बुधवार, 30 सितंबर 2020

 ‘‘एक बड़े नेता की संतान दिल्ली के एक ही कमरे में 

बैठकर 21 कंपनियां चलाती थीं।

6 हजार करोड़ रुपए की मालकिन बन बैठी।

तब देश की अर्थ-व्यवस्था बहुत मजबूत थी।

पर,जब मोदी सरकार ने उन फर्जी कंपनियों को बंद 

करा दिया तो मंदी आ गई।’’

              ---इरफान अहमद,

भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के उपाध्यक्ष

11 सितंबर 2020

...............................

‘‘चाहे यह भ्रष्टाचार का विरोध हो या भ्रष्ट के रूप में देखे जाने का भय,शायद भ्रष्टाचार अर्थ व्यवस्था के पहियों को 

आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण था,इसे काट दिया गया है।

मेरे कई व्यापारिक मित्र मुझे बताते हैं निर्णय लेेने की गति धीमी हो गई है।.............’’

                 -- नोबल विजेता अभिजीत बनर्जी,

              दैनिक हिन्दुस्तान, 23 अक्तूबर 2019

....................................

अभिजीत बनर्जी राहुल गांधी के अघोषित आर्थिक सलाहकार बताए जाते हंै। 


मंगलवार, 29 सितंबर 2020

 अलबर्ट एक्का भवन में 

काॅफी हाउस बने

.....................

पटना के निकट गंगा नदी पर निर्मित गांधी सेतु का 

शुभारम्भ 1982 में हुआ था।

अब उसका फिर से निर्माण हो रहा है।

पटना के अदालतगंज के विशाल परिसर में स्थित अलबर्ट एक्का भवन का 1984 में उद्घाटन हुआ था।

पर, इतने ही साल में वह जर्जर हो गया। 

वहां फिर से नए व भव्य भवन का निर्माण होने जा रहा है।

कोइलवर में सोन नद पर अंग्रेजों ने किस साल पुल बनवाया था ?

फिर भी अब भी उस पर आवागमन जारी है।

जब नवीन अलबर्ट एक्का भवन बने तो उसमें ‘काॅफी हाउस’ 

भी खुलना  चाहिए।

पटना में उसका अभाव खटकता है।

शासन को चाहिए कि वह उस भवन में काॅफी हाउस के लिए स्थान उपलब्ध कराए।

कभी काॅफी बोर्ड द्वारा संचालित पटना स्थित काॅफी हाउस के बंद हो जाने के बाद यहां उसकी कमी महसूस की जाती रही है।  

......................................

25 सितंबर, 2020 के प्रभात खबर,पटना में प्रकाशित 

मेरे काॅलम कानोंकान से।


 एक पेंशन योजना ऐसी भी !

..........................

सन 2006 में मुझे इ.पी.एफ.पेंशन योजना के तहत

हर माह पेंशन के रूप में 1046 रुपए मिलने शुरू 

हुए थे।

...........................

 2016 में यह राशि बढ़कर 1231 रुपए हो गई।

...........................................

अगस्त, 2020 की पेंशन राशि भी पासबुक पर चढ़ा दी गई है।

अब भी मुझे हर माह 1231 रुपए ही मिलते हैं।

..........................

आज 1231 रुपए मंे क्या-क्या मिल सकता है ?

 मेरी सेवानिवृत शिक्षिका पत्नी की पेंशन राशि से मेरे परिवार का खर्च चल रहा है।

 यदि यह सुविधा भी नहीं होती तो मुझे कब का अपने पुश्तैनी 

गांव में जाकर खेती के काम में लग जाना पड़ता।

......................

अब असली सवाल पर आएं।

आखिर क्या सोच कर केंद्र सरकार ने 1995 में ऐसी 

इम्प्लाइज पेंशन स्कीम शुरू की थी ?

.....................................

--सुरेंद्र किशोर-29 सितंबर 20

  

  


सोमवार, 28 सितंबर 2020

 


सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर 

निरंतर नजर रखे चुनाव आयोग-

--सुरेद्र किशोर--

................................... 

