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सोमवार, 19 नवंबर 2018

इंदिरा गांधी की वसीयत : वरुण के हितों की सुरक्षा राजीव-सोनिया की जिम्मेदारी थी

इंदिरा गांधी के जन्मदिन पर विशेष

सुरेंद्र किशोर 

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इंदिरा गांधी ने लिखा था कि ‘मैं यह देख कर खुश हूं कि राजीव और सोनिया फिरोज वरुण को उतना ही प्यार करते हैं जितना अपने खुद के बच्चों को। मुझे पक्का भरोसा है कि जहां तक संभव होगा, वे हर तरह से वरुण के हितों की रक्षा करेंगे।’

यह बात पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी वसीयत में दर्ज की है। वह वसीयत 4 मई, 1981 को लिखी गयी थी। उसके गवाह थे एम.वी. राजन और माखनलाल। इंदिरा गांधी ने यह भी लिखा है कि ‘संजय गांधी की जायदाद में मेरा जो शेयर है, मेरी इच्छा है कि वह फिरोज वरुण को मिले। इन बच्चों के बालिग होने तक यह संपत्ति ट्रस्ट के पास रहे जिसके प्रबंधक राजीव और सोनिया रहें।’


इंदिरा गांधी की वसीयत में अन्य परिजन की चर्चा मौजूद है सिवा मेनका गांधी के। फिरोज वरुण का तो उन्होंने पूरा ध्यान रखा, पर अपने छोटे पुत्र संजय की विधवा के लिए उनके पास देने को कुछ नहीं था। याद रहे कि संजय के निधन के बाद मेनका का संबंध इंदिरा जी से बहुत ही खराब हो गया था।


इंदिरा जी के जीवनकाल में मेनका ने अपना एक राजनीतिक संगठन भी बना लिया था-संजय विचार मंच।

ऐतिहासिक वसीयत में इंदिरा गांधी ने यह भी लिखा है कि 1947 में हमारे पास जितनी संपत्ति थी, आज उससे कम है। याद रहे कि इस बीच उन्होंने जवाहर लाल नेहरू स्मारक ट्रस्ट को इलाहाबाद का अपना ‘आनंद भवन’ दान कर दिया था।

वसीयत के अनुसार मेहरौली के पास के निजी फार्म हाउस राहुल और प्रियंका को मिले। वसीयत के अनुसार हिस्सेदारी दोनों बच्चों की बराबर -बराबर रहेगी। उन्होंने पुस्तकों की कॉपी राइट भी तीन हिस्सों में बांट दिए, तीनों बच्चों के नाम। यानी प्रियंका, राहुल और वरुण के नाम।


वसीयत के अनुसार जेवर इंदिरा जी ने प्रियंका को दिए। पर शेयर, सिक्युरिटी व यूनिट को तीनों बच्चों में बांटे। पुरातन सामग्री जो पुरातत्व विभाग में निबंधित हैं, वे प्रियंका को मिलेंगी।


इंदिरा जी ने अपनी वसीयत में लिखा कि मेरे सारे निजी पेपर्स राहुल को मिलेंगे। बहुमूल्य व दुर्लभ पुस्तकें राहुल और प्रियंका को मिलेंगी। कुछ अन्य सामग्री के बारे में भी वसीयत में जिक्र है।


प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लिखा कि तीनों बच्चों के नाम की गयी संपत्ति, ट्रस्ट के तहत रहेगी क्योंकि बच्चे अभी वयस्क नहीं हैं। ट्रस्ट के प्रबंधक राजीव होंगे। यदि किसी कारणवश राजीव प्रबंधक नहीं रहे तो सोनिया प्रबंधक बनेगी।


यह भी मान लिया गया कि इस वसीयत के जरिए भी इंदिरा जी ने अघोषित रूप में राजीव और उनके पुत्र राहुल को ही अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी भी नामजद कर दिया न कि वरुण को। वैसे भी 1980 में संजय गांधी के असामयिक निधन के थोड़े ही दिनों बाद मेनका गांधी इंदिरा गांधी के आवास से बाहर हो गयी थीं। या यूं कहिए कि कर दी गयी थीं। 


संजय गांधी की जायदाद जो भी रही हो, पर खुद इंदिरा गांधी की जायदाद ऐसी नहीं थी जिसपर अंगुली उठाई जा सके। इंदिरा जी का यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि 1947 की अपेक्षा उनके परिवार की संपत्ति घटी जबकि वे लंबे समय तक सत्ता में रहे।


उनके जीवनकाल में भी किसी विरोधी नेता ने उनकी आय से अधिक संपत्ति का कोई मामला उठाया हो, यह हमें याद नहीं। हां, एक दूसरे प्रकार की शिकायत जरूर रही। अपने प्रधानमंत्रित्व काल में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्हें जितना कठोर होना चाहिए था, उतना नहीं हुर्इं। कई लोगों की ऐसी ही शिकायत जवाहरलाल नेहरू से भी रही।


फिर भी नेहरू - गांधी परिवार की 1981 तक की निजी संपत्ति को देखकर और आज के पक्ष-विपक्ष के अनेक नेताओं से उसकी तुलना करके देखने पर लगता है कि वे राजनीति के ‘संत’ थे। हालांकि इस शब्द का इस्तेमाल खुद इंदिरा गांधी ने अपने पिता के लिए किया था-‘मेरे पिता संत थे। पर मैं तो पॉलिटिशियन हूं।’


(मेरा यह लेख 19 नवंबर, 2018 को फस्र्टपोस्ट हिंदी में प्रकाशित)

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

‘आप’ की राजनीतिक शैली और उसका राजनीति पर संभावित असर

भाजपा नेता डा. सुब्रह्मण्यन स्वामी ने आम आदमी पार्टी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें कही हंै। अरविंद केजरीवाल की तुलना नक्सलियों से करते हुए उन्होंने भविष्यवाणी की है कि यदि ‘आप’ को दिल्ली प्रदेश की सत्ता मिल भी गयी तो वह एक साल के भीतर सरकार से अलग हो जाएगी।

 स्वामी के अनुसार ‘केजरीवाल के सारे सहयोगियों का संबंध नक्सलियों से रहा है। वे सरकार नहीं चला सकते। आप देखेंगे कि वे समाप्त हो जाएंगे।’

 याद रहे कि अरविंद केजरीवाल ने मात्र 49 दिनों के बाद ही मुख्यमंत्री पद से 15 फरवरी 2014 को इस्तीफा दे दिया था। उस समय भी कुछ राजनीतिक पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि ‘आप’ अब समाप्त हो जाएगी। पर हुआ उसके विपरीत ।दिल्ली में ‘आप’ का वोट शेयर बढ़ता ही चला गया।

ओपियन पोल और एग्जिट पोल के नतीजों पर भरोसा करें तो ‘आप’ दिल्ली में एक बार फिर सरकार बनाएगी। आखिर दिल्ली की अधिकतर जनता ‘आप’ को इतना पसंद क्यों कर रही है?

क्यों भाजपा जैसी सुसंगठित पार्टी और नरेंद्र मोदी जैसे लोकप्रिय नेता को भी दरकिनार कर अधिकतर जनता  ‘आप’ को गले लगा रही है  ?

  जानकारों के अनुसार  इसका एकमात्र कारण यह  है कि ‘आप’ ने भ्रष्टाचार के प्रति लगातार शून्य सहनशीलता दिखाई है। यदि यही काम मोदी सरकार ने  आठ महीनों के कार्यकाल में किया होता तो ‘आप’ की चमक गायब हो गई होती।

 पर सरकार के भीतर जाकर संभवतः मोदी जी और बाहर से डा. स्वामी को लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चैतरफा युद्ध छेड़ देना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है। दूसरी ओर ‘आप’ इस तर्क से सहमत नहीं दिखती।

 इस पृष्ठभूमि में डा.स्वामी की यह सोच उनकी खुद की कसौटियों पर तो तार्किक लगती है। उन्हें लगता है कि नक्सली मानसिकता वाली ‘आप’ को यदि सरकार चलाने का मौका मिलेगा तो उनकी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई जीत ही नहीं सकेगी । और, जब जीत नहीं सकेगी तोे वे भाग खड़े होंगे।

   इन्हीं परिस्थितियों में केजरीवाल ने मुख्य मंत्री पद छोड़ा था। जबकि पद छोड़ने की उनकी कोई मजबूरी नहीं थी। इस देश में अधिकतर जनता उस नेता या दल को अधिक पसंद करती है जो अपने सिद्धांतों के लिए गददी छोड़ने के लिए तैयार रहता है। अरविंद ने जब पद छोड़ा था तो उस समय तो उनके समर्थकों के एक हिस्से ने उन पर गुस्सा दिखाया था। पर जब अरविंद ने स्थिति स्पष्ट की तो वही जनता संतुष्ट हो गई। इतना ही नहीं ‘आप’ का जन समर्थन बढ़ गया। दरअसल अधिकतर जनता ने ‘आप’ की कथित रणनीतिक त्रुटियों को नजरअंदाज किया और उसकी अच्छी मंशा पर भरोसा किया।

     केजरीवाल जमात का उभार जन लोकपाल आंदोलन के गर्भ से हुआ था।जब वह आदोलन चल रहा था, उस समय ‘आप’ बनी भी नहीं थी। क्योंकि उसके नेताओं का उद्देश्य राजनीति में जाना नहीं था। वे लोग अन्ना हजारे के नेतृत्व में गैर राजनीतिक आंदोलन चला कर जन लोकपाल विधेयक पास करवाना चाहते थे।

  पर जनलोकपाल विधेयक के कड़े मसविदे को देख कर देश की मौजूदा राजनीतिक जमात ,खासकर मनमोहन सरकार के कान खड़े हो गए थे।

 यदि उस विधेयक को उसी स्वरूप में पास कर दिया गया होता तो इस देश के अनेक नेता जेल में होते और चालू राजनीति को अपना कायाकल्प कर देना पड़ता।पर इसके लिए आज भला कौन तैयार है ?

  इसीलिए अन्ना हजारे की सलाह से मन मोहन सरकार ने जिस स्वरूप में लोकपाल विधेयक बाद में पास किया ,वह ‘आप’ के अनुसार नख-दंत विहीन है।उनकी गिरफ्त तो कोई चूहा भी नहीं लाया जा सकेगा  जबकि भ्रष्टाचार के बड़े -बड़े भेडि़यों और घडि़यालों को उनकी सही जगह बताने की जरूरत आज महसूस करती है।

  जिस लोकपाल आंदोलन के कारण जनता ने 2013 में ‘आप’ को सत्ता दिलाई थी,यदि वही विधेयक पास नहीं कर पाई तो वह गद्दी पर क्यों बैठी रहती ? वादा करके भूल जाने वाले दलों की भीड़ में ‘आप’ अलग तरह की पार्टी दिखाई पड़ रही है। आप के जनसमर्थन के बढ़ने का एक बड़ा कारण यही है।

  यदि ‘आप’ को इस बार भी सत्ता मिलेगी तो वह जन लोकपाल या यूं कहिए कि जन लोकायुक्त विधेयक को भूल नहीं सकती। पर विधेयक का जो मसविदा ‘आप’ के पास है, उसे विधेयक के रुप में पेश करने से पहले पूर्वानुमति की जरुरत पड़ेगी। ऐसे कड़े कानून बनाने की पूर्वानुमति यह व्यवस्था देगी ? उम्मीद तो नहीं है।
  डा.स्वामी को तो यह साफ लगता है कि वह अनुमति नहीं मिलेगी।फिर यदि बनी तो क्या ‘आप’ की सरकार सिर्फ कुर्सी गरम करने के लिए कुर्सी पर बनी रहेगी  ?

  डा.स्वामी को लगता है कि ऐसा नहीं होगा,इसलिए तुनक कर आप सरकार फिर गददी छोड़ देगी।
  राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार यदि ऐसा हुआ तो उसका पूरे देश पर  असर पड़ेगा ।

कई राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि  पूरा देश वर्षों से भीषण सरकारी और गैर सरकारी भ्रष्टाचार से पीडि़त है। 1966-67 में डा.राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में देश में कुछ गैर कांग्रेसी दलों का जो साझा आंदोलन और चुनावी अभियान चला  था,वह मुख्यतः भ्रष्टाचार के खिलाफ ही था।

 1974-77 के  जेपी आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार था। बोफर्स तथा अन्य घोटाले के खिलाफ वी.पी.सिंह के नेतृत्व में 1987-89 में चले आंदोलन का मुख्य मुददा तो
सिर्फ भ्रष्टाचार था।पर इन आंदोलनों के बाद निजाम बदलने के बावजूद देश के हालात नहीं बदले।
इन में से किसी सरकार ने यह कह कर गद्दी नहीं छोड़ी थी कि चूंकि वे अपने आंदोलन के मुददे को सरकार में आकर लागू नहीं कर पा रहे हैं,इसलिए गद्दी छोड़ रहे हैं।यह काम सिर्फ ‘आप’  ने किया।

  यदि इस बार गद्दी मिलने पर देश की भ्रष्टाचार समर्थक शक्तियां एक बार  केजरीवाल को गददी छोड़ने को विवश कर देंगीं तो उसका राजनीतिक परिणाम  देश भर में प्रकट हो सकता है।‘आप’ देर -सवेर राष्ट्रीय पार्टी बन कर उभर सकती है।क्योंकि उसकी अच्छी मंशा के कायल देश भर के लोग  हो सकते हैं।

  याद रहे कि आप के 2013-14 के 49 दिनों के शासनकाल में दिल्ली में भ्रष्टाचार काफी हद तक थम गया था।ऐसा प्रभाव  अब तक मोदी सरकार नहीं दिखा पाई है।

  एग्जिट पोल के नतीजे बताते हैं कि इस बार भी ‘आप’ को सभी जातियों,वर्गो और समुदायों में से  उन लोगों के वोट मिले हैं जो भ्रष्टाचार को इस देश की सबसे बड़ी समस्या मानते हैं।

 ‘आप’ की अगली सफलता या विफलता दोनों ही स्थितियों में देश भर में एक खास तरह के
राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना जाहिर की जा रही है।वह धु्रवीकरण भ्रष्टाचार समर्थक और भ्रष्टाचार विरोधी शक्तियों के बीच हो सकता है।यदि ऐसा हुआ तो इसके साथ यह भी अपने आप हो जाएगा कि जाति,समुदाय और संप्रदाय के आधार पर समाज को बांट कर वोट बटोरने वाले नेताओं को उनकी नानी याद आ जाएगी।

  ( इस लेख का संपादित अंश 10 फरवरी, 2015 के दैनिक भास्कर ,पटना में प्रकाशित )
   



