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शनिवार, 21 सितंबर 2019

जैन हवाला कांड, कश्मीर के आतंकियों को पहुंचाते थे पैसा



इन दिनों देश भर के जितने बड़े नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के तहत मुकदमे चल रहे हैं, लगभग उतने नेताओं के नाम हवाला घोटाले में नब्बे के दशक में आए थे। यदि हवाला घोटालेबाजों को सजा हो गई होती तो आज के आरोपी और आरोपित नेतागण चेत गए होते।

आज जिनपर मुकदमे चल रहे हैं, यदि उन्हें सजा नहीं होगी तो भविष्य में इस गरीब देश में इससे भी बड़े -बड़े घोटाले-महाघोटाले हो सकते हैं।

आज की कहानी तो सबको मालूम ही है। नई पीढ़ी के लिए हवाला घोटाले की कहानी संक्षेप में -- 

नब्बे के दशक में चर्चित व घृणित जैन हवाला कांड हुआ था। जो जैन बंधु भारत विरोधी विदेशी ताकतों से पैसे लेकर कश्मीर के आतंकियों को पहुंचाते थे, उन्हीं जैन बंधुओं ने उसी पैसों में से इस देश के 115 बड़े नेताओं और नौकरशाहों को भी भारी रकम तब दी थी। लाभुकों में भारत के एक पूर्व राष्ट्रपति, दो पूर्व प्रधानमंत्री, कई पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व—वर्तमान केंद्रीय मंत्री स्तर के अनेक नेता शामिल थे। वह बहुदलीय घोटाला था।

पैसे पाने वालों में खुफिया अफसर सहित 15 बड़े -बड़े अफसर भी थे। आरोप लगा था कि पैसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. ने भिजवाए थे। जिस घोटाले में लगभग सभी प्रमुख दलों के बड़े नेता लिप्त हों, उन्हें सजा कैसे होगी ? नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सी.बी.आई. ने तो हवाला घोटाले की कोई जांच ही नहीं की।

बुधवार, 18 सितंबर 2019

धोखा दे गई छोटी दुकान ?


देश के एक बड़े उद्योगपति ने मनमोहन सिंह के प्रधान मंत्रित्वकाल में कहा था कि कांग्रेस मेरी बड़ी दुकान है और भाजपा छोटी। यानी वे कहना चाहते थे कि जहां से जो चाहूं, निर्णय खरीद सकता हूं। पर, छोटी दुकान ने उन्हें अंततः धोखा दे दिया। 28 मार्च, 2019 को ब्लैक मनी एक्ट के तहत आयकर महकमे ने उन्हें नोटिस भेज  दिया। (इंडियन एक्सप्रेस-14 सितंबर 2019)

उद्योगपति महोदय ने गत मई के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को वोट दे दिया। शायद नोटिस मिलने की प्रतिक्रिया थी। इतना ही नहीं, मतदान केंद्र से बाहर निकलकर उन्होंने मीडिया को बता भी दिया कि मैंने कांग्रेस उम्मीदवार को वोट दिया है।

मैं तो इसके लिए उस उद्योगपति को शाबासी दूंगा। वास्तव में उनकी हिम्मत की सराहना करनी पड़ेगी। अब तक किसी छोटे उद्योगपति ने भी सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा था कि उसने प्रतिपक्षी दल को वोट दिया है। या फिर उस बड़े उद्योगपति का 2019 के चुनाव नतीजे के बारे में पूर्वानुमान गलत निकला?

सोमवार, 16 सितंबर 2019

जमानत और जेल झेल रहे नेताओं की और भी बढ़ेगी



इस देश में जमानत और जेल झेल रहे नेताओं की संख्या ने पिछले सारे रिकाॅर्ड तोडे़ यह संख्या और भी बढ़ेगी।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल रांची में कहा कि ‘हमारा संकल्प है जनता को लूटने वालों को उनकी सही जगह पहुंचाने का। इस पर काम हो रहा है। कुछ लोग चले भी गए हैं। खुद को कानून से ऊपर मानने वाले बेल के लिए चक्कर काट रहे हैं।’

मोदी की यह पहल सराहनीय है। यह आज की जरुरत है। भ्रष्टाचार के आरोप में आज इस देश के जितने नेता लोग जेल में हैं या जमानत पर हैं, उतने इससे पहले कभी नहीं थे। इससे देश की अधिकतर जनता खुश है। क्योंकि अपवादों को छोड़कर अधिकांश लोगों को यह लगता है कि नेताओं-अफसरों-व्यापारियों के एक बड़े हिस्से के भीषण भ्रष्टाचार के कारण ही अपना देश अब भी गरीब है।

भ्रष्टाचारी लगभग सभी दलों में हैं। कुछ में अधिक तो कुछ में कम। यह अच्छी बात है कि अपवादों को छोड़ कर अदालतें भी बहुत अच्छे ढंग से अपना काम रही हैं।

आज भ्रष्टाचार और आतंकवाद देश के सामने सबसे बड़े मुद्दे हैं। ‘नकली समाजवाद’ और ‘फर्जी धर्मनिरपेक्षता’ के नारे बेअसर हो चुके हैं। जिन लोगों ने इसे मुख्य मुद्दा बनाया, वे चुनाव हारे।
ऐसा कई बार हो चुका है कि चुनावों में अधिकतर जनता के दिल ओ दिमाग में कुछ अन्य बातें होती हैं, पर कुछ नेता व दल किसी अन्य दिशा में उसे हांकना चाहते हैं। हालांकि वे फेल कर जाते हैं।


1971 चुनाव- इंदिरा गांधी ने 1969 में गरीबी हटाओ का नारा दिया। अधिकतर लोगों को अच्छा लगा। पर तब प्रतिपक्ष कह रहा था कि इंदिरा एकाधिकारवाद की ओर जा रही है। चुनाव में इंदिरा गांधी जीत गईं।

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1977-अधिकतर लोग इमरजेंसी के अत्याचारों से पीडि़त थे। पर कांग्रेस के पास कुछ और ही नारे थे। जैसे--अनुशासन ही देश को महान बनाता है आदि—आदि.....। उस चुनाव में सी.पी.आई. चुनाव सभाओं में कह रही थी कि अमेरिका दियागो ग्रासिया द्वीप में सैन्य अड्डा बना रहा है। वह आज सबसे बड़ी समस्या है।

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2019--कांग्रेस के राहुल गांधी का नारा था-‘चौकीदार चोर है।’

दूसरी ओर जनता देख रही थी कि मोदी सरकार तो एक -एक करके अनेक बड़े—बड़े चोरों के खिलाफ ही कार्रवाई कर रही है। मोदी मंत्रिमंडल का कोई सदस्य किसी घोटाले में नहीं पड़ा।
नतीजतन 2019 के लोकसभा चुनाव का नतीजा सामने हैं। आगे भी क्या होगा,उसके संकेत अभी से मिल रहे हैं।

पुनश्चः-

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हां, आज के प्रतिपक्ष की एक शिकायत जायज लगती है। यह कि क्या भ्रष्ट सिर्फ गैर राजग दलों में ही हैं? इस शिकायत की पृष्ठभूमि में मोदी सरकार का यह कर्तव्य है कि वह अपने दल व जमात के भ्रष्टों के खिलाफ भी उतनी गंभीरता से कार्रवाई करे। यदि वह नहीं करती है तो गैर भाजपा दल के बड़े- बड़े वकीलगण डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी की राह पर चलकर उन्हें जेल भिजवाएं।

मंगलवार, 4 जून 2019

दारोगा की अपार ताकत

राष्ट्रीय सहारा के अनुसार, बिहार के डी.जी.पी. गुप्तेश्वर पांडेय रविवार देर शाम पटना के एसएसपी कार्यालय पहुंचे। बढ़ते अपराध पर चिंता प्रकट की। पुलिसकर्मियों से कहा कि ‘सुधर जाइए, वरना कार्रवाई के लिए तैयार रहिए।’

उन्होंने चेताया कि शराब, बालू और भूमि माफिया से साठगांठ रखने वाले पुलिसकर्मियों और पदाधिकारियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। डी.जी.पी. बनने के बाद पांडेय जी दूसरी बार एसएसपी आफिस गए थे। शायद इसी काम के लिए उन्हें तीसरी बार भी जाना पड़े!

यह खबर पढ़कर मुझे एक साथ कई घटनाएं याद आ गईं और पुलिसकर्मियों खासकर दारोगा की अपार ताकत भी।

आजादी से पहले की बात है। कहानी मेरे पुश्तैनी गांव के थाने यानी सारण जिले के परसा थाने की है। बचपन में सुना था कि उस थाने के निवासी दुनिया राय ने अपने पुत्र का नाम दारोगा प्रसाद राय रखा। वे चाहते थे कि उनका बेटा बड़ा होकर दारोगा बने। पर, बाद में तो दारोगा बाबू मुख्यमंत्री तक बने। 

इस बात का पूरा रहस्य तब पता चला जब अस्सी के दशक में मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ‘बिहार में दारोगा राज है।’ जबकि, आजाद जी खुद एक बड़े कड़क नेता थे।

नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण के स्थानीय संपादक दीनानाथ मिश्र ने उन्हीं दिनों एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था -‘डीजीपी हारा, दरोगा जीता।’ एक बार बिहार के एक अन्य मुख्यमंत्री ने भी कहा था कि थाने के भ्रष्टाचार को खत्म नहीं किया जा सकता।

सवाल सिर्फ बिहार का ही नहीं है। कई साल पहले केंद्रीय गृह संचिव रहे एक अफसर ने कहा था कि होम मिनिस्टर की इस बात में भी रूचि रहती थी कि दिल्ली के किस पुलिस थाने में किसे एस.एच.ओ बनाया जाए।

सड़कों पर भारी अतिक्रमण से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कई महीने पहले पटना हाईकोर्ट ने जक्कनपुर के थाना प्रभारी से पूछा था कि अतिक्रमण करवाने से आपको कितनी ऊपरी आय हो जाती है ? हाईकोर्ट की उक्त टिप्पणी के बावजूद आज पटना में अतिक्रमण का हाल जस का तस है। बल्कि बढ़ ही रहा है।

डी.जी.पी. फटकार ही रहे हैं। मुख्यमंत्री भी समय -समय पर चिंता प्रकट करते ही रहते हैं। फिर आखिर कौन से ‘अदृश्य निर्मल बाबा’ हैं जो थानेदारों पर लगतार कृपा पर कृपा बरसाते जा रहे हैं ?!

एक और कहानी सारण जिले की ही। डा.राजेंद्र प्रसाद जब राष्ट्रपति बने तो उनके गांव की एक महिला से किसी ने कहा था कि वे बहुत बड़े आदमी बन गए हैं। इस पर उस महिला ने भोजपुरी में सवाल किया कि ‘का दारोगा बन गईल बाड़ें ?’

जून 2019

रविवार, 10 जून 2018

अखिलेश बंगला : जैसे विदेशी लुटेरे ने बेरहमी से लूटा हो ...

सपा के एम.एल.सी. सुनील यादव ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के कहने पर अखिलेश जी के बंगले में तोड़फोड़ हुई है।

उधर उस टूटे- फूटे बंगले की वीडियो रिकॉर्डिंग को कुछ देर के लिए  यह लगता है कि किसी विदेशी लुटेरे की बेरहम लूट की तरह ही भारत की इस संपत्ति को नष्ट-भ्रष्ट किया गया है। मानो इस महल में किसी गड़े खजाने की खोज हो रही हो!

दरअसल यह सब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के परिणामस्वरूप सामने आया है। यदि सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा आदेश नहीं दिया होता तो न तो पूर्व मुख्यमंत्री लोग सरकारी आवास खाली करते और न ही अपनी खींझ बंगले पर उतारते। पता लगाया जाना चाहिए कि किसी अन्य पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले से भी कोई सामान गायब हुआ है या नहीं।

यह तोड़फोड़ दरअसल सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मुंह चिढ़ाने के लिए की गयी है। यह अदालत की अवमानना है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि एक विशेष जांच दल बनाकर इसकी जांच कराए। साथ ही सपा नेता सुनील यादव के आरोप की भी जांच हो कि इसमें मुख्यमंत्री या उनके अफसरों का तो कोई हाथ नहीं !

