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गुरुवार, 20 अगस्त 2020

राजीव गांधी -: संभावनाओं का असमय अंत

जन्मदिन पर


सन 1984 में प्रधानमंत्री बनने से पहले ही राजीव गांधी की छवि ‘मिस्टर क्लिन’ की बननी शुरू हो गई थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से दो महत्वपूर्ण बातें कह दीं। उन बातों से लगा कि वे इंदिरा गांधी की कमी को भी पूरा कर देंगे।


इंदिरा गांधी भ्रष्टाचार के प्रति सहिष्णु थीं। इस देश के लिए उस सबसे बड़े मर्ज के बारे में श्रीमती गांधी कहती थीं कि ‘‘भ्रष्टाचार तो वर्ल्ड फेनोमेना है।’’ यानी, यह जब पूरे विश्व में है तो यहां भी है, फिर इसमें कौन सी बड़ी बात है ?


इसके उलट राजीव गांधी ने ‘‘सत्ता के दलालों’’ के खिलाफ जोरदार आवाज उठा दी। उन्होंने एक अन्य अवसर पर यह भी कह दिया कि केंद्र सरकार दिल्ली से 100 पैसे भेजती है, किंतु गांव तक उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही पहुंचते हैं। उससे पहले देश के तीन राज्यों के विवादास्पद कांग्रेसी मुख्यमंत्री जब एक साथ हटा दिए गए थे तो यह कहा गया कि इसके पीछे पार्टी महासचिव राजीव गांधी का ही हाथ है। उन्हें भ्रष्टाचार पसंद नहीं है।


इन बातों से अनेक लोगों में यह धारणा बनी कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक कदम उठाएंगे।

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पर, अंततः ऐसा नहीं हो सका। कई कारणों से प्रधानमंत्री के रूप में उनके कदम डगमगाने लगे।

राजनीतिक रूप से दूरदर्शी लोगों को लगने लगा कि मिस्टर क्लीन से जो उम्मीद की गई थी, वह पूरी नहीं होती लगती है। यानी एक विराट संभावना का असमय अंत होने लगा।

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राजीव की पहली गलती

बोफर्स तोप सौदा घोटाला और एक-एक कर अन्य घोटाले सामने आने लगे। सर्वाधिक चर्चा बोफर्स की हुई क्योंकि उसके दलालों में एक क्वात्रोचि इटली का था। उसकी प्रधानमंत्री के आवास में किसी सुरक्षा जांच के बिना सीधी पहुंच थी। 

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दूसरी गलती

1989 के भागलपुर सांप्रदायिक दंगे के समय वहां के विवादास्पद एस.पी. का तबादला प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने रुकवा दिया। मुख्यमंत्री से पूछे बिना। दंगे के दौरान ही मुख्यमंत्री ने तबादला कर दिया था। तबादला रुकने के बाद और अधिक हत्याएं हुईं। नतीजतन कांग्रेस का वोट बैंक पूरे देश में उससे अलग हो गया।

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तीसरी गलती

1990 में जब मंडल आरक्षण आया तो कांग्रेस हाईकमान को उस पर कोई स्टैंड लेना था। ‘‘राजीव गांधी के कहने पर मणिशंकर अय्यर ने आरक्षण पर एक प्रस्ताव तैयार किया। उसमें कहा गया था कि आरक्षण को पूरी तरह ठुकरा दिया जाना चाहिए।


मणि द्वारा तैयार प्रस्ताव पर कांग्रेस कार्यसमिति व राजनीतिक मामलों की समिति की साझी बैठक में विचार होना था। प्रस्ताव पेश होते ही समिति में शामिल पिछड़ी जाति के नेताओं ने मणि द्वारा तैयार प्रस्ताव का कड़ा विरोध कर दिया।’’

--इंडिया टूडे-30 सितंबर 1990


इस पर राजीव दुविधा में पड़ गए। फिर भी उनपर मणिशंकर अय्यर का असर कायम रहा। मंडल आरक्षण पर राजीव गांधी ने संसद में तीन घंटे तक भाषण किया। उस भाषण से इस देश के अधिकतर पिछड़ों को ऐसा लगा कि कांग्रेस आरक्षण का दिल खोलकर समर्थन नहीं कर रही है।


1989 के बाद एक बार फिर 1991 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला। उसके बाद तो किसी चुनाव में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला।

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राजीव गांधी अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर में सच्चे, सहृदय और शालीन नेता के रूप में उभरे थे। वे कोरे कागज थे। लोगबाग उनसे प्रभावित भी थे। किंतु अपनी अनुभवहीनता या गलत सलाहकारों के कारण संभावनाओं का असमय अंत हो गया।

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कहानी का मोरल --

यदि भविष्य में किसी ऐसे ही कोरे कागज नुमा नेता को जिसके खिलाफ कोई शिकायत न हो, मौका मिले तो वह राजीव की खूबियों के साथ-साथ गलतियों को भी याद रखें, उनसे सबक लें, अच्छा करेंगे।

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--सुरेंद्र किशोर 20 अगस्त 2020

मंगलवार, 2 जून 2020

भारतेंदु हरिश्चंद्र और खड्गविलास प्रेस

महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘सत्य हरिश्चंद्र’ नाटक पढ़ने से उनके जीवन में निर्णायक मोड़ आ गया। नई पीढ़ी के कम ही लोग जानते हैं कि इसके लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनाएं पटना के खड्ग विलास प्रेस में ही छपी थींं।अब वह प्रेस तो नहीं है,पर आधुनिक हिंदी को उस प्रेस का योग दान अद्भुत है।उन्नीसवीं सदी के उतरार्ध में पटना का वह प्रेस बिहार का गौरव था। उस प्रेस और प्रकाशन संस्था पर शोध करके डाक्टरेट की उपाधि हासिल करने वाले डा.धीरेंद्र नाथ सिंह लिखते हैं, ‘आधुनिक हिंदी साहित्य को उजागर करने में इस प्रेस के योगदान का ऐतिहासिक मूल्य है।’ दिवंगत डा.सिंह ने आधुनिक हिंदी के विकास में खड्ग विलास प्रेस के विशिष्ट अवदान का मूल्यांकन किया था। इस विषय पर बिहार राष्ट्र भाषा परिषद द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘आधुनिक हिंदी के विकास में खड्ग विलास प्रेस की भूमिका’ में डा.सिंह ने लिखा है कि ‘उत्तर प्रदेश के बलिया निवासी महाराजकुमार राम दीन सिंह ने सन् 1880 में पटना के बांकी पुर में खड्ग विलास प्रेस की स्थापना की थी।उन्होंने अपना जीवन शिक्षक के रूप में आरम्भ किया था तथा पाठ्य पुस्तकों और हिंदी पुस्तकों के अभाव ने उन्हें प्रकाशन व्यवसाय के लिए प्रेरित किया था।उन्होंने स्वयं पाठ्य पुस्तकें तैयार कीं और अन्य लोगों से पुस्तकें लिखवाईं।इन कृतियों का प्रकाशन खड्ग विलास प्रेस ने किया।भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र और उनके युग के लेखक यदि आधुनिक हिंदी साहित्य के निर्माता हैं तो निश्चय ही खड्ग विलास प्रेस और उसके संस्थापक को उनका एकमात्र प्रकाशक माना जाना उचित होगा।यदि महाराज कुमार राम दीन सिंह का सद्भाव और सहयोग न मिला होता तो भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन साहित्यकारों को अपनी रचनाओं के व्यवस्थित प्रकाशन का इतना अच्छा सुयोग नहीं मिला होता।’ ‘इस प्रकाशन संस्थान ने भारतेंदु हरिश्चंद्र,पंडित प्रताप नारायण मिश्र,पंडित अम्बिका दत्त व्यास,पंडित शीतला प्रसाद त्रिपाठी,भारतीय सिविल सेवा में हिंदी के प्रतिष्ठापक फ्रेडरिक पिंकाट,आधुनिक हिंदी खड़ी बोली के प्रथम महा काव्य प्रिय प्रवास के प्रणेता पंडित अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔंध’, पंडित दामोदर शास्त्ऱी सपे्र, लाल खड्ग बहादुर मल्ल, शिव नंदन सहाय प्रभृति साहित्यकारों को प्रकाशकीय संरक्षण प्रदान किया और उनकी कृतियों के प्रकाशन पर मुक्तहस्त से व्यय किया।’ ‘हिंदी भाषी प्रदेशों में सबसे पहले बिहार प्रदेश में सन् 1835 में हिंदी आंदोलन शुरू हुआ था।इस अनवरत प्रयास के फलस्वरूप सन् 1875 में बिहार में कचहरियों और स्कूलों में हिंदी प्रतिष्ठित हुई, किंतु पाठ्््य पुस्तकों का सर्वथा अभाव था।खड्ग विलास प्रेस ने विभिन्न विषयों में पाठ्य पुस्तकें तैयार करा कर इनका प्रकाशन किया।साहब प्रसाद सिंह,उमानाथ मिश्र,चण्डी प्रसाद सिंह,काली प्रसाद मिश्र,प्रेमन पांडेय प्रभृति लेखकों ने इस दिशा में सक्रिय रूप से सहयोग किया था।साहब प्रसाद सिंह की ‘भाषा सार’ नामक पुस्तक सन् 1884 से 1936 तक बिहार के स्कूलों और कालेजों में पढाई जाती रही। राम दीन सिंह का बचपन पटना जिले के तारण पुर गांव में बीता जहां उनके मामा का घर था।राम दीन सिंह के पुत्र सारंगधर सिंह भी एक बुद्धिजीवी राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी थे।वे सन् 1937 में डा.श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में बने मंत्रिमंडल में संसदीय सचिव थे।बाद में वे बिहार से संविधान सभा के सदस्य बने।उन्होंने 1952 से 1962 तक पटना को लोक सभा में प्रतिनिधित्व किया।रामदीन सिंह से भारतेंदु हरिश्चंद्र के आत्मीय संबंध की झलक उनके आपसी पत्र -व्यवहार से भी मिलती है। 23 सितंबर 1882 को भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बाबू राम दीन सिंह को लिखा,‘आपका पत्र और तार मिला।आपने जैसा अनुग्रह इस समय किया,वह कहने के योग्य नहीं,चित्त ही साक्षी है।आज शनिवार की दोपहर है।अब तक बाबू साहब प्रसाद सिंह नहीं आए।शाम तक या रात तक शायद आवें।यद्यपि इस अवसर पर फिर आपको कुछ लिखना निरा झख मारना है किंतु अत्यंत कष्ट के कारण लिखता हूं।हो सके तो एक सौ और भेज दीजिए।जो काम कमबख्त दरपेश है नहीं निकलता और मैं यहां किसी से उसका जिक्र तक नहीं किया चाहता इसी से फिर निर्लज्ज होकर लिखा।किंतु जाने दीजिए,बहुत कष्ट हो तो नहीं।क्षमा। इसके पीछे जो नोटिस है मेरे अनुरोध से क्षत्रिय पत्रिका में छाप दीजिएगा। भवदीय,हरिश्चंद्र ।’ ‘सूचना ः मेरी बनाई वा अनुवादित वा संग्रह की हुई पुस्तकों को श्री बाबू राम दीन सिंह खड्ग विलास के स्वामी छाप सकते हैं जब तक जिन पुस्तकों को ये छापते रहें और किसी को अधिकार नहीं कि छापें।-हरिश्चंद्र।’ भारतेंदु ने एक बार फिर राम दीन सिंह को लिखा,‘मेरे एक मित्र ने मुझसे बड़ा विश्वासघात किया।मेरा कुछ रुपया कुछ कारण से उसके नाम से रहता था।वह बेइमान होकर मिरजा पुर चला गया।वरंच मैं इसी वास्ते विन्ध्याचल गया था।अब वह साफ इनकार कर गया।खैर दीवानी फौजदारी जो कुछ होगी वह देख ली जाएगी।अब गुप्त बात आपको लिखता हूं कि रुपए सब एक साथ हाथ से निकल जाने से मैं बहुत ही तंग हो गया हूं।’ प्रभात खबर (21-11-2008)

सोमवार, 1 जून 2020

1975 के जून में हुई थी देश को झकझोरने वाली कई घटनाएं




सुरेंद्र किशोर
सन् 1975 के जून में देश को झकझोरने वाली एक साथ एक से अधिक घटनाएं हुईं। उतनी बड़ी राजनीतिक घटनाएं कभी किसी एक महीने में इस देश में शायद ही उससे पहले हुई। 

सबसे प्रमुख राजनीतिक घटना 25 और 26 जून के बीच की रात में हुई । उस रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। एक लाख से अधिक राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं तथा अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। उस महीने की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का लोकसभा का चुनाव अदालत ने खारिज कर दिया। किसी प्रधानमंत्री का चुनाव पहली बार खारिज हुआ।आपातकाल उस अदालती निर्णय का परिणाम बताया गया।

