Thursday, October 10, 2013

बड़े जतन किए,पर नहीं बच पाए बड़बोले लालू

   सी.बी.आइ. की कठोर जांच -प्रक्रिया और बाद में अदालती कार्रवाइयों से बचने के लिए लालू प्रसाद ने पिछले 17 वर्षों में बहुत हाथ -पांव मारे। कभी किसी को धमकाया तो कभी प्रलोभन दिया। कभी किसी से पैरवी की और करवाई तो कभी  दबाव डलवाया।

  केस से बचने के लिए कभी अपने आवास पर महीनों तक विघ्ननाशक यज्ञ करवाया तो साथ ही देश के मशहूर तीर्थ स्थलों व सिद्ध शक्तिपीठों की अनेक यात्राएं कीं। लालू प्रसाद इस केस के सिलसिले में जब भी अदालत में जाते थे, उससे पहले पूजा पाठ करते थे, मछली के दर्शन करते थे। दही खाकर निकलते थे। इस बार भी रांची अदालत जाने से पहले उन्होंने वह सब किया और साथ ही अपनी प्रिय गाय के भी दर्शन किये।
    पर उनका कोई उपाय काम नहीं आया। अंततः अदालत ने उन्हें दोषी ठहरा ही दिया।

  आज की अपनी स्थिति के लिए खुद लालू प्रसाद ही जिम्मेवार हैं। सन 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू प्रसाद सार्वजनिक रूप से कहा करते थे कि ‘मैं खुद ही कानून बनाता हूं और तोड़ता हूं।’

 उनकी यही प्रवृति हाल तक भी सामने आती रहती थी। मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने जब कोई आपराधिक मामला आता है तो वह अक्सर यह कह दिया करते हैं कि ‘कानून अपना काम करेगा।’

 इसके जवाब में नीतीश का मजाक उड़ाते हुए लालू प्रसाद ने कई बार सार्वजनिक रुप से कहा कि ‘जब कानून ही अपना काम करेगा तो आप किस काम के मुख्यमंत्री बने हुए है ?’

यानी लालू प्रसाद जब मुख्यमंत्री थे तो वे खुद को सदा कानून से ऊपर समझते थे। उनके कई काम भी वैसे ही होते थे। उन्हीं कामों में यह चारा घोटाला भी शामिल है। पर अंत में कानून के गिरफ्त में वे आ ही गये।

  मंडल आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुए 1991 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद को बिहार की गरीब व पिछड़ी जनता ने अभूतपूर्व जन समर्थन दिया था। पर उन्होंने लगातार उस समर्थन का दुरुपयोग ही किया।

  एक बात का उल्लेख यहां विशेष तौर पर जरुरी है। यदि चारा घोटाले की जांच प्रक्रिया पर पटना हाईकोर्ट की निगरानी नहीं होती तो इस केस को तार्किक परिणति तक पहुंचाना संभव नहीं होता। क्योंकि चारा घोटाला न सिर्फ सर्वदलीय बल्कि सर्वपक्षीय भ्रष्टाचार का नमूना है। डा.यू.एन.विश्वास जैसे ईमानदार और निडर सी.बी.आइ. अफसर इस घोटाले की जांच टीम के अगुआ नहीं होते तो भी यह नतीजा शायद सामने नहीं आता क्योंकि राजनीति से जुड़े चारा घोटालेबाज लोग  कभी केंद्र और राज्य सरकार प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से चलाते थे।

चारा घोटालेबाजों ने रिश्वत के बल पर मीडिया के एक हिस्से सहित इस लोकतांत्रिक देश के सिस्टम के लगभग सारे अंगों के संबंधित लोगों को खरीद रखा था। सी.बी.आइ. जांच का आदेश देते हुए पटना हाईकोर्ट ने 1996 में ही कह दिया था कि उच्चस्तरीय साजिश के बिना इतना बड़ा घोटाला संभव ही नहीं था।

      1996 में जब सी.बी.आइ. ने लालू प्रसाद पर शिकंजा कसना शुरु किया तो लालू प्रसाद ने उससे बचने के लिए बहुत हाथ पैर मारे। तब लालू प्रसाद बिहार की राजनीति के महाबली नेता और मुख्यमंत्री थे। खुद को कानून की गिरफ्त से बचाने के लिए किसी की चिरौरी की और किसी की भावना उभारने की कोशिश की तो किसी को बुरी तरह धमकाया। उनके कई उदंड समर्थकों ने तो इस दिशा में  हद ही कर दी।

