शनिवार, 31 अगस्त 2019

अब हम झांकें पूर्वजों की ओर
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बाजरा,जौ,चना,मंूग,सोयाबीन,मक्का,रागी,मड़ुआ,और सफेद तिल।
राज्य सभा सांसद आर.के.सिन्हा के अनुसार ये अन्न ऐसे हैं सामान्यतः जिनके फूल रासायनिक खाद या कीटनाशक बर्दाश्त नहीं कर सकते।
यानी, ये कैंसरजनित नहीं हैं।
इन्हें समान मात्रा में मिलाकर पिसवाइए और इसकी रोटी खाइए।
यदि ‘दारा’ दरवाना हो तो वह भी कर सकते हैं।
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इसके विपरीत बाजार में जो चावल,गेहूं या आटा उपलब्ध है,उनमें रासायनिक खाद कीटनाशक के अंश हैं,जो कैंसर पैदा कर सकते हैं।
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आर.के.सिन्हा सहित इस देश-प्रदेश में कई प्रमुख व अग्र सोची लोग जैविक खाद के सहारे अपने खेतों में अन्न उपजा रहे हैं।
खुद को और अपनी अगली पीढि़यों को भी बचाना है 
तो यह काम बड़े पैमाने पर करना होगा।
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इस बीच प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि ‘आज हम देखते हैं कि जिस भोजन को हमने छोड़ दिया,उसको दुनिया ने अपनाना शुरू कर दिया।
 जौ,ज्वार,रागी,कोदो,सामा, बाजरा, सावां ऐसे अनाज कभी हमारे खानपान का हिस्सा हुआ करते थे।
लेकिन ये हमारी थालियों से गायब हो गए।
अब इस पोषक आहार की पूरी दुनिया में डिमांड है।’
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गांधी और उनके युग के अनेक नेतागण लोगों को खानपान के प्रति भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से सावधान -शिक्षित करते रहते थे।
हमने बचपन में यह काम करते पूर्व मंत्री जगलाल चैधरी को देखा था।
जबकि वे खुद फोर्थ इयर तक  मेडिकल की पढ़ाई पढ़ चुके थे।
उनका निजी जीवन भी सकारात्मक संदेश देता था।
इसके विपरीत अपवादों को छोड़कर आज के अनेक नेता-कार्यकत्र्ता खुद शराब पीते हैं,लोगों को पिलाते हैं तथा गलत खानपान करते थे।
नशे की हालत में भी सामाजिक समारोहों में भी जाते नेताओं को देखा जा सकता है।
परिणामस्वरूप असमय मृत्यु का प्राप्त होते जा रहे हैं।
कोई प्रतिपक्षी नेता किसी पर मारक मंत्र नहीं चला रहा  है।
ऐसा इसलिए भी है क्योंकि राजनीति में बहुत काला धन है।
सेवा के बदले धनोपार्जन व ऐय्याशी के तत्व राजनीति पर हावी हैं।
 ऐसे लोगों से भला कोई क्या सीखेगा ? 
नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं को चाहिए कि वे पोषक आहार का सरकारी स्ता पर प्रचार करें।
उसे उपजवाने के व्यापक उपाय करें।
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डा.राम मनोहर लोहिया पहले सिगरेट बहुत पीते थे।
उनकी देखादेखी उनके दल के अनेक कार्यकत्र्ता सिगरेट पीने लगे।
उनका स्वास्थ्य खराब होेने लगा।
इस पर मामा बालेश्वर दयाल ने लोहिया को पत्र लिखा।
आप सिगरेट छोड़ दीजिए।
लोहिया ने छोड़ दिया।
उसका सकारात्मक असर समाजवादी कार्यकत्र्ताओं पर भी पड़ा। 
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एक व्यक्तिगत अनुभव
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मेरे बाबू जी घर में अक्सर तीसी का ‘परेह’ यानी दाल बनवाते थे और भात या रोटी के साथ खाते थे।
उन्हें प्रोस्टेट की बीमारी नहीं हुई।
हमने शहर आकर यह सब छोड़ दिया।
मुझे प्रोस्टेट का आपरेशन कराना पड़ा।
अब तीसी तथा अन्य पांच पदार्थों से बना चूर्ण रोज खाता हूं।
उससे प्रोस्टेट को राहत है।   
  















शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

युगेश्वर पांडेय की पुण्य तिथि पर
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पारंपरिक विवेक और आधुनिक चेतना से लैस
युगेश्वर पांडेय की आज चैथी पुण्य तिथि है।
इस अवसर पर मैं उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहा हूं।
 बिहार वाणिज्य मंडल के पूर्व अध्यक्ष दिवंगत पाण्डेय 
का मुझे आशीर्वाद मिला हुआ था।
  मैं उन्हें तब से जानता रहा जब मैं गांव में रहता था।
वे वहां भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय थे । मेरे बाबू जी से मिलने आया करते थे।
हम लोग एक ही इलाके के थे।
  बाबू जी के नहीं रहने के बाद मैं उनसे विभिन्न निजी व सार्वजनिक मुद्दों पर सलाह लिया करता था।
  जब कभी मैं डा.रजी अहमद से मिलने गांधी संग्रहालय जाता था तो वे पूछते थे,
‘गुरूद्वारा से होकर आ रहे हैं या जाने वाले हैं ?’
रजी साहब जानते थे कि पांडेय जी मेरे गुरू तुल्य थे।
  पांडेय जी एक खूबी यह भी थी कि वे ऐसे लोगों की भी मदद किया करते थे जिनसे उन्हें बदले में कुछ मिलने वाला नहीं होता था।
  उसकी उन्हें कोई उम्मीद भी नहीं रहती थी।
मुझे उनमें  सबसे अच्छी बात यह लगती थी कि वे गांव और नगर के संगम  थे।
  शायद वैसे लोग अब विरल हैं।


खेती का रकबा बढ़ाने के साथ-साथ कृषि आधारित उद्योग भी जरूरी-सुरेंद्र किशोर



यह अच्छी बात है कि हमारे देश में करीब 50 लाख हेक्टेयर ऐसी बंजर जमीन उपलब्ध है जिसे खेती लायक बनाया जा सकता है।
 सरकार उसे खेती लायक बनाने को तैयार भी है।
यदि उसे खेती लायक बनाकर उसे भूमिहीनों के बीच बांटा जाए तो उससे समाज में कई तरह से सकारात्मक स्थिति पैदा होगी। 
पर हां, उससे पहले सरकार को इस बात पर गौर करना होगा कि खेती को धीरे- धीरे मुनाफे का धंधा कैसे बनाया जाए।
कृषि आधारित उद्योग का जाल कैसे बिछाया जाए।
भूजल की वैसे ही कमी होती जा रही है।
सरकार को पहले इस बात पर भी विचार करना होगा कि वर्षा जल का संचय करके उसे खेती के लिए कैसे उपयोग में लाया जाए।
 छोटी नदियों में चेक डैम बना कर कैसे सतही जल का संचय किया जाए।
  अभी देश में 15 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर जमीन खेती के लिए उपलब्ध है।
  उसकी सिंचाई के लिए ही पानी कम पड़ रहा है।
50 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन के लिए तो और भी अधिक पानी  की जरूरत पड़ेगी।
--सरकारी योजनाओं की निगरानी--
केंद्र सरकार अपनी 85 योजनाएं अब जम्मू -कश्मीर और लद्दाख में भी लागू करेगी।
 इसके लिए संबंधित नियमों में परिवत्र्तन का प्रस्ताव है।
इस ताजा खबर के साथ इस बात का अंदाज हुआ कि केंद्र सरकार राज्यों में न जाने कितनी योजनाएं चलाती रहती हैं।
इन योजनाओं के बारे में सामान्य लोगों को पता भी नहीं चल पाता है।
कहते हैं कि इनमें से कुछ योजनाएं कागजी हैं।इनके नाम पर पैसों की बंदरबांट हो जाती है।
संंभव है कि इन 85 योजनाओं के अलावा भी कुछ योजनाएं जम्मू कश्मीर में पहले से लागू हों।
 इनके अलावा विकास व कल्याण के लिए राज्य सरकार भी अपनी योजनाएं चला रही होंगी।
  यदि अन्य राज्यों में चल रही राज्य व केंद्र की सभी योजनाओं की सूची बनाएं तो वे सैकड़ों में होंगीं।
  होना तो यह चाहिए था कि इन योजनाओं की पूरी सूची की जानकारी प्रचार माध्यमों के जरिए जनता तक पहुंचती रहती।
 ताकि, स्थानीय प्रशासन से जागरूक  लोग समय -समय पर यह पूछ पाते कि आप किस योजना को कहां- कहां लागू  कर रहे हैं।
  यदि यह सब जब तक नहीं हो रहा है,तब तक विभिन्न दलों के  कार्यकत्र्ता व एन.जी.ओ. से जुड़े लोग  इन योजनाओं की खोज -खबर ले सकते हैं।
वे यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि योजनाओं के पैसे बीच में ही बंदरबांट में तो नहीं चले जा रहे हैं।
हां,इस काम में कुछ खतरे जरूर हैं।
पर कौन बड़ा नेता खतरा उठाए बिना जनता का लाड़ला बना है ?
  कई राजनीतिक कार्यकत्र्ता कहते हैं कि हमारे पास कोई काम ही नहीं है।
इससे बढि़या व जनहितकारी काम और कौन सा हो 
सकता है ?
  --पुलिस का एक पक्ष यह भी--
अधिकतर लोग पुलिसकर्मियों का एक ही पक्ष देखते हैं।
जाहिर है कि वह पक्ष नकारात्मक होता है।
उसे भी देखना चाहिए।उसमें सुधार की भी सख्त जरूरत है।
पर,पुलिसकर्मियों  का एक दूसरा पक्ष भी है।उसमें कई स्तरों के पुलिसकर्मी शामिल हैं।
वह पक्ष उनको मिल रही सुविधाओं के बारे में है।
 गैर सरकारी संगठन के सर्वेक्षण के आधार पर जो सूचनाएं हाल में सामने आई हैं,वे चिंताजनक हैं।
21 राज्यों में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार पुलिसकर्मी काम के भारी बोझ के कारण तनाव में रहते हैं।
 काम और निजी जिंदगी के बीच कोई संतोषजनक संतुलन नहीं है।
यही नहीं,जितनी अधिक जिम्मेवारियां पुलिसकर्मियों को सौंपी जाती हैं,उस अनुपात में उन्हें सुविधाएं नहीं दी जातीं ।
सर्वेक्षण से यह भी पता चला है कि देश के एक तिहाई पुलिसकर्मी अपनी नौकरी बदलना चाहते हैं ।यदि मौजूदा वेतन व सुविधाओं के बराबर का उन्हें कोई दूसरा काम मिल जाए।
     बिहार में पुलिस से पुलिस मंत्री बने रामानंद तिवारी ने सत्तर के दशक में सिपाहियों की खराब सेवा शत्र्तों और बदतर जिंदगी पर एक पुस्तिका लिखी थी।
उसे पढ़ने से बाहर के लोगों के सामने पहली बार उनका दूसरा पक्ष भी सामने आया था।
अब ताजा सर्वे ने तो यह बता दिया है कि दशकों के बाद अन्य स्तरों के पुलिसकर्मियों की स्थिति में भी कोई खास सुधार नहीं हुआ है। 
       --और अंत में-- 
सड़कों पर अतिक्रमण,गंगा में प्रदूषण और दवाओं में मिलावट ! 
अनेक लोगों को हाल तक यह लगता था कि पटना की सड़कों से अतिक्रमण  हट ही नहीं सकता।
पर, अब हट रहा है।
यहां तक कि अतिक्रमण के अब तक के ‘अछूते किले’ भी  ध्वस्त हो रहे हैं।उन अछूते किलों की ओर नजर गड़ाने की किसी सरकार को हिम्मत नहीं हो रही थी।इस बार पटना हाईकोर्ट ने वह हिम्मत प्रशासन को दे दी है।
पहले कई लोगों को यह भी लगता था कि पवित्र गंगा नदी को प्रदूषित करने वाले कल-कारखानों पर कार्रवाई  हो ही नहीं सकती।
पर,कान पुर के अनेक चमड़ा कारखाने कुम्भ के बाद भी इस बार बंद ही रहे।नतीजतन गंगा  जल की गुणवत्ता में थोड़ा सुधार हुआ है।
  पर, तीसरा काम अभी बाकी है।दवाओं में व्यापक मिलावट व नकलीपन अब भी जारी है।
  देखना है कि उस मिलावट पर इस देश में कारगर कार्रवाई कब हो पाती है ?
--30 अगस्त 2019 को प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित साप्ताहिक काॅलम कानोंकान से।