बिहार में चुनाव सामने है।

इसमें सोशल मीडिया के भारी दुरुपयोग की आशंका प्रकट की जा रही है।दुरुपयोग शुरू भी हो चुका है।

वैसे तो आम दिनों में भी इस माध्यम के दुरुपयोग की खबरें आती रहती हंै।पर चुनाव तो कई दलों व लोगों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन जाता है।वैसे में सोशल मीडिया का दुरुपयोग करें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

ऐसे में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी बढ़ गई है।

वह देखे कि यह मीडिया गलत ढंग से मतदाताओं को प्रभावित न करे।

हाल ही में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह सोशल मीडिया को सुव्यवस्थित करे।

क्योंकि इस मीडिया की पहुंच काफी बढ़ गई है।

 .................................

चुनाव प्रचार में नेताओं 

 से शालीनता की उम्मीद

................................

2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में प्रचारकों ने कई बार शालीनता की लक्ष्मण रेखा पार कर दी थी।

उम्मीद है कि 2020 के राज्य विधान सभा चुनाव प्रचार में ऐसा नहीं होगा।

याद रहे कि लोक सभा चुनाव की अपेक्षा विधान सभा चुनाव में लक्ष्मण रेखा पार करने की अपेक्षाकृत अधिक घटनाएं होती रही हैं।

 ध्यान रहे कि जब कोई चुनाव प्रचारक, नेता या कार्यकत्र्ता लक्षण रेखा पार करता है तो वह अपना ही चरित्र और संस्कार उजागर करता है।

साथ ही, वह मुकदमे को भी आमंत्रित करता है।

2015 के चुनाव में मुकदमे हुए भी थे।

एक नेता पर ‘चारा चोर’ कहने के लिए केस हुआ था तो दूसरे पर ‘नरभक्षी’ कहने पर मुकदमा हुआ।

पर ऐसे मुकदमों का अंततः क्या हश्र होता है ?

आम तौर से कुछ नहीं होता।

तब एक वरिष्ठ नेता ने तो कहा भी था कि चुनाव प्रचार के दौरान प्रचारकों के मुंह से निकली  गालियों को होली की गाली मान कर बाद में भुला दिया जाना चाहिए।

वैसे आप भले भुला देंगे,पर आम लोगों के दिल ओ दिमाग पर संबंधित गालीबाज नेताओं के बारे में जो छाप पड़ती है,वह उन नेताओं के लिए ही अच्छा नहीं होता।

  गाली-गलौज,अपशब्दों का प्रयोग और निराधार आरोप-प्रत्यारोप स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक है।

..............................

भारी वाहनों से सड़कें ध्वस्त

............................

सारण जिला स्थित नवनिर्मित दिघवारा-भेल्दी-अमनौर स्टेट हाईवे की स्थिति इन दिनों जर्जर है।

यह पहले ग्रामीण सड़क थी।मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने इसमें रूचि लेकर इसे कुछ ही साल पहले स्टेट हाईवे में परिणत कराया ।

चूंकि यह सड़क मुख्य मंत्री की नजर में थी,इसलिए इसका निर्माण भी बेहतर हुआ।

पर हाल के महीनों में इस सड़क पर अत्यंत भारी वाहनों की  बेरोकटोक आवाजाही के कारण यह रोड जर्जर हो गया।

इसके पुनर्निर्माण में भारी धन की जरूरत पड़ेगी।

निर्माण पर करीब 44 करोड़ रुपए खर्च हुए थे।

अब सवाल है कि उस सड़क को बर्बाद करने के लिए किसने उस सड़क पर भारी वाहनों की आवाजाही की अनुमति दी ?

इस सड़क का मामला तो एक नमूना है।

ऐसा पूरे राज्य में होता रहता है।

यह सार्वजनिक धन की बर्बादी नहीं तो और क्या है ?

 पहले निर्माण में भारी खर्च करो।फिर कुछ ही समय बाद उसके पुनर्निर्माण में धन लगाओ।  

................................

