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रविवार, 31 मई 2020

3 जून को जार्ज फर्नांडिस जयंती


बिहार कैबिनेट ने कल निर्णय किया कि हर साल 3 जून को जार्ज फर्नांडिस का जन्मदिन राजकीय समारोह के रूप मनाया जाएगा। यह निर्णय बहुत पहले हो जाना चाहिए था। खैर, देर आए दुरुस्त आए। यह निर्णय सराहनीय है। जार्ज से संबंधित मेरे पास अनेक संस्मरण हैं। यदि अपने संस्मरणों की प्रस्तावित पुस्तक लिख पाया तो उसमें वह सब भी समाहित रहेगा।

थोड़े में यह कहा जा सकता है कि जार्ज एक अत्यंत ईमानदार नेता थे। उन्होंने अपने लिए कोई संपत्ति नहीं बनाई। वे शब्द के सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष थे। वह पहले दर्जे के निडर राजनीतिक योद्धा थे। वे एक देशभक्त नेता थे। आपातकाल में जब कई नेता चूहों की तरह बिल में छिप गए थे, जार्ज बंगलोर के पास की उस पहाड़ी पर अपने चुने हुए साथियों को डायनामाइट की ट्रेंनिंग दे रहे थे जहां शोले फिल्म की शूटिंग हुई थी। मैं भी तब बंगलोर में था।

बाद में जार्ज से मेरा एक सैद्धांतिक मामले में मतभेद हो गया था और मैंने उनसे मिलना बंद कर दिया था। पर, किसी एक बात के कारण देश-समाज के प्रति उनके कुल योगदान में कोई कमी नहीं आती है। मैंने वैसे नेताओं से संबंधित संस्मरण भी सकारात्मक ढंग से लिखे हैं जिन्हें मैंने पसंद नहीं किया। या, उन्होंने मुझे नापसंद किया।

किसी के योगदान का मेरी पसंदगी-नापसंदगी से कोई संबंध नहीं होता। इतिहास जैसा घटित हुआ है, वह भरसक उसी रूप में लोगों के सामने जाना चाहिए। अन्यथा, आप डंडीमार इतिहासकार हैं। डंडीमार इतिहासकारों ने इस देश का बड़ा नुकसान किया है।

---सुरेंद्र किशोर --29 मई 2020

गुरुवार, 28 मई 2020

1962 का युद्ध चल रहा था और नेहरू के रिश्तेदार बीच में मैदान छोड़कर दिल्ली आ गए

तैयारियों के मामले में सन् 62 से हम आगे निकल चुके हैं।पर, अभी और आगे जाना है, देश के बाहरी-भीतरी दुश्मनों से मुकाबले के लिए

अपनी सैनिक गतिविधियों के जरिए पहले चीन ने सीमा पर तनाव बढ़ाया। पर, जब भारत ने यह जता दिया कि जरूरत पड़ने पर चीन से डटकर मुकाबला होगा, तो चीन ने नरम रुख अपना लिया। बहुत अच्छी बात है। युद्ध किसी के हक में नहीं है। यदि किसी को कम नुकसान होगा तो किसी को ज्यादा। पर नुकसान तो दोनों पक्षों का होता है। अब भारत 1962 वाला नहीं है

चीन भी समझ रहा है कि भारत अब 1962 वाला नहीं है। सन 62 में तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने कह दिया था कि हमें अफसोस है कि हम असम को नहीं बचा पा रहे हैं।

वैसी नौबत क्यों तब आ गई थी? क्योंकि हमारी सरकार अदूरदर्शी थी। आजादी के तत्काल बाद के वर्षों में हम हिंदी-चीनी भाई -भाई के नारे लगा रहे थे। दरअसल हम मुगालते में थे।

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1962 के युद्ध से ठीक पहले भारतीय सेना ने अपनी सरकार से एक करोड़ रुपए मांगे थे। सेना की कुछ बुनियादी जरूरतेें पूरी करने के लिए। पर ‘पंचशील’ के नशे में डूबी हमारी सरकार ने पैसे नहीं दिए। नतीजा क्या हुआ, वह देश के प्रमुख पत्रकार मनमोहन शर्मा के, जो अब भी हमारे बीच मौजूद हैं, शब्दों में पढ़िए--

‘एक युद्ध संवाददाता के रूप में मैंने चीन के हमले को कवर किया था। मुझे याद है कि हम युद्ध के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। हमारी सेना के पास अस्त्र, शस्त्र की बात छोड़िये, कपड़े तक नहीं थे। नेहरू जी ने कभी सोचा ही नहीं था कि चीन हम पर हमला करेगा।

एक दुखद घटना का उल्लेख करूंगा।

अंबाला से 200 सैनिकों को एयर लिफ्ट किया गया था। उन्होंने सूती कमीजें और निकरें पहन रखी थीं। उन्हें बोमडीला में एयर ड्राप कर दिया गया जहां का तापमान माइनस 40 डिग्री था। वहां पर उन्हें गिराए जाते ही ठंड से सभी बेमौत मर गए।

‘युद्ध चल रहा था, मगर हमारा जनरल कौल मैदान छोड़कर दिल्ली आ गया था। ये नेहरू जी के रिश्तेदार थे। इसलिए उन्हें बख्श दिया गया। हेन्डरसन जांच रपट आज तक संसद में पेश करने की किसी सरकार में हिम्मत नहीं हुई।’

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बाद के वर्षों में भी हमारी युद्ध तैयारी वैसी नहीं रही, जैसी होनी चाहिए थी। ‘कारणों’ का पता समय -समय पर चलता रहता था। हाल के वर्षों में कुछ तेजी जरूर आई है। पर वह भी अभी संतोषजनक नहीं है। जब तक सार्वजनिक धन भ्रष्टाचार में जाना जारी रहेगा, तक तक हम उतने सैनिक व असैनिक साजो- सामान से खुद को लैस नहीं कर पाएंगे, जितने की जरूरत देसी-विदेशी दुश्मनों से लड़ने के लिए है। हां, मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्रिमंडल स्तर से भ्रष्टाचार हटा है, पर अफसर स्तरों पर अभी काम बाकी है।

----सुरेंद्र किशोर-28 मई 2020 

शनिवार, 23 मई 2020

राज्यसभा की सदस्यता ठुकरा दी थी आचार्य जी ने

सर्वोदय नेता आचार्य राममूर्ति की पुण्यतिथि पर



बात पुरानी है। पर मुझे पूरी तरह याद है। पटना के श्रीकृष्ण स्मारक भवन में सभा हो रही थी।
मंच पर वी.पी.सिंह, मुख्यमंत्री लालू प्रसाद और सर्वोदय नेता आचार्य राममूर्ति मौजूद थे। अपने भाषण में लालू प्रसाद ने कहा कि हमने और राजा जी यानी वी.पी. सिंह ने आचार्य जी से कहा था कि आप राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार कर लीजिए। पर आचार्य जी ने साफ मना कर दिया।
ऐसे निष्पृह समाजसेवी व्यक्ति थे आचार्य जी। 

स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी व सर्वोदय नेता आचार्य राममूर्ति का जन्म उत्तर प्रदेश के जौनपुर के एक संपन्न परिवार में 1913 में हुआ था। 20 मई 2010 को पटना में उनका निधन हुआ। वे वाराणसी के क्वीन्स कालेज में पढ़ाते थे। पर उन्होंने नौकरी छोड़कर समाज सेवा की राह पकड़ ली। बिहार को उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र बनाया।

जेपी के नेतृत्व में 1974 में जब बिहार आंदोलन शुरू हुआ तो आचार्य जी का जेपी के बाद आंदोलन के नेतृ वर्ग में दूसरा स्थान था। आंदोलन के दौरान जब जेपी इलाज के वेलौर गए थे तो उन्होंने कुछ समय के लिए आंदोलन की बागडोर आचार्य जी को ही सौंपी थी। स्वतंत्रता सेनानी और गांधीवादी आचार्य जी का पूरा जीवन लोगों के कल्याण के लिए समर्पित रहा। ऐसे नेता अब कम ही देखे जाते हैं।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

कांग्रेस सरकार बनाम रामनाथ गोयनका वाला ‘इंडियन एक्सप्रेस’

भूली-बिसरी याद


इंडियन एक्सप्रेस अखबार समूह के मालिक रामनाथ गोयनका का दो -दो बार कांग्रेस सरकारों से भीषण संघर्ष हुआ था। किसी अन्य मीडिया समूह से केंद्र सरकार की शायद ही कभी वैसी भिड़त हुई होगी! पहली बार इंदिरा गांधी सरकार से और दूसरी बार राजीव गांधी सरकार से।

इन भिड़ंतों के परिणामस्वरूप गोयनका व एक्सप्रेस समूह पर शासन ने समय -समय पर अनगिनत मुकदमे लादे। विकली के संपादक प्रीतीश नंदी से लंबी बातचीत में आर.एन.जी. यानी रामनाथ गोयनका ने एक बार कहा था कि आई.पी.सी. में जितनी धाराएं हैं, उन सबके तहत हम पर मुकदमे हो चुके हैं।

आर.एन.जी.स्वतंत्रता सेनानी भी थे। संविधान सभा के सदस्य थे। दो बार लोकसभा के लिए भी चुने गए थे। गोयनका जी जयप्रकाश नारायण के मित्र थे। उन्होंने जेपी आंदोलन का समर्थन किया था। आपातकाल में इंदिरा सरकार ने एक्सप्रेस समूह के निदेशक मंडल को भंग करके उसके प्रधान पद पर एक दूसरे अखबार समूह के मालिक को बैठवा दिया था।

एक दिन गुस्से में लाल रामनाथ गोयनका तत्कालीन सूचना व प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल के आफिस में गए। उन्हें इतनी कड़ी बातें कह कर आ गए जितनी कड़ी बातें किसी अखबार मालिक ने कभी किसी केंद्रीय मंत्री को सामान्य दिनों में भी नहीं कही होगी, वह तो आपातकाल था।

स्वतंत्र चेता लोगों के लिए आपातकाल में भय-आतंक का ऐसा माहौल सरकार ने बना रखा था जैसा अंग्रेजों के राज में भी नहीं था। जानकारों के अनुसार गोयनका जी लौटते समय सोच रहे थे कि पहुंचने के साथ ही मैं गिरफ्तार कर लिया जाऊंगा। पर उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई।

गोयनका जी को बाद में महसूस हुआ कि उसका कारण क्या था। फिरोज गांधी कभी एक्सप्रेस के प्रबंधक निदेशक थे। गोयनका के पास के उस परिवार से संबंधित कुछ सनसनीखेज दस्तावेज थे।
गिरफ्तारी के बाद उनके लीक हो जाने का भय था।



गोयनका जी की सरकार से दूसरी भिड़ंत राजीव गांधी के शासनकाल में हुई। राजीव के शासन काल के प्रारंभिक दिनों में तो गोयनका राजीव से खुश थे। तब तक राजीव की छवि ‘मिस्टर क्लीन’ की थी। संभवतः इसीलिए राजीव से दोस्त सुमन दूबे को एक्सप्रेस का संपादक बना दिया गया था।

पर जब बोफोर्स तथा एक पर एक अन्य घोटालों के दलदल में राजीव सरकार फंसती चली गई  तो एक्सप्रेस समूह से सरकार का टकराव हो गया। नतीजतन एक्सप्रेस समूह परिसर में छापामारी के लिए सरकारी एजेंसियों को लगा दिया गया।

नई दिल्ली स्थित एक्सप्रेस बिल्डिंग के एक हिस्से को ध्वस्त करने का उप राज्यपाल जगमोहन ने आदेश जारी कर दिया। पर अंततः सुप्रीम कोर्ट में गोयनका की जीत हुई।

इस बीच गोयनका के एक्सप्रेस समूह पर एकतरफा पत्रकारिता का आरोप लगता रहा। पर अंततः दोनों मामलों में यह बात साबित हुई कि गोयनका व एक्सप्रेस सही थे। सही बातें कहने के सिलसिले में कोई एकतरफा भी नजर आता है तो इस देश की अधिकतर जनता उसे पसंद करती है। किया भी।

इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए लोस चुनाव में न सिर्फ इंदिरा सरकार सत्ता से बाहर हो गई, बल्कि खुद इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी लोकसभा की अपनी सीटें भी हार गए।

अस्सी के दशक के बोफोर्स आदि विवाद के बाद राजीव गांधी की कांग्रेस पार्टी की ऐसी हार हुई कि उसके बाद कांग्रंस को कभी लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका।