बुधवार, 28 अगस्त 2019

एकै साधे सब सधै, 
सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो,
फूलहि फलहि अघाय।।
यानी, एक ही काम को हाथ में लेकर उसे पूरा कर लो।
सबमें अगर हाथ डाला,तो एक भी काम बनने का नहीं।
पेड़ की जड़ को यदि तुमने सींच लिया, 
तो उसके फूलों और फलों को पूर्णतया प्राप्त कर लोगे।

मंगलवार, 27 अगस्त 2019


ताशकंद और शिमला समझौते के सबक
     ---सुरेंद्र किशोर--
जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में मोदी सरकार की ओर से लिए गए ऐतिहासिक फैसले के बाद से शिमला समझौते की व्यापक चर्चा हो रही है।
    3 जुलाई 1972 को हुए इस समझौते के बारे में यह बात कम ही लोग जानते हैं कि उसकी धज्जियां पाकिस्तान के तत्काीन शासक जुल्फीकार अली भुट्टो ने उसी जुलाई महीने में ही उड़ानी शुरू कर दी थी।
    इसीलिए यह कहा जाता है कि भारतीय सेना ने तो युद्ध में फतह हासिल की ,लेकिन हमारे हुक्मरानों ने समझौते की मेज पर सेना द्वारा हासिल लाभ गंवा दिया।
  ताशकंद समझौते में भी ऐसा ही हुआ था।
ताशकंद समझौते के खिलाफ केंद्रीय मंत्री महावीर त्यागी ने अपना इस्तीफा तक दे दिया था।वे ताशकंद समझौते की कुछ शत्र्तों से असहमत थे।
   लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद गुलजारीलाल नंदा कार्यवाहक प्रधान मंत्री बने थे।
  शास्त्ऱी मंत्रिमंडल के सारे सदस्य नंदा मंत्रिमंडल में भी शामिल कर लिए गए।
   जब ताशकंद समझौते पर मुहर लगाने के लिए मंत्रिमंडल की बैठक हुई तो बहुत देर तक ताशकंद समझौते पर विवाद होता रहा।
  महावीर त्यागी ने लिखा है कि ‘जब इस समझौते को स्वीकार करने का प्रस्ताव आया तो मैं कैबिनेट छोड़कर बाहर आ गया और अपना त्यागपत्र नंदा जी के पास भेज दिया।’
   अपने इस्तीफ के बाद त्यागी जी ने कहा कि उनकी समझ से पाकिस्तान और भारत तब तक अच्छी तरह उन्नत और संपन्न नहीं बनेंगे जब तक इन दोनों देशों में एकता स्थापित नहीं हो जाती।
   उन्होंने लिखा कि ‘ताशकंद समझौते के मूल ध्येय से भी  मैं सहमत हूं।लेकिन इस समझौते की कुछ बातें ऐसी हैं,जो हमारी सरकार और हमारी पार्टी की ओर से की गई घोषणाओं के विपरीत है।इस समझौते के कई तत्व बहुत ही गंभीर हैं।
  केवल भारत के रक्षा मंत्री की हैसियत से ही नहीं बल्कि विश्व युद्ध के सैनिक की हैसियत से भी मेरे कुछ निजी अनुभव हैं।
      उनके आधार पर मैं कह सकता हूं कि जीती हुई हाजी पीर की चैकियों को छोड़ना भयंकर भूल होगी,विशेषकर तब जब पाकिस्तान अपने छापामारों,गुप्तचरों और बिना वर्दी के हथियारबंद सैनिकों को वापस बुलाने और और भविष्य में ऐसे आक्रमण न करने को कटिबद्ध नहीं होता।’
   महावीर त्यागी ने यह भी लिखा है कि ‘ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर के तुरंत बाद पाकिस्तानी नेताओं ने यह कहना शुरू कर दिया था कि ‘समझौते में हथियारबंद पाकिस्तानियों को वापस बुलाने का जो जिक्र है,उसका अर्थ यह नहीं है कि हम अपने हथियारबंद छापमारों को भी कश्मीर से वापस बुलाएंगे।
  इसी तरह एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का अर्थ यह नहीं है कि हम जम्मू कश्मीर में कोई दखल न दें।क्योंकि इस क्षेत्र को पाकिस्तान अपना निजी क्षेत्र मानता है।’
     ताशकंद समझौते जैसा हश्र शिमला समझौते का  भी हुआ।
शिमला समझौते पर दस्तखत करके पाकिस्तान लौटने पर पाकिस्तानी संसद में अपने 165 मिनट के भाषण में भुट्टो ने कहा कि ‘हम पाकिस्तान की जनता की ओर से यह आश्वासन देना चाहते हैं कि ज्यों ही कश्मीर की जनता अपना मुक्ति आंदोलन शुरू करती है ,पाकिस्तान के लोग उनकी हर प्रकार से सहायता करेंगे।
   वे इस सिलसिले में अपना खून बहाने से भी नहीं हिचकिचाएंगे।’
    पाकिस्तान के युद्धबंदियों पर भुट्टो का कहना था कि ‘भारत उन्हें अधिक देर तक नहीं रख सकता।
हम इस सिलसिले में विश्व जनमत बनाने का प्रयास करेंगे।
   भुट्टो ने यह भी कहा कि ‘इस समझौते से कश्मीर के बारे में हमारे किसी प्रकार के सिद्धांतों का हनन नहीं हुआ है।पाकिस्तान कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के लिए स्वतंत्र है।’
  शिमला समझौते के समय अटल बिहारी वाजपेयी शिमला में ही थे।
समझौते के बाद वाजपेयी ने जो कछ कहा, इतिहास ने उसे सच साबित किया।
वाजपेयी ने तभी कह दिया था कि ,‘यह भारत का आत्म समर्पण है,क्योंकि दोनों देशों के विवादों पर कोई समझौता न होने पर भी भारत पाकिस्तानी इलाकों से भारतीय सेनाओं को हटा लेने पर सहमत हो गया।’
  याद रहे कि समझौते के अनुसार पाकिस्तान को 69 वर्ग मील भारतीय इलाका खाली करना पड़ा था तो भारत को 5139 वर्ग मील पाकिस्तानी इलाका।
  शिमला समझौते पर तत्कालीन विदेश मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह का कहना था कि दोनों देशों ने भारतीय उप महा द्वीप में स्थायी शांति की स्थापना के उद्देश्य से बातचीत में भाग लिया लेकिन सब जानते हैं कि शांति स्थायी रूप नहीं ले सकी।
 यदि ताशकंद और शिमला में भारत ने पाकिस्तान से कड़ी सौदेबाजी की होती तो स्थायी शांति की जमीन तैयार हो सकती थी।
    ध्यान रहे कि ताशकंद समझौते के जरिए भी भारत ने जीती हुई महत्वपूर्ण भूमि पाकिस्तान को लौटा दी थी।
उसी जमीन से घुसपैठिए लगातार कश्मीर में प्रवेश करके आतंक फैलाते रहे।
   पाकिस्तान हर बार गैर भरोसमंद पक्षकार ही साबित हुआ है।वह झूठ बोलने और अपने लोगों समेत दुनिया को भरमाने में माहिर है।
  यह किसी से छिपा नहीं है कि बालाकोट में एयर स्ट्राइक पर उसका यही कहना था कि भारत चंद पेड़ों को नुकसान पहुंचाने के अलावा कुछ खास नहीं कर सका।
 अब वह कह रहा है कि भारत बालाकोट से भी बड़े हमले की तैयारी में है।
  शिमला समझौते के तहत दोनों देशों ने संकल्प लिया था कि वे अपने मतभेदों को द्विपक्षीय वार्ता द्वारा शांतिपूर्ण उपायों से हल करेंगे।
और दोनों देशों की सरकारें अपनी सामथ्र्य के अनुसार एक दूसरे के खिलाफ घृणित प्रचार नहीं करेंगी।
  इसमें यह भी कहा गया था कि आपसी संबंधों में सामान्य स्थिति लाने की दृष्टि से सुविधाओं का आदान -प्रदान होगा।
दोनों देशों की सेनाएं अपनी सीमा में लौट जाएंगी।
  समझौते का एक बिंदु यह भी था कि जम्मू-कश्मीर में 17 दिसंबर 1971 को हुए युद्ध विराम के तहत नियंत्रण रेखा को मान्य रखेंगे।
इस समझौते को लागू करने के लिए किसने क्या प्रयास किए,इसे बयान करने के लिए 1972 की घटनाएं पर्याप्त हैं।
  कश्मीर में आतंक फैलाए रखने में पाकिस्तान की मुख्य भूमिका रही है।
वह वहां खुलेआम जिहाद छेड़ने की बात करता है।
   कश्मीर में पाकिस्तान की बेजा हरकतें भारत की ओर से उसके प्रति दिखाई गई उदारता का नतीजा है।
क्या शिमला समझौते में शामिल भारतीय पक्ष ताशकंद समझौते के बाद के अनुभव से परिचित नहीं था ?
जरूर परिचित रहा होगा।
90 हजार सैनिकों और करीब 5 हजार वर्ग मील पाकिस्तानी भूभाग पर भारतीय सेना के कब्जे के बावजूद भारत सरकार पाकिस्तान को कोई ठोस सबक नहीं सिखा सकी।
    शिमला में एक तरह से ताशकंद दोहराया गया।
 यदि अब ऐसा कोई अवसर आए तो यही उम्मीद की जाती है कि मौजूदा  सरकार ताशकंद और शिमला वाली गलती नहीं करेगी।
  इसी के साथ यह भी उम्मीद की जाती है कि हमारी सरकार उस पुरानी धारणा से भी इस देश को मुक्त करेगी कि भारतीय अपने इतिहास से नहीं सीखते।
--27 अगस्त 2019 के दैनिक जागरण में प्रकाशित।   
  



