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रविवार, 9 मार्च 2014

लेकिन मंडल परिवार से कोई आईएएस क्यों नहीं बना !

मंडल- आरक्षण पर 1994 में जनसत्ता में छपे नेताओं के बयान 


पटना , 18 अगस्त। सामंती पृष्ठभूमि के दो नेता बिहार के मुख्यमंत्री बने। ये थे बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल और सत्येंद्र नारायण सिंह। सवर्ण सत्येंद्र नारायण सिंह के परिवार और उनके रिश्तेदारों के घरों में अनेक आई.ए.एस. और आई.पी.एस. बने। लेकिन पिछड़ा वर्ग के बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल का परिवार अब तक एक भी आई.ए. एस. या आई.पी.एस. पैदा नहीं कर सका।

  क्रीमी लेयर यानी मलाईदार परत की अवधारणा के विरोधी यह कह रहे हैं कि पहले तो सवर्ण लोगों ने जातीय आधार पर बेईमानी की। अब वे लोग क्रीमी लेयर का बंधन लगाकर बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल और पूर्व मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय जैसे संपन्न पिछड़ों के परिजनों को आरक्षण के लाभ से वंचित करना चाहते हैं।
वे कहते हैं कि आरक्षण की लड़ाई सिर्फ नौकरियों के लिए नहीं, बल्कि सम्मान व राजपाट में हिस्सेदारी की लड़ाई का भी हिस्सा है।

  मलाईदार परत के विरोधी यह भी कहते हैं कि धन संपत्ति, लाठी और दूसरे मामलों में बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल और सत्येंद्र नारायण सिंह और उनके रिश्तेदारों के परिवारों में कोई खास फर्क नहीं है। फर्क यही है कि श्री मंडल के परिवार में कोई आईएएस या आईपीएस नहीं है। इसलिए मंडल परिवार एक खास प्रकार की हीन भावना से भी ग्रस्त है। आरक्षण से संबंधित मंडल आयोग की रपट से इस भावना से मुक्ति मिलने वाली थी। पर, सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर का बंधन लगा कर धनी पिछड़ों के साथ अन्याय किया है।

 जनता दल ने क्रीमी लेयर की अवधारणा का प्रारंभ से ही विरोध किया है। इसीलिए जब बिहार सरकार को पिछड़ों की मलाईदार परत की पहचान करनी पड़ी तो उसने ऐसा मापदंड तय किया जिसके तहत आरक्षण के लाभ से राज्य का शायद ही कोई पिछड़ा वंचित हो।

लालू कहते हैं कि वे क्रीमी लेयर लगाकर पिछड़ों की एकता तोड़ना नहीं चाहते।

लालू सरकार ने रिटायर आई.ए.एस. यूएन सिन्हा की अध्यक्षता में क्रीमी लेयर की पहचान के लिए समिति बनाई थी। समिति ने जो रपट सरकार को दी, उसमें संशोधन के साथ राज्य सरकार ने उसे स्वीकार किया है।
 राज्य सरकार ने क्रीमी लेयर की छंटाई के लिए जो मापदंड तैयार किया है वह जाहिर है कि बिहार सरकार की नौकरियों पर लागू होगा। लेकिन लालू प्रसाद की जनता दल सरकार ने इस बात को ध्यान में रखकर यह मापदंड तय किया है कि ताकि उसे मौका मिलने पर केंद्र की नौकरियों के लिए भी लागू किया जा सके।

हालांकि जनता दल निकट भविष्य में केंद्र में सत्ता पा सकेगा, ऐसी उम्मीद बहुत थोड़े से लोग ही कर सकते हैं। केंद्र की नौकरियांे के लिए क्रीमी लेयर की छंटाई का काम आर.एन. प्रसाद की समिति ने किया है। आर.एन. प्रसाद की समिति की रपट के अनुसार केंद्र की नौकरियांे में आरक्षण का लाभ उन परिवारों को नहीं मिलेगा जिसकी साल में एक लाख रुपये से अधिक आमदनी है।

पर मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने कहा है कि बिहार में पिछड़ों में कोई क्रीमी लेयर यानी संपन्न तबका नहीं है। क्रीमी लेयर केंद्र सरकार का ब्रहमपाश है जिसके जरिए वह पिछड़ों को मारना चाहती है। क्रीमी लेयर को मैं बधिया आरक्षण मानता हूं। जनता दल के लोहियावादी विधायक राधाकांत यादव ने जनसत्ता को बताया कि पिछड़ों के जिस सपन्न तबकों में नौकरियों के लिए योग्य उम्मीदवार उपलब्ध है, उन्हें तो केंद्र सरकार क्रीमी लेयर के नाम पर छांटना चाहती है। लेकिन जिस कमजोर तबके मेें अभी योग्य उम्मीदवार नहीं हैं, उसे आरक्षण का लाभ देने का ढांेग कर रही है।

डा.राम मनोहर लोहिया ने भी कहा था कि पिछड़ों को जब कुछ मिलने लगेगा तो उसका लाभ पहले वहीं उठाएंगे जो अपेक्षाकृत खुशहाल और दबंग हैं। श्री यादव ने कहा कि हालांकि लोहिया की आरक्षण नीति और आज की आरक्षण नीति में फर्क आ चुका है। आज अरक्षण की लड़ाई में सुविधा और सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई भी है।

  यू एन सिन्हा समिति के सदस्य डा. राम उदगार महतो ने बताया कि यहां दस लाख रुपये सालाना से अधिक आय और बीस लाख रुपये से अधिक की अचल संपत्ति वाले लोग मलाईदार परत में आएंगे। उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

डा.महतो ने कहा कि यदि आर.एन. प्रसाद समिति का मापदंड यहां लागू किया जाए तो कोई पिछड़ा यहां किसी काॅलेज का प्रिंसिपल तक नहीं बन सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि आर.एन. प्रसाद समिति का मापदंड यहां लागू कर दिया जाए तो पिछड़ों के लिए आरक्षित सीटें खाली रह जाएंगी। जिस तरह अनुसूचित जाति  के लिए आरक्षित सीटें खाली रहती हैं। अभी पूरे बिहार में सिर्फ सात या आठ हरिजन ही विश्वविद्यालयों में टीचर हैं। प्रोफेसर तो शायद एक भी नहीं।

  दूसरी ओर, खुद यू.एन. सिन्हा समिति के एक बागी सदस्य प्रो.कमलेश्वरी साह ने यह सुझाव दिया था कि विधायक , सांसद या मंत्री जो दो बार चुनाव जीत चुके हैं, उनके परिवार के सदस्यों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

  लालू सरकार ने इसे नहीं माना। क्रीमी लेयर से संबंधित लालू सरकार के मापदंड के खिलाफ डा.जगन्नाथ मिश्र ने राज्यसभा मे आवाज उठाई तो केंद्रीय कल्याण मंत्री सीताराम केसरी ने उसकी जांच कराने का आश्वासन दिया। जनसत्ता से बातचीत में डा.मिश्र ने कहा कि इस बारे में लालू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ काम किया है। इससे साफ हो गया है कि लालू प्रसाद पिछड़ों के सुखी संपन्न व उच्च पदस्थ लोगों के पक्षधर हैं। अन्य पिछड़ों और गरीब पिछड़ों के प्रति उनकी निष्ठा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की मंशा है कि पिछड़ों का वास्तविक गरीब और कमजोंर तबका आरक्षण का लाभ उठाए। जो पिछड़े सामान्य लोगों के बराबर आ चुके हैं, उन्हें क्रीमी लेयर मान कर छांट दिया जाए।

समाजवादी पार्टी के लक्ष्मी साहु ने क्रीमी लेयर के संबंध में बिहार सरकार के रवैये के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा है और हस्तक्षेप की मांग की है।

भारतीय जनता पार्टी की बिहार शाखा के अध्यक्ष कैलाशपति मिश्र ने कहा कि हमारी पार्टी हमेशा 27 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में रही है। लेकिन हम यह भी चाहते हैं कि उसका लाभ पहले उन लोगों को मिले जो गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं।

जनता दल (जार्ज) के सांसद सैयद शहाबुददीन ने कहा है कि क्रीमी लेयर के बारे में बिहार सरकार के फैसले से सुप्रीम कोर्ट की अवमानना होती है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने एक खास मकसद के तहत सरकार से कहा था कि वह क्रीमी लेयर की पहचान करे। लालू सरकार ने उस मकसद के खिलाफ काम किया हे।

सी.पी.आइ. (एम एल-लिबरेशन) की बिहार शाखा के प्रवक्ता राजाराम सिंह ने कहा है कि लालू सरकार ने पिछड़ों को धोखा दिया है।अब पिछड़ी जातियों का गरीब हिस्सा आरक्षण से वंचित होगा।लालू प्रसाद यह कहना चाहते हैं कि पिछड़ों में कोई कुलक या नव धनिक तबका नहीं है।यह गलत बात है।  
    
(यह लेख जनसत्ता के 19 अगस्त, 1994 के अंक में प्रकाशित)

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

सुनवाई में देरी का एक रिकार्ड है एल.एन.मिश्र हत्याकांड मुकदमा

   सुप्रीम कोर्ट ने ललित नारायण मिश्र हत्याकांड मुकदमे की सुनवाई में देरी पर सन् 2011 में ही आश्चर्य प्रकट करते हुए इस संबंध में स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट के इस निदेश का क्या नतीजा निकला, यह तो नहीं मालूम, पर यह तथ्य है कि अब तक इस केस को अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंचाया जा सका है।

यानी लोअर कोर्ट भी इस केस में किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका है।

  लोअर कोर्ट के फैसले के बाद उसकी अपील हाईकोर्ट व बाद में सुप्रीम कोर्ट में की जा सकती है। यानी इस केस में और कितनी देरी हो सकती है, इसकी कल्पना कठिन नहीं है।

  याद रहे कि 1975 में तत्कालीन रेलमंत्री एल.एन. मिश्र की बिहार के समस्तीपुर में खुलेआम हत्या कर दी गई थी। किसी बड़े नेता की हत्या के केस की सुनवाई में देरी का यह एक रिकाॅर्ड है। इस मामले की सुनवाई पहले समस्तीपुर कोर्ट में हो रही थी, पर 1979 में इस मुकदमे को दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया था। तब से इसकी सुनवाई जारी है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 1991 में ही यह निदेश दिया था कि इस केस की सुनवाई प्रति दिन होनी चाहिए।