  ---सुरेंद्र किशोर-28 अप्रैल 2020     

  

सोमवार, 19 नवंबर 2018

इंदिरा गांधी की वसीयत : वरुण के हितों की सुरक्षा राजीव-सोनिया की जिम्मेदारी थी

इंदिरा गांधी के जन्मदिन पर विशेष

सुरेंद्र किशोर 

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इंदिरा गांधी ने लिखा था कि ‘मैं यह देख कर खुश हूं कि राजीव और सोनिया फिरोज वरुण को उतना ही प्यार करते हैं जितना अपने खुद के बच्चों को। मुझे पक्का भरोसा है कि जहां तक संभव होगा, वे हर तरह से वरुण के हितों की रक्षा करेंगे।’

यह बात पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी वसीयत में दर्ज की है। वह वसीयत 4 मई, 1981 को लिखी गयी थी। उसके गवाह थे एम.वी. राजन और माखनलाल। इंदिरा गांधी ने यह भी लिखा है कि ‘संजय गांधी की जायदाद में मेरा जो शेयर है, मेरी इच्छा है कि वह फिरोज वरुण को मिले। इन बच्चों के बालिग होने तक यह संपत्ति ट्रस्ट के पास रहे जिसके प्रबंधक राजीव और सोनिया रहें।’


इंदिरा गांधी की वसीयत में अन्य परिजन की चर्चा मौजूद है सिवा मेनका गांधी के। फिरोज वरुण का तो उन्होंने पूरा ध्यान रखा, पर अपने छोटे पुत्र संजय की विधवा के लिए उनके पास देने को कुछ नहीं था। याद रहे कि संजय के निधन के बाद मेनका का संबंध इंदिरा जी से बहुत ही खराब हो गया था।


इंदिरा जी के जीवनकाल में मेनका ने अपना एक राजनीतिक संगठन भी बना लिया था-संजय विचार मंच।

ऐतिहासिक वसीयत में इंदिरा गांधी ने यह भी लिखा है कि 1947 में हमारे पास जितनी संपत्ति थी, आज उससे कम है। याद रहे कि इस बीच उन्होंने जवाहर लाल नेहरू स्मारक ट्रस्ट को इलाहाबाद का अपना ‘आनंद भवन’ दान कर दिया था।

वसीयत के अनुसार मेहरौली के पास के निजी फार्म हाउस राहुल और प्रियंका को मिले। वसीयत के अनुसार हिस्सेदारी दोनों बच्चों की बराबर -बराबर रहेगी। उन्होंने पुस्तकों की कॉपी राइट भी तीन हिस्सों में बांट दिए, तीनों बच्चों के नाम। यानी प्रियंका, राहुल और वरुण के नाम।


वसीयत के अनुसार जेवर इंदिरा जी ने प्रियंका को दिए। पर शेयर, सिक्युरिटी व यूनिट को तीनों बच्चों में बांटे। पुरातन सामग्री जो पुरातत्व विभाग में निबंधित हैं, वे प्रियंका को मिलेंगी।


इंदिरा जी ने अपनी वसीयत में लिखा कि मेरे सारे निजी पेपर्स राहुल को मिलेंगे। बहुमूल्य व दुर्लभ पुस्तकें राहुल और प्रियंका को मिलेंगी। कुछ अन्य सामग्री के बारे में भी वसीयत में जिक्र है।


प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लिखा कि तीनों बच्चों के नाम की गयी संपत्ति, ट्रस्ट के तहत रहेगी क्योंकि बच्चे अभी वयस्क नहीं हैं। ट्रस्ट के प्रबंधक राजीव होंगे। यदि किसी कारणवश राजीव प्रबंधक नहीं रहे तो सोनिया प्रबंधक बनेगी।


यह भी मान लिया गया कि इस वसीयत के जरिए भी इंदिरा जी ने अघोषित रूप में राजीव और उनके पुत्र राहुल को ही अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी भी नामजद कर दिया न कि वरुण को। वैसे भी 1980 में संजय गांधी के असामयिक निधन के थोड़े ही दिनों बाद मेनका गांधी इंदिरा गांधी के आवास से बाहर हो गयी थीं। या यूं कहिए कि कर दी गयी थीं। 


संजय गांधी की जायदाद जो भी रही हो, पर खुद इंदिरा गांधी की जायदाद ऐसी नहीं थी जिसपर अंगुली उठाई जा सके। इंदिरा जी का यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि 1947 की अपेक्षा उनके परिवार की संपत्ति घटी जबकि वे लंबे समय तक सत्ता में रहे।


उनके जीवनकाल में भी किसी विरोधी नेता ने उनकी आय से अधिक संपत्ति का कोई मामला उठाया हो, यह हमें याद नहीं। हां, एक दूसरे प्रकार की शिकायत जरूर रही। अपने प्रधानमंत्रित्व काल में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्हें जितना कठोर होना चाहिए था, उतना नहीं हुर्इं। कई लोगों की ऐसी ही शिकायत जवाहरलाल नेहरू से भी रही।


फिर भी नेहरू - गांधी परिवार की 1981 तक की निजी संपत्ति को देखकर और आज के पक्ष-विपक्ष के अनेक नेताओं से उसकी तुलना करके देखने पर लगता है कि वे राजनीति के ‘संत’ थे। हालांकि इस शब्द का इस्तेमाल खुद इंदिरा गांधी ने अपने पिता के लिए किया था-‘मेरे पिता संत थे। पर मैं तो पॉलिटिशियन हूं।’


(मेरा यह लेख 19 नवंबर, 2018 को फस्र्टपोस्ट हिंदी में प्रकाशित)

शुक्रवार, 15 जून 2018

सिर्फ अपनी अंगुलियों से बड़े -बड़े ताले खोल देने वाले एक डाकू की कहानी

बिहार के अविभाजित सारण जिले का एक डाकू कोई भी ताला किसी भी औजार की मदद के बिना ही खोल देता था। ताला कितना भी मजबूत हो, उसके लिए सिर्फ उस डाकू की अंगुलियां ही पर्याप्त थीं। अदालत इस आरोप पर भरोसा नहीं कर के हर बार उस डाकू को सजामुक्त कर देती थी।

चम्पारण जिले के एक दूसरे व्यक्ति ने एक ऐसा ताला बनाया था जिसे उसके परिवार का सदस्य ही खोल सकता है। वह ताला अब भी मौजूद है और खोलने वाला भी। दोनों कहानियां पिछली सदी की हैं।

जगन्नाथ मंदिर के खजाने की चाभी खो जाने की ताजा खबर के साथ ही उन तालों की कहानियां याद आ गईं।

सारण की कहानी तो वहां के एक मशहूर वकील हेमचंद्र मित्रा ने लिखी है। ‘मेरे संस्मरण’ नाम से उनकी किताब अंग्रेजी में छप चुकी है। मित्रा छपरा बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी थे। मित्रा ने सन 1898 में छपरा जिला अदालत में वकालत शुरू की थी। वे एक नामी व तेजस्वी वकील थे। उन दिनों अविभाजित सारण जिले के सिवान अनुमंडल के एक डाकू पर यह आरोप था कि वह मजबूत से मजबूत ताले को भी अपनी अंगुलियों से ही खोल देता था। वह इस काम के लिए किसी चाभी या किसी अन्य औजार का इस्तेमाल नहीं करता था।


सिवान के एस.डी.ओ. ने उस पर सी.आर.पी.सी की धारा -110 के तहत कानूनी कार्रवाई कर रखी थी। उसने उस कार्रवाई के खिलाफ छपरा कोर्ट में अपील की। उसने ए.एच. मित्रा को अपना वकील रखा। कोर्ट में कई गवाहों ने बताया कि वह सिर्फ अपनी अंगुलियों से ताला खोल देता हैं। मित्र ने यह दलील पेश की कि कोई भी व्यक्ति सिर्फ अंगुलियों से कोई ताला खोल ही नहीं सकता है। अनेक गवाहों को गलत बताते हुए कोर्ट ने मित्र के तर्क को माना और डाकू को रिहा कर दिया।

मेरे संस्मरण में यह कहानी लिखते समय मित्र ने लिखा कि ‘ट्रूथ इज स्ट्रेंजर दैन फिक्सन।’ मित्र ने अपनी किताब में उस डकैत का नाम नहीं लिखा है। उन दिनों फोटो का आज जैसा चलन तो था नहीं। कई महीनों के बाद वह डाकू किसी अन्य केस के सिलसिले में वकील मित्र के यहां गया। मित्र ने उससे पूछा कि क्या इस आरोप में सच्चाई भी है कि तुम सिर्फ हाथ की अंगुलियों की मदद से ही ताले खोल देते हो ?

वकील ने यह सवाल इसलिए भी पूछा क्योंकि उन्हें लगा था कि सारे के सारे गवाह झूठ तो नहीं हो सकते। इस सवाल पर उस डाकू ने मुस्कराते हुए कहा कि यह आरोप सही है। उसने मित्र से कहा कि कोई ताला लाइए। मित्र ने लिखा है कि उन्होंने एक मजबूत ताले को बंद करके उस डाकू को दे दिया। उसे उसने अपने हाथ में लिया। मित्र लिखते हैं कि मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि जब उसने अपने हाथों से ही उस ताले को तुरंत खोल दिया। उसने मेरी आंखों के सामने ही यह काम इतनी जल्द कर दिया कि मैं कुछ समझ नहीं पाया।

पांच किलोग्राम का ताला, जिसे कोई खोल नहीं सकता था

कुछ इसी तरह की कहानी संदीप भास्कर ने हाल में टेलिग्राफ में लिखी है। सन 1940 में बेतिया के नारायण प्रसाद ने 5 किलोग्राम का एक ताला बनाया था। उस ताले की खूबी यह है कि उसे नारायण प्रसाद के सिवा कोई और नहीं खोल सकता था। बाद में नारायण प्रसाद ने यह हुनर अपने पुत्र लाल बाबू को सिखा दिया। अब वह अजूबा ताला सिर्फ लाल बाबू या उनके कोई परिवारीजन ही खोल सकते हैं। दरअसल उसे खोलने के लिए एक खास तरह की ‘हाथ की सफाई’ चाहिए। वह कौशल सिर्फ उस परिवार को ही हासिल है।

1940 में बेतिया के महाराजा ने एक प्रदर्शनी आयोजित की थी। नारायण प्रसाद ने उस ताले को  उस प्रदर्शनी में शामिल किया। महाराजा ने घोषणा की कि जो भी उस ताले को खोल देगा, उसे चांदी के 11 सिक्के दिए जाएंगे। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला। लाल बाबू के अनुसार महाराजा ने उस ताले को खरीदने की इच्छा जाहिर की। नारायण प्रसाद ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।

इतना ही नहीं 1972 में गादरेज इंडिया लिमिटेड ने उस ताले के पेटेंट का अधिकार मांगा। उसके बदले 1 लाख रुपए देने का आॅफर दिया। पर नारायण प्रसाद को यह स्वीकार नहीं था। दरअसल नारायण का परिवार उस हुनर को अपनी संतानों तक ही सीमित रखना चाहता है।

1972 में तत्कालीन मुख्यमंत्री केदार पांडेय ने जो चम्पारण जिले के ही मूल निवासी थे, ताला व राइफल कारखाना खोलने में मदद करने का इस परिवार को आश्वासन दिया था। पर वह पूरा नहीं हो सका। लालबाबू के अनुसार कुछ पैसे तो एकत्र किए गए, पर कारखाने के लिए वे काफी नहीं थे। आश्चर्य है कि बाद के मुख्यमंत्रियों का ध्यान भी उस परिवार के इस हुनर की ओर  नहीं गया!   