  







सोमवार, 26 अगस्त 2019

सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत जज मार्कंडेय काटजू ने कहा है कि 
पाकिस्तान कभी भी चीन द्वारा उइगर मुसलमानों की हत्या के बारे में नहीं बालेंगे क्योंकि वे दिवालिया हो चुके हैं और चीन से भिखारी की तरह भीख मांग रहे हैं।
          ----राष्ट्रीय सहारा-26 अगस्त 2019

रविवार, 25 अगस्त 2019

अरुण जेटली और रजत शर्मा
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1973 की बात है।
दिल्ली विश्व विद्यालय के एक काॅलेज के एडमिशन 
काउंटर पर लाइन लगी हुई थी।
एक छात्र को 3 रुपए घट रहा था।
क्लर्क कम लेने पर राजी नहीं हो रहा था।
पीछे के एक अपरिचित छात्र ने उसे पांच रुपए का नोट बढ़ा दिया।
उसका एडमिशन हो गया।
दोनों जब काउंटर से हटे तो दूसरे छात्र ने पहले से कहा कि चलिए ,चाय पिलाता हूं।
 चाय- वाय हुआ और उसके बाद दोनों ऐसे दोस्त बने कि अंत तक बने रहे।
  पंक्ति में आगे खड़े छात्र का नाम है रजत शर्मा।
पीछे खड़े छात्र के नाम का अनुमान लगाइए !
 खैर , वे थे अरुण जेटली !
एक दिन दोनों अपने -अपने क्षेत्र में शीर्ष पर पहुंचे।
रजत शर्मा ने कल भावुक होकर अपने चैनल पर कहा कि ‘जीवन भर अरुण जी मेरे फं्रेंड, फिलाॅस्फर और गाइड 
रहे ।कोई काम मैं उनसे पूछे बिना नहीं करता था।’
जिसके मित्र अरुण जेटली हों,उसे तो आगे जाना ही था।
हालांकि प्रतिभा की कमी रजत में भी नहीं ही है !



csgrj dkuwuksa ls ySl gksrh ljdkj
nqcyk gksrk izfri{k&&& सुरेंद्र किशोर  
विधि विरुद्ध क्रिया कलाप निवारण संशोधन विधेयक,2019
पर एक कांग्रेसी सांसद ने सवाल उठाया है किइतने कड़े
प्रावधान जोड़ने के  पीछे आखिर सरकार की मंशा क्या है ?’
 
ऐसे सवालों का भला क्या जवाब हो सकता है ?
अमेरिका सहित जिन -जिन देशों को आतंकवादियों की हिंसा झेलनी पड़ती है,वे अपने यहां संबंधित कानूनों को कड़ा करते जाते हैं।
 
पर, अपना ही एक देश है जहां ऐसे खतरों के बावजूद मनमोहन सरकार ने 2004 में पोटा कानून यानी प्रिवेंसन आॅफ टेररिज्म एक्ट 2002 को ही समाप्त कर दिया था।
उससे पहले राजग सरकार ने 2002 मंे पोटा’  बनाया था।
पर जब 2008 में मुम्बई पर भीषण आतंकी हमला हुआ तो मनमोहन सरकार को एक नया आतंक विरोधी कानून बनाना पड़ा।
 
मौजूदा मोदी सरकार को यदि यह लग रहा है कि बढ़ते आतंकी खतरों  के मुकाबले के लिए कानून को कड़ा करने की सख्त जरूरत है तो वह वैसा कर रही है।
 
नरेंद्र मोदी सरकार को ऐसा ही करने के लिए जनादेश भी मिला है।
 
देश को बाहरी और भीतरी खतरों से बचाने के काम में जो सरकार विफल होती या कमजोर दिखाई पड़ती है,उसे मतदाता उलट देते हैं।
 
नरेंद्र मोदी सरकार उस स्थिति से भरसक बचना चाहती है।
इसीलिए यह पहली घटना है कि देश ने लगातार दूसरी बार किसी नेता को प्रधान मंत्री पद के लिए चुना है।
 
मोदी सरकार के 2014 से 2019 तक के कामकाज को अधिकतर मतदाताओं ने पसंद किया तभी तो फिर चुन लिया।
मोदी सरकार पिछले पांच वाली शैली
को ही और बेहतर बनाते हुए आगे बढ़ रही है।
 
प्रतिपक्ष को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश के  मतदाता
कभी गलत निर्णय नहीं करते।उस समय भी नहीं जब 1971 में इंदिरा गांधी की जीत हुई।उस समय भी जनता सही ही थी जब 1977 में कांग्रेस जमीन पर आ गई।
1984
और 1989 के लोक सभा चुनावों में भी मतदाताओं ने सही निर्णय ही किए।
 
यदि आज का प्रतिपक्ष अपनी पिछली गलतियों को सुधारने की कोशिश करे तो वह अगले चुनावों में बेहतर कर सकती है।हालांकि सत्ता तब भी उससे दूर ही रहेगी,ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है।
पर मिल रहे संकेतों से यह लगता है कि उसे अपनी गलतियों के साथ ही जीना या मरना मंजूर है।ताजा आतंक विरोधी विधेयक पर शंका उठाना भी वैसा ही संकेत दे रहा है।
  2014
के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस की अभूतपूर्व पराजय के बाद कांग्रेस अध्यक्ष ने हार केे कारणों की पड़ताल करने का भार पूर्व रक्षा मंत्री ए.के. एंटोनी को सौंपा था।
एंटोनी ने अपनी रपट में अन्य बातों के अलावा यह भी कहा कि भ्रष्टाचार और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के कारण हम हारे।
क्या 2014 और 2019 के बीच कांग्रेस ने उस गलती को सुधारने की कोई कोशिश भी की ?
कत्तई नहीं।
नतीजतन 2019 के चुनाव में एक बार फिर राजग सत्ता में आ गया।
राजग यह बात बेहतर जानता है कि कौन से कानून कड़ा करने से देश व जनता का भला होगा और आतंकियों का हौसला पस्त होगा ।
उसे इस मामले में किसी निहितस्वार्थी की सलाह पर चलने की न तो उसे कोई जरूरत है और न ही उसकी मजबूरी है।
संकेत हैं कि अभी तो मोदी सरकार को और भी चैंकानेवाले काम करने हैं।
जनता ने यूं ही नहीं नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में  लगातार  दुबारा अपना विश्वास व्यक्त किया है।
 
इससे पहले जवाहर लाल नेहरू,इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी दुबारा प्रधान मंत्री बने थे।
पर उनकी जीत अलग कारणों से हुई।वह सिर्फ उनके ही कारण नहीं थी।
सत्तर के दशक तक इस देश में बड़ी संख्या में ऐसे -ऐसे अनेक दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी भी जीवित थे जिनकी और जिनके समर्थकों की चुनावी जीत में उनके खुद के त्याग- -तपस्या का भी योगदान था।
जवाहरलाल नेहरू बड़े लोकप्रिय नेता थे।पर सभी  कांग्रेसी उम्मीदवारों  की जीत सिर्फ उनके ही कारण नहीं होती थी।
 
इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की 1967 की जीत के पीछे देश भर में फैले अनेक मशहूर स्वतंत्रता सेनानियों का भी योगदान था।
 