    कमल पासवान उन दिनों लालू प्रसाद के दल के प्रादेशिक अध्यक्ष थे। उन्होंने 29 सितंबर 1996 को सार्वजनिक रुप से यह धमकी दी कि ‘यदि लालू प्रसाद के चरित्र हनन की कार्रवाई की गई तो देश में खूनी क्रांति होगी और धरती लाल कर दी जाएगी।’

पासवान ने यह भी कहा कि जो लोग यह समझते हैं कि मैं सी.बी.आइ. को धमकाने के लिए ऐसा बयान दे रहा हूं तो वे भ्रम में हैं। हमें सी.बी.आइ. पर पूरा विश्वास है। पर जांच कार्य आगे बढ़ा तो लालू समर्थकों का सी.बी.आइ. पर से विश्वास उठ गया। 1997 में एक दिन पटना के व्यस्त डाक बंगला चौराहे पर आम लोग यह देख कर हैरान रह गये कि लालू समर्थक प्रमुख नेतागण एक नंग धड़ंग बच्चे से जमीन पर पड़े दो पुतलों पर सरेआम पेशाब करवा रहे हैं और बगल खड़े वे लोग हंस रहे हैं। वे पुतले सी.बी.आइ. के जांच अधिकारी डा. यू.एन. विश्वास और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी केे थे।

   बाद में पुतलों को जला दिया गया। एक अन्य अवसर पर लालू प्रसाद के दल के नेताओं ने पटना राज भवन के सामने यू.एन. विश्वास के पुतले को जलाने से पहले तलवार से काटा। ऐसा करके उन लोगों ने सी.बी.आइ. के कर्त्तव्यनिष्ठ अफसर डा. विश्वास को आतंकित करने की कोशिश की।

  इतना नहीं। लालू प्रसाद ने पता लगा लिया कि डा. विश्वास, जो जांच कार्य में घोटालेबाजों के साथ कोई रहम करने को तैयार नहीं थे, दरअसल बौद्ध हैं। उन्होंने यह भी पता लगा लिया कि उन्होंने किस बौद्ध गुरु से दीक्षा ली है। वह बौद्ध गुरु थे राष्ट्रपाल महाथेरो। लालू प्रसाद ने यू.एन. विश्वास पर प्रभाव डालने के उद्देश्य से बोधगया स्थित उस बौद्ध गुरु राष्ट्रपाल महाथेरो को 1996 के अक्तूबर में फोन किया।

मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने उनसे कहा कि ‘भंते जी, आपके चेला ने हमें झूठमूठ बोल कर फंसा दिया है। प्लीज आप जल्दी कुछ कीजिए। मैं अभी बहुत दिक्कत में हूं।’

   पर राष्ट्रपाल महाथेरो ने मुख्यमंत्री से साफ -साफ कह दिया कि डा. विश्वास की जो गतिविधियां धर्म से संबंधित नहीं हैं, उनसे मेरा कोई सरोकार नहीं है। इस जवाब से लालू प्रसाद को झटका लगा था।

   उसके बाद लालू ने दूसरा रास्ता अपनाया। तब जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद ही थे। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौडा को 10 जनवरी 1997 को पत्र लिखा। याद रहे कि देवगौडा़ भी जनता दल में ही थे। लालू ने लिखा कि वे डा. यू.एन. विश्वास को चारा घोटाले के जांच कार्य से हटा दें। याद रहे कि डा.विश्वास सी.बी.आइ. के पूर्वी क्षेत्र के संयुक्त निदेशक की हैसियत से चारा घोटाले की जांच कार्य को निदेशित कर रहे थे। विश्वास को पटना हाईकोर्ट ने कह रखा था कि आपको जांच कार्य में कोई कठिनाई हो तो हमें सूचित करें।