गुरुवार, 13 नवंबर 2014

जनता परिवार का महामोर्चा समय की जरुरत


एक तरफ कांग्रेस मुरझा रही है तो दूसरी ओर भाजपा का हौसला सातवें आसमान पर है। ऐसे में जनता परिवार का महामोर्चा आज के समय की  जरुरत थी। वह पूरी हुई।

स्वस्थ लोकतंत्र  के लिए भी यह जरुरी है कि विपक्ष भी मजबूत हो।

  मुलायम सिंह यादव के यहां जुटे नेताओं का मंसूबा तो विभिन्न दलों में बिखरे पूरे जनता परिवार को एक बार फिर एक दल में शामिल कर देने का है। साथ ही वे यह भी चाहते हैं कि सभी गैर भाजपा -गैर कांग्रेस दल मिलकर काम करें। यह ऊंचा लक्ष्य है। पर फिलहाल जो कुछ भी वे कर पाए हैं, उसे भी सही दिशा में सही कदम ही माना जाएगा।

याद रहे कि महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा की जीत ने जनता परिवार को एक साथ बैठने का मजबूर कर दिया है।

  एक और अच्छी बात यह हुई है कि जनता परिवार के नेताओं ने नीतीश कुमार को अपना प्रवक्ता बना कर मीडिया के सामने पेश किया है। संतुलित और समतल दिमाग के सुलझे हुए नेता की जनता परिवार कमी रही है। ऐसे में नीतीश कुमार उन्हें काम आएंगे।

   फिलहाल नीतीश कुमार ने जो मुददे उठाए हैं, वे विवादास्पद नहीं कहे जा सकते। इन मुद्दों के जरिए मोदी सरकार को घेरने में सुविधा भी होगी। घनघोर जातिवाद, एकतरफा धर्मनिरपेक्षता का ओवरडोज, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण जनता परिवार के अनेक नेताओं का इकबाल हाल के वर्षों में काफी घटा है। राजनीति व सरकार में इन तत्वों, बुराइयों व मुद्दों को निरुत्साहित करने की जरुरत जनता परिवार के समझदार नेताओं को पड़ेगी ।तभी वे भाजपा व खास तौर पर नरेंद्र मोदी का कारगर मुकाबला कर पाएंगे। क्या ऐसा वे कर पाएंगे ?

सपा,राजद,इनेलोद,जदयू और जद (एस) के नेताओं की बैठक के बाद नीतीश कुमार ने मीडिया से जो कुछ कहा,उससे तो यह साफ लगा कि वे विवादास्पद मुद्दों को किनारे ही करना चाहते हैं।यह शुभ संकेत है।

   उपर्युक्त दलों के अधिकतर नेता कभी समाजवादी नामधारी पार्टी में रहे हैं। उनके आदर्श पुरुष गांधी, लोहिया और जय प्रकाश रहे हैं।

बुधवार को पटना में अपनी पार्टी की बैठक में नीतीश कुमार ने कहा भी था कि हमारी विचारधारा गांधी,लोहिया और जयप्रकाश नारायण के विचारों पर आधारित है। उम्मीद है कि महामोर्चा के लिए काम करते हुए नीतीश कुमार तथा जनता परिवार के अन्य नेतागण  इस बात को याद रखेंगे।

 राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार महामोर्चा को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी होगी कि कांग्रेस की किन कमजोरियों का लाभ उठा कर भाजपा या फिर कहिए नरेंद्र मोदी ने चुनावी सफलता पाई।

कांग्रेस की मुख्य कमजोरी यह रही कि उसके प्रथम परिवार में कोई भी कमी देखने की किसी स्तर के कांग्रेसकर्मियों को कोई इजाजत ही नहीं है। दूसरी कमी यह रही कि कांग्रेस की सरकारें आम तौर पर अन्य सरकारों से अधिक भ्रष्ट व अहंकारी रही।

अधिकतर मतदाताओं के अनुसार गत लोक सभा चुनाव में कांग्रेस की तीसरी और सबसे बड़ी गलती यह रही कि उसने एकतरफा व ढांेंगी धर्मनिरपेक्षता को मुख्य चुनावी मुददा बना दिया था।

  इन मुद्दों पर गांधी,लोहिया और जय प्रकाश नारायण के विचारों, कर्मो और जीवन शैली को महामोर्चा अपना सचमुच आदर्श माने तो उसे भाजपा सरकार का मुकाबला करने में सुविधा होगी। इस मामले में भारत का संविधान भी महामोर्चा के नेताओं के लिए बढि़या दिशा निदेशक का काम कर सकता है।

       
  
   

  

बुधवार, 7 मई 2014

चुनाव में मनी पावर यानी एक नया वोट बैंक

चुनावों में ‘मनी पावर’ एक नये ढंग के वोट बैंक के रूप में तेजी से उभर रहा है। यह तत्व भी मतदान को एक हद तक प्रभावित करने लगा है।
 जिन चुनाव क्षेत्रों में थोड़े मतों से हार-जीत का फैसला होता है, वहां मनी पावर निर्णायक साबित होता दिख रहा है।

 यह मनी पावर यानी नया वोट बैंक, परंपरागत जातीय व सांपद्रायिक वोट बैंक को जहां -तहां काफी ताकत पहुंचा रहा है। तीनों तत्व मिलकर कहीं -कहीं निर्णायक साबित हो रहे हैं।

 मिल रही सूचनाओं के अनुसार मनी पावर अभी किसी जातीय वोट बैंक से अधिक ताकतवर नहीं बना है, पर यह उस रास्ते पर जरूर है।

   मौजूदा चुनाव में आयकर दस्तों ने देश भर में 273 करोड़ रुपये नकदी और करीब दो करोड़ लीटर शराब जब्त की है। यह आंकड़ा गत एक मई तक का है। बिहार सहित देश भर में ऐसी जब्तियां अब भी जारी हैं। जब्तियों की यह मात्रा अभूतपूर्व है।

  जितने पैसे व शराब पकड़े गये हैं, वे उन अपार धन व सामग्री के बहुत छोटा हिस्सा हंै जो पकड़े नहीं जा सके। वे मतदाताओं के एक हिस्से के बीच वितरित कर दिये गये।

 एक ताजा अध्ययन के अनुसार देश के नेतागण इस पूरे चुनाव में कुल करीब तीस हजार करोड़ रुपये खर्च करेंगे। इनमें वैध व अवैध खर्च शामिल हैं।

   गत साल जून में भाजपा नेता गोपी नाथ मुंडे ने सार्वजनिक रुप से यह स्वीकार किया था कि उन्होंने 2009 के लोकसभा के चुनाव में अपने क्षेत्र में 8 करोड़ रुपये खर्च किये थे।

 गत दिनों चुनाव आयुक्त एच.एस. ब्रह्मा ने एक रहस्योद्घाटन किया । श्री ब्रहमा ने कहा कि मैंने सुना है कि आंध्र प्रदेश के एक संभावित लोकसभा उम्मीदवार अपने चुनाव क्षेत्र में एक सौ करोड़ रुपये खर्च करने वाला है। एक अन्य उम्मीदवार ने व्यक्तिगत बातचीत में श्री ब्रह्मा को बताया था कि अपने चुनाव क्षेत्र में वह 35 करोड़ रुपये खर्च करने वाला है।

  इन आंकड़ों व सूचनाओं को देखकर क्या ऐसा नहीं ंलगता कि ‘मनी पावर’ एक नया वोट बैंक बनता जा रहा है। वह  जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंक से कम खतरनाक नहीं है !

  यह संयोग नहीं है कि इस देश की संसद व विधायिकाओं में करोड़पतियों व अरबपतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

 चुनाव आयोग की कड़ाई के कारण चुनाव में बाहुबल का इस्तेमाल पहले की अपेक्षा थोड़ा कम हुआ है। पर, कई क्षेत्रों में मनी पावर, अब बाहुबल का विकल्प बन कर उभरा है।

  बूथ कैप्चर की जगह भारी पैसे के बल पर मतदाताओं के एक हिस्से को अपने प्रभाव में लाया जा रहा है। मतदाताओं का जो हिस्सा पैसे स्वीकार कर रहा है,उनमें से अधिकतर लोगों के दिलों -दिमाग में यह भाव उभर रहा है कि जब सत्ता में आने के बाद किसी भी दल को आम जन की भलाई के लिए काम नहीं ही करना है, खुद की भलाई के लिए ही बहुत करना है, तो क्यों नहींं आज जो कुछ उनसे मिल रहा है, उसे ही स्वीकार करके संतोष कर लिया जाए।

राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार वैसे मतदाता इस बात की परवाह नहीं कर रहे हैं कि पैसे के बल पर चुनाव जीतने वाले नेतागण  और भी कितना अधिक निर्भीक होकर इस देश को लूटंेगे।

 हालांकि यह बात भी सही है कि इसी देश में  कुछ दल व नेता ऐसे भी हैं जो चुनावों में मनी पावर के खेल में शामिल नहीं हैं।  


(साभार -दैनिक भास्कर ,पटना संस्करण- 6 मई 2014)

होली की गालियां या गब्बर सिंह के डायलाॅग ?


गत बिहार विधानसभा चुनाव में भी प्रतिस्पर्धी नेताओेंं के बीच तीखे आरोपों -प्रत्यारोपों के दौर चले थे। तब एक बड़े नेता ने कहा था कि चुनाव के दौरान की गई आलोचनाएं होली की गालियां जैसी होती हैं। उन गालियों को होली बीतने के बाद भुला दिया जाता है।

   पर क्या इस बार की तीखी व अभूतपूर्व गालियां भी होलियाना ही हैं ? ऐसा तो नहीं लगता। इन गालियों व तीखे संवादों के सामने तो शोले फिल्म के गब्बर सिंह के डायलाॅग भी फीके हो गये हैं।

क्या नेताओं के जहर बुझे बयानों से लगे घाव चुनाव के बाद भी जल्दी भर पाएंगे ? उम्मीद की जानी चाहिए कि वे घाव जल्द ही भर जाएं और तनावमुक्त ढंग से लोकतंत्र की गाड़ी फिर से चलने लगे।

   पर, ऐसा होने मेंे  कई लोगों को अभी संदेह है। उनका मानना है कि इसका असर चुनाव के बाद भी कुछ दिनों तक रहेगा। कई लोगों को इस बात पर आश्चर्य हो रहा है कि क्यों चुनाव आयोग  कसूर के अनुपात में तौलकर उन नेताओं को  सजा नहीं दे रहा है जो नेतागण खुलेआम चुनाव आचार संहिता का घोर उल्लंघन कर रहे हैं। साथ ही जो वोट के लिए समाज में विद्वेष फैलाने के साथ- साथ लोकतंत्र की गरिमा भी गिरा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि आचार संहिता के सवाल पर एक -दो चुनाव क्षेत्रों के चुनाव स्थगित कर दिए गए होते तो बेलगाम नेताओं की बोलती बंद हो गई होती।

   चुनाव के कुछ फेज अब भी बाकी हैं। अब यह मतदाताओंं पर ही निर्भर है कि एक दूसरे के खिलाफ बयानों के ऐसे जहर बुझे तीर चलाने वालों को वे वोट देंगे या नहीं। क्या मतदातागण ऐसे ही लोगों के हाथों संसदीय जनतंत्र की कमान सौंपेंगे जिनकी जुबान इतनी बेलगाम व जहरीली हैं ? जो वोट के लिए किसी भी हद तक जाकर जातीय व सांप्रदायिक भावनाएं उभार सकते हैं ? जो किसी की भी प्रतिष्ठा का ख्याल रखे बिना किसी भी तरह के अपुष्ट व उल्टे सीधे आरोप लगा सकते हैं ?

  इतने गंदे, अश्लील, दिलों को भेदने वाले तथा समाज में द्वेष फैलाने वाले आरोप-प्रत्यारोप इससे पहले किसी चुनाव में नहीं लगाये गये थे। जब जुबान पर हिंसा हो तो सरजमीन पर भी उसका असर देखा ही जा सकता है। चुनाव से संबंधित हिंसक घटनाओं की खबरें आने भी लगी हैं।

  इसके साथ ही जितनी अधिक मात्रा में काला धन का इस्तेमाल मौजूदा चुनाव में हो रहा है,उतना इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

  लगातार पकड़े जा रहे भारी मात्रा में काला धन से इस बात की पुष्टि होती है। याद रहे कि जुबान ही नहीं बल्कि काला धन भी मतदाताओं के एक हिस्से को प्रभावित करते हैं। इस देश के लोकतंत्र में तेजी से घर कर रही इन गंभीर बीमारियों का इलाज सिर्फ मतदाताओं के पास है। उनसे उम्मीद की जा रही है कि नफरत व चुनावी गंदगी फैलाने वाले नेताओं को इस चुनाव में नकार दें।

   अन्यथा जहर उगलने वाले नेतागण अपने राजनीतिक लाभ के लिए आने वाली पीढि़यों के दिलो -दिमाग में भी जहर ही घोलेंगे।   

अब जरा कुछ नेताओं की बदजुबानियों के कुछ नमूने पढि़ए।

 एक नेता ने अपने प्रतिद्वंद्वी नेता के बारे में कहा कि वह घमंडी और लुटेरा है। दूसरे ने कहा  कि वह कसाई है। तीसरे की टिप्पणी थी कि उसे देख कर तो कसाई भी शर्मा जाते हैं।

  जब तक वे एक दूसरे को पप्पू और फेंकू कह रहे थे, तब तक वह सहनीय था। क्योंकि उसमें मनोरंजन का भी पुट था। पर अब तो आरोप-प्रत्यारोपों में खांटी दुश्मनी के भाव दिख रहे हैं। जीजाजी शब्द के उच्चारण से राजनीति की गरिमा गिरी। नपुंसक व गुंडे शब्द ने लोकतंत्र को शर्मा दिया। इनके अलावा भी कुछ ऐसे डायलाॅग बोले गये जिन्हें सुन कर गब्बर सिंह के डायलाॅग भी फीके लगने लगे।

वैसे अभी चुनाव प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। अब भी न जाने कितने विषैले तीर हमारे नेताओं के पास बचे हुए हैं। हालांकि यह कहना भी सही नहीं होगा कि सारे नेता ऐसे ही हैं। इस तनावपूर्ण चुनाव में भी कुछ नेताओं की जुबान पर अब भी शालीनता विराजमान है।


(30 अप्रैल 2014 के दैनिक भास्कर के पटना संस्करण में प्रकाशित)       

रविवार, 16 मार्च 2014

बलिदान की भूमि पर आदर्शों की हत्या

  बिहार में इस बार जितने बड़े पैमाने पर टिकट के लिए दल -बदल हो रहे हैं, उतने इससे पहले कभी नहीं हुए। बिहार कभी सेवा, त्याग और बलिदान वाली राजनीति की भूमि रहा है। अब तो उसे पहचानना ही मुश्किल है।
सवाल यह नहीं है कि कितने लोग दल -बदल कर रहे हैं। सवाल यह है कि आज की राजनीति में कौन ऐसा नेता बचा है जिसका टिकट कट जाने के बावजूद वह अपने दल में बना रह जाएगा ?

