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मंगलवार, 12 जून 2018

दोहरे मापदंड की एक और मिसाल

संघ परिवार को लेकर कांग्रेसियों-कम्युनिस्टों का एक बार फिर दोहरा रवैया सामने आया है। तथाकथित ‘सेक्युलर’ जमात का कोई बड़ा नेता जब आर.एस.एस. से संपर्क साधता है तो उसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठती। पर कोई दूसरा नेता जब संघ मुख्यालय जाता है तो हाय -तौबा मचा दिया जाता है। कहा जाता है कि संघ परिवार को प्रतिष्ठा दी जा रही है। उसे ताकतवर बनाया जा रहा है। इससे भाजपा ताकतवर होती है।

जबकि संघ परिवार के ताकतवर बनने के कारण कुछ और होते हैं। दरअसल तथाकथित सेक्युलर जमात की कमजोरियों -विफलताओं का लाभ संघ परिवार को मिलता रहा है। पर सेक्युलर जमात उन कमजोरियों पर काबू पाने की जगह आरोप-प्रत्यारोप से ही अपना काम निकाल लेना चाहती है। इन दिनों उनका प्रयास देश में महागठबंधन बनाकर संघ परिवार यानी भाजपा यानी राजग को पराजित करने का है। संभव है कि वे उसमें सफल भी हो जाएं। पर क्या वह जीत स्थायी होेगी?

हाल के कुछ उपचुनाव नतीजों ने सेक्युलर जमात का मनोबल बढ़ाया है। पर, जब तक सेक्युलर जमात अपनी कमजोरियों पर काबू पाने की कोशिश नहीं करेगी तब तक उसे कोई स्थायी राजनीतिक लाभ नहीं मिलेगा। इस बीच वह जमात आरोप -प्रत्यारोप से ही अपना काम चला लेना चाहती है। पर उन आरोपों में भी दोहरा मापदंड नजर आता है।  

एक राजनीतिक दल जब भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाता है तो उसे बुरा नहीं माना जाता।पर दूसरे दल को ऐसी छूट देने को सेक्युलर जमात तैयार ही नहीं है।

नेहरू, इंदिरा और लाल बहादुर शास्त्री 

यदि 1963 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को बुलाया था तो कम्युनिस्टों व कांग्रेसियों के लिए वह कोई हर्ज की बात नहीं थी। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि बुलाने की खबर ही सही नहीं है। यदि नहीं बुलाया गया था तो बुलाने की उस खबर का कांग्रेस खंडन क्यों नहीं करती ? जबकि खुद जवाहर लाल नेहरू ने तब कहा था कि ‘मेरी पार्टी का संघ के साथ वैचारिक मतभेद हो सकता है, पर जब देश संकट में हो तो हम सबको एकजुट होकर काम करना चाहिए।’ बाद के वर्षों में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिल्ली की ट्राफिक व्यवस्था के संचालन का भार संघ को दिया था तो भी कोई एतराज नहीं हुआ।

पर, जब पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इस महीने नागपुर गए तो माकपा महासचिव सीताराम येचुरी को इस बात से सख्त एतराज था कि प्रणव जी ने वहां गांधी हत्याकांड की चर्चा क्यों नहीं की! कांग्रेस के कुछ नेताओं ने पहले तो उन्हें जाने से ही रोकने की कोशिश की। नहीं माने तो उन लोगों ने कुछ आशंकाएं भी जाहिर कीं। पर, प्रणव मुखर्जी वहां से जब एक संतुलित भाषण देकर आए तो कांग्रेसी ठंडे पड़ गए। पर उनमें से कुछ कांग्रेसियों के मन में यह मलाल फिर भी रहा कि वे गए ही क्यों ?  

ऐसा ही मलाल उन्हें इंदिरा गांधी को लेकर नहीं हुआ था जब 1977 में संघ परिवार के निमंत्रण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने विवेकानंद राॅक मेमोरियल का उद्घाटन किया था। तब किसी कम्युनिस्ट या कांग्रेसी नेता ने संघ की पृष्ठभूमि को लेकर कोई विवाद खड़ा करने की कोशिश नहीं की।
यह नहीं कहा गया कि इंदिरा जी ने वहां गांधी हत्याकांड का मामला क्यों नहीं उठाया।

जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी को लेकर कोई कांग्रेसी या कम्युनिस्ट आज भी सवाल नहीं उठा रहा हैं। इस पर भी कोई चर्चा नहीं है कि देश के सामने जो संकट उस समय था, उतना ही बड़ा संकट आज है या नहीं।

पर प्रणव मुखर्जी की नागपुर यात्रा पर तरह -तरह की बातें की गयी। कुछ कम्युनिस्ट नेता अब भी मीन -मेख निकालने में लगे हैं। एक बड़े कम्युनिस्ट नेता यह उम्मीद कर रहे थे कि जिसके आमंत्रण पर जाओ, उसके यहां जाकर उसे ही खरी -खोटी सुना कर वापस आ जाओ। कम से कम प्रणव मुखर्जी की यह संस्कृति नहीं रही है।

इससे पहले भी संघ को लेकर कई कम्युनिस्ट नेता समाजवादियों पर भी आरोप लगाते रहे हैं।
आरोप बे सिर पैर का है। क्योंकि कम्युनिस्टों की कसौटी मानी जाए तो ऐसा ही आरोप खुद उन पर भी है। उनका आरोप यह रहा है कि सोशलिस्टों ने ही संघ परिवार के लिए इस देश में राजनीतिक जमीन तैयार की। यानी संघ -जनसंघ-भाजपा को मजबूत किया। 

इस संबंध में भी उनका तर्क यह है कि जनसंघ और बाद में भाजपा के साथ मिली -जुली सरकार बनाकर सोशलिस्टों ने संघ परिवार को समाज मेंं प्रतिष्ठा भी दिला दी। उससे पहले उसे राजनीतिक तौर पर अछूत माना जाता था।

दरअसल 1966-67 में प्रतिष्ठा तो सी.पी.एम. के नेताओं को भी मिली जो 1962 में अपनी चीनपक्षी रवैये के कारण अलग -थलग पड़ गए लगते थे। दरअसल 1967 के आम चुनाव के बाद में देश के सात राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गयीं। बाद में अन्य दो राज्यों में कुछ कांग्रेसी विधायकों के दलबदल के कारण कांग्रेसी सरकारें गिर गयीं। वहां भी गैर कांग्रेसी सरकारें बन गयीं।

बिहार और उत्तर प्रदेश के मंत्रिमंडलों में एक साथ सी.पी.आई. और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य शामिल किए गए थे। उन सरकारों में जनसंघ के प्रतिनिधि भी थे। देश में सोशलिस्टों व जनसंघियों ने पहली बार सत्ता में हिस्सेदारी की थी। पर उन मंत्रिमंडलों में सी.पी.आई. के प्रतिनिधि भी तो थे। यदि सोशलिस्टों ने इस तरह जनसंघ को बढ़ाया और सम्मानित किया तो उसका श्रेय सी.पी.आई. को भी तो जाता है। आखिर वे उन मंत्रिमंडलों में क्यों शामिल हो गए थे जिनमें जनसंघ भी था ?

पर सी.पी.आई. के नेता खुद को उसके लिए जिम्मेदार नहीं मानते। दोहरे मापदंड का इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है ? याद रहे कि 1966 में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कुछ गैर कांग्रेसी दलों को एक साथ आने पर राजी किया था। उनका तर्क था कि गैर कांग्रेसी दलों के आपस में मिलने के सिवा और कोई उपाय नहीं है। क्योंकि कांग्रेस प्रतिपक्ष के वोट के बंटवारे का लाभ उठाकर चुनाव—दर चुनाव सत्ता हासिल करती जा रही है। 

परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से भाजपा के साथ थे कम्युनिस्ट

यही नहीं, सन 1989 में जब केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी तो भाजपा और कम्युनिस्ट उस सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे। क्या उससे भाजपा की ताकत नहीं बढ़ी ? यानी परोक्ष या प्रत्यक्ष ढंग से भाजपा के साथ काम करने के बावजूद  कम्युनिस्ट खुद को जिम्मेदार नहीं मानते, पर दूसरे दल को जिम्मेदार जरूर ठहरा देते हैं।

सन 2014 के लोकसभा चुनाव में राजग की भारी जीत के बाद कांग्रेस ने पूर्व रक्षामंत्री ए.के. एंटोनी के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई। हार के कारणों की जांच का भार उसे दिया गया। जून, 2014 में एंटोनी ने अन्य बातों के साथ-साथ यह भी कहा कि ‘मुस्लिम तुष्टिकरण कांग्रेस की हार का मुख्य कारण है। जनता में संतुलित धर्म निरपेक्षता वाली हमारी साख अब नहीं रही।’

जो बात एंटोनी ने नहीं कही, वह यह है कि राजग खासकर भाजपा के उभार का दूसरा बड़ा कारण मनमोहन सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। याद रहे कि अपने शासनकाल में जांच के बदले मनमोहन सरकार उन आरोप को गलत बताती रही। इससे जनरोष बढ़ा जिसका लाभ सबसे बड़े विपक्षी गठबंधन यानी राजग को मिला। यानी राजग की जीत में राजग से अधिक यू.पी.ए. सरकार का ‘योगदान’ था।

हाल के दिनों में भी कुछ नेता यह कहते रहे कि यह सब सोशलिस्टों की ही कारस्तानी है।
अधिकतर राजग विरोधी दल आज भी उन दो प्रमुख कारणों को समाप्त करने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं जो 2014 में हार के कारण बने थे। इसके बदले वे दलीय गठजोड़ पर जोर दे रहे हैं।यानी गुण के बदले मात्रा पर जोर है। पता नहीं, यह कितना कारगर व स्थायी साबित होगा? 

पर आम धारणा यही है कि अपनी हर विफलता के लिए किसी और दोषी ठहराकर कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता।

(मेरे इस लेख का संपादित अंश 10 जून 2018 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)

शनिवार, 5 मई 2018

समाज को शिक्षित करने का प्रस्ताव

 पूर्व सांसद प्रो.रंजन प्रसाद यादव के संरक्षकत्व वाले गैर राजनीतिक संगठन ‘यादव जागरण मंच’ के सम्मेलन ने  समाज को शिक्षित करने का कल एक प्रस्ताव पारित किया। यह एक जरूरी पहल है। किसी भी जाति के जिन परिवारों में पहली बार शिक्षा आयी, उन परिवारों को विकसित होते मैंने देखा है।

यादवों के साथ -साथ कुछ अन्य जातियों में भी शिक्षा का उतना फैलाव नहीं हुआ है जितना आजादी के बाद हो जाना चाहिए था।

मेरी राय है कि जो लोग अपनी जाति के कल्याण की बातें विभिन्न मंचों से करते रहते हैं, उन्हें पहले अपनी -अपनी जातियों में शिक्षा के फैलाव और व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
जिन जातियों में कई कारणों से अब भी शिक्षा के प्रति अपेक्षाकृत अधिक  अरूचि है,उनके बीच काम करने की अधिक जरूरत है।

इस संबंध में ‘ डा.आम्बेडकर संपूर्ण ’ में एक प्रकरण आता है। वह प्रकरण सन 1858 का है। बंबई प्रेसिडेंसी के शिक्षा विभाग की एक रपट के अनुसार सरकार ने चार जातियों के बीच शिक्षा के प्रसार की कोशिश की थी।
तीन जातियों में तो शिक्षा के प्रति उत्साह देखा गया। पर एक खास जाति के बारे में पता चला कि उनकी रूचि नहीं है।वे अपने पूर्वजों की वीर गाथा में डूबे हुए थे।
बाद के वर्षों में भी शिथिलता रही थी। हालांकि  अब वैसी स्थिति नहीं है।काफी बदलाव आया है।फिर भी कुछ अन्य जातियों के साथ-साथ उस जाति में भी इस दिशा में काम करने की अभी जरूरत है।    

शनिवार, 16 सितंबर 2017

वंशवादी राजनीति के बुरे नतीजे

सबसे पहले कांग्रेस ने इस देश की राजनीति में वंशवाद की शुरुआत की और जब कुछ अन्य दलों ने उसे अपना लिया तो अब राहुल गांधी कह रहे हैं कि ‘भारत ऐसे ही चलता है। यह भारत के अधिकतर दलों की समस्या है।’ जिसने शुरू किया, वही इसे समाप्त करने की पहल करे तो कांग्रेस भी बच सकती है और अन्य दल भी।
कांगे्रस यदाकदा यह कहती रही है कि जवाहर लाल नेहरू ने इस देश को वैज्ञानिक सोच दी। अनेक उच्चस्तरीय संस्थान भी दिए। पर वह यह कहना भूल जाती है कि सर्वाधिक समय तक इस देश पर राज करने वाली कांग्रेस के शासनकाल में यदि गरीबी बढ़ी, भ्रष्टाचार फैला और वंशवाद-परिवारवाद कायम हुआ तो उसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाए ?


