केरल से लेकर बिहार तक देश की शिक्षा-परीक्षा पर
लंबा प्रश्न चिन्ह खड़ा है !
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सुरेंद्र किशोर
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पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं।
जो राज्य सरकार परीक्षा में कदाचार रोकती है,वह अगला चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हो जाती है।
इसलिए सत्ता कौन गंवाना चाहेगा ??
फिर उपाय क्या है ?
समझदार लोग चिंता करें और चिंतन भी।
कोई रास्ता निकालें !
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सन 1992 में कल्याण सिंह सरकार ने नकल विरोधी कानून बनाया।
मुलायम सिंह की सरकार ने 1994 में उस कानून को रद कर दिया।
दरअसल यू.पी.बोर्ड की परीक्षा में कदाचार पूरी तरह रोक देने के कारण कल्याण सिंह की सरकार 1993 के चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई।
1992 में बाबरी ढांचा गिराने के कारण उत्पन्न भावना को भंजाने का चुनावी लाभ तक भाजपा को नहीं मिल सका था।
(राम मंदिर से अधिक महत्वपूर्ण साबित हुई थी परीक्षा में कदाचार की छूट)
मुलायम सिंह यादव कदाचारी विद्यार्थियों व उनके अभिभावकों के ‘हीरो’ बन गए थे।
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यानी,मुझे यह लगने लगा है कि चुनाव लड़ने वाली कोई भी सरकार आम परीक्षाओं में नकल नहीं रोक सकती।
उसके लिए शायद किसी तानाशाह शासक की जरूरत पड़ेगी।
या फिर कोई सरकार चुनाव जीतने के प्रथम साल से ही शिक्षा-परीक्षा माफियाओं पर नकल कसना शुरू कर दे तो शायद कुछ बात बने।
कम से कम तकनीकी संस्थानों की हालत तो सुधरे !
आज उद्योग जगत कहता है कि सिर्फ 27 प्रतिशत इंजीनियर ही ऐसे हैं जिन्हें नौकरी पर रखा जा सकता है।
हमारे स्वास्थ्य की देखरेख करने वाले ‘‘धरती के भगवान’’ तो ठीकठाक पढ़- लिखकर निकलें।
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जब-जब शिक्षा -परीक्षा के ध्वस्त होने की बात होती है,तब -तब कई लोग अपनी -अपनी राजनीतिक ‘सुविधा’ के अनुसार अपना ‘टारगेट’ तय करके आरोप का गोला दागने लगते हैं।
पर 1963 से इस संबंध में मैंने जो कुछ अपनी आंखों से देखा है,उसे संक्षेप में शेयर करता हूं।
1.-राजनीति और प्रशासन में गिरावट के अनुपात में शिक्षा में भी गिरावट होनी ही थी।
हुई भी।
2.-पहले परीक्षाओं में ‘सामंतवाद’ था।सन 1967 से उसमें ‘समाजवाद’ आ गया।
3.-इमरजेंसी में माक्र्स के आधार पर बिहार में लाखों सरकारी शिक्षक बहाल हुए।तब की सरकार ने जेपी आंदोलन को कमजोर करने के लिए यह काम किया था।
4.-सरकारी नौकरियां देने के लिए कत्र्तव्यनिष्ठ उच्च पदस्थ अफसरों व सेना की देखरेख में उम्मीदवारों की कदाचारमुक्त प्रतियोगी परीक्षाएं हों।या फिर उच्च न्यायालयों और जिला जजों की देखरेख में परीक्षाएं हों।जनहित याचिका के बाद बिहार में 1996 में वैसा हुआ था।नतीजतन बिहार इंटर बोर्ड परीक्षा में 85 प्रतिशत परीक्षार्थी फेल कर गये थे।मैट्रिक परीक्षा का रिजल्ट भी ऐसा ही रहा था।