हां,1971 की जीत सिर्फ इंदिरा जी की  अपनी जीत जरूर थी।पर वह जीत दुहरा नहीं सकीं।
अटल नीत राजग 1999 में दुबारा जीत गया था।वह सिर्फ भाजपा या अटल बिहारी वाजपेयी की जीत नहीं थी बल्कि गठबंधन की जीत थी।
 
इस पृष्ठभूमि में 2014 और 2019 के चुनावों में नरेंद्र मोदी की जीत सिर्फ उनकी जीत मानी जाती है।
 
नरेंद्र मोदी सरकार  का देश की सुरक्षा और प्रशासनिक सदाचार के मामले में हाल की  अन्य सरकारों की अपेक्षा बेहतर रिकाॅर्ड है।
 
आम लोग उससे खुश हैं।अपवादों की बात और है।
मोदी सरकार में भी भ्रष्टाचार है।पर आम धारणा है कि सरकार उसे रोकने की कोशिश भी कर रही है।
आतंकी घटनाएं भी हो रही हैं,पर लोगों की धारणा है कि मोदी सरकार उसे कुचलने की कारगर कोशिश करती रहती है।
 
भाजपा में भी परिवारवाद है।पर कांग्रेस सहित प्रतिपक्ष के कुछ  दलों की तरह  परिवार में ही दलसमाहित नहीं है।  
 
इन सब कारणों से मोदी व उनकी सरकार का अपर हैंडहै और प्रतिपक्ष दुबला होता जा रहा है।
यदि एंटानी कमेटी की रपट में कांग्रेस की जिन कमजोरियों का जिक्र किया गया है,यदि उन्हें दूर करने की कोशिश कांग्रेस  करे तो कांग्रेस से कोई कुछ उम्मीद पाल सकता है।पर वैसा होता नहीं दिख रहा है।
इस स्थिति में संकेत तो यही है कि वंश -तंत्र व दूसरी कमजोरियों से ग्रस्त अनेक दल धीरे -धीरे और भी कमजोर होते चले जाएंगे।
यह स्थिति स्वस्थ लोकतंत्र के लिए कत्तई सही नहीं है,पर इसके लिए नरेंद्र मोदी जिम्मेवार नहीं हैं।  
मोदी सरकार इसी गति से खुद को बेहतर कानूनों से लैस करती जाएगी।यदि किसी को लगता है कि कानून सही नहीं है तो फिर उसे सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी चाहिए।संविधान की भावना और मूल ढांचा के विपरीत किसी भी कानून को निरस्त कर देने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास मौजूद है।  
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जो रहीम उत्तम प्रकृति,
का करी सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापे नहीं,
लिपटे रहत भुजंग।।
   यह बात कभी के लिए सही थी।
अनुभव बताते हैं कि आज के लिए सही नहीं है।
इसलिए आज सावधानी जरूरी है।
अन्यथा,
सावधानी हटी,दुर्घटना घटी !

शनिवार, 24 अगस्त 2019

सोनिया गांधी का यह दावा गलत है कि ‘राजीव सरकार
 ने किसी को डराने की कोशिश नहीं की थी’
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    सोनिया गांधी ने हाल में कहा है कि राजीव गांधी को 1984 में पूर्ण बहुमत मिला था।
लेकिन उन्होंेने उसका इस्तेमाल डर का माहौल बनाने और धमकाने के लिए नहीं किया था।
पी.चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई के बाद 22 अगस्त को सोनिया गांधी ने यह बयान दिया ।
उनका आशय यह था कि मोदी सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों को डरा रही है।
मेरा मानना है कि इस देश में न्यायालय स्वतंत्र है।
इसलिए किसी निर्दोष व्यक्ति को डरने की कोई जरूरत ही नहीं।
इस देश का ऐसा कोई मामला मैं नहीं जानता जिसमें किसी बड़े नेता को
फंसा कर अदालत से सजा दिलवा दी गई हो।
      औरों की बात कौन कहे ,राजीव सरकार ने तो तब एक बड़े मीडिया हाउस को ही डराने की कोशिश कर दी थी।
केंद्र सरकार  के वित्त मंत्रालय के 400 अफसरों व कर्मचारियों  ने तब देश भर में फैले इंडियन एक्सप्र्रेस के सभी 11 दफ्तरों पर एक साथ छापा मारा था।
 इस पर राजीव गांधी ने कहा था कि यदि प्रेस को स्वतंत्रता हासिल है जांच एजेंसियों को भी स्वतंत्रता है।
  यह कहा गया था कि एक्सप्रेस पर जिस तरह की आर्थिक गड़बडि़यों का आरोप लगाया गया था, वैसे मामूली आरोप तो अधिकतर व्यापारियों पर लगते रहे हैं।
अधिकतर अखबारों के मालिक व्यापारी ही होते हैं।
पर तब कार्रवाई सिर्फ एक्सप्रेस पर ही हुई थी।क्योंकि उसने राजीव सरकार के भ्रष्टाचारों का भंड़ाफोड़ करना शुरू कर दिया था।
छापेमारी की उस घटना पर पूर्व प्रधान मंत्री मोराजी देसाई ने कहा था कि भले सरकार इस छापेमारी का औचित्य सिद्ध करने की कोशिश करे,पर लोग उस पर विश्वास नहीं करेंगे।यह प्रेस की स्वतंत्रता पर ही हमला है।
  याद रहे कि मोरारजी आम तौर पर ऐसे बयान नहीं दिया करते थे।
उस छापेमारी की व्यापक निंदा हुई थी।यहां तक प्रतिद्वंद्वी अखबारों के संपादकों ने भी छापेमारी की आलोचना की थी।
 एक्सप्रेस के अरूण शौरी ने कहा था कि  अखबार की संपादकीय नीतियों को प्रभावित करने के लिए देश व्यापी छापेमारियां की  गर्इं।
याद रहे कि एक्सप्रेस समूह के अखबार राजीव गांधी सरकार के खिलाफ घोटालों के आरोपों की खबरें विस्तार से छाप रहा था।उस पर सरकार सख्त नाराज थी।मैं भी उन दिनों एक्सप्रेस समूह के दैनिक अखबार जनसत्ता से जुड़ा था।
इतना ही नहीं,राजीव सरकार से विद्रोह करके अलग हुए वी.पी.सिंह के पुत्र अजेय सिंह को बदनाम करने के लिए सेंट किट्स में उनके नाम से जाली बैंक खाता खोलवा दिया गया और उसमें पैसे जमा करवा दिए।
 जाली  बैंक खाता खोलवाने में केंद्र सरकार के मंत्री और अफसर के हाथ थे।इसके अलावा भी लोक सभा में 404 सीटें पाई राजीव सरकार ने इस तरह के और भी कई कारनामे किए।
 कई कारणों से राजीव सरकार बदनाम हुई । नतीजतन 1989 के लोस चुनाव में कांग्रेस को  बहुमत तक नहीं मिला।
दरअसल ऐसे बयान देने से पहले नेता लोग यह सोचते हैं कि जनता की स्मरण शक्ति कमजोर होती है।
दूसरी बात ।यह अस्सी के दशक की बात है।
तब से कई दशक बीत चुके हैं।
नई पीढि़यां आ चुकी हैं।
वे शायद सोनिया जी की बातों पर विश्वास कर लेंगी।
इसीलिए मैंने इसे लिख दिया।
हालांकि ऐसा बयान देने का आरोप सिर्फ एक ही पार्टी 
पर नहीं लग सकता।अन्य कई दल भी दूध के धुले नहीं हैं।वे भी यदाकदा लोगों की क्षीण स्मरण शक्ति का लाभ उठाने की कोशिश करते रहते हैं।



शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

इतिहास के पन्नों से --3
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जब जेपी को मिला रेमान मैगसेसाय पुरस्कार
  सुरेंद्र किशोर
‘‘जय प्रकाश नारायण आधुनिक भारत में जन चेतना की रचनात्मक अभिव्यक्ति हैं।
उनमें यह देख और कह सकने का साहस रहा है कि 
स्वाधीनता ,राष्ट्रीयता और समाजवाद जैसी संस्थाएं इंसान की बिलकुल बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में अपने आप में पर्याप्त नहीं है।
  जब दफ्तरशाही ,सत्ता के केंद्रीकरण और गलत व्याख्या के कारण ,ये अत्याचार की सहचरियां बन जाती हैं तब इनमें कोई सार नहीं रहता।
इसीलिए जयप्रकाश नारायण व्यक्ति को उसकी मुक्तिकांक्षा और समानता -साधना को सर्वोपरि मानते हैं।’’
जय प्रकाश नारायण को जन सेवा के लिए मैगसेसाय पुरस्कार प्रदान करते हुए उनकी प्रशस्ति में उपर्युक्त बातेें कही गई थीं।
   1965 में उन्हें  मिला   पुरस्कार लगभग 50 हजार रुपए का था।
 कहीं मैंने पढ़ा था कि इसके सूद के पैसे  जेपी के निजी
खर्च में लगते थे।
  मैगसेसाय मिलने पर ‘दिनमान’ ने लिखा था  कि 
‘ जवाहरलाल नेहरू के बाद भारतीय राजनीति में सर्वाधिक प्रभावशाली जय प्रकाश नारायण का जन्म 1902 में बिहार के सारण जिले के सिताब दियारा में हुआ था।
@याद रहे कि सिताब दियारा का वह टोला बाद में उत्तर प्रदेश में चला गया।हालांकि जेपी पटना में रहते थे।गांव की उनकी खेती की देखभाल उनके विश्वस्त जगदीश सिंह करते थे@
मैट्रिक के बाद महात्मा गांधी के प्रभाव में आकर जेपी ने पढ़ाई छोड़ दी।
1922 में अपनी पढ़ाई आगे चलाने के लिए वे अमेरिका गये।
उन्होंने वहां सात वर्ष तक कैलीफोर्निया,विसकांसिन और कोलम्बिया विश्व विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की।
समाजशास्त्र की ड्रिग्री लेकर स्वदेश लौटे।
1934 में उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही  कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाई।
 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का संचालन किया।अपने विद्रोही साहसी व्यक्तित्व के कारण वे राजनीति में जन नायक के रूप में आये।
 आजादी के बाद अपनी सिद्धांतप्रियता के कारण वह राजनीति के क्षेत्र में अकेले होते गये और उनके साथ खोये अवसरों का इतिहास जुड़ता गया।
देश के सामने आई हर प्रमुख समस्या का उन्होंने अपने ढंग से निदान दिया।लेकिन उन्हें अल्पमत ही प्राप्त हुआ।
और आज वह सक्रिय राजनीति से दूर एक सर्वोदयी नेता ही माने जाते हैं।