उसी महीने गुजरात विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी हार गयी। 12 जून को एक साथ तीन खबरें आईं। तीनों खबरें प्रधानमंत्री के लिए बुरी थीं। राजदूत डी.पी. धर का निधन, गुजरात में कांग्रेस की हार और इलाहाबाद हाईकोर्ट का प्रतिकूल निर्णय। दिवंगत धर इंदिरा जी के विश्वासपात्र  थे।

चुनाव कराने की मांग पर जोर डालने के लिए उससे पहले 1975 के अप्रैल में मोरारजी देसाई ने नई दिल्ली में अनशन किया था। उनकी मांग प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मान ली और चुनाव करा दिया गया। याद रहे कि गुजरात में एक साल से चुनाव टाला जा रहा था। वहां राष्ट्रपति शासन था। 9 फरवरी, 1974 तक चिमन भाई पटेल मुख्य थे। चुनाव के बाद जनता मोर्चा के नेता बाबू भाई पटेल मुख्यमंत्री बने।

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने जब इंदिरा गांधी का चुनाव खारिज कर दिया तो एक बड़े वकील ने टिप्पणी की कि इंदिरा गांधी पर ट्रैफिक रूल्स के उलंघन जैसा कसूर था।

इस निर्णय पर देश में राजनीतिक तहलका मच गया।

याद रहे कि 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में सोशलिस्ट नेता राज नारायण को हराया था। हाईकोर्ट ने चुनाव रद करने के दो कारण बताए थे। एक तो इंदिरा जी की चुनावी सभा के मंच का निर्माण सरकारी साधनों से किया गया था। दूसरा कारण गजटेड अफसर यशपाल कपूर को लेकर बना। अदालत के अनुसार इंदिरा गांधी ने चुनाव में यशपाल कपूर की मदद ली थी। यह साबित हो गया था।

उस निर्णय के बाद प्रधानमंत्री के पक्ष में देश में जहां—तहां नारे लगने लगे, नुक्कड़ सभाएं होने लगीं। उधर जय प्रकाश नारायण तथा प्रतिपक्षी दलों ने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग शुरू कर दी। 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में इस सवाल पर जयप्रकाश नारायण की बड़ी सभा हुई। इस बीच इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सबसे बड़ी अदालत ने हाईकोर्ट के निर्णय को स्टे कर दिया, पर इंदिरा जी को लोकसभा के किसी मत विभाजन में भाग लेने से रोक दिया। यह प्रधानमंत्री के लिए यह अपमानजनक स्थिति थी।

उन्होंने 25 और 26 जून के बीच की रात में देश में आपातकाल घोषित कर देने की राष्ट्रपति से सिफारिश कर दी और राष्ट्रपति ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी। साथ ही जयप्रकाश नारायण सहित देश के करीब एक लाख से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में राजनीतिक कर्मियों की गिरफ्तारी की वह आजाद भारत की पहली घटना थी।

आपातकाल लगाने के बाद प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संदेश में प्रतिपक्षी दलों के बारे में कहा कि ‘......बहुत दिनों से इन घटनाओं को हम अत्यधिक धैर्य से देखते रहे। अब हमें इनके नये कार्यक्रमों का पता चला है जिनसे सारे देश में सामान्य कार्य में बाधा डालने के उद्देय से कानून व व्यवस्था को चुनौती दी गयी है। क्या कोई भी सरकार जो सरकार है, देश के स्थायित्व को ऐसे खतरे में पड़ने दे सकती है? कुछ लोग हमारे सशस्त्र सैनिकों व पुलिस को विद्रोह के लिए उकसाने लगे हैं।’

आपातकाल के साथ प्रेस पर कठोर सेंसरशीप लगा दी गयी। प्रतिपक्ष की राजनीतिक गतिविधियां पूरी तरह ठप हो गयीं। आजाद भारत के लिए यह एक अजूबी घटना थी। किसी नेता के अनशन के दबाव पर किसी विधानसभा का चुनाव हो, वैसी अनूठी घटना भी जून 1975 में गुजरात में  हुई थी।

शनिवार, 23 मई 2020

राज्यसभा की सदस्यता ठुकरा दी थी आचार्य जी ने

सर्वोदय नेता आचार्य राममूर्ति की पुण्यतिथि पर



बात पुरानी है। पर मुझे पूरी तरह याद है। पटना के श्रीकृष्ण स्मारक भवन में सभा हो रही थी।
मंच पर वी.पी.सिंह, मुख्यमंत्री लालू प्रसाद और सर्वोदय नेता आचार्य राममूर्ति मौजूद थे। अपने भाषण में लालू प्रसाद ने कहा कि हमने और राजा जी यानी वी.पी. सिंह ने आचार्य जी से कहा था कि आप राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार कर लीजिए। पर आचार्य जी ने साफ मना कर दिया।
ऐसे निष्पृह समाजसेवी व्यक्ति थे आचार्य जी। 

स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी व सर्वोदय नेता आचार्य राममूर्ति का जन्म उत्तर प्रदेश के जौनपुर के एक संपन्न परिवार में 1913 में हुआ था। 20 मई 2010 को पटना में उनका निधन हुआ। वे वाराणसी के क्वीन्स कालेज में पढ़ाते थे। पर उन्होंने नौकरी छोड़कर समाज सेवा की राह पकड़ ली। बिहार को उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र बनाया।

जेपी के नेतृत्व में 1974 में जब बिहार आंदोलन शुरू हुआ तो आचार्य जी का जेपी के बाद आंदोलन के नेतृ वर्ग में दूसरा स्थान था। आंदोलन के दौरान जब जेपी इलाज के वेलौर गए थे तो उन्होंने कुछ समय के लिए आंदोलन की बागडोर आचार्य जी को ही सौंपी थी। स्वतंत्रता सेनानी और गांधीवादी आचार्य जी का पूरा जीवन लोगों के कल्याण के लिए समर्पित रहा। ऐसे नेता अब कम ही देखे जाते हैं।

सोमवार, 19 नवंबर 2018

इंदिरा गांधी की वसीयत : वरुण के हितों की सुरक्षा राजीव-सोनिया की जिम्मेदारी थी

इंदिरा गांधी के जन्मदिन पर विशेष

सुरेंद्र किशोर 

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इंदिरा गांधी ने लिखा था कि ‘मैं यह देख कर खुश हूं कि राजीव और सोनिया फिरोज वरुण को उतना ही प्यार करते हैं जितना अपने खुद के बच्चों को। मुझे पक्का भरोसा है कि जहां तक संभव होगा, वे हर तरह से वरुण के हितों की रक्षा करेंगे।’

यह बात पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी वसीयत में दर्ज की है। वह वसीयत 4 मई, 1981 को लिखी गयी थी। उसके गवाह थे एम.वी. राजन और माखनलाल। इंदिरा गांधी ने यह भी लिखा है कि ‘संजय गांधी की जायदाद में मेरा जो शेयर है, मेरी इच्छा है कि वह फिरोज वरुण को मिले। इन बच्चों के बालिग होने तक यह संपत्ति ट्रस्ट के पास रहे जिसके प्रबंधक राजीव और सोनिया रहें।’


इंदिरा गांधी की वसीयत में अन्य परिजन की चर्चा मौजूद है सिवा मेनका गांधी के। फिरोज वरुण का तो उन्होंने पूरा ध्यान रखा, पर अपने छोटे पुत्र संजय की विधवा के लिए उनके पास देने को कुछ नहीं था। याद रहे कि संजय के निधन के बाद मेनका का संबंध इंदिरा जी से बहुत ही खराब हो गया था।


इंदिरा जी के जीवनकाल में मेनका ने अपना एक राजनीतिक संगठन भी बना लिया था-संजय विचार मंच।

ऐतिहासिक वसीयत में इंदिरा गांधी ने यह भी लिखा है कि 1947 में हमारे पास जितनी संपत्ति थी, आज उससे कम है। याद रहे कि इस बीच उन्होंने जवाहर लाल नेहरू स्मारक ट्रस्ट को इलाहाबाद का अपना ‘आनंद भवन’ दान कर दिया था।

वसीयत के अनुसार मेहरौली के पास के निजी फार्म हाउस राहुल और प्रियंका को मिले। वसीयत के अनुसार हिस्सेदारी दोनों बच्चों की बराबर -बराबर रहेगी। उन्होंने पुस्तकों की कॉपी राइट भी तीन हिस्सों में बांट दिए, तीनों बच्चों के नाम। यानी प्रियंका, राहुल और वरुण के नाम।


वसीयत के अनुसार जेवर इंदिरा जी ने प्रियंका को दिए। पर शेयर, सिक्युरिटी व यूनिट को तीनों बच्चों में बांटे। पुरातन सामग्री जो पुरातत्व विभाग में निबंधित हैं, वे प्रियंका को मिलेंगी।


इंदिरा जी ने अपनी वसीयत में लिखा कि मेरे सारे निजी पेपर्स राहुल को मिलेंगे। बहुमूल्य व दुर्लभ पुस्तकें राहुल और प्रियंका को मिलेंगी। कुछ अन्य सामग्री के बारे में भी वसीयत में जिक्र है।


प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लिखा कि तीनों बच्चों के नाम की गयी संपत्ति, ट्रस्ट के तहत रहेगी क्योंकि बच्चे अभी वयस्क नहीं हैं। ट्रस्ट के प्रबंधक राजीव होंगे। यदि किसी कारणवश राजीव प्रबंधक नहीं रहे तो सोनिया प्रबंधक बनेगी।


यह भी मान लिया गया कि इस वसीयत के जरिए भी इंदिरा जी ने अघोषित रूप में राजीव और उनके पुत्र राहुल को ही अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी भी नामजद कर दिया न कि वरुण को। वैसे भी 1980 में संजय गांधी के असामयिक निधन के थोड़े ही दिनों बाद मेनका गांधी इंदिरा गांधी के आवास से बाहर हो गयी थीं। या यूं कहिए कि कर दी गयी थीं। 


संजय गांधी की जायदाद जो भी रही हो, पर खुद इंदिरा गांधी की जायदाद ऐसी नहीं थी जिसपर अंगुली उठाई जा सके। इंदिरा जी का यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि 1947 की अपेक्षा उनके परिवार की संपत्ति घटी जबकि वे लंबे समय तक सत्ता में रहे।


उनके जीवनकाल में भी किसी विरोधी नेता ने उनकी आय से अधिक संपत्ति का कोई मामला उठाया हो, यह हमें याद नहीं। हां, एक दूसरे प्रकार की शिकायत जरूर रही। अपने प्रधानमंत्रित्व काल में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्हें जितना कठोर होना चाहिए था, उतना नहीं हुर्इं। कई लोगों की ऐसी ही शिकायत जवाहरलाल नेहरू से भी रही।


फिर भी नेहरू - गांधी परिवार की 1981 तक की निजी संपत्ति को देखकर और आज के पक्ष-विपक्ष के अनेक नेताओं से उसकी तुलना करके देखने पर लगता है कि वे राजनीति के ‘संत’ थे। हालांकि इस शब्द का इस्तेमाल खुद इंदिरा गांधी ने अपने पिता के लिए किया था-‘मेरे पिता संत थे। पर मैं तो पॉलिटिशियन हूं।’


(मेरा यह लेख 19 नवंबर, 2018 को फस्र्टपोस्ट हिंदी में प्रकाशित)

शुक्रवार, 15 जून 2018

सिर्फ अपनी अंगुलियों से बड़े -बड़े ताले खोल देने वाले एक डाकू की कहानी

बिहार के अविभाजित सारण जिले का एक डाकू कोई भी ताला किसी भी औजार की मदद के बिना ही खोल देता था। ताला कितना भी मजबूत हो, उसके लिए सिर्फ उस डाकू की अंगुलियां ही पर्याप्त थीं। अदालत इस आरोप पर भरोसा नहीं कर के हर बार उस डाकू को सजामुक्त कर देती थी।

चम्पारण जिले के एक दूसरे व्यक्ति ने एक ऐसा ताला बनाया था जिसे उसके परिवार का सदस्य ही खोल सकता है। वह ताला अब भी मौजूद है और खोलने वाला भी। दोनों कहानियां पिछली सदी की हैं।

जगन्नाथ मंदिर के खजाने की चाभी खो जाने की ताजा खबर के साथ ही उन तालों की कहानियां याद आ गईं।

सारण की कहानी तो वहां के एक मशहूर वकील हेमचंद्र मित्रा ने लिखी है। ‘मेरे संस्मरण’ नाम से उनकी किताब अंग्रेजी में छप चुकी है। मित्रा छपरा बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी थे। मित्रा ने सन 1898 में छपरा जिला अदालत में वकालत शुरू की थी। वे एक नामी व तेजस्वी वकील थे। उन दिनों अविभाजित सारण जिले के सिवान अनुमंडल के एक डाकू पर यह आरोप था कि वह मजबूत से मजबूत ताले को भी अपनी अंगुलियों से ही खोल देता था। वह इस काम के लिए किसी चाभी या किसी अन्य औजार का इस्तेमाल नहीं करता था।


सिवान के एस.डी.ओ. ने उस पर सी.आर.पी.सी की धारा -110 के तहत कानूनी कार्रवाई कर रखी थी। उसने उस कार्रवाई के खिलाफ छपरा कोर्ट में अपील की। उसने ए.एच. मित्रा को अपना वकील रखा। कोर्ट में कई गवाहों ने बताया कि वह सिर्फ अपनी अंगुलियों से ताला खोल देता हैं। मित्र ने यह दलील पेश की कि कोई भी व्यक्ति सिर्फ अंगुलियों से कोई ताला खोल ही नहीं सकता है। अनेक गवाहों को गलत बताते हुए कोर्ट ने मित्र के तर्क को माना और डाकू को रिहा कर दिया।

मेरे संस्मरण में यह कहानी लिखते समय मित्र ने लिखा कि ‘ट्रूथ इज स्ट्रेंजर दैन फिक्सन।’ मित्र ने अपनी किताब में उस डकैत का नाम नहीं लिखा है। उन दिनों फोटो का आज जैसा चलन तो था नहीं। कई महीनों के बाद वह डाकू किसी अन्य केस के सिलसिले में वकील मित्र के यहां गया। मित्र ने उससे पूछा कि क्या इस आरोप में सच्चाई भी है कि तुम सिर्फ हाथ की अंगुलियों की मदद से ही ताले खोल देते हो ?

