Wednesday, May 7, 2014

चुनाव में मनी पावर यानी एक नया वोट बैंक

चुनावों में ‘मनी पावर’ एक नये ढंग के वोट बैंक के रूप में तेजी से उभर रहा है। यह तत्व भी मतदान को एक हद तक प्रभावित करने लगा है।
 जिन चुनाव क्षेत्रों में थोड़े मतों से हार-जीत का फैसला होता है, वहां मनी पावर निर्णायक साबित होता दिख रहा है।

 यह मनी पावर यानी नया वोट बैंक, परंपरागत जातीय व सांपद्रायिक वोट बैंक को जहां -तहां काफी ताकत पहुंचा रहा है। तीनों तत्व मिलकर कहीं -कहीं निर्णायक साबित हो रहे हैं।

 मिल रही सूचनाओं के अनुसार मनी पावर अभी किसी जातीय वोट बैंक से अधिक ताकतवर नहीं बना है, पर यह उस रास्ते पर जरूर है।

   मौजूदा चुनाव में आयकर दस्तों ने देश भर में 273 करोड़ रुपये नकदी और करीब दो करोड़ लीटर शराब जब्त की है। यह आंकड़ा गत एक मई तक का है। बिहार सहित देश भर में ऐसी जब्तियां अब भी जारी हैं। जब्तियों की यह मात्रा अभूतपूर्व है।

  जितने पैसे व शराब पकड़े गये हैं, वे उन अपार धन व सामग्री के बहुत छोटा हिस्सा हंै जो पकड़े नहीं जा सके। वे मतदाताओं के एक हिस्से के बीच वितरित कर दिये गये।

 एक ताजा अध्ययन के अनुसार देश के नेतागण इस पूरे चुनाव में कुल करीब तीस हजार करोड़ रुपये खर्च करेंगे। इनमें वैध व अवैध खर्च शामिल हैं।

   गत साल जून में भाजपा नेता गोपी नाथ मुंडे ने सार्वजनिक रुप से यह स्वीकार किया था कि उन्होंने 2009 के लोकसभा के चुनाव में अपने क्षेत्र में 8 करोड़ रुपये खर्च किये थे।

 गत दिनों चुनाव आयुक्त एच.एस. ब्रह्मा ने एक रहस्योद्घाटन किया । श्री ब्रहमा ने कहा कि मैंने सुना है कि आंध्र प्रदेश के एक संभावित लोकसभा उम्मीदवार अपने चुनाव क्षेत्र में एक सौ करोड़ रुपये खर्च करने वाला है। एक अन्य उम्मीदवार ने व्यक्तिगत बातचीत में श्री ब्रह्मा को बताया था कि अपने चुनाव क्षेत्र में वह 35 करोड़ रुपये खर्च करने वाला है।

  इन आंकड़ों व सूचनाओं को देखकर क्या ऐसा नहीं ंलगता कि ‘मनी पावर’ एक नया वोट बैंक बनता जा रहा है। वह  जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंक से कम खतरनाक नहीं है !

  यह संयोग नहीं है कि इस देश की संसद व विधायिकाओं में करोड़पतियों व अरबपतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

 चुनाव आयोग की कड़ाई के कारण चुनाव में बाहुबल का इस्तेमाल पहले की अपेक्षा थोड़ा कम हुआ है। पर, कई क्षेत्रों में मनी पावर, अब बाहुबल का विकल्प बन कर उभरा है।

  बूथ कैप्चर की जगह भारी पैसे के बल पर मतदाताओं के एक हिस्से को अपने प्रभाव में लाया जा रहा है। मतदाताओं का जो हिस्सा पैसे स्वीकार कर रहा है,उनमें से अधिकतर लोगों के दिलों -दिमाग में यह भाव उभर रहा है कि जब सत्ता में आने के बाद किसी भी दल को आम जन की भलाई के लिए काम नहीं ही करना है, खुद की भलाई के लिए ही बहुत करना है, तो क्यों नहींं आज जो कुछ उनसे मिल रहा है, उसे ही स्वीकार करके संतोष कर लिया जाए।

राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार वैसे मतदाता इस बात की परवाह नहीं कर रहे हैं कि पैसे के बल पर चुनाव जीतने वाले नेतागण  और भी कितना अधिक निर्भीक होकर इस देश को लूटंेगे।

 हालांकि यह बात भी सही है कि इसी देश में  कुछ दल व नेता ऐसे भी हैं जो चुनावों में मनी पावर के खेल में शामिल नहीं हैं।  


(साभार -दैनिक भास्कर ,पटना संस्करण- 6 मई 2014)

होली की गालियां या गब्बर सिंह के डायलाॅग ?


