और भारतीय समाज के लिए ?

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सुरेंद्र किशोर

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पूर्व केंद्रीय मंत्री व वरीय कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने 

सन 2022 में कहा था कि राहुल गांधी, लाॅर्ड राम के समान हैं।

इतना ही नहीं, खुर्शीद साहब ने यह भी कहा था कि राहुल गांधी सुपरमैन यानी अति मानव हैं और योगी की तरह तपस्या कर रहे हैं।

  इस टिप्पणी पर भाजपा ने कहा था कि जो व्यक्ति भ्रष्टाचार के आरोप में जमानत पर है,उसकी तुलना भगवान से करना अनुचित है।इससे असंख्य लोगों की, खास कर हिन्दुओं की भावनाएं आहत होती हैं।

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 सलमान खुर्शीद को कोई उनका ही यह बयान आज उन्हें दिखाए और उनसे पूछे कि आपके अति मानव ने अपनी तपस्या के जरिए काग्रेस और आम लोगों के लिए अब तक कितना कुछ हासिल किया है ?

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27 सितंबर 26


सोमवार, 28 सितंबर 2026

 पितृ पक्ष (26 सितंबर--10 अक्तूबर) के 

अवसर पर पिता की यादें

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वह जमाना कब का गुजर गया जब इस देश के 

लोग अपने पिता के पैरों में 

स्वर्ग देखते थे !

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--सुरेंद्र किशोर--

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अपवादों को छोड़ दें तो इन दिनों अधिकतर मामलों 

में पुत्र का समय अपने पिता से 

यह कहते हुए बीतता है कि 

‘‘ आपने मेरे लिए किया ही क्या ? ’’

ऐसा कह कर एक तरफ पुत्र अपनी नाकामियों को छिपाता है तो दूसरी ओर कूढ़न में पिता की आयु कम होती जाती है।

पिता के गुजर जाने तक यह सब चलता रहता है।

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पुत्र यह कहना चाहता है कि जो भी उपलब्धि मैंने पाई,वह खुद अपने बल पर।

और, मेरे जीवन में जो भी कमी रह गई,

वह पिता के असहयोग कारण।

वैसे सच तो यह है कि सिर्फ एक पिता को ही अपने पुत्र की तरक्की से कभी ईष्र्या नहीं होती।बाकी सबको होती है।

(मैं खुद इस बात का गवाह हूं।)

यानी, पिता दिल से चाहता है कि उसका पुत्र उससे भी अधिक तरक्की करे।

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समय बीतते देर नहीं लगती।

तब तक पुत्र भी पिता बन चुका होता है ।

और, उसे भी अपने पुत्र से यही सब सुनना पड़ता है।

इस तरह इतिहास का पहिया न जाने कब से 

घर्र -घर्र करते आगे बढ़ता जा रहा है।

एक बार फिर कह दूं।

इस नियम के कुछ अपवाद भी होते हैं।

पर, कुछ ही होते हैं।

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जीवन काल में पिता की उपेक्षा करने वाले उनके निधन के बाद कुछ अधिक ही पितृपक्ष मनाने लगते हैं।

दाढ़ी के बाल बढ़ा लेंगे,

थोड़ा उदास दिखने की कोशिश करेंगे और उनमें से कुछ गया में पिंडदान करने भी चले जाएंगे।

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अंध विश्वास है या यथार्थ ?

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आप इसे मेरा अंध विश्वास मान सकते हैं।

पर,यह तो मेरे साथ घटित हुआ है !