जांच से दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

अन्यथा सुप्रीम कोर्ट को भविष्य में ऐसा कोई आदेश देने के पहले सोच लेना चाहिए ताकि सरकार यानी जनता के 48 करोड़ रुपए का नुकसान न हो। या फिर सुप्रीम कोर्ट अगली बार से अदालत के कमिश्नर की निगरानी में ऐसे बंगले खाली कराए ताकि कोई राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उस नेता को बदनाम न कर सके जैसा आरोप अखिलेश यादव लगा रहे हैं। 

10 जून 2018

शुक्रवार, 8 जून 2018

भारत के ये भ्रष्ट गिद्ध अफसर, हिन्दू शरणार्थियों से लेते हैं घूस


केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक वरीय सचिवालय सहायक को हाल में जोधपुर के एक होटल से गिरफ्तार किया गया। उसपर पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों से रिश्वत लेने का आरोप है।

मनमोहन सरकार ने पाक में ‘जेहादियों’ के सितम से परेशान होकर भारत में आए 12 हजार 100 हिंदू शरणार्थियों को लंबी अवधि के लिए वीसा दिया था। वे राजस्थान में बसे हुए हैं। तब से यह काम जारी है। क्योंकि नये शरणार्थी भी आते रहते हैं। इसके लिए केंद्र सरकार के अफसर राजस्थान जाते रहते हैं। उनमें से कुछ अफसर उन दीन-हीन-बेबस-परेशान शरणार्थियों का काम भी तभी करते हैं जब उन्हें रिश्वत मिलती है।

इन भ्रष्ट गिद्धों को किस्मत के मारे शरणार्थियों पर भी कोई दया नहीं आती। जब उनपर भी दया नहीं आती तो यहां के लोगों के साथ ये गिद्धगण कैसा व्यवहार करते हैं, उनकी कल्पना आसान है। लोगबाग देख ही रहे हैं। झेल भी रहे हैं। दरअसल इस पूरे देश भर के भ्रष्ट अफसरों व कर्मचारियों का कमोवेश यही हाल है। अधिकतर सरकारी सेवक, सेवा को अधिकार मानकर सरकारी आदेशों को बेचते रहते हैं।

बिहार सहित देश के किस हिस्से के अधिकारी-कर्मचारी बिना रिश्वत का जनता का काम निःशुल्क कर देते हैं, यह जानने में मुझे रुचि रहती है।
किसी को उस पवित्र स्थान का पता हो तो लोगों को जाकर वहां फूल चढ़ाना चाहिए। क्योंकि मैं मानता हूं कि ईमानदार अफसर व कर्मचारी अब भी जहां -तहां मौजूद हैं। सत्ताधारी नेताओं के बीच भी कुछ ईमानदार लोग हैं। पर वे आम तौर पर निर्णायक नहीं हो पा रहे हैं।

जोधपुर की घटना सुन-जानकर एक बार फिर यह विचार मन में आया कि क्यों नहीं इस देश के आदर्शवादी और उत्साही नौजवान अखिल भारतीय स्तर पर स्टिंग आपरेशन दस्ते बना रहे हैं ? वे दस्ते ऐसे भ्रष्ट कर्मियों का स्टिंग करें और जनता के बीच उनका भंडाफोड़ करें? अब तो सोशल मीडिया भी ताकतवर होता जा रहा है।

इस काम में खतरा तो जरूर है। पर आज यदि कोई ईमानदारी से राजनीति भी करता है तो उसमें भी खतरा है। आर.टी.आई. कार्यकर्ताओं की हत्याओं की खबरें भी मिलती रहती हैं। फिर भी सूचना के अधिकार के क्षेत्र में काम बंद नहीं हुआ है। 

आजादी की लड़ाई के दिनों में क्या स्वतंत्रता सेनानियों के समक्ष कम खतरे थे ? मेरा मानना है कि इस स्टिंग आपरेशन के काम में जो लोग ईमानदारी से लगेंगे और बने रहेंगे तो उन्हें देर- सवेर जनता हाथों- हाथ लेगी। यदि वे चुनावी राजनीति भी करना चाहेंगे तो वंशवादी, जातिवादी, सम्प्रदायवादी तथा धन पशु उम्मीदवारों को भी देर -सवेर वे मात दे सकते हैं। 

मंगलवार, 5 जून 2018

सरकारी रिश्वत -तंत्र पर अब तक का सबसे बड़ा हमला होगा !

कल्पना कीजिए कि जिला परिवहन कार्यालय का कोई दूत आपके दरवाजे पर जाकर कहे कि ‘लीजिए अपना ड्राइविंग लाइसेंस, जिसके लिए आपने आवेदन किया था।’ उस समय आपको कैसा लगेगा ?

जाहिर है कि उसे आपके घर आकर देना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में  रिश्वत की चर्चा नहीं होगी। अभी तो ऐसा माना ही जाना चाहिए। सरकार का उद्देश्य भी यही है। शायद आपको यह कल्पना लोक की बात लगेगी। पर दिल्ली सरकार ने इसी जुलाई से ऐसा ही करने का निर्णय किया है।

न सिर्फ ड्राइविंग लाइसेंस बल्कि इस तरह की 39 अन्य सरकारी सेवाएं आम लोगों के दरवाजे तक पहुंचेंगी। अगले फेज में अन्य सेवाएं भी इससे जुड़ेंगी। यदि सफल हुई तो यह पहल अन्य राज्यों के लिए नमूना बन सकती है।

अब देखना है कि इस निर्णय को दिल्ली सरकार कितनी सफलता से लागू करा पाएगी ! क्योंकि यह सरकारी रिश्वत -तंत्र पर अब तक का सबसे बड़ा हमला होगा। उस तंत्र के लोग इस देश में बहुत ताकतवर हैं। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री से भी अधिक ताकतवर। 

यह प्रस्ताव जब केजरीवाल सरकार ने गत साल उप राज्यपाल को भेजा तो उन्होंने इस पर फिर से विचार करने के लिए कहा। कहा कि इनमें से 35 सेवाएं तो पहले से ही ऑनलाइन उपलब्ध हैं। पर राज्य सरकार ने दोबारा भेजा तो उन्होंने मंजूरी दे दी।

अब होम डिलवरी के लिए प्राइवेट पार्टी का चयन हो रहा है। फिलहाल जो सेवाएं मिलेंगी, उनमें जाति प्रमाण पत्र, जन्म, मृत्यु प्रमाण पत्र, विवाह निबंधन, आय, आवास प्रमाण और वृद्धावस्था पेंशन आदि। 

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

नेता से पत्रकार ने 5 करोड़ रुपए ठग लिए !

कई साल पहले दिल्ली के एक बहुत बड़े पत्रकार ने एक राज की बात मुझे बताई थी। उस पत्रकार से पंजाब के एक बहुत बड़े नेता ने एक शिकायत की थी। नेता ने कहा था कि मुझसे दिल्ली के एक बहुत बड़े पत्रकार ने 5 करोड़ रुपए ठग लिए।

मुझे तब लगा था कि किसी के पास पांच करोड़ रुपए ठगवाने के लिए आते कहां से हैं ? मैं  अनुमान के घोड़े दौड़ाने  लगा। पंजाब में खेती बहुत अच्छी होती है।
घूसखोरी भी बहुत है। बाद में सुना कि वहां ड्रग्स के करोबार में भी बहुत पैसे हैं।

पर, वह नेता ड्रग्स के धंधे में  नहीं रहा। मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका। बात यह भी है कि बहुत रिश्क उठा कर इन तरीकों से कमाए जाते हैं। कोई उन पैसों में से पांच करोड़ क्यों किसी को यूं ही दे देगा ?

पर मैंने जब कैप्टन अमरेंद्र सिंह के दामाद के बैंक घोटाले की कहानी पढ़ी तो  राज समझ गया। यानी किसानों के नाम पर बैंकों से करोड़ों  उठा लो और अधिक खुद रखो और कुछ ऐसे लोगों में बांट दो जिनके मुंह, कलम और कैमरे बंद कर देने की जरूरत महसूस हो।

इसलिए कि बैंकों के पैसे लौटाने की जरूरत तो है नहीं।अधिक कड़ाई हो तो विदेश भाग जाओ।कदम- कदम पर मदद के लिए लोग इस देश में मौजूद रहते ही हैं ।हमेशा रहे हैं।

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि कैप्टन के दामाद ने उस पत्रकार को पैसे दिए होंगे। पर जब बैंकों को इस तरह लूटने की छूट उपलब्ध है तो इस काम में सिर्फ अमरेंद्र के दामाद ही नहीं लगे होंगे !
कोई अन्य भी हो सकता है।


गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

भ्रष्टाचारियों से सार्वजनिक धन बचाने की समस्या

मेरी समझ से भ्रष्टाचार इस गरीब देश की सबसे बड़ी समस्या है। इसी समस्या से अन्य अनेक तरह की समस्याएं पैदा होती रहती  हैं।

मैं 1967 से लगातार सरकारों और नेताओं को कभी नजदीक और कभी दूर से देखने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं।पहले राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप में और बाद में पत्रकार की भूमिका  में।

भ्रष्टाचारवाद यानी पैसावाद यानी धन लोलुपतावाद  ने सभी राजनीतिक विचारधाराओं और वादों को लगभग पछाड़ दिया है।यदि यह जारी रहा तो भविष्य में भ्रष्टाचार और भी घृणित खेल दिखाएगा।

अपवादस्वरूप कई ईमानदार नेताओं को भी देखा है,पर पूरी व्यवस्था में आम तौर पर वे कारगर नहीं हो पाते।क्योंकि वे अल्पमत में होते हैं। चूंकि हर जाति और समुदाय में अच्छे -बुरे लोग हैं,इसीलिए भ्रष्ट लोगों में भी हर जाति और समुदाय के लोग हैं।

आम लोगों में से जो लोग अपनी अगली पीढि़यों के लिए एक बेहतर देश और समाज छोड़कर जाना चाहते हैं,उन्हें मेरी राय में एक काम जरूर करना चाहिए। राष्ट्री स्तर पर  और हर राज्य के पांच सबसे भ्रष्ट नेताओं की पहचान कर उनके खिलाफ अभियान चलाना चाहिए।और इसी तरह पांच सबसे कम भ्रष्ट या ईमानदार नेताओं को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि वे जनहित में और भी अच्छे काम कर सकें।

यदि ऐसा हुआ तो बीच के नेता खुद ही सबक ले लेंगे। यदि नेता सुधर गए तो उसका असर ब्यूरोक्रेसी और अर्थ जगत पर भी पड़ेगा।

 दरअसल ब्यूरोक्रेसी घोड़ा है और सत्ताधारी नेता सवार। सत्ताधारी जमात  किसी भ्रष्ट अफसर को सजा दे सकती है,पर कोई अफसर किसी भ्रष्ट मंत्री को उसके पद से नहीं हटा सकता।

भ्रष्टाचार नामक गंभीर बीमारी के कुछ प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं-

1.-सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि भ्रष्टाचार तो विश्व व्यापी है,इसलिए यदि इस देश में भी है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।उन्होंने यह भी कहा था कि मेरे पिता संत थे,पर मैं पालिटिशियन हूं।

2.-अस्सी के दशक में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि दिल्ली से सौ पैसे चलते हैं,पर उसमें से गांव में जनता तक सिर्फ 15 पैसे ही पहुंचते हैं। 85 पैसे बिचैलिए खा जाते हैं।

3.-नब्बे के दशक में जैन हवाला कांड हुआ था।कम्युनिस्टों को छोड़ कर लगभग सभी दलों के दर्जनों नामी -गिरामी  नेताओं ने हवाला कारोबारियों से रिश्वत ली।वही हवाला कारोबारी कश्मीरी आतंकवादियों को भी पैसे पहुंचाते थे।उन्हें नेताओं का संरक्षण चाहिए था,इसलिए उन्होंने रिश्वत दी थी। नेताओं को मिली अधिकत्तम राशि 10 करोड़ और न्यूनत्तम राशि 25 हजार रुपए थी। लाभान्वितों में एक पूर्व प्रधान मंत्री और कई पूर्व व वर्तमान केंद्रीय मंत्री शामिल थे।

सी.बी.आई.ने इस केस को रफा -दफा कर दिया।करना पड़ा क्योंकि इतने बड़े नेताओं पर वह कैसे कार्रवाई करती।सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में मन मसोस कर रह गया।

4.-कोई भी राजनीतिक दल आज चुनाव आयोग को अपने राजनीतिक चंदे का पूरा हिसाब देने को तैयार नहीं है।अधूरा देते हैं।यहां तक कि कम्युनिस्ट पार्टियां भी पूरा हिसाब नहीं देतीं।आखिर क्यों भाई ?