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छोटी -छोटी टुकड़ियों में सालों भर बड़े हाॅल में ऐसी परीक्षाएं होती रहें।
तभी सिर्फ योग्य लोग ही सेवाओं में आ सकेंगे।
अब भी योग्य लोग सेवा में हैं,पर काफी कम संख्या में।
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1963 में मैं मैट्रिक की परीक्षा दे रहा था।
जिला स्कूल में केंद्र था।
उस जिले के सबसे अधिक प्रभावशाली सत्ताधारी नेता के परिवार के एक सदस्य के लिए चोरी की छूट थी।
केंद्र में किसी अन्य के लिए वह ‘सुविधा’ उपलब्ध नहीं थी।
मैं बी.एससी.पार्ट वन की परीक्षा दे रहा था।
संयोग से उस काॅलेज के प्राचार्य के पुत्र की सीट मेरे ही हाॅल में पड़ी थी।
नतीजतन पूरे हाॅल को चोरी की छूट थी।
उसी केंद्र में किसी अन्य हाॅल में कोई छूट नहीं थी।
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उन दिनों मेडिकल - इंजीनियरिंग काॅलेजों में माक्र्स के आधार पर दाखिला हो जाता था।
प्रैक्टिकल विषयों में कुल 20 में उन्नीस अंक मिल जाने पर कम तेज उम्मीदवार भी डाक्टर या इंजीनियर आसानी से बन जाते थे।
संयोग से मेरा रूम मेट ही इन 250 रुपयों को इधर से उधर करता था।
न जाने कितनों को उसने डाक्टर-इंजीनियर बनवा दिया।
एक दिन मुझसे उसने पूछा,
‘का हो सुरिंदर,तुमको भी नंबर चाहिए।
तुमको कुछ कम ही पैसे लगेंगे।’’दो सौ में वह काम हो रहा था।
मैंने कहा कि मुझे कोई नौकरी नहीं करनी है।
मेरा वह रूम मेट खुद हाई स्कूल का शिक्षक बना।
ऐसे गोरखधंघे के कारण ही माक्र्स के आधार पर दाखिला बाद में बंद हो गया।
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1967 के चुनाव के बाद परीक्षाओं में धुंआधार चोरी शुरू हो गई।
कहा भी जाने लगा कि ‘चोरी में समाजवाद’ आ गया।
महामाया सरकार ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की।
छात्रगण महामाया बाबू के ‘जिगर के टुकड़े’ जो थे !
के.बी.सहाय की सरकार को चुनाव में हराने में छात्रों की बड़ी भूमिका थी।
1967 के आम चुनाव से पहले बड़ा छात्र और जन आंदोलन हुआ था।
छात्रों पर भी जमकर पुलिस दमन हुआ था।
मैं भी तब एक छात्र कार्यकत्र्ता था।
मैंने खुद परीक्षा छोड़ दी थी क्योंकि आंदोलन के कारण मेरी तैयारी नहीं हो पाई थी।
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1972 में केदार पांडेय की सरकार ने नागमणि और आभाष चटर्जी जैसे कत्र्तव्यनिष्ठ आई.ए.एस.अफसरों की मदद से परीक्षा में चोरी को बिलकुल समाप्त करवा दिया।
पर सवाल है कि अगले ही साल से ही फिर चोरी किसने होने दी ?
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1996 में पटना हाईकोर्ट के सख्त आदेश और जिला जजों की निगरानी में मैट्रिक व इंटर परीक्षाआंे में कदाचार पूरी तरह बंद कर दिया गया।शिक्षा मंत्री जयप्रकाश नारायण यादव ने प्रेस को बताया कि ‘‘शिक्षा माफिया को समाप्त कर दिया गया।’’
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पर, अगले ही साल से कदाचार फिर क्यों शुरू करवा दिया गया ?