जब तक मेरे परिवार ने गया में पिंडदान नहीं किया,

तब तक मेरे बाबू जी 

(शिव नन्दन सिंह,ग्राम-भरहापुर,अंचल-दरियापुर,जिला-सारण,बिहार।)

अक्सर मेरे सपनों में आते थे।

पिंडदान के बाद नहीं आते।कभी नहीं आये।

  गया (अब गयाजी)का बहुत महत्व रहा है ।बताते हैं कि राम-सीता ने अपने पूर्वज की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था।

 खैर, इस अवसर पर कुछ दूसरी बातें भी।

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मेरे किसान पिता ने पिता की जिम्मेदारी 

बेहतर ढंग से निभाई।

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 जब मैंने सन 1963 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक(साइंस) पास किया ,उस पर बाबू जी मुझसे बहुत खुश थे।तब इक्के-दुक्के छात्र ही प्रथम श्रेणी में पास होते थे।

  बाबू जी मुझे जूनियर इंजीनियर बनाना चाहते थे।कहते थे कि पांच साल इंजीनियरिंग पढ़ाने का हमें धैर्य और साधन नहीं है।

पर, मेरी लाइन ही अलग थी।मैं सामाजिक -राजनीतिक क्षेत्र में जाना चाहता था।इसलिए बाद में मुझसे मेरे पिता काफी निराश हुए।

फिर भी कहते थे कि ‘‘जो मन में आए,करो।पर कभी -कभी गांव आ जाया करो--मुझे देखने के लिए नहीं तो खुद को मुझे दिखाने के लिए।’’

उनकी इच्छा के अनुसार मेरे छोटे भाई नागेंद्र ने पटना विश्व विद्यालय के लाॅॅ कालेज से   

कानून की डिग्री ली।

बड़े भाई को मुजफ्फर पुर में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हेड मास्टर पृथ्वीनाथ त्रिपाठी (बी बी काॅलेजिएट स्कूल)के घर रखकर पढ़ाने की कोशिश की।

पर उनके लगातार अस्वस्थ रहने के कारण उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई।

त्रिपाठी जी बहुत ही अच्छे शिक्षक थे।बी.बी.काॅलेजिएट स्कूल के प्राचार्य थे।

मेरे ही गांव के थे।मेरे बाबू जी के देास्त थे।

  यानी अपनी संतान को शिक्षित बनाने की एक किसान की तीव्र इच्छा तो देखिए।

मेरे पिता ने अपनी जमीन बेच कर शिक्षा पर खर्च किया।आने वाले जमाने का उन्हें पूर्वानुमान था।

जमींदारी जा चुकी थी।समय बदल रहा था।

आजाद भारत में शिक्षा का महत्व बढ़ा रहा था।

बाबू जी लंबे-चैड़े कसरती शरीर के स्वामी थे।बातचीत में दबंग थे।

लघुत्तम जमींदार थे।एक बड़े जमींदार के तहसीलदार भी थे।

उनका जन्म 1898 और निधन 1986 में हुआ।

 मेरे जन्म के समय बाबू जी  22 बीघा जमीन के मालिक थे।

स्कूल में पढ़ने लगा तो देखा कि घर में दो नौकर

दो गाय,दो या तीन बैल ,एक भैंस रहते थे।

सघन आबादी वाले सारण जिले में इतनी जमीन-जायदाद  होने पर हमारे आसपास के गांवों के अन्य किसान संतुष्ट थे।

खेत बेच कर अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में उन लोगों ने सोचा भी नहीं।

उल्टे वे मेरे बाबू जी के इस काम को अदूरदर्शी मानते थे।

पर,अब जब कभी गांव जाता हूं तो देखता हूं कि हमारे बराबर जमीन के मालिक की  हम उम्र संतान  आज भी किसानी करती  है और अच्छी हालत में नहीं हैं।

 एक बार मेरे एक स्कूल सहपाठी गया राय (रामपुर जैंती)ने कहा कि तू लोग त पहले भी जमींदार थे और पढ़ाई -लिखाई के कारण अब भी जमींदार हो।

इस तुलनात्मक अध्ययन से लगता है कि मेरे बाबू जी कितने दूरदर्शी थे।

यदि वैसा नहीं होते तो हम भी आज गांव में किसानी ही कर रहे होते।

किसानी की हालत यह है कि हमारे सामूहिक परिवार का एक सदस्य यानी मेरा भतीजा जो गांव पर रहता है,वह सारी जमीन में खेती नहीं कर पाता।क्योंकि अधिक खेती यानी अधिक घाटा।