 5.-हमारे देश के प्रभावशाली नेतागण सांसद क्षेत्र विकास फंड को बंद करने के लिए तैयार नहीं हैं जबकि प्रशासनिक सुधार आयोग इसे खत्म करने की बहुत पहले सिफारिश कर चुका है।यह फंड राजनीति को दूषित करने वाला एक प्रमुख कारक बना हुआ है। 

6 - इस  देश के अधिकतर सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों के लिए दवाएं और रूई -पट्टी तक उपलब्ध नहीं है क्योंकि सरकार के पास पैसे नहीं हैं। गरीब लोग एम्बुलेंस के अभाव में अपने परिजन की लाश  ठेला और कंधे पर ढोकर ले जाने को मजबूर हैं। क्योंकि एम्बुलेंस खरीदने के लिए सरकार के पास  पैसे नहीं हैं।पर यहां  के सासंद अपने वेतन-भत्ते खुद ही बढ़ा लिया करते हैं । जहां के अधिकतर नेतागण गरीब जनता की मूलभूत समस्याओं के प्रति भी ऐसे संवेदनहीन हों,वहां भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या होगी ही।
          अब तो आम लोगों के पास भी सोशल मीडिया की ताकत उपलब्ध है। उन्हें जाति ,सम्प्रदाय और विचारधारा से ऊपर उठकर भ्रष्टाचार के राक्षसों को पहले पराजित करने की कोशिश करनी चाहिए।इस बात की परवाह किए बिना कि वे सफल होंगे या नहीं।  भले सफल नहीं हुए, पर 1857 में इस देश के बहादुर लोगों ने विदेशी ताकतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी न !
         भ्रष्टाचारियों के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ लड़ाई पूरी हो जाने के बाद  फरिया लीजिएगा कि इस देश में समाजवादी व्यवस्था चलेगी ,साम्यवादी व्यवस्था या पूंजीवादी।
        अभी तो भ्रष्टाचार के गिद्धों के चंगुल से देश के संसाधनों को बचाने की समस्या प्रमुख है।इसे बचाने की ईमानदार कोशिश नहीं करने पर अगली पीढि़यां हमें माफ नहीं करेंगी। 

रविवार, 9 जुलाई 2017

कहां से चले थे कहां पहुंच गए लालू!

लोकसभा में 2013 में लोकपाल विधेयक पर चर्चा के दौरान उस विधेयक का विरोध करते हुए लालू प्रसाद ने कहा था कि यदि राजनीतिक दलों ने व्हीप जारी नहीं किया होता तो लोकपाल बिल के पक्ष में पांच प्रतिशत सांसद भी वोट नहीं देते। लोकपाल को नेताओं के लिए फांसीघर मानने वाले लालू प्रसाद ने संभवतः अनेक सांसदों से व्यक्तिगत बातचीत के आधार पर ही ऐसा कहा था। इसीलिए तब सदन में उपस्थित किसी सदस्य ने खड़ा होकर लालू की बात का खंडन नहीं किया। लोकपाल विधेयक के खिलाफ लालू प्रसाद जब बोल रहे थे तो सदन में उपस्थित अधिकतर सांसदों के हाव भाव व प्रतिक्रियाओं से भी यह लग रहा था कि लालू प्रसाद को उन लोगों का भीतरी समर्थन प्राप्त है।

  यानी 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद भ्रष्टाचार के प्रति लालू प्रसाद ने जो अपना कठोर रुख प्रदर्शित किया था, 2013 आते आते वह लालू पूरी तरह बदल चुके थे।


    1992 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने इन पंक्तियों के लेखक से बातचीत में कहा था कि ‘भ्रष्ट और माफिया तत्वों के ऊपर मैंने प्रहार किया है। वे तत्व चूं भी नहीं कर सके। वे मेरे सामने भी नहीं आए। कोई पैरवी भी नहीं आई। पहले के राज में मजाल था कि किसी पर आप एक्शन कर लेते ? वे तत्व पिछले मुख्यमंत्रियों की छाती पर चढ़ जाते थे। जब चीफ मिनिस्टर ही उसमें संलग्न रहेगा तो वह आंख कैसे तरेरेगा ?’


  अपने मुख्य मंत्रित्वकाल के प्रारंभिक दिनों में लालू प्रसाद न सिर्फ सामाजिक अन्याय के मामले में, बल्कि भ्रष्टाचार के मामले में भी कठोर दिखाई पड़ते थे। 1990 के मंडल आरक्षण आंदोलन के दौरान तो लालू ‘मंडल मसीहा’ भी कहलाए। तब बिहार के पिछड़ा वर्ग के अधिकतर लोग उन्हें अपना नेता मानने लगे थे।


पर आज क्या हो रहा है ? आज लालू प्रसाद करीब- करीब हर मामले में यथास्थितिवादी नजर आ रहे हैं। लगता है कि मसीहा भटक गया है। उसी भटकाव की सजा उन्हें आज मिल रही है।


उनकी यथास्थितिवादिता लोकपाल विधेयक पर उनकी टिप्पणी से साफ हो गयी थी। कई कारणों से समय के साथ लालू प्रसाद पूरे पिछड़ोंं के नेता भी अब नहीं रहे।


आज जो कुछ उनके साथ हो रहा है, उसके लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है। खुद  और अपने पूरे परिवार के चारों ओर येन केन प्रकारेण आर्थिक सुरक्षा की ऊंची  और मजबूत दिवाल खड़ी करने के लोभ में उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ गया है। इससे उनके अनेक समर्थकों में भी उदासी है।


 लालू प्रसाद कभी कहा करते थे कि विषमताओं और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ कोई आंदोलन इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि पोथी -पतरा उसमें बाधक है। पोथी - पतरा वाले गरीबोंं को समझा देते हैं कि भगवान की वजह से ही तुम गरीब हो।


पर, अब लालू प्रसाद ही नहीं, बल्कि  उनके परिजन भी जब मुकदमों में फंसे तो पोथी-पतरा का विरोध छोड़कर खुद मंदिरों के चक्कर लगाने लगे हैं। पर उन्हें न तो कोर्ट से राहत मिल रही है और न ही मंदिरों से।


खुद लालू प्रसाद नब्बे के दशक में कहा करते थे कि ‘लाख करो चतुराई करम गति टारत नाहीं टरै’ यह सब अब चलने वाला नहीं है। पर अब खुद लालू परिवार पर यह कहावत लागू हो रही है।


लालू प्रसाद ने 1990 में मंडल आरक्षण के विरोधियों के खिलाफ बड़ी हिम्मत से संघर्ष किया था। याद रहे कि आरक्षण एक संवैधानिक प्रावधान था जिसका तब नाहक विरोध हो रहा था। उस संघर्ष में जीत के बाद पूरे पिछड़े वर्ग में लालू प्रसाद की प्रतिष्ठा काफी बढ़ी थी। उतना समर्थन बिहार में किसी अन्य नेता को नहीं मिला था। अनेक लोंगों का यह मानना है कि बाद के वर्षों में यदि लालू प्रसाद अपने परिवार की ‘आर्थिक सुरक्षा के इंतजाम’ के काम में नहीं लग गए होते तो गांव -गांव में उनकी मूर्तियां लगतीं। हालांकि अब भी उनके समर्थकों की कमी नहीं हैं। पर पहले जैसी बात नहीं है।


भ्रष्टाचार के मामले में किसी नेता के खिलाफ जब कोई कानूनी कार्रवाई होती है तो वह आरोप लगा देता है कि राजनीतिक बदले की भावना से ऐसा हो रहा है। लालू प्रसाद इसके साथ यह भी कह रहे हैं कि यह पिछड़ों पर हमला है।


पर यह तर्क शायद ही चले। पहले भी नहीं चला था। चारा घोटाले में जब 1997 में पहली बार लालू प्रसाद जेल गए तो भी यही तर्क उनकी ओर से दिया गया था। पर 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू के दल का बहुमत समाप्त हो गया था। जबकि 1995 में उन्हें बहुमत मिला था।


अब तो उन्हें कोर्ट का ही सहारा होगा। इसलिए कि लालू परिवार को राजनीतिक मदद मिलती नहीं दिख रही है जैसी मदद मुलायम सिंह यादव तथा इस देश के  कुछ दूसरे नेताओं को मिलती रही। देखना होगा कि कोर्ट से लालू प्रसाद और उनके परिजनों को किस तरह का न्याय मिलता है।


वैसे लालू परिवार पर आरोपों की लंबी सूची देखकर यह जरूर कहा जा सकता है कि परिवार का राजनीतिक भविष्य अभी तो अनिश्चित नजर आ रहा है। बाद में भले जो हो!


हां, यदि इसी तरह के आरोपों से घिरे देश के किन्हीं भाजपा नेताओं पर भी जब केंद्रीय एजेंसियां इसी तरह की कार्रवाई नहीं करंेगी तो वह दोहरा मापदंड भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से जरूर महंगा पड़ सकता है। 


शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

अपराध के खिलाफ भी हो सर्जिकल स्ट्राइक

झारखंड से एक अच्छी खबर आई है। मीट सप्लायर की हत्या के आरोप में भाजपा सरकार की पुलिस ने एक भाजपा नेता को गिरफ्तार कर लिया  है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कड़े रुख के बाद यह कदम उठाया गया है। बिगड़े सांप्रदायिक माहौल में ऐसी गिरफ्तारी शांतिप्रिय लोगों को सुकून देने वाली खबर है। पर लोगों को पूरा सुकून तभी मिलेगा जब आरोपी के खिलाफ ईमानदारी से सबूत जुटाए जाएं और अदालत से यथाशीघ्र उसे वाजिब सजा भी दिलवा दी  जाए।

याद रहे कि गत 29 जून को रामगढ़ में बीफ के शक में भीड़ ने मांस से भरे वैन को जला दिया। ड्राइवर अलीमुद्दीन की पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी। इस तरह की छिटपुट खबरें पूरे देश से आती रहती हंै। कुछ हत्याओं के पीछे ‘भावनाएं’ रहती हैं तो कुछ अन्य के पीछे सिर्फ आपराधिक प्रवृत्ति। कुछ घटनाओं में दोनों तत्व एक साथ विराजमान होते हैं।

वैसे अधिकतर मामलों में सांप्रदायिक दंगाइयों का मनोबल भी इसीलिए बढ़ा रहता है क्योंकि वे समझते हैं कि उन्हें अंततः कोई न कोई सत्ताधारी बचा ही लेगा। कुछ मामलों में ऐसे दंगाइयों की इच्छा पूरी हो भी जाती है। कुछ अन्य मामलों में उन्हें सजा भी मिल जाती है।

जिन मामलों में ऐसे जघन्य अपराधी सजा से बच जाते हैं, उसके पीछे इस देश की लचर कानून-व्यवस्था भी है। समस्याओं के अनुपात में न्यायिक प्रक्रिया और प्रणाली भी नाकाफी साबित हो रही हैं।

राजनीति के अपराधीकरण और सांप्रदायीकरण के इस दौर में अनेक मामलों में तरह -तरह के नेतागण तरह -तरह के रंगों के सांप्रदायिक तत्वों को सजा से बचाने की कोशिश करते रहते हैं। वैसे इस देश में जब कभी जहां कानून का शासन कड़ाई से लागू करने की कोशिश हुई, वहां हर तरह के अपराधी चूहों के बिल में छिप गए। अपवादों की बात और है।

सन् 2006 -10 तथा बाद के भी कुछ वर्षों में बिहार में ऐसा ही कुछ हुआ था। कानून -व्यवस्था की मशीनरी तब अपना काम कर रही थी। तब न सिर्फ सामान्य अपराधियों और माफियाओं की जान सांसत मंे थी, बल्कि सांप्रदायिक उन्मादी और माओवादियों की सक्रियता भी घटी थी।

यदि झारखंड की ताजा गिरफ्तारी की तरह ही पूरे देश में ऐसे लोगों को उनकी उचित जगह पर पहुंचा दिया जाए तो सन 2006-10 वाली बिहार की स्थिति पूरे देश में कायम हो सकती है। हालांकि यहां यह कहना जरूरी है कि बिहार में भी अब 2006-10 वाली स्थिति नहीं रह गयी है। चाहे अपराध के आंकड़े जो कुछ कह रहे हों।

दरअसल कानून-व्यवस्था को लेकर आजादी के बाद से ही लापरवाही बरती गयी। हालांकि उत्तराधिकार के रूप में हमें अंग्रेजों की दी हुई एक चुश्त सरकारी मशीनरी मिली थी।