किसी नेता को अपनी पत्नी के लिए टिकट चाहिए तो किसी को अपने पति के लिए। किसी की संतान टिकट के लिए मचल रही है तो कोई खुद टिकट के बिना जिंदा नहीं रह सकतां।

  टिकट के लिए इस चूहा -दौड़ को देख कर लगता है कि आज टिकट धर्मा, टिकट कर्मा, धर्मा-कर्मा टिकट-टिकट ही हो चुका है।

    बिहार की इसी धरती पर डा. राजेंद्र प्रसाद हुए थे जिन्होंने 1949 में जवाहर लाल नेहरू को यह लिख कर दे दिया था कि मैं किसी पद का उम्मीदवार नहीं हूं। उनसे पंडित नेहरू ने पूछा था कि क्या आप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं?

यह और बात है कि बाद में सरदार पटेल और दूसरे नेताओं के हस्तक्षेप के बाद राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति बने थे।
  जय प्रकाश नारायण कभी सक्रिय राजनीति में भी थे, पर खुद कभी चुनाव नहीं लड़े। बाद में जेपी ने उपप्रधानमंत्री बनाने के नेहरू के आॅफर को ठुकरा दिया था।

आजादी के समय के बिहार कांग्रेस के दो सर्वाधिक प्रमुख नेता डा. श्रीकृष्ण सिन्हा और डा.अनुग्रह नारायण सिन्हा कभी टिकट के लिए आवदेन पत्र तक ंनहीं देते थे।

उन्हें पार्टी टिकट आॅफर करती थी। तब श्रीबाबू मुख्यमंत्री व अनुग्रह बाबू वित्त मंत्री थे।

 समाजवादी नेता व पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर से जब 1980 में उनकी पार्टी ने कहा कि आपके पुत्र को भी हम लोग विधानसभा का चुनाव लड़वाना चाहते हैं तो कर्पूरी ठाकुर ने कहा कि उसे दे दीजिए, पर तब मैं खुद नहीं लडूंगा। क्योंकि परिवार के किसी एक ही व्यक्ति को चुनाव लड़ना चाहिए। बिहार के ताजा राजनीतिक इतिहास में ऐसे अन्य अनेक उदाहरण मिलेंगे।

2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजद नेता जगदानंद सिंह ने रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र में अपने पुत्र को हरवा दिया। उनका पुत्र भाजपा से उम्मीदवार था। जगदानंद ने एक यादव कार्यकर्ता को उम्मीदवार बनवा कर बेटे को हराया।

इससे पहले कोई यादव उम्मीदवार उस क्षेत्र से चुनाव जीत नहीं पाया था। क्योंकि वह राजपूतबहुल क्षेत्र है। जगदानंद सिंह खुद राजपूत परिवार से आते हैं। उन पर लालू प्रसाद का दबाव था कि वे अपने बेटे को ही राजद का उम्मीदवार बनायें। पर उन्होंने नहीं बनाया। 

जगदानंद बक्सर से निवर्तमान सांसद हैं। पर इसके विपरीत आज अपने ही घोषित नीति -सिद्धांत, दलीय आस्था और नेतृत्व के प्रति निष्ठा को तिलांजलि दे -दे कर बड़ी संख्या में नेतागण दल बदल कर रहे हैं और परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं।

  लगता है कि संसद की सीट नहीं हो बल्कि स्वर्ग की सीढ़ी हो।

बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष चैधरी महबूब कैसर का एल.जे.पी. में जाना और राजद नेता रामकृपाल यादव का भाजपा ज्वाइन करना लोगों को चैंकाता है।

यानी चुनावी टिकट के समक्ष सांप्रदायिकता व सामाजिक न्याय के मुद्दे कुछ भी नहीं हंै। वंे मुददे भी सिर्फ मतदाताओं को मूर्ख बनाने के लिए हैं। 

  रामविलास पासवान यह काम पहले ही कर चुके हैं। पर उनके ताजा ‘दिल-बदल’ को देखकर कम से कम उन लोगों को कोई आश्चर्य नहीं हुआ जो 2002 में उनके राजग छोड़ने की असलियत को जानते हैं।

   ऊपर दिये गये कुछ नाम तो नमूने मात्र हैं। दल बदल की महामारी व टिकट के लिए मारामारी से कोई दल वंचित नहीं है। बड़े नेताओं की ओर से ऐसे कामों के लिए पूरा उकसावा है।

  आखिर ऐसे दल बदलु लोग किसी न किसी कीमत पर संसद में क्यों जाना चाहते हैं? क्या वे राष्ट्रहित में सार्थक चर्चा करने के लिए उतावले हैं ? क्या ऐसा कुछ इन दिनों संसद में हो भी रहा है ?

 क्या इन दिनों संसद में देशहित के गंभीर मुद्दे पर कभी कोई आम सहमति बन भी पा रही है ?

  क्या भ्रष्टाचार, महंगाई, संसद के भीतर की रोज ब रोज की अराजकता तथा दूसरे जरुरी मुद्दों पर कोई सार्थक व कारगर बहस हो पा रही है ?

राजनीति में धन बल, बाहुबल व कारपोरेट बल के बढ़ते प्रभाव को रोकन के लिए संसद कोई काम कर भी रही है ?

 इसके विपरीत जनहित में जो कुछ भी कदम उठाए जा रहे हैं, वे आम तौर पर  अदालतों व मीडिया के दबाव के कारण ही।

 ऐसे में दल बदलु लोगों, नव कुबेरों, स्वार्थी तत्वों और आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को संसद में भेज कर मतदातागण देश का कौन सा भला करेंगे ?

यदि थोड़े से  अपवादों को छोड़ दें तो दल बदल करने वालों में से अधिकतर नेताओं के जीवन में शुचिता नाम की कोई चीज नहीं है।

  देश व लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि अधिकतर राजनीतिक दलों ने ऐसे ही लोगों को भेजने की तैयारी कर ली है। इस स्थिति में राजनीतिक प्रेक्षकों व देश का भला सोचने वालों की राय है कि अब यह जिम्मेदारी मतदाताओं पर है जो ऐसे लोगों को कत्तई तरजीह नहीं दें।राजनीतिक दलों की गलतियां सुधारने की जिम्मेदारी अब मतदाताओं पर आ पड़ी है। 


(इस लेख का संशोधित अंश जनसत्ता के 15 मार्च 2014 के अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

गठबंधन से पहले ओपिनियन पोल की जल्दीबाजी क्यों ?

चुनावी गठबंधन का काम पूरा होने से पहले ही ओपिनियन पोल कराने की जल्दीबाजी क्यों दिखाई जा रही है ? इसको लेकर राजनीतिक हलकों में आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है।

  चुनावी गठबंधन के काम अभी अधूरे हैं। चुनाव पूर्व दल-बदल की प्रक्रिया भी अभी पूरी नहीं हुई है। हर चुनाव से पहले बड़ी संख्या में नेता दल बदल करते हैं। दल बदल टिकट के बंटवारे तक जारी रहते हैं। वोट के समीकरण में राजनीतिक गठबंधनों व दल- बदल का काफी महत्व रहा है। इस देश का चुनावी इतिहास यही बताता है।

  पर गठबंधन के पहले ही इन दिनों धुआंधार चुनावपूर्व ओपियन पोल कराए जा रहे हैं। उनके नतीजे भी सार्वजनिक किये जा रहे हैं। ऐसे में ये नतीजे आखिर कितने सटीक साबित होंगे ?

  यह सवाल बिहार को लेकर अधिक मौजूं है।


नतीजे गलत होने के आसार

   वैसे भी ओपिनियन पोल के नतीजे सीटों की संख्या के बारे में सटीक नहीं होते। हो भी नहंीं सकते। पर,उससे चुनावी हवा के रुख का जरूर पता चल जाता है। पर, यह भी इस बात पर निर्भर करता है कि ओपिनियन पोल का समय क्या है। चुनावी गठबंधन से पहले तो ओपिनियन पोल के नतीजों के गलत होने के और भी आसार रहते हैं। इसके बावजूद ओपिनियन पोल करने-कराने के लिए इतनी जल्दीबाजी क्यों ? इस जल्दीबाजी के कारण ओपिनियन पोल को बकवास बताने वालों को बल मिल रहा है। नेताओं की एक जमात हमेशा ही ओपिनियन पोल के खिलाफ आवाज उठाती रही है।

ओपिनियन पोल के नतीजे जिन दलों या नेताओं के खिलाफ जाते हैं, वे तो कुछ अधिक ही जोर-शोर से ऐसे पोल के खिलाफ आवाज उठाते रहते हैं। उनमें से कुछ लोग पोल की मंशा पर भी शक करते हैं। समय पूर्व ओपिनियन पोल से ऐसे लोगों को बल मिलता है।  


अलग पोल के अलग नतीजे

बिहार से संबंधित कुछ ओपिनियन पोल के परस्परविरोधी नतीजे भी आ रहे  हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार उनके सटीक होने के बारे में संदेह है। अब तक   दो अलग- अलग ओपिनियन पोल के अलग-अलग नतीजे आ चुके हैं। ये पोल हाल ही कराए गए थे।


अलग-अलग गठबंधन

    बिहार में राजद, जदयू और भाजपा अलग -अलग बड़ी राजनीतिक ताकतें हैं। ये दल अलग-अलग गठबंधन करने की कोशिश में हैं। यदि गठबंधन हो गये तो वोट के समीकरण थोड़ा बदल सकते हैं। फिर तो चुनाव नतीजे भी अलग तरह के हो सकते हैं। ऐसे में हाल के ओपिनियन पोल के नतीजों का क्या और कितना अर्थ रह जाएगा ?

  इन पंक्तियों के लिखते समय तक राजद प्रमुख लालू प्रसाद कांग्रेस, लोजपा और एन.सी.पी. से चुनावी तालमेल की कोशिश में हंै। बातचीत चल रही है। पर इस बीच यह भी खबर आई है कि लोजपा भाजपा से तालमेल कर सकती है।

  उधर जदयू भी कुछ वाम दलों से गठबंधन कर सकता है। वह काम भी अभी पूरा नहीं हुआ है। छोटे-छोटे दलों की चुनावों में भूमिका कई बार महत्वपूर्ण हो जाती है।

राम विलास पासवान की पार्टी लोजपा एक छोटी पार्टी है। पर वह दही में जोड़न का काम करती रही है। सन 1999 के लोकसभा चुनाव में लोजपा एन.डी.ए. के साथ थी। नतीजतन उस चुनाव में बिहार से राजग को ही लोकसभा की अधिकतर सीटें मिलीं थीं।

पर राजग को छोड़कर लोजपा 2004 के लोकसभा चुनाव में राजद के साथ हो गई। परिणाम इस गठबंधन के पक्ष में हो गया और राजग की खटिया खड़ी हो गई।

पर 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले लोजपा के किसी गठबंधन में शामिल होने की घोषणा के बिना ही ओपिनियन पोल करा लिये गये और रिजल्ट घोषित कर दिये गये। आखिर ऐसे ओपिनियन पोल के नतीजों को कितना विश्वसनीय माना जाए?

 (24 फरवरी 2014 के जनसत्ता में प्रकाशित) 


गुरुवार, 30 जनवरी 2014

इतिहास गवाह बेहद जरूरी है सुरक्षा चक्र


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को निजी सुरक्षा के संबंध में इतिहास तथा ‘जनता दरबार’ के संबंध में वर्तमान से सीखना चाहिए। भगदड़ मच जाने का खतरा सामने होने पर मुख्यमंत्री को शनिवार को अपने ‘जनता दरबार’ को बीच में ही स्थगित कर देना पड़ा। अब वे बेहतर तरीके से जनता दरबार आयोजित करने का प्रयास करेंगे।

   बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वर्षों से ‘जनता के दरबार में मुख्यमंत्री’ कार्यक्रम आयोजित करते रहे हैं। वहां कोई भगदड़ नहीं मचती क्योंकि भीड़ को नियंत्रित रखने के उपाय किये जाते हैं। केजरीवाल को उस अनुभव से लाभ उठाना चाहिए था।

   दूसरी ओर, अपनी निजी सुरक्षा को लेकर उन्हें इतिहास से सीखना चाहिए। जो इतिहास से नहीं सीखता, वह उसे दुहराने के लिए अभिशप्त होता है।


नेता नहीं, विशेषज्ञ करें सुरक्षा का फैसला

   केजरीवाल ने शुक्रवार को भी कहा है कि वे जेड श्रेणी की सुरक्षा स्वीकार नहीं करेंगे। दरअसल किस नेता को किस श्रेणी की सुरक्षा चाहिए, उसका फैसला खुद नेता को नहीं बल्कि विशेषज्ञों को करने देना चाहिए।  

  इस बीच यह खबर आई है कि केजरीवाल के इस निर्णय से मुख्यमंत्री की सुरक्षा का खर्च बढ़ गया है। क्योंकि उनकी परोक्ष सुरक्षा पर शासन को अधिक खर्च करना पड़ रहा है।

   मुख्यमंत्री के रूप में केजरीवाल जनहित में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। उनके प्रारंभिक सरकारी फैसलों से भी निहितस्वार्थी तत्व सख्त नाराज हो सकते हैं। उन्हें नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी कर सकते हैं। 

केजरीवाल कहते हैं कि उनका जीवन भगवान के हाथों में है। पर कहावत  है कि ‘भगवान भी उसी की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करता है।’


देश भुगत चुका है नुकसान

सुरक्षा के मामलों में लापरवाही बरतने या फिर इसे भगवान के भरोसे छोड़ दे़ने का भारी नुकसान यह देश कई बार भुगत चुका है। मध्य युग में जब विदेशी हमलावर हमारे मंदिरों पर आक्रमण करते थे तो पुजारीगण हमलावरों का मुकाबला करने -करवाने के बदले उसी समय भगवान की प्रार्थना करने लगते थे। वे मंदिर की रक्षा के लिए भगवान को बुलाने लगते थे। भगवान को तो न आना होता था और न ही वे आते थे। नतीजों की कहानियां हमारे इतिहास के पन्नों पर मौजूद हैं।ं 