मीठा-मीठा गप और कड़ुआ कड़ुआ थू ?

आज तो केंद्र के चारों शीर्ष पदों पर बैठे कोई नेता परिवारवाद की उपज नहीं हैं। फिर भी देश बेहतर ढंग से चल रहा है। अधिकतर आम लोगों की सोच है कि देश बेहतर चलना चाहिए चाहे वंशवादी चलाएं या गैर वंशवादी। पर घटनाएं बताती हैं कि अपवादों को छोड़कर गैर वंशवादियों ने ही देश को बेहतर ढंग से चलाया है।
आज शीर्ष पदों पर गैरवंशवादी ही क्यों बैठे हैं ? आखिर यह कैसे संभव हुआ ? इसलिए संभव हुआ क्योंकि मतदाताओं ने 2014 में कांग्रेस को सत्ता से हटा दिया जो अनेक बुराइयों और विफलताओं की प्रतीक बन चुकी थी। उनमें से अपनी एक -दो विफलताएं तो खुद राहुल गांधी ने भी स्वीकारी हैं।
पर विफलताएं तो अनेक हैं।


राहुल गांधी अपने वंशवाद को जायज ठहराने के लिए 

अखिलेश यादव से लेकर स्टालिन तक का उदाहरण दे रहे हैं। इस तरह वे अपने वंशवाद का बचाव करना चाहते हैं। पर 1928 में तो न कोई अखिलेश थे और न ही कोई स्टालिन। तब कांग्रेस अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे। महात्मा गांधी सर्वोच्च नेता थे।

मोतीलाल ने महात्मा गांधी को लिखा कि ‘वैसे तो सरदार बल्लभ भाई पटेल कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सर्वोत्तम उम्मीदवार हैं, पर आप जवाहर लाल नेहरू को अध्यक्ष बना दीजिए।’

नेहरू मेमोरियल में मोतीलाल पेपर्स पढ़ने के बाद इतिहासकार रिजवान कादरी ने लिखा कि ‘मोतीलाल नेहरू युवा को आगे बढ़ाना चाहते थे।’

आखिर किसी युवा की तलाश सिर्फ अपने ही घर से क्यों? एक चिट्ठी आने के बावजूद महात्मा गांधी जवाहर लाल को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने को तैयार नहीं थे। इसीलिए इसके लिए मोतीलाल नेहरू ने उन्हें दो  चिट्ठयां और लिखीं। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने अन्य हस्तियों से भी गांधी जी को लिखवाया। गांधी भारी दबाव में आ गए।
दरअसल यही तो वंशवाद है जिसे देश के अन्य दलों ने अपने स्वार्थवश बाद में अपनाया। ‘महाजनो येन गतः स पंथाः !’ नब्बे के दशक में लालू प्रसाद ने कहा था कि ‘मेरा परिवार बिहार का नेहरू परिवार है।’ उन्होंने इसे साबित करके भी दिखाया।

वंश को आगे बढ़ाने में मोतीलाल जी को थोड़ी कठिनाई जरूर हुई थी, पर जवाहर लाल नेहरू को नहीं हुई। उन्होंने 1958 में इंदिरा गांधी को 24 सदस्यीय कांग्रेस कार्यसमिति का सदस्य बनवा दिया। उससे पहले जवाहर लाल जी फिरोज गांधी तथा अपने परिवार के अन्य अनेक सदस्यों को महत्वपूर्ण पदों को बिठवा चुके थे।
1959 में जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाने की प्रक्रिया शुरू हुई तो कांग्रेसी सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री महावीर त्यागी ने जवाहर लाल नेहरू को चिट्ठी लिखी। त्यागी ने कई वजहें गिनाते हुए 31 जनवरी 1959 को लिखा कि ‘मेरी राय है कि इंदु को कांग्रेस प्रधान चुने जाने से रोको। या फिर आप प्रधानमंत्री पद से अलग हो जाओ।’उसके जवाब में जवाहर लाल नेहरू ने त्यागी को 1 फरवरी 1959 को लिखा कि ‘मेरा यह भी ख्याल है कि बहुत तरह से उसका इस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष बनना मुफीद होगा।’

आज राहुल गांधी अन्य दलों के वंशवाद की चर्चा कर रहे हैं। पर 1959 में किस दल के किस नेता ने अपनी पार्टी का अध्यक्ष पद अपनी संतान के हवाले कर दिया था ?  अब देखिए इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद क्या किया ? उन्होंने अपने पुत्र संजय गांधी को शासन  का संविधानेत्तर केंद्र बनातेे हुए आपातकाल में उनके जिम्मे एक तरह से सरकार ही सौंप दी थी। संजय गांधी के नहीं रहने के बाद इंदिरा जी ने राजीव गांधी को पार्टी सौंप दी। वे किसी राजनीतिक अनुभव के बिना महासचिव बना दिए गए।

हाल के वर्षों में सोनिया गांधी ने दस साल तक परदे के पीछे से राज चलाया। कैसा राज चला ? लोकसभा में 44 सीटें लायक ही तो। अब राहुल कह रहे हैं कि वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने को तैयार हैं।

वंशवाद की तारीफ होती, यदि वंशवादियों ने सत्ता में आकर देश का सचमुच देश का भला किया होता। यदि भला हुआ होता तो 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा नहीं दिया होता।
आजादी के बाइस साल बाद भी, जिसमें 19 साल एक वंश का शासन रहा हो, आखिर गरीबी क्यों नहीं हटी थी? क्या गरीबी हटाओ का नारा 17 साला शासन पर टिप्पणी नहीं था ?


अमरीकी शोधकर्ता पाॅल आर ब्रास का शोध


अमरीकी शोधकर्ता पाॅल आर ब्रास ने साठ के दशक में उत्तर प्रदेश सरकार में भ्रष्टाचार पर गहन शोध किया था। ब्रास के शोध का नतीजा था कि मंत्रियों ने जिलों में अपने गुटों को ताकत देने के लिए ऊपर से नीचे की ओर सरकारी भ्रष्टाचार को फैलाया।

 जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव ने लिखा है कि नेहरू ने भ्रष्ट मंत्रियों और अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की पोख्ता व्यवस्था इसलिए नहीं की क्योंकि वे मानते थे कि इससे शासन में पस्तहिम्मती आएगी।

जवाहर लाल और इंदिरा गांधी के शासनकाल मंे भ्रष्टाचार का क्या हाल था, उसका जवाब खुद राजीव गांधी ने अस्सी के दशक में दिया था। तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधीे ने कहा था कि हम सौ पैसे दिल्ली से भेजते हैं और गांवों तक उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही मिल पाते हैं।क्या यह एक दिन में हुआ ?

कोई पूछे कि ऐसी नौबत किसने लाई थी ? तो इस सवाल के जवाब के लिए किसी को सिर खुजलाना नहीं पड़ेगा।
 वंशवाद ने तो देश को यही दिया है ! कभी मिस्टर क्लिन कहलाने वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सत्ता के दलालों के खिलाफ आवाज उठाई थी। पर विडंबना यह रही कि बोफर्स तोप सौदे के दलाल को बचाने के प्रयास में ही उन्होंने अपनी गद्दी गंवा दी। यह अनुभवहीनता का परिणाम था या कुछ और ?

 उधर अधिकतर वंशवादी क्षेत्रीय दलों ने सत्ता में आकर तो हदें पार कर दी हैं। वैसे अनेक नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के तहत मुकदमे चल रहे हैं।

इस बीच इन दिनों गैर वंशवादी प्रधानमंत्री सत्ता में हैं। खुद नरेंद्र मोदी कौन कहे, उनके मंत्रिमंडल के किसी सदस्य के खिलाफ किसी भ्रष्टाचार के आरोप की कोई खबर नहीं मिल रही है।

यही नहीं, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो को उनके पद से तभी हटाया जा सका जब 1964 में लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने थे। उनपर और उनके परिजन पर भ्रष्टाचार के आरोप थे। जबकि कैरो के खिलाफ जांच आयोग ने पहले ही अपनी रपट दे रखी थी।
  दरअसल अधिकतर मामलों में वंशवाद और जातिवाद जुड़वा भाई हैं। वंशवादी नेता अपने जातीय वोट बैंक को लेकर निश्चिंत रहते हैं। फिर तो वह समझने लगते हंै कि वह कोई भी अनर्थ करके बच सकते हंै। उसके मतदातागण हर हाल में उसका साथ देते ही रहेंगे। इस प्रचलन-प्रवृत्ति से देश का अधिक नुकसान हुआ है।
 पर जो वंशवादी नहीं हैं, उन्हें सरकार में आने पर कुछ काम करके दिखाना पड़ता है।

(इस लेख का संपादित अंश 15 सितंबर 2017 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

महागठबंधन की राह के कांटें

बिहार जैसा महागठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बनाने की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सलाह मौजूं है। उत्तर प्रदेश की चुनावी हार के बाद प्रतिपक्ष इन दिनों पस्तहिम्मत है। इस पृष्ठभूमि में यदि महागठबंधन बनाने का गंभीर प्रयास भी शुरू हो जाए तो उससे गैर राजग दलों में एक नयी ऊर्जा का संचार हो सकता है।

वैसे भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह ठीक नहीं है कि छितराये प्रतिपक्षी दल अधिक दिनों तक पस्तहिम्मत बने रहें। प्रतिपक्ष की पस्तहिम्मती के माहौल में सत्ताधारी जमात द्वारा मनमानी किए जाने का खतरा बढ़ जाता है।

  नीतीश कुमार की यह सलाह भी सही है कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट महागठबंधन बनाने की दिशा में पहल करें। इससे पहले मणि श्ांकर अय्यर तथा कुछ अन्य नेताओं ने भी ऐसी ही सलाह दी है।

पर नीतीश कुमार की सलाह का महत्व अधिक इसलिए भी है क्योंकि उनके नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार कुछ कठिनाइयों और शिकायतों के बावजूद आराम से चल रही है। इस चर्चा के बीच कि नीतीश राजग में ंजा सकते हैं, बिहार के मुख्यमंत्री की ताजा सलाह प्रतिपक्ष का हौसला बढ़ाने वाली है।

पर अब सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय स्तर पर बिहार जैसा कोई महागठबंधन बनाना आज की स्थिति में संभव भी है ? अभी तो असंभव जरूर लगता है। पर यदि इसके लिए गंभीर और ईमानदार प्रयास अभी से शुरू हो जाएं तो आने वाले दिनों में शायद एक हद तक यह कल्पना साकार रूप ग्रहण कर ले।

यह नरेंद्र मोदी की सरकार अपने लोकलुभावन कामों के जरिए अपनी लोकप्रियता बढ़ाती जा रही है। उसे देशव्यापी दलीय गठजोड़ के जरिए पराजित करने के विचार को एक ठोस राजनीतिक पहल की संज्ञा दी जा सकती है। पर सवाल यह भी है कि क्या मोदी सरकार अगले दो साल में नोटबंदी और बेनामी संपत्ति पर हमला जैसे अपने अन्य चौंकाने वाले कामों से आगे निकल जाती है या प्रतिपक्ष महागठबंधन बना कर 2019 के लोकसभा चुनाव में राजग को मात दे देता है।  

पर, किसी भी महागठबंधन के निर्माण में मुख्यतः तीन कठिनाइयां सामने आ सकती हैं। महागठबंधन का नेता कौन होगा? कुछ दल चाहेंगे कि यह बात पहले ही तय हो जाए।

महागठबंधन को नीति -रीति कैसी होगी? राज्यों के परस्पर विरोधी क्षत्रपों को एक मंच पर कैसे लाया जा सकेगा? प्रतिपक्ष के लिए एक और कठिनाई नरेंद्र मोदी सरकार इस बीच पैदा कर सकती है।

