Friday, August 18, 2017

अपनी ही सुरक्षा से बेपारवाह नेता

 गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बीते दिनों लोकसभा में जब यह   सनसनीखेज जानकारी दी कि राहुल गांधी ने गत दो साल में सौ बार सुरक्षा नियमों को तोड़ा है तो कांग्रेसी सांसद नाराज हो गए। समझना कठिन है कि इसमें नाराज होने की क्या बात थी ? खैर इस खबर के साथ इस देश के उन तमाम बड़े नेताओं के नाम स्मृति पटल पर उभर आये जिन नेताओं ने अपनी सुरक्षा में लापरवाही के कारण अपनी जान गंवाई। न सिर्फ इंदिरा गांधी और राजीव गांधी, बल्कि खुद महात्मा गांधी ने भी अपनी सुरक्षा संबंधी पूर्व चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया था।

 इसका खामियाजा न सिर्फ खुद उन नेताओं को बल्कि इस देश को भी भुगतना पड़ा। ऐसे नेताओं की ओर इस देश के करोड़ों लोग बड़ी उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं। इसलिए उनकी जान पर सिर्फ उनका ही नहीं बल्कि देश का भी अधिकार है।

आजादी के बाद एक बार महात्मा गांधी ने कहा था कि वह सौ साल जीना चाहते हैं। पर देश के तनावपूर्ण माहौल में भी अपनी लंबी उम्र के लिए उन्होंने कोई प्रयास नहीं किया। नई दिल्ली की प्रार्थना सभा में सरकारी सुरक्षा की उच्चस्तरीय  पहल को महात्मा गांधी ने इसलिए भी बार-बार ठुकरा दिया था क्योंकि उन्हें ईश्वर पर अटूट विश्वास था। 

    दूसरी ओर तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ईश्वर के साथ-साथ सुरक्षा प्रबंध पर भी भरोसा करते थे। उन्होंने गांधी जी से कई बार विनती की थी कि वे बिड़ला भवन के आसपास हल्की सुरक्षा व्यवस्था भी मंजूर कर लें।  

     बिड़ला भवन के पास 20 जनवरी 1948 को हुए बम विस्फोट की घटना के बाद भी गांधी जी ने सरदार पटेल को धमकी दे दी थी कि यदि प्रार्थना सभा में आने वाले किसी भी व्यक्ति की तलाशी ली गई तो वे उसी क्षण से आमरण अनशन शुरू कर देंगे। आखिर वही हुआ जो गांधी जी के अनुसार ईश्वर को मंजूर था। 30 जनवरी 1948 को प्रार्थना सभा में नाथू राम गोड्से ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी। वह पिस्तौल लेकर प्रार्थना सभा में गांधी जी के पास तक आसानी से पहुंच गया था। यदि आगंतुकों की तलाशी हुई होती तो गोड्से की पिस्तौल तो पकड़ ही ली गई होती। महात्मा गांधी यदि सौ साल तक जीवित रहते तो इस देश की तस्वीर शायद कुछ और ही बन सकती थी। शायद बेहतर होती।

     जब महात्मा गांधी की जान नहीं बचा पाने के लिए कसूरवार ठहराते हुए जय प्रकाश नारायण और डा. राम मनोहर लोहिया ने तत्कालीन स्वराष्ट्र मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल पर तीखा वाक् प्रहार किये तो पटेल ने इन शब्दों में उसका प्रत्युत्तर दिया, ‘समाजवादी कहते हैं कि मैं महात्मा की रक्षा करने में असफल रहा। मैं महात्मा गांधी की सुरक्षा के लिए किए गए अनेक उपाय, जो मानव मस्तिष्क में आ सकते हैं, का यहां ब्योरा देते हुए उनके आरोप को अस्वीकार करता हूं।’ दरअसल गांधी जी तलाशी को ही राजी नहीं थे तो सरदार पटेल कितना कुछ करते!

    इसी तरह जून, 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हुए ‘ब्लू स्टार आपरेशन’ के बाद प्रधानमंत्री आवास से सारे सिख सुरक्षाकर्मी हटा दिए गए थे। ऐसा इंदिरा जी को बताए बिना किया गया था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस पर सख्त नाराजगी जाहिर की। उनके सचिव आर.के. धवन ने संबंधित सुरक्षा अधिकारी को बुलाकर पूछताछ की। अधिकारी से धवन ने कहा कि मैडम बहुत नाराज हैं। डी.सी. (पुलिस-सुरक्षा) ने कहा कि ब्लू स्टार आपरेशन के बाद अभी देश का माहौल तनावपूर्ण है। ऐसे में धार्मिक भावना में आकर कोई गार्ड प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर खतरा पैदा कर सकता है।

   इस तर्क के बावजूद इंदिरा गांधी के सख्त आदेश के मद्देनजर धवन ने उस अफसर को निदेश दिया। आदेश यह था कि वह सिख सुरक्षाकर्मियों को प्रधानमंत्री आवास में इस तरह तैनात करें ताकि वे अक्सर प्रधानमंत्री की नजरों के सामने आते रहंे। ऐसा ही हुआ। नतीजा सामने था। सिख संतरियों ने उनके आवास में ही इंदिरा गांधी की हत्या कर दी। प्रतिक्रियास्वरूप हजारों सिख मार डाले गये।

प्रधानमंत्री आवास में यदि सिख संतरी नहीं होते तो हजारों निर्दोष सिखों की जान तो बच जाती। सिख संतरियों को हटाये जाने से जो नुकसान होना था, उससे अधिक कीमती हजारों सिखों की जान थी। पर इस देश के नेता यह समझें तब तो !

  राजीव गांधी की हत्या तमिल उग्रवादियों ने 1991 में कर दी। उससे तीन सप्ताह पहले राजीव गांधी के सुरक्षा अधिकारी प्रदीप गुप्त ने एक पत्रकार को बताया था कि ‘मैं जानता हूं कि राजीव गांधी अपनी सुरक्षा के प्रति लापारवाह हैं। पर हम सावधान हैं। यदि कुछ होता है तो वह मेरी लाश पर होगा।’

  अब एक रपट पढि़ए जिसमें यह दर्ज है कि किस तरह  राजीव गांधी ने मौत को अपने पास बुलाया था। ‘राजीव गांधी 10 बजे रात में पहुंचे और तुरंत माला पहनानेवाले लोगों ने उन्हें घेर लिया। महिला सब इंस्पेक्टर अनुसूया ने एक बार फिर धनु को राजीव के निकट जाने से रोकने की कोशिश की। उन्होंने करीब- करीब उस हत्यारिन को पकड़ ही लिया था। लेकिन अनुसूया के अनुसार खुद राजीव गांधी ने कहा कि सबको मौका दो। उसके बाद अनसूया वहां से दूर चली गयी। इस तरह खुद उसकी जान बच गयी। धनु इस प्रकार झुुकी ंंजैसे राजीव के पैर छूना चाहती है। फिर राजीव उसे उठाने के लिए झुके। तभी धनु के दाहिने हाथ की उंगली ने बम का स्विच दबा दिया।’

  सन 2002 में लोकसभा के स्पीकर बालयोगी की आंध्र प्रदेश में हेलिकाॅप्टर दुर्घटना में मौत हो गयी। इस मामले में भी सुरक्षा नियमों का सरासर उलंघन किया गया था। नियम है कि वी.वी.आई.पी. जिस विमान या हेलिकाॅप्टर से यात्रा करेंगे, वह दो इंजन वाला होना चाहिए। उसमें दो पायलट भी होने जरूरी हैं। बालयोगी के मामले में इस में से किसी भी नियम का पालन नहीं किया गया था।

  सन् 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के लिए एस.पी.जी.सुरक्षा का कानूनी प्रावधान किया गया। पर यह सुविधा तब लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता को नहीं दी गयी थी। दरअसल जब नेता सत्ता में होते हैं तो वे सत्ता के नशे में यह नहीं समझ पाते कि वे खुद कभी प्रतिपक्ष में भी जाएंगे।

 इस तरह 1989 में जब राजीव गांधी प्रतिपक्ष के नेता बने तो उन्हें एस.पी.जी. सुविधा उपलब्ध नहीं थी। 1989 में वी.पी. सिंह की सरकार ने भी प्रतिपक्ष के नेता के लिए इसकी जरूरत नहीं समझी थी। यहां तक कि जब 1990 में कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तौभी राजीव गांधी के लिए एस.पी.जी.सुरक्षा का प्रावधान नहीं किया गया। कांग्रेस ने इसकी मांग भी नहीं की।

 पर जब तमिलनाडु में 1991 में राजीव गांधी की हत्या हो गयी तो कांग्रेस ने वी.पी. सिंह पर आरोप लगाया कि उन्होंने राजीव गांधी को यह सुविधा नहीं दी थी। इस तरह वी.पी. ने राजीव की सुरक्षा को नजरअंदाज किया। पर जब कोई नेता खुद ही अपनी सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहा हो तो भला कोई क्या कर सकता है ?