महात्मा गांधी ने भी किया था इंकार

  केजरीवाल को महात्मा गांधी हत्याकांड से भी सबक लेना चाहिए। महात्मा गांधी तब दिल्ली के बिड़ला हाउस में प्रार्थना सभाएं आयोजित करते थे। उनमेंं शामिल होने के लिए आने वालों की तलाशी लेने तक की अनुमति उन्होंने शासन को कभी नहीं दी थी।

  यदि सघन तलाशी ली गई होती तो नाथूराम गोडसे अपनी पिस्तौल लेकर गांधी जी के नजदीक नहीं पहुंच पाता। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने भी अपनी सुरक्षा के मामले में अव्यावहारिक रुख अपनाया था।


दुश्मनों की कमी नहीं

केजरीवाल की भी सुरक्षा की समस्या सिर्फ उनकी खुद की समस्या नहीं है। दरअसल केजरीवाल अब उन लोगों की भी संपत्ति हैं जिन लोगों ने उनसे एक बेहतर सरकार व नई राजनीतिक शैली की उम्मीद लगा रखी है। वे कितने दिनों तक दिल्ली की गद्दी पर रहते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वे सत्ता से बाहर भी रहेंगे तो उनके दुश्मनों की अब कोई कमी नहीं रहेगी। क्योंकि केजरीवाल शैली की राजनीति को यह सिस्टम स्वीकार करने के लिए अभी तैयार ही नहीं दिखता है। निहितस्वार्थियों की जमात ऐसे भी हर समय सक्रिय रहती है। 

  बेहतर सरकारी फैसलों के साथ- साथ सादा जीवन बिताना केजरीवाल का स्वभाव सा बन गया है। इससे केजरीवाल के पक्ष में देश में अच्छा संदेश गया है। इसे ही पर्याप्त माना जाना चाहिए था।


जनता को हक का हौसला

    इस देश में आतंकवाद, नक्सलवाद और आर्थिक तथा आपराधिक माफियागिरी का दौर -दौरा चल रहा है। उसमें किसी ईमानदार व देशभक्त नेता की सुरक्षा कभी भी खतरे में पड़ सकती है। आम आदमी की सरकार दिल्ली के जिन बड़े- बड़े व ताकतवर आर्थिक अपराधियों के स्वार्थों को क्षति पहुंचाकर आम जनता को उनका हक दिलाने का हौसला बांध रही है, वैसी स्थिति में केजरीवाल की निजी व बेहतर सुरक्षा बहुत जरूरी है।


पटेल को मना किया था महात्मा गांधी ने

   20 जनवरी, 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस के पास बम विस्फोट हुआ था। उस घटना के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने एक एस.पी. को बापू के स्टाफ के पास भेजा। एस.पी. ने उन लोगों से कहा कि हम चाहते हैं कि प्रार्थना सभा में शामिल होने वालों की तलाशी ली जाए।

 पर गांधी जी इसके लिए तैयार नहीं हुए। उसके बाद डी.आइ.जी. स्तर के एक अधिकारी गांधी जी से मिले। उनसे गांधी जी ने कहा कि मेरी जान ईश्वर के हाथ है। अंत में सरदार पटेल ने खुद गांधी से मिलकर उनसे प्रार्थना की। पर गांधी जी ने साफ -साफ कह दिया कि यदि किसी की भी तलाशी शुरू कराओगे तो मैं आमरण अनशन शुरू कर दूंगा। शासन लाचार हो गया और नाथू राम गोडसे सफल हो गया। हालांकि तब घटना के समय वहां सादे कपड़े में 30 पुलिस अधिकारी तैनात थे।


इंदिरा ने की चेतावनी की अनदेखी

  अब जरा इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या की चर्चा की जाए। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में जून ,1984 में हुए ब्लू स्टार आपरेशन की पृष्ठभूमि में उनके निजी सुरक्षाकर्मियों ने ही उनके आवास में इंदिरा जी की हत्या कर दी।

  आपरेशन ब्लू स्टार के बाद ही इंदिरा गांधी की जान पर खतरा काफी बढ़ गया था। खुफिया सूत्रों ने इंदिरा गांधी के निजी सचिव आर.के. धवन से कहा था कि एक खास समुदाय के सुरक्षाकर्मियों को प्रधानमंत्री की सुरक्षा से हटा दिया जाना चाहिए। उन्हें नहीं हटाया गया। धवन ने बाद में एक आयोग के समक्ष कहा कि ‘उन सुरक्षाकर्मियों को न हटाने का निर्णय खुद प्रधानमंत्री का था न कि मेरा।’

  हालांकि एक अन्य खबर के अनुसार इंदिरा गांधी ने 1971 के बंगलादेश युद्ध के समय संदिग्ध लोगों को महत्वपूर्ण स्थानों से हटवा दिया था।

  यह और बात है कि तब प्रतिपक्षी नेता जार्ज फर्नांडिस ने यह सवाल उठाया था। जार्ज 1972 की अपनी जनसभाओं में इस बात को लेकर  इंदिरा जी की आलोचना किया करते थे।


राजीव गांधी ने भी तोड़ा था नियम

   इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश व खुद कांग्रेस की राजनीति बदल गई। राजीव गांधी की 1991 में मद्रास के पास बेरहम हत्या कर दी गई। जिस सभा में मानव बम के जरिए तमिल उग्रवादियों ने उनकी हत्या की, उस सभा में सुरक्षा नियमों को खुद राजीव गांधी और तमिलनाडु कांग्रेस के नेताओं ने तोड़ा था। राजीव गांधी ने मानव बम बनी युवती को अपने पास आने दिया जबकि सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा करने की मनाही थी। राजीव गांधी के नहीं रहने पर कांग्रेस को और अधिक नुकसान हुआ।

  राजीव गांधी आज होते तो कांग्रेस की जैसी स्थिति आज बनी हुई है, शायद वैसी नहीं होती। आज सोनिया -राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस बिना पतवार की दिशा विहीन नाव बन चुकी है। एक बड़ी पार्टी की दुर्दशा का दंश पूरा देश भी झेल रहा है।


देश के लिए महत्वपूर्ण थे नेता 

इसलिए कई बार किसी देश की राजनीति को प्रभावित करने के लिए एक नेता का बड़ा रोल होता है। कल्पना कीजिए कि यदि महात्मा गांधी आजादी के पांच-दस साल बाद तक भी हमारे बीच रहते तो क्या सत्ताधारी कांग्रेसियों की वैसी ही दशा-दिशा होती जैसी प्रारंभिक वर्षों में ही सत्ताधारियों ने बना दी ?

याद रहे कि जब गांधी की हत्या हुई तब उनकी उम्र 80 साल भी पूरी नहीं हुई थी। गांधी की तरह ही निजी जीवन में संयमी मोरारजी देसाई करीब सौ साल तक हमारे बीच थे। करीब 95 साल तक तो मोरार जी भाई  दिमागी तौर पर सजग व सक्रिय थे। 

  इस पृष्ठभूमि में अपनी निजी सुरक्षा को लेकर आज अरविंद केजरीवाल जैसे नेता लापरवाही व अपरिपक्वता अपनाते हैं तो वे राजनीति के इस मोड़ पर खुद से अधिक उस जनता को भी अनिश्चितता में डालते हैं जो लोग उनकी ओर उम्मीद भरी नजरों से आज देख रहे हैं।

(इस विश्लेषण का संपादित अंश 12 जनवरी, 2014 के जनसत्ता में प्रकाशित)

बुधवार, 8 जनवरी 2014

बुत बनने की राह पर अन्ना


  अन्ना हजारे ने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को चिट्ठी लिखकर उनसे मदद मांगी है। यह मदद किसी जन कल्याणकारी काम के लिए नहीं मांगी गई है। मदद अन्ना की खुद की मूर्ति की स्थापना के लिए मांगी गई है।

   विख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे ने भाजपा नेता से आग्रह किया है कि वे गुड़गांव में उनकी मूर्ति लगाने में आ रही अड़चन को दूर करें। अन्ना समर्थकों द्वारा अन्ना हजारे की मूर्ति लगाने की कोशिश का स्थानीय भाजपा नेता विरोध कर रहे हैंं।

  भाजपा अध्यक्ष ने अन्ना की चिट्ठी पर क्या कदम उठाया है, यह तो पता नहीं चला है, पर अन्ना की यह चिट्ठी चैंकाती है। (ताजा जानकारी के अनुसार राजनाथ सिंह के हस्तक्षेप के बाद गुड़गांव के भाजपा नेता ने  अन्ना की मूर्ति के लिए स्थल चयन में मदद करने का आश्वासन दिया है।)

 यह बात खुद अन्ना हजारे के स्वभाव व व्यक्तित्व के खिलाफ लगती है। अन्ना हजारे की छवि एक निःस्वार्थ सेवाभावी की बनी है। उस छवि में इस बात का कोई स्थान नहीं है कि वे अपने जीवनकाल में ही अपनी मूर्ति लगवाने के काम में मदद करें। आज की तारीख में तो अन्ना हजारे करोड़ों लोगों के दिलों में घर बना चुके हैं। उन्हें मूर्तियों में समेटना बनावटी लगता है।

  राजनाथ सिंह को लिखी चिट्ठी से अन्ना हजारे की खुद की छवि को धक्का लगता है। अन्ना के अनेक प्रशंसकों ने इसे अच्छा नहीं माना है। उन्हें डर है कि इससे अन्ना के विरोधियों को बल मिलेगा। अन्ना के भ्रष्टाचारविरोधी अभियान के कारण अनेक निहितस्वार्थी तत्व अन्ना के विरोधी हो गये हैं।

इससे पहले मायावती अपनी मूर्ति को लेकर काफी चर्चा में आई थीं। अपने शासनकाल में उन्होंने उत्तर प्रदेश में अपनी भी मूर्तियां लगवाईं।

मायावती जैसी नेताओं को यह आशंका हो सकती है कि उनके नहीं रहने के बाद पता नहीं कोई उनकी मूर्तियां लगवाएगा या नहीं। पर अन्ना हजारे को तो इसकी कोई आशंका नहीं होनी चाहिए थी।

  उनके नहीं रहने पर उनकी मूर्तियां लगेंगी ही ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है। भ्रष्टाचार विरोधी अभियान व जन सेवा के क्षेत्रों में उनके काम उल्लेखनीय रहे हैं। अभी तो उन्हें और भी काम करने हैं।

डा. राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि किसी व्यक्ति की मूर्ति उसके निधन के सौ साल बाद ही लगनी चाहिए। क्योंकि इतिहास तब तक उस व्यक्ति के बारे में निष्पक्ष आकलन कर चुका होता है।

  नब्बे के दशक मेंे मास्को में उस देश के वासियों द्वारा ही जब लेनिन की मूर्ति सरेआम तोड़ दी गई तो कुछ लोगों ने डा. लोहिया की उक्ति याद की थी। तब तक बोल्शेविक क्रांति के सौ साल पूरे नहीं हुए थे।

  पर इसी देश में संभवतः पहली बार इलाहाबाद में खुद डा. लोहिया की मूर्ति लगनी शुरू हुई तो विरोध होने पर उनके कुछ अनुयायियों ने डा.लोहिया की उक्ति को ही झुठला दिया। एक लोहियावादी ने कहा कि डा.लोहिया ने सौ साल बाद नहीं बल्कि दस साल बाद की ही सीमा बांधी थी।

दरअसल जिन्हें डा. लोहिया के कहे अनुसार नहीं चलना था, उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु को मूर्तियों तक ही सीमित कर देना ठीक समझा।

  इस संबंध में अविभाजित कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा की टिप्पणी याद आती है। 1994 में कर्नाटका के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरप्पा मोइली ने घोषणा की कि वे एस. निजलिंगप्पा की मूर्ति उनके जीवनकाल में ही लगवाना चाहते हैं। इसके लिए विधायकों की एक समिति गठित की जाएगी।

 पर, उस समय जब इस बारे में निजलिंगप्पा से एक पत्रकार ने पूछा तो उन्होंने एक अंग्रेज कवि की कविता सुना दी,--‘अनसंग, अनवेप्ट, अनहर्ड, लेट मी डाइ। लेट नाॅट अ स्टोन टेल व्हेयर आई लाइ।’ निजलिंगप्पा ने यह भी कहा कि ‘मैं नहीं चाहता कि कौवे मेरी मूर्ति पर बैठ कर उसे गंदा करें।’

   कर्नाटका के मुख्यमंत्री रहे निजलिंगप्पा के लिए लोगों के मन में  सम्मान था क्योंकि आजादी की लड़ाई के एक यांेद्धा थे। पर, उससे कम  इज्जत अन्ना हजारे के लिए आज नहीं है जिन्होंने भ्रष्टाचार से आजादी के लिए अपनी जान जोखिम में डाला। लंुजपुंज ही सही, पर उनके प्रयास से एक लोकपाल कानून देश के सामने आया।

   इसलिए अन्ना से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वे खुद अपनी मूर्ति के लिए प्रयास करें। नेताओं की मूर्तियों की स्थापना को लेकर इस देश में अक्सर विवाद होते रहे हैं।

जीवनकाल में ही मूर्तियां लगवाने की परंपरा संभवतः तमिलनाडु में शुरू हुई थी। सन 1961 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के. कामराज की मूर्ति मद्रास में  लगवाई गई थी जिसका अनावरण तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने किया था। तब भी एक तबके ने उसका विरोध किया था।

 कामराज का निधन 1975 में हुआ। सन् 1967 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सी.एन. अन्नादोरै की मूर्ति मद्रास में ही लगाई गई तब भी उसकी आलोचना हुई थी।

  यह ऐसी ही बात है जैसे कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही अपना श्राद्ध कर्म करा ले। इस देश में कुछ ऐसे गिने -चुने लोग कराते भी रहे हैं जिन्हें यह आशंका होती है कि उनके नालायक वंशज यह काम ठीक से नहीं करेंगे। या, वे अपने नालायक वंशज से इतने नाराज होते हैं कि उनके हाथों यह काम नहीं होने देना चाहते।

   पर, यह देश इतना कृतघ्न नहीं है कि उनके नहीं रहने पर अन्ना हजारे की सेवाओं को भूल जाए और उनकी मूर्ति न लगाए।
(06 जनवरी, 2014 के जनसत्ता से साभार) 
   



रविवार, 29 दिसंबर 2013

‘आप’ के सामने सरकार से अधिक साख बचाने की चुनौती


अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली में गठित आम आदमी पार्टी की सरकार ने अच्छी शुरुआत कर दी है।
उसने जल्द ही कई ठोस जनहितकारी कदम उठाने का आश्वासन भी आम लोगों को दिया है। पर इस सरकार की सफलता को लेकर कुछ हलकों में अपशकुन भी किये जा रहे हैं। दरअसल कई लोगों को यह लग रहा है कि ‘आप’ प्रयोग अंततः विफल हो जाएगा। क्योंकि ‘आप’ के नेतागण राजनीति व प्रशासन से भ्रष्टाचार का खात्मा कर देना चाहते हैं। अपशकुन करने वाले वही लोग हैं जो यह मान बैठे हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार तो राजनीति व प्रशासन की गाड़ी को चलाने के लिए मोबिल का काम करते हैं और मोबिल के बिना गाड़ी चल ही नहीं सकती। फिर ‘आप’ की गाड़ी भला कैसे चल पाएगी !