संभव है कि अगले लोकसभा चुनाव के पहले तक मोदी सरकार कुछ ऐसे चौंकाने वाले काम कर दे ताकि महागठबंधन के निर्माण के बावजूद राजग  अपराजेय रहे।

याद रहे कि हाल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राजग को 325 सीटें मिलीं। जबकि उसे 2014 के लोकसभा चुनाव में विधानसभा की 328 सीटों पर बढ़त मिली थी। यानी उसकी 3 सीटें ही घटीं। आम तौर पर लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में विजयी दलों की सीटें काफी घट जाती हैं।

1977 में उत्तर प्रदेश में जनता पार्टी को 425 में से 352 सीटें मिल सकी थीं जबकि उससे तीन ही महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी को लोकसभा की सभी 85 सीटें मिल गयी थीं।

यानी अनेक मतदाताओं के अनुसार नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पौने तीन साल के कार्यकाल में अच्छे काम किये। उतने काम 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय तक लोगों को नजर नहीं आए थे। दूसरी बात वहां महागठबंधन का भी कमाल था।

वैसे आरक्षण की समीक्षा की मांग करते हुए चुनाव की पूर्व संध्या पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के आए तीन बयानों ने भी बिहार में महागठबंधन के काम और भी आसान कर दिया था। आरक्षण पर खतरे का शोर तो उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान भी राजग विरोधी दलों ने किया था। पर उसका असर नहीं हुआ। क्योंकि मतदाताओं के दिलो दिमाग पर वहां अन्य तत्व अधिक हावी थे।

क्योंकि एक तो मोदी सरकार के काम और मंशा लोगों को पसंद आए, दूसरी बात यह भी हुई कि सांप्रदायिक तत्व भी चुनाव प्रचार के साथ जुड़ गये। अब गैर राजग दलों को इस बात भी विचार करना होगा कि वे नरेंद्र मोदी के लोकलुभावन कामों का मुकाबला कैसे करेंगे ?

क्या जहां-जहां गैर राजग दलों की सरकारें बची हुई हैं, वहां वे सुशासन व विकास की रफ्तार को तेज करेंगे ? क्या बिहार में भी सुशासन की ढीली होती लगाम को ठीक ढंग से कसा जा सकेगा ?

क्योंकि सिर्फ दलीय या फिर जातीय समीकरण ही हर जगह राजग का मुकाबला नहीं कर पाएगा।

महागठबंधन के निर्माण में सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम को एक मंच पर कैसे लाया जाए ? क्या मायावती 1995 में हुए लखनऊ गेस्ट हाउस का कांड भूल जाएंगी ? तब सपा के बाहुबलियों ने उनके कमरे में जबरन घुस कर उस मायावती के साथ काफी बदतमीजी की थी।

मायावती भूल सकती हैं यदि उन्हें अपनी ताजा चुनावी हार उस कांड की अपेक्षा अधिक पीड़ादायक लग रही हो।
याद रहे कि उत्तर प्रदेश के ताजा चुनाव में राजग की अपेक्षा कांग्रेस-सपा- बसपा को कुल मिलाकर दस प्रतिशत अधिक वोट मिले।

लगभग यही समस्या पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और कम्युनिस्टों के बीच आएगी। इन दोनों के कार्यकर्ताओं के बीच यदाकदा खूनी झड़पें होती  रही हैं। क्या ममता वह कांड भूल जाएगी जिसमें उनपर वाम मोर्चे की सरकार की पुलिस ने निर्मम प्रहार किया था और ममता को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा था ?

तमिलनाडु में क्या होगा ? क्या अन्नाद्रमुक और द्रमुक को कभी एक मंच पर लाना संभव होगा? 1989 में जयललिता तमिलनाडु विधानसभा में प्रतिपक्ष की नेता थीं। के. करूणानिधि मुख्य मंत्री थे। एक सवाल पूछने पर कुछ द्रमुक सदस्यों ने जयललिता को सदन के अंदर ही इस कदर अपमानित किया जैसा अपमान शायद ही किसी महिला नेत्री का कभी किसी सदन में हुआ हो।

जयललिता अंत-अंत तक वह अपमान भूल नहीं पायी थीं। क्या उनके उत्तराधिकारी उस घटना को भुला कर द्रमुक से समझौता कर लेंगे?

ऐसी  समस्याएं कुछ अन्य राज्यों में भी है।

इस तरह सारे गैर राजग दलों को एक मंच पर लाना असंभव नहीं तो  अत्यंत कठिन जरूर है। इस महती काम को संभव बनाने के लिए कुशल मध्यस्थों की जरूरत पड़ेगी। फिर भी इस काम में काफी समय लग सकता है।
लोकसभा के अगले चुनाव के सिर्फ दो साल बाकी हैं। यह समय देखते -देखते बीत जाएंगे। इसलिए गैर राजग दल इस काम में यदि अभी से लग जाएं तो पूर्ण नहीं तो कम से कम शायद आंशिक सफलता मिल जाए!
एक मजबूत विकल्प तैयार करने में यदि प्रतिपक्ष विफल रहता है तो वह उसकी विफलता है। जनता की नहीं। गत 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता के तो करीब 61 प्रतिशत वोट राजग के खिलाफ पड़े थे।

(इस लेख का संपादित अंश ‘प्रभात खबर’ के 6 अप्रैल 2017 के अंक में प्रकाशित)

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

ओसामा बिन लादेन को अपना आदर्श मानता है सिमी

 
‘इस्लाम का गाजी कुफ्र शिकन, मेरा शेर ओसामा बिन लादेन।’ 

2001 में पटना और लखनऊ में सिमी ने अपने समर्थकों के बीच एक मैगजीन बांटी थी। उसमें उपर्युक्त शेर लिखा हुआ था।

सिमी 1977 में अपने गठन के समय से ही लगातार विवादास्पद रहा। उसने कई बार यह घोषणा की कि वह हथियार के बल पर पूरी दुनिया में इस्लाम का शासन कायम करना चाहता है। आश्चर्य है कि इसके बावजूद इस देश के कई बुद्धिजीवी और अनेक नेता सिमी को छात्रों का निर्दोष संगठन बताते रहे।


‘कुरान हमारा संविधान’

सिमी के बिहार जोन के सचिव रियाजुल मुशाहिल ने 20 सितंबर 2001 को कहा था कि ‘कुरान हमारा संविधान है। यदि भारतीय संविधान का कुरान से टकराव होता है तो हम संविधान से बंधे हुए नहीं हैं। हम भारत सहित पूरी दुनिया में खलीफा का शासन चाहते हैं।’ इस बीच सिमी अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हिंसक गतिविधियों में शामिल रहा।

जब 1986 में सिमी ने ‘इस्लाम के जरिए भारत की मुक्ति’ का नारा दिया तो ‘जमात ए इस्लामी’ ने सिमी से अपना संबंध पूरी तरह तोड़ लिया। याद रहे कि सिमी का गठन ‘जमात ए इस्लामी’ हिंद के छात्र संगठन के रूप में हुआ था।

  2001 में सिमी पर प्रतिबंध लग जाने के बाद सिमी के कुछ प्रमुख लोगों ने मिलकर इंडियन मुजाहिद्दीन बना लिया। पर उसके कई सदस्यों के नाम के साथ सिमी जुड़ा रहा। क्योंकि उनके खिलाफ के मुकदमों में सिमी का नाम भी जुड़ा रहा।

प्रतिबंध के बाद भी बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ बड़े राजनीतिक नेतागण कई वर्षों तक सिमी को निर्दोष संगठन बताते रहे। आरोप लगा कि वोट के लिए वे नेता ऐसा करते रहे। इससे भी भाजपा को राजनीतिक लाभ मिला।


‘लोकतांत्रिक तरीके से इस्लामिक शासन संभव नहीं’

 अहमदाबाद धमाकों के बाद पकड़े गए सिमी सदस्य अबुल बशर ने बताया था कि ‘सिमी की इस नीति से प्रभावित हूं कि लोकतांत्रिक तरीके से इस्लामिक शासन संभव नहीं है। उसके लिए एकमात्र रास्ता जेहाद है।’
याद रहे कि 26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में एक साथ 21 बम विस्फोट हुए थे जिनमें 56 लोगों की जानें गयीं थीं। इंडियन मुजाहिदीन ने विस्फोट की जिम्मेदारी ली थी। याद रहे कि सिमी के सदस्य ही आई.एम. में सक्रिय हो गये थे।


‘मंदिरों को नष्ट कर वहां मस्जिद बना देंगे’

  सिमी के अहमदाबाद के जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने 2001 में एक अखबार से बातचीत  में कहा था कि ‘जब हम सत्ता में आएंगे तो सभी मंदिरों को नष्ट कर देंगे और वहां मस्जिद बना देंगे।’ मंसूरी का बयान 30 सितंबर 2001 के उस अखबार में छपा था। उपर्यक्त तथ्य  सिमी और इंडियान मुजाहिददीन की कार्य शैली को समझने के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

 भोपाल की जेल से भागे सिमी के सदस्यों की मौत असली मुठभेड़ में हुई या नकली ? यह एक अलग सवाल है। इस पर तरह -तरह की बातें आती रहेंगी और पहले की तरह ही ऐसे विवाद से राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश राजनीतिक दल करते रहेंगे।
एक नवंबर 2016 को प्रभात खबर में प्रकाशित  

बुधवार, 25 मई 2016

जंगल राज नहीं, उसकी आहट

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और बिहार में अपनी जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाये रखने की कोशिश कर रहे हैं। नशाबंदी से मिली लोकप्रियता को राष्ट्रीय स्तर पर भंजाने की कोशिश में हैं। यह प्रयास स्वाभाविक ही है। सचमुच नशाबंदी में देर-सवेर देशव्यापी मुद्दा बन जाने की संभावना है।
पर, बिहार में इन दिनों घट रही दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को लेकर राज्य में नीतीश कुमार की उपस्थिति की अधिक जरूरत महसूस की जा रही है। इन घटनाओं के कारण सुशासन और विकास के क्षेत्रों में उनकी पिछली उपलब्धियांें के मद्धिम पड़ने की आशंका है।

 नीतीश कुमार ने गत साल 20 नवंबर को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। इस छह माह में राज्य में सब कुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है। प्रतिपक्ष और विघ्नसंतोषी इसे ‘जंगल राज’ करार दे रहे हैं। इनमें से कुछ लोग तो इसे महाजंगल राज की उपमा भी दे रहे हैं।

 पर जिन लोगों ने 1990-2005 का ‘जंगल राज’ देखा और भुगता है, वे इन उपमाओं से सहमत नहीं हैं। दरअसल आज के कई नेतागण इमरजेंसी और जंगल राज की उपमा देने में जरा जल्दीबाजी कर देते हैं।
 बिहार में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वह जंगल राज तो नहीं है, पर जंगल राज की आहट जरूर है।
नब्बे के दशक में जो कुछ हो रहा था, उसको लेकर पटना हाईकोर्ट ने कई बार कहा था कि ‘बिहार में जंगल राज है।’ अदालत ने तो एक बार यह भी कहा था कि ‘जंगल राज के भी कुछ नियम होते हैं, पर बिहार में वह भी नहीं है।’

 नीतीश कुमार के शासनकाल में अदालत ने संभवतः अब तक ऐसा कुछ नहीं कहा है।

 इसका कारण यह है कि अपवादों को छोड़ दें तो नीतीश ने अपने पूरे कार्यकाल में इस वायदे का पालन किया है कि ‘हमारी सरकार न तो किसी को बचाएगी और न ही फंसाएगी।’

 हाल की जघन्य घटनाओं को लेकर भी शासन कमोवेश यही कर रहा है।

 बिहार में सबसे बड़ा सकारात्मक फर्क यह आया है कि लालू प्रसाद ने कानून-व्यवस्था के मामले में अपना रुख बदल लिया है। नब्बे के दशक में लालू प्रसाद राजनीति में सक्रिय अपराधियों के बारे में भी कहा करते थे कि ‘जिसे जनता ने जिता दिया, वह अपराधी कैसा ?’ उनका दल अपराध की घटनाओं को सामाजिक उथल-पुथल से भी जोड़कर उसे उचित ठहराता था।