वकील ने यह सवाल इसलिए भी पूछा क्योंकि उन्हें लगा था कि सारे के सारे गवाह झूठ तो नहीं हो सकते। इस सवाल पर उस डाकू ने मुस्कराते हुए कहा कि यह आरोप सही है। उसने मित्र से कहा कि कोई ताला लाइए। मित्र ने लिखा है कि उन्होंने एक मजबूत ताले को बंद करके उस डाकू को दे दिया। उसे उसने अपने हाथ में लिया। मित्र लिखते हैं कि मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि जब उसने अपने हाथों से ही उस ताले को तुरंत खोल दिया। उसने मेरी आंखों के सामने ही यह काम इतनी जल्द कर दिया कि मैं कुछ समझ नहीं पाया।

पांच किलोग्राम का ताला, जिसे कोई खोल नहीं सकता था

कुछ इसी तरह की कहानी संदीप भास्कर ने हाल में टेलिग्राफ में लिखी है। सन 1940 में बेतिया के नारायण प्रसाद ने 5 किलोग्राम का एक ताला बनाया था। उस ताले की खूबी यह है कि उसे नारायण प्रसाद के सिवा कोई और नहीं खोल सकता था। बाद में नारायण प्रसाद ने यह हुनर अपने पुत्र लाल बाबू को सिखा दिया। अब वह अजूबा ताला सिर्फ लाल बाबू या उनके कोई परिवारीजन ही खोल सकते हैं। दरअसल उसे खोलने के लिए एक खास तरह की ‘हाथ की सफाई’ चाहिए। वह कौशल सिर्फ उस परिवार को ही हासिल है।

1940 में बेतिया के महाराजा ने एक प्रदर्शनी आयोजित की थी। नारायण प्रसाद ने उस ताले को  उस प्रदर्शनी में शामिल किया। महाराजा ने घोषणा की कि जो भी उस ताले को खोल देगा, उसे चांदी के 11 सिक्के दिए जाएंगे। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला। लाल बाबू के अनुसार महाराजा ने उस ताले को खरीदने की इच्छा जाहिर की। नारायण प्रसाद ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।

इतना ही नहीं 1972 में गादरेज इंडिया लिमिटेड ने उस ताले के पेटेंट का अधिकार मांगा। उसके बदले 1 लाख रुपए देने का आॅफर दिया। पर नारायण प्रसाद को यह स्वीकार नहीं था। दरअसल नारायण का परिवार उस हुनर को अपनी संतानों तक ही सीमित रखना चाहता है।

1972 में तत्कालीन मुख्यमंत्री केदार पांडेय ने जो चम्पारण जिले के ही मूल निवासी थे, ताला व राइफल कारखाना खोलने में मदद करने का इस परिवार को आश्वासन दिया था। पर वह पूरा नहीं हो सका। लालबाबू के अनुसार कुछ पैसे तो एकत्र किए गए, पर कारखाने के लिए वे काफी नहीं थे। आश्चर्य है कि बाद के मुख्यमंत्रियों का ध्यान भी उस परिवार के इस हुनर की ओर  नहीं गया!   

राजेंद्र काॅलेज (छपरा) : जरा याद कर लें प्राचार्य भोला प्रसाद सिंह को


18 दिसंबर, 1967 की बात है। बिहार के अनेक राजनीतिक तथा गैर राजनीतिक संगठनों ने राजभाषा संशोधन विधेयक के खिलाफ ‘बिहार बंद’ का आह्वान किया था। मैं उन दिनों संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े क्रांतिकारी विद्यार्थी संघ की सारण जिला शाखा का सचिव था। हम छात्रों ने इस अवसर पर छपरा में जुलूस निकालने का निर्णय किया था। उस दिन मैं सुबह सात बजे ही एक रिक्शे पर माइक लेकर राजेंद्र कालेज के गेट पर पहुंच गया।



मैं छात्रों से क्लास का बहिष्कार करके जुलूस में शामिल होने की अपील कर रहा था। जिस दिन काॅलेज में असामान्य स्थिति रहती थी, उस दिन राजेंद्र कालेज के प्राचार्य भोला प्रसाद सिंह समय से पहले ही काॅलेज पहुंच जाते थे। उस दिन भी पहंुच गए थे।

वे गेट पर मेरे पास आए और मुझसे कहा कि ‘तुम यहां से माइक लेकर चले जाओ।’ जब मैंने हटने से इनकार कर दिया तो उन्होंने कहा कि ‘तुमसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी।’ मैंने कहा कि मैं आज आपका हुक्म नहीं मानूंगा। दरअसल मेरे साथ छात्र थे और उस काॅलेज के प्रो. राम श्रेष्ठ मिश्र का भी मुझे समर्थन हासिल था।

उसके बाद काॅलेज के अहाते में छात्रों -प्राध्यापकों की एक सभा बुलाई गयी। कई छात्रों और प्राध्यापकों ने जुलूस के खिलाफ अपनी राय जाहिर की। अंत में प्रो. रामश्रेष्ठ मिश्र बोलने को खड़े हुए। वे बोल ही रहे थे कि बगल के एक वृक्ष से एक काग कांव- कांव करता हुआ उड़ा। इस पर भोला बाबू ने कहा कि ‘ देखो काग बोल रहा है। आज जरूर कुछ बुरा होगा।’

विरोध के बावजूद हमने जुलूस निकाला। सैकड़ों छात्र जुलूस में शामिल हो गए। हमारा संगठन मजबूत था। पर इतने बड़े जुलूस की मुझे भी उम्मीद नहीं थी। मुझे कुछ शंका होने लगी। संभवतः भोला बाबू को यह लगता था छात्रों की जमात को मैं संभाल नहीं पाऊंगा।

जब जुलूस के रास्ते में नये -नये युवक जुड़ने लगे तो  मेरी शंका बढ़ गयी। क्योंकि वे अनजान चेहरे थे। लगा कि जुलूस के जरिए तोड़-फोड़ करवाने की कोई बाहरी राजनीतिक साजिश थी। याद रहे कि उन दिनों बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार चल रही थी। खैर, भोला बाबू की आशंका सच होने वाली थी और हो ही गयी। जुलूस छपरा कोर्ट परिसर स्थित स्टेट बैंक के पास पहुंचा। वहां जुलूस में शामिल कुछ युवक अनियंत्रित हो गए। बैंक के गार्ड ने गोली चला दी। एक राहगीर मारा गया। जुलूस तितर -बितर हो गया।

हालांकि इसको लेकर किसी छात्र की गिरफ्तारी नहीं हुई। दरअसल उस जुलूस का आयोजन मैंने ही किया था। संभवतः भोला बाबू को यह लग गया था कि मेरे जैसे अपरिपक्व व्यक्ति के लिए जुलूस में शामिल छात्रों -युवकों को नियंत्रित कर पाना संभव नहीं होगा। उन्हें ठीक ही लगा था।

खैर, दूसरी घटना कुछ समय बाद की है।

16 जनवरी, 1968 को बिहार विधानसभा भवन के समक्ष संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का प्रदर्शन होने वाला था। उससे दो दिन पहले हमने सारण जिले में कुछ नेताओं के साथ सघन भ्रमण कर लोगों को पटना पहुंचने का संदेश दिया था। थककर चूर हो गया था। जुकाम हो गया।

इसलिए मैं खुद पटना नहीं जा सका। 16 जनवरी की शाम में जब भोला बाबू ने मुझे काॅलेज परिसर में देखा तो पूछा कि ‘तुम लोगों का प्रदर्शन है न। तुम यहां हो ?’ उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि ‘तुम जीवन में कुछ नहीं कर सकते। कभी नेता नहीं बनोगे।’

यह एक अभिभावक की फटकार थी। वे मुझे राजनीति में आगे बढ़ते देखना चाहते थे। मेरी बी.एससी. परीक्षा का रिजल्ट हो चुका था। मैं अंक पत्र लेने काॅलेज गया था। भोला बाबू अपने कक्ष के सामने खड़ा होकर उन कुछ छात्रों को समझा रहे थे जो छात्रसंघ का चुनाव कराने की जिद पर अड़े थे। मैं भोला बाबू के पीछे से गुजरा। थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्होंने मुझे वापस बुलाया। पूछा, ‘पास कर गए?’

जब मैंने ना कह दी तो उन्होंने हड़ताली लड़कों का ध्यान मेरी ओर खींचते हुए अभिनय की मुद्रा में कहा कि ‘देखो, यही था जो फाटक पर माइक लेकर कहता था, साथियों साथ दो। और आज जब फेल हो गया तो मुझसे मिले बिना ही जा रहा है। तुम लोगों की भी यही हालत होगी।’ फिर मेरी ओर मुखातिब होकर उन्होंने कहा कि ‘कोई बात नहीं। फिर परीक्षा दो। मैं तुम्हारी मदद करूंगा।’ दरअसल मैं फेल कैसे नहीं करता! पढ़ाई-परीक्षा मेरी प्राथमिकता से काफी दूर चली गयी थी।

शिक्षक के रूप में उनके अतुलनीय योगदान की चर्चा किए बिना बात पूरी नहीं हो सकती। भोला बाबू केमिस्ट्री पढ़ाते थे। मैं विज्ञान का छात्र होने के कारण उनका क्लास करता था। राजेंद्र कालेज में विज्ञान संकाय में छात्र बहुत थे। इसलिए भोला बाबू सबको एक साथ शामियाना में बैठाकर पढ़ाते थे। रसायन शास्त्र जैसे निरस और जटिल विषय को इस तरह से मनोरंजक ढंग से पढ़ा देते थे कि उसे फिर घर  जाकर पढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। लगातार घंटों तक पढ़ाते जाना उनके ही वश की बात थी। हमें हमेशा उनके क्लास की प्रतीक्षा रहती थी।

बी.एससी. फेल कर जाने के बाद मैं पटना रहने लगा था। समाजवादी साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकमुख’ में काम करने लगा। उसके संपादक प्रो. देवी दत्त पोद्दार थे। इस बीच मेरे एक शुभचिंतक ने मुझे सलाह दी कि पहले तुम गे्रजुएट तो हो जाओ। बाद में जीवन में जो करना हो, करो। मुझे बात अच्छी लगी।

मैं गांव लौट गया। सारण जिला संसोपा के आॅफिस सेके्रट्री के रूप में काम करने लगा। मुझे हर माह सौ रुपए मिलते थे। साथ ही राजेंद्र काॅलेज में ही हिस्ट्री आॅनर्स में दाखिला करा लिया। आॅनर्स के साथ पास भी कर गया।
इस बीच भोला बाबू से मेरा पहले जैसा संपर्क नहीं रहा। गांव से रोज ट्रेन से छपरा जाता था। क्लास करना और पार्टी आॅफिस में काम करना। इसी में समय बीत जाता था।

इस बीच 26 अप्रैल, 1971 को यह दुःखद खबर मिली कि भोला बाबू की काॅलेज परिसर में ही किसी ने हत्या कर दी। मेरे लिए तो सदमे वाली खबर थी। मैंने ‘सारण संदेश’ में उन पर संस्मरणात्मक लेख लिखा था।

किन्हीं और के लिए भोला बाबू जो कुछ भी हों, पर मेरे लिए तो भोला बाबू अभिभावक तुल्य थे। मैं उनके शिक्षक रूप से सर्वाधिक प्रभावित था। कमेस्ट्री का वैसा बढि़या टीचर मैंने नहीं देखा।

