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शनिवार, 22 अगस्त 2020

‘गजवा ए हिन्द’ का सपना देखने वाले

चीन उइगर मुसलमानों का उत्पीड़न कर रहा है।

आखिर कितने मुस्लिम देशों ने इस मसले पर चीन का विरोध किया? चीन ने मुस्लिम देशों में भारी -भरकम निवेश किया हुआ है। वे जानते हैं कि पैसे धर्म से कहीं अधिक मूल्यवान है।


--तसलीमा नसरीन,दैनिक जागरण,


   22 अगस्त 2020

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दरअसल बात इतनी ही नहीं है। इस देश यानी भारत के जेहादी मुसलमान इस अत्याचार को लेकर चीन के खिलाफ क्यों नहीं बोल रहे हैं ? उन्हें तो किसी चीनी निवेश से कोई मतलब नहीं है।


किसी ने मुझे बताया कि दरअसल इस देश के जेहादी गण चीन को नाराज नहीं करना चाहते हैं।

नाराज करेंगे तो हिन्दुस्तान में इस्लामी शासन कायम करने में चीन उनकी मदद कैसे करेगा ?


‘गजवा ए हिन्द’ का सपना देखने वाले एक मुल्ला ने हाल में टी.वी. पर कहा भी कि जब हम ताकतवर होंगे तो राम मंदिर को तोड़कर फिर वहां बाबरी मस्जिद बना देंगे।


हौसला तो देखिए !!!


ऐसे ही उन्मादी जेहादियों के कारण नरेंद्र मोदी के सत्ता से हटने का दूर -दूर तक कोई संकेत नहीं मिल रहा है। 


सुरेंद्र किशोर-22 अगस्त 2020

सोमवार, 1 जून 2020

रंगदारों-भ्रष्टों के लिए कंपनी की ओर से 27 लिफाफे !!

कई साल पहले की बात है। मैं झारखंड गया था। वहां एक सामाजिक समारोह में शामिल होना था। एक बड़ी निजी कंपनी के वरीय पदाधिकारी से मुलाकात हुई। पहले सुन रखा था कि वे कंपनी के संचालन को लेकर परेशान रहते हैं। 
उस दिन पूछा,‘अब क्या हाल है ?’

उन्होंने कहा कि ‘अब पूरी शांति है।’ कैसे ? उनका जवाब था, ‘‘पहले 27 लिफाफे हर महीने बनाने पड़ते थे। अब एक ही लिफाफे से काम चल जाता है।’’

‘‘वह कैसे ?’’ मेरा सवाल था।

पहले संबधित सरकारी विभागों के अफसरों, स्थानीय रंगदारों, और नेताओं के लिए कुल 27 लिफाफे बनते थे। लिफाफे लेने वालों का व्यवहार भी बड़ा खराब रहता था। पर अब सिर्फ माओवादियों को लेवी देनी पड़ती है। माओवादियों के संरक्षण में चले जाने के बाद बाकी 27 डर
के मारे अब गायब हो गए है। इसलिए शांति से हमारा काम चल रहा है।

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अब सवाल है कि देश में हर जगह तो माओवादी हैं नहीं जो निजी कंपनियों को ‘थोड़े में’ निश्चिंतता प्रदान कर देंगे ? ऐसा नहीं कि 27 लिफाफे सिर्फ झारखंड में ही तैयार करने पड़ते हैं।

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सुना है कि चीन से एक हजार कंपनियां भारत आएंगी। उन कंपनियों को हमारी सरकारें ‘27 के चक्कर’ से कैसे बचाएंगी ? यदि नहीं बचाएंगी तो वे कंपनियां कब तक यहां टिकेंगी ?

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सुरेंद्र किशोर, 1 जून 2020

गुरुवार, 28 मई 2020

1962 का युद्ध चल रहा था और नेहरू के रिश्तेदार बीच में मैदान छोड़कर दिल्ली आ गए

तैयारियों के मामले में सन् 62 से हम आगे निकल चुके हैं।पर, अभी और आगे जाना है, देश के बाहरी-भीतरी दुश्मनों से मुकाबले के लिए

अपनी सैनिक गतिविधियों के जरिए पहले चीन ने सीमा पर तनाव बढ़ाया। पर, जब भारत ने यह जता दिया कि जरूरत पड़ने पर चीन से डटकर मुकाबला होगा, तो चीन ने नरम रुख अपना लिया। बहुत अच्छी बात है। युद्ध किसी के हक में नहीं है। यदि किसी को कम नुकसान होगा तो किसी को ज्यादा। पर नुकसान तो दोनों पक्षों का होता है। अब भारत 1962 वाला नहीं है

चीन भी समझ रहा है कि भारत अब 1962 वाला नहीं है। सन 62 में तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने कह दिया था कि हमें अफसोस है कि हम असम को नहीं बचा पा रहे हैं।

वैसी नौबत क्यों तब आ गई थी? क्योंकि हमारी सरकार अदूरदर्शी थी। आजादी के तत्काल बाद के वर्षों में हम हिंदी-चीनी भाई -भाई के नारे लगा रहे थे। दरअसल हम मुगालते में थे।