पर, अब कानून-व्यवस्था लागू करने में लालू प्रसाद, नीतीश कुमार को पूरा समर्थन देने की लगातार घोषणा कर रहे हैं। एक तो उन्होंने अपनी पिछली गलतियों से सीखा है।साथ ही  उन्होंने यह बात भी समझ ली है कि उनके पुत्रों का राजनीतिक कैरियर तभी निखरेगा जब वे नीतीश कुमार के सुशासन-विकास की लाइन पर काम करेंगे।

वैसे भी लालू प्रसाद की संतानों ने लालू की शैली नहीं सीखी है। खुद लालू समझ रहे हैं कि उनकी शैली में अब राजनीति हो भी नहीं सकती। राजनीति तो होगी, पर उस शैली के बल पर सत्ता नहीं मिल सकती।

राजद के नीतीश कुमार की सरकार में शामिल होने के तत्काल बाद ही सार्वजनिक रूप से लालू प्रसाद ने यह कह दिया था कि ‘राज्य में कानून -व्यवस्था लागू करने में राजद नीतीश कुमार को पूरा साथ देगा। कोई यह नहीं समझे कि वह किसी खास जाति का होने के कारण अपराध करके बच जाएगा।’

 उनका ऐसा रुख नब्बे के दशक में नहीं था। इसीलिए उसे जंगलराज कहा गया। पर एक चिंताजनक बात यह है कि लालू प्रसाद की अपील के बावजूद राजनीति के भीतर और बाहर के कुछ अपराधी उनकी बात नहीं सुन रहे हैं। लालू प्रसाद ने एक बार कहा था कि वे राज्य भर में घुम कर लोगों को समझाएंगे। पर अभी इसके लिए उन्हें समय नहीं मिला है। यह काम वे जितनी जल्दी कर लें, उतना ही अच्छा होगा।

क्योंकि कई बार सख्त-सटीक पुलिसिया कार्रवाइयों के बावजूद कुछ नेता-सह -अपराधी बार-बार जघन्य घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।

 क्योंकि उनमें गवाहों को खरीदने, धमकाने और अभियोजन पक्ष को प्रभावित करने की अपार शक्ति है। इस समस्या से राज्य सरकार कैसे निपटेगी, सब काम छोड़कर इस मुद्दे पर नीतीश कुमार को विचार करने की अधिक जरूरत है।

 सुशासन व विकास के क्षेत्र में मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार की बिहार में जितनी बड़ी उपलब्धियां हंै, उसमें कोई भी नेता अपने लिए अपेक्षाकृत बड़ी राजनीतिक स्पेस चाहेगा। दशकों से विकसित गुजरात में कुछ बेहतर काम कर लेना किसी नेता के लिए आसान है। क्योंकि वहां कुल मिलाकर सिस्टम काम करता है। पर, बिहार जैसे बिगड़े शासन व उससे भी अधिक बिगड़ी राजनीति वाले बीहड़ प्रदेश को पटरी पर ला देना मुश्किल काम माना जाता था। वह मुश्किल काम भी नीतीश ने कर दिखाया।

पर गत छह महीने से जो कुछ हो रहा है, वह नीतीश के राजनीतिक भविष्य के लिए भी सुखदायी नहीं होगा। क्या प्रतिपक्षी दलों की यह भविष्यवाणी अंततः सही साबित होगी कि जिस सरकार में राजद रहेगा, वह सरकार न तो विकास कर सकती है और न ही सुशासन ? हालांकि इस बीच जदयू के कुछ नेताओं के भी घृणित कारनामे सामने आते रहते हैं। हां, उनके खिलाफ भी राजनीतिक और प्रशासनिक कार्रवाइयां करने में नीतीश ने देरी नहीं की।

  यह सच है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में हाल में अपराध घटे हैं। पर चिंताजनक बात यह है कि अपराध की घटनाओं में सत्ताधारी दलों से जुड़े नेताओं और विधायकों के हाथ भी रहे हैं। जब सत्ता के लोग ही अपराध करने लगें तो लोगबाग अधिक भयभीत हो जाते हैं भले सामान्य अपराध का आंकड़ा नीचे गिर रहा हो।

 यानी धारणा और आंकड़ा अलग-अलग हैं।

 राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार नीतीश कुमार जैसे संयमी और ईमानदार नेता के लिए यह चिंता की बात होनी चाहिए। उन्हें अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को थोड़े समय के लिए भुलाकर बिहार को किसी भी कीमत पर फिर वैसा ही शासन देना चाहिए जैसा शासन उन्होंने जून, 2013 से पहले दिया था जब भाजपा उनकी सरकार में थी।

  जदयू के राष्ट्रीय महासचिव के.सी. त्यागी ने ठीक ही कहा है कि नीतीश कुमार में प्रधानमंत्री बनने के सारे गुण हैं। पर राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार जदयू जैसे एक छोटे दल के अच्छे नेता को भी उनकी अच्छाइयों को देखकर इस देश के अन्य दल प्रधानमंत्री बना देंगे, ऐसी अच्छी राजनीति इस देश में अभी नहीं है।
 इस देश के छोटे दलों के कुछ नेता झटके में या गठबंधन की मजबूरी के तहत प्रधानमंत्री बने हैं। पर वह अवसर भिन्न परिस्थितियों में आया था। अभी तो 2019 के चुनाव में देर है।

 वी.पी. सिंह तो प्रधानमंत्री बनने से पहले ही कई गैर कांगेेसी दलों के समूह के नेता बन चुके थे। यहां तो सहयोगी राजद भी नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री बनाना दिल से चाहता है या नहीं, यह भी एक बड़ा सवाल है। हालांकि लालू प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से यह कह दिया है कि नीतीश प्रधानमंत्री बनें तो यह अच्छा होगा। सन 2019 में नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं इस बारे में अभी कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है।
पर संस्कृत के एक श्लोक को नीतीश कुमार को याद रख लेना चाहिए। उसका अर्थ है -जो ध्रुव को छोड़कर अध्रुव की ओर जाता है, उसका ध्रुव भी चला जाता है। अध्रुव तो अधु्रव है ही।

    आज नीतीश कुमार ने नशाबंदी को जो मुद्दा उठाया है, वह बोफर्स मुद्दे से कम महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि अधिक है। याद रहे कि उन्होंने बिहार मेंं नशाबंदी की शुरुआत भी कर दी है। पर इसको लेकर गैर भाजपा राजनीतिक दलों में आम सहमति बननी अभी बाकी है।

उस आम सहमति की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इससे पहले बिहार को फिर से पटरी पर लाने के लिए नीतीश कुमार को एक बार फिर जी-जान लगा देनी चाहिए। इस काम में उन्हें लालू प्रसाद के दल के भरपूर सहयोग की जरूरत होगी।

 कोई सफल मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री बनना चाहता है तो इसमें किसी को कोई एतराज भी नहीं होना चाहिए। वैसे भी कई लोग यह मानते हैं कि बिहार के विकास के लिए यह जरूरी है कि इस राज्य से कोई प्रधानमंत्री बने।
लंबे समय से बिहार का शासन-संचालन के दौरान नीतीश ने भी यह अनुभव किया है कि केंद्र सरकार से भरपूर आर्थिक मदद मिले बिना बिहार को विकसित राज्य बनाया ही नहीं जा सकता है। यदि सिर्फ लंबे समय तक वह मुख्यमंत्री बने भी रहें और इसका अर्थाभाव में विकास नहीं कर सकें तो फिर कुछ साल के बाद उनकी पिछली उपलब्धियां भी फीकी पड़ जाएंगी। यदि इसलिए वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो बात समझ में आती है। पर अभी तो बिहार में ही उनका काम अधूरा है।

   (इस लेख का संपादित अंश 18 मई 2016 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)
     


मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

नीतीश के प्रामाणिक नेतृत्व के कारण महागठबंधन का फैलाव अधिक आसान

   जदयू ने बिहार के  बाद अब पूरे देश में राजग विरोधी दलों का महागठबंधन खड़ा करने का निर्णय किया है। बिहार की चुनावी सफलता के बाद यह स्वाभाविक है। साथ ही, यह मौजू भी है। क्योंकि राजग राष्ट्रीय स्तर पर भी पहले की अपेक्षा अब कमजोर पड़ रहा है। नरेंद्र मोदी की तेजस्विता भी मद्धिम पड़ रही है।

जिन भारी-भरसक घोषित-अघोषित वायदों के साथ नरेंद्र मोदी सत्ता में आये थे, उन्हें पूरा करने में राजग सरकार को अब तक सीमित सफलता ही मिल सकी है। मोदी जी समस्याओं की सर्जरी के बदले उनका होमियोपैथी इलाज कर रहे हैं। ऐसे में देरी होती है। लोगों को उतना धैर्य नहीं होता। हालांकि लोगबाग अभी उनसे निराश नहीं हुए हैं, पर केंद्र की राजग सरकार के प्रति समर्थन के उत्साह में कमी आ रही है। यदि आने वाले महीनों में मोदी सरकार ने जनहित में कुछ चैंकाने वाले काम नहीं किये तो राजग के लिए महंगा पड़ेगा।

लोकतंात्रिक व्यवस्था की यह मांग है कि इस बीच मजबूत विकल्प खड़ा किया जाये। अब अकेले कांग्रेस तो विकल्प बनने की स्थिति में बिलकुल नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि कांग्रेस के अनेक बड़े नेता भ्रष्टाचार, संपत्ति विवाद और अन्य तरह के गैर राजनीतिक आरोपों को लेकर बचाव की मुद्रा में हैं। 

ऐसी ही स्थिति में यानी महाघोटालों के गंभीर आरोपों के बीच 2014 के लोकसभा चुनाव में मनमोहन सरकार को जनता ने धूल चटा दी। यानी भ्रष्टाचार के आरोपों से सने नेताओं और दलों को आम तौर पर जनता सत्ता नहीं सौंपती जब तक कि उनका कोई मजबूत जातीय वोट बैंक नहीं हो।

  कभी कांग्रेस का अपना मजबूत जातीय वोट बैंक हुआ करता था। पर वह कई कारणों से छिजता चला गया। अब कांग्रेस यदि किसी गठबंधन में राष्ट्रीय स्तर पर भी सहयोगी रोल में ही रहे तो बेहतर होगा। कांग्रेस की यह कमजोरी भी खुलकर सामने आ रही है कि उसका अपना नेतृत्व न तो प्रामाणिक है और न ही कल्पनाशील। वंशवाद की यही तो सबसे बड़ी बुराई है। उसमें लचर नेतृत्व को भी पार्टियां ‘ढोती’ हैं।

      इधर जदयू के पास नीतीश कुमार के रूप में एक प्रामाणिक नेता  उपलब्ध है। किसी अन्य नेता की अपेक्षा नीतीश कुमार के नाम पर देश के अधिकाधिक दलों को जुटा लेने की अधिक संभावना है।

  वैसे जदयू यह जरूर कहता है कि नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। खुद नीतीश कुमार ने भी कभी यह नहीं कहा कि वे इस पद के उम्मीदवार हंै। पर उनके समर्थक और प्रशंसक यदि ऐसा कहते हैं तो वैसा कहने का समय अब आया है।

  ऐसा कहने का समय तब नहीं था जब गत लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी यू.पी.ए. सरकार के साथ चुनावी मुकाबले में थे।

महा भ्रष्टाचार और एकतरफा व ढोंगी धर्मनिरपेक्षता की नीति पर चल रहे यू.पी.ए. सरकार के खिलाफ नरेंद्र मोदी इस देश के अधिकतर मतदाताओं को बेहतर लगे। नरेंद्र मोदी के पास भाजपा के रुप में  एक मजबूत पार्टी भी थी जिसमें लोगों ने कांग्रेस का विकल्प देखा। पर 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या होगा ? राजग सरकार और नरेंद्र मोदी की छवि में छीजन जारी रही तो लोगबाग विकल्प खोजेंगे ही। 

  हालांकि अभी तो असम, पश्चिम बंगाल (2016) और उत्तर प्रदेश (2017) जैसे प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों के राजनीतिक दलों यह तय करना है कि वे अकेले लड़ेंगे या बिहार माॅडल अपना कर प्रतिद्वंद्वी दलों को पराजित करेंगे।

 इन राज्यों में महागठबंधन के गठन की राह में बाधाएं हंै। क्योंकि वहां नेताओं के बीच व्यक्तिगत अहं का भीषण टकराव है।