गत बिहार विधानसभा चुनाव में भी प्रतिस्पर्धी नेताओेंं के बीच तीखे आरोपों -प्रत्यारोपों के दौर चले थे। तब एक बड़े नेता ने कहा था कि चुनाव के दौरान की गई आलोचनाएं होली की गालियां जैसी होती हैं। उन गालियों को होली बीतने के बाद भुला दिया जाता है।

   पर क्या इस बार की तीखी व अभूतपूर्व गालियां भी होलियाना ही हैं ? ऐसा तो नहीं लगता। इन गालियों व तीखे संवादों के सामने तो शोले फिल्म के गब्बर सिंह के डायलाॅग भी फीके हो गये हैं।

क्या नेताओं के जहर बुझे बयानों से लगे घाव चुनाव के बाद भी जल्दी भर पाएंगे ? उम्मीद की जानी चाहिए कि वे घाव जल्द ही भर जाएं और तनावमुक्त ढंग से लोकतंत्र की गाड़ी फिर से चलने लगे।

   पर, ऐसा होने मेंे  कई लोगों को अभी संदेह है। उनका मानना है कि इसका असर चुनाव के बाद भी कुछ दिनों तक रहेगा। कई लोगों को इस बात पर आश्चर्य हो रहा है कि क्यों चुनाव आयोग  कसूर के अनुपात में तौलकर उन नेताओं को  सजा नहीं दे रहा है जो नेतागण खुलेआम चुनाव आचार संहिता का घोर उल्लंघन कर रहे हैं। साथ ही जो वोट के लिए समाज में विद्वेष फैलाने के साथ- साथ लोकतंत्र की गरिमा भी गिरा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि आचार संहिता के सवाल पर एक -दो चुनाव क्षेत्रों के चुनाव स्थगित कर दिए गए होते तो बेलगाम नेताओं की बोलती बंद हो गई होती।

   चुनाव के कुछ फेज अब भी बाकी हैं। अब यह मतदाताओंं पर ही निर्भर है कि एक दूसरे के खिलाफ बयानों के ऐसे जहर बुझे तीर चलाने वालों को वे वोट देंगे या नहीं। क्या मतदातागण ऐसे ही लोगों के हाथों संसदीय जनतंत्र की कमान सौंपेंगे जिनकी जुबान इतनी बेलगाम व जहरीली हैं ? जो वोट के लिए किसी भी हद तक जाकर जातीय व सांप्रदायिक भावनाएं उभार सकते हैं ? जो किसी की भी प्रतिष्ठा का ख्याल रखे बिना किसी भी तरह के अपुष्ट व उल्टे सीधे आरोप लगा सकते हैं ?

  इतने गंदे, अश्लील, दिलों को भेदने वाले तथा समाज में द्वेष फैलाने वाले आरोप-प्रत्यारोप इससे पहले किसी चुनाव में नहीं लगाये गये थे। जब जुबान पर हिंसा हो तो सरजमीन पर भी उसका असर देखा ही जा सकता है। चुनाव से संबंधित हिंसक घटनाओं की खबरें आने भी लगी हैं।

  इसके साथ ही जितनी अधिक मात्रा में काला धन का इस्तेमाल मौजूदा चुनाव में हो रहा है,उतना इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

  लगातार पकड़े जा रहे भारी मात्रा में काला धन से इस बात की पुष्टि होती है। याद रहे कि जुबान ही नहीं बल्कि काला धन भी मतदाताओं के एक हिस्से को प्रभावित करते हैं। इस देश के लोकतंत्र में तेजी से घर कर रही इन गंभीर बीमारियों का इलाज सिर्फ मतदाताओं के पास है। उनसे उम्मीद की जा रही है कि नफरत व चुनावी गंदगी फैलाने वाले नेताओं को इस चुनाव में नकार दें।

   अन्यथा जहर उगलने वाले नेतागण अपने राजनीतिक लाभ के लिए आने वाली पीढि़यों के दिलो -दिमाग में भी जहर ही घोलेंगे।   