  इसके साथ ही यह भी आशंका जाहिर की जा रही है कि कुछ विध्वंसक तत्व को ‘आप’ की सरकार को बदनाम व विफल करने के प्रयास में लग गये होंगे। इस पृष्ठभूमि में आम आदमी पार्टी के सामने अब अपनी सरकार से अधिक अपनी साख बचाये रखने की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

राजनीतिक प्रेक्षक बताते हैं कि यदि ‘आप’ की साख बची नहीं रही तो देश का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक बार फिर दशकों पीछे चला जाएगा। इसके विपरीत यदि दिल्ली की आप सरकार ने अपने बेहतर कामों के जरिए अपनी साख बढ़ाई तो उसे पूरे देश में फैल जाने से कोई रोक नहीं सकता। क्योंकि पूरा देश आज राजनीति व प्रशासन में फैले भीषण भ्रष्टाचार से ऊब गया है।

  आप के एक विधायक विनोद कुमार बिन्नी के सामने नहीं झुक कर ‘आप’ ने अच्छे संकेत दिये हैं। पर उसे आगे भी और अधिक सावधान रहने की जरुरत पड़ेगी। याद रहे कि बिन्नी मंत्री पद नहीं मिलने के कारण सख्त खफा थे और वे विद्रोह की मुद्रा में थे।

इस पर आप ने साफ साफ कह दिया कि उसके दल में सत्तालोलुपों के लिए कोई जगह नहीं है। नतीजतन बिन्नी शांत हो गये। पर ‘आप’ के सामने यह तो एक छोटी समस्या थी। समस्याएं और भी हैं। कठिन चुनौतियां सामने हैं। क्योंकि ‘आप’ के सत्तारोहन की आहट पर ही इस देश के भ्रष्ट सरकारी व गैर सरकारी लोग डरे हुए हैं। वे आप की साख खराब करने के लिए कोई भी षड्यंत्र कर सकते हैं। दूसरी ओर स्टिंग आॅपरेशन का खतरा भी सामने है। कुछ ‘आप’ नेताओं की यह आशंका सही है कि कांग्रेस का समर्थन केवल केजरीवाल को कुर्सी पर बिठाने तक है। उसके बाद वह चाहेगी कि केजरीवाल विफल हों ताकि भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन देश में जड़ नहीं पकड़ सके। कुछ अन्य दल भी ‘आप’ को सफल देखना नहीं चाहेंगे।

इससे पहले कांग्रेस पार्टी ने समय समय पर चैधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा और गुजराल के साथ यही किया। पर इस जाल से निकलने की जिम्मेदारी खुद आप नेताओं की ही है। उन्हें अपने चाल, चरित्र और चेहरे को बचाये रखना होगा। अन्यथा इस देश का भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन एक बार फिर काफी पीछे चला जाएगा।
 इसके पहले के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के साथ इस देश में यही हुआ। 1966-67 का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन विफल होने पर दोबारा उसे शुरू करने में सात साल लग गये थे। इस बीच सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचार बढ़ता गया। तानाशाही भी बढ़ी। यानी 1973 में ही गुजरात और 1974 में बिहार में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरू हो सका।

  1966-67 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रमुख नेता डा.राम मनोहर लोहिया थे। उन्होंने जनसंघ और भाकपा सहित कई प्रतिपक्षी दलों को एक मंच पर लाया था। सन 1974 के आंदोलन के नेता जय प्रकाश नारायण थे। याद रहे कि गुजरात और बिहार आंदोलन छात्रों -युवकों ने शुरू किया था न कि राजनीतिक दलों ने। क्योंकि लोगों को उन गैर कांग्रेसी नेताओं पर भरोसा नहीं रह गया था जिन्होंने 1967 और 1972 के बीच देश के कई राज्यों में सत्तारुढ़ होकर अपनी सत्तालोलुपता दिखा दी थी।

  1974 के आंदोलन व उसके कारण बनी सरकारों ने जब पदलोलुपता दिखाई तो कोई नया आंदोलन शुरू होने में 13 साल लग गये। यानी वी.पी.सिंह का बोफर्स घोटाला विरोधी अभियान 1987 में ही शुरू हो सका। पर उस आंदोलन से उपजी सरकारें भी जनता की उम्मीदों पर खड़ी नहीं उतर सकी तो 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में जनलोकपाल विधेयक के लिए आंदोलन शुरू हो सका।

  यानी पहला आंदोलन विफल होने पर दूसरा शुरू करने मेंे सात साल लगे। दूसरा विफल होने पर तीसरा शुरू होने में 12 साल लग गये। तीसरा विफल होने पर चैथा शुरू करने में 20 साल लगे। अब यदि यह भी विफल हो जाएगा तो कल्पना कीजिए कि अगला आंदोलन शुरू होने में कितने साल लग जाएंगे ?
इस बीच इस गरीब देश की हालत और कितनी बुरी हो चुकी होगी। साथ ही परंपरागत राजनीति तब तक और कितनी गर्हित हो चुकी होगी !

   यदि डा.राम मनोहर लोहिया को थोड़ा लंबा जीवन मिला होता तो शायद 1967 के आंदोलन और उससे निकली सरकार को वे भरसक विफल नहीं होने देते। जय प्रकाश नारायण का स्वास्थ्य ठीक रहता तो वे जनता प्रयोग को सफल करने का प्रयास करते। अन्यथा वे फिर जनता के बीच जाते।

यदि भाजपा ने मंडल आरक्षण के खिलाफ मंदिर का बहाना बनाकर वी.पी.सिंह को सरकार को गिराया नहीं होता तो इस देश के भ्रष्टाचारियों का एक हद तक इलाज वी.पी. सिंह की सरकार कर चुकी होती। और उससे यह होता कि राजनीति के प्रति लोगों इतना मोहभंग नहीं हेाता जितना आज हो चुका है।

  आप विधायक विनोद कुमार बिन्नी के आगे नहीं झुक आम आदमी पार्टी ने अच्छा संकेत दिया है। पर आप को 1967 के डा.राम मनोहर लोहिया के कुछ कदमों को भी याद रखना होगा।

  1967 के चुनाव के बाद सात राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गई थीं। अन्य दो राज्यों में कांग्रेसी नेताओं के दलबदल के कारण गैरकांग्रेसी सरकारें बनीं। इन सरकारों को डा.लोहिया ने सलाह दी थी कि वे छह महीने के भीतर जनहित में कुछ ऐसे बड़े फैसले कर दें ताकि लोग यह समझ जायें कि ये सरकारें कांग्रेसी सरकारों से काफी अलग ढंग की सरकारें हैंे। ऐसा नहीं होने पर कांग्रेस फिर सत्ता में आ जाएगी।

   डा.लोहिया के अनुसार कुछ फैसले तो उन राज्य सरकारों को सत्ता में आने के कुछ ही हफ्तों के भीतर ही करने थे। बिहार पर डा.लोहिया की सबसे अधिक नजर थी क्योंकि आनुपातिक दृष्टि में लोहियावादियों की बिहार में अन्य राज्यों की अपेक्षा सबसे बड़ी चुनावी जीत हुई थी।

 बिहार में गैरकांग्रेसी सरकार ने जब डा.लोहिया के निदेश को नजरअंदाज किया तो लोहिया ने अपने दल के एक बड़े बिहारी नेता से मिलने से भी इनकार कर दिया था।  इस पर उस नेता जी को होश आये। उन्होंने कुछ सरकारी काम तो किये। पर पूरे काम नहीं हो सके।

 1967 में बिहार में ही बी.पी. मंडल को, जो बाद में मंडल आयोग के अध्यक्ष बने थे, मंत्री बना दिया गया था जबकि वे 1967 के लोकसभा चुनाव में संसोपा के टिकट पर मधेपुरा से सांसद चुने गये थे। उन्हें मंत्री बनाने से पहले डा.लोहिया की राय नहीं ली गई थी। डा.लोहिया मानते थे कि जो जहां के लिए चुना जाए , वह उसी सदन का काम करे। डा.लोहिया को जब पता चला तो उन्होंने निदेश दिया कि बी.पी.मंडल मंत्री पद से इस्तीफा देकर लोकसभा के सदस्य के रूप में काम करें। पर मंडल ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। मंडल कांग्रेस से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए थे।

  बिहार के कुछ संसोपा नेताओं ने डा.लोहिया को समझाने की कोशिश की कि मंडल को मंत्री पद छोड़ने के लिए मजबूर कीजिएगा तो वे सरकार गिरा देंगे। लोहिया ने कहा कि भले वे सरकार गिरा दें पर उनके लिए पार्टी की नीति नहीं बदली जाएगी। मंडल ने आखिरकार सरकार गिरा ही दी।

  सन 1968 में वे खुद मुख्यमंत्री बन गये। इससे संसोपा की साख घटी। हालांकि उससे पहले डा.लोहिया का अक्तूबर, 1967 में असामयिक निधन हो चुका था। यदि दिल्ली की आम आदमी पार्टी अपनी सरकार की चिंता किये बिना ऐसे ही  नीतिपरक रुख कायम रखे तो वह भविष्य में भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की अगुआ बनी रह सकती है।

अन्यथा इस देश के घाघ भ्रष्टाचारी गण एक बार फिर सांड़ की तरह जनता के खेत चरने लगेंगे।


बुधवार, 18 दिसंबर 2013

‘बकरे की बलि’ चढ़ाने से बच जाएगी कांग्रेस की इज्जत ?

कांग्रेस में एक बार फिर बलि के बकरे की तलाश हो रही है। केंद्र में और राज्यों में भी। मणि शंकर अयर का ताजा बयान उसी तलाश का हिस्सा है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से भी ऐसी ही तलाश की सूचना आ रही है।

    पर, क्या बकरे की बलि देने से कांग्रेस को कभी कोई लाभ मिला है जो इस बार मिलेगा ?

दरअसल इतिहास बताता है कि नीयत और नीतियां बदलने की मंशा नहीं हो तो सिर्फ नेता बदलने से कांग्रेस को कभी लाभ मिला ही नहीं है। हां, पर बलि का कोई बकरा खोजना ही है तो वे खोज रहे हैं। ऐसे अवसरों पर हर बार खोजा जाता रहा है तो इस बार भी खोजा जा रहा है। चीन के हाथों भारत की पराजय के लिए तत्कालीन रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन को बलि का बकरा बनाया गया था।

  यह सब ऐसे देश में हो रहा है जहां 2004 से ही पद किसी और के पास है तो पावर किसी अन्य नेता के पास।
  पूरा पावर अपने पास रखने वाले संविधानेत्तर केंद्र की कमियों की चर्चा तो मणि जी करेंगे नहीं, इसलिए वे पद रखने वाले पर लाल-पीले हो रहे हैं। सवाल यह है कि मनमोहन सिंह ने अब तक कौन सा बड़ा फैसला सोनिया गांधी और राहुल गांधी की इच्छा के खिलाफ जाकर किया है? बल्कि चर्चा तो यही है कि उन्होंने यथा प्रस्तावित ही काम किया है। प्रस्ताव किसका होता है, यह सब जानते हैं।

  यहां तक कि हाल में राहुल गांधी ने जब एक अध्यादेश को सार्वजनिक रूप से बकवास बताया तो मनमोहन सिंह ने सर्वदलीय बैठक और पूरे केंद्रीय कैबिनेट के फैसले तक को ताक पर रखकर उसे वापस कर लिया। यह और बात है कि सुप्रीम कोर्ट व राष्ट्रपति के रुख को भांप कर ही राहुल गांधी ने वह कदम उठाया था।
उससे लगा था कि उससे उन्हें चुनावी लाभ मिलेगा, पर मिला नहीं। क्योंकि हकीकत लोग जानते हैं।

   लगता है कि कांग्रेस के प्रथम परिवार के करीबी मणिशंकर अयर एक नया कामराज योजना लागू करना चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि 2009 में मनमोहन सिंह को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय गलत था। यानी वे यह कहना चाहते हैं कि मनमोहन के कारण ही कांग्रेस की शर्मनाक हार हुई है। ऐसा कहकर वे मनमोहन को हटवाना चाहते हैंं। यानी वे एक बार फिर मिनी कामराज योजना लागू करना चाहते हैं।

   मणि शंकर अयर संभवतः छात्र रहे होंगे जब उन्हीं के प्रदेश के एक प्रमुख कांग्रेसी नेता के. कामराज ने कांग्रेस हाईकमान को एक सुझाव दिया था। वह कामराज योजना के नाम से जाना गया। तब कामराज योजना लागू की गई थी।
 
हार के बाद लागू हुई थी कामराज योजना

 जवाहर लाल नेहरु के प्रधानमंत्रित्व काल में चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय और दूसरी सरकारी विफलताओं की पृष्ठभूमि में कामराज योजना लागू की गई थी। उन दिनों लगातार कई लोकसभा उपचुनाव कांग्रेस हार रही थी।

  कहा गया कि कांग्रेस संगठन की कमजोरी के कारण हार हो रही है। तय हुआ था कि कांग्रेस के कुछ बड़े नेता केंद्रीय मंत्री पद और मुख्यमंत्री पद छोड़कर संगठन के काम में लगें। नतीजतन करीब आधा दर्जन केंद्रीय मंत्री और आधा दर्जन मुख्यमंत्री 1963 में अपने पदों से हटा दिये गये।

  पर 1967 के आम चुनाव में इसका क्या नतीजा हुआ? कामराज योजना के नाम पर  जिन राज्यों के मुख्यमंत्री हटाये गये थे, उन राज्यों में भी कांगे्रस चुनाव हार गई और सत्ता से हटा दी गई। वहां गैर कांग्रेसी सरकार बन गई। लोकसभा में भी कांग्रेस का बहुमत पहले की अपेक्षा काफी कम हो गया। क्योंकि सिर्फ नेता हटे थे, जनपक्षी नीतियां नहीं बनी थीं। नीयत भी पहले ही जैसी ही थी। इसलिए कामराज योजना का कोई लाभ नहीं हुआ? आज भी क्या कांग्रेस और केंद्र सरकार अपनी नीतियां और नीयत बदलने को तैयार है ?