 राहुल गांधी को तो एस.पी.जी. की सुरक्षा मिली हुई है। फिर भी वह कई बार उसका उपयोग ही नहीं करते। राहुल अपनी विदेश यात्रा में एस.पी.जी. का सुरक्षा कवर नहीं लेते। हाल के गुजरात दौरे में भी राहुल गांधी अपने बुलेट प्रूफ कार के बदले एक अन्य कार पर सवार थे। उसी पर रोड़े लगे थे।

इस मामले में भी कांग्रेसी नेतागण सरकार पर आरोप लगा रहे हैं। राजनीतिक लाभ के लिए वे सिर्फ यही कर सकते हैं। क्योंकि वे सुरक्षा के प्रति सावधान रहने की सलाह राहुल गांधी को देने की हिम्मत तो कर नहीं सकते!
हालांकि यदि बड़े नेताओं के साथ कुछ बुरा घटित होता है तो उसका कुपरिणाम देश और संबंधित पार्टी को भी भुगतना पड़ता है। कल्पना कीजिए कि यदि राजीव गांधी हमारे बीच आज भी होते तो क्या होता ? कम से कम कांग्रेस लोकसभा में 44 सीटों पर तो नहीं ही सिमटती !  

(इस लेख का संपादित अंश 18 अगस्त, 2017 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)


Saturday, July 22, 2017

भ्रष्टाचार को क्यों बनने दिया गया लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज

महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार और पाखण्ड को लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज नहीं बनने दिया जाना चाहिए जैसा कि आज हो गया है।’ आजादी के तत्काल बाद सरकारों में जो कुछ हो रहा था, उससे महात्मा गांधी चिंतित थे। उन्होंने भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलने पर बिहार के एक कैबिनेट मंत्री को पदच्युत कर देने की सलाह दी थी। पर उनकी बात नहीं मानी गयी।

1967 के आम चुनाव में बिहार में कांग्रेस की पहली बार पराजय हुई थी। उस पराजय के लिए जिम्मेवार नेताओं में उस खास नेता के भ्रष्टाचरण का सबसे बड़ा ‘योगदान’ बताया गया।

आजादी के तत्काल बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका दिया जाना चाहिए।’ नेहरू ने इसकी जरूरत समझी होगी तभी तो कहा होगा। पर यह काम भी वह नहीं कर सके। भ्रष्ट लोग फलते-फूलते गये।

पहले भ्रष्ट लोग ‘अंडे’ से अपना काम चला लेते थे। बाद में ‘मुर्गी’ को ही मार कर खाने लगे। समय बीतने के साथ सरकारी पैसों की इतनी लूट होने लगी कि टिकाऊ संरचना बनना भी कठिन होने लगा। अब तो देश में ‘प्राक्कलन घोटाले’ का दौर है।

प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने कहा था कि ‘सत्ता के दलालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।’ राजीव ने सत्ता के दलालों का वर्चस्व देखा होगा तभी तो कहा होगा। पर दलालों के खिलाफ भी कार्रवाई नहीं हो सकी। उल्टे विडंबना यह रही कि बोफर्स दलाली के शोर के बीच ही 1989 के चुनाव में केंद्र में कांग्रेस की सरकार की पराजय हो गयी। 1991-1996 की नरसिंह राव की सरकार अल्पमत की  सरकार थी। बाद के वर्षों में कभी कांग्रेस को लोकसभा में अपना बहुमत नहीं हुआ। समय बीतने के साथ स्थिति बिगड़ती चली गयी। इसी पृष्ठभूमि में सन 2003 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह ने कह दिया था कि ‘राजनेता कैंसर हैं जिनका इलाज अब संभव नहीं।’ तब अनेक लोग लिंगदोह से असहमत थे। पर यह जरूर मानने लगे थे कि चीजें तेजी से बिगड़ रही हैं।

राज्यसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता मनमोहन सिंह ने 1998 में कहा था कि ‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है।’ उन्होंने सड़न देखी होगी तभी तो कहा होगा। पर जब श्री सिंह खुद प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उस सड़न को रोकने के लिए क्या किया ?

उल्टे उन्होंने जो कुछ किया, वह सब देश ने देखा और भोगा। 2014 के चुनाव में कांग्रेस लोकसभा में 44 सीटों पर सिमट गयी। इस देश के अधिकतर नेताओं ने प्रतिपक्ष में रहने पर तो अपने राजनीतिक विरोधियों के भ्रष्टाचार पर खूब हायतोबा मचायी। पर जब वे सत्ता में आए तो खुद बहती गंगा में हाथ धोया। अपवादों की बात और है।
अपवाद स्वरूप जो भी अच्छे नेता इस देश में बचे हुए हैं, वे या तो सत्ता के मोह में डूबे हुए हैं या फिर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ बौने साबित हो रहे हैं। सत्ता संभालते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को आश्वासन दिया था कि ‘मैं न तो खाऊंगा और न ही किसी को खाने दूंगा।’ मोदी मंत्रिमंडल के किसी सदस्य पर तो घोटाले का अब तक कोई आरोप नहीं लगा है, पर सरकार के दूसरे अंग लगभग पहले ही जैसे ‘काम’ कर रहे हैं। लगता है कि वे मोदी से भी अधिक ताकतवर हैं।

संभवतः इसीलिए तीन साल के शासनकाल के बाद भी प्रधानमंत्री को 6 अप्रैल 2017 को साहिबगंज में यह कहना पड़ा कि ‘भ्रष्टाचार और ब्लैक मनी ने दीमक की तरह चाटकर इस लोकतंत्र को बर्बाद कर दिया है। इसके खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा।’ पर सवाल है कि लोगबाग कब तक प्रतीक्षा करेंगे ?

मोदी सरकार की उपलब्धि और विफलताओं का सही आकलन तो 2019 में हो जाएगा। पर इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी याद आती है। उसने 5 अगस्त 2008 को ही कह दिया था कि ‘भगवान भी इस देश को नहीं बचा सकता है।’ इस विकट स्थिति में इस देश के नेताओं तथा अन्य क्षेत्रों के जागरूक और देशभक्त लोगों का क्या कर्तव्य बनता है ?

क्या भ्रष्ट नेताओं और अफसरों तथा इसी तरह के अन्य लोगों के खिलाफ देशहित में कठोर कार्रवाई होनी चाहिए या फिर यह तर्क दिया जाना चाहिए कि चूंकि पहले के लोगों ने इस देश को लूटा है, इसलिए हमें भी लूट लेने का जन्मसिद्ध अधिकार हासिल है?


मधु लिमये से एन.सी. सक्सेना तक के एक ही स्वर 

वैसे मधु लिमये तो 1988 में ही इस नतीजे पर पहुंच गए थे कि ‘मुल्क के शक्तिशाली लोग इस देश को बेच कर खा रहे हैं।’ सन 1998 में तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एनसी. सक्सेना ने कहा कि ‘इस देश में भ्रष्टाचार में जोखिम कम और लाभ ज्यादा है।’

याद रहे कि सक्सेना की इस टिप्पणी के बावजूद ‘जोखिम अधिक और लाभ कम’ करने वाले किन्हीं कानूनी प्रावधानों की जरूरत इस देश की सरकारें नहीं समझ पा रही हैं। इस दिशा में आधे -अधूरे मन से कहीं कुछ काम भी हुए हैं तो उसका कोई खास लाभ देश को नहीं मिल रहा है। याद रहे कि मधु लिमये ऐसे नेता थे जो न तो स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेते थे और न ही पूर्व सांसद पेंशन। अखबारों में लिखे अपने लेखों के पारिश्रमिक से ही वह जीवन यापन करते थे।


अब जरा आज के नेता को देखिए !