   31 जनवरी 1997 को पटना के कदमकुआं से गांधी मैदान तक लालू समर्थकों ने सोंटा मार्च /यानी लाठी मार्च/ निकाला। मार्च में शामिल जद कार्यकर्ता उत्तेजक नारे लगा रहे थे। प्रतिपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि सोंटा मार्च सी.बी.आइ. तथा उन लोगों को आतंकित करने के लिए निकाला गया था जिनकी जनहित याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने जांच का भार सी.बी.आइ. को सौंपा था।

   2 मई 1997 को अपने आवास पर प्रेस कांफ्रेंस में लालू प्रसाद ने यहां तक कह दिया कि सी.बी.आइ. अमेरीकी खुफिया एजेंसी सी.आइ.ए. की तरह है। सी.बी.आइ.यहां के राजनेताओं की हत्या भी करवा सकती है। अपने समर्थकों की भावना उभारने की लालू प्रसाद की यह एक और कोशिश थी।

    18 मई 1997 को पटना के मिलर स्कूल के मैदान में आयोजित एक समारोह में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने कहा कि राज रहता है तो चेहरे पर मुस्कराहट रहती है। जिस दिन हमारा राज चला जाएगा, उस दिन गरीबों को पता चल जाएगा। उस दिन गरीबों पर सामंती शक्तियां कहर ढाहेंगीं। इसलिए राज को बचाने के लिए दलितों, पिछड़ों और गरीबों को खुद ही आगे आना होगा।

   मीडिया पर जम कर बरसते हुए लालू प्रसाद ने कहा कि सारा अखबार पूंजीपतियों का है। वे लोग पिछले डेढ़ साल से मेरे खिलाफ अभियान चला रहे हैं।

इस लेख का संपादित अंश जनसत्ता के 1 अक्तूबर 2013 के अंक में प्रकाशित/

चारा घोटाला जांच के हीरो डा. यू.एन.विश्वास


     लातिनी अमरीकी विद्रोही चे. ग्वेवारा को अपना आदर्श मानने वाले सी.बी.आइ. अफसर डा. यू.एन. विश्वास चारा घोटाला -जांच -कार्य के हीरो रहे। इस सजा की खबर से उन्हें भारी संतोष मिला होगा। हालांकि उन्होंने भले ही कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया है।

     डा.विश्वास की देखरेख में सी.बी.आइ. ने इस मामले में ऐसा मजबूत केस बनाया था कि घोटालेबाज सजा से बच नहीं पा रहे हैं। देश के बड़े से बड़े वकील आरोपितों के काम नहीं आये। जांच कार्य के दौरान भी वे पटना में पत्रकारों से यह कहा करते थे कि यह एक मजबूत केस साबित होगा।
ऐसा ही हुआ भी।

   चर्चित चारा घोटाले की जांच का भार यदि डा. यू.एन. विश्वास जैसे ईमानदार और निडर अफसर को नहीं मिला होता तो इस महाघोटाले की जांच के काम को उसकी तार्किक परिणति तक पहुंचाया नहीं जा सकता था।

   सी.बी.आइ. का कोई भी अन्य अधिकारी बाहरी और भीतरी तमाम दबावों के बीच वह काम कर पाता जिसे उपेन विश्वास ने बखूबी अंजाम दिया? शायद नहीं।

   हालांकि यह बात भी विश्वास के पक्ष में रही कि पटना हाईकोर्ट ने विश्वास की भरपूर मदद की। इन पंक्तियों के लेखक ने एक संवाददाता के रूप में चारा घोटाले के जांच- कार्य का नेतृत्व करते डा. विश्वास को करीब से देखा था।

  एक बार सी.बी.आइ. के संयुक्त निदेशक /पूर्वी क्षेत्र/ डा. विश्वास ने पटना में पत्रकारों के एक छोटे समूह को बताया था कि मैं कलकत्ता छोड़ते समय हर बार अपनी पत्नी को यह कह कर आता हूं कि ‘शायद मैं इस बार नहीं लौट पाऊंगा।’

  उनकी यह बात कोई बनावटी नहीं थी। जांच के दौरान उन्हें पटना में तरह -तरह के प्रलोभन और धमकियां मिल रहे थे। तीस जून 1997 को विश्वास ने पटना हाईकोर्ट से कहा था कि ‘हमारे अफसरों को जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं, इसलिए राजनीति से जुड़े आरोपितों को गिरफ्तार करना संभव नहीं हो पा रहा है।’  याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पटना हाईकोर्ट चारा घोटाले की जांच की निगरानी कर रहा था।

पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस.एन. झा और न्यायमूर्ति एस.जे. मुखोपाध्याय के खंडपीठ ने डा. विश्वास को कदम -कदम पर संरक्षण दिया।

     डा. विश्वास को लगातार धमकियां मिल रही थीं। उन्हें कहा जा रहा था कि वे कुछ खास नेताओं को जांच के दायरे से बाहर रखें। सी.बी.आइ. का मुख्यालय भी यह नहीं चाहता था कि इस घोटाले में लालू प्रसाद को  आरोपित किया जाये। डा. विश्वास के नीचे के कुछ अफसर भी उनको सहयोग नहीं दे रहे थे।
इसको लेकर सी.बी.आइ. मुख्यालय और डा. विश्वास के बीच करीब दो महीने तक तनाव रहा। सी.बी.आइ. मुख्यालय पर तत्कालीन प्रधानमंत्री गुजराल का दबाव था। गुजराल की मिलीजुली सरकार लालू प्रसाद के दल के समर्थन से चल रही थी। इधर डा. विश्वास के नेतृत्व में जारी जांच से सी.बी.आइ. के सामने यह बात सामने आ रही थी कि मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की घोटालेबाजों से सांठगांठ है। तत्कालीन सी.बी.आइ. निदेशक जोंिगंदर सिंह ने अपनी पुस्तक में यह बात स्वीकारी है कि लालू प्रसाद को बचाने के लिए उनपर प्रधानमंत्री का दबाव था।
 
   जब घोटालेबाजों ने देखा कि डा. विश्वास को प्रभावित नहीं किया जा सकता है तो इस अफसर को तरह- तरह से परेशान किया जाने लगा। डा.विश्वास के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की गई। चारा घोटाले की जांच के बारे में यू.एन. विश्वास द्वारा तैयार प्रगति   प्रतिवेदन को हाईकोर्ट में दाखिल करने से  पहले ही उनके अधीनस्थ अफसर ने उसके निष्कर्षों को बदल दिया था। ऐसा उसने सी.बी.आइ. मुख्यालय के निदेश पर किया था।

  इसकी सूचना विश्वास ने हाईकोर्ट को दी। इस पर हाईकोर्ट ने विश्वास को संरक्षण प्रदान किया। हाईकोर्ट ने कहा कि डा.विश्वास अपनी रपट किसी अन्य अफसर को दिखाये बिना इस अदालत में दाखिल करेंगे।

   इस बीच डा.विश्वास को विधायिका  के विशेषाधिकार हनन का आरोप झेलना पड़ा। बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों में कुछ सत्ताधारी विधायकों व मंत्रियों ने  डा.विश्वास की तीखी आलोचना कीं और उनकी मंशा पर शक किया।

  यानी चारों ओर से दबाव व जान पर खतरे के बीच डा. विश्वास ने चारा घोटाले की सही जांच करके ऐसे आरोप पत्र तैयार करवाये कि अधिकतर घोटालेबाजों को अदालत ने सजा दी। अभी तो सजा देने की प्रक्रिया जारी है।
खुद लालू प्रसाद व जगन्नाथ मिश्र के खिलाफ कई अन्य केस सुनवाई की प्रक्रिया में हैं।

   चर्चित चारा घोटाला केस के जरिए डा. यू.एन. विश्वास ने बिहार में नब्बे के दशक में हलचल मचा दी थी। इस केस में डा. विश्वास के साहसपूर्ण कार्यों ने बिहार से अंततः जंगल राज की समाप्ति में परोक्ष रूप से ही सही, पर शुरुआती भूमिका निभाई। अब सी.बी.आई. के वही रिटायर अफसर  बंगाल विधानसभा का चुनाव लड़कर वहां मंत्री बने हैं। पश्चिम बंगाल में उनकी जीत के पीछे ममता बनर्जी की लोकप्रियता के साथ -साथ बिहार में किये गये उनके कामों का भी असर रहा।