 हालांकि असम में महागठबंधन की राह आसान हो सकती है। वैसे कुल मिलाकर महागठबंधन के नेताओं खासकर नीतीश कुमार का राजनीतिक कौशल में कसौटी पर होगा। यदि इन राज्योंे में सफलता मिल गई तो 2019 का चुनाव महागठबंधन के लिए आसान हो जाएगा।

महागठबंधन का अंतिम लक्ष्य 2019 का लोकसभा चुनाव रहेगा।

 तब यदि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग को चुनावी सफलता नहीं मिलती है तो गैर राजग दलों में से ही किसी न किसी नेता को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिलेगा।

 देश के विभिन्न नेताओं की छवि और उपलब्धियों के तुलनात्मक अध्ययन के बाद अधिकतर राजनीतिक प्रेक्षक इस नतीजे पर आसानी से पहुंच सकते हंै कि नीतीश कुमार का स्थान सबसे ऊपर रहेगा। यह बिहार के लिए भी गौरव की बात है। यदि नीतीश प्रधानमंत्री बने तो वे बिहार से पहले पी.एम. होंगे।

हालांकि तब भी नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं, यह अन्य अनेक बातों पर निर्भर करेगा।

  इस देश के छह पूर्व मुख्यमंत्री अब तक प्रधानमंत्री बन चुके हैं। वे हैं मोरारजी देसाई (बंबई), चरण सिंह व वी.पी. सिंह (उत्तर प्रदेश), नरसिंह राव (आंध्र प्रदेश), एच.डी. देवगौड़ा (कर्नाटका) और नरेंद्र मोदी (गुजरात)।

इसलिए यह सवाल उठाना भी बेमानी है कि कोई क्षेत्रीय नेता, प्रधानमंत्री के रूप में कितना ठीक रहेगा।

    यहां यह कहना प्रासंगिक होगा कि जो लोग गत लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री मेटेरियल बता रहे थे, वे जल्दीबाजी कर रहे हैं। क्योंकि देश की उम्मीदों के केंद्र नरेंद्र मोदी की तेजस्विता तब तक मद्धिम नहीं पड़ी थी।

  हाल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि जिस अनुपात में सत्ताधारी नेता का करिश्मा कम होने लगता है, उसी अनुपात में मुख्य प्रतिद्वंद्वी दल के नेता की छवि भी निखरती है। यदि महागठबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने में नीतीश कुमार सफल हो गये तो राष्ट्रीय स्तर पर मुख्य प्रतिद्वंद्वी नीतीश कुमार बन सकते हैं।

  यहां यह मानकर भी चला जा रहा है कि कांग्रेस के बड़े -बड़े नेताओं को विवादास्पद कानूनी परेशानियों से अगले लोकसभा चुनाव तक शायद फुर्सत नहीं मिल पाएगी। 

  कुल मिलाकर आने वाली राजनीति के संकेत यह हैं कि महागठबंधन के कारगर विस्तार व चुनावी सफलता का श्रेय बिहार के नेता को मिल सकता है। पर इसके साथ एक शर्त है। इस बीच बिहार की नीतीश सरकार और भी बेहतर काम करे। शर्त यह है कि कांग्रेस तथा राजद के राज्य भर के छोटे- बड़े नेतागण सुशासन और न्याय के साथ विकास के काम में नीतीश कुमार का पूरे दिल से साथ देते रहें। अब तक राजद और कांग्रेस ने अच्छे संकेत दिए हैं। पर पता नहीं  आगे क्या होगा! नीतीश सरकार की उपलब्धियां  2019 के लोकसभा चुनाव में राजग विरोधी दलों के काम आएंगीं। गुजरात की उपलब्धियों की पृष्ठभूमि में लोगों ने 2014 में नरेंद्र मोदी को हाथों-हाथ लिया था। क्या ऐसा हो पाएगा ?  

(22 दिसंबर, 2015 के दैनिक भास्कर,पटना से साभार) 
  
  

संसदीय सक्रियता बढ़ जाने से कम हो जाएगी अदालती अति सक्रियता

  सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाइयों को लेकर दो बड़ी और महत्वपूर्ण खबरें आई हैं। एक उदासी की है तो दूसरी खुश करने वाली।

  सुप्रीम कोर्ट ने बिहार और ओडिसा के उस कानून को वैध करार दे दिया जिसमें आरोपित की संपत्ति जब्त करने की व्यवस्था की गई है। अदालत ने कहा कि ‘रिश्वतखोरी जैसी सामाजिक बुराई अब राष्ट्रीय आतंकवाद का रूप ले चुकी है।’

  याद रहे कि बिहार विशेष अदालत अधिनियम, 2009 के तहत कई बड़े अफसरों की संपत्ति जब्त की जा चुकी है।

 अदालत के ताजा निर्णय के बाद यह उम्मीद है कि भ्रष्टाचार के  मुकदमे झेल रहे लोगों की संपत्ति जब्त करने के काम में तेजी आएगी।

  याद रहे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अक्सर कहते रहे हैं कि भ्रष्टाचार के प्रति हमारी शून्य सहनशीलता की नीति है। यह अच्छी बात है कि उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी मुख्यमंत्री की बात दुहरायी है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में लाल किले के भाषण में कहा था कि जब कोई व्यक्ति किसी काम से किसी अफसर के यहां जाता है तो अफसर पूछता है कि ‘इसमें मेरा क्या ?’ पर जब उसे पता चलता है कि उसमें उसे कुछ नहीं मिलने वाला है तो वह कहता है कि ‘तो फिर मुझे क्या ?’

यानी कुछ नहीं मिलेगा तो वह काम नहीं करेगा। प्रधानमंत्री ने यह कहकर इस बात की जरूरत बताई कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाइयां करने की कितनी अधिक जरुरत है।

  पिछले कुछ वर्षों में इस देश की विभिन्न अदालतों ने भ्रष्टाचार के आरोपों में प्रभावशाली लोगों के खिलाफ चल रही सी.बी.आई. जांच की निगरानी की है। जानकार लोग बताते हैं कि निगरानी के कारण ही कई मामलों में उन प्रभावशाली लोगों को जेल भिजवाया जा सका जिनके खिलाफ केस चल रहे थे।

  जिस देश की सर्वोच्च अदालत कह रही है कि भ्रष्टाचार राष्ट्रीय आतंकवाद बन चुका है, प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार पर चिंता जता रहे हैं, उसी देश की एक संसदीय समिति की एक चैंकानेवाली सिफारिश हाल में सामने आई है।

समिति ने अदालतों की न्यायिक अति सक्रियता की आलोचना की है। उसने राज्यों के विभिन्न जिलों में विशेष सी.बी.आई. अदालतें गठित किये जाने पर भी आपत्ति जाहिर की है।

  कार्मिक, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने कहा है कि ‘अदालतों की अति सक्रियता, शासन की पिरामिड व्यवस्था को और बढ़ाएगी।’

  यह बात सही है कि आज सभी तरह के अपराधों की जांच की मांग सी.बी.आई. से कराने की मांग की जाने लगी है। संसदीय समिति को इस बात पर पहले विचार कर लेना चाहिए था कि ऐसा क्यों हो रहा है ?

क्यों लोगों को राज्य पुलिस पर विश्वास नहीं रहा? क्या इसलिए कि अधिकतर राज्यों में पुलिस राजनीतिक कार्यपालिका के हाथों की कठपुतली बन चुकी है ?

पुलिस सुधार के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निदेशों का पालन करने में राज्य सरकारों को आखिर क्या दिक्कतें हैं ?

  क्यों सी.बी.आई. को यदाकदा पिजड़े का तोता बना दिया जाता है?

जब पुलिस लाचार और सी.बी.आई. तोता हो तो अदालती निगरानी के सिवा कौन सा रास्ता बचता है ?

 आंकड़े बताएंगे कि जिन हाई प्रोफाइल मामलों में अदालती निगरानी नहीं रही, उन मामलों का क्या हश्र हुआ और जिनमें निगरानी रही, उनका क्या हुआ?

 जहां संस्थाएं अपना काम नहीं कर रही हों, वहां उनका काम कोई और करेगा ही। शून्य तो कहीं नहीं रहेगा।

 संसदीय समिति को इस बात की भी जांच करनी चाहिए कि राज्य पुलिस कितने प्रतिशत मुकदमों में अदालतों से सजा दिलवा पाती है और सी.बी.आई. के मामलों में यह प्रतिशत कैसा है। याद रहे कि  सी.बी.आई. द्वारा तैयार मुकदमों में सजा का प्रतिशत काफी अधिक है। जिन मामलों में अदालतें निगरानी करती हैं, उनमें तो सजा का प्रतिशत और भी अधिक होता है।

  क्या सी.बी.आई. गलत लोगों को सजा दिलवाती है? यदि ऐसा नहीं है तो भ्रष्टाचार के आतंकवाद से लड़ने के लिए संसद का क्या और कितना योगदान है, जरा इस पर भी विचार होना चाहिए।

 चीन में एक कहावत है कि भारत अपने बजट का पैसा एक ऐसे लोटे में रखता है जिसमें अनेक छेद होते हैं। अस्सी के दशक मेंे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी कहा था कि हम एक रुपए दिल्ली से भेजते हैं, उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही गांवों तक पहुंचते हैं। जब सरकारी साधनों की इस तरह लूट जारी रहेगी तो गरीबी कम नहीं होगी। गरीबी कम नहीं होगी तो देश में व्यवस्था के प्रति आम लोगों का असंतोष बढ़ेगा। फिर क्या होगा ? 

 इन बातों से नरेंद्र मोदी के लाल किले के भाषण से जोड़कर देखें तो अदालतों की सक्रियता की और भी जरूरत महसूस होगी।

ऐसी जरूरत सांसदों को भी महसूस होनी चाहिए अन्यथा वे समय के साथ अपना महत्व खो देंगे। इस बीच कई सांसद भ्रष्टाचार के कैंसर के खात्मे की जरूरत अवश्य महसूस करते हैं। पर लगता है कि वे अल्पमत में हैं।

आज इस देश के अनेक बड़े नेताओं, अफसरों और अन्य प्रभावशाली लोगों में अपार धन खास कर रियल इस्टेट जुटाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे में कई विवेकशील लोगों को अदालती अति सक्रियता और भी जरूरी लगती है। 

  इन समस्याओं को नजरअंदाज करके संसद के अनेक सदस्यगण आए दिन सदन में हंगामा करते रहते हैं। यह सब देख कर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को हाल में कहना पड़ा कि ‘संसद में बहस होनी चाहिए, हंगामा नहीं।’

 एक बात और। यदि संसद अपना काम करती होती तो अदालतों की सक्रियता नहीं बढ़ती।

  झारखंड मुक्ति मोर्चा सांसद रिश्वत कांड मुकदमे के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट ने नब्बे के दशक में कहा था कि हम जानते हैं कि सरकार को गिरने से बचाने के लिए रिश्वत ली गयी है, पर हम कुछ कर नहीं सकते। क्योंकि संविधान का अनुच्छेद -122 हमें कुछ करने से रोकता है। संसद को चाहिए था कि वह संबंधित अनुच्छेद में संशोधन कर देती ताकि कोई सांसद सदन में वोट देने के लिए घूस ले तो वह भी सजा से नहीं बच सके।

 हवाला घोटाले के बारे में उन्हीं दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस कांड की तो सी.बी.आई. ने ठीक से जांच ही नहीं की। संसद ने सी.बी.आई.को पिजड़े का तोता बन जाने से क्यों नहीं रोका ?

याद रहे कि हवाला घोटाला सर्वदलीय घोटाला था जिसमें अनेक दलों के अनेक प्रमुख नेता लिप्त पाये गये थे। उपर्युक्त संसदीय समिति के सदस्यों को इस बात की जांच कर लेनी चाहिए थी कि पिछले कुछ दशकों में  समय -समय पर विभिन्न घोटालों की जांच के लिए गठित संसदीय समिति किस नतीजे पर पहुंची और जब उन्हीं मामलों की जांच जब सी.बी.आई. ने की तो क्या नतीजा निकला। 


(15 दिसंबर 2015 के दैनिक भास्कर,पटना से साभार)     
   

सही सबक के लिए परिणाम का वस्तुपरक आकलन जरूरी

बिहार चुनाव का नतीजा एक महीना पहले आ गया था। इतना समय बीत जाने के बावजूद उसके नतीजों के कारणों को लेकर कुछ हलकों में अब भी कन्फ्यूजन बना हुआ है। या, फिर  यह कन्फ्यूजन भी राजनीतिक ही है?