केंद्र सरकार प्रत्येक सांसद पर हर माह 2 लाख 70 हजार रुपए खर्च करती है। यह आंकड़ा 2015 का है। इसके बावजूद इस बुधवार को राज्यसभा में सपा के नरेंश अग्रवाल ने कहा कि मौजूदा तनख्वाह से सांसदों का काम नहीं चल रहा है। सांसदों का दबाव जारी रहा तो सरकार 2.70 लाख की राशि देर-सवेर बढ़ा ही देगी।

यह सब ऐसे देश में हो रहा है जहां के सरकारी अस्पतालों के पास सभी गंभीर मरीजों के लिए भी इलाज की व्यवस्था तक नहीं है। क्योंकि सरकारें धनाभाव से जूझ रही हंै। आए दिन यह खबर आती रहती है कि अस्पताल में मृतक मरीज के लिए शव वाहन का प्रबंध नहीं हो सका। कहीं शव दोपहिया पर ढोया जाता है तो कहीं ठेले पर।

पटना के एक बड़े सरकारी अस्पताल की ताजा खबर यह है कि अस्पताल के भीतर गंभीर मरीज को परिजन चादर पर रखकर उठा रहे हैं और एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा रहे हैं।


पटना एम्स की मारक उपेक्षा

पटना में स्थापित एम्स में भी साधन के अभाव में मरीजों का उचित इलाज नहीं हो पा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अस्सी के दशक में पटना में विद्यार्थी परिषद के नेता थे। परिषद की खबरों के हैंड आउट लेकर अखबारों के दफ्तरों का चक्कर लगाते मैंने उन्हें देखा था। यानी उनका बिहार से जो लगाव होना चाहिए था, वह नहीं है।
जबकि दिल्ली एम्स के कुल मरीजों में बिहार के मरीजों का प्रतिशत 40 है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पटना के निर्माणाधीन एम्स का निर्माण जल्द पूरा कर लिया जाना चाहिए था।

2004 में इस पटना एम्स का शिलान्यास हुआ था। अब तक 50 प्रतिशत काम भी पूरा नहीं हुआ है। दरअसल केंद्र सरकार पूरा फंड ही नहीं देती। हां,सांसदों के वेतन भत्ते के लिए उसके पास पैसों की कभी कोई कमी नहीं रहती।


लोकसभा टी.वी. और राज्यसभा टी.वी.

अब तक राज्यसभा टी.वी. और लोकसभा टी.वी. के अलग- अलग राजनीतिक स्वर रहे हैं। अब वह बात नहीं रहेगी। वैसे पहले दो स्वर होने के कारण भी रहे हैं। लोकसभा की स्पीकर पहले भाजपा की नेता थीं। राजग का बहुमत राज्यसभा में नहीं है। राज्यसभा के निवर्तमान सभापति यानी उपराष्ट्रपति कांग्रेसी पृष्ठभूमि के रहे हंै। अब उस पद को अगले उपराष्ट्रपति संभालेंगे। वह भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

अब या तो राज्यसभा टी.वी. और लोकसभा टी.वी. का विलयन हो जाएगा या फिर पिछले विरोधाभास की समाप्ति हो जाएगी।


और अंत में

  संविधान के अनुच्छेद- 212 के अनुसार ‘न्यायालयों द्वारा विधायिकाओं की कार्यवाहियों की जांच नहीं की जा सकेगी।’ जब संविधान बना था, उन दिनों सदन की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की सुविधा नहीं थी। देवताओं के बारे में राज्यसभा में एक सपा नेता के कुवचन को देखते हुए अब नयी व्यवस्था की जरूरत आ पड़ी है। या तो सदनों में उच्चारित ऐसे कुवचनों के खिलाफ अदालत में मुकदमा चलाने की संवैधानिक छूट मिले या फिर सदन की कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण यथाशीघ्र बंद हो।

 (इसका संक्षिप्त अंश 21 जुलाई 2017 के प्रभात खबर (बिहार) में प्रकाशित)

Sunday, July 16, 2017

सजायाफ्ता कर्मचारी मंजूर नहीं तो नेताओं को क्यों मिले छूट

इस देश की सरकार किसी सजायाफ्ता को चपरासी तक की नौकरी नहीं देती। पर  सजायाफ्ता नेता, प्रधानमंत्री के पद तक भी पहुंच सकता है। इस तरह की विसंगतियों को दूर करने की उम्मीद नरेंद्र मोदी सरकार से कुछ लोग कर रहे थे। पर उन्हें अब निराशा हो रही है। जब सजायाफ्ता नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक की मांग को लेकर जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी तो केंद्र सरकार ने उस पर अपनी मंशा जाहिर कर दी।

केंद्र सरकार के वकील ने कहा कि यह मामला सुनवाई के लायक ही नहीं। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने यह ठीक ही सवाल उठाया है कि ऐसे में जब सरकारी कर्मचारियों और न्यायिक पदाधिकारियों पर आजीवन पाबंदी लग जाती है तो जनप्रतिनिधियों पर क्यों नहीं लगे ? उन्होंने राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण और भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि में यह याचिका दायर की है। इस याचिका पर 19 जुलाई को  सुनवाई होगी।

गत बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को फटकारा। आयोग इस मुद्दे पर कोर्ट को यह नहीं बता रहा है कि वह आजीवन प्रतिबंध के पक्ष में है या नहीं। संभवतः आयोग इस मामले में केंद्र सरकार के रुख के अनुसार ही काम कर रहा है। राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टीकरण से ऊबे इस देश के अनेक लोग सुप्रीम कोर्ट से ही यह उम्मीद कर रहे हैं कि वह इस मामले में सरकार को सख्त निर्देश दे। अन्यथा कुछ दिनों के बाद संविधान की रक्षा करना और भी मुश्किल हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट को ही तो देखना है कि इस देश में संविधान के अनुसार काम चल रहा है या नहीं। यदि राजनीति में भ्रष्ट और अपराधी लोगों की बढ़ती संख्या की रफ्तार को तत्काल नहीं रोका गया तो विधायिकाएं भ्रष्टाचार और अपराध के आरोपियों से पूरी तरह भर जाएंगी। अभी उनकी संख्या सदन की कुल संख्या की एक तिहाई है। याद रहे कि  किसी सांसद या विधायक को कम से कम दो साल की सजा मिलने के तत्काल बाद उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है। पर सजा पूरी हो जाने के छह साल बाद वह फिर से चुनाव लड़ सकता है।



यूं हुई अच्छे कार्यकर्ताओं की कमी

जब तक इस देश में संयुक्त परिवारांे का दौर चलता रहा, अच्छी मंशा वाले राजनीतिक कार्यकर्ता विभिन्न राजनीतिक दलों को मिलते रहे। पर अब तो लघु परिवारों का जमाना है। अब भी जहां-तहां संयुक्त परिवार मौजूद हैं, पर उनकी संख्या कम होती जा रही है।

पहले संयुक्त परिवार से निकले राजनीतिक कार्यकर्ता के पत्नी और बाल-बच्चों की देखरेख संयुक्त परिवार कर देता था। यानी सच्चे राजनीतिक कार्यकर्ता बनने की इच्छा रखने वालों के लिए नौकरी करने की मजबूरी नहीं थी।

पर आज तो सबको अपने-अपने लघु परिवार का पालन-पोषण खुद ही करना है। इसलिए कोई व्यक्ति राजनीतिक कर्म में लगता भी है तो वह निजी खर्चे के लिए राजनीति या शासन से ही पैसे निकालना चाहता है। हालांकि सारे राजनीतिक कार्यकर्ता ऐसे नहीं हैं। कुछ कार्यकर्ता अब भी निःस्वार्थ भाव से राजनीति में लगे हुए हैं। पर अनेक कार्यकर्ताओं को या तो कोई ठेकेदारी चाहिए या दलाली का धंधा।