   डा. यू.एन. विश्वास एक ऐसा नाम है जिससे अखबार पढ़ने वाला बिहार का करीब- करीब हर व्यक्ति अवगत है। जांच के दिनों विश्वास की चर्चा बिहार के घर -घर में होती थी।

   जांच के दौरान पटना में डा. विश्वास को बुलेटप्रूफ गाड़ी में चलना पड़ता था।  पर डा. विश्वास ने चारा घोटाले की ऐसी पक्की जांच की और कराई कि जनता एक बड़े हिस्से को भी यह भरोसा हो गया कि कुछ नेताओं की शह पर ही सरकारी खजाने को बेरहमी से लूटा गया था। अंततः रांची की अदालत ने भी उन आरोपों को सही पाया। चारा घोटाले की जांच शुरु होते ही  लालू प्रसाद तथा कुछ खास अन्य नेताओं का राजनीतिक अवसान भी शुरू हो गया था।

   पटना हाई कोर्ट ने सन 1996 में यह आदेश दिया था कि चारा घोटाले की जांच सी.बी.आई. करे क्योंकि यह उच्चस्तरीय साजिश के तहत हुआ है। उन दिनों 1968 बैच के आई.पी.एस. अफसर डा. विश्वास सी.बी.आई. के पूर्वी क्षेत्र के संयुक्त निदेशक थे। चारा घोटाले के कागज पत्र देखने के बाद ही उन्हें लग गया था कि यह एक जघन्य पाप व अपराध है जो मूक पशुओं के खिलाफ किया गया है। पशुओं के हक को छीन कर दरअसल पिछड़ों और आदिवासियों को गरीबी से उबारने के सरकारी कार्यक्रम को धक्का पहंुचाया गया जबकि लालू की सरकार पिछड़ों के वोट से  ही बनी थी।

   इस घोटाले में करीब -करीब सभी दलों के अनेक छोटे-बड़े नेता शामिल थे। दरअसल घोटालेबाज अनेक नेताओं सहित समाज के प्रभु वर्ग के एक बड़े हिस्से पर पैसे बरसा रहे थे।

    जाहिर है कि जांच शुरु होने पर विश्वास पर कितना बड़ा खतरा था। डा.विश्वास ने 12 जनवरी 1997 को ही यह कह दिया था कि ‘मैं  अपनी निजी सुरक्षा की परवाह किये बिना चारा घोटाले की जांच को अंजाम तक पहुंचाउंगा।’

यही काम उन्होंने किया भी। चारा घोटाले का केस इतना पोख्ता बनाया गया है कि कुछ आई.ए.एस. अफसर भी सजा से बच नहीं सके हैं। कुछ साल पहले एक सजायाफ्ता आई.ए.एस. अफसर ने मीडिया से कहा था कि मैं तो इस केस में बर्बाद ही हो गया।

डा.विश्वास ने उन दिनों पटना में मीडिया से खुद ही कहा था कि वह लैटिन अमरीकी क्रांतिकारी चे ग्वेवारा को अपना आदर्श मानते हैं। विश्वास ने ममता बनर्जी के दल में शामिल होना इसलिए भी स्वीकार किया क्योंकि डा. विश्वास को यह विश्वास था कि ममता बनर्जी ईमानदार नेत्री हैं।

पर माकपा नेताओं के बारे में विश्वास की राय दूसरी ही है। डा.विश्वास बताते हैं कि वाम शासन के शुरुआती दौर में उन्होंने कुछ ईमानदार आई.पी.एस. अफसरों के नाम ज्योति बसु को दिये थे ताकि वे उन्हें महत्वपूर्ण जगहों पर तैनात कर सकें। पहले तो ज्योति बसु ऐसा करने के लिए राजी थे। पर बाद में उन्होंने माकपा नेताओं की सलाह पर ऐसे अफसरों को ही महत्वपूर्ण पदों पर तैनात कर दिया जिनमें से अधिकतर बेईमान थे।
 
एक अन्य घटना की चर्चा विश्वास पटना में करते थे। यह बात उस समय की है कि जब सिद्धार्थ शंकर राय पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री थे। आसनसोन में सांप्रदायिक दंगा हो गया जहां विश्वास एस.पी थे। मुख्यमंत्री ने विश्वास से पूछा कि आप दंगा रोकने में विफल क्योें हो गये ?