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1962 के युद्ध से ठीक पहले भारतीय सेना ने अपनी सरकार से एक करोड़ रुपए मांगे थे। सेना की कुछ बुनियादी जरूरतेें पूरी करने के लिए। पर ‘पंचशील’ के नशे में डूबी हमारी सरकार ने पैसे नहीं दिए। नतीजा क्या हुआ, वह देश के प्रमुख पत्रकार मनमोहन शर्मा के, जो अब भी हमारे बीच मौजूद हैं, शब्दों में पढ़िए--

‘एक युद्ध संवाददाता के रूप में मैंने चीन के हमले को कवर किया था। मुझे याद है कि हम युद्ध के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। हमारी सेना के पास अस्त्र, शस्त्र की बात छोड़िये, कपड़े तक नहीं थे। नेहरू जी ने कभी सोचा ही नहीं था कि चीन हम पर हमला करेगा।

एक दुखद घटना का उल्लेख करूंगा।

अंबाला से 200 सैनिकों को एयर लिफ्ट किया गया था। उन्होंने सूती कमीजें और निकरें पहन रखी थीं। उन्हें बोमडीला में एयर ड्राप कर दिया गया जहां का तापमान माइनस 40 डिग्री था। वहां पर उन्हें गिराए जाते ही ठंड से सभी बेमौत मर गए।

‘युद्ध चल रहा था, मगर हमारा जनरल कौल मैदान छोड़कर दिल्ली आ गया था। ये नेहरू जी के रिश्तेदार थे। इसलिए उन्हें बख्श दिया गया। हेन्डरसन जांच रपट आज तक संसद में पेश करने की किसी सरकार में हिम्मत नहीं हुई।’

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बाद के वर्षों में भी हमारी युद्ध तैयारी वैसी नहीं रही, जैसी होनी चाहिए थी। ‘कारणों’ का पता समय -समय पर चलता रहता था। हाल के वर्षों में कुछ तेजी जरूर आई है। पर वह भी अभी संतोषजनक नहीं है। जब तक सार्वजनिक धन भ्रष्टाचार में जाना जारी रहेगा, तक तक हम उतने सैनिक व असैनिक साजो- सामान से खुद को लैस नहीं कर पाएंगे, जितने की जरूरत देसी-विदेशी दुश्मनों से लड़ने के लिए है। हां, मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्रिमंडल स्तर से भ्रष्टाचार हटा है, पर अफसर स्तरों पर अभी काम बाकी है।

----सुरेंद्र किशोर-28 मई 2020 

बुधवार, 27 मई 2020

जरूरी नहीं तो नगरों में भीड़ बढ़ाने के बदले गांवों में बसें

जो काम आप इस देश की किसी छोटी जगह में रहकर भी कर सकते हैं, उसके लिए महानगरों में भीड़ न बढ़ाएं। कोरोना महामारी ने भी हमें यही सीख दी है, प्रवासी मजदूरों से लेकर अन्य लोगों को भी।

कोरोना विपत्ति तो समय के साथ गुजर जाएगी, पर, आने वाले दिनों में नगरों-महानगरों पर अन्य तरह के संकट भी आ सकते हैं। वे संकट कैसे होंगे, क्या होंगे, उनका स्वरूप क्या होगा, उसका थोड़ा-बहुत अंदाज मुझे है। पर, उस पर अभी कुछ कहना सही नहीं है।

मैं एक सामान्य आदमी हूं। एक छोटी जगह में रहकर वह सब कर लिया और कर रहा हूं जो मैं करना चाहता था। वैसे प्रारंभ से ही मेरी आकांक्षाएं सीमित ही रही हैं। सन 1977 और उसके बाद दिल्ली में बसने के लिए मुझे बारी -बारी से कम से कम पांच आफर -अवसर मिले थे। हर बार मैंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।

सन 1998 में तो अपनी बदली कैंसिल करवाकर दिल्ली से एक ही माह में पटना लौट आया था।
अब मैं मुख्य पटना नगर में भी नहीं, बल्कि पटना के पास के एक गांव में घर बना कर रहता हूं। नगर यहां तक भी धीरे -धीरे हमारा पीछा कर रहा है। पर, इसे भी नगर हो जाने में अभी समय लगेगा। 

यहीं से मैं वह सब काम कर सकता हूं, करता हूं जो करना चाहता रहा हूं। तकनीकी ने ऐसी सुविधा प्रदान कर दी है कि अब तो अपने पुश्तैनी गांव से भी सब काम कर सकता हूं। मैंने ‘टकू -टकू ट्राक -ट्राक’ के जमाने से पत्रकारिता शुरू की थी। टेलीग्राम यानी तार आज लगाने पर जरूरी नहीं कि दिल्ली आज ही मिल जाए। कई बार एक दिन बाद मिलता था।

वह भी एक जमाना था। पर आज बहुत फर्क आ गया है। मेरा पुश्तैनी गांव अभी तो सड़क मार्ग से मुख्य पटना से 45 किलोमीटर पर है। पर यदि प्रस्तावित पटना रिंग रोड बन गया तो वह दूरी करीब 30 किलोमीटर रह जाएगी। अभी जहां रहता हूं ,वहां प्रकृति के बहुत करीब हूं। मेरे घर के आसपास अनेक वृक्ष हैं। कुछ मैंने भी अपने परिसर में लगाए हैं।