आजादी के बाद कुछ सत्ताधारी नेताओं के स्वार्थ और लापरवाही भी सामने आने लगी। इसके बावजूद जब तक उस चुस्त मशीनरी को काम करने दिया गया तब तक तो कानून -व्यवस्था लगभग ठीक- ठाक ही रही। पर जब पुरानी पीढ़ी के आदर्शवादी नेता और कार्यकर्ता एक- एक कर गुजरने लगे तो मशीनरी को भी धीरे -धीरे प्रदूषित कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के लिए सरकार को कई साल पहले निर्देश दे रखा है। पर वह कहीं लागू नहीं हो रहा है। ऐसी घटनाओं से चिंचित प्रधानमंत्री पुलिस सुधार को लागू करने का प्रयोग करने की हिम्मत जुटाएं तो शायद उन्हें सांप्रदायिक और उन्मादी तत्वों के साथ -साथ आर्थिक अपराधियों से भी लड़ने में सुविधा होगी।
वैसे आजादी के तत्काल बाद की कुछ घटनाओं को यहां नमूने के तौर पर गिनाना मौजूं होगा। उन घटनाओं के बारे में जान कर यह लगता है कि तत्कालीन सत्ताधारी नेताओं ने अपनी कमजोरी दिखाई थी। यदि तब ताकतवर अपराधियों के प्रति भी बेरहमी दिखाई गयी होती तो शायद इस देश में कानून -व्यवस्था की स्थिति इतनी नहीं बिगड़ती जितनी आज बिगड़ी हुई है। 

आज तो देश के किसी भी हिस्से में सड़क पर किसी निजी गाड़ी में थोड़ी भी खरोंच लग जाने पर भी लोग एक-दूसरे को मरने -मारने पर उतारू हो जाते हैं। क्योंकि उन्हें कानून का भय नहीं है। विजय माल्या ही नहीं, बल्कि सड़क पर किसी को मारने पर उतारू व्यक्ति भी यह समझ रहा है कि उन्हें अंततः कोई न कोई सत्ताधारी व्यक्ति बचा ही लेगा। या फिर गवाहों को खरीद कर या फिर जांच अधिकारी को ‘खुश’ करके वह सजा से बच जाएगा।

इस बीच दुनिया के कई सभ्य देशों से अलग-तरह की कहानियां आती रहती हैं। किसी देश के राष्ट्रपति की अल्पवयस्क बेटी शराब पीने के आरोप में दंडित हुई तो कहीं प्रधानमंत्री का बेटा किसी अन्य अपराध में आरोपित हुआ। पर इस देश में जब भी कोई नेता किसी जघन्य अपराध में भी जांच एजेंसी की गिरफ्त में आता है तो वह तथ्यों पर बात करने के बजाए राजनीतिक और भावनात्मक बयान देने लगता है। जोर -जोर से कहने लगता है कि उसके खिलाफ बदले की भावना से काम हो रहा है। फिर सरकार बदलते ही उस पर से केस उठा लिए जाते हैं या कमजोर कर दिए जाते हैं। अपवादों की बात और है।

नतीजतन इस देश में अन्य तरह के अपराधों में लिप्त लोगों का भी मनोबल बढ़ जाता है। ताजा आंकड़ों के अनुसार ंइस देश में सिर्फ 45 प्रतिशत आरोपितों को ही अदालतों से सजा मिल पाती है। जबकि अमेरिका में यह प्रतिशत 93 और जापान में 99 है।

आजादी के तत्काल बाद के सत्ताधारी नेतागण शुरुआती दौर में ही इस मामले में कठोर रुख अपना सकते थे। पर उन्होंने कैसा रुख अपनाया, उसके कम से कम तीन उदाहरण यहां पेश हंै।

पहली घटना बिहार से। पचास के दशक की बात है। एक सत्ताधारी विधायक सीवान से सड़क मार्ग से पटना जा रहे थे। रास्ते में दिघवारा पड़ता है जहां रेलवे क्राॅसिंग है। ट्रेन आने वाली थी, इसलिए फाटक बंद था। नेता जी काफी जल्दीबाजी में थे। उन्होंने ट्रेन आने से पहले ही फाटक खोल देने का आदेश दिया। पर गेटमैन ने उनकी बात नहीं मानी। जब फाटक खुला तो गेटमैन को विधायक ने पास बुलाया। उसे जबरन अपनी गाड़ी में बैठा लिया। उसे पीटते हुए कुछ किलोमीटर ले गये। बाद में उसे एक सूनसान स्थान में अपनी कार से उतार दिया। उस घटना की तब बड़ी चर्चा थी। पर उस नेता जी का कुछ नहीं बिगड़ा। अन्य दबंग नेताओं का उससे हौसला बढ़ा।

आजादी के बाद की ही एक दूसरी घटना के तहत एक अन्य नेता जी जान ही चली गयी। बड़े कद नेता जी दक्षिण बिहार से पटना आ रहे थे। उन दिनों गांधी जी पटना में ही थे। गांधी जी से उनकी मुलाकात तय थी। रास्ते में एक स्थान पर रेलवे क्राॅसिंग का फाटक बंद था। गोरखा सिपाही राइफल के साथ पहरे पर था। नेता जी ने उसे फाटक खोलने का आदेश दिया। वह नहीं माना। नेता जी ने उसे एक थप्पड़ रसीद कर दी। गुस्से में सिपाही ने उन्हें गोली मार दी।

पचास के दशक की तीसरी घटना दिल्ली की है। दक्षिण भारत के एक केंद्रीय मंत्री के बिगड़ैल पुत्र ने दिल्ली के पास के एक राज्य मंे एक हत्या कर दी थी। वह गिरफ्तार हो गया। केंद्रीय मंत्री मदद के लिए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के यहां गये। उन्होंने मदद से इनकार कर दिया। फिर वह मंत्री एक अन्य ताकतवर केंद्रीय मंत्री के पास गये। वह संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री के गहरे दोस्त थे। दोनों में बातचीत हुई। मंत्री पुत्र को जमानत दिलवाकर मुख्यमंत्री ने उस लड़के को अपने मित्र के यहां दिल्ली भिजवा दिया। उसी मंत्री ने उस लड़के का तुरंत पासपोर्ट भी बनवा दिया।  उस मंत्री ने उस बेटे के पिता को बुलाया। पासपोर्ट के साथ उस बेटे को उसके पिता को सिपुर्द करते हुए कहा कि इसे हमेशा के लिए विदेश भिजवा दीजिए। ऐसा ही हुआ।

अब बताइए कि कानून-व्यवस्था पर इन घटनाओं का धीरे -धीरे कैसा और कितना असर पड़ा होगा!
समय बीतने और राजनीति में भारी गिरावट आने के साथ अब स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की हार्दिक अपील के बावजूद ऐसे अपराध भी नहीं रुक रहे हैं जिससे देश के ताने -बाने के बिगड़ने का खतरा है। दरअसल प्रधानमंत्री को राज्यों के साथ मिलकर तरह -तरह के अपराधियों के खिलाफ भी सर्जिकल स्ट्राइक करवानी होगी। 
( इस लेख का संपादित अंश 7 जुलाई 2017 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

झाड़ दीजिए रपट की धूल

   काले धन की झाड़ी साफ करने की कोशिश जारी है।पर झाड़ी की जड़ में मट्ठा कब डाला जाएगा? जड़ खोदे बिना काले नोटों की झाड़ी फिर- फिर उग आएगी। 

 वोहरा कमेटी ने भ्रष्टाचार, अपराध और आतंक के त्रिगुट की चर्चा की है। जड़ तो वही है। नीरा राडिया टेप प्रकरण के अनुसार उस त्रिगुट में कुछ अन्य तत्व भी जुड़ चुके हैं।

 भ्रष्टाचार को जड़ से मिटा देने से संबंधित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ताजा वायदा देशवासियों को संतोष और दिलासा देने वाला है।

 पर, वायदा पूरा करने के सिलसिले में उन्हें वोहरा समिति की रपट पर से भी धूल झाड़नी पड़ेगी। वह रपट कें्रदीय सचिवालय में 1993 से पड़ी हुई है। 

 23 साल पहले वोहरा रपट आने के बाद तो इस बीच भ्रष्टाचार, अपराध  और आतंक की जड़ें और भी  गहरी हो चुकी हैं। इनसे   कुछ अन्य अवांछित तत्व जुड़कर उन्हें बेहद ताकतवर बना रहे हैं।
रपट में उन तत्वों की बेबाक चर्चा है।

तत्कालीन गृह सचिव एन.एन.वोहरा के नेतृत्व में बनी समिति की रपट में सरकारी अफसरों, नेताओं और देश के माफिया गिरोहों के बीच के अपवित्र गठबंधन का जिक्र है। गठबंधन को तोड़ने के  उपाय भी  सुझाए गये हैं। यह गठजोड़ अब अधिक खतरनाक स्तर पर पहुंच  चुका है। 
   माफिया तत्वों, आर्थिक क्षेत्र में सक्रिय लाॅबियों, तस्कर गिरोहों के साथ कतिपय प्रभावशाली नेताओं और अफसरों की सांठगाठ की विस्तृत चर्चा वोहरा समिति की रपट में है। पर, 1993 और उसके बाद की किसी भी सरकार ने उसकी सिफारिश पर अमल करने का साहस नहीं दिखाया। इससे माफिया तत्वों की ताकत का पता चलता है।

 याद रहे कि 1993 के बंबई बम विस्फोट की पृष्ठभूमि में ही वोहरा समिति का गठन किया गया था। श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोट बाहर-भीतर के आतंकी और देशद्रोही तत्वों की आपसी साठगांठ का परिणाम था। उसमें करीब 300 निर्दोष लोगों की जानें गई थीं।
  
  पांच दिसंबर, 1993 को वोहरा ने अपनी सनसनीखेज रपट गृह मंत्री को सौंपी थी। रपट में कहा गया कि ‘इस देश में अपराधी गिरोहों, हथियारबंद सेनाओं, नशीली दवाओं का व्यापार करने वाले माफिया गिरोहों, तस्कर गिरोहों, आर्थिक क्षेत्रों में सक्रिय लाॅबियों का तेजी से प्रसार हुआ है। इन लोगों ने विगत कुछ वर्षों के दौरान स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों, सरकारी पदों पर आसीन लोगों, राज नेताओं, मीडिया से जुड़े व्यक्तियों तथा गैर सरकारी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों के साथ व्यापक संपर्क विकसित किये हैं। इनमें से कुछ सिंडिकेटों की विदेशी खुफिया एजेंसियों के साथ-साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय सबंध भी हैं।’

     रपट में यह भी कहा गया है कि इस देश के कुछ बड़े प्रदेशों  में इन गिरोहों को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों के नेताओं और सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों का संरक्षण हासिल है। तस्करों के बड़े-बड़े सिंडिकेट देश के भीतर छा गये हैं। उन्होंने हवाला लेन-देनों, काला धन के परिसंचरण सहित विभिन्न आर्थिक कार्यकलापों को प्रदूषित कर दिया है। उनकी  समानांतर अर्थव्यवस्था के कारण देश के आर्थिक ढांचे को गंभीर क्षति पहुंची है। इन सिंडिकेटों ने सरकारी तंत्र को सभी स्तरों पर सफलतापूर्वक भ्रष्ट किया हुआ है। इन तत्वों ने जांच-पड़ताल तथा अभियोजन अभिकरणों को इस तरह प्रभावित किया हुआ है कि उन्हें  अपना काम चलाने में अत्यंत कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।’
  रपट के अनुसार ‘कुछ माफिया तत्व नारकोटिक्स, ड्रग्स और हथियारों की तस्करी में संलिप्त हैं। चुनाव लड़ने जैसे कार्यों में खर्च की जाने वाली राशि के मददेनजर नेता भी इन तत्वों के चंगुल में आ गये हैं। रपट में आई.बी. के निदेशक की बातें दर्ज की गयी हैं। उनके अनुसार ‘माफिया तंत्र ने वास्तव में एक समानांतर सरकार चलाकर राज्य तंत्र को एक विसंगति में धकेल दिया है।’

‘इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि इस प्रकार के संकट से प्रभावी रूप से निपटने के लिए एक संस्थान स्थापित किया जाए। इस समय ऐसा कोई तंत्र मौजूद नहीं है जो विशेषकर अपराध सिंडिकेट और माफिया के सरकारी तंत्र के साथ बने संबंधों के बारे में सूचनाएं एकत्रित और समेकित कर सके।’

सी.बी.आई. के निदेशक के अनुसार बड़े शहरों में संगठित अपराधी सिंडिकेट/माफिया की आय का प्रमुख साधन भू संपदा आदि है। वे भूमि और भवनों पर जबरन कब्जा कर लेते हैं। इस प्रकार से अर्जित धनशक्ति का इस्तेमाल नौकरशाहोंं तथा नेताओं के साथ संपर्क बनाने के लिए किया जाता है ताकि वे बेरोकटोक अपनी गतिविधियां चालू रख सकें। वे लठैत पालते हैं। उनका इस्तेमाल चुनावों में भी होता है।

छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी लठैतों का दबदबा आम बात हो गयी है। भाड़े के हत्यारे इन संगठनों के अभिन्न अंग हैं। अपराधी गिरोहों, पुलिस, नौकरशाही तथा नेताओं के बीच साठगांठ अब देश के विभिन्न हिस्सों में खुलकर सामने आ चुकी है। वर्तमान आपराधिक न्याय प्रणाली, जो मूलतः व्यक्तिगत अपराधों से निपटने के लिए बनाई गयी थी, माफिया की गतिविधियों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है। आर्थिक अपराधों के संबंध में भी हमारे कानून के उपबंध कमजोर हैं।’

  रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के अफसर ने कहा कि विदेशों में स्थित इस एजेंसी के कार्यालयों की वर्तमान क्षमता इतनी अधिक नहीं है कि वह अपनी गतिविधियों के क्षेत्र को व्यापक बना सके।   

    1993 के बाद देश के संसाधनों को लूटने वालों ने अपनी कार्यशैली व रणनीति में थोड़ा बदलाव जरूर किया है, पर मूल तत्व वहीं हंै। इस बीच नये कानून व संस्थान भी बने हैं। पर वे अपर्याप्त हैं।

   समिति की मुख्य सलाह यह है कि गृह मंत्रालय के तहत एक  नोडल एजेंसी तैयार हो जो देश मेंे जो भी गलत काम हो रहे हैं, उसकी सूचना वह एजेंसी एकत्र करे। ऐसी पक्की व्यवस्था भी की जाए ताकि सूचनाएं लीक नहीं हों।

   सावधानी बरतते हुए  वोहरा ने इस रपट की सिर्फ तीन प्रतियां तैयार की थीं। यह काम उन्होंने खुद किया।ऐसा उन्होंने लीक होने के डर से किया। वोहरा ने रपट की  प्रति तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री और गृह राज्य मंत्री (आंतरिक सुरक्षा) को सौंपी। तीसरी प्रति वोहरा ने अपने पास रखी। 

वोहरा ने उस रपट में लिखा कि ‘गृह मंत्री द्वारा इस रपट के अवलोकन के बाद मैं उनसे अनुरोध करूंगा कि वे आगे की कार्रवाई के लिए वित्त मंत्री,राज्य मंत्री @आंतरिक सुरक्षा@ और मेरे साथ विचार विमर्श करने का कष्ट करें। उससे जो रास्ता निकलेगा, उसको अमल में लाने से पहले प्रधानमंत्री जी की मंजूरी प्राप्त की जा सकती है।’
  पर जानकार लोग बताते हैं कि वोहरा की इस सलाह को सरकार ने कुल मिलाकर नजरअंदाज ही कर दिया।

( 8 दिसंबर 2016 के राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित)

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

यू.पी.चुनाव के मद्देनजर अति पिछड़ों को लुभाने की राजग की कोशिश शुरू

राजग अब अति पिछड़ा मतदाताओं को लुभाने के प्रयास मेें लग गया है। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया जा रहा है।

वैसे उसकी नजर लोकसभा के 2019 के चुनाव पर भी है। खबर मिली है कि भाजपा के पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ ने अति पिछड़ों को गोलबंद करने के लिए रैलियां आयोजित करने का फैसला किया है।

 उधर लोजपा नेता राम विलास पासवान ने भी अपने दल के अति पिछड़ा नेताओं से कहा है कि वे अपनी दुर्दशा पर चुप नहीं रहें।

  भाजपा के कुछ नेताओं की यह राय बन रही है कि केंद्र सरकार को चाहिए कि वह पिछड़ा वर्ग आयोग की उस सिफारिश को स्वीकार कर ले जिसके तहत 27 प्रतिशत आरक्षण को तीन भागों में बांट देने की सलाह दी गयी है।

  पता नहीं, केंद्र सरकार इस सलाह को मानेगी या नहीं। पर राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार यदि उसने मान लिया तो बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भाजपा को विशेष चुनावी लाभ मिल सकता है। पूरे देश में भी मिल सकता है।

   लगता है कि भाजपा के कुछ नेताओं ने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है कि 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव जीतना जरूरी है। यदि यू.पी. में भाजपा को पराजय मिली तो राजग के कुछ सहयोगी दल पाला बदल सकते हैं।

  याद रहे कि बिहार विधानसभा के गत चुनाव से ठीक पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण पर विवादास्पद बयान दिया था। गत साल सितंबर में उन्होंने आरक्षण की समीक्षा की जरूरत बताते हुए यह सवाल भी उठा दिया था कि आखिर आरक्षण कब तक जारी रहेगा ? नतीजतन पिछड़ा और दलित समुदाय के उन मतदाताओं ने भी बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को वोट दे दिए जिन्होंने लोकसभा चुनाव में राजग को दिये थे।

 गत लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने मतदाताओं को यह जानकारी दी थी कि नरेंद्र मोदी अति पिछड़ा समुदाय से आते हैं। इसका लाभ भी राजग को तब मिला था।

 मोहन भागवत के बयान के बाद पिछड़ा समुदाय के बड़े हिस्से को 1990 की घटना याद आ गयी थी। तब भाजपा ने वी.पी. सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस लेकर उसे गिरा दिया था। ऐसा इसलिए किया था क्योंकि वी.पी. सरकार ने पिछड़ों के लिए सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया था। तब कहा गया था कि यदि मंडल आरक्षण नहीं होता तो राम मंदिर आंदोलन भी नहीं होता।

 पर इस घटना से यह धारणा बनी कि भाजपा को सामाजिक न्याय की जरुरत समझ में नहीं आती।या समझना नहीं चाहती। मोहन भागवत के बयान के बाद उस धारणा की पुष्टि हुई थी। अब जबकि बिहार चुनाव में शर्मनाक पराजय के बाद भाजपा पस्तहिम्मत है तो उसके नेताओं के एक हिस्से को राष्ट्रीय स्तर पर अति पिछड़ा वोट बैंक बनाने की जरूरत महसूस हो रही है।

 क्योंकि उन्हें अब यह साफ लग रहा है कि सिर्फ हवाबाजी से 2019 का लोकसभा चुनाव नहीं जीता जा सकता है।

  हालांकि 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के हवाबाजी के अलावा भी दो -तीन और प्रमुख कारण रहे। तब मनमोहन सिंह सरकार के कई महाघोटालों से आम लोग नाराज थे। साथ ही, यू.पी.ए. की एकतरफा धर्म निरपेक्षता की नीति को भी अनेक मतदाताओं ने नापसंद किया।

 पर अब मनमोहन सरकार नहीं है जिसे निशाना बनाकर चुनाव जीता जा सकेगा। अब नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यकलापों का मतदाता आकलन करेंगे।

 यह सच है कि मोदी सरकार ने महाघोटालों को रोका है। पर केंद्र सरकार  रुटीन भ्रष्टाचार को रोक नहीं पा रही  है। इससे ही आम लोगों का रोज ब रोज पाला पड़ता है। केंद्र सरकार ने राहत और विकास के भी कई काम किये हैं, पर  2014 के लोकसभा चुनाव के समय नरेंद्र मोदी ने देश के सामने जो बड़े-बड़े वायदे किये थे, उन्हें लागू करने में मोदी सरकार  अब तक विफल रही है। इसलिए भी अब भाजपा  के लिए जातीय वोट बैंक तैयार करने की मजबूरी हो गयी है।

 यदि किसी दल के पास अपना जातीय वोट बैंक हो तो उस दल की सरकार अपने वादों को कार्यरूप देने के काम में कुछ देरी करने का जोखिम उठा सकती है।

  ऐसा ही करके कांग्रेस ने लंबे समय तक देश पर राज किया था। याद रहे कि कांग्रेस के वोट बैंक ने ंउसका 1967 और 1977 के चुनावों में भी साथ नहीं छोड़ा था। उन चुनावों में उत्तर भारत में कांग्रेस विरोधी लहर के बावजूद ऐसा हुआ था।

  वैसे भी अति पिछड़ों के कल्याण के लिए अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। तभी देश का समावेशी विकास संभव है। मंडल आरक्षण का लाभ जितना मजबूत पिछड़ों को मिल रहा है, उतना अति पिछड़ों को नहंीं मिल सका है।

  बिहार में नीतीश सरकार ने अति पिछड़ों के लिए विशेष प्रावधानों के जरिए उनका सशक्तीकरण किया है। इसका चुनावी लाभ नीतीश कुमार के दल को मिला भी है।

  नीतीश सरकार ने बिहार की पंचायतों में अति पिछड़ों के लिए 20 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दीं। उस आरक्षण से पहले अति पिछड़ों के बीच से सिर्फ 3 दशमलव 9 प्रतिशत मुखिया ही चुने जाते थे। जबकि, मजबूत और दबंग पिछड़ों के बीच से 41 दशलव 7 प्रतिशत मुखिया हुआ करते थे।

 आरक्षण के बाद अति पिछड़ों को करीब 16 प्रतिशत का लाभ मिला। याद रहे कि बिहार में मजबूत पिछड़ों की अपेक्षा अति पिछड़ों की संख्या काफी अधिक है। लगभग यही हाल पूरे देश में है। यदि भाजपा के कुछ नेताओं की नजर उधर जा रही है तो वह अकारण नहीं है।

  1977 मेंं कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार ने जब आरक्षण लागू किया तो उसमें भी अति पिछड़ों का विशेष ध्यान रखा गया था। तब 12 प्रतिशत अति पिछड़ों और 8 प्रतिशत पिछड़ों के आरक्षण का प्रावधान था। आज भी बिहार में पिछड़ों की अपेक्षा अति पिछड़ों का कोटा अधिक है।

  यदि केंद्र सरकार अति पिछड़ों के लिए कुछ ठोस कर पाएगी तो वह इस कदम के जरिए आरक्षण के सिद्धांत पर भी अपनी पार्टी की मुहर लगाएगी। अब तक तो इस मुद्दे पर भाजपा का रवैया संदिग्ध ही माना जाता रहा है।

( 9 फरवरी 2016 के दैनिक भास्कर,बिहार से साभार) 


गलत कामों की आलोचना के साथ ही अच्छे कामों की सराहना से बढ़ेगी नेताओं की साख

केजरीवाल सरकार के एक साल पूरा होने पर एक टी.वी. चैनल पर चर्चा हो रही थी। एंकर ने चर्चा में शामिल भाजपा और कांग्रेस के नेताओं से पूछा कि क्या एक साल में केजरीवाल सरकार ने एक भी अच्छा काम ंनहीं किया? भाजपा और कांग्रेस के नेताओं ने इस सवाल का सीधा जवाब देने के बजाये दूसरी बात शुरू कर दी।

  ताजा जनमत संग्रह के अनुसार दिल्ली के आधे से अधिक लोग केजरीवाल सरकार के कामकाज से संतुष्ट हैं। कांग्रेस ने इस अवसर पर रिपोर्ट कार्ड जारी किया। उसने केजरीवाल सरकार को 100 में से शून्य अंक दिये। क्या केजरीवाल सरकार एक अंक लायक भी नहीं है ?