 खुले में शौच का हाल 

.....................

बिहार सरकार ने खुले में शौच रोकने के लिए काफी प्रयास किया।उसका कुछ सकारात्मक नतीजे भी सामने आए।

पर कुल मिलाकर स्थिति यह है कि वैसी सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी।

जबकि खुले में शौच से मुक्ति के कई फायदे हैं।

बिहार सरकार को चाहिए कि वह चुनाव के बाद एक बार फिर उस दिशा में पहल करे।

इस बार सख्ती से लागू करे।

कोरोना तथा इस तरह की किसी अन्य महामारी के इस दौर में 

खुले में शौच एक जघन्य अपराध है। 

........................

अलबर्ट एक्का भवन में काॅफी हाउस बने

.....................

पटना के निकट गंगा नदी पर निर्मित गांधी सेतु का 

शुभारम्भ 1982 में हुआ था।

अब उसका फिर से निर्माण हो रहा है।

पटना के अदालतगंज के विशाल परिसर में स्थित अलबर्ट एक्का भवन का 1984 में उद्घाटन हुआ था।

पर, इतने ही साल में वह जर्जर हो गया। 

वहां फिर से नए व भव्य भवन का निर्माण होने जा रहा है।

कोइलवर में सोन नद पर अंग्रेजों ने किस साल पुल बनवाया था ?

फिर भी अब भी उस पर आवागमन जारी है।

जब नवीन अलबर्ट एक्का भवन बने तो उसमें ‘काॅफी हाउस’ 

भी खुलना  चाहिए।

पटना में उसका अभाव खटकता है।

शासन को चाहिए कि उसके लिए उस भवन में स्थान उपलब्ध होना चाहिए।

कभी काॅफी बोर्ड द्वारा संचालित पटना स्थित काॅफी हाउस के बंद हो जाने के बाद यहां उसकी कमी महसूस की जाती रही है।  

......................

और अंत में

.....................

बिहार के मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंह और उप मुख्य मंत्री डा. अनुग्रह नारायण सिंह अपने चुनावी टिकट के लिए कभी कोई आवदेन पत्र नहीं देते थे।

बल्कि कांग्रेस पार्टी उन्हें टिकट आॅफर करती थी।

नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद डा.श्रीकृष्ण सिंह यानी  श्रीबाबू कभी अपने क्षेत्र में चुनाव प्रचार करने नहीं जाते थे।

  हां, श्रीबाबू ने 1957 में अपना चुनाव क्षेत्र जरुर बदला।

किंतु अनुग्रह बाबू यानी ‘बाबू साहब’ लगातार एक ही चुनाव क्षेत्र से लड़े।

....................................

कानोंकान ,प्रभात खबर 25 सितंबर 20 


 हंगामा सभाओं में बदलते विधान मंडल

.......................................

यह कौन सा न्याय है कि सदन के भीतर दुव्र्यवहार को लेकर तो कोई जेल न जाए,

किंतु बाहर यही काम करने पर कोई न बचे।

................................................ 

       --सुरेंद्र किशोर--

............................................

  पिछले दिनों संसद के उच्च सदन यानी राज्य सभा  में  अभूतपूर्व ,अशोभनीय और शर्मनाक दृश्य देखे गए।

ये दृश्य पूरे देश ने अपने टी.वी.सेट पर देखे।

विवेकशील लोग शर्मसार हुए।

 बाकी का नहीं पता !