राजेंद्र काॅलेज (छपरा) : जरा याद कर लें प्राचार्य भोला प्रसाद सिंह को


18 दिसंबर, 1967 की बात है। बिहार के अनेक राजनीतिक तथा गैर राजनीतिक संगठनों ने राजभाषा संशोधन विधेयक के खिलाफ ‘बिहार बंद’ का आह्वान किया था। मैं उन दिनों संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े क्रांतिकारी विद्यार्थी संघ की सारण जिला शाखा का सचिव था। हम छात्रों ने इस अवसर पर छपरा में जुलूस निकालने का निर्णय किया था। उस दिन मैं सुबह सात बजे ही एक रिक्शे पर माइक लेकर राजेंद्र कालेज के गेट पर पहुंच गया।



मैं छात्रों से क्लास का बहिष्कार करके जुलूस में शामिल होने की अपील कर रहा था। जिस दिन काॅलेज में असामान्य स्थिति रहती थी, उस दिन राजेंद्र कालेज के प्राचार्य भोला प्रसाद सिंह समय से पहले ही काॅलेज पहुंच जाते थे। उस दिन भी पहंुच गए थे।

वे गेट पर मेरे पास आए और मुझसे कहा कि ‘तुम यहां से माइक लेकर चले जाओ।’ जब मैंने हटने से इनकार कर दिया तो उन्होंने कहा कि ‘तुमसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी।’ मैंने कहा कि मैं आज आपका हुक्म नहीं मानूंगा। दरअसल मेरे साथ छात्र थे और उस काॅलेज के प्रो. राम श्रेष्ठ मिश्र का भी मुझे समर्थन हासिल था।

उसके बाद काॅलेज के अहाते में छात्रों -प्राध्यापकों की एक सभा बुलाई गयी। कई छात्रों और प्राध्यापकों ने जुलूस के खिलाफ अपनी राय जाहिर की। अंत में प्रो. रामश्रेष्ठ मिश्र बोलने को खड़े हुए। वे बोल ही रहे थे कि बगल के एक वृक्ष से एक काग कांव- कांव करता हुआ उड़ा। इस पर भोला बाबू ने कहा कि ‘ देखो काग बोल रहा है। आज जरूर कुछ बुरा होगा।’

विरोध के बावजूद हमने जुलूस निकाला। सैकड़ों छात्र जुलूस में शामिल हो गए। हमारा संगठन मजबूत था। पर इतने बड़े जुलूस की मुझे भी उम्मीद नहीं थी। मुझे कुछ शंका होने लगी। संभवतः भोला बाबू को यह लगता था छात्रों की जमात को मैं संभाल नहीं पाऊंगा।

जब जुलूस के रास्ते में नये -नये युवक जुड़ने लगे तो  मेरी शंका बढ़ गयी। क्योंकि वे अनजान चेहरे थे। लगा कि जुलूस के जरिए तोड़-फोड़ करवाने की कोई बाहरी राजनीतिक साजिश थी। याद रहे कि उन दिनों बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार चल रही थी। खैर, भोला बाबू की आशंका सच होने वाली थी और हो ही गयी। जुलूस छपरा कोर्ट परिसर स्थित स्टेट बैंक के पास पहुंचा। वहां जुलूस में शामिल कुछ युवक अनियंत्रित हो गए। बैंक के गार्ड ने गोली चला दी। एक राहगीर मारा गया। जुलूस तितर -बितर हो गया।

हालांकि इसको लेकर किसी छात्र की गिरफ्तारी नहीं हुई। दरअसल उस जुलूस का आयोजन मैंने ही किया था। संभवतः भोला बाबू को यह लग गया था कि मेरे जैसे अपरिपक्व व्यक्ति के लिए जुलूस में शामिल छात्रों -युवकों को नियंत्रित कर पाना संभव नहीं होगा। उन्हें ठीक ही लगा था।

खैर, दूसरी घटना कुछ समय बाद की है।

16 जनवरी, 1968 को बिहार विधानसभा भवन के समक्ष संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का प्रदर्शन होने वाला था। उससे दो दिन पहले हमने सारण जिले में कुछ नेताओं के साथ सघन भ्रमण कर लोगों को पटना पहुंचने का संदेश दिया था। थककर चूर हो गया था। जुकाम हो गया।

इसलिए मैं खुद पटना नहीं जा सका। 16 जनवरी की शाम में जब भोला बाबू ने मुझे काॅलेज परिसर में देखा तो पूछा कि ‘तुम लोगों का प्रदर्शन है न। तुम यहां हो ?’ उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि ‘तुम जीवन में कुछ नहीं कर सकते। कभी नेता नहीं बनोगे।’

यह एक अभिभावक की फटकार थी। वे मुझे राजनीति में आगे बढ़ते देखना चाहते थे। मेरी बी.एससी. परीक्षा का रिजल्ट हो चुका था। मैं अंक पत्र लेने काॅलेज गया था। भोला बाबू अपने कक्ष के सामने खड़ा होकर उन कुछ छात्रों को समझा रहे थे जो छात्रसंघ का चुनाव कराने की जिद पर अड़े थे। मैं भोला बाबू के पीछे से गुजरा। थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्होंने मुझे वापस बुलाया। पूछा, ‘पास कर गए?’

जब मैंने ना कह दी तो उन्होंने हड़ताली लड़कों का ध्यान मेरी ओर खींचते हुए अभिनय की मुद्रा में कहा कि ‘देखो, यही था जो फाटक पर माइक लेकर कहता था, साथियों साथ दो। और आज जब फेल हो गया तो मुझसे मिले बिना ही जा रहा है। तुम लोगों की भी यही हालत होगी।’ फिर मेरी ओर मुखातिब होकर उन्होंने कहा कि ‘कोई बात नहीं। फिर परीक्षा दो। मैं तुम्हारी मदद करूंगा।’ दरअसल मैं फेल कैसे नहीं करता! पढ़ाई-परीक्षा मेरी प्राथमिकता से काफी दूर चली गयी थी।

शिक्षक के रूप में उनके अतुलनीय योगदान की चर्चा किए बिना बात पूरी नहीं हो सकती। भोला बाबू केमिस्ट्री पढ़ाते थे। मैं विज्ञान का छात्र होने के कारण उनका क्लास करता था। राजेंद्र कालेज में विज्ञान संकाय में छात्र बहुत थे। इसलिए भोला बाबू सबको एक साथ शामियाना में बैठाकर पढ़ाते थे। रसायन शास्त्र जैसे निरस और जटिल विषय को इस तरह से मनोरंजक ढंग से पढ़ा देते थे कि उसे फिर घर  जाकर पढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। लगातार घंटों तक पढ़ाते जाना उनके ही वश की बात थी। हमें हमेशा उनके क्लास की प्रतीक्षा रहती थी।

बी.एससी. फेल कर जाने के बाद मैं पटना रहने लगा था। समाजवादी साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकमुख’ में काम करने लगा। उसके संपादक प्रो. देवी दत्त पोद्दार थे। इस बीच मेरे एक शुभचिंतक ने मुझे सलाह दी कि पहले तुम गे्रजुएट तो हो जाओ। बाद में जीवन में जो करना हो, करो। मुझे बात अच्छी लगी।

मैं गांव लौट गया। सारण जिला संसोपा के आॅफिस सेके्रट्री के रूप में काम करने लगा। मुझे हर माह सौ रुपए मिलते थे। साथ ही राजेंद्र काॅलेज में ही हिस्ट्री आॅनर्स में दाखिला करा लिया। आॅनर्स के साथ पास भी कर गया।
इस बीच भोला बाबू से मेरा पहले जैसा संपर्क नहीं रहा। गांव से रोज ट्रेन से छपरा जाता था। क्लास करना और पार्टी आॅफिस में काम करना। इसी में समय बीत जाता था।

इस बीच 26 अप्रैल, 1971 को यह दुःखद खबर मिली कि भोला बाबू की काॅलेज परिसर में ही किसी ने हत्या कर दी। मेरे लिए तो सदमे वाली खबर थी। मैंने ‘सारण संदेश’ में उन पर संस्मरणात्मक लेख लिखा था।

किन्हीं और के लिए भोला बाबू जो कुछ भी हों, पर मेरे लिए तो भोला बाबू अभिभावक तुल्य थे। मैं उनके शिक्षक रूप से सर्वाधिक प्रभावित था। कमेस्ट्री का वैसा बढि़या टीचर मैंने नहीं देखा।

(नोट-आपने ध्यान दिया होगा। मैं उन शिक्षकों के बारे में फेसबुक पर बारी-बारी से लगातार लिख रहा हूं जिन्होंने मुझे किसी न किसी रूप से प्रभावित किया। या जिनके बारे में पढ़कर -जानकर प्रभावित हुआ हूं। अगली बार किन्हीं अन्य गुरू देव के बारे में लिखूंगा।)

शुक्रवार, 1 जून 2018

प्रभावशाली नेत्री तारकेश्वरी सिन्हा : चार बार सांसद

कभी की प्रभावशाली नेत्री तारकेश्वरी सिन्हा को आज कम ही लोग  याद करते हैं। पहली बार 1952 में बिहार से लोकसभा की सदस्य चुन ली गयी थीं। कुल चार बार सांसद रहीं। जवाहर लाल नेहरू मंत्रिमंडल में उपमंत्री रही थीं। 

प्रभावशाली वक्ता थीं। साफ बोलती थीं। शेर ओ शायरी के लिए मशहूर थीं। हाजिर जवाबी भी। अपने जमाने में संसद में प्रभावशाली भूमिका निभाती थीं। सत्ताधारी कांग्रेस में थीं, पर प्रतिपक्ष के नेताओं के साथ भी तारकेश्वरी जी का अच्छा संबंध था। 

समाजवादी सांसद डॉ. राम मनोहर लोहिया पर लिखा हुआ तारकेश्वरी सिन्हा का एक संस्मरण यहां प्रस्तुत है। 

‘एक बार गाड़ी के पास खड़ी मैं किसी से बात कर रही थी। लोहिया वहां आए तो मैंने कहा कि ‘चलिए आपको छोड़ दूं।’ कहने लगे,‘मुझे जनता कॉफी हाउस जाना है।’ उन्हें पता था, मैं वहां नहीं जाती।

मुझे ऊहापोह में देख कर बोले, ‘अच्छा तो साधारण लोगों में जाने में आपकी बेइज्जती होती है। पांच सितारा में नहीं होती।’ खैर, मैं उन्हें छोड़ने गयी तो बोले, ‘ उतरो नीचे, नहीं तो सबके सामने कान पकड़कर उतारूंगा।’ मैं उतरी तो काफी हाउस में लोग इकट्ठे हो गए। सबको कॉफी पिलाई। बिल आया बयालीस रुपए का। लोहिया जी की पॉकिट में आठ रुपए थे। बाकी लोगों ने इकट्ठे करके दिए। एक बैरे ने साढ़े चार रुपए निकाल कर दिए तो लोहिया जी ने मनाकर दिया।

बाद में मैंने उनसे कहा कि ‘आप कमाल के आदमी हैं। पैसा जेब में नहीं है, ऑर्डर पर आर्डर दिए जाते हैं।’ पर, डाक्टर साहब (यानी डाक्टर लोहिया) तो खनाबदोश किस्म के आदमी थे। उन्हें कोई बांध नहीं सकता था।’

तारकेश्वरी जी का जन्म 1926 में हुआ था। सन 2007 में उनका निधन हुआ।

 (प्रभात खबर - बिहार - में प्रकाशित मेरे कॉलम कानोंकान से)

शनिवार, 5 मई 2018

आज भी याद आते हैं ‘फिरंगिया’ के लेखक प्रिंसिपल मनोरंजन बाबू

मैंने जब छपरा के राजेंद्र काॅलेज में अपना नाम लिखवाया, उससे करीब तीन या चार साल पहले ही मनोरंजन बाबू उस काॅलेज के प्राचार्य पद से रिटायर हो चुके थे। पर बाद में भी  कालेज में अक्सर उनका नाम बहुत आदर से लिया जाता था। कोई उनके एक गुण की चर्चा करता तो कोई उनकी  दूसरी  उपलब्धियों की।उनकी मशहूर रचना ‘फिरंगिया’ तो अनेक लोगों की जुबान पर थीं।

वे मूलतः अंग्रेजी के शिक्षक थे, पर वे भोजपुरी बहुत सहजता से बोलते-लिखते थे। फिरंगिया भोजपुरी में ही है। एक बार कालेज परिसर में  कुछ छात्र किसी बात पर शोर कर रहे थे। मनोरंजन बाबू उनके पास गए। उन्होंने छात्रों से भी कविता में बात कर  ली।
‘ हड़बड़ कइले, गड़गड़ होई, बढ़-चढ़ बात करे ना कोई !’
इस पर वे हंसते हुए अपने -अपने क्लास में चले गए।
दरअसल उनकी नैतिक धाक का कमाल था।

मनोरंजन बाबू ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में  एम.ए. अंग्रेजी में टाॅप किया था। मदन मोहन मालवीय  उन्हें बी.एच.यू. में ले गए। वहां कुछ दिनों तक उन्होंने अंग्रेजी पढ़ाई। बाद में राजेंद्र कालेज में प्राचार्य होकर आ गए।
असहयोग आंदोलन के समय मनोरंजन बाबू ने ‘फिरंगिया’ नाम से  देशभक्ति का गीत लिखा।बाद में वह गीत स्वतंत्रता सेनानियों की जुबान पर था।