पौधों को बढ़ते हुए देखने में भी एक अजीब सुख है। उनमें फल-फूल लगे हों तब तो बात ही कुछ और है। यहां दूर-दूर तक फैले खेत और इक्के -दुक्के मकान हैं। स्वच्छ हवा। दूध-सब्जी अपेक्षाकृत शुद्ध। हां, जब तक नौकरी में था, पटना में रहने की मजबूरी थी। पर 20 साल पहले ही योजना बना ली थी कि नगर के पास के किसी गांव में घर बनाऊंगा। मेरी योजना ‘विपत्ति में वरदान’ की तरह ही थी।

नगर में ऐसा आवास खड़ा करना जो खुला-खुला भी हो, मेरे जैसे सीमित आय वाले के लिए असंभव था। हां, मेरी शिक्षिका पत्नी के ‘सेवांत लाभ’ ने गांव में ठीक से बसने लायक साधन मुहैया करा दिया। हमारे आसपास के जो कुछ सज्जन नगर से आकर बसे हैं, उनमें भी एक दूसरे की मदद करने की भावना बनी हुई है। ऐसा महानगरों में कौन कहे, नगरों में भी विरल है।

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26 मई 2020

शनिवार, 23 मई 2020

राज्यसभा की सदस्यता ठुकरा दी थी आचार्य जी ने

सर्वोदय नेता आचार्य राममूर्ति की पुण्यतिथि पर



बात पुरानी है। पर मुझे पूरी तरह याद है। पटना के श्रीकृष्ण स्मारक भवन में सभा हो रही थी।
मंच पर वी.पी.सिंह, मुख्यमंत्री लालू प्रसाद और सर्वोदय नेता आचार्य राममूर्ति मौजूद थे। अपने भाषण में लालू प्रसाद ने कहा कि हमने और राजा जी यानी वी.पी. सिंह ने आचार्य जी से कहा था कि आप राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार कर लीजिए। पर आचार्य जी ने साफ मना कर दिया।
ऐसे निष्पृह समाजसेवी व्यक्ति थे आचार्य जी। 

स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी व सर्वोदय नेता आचार्य राममूर्ति का जन्म उत्तर प्रदेश के जौनपुर के एक संपन्न परिवार में 1913 में हुआ था। 20 मई 2010 को पटना में उनका निधन हुआ। वे वाराणसी के क्वीन्स कालेज में पढ़ाते थे। पर उन्होंने नौकरी छोड़कर समाज सेवा की राह पकड़ ली। बिहार को उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र बनाया।

जेपी के नेतृत्व में 1974 में जब बिहार आंदोलन शुरू हुआ तो आचार्य जी का जेपी के बाद आंदोलन के नेतृ वर्ग में दूसरा स्थान था। आंदोलन के दौरान जब जेपी इलाज के वेलौर गए थे तो उन्होंने कुछ समय के लिए आंदोलन की बागडोर आचार्य जी को ही सौंपी थी। स्वतंत्रता सेनानी और गांधीवादी आचार्य जी का पूरा जीवन लोगों के कल्याण के लिए समर्पित रहा। ऐसे नेता अब कम ही देखे जाते हैं।

बुधवार, 20 मई 2020

संबित पात्रा का होम वर्क कमजोर !


‘याद है ना दोस्तो, चारा घोटाला जिसमें ट्रक की जगह स्कूटर का रजिस्ट्रेशन नंबर दिया गया था।
आज ठीक उसी प्रकार बस के नाम पे दुपहिया वाहन और आटो का नंबर प्रियंका जी ने दिया है। प्रियंका वाड्रा लालू यादव जी से प्रेरित हैं।

----संबित पात्रा,

राष्ट्रीय प्रवक्ता,भाजपा

राष्ट्रीय सहारा, 20 मई 2020

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संबित पात्रा का होम वर्क आम तौर पर सही होता है। बातें रखने का उनका अंदाज भी मुझे पसंद है। पर पात्रा जी, इस मामले में आप गलत हैं। चारा घोटाले के जिस प्रकरण की आपने चर्चा की है, वह कांग्रेस शासनकाल में ही घटित हो चुका था।

यानी, लालू के सत्ता में आने से पहले ही बिहार की कांग्रेसी सरकार ‘स्कूटर पर सांड’ ढुलवा चुकी थी। यह बात अस्सी के दशक की है। सी.ए.जी.रपट में इसका खुलासा हुआ था।

‘द हिन्दू’ के बिहार संवाददाता रमेश उपाध्याय की तत्संबंधी रपट फोटोकाॅपी के साथ छपी थी। 
चारा घोटाले को लेकर लालू प्रसाद के शासनकाल की घटनाएं ऐसी साधारण नहीं ,बल्कि ‘असाधारण’ थीं।

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  -- सुरेंद्र किशोर - 20 मई 2020

वैकल्पिक राजनीति

जनपक्षधर कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के एनजीओकरण ने कुछ प्रदेशों में बेहतर और वैकल्पिक राजनीति की संभावना का कबाड़ा कर दिया! संघ-भाजपा को इससे बड़ा बल मिला! एनजीओ यहां सिर्फ शाब्दिक अर्थ में नहीं! अनेक एनजीओ अच्छा काम करते हैं और कर रहे हैं।