दरअसल किसी सरकार के इस असंतुलित और एक तरफा आकलन के जरिए खुद कांग्रेस और भाजपा ने अपने बारे में लोगों मेंे यह धारणा बनाई कि वह सच बोल ही नहीं सकती।

 पर बात सिर्फ कांग्रेस पर ही लागू नहीं होती। जिन प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें हैं, उन राज्यों के प्रतिपक्षी दल भी उन सरकारों के बारे में लगभग वैसी ही राय रखते हैं जिस तरह की राय कांग्रेस और भाजपा केजरीवाल सरकार के बारे में रखती है।

  ऐसा पूरे देश में होता है। बिहार कोई अपवाद नहीं। इस देश के प्रतिपक्षी दल सरकार के गलत कामों की आलोचना के साथ यदि कभी -कभी उसके अच्छे कामों की सार्वजनिक रूप से सराहना कर लेते तो उससे आम लोगों को यह लगता है राजनीतिक दल सच भी बोलते हैं। यानी राजनीति मेंे जाने के बाद लोगों को सिर्फ असत्य या अर्ध सत्य बोलने की ही मजबूरी नहीं है। पर ऐसी आंशिक सराहना के लिए भी कोई जगह राजनीति में शायद नहीं बची है।

 संभवतः इसीलिए झूठ से नफरत करने वाले लोग यह समझते हैं कि राजनीति उनके अनुकूल की चीज नहीं है।

  बिहार में इन दिनों अपराध को लेकर प्रतिपक्षी दल नीतीश सरकार के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। हाल के दिनों में कुछ चर्चित व प्रमुख लोगों की हत्याएं हुई भी हैं। हालांकि आंकड़े बता रहे हैं कि कुल मिलाकर अपराध के आंकड़ों में 2014 की अपेक्षा 2015 में कमी आई है।  

  वैसे अपराध की जो भी घटनाएं हो रही हैं, उनको अलग-अलग करके देखने की जरूरत है। यदि निर्माण कार्य में लगे इंजीनियरों की हत्याएं हुई हैं तो उसमें यह साफ लग जाता है कि वह कांड शासन के निकम्मेपन या फिर अपराधियों के साथ पुलिस की मिलीभगत के कारण हुई। उस कांड में सख्त कार्रवाई की दिशा में शासन की ढिलाई है तो उसके लिए राज्य सरकार की आलोचना जरूर होनी चाहिए। आंदोलन भी किया जा सकता है।

पर यदि कुछ बाहुबली गैंगवार में मारे जाते हैं तो उन कांडों को दूसरे तरह से देखा जाना चाहिए। उसके लिए सर्वदलीय बैठक की मांग की जानी चाहिए ताकि राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण की समस्या पर सभी दल अपनी राय दें और इस समस्या के निदान का कोई रास्ता मिलजुल कर निकालें।
 यदि ऐसा नहीं होगा तो इस समस्या का कोई अंत नहीं है। साथ ही इतिहास भी आज के नेताओं के बारे में कुछ अलग ढंग की ही राय बनाएगा।

  राजनीति में सबसे बड़ी कमी वस्तुपरकता की है।देश और प्रदेश के अधिकतर नेता अपने वेाट बैंक और अन्य तरह के ओछे स्वार्थ को ध्यान में रखते हुए ही बयान देते हैं। आरोप और बचाव के बीच कई बार सत्य पिसता नजर आता है। हालांकि आम लोग चीजों को निरपेक्ष ढंग से देखते हैं, इसलिए अंततः उनसे कुछ छिपा हुआ नहीं रहता।

  जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की ताजा घटना को लेकर भी यही सब हो रहा है। यह सच है कि परिसर में कुछ छात्र-छात्राओं तथा अन्य लोगों ने अत्यंत आपत्तिजनक लहजे में भारत विरोधी नारेबाजियां कीं। उस पूरी घटना को लेकर आॅडियो और वीडियो टेप उपलब्ध हैं। इस देश में टेप की प्रामाणिकता की जांच भी संभव है। टेप के विवरण सामने आ जाने के बाद राजनीतिक दलों को उस संवेदनशील मामले पर अपना बयान देना चाहिए था। पर, उससे पहले ही अधिकतर नेता शुरू हो गये। सब अपनी -अपनी पार्टी की लाइन के आधार पर बयान देने और आरोप लगाने लगे।

  बयान परस्पर विरोधी हैं। कोई एक ही पक्ष सच बोल रहा है। दूसरा झूठ। देश की सुरक्षा के मामलों को लेकर भी राजनीतिक दलों का ऐसा रवैया ? उस घटना की पूरी सचाई आ जाने के बाद क्या उससे कई प्रमुख नेताओं की साख नहीं गिरेगी ?

इस बीच बिहार से एक केंद्रीय मंत्री ने कहा है कि नीतीश कुमार को लालू प्रसाद के साथ बैठकर अपराध के कारणों को तलाशना चाहिए। इस बयान में भी पूरी सच्चाई नहीं है।

पूरी सच्चाई तब सामने आती जब मंत्री जी यह कहते कि अब किसी बाहुबली विधायक की गिरफ्तारी के बाद हमारे दल का कोई नेता यह नहीं कहेगा कि हम मुख्यमंत्री की छाती तोड़ देंगे।

 अब तक बिहार में यही होता रहा है कि अपने दल से जुड़े बाहुबलियों को संरक्षण दो और प्रतिद्वंद्वी दलों के बाहुबलियों के खिलाफ अभियान चलाओ। इसीलिए अधिकतर नेताओं के बयानों में एकतरफा सच, अर्ध सत्य और झूठ ही होते हैं।

इससे नेताओं की साख नहीं बढ़ती। जब तक  राजनीतिक दल और नेताओं की साख नहीं बढ़ेगी तब तक लोकतंत्र अपने सही स्वरूप में सामने नहीं आएगा जिसकी कल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी। जो हो रहा है यदि यही सब जारी रहा तो न तो बिहार में अपराध पर काबू पाया जा सकेगा और न ही लोगों में यह धारणा बनेगी कि राजनीतिक नेता सच भी बोलते हैं। यहां अपवाद की चर्चा नहीं की जा रही है।

(16 फरवरी 2016 के दैनिक भास्कर,पटना से साभार)  




मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

संसदीय सक्रियता बढ़ जाने से कम हो जाएगी अदालती अति सक्रियता

  सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाइयों को लेकर दो बड़ी और महत्वपूर्ण खबरें आई हैं। एक उदासी की है तो दूसरी खुश करने वाली।

  सुप्रीम कोर्ट ने बिहार और ओडिसा के उस कानून को वैध करार दे दिया जिसमें आरोपित की संपत्ति जब्त करने की व्यवस्था की गई है। अदालत ने कहा कि ‘रिश्वतखोरी जैसी सामाजिक बुराई अब राष्ट्रीय आतंकवाद का रूप ले चुकी है।’

  याद रहे कि बिहार विशेष अदालत अधिनियम, 2009 के तहत कई बड़े अफसरों की संपत्ति जब्त की जा चुकी है।

 अदालत के ताजा निर्णय के बाद यह उम्मीद है कि भ्रष्टाचार के  मुकदमे झेल रहे लोगों की संपत्ति जब्त करने के काम में तेजी आएगी।

  याद रहे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अक्सर कहते रहे हैं कि भ्रष्टाचार के प्रति हमारी शून्य सहनशीलता की नीति है। यह अच्छी बात है कि उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी मुख्यमंत्री की बात दुहरायी है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में लाल किले के भाषण में कहा था कि जब कोई व्यक्ति किसी काम से किसी अफसर के यहां जाता है तो अफसर पूछता है कि ‘इसमें मेरा क्या ?’ पर जब उसे पता चलता है कि उसमें उसे कुछ नहीं मिलने वाला है तो वह कहता है कि ‘तो फिर मुझे क्या ?’

यानी कुछ नहीं मिलेगा तो वह काम नहीं करेगा। प्रधानमंत्री ने यह कहकर इस बात की जरूरत बताई कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाइयां करने की कितनी अधिक जरुरत है।

  पिछले कुछ वर्षों में इस देश की विभिन्न अदालतों ने भ्रष्टाचार के आरोपों में प्रभावशाली लोगों के खिलाफ चल रही सी.बी.आई. जांच की निगरानी की है। जानकार लोग बताते हैं कि निगरानी के कारण ही कई मामलों में उन प्रभावशाली लोगों को जेल भिजवाया जा सका जिनके खिलाफ केस चल रहे थे।

  जिस देश की सर्वोच्च अदालत कह रही है कि भ्रष्टाचार राष्ट्रीय आतंकवाद बन चुका है, प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार पर चिंता जता रहे हैं, उसी देश की एक संसदीय समिति की एक चैंकानेवाली सिफारिश हाल में सामने आई है।

समिति ने अदालतों की न्यायिक अति सक्रियता की आलोचना की है। उसने राज्यों के विभिन्न जिलों में विशेष सी.बी.आई. अदालतें गठित किये जाने पर भी आपत्ति जाहिर की है।

  कार्मिक, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने कहा है कि ‘अदालतों की अति सक्रियता, शासन की पिरामिड व्यवस्था को और बढ़ाएगी।’

  यह बात सही है कि आज सभी तरह के अपराधों की जांच की मांग सी.बी.आई. से कराने की मांग की जाने लगी है। संसदीय समिति को इस बात पर पहले विचार कर लेना चाहिए था कि ऐसा क्यों हो रहा है ?

क्यों लोगों को राज्य पुलिस पर विश्वास नहीं रहा? क्या इसलिए कि अधिकतर राज्यों में पुलिस राजनीतिक कार्यपालिका के हाथों की कठपुतली बन चुकी है ?

पुलिस सुधार के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निदेशों का पालन करने में राज्य सरकारों को आखिर क्या दिक्कतें हैं ?

  क्यों सी.बी.आई. को यदाकदा पिजड़े का तोता बना दिया जाता है?

जब पुलिस लाचार और सी.बी.आई. तोता हो तो अदालती निगरानी के सिवा कौन सा रास्ता बचता है ?

 आंकड़े बताएंगे कि जिन हाई प्रोफाइल मामलों में अदालती निगरानी नहीं रही, उन मामलों का क्या हश्र हुआ और जिनमें निगरानी रही, उनका क्या हुआ?

 जहां संस्थाएं अपना काम नहीं कर रही हों, वहां उनका काम कोई और करेगा ही। शून्य तो कहीं नहीं रहेगा।

 संसदीय समिति को इस बात की भी जांच करनी चाहिए कि राज्य पुलिस कितने प्रतिशत मुकदमों में अदालतों से सजा दिलवा पाती है और सी.बी.आई. के मामलों में यह प्रतिशत कैसा है। याद रहे कि  सी.बी.आई. द्वारा तैयार मुकदमों में सजा का प्रतिशत काफी अधिक है। जिन मामलों में अदालतें निगरानी करती हैं, उनमें तो सजा का प्रतिशत और भी अधिक होता है।

  क्या सी.बी.आई. गलत लोगों को सजा दिलवाती है? यदि ऐसा नहीं है तो भ्रष्टाचार के आतंकवाद से लड़ने के लिए संसद का क्या और कितना योगदान है, जरा इस पर भी विचार होना चाहिए।

 चीन में एक कहावत है कि भारत अपने बजट का पैसा एक ऐसे लोटे में रखता है जिसमें अनेक छेद होते हैं। अस्सी के दशक मेंे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी कहा था कि हम एक रुपए दिल्ली से भेजते हैं, उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही गांवों तक पहुंचते हैं। जब सरकारी साधनों की इस तरह लूट जारी रहेगी तो गरीबी कम नहीं होगी। गरीबी कम नहीं होगी तो देश में व्यवस्था के प्रति आम लोगों का असंतोष बढ़ेगा। फिर क्या होगा ? 

 इन बातों से नरेंद्र मोदी के लाल किले के भाषण से जोड़कर देखें तो अदालतों की सक्रियता की और भी जरूरत महसूस होगी।

ऐसी जरूरत सांसदों को भी महसूस होनी चाहिए अन्यथा वे समय के साथ अपना महत्व खो देंगे। इस बीच कई सांसद भ्रष्टाचार के कैंसर के खात्मे की जरूरत अवश्य महसूस करते हैं। पर लगता है कि वे अल्पमत में हैं।

आज इस देश के अनेक बड़े नेताओं, अफसरों और अन्य प्रभावशाली लोगों में अपार धन खास कर रियल इस्टेट जुटाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे में कई विवेकशील लोगों को अदालती अति सक्रियता और भी जरूरी लगती है। 

  इन समस्याओं को नजरअंदाज करके संसद के अनेक सदस्यगण आए दिन सदन में हंगामा करते रहते हैं। यह सब देख कर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को हाल में कहना पड़ा कि ‘संसद में बहस होनी चाहिए, हंगामा नहीं।’

 एक बात और। यदि संसद अपना काम करती होती तो अदालतों की सक्रियता नहीं बढ़ती।

  झारखंड मुक्ति मोर्चा सांसद रिश्वत कांड मुकदमे के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट ने नब्बे के दशक में कहा था कि हम जानते हैं कि सरकार को गिरने से बचाने के लिए रिश्वत ली गयी है, पर हम कुछ कर नहीं सकते। क्योंकि संविधान का अनुच्छेद -122 हमें कुछ करने से रोकता है। संसद को चाहिए था कि वह संबंधित अनुच्छेद में संशोधन कर देती ताकि कोई सांसद सदन में वोट देने के लिए घूस ले तो वह भी सजा से नहीं बच सके।

 हवाला घोटाले के बारे में उन्हीं दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस कांड की तो सी.बी.आई. ने ठीक से जांच ही नहीं की। संसद ने सी.बी.आई.को पिजड़े का तोता बन जाने से क्यों नहीं रोका ?