     इतना ही नहीं, 1980 से 1990 के बीच कांग्रेस हाईकमान ने बिहार में पांच  मुख्यमंत्री बदले। इसके बावजूद छठे मुख्यमंत्री भी 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता में नहीं ला सके।

ऐसे कई अन्य उदाहरण भी हैं। इसके बावजूद मणि शंकर अयर जैसे नेता समझते  हैं कि कांग्रेस की चुनावी विफलता के लिए सिर्फ मनमोहन सिंह जिम्मेदार हैं।

लगातार बलि का बकरा खोजते रहने वाले दल में मणि शंकर अयर ऐसे अकेले नेता नहीं होंगे। अंतर यही है कि मणि शंकर स्पष्टवादी व बड़बोले नेता हैं और दूसरे ऐसा नहीं हैं।

‘परिवार’ को सिर्फ सफलता का श्रेय

  जिस दल में प्रथम परिवार में किसी तरह गलती ढूंढ़ना ईशनिंदा मानी जाती हो, वहां यही होना है। वहां तो उस परिवार को सिर्फ किसी सफलता के लिए श्रेय देने की परंपरा है।

   वैसे कांग्रेस से नाराज मतदाता यह अच्छी तरह जानते हैं कि भ्रष्टाचार और महंगाई के लिए कोई जिम्मेदार है तो वही है जिसके हाथों में केंद्र सरकार का पावर है। जिसके पास राजनीतिक कार्यपालिका का सर्वोच्च पद है, वह आदेश का पालन करने वाला भर है।

 महंगाई का भी मूल कारण सरकारी भ्रष्टाचार ही है। अन्यथा क्या कारण है कि जब  केंद्र में गैरकांग्रेसी सरकार बनती है कि महंगाई अरिथमेटिकल प्रोग्रेशन यानी अंकगणतीय गति से बढ़ती है और जब कांग्रेस की सरकार होती है तो ज्योमेट्रिकल प्रोग्रेशन यानी ज्यामितीय गति से ? भ्रष्टाचार गैर कांग्रेसी सरकारों में भी होता रहा है, पर कांग्रेसी सरकार की अपेक्षा कम।

मुख्यतः महंगाई व भ्रष्टाचार के मुद्दों पर कांग्रेस सरकार की विफलता के कारण मतदाता कांग्रेस से विमुख हो रहे हैं।

पर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह का अब तक क्या रुख रहा है?

  यही रुख रहा कि भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वालों पर कार्रवाई करो और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए कुछ नहीं करो। अशोक खेमका प्रकरण इसका एक उदाहरण है। हाल के वर्षों में बड़े भ्रष्टाचारों के मामलों में भी तभी कोई कार्रवाई हुई जब सी.ए.जी. ने रपट दी और अदालत ने जांच का आदेश दिया। कोयला घोटाला हो या टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला। इसके अलावा भी इस बीच कई बातें हुईंं हैं। सब कुछ सोनिया गांधी और राहुल गांधी की जानकारी में हुआ। ताजा चुनाव रिजल्ट आने से पहले तक कांग्रेस के प्रवक्तागण भी यह कहते रहे हैं कि किसी मुद्दे पर सोनिया जी-राहुल जी और मनमोहन सिंह में कोई मतभेद नहीं है। फिर अचानक बलि के बकरे की तलाश व पहचान क्यों ?

मनमोहन सिंह एक बेचारे प्रधानमंत्री

 देश के अधिकतर लोग यह जानते हैं कि मनमोहन सिंह एक बेचारे प्रधानमंत्री की तरह आदेशानुसार ही काम करते रहे हैं।

मतदाताओं ने इसे समझा और उसके अनुसार हाल के चुनाव में मतदान किया। लोकसभा चुनाव में भी यही होगा, इसके संकेत साफ है। इसलिए यह कहा जा रहा है कि नेता बदलने के बदले नीयत और नीति बदलने से ही कांग्रेस आशंकित पराजय से बच सकती है। या फिर पराजय का प्रभाव कम हो सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी पार्टी का जो रुख सामने आया है, वह इस देश की राजनीति के लिए कसौटी बन गई है। अन्य पार्टियों को जनता उसी कसौटी पर कसेगी, इसके भी संकेत साफ हैं।
( 13 दिसंबर, 2013 के जनसत्ता में प्रकाशित)


बुधवार, 11 दिसंबर 2013

आम आदमी पार्टी पर करोड़ों नजरें


इस मिनी आम चुनाव (दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव 2013) की सबसे बड़ी उपलब्धि आम आदमी पार्टी का उभार है। उभार भी ऐसा वैसा नहीं बल्कि बेमिसाल है। ‘आप’ को भारी जीत दिलाकर दिल्ली के बहुमत मतदाताओं ने देश को एक नयी राजनीतिक दिशा भी दिखाई है। इस तरह मतदाताओं ने देश की राजधानी का नागरिक होने का फर्ज भी निभाया है।

    दिल्ली की जनसंख्या की विविधता का आज जो स्वरूप है, उसे लगभग पूरे देश की प्रतिनिधि आबादी भी कहा जा सकता है। इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि यदि पहले से आम आदमी पार्टी के काम व प्रचार अन्य राज्यों में हुए होते और ‘आप’ ने वहां भी चुनाव लड़ा होता तो वह उन राज्यों में भी चुनाव को प्रभावित कर सकती थी जहां हाल में (2013) चुनाव हुए।


मोदीत्व बनाम ‘आप’वाद में राजनीतिक मुकाबले

    संकेत बताते हैं कि आने वाले समय में धीरे -धीरे कांग्रेस राजनीति के हाशिये पर जाएगी। ‘आप’ धीरे -धीरे उसकी जगह लेगी। देश भर के अच्छे तत्व आम आदमी पार्टी से जुड़ेंगे। मोदीत्व बनाम ‘आप’वाद के बीच आने वाले दिनों में राजनीतिक मुकाबले होंगे। क्योंकि मोदीत्व को हराने में अभी उनके विरोधियों को भी समय लगेगा। क्योंकि भाजपा के हिन्दुत्व की चाशनी और कांग्रेस की नकली धर्मनिरपेक्षता से मोदीत्व को ताकत मिली है। इसके हालांकि कुछ अन्य कारण भी हैं। वैसे तसलीमा नसरीन के खिलाफ फतवा देने वाले व्यक्ति की तरह के लोगों के साथ ‘आप’ ने यदि अधिक मेलजोल बढ़ाया तो उससे मोदीत्व को ही बढ़ावा मिलेगा।
 यह भी उम्मीद की जाती है कि इतनी बड़ी चुनावी सफलता के बाद ‘आप’ वास्तविक धर्मनिरपेक्ष बने न कि अन्य कुछ दलों की तरह एकतरफा या ढोंगी धर्म निरपेक्ष।


कांग्रेस के भ्रष्टाचार से परेशान जनता

   उधर कांग्रेस के भ्रष्टाचार, अहंकार, वंशवाद, काला धन और चमचागिरी से परेशान इस देश की आम व खास जनता को आम आदमी पार्टी के रूप में देर- सवेर एक खेवनहार मिल सकता है। एक हद तक मिल भी गया है।
बशर्ते कि ‘आप‘ ने अपने चाल, चरित्र व चेहरे को आगे भी ठीकठाक रखा। इसके लिए यह जरूरी है कि गंदे और अवसरवादी तत्व आप में घुसपैठ नहीं कर पायें। कांग्रेस की लगातार नाकामयाबियों से उभरे मोदीत्व ने दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी के विजय रथ को रोक लिया है, पर आने वाले समय में पूरे देश में ‘आप’वाद बनाम मोदीत्व के बीच मुकाबले की ही संभावना नजर आ रही है।

 सरकारी भ्रष्टाचार से पीडि़त इस गरीब देश में अगले चुनावों में अंततः आम आदमी की ही जीत की संभावना जाहिर की जा सकती है। हालांकि इसमें समय लग सकता है। आप के नेताओं की मौजूदा साख को देखते हुए देश के अन्य हिस्सों की जनता भी आप को स्वीकार कर सकती है।


घाघ नेताओं ने विफल किए जनता के बदलाव

   पर, इससे पहले के दशकों में जनता ने ऐसे ही तीन प्रयास किये थे जिन्हें घुटे हुए घाघ नेताओं ने अंततः विफल कर दिये। उम्मीद की जानी चाहिए कि आम आदमी पार्टी में वैसे घुटे हुए घाघ नेताओं का कभी वर्चस्व नहीं हो पाएगा। क्योंकि आप में अभी तो  नये ढंग के लोग हैं जो ‘राजनीति का विकल्प’ नहीं बल्कि वैकल्पिक राजनीति के पक्षधर हैं।

  याद रहे कि दिल्ली में शानदार प्रदर्शन के बाद यह उम्मीद की जाती है कि आम आदमी पार्टी देश के अन्य हिस्सों में भी अगला चुनाव लड़ेगी। देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी मांग भी ‘आप’ के पास अब आएगी। बल्कि आनी शुरु हो चुकी होगी। सीमित शक्ति व साधनों के कारण भले उसे आगे भी सीमित चुनावी सफलता ही मिले, पर यह बात पक्की मानी जा रही है कि वह विकल्प की राजनीति नहीं, बल्कि वैकल्पिक राजनीति ही करेगी और आने वाले दिनों में देश का नेतृत्व भी करेगी।

  दिल्ली में प्रबुद्ध से लेकर आम मतदाताओं ने यही देख-समझकर आम आदमी पार्टी को अपनाया है क्योंकि ‘आप’ देश के सामने वैकल्पिक राजनीति पेश कर रही है।


’आप’ को जातपात से ऊपर उठकर मिले वोट

  याद रखने की बात है कि ‘आप’ को लोगों ने जातपात से ऊपर उठकर वोट दिये हैं। जब भी बेहतर विकल्प लोगों को दिखा है, इस देश के लोगांे ंने जातपात तथा अन्य लाभ-लोभ-दबाव से ऊपर उठकर ही वोट दिया है। हां, जब विकल्पों के बीच अंतर कम हो तो लोगों का एक हिस्सा संकीर्ण स्वार्थों में लिप्त हो जाता है। वही हिस्सा कभी -कभी चुनावों में निर्णायक भी हो जाता है।


1967, 1977 और 1989 में नेताओं ने दिया धोखा

  इससे पहले 1967, 1977 और 1989 मेंे भी देश के अधिकतर लोगों ने वैकल्पिक राजनीति की उम्मीद में संकीर्णता से ऊपर उठकर मतदान किये थे। 1967 के नेता डा. राम मनोहर लोहिया, 1977 के नेता जय प्रकाश नारायण और 1989 के नेता वीपी. सिंह थे। पर इस देश के जनतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही कि तीनों बार लोगों ने नेताओं से अंततः धोखा ही खाया। उम्मीद की जानी चाहिए कि आम आदमी पार्टी से उन्हें धोखा नहीं मिलेगा।

1967, 1977 और 1989 में आम लोगों ने मूलतः सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ मतदान किये थे। दरअसल किसी गरीब देश में सरकारी भ्रष्टाचार ही अन्य कई गंभीर समस्याएं भी पैदा कर देता है। 1967 के चुनाव में तो नौ राज्यों से कांग्रे्रेस का एकाधिकार खत्म हुआ था, पर 1977 में तो केंद्र से ही उसका एकाधिकार समाप्त हो गया था। 1984 में चार सौ से अधिक लोकसभा सीटें जीत चुकी कांग्रेस 1989 में बुरी तरह हार गई थी। बोफोर्स भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों का गुस्सा इतना अधिक था।


आज कदम-कदम पर भ्रष्टाचार

 अब तो कदम -कदम पर बोफोर्स हैंं। आज इस देश की अधिकतर जनता यह चाहती है कि काला धन, भ्रष्टाचार, सत्ताधारियों के अहंकार, वंशवाद और चमचागिरी से देश को जल्द मुक्ति मिले। गरीब से लेकर अमीर जनता तक से  टैक्स में मिले पैसे जनता के लिए ही खर्च हों। वे घोटालों की भेंट नहीं चढे़। इस पृष्ठभूमि में आज मोदीत्व बनाम कांग्रेस के बीच ‘आप’ उम्मीद की नयी किरण बन कर उभरी है।

( 9 दिसंबर 2013 के जनसत्ता से साभार)

देश ही नहीं, खुद के साथ भी मनमोहनी धोखा

 प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इतिहास किस रूप में याद करेगा? उनकी उपलब्धियों और विफलताओं को कसने के लिए कई अन्य कसौटियां भी होंगी। पर, उन्हें इस रूप में अधिक याद किया जाएगा कि उन्होंने इस गरीब देश के साथ -साथ खुद अपने साथ भी न्याय नहीं किया।
   
 सर्वाधिक घोटाले वाली सरकार चला रहे मनमोहन सिंह के खिलाफ अब तक नाजायज तरीके से पैसे कमाने का आरोप या सबूत सामने नहीं आया है। तो फिर सबसे भ्रष्ट सरकार के ‘सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री’ आखिर
अपने पद पर क्यों बने हुए हैं ?

     आखिर क्यों वह ‘ईमानदारी के साथ’ अपनी सरकार से बेईमानी करवा रहे हैं ? क्या वे ऐसा किसी अन्य शक्ति के आदेश पर बेमन से कर रहे हैं ? अपनी ही पुरानी मान्यताओं व बयानों के खिलाफ वह रोज -रोज कदम उठा रहे हैं ?

     यह बात मानी हुई है कि उनके पास कुर्सी जरूर है, पर सत्ता कहीं और है। तो फिर वह उस कुर्सी पर क्यों बैठे हुए हैं जिसकी ताकत का वे देश के भले के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते ? क्या सिर्फ कुर्सी पर बैठे रहने का मोह उनके लिए इतना बड़ा मोह होता है कि वर्षों से जतन से बनाई हुई अपनी ही छवि को खुद ही ध्वस्त कर दिया जाए ?