इस युवा एस.पी. ने कहा कि कांग्रेस के श्रमिक नेतागण ही इसके लिए जिम्मेदार हैं और सत्ताधारी दल उनके खिलाफ कड़ाई करने से पुलिस को रोक रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस तरह के कठिन पदों पर तो आपको नहीं रहना चाहिए। इस पर विश्वास ने कहा कि ‘सर, मैं 24 घंटे में यहां से हटने को तैयार हूं।’

  विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य के लिए बड़े से बड़ा शक्तिशाली व्यक्ति का सामना करने को तैयार रहने वाले डा. विश्वास के ही वश में था कि वह चारा घोटाले की जांच सही ढंग से कर सके और बड़े नेताओं को भी अदालत से सजा दिलवाने लायक केस तैयार करा सके।

बिहार में नमो बनेंगे अति पिछड़ा ?


  क्या अगले लोकसभा चुनाव के समय बिहार में नरेंद्र मोदी के नाम पर अति पिछड़ा कार्ड खेला जाएगा ? क्या उसके बिना नमो का काम बिहार में नहीं चलेगा ? बिहार की राजनीति में जातीय कार्ड खेले जाने की पुरानी परंपरा रही है। ऐसे तो यह बीमारी पूरे देश में है, पर बिहार में कुछ अधिक ही है।

        बिहार के कुछ भाजपा नेताओं के हाल के बयानों को ध्यान में रखें तो शायद नरेंद्र मोदी को इस रूप में भी बिहार में पेश किया जाने वाला है। नरेंद्र मोदी के कुछ खास गुणों और विशेषताओं के कारण संघ व भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है। पर बिहार भाजपा के कुछ नेताओं को यह लगता है कि  मात्र उन गुणों और विशेषताओं से बिहार मंे उनका चुनावी काम नहीं चलेगा।

नरेंद्र मोदी के अति पिछड़ा होने का प्रचार भी बिहार में करना पड़ेगा। इस मुद्दे पर खुद नरेंद्र मोदी की राय अभी सामने नहीं आई है। विराट हिंदू एकता की बात करने वाले भाजपा के सहमना संगठनों की राय भी आनी बाकी है। पर, लगता है कि बिहार भाजपा के कुछ नेता नमो को लोकसभा चुनाव के समय बिहार में इस नये रूप में पेश करके ही मानेंगे। वे ऐसा पहले से भी  कर  रहे हैं। यदि खुद नमो की सहमति से अंततः ऐसा हुआ तो यह सवाल उठेगा कि क्या इससे नरेंद्र मोदी के हिंदू हृदय सम्राट की छवि को धक्का नहीं लगेगा ?

    जो हो , नीतीश विरोध के अतिरेक के चक्कर में राज्य के कुछ भाजपा नेता नमो  को उप जातीय चौखटे में कैद कर देना चाहते हैं ताकि नीतीश कुमार को राजनीतिक दृष्टि से नुकसान पहुंचाया जा सके।

  याद रहे कि अति पिछड़ा वोट बैंक जदयू का सबसे बड़ा वोट बैंक है। कुछ बिहारी भाजपा नेतागण पिछले कुछ महीनों से बिहार में यह प्रचार कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी गुजरात की अति पिछड़ी घांची जाति से आते हैं। इस जाति के लोग कपास से तेल निकालने का काम करते हैं। वे अपने भाषणों व प्रेस बयानों के जरिए बिहार की अति पिछड़ी जातियों के मतदाताओं को पहले से ही यह संदेश दे रहे हैं कि आपकी जाति का एक नेता पहली बार इस देश का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है। इसलिए आप लोग उनका समर्थन करें।

   अब जबकि शुक्रवार को अंततः नरेंद्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बजाप्ता घोषित कर दिया गया तो यह प्रचार और भी तेज हो सकता है। बिहार में अति पिछड़ी जातियों की  आबादी कुल आबादी में करीब 32 प्रतिशत है। यह आंकड़ा 1931 की जनगणना पर आधारित है। तब ओडिसा भी बिहार का हिस्सा था। इस देश में जातीय आधार पर जनगणना अंतिम बार 1931 में हुई थी।