  इस संबंध में ताजा बयान पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती और माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य के आये हैं। जानकार लोगों के अनुसार इन बयानों से भी सही नतीजों तक पहुंचने में मदद नहीं मिलती।

 पहले के अधिकतर बयान भी ऐसे ही थे। हालांकि दोनों पक्षों में कुछ नेता ऐसे जरूर हैं जो हकीकत जानते हैं। चुनाव हारने वाले को हार के सही कारणों की जानकारी होनी ही चाहिए। इससे उसे आगे की राह तय करने में सुविधा होती है। जीतने वाले दल को आगे भी विजयी होते जाने की राह मिलती है।

पर बिहार विधानसभा चुनाव के बाद दोनों पक्षों के अनेक नेताओं को रिजल्ट के असली कारणों का पता ही नहीं है। उनके बयानों से तो यही लगता है।

  2004 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार तब लोकसभा चुनाव में हार गयी थी। उससे पहले राजग सरकार ने इंडिया साइनिंग का नारा दिया था।

अटल के कार्यकाल में कई अच्छे काम हुए भी थे। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडु की राज्य सरकार ने भी बहुत अच्छे काम किये थे। लोकसभा चुनाव के साथ ही आंध्र में विधानसभा का चुनाव भी हुआ था। तब नायडु का दल भी सत्ता से बाहर हो गया था।
तब कांग्रेस को लगा था कि विकास से वोट नहीं मिलते। अनेक बुद्धिजीवियों ने ऐसा ही प्रचार भी किया था। वे कहते थे कि दलीय व जातीय समीकरण से वोट मिलते हैं। पर,यह अधूरा सच था।

  अटल सरकार और नायडु सरकार की हार का कारण दूसरा था। उसने विकास पर तो ध्यान दिया, पर जातीय समीकरण को नजरअंदाज कर दिया। याद रहे कि आम तौर पर क्षेत्रीय दल जातीय पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं। भाजपा ने 2004 के चुनाव से ठीक पहले एक-एक करके अपने कई सहयोगी दलों को राजग से अलग हो जाने पर मजबूर कर दिया था। 2004 में आंध्र में नायडु इसलिए हारे क्योंकि अल्पसंख्यक मतदताओं ने नायडु सरकार का साथ छोड़ दिया था। नायडु के विकास की हार नहीं थी। उन्हें फिर भी 37 प्रतिशत मत मिले थे।

2004 में कांग्रेसनीत यू.पी.ए. सरकार बनी। आंध में भी कांगे्रस की सरकार बनी। इन दोनों सरकारों ने नायडु और अटल सरकारों के विकास और सुशासन से कोई शिक्षा ग्रहण नहीं की। दोनों सरकारेंं भ्रष्टाचार में डूब गयीं।

  यू.पी.ए. सरकार के कार्यकाल में महाघोटालों की बाढ़ आ गयी। साथ ही एकपक्षीय धर्मनिरपेक्षता अभियान चलाया गया। नरेंद्र मोदी ने इसका लाभ उठाया।

  बिहार की ताजा जीत में सुशासन, विकास और मजबूत सामाजिक समीकरण की मुख्य भूमिका थी। अन्य तत्वों की भूमिका कम थी। हां,नीतीश कुमार के रूप में एक प्रामाणिक नेतृत्व मतदाताओं के सामने था।

 निष्पक्ष प्रेक्षकों के अनुसार महागठबंधन की जीत में संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान ने निर्णायक भूमिका निभाई जिसमें उन्होंने आरक्षण की समीक्षा करने की जरूरत बताई थी।

 एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के अनुसार राजग को बिहार में महागठबंधन पर करीब चार प्रतिशत की बढ़त मिल रही थी। पर भागवत के आरक्षण पर लगातार तीन बयानों के बाद स्थिति बदल गयी। यहां तक कि दलितों पर भी इस बयान का असर पड़ा। इसके बावजूद नतीजे आने के बाद भाजपा के नेतृत्व से नाराज नेतागण हार के लिए नरेंद्र मोदी, अमित शाह और बिहार भाजपा के नेतृत्व को दोषी ठहराने लगे।

 हां, बिहार चुनाव का एक बड़ा सबक भाजपा के लिए है। भाजपा नेतृत्व आरक्षण के दायरे में आने वाले लोगों को अपने कर्मों के जरिए विश्वास दिलाये। यह कि न सिर्फ वह आरक्षण का बिना शर्त समर्थन करता है बल्कि उन लोगों के लिए अब कुछ अधिक ही करना चाहता है।

  एक समाजशास्त्री ने केंद्र की भाजपानीत सरकार को यह सलाह दी थी  कि वह 27 प्रतिशत आरक्षण में से अति पिछड़ों के लिए 15 प्रतिशत सीटें अलग से आरक्षित कर दे। पर केंद्र सरकार ने इस सलाह पर अभी ध्यान नहीं दिया है। सरकार को दलितों के लिए भी कुछ खास करना पड़ेगा अन्यथा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी भाजपा का हाल बिहार जैसा ही हो सकता है।

 क्या भाजपा देश की इस सामाजिक सच्चाई को अब भी समझेगी? दरअसल आरक्षण को लेकर भाजपा का इतिहास संदिग्ध रहा है। मंडल आरक्षण लागू करने वाले वी.पी. सिंह की सरकार भाजपा ने ही 1990 में गिरा दी थी।

  शायद पिछड़ों-दलितों के लिए कुछ खास करना नहीं पड़े, शायद इसीलिए भी भाजपा के अनेक नेता मोहन भागवत को जिम्मेदार नहीं मान रहे हैं। जबकि जिन भाजपा नेताओं ने अपने पुत्रों को बिहार विधानसभा चुनाव में खड़ा करा रखा था, उन्होंने जरूर भागवत को जिम्मेदार ठहराया था। ये नेता अपने पुत्र के लिए चुनाव प्रचार के दौरान जनता के काफी करीब गये थे। 

 अधिकतर भाजपा नेता तो भागवत पर अंगुली उठाने से डरते हैं। कुछ भाजपा नेताओं को नरेंद्र मोदी-अमित शाह से बदला लेने का बहाना भी  मिल गया है। 

  इसी तरह महागठबंधन के दल भी जीत के सही कारणों को नहीं समझेंगे तो उन्हें आगे भी चुनावी जीत हासिल करते रहने में दिक्कत आएगी।

 दरअसल चुनावी राजनीति के साथ समस्या यह है कि नतीजे का विश्लेषण अक्सर वस्तुपरक की जगह व्यक्तिपरक होकर किया जाता है।

   अब रही महबूबा और दीपंकर की बातें तो वे अपनी बनी-बनायी राजनीतिक लाइन के अनुसार ही बयान दे रहे थे।

 माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य राम मंदिर पर भागवत के बयान की चर्चा करते हुए हाल में कहा कि बिहार में शिकस्त  के बावजूद भाजपा ने कुछ नहीं सीखा है।

   उधर महबूबा मुफ्ती ने शनिवार को कहा कि बिहार के नतीजों ने वैसे तत्वों को अच्छा सबक सिखाया जो हिन्दुत्व के नाम पर राष्ट्रवाद का दुरुपयोग कर रहे हैं। महबूबा का इशारा भाजपा के उन कुछ अतिवादी नेताओं की ओर था जो अपने विवादास्पद बयानों से उत्तेजना पैदा करते रहते हैं। पर जानकार लोगों के अनुसार वे तत्व इस बार कोई कारगर भूमिका नहीं निभा सके। बल्कि उससे पहले लोकसभा चुनाव में वैसे बयानों ने कुछ मतदाताओं की भावनाएं भड़काई थीं। बिहार विधानसभा चुनाव में हिन्दुत्व के मुद्दों की अपेक्षा आरक्षण तथा अन्य तत्व काफी अधिक महत्वपूर्ण रहे। पर यह समझने से कुछ नेता अब भी इनकार कर रहे हैं।


           (08 दिसंबर, 2015 के दैनिक भास्कर, पटना से साभार )
  

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

सुशासन और विकास को लेकर नीतीश पर भरोसा कायम

     तीव्र शाब्दिक प्रहार प्रति प्रहार के बीच पांच चरणों में चुनाव संपन्न हुए हंै। इससे तरह -तरह के तनाव पैदा हुए। लालू प्रसाद के बारे में शुभ संकेत मिल रहे हैं। वे अब विकास पर जोर दे रहे हैं। नीतीश कुमार तो पहले से ही ‘विकास पुरुष’ रहे हैं। हालांकि कुछ आशंकाएं भी हैं। इसके बावजूद हर तबके के विवेकशील लोगों का यह मानना है कि नीतीश कुमार  के हाथों  में राज्य के लोगों के हित सुरक्षित रहने की ही अधिक उम्मीद है।अनेक लोगों से बातचीत के बाद यह आम राय सामने आई है।

  सामाजिक और राजनीतिक तनातनी के बावजूद चुनाव के दौरान कोई बड़ी हिंसा नहीं हुई। भीषण चुनावी हिंसा के लिए कभी चर्चित रहे इस राज्य के पिछले ़कई चुनाव शांतिपूर्ण ही हुए हैं।इस बार भी ऐसा ही रहा जबकि  भीतर-भीतर तनातनी की खबरें आ रही थीं।इसका श्रेय चुनाव आयोग को तो है ही। साथ ही नीतीश  शासन को भी जाता है जिसने 2005 से ही भरसक कानून का शासन कायम रखा है।

  याद रहे कि पिछले दस साल से नीतीश सरकार ने न्याय के साथ विकास और सुशासन की राह पर बिहार को चलाया है।उसके अच्छे नतीजे भी सामने आये हैं।

  यदि लालू प्रसाद का साथ और तनावपूर्ण माहौल में हुए इस चुनाव के बाद अधिकतर लोगों का नीतीश शासन पर भरोसा कायम नजर आ रहा है तो इसका मुख्य कारण नीतीश कुमार का अपना पिछला रिकार्ड ही है।वह भरसक स्वच्छ शासन,विकास  और बेहतर कानून -व्यवस्था का रिकार्ड है।

  बिहार विधान सभा के इस खास तरह के चुनाव में एक साथ कई मुददों ने अपनी भूमिका निभाई है।पर यह बात विशेष तौर पर महत्वपूर्ण है कि नीतीश कुमार के खिलाफ एन्टी इन्कम्बेंसी यानी सत्ता के खिलाफ रोष की कोई भावना आम तौर पर नहीं देखी गई।जो  लोग महा गठबंधन को वोट नहीं दे रहे थे,उनका भी कहना था कि नीतीश कुमार ने अपने शासन काल में अच्छा काम किया है।

 गत लोक सभा चुनाव के समय भी अनेक मतदाताओं ने नीतीश कुमार से कहा था कि इस बार तो हम  नरेंद्र मोदी को वोट देंगे,पर विधान सभा के चुनाव में हम आपको ही  मदद करेंगे।तब देश में विशेष परिस्थिति थी।मन मोहन सरकार से लोगों को मुक्ति चाहिए थी।उन दिनों नरेंद्र मोदी ही मुक्तिदाता लग रहे थे। उन  मतदाताओं ने अपना वायदा निभाया और नीतीश को इस बार वोट दिये।

     यह उम्मीद की जा रही है कि अगले पांच साल में बिहार में और भी अच्छे काम होंगे।खुद नीतीश कुमार की यही इच्छा है।और बिहार की अधिकतर जनता भी चाहती है कि कानून -व्यवस्था बेहतर हो । विकास की गति तेज हो।लगता है कि  राज्य को विकसित देखने  की लोगों की  इच्छा काफी हद तक पूरी हो जाएगी ।

  बिजली और सड़क के मामले में पिछले दस साल में बिहार ने  तरक्की की है।उम्मीद की जा रही है कि अगले दो तीन साल में राज्य के घर -घर में बिजली पहुंच जाएगी।सड़कों के मामले में बिहार और भी बेहतर  स्थिति में होगा।इससे काफी फर्क पड़ेगा।बिजली और सड़क विकास के इंजन हैं।सरकार की मदद कम भी रहेगी तो आम लोग बिजली-सड़क के बूते अपने उद्यम बढ़ा सकते हैं।

पर खेतों की सिंचाई पर अधिक जोर देना होगा।उससे किसानों की आय बढ़ेगी।आय बढ़ने से उनकी क्रय शक्ति बढे़गी।क्रय शक्ति बढ़ने से वे कारखनिया माल खरीदने की स्थिति में होंगे।उससे कारखानों की संख्या बढ़ेगी।उद्योग बढ़ने से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
 पर इसके लिए यह भी जरुरी है कि सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार कम हो।
रिश्वतखोर बाबुओं के खिलाफ स्टिंग आपरेशन चलाना होगा।   इस बीच नीतीश कुमार के सात संकल्पों पर भी काम चल रहा होगा।

चुनाव नतीजे आने के तत्काल बाद राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद का यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि  ‘महा गठबंधन विचारों और कार्यक्रम पर आधारित है।सरकार चलाने में मेरा कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।’यह खबर भी उत्साहबर्धक और महत्वपूर्ण है कि  लालू प्रसाद अब विकास पर जोर दे रहे हैं।पर विकास के लिए जरुरी है कि राजद के लोग कानून -व्यवस्था बेहतर बनाने में नीतीश कुमार की पूरी मदद करें।

मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि हमारा कार्यक्रम पूर्व निर्धारित है।सबको साथ लेकर चलना है।सभी तबकों के वोट हमें मिले हैं।लोगों की उम्मीदों के अनुरुप ही हम काम करेंगे। केंद्र सरकार ने भी बिहार को मदद जारी रखने का वायदा किया है।
ये बातें बेहतर बिहार के लिए उम्मीदें जगाती हैं।
  (10 नवंबर 2015 )
   
   


सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

बुरे प्रत्याशियों के साथ कैसा सलूक करे मतदाता !