एक शिक्षक,एक प्रशासक व एक साहित्यकार के रूप में उन्होंने अपना एक विशेष स्थान बनाया था। हालांकि उनके प्रशंसकों को यह अफसोस रहा कि उन्होंने अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने के कारण अधिक लेखन नहीं किया। जबकि उनमें लेखन प्रतिभा अद्भुत थी। हालांकि  उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखी थीं।
1942 में वे बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के मोतिहारी अधिवेशन के अध्यक्ष हुए थे। 

 वैसे राजेंद्र काॅलेज को एक बेहतर काॅलेज बनाने में उनका योगदान अतुलनीय रहा। उन दिनों भी बिहार में ऐसे कम ही काॅलेज थे जहां आर्ट, साइंस और काॅमर्स तीनों की पढ़ाई होती थी। राजेंद्र कालेज में भी ऐसा था।
राजेंद्र काॅलेज के विस्तृत परिसर और बड़े -बड़े क्लास रूम और समृद्ध प्रयोगशालाओं को तो मैंने एक छात्र के रूप में खुद भी देखा और उपयोग किया था। 

 मुझे भी इस बात का अफसोस रहा कि मैं उन्हें वहां काम करते नहीं देख सका था। पर उनके नाम की सुगंध तब भी मौजूद थी। फिलहाल देश प्रेम जगाने वाली उनकी ऐतिहासिक रचना ‘फिरंगिया’ यहां प्रस्तुत है।
संभव है कि मुझसे उसकी एक- दो पंक्तियां छूट गयी हों।--

      --फिरंगिया--
 सुन्दर सुघर भूमि भारत के रहे रामा,
आज उहे भइल मलीन रे फिरंगिया।
अन्न-धन-जन -बल बुद्धि सब नास भइल,
कवनो  के ना रहल निसान रे फिरंगिया।
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जहवां थोड़े ही दिन पहिले होत रहे,
लाखों मन गल्ला और धान रे फिरंगिया।
उंहवे पर आज रामा मथवा पर हाथ धके,
बिलखी के रोवे ला, किसान रे फिरंगिया।
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घिउवा आ दूधवा के नदिया बहत जहां,
उहवां बहेला रक्तधार रे फिरंगिया।
जहवां के लोग सब खात ना अघात रहे,
रुपया से रहे मालामाल रे फिरंगिया।

उहें आज जेने जेने अखियां घुमा के देखीं,

तेने तेने देखबे कंगाल रे फिरंगिया।
हमनी के पसु से रे हालत खराब कइले,
पेटवा के बल रेंगवउले रे फिरंगिया।
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एको जो रोऊवा निरदोसिया के कलपी ते,
तोर नास होई जाई सुन रे फिरंगिया।
दुखिया के आह तोर देहिया के भसम कै देई,
जरि भुनि होई जइबे रे फिरंगिया।
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स्वाधीनता हमनी के नामो के रहल नाहीं,
अइसन कानून के बा जाल रे फिरंगिया।
प्रेस एैक्ट, आर्म्स ऐक्ट, इंडिया डिफेंस एैक्ट,
सब मिली कइलस ई हाल रे फिरंगिया।
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भारत के छाती पर भारत के बचपन के,
बहल रक्तवा के धार रे फिरंगिया।
घरे लोग भूख मरे गेहुंआ विदेस जाए,
कइसन बा विधि के विधान रे फिरंगिया।
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मरदानापन अब तनिको रहल नाहीं,
ठकुरसुहाती बोले रे फिरंगिया।
रात दिन करेले खुसामद सहेबवा के,
सहेले विदेसिया के लात रे फिरंगिया।
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चेति जाउ,चेति जाउ भैया रे फिरंगिया तें,
छोड़ दे अधरम के पंथ रे फिरंगिया।
छोड़ के कुनीतियां सुनीतिया के बांह गहु,
भला तोर करी भगवान रे फिरंगिया।
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गुरुवार, 3 मई 2018

‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ पर मैं खुशवंत सिंह को याद कर रहा हूंं। पर, उन्हें ही क्यों ? इसलिए कि वे आपने पाठकों की भी स्वतंत्रता के  प्रबल पक्षधर थे। जब वे ‘इलेस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया के संपादक थे तो उन्होंने अपने पाठकों की उन चिट्ठियों को भी छापा जिनमें उन्हें खुशामद सिंह, संजय गांधी के चमचा और न जाने क्या -क्या लिखा रहता था।

2005 में  खुशवंत सिंह ने ‘आउटलुक’ को दिए गए इंटरव्यू में  कहा भी था कि ‘ संजय गांधी के कहने पर मैं दुबारा  संपादक बना था।’ सरदार जी  1969 से 1977 तक इलेस्ट्रेटेड विकली आॅफ इंडिया के संपादक थे। बाद में  वे ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के संपादक बने।

इंदिरा गांधी के एक बार फिर 1980 में सत्ता में आ जाने के बाद संजय गांधी ने खुशवंत सिंह को कुछ आॅफर दिए। खुशवंत सिंह के अनुसार, संजय ने कहा ‘आप ब्रिटेन में भारत के  उच्चायुक्त या दुनिया में कहीं के राजदूत बनना चाहते हों या फिर राज्यसभा के सदस्य और हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक ।’ खुशवंत जी ने कहा कि मुझे बाद वाला प्रस्ताव बेहतर लगा।
खुशवंत ने कहा कि एक दो बार प्रधान मंत्री (इंदिरा गांधी) के दफ्तर से संदेश आया कि मैं ऐसा करूं, या ऐसा न करूं, लेकिन मैंने उसकी परवाह नहीं की।
इंदिरा जी के बारे में उन्होंने लिखा कि इंदिरा मुझे पसंद करने लगी थीं। क्योंकि मैं संजय का समर्थन कर रहा था। दरअसल संजय पर गलत आरोप लगा कर आक्रमण किए जा रहे थे। मैं सभी आरोपों की तह में गया, उन्हें गलत पाया।

यानी खुशवंत सिंह अपनी शर्तों पर काम करते थे। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। पर अनेक लोग यह मानते हैं कि वे एक अत्यंत योग्य लेखक व पत्रकार थे। हालांकि उन्हें पत्रकार रहना अधिक पसंद था। वे उन कुछ लोगों के कथन से असहमत थे कि ‘पत्रकारिता साहित्य की हरामी औलाद है।’  वे कहते थे कि आज मेरी जो प्रसिद्धि है, वह पत्रकारिता के कारण है।

यूनेस्को की अपनी नौकरी छोड़कर लेखक पत्रकार के अनजाने से पेशे में खुशवंत सिंह आ गए थे। पर वीकली के संपादक के रूप में उन्होंने कमाल किया था।

इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं तो न्यूयार्क टाइम्स ने उन पर लिखने के लिए कहा था। सरदार जी ने लिखा कि इंदिरा गांधी सरकार में एक क्लर्क का काम करने लायक भी नहीं हैं क्योंकि वह मैट्रिक पास भी नहीं हैं।
सम्पादकों के बारे में खुशवंत ने कहा था कि ‘संपादक जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वह यह कि वे अपना उत्तराधिकारी तैयार नहीं करते।’

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

एक आदर्श शिक्षक जंगल बाबा

सारण जिले के दिघवारा का जय गोविंद उच्च विद्यालय कोई गुरुकुल तो नहीं था,एक सामान्य स्कूल था,पर उसके शिक्षक राम जंगल सिंह गुरु जरूर थे।
 मैं 1959 से 1961 तक वहां का छात्र था। तब के वहां के प्रधानाध्यापक हरिहर बाबू भी बहुत योग्य व सम्मानित शिक्षक थे,पर राम जंगल बाबू जिन्हें हम लोग 
‘जंगल बाबा’ कहते थे,की अपनी अलग एक नैतिक सत्ता थी।

 जंगल बाबा वेश भूषा और पोशाक से लेकर विषयों की जानकारी तक नीचे से ऊपर तक गुरु दिखते थे।
  स्कूल के बरामदे पर उनके पैर  रखते ही हम विद्यार्थी जल्द अपनी- अपनी कक्षाओं में प्रवेश कर जाते थे और स्कूल का वातावरण बिलकुल शांत हो जाता था।
 वे एक तरह के स्कूल के अभिभावक ही थे। इलाके एक संपन्न व्यक्ति जय गोविंद पांडेय ने जंगल बाब की प्रेरणा सेे ही हाई स्कूल की स्थापना की। पांडेय जी की शत्र्त थी कि राम जंगल बाबू को भी शिक्षक और अभिभावक स्वरूप स्कूल में कार्यरत रहना पड़ेगा।
वे रहे भी।

हमारे जमाने में एक से एक योग्य शिक्षक उस स्कूल में थे। पर जंगल बाबा सबके गुरु थे।  किसी भी अन्य शिक्षक की अनुपस्थिति में कोई क्लास खाली नहीं जाता था। क्योंकि जंगल बाबा हर ताले की चाभी थें। वे हर विषय आसानी से पढ़ा लेते थे।

बी.एच.यू. के छात्र रहे जंगल बाबा दो साल तक इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी कर चुके थे। पर स्वास्थ्य खराब रहने के कारण वे आगे पढ़ाई नहीं कर सके थे।उन्हें दिघवारा लौटना पड़ा था।

सारण जिले के दिघवारा के मूल निवासी जंगल बाबा का जन्म 1902 में हुआ था और नवंबर, 1985 में निधन हो गया। पर जब तक जीवित रहे, उन्हें सब लोग सम्मान की नजरों से देखते थे। कभी किसी विवाद में नहीं रहे। उनके नाम पर इन दिनों राम जंगल सिंह इंटर कालेज दिघवारा में चलता है। जंगल बाबा के परिवार के सदस्य अशोक कुमार सिंह के अनुसार उन्हें राहुल सांकृत्यायन का भी सानिध्य मिला था।

जंगल बाबा ने छपरा स्थित राजपूत उच्च विद्यालय  से इंट्रेंस की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी। उसके बाद काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में दाखिला लिया।
जंगल बाबा वहां भरूचा छात्रावास में रहते थे जहां जगजीवन राम और जयप्रकाश नारायण के छोटे भाई राजेश्वर लाल इनकी मित्र मंडली में थे।

 आईएससी करने के बाद राम जंगल सिंह ने इंजीनियरिंग काॅलेज में दाखिला लिया। पर अचानक अस्वस्थ हो जाने के कारण पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी।
चाहे गांधी की आंधी हो या जेपी का आंदोलन, जंगल बाबा ने लोगों की चेतना जगाने का काम किया।

मुझे गर्व है कि मैंने भी जय गोविंद विद्यालय में जंगल बाबा से शिक्षा पाई।उन्हें आटर््स व साइंस सभी विषयों में  समान रूप से महारत हासिल था।जंगल बाबा न सिर्फ एक आदर्श शिक्षक थे बल्कि उनका व्यक्तित्व भी आदर्श था। 
  

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

विभाजित मीडिया के बीच पाठक-श्रोता बेचारा !

इन दिनों पाठकों और दर्शकों की ओर से इस बात की अक्सर  शिकायतें मिलती रहती हैं कि कुछ  मीडिया समूह खास कर कुछ इलेक्ट्राॅनिक मीडिया संस्थान एकतरफा हो गये हंै। उनमें से एक उत्तर है तो दूसरा बिलकुल दक्षिण।पेशेवर निष्पक्षता का अभाव है। हालांकि  अनेक  मीडिया संस्थान अब भी अपनी निष्पक्षता बनाए रखने की कोशिश करते  हैं।

पर सवाल है कि ऐसा कब नहीं था ? कमोवेश पहले भी था।
पहले कम था।अब अधिक है। आजादी के तत्काल बाद तो कुछ अत्यंत बड़े सत्तासीन नेताओं के  अपने -अपने कुछ खास  करीबी पत्रकार थे। वे तब के बड़े पत्रकारों में  थे।

कुल मिलाकर मीडिया के एक हिस्से का एकतरफा व्यवहार थोड़ा- बहुत पहले भी था। पचास के दशक में सत्ताधारियों पर यदि मुख्य धारा का मीडिया आम तौर पर मोहित था तो उसका  कारण भी था।उन लोगों  ने आजादी जो दिलाई थी।वे देश के हीरो थे। उनकी कुछ गलतियांे को भी मीडिया के एक हिस्सा समय -समय पर नजरअंदाज  कर देता था।
पर साठ -सत्तर के दशकों से इस मामले में  फर्क आने लगा।

 साठ-सत्तर के दशकों में मैं तीन साप्ताहिक पत्रिकाएं अक्सर पढ़ता था - ब्लिट्ज, दिनमान और करंट।

ब्लिट्ज वामपंथी था तो करंट दक्षिणपंथी।‘दिनमान’ मध्यमार्गी - डा.राम मनोहर लोहिया के प्रति सहानुभूति से भरा हुआ। तब एक बार तो ‘दिनमान’ में एक पाठक की चिट्ठी छपी थी- ‘आप अपनी पत्रिका का नाम दिनमान के बदले लोहियामान क्यों नहीं रख देते ?’