अपराध के धंधे में भी काफी पैसे हैं। राजनीति के पतन का यह बड़ा कारण है। पता नहीं इस स्थिति से देश की राजनीति को कौन बचाएगा ? मौजूदा राजनीति न  तो भ्रष्टाचार और न ही अपराध पर निर्णायक हमले की स्थिति में है। राजनीति की इन दो विपदाओं को जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक की ताकत भी बढ़ाती जा रही है।



संकट में दोस्तों की पहचान

1967 में विदेश मंत्री एम.सी. छागला ने लोकसभा में कहा था कि भारत-चीन सीमा विवाद पर सोवियत संघ अब भारत के पक्ष को समझ गया है और वह हमें ही सही मानता है। पर 1962 में चीन ने जब भारत पर हमला किया तो सोवियत संघ ने हमें मदद करने से साफ मना कर दिया था। तब वह हमारे देश का पक्ष समझने को भी तैयार नहीं था। उसने कहा था कि चीन हमारा भाई है और भारत हमारा दोस्त। यानी दोस्त के लिए कोई भाई से झगड़ा नहीं करता।

हां, तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने न चाहते हुए भी अमेरिका से मदद मांगी। चीन सीमा से इस आशंका से पीछे हट गया था कि कहीं अमेरिका हस्तक्षेप न कर दे। उससे पहले भारत अमेरिका से दोस्ताना संबंध नहीं रखना चाहता था। दूसरी ओर वह सोवियत संघ से घनिष्ठ संबंध के पक्ष में रहा।

आज भी जब हमारे  देश पर युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, तो हमें विभिन्न देशों से दोस्ती के सिलसिले में अपने हितों को ध्यान में रखना चाहिए न कि किन्हीं अन्य बातों कोे। दुनिया के अन्य सभी देश भी अपने राष्ट्रीय हितों का ही ध्यान रखते हैं। पर हमारे ही देश में ऐसी राजनीतिक शक्तियां भी हैं जो परमाणु परीक्षण करने पर   चीन की तो तारीफ करती हैं, पर वही काम जब भारत सरकार करती है तो वह उसका विरोध करती है। 



कांग्रेसी वकील क्यों नहीं दिखाते करामात  

टू जी स्पैक्ट्रम आवंटन घोटाले में जीरो लाॅस का सिद्धांत पेश करने वाले मशहूर वकील कपिल सिब्बल ने अब एक नयी ‘थ्योरी’ पेश की है। स्पैक्ट्रम की नीलामी शुरू होते ही सिब्बल की जीरो लाॅस थ्योरी तो फेल हो गयी। अब देखना है कि उनकी नयी थ्योरी पास होती है या फेल!

सिब्बल का आरोप है कि भाजपा के सत्ताधारी नेताओं के यहां आयकर और ईडी के छापे क्यों नहीं पड़ रहे हैं ? क्या वे सब के सब स्वच्छ हैं ? सिर्फ गैर राजग दलों के नेता ही दागी हैं ? कपिल साहब के सवाल में दम है। यदि जनहित याचिकाओें के मामलों में कपिल सिब्बल, डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी और प्रशांत भूषण की राह अपना लें तो उन्हें इसका रोना नहीं रोना पड़ेगा कि केंद्र सरकार एकतरफा कार्रवाई कर रही है।

डाॅ. स्वामी और प्रशांत भूषण ने मनमोहन सिंह के शासनकाल में सिर्फ कपिल सिब्बल की तरह रोना तो नहीं रोया था। उन्होंने जनहित याचिकाओं के जरिए जांच एजेंसियों को ऐसी हस्तियों के खिलाफ भी कार्रवाई करने को मजबूर कर दिया था  जिन्हें मनमोहन सरकार बचा रही थी। 

यदि सिब्बल के पास भाजपा नेताओं के खिलाफ वैसे ही ठोस सबूत हैं तो वह जनहित याचिकाओं का सहारा क्यों नहीं ले रहे हैं ? सिब्बल तो बड़े काबिल वकील हैं। क्या उनके लिए जनहित याचिकाओं का रास्ता बंद है ? या फिर उनके पास कोई सबूत ही नहीं है ? क्या सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए बयान देना इतने बड़े वकील को शोभा देता है ?

अपनी सरकार में शामिल लुटेरों के खिलाफ मनमोहन सिंह सरकार जब कार्रवाई नहीं कर सकी जिस सरकार के खुद सिब्बल भी मंत्री थे तो वह मोदी सरकार से ऐसी उम्मीद क्यों कर रहे हंै ? आम धारणा यह है कि लगभग सभी दलों में चोर और लुटेरे घुसे हुए हैं। हालांकि उन्हीं के बीच ईमानदार नेता भी हैं। सत्ताधारी दल अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई करेगा ही।

पर राजग विरोधी दलों को भी चाहिए कि वे भी अपने बीच से ‘डाॅ. स्वामी’ और ‘प्रशांत भूषण’ तैयार करंे ताकि दोनों पक्षों के लुटेरों को उनके सही स्थान पर पहुंचाया जा सके।



और अंत में

एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता ने गुरुवार को मीडिया से कहा कि सी.बी.आई.जितने मामलों की जांच करती है, उनमें से सिर्फ 30 प्रतिशत मामलों में ही वह आरोपितों को अदालतों से सजा दिलवा पाती है। पर सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार ने गत अप्रैल में लोकसभा में बताया कि वह दर 66 दशमलव 8 प्रतिशत है। प्रवक्ता जी यह कहना चाहते थे कि बहुधा सी.बी.आई. झूठे केस तैयार करती है  जो अदालतों में नहीं टिकते। सी.बी.आई. की आलोचना से पहले अपने आंकड़े तो ठीक कर लीजिए प्रवक्ता जी ! 

(प्रभात खबर में 14 जुलाई 2017 को प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से)

इस गरीब बिहार में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा है भी या नहीं ?

ऊपरी तौर पर तो अब यह लग रहा है कि बिहार का सत्ताधारी महागठबंधन बिखराव के कगार पर है, पर राजनीति में कभी भी कुछ भी संभव है। इस बीच कोई दूसरा मोड़ भी आ सकता है। अगले कुछ दिन  महत्वपूर्ण होंगे। तब सब कुछ साफ हो जाएगा।

ताजा टकराव उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के इस्तीफे की मांग को लेकर है। पर क्या जदयू और राजद के बीच मतभेद का सिर्फ यही कारण है ? या फिर पहले से ही कुछ मुद्दों पर महागठबंधन के घटक दलों में भीतर -भीतर टकराव जारी था ? क्या वह राजनीतिक शैलियों का टकराव नहीं रहा है ?

क्या ताजा विवाद ऊंट की पीठ पर अंतिम तिनके के रूप में सामने आया है? पता नहीं। आने वाले दिन इन सवालों का जवाब दे सकते हैं।

याद रहे कि गठबंधन में टूट के बाद आरोप-प्रत्यारोपांे का दौर शुरू होता है। उस दौरान बहुत सारी अनकही बातें सामने आती हैं। इस मामले में वह नौबत आएगी ही, ऐसा यहां नहीं कहा जा रहा है। पर नहीं ही आएंगी, यह भी तय नहीं है।

यदि जदयू और राजद के बीच टकराव ऐसे ही जारी रहा तो आने वाले दिनों में कुछ भीतरी बातें भी खुल कर सामने आ ही सकती हैं। लगता है कि मूलतः यह शैलियों के बीच के टकराव की समस्या है। राजद और जदयू की शैलियों पर क्रमशः लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की छाप रही है। वैसे नीतीश सरकार के वरिष्ठ मंत्री और जदयू नेता बिजेंद्र प्रसाद यादव का यह सवाल एक हद तक सही है कि जब जदयू और राजद के बीच समझौता हुआ था तब नहीं जानते थे कि लालू चार्जशीटेड हैं?