  इन दृश्यों से यह साफ है कि लोकतंत्र के मंदिरों में अनुशासन और शालीनता लाने के अब तक के सारे प्रयास विफल ही साबित हुए हैं।

   इसलिए  देश की राजनीति की बेहतरी  और लोक जीवन को गरिमापूर्ण बनाने के कुछ खास उपाय करने पर नए सिरे से विचार करना पड़ेगा।

  राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश के साथ उस दिन सदन में जो कुछ अकल्पनीय हुआ,वह कोई पहली घटना नहीं थी।

यदि कुछ ठोस उपाय नहीं होंगे तो वह आखिरी घटना भी नहीं होगी।

 किसी पीठासीन अधिकारी के साथ ऐसा अपमानजनक व्यवहार इससे पहले कभी नहीं हुआ ।

  यह इस देश की राजनीति के गिरते स्तर का द्योतक है जिसे जारी रहने की और छूट अब यह लोकतंत्र बर्दाश्त नहीं कर  सकता।

हल्की सजाओं के साथ  यदि इसी तरह छूट मिलती रहेगी तो इसे कुछ दिनों बाद लोकतंत्र नहीं कहा जा सकेगा, चाहे इसे  जो भी अन्य नाम दिया जाए।

   लोक सभा में हुई एक ऐसी ही शर्मनाक घटना को लेकर सन 1997 में संसद के दोनों सदनों ने करीब एक सप्ताह तक गंभीर व भावपूर्ण चर्चा की थी।

  तब लोक सभा के भीतर ही दो बाहुबली सांसदों ने आपस में मारपीट कर ली थी।

  उस चर्चा में सदस्यों ने  ‘‘लोक जीवन में भ्रष्टाचार के विकराल रूप और सामाजिक जीवन में बढ़ती असहिष्णुता को देश के लिए गंभीर खतरा बताते हुए इन प्रवृतियों पर तत्काल अंकुश लगाने पर बल दिया था।’’

  तब सार्वजनिक जीवन को आदर्श बनाने के संकल्प से संबंधित सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव भी पारित किया था।

उसमें भ्रष्टाचार को समाप्त करने,राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने के साथ चुनाव सुधार करने ,जनसंख्या वृद्धि ,निरक्षरता  और बेरोजगारी को दूर करने के लिए जोरदार राष्ट्रीय अभियान चलाने का संकल्प लिया गया था।

   उस विशेष चर्चा के दौरान विभिन्न दलों के वक्ताओं ने 

देशहित में भावपूर्ण भाषण दिया था,पर उसके बाद के वर्षों में 

इस संकल्प के संदर्भ में क्या -क्या काम हुए,इसका पता नहीं चला।

हां,संसद सहित देश के विभिन्न विधान मंडलों में चर्चा का स्तर जरूर गिरता चला गया।

संसदीय गरिमा में भी गिरावट आती गई।

लोकतंत्र की ये सभाएं हंगामा सभाओं में बदलती चली गईं।

अपवादों की बात और है।

 25 नवंबर, 2001 को संसद तथा राज्यों  के विधान मंडलों में अनुशासन और शालीनता विषय पर पीठासीन अधिकरियों ,मुख्य मंत्रियों ,संसदीय कार्य मंत्रियों ,विभिन्न दलों के  नेताओं और सचेतकों ने अपने अखिल भारतीय सम्मेलन में एक संकल्प स्वीकृत किया था।

   उसमें यह कहा गया था कि सदन में अनुचित आचरण जैसे नारेबाजी करना,इश्तिहार दिखाना ,पत्रों को फाड़ना और फेंकना,अनुचित और अभद्र मुद्राओं का प्रदर्शन करना,अध्यक्ष के आसन के समीप जाना,प्रदर्शन करना,धरने पर बैठना, कार्यवाही में बाधा डालना और अन्य सदस्यों को बोलने न देना,व्यवस्था बनाए रखने के लिए अध्यक्ष पीठ के निदेशों पर ध्यान न देना ,पीठासीन अधिकारियों के निर्णय पर प्रश्न चिन्ह लगाना आदि संसद और विधान सभाओं के समुचित कार्यकरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

 उस सम्मेलन में शामिल सभी लोगों ने एक स्वर से कहा था कि हम राजनीतिक दलों से आग्रह करते हैं कि वे अनुशासनहीन आचरण करने से अपने सदस्यों को रोककर विधान मंडलों में शालीनता बनाए रखने में सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए आगे आएं।

  