(नोट-आपने ध्यान दिया होगा। मैं उन शिक्षकों के बारे में फेसबुक पर बारी-बारी से लगातार लिख रहा हूं जिन्होंने मुझे किसी न किसी रूप से प्रभावित किया। या जिनके बारे में पढ़कर -जानकर प्रभावित हुआ हूं। अगली बार किन्हीं अन्य गुरू देव के बारे में लिखूंगा।)

शुक्रवार, 1 जून 2018

प्रभावशाली नेत्री तारकेश्वरी सिन्हा : चार बार सांसद

कभी की प्रभावशाली नेत्री तारकेश्वरी सिन्हा को आज कम ही लोग  याद करते हैं। पहली बार 1952 में बिहार से लोकसभा की सदस्य चुन ली गयी थीं। कुल चार बार सांसद रहीं। जवाहर लाल नेहरू मंत्रिमंडल में उपमंत्री रही थीं। 

प्रभावशाली वक्ता थीं। साफ बोलती थीं। शेर ओ शायरी के लिए मशहूर थीं। हाजिर जवाबी भी। अपने जमाने में संसद में प्रभावशाली भूमिका निभाती थीं। सत्ताधारी कांग्रेस में थीं, पर प्रतिपक्ष के नेताओं के साथ भी तारकेश्वरी जी का अच्छा संबंध था। 

समाजवादी सांसद डॉ. राम मनोहर लोहिया पर लिखा हुआ तारकेश्वरी सिन्हा का एक संस्मरण यहां प्रस्तुत है। 

‘एक बार गाड़ी के पास खड़ी मैं किसी से बात कर रही थी। लोहिया वहां आए तो मैंने कहा कि ‘चलिए आपको छोड़ दूं।’ कहने लगे,‘मुझे जनता कॉफी हाउस जाना है।’ उन्हें पता था, मैं वहां नहीं जाती।

मुझे ऊहापोह में देख कर बोले, ‘अच्छा तो साधारण लोगों में जाने में आपकी बेइज्जती होती है। पांच सितारा में नहीं होती।’ खैर, मैं उन्हें छोड़ने गयी तो बोले, ‘ उतरो नीचे, नहीं तो सबके सामने कान पकड़कर उतारूंगा।’ मैं उतरी तो काफी हाउस में लोग इकट्ठे हो गए। सबको कॉफी पिलाई। बिल आया बयालीस रुपए का। लोहिया जी की पॉकिट में आठ रुपए थे। बाकी लोगों ने इकट्ठे करके दिए। एक बैरे ने साढ़े चार रुपए निकाल कर दिए तो लोहिया जी ने मनाकर दिया।

बाद में मैंने उनसे कहा कि ‘आप कमाल के आदमी हैं। पैसा जेब में नहीं है, ऑर्डर पर आर्डर दिए जाते हैं।’ पर, डाक्टर साहब (यानी डाक्टर लोहिया) तो खनाबदोश किस्म के आदमी थे। उन्हें कोई बांध नहीं सकता था।’

तारकेश्वरी जी का जन्म 1926 में हुआ था। सन 2007 में उनका निधन हुआ।

 (प्रभात खबर - बिहार - में प्रकाशित मेरे कॉलम कानोंकान से)

मंगलवार, 1 मई 2018

हंगामे के बिना ही संसद को हिलाया था बिहार से सांसद मधु लिमये ने

उनके जन्म दिन के अवसर पर मधु लिमये पर लिखा अपना एक पुराना लेख मैं यहां प्रस्तुत  कर रहा हूं।
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बिहार के मुंगेर व बांका से बारी- बारी से लोकसभा में चार बार गये मधु लिमये ने यह सिखाया था कि किसी हंगामे के बिना भी विधायका में किस तरह कटु सत्य भी प्रभावकारी तरीके से बोले जा सकते हैं।

 पर इसके लिए सदन के नियमों की बेहतर जानकारी होनी चाहिए और उसके इस्तेमाल की सलाहियत भी।यह सब सन 1964 में बिहार से पहली बार लोक सभा में गये मधु लिमये को अच्छी तरह आता था।दुःख की बात है कि आज विधायिकाओं में अपनी बातें  कहने के लिए भाजपा व कांग्रेस जैसे बड़े दलों को भी  अक्सर हंगामे का सहारा लेना पड़ता है।जबकि, मधु लिमये तो ‘वन मैन आर्मी’ थे।संसद व विधान सभाओं  की गरिमा का अवमूल्यन आज की तरह ही  जारी रहा तो इस देश की लोकतांित्रक व्यवस्था के प्रति ही लोगों के मन में इज्जत घट जाएगी।यह और भी दुःख की बात है कि आज संसद या फिर विधायिका की गरिमा घटाने में करीब- करीब सभी दलों का योगदान है।ऐसे में मधु लिमये जैसे सभा -चतुर नेता अधिक ही याद आते है।

वैसे बिहार से चुनाव जीत कर संसद के दोनों सदनों में बारी -बारी से  गये नामी -गिरामी राष्ट्रीय नेताओं  नेताओं की भी कमी नहीं रही।उन बड़े नेताओं व काबिल पार्लियामेंटेरियनों में बिहारी भी थे और गैर बिहारी भी।पर सबमें मधु लिमये का स्थान बेजोड़ था।आजादी के बाद बिहार से लोक सभा व राज्य सभा के संदस्य बने नेताओं में जे.बी.कृपलानी, अशेाक मेहता, जार्ज फर्नाडिस, आई.के.गुजराल, युनूस सलीम, कपिल सिब्बल, रवींद्र वर्मा, नीतीश भारद्वाज, मीनू मसानी, लक्ष्मी मेनन और एम.एस. ओबराय प्रमुख थे। पर इनमें मधु लिमये का स्थान अलग था।

इनके कारण भी बिहार और मुंगेर के नाम दुनिया भर में गौरवान्वित हुए।मधु लिमये का बिहार से कुछ खास तरह का लगाव भी रहा।वे बिहार से मात्र सांसद ही नहीं थे बल्कि वे राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के साथ-साथ   बिहार की समस्याओं को भी समान ऊर्जा व मनोयोग से संसद के भीतर व बाहर उजागर करते थे।बिहार पर उनके लेखन व भाषण  चर्चित हुए। 

हंगामे के बिना आज जिन छोटे -बड़े सांसदों व दलों के लिए अपनी बातें कह पाना कठिन होता है,उन्हें मधु लिमये की संसदीय शैली से इस मामले में अब भी कुछ सूत्र सीख लेना चाहिए । हालांकि यह थोड़ा कठिन दिमागी कसरत का काम है जिससे हमारे अधिकतर नेता जरा दूर ही रहना चाहते हैं।

समाजवादी विचारक व सभा चतुर मधु लिमये का जन्म 1 मई 1922 को पूणे में हुआ था।उनका निधन 8 जनवरी 1995 को दिल्ली में हुआ।वे दो बार मुंगेर (1964 और 1967) और दो बार बांका (1973 और 1977) से लोकसभा सदस्य चुने गये। सांसद के रूप में मधु लिमये ने तत्कालीन केंद्र सरकार को इतना हिला दिया था कि इंदिरा गांधी ने 1971 में तत्कालीन बलशाली कांग्रेसी नेता व शेरे बिहार के नाम से चर्चित राम लखन सिंह यादव के सामने अपनी आंचल पसार कर उनसे यह आग्रह किया था कि  आप मुंगेर और बाढ़ की  सीटें हमें विशेष तौर पर उपहार में दे दीजिए।

यानी इंदिरा जी मधु लिमये और तारकेश्वरी सिंहा को किसी भी कीमत पर हरवाना चाहती थीं।इस काम में यादव जी ने उनकी भारी मदद भी की थी। दोनों हार गए थे।लालू प्रसाद से पहले राम लखन जी ही बिहार के यादवांें के सबसे बड़े नेता थे।
 वैसे भी तब गरीबी हटाओ का नारे का इंदिरा जी के पास बल  था।  पर दो साल बाद ही यदि मधु लिमये एक उप चुनाव के जरिए बिहार के ही बांका से लोकसभा मे ंचले गये थे तो यह उनके प्रति बिहारी कृतज्ञ मानस का उपकार का भाव ही था। मधु ने बिहार का नाम ऊंचा ही किया था। मधु लिमये की चर्चा करने पर कुछ  विदेशी राजनयिक भी दिल्ली में यह पूछते थे कि वे कहां से चुनाव जीतते हैं ? याद रहे कि मुंगेर या बांका  चुनाव क्षेत्र ब्राहमण बहुल नहीं माना जाता।इस सूचना  के बाद कई विदेशी राजनयिकों  के मन में यह बात भी कुलबुलाने लगती थी कि तब क्यों बिहार को जातिवादी राज्य कहा जाता है ? 

मधु लिमये ने ऐसे समय में लोक सभा में अपनी संसदीय योग्यता की धाक जमाई थी जब के स्पीकर सरदार हुकुम सिंह लोहियावादी समाजवादी सांसदों के सदन में खड़ा होने के साथ ही उन्हें  तत्काल बैठा देने की कोशिश करने लगते थे। क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि वे जवाहर लाल नेहरू या इंदिरा गांधी  के खिलाफ कोई कटु बात बोल दंे। नेहरू 1964 तक प्रधान मंत्री थे।नेहरू के कटु आलोचक व अदमनीय समाजवादी नेता डा.राम मनोहर लोहिया ने 1963 में लोक सभा में प्रवेश करने के साथ ही नेहरू पर ऐसे कठोर प्रहार शुरू कर दिये थे कि स्पीकर सदा सतर्क रहते थे।

पर यदि मधु के पास संसदीय फोरम के इस्तेमाल की चतुराई थी, तो उन्हें अपनी बात कहने से 
 स्पीकर रोक भी नहीं सकते थे। स्पीकर उन दिनों  लोक लाज का काफी ध्यान रखने वाले नेता हुआ करते  थे।संविधान व लोक सभा की कार्य संचालन नियमावली का सहारा लेकर जब मधु लिमये  प्रस्ताव व सूचनाएं देते थे तो उन पर चर्चाएं कराने पर स्पीकर मजबूर हो जाते थे। इस तरह संसदीय ज्ञानों का उपयोग करके मधु लिमये देश व समाज के लिए काफी कुछ कर पायेे।

उनसे सकारात्मक ईष्र्या रखने वाले एक अन्य समाजवादी चिंतक व पूर्व सांसद किशन पटनायक ने मधु लिमये के बारे में उनके निधन के बाद  लिखा था कि ‘एक श्रेष्ठ कोटि के सांसद के रूप में मधु की प्रतिष्ठा हुई।मंत्रियों के भ्रष्टाचार के विरोध में उनका हमला इतना कारगर होने लगा था कि बड़े नेताओं में उनके प्रति भय हुआ। सन 1964 से 1967 के बीच सांसद के रूप में उनका जो उत्थान हुआ ,उसका मैं सदन के भीतर प्रत्यक्षदर्शी था। संसदीय प्रणाली व संविधान के बारे में उनका ज्ञान अद्वितीय था। मधु लिमये शुरू से मेरे लिए आदर, ईष्र्या व असंतोष के पात्र रहे। मेरे स्वभाव में है कि ईष्र्या उस व्यक्ति के लिए होती है जिसके लिए मेरे मन प्यार होता है।’
   गौरव की बात है कि मधु लिमये जैसे संसदीय महारथि सिफ्र्र बिहार से ही सांसद रहे। काश ! बिहार को वैसा गौरव  एक बार फिर मिल पाता ।   

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

एक आदर्श शिक्षक जंगल बाबा

सारण जिले के दिघवारा का जय गोविंद उच्च विद्यालय कोई गुरुकुल तो नहीं था,एक सामान्य स्कूल था,पर उसके शिक्षक राम जंगल सिंह गुरु जरूर थे।
 मैं 1959 से 1961 तक वहां का छात्र था। तब के वहां के प्रधानाध्यापक हरिहर बाबू भी बहुत योग्य व सम्मानित शिक्षक थे,पर राम जंगल बाबू जिन्हें हम लोग 
‘जंगल बाबा’ कहते थे,की अपनी अलग एक नैतिक सत्ता थी।

 जंगल बाबा वेश भूषा और पोशाक से लेकर विषयों की जानकारी तक नीचे से ऊपर तक गुरु दिखते थे।
  स्कूल के बरामदे पर उनके पैर  रखते ही हम विद्यार्थी जल्द अपनी- अपनी कक्षाओं में प्रवेश कर जाते थे और स्कूल का वातावरण बिलकुल शांत हो जाता था।
 वे एक तरह के स्कूल के अभिभावक ही थे। इलाके एक संपन्न व्यक्ति जय गोविंद पांडेय ने जंगल बाब की प्रेरणा सेे ही हाई स्कूल की स्थापना की। पांडेय जी की शत्र्त थी कि राम जंगल बाबू को भी शिक्षक और अभिभावक स्वरूप स्कूल में कार्यरत रहना पड़ेगा।
वे रहे भी।