पर सवाल सिर्फ लालू प्रसाद का ही नहीं है। अब तो नीतीश कुमार के बगल में बैठने वाले उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का भी है। याद रहे कि लालू प्रसाद के दोनों पुत्र तेजस्वी और तेज प्रसाद नीतीश मंत्रिमंडल में हैं।
रेलवे के होटलों की नीलामी जिसके नाम हुई, उसी व्यापारी से पटना में जमीन लेने का आरोप लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव पर लगा है। इस मामले में सी.बी.आई. ने इन तीनों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है।

इस पर जब भाजपा ने तेजस्वी के इस्तीफे की मांग की तो जदयू ने कहा कि जिन पर आरोप है, वे अपने जवाब से जनता को संतुष्ट करें। जदयू का इशारा तेजस्वी की ओर है। तेजस्वी और राजद अपने ढंग से जवाब दे रहे हैं। राजद ने कहा है कि तेजस्वी निर्दोष हैं और वह इस्तीफा नहीं देंगे। अब देखना है कि तेजस्वी के बारे में राजद के इस जवाब से जदयू संतुष्ट होता भी है या नहीं। उम्मीद तो कम है।  

तेजस्वी के इस्तीेफे की संभावना से साफ इनकार के बाद अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर यह निर्भर है कि वह तेजस्वी सहित राजद खेमे के मंत्रियों से खुद को अलग कर लेने के लिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देते हैं या तेजस्वी को बर्खास्त करने की राज्यपाल से सिफारिश करते हैं। वह घड़ी आने से पहले इस बीच जितने दिन दागी उपमुख्यमंत्री के साथ सरकार चलाएंगे, उतने ही दिन नीतीश की छवि पर प्रश्न चिह्न बना रहेगा।
वैसे राजद से नाता तोड़ने की स्थिति में भाजपा नीतीश की सरकार को बाहर से समर्थन देने को तैयार है। अब फैसला नीतीश को ही करना है। 

इस बीच महागठबंधन के नेताओं के बीच भ्रष्टाचार के सवाल पर बहस शुरू हो गयी है। एक लालू समर्थक नेता और पूर्व जदयू सांसद शिवानंद तिवारी ने सवाल किया है कि क्या नीतीश के साथ बैठने वाले नेता हरिश्चंद्र की औलाद हैं ?

यानी राजद का यह तर्क है कि जब आपके साथ भी दागी लोग मौजूद ही हैं तो हमारे नेता पर प्राथमिकी दर्ज होने मात्र से इस्तीफा क्यों मांग रहे हैं? राजद का यह भी तर्क है कि भाजपा जब लालू परिवार को जेल भिजवा देगी तो नीतीश कुमार को मसलने में उसे कितना समय लगेगा।

पर जदयू का तर्क है कि खुद नीतीश कुमार पर कोई दाग नहीं है और वह अपनी सरकार की छवि साफ-सुथरी रखना चाहते हैं। इससे कोई समझौता नहीं होगा, चाहे सरकार रहे या जाए।

दरअसल राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार भ्रष्टाचार के आरोपों के मामले में ‘गुण’ के साथ-साथ ‘मात्रा’ का भी अब सवाल है। भ्रष्टाचार के आरोपी को  सहने की क्षमता अलग -अलग नेताओं की अलग -अलग रही है। इस मामले में नीतीश की तो बहुत कम है। दरअसल हाल के दिनों में लालू परिवार के खिलाफ जितने घोटालों की खबरें सामने आती जा रही  हैं, उनको यदि जांच एजेंसियां तार्किक परिणति तक पहुंचाने लगंेगी तो लालू परिवार के अनेक सदस्य जांच के दायरे और न्याय के कठघरे में होंगे।

ऐसे में सवाल यह है कि एक ऐसी पार्टी के साथ मिलकर साफ छवि वाले नीतीश, सरकार चलाएंगे जिस दल के अधिकतर प्रमुख नेता जांच के घेरे में हो ? जदयू के सामने यह एक बड़ा सवाल है। यदि सरकार चलाएंगे तो नीतीश की छवि पर उसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। यदि छवि बची रहेगी तो आगे भी नीतीश मुख्यमंत्री बन सकते हैं। यदि वही नहीं रहेगी तो फिर क्या होगा ?

पर इस राजद-जदयू मुठभेड़ में जदयू के ही दो वरिष्ठ नेता नीतीश से अलग राय रखते हैं। बिजेंद्र प्रसाद यादव के बयान का चुनावी राजनीति की नजर में भी खास महत्वपूर्ण है। उधर जदयू सांसद शरद यादव ने भी इस मामले में जदयू की लाइन से अलग राह पकड़ ली है। शरद-बिजेंद्र की लाइन पर जदयू के और कितने विधायक हैं ? यह देखना दिलचस्प होगा। क्या इन दोनों नेताओं पर अपने ‘खास’ मतदाताओं की ओर से कोई दबाव है? क्या उन मतदाताओं की सहानुभूति लालू परिवार के साथ है ?

यदि ऐसा है तब तो बिहारी समाज में उसकी प्रतिक्रिया भी संभव है। न्यूटन का सिद्धांत लागू हो सकता है। इसकी प्रतिक्रिया राजद और कांग्रेस विधायक दलों में भी हो सकती है। फिर इस राज्य की अगली राजनीति कुछ अलग ढंग की होगी।

इसी माहौल में इस बीच यदि बिहार विधानसभा के मध्यावधि चुनाव की नौबत आ जाए तो फिर कैसे नतीजे आएंगे ? मध्यावधि चुनाव की आशंका जाहिर करने का कारण मौजूद हैं। मौजूदा महागठबंधन यदि टूटेगा तो नया गठबंधन बन सकता है। इस बनने-बिगड़ने के क्रम में यह भी संभव है कि कुछ विधायक दलों में भी छोटी-मोटी टूट-फूट हो। फिर तो राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बन सकती है। वैसी स्थिति में विधानसभा के मध्यावधि चुनाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

यदि चुनाव होगा तो उसके नतीजों से इस बात का पता चल जाएगा कि इस गरीब प्रदेश बिहार के आम मतदातागण भ्रष्टाचार और अपराध को कितना बुरा मानते हैं। या फिर इन दोनों तत्वों को वे राजनीति का अनिवार्य अंग मानते हैं। चुनाव नतीजे के जरिए इस सवाल का भी जवाब मिल जाएगा कि मतदातागण राजनीति और प्रशासन में भ्रष्टाचार को दाल में नमक के बराबर ही बर्दाश्त करेंगे या अतिशय भ्रष्टाचार से भी उन्हें कोई एतराज नहीं है। सामाजिक न्याय, धर्म निरपेक्षता, सुशासन और स्वच्छ छवि के भी सवाल उठंेगे। वे भी मतदाताओं की कसौटी पर होंगे। याद रहे कि इन सभी तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले दल और नेतागण बिहार की राजनीति में अलग -अलग अपनी उपस्थिति बनाये हुए हैं।

बिहार में यह सवाल भी उठता रहा है कि आजादी के तत्काल बाद के कुछ सत्ताधारी नेतागण जब लूट रहे थे तो इतना हंगामा क्यों नहीं हुआ ? मीडिया तथा सवर्ण शक्तियां तब क्यों चुप थीं ? अब क्यों हंगामा हो रहा है? पर मौजूदा भ्रष्टाचार पर तो एतराज जदयू को भी है जो पिछड़ा नेतृत्व वाली पार्टी है। पिछड़ा नेतृत्व जरूर है, पर जदयू में विभिन्न सामाजिक जमातें अन्य दलों की अपेक्षा बेहतर अनुपात में उपस्थित हैं।


( 15 जुलाई 2017 के राष्ट्रीय सहारा के ‘हस्तक्षेप’ में प्रकाशित)

Sunday, July 9, 2017

कहां से चले थे कहां पहुंच गए लालू!

लोकसभा में 2013 में लोकपाल विधेयक पर चर्चा के दौरान उस विधेयक का विरोध करते हुए लालू प्रसाद ने कहा था कि यदि राजनीतिक दलों ने व्हीप जारी नहीं किया होता तो लोकपाल बिल के पक्ष में पांच प्रतिशत सांसद भी वोट नहीं देते। लोकपाल को नेताओं के लिए फांसीघर मानने वाले लालू प्रसाद ने संभवतः अनेक सांसदों से व्यक्तिगत बातचीत के आधार पर ही ऐसा कहा था। इसीलिए तब सदन में उपस्थित किसी सदस्य ने खड़ा होकर लालू की बात का खंडन नहीं किया। लोकपाल विधेयक के खिलाफ लालू प्रसाद जब बोल रहे थे तो सदन में उपस्थित अधिकतर सांसदों के हाव भाव व प्रतिक्रियाओं से भी यह लग रहा था कि लालू प्रसाद को उन लोगों का भीतरी समर्थन प्राप्त है।

  यानी 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद भ्रष्टाचार के प्रति लालू प्रसाद ने जो अपना कठोर रुख प्रदर्शित किया था, 2013 आते आते वह लालू पूरी तरह बदल चुके थे।

    1992 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने इन पंक्तियों के लेखक से बातचीत में कहा था कि ‘भ्रष्ट और माफिया तत्वों के ऊपर मैंने प्रहार किया है। वे तत्व चूं भी नहीं कर सके। वे मेरे सामने भी नहीं आए। कोई पैरवी भी नहीं आई। पहले के राज में मजाल था कि किसी पर आप एक्शन कर लेते ? वे तत्व पिछले मुख्यमंत्रियों की छाती पर चढ़ जाते थे। जब चीफ मिनिस्टर ही उसमें संलग्न रहेगा तो वह आंख कैसे तरेरेगा ?’