    अब तक यह धारणा रही है कि कोई भी सत्ताधारी नेता लूट में हिस्सा मिले बिना बेईमान लोगों का साथ नहीं देता। पर मनमोहन सिंह ने इस धारणा को भी गलत साबित कर दिया। इस रूप में वह याद किये जाएंगे। वह एक और कारण से भी इतिहास में याद किये जाएंगे। उन्होंने इस धारणा को भी झूठा साबित कर दिया कि किसी सरकार के शीर्ष पद पर बैठे किसी ईमानदार व्यक्ति की ईमानदारी का सुप्रभाव उसके अधीनस्थ लोगों पर भी थोड़ा जरूर पड़ता है।
     मनमोहन सिंह के मामले में गंगा उल्टी दिशा में बह रही है। मनमोहन यह कहकर साफ बच निकलना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार गठबंधन युग की मजबूरी है। क्या मनमोहन सिंह कहीं और से आदेश पाकर अपनी सरकार से ईमानदारी पूर्वक बेईमानी करवा रहे हैं ?
 
 इतिहास इस सवाल का भी जवाब ढूंढ़ेगा।

     कोई नेता अपनी ही बातों को बाद में किस तरह चबा जाता है, उसका उदाहरण संासद क्षेत्र विकास फंड है। एक विवादास्पद परिस्थिति में 23 दिसंबर 1993 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने सांसद फंड की शुरुआत की थी। उससे ठीक पहले राम जेठमलानी ने आरोप लगाया था कि नरसिंह राव को शेयर दलाल हर्षद मेहता ने एक करोड़ रुपये की रिश्वत दी थी। वह रकम नंदियाल लोकसभा उपचुनाव में खर्च करने के लिए नरसिंह राव को दी गई थी।

     राव नंदियाल से उपचुनाव जीत कर लोकसभा में पहुंचे थेे। 1991 का आम चुनाव उन्होंने नहीं लड़ा था, पर गैर सांसद नरसिंह राव को विशेष राजनीतिक परिस्थितियों में प्रधानमंत्री बना दिया गया था। जब हर्षद मेहता का आरोप नरसिंह राव पर लगा तो शायद राव साहब ने यह सोचा होगा कि संासद फंड शुरू करा कर ऐसा ही आरोप अन्य सांसदों पर भी लगते रहने का रास्ता बना दिया जाए ताकि हम पर लग रहे आरोप की तीव्रता कम हो जाए। एक बात और थी। नरसिंह राव की सरकार को लोकसभा में बहुमत का समर्थन हासिल नहीं था। सांसद फंड के जरिए सांसदों को खुश करना जरूरी था।

याद रहे कि यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि संासद फंड घोटाले में सारे सांसद फंसे रहते हैं। अनेक सांसदों पर आरोप तो लगत ही रहते हैं।

  मनमोहन सिंह राव सरकार में वित्त मंत्री थे। वे ऐसे फंड के सख्त खिलाफ थे। इसलिए मनमोहन सिंह जब विदेश दौरे पर थे, जानबूझकर उस समय नरसिंह राव ने इस फंड की शुरुआत की थी। बाद की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इस फंड को एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर दो करोड़ रुपये सालाना कर दिया।


शुरू में सांसद फंड का विरोध, बाद में खुद ही बढ़ा दिया फंड

     सन् 1998 मेंं राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता मनमोहन सिंह ने इस फंड की बढ़ी राशि का विरोध करते हुए तत्कालीन अटल सरकार से कहा था कि ‘आप चीजों को इसी रास्ते पर जाने देंगे तो जनता नेताओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास खो देगी। संसद में इस मुद्दे पर कपिल सिब्बल ने भी तब कहा था कि ‘पब्लिक फंड का इस्तेमाल प्राइवेट उद्देश्यों के लिए हो रहा है और हम भ्रष्टाचार के नये मील के पत्थर को पार कर रहे हैं।’ तब की अटल बिहारी सरकार ने एक करोड़ रुपये से बढ़कर दो करोड़ सालाना किया था।

   पर वही मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने 2011 में सांसद फंड की राशि दो करोड़ रुपये से बढ़ा कर पांच करोड़ रुपये कर दी। या यूं कहें कि उन्हें करनी पड़ी। जबकि योजना आयोग ने इस बढ़ोतरी का विरोध किया था।

  यह बात गौर करने लायक है कि एक संसदीय समिति ने इसे बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये सालाना कर देने की सिफारिश की थी। इस बात के लिए आप मनमोहन को जरूर धन्यवाद दे सकते हैं कि उन्होंने दस करोड़ के बदले पांच करोड़ ही किया।

   सन् 1993 में जब पी.वी. नरसिंह राव की सरकार ने सांसद क्षेत्र विकास निधि की शुरुआत की थी, तभी कुछ लोगों ने यह आशंका जाहिर की थी कि यह निधि इस देश की राजनीति की शुचिता के लिए घातक साबित होगी।

   मनमोहन सिंह की तब यह राय थी कि सांसद फंड में जो पैसे खर्च किये जाने हैं, उसको लेकर एक चुनाव फंड बनाया जाए जिसे दलों या उम्मीदवारों को खर्च करने के लिए सरकार दे दिया करे। इससे राजनीति में शुचिता आएगी। पर प्रधानमंत्री बनने के बाद वह काम मनमोहन नहीं कर सके। यानी उन्हें गद्दी पर बैठाने व बनाये रखने में मदद करने वाले दूसरे लोगों के इशारे पर मनमोहन सिंह फैसले करते रहे।

   इस रूप में इतिहास उन्हें याद रखेगा। किसी ने ठीक ही कहा है कि जीवन लंबा नहीं बल्कि ऊंचा होना चाहिए। मनमोहन ने अपनी कुर्सी की अवधि को लंबा करने के लिए अपनी खुद की ऊंचाई को भी घटा लिया। इस रूप में भी वे याद किये जाएंगे। जवाहर लाल और इंदिरा के बाद मनमोहन सिंह सर्वाधिक लंबे समय तक प्रधानमंत्री बनने के लिए याद किये जाएंगे। पर ऐसी लंबाई का क्या मतलब कि जिससे आम लोगों को कोई फायदा नहीं हो।


सांसद फंड गले में हड्डी

  याद रहे कि संासद फंड राजनीति के गले में हड्््डी की तरह अटक गया है। अब इसे न तो उगलते बनता है और न ही निगलते। जबकि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस देश में जन अभियान चल रहा है। इस बीच इस फंड में कमीशन की बंदरबांट के लिए जहां -तहां तपे- तपाये राजनीतिक कार्यकर्ता अभिकर्ता बन रहे हैं। फंड की ठेकेदारी हासिल करने के लिए जहां-तहां गोलियां चल रही हैं और हत्याएं हो रही हैं। कुछ साल पहले स्टिंग आॅपरेशन में समाजवादी सांसद साक्षी महाराज सांसद फंड के घोटाले के सिलसिले में रंगे हाथ पकड़े गये। इस कारण उनकी सदस्यता भी चली गई। इससे जुड़े हुए निहितस्वार्थ का हाल यह है कि देश के अधिकतर नेता और दल ऊपरी तौर पर तो इस फंड को समाप्त करने की मांग करते हैं, पर समाप्त करने के बारे में फैसला करने का जब वक्त आता है तो वे बहाना बनाकर साफ मुकर जाते हैं। यह सब जानते हुए भी मनमोहन ने फंड की राशि बढ़ा दी।

  अधिक उम्मीद तो इसी बात की है कि 2014 के चुनाव के बाद मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। यदि ऐसा होने वाला है तो मनमोहन की गद्दी कुछ महीनों तक ही रहेगी। ऐसे में उनके पूरे कार्यकाल का आकलन करना मौजू होगा।


प्रधानमंत्री के रूप में फ्लाप

  मनमोहन सिंह का जन्म पश्चिमी पंजाब में 1932 में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। विभाजन के समय मनमोहन का परिवार अमृतसर आ गया था। पढ़ाकू विद्यार्थी मनमोहन ने आॅक्सफोर्ड से अर्थशास्त्र में डाक्टरेट किया। उन्होंने 1966 से 1969 तक यूनाइटेड नेशन्स में काम किया। बाद में तत्कालीन विदेश व्यापार मंत्री ललित नारायण सिंह ने उन्हें अपने मंत्रालय में सलाहकार बना कर स्वदेश बुलाया।

     1991 में वित्त मंत्री बनने के पहले वे भारत सरकार में कई पदों पर रहे।  वित्त मंत्री के रूप में उनके कामों की कई हलकों में सराहना ही हुई।
पर प्रधानमंत्री के रूप में वे फलाॅप रहे। ऐसा नहीं कि मनमोहन सरकार ने कोई अच्छा काम नहीं किया। ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, आधार कार्ड, मनरेगा और सूचना अधिकार कानून सरकार के अच्छे काम माने गये। पर अधिकतर अच्छे कामों का श्रेय सोनिया गांधी के नतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने ले ली और बुरे कामों या फिर विफलताओं के जवाब देने का भार मनमोहन सिंह पर सौंप दिया गया।

     ऐसे में यदि मनमोहन ने अधिकतर समय मौन धारण किया तो इसमें आश्चर्य की कौन सी बात है ? यह कोई अजूबी बात नहीं है कि मनमोहन सिंह का एक नाम मौन मोहन सिंह के रूप में भी प्रचलित हुआ।


प्रधानमंत्री पद और कैबिनेट की संस्था की प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़

  राहुल गांधी ने तो अपनी छवि चमकाने के लिए हाल में मनमोहन सिंह व प्रधानमंत्री पद और कैबिनेट की संस्था की प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ भी कर दिया। राहुल ने उस अध्यादेश को सार्वजनिक रूप से बकवास बता था जो सांसदी बचाने के लिए तैयार किया गया था। उस अध्यादेश को वापस ले लेना पड़ा।

     इसपर राजनीतिक व गैर राजनीतिक हलकोंं में यह चर्चा थी कि यदि मनमोहन की जगह थोड़ा भी स्वाभिमान रखने वाले कोई अन्य नेता होता तो प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देता। पर जिस तरह किसी गैर सरकारी संस्थान में अपने बाॅस की सारी फटकार सुनकर कोई निम्न श्रेणी का कर्मचारी नौकरी में बने रहता है, उसी तरह मनमोहन ने अपनी गद्दी बचाई भले प्रतिष्ठा तार-तार हो गई हो। इसके साथ लोकतंत्र, कैबिनेट प्रणाली  और प्रधानमंत्री पद की संस्था की इज्जत भी मिट्टी में मिला दी गई।

 अब ऐसे प्रधानमंत्री को इतिहास किस रूप में याद करेगा, इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए दिमाग पर बहुत जोर डालने की कोई जरूरत नहीं है। मनमोहन सिंह सरकार का कार्यकाल इस देश के इतिहास का सर्वाधिक भ्रष्ट सरकार का कार्यकाल माना जाएगा।




सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप झुठलाए, कोर्ट में सही साबित हुए

    लगभग सारे भ्रष्टाचारों के आरोपों को मनमोहन सरकार सार्वजनिक रूप से झुठलाती रही। पर जब उन्हीं मामलों में अदालतों ने आदेश दिये तो उनकी जांच हुई। आरोपित जेल गये या फिर पद से हटाए गए।

  इस मामले में इतिहास मनमोहन सरकार को सर्वाधिक बेशर्म सरकार के रूप में भी याद करेगा।कुल मिलाकर महंगाई,गिरती अर्थ व्यवस्था,भ्रष्टाचार और कुशासन के लिए मन मोहन सरकार तब तक याद की जाएगी जब तक कि इससे भी बदतर कोई सरकार न आ जाए।      

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

बिहार में नमो बनेंगे अति पिछड़ा ?


  क्या अगले लोकसभा चुनाव के समय बिहार में नरेंद्र मोदी के नाम पर अति पिछड़ा कार्ड खेला जाएगा ? क्या उसके बिना नमो का काम बिहार में नहीं चलेगा ? बिहार की राजनीति में जातीय कार्ड खेले जाने की पुरानी परंपरा रही है। ऐसे तो यह बीमारी पूरे देश में है, पर बिहार में कुछ अधिक ही है।

        बिहार के कुछ भाजपा नेताओं के हाल के बयानों को ध्यान में रखें तो शायद नरेंद्र मोदी को इस रूप में भी बिहार में पेश किया जाने वाला है। नरेंद्र मोदी के कुछ खास गुणों और विशेषताओं के कारण संघ व भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है। पर बिहार भाजपा के कुछ नेताओं को यह लगता है कि  मात्र उन गुणों और विशेषताओं से बिहार मंे उनका चुनावी काम नहीं चलेगा।

नरेंद्र मोदी के अति पिछड़ा होने का प्रचार भी बिहार में करना पड़ेगा। इस मुद्दे पर खुद नरेंद्र मोदी की राय अभी सामने नहीं आई है। विराट हिंदू एकता की बात करने वाले भाजपा के सहमना संगठनों की राय भी आनी बाकी है। पर, लगता है कि बिहार भाजपा के कुछ नेता नमो को लोकसभा चुनाव के समय बिहार में इस नये रूप में पेश करके ही मानेंगे। वे ऐसा पहले से भी  कर  रहे हैं। यदि खुद नमो की सहमति से अंततः ऐसा हुआ तो यह सवाल उठेगा कि क्या इससे नरेंद्र मोदी के हिंदू हृदय सम्राट की छवि को धक्का नहीं लगेगा ?