हमारे जमाने में एक से एक योग्य शिक्षक उस स्कूल में थे। पर जंगल बाबा सबके गुरु थे।  किसी भी अन्य शिक्षक की अनुपस्थिति में कोई क्लास खाली नहीं जाता था। क्योंकि जंगल बाबा हर ताले की चाभी थें। वे हर विषय आसानी से पढ़ा लेते थे।

बी.एच.यू. के छात्र रहे जंगल बाबा दो साल तक इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी कर चुके थे। पर स्वास्थ्य खराब रहने के कारण वे आगे पढ़ाई नहीं कर सके थे।उन्हें दिघवारा लौटना पड़ा था।

सारण जिले के दिघवारा के मूल निवासी जंगल बाबा का जन्म 1902 में हुआ था और नवंबर, 1985 में निधन हो गया। पर जब तक जीवित रहे, उन्हें सब लोग सम्मान की नजरों से देखते थे। कभी किसी विवाद में नहीं रहे। उनके नाम पर इन दिनों राम जंगल सिंह इंटर कालेज दिघवारा में चलता है। जंगल बाबा के परिवार के सदस्य अशोक कुमार सिंह के अनुसार उन्हें राहुल सांकृत्यायन का भी सानिध्य मिला था।

जंगल बाबा ने छपरा स्थित राजपूत उच्च विद्यालय  से इंट्रेंस की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी। उसके बाद काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में दाखिला लिया।
जंगल बाबा वहां भरूचा छात्रावास में रहते थे जहां जगजीवन राम और जयप्रकाश नारायण के छोटे भाई राजेश्वर लाल इनकी मित्र मंडली में थे।

 आईएससी करने के बाद राम जंगल सिंह ने इंजीनियरिंग काॅलेज में दाखिला लिया। पर अचानक अस्वस्थ हो जाने के कारण पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी।
चाहे गांधी की आंधी हो या जेपी का आंदोलन, जंगल बाबा ने लोगों की चेतना जगाने का काम किया।

मुझे गर्व है कि मैंने भी जय गोविंद विद्यालय में जंगल बाबा से शिक्षा पाई।उन्हें आटर््स व साइंस सभी विषयों में  समान रूप से महारत हासिल था।जंगल बाबा न सिर्फ एक आदर्श शिक्षक थे बल्कि उनका व्यक्तित्व भी आदर्श था। 
  

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था, ‘इस पके आम के लिए आमों के पेड़ मत काटो’


28 फरवरी 1963 को राजेन बाबू को जहानाबाद से एक तार मिला। उसे पढ़ते ही उनकी तबियत बिगड़ने लगी। तार के जरिए यह सूचना आई थी कि उनके मित्र सुलतान अहमद नहीं रहे। नर्स से ऑक्सीजन लाने के लिए कहा। ऑक्सीजन सिंलेडर आने में थोड़ी देर हुई। वैसे ऑक्सीजन दरवाजे पर आया ही था कि राजेन बाबू नहीं रहे। एक आम आदमी  की तरह जिए और मरे।

1962 में राष्ट्रपति पद से अवकाश मिलने के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद पटना आए । सदाकत आश्रम परिसर में रहने लगे। यह वही मकान था जहां से वे आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। अत्यंत सामान्य किस्म का वह घर था। बाद में रहने लायक भी नहीं रह गया था। 

जयप्रकाश नारायण ने चंदा करके उसे रहने लायक बनाया। हालांकि जेपी उनके लिए एक मकान बनवाना चाहते थे। पर उसके लिए आम के पेड़ काटने पड़ते।
राजेंद्र बाबू ने इस पर कहा था कि ‘इस पके आम के लिए आम के पेड़ों को मत काटो।’

देश के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, संविधान सभा के अध्यक्ष और  12 साल तक राष्ट्रपति रहे डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बुढ़ापे में देखभाल करने में सरकार का शायद कोई खास योगदान नहीं था। समकालीन पत्रकार रवि रंजन सिन्हा के अनुसार पटना में राजेंद्र बाबू के आसपास कहीं सरकारी तंत्र नजर नहीं आता था।

पटना के गंगा किनारे आम के बगीचे के बीच की उनकी ‘कुटिया’ में ए.सी. का भी  प्रबंध  नहीं था। ऐसा उनके दमा के मरीज होने के कारण था या साधन के अभाव में, इस पर कई बार चर्चा चलती रहती है।

जवाहर लाल नेहरू के साथ मनमुटाव 

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ उनके ठंडे संबंधों के कारण ऐसी चर्चाओं को बल मिलता रहा।
दोनों के बीच मनमुटाव और बढ़ गया था जब चीनी आक्रमण के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पटना के गांधी मैदान में ‘हिमालय बचाओ’ बैनर तले हुई सभा को संबोधित किया। डॉ. राम मनोहर लोहिया द्वारा आयोजित उस सभा में जनरल करियप्पा भी शामिल हुए थे। उस सभा में सरकार के खिलाफ भी कुछ बातें कहीं गयीं।

पुराने समाजवादी उमेश जी ने बताया कि राजेंद्र बाबू के निधन के समय डॉ. लोहिया भी पटना में थे। लोहिया के साथ पत्रकार जितेंद्र सिंह भी उस दिन राजेन बाबू से मिलने गए थे। राजेन बाबू के अंतिम संस्कार में शामिल होने जब जवाहरलाल नेहरू पटना नहीं आए तो उसका यह भी एक कारण बताया गया। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री विनोदानंद झा ने प्रधानमंत्री को फोन करके पटना आने के बारे में उनसे पूछा था। प्रधानमंत्री ने कहा था कि उन्हें जयपुर जाना है। वैसे अंत्येष्टि कार्यक्रम में राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन, लाल बहादुर शास्त्री तथा अन्य कई बड़े नेता शामिल हुए थे।

डॉ. प्रसाद बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य के बावजूद सार्वजनिक कार्यक्रमों का निमंत्रण जल्दी अस्वीकार नहीं करते थे। 28 फरवरी 1963 को उन्हें पटना विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह  को संबंोधित करना था। उसके लिए वे तैयार भी थे, पर इसी बीच मित्र के निधन की खबर मिल गयी।

जब वे राष्ट्रपति थे तो उनके स्टाफ में थे राजेंद्र कपूर । वे नौकरी छोड़ कर राजेंद्र बाबू के साथ रहने पटना आ गए थे। याद रहे कि राजेंद्र बाबू के छात्र जीवन में उनके एक परीक्षक ने उनकी उत्तर पुस्तिका में लिखा था कि ‘परीक्षार्थी, इस परीक्षक से बेहतर है।’

राजेंद्र बाबू ने किसी परीक्षा में कभी सेकेंड नहीं किया। आजादी की लड़ाई में उनका योगदान अप्रतिम था। संविधान सभा के अध्यक्ष और 12 साल तक राष्ट्रपति रहे राजेंद्र बाबू के लिए उस जगह कोई ढंग का अब तक स्मारक नहीं बन सका जहां उन्होंने अंतिम सांस ली और जहां से आजादी की लड़ाई लड़ी।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म तीन दिसंबर, 1884 को बिहार के अविभाजित सारण जिले के जीरादेई गांव में हुआ था। छपरा के जिला स्कूल में उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई। पटना के टी.के. घोष अकादमी में शिक्षक रहे राम नरेश झा को इस बात पर गर्व है कि छपरा जिला स्कूल के पहले राजेंद्र बाबू दो साल तक टी.के. घोष अकादमी के छात्र रहे। उच्च शिक्षा के लिए वे प्रेसिडेंसी कॉलेज कलकत्ता गए।

कुशाग्र बुद्धि के राजेंद्र बाबू ने एट्रेंस से बी.ए. तक की परीक्षाओं में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। एम.ए.की परीक्षा में भी प्रथम श्रेणी में विश्वविद्यालय में प्रथम आए। वकालत पढ़ी। सन 1911 में वकालत प्रारंभ की। पहले कलकत्ता और फिर पटना में। वर्ष 1917 में वे चम्पारण सत्याग्रह में गांधी जी के सहयोगी बने।

1920 में वकालत छोड़ दी। असहयोग आंदोलन में शमिल हो गए। तीन बार कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। अंतरिम सरकार में देश के खाद्य मंत्री थे।उन्हें 1962 में भारत रत्न से अलंकृत किए गए। वे बिहारी छात्र सम्मेलन के संस्थापक भी थे।


(पुण्यतिथि पर उनकी याद में)

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

सरदार हरिहर सिंह की नजर में श्रीबाबू

बिहार में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे डा. श्रीकृष्ण सिंह के बारे में तरह -तरह के लोग तरह -तरह के विचार रखते हैं।ऐसा स्वाभाविक ही है क्योंकि उन्होंने आजादी के बाद व पहले की कांग्रेसी राजनीति व शासन को काफी प्रभावित किया था।


   पर एक अन्य मुख्य मंत्री सरदार हरिहर सिंह की नजरों से डा.श्रीकृष्ण सिंह को देखना अधिक महत्वपूर्ण बात होगी।सरदार साहब सन 1969 में बिहार के मुख्य मंत्री बने थे।

डा.श्रीकृष्ण सिंह यानी श्रीबाबू के बारे में सरदार साहब ने लिखा है कि ‘आजादी की लड़ाई के दिनों  श्रीबाबू खास तौर पर युवकों के नेता थे।ऐसे तो वे संपूर्ण जनता के नेता थे,पर अपने उग्र राष्ट्रीय विचारों के कारण वे युवकों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते थे।उनके अपने स्वतंत्र विचार थे।वे किसी के ‘हिज मास्टर्स वायस’ नहीं थे।उनका अपना स्टैंड होता था,इसलिए वे हमारे जैसे युवकों के लिए ग्राह्य और प्रिय थे।

  सरदार हरिहर सिंह खुद भी एक महत्वपूर्ण हस्ती थे और आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उनका नाम सरदार पड़ा था।

   सरदार साहब ने लिखा है कि श्रीबाबू सन 1930 से पहले मुंगेर जिले की राजनीति तक अपने को सीमित रखे हुए थे।वे राज्य के नेतृत्व में भाग लेते थे,लेकिन मुंगेर को अपना मुख्य केंद्र बना कर चलते थे।नमक सत्याग्रह के बाद वे बिहार के राजनीतिक क्षितिज पर छा गये।

तब से लेकर मरते दम तक छाये रहे।याद रहे कि डा.राजेंद्र प्रसाद व डा.अनुग्रह नारायण सिंह सहित कई नेतागण चंपारण सत्याग्रह के समय ही गांधी के साथ हो लिये थे।

  बिहार के  अत्यंत महत्वपूर्ण नेता  डा.अनुग्रह नारायण सिंह को लोग बाबू साहब कहते थे।बाबू साहब के  बारे में सरदार साहब ने लिखा है कि अनुग्रह बाबू से मेरा संबंध 1916 से था।हमारा उनका व्यक्तिगत संबंध था।
हम बाबू साहब के बहुत करीब थे।उनके साथ मेरा घनिष्ठ संबंध था,पर राजनीतिक स्तर पर हम श्रीबाबू से संबंधित थे।राजेंद्र बाबू और बाबू साहब सुधारवादी व नरमपंथी विचार के थे।उस जमाने के लिहाज से श्रीबाबू प्रगतिशील और उग्र विचार के थे।इसी कारण श्रीबाबू को युवको का समर्थन मिला।बहुत से उग्रवादी नेता जैसे राम विनोद सिंह,श्यामा बाबू ,योगेंद्र शुक्ल आदि श्रीबाबू के साथ जाना पसंद करते थे और साथ चले भी।याद रहे सरदार साहब ने क्रांतिकारियों के लिए अपने लेख में उग्रवादी शब्द का इस्तेमाल किया है।

   राजनीति में शालीनता के बारे में हरिहर सिंह ने लिखा कि उस समय के लोगों की सबसे बड़ी बात थी कि  राजनीति में शालीनता थी।श्रीबाबू का अपना स्टैंड जरूर होता था,लेकिन इसका मतलब दूसरे के प्रति अनादर और दुश्मनी नहीं थी।

बाबू साहब हों या राजेंद्र बाबू वे सबका आदर करते थे और सबको सम्मान देते थे।प्रारंभ में बाबू कष्ण बल्लभ सहाय बाबू साहब के साथ थे।उन्होंने 1937 में श्रीबाबू का विरोध किया।उसके बाद वे श्रीबाबू के संपर्क में आये।सहाय जी 1952 में श्रीबाबू के साथ थे।पर 1957 के चुनाव उन्होंने श्रीबाबू को हराने का असफल प्रयास किया।तब बिहार कांग्रेस विधायक दल के नेता पद का चुनाव श्रीबाबू और बाबू साहब के बीच हुआ था।श्रीबाबू जीते।