  अपने मुख्य मंत्रित्वकाल के प्रारंभिक दिनों में लालू प्रसाद न सिर्फ सामाजिक अन्याय के मामले में, बल्कि भ्रष्टाचार के मामले में भी कठोर दिखाई पड़ते थे। 1990 के मंडल आरक्षण आंदोलन के दौरान तो लालू ‘मंडल मसीहा’ भी कहलाए। तब बिहार के पिछड़ा वर्ग के अधिकतर लोग उन्हें अपना नेता मानने लगे थे।

पर आज क्या हो रहा है ? आज लालू प्रसाद करीब- करीब हर मामले में यथास्थितिवादी नजर आ रहे हैं। लगता है कि मसीहा भटक गया है। उसी भटकाव की सजा उन्हें आज मिल रही है।

उनकी यथास्थितिवादिता लोकपाल विधेयक पर उनकी टिप्पणी से साफ हो गयी थी। कई कारणों से समय के साथ लालू प्रसाद पूरे पिछड़ोंं के नेता भी अब नहीं रहे।

आज जो कुछ उनके साथ हो रहा है, उसके लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है। खुद  और अपने पूरे परिवार के चारों ओर येन केन प्रकारेण आर्थिक सुरक्षा की ऊंची  और मजबूत दिवाल खड़ी करने के लोभ में उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ गया है। इससे उनके अनेक समर्थकों में भी उदासी है।

 लालू प्रसाद कभी कहा करते थे कि विषमताओं और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ कोई आंदोलन इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि पोथी -पतरा उसमें बाधक है। पोथी - पतरा वाले गरीबोंं को समझा देते हैं कि भगवान की वजह से ही तुम गरीब हो।

पर, अब लालू प्रसाद ही नहीं, बल्कि  उनके परिजन भी जब मुकदमों में फंसे तो पोथी-पतरा का विरोध छोड़कर खुद मंदिरों के चक्कर लगाने लगे हैं। पर उन्हें न तो कोर्ट से राहत मिल रही है और न ही मंदिरों से।

खुद लालू प्रसाद नब्बे के दशक में कहा करते थे कि ‘लाख करो चतुराई करम गति टारत नाहीं टरै’ यह सब अब चलने वाला नहीं है। पर अब खुद लालू परिवार पर यह कहावत लागू हो रही है।

लालू प्रसाद ने 1990 में मंडल आरक्षण के विरोधियों के खिलाफ बड़ी हिम्मत से संघर्ष किया था। याद रहे कि आरक्षण एक संवैधानिक प्रावधान था जिसका तब नाहक विरोध हो रहा था। उस संघर्ष में जीत के बाद पूरे पिछड़े वर्ग में लालू प्रसाद की प्रतिष्ठा काफी बढ़ी थी। उतना समर्थन बिहार में किसी अन्य नेता को नहीं मिला था। अनेक लोंगों का यह मानना है कि बाद के वर्षों में यदि लालू प्रसाद अपने परिवार की ‘आर्थिक सुरक्षा के इंतजाम’ के काम में नहीं लग गए होते तो गांव -गांव में उनकी मूर्तियां लगतीं। हालांकि अब भी उनके समर्थकों की कमी नहीं हैं। पर पहले जैसी बात नहीं है।

भ्रष्टाचार के मामले में किसी नेता के खिलाफ जब कोई कानूनी कार्रवाई होती है तो वह आरोप लगा देता है कि राजनीतिक बदले की भावना से ऐसा हो रहा है। लालू प्रसाद इसके साथ यह भी कह रहे हैं कि यह पिछड़ों पर हमला है।

पर यह तर्क शायद ही चले। पहले भी नहीं चला था। चारा घोटाले में जब 1997 में पहली बार लालू प्रसाद जेल गए तो भी यही तर्क उनकी ओर से दिया गया था। पर 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू के दल का बहुमत समाप्त हो गया था। जबकि 1995 में उन्हें बहुमत मिला था।

अब तो उन्हें कोर्ट का ही सहारा होगा। इसलिए कि लालू परिवार को राजनीतिक मदद मिलती नहीं दिख रही है जैसी मदद मुलायम सिंह यादव तथा इस देश के  कुछ दूसरे नेताओं को मिलती रही। देखना होगा कि कोर्ट से लालू प्रसाद और उनके परिजनों को किस तरह का न्याय मिलता है।

वैसे लालू परिवार पर आरोपों की लंबी सूची देखकर यह जरूर कहा जा सकता है कि परिवार का राजनीतिक भविष्य अभी तो अनिश्चित नजर आ रहा है। बाद में भले जो हो!

हां, यदि इसी तरह के आरोपों से घिरे देश के किन्हीं भाजपा नेताओं पर भी जब केंद्रीय एजेंसियां इसी तरह की कार्रवाई नहीं करंेगी तो वह दोहरा मापदंड भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से जरूर महंगा पड़ सकता है। 

Friday, July 7, 2017

अपराध के खिलाफ भी हो सर्जिकल स्ट्राइक

झारखंड से एक अच्छी खबर आई है। मीट सप्लायर की हत्या के आरोप में भाजपा सरकार की पुलिस ने एक भाजपा नेता को गिरफ्तार कर लिया  है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कड़े रुख के बाद यह कदम उठाया गया है। बिगड़े सांप्रदायिक माहौल में ऐसी गिरफ्तारी शांतिप्रिय लोगों को सुकून देने वाली खबर है। पर लोगों को पूरा सुकून तभी मिलेगा जब आरोपी के खिलाफ ईमानदारी से सबूत जुटाए जाएं और अदालत से यथाशीघ्र उसे वाजिब सजा भी दिलवा दी  जाए।

याद रहे कि गत 29 जून को रामगढ़ में बीफ के शक में भीड़ ने मांस से भरे वैन को जला दिया। ड्राइवर अलीमुद्दीन की पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी। इस तरह की छिटपुट खबरें पूरे देश से आती रहती हंै। कुछ हत्याओं के पीछे ‘भावनाएं’ रहती हैं तो कुछ अन्य के पीछे सिर्फ आपराधिक प्रवृत्ति। कुछ घटनाओं में दोनों तत्व एक साथ विराजमान होते हैं।

वैसे अधिकतर मामलों में सांप्रदायिक दंगाइयों का मनोबल भी इसीलिए बढ़ा रहता है क्योंकि वे समझते हैं कि उन्हें अंततः कोई न कोई सत्ताधारी बचा ही लेगा। कुछ मामलों में ऐसे दंगाइयों की इच्छा पूरी हो भी जाती है। कुछ अन्य मामलों में उन्हें सजा भी मिल जाती है।

जिन मामलों में ऐसे जघन्य अपराधी सजा से बच जाते हैं, उसके पीछे इस देश की लचर कानून-व्यवस्था भी है। समस्याओं के अनुपात में न्यायिक प्रक्रिया और प्रणाली भी नाकाफी साबित हो रही हैं।

राजनीति के अपराधीकरण और सांप्रदायीकरण के इस दौर में अनेक मामलों में तरह -तरह के नेतागण तरह -तरह के रंगों के सांप्रदायिक तत्वों को सजा से बचाने की कोशिश करते रहते हैं। वैसे इस देश में जब कभी जहां कानून का शासन कड़ाई से लागू करने की कोशिश हुई, वहां हर तरह के अपराधी चूहों के बिल में छिप गए। अपवादों की बात और है।