यह याद रहे कि विधायिका के सदस्यों के लिए आचार संहिता है,जिसके अतिक्रमण के मामलों के लिए विभिन्न तरह की सजाओं के भी प्रबंध किए गए हैं।

 यदाकदा सजाएं दी भी जाती हैं ।

किंतु पिछले अनुभव बताते हैं कि 

उन सजाओं का सबक सिखाने लायक असर नहीं हो रहा है।

 इसके अलावा भी कई अन्य अवसरों पर संबंधित सम्मेलनों में 

सदन की गरिमा बनाए रखने की जरूरत बताई जाती रही है।

पर, राज्य सभा की ताजा घटना से यह लगता है कि कुछ  अनुशासनहीन सदस्यों के लिए ऐसे संकल्पों का कोई मतलब नहीं रह गया है।

क्या कभी यह सोचा गया है कि जब कभी स्कूली छात्रों का दल विधायिका की बैठक देखने जाता है तो उसकी कैसी

प्रतिक्रिया होती है ?

सच तो यह है कि हमारे लोकतंत्र के मंदिरों के बारे में उनकी  अच्छी प्रतिक्रिया नहीं होती।

एक बार तो एक छात्र ने कहा था कि 

इनसे अधिक अनुशासित तो हम छात्र अपने क्लास रूम में रहते हैं।

 हाल की  एक खबर के अनुसार राज्य सभा के प्रश्न काल का  60 प्रतिशत समय तो प्रतिपक्ष  के हंगामे में ही डूब जाता है।

 यह इस तथ्य के बावजूद होता है कि प्रश्न काल

सरकार को घेरने का सबसे अच्छा अवसर होता है।

इसी से आप अधिकतर सदस्यों की अपने मूल काम के प्रति गंभीरता का अंदाजा लगा सकते हैंे।

  कुल मिलाकर स्थिति यह है कि  पुराने उपायों से लोकतंत्र के मंदिरों की गरिमा वापस लौटने वाली नहीं है।

इसके लिए विशेष उपाय करने होंगे।

एक उपाय तो यह हो सकता है कि अपनी सीट छोड़ कर अकारण हंगामा करने के लिए सदन के ‘वेल’ में आने वाले सदस्यों की सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जानी चाहिए।

  ऐसे कई अन्य कठोर उपाय भी होने चाहिए।

यह कौन सा न्याय है कि सदन के भीतर की मारपीट,गाली -गलौज को लेकर तो कोई जेल न जाए,किंतु सदन के बाहर यही काम करने पर कोई न बचे ।

  याद रहे कि कभी उत्तर प्रदेश विधान सभा में सदस्यों ने माइक के रड से एक दूसरे का  खून बहाया था। 

      कुछ अन्य विधान सभाओं में भी सदस्यों के बीच मारपीट और तोड़फोड़ हो चुकी है।

वर्ष 2015 में केरल विधान सभा में इसी तरह की घटना को लेकर छह विधायकों के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी।

.......................

दैनिक जागरण 28 सितंबर 20


गुरुवार, 24 सितंबर 2020

 जो लोग सी.ए.ए.,

एन.पी.आर. 

और एन.आर.सी. का 

प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से 

विरोध कर रहे हैं, वे लोग भारत के खिलाफ

 अघोषित युद्ध लड़ रहे हैं।

मेरी यह बात अभी कई लोगों को बेसिरपैर की और कुछ लोगों को अतिशयोक्ति लग सकती है।

जिन्हें लगेगी,उनमें से कुछ तो अनजान हैं तो कुछ अन्य .....

अभी मैं उन्हें कोई नाम नहीं दूंगा।

दस-पांच साल बाद आप ही उन्हें कुछ नाम देने को बाध्य हो जाएंगे।

अभी आप भी नाम मत दीजिए।

..........................

--सुरेंद्र किशोर 

20 सितंबर 20

.............................