  मिश्र हत्याकांड की सुनवाई में देरी इस देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था की स्थिति पर एक कड़ी टिप्पणी है। इस देरी के लिए सिर्फ न्यायालयों पर कार्य अधिकता ही जिम्मेदार नहीं है। जब एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री के हत्यारों को भी इस देश में समय पर सजा नहीं मिल पा रही है, तो अन्य सामान्य अदालती मामलों के हश्र की कल्पना आसानी से की जा सकती है। ऐसी ढीली न्याय प्रणाली का खामियाजा पूरा समाज और देश भुगत रहा है। इससे सिर्फ अपराधी खुश होते हैं।      
  
 ललित नारायण मिश्र सत्तर के दशक के चर्चित केंद्रीय मंत्री थे। अपने जीवनकाल में वे कई कारणों से अक्सर चर्चाओं में रहते थे। पर, उससे भी अधिक चर्चा उनकी हत्या को लेकर हुई थी।

    ललित नारायण मिश्र एक दबंग और विवादास्पद नेता थे। वे तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और उनके छोटे पुत्र संजय गांधी के करीबी थे। उनके जितने दोस्त थे, उतने ही दुश्मन। बिहार के मजबूत नेता व स्वतंत्रता सेनानी ललित नारायण मिश्र की हत्या से संबंधित मुकदमे की सुनवाई के अंत की वर्षों से बिहारवासी प्रतीक्षा कर रहे हैं। 

   याद रहे कि इस केस में भी शुरू से ही राजनीति होती रही है। यह भी देरी का कारण रहा। इसे राजनीतिक हत्या बताया जाता है। इस केस की जांच का भार पहले बिहार पुलिस की सी.आई.डी. और बाद में सी.बी.आई. को सांैपा गया। बिहार की अदालत में इस केस से संबंधित आरोप पत्र दाखिल किया गया था। पर बाद में सी.बी.आई. ने सुप्रीम कोर्ट से गुजारिश की थी कि वह इस केस को बिहार से बाहर सुनवाई के लिए भेजने का आदेश दे। क्यांेकि इस केस से संबंधित कागजात नष्ट किए जाने का खतरा है और गवाह विक्रम की जान पर भी खतरा है। विक्रम इस केस का इकबालिया गवाह बन गया था। 

सी.बी.आई. ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि विक्रम को बिहार की जेल में जान से मार देने की धमकी मिल रही है। संभवतः यह पहला केस था जिसकी सुनवाई संबंधित राज्य से बाहर करने का सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसंबर 1979 को आदेश दिया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की त्वरित सुनवाई का आदेश भी निचली अदालत को दिया था। इसके बावजूद कई कारणों से यह केस लंबा खिंचता चला गया।
    
22 मई 1980 को यह केस सेशन ट्रायल के लिए भेज दिया गया था। याद रहे कि इकबाली गवाह यानी एप्रूवर विक्रम ने 7 मई 1980 को दिल्ली के चीफ मेट्रोपाॅलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष यह बयान दिया था कि अक्तूबर 1978 में बिहार सरकार के तत्कालीन मुख्य सचिव ने उससे कहा था कि राज्य सरकार इस केस को वापस कराना चाहती है। विक्रम ने यह भी कहा था कि बिहार सरकार चाहती है कि उसके कहने के अनुसार ही वह कोर्ट में गवाही दे। 

  याद रहे कि जब ललित नारायण मिश्र की हत्या हुई थी तब कांग्रेस के अब्दुल गफूर बिहार के मुख्यमंत्री थे। बाद में उसी दल के डा. जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री बना दिए गए। कांग्रेस हाई कमान के इस फैसले को स्वीकार कर लेने के कारण ललित बाबू की विधवा डा. मिश्र से नाराज हो गई थीं। डा. मिश्र ललित बाबू के भाई हैं। इस नाराजगी को लेकर तरह- तरह की चर्चाएं थीं। आपातकाल की समाप्ति के बाद जनता पार्टी के कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री बने। सन् 1980 में इंदिरा गांधी फिर कें्रद्र में सत्ता में आ गईं। 1980 में ही डा.जगन्नाथ मिश्र एक बार फिर मुख्य मंत्री बने। 

  कर्पूरी ठाकुर जब मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने प्रसिद्ध न्यायविद् वी.एम.तारकुंडे से कहा था कि वे इस बात की समीक्षा करें कि सी.बी.आई.इस केस कीं जांच सही दिशा में कर रही है या नहीं। तारकुंडे ने फरवरी, 1979 में प्रस्तुत अपनी रपट में साफ -साफ कह दिया था कि सी.बी.आई. इस केस में आनंद मार्गियों को गलत ढंग से फंसा रही है। इस रपट को बिहार सरकार ने केंद्र सरकार को भेज दिया था। 

  पहले दिल्ली के पाटियाला हाउस कोर्ट में यह केस गया। फिर इसे तीस हजारी कोर्ट में भेज दिया गया। इस लंबे खिंचते मुकदमे की सुनवाई बारी- बारी से करीब दो दर्जन जज कर चुके हैं। कुछ समय पहले तक प्राप्त सूचना के अनुसार बचाव पक्ष के चार वकीलों का सुनवाई के बीच ही देहांत हो चुका है। एक अभियुक्त की भी मृत्यु हो चुकी है। सन 2011 में यह सूचना मिली थी कि बचाव पक्ष के कुल 39 गवाहों में से 31 की इस बीच मृत्यु हो चुकी है।


   इस केस के दस्तावेज 11 हजार पन्नों में हैं। सी.बी.आई. ने आनंद मार्ग से जुड़े 10 प्रमुख लोगों के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। आनंद मार्ग के जिन लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया, उनमें संतोषानंद, सुदेवानंद, गोपाल जी, रंजन द्विवेदी, दीनानंद, राम कुमार, रामाश्रय और अर्थानंद शामिल हैं। इनमें से कुछ व्यक्तियों का निधन हो चुका है। राम कुमार तथा रामाश्रय को गिरफ्तार नहीं किया जा सका। कई सौ गवाहों की गवाहियां गुजर चुकी हैं। कई साल साल पहले एल.एन.मिश्र के पुत्र विजय कुमार मिश्र की गवाही हो चुकी है। विजय मिश्र बिहार में विधायक हैं।

    यह हत्याकांड जब हुआ था तब आनंद मार्ग के संस्थापक प्रभात रंजन सरकार उर्फ आनंदमूर्ति जी पटना के केंद्रीय कारा में बंद थे। उन पर अपने ही संगठन के बागी संन्यासियों की हत्या का आरोप था। यह बात और है कि वे बाद में उन आरोपों से बरी हो गए थे। पर आनंदमूर्ति के जेल में रहने के कारण देश-विदेश में फैले उनके कट्टर अनुयायियों में बड़ा रोष था। सी.बी.आई. का आरोप है कि आनंदमार्गियों ने अपने गुरू की रिहाई के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए ललित नारायण मिश्र की हत्या कर दी। 

हालांकि बिहार पुलिस की सी.आई.डी. द्वारा प्रारंभिक जांच के सिलसिले में जो बातें सामने आई थीं, वे बातें किन्हीं अन्य प्रभावशाली लोगों की तरफ इशारा करती थीं। इस हत्याकांड के मुख्य सूत्रधार दिल्ली के एक अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति बताये जाते हैं जिनका सत्ता के शीर्ष से सीधा संबंध था। आनंदमार्गी इस हत्याकांड में कहीं नहीं थे।

ललित बाबू के एक परिजन ने भी इन पंक्तियों के लेखक से व्यक्तिगत बातचीत में इस बात की पुष्टि की थी कि दिल्ली के उस प्रभावशाली व्यक्ति का ही हत्या में हाथ था। 

    इस केस में पूर्व मुख्यमंत्री डा.जगन्नाथ मिश्र पहले ही गवाही दे चुके हैं। इस केस के मुतल्लिक ललित बाबू के परिजन भी यह मानते हैं कि जिन आनंदमार्गियों को आरोपित किया गया है, उनसे ललित बाबू की कोई दुश्मनी नहीं थी। आनंद मार्ग से भी उनकी कोई दुश्मनी नहीं थी। दिल्ली से गवाही देकर पटना लौटे विजय कुमार मिश्र ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि मैंने अदालत को कह दिया है कि मेरे पिता की हत्या में उन लोगों का हाथ नहीं है जिनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया है। 

इससे पहले ललित नारायण मिश्र की विधवा कामेश्वरी देवी ने मई 1977 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री चरण सिंह को पत्र लिखकर उनसे मांग की थी कि वे मेरे पति की हत्या के मामले की फिर से जांच कराएं। उन्होंने यह भी लिखा था कि जिन आनंदमार्गियों को इस कांड में गिरफ्तार किया गया है, वे निर्दोष हैं। याद रहे कि कामेश्वरी देवी का सन् 2001 में निधन हो गया।
    आश्चर्यजनक ढंग से यह बात सी.बी.आई. की कहानी से मेल नहीं खाती। अब कोर्ट को फैसला करना है कि वह सी.बी.आई की बातों पर भरोसा करती है कि ललित बाबू के परिजनों की गवाही पर। इस केस में फैसला कुछ भी हो, कोई न कोई पक्ष अपील में ऊपरी अदालत में जाएगा ही। क्योंकि मामला न सिर्फ विवादास्पद है बल्कि इसमें राजनीतिक पुट भी है। उनकी हत्या के बाद से ही यह सवाल पूछा जाता रहा है कि क्या उनकी हत्या के पीछे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी ?ं 

   दरअसल इस केस के प्रारंभिक दिनों से ही इस हत्याकांड की जांच प्रक्रिया को लेकर कई तरह की आशंकाएं जाहिर की जाती रही हंै। इस केस की सुनवाई में विलंब होने का यह भी एक कारण रहा। 21 जनवरी 2001 को ही अदालत इस केस में अभियुक्तों के खिलाफ आरोप गठित कर पाई। इस बीच किसी न किसी बहाने सुनवाई टलती रही। 

केस की गति यही थी कि सुनवाई शुरू होने के बाद दस साल में यानी सन् 2001 तक अदालत सात में से सिर्फ दो आरोपितों के बयान ही दर्ज करा पाई थी। ऐसा इस देश के अनेक मुकदमों के सिलसिले में आए दिन होता रहता है। सरकारें अभियोजन पक्ष को चुस्त बनाने की दिशा में काम नहीं करती।