                   --वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, 19 मई 2020 

मंगलवार, 19 मई 2020

सरकार सबको बेहतरीन चाहिए

हम ऐसे देश में रहते हैं जहां सोसायटी वाले रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन को काम करने नहीं देते। विभाजित ग्रामीण समाज ग्राम पंचायत ठप कर देता है। बेतरतीब शहरी बस्तियां स्थानीय निकायों के लिए दुःस्वप्न बन जाती हैं। तमाम शहरी लोग मतदान को बोझ मानते हैं। फिर भी सरकार सबको बेहतरीन चाहिए।

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--कंचन गुप्त, दैनिक जागरण। 19 मई 2020 

रविवार, 17 मई 2020

ऐसे करें किसानों का भला !


देश की जीवन रेखा कृषि को इस कठिन दौर में बड़े राहत पैकेज की दरकार है। कर्ज पे कर्जा देने से समाधान नहीं निकलने वाला। किसानों को प्रत्यक्ष आय समर्थन देना होगा।

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 ---कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा,
    दैनिक जागरण,17 मई 2020

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मैं बिहार के सारण जिले के एक परिवार को जानता हूं जिसे 1976 से पहले सामान्य खर्चे चलाने के लिए भी अक्सर जमीन बेचनी पड़ती थी। सन 1976 में उस परिवार में एक व्यक्ति को मासिक 125 रुपए पर सरकारी नौकरी मिल गयी। उसके बाद जमीन बिकनी बंद हो गई। याद रहे कि 1976 के एक सौ रुपए आज के 2463 रुपए के बराबर है।

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यदि सरकार किसान परिवार को इतनी नकदी देने में असमर्थ है तो वह फिलहाल एक बीच का रास्ता निकाल सकती है। केंद्र व राज्य सरकारें ऐसे किसान परिवारों के लिए सरकारी नौकरियों में कुछ सीटें आरक्षित कर दे जिस परिवार से कोई भी व्यक्ति सरकारी या निजी नौकरी में नहीं है।
यदि ऐसा हुआ तो उस परिवार की क्रय शक्ति बढ़ जाएगी। फिर वह कुछ करखनिया उत्पाद भी खरीदने की स्थिति में हो जाएगा। उससे अतिरिक्त कारखाने भी खुलेंगे। उनमें भी नौकरियां मिलेंगी।  


----सुरेंद्र किशोर--17 मई 2020

बुधवार, 13 मई 2020

जन भावना की उपेक्षा नुकसानदेह

1.-जिन राजनीतिक दलों और नेताओं ने तब्लीगी जमात और पाॅपुलर फ्रंट आफ इंडिया के कारनामों की आलोचना नहीं की, या, परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से उनका बचाव किया, उनका राजनीतिक सह चुनावी भविष्य फिलहाल अनिश्चित हो गया लगता है। भविष्य में राजनीति कौन सा मोड़ लेगी,यह नहीं कहा जा सकता। पर मैं तो आज की स्थिति बता रहा हूं। आज आम लोगों के बोल-वचन से तो यही संकेत मिल रहा है। अब भी समय है, गलती सुधारने के लिए।

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2.-कई साल पहले तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग व राजनीतिक -गैर राजनीतिक संगठन, एक खास बहाना बनाकर केंद्र और कुछ राज्यों की विवादास्पद सरकारों का समर्थन व बचाव कर रहे थे।
ऐसी सरकारों व नेताओं का, जिन पर भ्रष्टाचार, वंशवाद और तुष्टिकरण के आरोप लग रहे थे।
तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्ष’ लोगों का तर्क था कि हम क्या करें ? हमारी मजबूरी है।

-हालांकि उनकी धर्मनिरपेक्षता एकांगी ही रही है ।-

वे कह रहे थे कि हम सांप्रदायिक ताकतों को यानी भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए ऐसा कर रहे हैं। उनसे तब यह कहा जा रहा है कि ऐसे में तो आप न भाजपा को रोक सकेंगे और न ही खुद के अस्तित्व को बचा सकेंगे। क्योंकि अधिकतर जनता की भावना आपके खिलाफ है। फिर भी वे नहीं माने। नतीजा सामने है।

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3. सन 1990 के मंडल आरक्षण के समय आरक्षण विरोधियों ने जब मंडल आरक्षण का विरोध शुरू किया तो उन्हें सवर्णों के बीच के कुछ विवेकशील लोग समझा रहे थे --‘गज नहीं फाड़िएगा तो थान हारना पड़ेगा।’ पर, वे नहीं माने। उनका विरोध जारी रहा। भीषण प्रतिक्रिया हुई। नतीजा सबने देखा। अनेक लोगों ने भोगा भी !