-ग्राउंड फ्लोर पार्किंग के बिना शहरों में जाम की समस्या से निजात नहीं-सुरेंद्र किशोर  
इन दिनों पटना में सड़कों से अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं।
आम लोगों की रोज -रोज की तकलीफें दूर करने की दिशा में यह सराहनीय कदम है।
भले पटना हाईकोर्ट के कड़े निदेश पर ही हो रहा है,पर हो तो रहा है।
इन दिनों सरकार किसी अतिक्रमणकारी की नहीं सुन रही है।
ऐसा ही होना चाहिए।अब सड़कें और भी चैड़ी हांेगी।लोगों का आना-जाना सुगम  होगा।
  पर एक मूल समस्या की ओर प्रशासन का भी ध्यान नहीं है।
वह है ग्राउंड फ्लोर पार्किंग की स्थायी व्यवस्था करने की जरूरत ।
  पटना की मुख्य सड़कों के किनारे बड़े -बडे व्यावसायिक प्रतिष्ठान  तो खडे़ कर दिए गए।
पर उन प्रष्ठिानों के  भूतल पर भी पार्किंग की जगह दुकानें खोल दी गईं हैं।
जबकि नक्शा पास करवाए  गए ग्राउंड फ्लोर पार्किंग के साथ।
  आज भी जो मुख्य मार्गों पर जो व्यावसायिक भवन  खड़े किए जा रहे हैं,उनमें भूतल या भूमिगत पार्किग का कोई प्रावधान नहीं रखा जा रहा है।
ऐसे निर्माणों की देखभाल करने वाली सरकारी एजेंसियों को सच्चे कामों से क्या मतलब ?
उन्हें तो कुछ और से ही मतलब रहता है।
  कुछ महीने पहले पटना की दो मुख्य सड़कों के ग्राउंड फ्लोर पार्किंग रहित भवनों के मालिकों को संबंधित अधिकारी ने नोटिस भेजे थे।कहा था कि आप अपने भवन के निचले हिस्से में पार्किंग स्थल बनवाइए।
पर अब तक तो बनने के कोई संकेत नहीं हैं।
  यदि भूतल या भूमिगत पार्किेग का प्रबंध नहीं होगा तो उससे कोई लाभ स्थायी नहीं होगा।
सड़कों को आप और कितना चैड़ा कीजिएगा ? 
 --एकलौती उपलब्धि--
अस्सी के दशक में पटना के मजहरूल हक पथ यानी फ्रेजर रोड के एक निजी होटल को भूमिगत पार्किंग बनाने के लिए शासन ने बाध्य कर दिया  था।लोगबाग उससे खुश थे।
लगा था कि यह काम आगे भी बढ़ेगा।
अन्य प्रतिष्ठानों के नीचे भी पार्किंग स्थल बनवाने का काम होगा।
पर, वह हो नहीं सका।
पार्किंग की कमी समस्या सिर्फ पटना में  ही नहीं है।
यह बिहार के अन्य शहरों में भी है।पर पहले पटना में तो सुधार हो !
  --लाॅ कालेजों में शिक्षा-परीक्षा का हाल-
हाल में बिहार में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीशों की बहाली हुई।
कुल बारह  उम्मीदवारों का चयन हुआ ।इनमें  बिहार से सिर्फ चार हैं।
इन चार में से भी एक की पढ़ाई दिल्ली लाॅ कालेज में हुई है।
आखिर ऐसा क्यों होता है कि  बाहर के ही अधिकतर  उम्मीदवार चयनित हो जाते हैं ?ऐसा आज ही नहीं हुआ है।वर्षों से ऐसा हो रहा है।
इसका सबसे बड़ा कारण यह  है कि बिहार के  अधिकतर लाॅ कालेजों में शिक्षण-परीक्षण का हाल ठीक नहीं है।
अपवाद स्वरूप ही  बिहार के किन्हीं  लाॅ कालेजों में अच्छी पढ़ाई होती है।
  ऐसे मामले में चिंता प्रकट करने वालों को चाहिए कि वे पहले बिहार के लाॅ कालेजों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई का प्रबंध कराएं।
फिर उम्मीद करें कि बिहार के उम्मीदवार अधिक संख्या में जज बनेंगे।
--चीन की बदलती जनसंख्या नीति--
1949 के बाद यानी कम्युनिस्ट शासन काल में चीन अपनी जनसंख्या नीति में समय- समय पर परिवत्र्तन करता रहा है।
उसकी पहली नीति कार्ल माक्र्स की नीतियों पर आधारित थी।बाद की नीति व्यावहारिक अनुभव के आधार पर।
1949 की क्रांति के बाद चीन ने नारा दिया-‘आबादी,आबादी और आबादी।’
शासन ने  गर्भ निरोधकों पर प्रतिबंध लगा दिया।
याद रहे कि माक्र्स आबादी बढ़ाने  के पक्ष में थे। 
हमारे देश भारत में भी इन दिनों जनसंख्या नियंत्रण पर गंभीर चर्चा शुरू हुई है।
 पता नहीं ,नियंत्रण के लिए हमारी सरकार  कोई नीति बना भी पाएगी भी या नहीं।
चीन में तो तानाशाही है।वहां तो ऐसी नीति लागू करना संभव भी है।
हमारे यहां तो यह बहुत मुश्किल काम है।पर मुश्किल काम को भी देशहित में कई बार करना पड़ता है।
  भारत में तो आए दिन सरकारी निर्णयों को धार्मिक भावना या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ दिया जाता है।
पर जब चीन में वैचारिक कट्टरता थी तभी 1957 में चीन के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि ‘परिवार नियोजन के बिना हम  देश को गरीबी के चंगुल से न तो शीघ्र मुक्त कर सकेंगे न ही समृद्ध और शक्तिशाली बना सकेंगे।’
चीन में तब गर्भ निरोधक बितरित किए गए थे।
 पर उस नीति को  थोड़े ही समय बाद
छोड़  दिया गया।
फिर एक दूसरा दौर भी आया।
1964 में चाउ एन लाई ने कहा कि हमने गर्भ नियंत्रण के तौर -तरीकांे के अध्ययन के लिए लोगों को जापान भेजा है।
चीन ने 1969 में दो बच्चों की नीति बनाई।
1979 में एक बच्चा नीति चली।
1980 में चीन सरकार ने आदेश दिया कि यदि पहली संतान लड़की हो तो दूसरी संतान पैदा की जा सकती है।
2019 की ताजा नीति दो बच्चों की हो गई।
भारत में दो बच्चे की नीति बनाना भी लोहे के चने चबाने जैसा काम होगा।पर कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं।
जहां संसाधन कम और आबादी अधिक हो,उस देश की तरक्की 
तो मुश्किल है ही।
--और अंत में-
1949 में चीन की मुख्य भूमि पर कम्युनिस्टों का आधिपत्य हुआ।
उन दिनों चीन सरकार ने आबादी बढ़ाओ कार्यक्रम चलाया।
उसका एक उद्देश्य यह भी था कि मुख्य भूमि से लोगों को ले जाकर उन्हें तिब्बत में बसाया जाए ताकि वहां जातीय स्थिति का स्वरूप बदले।
1950 में चीन ने तिब्बत पर आक्रमण किया और वहां जन मुक्ति सेना के लाखों सैनिकों को बसाया गया।
--कानोंकान-प्रभात खबर-बिहार -23 अगस्त 2019 से।


    




यदि किसी दल या दलीय समूह का शामियाना, घोटालों के ताना और आतंकवाद-समर्थन के बाना से बना हो तो फिर उसमें भारतीय मन कैसे समा सकता है ?

अपने ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ को आगे बढ़ाते हुए 27 जून 1961 को तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने मुख्य मंत्रियों को लिखा कि मैं जाति आधारित किसी तरह के आरक्षण खास कर सरकारी नौकरियों में आरक्षण के सख्त खिलाफ हंू।
 पर हाल में छत्तीसगढ़ की कांग्रेसी सरकार ने पिछड़ों के लिए पहले से उपलब्ध  आरक्षण को हाल में दुगुना कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की मुहर के बाद मंडल आरक्षण की अधिसूचना को भी कांग्रेस शासन काल में जारी करनी पड़ी थी।
  यानी नेहरू की कांग्रेस के एक हिस्से ने भी बाद में आरक्षण की जरूरत समझी।
क्योंकि आरक्षण के अभाव में सरकारी नौकरियों में पिछड़ों के हकों की ‘हत्या’ हो रही थी।
  जवाहरलाल नेहरू ने कभी धारा 370 का समर्थन करके उसका प्रावधान संविधान मंे कराया। 35 ए का प्रावधान भी कराया।
पर, उसी धारा से मिली ‘सुविधा’ का लाभ उठा कर जब मुस्लिम अतिवादियों ने लाखों हिन्दुओं खास कर पंडितों को घाटी से निकाल बाहर किया,उन पर अन्य तरह के जघन्य अपराध किए तो मोदी सरकार ने उसे हटा देने की जरूरत समझी।
उसी धारा की उपस्थिति के कारण कश्मीर को देसी-विदेशी जेहादियों  का अड्डा बना दिया गया और उससे पूरे देश की सुरक्षा पर भी खतरा पैदा हो गया तो  क्या फिर भी उस धारा को नहीं हटाया जाना चाहिए था ?
  कोई कानून,संवैधानिक प्रावधान या नियम समय की जरूरतों को पूरा करने में विफल रहे तो अग्रसोची देश उसे समाप्त कर देते हैं या बदल देते हैं।
  पर अपना देश ?