बाद में रोज ब रोज सुनवाई करने का तय हुआ तो केस कुछ तेजी से  आगे बढ़ने लगा। लगा था कि सन् 2009 में किसी समय इस केस का कुछ न कुछ फैसला हो जाएगा। पर ऐसा नहीं हो सका है।

    उत्तर बिहार के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर 2 जनवरी 1975 को समस्तीपुर-मुजफ्फरपुर बड़ी लाइन का उद्घाटन समारोह था। समारोह चल ही रहा था कि सभा स्थल पर ग्रेनेड से हमला कर दिया गया। इस हमले में रेलमंत्री सहित कई लोग घायल हो गए। 
आरोप है कि इस विस्फोट के बाद से ही इस बात का षड्यंत्र शुरू हो गया कि कैसे ललित नारायण मिश्र का जल्दी से जल्दी और ठीक- ठाक इलाज नहीं होने दिया जाए। ऐसे कुछ नेता लोग भी घटनास्थल पर थे जिनका नाम इस कांड में षड्यंत्रकारी के रूप में बाद में आया था। दरअसल वे ललित बाबू के पहले करीबी ही माने जाते थे, पर वे बाद में भीतर ही भीतर दुश्मन हो चुके थे। षड्यंत्र के तार दिल्ली तक जुड़े बताए गये।

  2 जनवरी 1975 को शाम 5 बज कर 50 मिनट पर हैंड ग्रेनेड से हमला किया गया। घायल ललित बाबू को बगल के शहर दरभंगा के किसी निजी अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचाया जा सकता था। पर उन्हें विशेष ट्रेन से समस्तीपुर से काफी दूर दानापुर लाया गया। वह विशेष ट्रेन जिससे घायल को दानापुर लाया गया, वह समस्तीपुर से रात आठ बजे ही खुल सकी। 

बताया गया कि तकनीकी कारणों से ट्रेन जल्दी नहीं खुल सकी। उस ट्रेन को जानबूझ कर बीच में भी रोका गया। उन दिनों बिहार के सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की हड़ताल थी, किंतु निजी चिकित्सकों से ललित बाबू का इलाज करवाया जा सकता था। समस्तीपुर से घंटों यात्रा करके दानापुर के मामूली रेलवे अस्पताल में लाने के पीछे कई लोगों को तब षड्यंत्र ही लगा था। जाहिर है कि इस बीच उनकी हालत बिगड़ गई और अगले दिन उनकी मृत्यु हो गई।

   इस हत्याकांड की कहानी सिर्फ इसलिए ही अजूबी नहीं है कि इसकी जांच और सुनवाई में रिकाॅर्ड समय लग रहा है, बल्कि इसलिए भी अजीब है क्योंकि इसमें काफी गुत्थियां हैं। इस केस को लेकर ललित बाबू के शुभचिंतकों व उनको जानने वाले लोगों में उलझन बरकरार है।
     इस केस के अनुसंधान के दौरान कई मोड़ आए। घटना के बाद की शुरुआती जांच के दौरान अरुण कुमार ठाकुर और अरुण मिश्र के सनसनीखेज बयान सामने आए थे। इन लोगों ने समस्तीपुर के एक न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष सी.आर.पी.सी. की धारा -164 के तहत यह बयान दिया था कि किसी के कहने पर उन लोगों ने ही हत्या की योजना बनाई थी और उस काम को अंजाम दिया था। बिहार पुलिस की सी.आई.डी. ने मिश्र और ठाकुर के बयान दर्ज करवाए थे।

  पर, इस बयान के आने के तत्काल बाद सी.बी.आई. के निदेशक डी.सेन ने समस्तीपुर का दौरा किया और कह दिया कि मिश्र और ठाकुर निर्दोष हैं। दरअसल ललित नारायण मिश्र की हत्या में आनंदमार्गियों के हाथ हैं। दरअसल अरुण मिश्र और अरुण ठाकुर के बयानों से यह बात भी सामने आ रही थी कि इस हत्याकांड में बिहार के एक एम.एल.सी., मुजफ्फरपुर के एक कांग्रेसी नेता और दिल्ली के एक चर्चित कांग्रेसी नेता शमिल हैं।

    जो लोग आनंदमार्गियों को निर्दोष मानते हैं, उन्हें इस मिश्र-ठाकुर की कहानी पर भरोसा है। पर पता नहीं असलियत क्या है। अदालत के सामने सारे तथ्य दोनों ंपक्ष रख रहे हैं। अदालती निर्णय से दूध का दूध और पानी का पानी होने की उम्मीद की जानी चाहिए। अदालत देखेगी कि सी.बी.आई. के आरोप पत्र में कितना दम है। वह यह भी देखेगी कि जो लोग आरोपित हैं, उनकी कहानी में कितना दम है।

      इस मुकदमे के अलावा ललितनारायण मिश्र हत्याकांड की जांच के लिए मैथ्यू आयोग भी बना था। मैथ्यू आयोग के समक्ष समस्तीपुर रेल पुलिस के अधीक्षक सरयुग राय और अतिरिक्त कलक्टर आर.वी. शुक्ल ने कहा था कि ललित नारायण मिश्र को घायलावस्था में समस्तीपुर से दानापुर ले जाने वाली गाड़ी को समस्तीपुर स्टेशन पर शंटिंग में ही एक घंटा दस मिनट लग गये। 

दरभंगा के कमिश्नर जे.सी. कुंद्रा ने 16 अप्रैल 1975 को आयोग से  कहा कि मैंने उद्घाटन के अवसर पर दो हजार लोगों को निमंत्रित करने के रेल अधिकारियों के प्रस्ताव पर कभी सहमति नहीं दी थी। पर सुरक्षा व्यवस्था पूरी थी। बम विस्फोट के कारण उत्पन्न विभ्रम के कारण भी घायल को लेकर जा रही रेलगाड़ी के छूटने में देर हुई होगी। साथ ही इसका यह भी कारण था कि स्टीम इंजन को बदल कर रेल अफसर उस ट्रेन में डीजल इंजन लगाना चाहते थे ताकि ट्रेन की गति अधिक हो।

 (22 फरवरी 2014)

बुधवार, 28 अगस्त 2013

क्यों कराना पड़ा 1971 में लोकसभा का मध्यावधि चुनाव

इस देश में लोकसभा का पहला मध्यावधि चुनाव क्यों कराना पड़ा था? मध्यावधि चुनाव 1971 में हुआ। सन् 1969 में कांग्रेस के महाविभाजन को इसका सबसे बड़ा कारण बताया गया। इस विभाजन के साथ ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सत्तारूढ़ दल का संसद में बहुमत समाप्त हो चुका था। पर, वह तो सी.पी.आई. तथा कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों की मदद से चल ही रही थी।

तब इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा देते हुए आरोप लगाया था कि इस काम में संगठन कांग्रेस के नेतागण बाधक हैं। कांग्रेस के विभाजन को यह कहकर औचित्य प्रदान करने की कोशिश की गई। क्या उन्होंने गरीबी हटाओ के अपने नारे को कार्यरूप देने के लिए मध्यावधि चुनाव देश पर थोपा ?

 यदि सन् 1971 के चुनाव में पूर्ण बहुमत पा लेने के बाद उन्होंने सचमुच गरीबी हटाने की दिशा में कोई ठोस काम किया होता तो यह तर्क माना जा सकता था। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ कि इस देश से गरीबी वास्तव में हटती। फिर क्यों मध्यावधि चुनाव थोपा गया ? दरअसल केंद्र सरकार के कभी भी गिर जाने के भय से वह चुनाव कराया गया था।

  सन् 1971 के मध्यावधि चुनाव के ठीक पहले देश में हो रही राजनीतिक घटनाओं पर गौर करें तो पता चलेगा कि तब कई राज्यों के मंत्रिमंडल आए दिन गिर रहे थे। इंदिरा गांधी को लगा कि कहीं उनकी सरकार भी किसी समय गिर न जाए! वे वामपंथियों से मुक्ति भी चाहती थीं। एक बार कंेंद्र सरकार गिर जाती तो राजनीतिक व प्रशासनिक पहल इंदिरा गांधी के हाथों से निकल जातीं। यह उनके लिए काफी असुविधाजनक होता।

    लोकसभा के मध्यावधि चुनाव के साथ एक और गड़बड़ी हो गई। सन् 1967 तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक ही साथ होते थे। इससे सरकारों, दलों और उम्मीदवारों को कम खर्चे लगते थे। सन् 1971 के बाद ये चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे। इससे खर्चे काफी बढ़ गए। इस कारण राजनीति में काला धन की आमद भी बढ़ गई। दरअसल सन् 1967 और 1970 के बीच उत्तर प्रदेश में पांच और बिहार में विभिन्न दलों के आठ मंत्रिमंडल बने। अन्य कुछ राज्यों में भी ऐसी ही अस्थिरता रही।


इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली नई कांग्रेस को यह जरूरी लगा कि जल्दी यानी नियत समय से एक साल पहले ही लोस का मध्यावधि चुनाव कराकर पूर्ण बहुमत पा लिया जाए।

 उस चुनाव को लेकर पूरी दुनिया में भारी उत्सुकता थी। विदेशी मीडिया में इस बात को लेकर अनुमान लगाए जा रहे थे कि पता नहीं भारत इस चुनाव के बाद किधर जाएगा। उन दिनों दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ के दो ध्रुवों के बीच बंटी हुई थी।

ब्रितानी अखबार न्यू स्टेट्समैन ने तब लिखा कि ‘हिम्मत से किंतु शांतिपूर्वक श्रीमती गांधी ने लोकसभा भंग कर दी। भारत में यह पहली बार हुआ है। सत्ताच्युत होने का खतरा न होते हुए भी उनकी सरकार को बहुमत प्राप्त नहीं था और इस स्थिति में वह असंतुष्ट थीं। लगातार चैथी बार अच्छी वर्षा होने के बावजूद कुछ आर्थिक विवशताएं भी थीं।......अब तक के तमाम चुनावों के मुद्दे बहुत ही अस्पष्ट रहे और चुनाव घोषणा पत्रों का उद्देश्य सबको खुश करना रहा है। इस बार स्थिति भिन्न होगी। समान मुद्दों की तह में कुछ ठोस मुद्दे होंगे जो कुछ दलों को वामपंथी और कुछ को दक्षिणपंथी सिद्ध करेंगे।’