अब भी हमारे संयुक्त परिवार के पास बेच -बाच कर नौ-दस बीघा जमीन बची है।

पर जो हैं,सब पक्की सड़क पर है।हालांकि अब हमलोग बेच रहे हैं।अन्यत्र पूंजी निवेश कर रहे हैं।

  यानी बाबू जी की अन्य बातों के साथ -साथ शिक्षा के प्रति उनकी तीव्र लालसा की याद आती है।

इस कहानी का मेारल यह है कि अभिभावकों को चाहिए कि वे तकलीफ उठाकर भी अपने बच्चों को शिक्षित जरुर करें।

(पर देश -प्रदेश का दुर्भाग्य है कि शिक्षण-परीक्षण का स्तर बिलकुल नीचे गिर चुका है।)

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बाबू जी की याद में

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पंडित ओम व्यास ओम ने ठीक ही लिखा है कि 

‘पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।’

मुझे याद नहीं कि बाबू जी ने कभी हमें बचपन में एक थपड़ भी मारा हो।

दरअसल उनकी उपस्थिति मात्र से हम सब भाई अनुशासित रहते थे।

वैसी कद-काठी का शायद ही कोई व्यक्ति जवार में हो !

मेरे परमानंद मामा उनके बारे में कहते हैं कि मेरे बहनाई शेर हैं।परमा मामा मुम्बई में पुत्र के साथ रहते हैं।

  स्वाभाविक ही है कि मेरे पिता के जीवनकाल में तो हमें उनके महत्व का उतना पता नहीं चल सका।

पर, न रहने पर हम सोचते रहे कि शायद हम लोग उनसे परंपरागत विवेक को लेकर कुछ अधिक सीख सकते थे।

उनकी स्कूली शिक्षा तो नहीं थी,

किंतु वे रामायण पढ़ते थे,

कैथी लिखते थे।

जमींदारी की रसीद काटते थे।

गांव- जवार में पंचायती करने जाते थे।

हां,वे मुकदमे के सिलसिले में अक्सर पटना-छपरा 

जाते रहते थे।अच्छे किसान है तो मुकदमा तो रहेगा ही।

कहा करते थे कि पटना हाईकोर्ट भवन के आसपास पहले धान की खेती होती थी जिसेे उन्होंने देखा था।

विधायक काॅलोनी तो बाद में बनी।

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  ओम व्यास ओम की कविता के जरिए हमें पिता के पूरे महत्व का एहसास हुआ।

आपके साथ साझा कर रहा हूं।

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पिता

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पिता  जीवन है, संबल है, शक्ति है।

पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है।

पिता अंगुली पकड़े बच्चे का सहारा है।

पिता कभी खारा तो कभी मीठा है।

पिता पालन पोषण है,परिवार का अनुशासन है।

पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।

पिता रोटी है, कपड़ा है,मकान है।

पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है।

पिता अप्रदर्शित अनंत प्यार है।

पिता है तो बच्चों को इंतजार है।

पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं।

पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं।

पिता से प्रतिपल राग है।

पिता से ही मां की बिंदी और सुहाग है।

पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ति है।

पिता गृहस्थाश्रम में उच्च स्थिति की भक्ति है।

पिता अपनी इच्छाओं का हनन परिवार की पूत्र्ति है।

पिता रक्त में दिए हुए संस्कारों की मूत्र्ति है।

पिता एक जीवन को जीवन का दान है।

पिता दुनिया दिखाने का अहसास है।

पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हाथ है।

पिता नहीं तो बचपन अनाथ है।

पिता  से बड़ा अपना नाम करो।

पिता  का अपमान नहीं, अभिमान करो।

क्योंकि मां-बाप की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता।

ईश्वर भी इनके आशीषों को काट नहीं सकता।

दुनिया में किसी भी देवता का स्थान दूजा है।

मां-बाप की सबसे बड़ी पूजा है।

वो खुशनसीब होते हैं, मां-बाप जिनके साथ होते हैं।

       --  पंडित ओम व्यास ओम

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28 सितंबर 26