सच्चिदानंद वात्स्यायन तब संपादक थे।संपादक की टिप्पणी भी उस पत्र के साथ छपी थी।याद रहे कि दिनमान में उनका पूरा नाम नहीं छपता था।
उनका पूरा नाम था-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय। 
खैर,मेरे जैसे सजग पाठक तीनों पत्रिकाओं के अध्ययन के बाद देश-विदेश और राजनीति का पूरा हालचाल जान लेते थे।

पर समय बीतने के साथ बाद के दशकों में और फर्क आने लगा। वह फर्क कुछ सत्ताधारी नेताओं के मीडिया के प्रति अति संवदेनशील और रुखा हो जाने के कारण हुआ ।

 जवाहरलाल नेहरू और मोरारजी देसाई जैसे नेता मीडिया के प्रति आम तौर पर निरपेक्ष थे।दुर्गादास जैसे एक -दो घटनाएं अपवाद जरूर थीं।मशहूर स्तम्भकार दुर्गादास के खिलाफ प्रधान मंत्री ने एक अखबार के मालिक से शिकायत की थी।

वैसे नेहरू जी का प्रिय अखबार ‘हिंदू’ था।

कतिपय कारणों से कुछ दिनों के लिए नेहरू जब ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ और उसी ग्रूप के साप्ताहिक ‘द इलेस्टे्रटेड विकली आॅफ इंडिया’ से नाराज थे तो उन्होंेने तीन मूत्र्ति भवन में टाइम्स आॅफ इंडिया और ‘विकली’ मंगवाना बंद करवा दिया था।पर उन्होंने अखबार की आर्थिकी को क्षति पहुंचाने के लिए कोई  कार्रवाई  की, ऐसी कोई खबर नहीं है।
वामपंथी ‘ब्लिट्ज’ मोरारजी देसाई के खिलाफ अभियान चलाता था।उस पर मोरारजी की यही प्रतिक्रिया होती थी कि ‘मैं तो ब्लिट्ज पढ़ता ही नहीं।’

 एम.एस.एम.शर्मा के संपादकत्व में जब पटना के चर्चित दैनिक ‘सर्चलाइट’ ने बिहार के तत्कालीन मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंह के खिलाफ आपत्तिजनक खबरें परोसनी शुरू कीं तो जनसंपर्क विभाग के एक अफसर ने मुख्य मंत्री से कहा कि आप कार्रवाई क्यों नहीं करते ?

अफसर उम्मीद करता था कि मुख्य मंत्री सर्चलाइट को मिल रहा सरकारी विज्ञापन बंद करा देंगे।

पर,मुख्य मंत्री ने कहा कि मैंने तो बहुत कठोर कार्रवाई कर दी है।अफसर ने कहा कि हमारे यहां तो ऐसा कोई आपका निदेश अभी आया  नहीं है।इस पर मुख्य मंत्री ने कहा कि मैंंने सर्चलाइट पढ़ना ही बंद कर दिया है।किसी अखबार के खिलाफ इससे बड़ी कार्रवाई और कौन सी हो सकती है ?
दरअसल नेहरू, मोरारजी और श्रीबाबू जैसे नेताओं को यह लगता था कि जब जनता हमारे साथ है तो अखबारों के कुछ लिख देने से कोई  फर्क नहीं पड़ जाएगा।

  पर बाद के दशकों में जब कुछ विवादास्पद  नेता सत्ता में आने लगे तो उन्होंने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि उनके कुकर्माें की चर्चा अखबारों में न हो।होने पर अखबारों का भयादोहन शुरू हो गया।प्रेस पर अंकुश लगाने के लिए बारी- -बारी से बिहार और केंद्र सरकारों ने प्रेस विधेयक भी लाए। यदाकदा अखबारों के सरकारी विज्ञापन बंद होने लगे।

संपादक गिरफ्तार होने लगे। नेताओं  के कहने पर पत्रकार नौकरी से निकाले जाने लगे। या उनका तबादला होने लगा। इसका सीधा  असर अखबार की आर्थिकी पर पड़ा।

अखबार तो व्यवसायी ही निकालते हैं।जब राजनीति में ही गिरावट आने लगी तो व्यापारियों ने  समाज सुधार का ठेका तो ले नहीं रखा था। इसलिए रामनाथ गोयनका जैसे कुछ अत्यंत थोड़े से अपवादों  को छोड़कर अधिकतर अखबार मालिकों ने सरकारों के साथ तालमेल रखने में ही अपने उद्योग धंधे , अखबार तथा उसके स्टाफ का भला  समझा। 

मालिकों के साथ -साथ अधिकतर संपादकों को भी अखबार की आर्थिकी का ध्यान रखना पड़ा।संपादक ध्यान रखेंगे तो संपादकीय स्टाफ को भी रखना ही पड़ेगा। सरकार के खिलाफ खबरें आम तौर पर नहीं रुकीं,पर अभियानी पत्रकारिता पर काफी हद तक अंकुश लगा।

इलेक्टा्रॅनिक मीडिया के इस दौर में तो मीडिया के संचालन का खर्च बेशुमार बढ़ गया। अपवादों को छोड़ दें तो सबको कहीं  से भी पूंजी लाने, बचाने और बढ़ाने की चिंता रहने लगी। इस स्थिति में मीडिया के बड़े हिस्से के समक्ष संबंधित सरकार से सह अस्तित्व बना कर चलने की मजबूरी रही है।

इस देश में मीडिया का एक हिस्सा ऐसा भी है जो प्रतिपक्ष के एक हिस्से से तालमेल बैठाए हुए है ताकि जब वे सत्ता में आएंगे तो इनके भी अच्छे दिन आ जाएंगे।कुछ मामलों में विचारधारा भी हावी है।

एक जमाने में एक पेशवर यानी निष्पक्ष मीडिया के एक बड़े अधिकारी ने कहा था कि ‘यदि दुनिया में कहीं कम्युनिज्म आ रहा है तो हम उसे रोकने की कोशिश नहीं करेंगे।या कहीं से जा रहा है तो उसे बचाने की भी चेष्टा नहीं करेंगे।हम सिर्फ रिपोर्ट करेंगे कि फलां देश में आ रहा है और फलां देश से जा रहा है।’

अब ऐसी बात आम तौर से नहीं है।अपवादों की बात और है। कुल मिलाकर मोटा -मोटी यही स्थिति है।इसे ही स्वीकारना है।पाठकों -श्रोताओं के पास कोई और रास्ता भी नहीं है। रास्ता वही है जो मैं साठ -सत्तर के दशकों में करता था। सभी पक्षों की सुनिए,पर अपने मन की करिए। यानी आज के मीडिया के बीच के ‘ब्लिट्ज’, ‘दिनमान’ और ‘करंट’ तीनों को  वाॅच  करते रहिए। फिर किसी नतीजे पर पहुंचिए।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

आपातकाल में फरारी के मेरे वे दिन !













आपातकाल में बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में सी.बी.आई. की विशेष टीम मेरी तलाश कर रही थी। पर, समय रहते पूर्व सूचना मिल गई और मैं किसी तरह उस टीम की गिरफ्त में आने से बच गया। मैं फरार हो गया।

 पर फरारी के महीनों में मुझे इतना अधिक परेशानी, अभाव और कष्ट से गुजरना पड़ा जिसका वर्णन मुश्किल है। मेरा काफी समय मेघालय के एक छोटे बाजार में बीता। वहां तब आॅल पार्टी हिल लीडर्स कांफे्रंस की सरकार थी। इसलिए आपातकाल का अत्याचार नहीं था।

 भूमिगत जीवन के कष्टों को देखकर कई बार मैं यह सोचता था कि बेहतर होता कि मैं गिरफ्तार ही हो जाता। पर,दूसरे ही क्षण यह डर समा जाता कि मुझे मार-मार कर सी.बी.आई. डायनामाइट केस में मुखबिर बना देगी। जिस रेवतीकांत सिन्हा को सी.बी.आई. ने मुखबिर बनाया, उन्हें मेरी अपेक्षा फर्नांडिस की गतिविधियों के बारे में कम ही जानकारियां थीं।

 मेरे जैसे दुबले-पतले और कमजोर से दिखने वाले व्यक्ति को धमका कर मुखबिर बनाने की कोशिश जांच एजेंसियां करती रही हैं।

  17 फरवरी, 1977 को मुखबिर रेवतीकांत सिन्हा का इकबालिया बयान देश के सभी अखबारों में छपा था। वह बयान उन्होंने दिल्ली के चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्टेªट मोहम्मद शमीम की अदालत में दिया था। उस बयान में अन्य बातों के अलावा सिन्हा ने यह भी कहा था कि ‘मेरे पटना स्थित आवास पर चार लोगों की बैठक हुई।

जुलाई, 1975 के पहले हफ्ते में हुई उस बैठक में मेरे अलावा जार्ज फर्नांडिस, महेंद्र नारायण वाजपेयी और सुरेंद्र अकेला थे। बैठक में जार्ज ने घोषणा की कि वह इंदिरा सरकार को उखाड़ फेंकने की योजना बना रहे हैं।

इसके लिए उन्हें कुछ विश्वस्त कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है।’

याद रहे कि उन दिनों मैं सुरेंद्र अकेला के नाम से लिखता था।

 जार्ज फर्नांडिस प्रतिपक्ष के प्रधान संपादक थे। मैं उसका बिहार संवाददाता था। इस लिहाज से जार्ज से मेरी निकटता थी। याद रहे कि लाइसेंस घोटाले से संबंधित ‘प्रतिपक्ष’ की एक रिपोर्ट पर लोकसभा मंे लगातार पांच दिनों तक गर्मागर्म चर्चा हुई थी। यह बात सितंबर, 1974 की है। सदन में पांच दिनों तक कोई दूसरा कामकाज नहीं हुआ था।  

 बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में 24 सितंबर 1976 को अदालत में आरोेप पत्र दाखिल कर दिया गया था। केस की सुनवाई चल रही थी। सी.बी.आई. ने इस केस के सिलसिले मेंे जिन्हें गिरफ्तार किया, उन्हें बड़ा कष्ट दिया।

दिल्ली विश्वविश्वविद्यालय के व्याख्याता विनोदानंद सिंह को तो कुर्सी से बांध कर रखा गया था। विनोद जी को बाद में सी.बी.आई. ने छोड़ दिया था।

वह 1977 में बिहार के गायघाट से जनता पार्टी के विधायक बने थे।

 सी.बी.आई. को इस केस के सिलसिले में कई झूठी जानकारियां भी मिली थीं। उनमें एक गलत जानकारी यह भी थी कि मैं जार्ज के लिए नेपाल से पैसे लाता था। सी.बी.आई. के अनुसार काठमांडु स्थित चीनी दूतावास से मैं संपर्क में था।

सी.बी.आई. के एक जांच अधिकारी ने मेरे एक मित्र को बताया था कि यदि सुरेंद्र अकेला गिरफ्तार हो जाता तो हमें जार्ज से चीन के रिश्ते का पता चल जाता।

 पर, सच्चाई यह है कि मैं आज तक नेपाल नहीं गया हूं। चीनी दूतावास से किसी तरह के संपर्क का सवाल ही नहीं उठता।

 पर, यह तब की जांच एजेंसी की ‘कार्य कुशलता’ का एक नमूना था।

 खैर मुझे गिरफ्तारी से बचाया था मुख्य मंत्रीसचिवालय के एक अफसर ने। समाजवादी पृष्ठभूमि के शिवनंदन पासवान तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र के सचिवालय में तैनात थे।

 दिल्ली से सी.बी.आई. की टीम आई हुई थी। उसने मुख्यमंत्री सचिवालय से संपर्क करके पटना का मेरा पता-ठिकाना पूछा। पासवान के अलावा किसी को मेरे बारे में कोई बात मालूम नहीं थी।

 पासवान ने हमारे परिचित लक्ष्मी साहु को इस बात की सूचना देते हुए कहा कि अकेला जी को शीघ्र खबर कर दीजिए कि वे फरार हो जाएं।