  अमेरिकी अखबार क्रिश्चेन सायंस माॅनिटर ने लिखा कि ‘श्रीमती गांधी एक साल से अधिक अर्सा पूर्व कांग्रेस विभाजन के बाद से अल्पमत की सरकार का नेतृत्व कर रही हैं। संसद में कोई भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास कराने से पहले उन्हें परंपरावादी मास्को समर्थक कम्युनिस्ट पार्टी और क्षेत्रीय राजनीतिक गुटों का समर्थन प्राप्त करना पड़ता था। इसी असंतोषकारी स्थिति से तंग आकर प्रधानमंत्री कई हफ्तों तक सोचती रहीं कि चुनाव कराया जाए या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से कि पूर्व राजाओं के विशेषाधिकारों को खत्म करने का उनका निर्णय गैर संवैधानिक है, श्रीमती गांधी की सोच खत्म हो गई।’

  न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा कि ‘वर्तमान भारतीय राजनीति की एक विडंबना यह है कि नई दिल्ली द्वारा बहुप्रचाारित हरित क्रांति वास्तव में उन ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष फैला रही है, जहां इसने सामाजिक और आर्थिक विषमता को बढ़ावा दिया है। श्रीमती गांधी की सधी हुई राजनीतिक चालें अब तक तो प्रतिपक्ष को डगमगाती रही है। लेकिन उनके विरोध में संगठित होने का प्रतिपक्ष का हौसला भी बढ़ता रहा है। यदि श्रीमती गांधी का पासा सही गिरा तो भारत अधिक परिपुष्ट राजनीतिक स्थायित्व और संयत वामपंथी सत्ता के अधीन अधिक गतिशील विकास के नये युग में प्रवेश करेगा। अगर नई कांग्रेस आगामी चुनाव में यथेष्ट बहुमत प्राप्त न कर सकी तो भारतीय राजनीति की वर्तमान विभाजक प्रवृतियां इस उपमहाद्वीप के लिए भारी खतरा उत्पन्न करेगी।’  
(प्रभात खबर में प्रकाशित)

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

आयोग के कारण तो गिर गई थी एक अच्छी सरकार

(सितंबर 2009 में प्रकाशित लेख)


एक न्यायिक जांच आयोग के असर ने सन् 1967 में तब की सरकार ही गिरवा दी थी।

   सन् 1967 का महामाया मंत्रिमंडल निष्पक्ष प्रेक्षकों द्वारा बिहार का अब तक का सबसे बढि़या मंत्रिमंडल माना जाता है। उसके करीब-करीब सभी मंत्री जनसेवा की भावना से ओत-प्रोत थे। उस मंत्रिमंडल के होम करते हाथ जल गये थे। उस सरकार के गिरने के कारण बिहार की अधिकतर जनता दुःखी थी। पर वह अब भी निष्पक्ष लोगों से यह सराहनीय पाती है कि वह बिहार का अब तक का सबसे अच्छा मंत्रिमंडल था।
यहां किसी एक मुख्यमंत्री की बात नहीं कही जा रही है। पूरे मंत्रिमंडल की बात कही जा रही है। वह जिन कारणों से एक ही साल के भीतर गिरा दी गई तो उसके दो मूल कारण थे। एक तो खुद संयुक्त मोर्चा में शामिल दलों के अनेक विधायक सत्तालोलुप हो गये थे। दूसरा किंतु सबसे महत्वपूर्ण कारण यह था कि अय्यर जांच आयोग से बिहार कांग्रेस के कई दिग्गज नेता बौखला गये थे और वे जल्द से जल्द महामाया सरकार को गिरा देना चाहते थे। पदलोलुपों की मदद से वे इस काम में सफल भी हो गये।

    महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में बिहार में जो सरकार बनी थी उसमें संसोपा, सी.पी.आई. और जनसंघ के मंत्री भी शामिल थे। पर मंत्री पद को लेकर बी.पी. मंडल और जगदेव प्रसाद नाराज थे और उन्होंने शोषित दल बना कर सरकार गिरा दी। पर इस काम में उन्हें बिहार कांग्रेस के कुछ दिग्गज नेताओं का भरपूर सहयोग हासिल था।

महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार ने सन् 1946 से 1966 तक मंत्री व मुख्यमंत्री रहे छह कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की जांच के लिए अय्यर न्यायिक जांच आयोग का गठन कर दिया। अय्यर सुप्रीम कोर्ट के प्रतिष्ठित जज रह चुके थे। इस आयोग के गठन के पीछे तत्कालीन मंत्री भोला प्रसाद सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका थी। वे आज भी बताते हैं कि किस तरह कुछ कांग्रेसी नेताओं ने महामाया प्रसाद की सरकार को गिराने के लिए कल-बल-छल का इस्तेमाल किया था। तत्कालीन उपमुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के आवास पर बम फेंके गये। विधायकों को प्रलोभन दिया गया। धमकाया गया। अपहरण करने की कोशिश की गई। तब सरकार गिरने की आशंका से उपजी राजनीतिक अनिश्चितता के कारण पुलिस भी असमंजस में थी। वह उन सरकार समर्थक विधायकों को समुचित संरक्षण नहीं दे रही थी जिनके अपहरण की आशंका थी। इसलिए कुछ विधायकों व मंत्रियों को बचाने के लिए संयुक्त मोर्चा के नेताओं ने निजी सुरक्षा व्यवस्था पर ही भरोसा किया।

   जितने विधायकों ने दलबदल करके शोषित दल बनाया, उन सबको बी.पी. मंडल सरकार में मंत्री बना दिया गया। यह राजनीति में पतन की ठोस शुरुआत थी। सवाल एक ऐसे आयोग का जो था। उस आयोग में सबकी गरदन फंस रह थी। अगले मुख्य मंत्री बी.पी. मंडल की तारीफ करनी होगी जिसने आरोपितों के दबाव के बावजूद अय्यर कमीशन को भंग नहीं किया।

पर बाद की अवधि में बार- बार सरकार बदलते जाने के कारण गवाहों व सबूतों को जुटाने में दिक्कत जरूर हुई। फिर भी सभी छह अभियुक्त किसी न किसी कदाचार-भ्रष्टाचार के लिए आयोग द्वारा  दोषी पाए ही गये थे। एक आयोग ने सरकार गिरवा कर अपना कमाल दिखा दिया। इससे यह भी पता चलता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई निर्णायक कदम उठाना उस समय तक भी कितना कठिन काम हो चुका था। अब तो यह काम दुष्कर बन चुका है।

   महामाया सरकार ने यह सोचा था कि अय्यर आयोग के जरिए दोषी नेताओं को सजा दिलवा कर आगे के भ्रष्ट नेताओं को चेतावनी दे दी जाए। पर उस काम में सफलता नहीं मिली। बल्कि एक अच्छी खासी सरकार शहीद हो गई।

महामाया सरकार जब बनी थी तब देश में भयंकर सूखा था। बिहार में उसका सर्वाधिक असर था। महामाया सरकार के अनेक मंत्रियों और अफसरों ने रात दिन एक करके राहत के काम नहीं किये होते तो हजारों लोग तब भूख से मर गये होते। जय प्रकाश नारायण ने भी सराहनीय राहत कार्य किया। उस सरकार को भी भ्रष्ट और सत्तालोलुप नेताओं ने नहीं बख्शा था।

याद रहे कि अय्यर आयोग भंग करने का राजनीतिक समझौता करके तब महामाया सरकार बचाई जा सकती थी। पर ऐसा करना उस समय के संयुक्त मोर्चा की सरकार ने उचित नहीं समझा। उस समय बी.पी. मंडल को बिहार में मंत्री बने रहने दिया गया होता और जगदेव प्रसाद को मंत्री बना दिया गया होता तोभी महामाया सरकार नहीं गिरती। पर ऐसा समझौता भी नहीं किया गया। ऐसे नहीं माना जाता है तब के मंत्रिमंडल को अब तक का सबसे अच्छा मंत्रिमंडल !

बुधवार, 7 अगस्त 2013

भागलपुर दंगे में आर.एस.एस. या भाजपा का हाथ नहीं : लालू (1989 में बोले)

(08 मई, 2007 को प्रकाशित लेख)

अपना फायदा लालू के लिए हरदम सर्वोपरि


  कम से कम तीन उदाहरण काफी होंगे। ताजा उदाहरण आपातकाल के समर्थन को लेकर है। उन्होंने पहले तो सार्वजनिक रूप से कह दिया कि 1975 में देश में आपातकाल लगाना जरूरी था, पर बाद में वे अपने बयान से पलट गए। इससे पहले भी अपने फायदे के लिए दो बार अपने महत्वपूर्ण बयानों से वे पलट चुके हैं।
सब अपने लाभ के लिए। वैसे पलटे तो हैं और भी कई बयानों से। पर इन तीन को महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए।

    लालू प्रसाद 1989 में लोकसभा के सदस्य चुने गए थे। भागलपुर दंगे पर लोकसभा में चर्चा हो रही थी। लालू प्रसाद ने सदन में दावे के साथ कहा कि दंगे में आर.एस.एस. या भाजपा का हाथ नहीं है। दंगा शुरू कराया दो मुस्लिम अपराधियों ने। यह बात लालू प्रसाद ने इसलिए कही क्योंकि तब केंद्र में वी.पी. सिंह की सरकार भाजपा के समर्थन से चल रही थी। बिहार विधानसभा का चुनाव 1990 में होने वाला था। चुनाव के परिणाम उनके दल के अनुकूल हो, इसके लिए जरूरी था कि केंद्र में वी.पी. सिंह की सरकार बनी रहे। ऐसा तभी संभव था जब भाजपा का समर्थन उसे मिलता रहे। भागलपुर दंगे को लेकर भाजपा या आर.एस.एस. पर आरोप लगाकर उसे नाराज करना ठीक नहीं लगा लालू प्रसाद को।