किसने शुरू करवाया ?शिक्षा माफिया के दबाव में तब की लालू सरकार ने करवाया।क्योंकि छात्र नहीं मिलने के कारण अधिकतर निजी काॅलेज बंद होने लगे थे।
क्या कदाचार की इस महामारी के लिए आप किसी एक दल एक सरकार या एक नेता या फिर किसी एक समूह को जिम्मेवार मान कर खुश हो जाना चाहते हैं ?
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याद रहे कि सन 1996 में बिहार इंटर विज्ञान परीक्षा में 85 प्रतिशत परीक्षार्थी फेल कर गये थे।
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सन 2026 में बिहार इंटर विज्ञान परीक्षा में 96 प्रतिशत परीक्षार्थी पास कर गये।यह चमत्कार कैसे हुआ ?
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दिल्ली विश्वविद्यालय में सन 2022 से पहले प्राप्तांकों के आधार पर नामांकन होते थे।
यानी, राज्यों के स्कूली बोर्ड्स की परीक्षाओं में मिले अंकों के आधार पर।
यह देखा गया कि केरल तथा कुछ दूसरे राज्यों की बोर्ड परीक्षाओं में असामान्य ढंग से 100 प्रतिशत अंक मिल रहे हैं ताकि दिल्ली विश्वविद्यालयों के विभिन्न प्रतिष्ठित काॅलेजों में उनका दाखिला हो जाये।
उसके बाद सन 2022 से दाखिला के लिए टेस्ट परीक्षा होने लगी।
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टेस्ट परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले केरल के 1672 छात्रों को दिल्ली विश्व विद्यालय में दाखिला मिल गया था।
प्रतियोगी परीक्षा के बाद केरल से वह संख्या घटकर 350 रह गयी।
दूसरी ओर, जहां पहले यानी 2021 में बिहार के 556 विद्यार्थियों को दाखिला मिला था ,वहीं टेस्ट शुरू होने के बाद 1280 बिहारी विद्यार्थी 2022 में दिल्ली यूनिवर्सिटी .में दाखिला के योग्य पाए गए।
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उधर केरल में सन 2002 में ही शिक्षा का क्या हाल हो चुका था,उसके बारे में टाइम्स आॅफ इंडिया ने एक खबर दी थी।
14 नवंबर 2002 को छपी खबर चैंकानेे वाली थी।
चूंकि खबर केरल के बारे थी,इसलिए और भी चैंकाती थीं।उस राज्य के बारे में यह कहा जाता रहा है कि वहां सर्वाधिक साक्षरता है।माना जा रहा था कि लोग पूर्ण साक्षर हंै तो सुशिक्षित और कुशल भी होंगे।पर ,सब सुशिक्षित व कुशल वहां भी नहीं हैं।कुछ जरूर होंगे जैसे अन्य राज्यों में भी होते हैं।
केरल के सार्वजनिक क्षेत्र के एक संस्थान ने क्लर्क आदि पद पर बहाली के लिए 2002 में विज्ञापन निकाला।करीब 13500 आवेदन आये।
उनमें से 5 हजार उम्मीदवार हाईली क्वालिफायड थे।उनमें 20 इंजीनियर और दो डाक्टर्स भी थे।
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वैसे शिक्षा-परीक्षा को लेकर बिहार की आदर्श स्थिति नहीं है।बहुत सुधार की जरूरत है।
किंतु केरल के बारे में यह सब जान-सुनकर किसी को सिर्फ बिहार को ‘‘सिंगल आउट’’ करने का नैतिक हक नहीं है।
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और अंत में
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1963 में मैंने साइंस विषयों के साथ मैट्रिक फस्र्ट डिविजन से पास किया था।
आसपास के गांव के कई लोग मुझे देखने आये थे।
2026 में जो विद्यार्थी फेल कर गए हैं ,उन्हें देखने कुछ लोग गए होंगे !
कैसा परीक्षार्थी निकला जो बहती गंगा में भी हाथ
नहीं धो पाया !
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24 मार्च 26