इस बीच दिल्ली दंगे से संबंधित आरोप पत्र अदालत में दाखिल कर दिया गया।

आरोप पत्र से भी जेहादी दंगाइयों के मंसूबे का पता चला है।

उससे भी मेरी ऊपर की आशंका की ही पुष्टि होती है।

यानी, देश भारी खतरे में है। 


    स्कूली जीवन का एक संस्मरण 

   ......................................  

यह बात तब की है,जब मैं हाई स्कूल में था।

नौंवी और दसवीं कक्षा में मेरा स्थान दूसरा रहता था।

फस्र्ट आने वाले का नाम था मुहम्मद ईसा।

ग्यारहवीं के लिए मैं किसी अन्य स्कूल में चला गया था। 

मैं ईसा का इस मामले में आज भी शुक्रगुजार हूं कि उसकी बहुत ही अच्छी लिखावट को देख -देख कर मैंने अपनी लिखावट सुधारी थी।

  अच्छी लिखावट का मुझे बाद के जीवन में बड़ा लाभ मिला।

याद रहे कि मैंने जीवन में कभी किसी सरकारी सेवा के लिए आवेदन तक नहीं दिया।

मुझे सार्वजनिक जीवन में जाने की

शुरू से इच्छा थी।

गया भी।

पर वहां से निराश होकर पत्रकारिता में चला आया।

पत्रकारिता भी एक अर्ध -सार्वजनिक जीवन ही है।

 स्कूल में फस्र्ट-सेकेंड करने के कारण मैं ईसा के पास ही  बैठता था।

पर, बात इतनी ही नहीं है।

एक बार तिवारी जी नामक शिक्षक ने मुझे बताया कि दरअसल तुमको ही फस्र्ट करना चाहिए।

किंतु उर्दू और फारसी में ईसा को करीब नब्बे -नब्बे प्रतिशत अंक मिल जाते हैं।

  दूसरी ओर संस्कृत शिक्षक मुझे सौ में सिर्फ 35 प्रतिशत अंक ही देते थे।

हिन्दी में भी बहुत अधिक अंक आने का सवाल ही नहीं था जो 90-90 प्रतिशत की ‘क्षतिपूत्र्ति’ कर सके।

   वैसे बिहार माध्यमिक विद्यालय परीक्षा बोर्ड की परीक्षा में संस्कृत में मुझे सौ में 84 अंक मिले थे।

  मेरे साथ सहानुभूति रखने वाले शिक्षक तिवारी जी ही यह जानते थे कि ईसा को कितने अंक मिलते थे।

उन्होंने संस्कृत शिक्षक से कहा भी था कि आप कम अंक क्यों देते हैं ?

उसके जवाब में पंडित जी ने कहा कि ज्यादा दूंगा तो छात्र पढ़ने में आलसी हो जाएगा और बोर्ड परीक्षा में अच्छा नहीं कर पाएगा।

  वैसे मेरे लिए तब इसका कोई खास महत्व नहीं था कि मैं फस्र्ट क्यों नहीं करता।

उस जमाने में एक नामी स्कूल में कक्षा में सेकेंड करना भी बड़ी बात थी।उसी से मैं संतुष्ट था।

  ईसा को इतने अधिक अंक मिल जाते थे,उसमें खुद ईसा का भला क्या कसूर ?

हां,उस उर्दू शिक्षक से जरूर पूछा जाना चाहिए था कि किस आधार पर भाषा में आप इतने अधिक अंक देते हैं ?

   ईसा पढ़ -लिखकर प्राइमरी स्कूल में शिक्षक बना।

जाहिर है कि बोर्ड परीक्षा में उसे अच्छे अंक नहीं आए होंगे।

मैं नहीं जानता कि बोर्ड परीक्षा उसने कितने अंकों के साथ पास किया।

  यदि मेरी तरह उसने फस्र्ट डिवीजन से पास किया होता तो उसे बेहतर नौकरी मिल सकती थी।

1963 में फस्र्ट डिविजनर बहुत कम होते थे।

उस स्कूल में उस साल सिर्फ चार विद्याथियों को ही फस्र्ट डिविजन मिला था।

................................

सुरेंद्र किशोर--19 सितंबर 20