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‘कहानी’ का ‘मोरल’ यह है कि जनभावना की उपेक्षा लोकतंत्र में अक्सर  नुकसानदेह ही साबित होती है। संभव है कि कुछ लोगों को मेरी ये बातें अच्छी नहीं लगें। पर ऐतिहासिक अवसरों पर ऐसी बातें कह दी जानी चाहिए। मंडल आरक्षण के समय बिहार विधानसभा के प्रेस रूम की बैठकी में मैं अक्सर यह कहा करता था कि आरक्षण का विरोध मत कीजिए। गज नहीं फाड़िएगा तो थान हारना पड़ेगा। पूर्व कांग्रेसी विधायक हरखू झा इस बात के गवाह हैं। 

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--सुरेंद्र किशोर -- 13 मई 2020

बिहार विधान परिषद की राह सुरक्षित


जो नेता यह समझते हैं कि उनके लिए आगे भी बिहार विधान मंडल के किसी न किसी सदन का 
सदस्य बने रहना जरूरी है, वे अगले द्विवार्षिक चुनाव में विधान परिषद के सदस्य बन जाएं।
क्योंकि कुछ लोगों के लिए बाहर की राजनीतिक हवा अभी अनिश्चित दिखाई पड़ रही है।

किसके लिए अनिश्चित है, इस पर कुछ कहना अभी ठीक नहीं है। याद रहे कि मैं न तो किसी दल का नाम ले रहा हूं और न ही किसी नेता का। इसलिए इस पोस्ट पर किसी को नाराज हो जाने का कोई आधार नहीं बनता है।

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सुरेंद्र किशोर--10 मई 2020

मंगलवार, 12 मई 2020

पत्रकारिता के लिए नया संकट काल

पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए नया संकट काल चल रहा है। संपादकों, पत्रकारों पर देश के अलग- अलग हिस्सों में मुकदमे किए जा रहे हैं। इनके पीछे सरकारें, पार्टियां हैं। इसके शिकार पहले वामपंथी माने जाने वाले संपादक हो रहे थे। अब कथित दक्षिणपंथियों की बारी है। यह बेहद खतरनाक है।

---राहुल देव, जनसत्ता के पूर्व संपादक।

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केरल पुलिस ने जी.न्यूज के सुधीर चौधरी के खिलाफ गैर जमानती धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया है। ठीक है। किसी को भी किसी से शिकायत है तो उसे मुकदमा करने का पूरा अधिकार है। पर, एक हिन्दी न्यूज चैनल के खिलाफ गैर हिन्दी राज्य में मुकदमा ?!!! क्योंकि वहां सी.पी.एम. की सरकार है ? यह बात कुछ हजम नहीं हुई !!!

किसी हिन्दी राज्य की पुलिस-अदालत पर भरोसा नहीं रहा? सारे हिन्दी राज्यों में भाजपा का शासन तो है नहीं।

---सुरेंद्र किशोर

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11 मई 2020

रविवार, 10 मई 2020

मेरी लघु साइकिल यात्रा !

मुझे भी अपनी एक लघु साइकिल यात्रा की याद आ गई। प्रवासी मजदूरों की लंबी-लंबी तकलीफदेह साइकिल यात्राओं के चित्र अखबारों में देखने के बाद ऐसा हुआ। पर, मेरी यात्रा तो मात्र 57 किलोमीटर की थी। पर, उसी से ऐसी यात्रा की तकलीफ का अनुभव हुआ।

वह यात्रा थी--आरा से पटना के बीच। 1963 की बात है। तब मैं आरा में पढ़ता था। एक दिन मेरे मित्र और सहपाठी रामकुमार गुप्ता ने कहा कि ‘चलो पटना सिनेमा देखने।’ दरअसल उन दिनों आरा में सिर्फ दो ही सिनेमा हाॅल थे--रूपम और मोहन। पता नहीं, आज कितने है !

वहां कितना देख पाते सिनेमा !! वह उम्र ही थी सिनमा देखने की। अब तो दशकों हो गए सिनेमा हाॅल गए। खैर, हम दोनों एक ही साइकिल पर पटना के लिए चल दिए। कभी मैं साइकिल चलाता और वह सहयात्री होता तो कभी वह चलाता और मैं सहयात्री। आरा से पटना तक की यात्रा तो हमने पूरी कर ली। ‘पर्ल’ में सिनेमा देखा। फिर साइकिल से ही आरा लौटने लगा। पर हमलोग थककर चूर हो चुके थे। दानापुर पहुंचकर ट्रेन पर साइकिल लादी और आरा वापस।

अब अंदाज लगाइए,उन मजदूरों की तकलीफों की। सैकड़ों किलोमीटर की साइकिल यात्राओं के बाद वे घर लौट रहे हैं। यह जरुर है कि वे हम लोगों की तरह सुकुमार नहीं हैं। रामकुमार गुप्त तो आरा के एक बहुत बड़े व्यापारी परिवार का है। पिछले कई वर्षों से रामकुमार से मेरा कोई संपर्क नहीं है। पर, उसकी याद आती है।

जीवन के जिस मोड़ पर जब जहां जो मिला, मित्र बना या परिचित, उनमें से अधिकतर बारी -बारी से यदाकदा मुझे याद आते रहते हैं। उम्मीद है कि और लोगों को भी अपने मित्र याद आते होंगे। वह भी निःस्वार्थ भाव से !

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--सुरेंद्र किशोर - 10 मई 2020

शुक्रवार, 1 मई 2020

उनके जन्मदिन पर मधु लिमये की याद में

इस अवसर पर उनके बारे में कुछ बातें!