   उन दिनों की राजनीति की शालीनता का एक और उदाहरण देते हुए सरदार साहब ने लिखा कि एक बार श्रीबाबू महेश प्रसाद सिंह को मंत्री बनाना चाहते थे और बाबू साहब  दीप नारायण सिंह को।एक बार तो लगा कि दोनों में से कोई एक ही मंत्री बनंेगे।क्योंकि दोनों नेता एक ही जिले के थे।पर ंदोनों मंत्री बने । इसमें यह खूबी रही कि डा.अनुग्रह नारायण सिंह ने   महेश प्रसाद सिंह का नाम प्रस्तावित किया और डा.श्रीकृष्ण सिंह ने  दीप नारायण सिंह का।श्रीबाबू के मंत्रिमंडल में अनुग्रह बाबू हमेशा मुख्य मंत्री के बाद दूसरे स्थान पर रहे।

   सरदार साहब के अनुसार श्रीबाबू के भाइयों ने जब आजादी की लड़ाई के दिनों उनका साथ छोड़ दिया था तो महेश प्रसाद सिंह ने श्रीबाबू का साथ दिया था।डा.श्रीकष्ण सिंह का जीवन तो निष्कलंक था,पर महेश प्रसाद सिंह को लेकर कुछ लेागों ने डा.श्रीकृष्ण सिंह  को बदनाम करने की कोशिश की।पर श्रीबाबू ने उपकार का बदला व्यावहारिक ही नहीं,बल्कि सांस्कतिक स्तर पर भी महेश बाबू को चुकाया।जब श्रीबाबू ने अपनी सबसे प्रिय निधि यानी अपनी पुस्तकों को मुंगेर के श्रीकृष्ण सेवा सदन को सौंपा तो उस पुस्तकालय का नाम कमला-महेश पुस्तकालय रखा।लेकिन महेश प्रसाद सिंह ने डा.श्रीकृष्ण सिंह  की उदारता और व्यक्तिगत संबंध का उपयोग अपने को राजनीति में स्थापित करने तथा आगे बढ़ाने में किया।

  अपने खुद के  कटु अनुभव की चर्चा करते हुए सरदार हरिहर सिंह ने लिखा कि सन 1957 के चुनाव में टिकट को लेकर सत्य नारायण सिंह और महेश प्रसाद सिंह ने मेरे नाम का विरोध किया।इसके परिणामस्वरूप मुझे टिकट नहीं मिला।इससे मैं कुछ खिन्न था।बाद की राजनीतिक स्थिति को देखकर मुझे तकलीफ हुई।श्रीबाबू के निधन के कुछ समय पहले मैंने एक दिन कुछ दुःखी होकर कह दिया--‘मरने के वक्त आप भूमिहार हो गये और मैं राजपूत।नहीं तो कोई नहीं जानता था कि हम दोनों एक ही जाति के नहीं हैं।’यह सुनते ही श्रीबाबू रो पड़े।न कोई शब्द थे और न कोई सफाई।मात्र अश्रु धार मेरे सवाल का जवाब दे रहे थे।

(श्रीबाबू के जन्म दिन के अवसर पर विशेष)

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

बुरे प्रत्याशियों के साथ कैसा सलूक करे मतदाता !

मतदाता क्या करे जब किसी भले दल से भी किसी बुरे प्रत्याशी को टिकट मिल जाए ? आज के राजनीतिक दौर में यह बड़ा सवाल है जिसका जवाब आसान नहीं है। दरअसल कई मतदाताओं के दिल तो कहते हैं कि उसे वोट न दिया जाए। पर, राजनीतिक परिस्थिति और उनके दिमाग कुछ और कहते हैं। यह राय भी है कि किसी अधिक बुरे दल या उम्मीदवार को हराने के लिए किसी कम बुरे उम्मीदवार को आधे मन से ही सही, पर स्वीकार कर लिया जाए।

अपनी-अपनी सोच और सुविधा के अनुसार मतदातागण बिहार विधानसभा के अगले चुनाव में भी अच्छे के साथ-साथ बुरे प्रत्याशियों से भी निपट लेंगे। अब तो नतीजे ही बताएंगे कि बुरे प्रत्याशियों के साथ लोगों ने कैसा व्यवहार किया। पर, इस संबंध में कम से कम तीन दिवंगत राजनीतिक हस्तियों के विचार उपलब्ध हैं। जवाहरलाल नेहरू, दीनदयाल उपाध्याय और चौधरी चरण सिंह ने समय-समय पर बुरे उम्मीदवारों के बारे में अपनी जाहिर कर दी थी।

अस्सी के दशक की बात है। इन पंक्तियों का लेखक बिहार में चौधरी चरण सिंह की एक चुनावी सभा में था। उन्होंने अन्य बातों के साथ -साथ मंच से मतदाताओं से यह अपील भी कर दी कि ‘यदि हमारे दल ने भी यहां किसी गलत उम्मीदवार को टिकट दे दिया हो तो तुम उसे वोट मत देना।’ बाद में पता चला कि कई अन्य चुनाव सभाओं में भी तब उन्होंने इसी तरह की बात कही थी।

पचास के दशक की बात है। मध्य प्रदेश के शिवबहादुर सिंह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे। वे नेहरू मंत्रिमंडल में भी रह चुके थे। पर जवाहर लाल नेहरू ने मतदाताओं से अपील कर दी कि वे शिवबहादुर सिंह को वोट न दें क्योंकि उन पर भ्रष्टाचार का आरोप था।

ऐसे मामले में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी राय अपनी डायरी में दर्ज कर दी है।
11 दिसंबर, 1961 को जनसंघ के वरिष्ठ नेता और विचारक दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी डायरी में लिखा कि ‘कोई बुरा प्रत्याशी केवल इसलिए आपका मत पाने का दावा नहीं कर सकता कि वह किसी अच्छे दल की ओर से खड़ा है। दल के ‘हाईकमान’ ने ऐसे व्यक्ति को टिकट देते समय पक्षपात किया होगा। अतः ऐसी गलती को सुधारना मतदाता का कर्तव्य है।’ 

बिहार में जो दल चुनाव लड़ रहे हैं उनमें से प्रमुख दलों के नेताओं का संबंध उपर्युक्त तीन नेताओं या उनके दलों से रहा है। इसलिए भी उन दिवंगत नेताओं का उल्लेख मौजूं है। क्योंकि विवादास्पद लोगों को टिकट देने का आरोप आज किसी एक ही दल पर नहीं है।

 (27 सितंबर 2015)

शनिवार, 2 जून 2012

नेता अभिमुख या देश अभिमुख राष्ट्रपति ?



मन के लायक राष्ट्रपति या देश के लायक राष्ट्रपति? विभिन्न दलों द्वारा अपने अनुकूल राष्ट्रपति बनाने की कोशिश इस देश में 1950 से ही जारी है। सन् 1950 मेें देश में संविधान लागू हुआ और डा. राजेंद्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति बने जो 1962 तक उस पद पर रहे।

लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री और देश के लोकप्रिय नेता जवाहर लाल नेहरू यह चाहते थे कि सी. राजागोपालाचारी राष्ट्रपति बनें न कि डा. राजेंद्र प्रसाद। राजा जी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था। यह बात उनके खिलाफ जाती थी। तीन उच्चत्तम पदों पर सामाजिक संतुलन का भी सवाल था। सरदार पटेल ने राजा जी के नाम का सख्त विरोध किया और डा. राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनवा दिया। एक लोकतांत्रिक नेता के रूप में जवाहर लाल नेहरू ने आधे मन से यह स्वीकार भी कर लिया।

  पर, आश्चर्य की बात यह थी कि समाजवादी विचारधारा के जवाहर लाल जी ने कैसे एक घनघोर पूंजीवाद समर्थक राजा जी के नाम पर जिद कर ली थी। एक समय तो यह भी आया था कि जब कांग्रेस की एक महत्वपूर्ण बैठक में जवाहर लाल जी ने धमकी तक दे डाली थी कि यदि राजा जी को नहीं बनाया गया तो वे प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे।

   पर उनकी धमकी काम नहीं आई। दरअसल पंडित नेहरू की चिंता अपने मन के राष्ट्रपति बनाने की थी ताकि राजपाट किसी बिघ्न बाधा के चलता रहे। हालांकि भारतीय संविधान में भारत के राष्ट्रपति के पद को करीब- करीब शोभा के पद का दर्जा दिया गया है। उससे थोड़ा ही अधिक। पर संविधान का कार्यान्वयन किस रूप में होता है। आने वाले वर्षों में चीजें किस तरह विकसित होती हैं, इसको लेकर कुछ नेताओं को आजादी के तत्काल बाद कुछ आशंकाएं रही होंगी। इसीलिए किसी अनहोनी को रोकने के लिए यह स्वाभाविक ही था कि कोई प्रधानमंत्री अपने मन लायक राष्ट्रपति चुनवाने की कोशिश करे।

   यह प्रवृति बाद के वर्षों में बढ़ी। आज कुछ और भी ज्यादा है। क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता व उथल पुथल के दौर में राष्ट्रपति का प्रधानमंत्री के पक्ष में खड़ा होना प्रधानमंत्री के लिए जरूरी माना गया।

सन् 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को यह लगा होगा कि जिन नीतियों को वह लागू करना चाहती हैं, उनके समर्थन के लिए उनके अनुकूल राष्ट्रपति जरूरी है। इसीलिए उन्होंने वी.वी. गिरि को राष्ट्रपति बनवा दिया। ऐसा उन्होंने पार्टी से विद्रोह करके किया। बाद में कांग्रेस पार्टी में महाविभाजन भी हुआ। अविभाजित पार्टी की बैठक में तो इंदिरा गांधी ने नीलम संजीव रेडड्ी की उम्मीदवारी पर अपनी मुहर लगाई, पर बाद में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार गिरि को जितवा दिया। इसका राजनीतिक लाभ भी उन्हें मिला। जो प्रगतिशील नीतियां वे लागू करना चाहती थीं, उस काम में उन्हें वी.वी. गिरि का सहयोग मिला। सन् 1975 में आपातकाल लागू करने के समय तो फखरूद्दीन अली अहमद जैसे अत्यंत अनुकूल राष्ट्रपति की भारी जरूरत इंदिरा गांधी को थी। आपातकाल की अधिसूचना पर राष्ट्रपति का दस्तखत पहले हुआ और उस पर कैबिनेट की मुहर बाद में लगी।

खैर वे तो कम उथल पुथल के दिन थे। कम से कम तब तो एक ऐसा कैबिनेट होता था जो प्रधानमंत्री की उचित-अनुचित इच्छा पर तुरंत मुहर लगा देता था। पर आज की मिलीजुली सरकारों के दौर में कोई प्रधानमंत्री अपने कैबिनेट से हर हाल में ऐसी उम्मीद नहीं कर सकता है। राजनीतिक अस्थिरता के इस दौर में राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

   सन् 2014 का लोकसभा चुनाव सामने है। अभी देश के जैसे राजनीतिक हालात हैं, उसमें कोई राष्ट्रीय दल अकेले बहुमत पाने की उम्मीद नहीं कर सकता। फिर तो पहला मौका मंत्रिमंडल के गठन के लिए किसी दल या गठबंधन के नेता को बुलाने का आएगा। सन् 1996 में एक राजनीतिक हादसा हो चुका है। तत्कालीन राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा ने अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी थी जबकि उन्हें लोकसभा में बहुमत का समर्थन हासिल नहीं था और न होने की संभावना थी। इसलिए तेरह दिनों तक ही वे प्रधानमंत्री पद पर बने रह सके।

  किसी राष्ट्रपति या राज्यपाल को यह देखना चाहिए कि जिस व्यक्ति को वह सरकार बनाने के लिए बुला रहे हैं उसे सदन के बहुमत का समर्थन हासिल है भी या नहीं। सिर्फ इससे काम नहीं चलेगा कि कोई व्यक्ति सबसे बड़े दल का नेता चुनाव गया है। पर इस सामान्य नियम का उलंघन होता रहा है।

   अगले लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर ऐसी नौबत आ सकती है। तब यदि राष्ट्रपति के पद पर कोई न्याय और संविधानप्रिय व्यक्ति नहीं बैठा हो तो किसी अल्पमत के नेता को प्रधानमंत्री बनने के बाद खरीद-फरोख्त करके बहुमत जुंटाने का मौका मिल सकता है। फिर इस देश का क्या होगा? जब खरीद-फरोख्त से सरकार बनेगी तो वह चलेगी भी उसी तरीके से।

 इसलिए अगला राष्ट्रपति किसी ऐसे व्यक्ति को ही होना चाहिए जो ऐसे मामले में वास्तविक स्थिति को देख कर यानी बहुमत की जांच करके निर्णय करे न कि अपनी इच्छा के अनुसार जिसे चाहे शपथ ग्रहण करा दे। ऐसा व्यक्ति मिलना जरा कठिन होता है, पर असंभव नहीं। आज इस देश की राजनीति में गिरावट के जो हालात हैं, उसमें यह लगता है कि कोई प्रमुख दल निष्पक्ष ढंग से काम करने वाले ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति नहीं बनाएगा। पर, किसी ऐसे -वैसे व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाने के जो खतरे हैं, उसकी ओर देश का ध्यान दिला देना जरूरी है।