याद रहे कि हवाला घोटाला सर्वदलीय घोटाला था जिसमें अनेक दलों के अनेक प्रमुख नेता लिप्त पाये गये थे। उपर्युक्त संसदीय समिति के सदस्यों को इस बात की जांच कर लेनी चाहिए थी कि पिछले कुछ दशकों में  समय -समय पर विभिन्न घोटालों की जांच के लिए गठित संसदीय समिति किस नतीजे पर पहुंची और जब उन्हीं मामलों की जांच जब सी.बी.आई. ने की तो क्या नतीजा निकला। 


(15 दिसंबर 2015 के दैनिक भास्कर,पटना से साभार)     
   

बुधवार, 27 मई 2015

बोफर्स सौदे के कई सवालों के जवाब बाकी हैं

चर्चित बोफर्स तोप सौदे में हुए घोटाले को लेकर कई सवाल अब भी अनुत्तरित रह गए हैं। 1986 में संपन्न इस सौदे को लेकर परस्पर विरोधी विचार यदा-कदा आते रहते हैं।आगे भी आते रहेंगे। इस मामले के जानकार लोगों के अनुसार सवाल इसलिए भी अनुत्तरित रह गए क्योंकि इस केस को उसकी तार्किक परिणति तक पहुंचने ही नहीं दिया गया। ऐसा राजनीतिक कारणों से किया गया।

  याद रहे कि इस घोटाले के कारण मलीन हुई कांग्रेस पार्टी को जनता ने 1989 के चुनाव में केंद्र की सत्ता से बाहर कर दिया था।

   इस मामले में एक रोचक मोड़ उस समय आया जब इस देश के आयकर न्यायाधीकरण ने जनवरी, 2011 में कहा कि बोफर्स तोप सौदे में क्वात्रोची और विन चड्ढ़ा को 41 करोड़ रुपए की रिश्वत दी गई थी। ऐसी आमदनी पर भारत में उन पर टैक्स की देनदारी बनती है।

  सवाल है कि न्यायाधिकरण के इस आदेश के बावजूद उन लोगों से टैक्स क्यों नहीं वसूला गया ?

 उपर्युक्त फैसले के बावजूद दिल्ली की सी.बी.आई. अदालत में सी.बी.आई. ने क्वोत्रोची के खिलाफ मामले को वापस लेने की अपील दायर कर दी ।
सी.बी.आई. ने कोर्ट से कहा कि इस केस की मेरिट को दरकिनार करके इस केस को वापस ले लेने की अनुमति दी जाए। 4 मार्च 2011 को सी.बी.आई कोर्ट ने केस वापस लेने की सी.बी.आई. की दलील मान भी ली।

 सी.बी.आई. ने केस की मेरिट को दरकिनार करते हुए इसे कोर्ट से वापस क्यों ले लिया ? 

याद रहे कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल मेंे सी.बी.आई. ने ही इस कांड के संबंध में अदालत में 22 अक्तूबर 1999 को आरोप पत्र दाखिल किया था।  उससे पहले वी.पी. सिंह के शासनकाल में 22 जनवरी 1990 को बोफर्स मामले में प्राथमिकी दायर की गई थी।

 1987 में इस घोटाले के प्रकाश में आने के बाद मीडिया में सबूतों के साथ इस घोटाले के बारे में प्रामाणिक खबरें छपती रहीं।इसके बावजूद तब की राजीव गांधी सरकार के कार्यकाल में इस संबंध में प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गई ?

 24 मार्च, 1986 को स्वीडन की हथियार बनाने वाली कंपनी ए.बी. बोफर्स से इस आश्वासन के बाद सौदा हुआ था कि इसमें कोई बिचैलिया नहीं है।
बिचैलिए की खबर आने पर केस होना चाहिए था।  18 अप्रैल 1987 को स्वीडन रेडियो ने खबर दी कि इस सौदे में भारतीय नेताओं और आला सैन्य अफसरों को रिश्वत दी गई।

  क्या इस सनसनीखेज सौदे की सही जांच होने दी गई ? दरअसल सरकार बदलने के साथ जांच की दिशा भी बदलती गई।

आखिर ऐसा क्यों हुआ ?

इस भटकाव के कारण जब अदालतों को इस मामले की तह में नहीं जाने दिया  गया तो फिर यह आरोप लगाना कितना सही है कि बोफर्स मामले में  मीडिया ट्रायल किया गया ?

  बोफर्स तोप एक अच्छी तोप है। पर विशेषज्ञ बताते हैं कि सौदा तय करते समय उसके साथ प्रतियोगिता फ्रंास की सोफ्मा तोप से थी। कुछ विशेषज्ञों ने सोफ्मा को  बेहतर बताया था। पर सोफ्मा शायद दलाली नहीं देता था।

    किस तरह अलग -अलग दलों की केंद्र सरकारों ने इस मामले में अलग -अलग रुख अपनाया, उसका पहला उदाहरण चंद्रशेखर सरकार का रवैया था। वी.पी. सिंह की सरकार के गिरने के बाद कांग्रेेस की मदद से चंद्रशेखर के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी। इस मामले में उस सरकार की राय वी.पी. सिंह की सरकार की राय से बिलकुल उलट थी।

नरसिंह राव सरकार के एक मंत्री माधव सिंह सोलंकी को मंत्रिमंडल से क्यों हटना पड़ा ? क्या यह बात सही है कि सोलंकी ने बोफर्स मामले की जांच रुकवाने के लिए संबंधित देश के सत्ताधारी व्यक्ति को पत्र दिया था ? ऐसा उन्होंने किसके कहने पर किया ? क्या इतने उलझे मामले के बारे में रिपोर्ट करना मीडिया ट्रायल होता है ?

एक बड़ा सवाल यह भी है कि 1993 में केंद्र सरकार ने क्वात्रोची को इस देश से गैर कानूनी ढंग से क्यों भाग जाने दिया ? 1991 से 1996 तक पी.वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे।

सवाल यह भी है कि 2006 में भारत सरकार  की किस हस्ती के इशारे पर ब्रिटेन में स्थित क्वात्रोची के उस खाते को डिफ्रीज कर  दिया गया जिसमें बोफर्स की दलाली का पैसे होने की खबर थी और उसे 2003 में भारत सरकार ने फ्रीज करवा दिया था ? याद रहे कि 2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे।

   जब बोफर्स घोटाले के मामले में खुद केंद्र सरकार का रवैया बदलता रहा और एक खास पार्टी की सरकार ने इस मामले को कोर्ट में हल नहीं होने दिया तो फिर आशंकाएं तो पैदा होंगी ही।कोई कितना भी कहे ,पर जो हाल बोफर्स जांच का किया गया ,उससे यह स्थिति बन गई है कि इतिहास  इस कांड की निष्पक्ष जांच पर बड़ा प्रश्न चिह्न उठाएगा ही। चाहे कोई इसे मीडिया ट्रायल कहे या कुछ और। अपने पापों और गलतियों पर पर्दा डालने के  लिए उल्टे मीडिया पर आरोप लगा देना इस देश की राजनीति के एक बड़े हिस्से की आदत सी हो गई है।    

  (दैनिक जनसत्ता के 27 मई 2015 के अंक में प्रकाशित)
   

बुधवार, 6 अगस्त 2014

अच्छे नेताओं को भले लोगों के समर्थन की जरूरत


राजनीति में नैतिकता के पतन की इससे बड़ी कहानी और भला क्या हो सकती है? तमिलनाडु के एक पूर्व मुख्यमंत्री को 2001 में भ्रष्टाचार के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया था। लोअर कोर्ट के जज एस. अशोक कुमार ने उन्हें जमानत दे दी थी।

  उस जज पर भ्रष्टाचार के अनेक गंभीर आरोप थे। इसके बावजूद उस पूर्व मुख्यमंत्री के दल ने 2007 मेें केंद्र सरकार पर दबाव डालकर एस.अशोक कुमार को मद्रास हाईकोर्ट का स्थायी जज बनवा दिया।

  इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज मार्कंडेय काटजू ने हाल में रहस्योद्घाटन किया। तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने काटजू के रहस्योद्घाटन की एक हद तक पुष्टि की।

  यानी राजनीतिक प्रदूषण ने एक हद तक न्यायपालिका को भी प्रदूषित कर दिया। याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट के कई मुख्य न्यायाधीशों ने समय -समय पर न्यायपालिका में बढ़ते भ्रष्टाचार पर चिंता जाहिर की है।

एक मुख्य न्यायाधीश ने तो यह भी कहा था कि न्यापालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर सख्ती से काबू पाने के लिए हम सरकार व संसद से कानूनी अधिकार मांग रहे हैं, पर वह अधिकार हमें मिल ही नहीं रहे हैं।

  इस प्रकरण से यह साबित होता है कि राजनीति के बीच के भ्रष्ट तत्व समाज के अन्य हिस्सों के साथ -साथ न्यायपालिका को भी प्रदूषित करने का काम करते रहते हैं।

यहां यह कह देना जरूरी है कि न तो राजनीति में सारे लोग भ्रष्ट हैं और न ही न्यायपालिका में।

  पर जब राजनीति के बीच के अनेक ईमानदार लोग भी सत्तालोलुपता में आकर भ्रष्ट नेताओं के दबाव में आ जाएं तब भ्रष्ट लोग हावी नजर आते हैं।
अब भला बताइए कि एक दिन जब न्यायपालिका मेंे भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जाने लगेगा तो आम लोगों को न्याय कौन देगा?
दरअसल हर क्षेत्र के भ्रष्ट तत्वों को पकड़कर अदालत के सामने खड़ा कर देने की जिम्मेदारी शासन की होती है। पर यदि अदालत ईमानदार नहीं होगी तो किसी भी क्षेत्र के भ्रष्टों को सजा कैसे हो पाएगी ?

   शुक्र है कि अभी अदालतों की हालत अधिक नहीं बिगड़ी है। बल्कि भ्रष्टाचार के समुद्र में अपवादों को छोड़कर अदालत ही अब भी ईमानदारी का टापू नजर आती है। हाल के वर्षों में यदि विभिन्न मामलों में अदालतों ने कड़ा रुख नहीं अपनाया होता तो अनेक बड़े -बड़े घोटालेबाज भी जेल जाने से बच जाते।

 पर यदि न्यायपालिका की साख को कहीं से सर्वाधिक खतरा है तो वह राजनीतिक कार्यपालिका से ही। इससे पहले 1993 में भी तत्कालीन केंद्र सरकार ने सुप्रीम के जज वी. रामास्वामी को महाभियोग से बचा लिया था। जबकि सुप्रीम कोर्ट की जांच कमेटी ने रामास्वामी के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई सबूत संसद के कटघरे में पेश कर दिए थे।

   राजनीति में गिरावट इस देश में कोई नई बात नहीं है। आजादी के तत्काल बाद से ही उसके लक्षण प्रकट होने लगे थे। तब के कई सत्ताधारी नेताओं ने खुद ईमानदार होने के बावजूद भ्रष्टाचार को नजरअंदाज किया। इस कारण समय के साथ भ्रष्ट नेताओं का मनोबल बढ़ता चला गया।
विचारधारा का महत्व धीरे-धीरे घटने लगा। त्याग, तपस्या और ईमानदारी शब्द मुख्यधारा की राजनीति से गायब होने लगे।

  अब तो गिरावट इस कदर व्याप्त हो चुकी है कि अपवादांे को छोड़कर राजनीति का एक ही मंत्र रह गया है --किसी तरह सत्ता व पद प्राप्त कर लो चाहे इसके लिए किसी तरह के समझौते क्यों न करने पड़े।

पैसे से सत्ता और सत्ता से फिर पैसा--यही रणनीति बन चुकी है।

  इसीलिए राजनीति के भीतर के थोड़े से ईमानदार लोगों का दम घुट रहा है क्योंकि वे निर्णायक स्थिति में नहीं है। जो निर्णायक स्थिति में हैं, वे भी लाचार हैं क्योंकि सिस्टम को पूरी तरह भ्रष्ट बना दिया गया है। एक ईमानदार मुख्यमंत्री ने कई साल पहले इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि ‘मैं इस लोकतांत्रिक सिस्टम को बचाने की कोशिश तो कर रहा हूं, पर लगता है कि यह बच नहीं पाएगा।’ सत्ता व राजनीति को भीतर से देखने से उन्हें साफ लग रहा था कि विभिन्न क्षेत्रों के भ्रष्ट लोग अपने स्वार्थ में एक दिन इस लोकतंत्र को ही खत्म कर देंगे।