वे बिहार से बारी -बारी से चार बार लोकसभा सदस्य चुने गए थे। उनके बारे में अनेक लोग कई बातें तो पहले से ही जानते हैं। पर, कुछ जिज्ञासु लोग अब भी एक सवाल अक्सर करते हैं। वह यह कि सन 1977 में मधु लिमये मोरारजी देसाई मंत्रिमंडल में शामिल क्यों नहीं हुए ? क्या मोरारजी ने उनके नाम पर एतराज किया था ?

इस सवाल का जवाब दिया था उनकी पत्नी चंपा लिमये ने। चंपा जी के अनुसार, ‘‘मोरारजी देसाई ने मधु जी से कहा था कि तुम, जार्ज और मधु दंडवते में से दो लोग मुझे चाहिए अपने मंत्रिमंडल में। पर मधु लिमये ने मोरारजी से कहा कि आप जार्ज फर्नांडिस और मधु दंडवते को शामिल कर लीजिए।’ वे शामिल हुए भी।

मधु लिमये ने इसका यह कारण बताया था, ‘‘ जार्ज पर बड़ौदा डायनामाइट केस चल रहा है।
एक मानी में वह केस उसपर टंगी हुई तलवार है। और बाहर रहकर वह रेल हड़ताल आदि कामों से जनता सरकार को परेशानी में डाल देगा। इसलिए जार्ज को मंत्रिमंडल में शामिल करके उसे रचनात्मक काम करने देना चाहिए।’’


1 मई, 2020 के प्रभात खबर, पटना में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से।

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मधु लिमये के बारे में कुछ अन्य जानकारियां -

1.-मधु जी दो बार मुंगेर और दो बार बांका से लोकसभा के सदस्य चुने गए थे।

दो बार उप चुनाव में जीते और दो बार जनरल चुनाव में।

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2.-बिना हंगामा किए और सदन के वेल में गए बिना मधु लिमये ने लोकसभा में जितनी कारगर भूमिका निभाई थी, वह एक रिकाॅर्ड है। जब वे सदन में बोलने के लिए खड़े होते थे तो सत्ताधारी बेंच में सिहरन होने लगती थी-- पता नहीं आज किस मंत्री की बारी है ! 

3.-मधु लिमये ने जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता का सवाल उठाया था। वे पार्टी के महासचिव थे।

जब उन्होंने देखा कि भारतीय मजदूर संघ और विद्यार्थी परिषद जनता पार्टी के क्रमशः मजदूर संगठन और छात्र-युवा संगठन की बैठकों में शामिल नहीं हो रहे हैं तो उन्होंने इस सवाल को उठाने की अधिक जरूरत महसूस की।

वैसे 1976 में ही चौधरी चरण सिंह ने दोहरी सदस्यता का सवाल उठाया था जब कई दलों को मिलाकर जनता पार्टी का गठन हो रहा था।

4.-यह कहना सही नहीं है कि दोहरी सदस्यता के सवाल पर ही जनता पार्टी की मोरारजी सरकार गई और पार्टी का विभाजन हुआ। यह भी कहना सही नहीं है कि चौधरी चरण सिंह के कारण देसाई सरकार गई। दरअसल इतनी राजनीतिक ताकत चरण सिंह में तब तक रह भी नहीं गई थी।

मोरारजी सरकार तब गई जब जनता पार्टी ने 1979 के फरवरी से लेकर जून तक तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को उनके पदों से हटा दिया। वे मुख्यमंत्री थे राम नरेश यादव-उत्तर प्रदेश, कर्पूरी ठाकुर-बिहार और देवी लाल-हरियाणा। उससे पहले मोरारजी ने चरण सिंह को मंत्री पद से अगस्त, 1978 में ही हटा दिया था। राज नारायण भी मंत्रिमंडल से बाहर कर दिए गए। इसके बावजूद देसाई सरकार नहीं गिरी।

फिर चरण सिंह देसाई मंत्रिमंडल में जनवरी, 1979 में शामिल भी हो गए। जबकि चरण सिंह को इस दफा गृह जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय के बदले वित्त दे दिया गया। फिर भी सरकार नहीं गिरी।उधर राज नारायण जी को फिर से मंत्री बनाने की मांग भी मोरारजी ने नहीं मानी थी। फिर भी देसाई सरकार नहीं गिरी।

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हां, जब तीन मुख्यमंत्रियों को हटाया गया तो संबंधित राज्यों के वे जनता सांसद भी विद्रोही हो गए जो तब तक नहीं हुए थे। हां, उसका लाभ जरूर चरण सिंह को मिला और वे इंदिरा गांधी की मदद से प्रधानमंत्री बन गए।

पर, चरण सिंह अपने ढंग के नेता थे। उनपर ‘चेयर सिंह’ होने का आरोप मुझे सही नहीं लगता है। उन्होंने इंदिरा गांधी के दबाव में आकर मुकदमे उठाने से साफ इनकार कर दिया। नतीजतन उनकी गद्दी जल्दी ही चली गई। कांग्रेस की कठपुतली बनकर कुछ और दिन तो पद पर बने ही रह सकते थे। हालांकि उधर इंदिरा जी भी जल्दीबाजी में ही थीं। याद रहे कि पहले के अनेक नेता ‘उद्धव ठाकरे’ जैसों से साफ अलग थे।