मतदाता क्या करे जब किसी भले दल से भी किसी बुरे प्रत्याशी को टिकट मिल जाए ? आज के राजनीतिक दौर में यह बड़ा सवाल है जिसका जवाब आसान नहीं है। दरअसल कई मतदाताओं के दिल तो कहते हैं कि उसे वोट न दिया जाए। पर, राजनीतिक परिस्थिति और उनके दिमाग कुछ और कहते हैं। यह राय भी है कि किसी अधिक बुरे दल या उम्मीदवार को हराने के लिए किसी कम बुरे उम्मीदवार को आधे मन से ही सही, पर स्वीकार कर लिया जाए।

अपनी-अपनी सोच और सुविधा के अनुसार मतदातागण बिहार विधानसभा के अगले चुनाव में भी अच्छे के साथ-साथ बुरे प्रत्याशियों से भी निपट लेंगे। अब तो नतीजे ही बताएंगे कि बुरे प्रत्याशियों के साथ लोगों ने कैसा व्यवहार किया। पर, इस संबंध में कम से कम तीन दिवंगत राजनीतिक हस्तियों के विचार उपलब्ध हैं। जवाहरलाल नेहरू, दीनदयाल उपाध्याय और चौधरी चरण सिंह ने समय-समय पर बुरे उम्मीदवारों के बारे में अपनी जाहिर कर दी थी।

अस्सी के दशक की बात है। इन पंक्तियों का लेखक बिहार में चौधरी चरण सिंह की एक चुनावी सभा में था। उन्होंने अन्य बातों के साथ -साथ मंच से मतदाताओं से यह अपील भी कर दी कि ‘यदि हमारे दल ने भी यहां किसी गलत उम्मीदवार को टिकट दे दिया हो तो तुम उसे वोट मत देना।’ बाद में पता चला कि कई अन्य चुनाव सभाओं में भी तब उन्होंने इसी तरह की बात कही थी।

पचास के दशक की बात है। मध्य प्रदेश के शिवबहादुर सिंह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे। वे नेहरू मंत्रिमंडल में भी रह चुके थे। पर जवाहर लाल नेहरू ने मतदाताओं से अपील कर दी कि वे शिवबहादुर सिंह को वोट न दें क्योंकि उन पर भ्रष्टाचार का आरोप था।

ऐसे मामले में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी राय अपनी डायरी में दर्ज कर दी है।
11 दिसंबर, 1961 को जनसंघ के वरिष्ठ नेता और विचारक दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी डायरी में लिखा कि ‘कोई बुरा प्रत्याशी केवल इसलिए आपका मत पाने का दावा नहीं कर सकता कि वह किसी अच्छे दल की ओर से खड़ा है। दल के ‘हाईकमान’ ने ऐसे व्यक्ति को टिकट देते समय पक्षपात किया होगा। अतः ऐसी गलती को सुधारना मतदाता का कर्तव्य है।’ 

बिहार में जो दल चुनाव लड़ रहे हैं उनमें से प्रमुख दलों के नेताओं का संबंध उपर्युक्त तीन नेताओं या उनके दलों से रहा है। इसलिए भी उन दिवंगत नेताओं का उल्लेख मौजूं है। क्योंकि विवादास्पद लोगों को टिकट देने का आरोप आज किसी एक ही दल पर नहीं है।

 (27 सितंबर 2015)

बुधवार, 27 मई 2015

बोफर्स सौदे के कई सवालों के जवाब बाकी हैं

चर्चित बोफर्स तोप सौदे में हुए घोटाले को लेकर कई सवाल अब भी अनुत्तरित रह गए हैं। 1986 में संपन्न इस सौदे को लेकर परस्पर विरोधी विचार यदा-कदा आते रहते हैं।आगे भी आते रहेंगे। इस मामले के जानकार लोगों के अनुसार सवाल इसलिए भी अनुत्तरित रह गए क्योंकि इस केस को उसकी तार्किक परिणति तक पहुंचने ही नहीं दिया गया। ऐसा राजनीतिक कारणों से किया गया।

  याद रहे कि इस घोटाले के कारण मलीन हुई कांग्रेस पार्टी को जनता ने 1989 के चुनाव में केंद्र की सत्ता से बाहर कर दिया था।

   इस मामले में एक रोचक मोड़ उस समय आया जब इस देश के आयकर न्यायाधीकरण ने जनवरी, 2011 में कहा कि बोफर्स तोप सौदे में क्वात्रोची और विन चड्ढ़ा को 41 करोड़ रुपए की रिश्वत दी गई थी। ऐसी आमदनी पर भारत में उन पर टैक्स की देनदारी बनती है।

  सवाल है कि न्यायाधिकरण के इस आदेश के बावजूद उन लोगों से टैक्स क्यों नहीं वसूला गया ?

 उपर्युक्त फैसले के बावजूद दिल्ली की सी.बी.आई. अदालत में सी.बी.आई. ने क्वोत्रोची के खिलाफ मामले को वापस लेने की अपील दायर कर दी ।
सी.बी.आई. ने कोर्ट से कहा कि इस केस की मेरिट को दरकिनार करके इस केस को वापस ले लेने की अनुमति दी जाए। 4 मार्च 2011 को सी.बी.आई कोर्ट ने केस वापस लेने की सी.बी.आई. की दलील मान भी ली।

 सी.बी.आई. ने केस की मेरिट को दरकिनार करते हुए इसे कोर्ट से वापस क्यों ले लिया ? 

याद रहे कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल मेंे सी.बी.आई. ने ही इस कांड के संबंध में अदालत में 22 अक्तूबर 1999 को आरोप पत्र दाखिल किया था।  उससे पहले वी.पी. सिंह के शासनकाल में 22 जनवरी 1990 को बोफर्स मामले में प्राथमिकी दायर की गई थी।

 1987 में इस घोटाले के प्रकाश में आने के बाद मीडिया में सबूतों के साथ इस घोटाले के बारे में प्रामाणिक खबरें छपती रहीं।इसके बावजूद तब की राजीव गांधी सरकार के कार्यकाल में इस संबंध में प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गई ?

 24 मार्च, 1986 को स्वीडन की हथियार बनाने वाली कंपनी ए.बी. बोफर्स से इस आश्वासन के बाद सौदा हुआ था कि इसमें कोई बिचैलिया नहीं है।
बिचैलिए की खबर आने पर केस होना चाहिए था।  18 अप्रैल 1987 को स्वीडन रेडियो ने खबर दी कि इस सौदे में भारतीय नेताओं और आला सैन्य अफसरों को रिश्वत दी गई।

  क्या इस सनसनीखेज सौदे की सही जांच होने दी गई ? दरअसल सरकार बदलने के साथ जांच की दिशा भी बदलती गई।

आखिर ऐसा क्यों हुआ ?

इस भटकाव के कारण जब अदालतों को इस मामले की तह में नहीं जाने दिया  गया तो फिर यह आरोप लगाना कितना सही है कि बोफर्स मामले में  मीडिया ट्रायल किया गया ?

  बोफर्स तोप एक अच्छी तोप है। पर विशेषज्ञ बताते हैं कि सौदा तय करते समय उसके साथ प्रतियोगिता फ्रंास की सोफ्मा तोप से थी। कुछ विशेषज्ञों ने सोफ्मा को  बेहतर बताया था। पर सोफ्मा शायद दलाली नहीं देता था।

    किस तरह अलग -अलग दलों की केंद्र सरकारों ने इस मामले में अलग -अलग रुख अपनाया, उसका पहला उदाहरण चंद्रशेखर सरकार का रवैया था। वी.पी. सिंह की सरकार के गिरने के बाद कांग्रेेस की मदद से चंद्रशेखर के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी। इस मामले में उस सरकार की राय वी.पी. सिंह की सरकार की राय से बिलकुल उलट थी।

नरसिंह राव सरकार के एक मंत्री माधव सिंह सोलंकी को मंत्रिमंडल से क्यों हटना पड़ा ? क्या यह बात सही है कि सोलंकी ने बोफर्स मामले की जांच रुकवाने के लिए संबंधित देश के सत्ताधारी व्यक्ति को पत्र दिया था ? ऐसा उन्होंने किसके कहने पर किया ? क्या इतने उलझे मामले के बारे में रिपोर्ट करना मीडिया ट्रायल होता है ?

एक बड़ा सवाल यह भी है कि 1993 में केंद्र सरकार ने क्वात्रोची को इस देश से गैर कानूनी ढंग से क्यों भाग जाने दिया ? 1991 से 1996 तक पी.वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे।

सवाल यह भी है कि 2006 में भारत सरकार  की किस हस्ती के इशारे पर ब्रिटेन में स्थित क्वात्रोची के उस खाते को डिफ्रीज कर  दिया गया जिसमें बोफर्स की दलाली का पैसे होने की खबर थी और उसे 2003 में भारत सरकार ने फ्रीज करवा दिया था ? याद रहे कि 2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे।

   जब बोफर्स घोटाले के मामले में खुद केंद्र सरकार का रवैया बदलता रहा और एक खास पार्टी की सरकार ने इस मामले को कोर्ट में हल नहीं होने दिया तो फिर आशंकाएं तो पैदा होंगी ही।कोई कितना भी कहे ,पर जो हाल बोफर्स जांच का किया गया ,उससे यह स्थिति बन गई है कि इतिहास  इस कांड की निष्पक्ष जांच पर बड़ा प्रश्न चिह्न उठाएगा ही। चाहे कोई इसे मीडिया ट्रायल कहे या कुछ और। अपने पापों और गलतियों पर पर्दा डालने के  लिए उल्टे मीडिया पर आरोप लगा देना इस देश की राजनीति के एक बड़े हिस्से की आदत सी हो गई है।    

  (दैनिक जनसत्ता के 27 मई 2015 के अंक में प्रकाशित)
   

गुरुवार, 21 मई 2015

दिल्ली की जंग का असर देश की राजनीति पर


जन लोकपाल विधेयक जब विधानसभा से पास नहीं होने दिया गया तो विरोधस्वरुप केजरीवाल ने 2014 में मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। दिल्ली की जनता ने केजरीवाल के प्रति अभूतपूर्व एकजुटता दिखाते हुए इस साल के चुनाव में कुल 70 में से 67 सीटें ‘आप’ को दे दी।

अब जब यह धारणा बन रही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘आप’ के बेलौस युद्ध में केंद्र सरकार रोड़े अटका रही है तो इसका अगला राजनीतिक नतीजा क्या होगा ?