   पर जब 1990 में लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने भागलपुर दंगे के कारणों को लेकर अपना विचार बदल लिया। तब तक भाजपा ने केंद्र की सरकार से अपना समर्थन वापस लेकर वी.पी. सिंह की सरकार को गिरा दिया था। फिर क्या था, लालू प्रसाद ने न सिर्फ भाजपा और आर.एस.एस. बल्कि एल.के. आडवाणी को भी भागलपुर दंगे के लिए जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। उन दिनों यशवंत सिन्हा बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता थे। उन्होंने लोकसभा में 1989 में दिए गए लालू प्रसाद के उस भाषण को विधानसभा में पढ़कर सुना दिया जिसमें उन्होंने आर.एस.एस. और भाजपा को क्लिन चीट दी थी।


बिहार का विभाजन मेरी लाश पर होगा : लालू (2000 में बोले)
   
  दूसरा मामला बिहार के विभाजन को लेकर है। सन् 2000 से पहले लालू प्रसाद अक्सर यह कहा करते थे कि ‘बिहार का विभाजन मेरी लाश पर होगा।’ पर सन 2000 में लालू प्रसाद के राजद को विधानसभा चुनाव में बहुमत नहीं मिला। राजद की सरकार का गठन तभी हो सकता था जब कांग्रेस का उसे समर्थन मिलता। कांग्रेस ने यह शर्त रख दी कि लालू प्रसाद यदि राज्य के विभाजन के लिए राजी हो जाएं तो
कांग्रेस समर्थन देकर सरकार बनवा देगी। लालू प्रसाद तुरंत राजी हो गए। वे अपना यह बयान भूल गए कि उनकी लाश पर विभाजन होगा। बिहार में उनके दल की सरकार जरूरी थी क्योंकि चारा घोटाले से संबंधित केस सामने थे और अपनी सरकार रहने पर विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में ठीक ठाक सुविधाएं मिल जाती हैं।

आपातकाल का समर्थन

   तीसरा उदाहरण आपातकाल के समर्थन का है। लालू प्रसाद की अपनी एक खासियत  है। उनके दिल में जो बात रहती है, वे उसे परिणामों की परवाह किए बिना कभी कभी बोल देते हैं। इंदिरा गांधी की तरह ही भ्रष्टाचार व परिवारवाद के तरह तरह के आरोप झेल रहे लालू प्रसाद को शायद लगता है कि एक बार फिर आपातकाल लग जाने के बाद वे इंदिरा गांधी की तरह ही अदालती कार्रवाइयों से बच जाएंगे। याद रहे कि आपात काल लगाकर कानून बदल देने के बाद इंदिरा गांधी इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजमेंट का परिणाम भुगतने से बच गई थीं। याद रहे कि हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी की संसद की सदस्यता खारिज कर दी। चुनाव में भ्रष्ट आचरण का आरोप सिद्ध हो जाने के बाद कोर्ट ने ऐसा किया था।

    कांग्रेस ने आपातकाल लगाने  पर जरूर बाद में अफसोस जाहिर किया था, पर अनेक कांग्रेसियों के मन में आपातकाल के प्रति आकर्षण अब भी है। शायद सोनिया गांधी लालू के इस बयान से भीतर भीतर खुश होंगी, यही सोच कर लालू प्रसाद ने आपातकाल के पक्ष में बयान दिया। यह और बात है कि अपनी पुरानी आदत के तहत उन्होंने बयान का इस इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के युग में भी तुरंत खंडन भी कर दिया। इससे उनकी साख कुछ और घटी क्योंकि कुछ ही समय पहले टी.वी. पर लोगों ने लालू प्रसाद को आपातकाल का समर्थन करते हुए देखा और सुना था। लालू प्रसाद के इस बयान पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि उनका बयान प्रतिक्रिया के काबिल भी नहीं है। उन्हें अभी कांग्रेस सरकार से कई काम कराने हैं। उनका इशारा था कि चारा घोटाले संबंधित केस में केंद्र सरकार से लालू प्रसाद को मदद चाहिए।

    लालू प्रसाद के आपातकाल समथर््ाक बयान पर उन नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है जो आंदोलन में सक्रिय थे और जिन्होंने आपातकाल की ज्यादतियां झेली थीं। आपातकाल के पक्ष में बयान देकर लालू प्रसाद ने उन्हें यह भी मौका दे दिया कि वे लालू प्रसाद की कमजोरियों की एक बार फिर चर्चा करें। लालू प्रसाद ने जेपी आंदोलन के दौरान अपनी अनेक कमजोरियां दिखाई थीं। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा है कि अगर आपातकाल कुछ समय और रहता तो लालू प्रसाद उसी समय कांग्रेस की गोद में जा बैठते। 
बिहार भाजपा के पूर्व संगठन मंत्री और जेपी आंदोलन के एक नेता हरेंद्र प्रताप ने लालू प्रसाद से संबंधित एक शर्मनाक प्रकरण की चर्चा कर दी। उन्होंने कहा कि  1985 में विद्यार्थी परिषद के सम्मेलन को लेकर राम बहादुर राय और लालमुनी चैबे के साथ मैं अब्दुल गफूर से मिला। तब वे केंद्र में मंत्री थे। श्री राय से जब उनका परिचय कराया गया तो उन्होंने कहा कि ‘इन्हीं के चलते बिहार से मेरा राजपाट चला गया। लालू को तो हमलोगों ने मिला लिया था। वह पैसा भी लेता था।’ राम बहादुर राय जेपी आंदोलन के प्रमुख नेताओं में थे और तब अब्दुल गफूर बिहार के मुख्यमंत्री थे।

   जदयू के प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने लालू के आपातकाल समर्थक बयान पर कहा कि लालू प्रसाद ने आंदोलन को अपनी बुलंदी के लिए सीढ़ी बनाइ्र्र। उनकी धोखाधड़ी की आदत अब भी कायम है। बिहार सरकार के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह ने कहा है कि हमने उन्हें आंदोलन में लाया था। वे तो वेटनरी कालेज में किरानी का काम करते थे। उनका एकमात्र काम था चंदा वसूलना। छात्र युवा संघर्ष संचालन समिति में लालू प्रसाद की हैसियत एक सदस्य मात्र की थी। समिति का कोई अध्यक्ष नहीं था। तब के आंदोलन में सक्रिय रहे भवेश चंद्र प्रसाद, विक्रम कुंअर, अश्विनी कुमार चैबे और अरूण कुमार सिंहा ने भी लालू प्रसाद के बारे में इसी तरह की राय प्रकट की है। कुल मिलाकर अपने बयान से लालू प्रसाद ने कांगेस को भले खुश किया होगा, पर जेपी आंदोलन में जो भी उनका थोड़ा बहुत योगदान था, उसपर भी उन्होंने पानी फेर दिया। निष्पक्ष लोगों में उनके प्रति यही राय बनी है। 
   
(08 मई, 2007 को प्रकाशित लेख)

प्रथम चुनाव में नेहरू की 18 हजार मील की विमान यात्रा


इन दिनों इस देश के कुछ लोहियावादी बुद्धिजीवी, जवाहरलाल नेहरू के ‘पुनर्मूल्यांकन’ के काम में लगे हुए हैं। थोड़े से नेहरूवादी भी डा. राम मनोहर लोहिया पर अब अपनी संतुलित दृष्टि डाल रहे हैं।

  यह इस देश की राजनीति में एक नया विकास है। कुछ साल पहले तक तो अधिकतर नेहरूवादियों ने डा. लोहिया और अधिकतर लोहियावादियों ने नेहरू में शायद ही कोई गुण देखा हो।

  पर, अब जब दोनों पक्षों ने संतुलित नजरों से इन दिग्गज महारथियों, स्वतंत्रता सेनानियों व विचारकांे को देखना शुरू किया है तो इसमें किसी तरह की अति नहीं हो तो बेहतर होगा। सपा सांसद मोहन सिंह उन बुद्धिजीवी नेताओं में शामिल हो गए हैं जो नेहरू पर ‘दूसरी नजर’ डाल रहे हैं। उन्होंने नेहरू पर पुस्तक लिख कर इस देश के बचे -खुचे लोहियावादियों को भी यह संदेश दिया है कि वे सिर्फ कुछ नेहरू निंदक समाजवादियों की नजर से ही नेहरू को नहीं देखें।

    मोहन सिंह ने 25 अप्रैल 2009 के ‘जागरण’ में यह लिखा है कि ‘प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कभी चुनावी यात्रा हवाई जहाज से नहीं की।’यह बात सही नहीं है। प्रथम आम चुनाव के दौरान उनकी चुनावी यात्राओं का विवरण उपलब्ध है। तब उन्होंने विमान से 18348 मील की चुनावी यात्राएं की थीं। उन्होंने कार से 5682 मील और ट्रेन से 1612 मील की यात्रा की। यहां तक कि उन्होंने तब 90 मील नावों पर चढ़कर चुनावी यात्रा की थी। मोहन सिंह की इस बात के बहाने नेहरू की चुनाव यात्राओं पर एक नजर डालना दिलचस्प होगा।

  यह बात सही है कि यदि आज वे होते तो आज के कुछ नेताओंे की तरह हेलिकाॅप्टर का बैलगाड़ी की तरह इस्तेमाल कतई नहीं करते। पर यह बात भी सही है कि उन्होंने ही सरकारी खर्च पर चुनाव प्रचार के लिए हवाई जहाज अपने लिए हासिल करने की परंपरा भी डलवाई थी। लोकतंत्र में यह अजूबा ही है कि ऐसी सुविधा सिर्फ प्रधानमंंत्री को ही मिले।

  यदि अपनी बिटिया इंदिरा गांधी को राजनीति में आगे बढ़ाने की उनकी कमजोरी   को भुला दिया जाए तो नेहरू स्वार्थी नेता नहीं थे। याद रहे कि नेहरू के जीवन काल में ही इंदिरा गांधी सन् 1958 में कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्य और 1959 में कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दी गई थीें। नेहरू के कुछ राजनीतिक और प्रशासनिक फैसले भी  गलत माने जा सकते हैं, पर वे हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे कि उन पर जनता के टैक्स के पैसे में से कम से कम खर्च हो। आज के अधिकतर नेताओं से यह बात नेहरू को अलग करती है।