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कुछ मामलो में मधु लिमये का तो कोई मुकाबला ही नहीं था। मधु जी पूर्व सांसद और स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन के हकदार थे। पर, वे जिस तरह राज्यसभा में जाने के खिलाफ थे, उसी तरह पेंशन के भी। इसलिए अखबारों में लेखन से जो पारिश्रमिक उन्हें मिलता था, उसी से उनका खर्च चलता था। वे दिल्ली की गर्मी और सर्दी में भी बिना ए.सी. के रहते थे।

उनके पास कोई कार नहीं थी। आटो से कहीं जाते थे। उनके पास कोई जाता था तो वे खुद ही काॅफी बना कर पिलाते थे। शाम में ही लोगों से मिलते थे। सुबह में कोई जाता था तो वे हाथ जोड़ लेते थे--कहते थे, ‘अभी मेरे लिखने का समय है। शाम में आइएगा।’

सक्रिय राजनीति से अलग इसलिए भी हुए क्योंकि कलही समाजवादी नेताओं के लगातार आपसी झगड़े फरियाने के काम से वे ऊब चुके थे। एक संपादक ने मुझे बताया था कि जब देरी होती थी तो मधु जी पारिश्रमिक के लिए फोन भी कर दिया करते थे।

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सुरेंद्र किशोर
1 मई 2020

कोटा स्थित कोचिंग संस्थान

कोरोना महामारी के कारण पूरी तरह बदली हुई परिस्थिति में कोटा स्थित कोचिंग संस्थानों को बिहार की ओर अब रुख करना चाहिए।

यदि वहां के नामी-गिरामी मूल संस्थान खुद यहां नहीं आ सकते तो उन्हें पूरी गुणवत्ता की गारंटी के साथ पटना में स्थानीय शाखा खोलने के लिए प्रामाणिक फ्रेंचाइजी की तलाश करनी चाहिए।

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--सुरेंद्र किशोर-

अप्रैल 2020

अर्नब --गोस्वामी--के खिलाफ डेढ़-दो सौ एफआइआर

‘‘....... अर्नब --गोस्वामी--के खिलाफ जो डेढ़-दो सौ एफआइआर दर्ज हुई हैं, वे इसीलिए दर्ज हुईं कि सोनिया जी का नाम लेने की हिम्मत की। जो सोनिया जी का नाम लेगा उसकी हिम्मत तोड़ना और सबक सिखना जरूरी है। वास्तव में दरबारी कांग्रेसियों की आंखें सोनिया जी की विराटता देखने की इतनी आदी हो चुकी हैं कि कि उन्हें सूक्ष्म दिखता ही नहीं। उन्हें सोनिया के जन्म के देश और शादी के पूर्व का नाम लेना नाकाबिले बर्दाश्त लगता है।

अर्नब ने वह किया जो पहले किसी ने नहीं किया। उन्होंने इस तिलिस्म को तोड़ दिया कि ‘परिवार’ के बारे में कोई कुछ व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं कर सकता। आप इस देश के प्रधानमंत्री को गाली दीजिए। संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के बारे में कुछ भी बोलिए, वह सब संविधान में मिली वाणी की स्वतंत्रता के दायरे में आता है।

आप चाहें तो इस देश के खिलाफ भी बोल सकते हैं। इसे आपका मौलिक अधिकार माना जाएगा,जिसे कोई छीन नहीं सकता। पर कांग्रेस की नजर में भारतीय संविधान का एक अलिखित अनुच्छेद है जो लिखे हुए संविधान से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है और वह यह कि ‘परिवार’ संवैधानिक व्यवस्थाओं और कानून से ऊपर है।

आज जिस तरह की पत्रकारिता और खास कर टीवी पत्रकारिता हो रही है उसमें कोई यह दावा नहीं कर सकता कि उसकी कमीज दूसरे से ज्यादा सफेद है। कोई लुटियन मीडिया की बात करता है तो कोई गोदी मीडिया की। अपना -अपना एजेंडा बेचने का समय है।

पत्रकारिता का प्रमाणपत्र बांटने का धंधा तेजी पर है। क्षण भर में घोषणा हो जाती है कि फलां पत्रकार को तो मैं पत्रकार मानता ही नहीं। समर्थन -विरोध की एक मुहिम चल पड़ती है। मुहिम चलाने वाले कभी अपने गिरेबां में नहीं झांकते।...........।’’

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आज के दैनिक जागरण में प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह के लेख का एक अंश।

30 अप्रैल 2020

मंगलवार, 31 मार्च 2020

कोरोना : मौत के साथ गिद्ध भी तो आएंगे ही !