अब जरा कुछ नेताओं की बदजुबानियों के कुछ नमूने पढि़ए।

 एक नेता ने अपने प्रतिद्वंद्वी नेता के बारे में कहा कि वह घमंडी और लुटेरा है। दूसरे ने कहा  कि वह कसाई है। तीसरे की टिप्पणी थी कि उसे देख कर तो कसाई भी शर्मा जाते हैं।

  जब तक वे एक दूसरे को पप्पू और फेंकू कह रहे थे, तब तक वह सहनीय था। क्योंकि उसमें मनोरंजन का भी पुट था। पर अब तो आरोप-प्रत्यारोपों में खांटी दुश्मनी के भाव दिख रहे हैं। जीजाजी शब्द के उच्चारण से राजनीति की गरिमा गिरी। नपुंसक व गुंडे शब्द ने लोकतंत्र को शर्मा दिया। इनके अलावा भी कुछ ऐसे डायलाॅग बोले गये जिन्हें सुन कर गब्बर सिंह के डायलाॅग भी फीके लगने लगे।

वैसे अभी चुनाव प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। अब भी न जाने कितने विषैले तीर हमारे नेताओं के पास बचे हुए हैं। हालांकि यह कहना भी सही नहीं होगा कि सारे नेता ऐसे ही हैं। इस तनावपूर्ण चुनाव में भी कुछ नेताओं की जुबान पर अब भी शालीनता विराजमान है।


(30 अप्रैल 2014 के दैनिक भास्कर के पटना संस्करण में प्रकाशित)       

Thursday, May 1, 2014

विचारों की बेतरतीबपना से जूझती ‘आप’


आम आदमी पार्टी में वैचारिक संतुलन बिगाड़ने के लिए क्या प्रशांत भूषण कम थे जो शाजिया इल्मी ने भी मोर्चा संभाल लिया? दरअसल यह ‘आप’ में फैली वैचारिक बेतरतीबपना की निशानी है। यह समय-समय पर प्रकट होती रहती है। कुछ लोग इसे वैचारिक अराजकता भी कह रहे हैं।

  इससे देश भर में फैले ‘आप’ के अनेक प्रशंसक निराश हो रहे हैं। यदि यह सब जारी रहा तो वे हताश हो सकते हैं। इससे उन लोगों को वास्तव में निराशा हुई है जो उम्मीद कर रहे हैं कि ‘आप’ एक न एक दिन भाजपा और कांग्रेस के मुकाबले देश में ‘वैकल्पिक राजनीति’ पेश करेगी।

  पर वैकल्पिक राजनीति पेश करने का काम वह संतुलित विचारों के जरिए ही कर सकती है। ‘आप’ के अधिकतर नेताओं में अच्छी मंशा, त्याग व व्यक्तिगत ईमानदारी की पूंजी पहले से है। इसलिए भी उनमें संभावना है। बल्कि अन्य दलों की अपेक्षा संभावना अधिक है।

   भाजपा पर एक रंग की सांप्रदायिकता को हवा देने का आरोप है तो कांग्रेस पर दूसरे रंग की सांप्रदायिकता को बढ़ाने का आरोप है।
कई लोग इस स्थिति से ऊब रहे हैं।   


जनता का कुशासन और भ्रष्टाचार विरोधी मूड

 आवेश से भरे इस चुनावी माहौल में जनता का कुशासन और भ्रष्टाचार विरोधी मूड साफ देखा जा सकता है। तरह -तरह के सांप्रदायिक तत्वों को सत्ता व राजनीति के शीर्ष से परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देना भी कुशासन का ही तो हिस्सा है।

  जनता के मूड को देख कर नरेंद्र मोदी को भी यह कहना पड़ रहा है कि सत्ता मिलने के बाद वे भारत के संविधान के अनुसार ही देश को चलाएंगे। गिरिराज सिंह जैसे नेताओं के जहरीले बयानों की ओर इशारा करते हुए मोदी कहते हैं कि हमारे शुभचिंतक संकीर्ण बयानों से परहेज करें। पर दूसरी ओर गाजियाबाद में आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार शाजिया इल्मी मुसलमानों से अपील कर रही हैं कि उन्हें अधिक धर्मनिरपेक्ष बनने की जरूरत नहीं है। वे थोड़ा सांप्रदायिक होकर वोट करें। विरोध होने पर शाजिया अपने इस विवादास्पद बयान पर माफी मांगने को भी तैयार नहीं हैं।