   जिस तरह यादव मतों पर लालू प्रसाद का लगभग एकाधिकार सा बन चुका  है, उसी तरह जदयू को अति पिछड़ी जातियों के अधिकतर मतदाता वोट देते रहे हैं। याद रहे कि लालू प्रसाद के राजद को अल्पसंख्यकों का अधिकांश मत मिलता रहा है। बिहार में यादव और मुसलमानों की मिलीजुली आबादी करीब 28 प्रतिशत है। हाल के वर्षों में जदयू ने अल्पसंख्यक मतों में जरूर सेंध लगाई है। नीतीश कुमार के वोट बैंक में महादलित, पिछड़े मुसलमान और महिला मतदाता भी शामिल हैं।

  नीतीश कुमार खुद कुर्मी जाति से आते हैं। इसलिए स्वाभाविक ही है कि अधिकतर कुर्मी वोट जदयू को मिले। बिहार में जिस जाति के मुख्यमंत्री होते हैं, उस जाति के अधिकतर वोट आम तौर पर मुख्यमंत्री के दल को मिलते हैं।:

   हाल के महीनों में राजद ने बिहार में कुछ राजनीतिक बढ़त हासिल की है। हाल में हुए महाराजगंज लोकसभा उपचुनाव में राजद ने जदयू को बड़े अंतर से हराया था। कई कारणों से महाराजगंज जदयू के लिए एक प्रतिकूल चुनाव क्षेत्र रहा  है। सन 2009 के आम चुनाव में भी वहां से राजद के ही उम्मीदवार विजयी हुए थे। इस विपरीत राजनीतिक परिस्थिति के बावजूद जदयू के उम्मीदवार को महाराजगंज उप चुनाव में दो लाख 44 हजार मत मिले थे। यानी प्रति विधानसभा क्षेत्र में करीब 41 हजार मत। इतने मतों में अति पिछड़े, पसमांदा मुस्लिम, महादलित और महिलाओं के मत शामिल थे।

भाजपा के साथ इन दिनों बिहार में सवर्णों की सहानुभति देखी जा रही है। परंपरागत ढंग से व्यावसायिक समुदाय भाजपा के साथ रहा है। जातीय वोट बैंक वाले बिहार में नमो की हिंदुत्व छवि का भी थोड़ा लाभ मिल रहा है। पर मनमोहन सरकार के लुंजपंुज शासन के मुकाबले नमो को कुछ बढ़त मिल सकती है। इसका अधिक लाभ नहीं मिलेगा क्योंकि बिहार में नीतीश का शासन भी एक बेहतर शासन ही माना जाता रहा है।

नमो के पक्ष में कुछ हवा बिहार में भी है, पर वह हवा चुनाव नतीजों को कितना प्रभावित कर पाएगी, यह अनिश्चित है। खुद बिहार भाजपा के कुछ नेताओं को भी यह नहीं लगता कि वह नमो की मात्र परंपरागत छवि से ही बिहार में निर्णायक जीत हासिल कर सकती है। इसलिए अति पिछड़ा कार्ड खेला जा रहा है। भाजपा जदयू के अति पिछड़ा वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है। इसलिए नमो को जातीय नेता के रूप में भी पेश किया जा रहा है।

   नीतीश सरकार ने अति पिछड़ों के लिए पंचायतों में 20 प्रतिशत सीटें रिजर्व की हैं। उसने महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत सीटें रिजर्व की। उनके लिए राज्य सरकार ने कुछ अन्य काम भी किये हैं। पंचायतों में अति पिछड़ों के लिए हुए आरक्षण का नुकसान खुद कुर्मी जाति को भी हुआ था जिस जाति पिछड़ी जाति से खुद नीतीश कुमार भी आते हैं। इससे यह संदेश गया कि नीतीश ने अपनी जाति को राजनीतिक नुकसान पहंुचा कर भी कमजोर वर्ग को लाभ पहुंचाया। इससे उनका अति पिछड़ा वोट बैंक ठोस हुआ।

  क्या अति पिछड़ों या किसी समुदाय के लिए ठोस काम करने के कारण वोट बैंक बनता है या उस जाति में सिर्फ पैदा होने के कारण ? अगले लोकसभा चुनाव में इस सवाल का जवाब एक बार फिर मिलेगा।