    जो हो , नीतीश विरोध के अतिरेक के चक्कर में राज्य के कुछ भाजपा नेता नमो  को उप जातीय चौखटे में कैद कर देना चाहते हैं ताकि नीतीश कुमार को राजनीतिक दृष्टि से नुकसान पहुंचाया जा सके।

  याद रहे कि अति पिछड़ा वोट बैंक जदयू का सबसे बड़ा वोट बैंक है। कुछ बिहारी भाजपा नेतागण पिछले कुछ महीनों से बिहार में यह प्रचार कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी गुजरात की अति पिछड़ी घांची जाति से आते हैं। इस जाति के लोग कपास से तेल निकालने का काम करते हैं। वे अपने भाषणों व प्रेस बयानों के जरिए बिहार की अति पिछड़ी जातियों के मतदाताओं को पहले से ही यह संदेश दे रहे हैं कि आपकी जाति का एक नेता पहली बार इस देश का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है। इसलिए आप लोग उनका समर्थन करें।

   अब जबकि शुक्रवार को अंततः नरेंद्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बजाप्ता घोषित कर दिया गया तो यह प्रचार और भी तेज हो सकता है। बिहार में अति पिछड़ी जातियों की  आबादी कुल आबादी में करीब 32 प्रतिशत है। यह आंकड़ा 1931 की जनगणना पर आधारित है। तब ओडिसा भी बिहार का हिस्सा था। इस देश में जातीय आधार पर जनगणना अंतिम बार 1931 में हुई थी।

   जिस तरह यादव मतों पर लालू प्रसाद का लगभग एकाधिकार सा बन चुका  है, उसी तरह जदयू को अति पिछड़ी जातियों के अधिकतर मतदाता वोट देते रहे हैं। याद रहे कि लालू प्रसाद के राजद को अल्पसंख्यकों का अधिकांश मत मिलता रहा है। बिहार में यादव और मुसलमानों की मिलीजुली आबादी करीब 28 प्रतिशत है। हाल के वर्षों में जदयू ने अल्पसंख्यक मतों में जरूर सेंध लगाई है। नीतीश कुमार के वोट बैंक में महादलित, पिछड़े मुसलमान और महिला मतदाता भी शामिल हैं।

  नीतीश कुमार खुद कुर्मी जाति से आते हैं। इसलिए स्वाभाविक ही है कि अधिकतर कुर्मी वोट जदयू को मिले। बिहार में जिस जाति के मुख्यमंत्री होते हैं, उस जाति के अधिकतर वोट आम तौर पर मुख्यमंत्री के दल को मिलते हैं।:

   हाल के महीनों में राजद ने बिहार में कुछ राजनीतिक बढ़त हासिल की है। हाल में हुए महाराजगंज लोकसभा उपचुनाव में राजद ने जदयू को बड़े अंतर से हराया था। कई कारणों से महाराजगंज जदयू के लिए एक प्रतिकूल चुनाव क्षेत्र रहा  है। सन 2009 के आम चुनाव में भी वहां से राजद के ही उम्मीदवार विजयी हुए थे। इस विपरीत राजनीतिक परिस्थिति के बावजूद जदयू के उम्मीदवार को महाराजगंज उप चुनाव में दो लाख 44 हजार मत मिले थे। यानी प्रति विधानसभा क्षेत्र में करीब 41 हजार मत। इतने मतों में अति पिछड़े, पसमांदा मुस्लिम, महादलित और महिलाओं के मत शामिल थे।

भाजपा के साथ इन दिनों बिहार में सवर्णों की सहानुभति देखी जा रही है। परंपरागत ढंग से व्यावसायिक समुदाय भाजपा के साथ रहा है। जातीय वोट बैंक वाले बिहार में नमो की हिंदुत्व छवि का भी थोड़ा लाभ मिल रहा है। पर मनमोहन सरकार के लुंजपंुज शासन के मुकाबले नमो को कुछ बढ़त मिल सकती है। इसका अधिक लाभ नहीं मिलेगा क्योंकि बिहार में नीतीश का शासन भी एक बेहतर शासन ही माना जाता रहा है।

नमो के पक्ष में कुछ हवा बिहार में भी है, पर वह हवा चुनाव नतीजों को कितना प्रभावित कर पाएगी, यह अनिश्चित है। खुद बिहार भाजपा के कुछ नेताओं को भी यह नहीं लगता कि वह नमो की मात्र परंपरागत छवि से ही बिहार में निर्णायक जीत हासिल कर सकती है। इसलिए अति पिछड़ा कार्ड खेला जा रहा है। भाजपा जदयू के अति पिछड़ा वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है। इसलिए नमो को जातीय नेता के रूप में भी पेश किया जा रहा है।

   नीतीश सरकार ने अति पिछड़ों के लिए पंचायतों में 20 प्रतिशत सीटें रिजर्व की हैं। उसने महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत सीटें रिजर्व की। उनके लिए राज्य सरकार ने कुछ अन्य काम भी किये हैं। पंचायतों में अति पिछड़ों के लिए हुए आरक्षण का नुकसान खुद कुर्मी जाति को भी हुआ था जिस जाति पिछड़ी जाति से खुद नीतीश कुमार भी आते हैं। इससे यह संदेश गया कि नीतीश ने अपनी जाति को राजनीतिक नुकसान पहंुचा कर भी कमजोर वर्ग को लाभ पहुंचाया। इससे उनका अति पिछड़ा वोट बैंक ठोस हुआ।

  क्या अति पिछड़ों या किसी समुदाय के लिए ठोस काम करने के कारण वोट बैंक बनता है या उस जाति में सिर्फ पैदा होने के कारण ? अगले लोकसभा चुनाव में इस सवाल का जवाब एक बार फिर मिलेगा।

शनिवार, 28 सितंबर 2013

बरकरार रखी गई दागी नेताओं को बचाने की परंपरा

  शायद नयी पीढ़ी को मालूम नहीं हो कि देश मेंं 1975 में इमरजेंसी क्यों लगायी गयी थी। इसलिए उसकी एक बार फिर चर्चा जरुरी है। दरअसल तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लोकसभा की सदस्यता बचाने के लिए तब लोकतंत्र का गला घोंटा गया था।

  जिस दल की सरकार अपनी प्रधानमंत्री की सदस्यता बचाने के लिए देश पर इमरजेंसी  थोप सकती है, उसने यदि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को धत्ता बताने के लिए 24 सितंबर को अध्यादेश को मंजूरी दे दी तो इसमें कोई आश्चर्य की बात ंनहीं है। आज तो अनेक लोगों की सदस्यता बचाने की उसे जरुरत है। यानी उस दल ने परंपरा कायम  रखी है। यदि 1975 में ही प्रतिपक्ष का आज की तरह पतन हो चुका होता तो इंदिरा गांधी को इमरजेंसी लगाने की भी तब कोई जरुरत नहीं पड़ती।

  केंद्र सरकार के मौजूदा कदम को सर्वदलीय सहमति तो गत एक अगस्त को ही  मिल चुकी थी। बस प्रतिपक्ष का एक हिस्सा आज विरोध इस बात पर कर रहा है कि  अध्यादेश लाने की जल्दीबाजी क्यों दिखाई जा रही है। इसे संसद के रास्ते ही आना चाहिए था। रशीद मसूद और लालू प्रसाद प्रतिपक्ष के होते तो उतना विरोध भी नहीं होता।

याद रहे कि गत 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दो साल से अधिक की  (लोअर कोर्ट से भी) सजा हो जाने पर सांसदों और विधायकों की सदस्यता  तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जाएगी।

  अपराधियों व भ्रष्टाचारियों से भरी आज की राजनीति की मुख्य धारा इस निर्णय पर तत्काल हरकत में आ गयी। इस पर एक अगस्त को सर्वदलीय बैठक बुला ली गयी।

 बैठक में तुरंत सर्वदलीय सहमति भी बन गई कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पलटने के उपाय किये जाएं। पहले तो सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर कर दी गई। साथ ही फैसले को पलटने के लिए संबंधित कानून में परिवर्तन के लिए संसद में विधेयक पेश कर दिया गया। पर संसद उसे पास किये बिना ही अन्य कारणों से स्थगित हो गई। इधर 4 सितंबर को सर्वोच्च अदालत ने सरकार की पुनर्विचार याचिका को  नामंजूर कर दिया। इसके बाद अध्यादेश का रास्ता अपनाया गया। इस बात का तनिक ध्यान तक नहीं रखा गया कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त राय है।

     याद रहे कि 1975 और आज में फर्क यही आया है कि अधिकतर प्रतिपक्षी दल व उनके नेतागण भी ऐसे जन विरोधी उपायों के समर्थक बन चुके हंै। राजनीति के अपराधीकरण व भ्रष्टीकरण का खामियाजा अंततः देश की करोड़ों जनता को ही तो भुगतना पड़ता है। जब राजनीति, सरकार व प्रशासन की गंगोत्री ही अपवित्र हो जाती है तो उसका मारक  असर पुलिस थानों व ब्लाॅक दफतरों तक पर पड़ता है।

  याद रहे कि 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जग मोहन लाल सिंहा ने राय बरेली से इंदिरा गांधी का लोकसभा का चुनाव रद कर दिया था। उन पर चुनाव में भ्रष्ट तरीके अपनाने का आरोप साबित हो चुका था। इंदिरा गांधी पर संबंधित कानून की जिन धाराओं को तोड़ने का आरोप था, उन धाराओं में आपातकाल में अनुकूल संशोधन कर दिया गया। संशोधित कानून के तहत जब सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को पलटने के सिवा सुप्रीम कोर्ट के सामने कोई चारा नहीं था।

    इंदिरा गांधी पर आरोप के बारे में देश के तब के एक शीर्ष  वकील ने  कहा था कि उन पर आरोप ट्राफिक नियम भंग करने जैसे ही मामूली थे। इसके बावजूद तब के प्रतिपक्षी राजनीतिक दलों  और जय प्रकाश नारायण ने प्रधान मंत्री से इस्तीफा मांगा था।

  पर आज की मुख्य धारा की लगभग समग्र राजनीति ऐसे सजायाफ्ता अपराधियों को भी संसद और विधायिकाओं में शोभा बढ़ाने की सुविधा देने पर अमादा है जिन पर जघन्य हत्या, बलात्कार, भीषण भ्रष्टाचार  तथा इस तरह के अन्य जघन्य अपराधों के तहत मुकदमे रहे हैं। कल्पना कीजिए कि इंदिरा गांधी की सदस्यता बचाने के लिए तब कोई सर्वदलीय बैठक और उसमें सहमति संभव थी ?

     कत्तई नहीं। क्योंकि तब राजनीति आज की तरह नहीं थी। हालांकि उसमें गंदगी आनी शुरु जरुर हो गई थी। पर आज तो पूरे कुएं में ही भांग पड़ चुकी है। लगभग सभी दलोंे में लालू प्रसाद और रशीद मसूद मौजूद हैं जिन्हें बचाना है।

  आज इस बात के बावजूद यह हो रहा है कि देश की संसद और विधायिकाओं में ऐसे सदस्यों  की संख्या चुनाव दर चुनाव  बढ़ती जा रही है जिन पर भ्रष्टाचार व अपराध के गंभीर आरोप हैं। लोकसभा के सन  2004 के चुनाव की अपेक्षा 2009 के चुनाव में संसद में ऐसे सदस्यों की संख्या में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई तो विधायिकाओं में इस अवधि में करीब 31 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

यदि यह रफतार जारी रही, और संकेत हैं कि जारी रहेगी ही,तो वह दिन दूर नहीं जब देश की सरकारों के कैबिनेट में  खूंखार अपराधियों व वारेन हेस्टिंग की तरह के आर्थिक लुटेरों का बहुमत हो जाएगा।

   कतिपय एन.जी.ओ.,कुछ संविधान व कानून प्रेमी हस्तियां ,सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग इस स्थिति से चिंतित जरुर है। संभव है कि सुप्रीम कोर्ट एक बार फिर अपने किसी अगले निर्णय के जरिए मौजूदा अध्यादेश के पक्षधर सरकार की इस मंशा पर पानी फेर दे। अब तो संविधानप्रिय जनता की नजरें सुप्रीम कोर्ट की ओर ही है।

  2002 में केंद्र की तत्कालीन राजग सरकार ने भी सर्वदलीय सहमति से इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए संसद से  कानून बनवाया था।पर,सुप्रीम कोर्ट ने उसे रद कर दिया।सुप्रीम कोर्ट के उस कदम के कारण ही हम आज उम्मीदवारों के आपराधिक रिकार्ड,उनकी संपत्ति का व्योरा और शैक्षणिक योग्यता जान पाते हैं।

  जो राजनीति 2002 में अपने नेताओं व सदस्यों के खिलाफ जारी गंभीर मुकदमों के विवरण तक को भी जनता से छिपाये रखना चाहती थी,वह सजा हो जाने के बावजूद सदस्यता गंवाने देना आज कैसे मंजूर करती  ?

   आज इस देश की मुख्य धारा की राजनीति को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि  अपराध, भ्रष्टाचार,परिवारवाद,जातिवाद और वोट बैंक की राजनीति से हमारा लोकतंत्र कितना लहूलुहान होता जा रहा  है।उसे तो पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसा चाहिए।

   इसी बिगड़ती स्थिति को देखते हुए वोहरा समिति, एम.एन.वेंकटचलैया आयोग, द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग, विधि आयोग और चुनाव आयोग ने राजनीति से अपराधियों व भ्रष्टाचारियों को निकाल बाहर करने के लिए समय -समय पर अनेक सिफारिशें कीं। वोहरा कमेटी की रपट 1993 में आई थी। तभी उस पर काम करना चाहिए था। पर 1993 के बाद की विभिन्न सरकारों ने उन सिफारिशों को आलमारियों में बंद कर उनमें मजबूत ताले लगा दिये। पता नहीं हमारे राजनीतिक कर्णधार इस देश को कहां ले जा रहे हैं या ले जाना चाहते हैं ?

   आज की राजनीतिक पार्टी अपने फंड के अज्ञात स्त्रोत के बारे में जनता को कोई सूचना देने को भी तैयार नहीं है जबकि कांग्रेस ने यह घोषणा की है कि  2004 और 2012 के बीच ज्ञात स्त्रोत से उसे मात्र 226 करोड़ और अज्ञात स्त्रोत से 1951 करोड़ रुपये मिले। यही हाल भाजपा का भी है।

   झामुमो सांसद रिश्वत प्रकरण में अदालत ने घूसखोरों को सजा देने में अपनी लाचारी दिखाते हुए कहा था कि संसद ही यह कानून बना सकती है ताकि रिश्वत लेकर सदन के  भीतर वोट करने वाले को सजा दी जा सके। पर संसद ने ऐसा कोई कानून  नहीं बनाया। यदि बना दिया  होता तो न्यूक्लियर डील के समय केंद्र सरकार गिरने से  कैसे बच पाती ? ऐसी परिस्थितियों में आगे भी इसी तरह सरकारों को बचाने की आज की राजनीति की मंशा है।

   न तो सरकार सी.बी.आइ. नामक तोते को पिजड़े से बाहर करने को तैयार है और न ही कारगर लोकायुक्त कानून बनाने के लिए। यदि सी.बी.आइ. को निष्पक्ष बना दिया जाएगा तो मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं को क्लीन चीट कौन देगा ?

  प्रकाश सिंह मामले में पुलिस सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट के निदेश का पालन करने को कोई सरकार तैयार नहीं है।यदि सुधार हो जाएगा तो मुजफ्फरनगर में दंगे के दंगाइयों  को थाने से ही कैसे छोड़ा जा सकेगा ? दंगाइयों के घरों में  एक तरफा छापामारी कैसे संभव होगी ?

 यानी देश कहीं जाए, इससे हमारे अधिकतर हुक्मरानों को आज कोई मतलब नहीं है।दुनिया का कोई अन्य देश लोकतांत्रिक ढंग से चुने गये अपने ही नेताओं से इतना अधिक पीडि़त है,ऐसा कोई उदाहरण अब तक नहीं मिला है।किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि इस दुःश्चक्र से इस गरीब देश को निकालने के उपाय क्या हैं ?

(इस लेख का संपादित अंश 26 सितंबर 2013 के जनसत्ता में प्रकाशित)