  अपने बयान पर सफाई में शाजिया ने जो कुछ कहा है, वह भी अनेक लोगों की नजरों में उन्हें क्लीन चीट नहीं देता। शाजिया के ऐसे बयान से सिर्फ भाजपा के बीच के अतिवादी तत्वों को ही राजनीतिक फायदा मिलेगा। जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार अब भी दिल्ली में भाजपा की मुख्य विरोधी पार्टी ‘आप’ ही नजर आती है। वाराणसी में भी मुख्य मुकाबले में मोदी और केजरीवाल ही अभी बताये जा रहे हैं।

 वाराणसी में भी भाजपा को शाजिया के बयान से बल मिल सकता है। क्योंकि एक रंग की सांप्रदायिकता दूसरे रंग की सांप्रदायिकता की खुराक पर पलती है।

  वहां कुछ निष्पक्ष लोग यह पूछ सकते हैं कि क्या उन्हें ऐसे दलों के बीच से ही चुनाव करना होगा जिन दलों में गिरिराज सिंह और शाजिया इल्मी जैसे नेता मौजूद हैं ?

याद रहे कि न तो शाजिया को ‘आप’ ने दल से निलंबित किया है और न ही भाजपा ने गिरिराज के खिलाफ कोई कार्रवाई की है।      

  शाजिया इल्मी एक ऐसी पार्टी की प्रमुख नेता हैं जो पार्टी देश के संविधान और कानून की दुहाई देती रही है। भारतीय संविधान हमें पंथनिरपेक्ष बने रहने की सीख देता है। आप नेता मनीष सिसोदिया ने शाजिया के बयान पर कहा है कि ‘हम सांप्रदायिक राजनीति में विश्वास नहीं करते। बल्कि हम भारत और सभी भारतीयों को एक करने में विश्वास करते हैं।’

पर, ‘आप’ की ओर से इतना ही कहा जाना काफी नहीं है।

    अनेक निष्पक्ष राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार कसूर को देखते हुए गिरिराज और शाजिया पर क्रमशः भाजपा व आप का रुख काफी नरम ही माना जा रहा है। ऐसे नरम रुख से बाद में इन दलों के कुछ अन्य अतिवादियोें की ओर से भी कुछ इस तरह के बयान आ सकते हैं।


अरविंद केजरीवाल ने बरती सावधानी

    हालांकि इससे पहले मुख्यमंत्री के रूप में अरविंद केजरीवाल ने बाटला हाउस एनकाउंटर की फिर से जांच कराने की मांग ठुकरा कर यह दिखा दिया था कि उनकी राजनीति एक तरफा नहीं है।

हाल में वाराणसी में मुख्तार अंसारी के समर्थन के सवाल पर भी केजरीवाल ने सावधानी बरती।

याद रहे कि विवादास्पद अंसारी के चुनाव मैदान से हट जाने के बाद वाराणसी में एक जाली चिट्ठी बंटी। वह चिट्ठी ‘आप’ की तरफ से अंसारी को लिखी बताई गई थी। उसमें लिखा गया था कि मुख्तार अंसारी के चुनाव मैदान से हट जाने के लिए आम आदमी पार्टी अंसारी का धन्यवाद देती है। अरविंद ने इसे जाली बताया। 

   आश्चर्य है कि जिस दल में योगेंद्र यादव और प्रो. आनंद कुमार जैसे समाजवादी विचारक हैं, उस दल के कुछ हलकों में एक तरफा बातें की जा रही हैं। तथा कुछ अन्य तरह की वैचारिक तथा अन्य तरह की अराजकता भी देखी जा रही है। दरअसल समाजवादी लोग दोनों रंगों की सांप्रदायिकताओं के खिलाफ रहे हैं।


प्रशांत भूषण का कश्मीर पर बयान

   इससे पहले अरविंद केजरीवाल प्रशांत भूषण के उस बयान से अपनी असहमति जाहिर कर चुके हैं जिसमें भूषण ने कश्मीर में जनसंग्रह की बात कही थी। हालांकि प्रशांत ने बाद में अपने बयान पर सफाई दी थी। पर उनकी सफाई भी कश्मीर में भारतीय सेना के रुख से मेल नहीं खाता। इसलिए प्रशांत के बयान व सफाई से आप की एक खास तरह की छवि बन रही है।

   यदि यही सब जारी रहा तो आप का कोई अन्य नेता कल बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के पक्ष में बयान दे सकता है जो उतना ही बुरा होगा।



(हिंदी दैनिक जनसत्ता के 24 अप्रैल 2014 के अंक में इस लेख का संपादित अंश प्रकाशित)