    राजनीतिक पे्रक्षकों के अनुसार यदि इस युद्ध में ‘आप’ सरकार शहीद हुई तो न सिर्फ भाजपा का राजनीतिक जलवा कुछ और कम हो जाएगा, बल्कि देश में अरविंद केजरीवाल का जन समर्थन बढ़ जाएगा।

 अनेक लोगों का यह मानना है कि नियमतः भले उप राज्यपाल को कुछ खास अधिकार मिले हुए हों, पर मुख्यमंत्री की मंशा सही है। वे भ्रष्टाचार से ईमानदारी से लड़ रहे हैं। उनको कम से कम उन लोगों का साथ मिलना चाहिए था जो भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते रहे हैं।

 पर साथ देने के बदले दिल्ली में ऐसी स्थिति बन गई है जहां के मुख्यमंत्री अपनी सरकार के मुख्य सचिव तक का खुद चयन नहीं कर सकते ।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ठीक ही कहा है कि ‘राज्य सरकार एक मुख्य सचिव नियुक्त नहीं कर सकती तो वह और क्या कर सकती है ? ’

    खुद मोदी सरकार गैरभाजपा शासित राज्यों में भी राज्यपाल नियुक्त करने से पहले संबंधित मुख्यमंत्री की सहमति ले लेती है। पर जब केजरीवाल को अपना मुख्य सचिव नहीं चुनने देती तो कई लोगों को केंद्र की मंशा पर शक होता है।

 खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकारी भ्रष्टाचार से परेशान रहे हैं। एक साल के शासन के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था गतिशील नहीं दिख रही है तो इसका सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार है। दूसरी ओर यदि दिल्ली में एक सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठा रही है तो केंद्र सरकार को चाहिए था कि वह उसे इस काम में बढ़ावा दे।

  गत 14 फरवरी को शपथ ग्रहण के बाद केजरीवाल ने कहा था कि उनकी सरकार दिल्ली को भ्रष्टाचार मुक्त करेगी। क्या ‘आप’ का यह कसूर है कि वह अपना वादा नहीं भूल रही है ?

 18 मई को केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली सरकार में भ्रष्टाचार 70 से 80 प्रतिशत कम हो चुका है। क्या ऐसा दावा केंद्र की मोदी सरकार कर सकती है ?

ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री अपनी सरकार से भ्रष्टाचार हटाना नहीं चाहते हंै। पर वह भ्रष्टाचार का होमियोपैथी इलाज कर रहे हंै जबकि जरुरत सर्जरी की है। केंद्र सरकार की राजनीतिक कार्यपालिका स्तर पर तो  घोटाले की कोई सूचना अब तक नहीं मिली है। पर क्या यही बात प्रशासनिक कार्यपालिका के बारे में कही जा सकती है ?

  यह ध्यान देने की बात है कि केजरीवाल की लड़ाई प्रशासनिक कार्यपालिका से ही अधिक है। होना तो यह चाहिए था कि केंद्र सरकार देशहित में ‘आप’ सरकार से सहयोग करके यह तरीका सीखती कि वह कैसे 70-80 प्रतिशत भ्रष्टाचार कम कर पाई है। इसके बदले यह धारणा बन रही है कि केंद्र सरकार  ‘आप’ सरकार को  सत्ताच्युत करना चाहती है। सवाल है कि दिल्ली राज्य की सरकार से च्युत होने के बाद कहीं पूरे देश में केजरीवाल, भाजपा के लिए राजनीतिक खतरा न पैदा कर दे !

(21 मई 2015 के दैनिक भास्कर के पटना संस्करण में प्रकाशित)

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

‘आप’ की राजनीतिक शैली और उसका राजनीति पर संभावित असर

भाजपा नेता डा. सुब्रह्मण्यन स्वामी ने आम आदमी पार्टी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें कही हंै। अरविंद केजरीवाल की तुलना नक्सलियों से करते हुए उन्होंने भविष्यवाणी की है कि यदि ‘आप’ को दिल्ली प्रदेश की सत्ता मिल भी गयी तो वह एक साल के भीतर सरकार से अलग हो जाएगी।

 स्वामी के अनुसार ‘केजरीवाल के सारे सहयोगियों का संबंध नक्सलियों से रहा है। वे सरकार नहीं चला सकते। आप देखेंगे कि वे समाप्त हो जाएंगे।’

 याद रहे कि अरविंद केजरीवाल ने मात्र 49 दिनों के बाद ही मुख्यमंत्री पद से 15 फरवरी 2014 को इस्तीफा दे दिया था। उस समय भी कुछ राजनीतिक पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि ‘आप’ अब समाप्त हो जाएगी। पर हुआ उसके विपरीत ।दिल्ली में ‘आप’ का वोट शेयर बढ़ता ही चला गया।

ओपियन पोल और एग्जिट पोल के नतीजों पर भरोसा करें तो ‘आप’ दिल्ली में एक बार फिर सरकार बनाएगी। आखिर दिल्ली की अधिकतर जनता ‘आप’ को इतना पसंद क्यों कर रही है?

क्यों भाजपा जैसी सुसंगठित पार्टी और नरेंद्र मोदी जैसे लोकप्रिय नेता को भी दरकिनार कर अधिकतर जनता  ‘आप’ को गले लगा रही है  ?

  जानकारों के अनुसार  इसका एकमात्र कारण यह  है कि ‘आप’ ने भ्रष्टाचार के प्रति लगातार शून्य सहनशीलता दिखाई है। यदि यही काम मोदी सरकार ने  आठ महीनों के कार्यकाल में किया होता तो ‘आप’ की चमक गायब हो गई होती।

 पर सरकार के भीतर जाकर संभवतः मोदी जी और बाहर से डा. स्वामी को लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चैतरफा युद्ध छेड़ देना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है। दूसरी ओर ‘आप’ इस तर्क से सहमत नहीं दिखती।

 इस पृष्ठभूमि में डा.स्वामी की यह सोच उनकी खुद की कसौटियों पर तो तार्किक लगती है। उन्हें लगता है कि नक्सली मानसिकता वाली ‘आप’ को यदि सरकार चलाने का मौका मिलेगा तो उनकी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई जीत ही नहीं सकेगी । और, जब जीत नहीं सकेगी तोे वे भाग खड़े होंगे।

   इन्हीं परिस्थितियों में केजरीवाल ने मुख्य मंत्री पद छोड़ा था। जबकि पद छोड़ने की उनकी कोई मजबूरी नहीं थी। इस देश में अधिकतर जनता उस नेता या दल को अधिक पसंद करती है जो अपने सिद्धांतों के लिए गददी छोड़ने के लिए तैयार रहता है। अरविंद ने जब पद छोड़ा था तो उस समय तो उनके समर्थकों के एक हिस्से ने उन पर गुस्सा दिखाया था। पर जब अरविंद ने स्थिति स्पष्ट की तो वही जनता संतुष्ट हो गई। इतना ही नहीं ‘आप’ का जन समर्थन बढ़ गया। दरअसल अधिकतर जनता ने ‘आप’ की कथित रणनीतिक त्रुटियों को नजरअंदाज किया और उसकी अच्छी मंशा पर भरोसा किया।

     केजरीवाल जमात का उभार जन लोकपाल आंदोलन के गर्भ से हुआ था।जब वह आदोलन चल रहा था, उस समय ‘आप’ बनी भी नहीं थी। क्योंकि उसके नेताओं का उद्देश्य राजनीति में जाना नहीं था। वे लोग अन्ना हजारे के नेतृत्व में गैर राजनीतिक आंदोलन चला कर जन लोकपाल विधेयक पास करवाना चाहते थे।

  पर जनलोकपाल विधेयक के कड़े मसविदे को देख कर देश की मौजूदा राजनीतिक जमात ,खासकर मनमोहन सरकार के कान खड़े हो गए थे।

 यदि उस विधेयक को उसी स्वरूप में पास कर दिया गया होता तो इस देश के अनेक नेता जेल में होते और चालू राजनीति को अपना कायाकल्प कर देना पड़ता।पर इसके लिए आज भला कौन तैयार है ?

  इसीलिए अन्ना हजारे की सलाह से मन मोहन सरकार ने जिस स्वरूप में लोकपाल विधेयक बाद में पास किया ,वह ‘आप’ के अनुसार नख-दंत विहीन है।उनकी गिरफ्त तो कोई चूहा भी नहीं लाया जा सकेगा  जबकि भ्रष्टाचार के बड़े -बड़े भेडि़यों और घडि़यालों को उनकी सही जगह बताने की जरूरत आज महसूस करती है।

  जिस लोकपाल आंदोलन के कारण जनता ने 2013 में ‘आप’ को सत्ता दिलाई थी,यदि वही विधेयक पास नहीं कर पाई तो वह गद्दी पर क्यों बैठी रहती ? वादा करके भूल जाने वाले दलों की भीड़ में ‘आप’ अलग तरह की पार्टी दिखाई पड़ रही है। आप के जनसमर्थन के बढ़ने का एक बड़ा कारण यही है।

  यदि ‘आप’ को इस बार भी सत्ता मिलेगी तो वह जन लोकपाल या यूं कहिए कि जन लोकायुक्त विधेयक को भूल नहीं सकती। पर विधेयक का जो मसविदा ‘आप’ के पास है, उसे विधेयक के रुप में पेश करने से पहले पूर्वानुमति की जरुरत पड़ेगी। ऐसे कड़े कानून बनाने की पूर्वानुमति यह व्यवस्था देगी ? उम्मीद तो नहीं है।
  डा.स्वामी को तो यह साफ लगता है कि वह अनुमति नहीं मिलेगी।फिर यदि बनी तो क्या ‘आप’ की सरकार सिर्फ कुर्सी गरम करने के लिए कुर्सी पर बनी रहेगी  ?

  डा.स्वामी को लगता है कि ऐसा नहीं होगा,इसलिए तुनक कर आप सरकार फिर गददी छोड़ देगी।
  राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार यदि ऐसा हुआ तो उसका पूरे देश पर  असर पड़ेगा ।

कई राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि  पूरा देश वर्षों से भीषण सरकारी और गैर सरकारी भ्रष्टाचार से पीडि़त है। 1966-67 में डा.राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में देश में कुछ गैर कांग्रेसी दलों का जो साझा आंदोलन और चुनावी अभियान चला  था,वह मुख्यतः भ्रष्टाचार के खिलाफ ही था।

 1974-77 के  जेपी आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार था। बोफर्स तथा अन्य घोटाले के खिलाफ वी.पी.सिंह के नेतृत्व में 1987-89 में चले आंदोलन का मुख्य मुददा तो
सिर्फ भ्रष्टाचार था।पर इन आंदोलनों के बाद निजाम बदलने के बावजूद देश के हालात नहीं बदले।
इन में से किसी सरकार ने यह कह कर गद्दी नहीं छोड़ी थी कि चूंकि वे अपने आंदोलन के मुददे को सरकार में आकर लागू नहीं कर पा रहे हैं,इसलिए गद्दी छोड़ रहे हैं।यह काम सिर्फ ‘आप’  ने किया।

  यदि इस बार गद्दी मिलने पर देश की भ्रष्टाचार समर्थक शक्तियां एक बार  केजरीवाल को गददी छोड़ने को विवश कर देंगीं तो उसका राजनीतिक परिणाम  देश भर में प्रकट हो सकता है।‘आप’ देर -सवेर राष्ट्रीय पार्टी बन कर उभर सकती है।क्योंकि उसकी अच्छी मंशा के कायल देश भर के लोग  हो सकते हैं।

  याद रहे कि आप के 2013-14 के 49 दिनों के शासनकाल में दिल्ली में भ्रष्टाचार काफी हद तक थम गया था।ऐसा प्रभाव  अब तक मोदी सरकार नहीं दिखा पाई है।

  एग्जिट पोल के नतीजे बताते हैं कि इस बार भी ‘आप’ को सभी जातियों,वर्गो और समुदायों में से  उन लोगों के वोट मिले हैं जो भ्रष्टाचार को इस देश की सबसे बड़ी समस्या मानते हैं।

 ‘आप’ की अगली सफलता या विफलता दोनों ही स्थितियों में देश भर में एक खास तरह के
राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना जाहिर की जा रही है।वह धु्रवीकरण भ्रष्टाचार समर्थक और भ्रष्टाचार विरोधी शक्तियों के बीच हो सकता है।यदि ऐसा हुआ तो इसके साथ यह भी अपने आप हो जाएगा कि जाति,समुदाय और संप्रदाय के आधार पर समाज को बांट कर वोट बटोरने वाले नेताओं को उनकी नानी याद आ जाएगी।

  ( इस लेख का संपादित अंश 10 फरवरी, 2015 के दैनिक भास्कर ,पटना में प्रकाशित )