कर्पूरी ठाकुर के निजी सचिव रहे लक्ष्मी साहु ने किसी तरह पटना के जक्कनपुर स्थित मेरा घर खोजा। वहां मैं किराए के मकान में रहता था। मुझे छिप जाने को कहकर लक्ष्मी जी तुरंत वहां से चल दिए।

आपातकाल का इतना आतंक ही था कि किसी ऐसे व्यक्ति के पास फटकना भी कोई नहीं चाहता था जिसे सी.बी.आई. कौन कहे पुलिस भी खोज रही हो।

मैं फरार हो गया। प्रतिपक्ष के संवाददाता के रूप में मुझे हर माह दो सौ रुपए मिलते थे। जार्ज ने आपातकाल लागू हो जाने के बाद भी वह राशि मुझे भिजवानी जारी रखी। हालांकि प्रतिपक्ष का प्रकाशन 25 जून, 1975 के बाद बंद हो गया था।

फिर भी पैसे भिजवाने का बड़ा कारण यह था कि आपातकालीन भूमिगत गतिविधियों में मैं जार्ज का सहयोग कर रहा था।

 मेरा असल कष्ट शुरू हुआ 1976 के मार्च में। तब बड़ौदा में डायनामाइट पकड़ा गया था। उससे जोड़कर जार्ज फर्नांडिस के साथियों की गिरफ्तारियां शुरू हुईं।

 फरारी समय में कोई मुझे शरण देने को तैयार ही नहीं था। रिश्तेदार भी भला नाहक क्यों संकट मोल लेते !
 मेरे मित्र और पटना सचिवालय में सहायक रामबिहारी सिंह ने एक अन्य सरकारी कर्मचारी श्रीवास्तव के पटना स्थित आवास में मुझे रखवा दिया।

पटना के बांसघाट के पास की उस घनी आबादी वाले मोहल्ले में कुछ दिन तो बीत गए, पर एक जगह अधिक दिनों तक रहा भी नहीं जा सकता था। पैसों की भारी दिक्कत थी। मेरे जैसे मामूली अभियानी पत्रकार को आपातकाल में कोई पैसे क्यों देता ?

राजनीतिक लोग या तो जेल में थे या काफी डरे हुए थे। इस बीच जार्ज से मिलना भी बंद हो गया। उनके पत्र जरूर आ रहे थे।

आपातकाल लागू होने के बाद मैं जार्ज से बंगलुरू, कोलकाता और दिल्ली में बारी -बारी से मिला था।
 जार्ज की गिरफ्तारी के बाद मैंने बिहार छोड़ देना ही बेहतर समझा।

मेरे बहनोई मेघालय के गारो हिल्स जिले के फुलबाड़ी बाजार में अपना छोटा व्यापार करते थे। मेरी बहन भी वहीं थीं।

 मैं जाकर वहीं रहने लगा। वहां चूंकि आपातकाल का कोई अत्याचार था ही नहीं, इसलिए मेरे रिश्तेदार यह समझ ही नहीं सके कि सी.बी.आई. को मेरी कितनी तलाश है। उनके यहां कोई अखबार भी नहीं आता था।
 पर मैं यह समझ रहा था कि मुझे यहां बैठकर रहने के बदले किसी काम में लग जाना चाहिए। मैं अपने बहनोई की दुकान पर ही बैठना चाहता था। बहनोई राजी थे। पर मेरी दीदी ने साफ मना कर दिया। उसने कहा कि आपको जो करना हो करिए, पर बबुआ दुकान नहीं चलाएगा। बाबू जी सुनेंगे तो उन्हें इस बात का बुरा लगेगा कि राजपूत का लड़का दुकान चला रहा है।

  जीजा जी भी मान गए।

 नतीजतन मैं बहन के घर खाता और सोता था। शाम को बाजार जाता था। एक बंगाली की चाय की दुकान में बैठकर चाय पीता था और ‘असम ट्रिब्यून’ पढ़ता था।

कुछ दिनों तक तो यह ठीक ठाक चलता रहा। फुलबाड़ी तब एक छोटी जगह थी। बंगलादेश की सीमा के पास है। वहां सब एक दूसरे को जानते थे। समय बीतने के साथ इस बात की चर्चा शुरू होने लग गयी कि अंग्रेजी पढ़ने वाला यह व्यक्ति यहां निट्ठला क्यों बैठा हुआ है ? क्या इंदिरा गांधी का सी.आई.डी. है ? क्या स्थानीय सरकार पर नजर रखने के लिए इसकी तैनाती हुई है ?

 जब यह चर्चा मुझ तक भी पहुंची तो मैं चिंतित हो गया। आशंका हुई कि यदि स्थानीय पुलिस मुझसे पूछताछ करने लगेगी तो मैं क्या जवाब दूंगा ? जल्दी-जल्दी मैं वहां से भागकर पटना पहुंचा। क्योंकि इस बीच नवंबर, 1976 में मेघालय के मुख्यमंत्री विलियमसन ए. संगमा कांग्रेस में शामिल हो चुके थे। मेघालय की राजनीतिक स्थिति बदल चुकी थी।

हालांकि तब तक पूरे देश में आपातकाल की कठोरता कम होने लगी थी। बड़े नेतागण जेलों से रिहा होने लगे थे। चुनाव होने वाले थे। हालांकि बड़ौदा डायनामाइट केस की सुनवाई चल ही रही थी। जब 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनी तभी वह केस वापस हुआ।

लोकसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही यह लगने लगा था कि कांग्रेस हार जाएगी। फिर तो मैंने ‘आज’ अखबार के पटना दफ्तर में नौकरी शुरू कर दी।

 मंत्री बनने के बाद जार्ज ने मुझसे कहा कि ‘दिल्ली चलकर प्रतिपक्ष निकालो।’

मेरे कुछ ‘शुभचिंतकों’ ने भी कहा कि ‘चले जाओ, उद्योगमंत्री से कुछ व्यापारियों की मुलाकात भी करवा दोगे तो जीवन संवर जाएगा। कई उद्योगपतियों के जायज बड़े काम भी मंत्री से मुलाकात नहीं होने के कारण रुका रहता है।’

इस पर मैंने कहा कि मुझे ऐसा जीवन मंजूर नहीं है। मैंने साफ मना कर दिया। क्योंकि संघर्षशील  जार्ज मुझे जरूर प्रभावित करते थे, पर मंत्री जार्ज कत्तई नहीं। वैसे भी मैं राजनीतिक गतिविधियांे से अलग हो जाने का पहले ही मन बना चुका था। आपातकाल के विशेष कालखंड में आपात धर्म ही निभा रहा था। उससे पहले किसी पेशेवर अखबार में नौकरी पाने की प्रतीक्षा में प्रतिपक्ष और जनता जैसे अभियानी और सोद्देश्य पत्रिकाओं में काम कर रहा था।
(दैनिक नया इंडिया में प्रकाशित) 

गुरुवार, 26 मई 2016

अच्छा हुआ जो राजनीति में नहीं रहा

मैंने पटना के विधायक आवास के कमरे में प्रवेश किया ही था कि एक समाजवादी ‘नेता जी’ ने सामने से मेरी गर्दन को मजबूती से पकड़ा और धकेलते हुए झटके में बाहर कर दिया।

 वह ‘गर्दनिया पासपोर्ट’ ही मुख्य कारण बना सक्रिय राजनीति से मेरे ‘निष्कासन’ का। इस घटना को अपने लिए मैं वरदान मानता हूं। पर,यह घटना राजनीतिक कार्यकर्ताओं की पीड़ा भी बयान करती है। इस पर अलग से देश के राजनीतिक नेताओं को विचार करना चाहिए।

 राजनीति से निकल जाने का फैसला तो खैर मेरा अपना था। पर उस नेता जी का ऐसा कोई उद्देश्य शायद नहीं रहा होगा। अधिकतर नेताओं की तरह वे भी बस यही चाहते थे कि मेरे जैसे छोटे राजनीतिक कार्यकर्ता इसी तरह का सलूक झेलते रहें। फिर भी कार्यकर्ता की तरह खटते रहें।

 संभवतः यह 1970 की बात रही होगी।

 उससे पहले मैं डा. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित होकर 1966 में राजनीति में आया था। बिहार में कांग्रेस सरकार के खिलाफ एक बड़े छात्र आंदोलन में शामिल रहने के कारण मेरी बी.एससी. की परीक्षा भी छूट गयी।

बाद में यानी 1971 में मैंने बी.ए. पास किया।

लोहिया के मुख्य विचार थे कि सवर्ण लोग खासकर समाजवादी पार्टी के सवर्ण लोग पिछड़ों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाने के क्रम में खुद को खाद बनाएं। लोहिया  पिछड़ों के लिए साठ प्रतिशत की हिस्सेदारी देने के पक्षधर थे। सवर्ण पृष्ठभूमि से आने के कारण लोहियावादी राजनीति में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति की वैसे भी मेरे लिए बहुत कम ही गंुजाइश थी। इसके बावजूद लोहियावादी राजनीति से जुड़ा क्योंकि मेरी कोई व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी ही नहीं।

 सन 1963 में मैंने साइंस से मैट्रिक प्रथम श्रेणी में पास किया था। तब सिर्फ माक्र्स के आधार पर ही तीसरी श्रेणी की सरकारी नौकरी मिल जाती थी। मेरे जैसे एक किसान के बेटे के लिए यह स्वाभाविक ही था कि उसके पिता यह चाहें कि वह जल्द से जल्द कोई पक्की यानी सरकारी नौकरी पकड़ ले।

पर मैंने तय किया था कि न तो मैं शादी करूंगा और न ही नौकरी। मुझसे उम्मीद पाले बाबू जी को भी मैंने कह दिया था कि मुझे पुश्तैनी संपत्ति में कोई हिस्सेदारी नहीं चाहिए।

राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में अब काम करूंगा। मैं परिवार को कोई आर्थिक मदद नहीं कर पाऊंगा। तब एक भोली आशा थी कि डा. लोहिया के नेतृत्व में देश में एक न एक दिन समाजवाद आएगा। एक बेहतर समाज बनेगा। उस काम में मेरा भी थोड़ा योगदान होना चाहिए।

 विधायक बनने, पैसे कमाने या फिर अखबारों में नाम छपवाने की कोई चाहत तो कत्तई नंहीं थी। अपनी पढ़ाई के बारे में भी एक कारणवश बताया। मैं उन लोगों में भी नहीं था जिन्हें कहीं कोई नौकरी नहीं मिलती थी तो राजनीतिक कार्यकत्र्ता बन जाते थे।

 तब मैं छात्र होने के कारण बिहार के विश्वविद्यालय परिसरों में जाकर  लोहियावादी समाजवादी विचारधारा का प्रचार करता था और समाजवादी संगठन में छात्रों को शामिल करता था। शामिल होने वालों में से एक तो बाद में राजनीति में काफी ऊपर उठे।

  उन दिनों ‘दिनमान’ एक अत्यंत प्रतिष्ठित पत्रिका थी। समाजवादियों की चहेती पत्रिका। उसमें संपादक के नाम पत्र छप जाने पर भी कोई राजनीतिक कार्यकत्र्ता देश भर के समाजवादियों के बीच जाना जाने लगता था। तब मैं सुरेंद्र अकेला के नाम से पत्र लिखता था। दिनमान में 1968 में मेरा इसी नाम से पहला पत्र छपा था। मैं डा. लोहिया और दिनमान के संपादक अज्ञेय को व्यक्तिगत चिट्ठियां भी लिखता था। उन लोगों ने जवाब भी दिए थे। छात्र जीवन में ही समाजवादी पत्रिकाओं में भी मैं पत्र और लेख लिखा करता था।

 यह सब मैं इसलिए बता रहा हूं क्योंकि एक समझदार कार्यकत्र्ता बनने की पृष्ठभूमि मुझमें मौजूद थे।

  उस नेता जी के साथ भी यदाकदा बैठकर मैं राजनीतिक चर्चा किया करता था। इसके बावजूद उन्होंने मेरे साथ यह सलूक किया। पटना के विधायक आवास में वे मुझे पीछे से नहीं बल्कि सामने से गर्दन पकड़ कर ढकेल रहे थे। मेरे गिर जाने का भी पूरा खतरा था। गिरने पर सिर के पिछले हिस्से में गंभीर चोट लगने का खतरा था। पिछले हिस्से की चोट कभी-कभी मारक भी होती है।