सन् 2006 -10 तथा बाद के भी कुछ वर्षों में बिहार में ऐसा ही कुछ हुआ था। कानून -व्यवस्था की मशीनरी तब अपना काम कर रही थी। तब न सिर्फ सामान्य अपराधियों और माफियाओं की जान सांसत मंे थी, बल्कि सांप्रदायिक उन्मादी और माओवादियों की सक्रियता भी घटी थी।

यदि झारखंड की ताजा गिरफ्तारी की तरह ही पूरे देश में ऐसे लोगों को उनकी उचित जगह पर पहुंचा दिया जाए तो सन 2006-10 वाली बिहार की स्थिति पूरे देश में कायम हो सकती है। हालांकि यहां यह कहना जरूरी है कि बिहार में भी अब 2006-10 वाली स्थिति नहीं रह गयी है। चाहे अपराध के आंकड़े जो कुछ कह रहे हों।

दरअसल कानून-व्यवस्था को लेकर आजादी के बाद से ही लापरवाही बरती गयी। हालांकि उत्तराधिकार के रूप में हमें अंग्रेजों की दी हुई एक चुश्त सरकारी मशीनरी मिली थी।

आजादी के बाद कुछ सत्ताधारी नेताओं के स्वार्थ और लापरवाही भी सामने आने लगी। इसके बावजूद जब तक उस चुस्त मशीनरी को काम करने दिया गया तब तक तो कानून -व्यवस्था लगभग ठीक- ठाक ही रही। पर जब पुरानी पीढ़ी के आदर्शवादी नेता और कार्यकर्ता एक- एक कर गुजरने लगे तो मशीनरी को भी धीरे -धीरे प्रदूषित कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के लिए सरकार को कई साल पहले निर्देश दे रखा है। पर वह कहीं लागू नहीं हो रहा है। ऐसी घटनाओं से चिंचित प्रधानमंत्री पुलिस सुधार को लागू करने का प्रयोग करने की हिम्मत जुटाएं तो शायद उन्हें सांप्रदायिक और उन्मादी तत्वों के साथ -साथ आर्थिक अपराधियों से भी लड़ने में सुविधा होगी।
वैसे आजादी के तत्काल बाद की कुछ घटनाओं को यहां नमूने के तौर पर गिनाना मौजूं होगा। उन घटनाओं के बारे में जान कर यह लगता है कि तत्कालीन सत्ताधारी नेताओं ने अपनी कमजोरी दिखाई थी। यदि तब ताकतवर अपराधियों के प्रति भी बेरहमी दिखाई गयी होती तो शायद इस देश में कानून -व्यवस्था की स्थिति इतनी नहीं बिगड़ती जितनी आज बिगड़ी हुई है। 

आज तो देश के किसी भी हिस्से में सड़क पर किसी निजी गाड़ी में थोड़ी भी खरोंच लग जाने पर भी लोग एक-दूसरे को मरने -मारने पर उतारू हो जाते हैं। क्योंकि उन्हें कानून का भय नहीं है। विजय माल्या ही नहीं, बल्कि सड़क पर किसी को मारने पर उतारू व्यक्ति भी यह समझ रहा है कि उन्हें अंततः कोई न कोई सत्ताधारी व्यक्ति बचा ही लेगा। या फिर गवाहों को खरीद कर या फिर जांच अधिकारी को ‘खुश’ करके वह सजा से बच जाएगा।

इस बीच दुनिया के कई सभ्य देशों से अलग-तरह की कहानियां आती रहती हैं। किसी देश के राष्ट्रपति की अल्पवयस्क बेटी शराब पीने के आरोप में दंडित हुई तो कहीं प्रधानमंत्री का बेटा किसी अन्य अपराध में आरोपित हुआ। पर इस देश में जब भी कोई नेता किसी जघन्य अपराध में भी जांच एजेंसी की गिरफ्त में आता है तो वह तथ्यों पर बात करने के बजाए राजनीतिक और भावनात्मक बयान देने लगता है। जोर -जोर से कहने लगता है कि उसके खिलाफ बदले की भावना से काम हो रहा है। फिर सरकार बदलते ही उस पर से केस उठा लिए जाते हैं या कमजोर कर दिए जाते हैं। अपवादों की बात और है।

नतीजतन इस देश में अन्य तरह के अपराधों में लिप्त लोगों का भी मनोबल बढ़ जाता है। ताजा आंकड़ों के अनुसार ंइस देश में सिर्फ 45 प्रतिशत आरोपितों को ही अदालतों से सजा मिल पाती है। जबकि अमेरिका में यह प्रतिशत 93 और जापान में 99 है।

आजादी के तत्काल बाद के सत्ताधारी नेतागण शुरुआती दौर में ही इस मामले में कठोर रुख अपना सकते थे। पर उन्होंने कैसा रुख अपनाया, उसके कम से कम तीन उदाहरण यहां पेश हंै।

पहली घटना बिहार से। पचास के दशक की बात है। एक सत्ताधारी विधायक सीवान से सड़क मार्ग से पटना जा रहे थे। रास्ते में दिघवारा पड़ता है जहां रेलवे क्राॅसिंग है। ट्रेन आने वाली थी, इसलिए फाटक बंद था। नेता जी काफी जल्दीबाजी में थे। उन्होंने ट्रेन आने से पहले ही फाटक खोल देने का आदेश दिया। पर गेटमैन ने उनकी बात नहीं मानी। जब फाटक खुला तो गेटमैन को विधायक ने पास बुलाया। उसे जबरन अपनी गाड़ी में बैठा लिया। उसे पीटते हुए कुछ किलोमीटर ले गये। बाद में उसे एक सूनसान स्थान में अपनी कार से उतार दिया। उस घटना की तब बड़ी चर्चा थी। पर उस नेता जी का कुछ नहीं बिगड़ा। अन्य दबंग नेताओं का उससे हौसला बढ़ा।

आजादी के बाद की ही एक दूसरी घटना के तहत एक अन्य नेता जी जान ही चली गयी। बड़े कद नेता जी दक्षिण बिहार से पटना आ रहे थे। उन दिनों गांधी जी पटना में ही थे। गांधी जी से उनकी मुलाकात तय थी। रास्ते में एक स्थान पर रेलवे क्राॅसिंग का फाटक बंद था। गोरखा सिपाही राइफल के साथ पहरे पर था। नेता जी ने उसे फाटक खोलने का आदेश दिया। वह नहीं माना। नेता जी ने उसे एक थप्पड़ रसीद कर दी। गुस्से में सिपाही ने उन्हें गोली मार दी।

पचास के दशक की तीसरी घटना दिल्ली की है। दक्षिण भारत के एक केंद्रीय मंत्री के बिगड़ैल पुत्र ने दिल्ली के पास के एक राज्य मंे एक हत्या कर दी थी। वह गिरफ्तार हो गया। केंद्रीय मंत्री मदद के लिए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के यहां गये। उन्होंने मदद से इनकार कर दिया। फिर वह मंत्री एक अन्य ताकतवर केंद्रीय मंत्री के पास गये। वह संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री के गहरे दोस्त थे। दोनों में बातचीत हुई। मंत्री पुत्र को जमानत दिलवाकर मुख्यमंत्री ने उस लड़के को अपने मित्र के यहां दिल्ली भिजवा दिया। उसी मंत्री ने उस लड़के का तुरंत पासपोर्ट भी बनवा दिया।  उस मंत्री ने उस बेटे के पिता को बुलाया। पासपोर्ट के साथ उस बेटे को उसके पिता को सिपुर्द करते हुए कहा कि इसे हमेशा के लिए विदेश भिजवा दीजिए। ऐसा ही हुआ।

अब बताइए कि कानून-व्यवस्था पर इन घटनाओं का धीरे -धीरे कैसा और कितना असर पड़ा होगा!
समय बीतने और राजनीति में भारी गिरावट आने के साथ अब स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की हार्दिक अपील के बावजूद ऐसे अपराध भी नहीं रुक रहे हैं जिससे देश के ताने -बाने के बिगड़ने का खतरा है। दरअसल प्रधानमंत्री को राज्यों के साथ मिलकर तरह -तरह के अपराधियों के खिलाफ भी सर्जिकल स्ट्राइक करवानी होगी। 
( इस लेख का संपादित अंश 7 जुलाई 2017 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)