गुरुवार, 22 अगस्त 2019

22 अगस्त 2019 के दैनिक ‘आज’ की एक रपट
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बाइकर्स गैंग के आतंक से खौफजदा हैं शहरवासी
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     राजनीतिक पार्टियों का संरक्षण
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‘.............बाइकर्स गैंग को राजनीतिक पार्टियों का संरक्षण प्राप्त  है।पुलिस इन्हें पकड़ कर इनके नाम- पते पूछने  ही लगती  है कि राजनीतिक नेताओं के फोन आने श्ुारू हो जाते हैं।
वे कहते हैं कि बच्चे हैं,पार्टी से जुड़े हैं।गलती की है,इस बार माफ कर दीजिए।
  यही सिलसिला चलते रहता है।
इसका मुख्य कारण यह है कि राजनीतिक पार्टियों को जब मोटर साइकिल रैली निकालनी होती है तो बाइकर्स गंैग के यही लोग रैली में शामिल होते हैं।
  आम लोगों की बात कौन कहे, हाल में पटना में एक रिटायर आई.पी.एस.अफसर और उनके परिजन  बाइकर्स गैंग की हिंसा के शिकार बन गए।
दूसरी घटना के तहत एक हाईकोर्ट जज को बाइकर्स गैंग से बचाने के लिए खुद डी.जीपी को घटनास्थल पर पहुंचना पड़ा।
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 नोट-- कौन कहता है कि बिहार में देर- सवेर जंगल राज की वापसी नहीं हो सकती,यदि राजनेताओं की इसी तरह 
मदद मिलती रहे  ! ! !
    दैनिक आज तो यह भी लिखता है कि ‘रंगदारी से लेकर हत्या तक की सुपारी लेते हैं बाइकर्स गैंग।’

   14 मार्च 2001 
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 तहलका कांड पर भाजपा संसदीय दल की बैठक के बाद पार्टी के प्रवक्ता प्रो.विजय कुमार मल्होत्रा ने मीडिया से कहा था कि ‘बैठक में पार्टी के सांसदों और घटक दलों से कहा गया कि उन्हें इस मामले में रक्षात्मक होने की जरूरत नहीं है।उन्हें इससे आक्रामक रूप से निपटना होगा।क्योंकि न तो कोई रक्षा सौदा हुआ है और न ही किसी मंत्री पर इसमें शामिल होने का आरोप लगा है।
कुछ दिन में जब सच्चाई सामने आ जाएगी तब पता चल जाएगा कि इसके पीछे कौन सी ताकत है।’
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नतीजा--
बंगारू लक्ष्मण को 2012 में चार साल की सश्रम सजा हुई।
भाजपा ने उनकी पत्नी को उनके बदले लोक सभा का उम्मीदवार बना दिया था।
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21 अगस्त 2019
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पी.चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई पर 
पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी--
‘पी.चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई एक साजिश है।उनकी छवि खराब करने की कोशिश है।’
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नतीजा- हालांकि भविष्य के गर्भ है।
पर, संकेत बताते हैं कि यदि जांच एजेंसियों ने लगातार ठीक से काम किया तो चिदंबरम को सजा मिलनी तय मानी जा रही है। भले राहुल गांधी जो कहें !
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दशकों से इस देश की राजनीति देख रहा हूं।इसी तरह चल रही है।
मैंने तो सिर्फ दो उदाहरण दिए हैं।
ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं।
एक नेता के खिलाफ कार्रवाई होती है तो उसके दल का दूसरा  नेता कहता है कि ‘उसी पर क्यों ?’
फलां पर क्यों नहीं ?
कार्रवाई अभी ही क्यों ?
इसमें कोई साजिश है।
बदले की भावना है।
किसी खास जाति या समुदाय का होने के कारण ही 
कार्रवाई हो रही है।
1952 से जितने नेताओं ने देश को लूटा है,सब पर पहले कार्रवाई होनी चाहिए।
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यानी, मैं चोर तो तू भी तो चोर ! ! !
हमारी पार्टी में अपराधी तो तुम्हारी पार्टी कौन सी दूध की धुली हुई !! ?
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इसी तरह की बेशर्म डायलाॅगबाजी के बीच इस देश की राजनीति चल रही है।
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पर,इस बीच भी कुछ बातें पक्की हैं।
अच्छी हैं।
उम्मीद की किरणें भी मौजूद हैं।
विभिन्न दलों के कुछ नेता ईमानदार हैं।
उनमें से कुछ अत्यंत ईमानदार हैं।
योग्य भी हैं।
वे अपने लिए नहीं ,देश के लिए कुछ करना चाहते हैं।
कर भी रहे हैं।
विभिन्न दलों के कुछ ऐसे नेताओं को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं जो सत्ता में रहे,सत्ता में हैं,पर खुद के लिए या परिवार के लिए कुछ नहीं किया।
किसी का नाम लेना ठीक नहीं।
कुछ नेता तो जान पर खतरा उठा कर भी देश के लिए काम रहे हैं।
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राजनीतिक दलों में भी फर्क है।
कुछ दलों में स्वार्थी कम निःस्वार्र्थी अधिक हैं।
कुछ अन्य दलों में निःस्वार्थी कम और स्वार्थी अधिक हैं।
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निःस्वार्थी हल्का शब्द है।
इसका आशय आप चोर,डकैत,घोटालेबाज,हत्यारा,
बलात्कारी,साम्प्रदायिक कुछ भी समझ सकते हैं।
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फिर भी इन्हीं विपरीत परिस्थितियों में  अधिकतर मतदातागण
अपवादों को छोड़ कर अपेक्षाकृत कम भ्रष्ट और कम अपराधी को चुनते रहते  हंै। 
गनीमत है !  
जिस तरह उम्मीद पर दुनिया जिंदा है,
उसी तरह इस देश का लोकतंत्र भी !


बुधवार, 21 अगस्त 2019

आइडिया आॅफ इंडिया बनाम जेहाद
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जब ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ के झंडावरदार लोग प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से जेहादियों के साथ हो जाएंगे तो आम जनता क्या करेगी ?
वही करेगी जो काम आज कर रही है।
पर,दूसरी ओर कुछ लोग कह रहे हैं कि जनता 
इडिएट है।राष्ट्रवादी है।हिन्दूवादी है।
  देश की एकता खतरे में है।
1962,1965 और 1971 की लड़ाइयों के समय भी इस देश की 
अधिकतर जनता में वैसी ही भावना पैदा हुई थी जैसी भावना 
‘पुलवामा बनाम बालाकोट’ के बाद पैदा हुई।
पर, तब तो किसी ने जनता पर हिन्दूवादी होने का आरोप  नहीं लगाया । तब भी नहीं लगाया जब  इंदिरा गांधी को दुर्गा कह दिया गया।
   दरअसल तब और अब में फर्क यह है कि तब प्रतिपक्ष सहित लगभग सारा देश युद्ध लड़ने वाली सेना और सरकार के साथ थी।
 और आज ?
देख ही रहे हैं कि आज क्या हो रहा है !
सिर्फ मध्य युग की कलंक कथाएं याद आ रही हैं।