 पर उनके गुस्से का एक ठोस कारण था। उनके कमरे में मेरे प्रवेश से उस समाजवादी विधायक की नींद में खलल पड़ सकती थी जिसके साथ नेताजी रहते थे। नेता जी उस विधायक के स्थायी अतिथि थे। नेता जी राज्य स्तर के बड़े समाजवादी नेता थे। 

नेता जी ने एक बार भोजन के लिए मुझे दो रुपए दिए थे। तब पटना की विधायक काॅलानी में दस आने में भर पेट भोजन मिल जाता था। शायद नेता जी को यह लगा होगा कि मैं एक बार फिर रुपए के लिए तो नहीं आ गया! हालांकि मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था।

वैसे मुझे याद नहीं है कि पिछली बार उन्होंने जो दो रुपए दिए थे, वे मेरे मांगने के बाद या खुद उन्होंने अपनी पहल पर दी थी। राजनीतिक चंदा देने वाले धनपतियों से वे संबंध रखते थे। यह और बात है कि उन दिनों समाजवादी नेताओं को बहुत कम पैसे चंदा के रूप में मिलते थे।  

 कुल मिलाकर इस प्रकरण से मुझे यह लग गया कि एक ऐसे कार्यकर्ता की समाजवादी दल मेंें क्या स्थिति है जिसके पास खुद के पैसे नहीं हैं। दूसरी बात यह कि जो नेता दो रुपए देगा, वह किस तरह एक कार्यकर्ता के साथ बर्ताव करेगा।

 मेरे मीठे स्वाभाव के कारण उस नेता जी को यह मालूम होना चाहिए था कि   यदि उस दिन उन्होंने अपने हाथ से धीरे से इशारा भी कर दिया होता तो मैं उस कमरे में दरवाजे से ही लौट जाता। पर वे समझते थे कि उन्हें किसी कार्यकर्ता की  गर्दन में हाथ लगा देने का भी पूरा अधिकार है।

 उसी दिन मैंने फैसला किया कि अब मैं आर्थिक रूप में स्वावलंबी बनने की कोशिश करूंगा और शादी करके घर भी बसाऊंगा। वैसे भी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता डा. लोहिया का इस बीच निधन हो चुका था। लोहिया  कार्यकर्ताओं की उम्मीद की किरण थे।

  अंततः मैंने पत्रकारिता को जीविका का साधन बनाने का फैसला किया। हालांकि इस बीच कुछ अन्य घटनाएं भी हुई जिसकी चर्चा फिर कभी। पहले छोटे अखबार और बाद में बड़े अखबारों में रहा।

अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मैं उस नेता जी को धन्यवाद ही देता हूं जिन्होंने समय रहते मेरी आंखें खोल दीं थी। एक बेहतर समाज बनाने की कोशिश की दिशा में एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में जितना प्रयास मैं कर सकता था, उससे बेहतर प्रयास एक पत्रकार के रूप में करने की मैंने कोशिश की। इसका मुझे संतोष है।

 कई बार विफल प्रेमी, कवि बन जाता है। विफल साहित्यकार आलोचक। और, विफल राजनीतिक कार्यकर्ता पत्रकार बन जाता है।

 मैं तीसरी श्रेणी में खुद को पा कर खुश हूं।

 पत्रकारिता जीविका के साथ-साथ एक सामाजिक काम भी है। सत्तर के दशक में मैं साप्ताहिक लोकमुख, और ‘जनता’ (पटना) तथा प्रतिपक्ष (नई दिल्ली) के लिए काम करता रहा। साथ ही बड़े अखबारों में नौकरी खोजता रहा। पर, कई कारणों से यह खोज लंबी चली।

 यह खोज 1977 में ही पूरी हो सकी जब दैनिक ‘आज’ में मेरी पक्की नौकरी हुई।  हालांकि सक्रिय राजनीति से मन उचट जाने का वही एक कारण नहीं था जिसकी चर्चा मैंने ऊपर की है। उससे पहले की दो अन्य घटनाएं भी मन पर छाई हुई थीं।

इस बार एक अन्य समाजवादी नेता के बारे मंे। उनके पटना स्थित आवास में मैं अक्सर जाया करता था। लंबी चर्चाएं होती थीं।

  एक दिन गपशप में देर शाम हो गयी। नेता जी ने अपने पुत्र से कहा कि ‘सुरेन्दर भी खाना खाएगा। मछली बनी है। इस गरीब को मछली और कहां मिलेगी?’

 एक राजनीतिक कार्यकर्ता सह बुद्धिजीवी के साथ ऐसा सलूक मुझे बहुत बुरा लगा। दरअसल नेता जी यह बात नहीं जानते थे कि मेरे जन्म के समय मेरे पिता जी 22 बीघा जमीन के मालिक थे। दो बैल, दो गाय और एक भैंस। लघुत्तम जमींदार थे और एक बड़े जमींदार के तहसीलदार थे। यदि नहीं जानते थे तौभी किसी गरीब कार्यकर्ता की गरीबी का ऐसा उपहास!

मेरे घर में दो नौकर थे। जमींदारी पृष्ठभूमि के कारण पास की नदी में मछली मारने वाले मुफ्त में मछली पहुंचाते थे। मेरे परिवार में मांस-मछली से लगभग परहेज था। इसलिए हमलोग अन्य लोगों में मछली बांट देते थे या नौकर -मजदूर खाते थे।

 दूसरी ओर इस नेता जी का जब जन्म हुआ था, तब उनका परिवार लगभग भूमिहीन था। समय बीतने के साथ नेता जी अमीर होते चले गये और मेरे परिवार की जमीन में से इस बीच 12 बीघा बिक गयी।

यहां दरअसल मैं राजनीतिक दलों खास कर मध्यमार्गी दलों के कार्यकर्ताओं की बेबसी का विवरण पेश करने के लिए अपनी यह कहानी लिख रहा हूं। ऐसा सिर्फ मेरे ही साथ थोड़े ही हुआ होगा! 

वाम दलों में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के जीवन यापन का दल की ओर से प्रबंध रहता था। आजादी की लड़ाई के दिनों और उसके कुछ साल बाद तक जयप्रकाश नारायण अपने दल के कुछ चुने हुए अच्छे कार्यकर्ताओं के लिए तीस रुपए माहवार का इंतजाम करते थे।

ऐसे कार्यकर्ताओं में से कुछ लोग बाद में केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और राज्य में मंत्री भी बने।

  अपवादों को छोड़ दें तो अब अधिकतर राजनीतिक कार्यकर्तागण सांसद -विधायक फंड के ठेकेदार हैं। या घर के जायज -नाजायज पैसे खर्च कर विधायक सांसद मंत्री बनने के लिए कार्यकर्ता बन रहे हैं।

 देश सेवा और समाज सेवा का कहीं कोई जुनून है भी तो वह अपवाद है। अपवाद से देश नहीं चलता। इसलिए देश जैसे चल रहा है,उसका तो भगवान ही मालिक है।

 गायत्री परिवार के मुखिया डा. प्रणव पण्डया ने राज्यसभा की सदस्यता ठुकराते समय जो कुछ कहा, क्या उससे भी इस देश की राजनीति कुछ सीखेगी ? एक गरिमापूर्ण सदन को नेताओं ने ऐसा बना रखा है कि प्रणव पण्डया को यह कहना पड़ता है कि मैं तो वहां अपनी बात रख ही नहीं पाऊंगा। 

 अपनी तीसरी कहानी सुनाकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं की पीड़ा की बात खत्म करूंगा।

 बिहार के सारण जिले के एक सुदूर देहात के डाकबंगला में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की बैठक हो रही थी। पार्टी का सम्मेलन चाहे अंचल मुख्यालय में हो या देश के किसी अन्य हिस्से में, मैं वहां जरूर जाता था। समाजवादी पत्रिकाओं के जरिए देश भर के हिंदीभाषी समाजवादी मुझे जानते ही थे। उनसे मिलकर अच्छा लगता  था।
अब बात सारण के उस डाकबंगले की।

एक समाजवादी नेता पहली बार विधायक बने थे। उनके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। उनके बोल चाल और हाव भाव से यह साफ लग रहा था कि वे रातोंरात समाजवादी से सामंतवादी बन चुके हैं।

 जब विधायक जी उस डाकबंगले के शौचालय से निकल रहे थे तो मैं संयोग से उनके सामने पड़ गया। उनसे मेरी कोई खास निकटता भी नहीं थी। क्योंकि सोचने समझने और पढ़ने लिखने से उनका नाता कम ही था। उन्होंने बिना किसी संकोच के कहा, ‘अकेला, जरा पखाना में एक बाल्टी पानी डाल देना।’

 मैंने पानी जरूर डाल दिया, पर सोचा कि विधायक जी कोई कट्टर गांधीवादी तो हैं नहीं जो शौचालय खुद ही साफ करते हैं। दरअसल ये सामंती हो चुके हैं। और उनकी नजर में एक पढ़ने लिखने वाले कार्यकर्ता का यही सही उपयोग है।

याद रहे कि जो व्यक्ति खुद शौचालय साफ नहीं करता, उसे दूसरे से कहने का अधिकार नहीं होना चाहिए। इन उदाहरणों से यह तो पता चल ही गया होगा कि  वास्तविक और समझदार राजनीतिक कार्यकर्ताओं को किस तरह दरकिनार और निरुत्साहित किया गया।

 नतीजतन अपवादों को छोड़ दें तो मध्यमार्गी राजनीतिक दलों में आज कैसे-कैसे कार्यकर्ता और नेता हैं! यदि उपर्युक्त व्यवहार झेलने के बावजूद यदि मैं राजनीतिक कार्यकर्ता बना रह गया होता तो आज मेरा हाल क्या होता ? !

 कल्पना करके ही डर जाता हूं। अच्छा हुआ कि गर्दनिया पासपोर्ट देकर अनजाने में ही एक नेताजी ने एक बेहतर काम मंे मुझे ढकेल दिया।

 मेरी रुझान और प्रवृत्ति देख कर किसी संपादक ने मुझ पर कभी किसी ऐसे काम के लिए दबाव नहीं बनाया जिसे मैं करना नहीं चाहता। यानी राजनीति की अपेक्षा पत्रकारिता ने मुझे अधिक संतुष्टि दी।

कुल मिलाकर यह बात कहनी चाहिए कि इस देश की राजनीति मौजूदा संसद को ऐसी गरिमायुक्त और शालीन बनाए जिसमें डा. पण्डया जैसे लोग अपनी बात रख सकें। साथ ही राजनीति को हर स्तर पर ऐसा बनाया जाए जिसमें एक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाविहीन कोई कार्यकर्ता रहकर सेवा का काम कर सके। क्या ऐसा कभी हो पाएगा ? 
(14 मई 2016  के हिंदी दैनिक ‘नया इंडिया’ में प्रकाशित)  

बुधवार, 25 मई 2016

उफ ! माफिया के शूटर से वह इंटरव्यू !