  यदि आज कोई नेता अपने निजी फायदे के लिए किसी भी दल में बेहिचक चला जा रहा है और कोई भी दल किसी अन्य दल से तुरंत समझौता कर ले रहा है तो इसका एक ही कारण है कि राजनीति में नीति -सिद्धांत, त्याग-तपस्या व जनसेवा का स्थान किन्हीं अन्य तत्वों ने ले लिया है।



    इस पृष्ठभूमि में देश के विभिन्न क्षेत्रों की कुछ ईमानदार हस्तियों ने  समय -समय पर जो टिप्पणियां व्यक्त की है, उन्हें एक बार फिर याद कर लेना मौजूं होगा।

  पूर्व सी.ए.जी. विनोद राय ने गत मई में कहा कि ‘ मैं राजनीति में कभी नहीं आऊंगा।’

उससे पहले 2003 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह ने कहा था कि ‘राजनीति में प्रवेश से बेहतर है कि आत्महत्या कर ली जाएं।’

  भले मनमोहन सिंह स्वेच्छा से विवादास्पद सरकार का नेतृत्व करते रहे, पर वे खुद रुपए-पैसे के मामले में बेईमान नहीं माने जाते। उन्होंने 1996 में एक अखबार से भेंट में कहा था कि ‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ गई है।’ 

समाजवादी नेता मधुलिमये ने 1988 में ही कह दिया था कि ‘मुल्क के शक्तिशाली लोग देश बेचकर खा रहे हैं।’

ज्योति बसु ने भी कहा था कि इस व्यवस्था को देख मुझे शर्म आती है।

  सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में कहा था कि ‘भ्रष्टाचारियों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान होना चाहिए।’

अन्ना हजारे से जब चुनाव लड़ने के लिए कहा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि जहां सौ-सौ रुपए में वोट बिकते हैं, वहां मैं चुनाव जीत ही नहीं पाऊंगा।

 इन सब टिप्पणियों का क्या किया जाए ? 

अनेक लोग कहते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था सबसे अच्छी शासन व्यवस्था है। इस व्यवस्था मेंं गरीब अपनी आवाज उठा सकता है। पर जब राजनीति के भीतर के अच्छे लोगों को ताकत मिलेगी तभी तो गरीबों की आवाज सुनी जाएगी। अच्छे लोग कब निर्णायक स्थिति में आएंगे ? तभी आ पाएंगे जब जनता के बीच के अच्छे लोग राजनीति के अच्छे लोगों को ताकत पहुंचाएंगे। यह सब कब तक होगा? पता नहीं। 


(दैनिक भास्कर के पटना संस्करण में 29 जुलाई 2014 को प्रकाशित)    
      
  

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

जन लोकपाल पर इस्तीफे से बढ़ेगी ‘आप’ की साख

    दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि जन लोकपाल बिल पास नहीं हुआ तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार यदि सचमुच उन्होंने इस्तीफा दे दिया तो देश में आम आदमी पार्टी की साख बढ़ सकती है।

    दरअसल इस देश में अब तक समय-समय पर जिन-जिन नेताओं ने भ्रष्टाचार के सवाल पर लड़ते हुए पदत्याग किया या प्रताड़ना सही, उन्हें इस देश की अधिकतर जनता ने हाथों -हाथ लिया। ताजा इतिहास बताता है कि उनका जनसमर्थन समय के साथ बढ़ा ही था।

   हाल के दिनों में ‘आप’ के नेताओं के कतिपय अशालीन बयानों व व्यवहार से कुछ लोगों को निराशा हुई है, उन्हें तो केजरीवाल के इस्तीफे से संतोष ही मिलेगा। दूसरी ओर जिन्हें ‘आप’ के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से अपने निहितस्वार्थों को नुकसान पहुंचता नजर आ रहा है, उन्हें राहत मिलेगी। पर जो लोग एक कारगर जन लोकपाल कानून के पक्षधर हैं, उन्हें एक बार फिर सड़कों जाना होगा। या फिर उन्हें ‘आप’ के अभियान को एक बार फिर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मदद करनी होगी।

‘आप’ के अभियान में चुनाव व आंदोलन दोनों शामिल हैं। हालांकि अभी तो लोकसभा चुनाव सामने होगा। अधिकतर लोग उसमें प्रत्यक्ष, परोक्ष या मानसिक रुप से व्यस्त रहेंगे।


अबोध शिशु की तरह लड़खड़ा रही आप   

दरअसल दिल्ली प्रदेश की सत्ता मेें आने के बाद ‘आप’ के कुछ नेताओं ने अपने आचरण से ऐसा प्रदशर््िात किया मानो कोई शिशु अपने शैशवास्था में चलने की कोशिश करते समय लड़खड़ा रहा है। लगा कि उन्हें सरकार या राजनीति चलाने के लिए अभी कुछ और जरूरी बातें सीखनी हंै। उन्हें विधिवत प्रशिक्षण की जरूरत है।

  हालांकि अबोध शिशु की तरह लड़खड़ाने के बावजूद ‘आप’ के नेताओं की मंशा पर वैसे लोगों को कभी कोई शंका नहीं हुई जो लोग किसी भी कीमत पर इस देश के शासन में फैले भीषण भ्रष्टाचार की समाप्ति चाहते हैं। और, इस काम के लिए अब भी वे ‘आप’ की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि उम्मीद की कोई बेहतर किरण उन्हें नजर भी नहीं आ रही है। 

, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में ‘आप’ की प्रतिबद्धता का ही नतीजा है कि अरविंद मुख्यमंत्री की गद्दी की अपेक्षा आज भी जन लोकपाल व स्वराज विधेयक को अधिक महत्व दे रहे है। इस देश में अब तक कितने नेता ऐसे हुए हैं जो गद्दी मिल जाने के बावजूद अपने मुद्दों के लिए कभी भी गद्दी छोड़ने को तैयार रहते हैं ?

   एक ऐसे देश में जहां के अधिकतर नेतागण गद्दी पर बने रहने या फिर गद्दी तक पहुंचने के लिए रोज- ब-रोज भ्रष्टाचार और भ्रष्ट लोगों से घृणित समझौते कर रहे हंै, उस देश में अरविंद की ताजा भीष्म प्रतिज्ञा अनेक लोगों को अच्छी लग रही है।

  क्या वे अपनी इस प्रतिज्ञा पर कायम रह सकेंगे ? इस देश के अच्छी मंशा वाले लोग चाहते हैं कि वे अपनी प्रतिज्ञा पर कायम रहें। यदि कायम रहे तो ‘आप’ को पूरे देश में देर- सवेर जमने और अपने जनहितकारी एजेंडे के साथ अधिकाधिक लोगों को जोड़ने में सुविधा होगी। 

अरविंद केजरीवाल जन लोकपाल के साथ -साथ अपने स्वराज विधेयक पर भी उतना ही जोर दे रहे हैं। पर स्वराज बिल के स्वरूप व महत्व को अभी देश के आम लोगों के बीच समझाना बाकी है।

कुछ प्रेक्षकों के अनुसार उसमें कई अव्यावहारिक बातें भी हैं। जो उन्हें अव्यावहारिक नहीं भी मानते, वे भी स्वराज विधेयक को अभी विराम देने की सलाह देते हैं।

  पर, जन लोकपाल विधेयक के प्रावधानों के बारे में तो अधिकतर लोगों की मोटा -मोटी समझदारी बन चुकी है। वे भी उन्हें जरुरी मानते हैं। लोगों के अनुसार जन लोकपाल विधेयक का मतलब है एक ऐसा सख्त व स्वतंत्र लोकपाल कानून जिसकी पकड़ में आ जाने के बाद बड़े से बड़ा भ्रष्टाचारी कानून की गिरफ्त से बच नहीं सकेगा।

    हाल में संसद ने जो लोकपाल विधेयक पास किया है, उसे कतई कारगर नहीं माना जा रहा है। यदि कारगर होता तो मुख्य धारा की राजनीति उसके लिए राजी ही नहीं होती।

  यदि दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल के पास जन लोकपाल जैसा कोई कानून नहीं होगा तो वे मुख्यमंत्री के रुप में अपनी कारगर भूमिका ही नहीं निभा पाएंगे। यदि नहीं निभा पाएंगे तो धीरे-धीरे उनकी पार्टी की 
लोकप्रियता भी समाप्त होती चली जाएगी। नतीजतन राष्ट्रीय पैेमाने पर फैलने का ‘आप’ का सपना भी सपना ही बना रह जाएगा।

  दिल्ली की गददी के अनुभव के बाद ‘आप’ को भी लग रहा है कि राज्यों की सरकारें ठीक से नहीं चलाई जा सकती हैं, यदि केंद्र की सरकार से समय -समय पर मदद नहीं मिले। केंद्र में तभी अच्छी सरकार बनाई जा सकती है जब संसद में अधिक से अधिक ईमानदार लोग चुन कर जाएं।

 यह भी तभी हो सकेगा जब ‘आप’ जैसी पार्टी का लोकसभा चुनाव में भी वैसा ही कारगर हस्तक्षेप हो जैसा दिल्ली विधानसभा में हुआ है। आप का अभियान जारी रहा तो 2014 के चुनाव में यदि नहीं तो 2019 तक लोकसभा की सूरत बदल सकती है।

  आज केजरीवाल के जन लोकपाल विधेयक का किसी न किसी बहाने कांग्रेस व भाजपा जितना अधिक विरोध कर रही हैं, वैसी स्थिति में उसके दिल्ली विधानसभा से पास होने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।
कोई भला क्यों अपने ही प्रयास से रस्सी खरीद कर उसे अपने ही गले में फांसी के रूप में पहन लेगा ? 


बहुगुणा सरकार ने कमजोर कर दिया जनलोकपाल कानून

पूरा देश देख रहा है कि ‘आप’ के जन लोक पाल विधेयक का प्रारुप उत्तराखंड के उस लोकपाल विधेयक से ठीक मिलता जुलता है जिसे उत्तराखंड में भाजपा की बी.सी. खंडुरी सरकार ने ही टीम अन्ना की सलाह पर पास कराया था। उस लोकपाल विधेयक को नवंबर 2011 में उत्तराखंड विधानसभा से पास कराया गया था।

  उस विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति भी मिल गई थी। यह और बात है कि बाद की बहुगुणा सरकार ने उसे बदल दिया।

राजनीति का दोहरापन देखिए। भाजपा ने तब खंडुरी के उस विधेयक का तो विरोध नहीं किया, बल्कि बहुगुणा सरकार के लोकायुक्त कानून बदलने के निर्णय का जरूर विरोध किया था। पर वही भाजपा केजरीवाल के जन लोकपाल विधेयक का कड़ा विरोध कर रही है। अरुण जेटली तो कहते हैं कि ‘आप’ शहरी माओवादी है।’


  कांग्रेस की ओर से ऐसे कड़े विधेयक के लिए समर्थन की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती है। हालांकि यह बात भी याद रखने की है कि केजरीवाल के 18 सूत्री कार्यक्रम में जन लोकपाल विधेयक भी है जिसका विरोध कांग्रेस ने गत साल उस समय तो नहीं किया था जब कांग्रेस ने बिना शर्त और बिना मांगे आप सरकार का बाहर से समर्थन किया था। ऐसे दलों और नेताओं के बीच इस देश में ‘आप’ के बढ़ने की काफी गुंजाइश बनी हुई है।

  ऐसे में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ कर एक बार फिर जनता के बीच जाने के अलावा ‘आप’ के लिए कोई रास्ता बचा भी नहीं है। पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या यह अपनी जिम्मेवारियों से भागना नहीं होगा ?

 हालांकि यह सवाल ही गलत है।‘आप’ सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी तो यही रही है कि वह जन लोकपाल विधेयक पास कराए। यदि नहीं करा सकती और फिर भी वह गद्दी पर बनी रहती है तो शीला दीक्षित सरकार व केजरीवाल सरकार में फर्क ही क्या रहेगा ?

  इसी विधेयक के लिए तीन बार अन्ना हजारे और दो बार केजरीवाल ने अनशन किया था। बुजुर्ग अन्ना हजारे तो केंद्र सरकार के ढीले ढाले लोकपाल विधेयक पर मान गये। यदि जवान केजरीवाल नहीं मान रहे हैं तो क्या उनकी जिद के पीछे उनका कोई निजी स्वार्थ है ? ऐसे आरोप को कोई ईमानदार व्यक्ति तो सच  मानेगा ही नहीं।

(इस लेख का संशोधित अंश जनसत्ता के 11 फरवरी 2014 के अंक में प्रकाशित)