डा.राम मनोहर लोहिया ने तीन मूर्ति भवन जैसे आलीशान मकान में उनके रहने और खुद पर काफी खर्च करने को लेकर संसद के भीतर और बाहर तीखी आलोचना की थी। पर यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने जिद करके नेहरू को चार कमरे के एक छोटे मकान से निकाल कर तीन मूर्ति भवन में पहुंचवाया था। नेहरू इस पक्ष में नहीं थे कि वे किसी बड़े मकान में रहें। महात्मा गांधी की हत्या के बाद पटेल ने नेहरू से कहा था कि यदि वे बड़े और सुरक्षित मकान में नहीं जाएंगे तो वे गृह मंत्री पद छोड़ देंगे। क्योंकि महात्मा जी के बाद आप के साथ यदि कुछ हो जाए तो यह देश वह बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। याद रहे कि देश के विभाजन और लुटे -पिटे शरणार्थियों के आगमन के कारण देश में काफी तनाव था।

   अब जरा प्रधानमंत्री के चुनाव प्रचार के लिए सरकारी विमान के प्रावधान की कथा एक बार फिर याद कर ली जाए। तब इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक ने प्रधानमंत्री सचिवालय को यह सलाह दी कि चुनाव प्रचार के लिए प्रधानमंत्री कमर्शियल फलाइट से यात्रा न करें। उनके लिए वायु सेना के विमान की व्यवस्था होनी चाहिए क्योंकि उनकी जान को खतरा है। निदेशक की इस सलाह पर प्रधानमंत्री सचिवालय हरकत में आ गया। कोई खतरा उठाना नहीं चाहता था। नेहरू भी चाहते थे कि कोई ऐसा निर्णय न हो जाए जिसे अनुचित माना जाए। इसलिए वे खुद इस संबंध में कोई निर्णय नहीं करना चाहे थे।

    इस संबंध में इस देश में पहले से कोई परंपरा नहीं थी। क्योंकि आजादी के बाद के पहले आम चुनाव को लेकर यह समस्या सामने आई थी। इस संबंध में तब के कैबिनेट सचिव एन.आर.पिल्लई ने प्रस्ताव किया कि इस मुद्दे पर विचार के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बना दी जाए। समिति हर पहलू पर विचार करके कोई सलाह दे। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की अनुमति से तीन सदस्यों की समिति बना दी गई। कैबिनेट सचिव अध्यक्ष और रक्षा सचिव समिति के सदस्य बने। एक अन्य सदस्य थे आई.सी.एस. अधिकारी तारलोक सिंह। समिति ने प्रधानमंत्री की निजी सुरक्षा को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना।

  समिति ने वायु सेना के विमान के इस्तेमाल की सिफारिश करते हुए अपनी सिफारिश में कहा कि ‘यदि प्रधानमंत्री कभी किसी गैर सरकारी काम से भी यात्रा करते हैं तो वे उतने समय के लिए प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाते। विमान में भी वे अनेक सरकारी काम कर सकते हैं। रात में वे जहां रुकेंगे, वहां भी सरकारी काम करेंगे।’ पर समिति ने यह भी कहा कि वे गैर सरकारी दौरे में वायु सेना के विमान का उपयोग तो करेगे, पर वे अपनी जेब से उसके भाड़े का भुगतान करेंगे। भाड़ा व्यावसायिक विमान की दर पर लिया जाएगा।’

   इस सिफारिश पर आगे काम होने वाला ही था। प्रधानमंत्री ने कैबिनेट सचिव से कहा कि वे इस सिफारिश की प्रति मंत्रिमंडल के सदस्यों में वितरित करा दें। मंत्रिमंडल ही इस पर कोई निर्णय करे। पर इसी बीच किसी ने प्रधानमंत्री को यह सलाह दी कि वे ऐसी समिति की सिफारिश पर कोई काम नहीं करें जो आपके मातहत अफसरों की समिति है। क्योंकि इसकी आलोचना होगी। इससे प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा को आंच आ सकती है। इसे आर्थिक घोटाला भी माना जा सकता है। सरकार के पैसों को निजी कामों मेंं खर्च करने का यह मामला माना जाएगा। इसलिए वायु सेना के विमान के प्रधानमंत्री द्वारा चुनाव कार्यों में इस्तेमाल की सिफारिश ऐसे किसी प्रतिष्ठान से होनी चाहिए जिसके रोज ब रोज के कामों में सरकार का सीधा असर नहीं रहता हो।े  
   
 इस पृष्ठभूमि में इस मामले को नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक नर हरि राव को भेज दिया गया। सारे कागजात उन्हें भेज दिए गए। कागजात के अध्ययन के बाद उन्होंेने प्रधानमंत्री सचिवालय को बताया कि अभी देश में स्थिति असामान्य है। इस हालात में प्रधानमंत्री की निजी सुरक्षा पर ध्यान रखना जरूरी है। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री को चुनाव कार्यों के लिए वायु सेना के विमान की सुविधा दी जा सकती है। पर नरहरि राव ने अपने नोट में यह भी लिख दिया कि किसी अगले प्रधानमंत्री के लिए यह पूर्व उदाहरण नहीं माना जाएगा। सी.ए.जी. की इस सलाह को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। कैबिनेट के निर्णय के बाद सी.ए.जी. की सिफारिश की प्रति प्रेस को वितरित कर दी गई।

  सन् 1951 में वायु सेना के पास सिर्फ कुछ डकोटा विमान ही थे। प्रधानमंत्री ने उसी का इस्तेमाल किया। प्रथम आम चुनाव की प्रक्रिया लम्बी चली। वह चुनाव सन् 1951 के अक्तूबर और दिसंबर तथा 1952 कीे फरवरी में हुआ था। बाद के प्रधान मंत्रियों ने भी चुनाव के समय वायु सेना के विमानों का इस्तेमाल किया। पर नर हरि राव की इस सलाह का कि यह पूर्व उदाहरण नहीं माना जाएगा,समाधान कैसे किया गया, यह पता नहीं चल सका। 

बुधवार, 24 जुलाई 2013

1966 के सूखे के समय केंद्र -बिहार आमने -सामने

सन् 1966 में बिहार में भयंकर सूखा पड़ा था। तब बिहार में के.बी. सहाय के नेतृत्व में कांग्रेस की ही सरकार थी। केंद्र में कांग्रेसी प्रधानमंत्री थीं इंदिरा गांधी। इसके बावजूद के.बी. सहाय ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया था कि ‘केंद्र न तो बिहार को पर्याप्त अन्न सहायता दे रहा है और न ही उसे अन्य प्रदेशों से सीधे अन्न खरीदने दे रहा है।

उन दिनों यह भी खबर आई थी कि आंध्र प्रदेेश की सरकार ने धमकी दी थी कि वह अपने प्रदेश से अनाज तब तक बिहार नहीं जाने देगा जब तक केंद्र सरकार आंध्र को यह पक्का आश्वासन नहीं दे देती कि देश का पांचवां इस्पात कारखाना आंध्र में ही लगेगा। हालांकि बाद में तब के मुख्यमंत्री ब्रह्मानंद रेड्डी ने समाचार पत्रों में छपी इस आशय की खबर का खंडन करते हुए कहा था कि आंध्र प्रदेश ने ऐसी कोई शर्त नहीं लगाई है।

खैर सूखा राहत को लेकर तब भी खींचतान चली थी। बिहार के सूखे की पृष्ठभूमि में ही चौथा आम चुनाव हुआ था। बिहार में कांग्रेस हार गई। मार्च 1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा की गैर कांग्रेसी सरकार बिहार में बन गई। वह इस दृष्टि से बिहार की अब तक की सबसे अच्छी सरकार मानी जाती है कि उसके अधिकतर मंत्री ईमानदार व कर्मठ थे। महामाया सरकार ने उस अकाल में अद्भुत सेवा कार्य किए। उस समय संयोग से जयप्रकाश नारायण जैसे नेता भी उपलब्ध थे जिन्होंने राहत के सराहनीय काम किए।

दिसंबर 1966 में दिल्ली में प्रेस के जरिए जयप्रकाश नारायण ने लोगों से अपील की कि वे ‘बिहार की अकालग्रस्त जनता को हरसंभव सहायता दें। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार के प्रशासनिक ढांचे के सुधार के लिए जो भी कदम उठाए जा रहे हैं, उनका मैं स्वागत करता हूं।

याद रहे कि तब भी यह कहा गया था कि इस भीषण अकाल से निपटने में प्रशासनिक ढांचा अक्षम साबित हो रहा है। जेपी ने निर्दल लोकतंत्रवादियों के सम्मेलन में बिहार की अन्न वितरण व्यवस्था को असंतोषजनक बताया था। सर्वोदय नेता ने इस संबंध में उच्चस्तरीय समिति के गठन की सरकारी घोषणा का स्वागत किया।

साप्ताहिक दिनमान के अनुसार, ‘इस समिति में दो केंद्रीय मंत्री, जिनमें केंद्रीय कृषि और खाद्य मंत्री होंगे, तथा प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल का एक सदस्य होगा। इसके अतिरिक्त इसमें केंद्र तथा राज्य से तीन वरिष्ठ अधिकारियों को भी शामिल किया जाएगा। प्रदेश सरकार के प्रशासनिक ढांचे को संतुलित करने के लिए केंद्र संयुक्त सचिव स्तर के छह अधिकारियों को भी बिहार भेजेगा। प्रशासनिक अनुशासन की इस व्यवस्था को जीवन बीमा निगम के अध्यक्ष श्री बी.डी. पांडेय का नेतृत्व मिलेगा। अतिरिक्त खाद्यान्न वाले प्रदेशों का हृृदय भी कुछ- कुछ पसीज रहा है। इस सिलसिले में भारतीय खाद्य निगम की अकर्मण्यता की चर्चा प्रायः हो चुकी है। इस बात के बावजूद श्री सुब्रह्मण्यम भारतीय खाद्य निगम का ढांचा ज्यों का त्यों बनाए रखने की घोषणा कर रहे हैं और भूख की समस्या के छू मंतर हो जाने की भविष्यवाणी करते फिर रहे हैं।’

बिहार अक्सर सूखे और बाढ़ की समस्याओं से जूझता रहता है, इसलिए 1966 की चर्चा मौजू है।