  बात 1984 की है। उन दिनों मैं जनसत्ता का बिहार संवाददाता था और पटना के लोहिया नगर में किराए के मकान में रहता था। 1983 में जनसत्ता ज्वाइन करने से पहले मैं दैनिक ‘आज’ के पटना संस्करण में मुख्य संवाददाता था। चर्चित बाॅबी हत्याकांड को उद्घाटित करने के कारण मेरी चर्चा पहले से थी। उधर जनसत्ता ने अपने प्रकाशन के साथ ही तहलका मचा रखा था जिसका मैं संवाददाता था।

  शायद इसी पृष्ठभूमि के चक्कर में एक दिन अचानक एक शार्प शूटर रघुनाथ सिंह मेरे घर आ धमका। उसके साथ मेरे एक पूर्व परिचित थे। रघुनाथ काफी लंबा-चैड़ा और हट्ठा-कट्ठा था। हुलिया देख कर मैं थोड़ा असहज हो गया। उसकी कमर में रिवाल्वर थी। बाद में पता चला कि वह साथ में हैंड ग्रेनेड लेकर भी चलता है।


  मेरे परिचित ने मुझे बताया कि ये मेरे रिश्तेदार हैं। बिहार के एक बड़े माफिया का नाम लेते हुए कहा कि ये उनके बाॅडीगार्ड और शूटर थे। पर अब उससे इनका झगड़ा हो गया है। दोनों एक दूसरे की जान के प्यासे हैं।


 रघुनाथ की शिकायत थी कि उस माफिया के लिए सारे मर्डर मैंने किये, पर मीडिया में नाम सिर्फ उसका होता है। वह तो भारी डरपोक आदमी है। एक चूहा भी नहीं मार सकता है। मेरा नाम भी होना चाहिए।


 यह सनसनीखेज बात सुनकर मैं रघुनाथ की ओर मुखातिब हुआ।


मैंने उससे पूछा कि आपने कितने मर्डर किये हैं ? इस पर उसने अपना रिवाल्वर निकाल कर टेबुल पर रख दिया। कहा कि यह हथियार मेरे लिए शुभ साबित हुआ है। इससे मैंने कई मर्डर किये हैं। हालांकि कुल तेरह लोगों को मारा है। उस माफिया का नाम लेते हुए कहा कि सब उसी के कहने पर।


फिर उसने विस्तार से बताया कि एक चर्चित मजदूर नेता को उसने कैसे मारा।


आप क्या चाहते हैं ? -मैंने पूछा।


उसने कहा कि मैं चाहता हूं कि फोटो सहित आप मेरा इंटरव्यू छापिए। मैंने कहा कि आपको इंटरव्यू में यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आपने कितने और कैसे मर्डर किये हैं।


उसने कहा कि आप कहिए तो मैं हैंडनोट पर लिखकर दे दूंगा। पर मेरा नाम और फोटो जरूर छपना चाहिए। मैंने सुना है कि आपमें छापने की हिम्मत है।


 मैंने कहा कि छपने के बाद पुलिस आप पर केस कर देगी। वैसा कोई केस होने पर उसका सामना करने को वह तैयार लगा।


 मैंने कुछ सोचने के बाद कहा कि आप एक सप्ताह के बाद आइए। मैं विस्तार से आपसे बातचीत करूंगा। अभी मैं थोड़ा व्यस्त हूं।


 वह चला गया।


मैंने सोचा कि रघुनाथ शायद अपने लोगों से इस बीच राय करेगा। लोग यही राय देंगे कि सिर्फ नाम छपने के लिए स्वीकारोक्ति देकर मत फंसो। और वह मान जाएगा। मेरे पास नहीं आएगा। मैंने इस बात को लेकर भी द्विविधा में था कि ऐसे शूटर का इंटरव्यू छापना चाहिए या नहीं। पर इसमें सार्वजनिक हित का पहलू यह था कि इसका इंटरव्यू उस बड़े माफिया के खिलाफ जाने वाला था। उस बड़े माफिया के समर्थकों और संरक्षकों में बड़े-बड़े नेता शामिल थे।


 उन दिनों बिहार में गैंगवार और नरसंहारों का दौर था।


 मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि ठीक एक सप्ताह के बाद वह मेरे यहां आ धमका।


उससे पहले मैंने उसके बारे में पुलिस सूत्रों से जानकारी ली थी। सुना था कि वह ‘शब्दबेधी वाण’ चलाता है। यानी आवाज की दिशा में गोली चला देता है और निशाने पर लगती है।


वह उत्तर प्रदेश के पी.ए.सी. का भगोड़ा सिपाही है।


 इस बात की भी पुष्टि हुई कि वह माफिया इसकी जान का प्यासा बना हुआ है जिसके यहां यह पहले काम करता था।


 एक बार फिर अपने आवास में देखकर मैं थोड़ा चिंतित हुआ। इस बार वह अकेला था। मैंने उससे कहा कि आपको मारने के लिए कोई खोज रहा है।


यदि उसके लोग यहां हमला कर दें तब तो हम सब मारे जाएंगे। मैं परिवार के साथ रहता हूं।


चेहरे पर निर्भीक भाव के साथ इस बार उसने रिवाल्वर के साथ-साथ हैंड ग्रेनेड भी निकाल कर टेबुल पर रखा।

कहा कि इसमें छह गोलियां हैं। मेरा निशाना खाली नहीं जाता है। उसके बाद यह ग्रेनेड एक भीड़ को रोक लेगा। उसके बाद तो जय भवानी।

  इसके बाद मैंने उससे बातचीत शुरू की। वह सनसनीखेज बातें बताता चला गया। मैं हाथ से  लिख रहा था। क्योंकि तब मेरे पास कोई टेप रिकाॅर्डर भी नहीं था। मुझे यदि इस बात का पक्का भरोसा होता कि यह दूसरी बार मेरे यहां आ ही जाएगा तो मैं किसी मित्र से टेप रिकाॅर्डर मांग कर रख लेता।


 लंबी बातचीत हुई। बातचीत बहुत ही सनसनीखेज थी। वह चला गया।


 इस बीच मैंने जो लिखा था, उसे फेयर किया। तीन काॅपी बनाई। एक काॅपी करीब तीस पेज में थी।


रघुनाथ ने मुझे साथ में छापने के लिए कुछ सनसनीखेज फोटोग्राफ भी दे दिए थे।


मैंने जनसत्ता, रविवार और माया के लिए काॅपियां बनायीं। मुझे आशंका थी कि यह इतना सनसनीखेज है कि जल्दी कोई इसे छापेगा नहीं। एक नहीं छापेगा तो दूसरे को भेजूंगा।


फेयर काॅपी बनाकर मैं रघुनाथ की प्रतीक्षा करने लगा ताकि उस पर रघुनाथ का दस्तखत ले सकूं।


 उधर वह इस बात की प्रतीक्षा कर रहा था कि वह कब छपता है। वह मोबाइल फोन का जमाना था नहीं। मेरे उस परिचित से भी रघुनाथ ने संपर्क नहीं रखा था जो मेरे यहां पहली बार उसे लेकर आया था।


  करीब एक माह बाद रघुनाथ मेरे यहां तीसरी बार आया। इस बार वह थोड़ा गुस्से में था। कहा कि आपने मुझसे इतनी लंबी बातचीत की और कहीं छपा नहीं। ध्यान रहे कि वह बलिया की खास तरह की भोजपुरी में बोलता था। उसमें दबंगियत का लहजा होता है।


 मैंने कहा कि आप दस्तखत कर दीजिए मैं अखबारों को भेज दूंगा। उसने कहा कि लाइए जहां कहिए वहां दस्तखत कर देता हूं। उसने तीनों काॅपियों के करीब सौ पेज पर खुशी-खुशी दस्तखत कर दिये।


 मैंने पहले जनसत्ता और माया को भेजा। जनसत्ता में छपने की मुझे कत्तई उम्मीद नहीं थी। पर चूंकि मैं वहां नौकरी करता था, इसलिए वहां भेजना नैतिक रूप से जरूरी समझा।


पर मैं यह इच्छा रखता था कि वह जनसत्ता में नहीं छपे। दरअसल यह ‘माया’ के स्वभाव वाला आइटम था।

पर संयोग से दोनों जगह शेड्यूल हो गया। जनसत्ता के मैगजिन सेक्सन में बेहतर डिसप्ले के साथ छपा। साथ ही माया ने भी छाप दिया।

 इस पर माया के बाबूलाल शर्मा मुझसे थोड़ा नाराज हुए। उन्होंने मुझे नाराजगी का एक पत्र भी लिखा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जनसत्ता ने पहले ही वाहवाही लूट ली थी। शर्मा जी ने लिखा कि आपको एक ही जगह भेजना चाहिए था।


रघुनाथ के शहर में जनसत्ता ब्लैक में बिका। पचास रुपए में एक काॅपी।


 बाद में प्रभाष जोशी ने मुझे बताया था कि उस इंटरव्यू पर रामनाथ गोयनका भी प्रसन्न थे। गोयनका जी ने कहा था कि ‘पंडत, तुम्हारा पटना वाला आदमी तो बड़ा खरा है।’


इंटरव्यू छपने के बाद रघुनाथ बहुत चर्चित हो गया था। काफी खुश हुआ। मेरे आफिस में आया। पैर छूकर प्रणाम किया। फिर एक सनसनीखेज आॅफर दिया। ‘मैं आपको इसके बदले तो कुछ दे नहीं सकता। पर एक काम जरूर कर सकता हूं। आप जिसे कहिएगा, उस एक आदमी को मैं मार दूंगा।’


मैंने उसे समझाया। कहा कि आप हत्या करना छोड़कर उस माफिया की तरह अब आप भी चुनाव लडि़ए। इंटरव्यू छपने के बाद लोग आपको भी जान ही गए हैं। उसने फिर मेरा पैर छुआ और चला गया।


 पर एक साल के बाद वह फिर मेरे पास आया। तब तक वह एक अन्य माफिया के साथ हो लिया था। उस दूसरे माफिया ने भी 1985 में विधानसभा का चुनाव लड़ा। पर हार गया।


चुनाव के दौरान विजयी उम्मीदवार के लोगों ने माफिया के भाई को मार डाला। उस माफिया ने रघुनाथ से कहा कि विजयी उम्मीदवार को मार दो। उसी के संबंध में मुझसे बात करने रघुनाथ आया था।


बोला कि भइया, आपने तो अब मर्डर करने से मना किया है। पर ‘वह’ कह रहा है कि फलां को मार दो। मैं नहीं चाहता। क्योंकि उस बड़े माफिया का अनुभव खराब है। मैंने उसके कहने पर एक बड़ा मर्डर किया। पर, उसने मुझे सिर्फ ढाई सौ रुपया दिया और कहा कि भाग जाओ और कहीं छिप जाओ। मुझे छिपने के दिनों में बड़ा कष्ट हुआ।


इस मामले में मैं क्या करूं। आपको मैं गुरु मानता हूं।


मैंने उसे कहा कि अब एक बार फिर कहंूगा कि आप यह सब काम छोड़ दीजिए। यह कह कर वह चला गया कि ‘हां, ठीक कहत बार भइया।’ जाते समय उसने फिर मेरा पैर छुआ।


  खैर वाहवाही और अच्छी फिडबैक के साथ-साथ एक संकट भी आ गया। पुलिस ने शूटर रघुनाथ सिंह के उस इंटरव्यू को आधार बना कर एक चर्चित मर्डर केस में एडिशनल चार्जशीट लगा दिया और प्रभाष जोशी और मुझे गवाह बना दिया।


तब तक बिहार में लालू प्रसाद की सरकार बन गयी थी। यह पत्रकार को परेशानी में डालने वाला मामला बना। पटना के पत्रकारों ने इसे इसी रूप में लिया।


 पत्रकारों ने सवाल किया कि पत्रकार का काम रिपोर्ट करना है या कोर्ट जा -जाकर गवाही देना ? हिन्दुस्तान के संवाददाता श्रीकांत के नेतृत्व में पत्रकारों का एक दल लालू प्रसाद से मिला। लालू प्रसाद भी पत्रकारों की बातों से सहमत थे। उन्होंने कहा कि सुरेंद्र जी को बुला कर लाइए।


दूसरे दिन मैं उनके आॅफिस में गया। मुख्यमंत्री ने संबंधित जिले के एस.पी. को मेरे सामने फोन किया। कहा कि बड़े -बड़े पत्रकारों को मरवाओगे क्या ? गवाही देने जाएंगे, माफिया मार देगा। हमारी सरकार की बदनामी होगी। एस.पी. मुश्किल से माना। मैं नहीं जानता कि गवाही देने के मामले में प्रभाष जी की क्या राय थी, पर मैं तो जरूर थोड़ा डरा हुआ था।


पटना के पत्रकार मेरे साथ थे। इससे मुझे नैतिक बल मिला। हालांकि वैसे भी एक सवाल अब भी मेरे दिल को मथता है कि मुझे जान हथेली पर लेकर गवाही देनी चाहिए थी या नहीं! यह सवाल देश भर के पत्रकारों के लिए भी है।


  इस क्रम में एक और छोटी घटना हुई। रघुनाथ जिस नये माफिया के साथ था, उसने रघुनाथ से कहा कि तुम मुझे भी जनसत्ता वाले से मिलवा दो। मेरा भी इंटरव्यू छपना चाहिए।


 रघुनाथ उसे लेकर मेरे एक पत्रकार मित्र के घर पहुंचा। वहां मुझे बुलाया। पहले रघुनाथ ने मुझे अलग हटाकर कहा कि ‘ई हो सरवा चाह ता फोटो छपवाना। मत छपीह भइया।’


 मैं जब उस छोटे माफिया से मिला तो उसने कहा कि मेरा भी इंटरव्यू लीजिए जिस तरह रघुनाथ का लिये थे।

मैंने कहा कि उसने मुझे लिखकर दिया था कि उसने किस- किस को मारा। आप भी दीजिए। छप जाएगा।
वह थोड़ा होशियार निकला। कहा कि यह मैं नहीं कर सकता। फिर मैंने कहा कि तब कैसे छपेगा ? वह चला गया।


(हिंदी दैनिक ‘नया इंडिया’ के 30 अप्रैल 2016 के अंक में प्रकाशित)