नये -पुराने ‘गिद्धों’ की संक्षिप्त कहानी

कई दशक पहले की बात है। उत्तर बिहार में भारी बाढ़ आई हुई थी। प्रजा में हाहाकार मचा था।
आसपास के राज्यों से राहत सामग्री पटना पहुंच रही थी। स्वाभाविक है कि गिद्ध भी खूब सक्रिय हो उठे थे। इधर का माल उधर हो रहा था।

उधर सभी बाढ़पीड़ितों तक राहत सामग्री जरूरत से कम पहुंच पा रही थी। कैसे पहुंचेगी? इस बीच मंत्री बना एक गिद्धराज ‘राजा’ से नाराज हो गया। ‘गिद्धराज’ को शिकायत थी कि उन्हें कम ‘मौके’ नहीं मिल पा रहे थे। राजा ने किसी को आदेश दिया-दो ट्रक माल मंत्री जी के घर पहुंचा दिया जाए। पहुंचा दिया गया।

मंत्री जी ने उसे औने -पौने दाम में व्यापारियों को बेच दिया। उन्हीं व्यापारियों ने फिर अधिक दाम पर उसे अत्यंत जरूरतमंद बाढ़पीड़ितों तक पहुंचवा दिया।

मौजूदा कोरोना विपत्ति में जब पता चला कि पटना के पास के एक गांव में शासन ने एक्सपायरी डेट का डेटाॅल बंटवा दिया तो कुछ जागरूक लोग नाराज हो गए। स्वाभाविक ही है। जान से खिलवाड़ ???

अरे भई, अभी तो जानकारियों की शुरुआत हुई है। आगे-आगे देखते जाइए गिद्धो-महा गिद्धों
की चोंच का कमाल !! पक्षीराज गिद्ध की भले कमी हो रही है। पर मनुष्य के रूप में गिद्धों की संख्या तो बढ़ती ही जा रही है।

अन्यथा, आजादी के बाद इस देश को एक बार फिर सोने का चिड़िया बनने से भला कौन रोक सकता था! सिर्फ 1947 से 1985 के बीच में सौ पैसे घिसकर 15 पैसे नहीं हो गये होते तो आज स्वास्थ्य संबंधी आधारभूत संरचना की जो भारी कमी महसूस की जा रही है, वह कमी रहती ?!!

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---सुरेंद्र किशोर--31 मार्च 2020

मंगलवार, 10 मार्च 2020

इंदिरा गांधी और बाबर का मकबरा

देश के सबसे बुजुर्ग पत्रकार माननीय मनमोहन शर्मा जब कुछ लिखते हैं तो मैं उसे बहुत ध्यान से पढ़ता हूं। मेरे एक पोस्ट पर उनकी एक टिप्पणी देखकर मैंने नटवर सिह की किताब निकाली।पढ़कर देखा तो पाया कि शर्मा जी सही हैं।

‘‘एक ही जिंदगी काफी नहीं’’ नामक पुस्तक के पेज नंबर -118 पर नटवर सिंह ने लिखा है, ‘‘श्रीमती इंदिरा गांधी के एक दोपहर थोड़ा समय खाली था और उन्होंने तय किया कि वे मेरे साथ ड्राइव पर चलेंगीं। काबुल से बाहर, कुछ मील की दूरी पर उन्हें एक जीर्ण -शीर्ण इमारत दिखाई दी जो कुछ पेड़ों से घिरी थी।

उन्होंने अफगान सुरक्षा अधिकारी से पूछा कि वह क्या है? उसने बताया कि वह बाबर का मकबरा है। श्रीमती गांधी ने वहां जाने का निर्णय किया। प्रोटोकाॅल विभाग के लिए मुसीबत हो गई। क्योंकि उन्होंने वहां कोई सुरक्षा प्रबंध नहीं किए थे। हम बाबर के मकबरे की ओर चल दिए। वे मकबरे के सामने खड़ी हुईं और हल्का सा सिर झुकाया। मैं उनके पीछे खड़ा था। वे बोलीं, ‘‘मैं इतिहास को महसूस कर रही थी।’’

बुधवार, 18 सितंबर 2019

तब कार स्टेट्स सिम्बल हुआ करती थी, अब ओला और उबेर बेहतर


कोटक महिंद्रा बैंक के एम.डी. उदय कोटक ने कहा है कि मैंने जब अपना कैरियर शुरू किया था, तब कार स्टेट्स सिम्बल हुआ करती थी। पर, मेरे पुत्र को ओला और उबेर बेहतर लगते हैं।
ओला की सेवाएं इस देश के 63 नगरों-महा नगरों  में उपलब्ध हैं। उबेर 36 छोटे -बड़े नगरों में उपलब्ध हैं।

यदि इनकी सेवाओं का विस्तार होता गया तो सड़कों पर भीड़ कम होगी। मेरे पड़ोसी भी ओला या उबेर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनके घर तक पहुंचाने के लिए तो ये सेवाएं उपलब्ध हैं। पर, घर से ले जाने के लिए नहीं। जो व्यक्ति एक बार ओला या उबेर को अपना घर दिखा दे, उसके बुलाने पर ओला उबेर को पिकअप करने के लिए पहुंचे, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।

वैसे कुछ नगरों में तो अब ओला बाइक भी उपलब्ध हैं।

मंगलवार, 17 सितंबर 2019

जनसत्ता के पूर्व संपादक राहुल देव ने लिखा है कि
‘‘हमारे मंत्री, उच्चाधिकारी, मठाधीश हिंदी को सबकी, हर भारतीय की मातृभाषा कहना कब बंद करेंगे ?
यह तथ्य नहीं है। भारत में कई हजार मातृभाषाएं हैं।
यह बात उनकी भाषा संतानों को चुभती है।
हिंदी देश व देशवासियों की संपर्क भाषा है, राजभाषा है 
इतना काफी है।’’