मंगलवार, 20 अगस्त 2019


इमरजेंसी में डाॅ.मिश्र ने बिहार में भूमि 
सुधार की दिशा में करवाये  थे अच्छे काम 
      -- सुरेंद्र किशोर-- 
सन् 1996 के प्रारंभ में कुछ ही सप्ताह पहले चारा घोटाले को बोफर्स और हवाला का ‘ग्रेट ग्रैंड फादर’ करार देने वाले 
डा.जगन्नाथ मिश्र बाद में खुद भी इस घोटाले के आरोपी बन गए थे।
बाद में रांची लोअर कोर्ट से सजायाफ्ता भी हुए।
इसे विडंबना ही कह सकते हैं।
  3 फरवरी 1996 को डा.मिश्र जब यह बात संवाददाताओं को बता रहे थे,तब उन्हें अपने बारे में इसकी कोई आशंका ही नहीं थी।
वे संभवतः यह समझ रहे थे कि चारा घोटालेबाजों से  जितना भी और जैसा उनका ‘संपर्क’ रहा,वह एक आम राजनीतिक चलन मान कर नजरअंदाज कर दिया जाएगा।
  पर, ऐसा नहीं हो सका।उन्हें लंबी जेल यात्राएं भी करनी पड़ी।
  गंभीर बीमारी के आधार पर ही उन्हें जमानत मिली थी।
बीमारी अंततः जानलेवा साबित हुई।
जब डा. मिश्र को जमानत मिली थी तो कुछ लोगों ने यह सवाल उठाया था कि एक ही केस में लालू प्रसाद भीतर 
और मिश्र बाहर क्यों ?
कम से कम वैसे दिलजले लोगों को अब समझ में आ जाना चाहिए कि मिश्र को जमानत देने का अदालत का निर्णय कितना सही था। 
पर, डा.मिश्र के राजनीतिक जीवन का सिर्फ यही एक पक्ष नहीं है।
 उन्होंने दशकों तक बिहार की राजनीति को प्रभावित किया।
सकारात्मक ढंग से भी और नकारात्मक तरीके से भी।
  दरअसल उन्हें अपने अग्रज,स्वतंत्रता सेनानी  व दिग्गज कांगे्रेसी नेता दिवंगत ललित नारायण मिश्र की लगभग पूरी  राजनीतिक विरासत मिल गई थी।
 ललित बाबू स्वतंत्रता सेनानी परिवार से थे।खुद प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे । ललित बाबू ने केंद्रीय मंत्री के रूप में बिहार खास कर उत्तर बिहार के विकास के लिए महत्वपूर्ण काम किए थे।
  ललित बाबू की 1975 की जनवरी में हत्या के  बाद राजनीतिक क्षतिपूत्र्ति के तौर पर 1975 में ही डा.मिश्र को मुख्य मंत्री बनाया गया था।उससे पहले वे बिहार के सिंचाई मंत्री थे।
वे 1977 तक मुख्य मंत्री उस पद पर रहे।
इस बीच देश में इमरजेंसी लग गयी थी।
 आपातकाल ज्यादतियों का दौर था।
बिहार भी उससे अछूता नहीं रहा।
पर डा.मिश्र के कार्यकाल में भूमि सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम भी हुए।खास कर हदबंदी से फाजिल जमीन निकालने के सिलसिले में। 
इमरजेंसी की ज्यादतियों के साथ -साथ भूमि सुधार के कारण भी अनेक भूमिपति कांग्रेस से सख्त नाराज थे।
उनमें से कुछ ने मुझे यह बात बताई भी थी।
  बिहार में 1977 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस सारी सीटें हार गईं।पर 1980 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस फिर सत्ता में आ गई।
संजय गांधी की मेहरबानी से डा.मिश्र एक बार फिर 1980 में मुख्य मंत्री बने।
1983 में विवादास्पद परिस्थितियों में उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
तब तक राजीव गांधी का उदय हो चुका था।
1980-83 का डा.मिश्र का कार्यकाल कुल मिलाकर विवादास्पद रहा।
 इस कार्य अवधि में उन पर तरह -तरह के आरोप लगे।हालांकि पटना अरबन कोपरेटिव घोटाले में डा.मिश्र को सुप्रीम कोर्ट से क्लिन चिट मिल गई।
 कांग्रेस के भीतर की एक मजबूत लाॅबी डा.मिश्र के खिलाफ थी।
पटना के स्थानीय अखबार समूह से उनकी ठन गई।मिश्र सरकार ने प्रेस को कंट्रोल करने के लिए विवादास्पद प्रेस बिल लाया।वह एक कलंकपूर्ण अध्याय  था।
  प्रेस बिल के खिलाफ बिहार सहित पूरे देश में पत्रकारों का आंदोलन चला।
अंततः उन्हें बिहार प्रेस बिल वापस लेना पड़ा।
प्रेस बिल तो वापस हो गया,पर मीडिया से डा.मिश्र का पहले जैसा मधुर संबंध नहीं रहा।
1983 में उन्हें मुख्य मंत्री पद छोड़ने के लिए हाईकमान ने बाध्य कर दिया।
  उससे कांग्रेस से असंतुष्ट होकर उन्होंने पार्टी छोड़ दी ।तब उनके समर्थकों की  अपनी अच्छी -खासी जमात थी।फिर भी उनकी पार्टी नहीं चली।
फिर कांग्रेस में गए।केंद्र में मंत्री भी बने।
पर चारा घोटाले ने उनके कैरियर पर विराम लगा दिया।
इसके बावजूद जदयू ने उन्हें अपने दल में मिलाकर उनके पुत्र को बिहार में मंत्री बना दिया था।
ऐसा उनके समर्थकों की अच्छी -खासी संख्या के कारण ही संभव हुआ। 
  डा.मिश्र जैसे एक विवादास्पद नेता को जदयू में मिलाने पर जब प्रश्न चिन्ह लगाया गया तो जदयू ने कहा कि डा.साहब के मिथिला के हर विधान सभा क्षेत्र में चार-पांच हजार ठोस समर्थक हैं।वे राजग को काम आएंगे।वे काम आए भी और 2005 में बिहार में राजग सत्ता में आ गया।
---20 अगस्त 2019 के प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित।

पद्मा सचदेव की अधूरी आस
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सन 1982 में शेख अब्दुल्ला के निधन के बाद पद्मा सचदेव ने धर्मयुग में उन पर लंबा लेख लिखा था।
उसकी कुछ पंक्तियां यहां प्रस्तुत हैं।
‘ मेरे मन में एक अरमान था।
महाराजा के जमाने का बना यह कानून कि रियासत के बाहर ब्याही लड़कियों को अपने मैके में दो गज जमीन खरीदने का भी हक न होगा,किसी रोज शेख साहब खत्म कर देंगे।
और मैं शिवालिक की अपनी पहाडि़यों पर एक घर बना सकूंगी।
मैंने सुना है,बेग साहब ने इस पर कुछ आवाज भी उठाई थी।
पर कुछ न हुआ।
मुझे याद आ रहा है कश्मीरी के शायर गुलाम रसूल आजाद का कलाम,
काबुक निशान थोमुत,
बुतखान त्सेई बनोभुत,
गीताई क्या खता कोर,
बनतम कुरान वाले ।
 इसका अर्थ है--‘काबा का निशां रक्खा,बुतखाना भी तुमने बनाया।गीता ने क्या खता की है,कुरान वाले ये तो बताओ।’
यह सवाल कभी मैं जिससे करना चाहती थी ,आज वह चला गया है।’
--धर्मयुग-19 सितंबर 1982
---याद रहे कि जम्मू में जन्मी पद्मा की शादी बाहर  हुई--




सोमवार, 19 अगस्त 2019

दिवंगत डा.जगन्नाथ मिश्र की याद में 
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डा.जगन्नाथ मिश्र ने बिहार में राजनीति व प्रशासन को लंबे 
समय तक सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ढंग से प्रभावित किया।
उनकी वे सब कहानियों देर -सवेर कही ही जाएंगी।
  पर मैं संक्षेप में उनसे जुड़ी हुई एक छोटी सी कहानी आज कहूूूूूूूूूूूूूूूूूूूंगा।
  मैंने पाया कि डा.मिश्र आम तौर पर पत्रकारों से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं पालते थे।
यदि कोई अपवाद है तो मैं नहीं जानता।
हां, इंडियन नेशन समूह से उनकी जरूर ठन गई थी।
उनका प्रेस बिल एक काला अध्याय था।
पर वह समूह की बात अधिक थी,व्यक्ति की कम ।
 मुख्य मंत्री के रूप में उनके अच्छे -बुरे कामों -निर्णयों के बारे में मैं बराबर लिखा करता था।
  विरोध वाली रपटों पर वे व उनके कुछ खास समर्थक बहुत नाराज रहते थे।
खुद डा.मिश्र ने कोशिश की थी कि दैनिक आज
का प्रबंधन मेरा पटना से कहीं बाहर तबादला कर दे।
पर ‘आज’ने मुख्य मंत्री की बात नहीं मानी।
इसको लेकर आज प्रबंधन का शुक्रगुजार रहा हूं।
सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर कोई अखबार जल्दी मुख्य मंत्री की बात नहीं टालता।
एक अन्य सत्ताधारी नेता ने तो बाद के वर्षों में अखबारों से एकाधिक पत्रकारों को नौकरी से ही निकलवा दिया था।
  इस पृष्ठभूमि में जगन्नाथ जी उदार लगे  थे।वे सिर्फ तबादला चाहते थे।खैर इस बीच जनसत्ता में मेरी नौकरी हो गई और ‘आज’ प्रबंधन का मानसिक बोझ समाप्त हो गया।
  पर जब डा.मिश्र ने अपना दैनिक ‘पाटलिपुत्र टाइम्स’ निकाला तो उन्होंने सी.पी.आई.के एम.एल.सी. सह पत्रकार सह डा.मिश्र के  मौसरे भाई चंद्र मोहन मिश्र से कहा कि आप जनसत्ता वाले से पूछिए कि क्या वह पाटलिपुत्र में काम करेगा ?
  चंद्र मोहन जी के यहां मैं अक्सर जाया करता था।मिलने पर उन्होंने मुझसे कहा कि मैंने जगन्नाथ जी को तो जवाब दे दिया है कि जनसत्ता छोड़कर वह आपके यंहा क्यों आएगा,फिर भी मैं आपसे पूछ रहा हूं कि आप पाटलिपुत्र ज्वाइन करिएगा ?
मैंने कहा कि आपने जगन्नाथ जी को ठीक ही कहा था।दरअसल मेरा अनुभव रहा है कि अखबार के ‘नेता मालिक’ की अपेक्षा ‘व्यापारी मालिक’ बेहतर होते हैं।
  वैसे मुझे जगन्नाथ जी की इस उदारता पर सुखद आश्चर्य हुआ कि जिस पत्रकार ने उनकी इतनी नींद हराम की थी,उसके प्रति कोई कटुता नहीं !!?

  

 अच्छे व्यक्तियों  की, चाहे उनमें कोई अपनी जाति का भी क्यों न हो,तारीफ करना और उनकी मदद करना जातिवाद नहीं है।
हां, वह जातिवाद जरूर है जब आप अपनी जाति के माफिया या भ्रष्ट की भी मदद और वकालत करने लगते हैं।