   भले संविधान में राष्ट्रपति को कोई खास अधिकार प्राप्त नहीं है, पर विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

 आने वाले समय राजनीतिक व आर्थिक दृष्टि से देश की हालत उथल पुथल वाले होंगे, ऐसी संभावना जाहिर की जा रही है। अधिकतर दलों व नेताओं के अपने अपने स्वार्थ जग जाहिर हैं। अधिकतर लोगों की नजर में देश बाद में और दल व निजी हित पहले है। गठबंधन की सरकारों के दौर में प्रधानमंत्री अक्सर निस्सहाय नजर आते हैं। केंद्र सरकार में कोई कमी रह गई या फिर कोई गलती हो गई तो प्रधानमंत्री तुरंत कह देते हैं कि यह तो गठबंधन सरकार की मजबूरी है।

कई बार इस कारण देश ही नहीं पूरी दुनिया में भारत सरकार की स्थिति अजीब दिखाई पड़ने लगती है। ऐसी स्थिति में किसी ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाना और भी जरूरी है जिसमें नैतिक धाक हो और समय पर सरकार को उचित सलाह दे। क्या ऐसा हो पाएगा ? यदि ऐसा हो जाता तो अनौपचारिक तौर पर ही सही, पर सरकार के लिए यदा -कदा जरूरत पड़ने  पर अधिकार विहीन अभिभावक व सलाहकार की भूमिका निभाता। वैसी नौबत आ सकती है जो देश के हालात बनते जा रहे हैं। ऐसा भी हो सकता है कि कोई भी अगला राष्ट्रपति इस बात का ध्यान रखे कि देश सही दिशा में आगे बढ़े और संविधान व कानून का शासन कायम हो। अभी तो कई बार यह लगता है कि देश में कानून व संविधान का शासन नहीं है।

राष्ट्रपति को संविधान ने यह अधिकार जरूर दिया है कि वह संसद के दोनों
सदनों को संदेश भेज सकते हैं। यदि कोई सरकार अपने कर्तव्यों को भूल कर कोई ऐसा कदम उठाए जो देशहित में नहीं हो तो वैसी आपात स्थिति में राष्ट्रपति संसद को संदेश भेज सकते हैं। किसी नैतिक धाक वाले राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए उस संदेश से कम से कम देश को यह तो पता चलेगा कि कहां गलत या कहां सही हो रहा है। भले सरकार उनके संदेश की उपेक्षा करे। या यह भी हो सकता है कि गठबंधन की मजबूरी का रोना रोने वाले प्रधानमंत्रियों के इस दौर में राष्ट्रपति के किसी निर्दोष हस्तक्षेप को आधार बना कर ही शायद सरकार कुछ अच्छे काम कर दे। या फिर किसी गलत कदम को रोक दिया जाए।

   सीमित अधिकारों के बावजूद कई बार राष्ट्रपतियों  राष्ट्रपतियों ने आजादी के बाद से ही सरकार के रूटीन कामों में हस्तक्षेप किया है। यह संवैधानिक व्यवस्था है कि संसद में पारित कोई विधेयक तब तक कानून नहीं बन सकता जब तक कि राष्ट्रपति का उस पर दस्तखत नहीं हो जाए। कई बार राष्ट्रपतियों ने विवादास्पद विधेयक पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया है। हालांकि इस मामले में भी राष्ट्रपति को सीमित अधिकार है। पर, एक बार इनकार की खबर और इनकार के कारणों की सूचना देश को मिल जाएगी तो उसका जन मानस पर सकारात्मक असर पड़ेगा। पर इसके लिए जरूरी है कि राष्ट्रपति पद पर बैठा व्यक्ति विवेकवान हो।

  कम से कम राष्ट्रपति के पद को किसी जातीय, क्षेत्रीय या सामाजिक कोटे से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके लिए बहुत सारे अन्य पद इस देश में उपलब्ध हैं। वे पद अधिक अधिकार वाले भी हैं। अभी प्रतिभा सिंह पाटील महामहिम राष्ट्रपति हैं। जब वह बनी थीं तो कहा गया था कि इससे महिलाओं का सम्मान बढ़ेगा, उनपर जुल्म कम होगा और उनका सशक्तीकरण होगा। पर क्या ऐसा हुआ? कोई नहीं कहेगा कि प्रतिभा पाटील के राष्ट्रपति बनने से देश की महिलाओं के जीवन में कोई फर्क आया है। यही बात अन्य समुदायों, जातियों व क्षेत्रों का भी है। उनके राष्ट्रपति पद पर पहुंचने से क्या हुआ?  मुस्लिम समुदाय से आने वाली तीन हस्तियां अब तक राष्ट्रपति बन चुकी हैं। इससे क्या फर्क पड़ा मुस्लिम समुदाय की दशा-दिशा पर ? सच्चर समिति की रपट बताती है कि कोई फर्क नहीं पड़ा। सबसे लंबे समय तक डा. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति रहे। वह बिहार के थे। आज बिहार देश के सबसे पिछड़े प्रदेशों में है।

  इसलिए लिंग, जाति या समुदाय के बदले व्यक्तियों के व्यक्तित्व पर ध्यान देने की आज अधिक जरूरत है चाहे वे किसी वर्ग से आते हों। क्योंकि देश के सामने नाजुक समस्याएं आने वाली हैं, ऐसी आशंका जाहिर की जा रही है। उस समस्या के मुकाबले के लिए न सिर्फ प्रधानमंत्री के पद पर बल्कि राष्ट्रपति के पद पर भी ऐसे व्यक्ति होने चाहिए जो व्यक्ति या दल की ओर देख कर निर्णय नहीं करे बल्कि देश और देशवासियों की ओर देख कर फैसले करें। ऐसे व्यक्ति मिल जाएंगे, यदि ईमानदारी से उसकी तलाश हो।

यह जरूरी है। या जो भी व्यक्ति उस पद पर आने वाले दिनों में बैठें, वे अन्य बातों को भूल कर सिर्फ देश और जनता का ध्यान रखें न कि आपातकाल के समय के राष्ट्रपति की तरह सरकार का रबर स्टाम्प बनें।

(इसका संपादित अंश हिंदी पाक्षिक द पब्लिक एजेंडा :  31 मई 2012: में प्रकाशित) 

शनिवार, 10 सितंबर 2011

उपाधियों के खिलाफ थी संविधान सभा


भारतीय संविधान सभा ने 30 अप्रैल 1947 को यह प्रस्ताव स्वीकार किया था कि ‘यूनियन द्वारा कोई उपाधि नहीं दी जाएगी। यूनियन का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। राज्य के अधीन किसी लाभप्रद या विश्वसनीय पद पर काम करने वाला कोई व्यक्ति बिना सरकार के सहमत हुए किसी विदेशी राज्य से किसी प्रकार का कोई उपहार, वेतन, पद या उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। ’यह प्रस्ताव सरदार बल्लभ भाई पटेल ने रखा था।

पर, आज जो हमारा संविधान उपलब्ध है, उसमें उपाधियों से संबंंिधत अनुच्छेद -18 में लिखा हुआ है कि ‘सेना या विद्या संबंधित सम्मान के सिवाय और कोई उपाधि राज्य प्रदान नहीं करेगा। भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा।’

यानी समय के साथ हमने कुछ संशोधनों के साथ उपाधियों का तो खात्मा कर दिया, पर अलंकरणों की परंपरा जरूर शुरू कर दीं। उपाधियां और अलंकरण एक जैसे ही लगते हैं।

वे अलंकरण हैं भारत रत्न और पद्म पुरस्कार। बगल के देश पाकिस्तान में निशान-ए-पाकिस्तान वहां का सबसे बड़ा नागरिक अलंकरण है। वह हमारे देश के मोरारजी देसाई और दिलीप कुमार को भी मिला। हमने भारत रत्न मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व पाकिस्तान के नागरिक खान अब्दुल गफार खान को भी दिया।

अंग्रेज शासक नाइटहुड, राय बहादुर और खान बहादुर जैसी उपाधियां देते थे। अब पद्म विभूषण और पद्म भूषण जैसे अलंकरण हैं। अंग्रेज आम तौर पर अपने समर्थकों को उपाधियां देते थे। भारत की सरकारें भी आम तौर पर अपनी ही विचारधारा के लोगों को अलंकृत करती हैं। अपवादों की बात और है।

संविधान सभा में श्रीप्रकाश ने कहा था कि यदि जनता किसी नेता को सम्मानित करना चाहती है तो वह कर सकती है। लेकिन हम इस घातक दुराचार उत्पन्न करने वाली प्रथा को मिटाना चाहते हैं जो व्यक्तियों को विवश करती है कि किसी सम्मान विशेष की प्राप्ति के लिए अधिकारियों से अनुग्रह भिक्षा मांगता फिरे।

आजादी के करीब 64 साल बाद इन दिनों पद्म पुरस्कारों की क्या स्थिति है? अपवादों को छोड़कर ये पुरस्कार आये दिन विवादों में रहते हैं।

कानूनन मनाही के बावजूद कई पुरस्कृत महानुभाव इन पुरस्कारों को अपने लेटर हेड, विजिटिंग कार्ड और नेम प्लेट में लिख लेते हैं। इन पुरस्कारों के लिए नामों के चयन में कई बार प्रतिभा, योग्यता, क्षमता और देश सेवा से इतर कारण होते हैं। कई बार लेन-देन की भी बातें सुनी जाती हैं। मोरारजी देसाई की सरकार ने 1977 में इन पुरस्कारों व अलंकरणों को बंद कर दिया था। पर बाद में इंदिरा जी के शासनकाल में दुबारा शुरू कर दिया गया।

संविधान सभा में सेठ गोविंद दास ने कहा था कि फ्रांस की क्रांति और रूस की क्रांति के बाद वहां पर जितनी उपाधियां थीं, वे तमाम वापस ले ली र्गइं। मैं सरदार जी से पूछना चाहता हूं कि क्या वे गुलामी के तमगों से लोगों का उद्धार नहीं करना चाहते ? मैं चाहता हूं कि जो भी उपाधि उनके पास हैं, वह भी वापस ले ली जाएं। इस समय के उपाधिधारी भी स्वतंत्र भारत में उसी प्रकार के व्यक्तियों की तरह रह सकेंगे जिस तरह अन्य व्यक्ति रहेंगे।

दरअसल सरकार के पक्ष में कोई विशेष काम कर देने के लिए या करने की उम्मीद में या फिर अपनी सल्तनत को मजबूती प्रदान करने के लिए अंग्रेज शासक कतिपय गणमान्य लोगों को राय बहादुर -खान बहादुर या फिर इस तरह की अन्य उपाधियां देते थे। भारतीय संविधान सभा के अधिकतर सदस्यों ने ऐसी उपाधियों के खिलाफ सख्त टिप्पणियां की थीं। सब तो नहीं, पर संभवतः अधिकतर ऐसे उपाधिधारकों ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों का ही साथ दिया था।

यहां भी फणीश्वर नाथ रेणु का उदाहरण है जिन्होंने जेपी पर पुलिस लाठी प्रहार के खिलाफ 1974 में पद्मश्री का अलंकरण लौटा दिया था। उससे पहले जालियांवाला बाग नरसंहार के खिलाफ कवि गुरू रवींद्र नाथ टैगोर ने नाइटहुड की उपाधि लौटा दी थी जो उन्हें 1915 में मिली थी।

साथ ही, यह बात भी देखी गई कि अधिकतर लोगों ने नहीं लौटाई। न ही वे इतिहास के नाजुक मौकों पर स्वतंत्र चेतना के साथ कदम उठा पाए।

संविधान सभा के सदस्य इस बात से अवगत थे। इसीलिए वे आजाद भारत में ऐसे नागरिक चाहते थे जो किसी उपाधि के दबाव में आकर निर्णय नहीं करे। पर आज क्या हो रहा है? अनेक क्षेत्रों में जो गिरावटें बढ़ती जा रही हैं, उससे हमारे संविधान निर्माता परलोक में अपने सिर धुन रहे होंगे।

संविधान सभा में एम.आर. मसानी ने ठीक ही कहा था कि केवल पराधीन देशों में ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र कहे जाने वाले देशों में भी यह देखा गया है कि लेने वालों और देने वालों के लिए भी उपाधियां खतरनाक और दुराचरण का कारण बन जाती हैं। इसलिए देश भक्ति, आत्म सम्मान और सेवा भावना पर विश्वास रखते हुए बिना किसी प्रकार की उपाधियों के हम अपने काम करेंगे।

संबंधित प्रस्ताव पेश करते हुए सरदार पटेल ने कहा था कि विभिन्न कमेटियों में विचार विमर्श के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यूनियन द्वारा कोई उपाधि नहीं दी जाएगी।