सन 1966-67 के बिहार के अकाल के संदर्भ में ब्रितानी अखबार गार्जियन ने बिहार की खाद्य समस्या को विश्व संकट घोषित कर अमेरिका, सोवियत संघ व अन्य समृद्ध देशों का अंतःकरण जगाने की कोशिश की। इस पर दिनमान ने लिखा कि लेकिन अंतःकरण अब तक केवल कनाडा और आस्ट्रेलिया का जागा है। कनाडा की संसद ने भारत-पाकिस्तान के अकालग्रस्त क्षेत्रों के लिए आपातकालीन पैमाने पर अन्न भेजने का कानून पास कर दिया है। आस्ट्रेलिया सरकार ने भी  भारत को डेढ़ लाख टन गेहूं भेजने का फैसला किया है। खाद्यान्न सहायता पर मौजूदा अमेरिकी प्रतिबंध की भारत में तीव्र प्रतिक्रिया हुई है और अब यह समाचार आने लगा है कि अमेरिका अपना निर्णय बदल रहा है।

उस समय के अकाल को लेकर दिनमान की कुछ पंक्तियां आज भी इस देश में  प्रासंगिक हैं, ‘जानलेवा भूख और भूख मिटा देने वाले भाषणों का सह अस्तित्व अकालग्रस्त भारत के लिए नया नहीं है। वरुण देवता से भारत सरकार की अनबन वैसे पुरानी है।’

ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति आजादी के 66 साल बाद भी बनी हुई है कि यहां का अधिकांश भूखंड वर्षा के जल पर ही निर्भर है।  

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

एक महाराजा लीक से हटकर

जयपुर के आखिरी महाराजा सवाई मान सिंह की कई विशेषताएं थीं। वह एक साथ कुशल प्रशासक, देशभक्त, सैनिक और खिलाड़ी थे।

वह न सिर्फ पोलो के बहुत अच्छे खिलाड़ी थे, बल्कि दुनिया की दस सबसे सुंदर महिलाओं में से एक गायत्री देवी के पति भी थे। सन् 1958 में उनके नेतृत्व में भारत ने पोलो खेल में विश्व का स्वर्ण कप जीता था। पोलो खेलते समय हुई दुर्घटना में 24 जून 1970 को उनका निधन हो गया। निधन के समय उनकी आयु सिर्फ 58 साल थी।

21 अगस्त 1912 को जन्मे मान सिंह जयपुर के महाराजा लेफ्टिनेंट जनरल सवाई माधो सिंह के दत्तक पुत्र थे। सवाई मान सिंह पोलो मैच खेलते हुए अचानक अस्वस्थ हो गये। उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। पर अस्पताल ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

इससे एक माह पहले भी एक पोलो मैच के दौरान वह गिर पड़े थे। तब उन्हें गहरी चोट लगी थी। पर एक माह के आराम के बाद वह फिर पोलो के खेल में जुट गये। राजपूत घरानों के इस नारे को कि ‘रण में लड़ते -लड़ते शहीद हो जाओ,’ उन्होंने पोलो के खेल में लागू कर दिया। पोलो का मैदान उनके लिए रणक्षेत्र था और उसी में वह शहीद हो गये। उनकी मौत महारानी गायत्री देवी के लिए एक बड़ा सदमा था।

कूच बिहार के महाराजा जितेंद्र नारायण की पुत्री गायत्री देवी से मान सिंह ने 1940 में प्रेम विवाह किया था। यह अंतरजातीय विवाह था। यह उनकी तीसरी शादी थी। इससे पहले की दो शादियां उन्होंने जोधपुर राजघराने में की थीं। जोधपुर के महाराजा सुमेर सिंह की बहन से मान सिंह की पहली शादी हुई थी। दूसरी शादी उनकी बेटी से हुई। गायत्री देवी से उनका परिचय तब हुआ था जब मान सिंह पोलो खेलने कलकत्ता गये थे और वह कूच बिहार के महाराजा के अतिथि थे।

मानसिंह के निधन के बाद गायत्री देवी को इंदिरा सरकार से कठिन संघर्ष करना पड़ा। आपातकाल में गायत्री देवी को सरकार ने जेल में बंद कर दिया था। बड़े अमानवीय तरीके से उन्हें जेल में रखा गया था। हालांकि उससे पहले वह 1962, 1967 और 1971 में लोकसभा की सदस्या रह चुकी थीं। प्राप्त मतों की संख्या की दृष्टि से उन्होंने रिकार्ड कायम किया था। गायत्री देवी का निधन सन 2009 में 90 साल की उम्र में हुआ।

मानसिंह को  7 सितंंबर 1922 को महाराजा सवाई माधो सिंह ने अपना उत्तराधिकारी बनाया था। पर जयपुर रियासत की सत्ता उन्होंने 1937 में संभाली। अपने शासन के दौरान उन्होंने लोगों की भलाई, सेवा और सहायता पर अधिक जोर दिया।

आजादी के बाद तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने रियासत को भारत में मिलाने का प्रस्ताव जब जयपुर महाराज के सामने रखा तो उन्होंने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। याद रहे कि तब 565 रियासतें थीं जिन्हें मिलाया गया था।

याद रहे कि तब सभी राजाओं का रुख ऐसा नहीं था। जयपुर रियासत देश की सबसे बड़ी कुछ रियासतों में एक थी। उन्हें 18 लाख रुपये सालाना प्रिवी पर्स मिलता था जिसे बाद में इंदिरा गांधी सरकार ने समाप्त कर दिया। इनके अलावा हैदराबाद, मैसूर, त्रावणकोर, बड़ौदा और पटियाला के पूर्व शासक ही दस लाख रुपये से अधिक प्रिवी पर्स पाते थे। हैदराबाद के पूर्व शासक को बीस लाख रुपये सालाना मिलता था। जयपुर महाराजा के विपरीत उन्हीं दिनों कुछ रियासतों ने भारत में विलयन में भारी हिचक दिखाई थी। हैदराबाद रियासत को तो पुलिस कार्रवाई के बाद हासिल किया गया था। संयोगवश उस पुलिस कार्रवाई का नाम दिया गया आपरेशन पोलो। पोलो जयपुर के पूर्व शासक का प्रिय खेल था।

जूनागढ़ के शासक भी विद्रोह की मुद्रा में थे। कश्मीर के महाराजा के तो आरंम्भिक इनकार के कारण पाकिस्तान को हमला करने का मौका मिल गया। ऐसे में विलय के प्रस्ताव को जयपुर  महाराजा द्वारा तुरंत स्वीकारने के रुख की  सराहना हुई थी।

जयपुर महाराज ने देश की नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लिया था। सवाई मान सिंह के बारे में प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक जाॅन गुंटर ने लिखा था कि वह अपने आप को नई परिस्थितियों में ढालने में ऐसे अभ्यस्त हो चुके थे जिस तरह वह पोलो खेल के दौरान अपने घोड़े बदलते थे।

पूर्व महाराजा के असामयिक निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने कहा था कि देश ने एक महान खिलाड़ी, एक योग्य प्रशासक और राजनीतिक खोया है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गायत्री देवी के नाम शोक संदेश भेजा था। उसमें उन्होंने सवाई मान सिंह के विभिन्न पदों की सेवाओं का जिक्र करते हुए अपनी संवेदना व्यक्त की थी।

उनके निधन की खबर सुनकर राजस्थान के विभिन्न हिस्सों से भारी संख्या में लोग जयपुर में इकट्ठे हो गये थे। तब के एक अखबार की खबर के अनुसार निधन के समाचार से सारे राजस्थान में मुर्दनी छा गई। गांवों और शहरों से भीड़ एकत्र हो गई। लोगों की आंखें इस प्रकार सूजी हुई थीं, जैसे कि उन्होंने अपना कोई बहुत ही करीबी रिश्तेदार खोया है। जयपुर के महाराज सचमुच एक इनसान थे जिनसे सभी प्रेम करते थे और आदर देते थे।

(प्रभात खबर में 23 नवंबर 2012 को प्रकाशित)

रविवार, 4 सितंबर 2011

इमरजेंसी में जार्ज फर्नांडीस से मुलाकात

25 जून 1975 को जब आपातकाल लगा तो उस समय जार्ज फर्नांडीस उड़ीसा में थे। अपनी पोशाक बदल कर जुलाई में जार्ज पटना आये और तत्कालीन समाजवादी विधान पार्षद रेवतीकांत सिंहा के आर. ब्लाक स्थित सरकारी आवास में टिके। इन पंक्तियों का लेखक भी उनसे मिला जो उन दिनों जार्ज द्वारा संपादित चर्चित साप्ताहिक पत्रिका प्रतिपक्ष का पटना संवाददाता था। जार्ज दो तीन दिन पटना रह कर इलाहाबाद चले गये।

बाद में उन्होंने मध्य प्रदेश के प्रमुख समाजवादी नेता लाड़ली मोहन निगम को इस संदेश के साथ पटना भेजा कि वे मुझे और शिवानंद तिवारी को जल्द विमान से बंगलुरू लेकर आयें। शिवानंद जी तो उपलब्ध नहीं हुए। पर मैं निगम जी के साथ मुम्बई होते हुए बंगलुरू पहुंचा।

वहां जार्ज के साथ तय योजना के अनुसार राम बहादुर सिंह, शिवानंद तिवारी, विनोदानंद सिंह, राम अवधेश सिंह और डा. विनयन को लेकर मुझे कोलकाता पहुंचना था। पटना लौटने पर मैंने उपर्युक्त नेताओं की तलाश की। पर इनमें से कुछ जेल जा चुके थे या फिर गहरे भूमिगत हो चुके थे। सिर्फ डा. विनयन उपलब्ध थे। उनके साथ मैं धनबाद गया।

याद रहे कि आपातकाल में कांग्रेस विरोधी राजनीतिक नेताओं -कार्यकर्त्ताओं पर सरकार भारी आतंक ढा रही थी। राजनीतिककर्मियों के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना तक कठिन था। भूमिगत जीवन जेल जीवन की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद था।

धनबाद में समाजवादी लाल साहेब सिंह से पता चला कि राम अवधेश तो कोलकाता में ही हैं तो फिर हम कोलकाता गये। वहां जार्ज से हमारी मुलाकात हुई। पर वह मुलाकात सनसनीखेज थी।