रविवार, 18 अगस्त 2019

 भ्रष्टाचार--पहला कदम तो उठाए 
सरकार !---- सुरेंद्र किशोर 
2014 में लाल किले से अपने पहले संबोधन में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि मैं ‘न तो खुद खाऊंगा और न किसी को खाने दूंगा।’
  पर, इस 15 अगस्त को उन्हंे यह कहना पड़ा कि भ्रष्टाचार से सरकार के साथ- साथ हर व्यक्ति को हर स्तर पर लड़ना होगा।क्योंकि यह दीमक की तरह लग गया है और मर्ज गहरा और व्यापक है।
  ताजा टिप्पणी उनके पांच साल के अनुभवों का परिणाम है।
उन्होंने बिलकुल ठीक कहा है कि इस दीमक से हर व्यक्ति को हर स्तर पर लड़ना चाहिए।
 पर खुद सरकार इस संबंध में जो कुछ कर सकती है, पहले वह काम तो करे।
साधारण उपचारों से काम नहीं चल रहा है तो वह भ्रष्टाचार पर भी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करना ही पड़ेगा।
  इस देश के भ्रष्टाचार पर समय- समय पर अनेक बड़े नेता कुछ न कुछ कड़ी बातें बोलते रहे हैं,पर जब कुछ करने का अवसर आता है तो वे उसी व्यवस्था के अंग बन जाते हैं।
या फिर व्यवस्था उन्हें अपने में समेट लेती है।
खुशी की बात है कि भ्रष्टाचार की  व्यवस्था ने नरेंद्र मोदी को अब तक  अपने -आप में समाहित नहीं किया है।
1998 में मन मोहन सिंह ने कहा था कि ‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है।’
    प्रथम प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के तत्काल बाद कहा था कि कालाबाजारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका देना चाहिए।
प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने 100 पैसे से 85 पैसे के बिचैलियों के पास चले जाने की हकीकत का रहस्योद््घाटन किया।
 हां,इंदिरा गांधी ने जरूर किसी तरह की कार्रवाई की घोषणा का  दिखावा नहीं किया।
उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार तो विश्वव्यापी समस्या है,यह सिर्फ इसी देश में थोड़े ही है।
  हां,नरेंद्र मोदी की बातों और उनके कर्मों से यह लगता है कि वे भ्रष्टाचार से उसी तरह लड़ना चाहते हैं जिस तरह आतंकवाद से।
  वैसे भी यह आतंकवाद से कम खतरनाक है भी नहीं भ्रष्टाचार ।
भ्रष्टाचार से निर्णायक लड़ाई की शुरूआत मोदी सरकार दो -तीन प्रारंभिक कदमों के साथ कर सकती है,यदि वह इस सांड को उसकी सींग से पकड़ना चाहती है तो।
 पहले कदम के रूप में  सांसद क्षेत्र विकास फंड को तत्काल बंद कर देना चाहिए।
यह फंड , ‘भ्रष्टाचार के रावण’ की नाभि का अमृत कुंड बन चुका है।
जानकार लोग बताते हैं कि इस फंड में से 40 से 50 प्रतिशत राशि कमीशन खोरी में चली जाती है।
सभी सांसद या अफसर तो रिश्वत नहीं लेते।पर अधिकतर लेते हैं।इस मद में रिश्वतखोरी के आरोप में एक सांसद की सदस्यता भी जा चुकी है।स्टिंग आपरेशन में फंसे थे।
अनेक आई.ए.एस.अफसरों को अपने सेवा काल के प्रारंभिक वर्षों में ही सासंद फंड ‘चखने’ का अवसर मिल जाता है। वैसी लत सेवाकाल के आखिरी वर्षों तक बनी रहती है।
आगे जाकर वे क्या -क्या गुल खिलाते रहते हैं,उसका सीधा अनुभव प्रधान मंत्री को मिल रहा  है।
  नब्बे के दशक में प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव को हर्षद मेहता से एक करोड़ रुपए घूस लेने का आरोप लगा था।
उसी राव साहब ने 1993 में इस फंड को शुरू करके पूरी राजनीति को ही गंदा बना देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।उनकी नाक कटी तो उन्होंने अधिकतर की नाक कटवा देने की भूमिका तैयार कर दी।
सांसद फंड को   सांसदों के दबाव के कारण तब से किसी भी प्रधान मंत्री को बंद करने की हिम्मत नहीं हुई।पर यदि है तो यह हिम्मत सिर्फ नरेंद्र मोदी में है,ऐसा अनेक लोग  महसूस कर रहे हैं।
  मोदी जी इस  नाभि पर वार किए बिना रावण को कत्तई नहीं मार सकेंगे ! 
   नब्बे के दशक में एन.सी.सक्सेना केंंद्र सरकार के ग्रामीण विकास विभाग के सचिव थे।
उन्होंने कहा था कि इस देश के भ्रष्टाचार में जोखिम कम और लाभ ज्यादा है।इसीलिए वह नहीं रुक रहा है।
वर्मा अपने सेवाकाल में डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम यानी बैंक खाताओं में सीधे पैसे भेजने पर सबसे अधिक जोर देते थे।
  अब सवाल है कि भ्रष्टाचार को अधिक जोखिम और कम लाभ का धंधा कैसे बनाया जाए।
 यह काम तो सरकार ही कर सकती है।
भ्रष्टाचार के लिए फंासी की सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए।
क्योंकि भ्रष्टाचार के कारण लोगों की जानें भी जाती रहती हैं।
अमीर देशों में भ्रष्टाचार लोगों की सुख सुविधा में थोड़ी कमी कर देता है,पर हमारे यहां तो जान ही ले लेता है।
इस देश में शायद ही कोई खाद्य या भोज्य पदार्थ हो जिसमें मिलावट नहीं है।
 दवाओं की मिलावट सीधे -सीधे जान ले लेती है।
हां,सिर्फ जहर में मिलावट जान बचा लेती है।
 रिश्वत लेकर संबंधित पदाधिकारी मिलावट की छूट दे देते हैं।
निचले स्तर के घूसखोर कर्मियों को ऊपर के अफसर बचा लेते हैं।
  यानी जब घूसखोरी से जान जाती हो तो इसके कसूरवार को फांसी की सजा क्यों नहीं ?
भ्रष्टाचार बढ़ने या फिर बने रहने का एक बड़ा कारण यह है कि बड़े अफसरों के खिलाफ अभियोजन की शुरूआत करने की जल्दी अनुमति नहीं मिलती।
इस स्थिति को बदलने का काम तो प्रधान मंत्री ही कर सकते हैं।
 कुछ साल पहले लोक सभा के 10 और राज्य सभा के एक सदस्य की सदस्यता चली गई थी।सदस्यता संसद ने ही ली।उन पर घूसखोरी के आरोप थे।आरोप साबित हो गया।
टी.वी.चैनल के स्टिंग आपरेशन में वे पकड़े गए थे।
 पर सवाल है कि सिर्फ सांसदों तक  ही ऐसी कार्रवाई क्यों सीमित रहे ?
स्टिंग आपरेशन को कानूनी मान्यता भी मिले।
यदि फोरेंसिक जांच से वीडियो कसैट सही साबित हो जाए तो उसे अदालत में भी  सबूत माना जाए,ऐसी कानूनी व्यवस्था हो।इससे कानून व्यवस्था भी बेहतर होगी।
इससे माॅब लिंचिंग  को कम करने में भी सुविधा होगी।
भ्रष्ट सरकारी अफसरों के खिलाफ ऐसे सफल स्टिंग आपरेशन करने वालों को सरकार भारी इनाम दे।
  ऐसे व इस तरह के दूसरे उपायों को पहले खुद सरकार अपनाए।फिर तो भ्रष्ट लोगों के खिलाफ अभियान चलाने के लिए आम लोग भी उत्साहित होंगे।
  अभी तो अनेक लोगों को यह लगता है कि भ्रष्टाचार कम  होेने वाला है नहीं।
इस धारणा को सरकार पहले खत्म करने का ठोस उपाय करे।एम.पी.फंड की समाप्ति के साथ सरकार का पहला कदम उठे।
- 18 अगस्त 2019 के हस्तक्षेप-राष्ट्रीय सहारा मंें प्रकाशित। 
   
    


शनिवार, 17 अगस्त 2019

इतने भारत रत्नों के बावजूद अपना देश गरीब क्यों ?
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सौ एकड़ में से 85 एकड़ जमीन बेच कर खा 
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जाने वाले किसी किसान पुत्र को यदि ‘पुत्र रत्न’ नहीं कहा
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जा सकता तो सौ सरकारी पैसों को घिसकर 15 पैसे कर देने 
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वालों को ‘भारत रत्न’ कैसे कहा जाएगा ?
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1954 से 1983 तक 8 गणमान्य व्यक्ति ‘भारत रत्न’
 से सम्मानित किए जा चुके थे।
  अब तो उनकी संख्या 50 पहुंचने वाली है।
  यदि किसी किसान का बेटा अपनी 100 एकड़ पुश्तैनी जमीन में से 85 एकड़  बेच कर खाए तो क्या उसे ‘पुत्र रत्न’ कहा जा सकता है ?
  1985 में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि हम दिल्ली से 100 पैसे भेजते हैं ,पर गांवों तक उसमें से सिर्फ
15 पैसे ही पहुंच पाते हैं।
  पता नहीं कि आज एक रुपया गांव पहुंचते- पहुंचते कितना घिस चुका होता है।
यह निष्पक्ष जांच का विषय है।
 फिर भी ‘भारत रत्नों’ की संख्या बढ़ती ही जा रही है।
याद रहे कि संविधान निर्माता ऐसे ‘सम्मान’ के सख्त खिलाफ थे। 
संविधान सभा में हृदय नाथ कंुजरू ने कहा था कि ‘पुरस्कारों द्वारा समाज को छोटे -बड़े में बांटने की प्रक्रिया शुरू होगी।
बाद में इन पुरस्कारों का राजनीतिकरण होगा।’
पर, जिन्हें लेना था,उन्होंने बाद में इसका प्रावधान कर ही दिया।
यानी, संविधान की भावना पर वह संभवतः पहली चोट थी।
    सबसे घटिया है इन पद्म सम्मानों का भोंड़ा प्रदर्शन।
नियम है कि पद्म सम्मानों से सम्मानित कोई व्यक्ति इसे अपने नाम के आगे या पीछे नहीं जोड़ सकता।
इसका कोई अन्य तरह से भी इस्तेमाल नहीं कर सकता।
फिर भी देश में इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल होता रहता है।
लोग अपने मकान के गेट पर अपने नेम प्लेट में तथा अपने लेटरहेड में भी लिखवा लेते हैं।
  अब तक दक्षिण भारत के दो फिल्मी अभिनेताओं के अलावा किसी अन्य को इसके दुरुपयोग के कारण दंडित किया गया है, यह मुझे नहीं मालूम।
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पुश्नचः
यदि आपका रसोइया 100 में 85 रोटियां जला दे तो क्या
आप फिर भी उसे अपना नौकर रखेंगे और पुरस्कार भी देंगे ?