रविवार, 4 सितंबर 2011

इमरजेंसी में जार्ज फर्नांडीस से मुलाकात

25 जून 1975 को जब आपातकाल लगा तो उस समय जार्ज फर्नांडीस उड़ीसा में थे। अपनी पोशाक बदल कर जुलाई में जार्ज पटना आये और तत्कालीन समाजवादी विधान पार्षद रेवतीकांत सिंहा के आर. ब्लाक स्थित सरकारी आवास में टिके। इन पंक्तियों का लेखक भी उनसे मिला जो उन दिनों जार्ज द्वारा संपादित चर्चित साप्ताहिक पत्रिका प्रतिपक्ष का पटना संवाददाता था। जार्ज दो तीन दिन पटना रह कर इलाहाबाद चले गये।

बाद में उन्होंने मध्य प्रदेश के प्रमुख समाजवादी नेता लाड़ली मोहन निगम को इस संदेश के साथ पटना भेजा कि वे मुझे और शिवानंद तिवारी को जल्द विमान से बंगलुरू लेकर आयें। शिवानंद जी तो उपलब्ध नहीं हुए। पर मैं निगम जी के साथ मुम्बई होते हुए बंगलुरू पहुंचा।

वहां जार्ज के साथ तय योजना के अनुसार राम बहादुर सिंह, शिवानंद तिवारी, विनोदानंद सिंह, राम अवधेश सिंह और डा. विनयन को लेकर मुझे कोलकाता पहुंचना था। पटना लौटने पर मैंने उपर्युक्त नेताओं की तलाश की। पर इनमें से कुछ जेल जा चुके थे या फिर गहरे भूमिगत हो चुके थे। सिर्फ डा. विनयन उपलब्ध थे। उनके साथ मैं धनबाद गया।

याद रहे कि आपातकाल में कांग्रेस विरोधी राजनीतिक नेताओं -कार्यकर्त्ताओं पर सरकार भारी आतंक ढा रही थी। राजनीतिककर्मियों के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना तक कठिन था। भूमिगत जीवन जेल जीवन की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद था।

धनबाद में समाजवादी लाल साहेब सिंह से पता चला कि राम अवधेश तो कोलकाता में ही हैं तो फिर हम कोलकाता गये। वहां जार्ज से हमारी मुलाकात हुई। पर वह मुलाकात सनसनीखेज थी।

जार्ज ने दक्षिण भारत के ही एक गैरराजनीतिक व्यक्ति का पता दिया था। उस व्यक्ति का नाम तीन अक्षरों का था। जार्ज ने कहा था कि इन तीन अक्षरों को कागज के तीन टुकड़ों पर अलग अलग लिखकर तीन पॉकेट में रख लीजिए ताकि गिरतार होने की स्थिति में पुलिस को यह पता नहीं चल सके कि किससे मिलने कहां जा रहे हो। यही किया गया। पार्क स्ट्रीट के एक बंगले में मुलाकात हुई। दक्षिण भारतीय सज्जन ने कह दिया था कि बंगले के मालिक के कमरे में जब भी बैठिए, उनसे हिंदी में बात नहीं कीजिए। अन्यथा उन्हें शक हो जाएगा कि आप मेरे अतिथि हैं भी या नहीं।

उस दक्षिण भारतीय सज्जन ने हमें जार्ज से मुलाकात करा दी। हम एक बड़े चर्च के अहाते में गये। जार्ज उस समय एक पादरी की पोशाक में थे। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। चश्मा बदला हुआ था और हाथ में एक विदेशी लेखक की मोटी अंग्रेजी किताब थी। जार्ज, विनयन और मुझसे देर तक बातचीत करते रहे। फिर हम राम अवधेश की तलाश में उल्टा डांगा मुहल्ले की ओर चल दिये। वहीं की एक झोपड़ी में हम टिके भी थे। फुटपाथ पर स्थित नल पर नहाते थे और बगल की जलेबी-चाय दुकान में खाते-पीते थे।

उल्टा डांगा का वह पूरा इलाका बिहार के लोगांे ंसे भरा हुआ था। जार्ज के साथ टैक्सी में हम लोग वहां पहुंचे थे। हम जार्ज को उस चाय की दुकान पर ही छोड़ दिया और राम अवधेश की तलाश में उस झोपड़ी की ओर बढ़े। पर पता चला कि राम अवधेश जी भूमिगत कर्पूरी ठाकुर के साथ कोलकाता में ही कहीं और हैं।

चाय की दुकान पर बैठे जार्ज ने इस बीच चाय पी थी। जब हम लौटे और जार्ज चाय का पैसा देने लगे तो दुकानदार उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया आर कहा, हुजूर हम आपसे पैसा नहीं लेंगे। इस पर जार्ज घबरा गये। उन्हें लग गया कि वे पहचान लिये गये। अब गिरतारी में देर नहीं होगी। जार्ज को परेशान देखकर मैं भी पहले तो घबराया, पर मुझे बात समझने में देर नहीं लगी। मैंने कहा कि जार्ज साहब, चलिए मैं इन्हें बाद में पैसे दे दूंगा। मैं यहीं टिका हुआ हूं। फिर अत्यंत तेजी से हम टैक्सी की ओर बढ़े जो दूर हमारा इंतजार कर रही थी। फिर हमें बीच कहीं छोड़ते हुए अगली मुलाकात का वादा करके जार्ज कहीं और चले गये।

आपातकाल में जिस तरह जान हथेली पर लेकर जार्ज फर्नांडीस ने अपने उसूलों के लिए बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी, यदि मंत्री बनने के बाद भी वे उसी तरह अपने उसूलों पर पूरी तरह खरा उतरे होते तो समाजवादी आंदोलन आगे बढ़ जाता। अक्सर उन कार्यकर्त्ताओं के मन में यह बात आती रहती है जिन लोगों ने भी कभी अपनी जान हथेली पर रखकर उनके साथ काम किया था और जिन्होंने बाद में भी सरकार से कभी कुछ नहीं लिया।

याद रहे कि आपातकाल में जार्ज और उनके साथियों पर बड़ौदा डायनामाइट केस को लेकर मुकदमा चला। सी.बी.आई. का आरोप था कि पटना में जुलाई 1975 मेें जार्ज फर्नाडीस, रेवती कांत सिंह, महेंद्र नारायण वाजपेयी और इन पंक्तियों के लेखक यानी चार लोगों ने मिलकर एक राष्ट्रद्रोही षड्यंत्र किया। षड्यंत्र यह रचा गया कि डायनाइट से देश के महत्वपूर्ण संस्थानों को उड़ा देना है और देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर देनी है। सन 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनने पर यह केस उठा लिया गया।


( प्रभात खबर से साभार )

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

ऐसे विफल कर दी गई एक गांधीवादी की भूमि सुधार योजना

जय प्रकाश नारायण का सपना था कि कोशी क्षेत्र में माॅडल भूमि सुधार कार्यक्रम चलाया जाए। यह सन 1978 की बात है। तब कर्पूरी ठाकुर की सरकार थी। स्वाभाविक ही था कि कर्पूरी ठाकुर इस काम के लिए तत्काल राजी हो जाएं। इस काम के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान से गांधीवादी बी।जी. वर्गीस पटना आये थे।

इस भूमि सुधार कार्यक्रम के तहत भूमि समस्याग्रस्त पूर्णिया जिले के पांच प्रखंडों में भूमि के रिकाॅर्ड को अद्यतन करना था। हदबंदी से फालतू घोषित जमीन का अधिग्रहण व भूमिहीनों में उनका वितरण करना था। साथ ही बटाईदारों के अधिकारों को स्वीकृति दिलानी थी। फिर उन चुने हुए पांच प्रखंडों के सर्वांगीण विकास का काम करना था। इसका नाम दिया गया कोशी क्रांति योजना।

इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए जेपी की सलाह पर बिहार सरकार ने तत्काल अलग से एक सरकारी कोषांग का गठन भी कर दिया और उसमें एक उपायुक्त व कई स्तरों के 119 अन्य लोक सेवक तैनात कर दिये गये। पर जैसे ही बनमनखी, भवानीपुर, बरहरा कोठी, धमदाहा और रुपौली में इस काम की शुरुआत करने की प्रक्रिया शुरू हुई कि भूस्वामियों और सामंती प्रवत्ति के लोगों व उनके संरक्षक नेताओं ने तगड़ा विरोध शुरू कर दिया। उस इलाके के सत्ताधारी जनता पार्टी के अनेक दबंग जन प्रतिनिधियों ने कर्पूरी सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया। पटना में भी गोलबंदी शुरू हो गई। कर्पूरी सरकार के गिरने की नौबत आ गई। कर्पूरी ठाकुर दबाव में आ गए। जेपी मन मसोस कर रह गये। और बी।जी. वर्गीस अपनी आंखों में आंसू लिए दिल्ली लौट गये। कोशी क्रांति योजना निष्क्रिय हो गई।

भूमिपतियों का दबाव इतना बढ़ा कि इस संबंध में वर्गीस ने जो लम्बा लेख लिखा था, उसकी एक ही किस्त एक अखबार में छप सकी। दूसरी किस्त छापने की हिम्मत उस अखबार ने भी नहीं की। इस प्रकरण ने यह बात साबित कर दी कि बिहार में भूमि संबंधों को बदलने का मुद्दा कितना नाजुक है और यह काम कितना कठिन है।

अब उस कोशी क्रांति योजना के बारे में प्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया द्वारा 2 अप्रैल, 1981 को जारी एक खबर का एक हिस्सा पढ़िए, ‘पूर्णिया, 2 अप्रैल (प्रे)। पूर्णिया जिले के पांच प्रखंडों में तीन वर्ष पूर्व शुरू की गई कोशी क्रांति योजना भूस्वामियों और भूमिहीनों के बीच सीधा टकराव उत्पन्न कर अपने ही भार से दबी जा रही है।

यहां अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस योजना की सफलता की उम्मीद नगण्य है। क्योंकि राजनीतिक संरक्षणप्राप्त कुछ भूस्वामी इस योजना के प्रत्येक स्तर पर अवरोध उत्पन्न कर रहे हैं। स्थानीय नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि भूमि सुधार के काम बंद नहीं किए गए तो परसबिगहा कांड की पुनरावत्ति हो सकती है। याद रहे कि मध्य बिहार के परसबिगहा में एक जमीन विवाद के चलते कई लोगों को उनके घर में बाहर से बंद कर उन्हें जिंदा जला दिया गया था।

प्रेस ट्रस्ट के अनुसार गांधी शांति प्रतिष्ठान के श्री बीजी।वर्गीस की कोशी क्रांति योजना को तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने 1978 में पूर्णिया जिले में माडल भूमि सुधार कार्यक्रम के रूप में शुरू किया था। भूमि सुधार के उपायुक्त के अनुसार दोषपूर्ण भूमि पद्धति और उपज में हिस्सा बंटाने की शोषणात्मक प्रवृत्ति आदि को देखते हुए इस योजना की आवश्यकता महसूस की गई थी। एक अधिकारी के अनुसार दो वर्षों में कार्य का केवल पहला भाग ही पूरा किया जा सका। अधिकारी ने प्रेस ट्रस्ट से बातचीत में यह स्वीकार किया कि इस गति से समस्या के समाधान में एक दशक लग जाएगा। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार पूर्णिया जिले में लगभग 10 हजार ऐसे भूस्वामी हैं जिनके पास एक सौ एकड़ से अधिक भूमि है। इस क्षेत्र की भूमि समस्या 50 साल पुरानी है। उस समय यह पूरा क्षेत्र घना जंगल था।’

कोशी क्रांति योजना ही नहीं, बाद के वर्षों में भी जब -जब भूमि सुधार की कोशिश हुई, भूस्वामियों ने तगड़ा विरोध कर दिया। दरअसल रोजगार के अन्य साधन विकसित नहीं होने के कारण भी भूस्वामी अपनी जमीन के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं और वे अपनी जमीन पर उनके स्वामित्व के मामले में किसी तरह के हल्के खतरे का भी पूरी जी-जान से विरोध कर देते हैं। आजादी के बाद राज्य का आम विकास हुआ होता तो जमीन मोह कम होता। पर सरकारी भ्रष्टाचार के कारण विकास नहीं हुआ।

इसी तरह 1992 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भूमि सुधार खास कर बंटाईदार कानून को सख्त करने की कोशिश की तो उनके ही वोट बैंक के तबके से भी इसका तगड़ा विरोध हो गया। भारी दबाव के बीच तब ही लालू प्रसाद ने कह दिया था कि मैं बर्र के छत्ते में हाथ नहीं डालूंगा। भ्ूमि सुधार के प्रति अपनी 1992 की नीति पर लालू प्रसाद तब तक कायम रहे जबतक वे और राबड़ी देवी सत्ता में थे।

(प्रभात खबर: 2 अक्तूबर, 2009 से साभार)