जार्ज ने दक्षिण भारत के ही एक गैरराजनीतिक व्यक्ति का पता दिया था। उस व्यक्ति का नाम तीन अक्षरों का था। जार्ज ने कहा था कि इन तीन अक्षरों को कागज के तीन टुकड़ों पर अलग अलग लिखकर तीन पॉकेट में रख लीजिए ताकि गिरतार होने की स्थिति में पुलिस को यह पता नहीं चल सके कि किससे मिलने कहां जा रहे हो। यही किया गया। पार्क स्ट्रीट के एक बंगले में मुलाकात हुई। दक्षिण भारतीय सज्जन ने कह दिया था कि बंगले के मालिक के कमरे में जब भी बैठिए, उनसे हिंदी में बात नहीं कीजिए। अन्यथा उन्हें शक हो जाएगा कि आप मेरे अतिथि हैं भी या नहीं।

उस दक्षिण भारतीय सज्जन ने हमें जार्ज से मुलाकात करा दी। हम एक बड़े चर्च के अहाते में गये। जार्ज उस समय एक पादरी की पोशाक में थे। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। चश्मा बदला हुआ था और हाथ में एक विदेशी लेखक की मोटी अंग्रेजी किताब थी। जार्ज, विनयन और मुझसे देर तक बातचीत करते रहे। फिर हम राम अवधेश की तलाश में उल्टा डांगा मुहल्ले की ओर चल दिये। वहीं की एक झोपड़ी में हम टिके भी थे। फुटपाथ पर स्थित नल पर नहाते थे और बगल की जलेबी-चाय दुकान में खाते-पीते थे।

उल्टा डांगा का वह पूरा इलाका बिहार के लोगांे ंसे भरा हुआ था। जार्ज के साथ टैक्सी में हम लोग वहां पहुंचे थे। हम जार्ज को उस चाय की दुकान पर ही छोड़ दिया और राम अवधेश की तलाश में उस झोपड़ी की ओर बढ़े। पर पता चला कि राम अवधेश जी भूमिगत कर्पूरी ठाकुर के साथ कोलकाता में ही कहीं और हैं।

चाय की दुकान पर बैठे जार्ज ने इस बीच चाय पी थी। जब हम लौटे और जार्ज चाय का पैसा देने लगे तो दुकानदार उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया आर कहा, हुजूर हम आपसे पैसा नहीं लेंगे। इस पर जार्ज घबरा गये। उन्हें लग गया कि वे पहचान लिये गये। अब गिरतारी में देर नहीं होगी। जार्ज को परेशान देखकर मैं भी पहले तो घबराया, पर मुझे बात समझने में देर नहीं लगी। मैंने कहा कि जार्ज साहब, चलिए मैं इन्हें बाद में पैसे दे दूंगा। मैं यहीं टिका हुआ हूं। फिर अत्यंत तेजी से हम टैक्सी की ओर बढ़े जो दूर हमारा इंतजार कर रही थी। फिर हमें बीच कहीं छोड़ते हुए अगली मुलाकात का वादा करके जार्ज कहीं और चले गये।

आपातकाल में जिस तरह जान हथेली पर लेकर जार्ज फर्नांडीस ने अपने उसूलों के लिए बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी, यदि मंत्री बनने के बाद भी वे उसी तरह अपने उसूलों पर पूरी तरह खरा उतरे होते तो समाजवादी आंदोलन आगे बढ़ जाता। अक्सर उन कार्यकर्त्ताओं के मन में यह बात आती रहती है जिन लोगों ने भी कभी अपनी जान हथेली पर रखकर उनके साथ काम किया था और जिन्होंने बाद में भी सरकार से कभी कुछ नहीं लिया।

याद रहे कि आपातकाल में जार्ज और उनके साथियों पर बड़ौदा डायनामाइट केस को लेकर मुकदमा चला। सी.बी.आई. का आरोप था कि पटना में जुलाई 1975 मेें जार्ज फर्नाडीस, रेवती कांत सिंह, महेंद्र नारायण वाजपेयी और इन पंक्तियों के लेखक यानी चार लोगों ने मिलकर एक राष्ट्रद्रोही षड्यंत्र किया। षड्यंत्र यह रचा गया कि डायनाइट से देश के महत्वपूर्ण संस्थानों को उड़ा देना है और देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर देनी है। सन 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनने पर यह केस उठा लिया गया।


( प्रभात खबर से साभार )

रविवार, 1 फ़रवरी 2009

भारत में सफल,पर चीन में क्यों विफल हुए यूरोपियन

अंग्रेज गवर्नर वारेन हेस्ंिटग्स (1772-1785) ने खुद ब्रितानी संसद में बड़े अभिमान के साथ यह कबूल किया था कि उसने किस तरह भारतीय शासकों के बीच फूट डाल कर राज किया। आज जब एक बार फिर इस देश में विभाजनकारी शक्तियां सिर उठा रही हंै, वारेन के इन शब्दों को याद करके उनसे कुछ सीख लेना जरूरी है, ‘ महान भारतीय संघ के एक सदस्य निजाम को ठीक मौके पर उसका कुछ इलाका वापस करके संघ से फोड़ा। दूसरे मूदाजी भोंसले के साथ मैंने गुप्त पत्र-व्यवहार जारी रखा और उसे अपना मित्र बना लिया। तीसरे माधो जी सिंधिया को दूसरे कामों में लगाकर और पत्र व्यवहार करके मैंने भुलाए रखा और सुलह के लिए बतौर अपने हथियार के उसका उपयोग किया।’

अंग्रेजों की इस फूट नीति और कूटनीति के बारे में सुंदर लाल ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज’ में विस्तार से लिखा है। सुंदर लाल ने लिखा कि ‘ वारेन हेस्टिंग्स के समय में हिंदुस्तान के अंदर ईस्ट इंडिया कम्पनी का इलाका नहीं बढ़ा। फिर भी वारेन का शासन काल ब्रिटिश भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्लाइव ने इस देश के अंदर अंग्रेजी राज की जो बुनियाद डाली थी,वारेन ने भारत की राज शक्तियों को और अधिक कमजोर करके उन बुनियादों को पक्का कर दिया।’

 अंग्रेजों के आने से पहले मध्य युग में भी विदेशी हमलावरों ने हमारी आपसी फूट का भरपूर लाभ उठाया था। अंग्रेजों के जमाने में भी हमारे देशी शासकों ने इतिहास से नहीं सीखा। कम से कम आज तो हम पूरी तरह चेत जाएं, इसके लिए जरूरी है कि हम भूले-बिसरे प्रकरणों को याद करते रहेंं।

 वारेन हेस्टिंग्स कैसा शासक था, इसके बारे में खुद लार्ड मैकाले ने लिखा था,‘ वारेन हेस्टिंग्स ने भी चाहे ईमानदारी से हो चाहे बेईमानी से जिस तरह हो सके , भारत से धन बटोरने का निश्चय कर लिया। देश की स्थिति का उसे पूरा ज्ञान था और सूझ की भी कमी उसमें नहीं थी।’ अंग्रेजों ने इस देश के साथ क्या- क्या किया,उसकी एक झलक उस चर्चा से मिलती है जो ब्रिटिश संसद में हुई थी।

चर्चा सन् 1804 के दूसरे मराठा युद्ध के औचित्य को लेकर हुई थी। सर फिलीप फैं्रसिस ने संसद में कहा था कि ‘भारत के साथ हमारा संबंध कैसे शुरू हुआ, इसके बारे में मुझे आपको यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि शुरू में हमारा संबंध केवल तिजारत का था। देशी नरेशें ने भी हम पर संदेह नहीं किया, बल्कि हर तरह से हमारे साथ अनुग्रह का व्यवहार किया।

उन्होंने न केवल तिजारत करने और उससे खूब फायदा उठाने के लिए हमें हर तरह की सुविधा प्रदान की, बल्कि ऐसी -ऐसी रियायतें और माफियां भी हमें दे दीं जो उनकी अधिकांश प्रजा को भी प्राप्त न थीं।’ ‘ व्यापार की दृष्टि से विदेशी कौमों के साथ अपनी तिजारत को बढ़ने का मौका देना देशी नरेशों के लिए बुद्धिमता थी, किंतु जबकि उनकी तिजारती आंखें खुली हुई थीं, उनकी राजनीतिक आंखें बंद थीं। उन्होंने उन असूलों पर काम नहीं किया, जिन असूलों पर चीन वालों ने काम किया और जिनके कारण यूरोपियन कौमें चीन पर अपनी सत्ता जमाने में सफल न हो सकीं।’

 सर फिलिप फ्रैंसिस ने अपने भाषण में यह भी दिखलाया कि किस तरह अंग्रेज शासक भारतीय नरेशों के खासकर उस समय के सिंधिया के चरित्र पर बिलकुल झूठे दोष लगा कर उसे बदनाम करते थे और किस तरह के छलों द्वारा उन नरेशों की स्वाधीनता हरते थे। उन्होंने कहा था कि ‘पहले हमने तिजारत शुरू की, तिजारत से कोठियां हुईं, कोठियों से किलेबंदी , किलेबंदी से सेनाएं, सेनाओं से देश विजय और विजयों से हमारी आजकल की हालत।’ उनकी राय में भारत मंे इलाके के विजय करने और अपने राज्य को बढ़ाने की योजनाएं करना अंग्रेज कौम की इच्छा के विरूद्ध है।’

 एक अन्य अंग्रेज इतिहासकार ने ठीक ही लिखा है कि ‘हमलोगों में यह रिवाज है कि पहले किसी देशी नरेश का राज उससे छीन लेते हैं।फिर पदच्युत नरेश पर और उसके बनने वाले उत्तराधिकारी पर झूठे कलंक लगा कर उसे बदनाम करते हैं।’ इतने चतुर व घाघ अंग्रेज शासकों से लड़कर हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने भारी संघर्ष व बलिदान के बलकर हमें आजादी दिलाई है। पर आज इस कीमती आजादी को बचाए रखने के लिए हमें जो कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए, वे सावधानियां क्या हम बरत रहे हैं ? आज राजनीतिक गुलामी की तो नहीं, पर इस देश पर आर्थिक गुलामी का खतरा तो बरकरार है ही। इतिहास से शिक्षा लेकर हम किसी नए खतरे से जरूर बच सकते हैं। इतिहास से शिक्षा तभी मिलेगी जब हम अपना सही -सही इतिहास पढ़ेंगे। पर इस देश के कई बुद्धिजीवियों और इतिहासज्ञों के साथ दिक्कत यह है कि वे हमें एक खास तरह का इतिहास ही पढ़ाना चाहते हैं।
प्रभात खबर (1 जनवरी, 2009)