Friday, June 30, 2017

इमरजेंसी के बहाने नागार्जुन के बारे में कुछ खट्टी-मीठी बातें

एक व्यक्ति ने एक जगह हाल में लिखा कि नागार्जुन ने ‘इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आपको’ वाली चर्चित कविता इमरजेंसी में ही लिखी थी। शायद वह यह कहना चाहते थे कि इमरजेंसी में भी प्रधानमंत्री की आलोचना करने की छूट थी।

इमरजेंसी और नागार्जुन को इतना कम जानने वाले लोग भी इस बार आपातकाल पर हुई चर्चाओं में शामिल हो गए।

याद रहे कि 25 जून 1975 की रात में इस देश में इमरजेंसी लगी थी। 25 जून को हर साल इमरजेंसी पर कुछ चर्चाएं होती हैं। कुछ लेख अखबारों में छपते हैं। संयोग से 30 जून बाबा नागार्जुन का जन्मदिन भी है। पर इस बीच के दशकों में इमरजेंसी लगाने वाली पार्टी और इमरजेंसी भुगतने वाले दल सत्ता के लिए आपस में मिलते-बिछुड़ते रहे। इसलिए नयी पीढि़यां इमरजेंसी के असली स्वरूप से पूरी तरह अवगत नहीं हो सकी। उनमें से अधिकतर लोगों के पास इस संबंध में जानकारी अधकचरी है या एकतरफा है। दरअसल उन्हें बताने वालों की ही कमी पड़ गयी।

अब नागार्जुन की उस चर्चित कविता के बारे में कुछ बातें।
नागार्जुन की कविता की कुछ पंक्तियां यूं हैं --
इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको ?
सत्ता की मस्ती में भूल गयीं बाप को !
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को।

इमरजेंसी में पुलिस किसी को ऐसी कविता गुनगुनाते हुए भी देख लेती तो उसकी जगह जेल होती। दरअसल यह कविता इमरजेंसी से पहली लिखी गयी थी। जेपी आंदोलन के दौरान की जनसभाओं और नुक्कड़ सभाओं में बाबा इस कविता का भी अक्सर पाठ करते थे। बल्कि यह कविता इमरजेंसी से पहले ही पटना के एक दैनिक अखबार में छप भी चुकी थी। 



फर्नांडिस ने किया था कविता पर मीठा एतराज़

1974 के जेपी आंदोलन के दौरान वैशाली जिले के महनार मेंं जनसभा हो रही थी। मुख्य वक्ता जार्ज फर्नांडिस थे। ऐसी सभाओं के लिए नागार्जुन की तब बड़ी मांग थी। स्वाभाविक था कि वहां बाबा भी थे। एक रिपोर्टर के रूप में मैं भी था।

पहले बाबा ने मंच से अपनी यह मशहूर कविता पढ़ी। खूब तालियां बजीं। पर जब बोलने के लिए जार्ज खड़े हुए तो बाबा की इस कविता से ही अपनी बात शुरू की। जार्ज ने कहा कि ‘इंदु जी इंदु क्या हुआ आपको और भूल गयीं बाप को’, यह लाइन सही नहीं है। दरअसल इनके बाप भी ऐसे ही थे। हालांकि श्रोताओं में जार्ज की इस बात की ग्राह्यता उतनी नहीं थी जितनी बाबा की उस कविता की। खैर यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि बाबा जेपी आंदोलन में थे। जेपी उनका बड़ा ख्याल रखते थे।

उस दौरान बाबा जेल भी गए। आंदोलन पर पुलिस दमन के विरोध स्वरूप बाबा ने  बिहार सरकार से मिल रही मासिक पेंशन को भी लेने से मना कर दिया था। हालांकि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। पेंशन मना करने वालों में रेणु भी थे। 4 नवंबर 1974 को जब पटना में जेपी पर पुलिस ने लाठी चलाई तो उसके विरोध में फणीश्वरनाथ रेणु ने तो पद्मश्री लौटा दी थी।

खैर बाबा का बाद के दिनों में जेपी आंदोलन से मन उचट गया था। दरअसल आंदोलन में शामिल कुछ अनुशासनहीन छात्रों से बाबा अधिक दुःखी थे। ऐसे उदंड आंदोलनकारियों से बाबा का बक्सर जेल में पाला पड़ गय़ा था। कुछ अन्य बातें भी रही होंगी।

बाद में उन्होंने आंदोलन से अलग होकर उस जेपी आंदोलन के खिलाफ भी एक जोरदार कविता लिख दी थी। जेपी आंदोलन में शामिल कुछ लोगों ने बाद के दशकों में जैसे-जैसे गुल खिलाए, उनपर बाबा की वह कविता सटीक बैठती है।

हालांकि सारे आंदोलनकारी वैसे ही नहीं साबित हुए।



जरा ढंग से हो पैथ लैब की जांच

एक अच्छी खबर है। पटना हाईकोर्ट के आदेश पर राज्य सरकार पैथ लैब की जांच कर रही है। कई फर्जी पाए गए। फर्जी लैब और फर्जी पैथोलाॅजिकल जांच से अनेक मरीजों का बड़ा नुकसान हो जाता है। कई मामलों में ऐसा नुकसान जिसकी कभी भरपाई नहीं हो पाती।

सवाल है यह कि जांच सिर्फ पंजीयन और तकनीकी स्टाफ की मौजूदगी की ही हो रही है या पैथोलाॅजिकल जांच की गुणवत्ता की भी जांच हो रही है ?

एक सलाह है। जो लोग इस जांच के काम में लगे हैं, वे नमूना के तौर पर एक व्यक्ति के खून के तीन नमूनों की जांच तीन लेबोरेटरी में करवा कर देखें। यदि जांच रिजल्ट समान आता है तो खुशी की बात है। यदि नहीं तो सरकार उस मर्ज का भी स्थायी इलाज करे। तभी मरीजों का पूरा कल्याण हो पाएगा।



पैरवीकारों के प्रकाशित हों नाम 

जो व्यक्ति सरकारी जमीन बेचने के आरोप में पहले ही जेल जा चुका हो, उसकी पटना में डी.सी.एल.आर के पद पर तैनाती हैरान करती है। पर जहां जिसके पैरवीकार ताकतवर लोग हों, वहां कुछ भी असंभव नहीं। अभी फरार डी.सी.एल.आर. मिथिलेश कुमार सिंह पर पटना के कंकड़बाग पावर सब स्टेशन की जमीन गैर कानूनी तरीके से बेचने का आरोप है। जाहिर है कि जमीन करोड़ों की है।

इससे पहले के वर्षों में भी मिथिलेश कुमार सिंह पर आरोप लगते रहे। पर उसके बावजूद वह महत्वपूर्ण जगहों पर पोस्टिंग पाते रहे। ऐसा उच्चस्तरीय पैरवी से ही संभव है। ऐसी पैरवी में नेता, बड़े अफसर और रिश्वत कारगर होते हैं। कुछ मामलों में तो तीनों एक साथ। यदि मिथिलेश को इस केस में अंततः अदालत से सजा हो जाती है तो राज्य सरकार को चाहिए कि वह उनके पैरवीकारों के नाम राज्य के मंत्रियों और अफसरों में वितरित करा दे ताकि अब से उनकी जायज पैरवी पर भी कोई मंत्री-अफसर ध्यान नहीं दे। अन्य मामलों में भी ऐसा ही हो। भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए यह कारगर तरीका बन सकता है। 



ऐसे संभव है किन्नरों की मदद

 किन्नरों के सामने भी बेरोजगारी की समस्या है। इनका उपयोग कर्ज और बकाया वसूली के काम में हो सकता है। देश भर में बैंक और नगर निकाय के समक्ष बकाया और टैक्स वसूली की समस्या मुंह बाए खड़ी रहती हैं।
 2006 में पटना नगर निगम ने किन्नरों को वसूली के काम में लगा कर ऐसा प्रयोग किया भी था। उन्हें कमीशन मिलता था। वसूली के काम में कुछ सफलता भी मिली थी। पर पता नहीं, उसे क्यों बंद कर दिया गया!

किन्नर गाना-बजाना करके कुछ ही देर में बकायएदारों के यहां से आसानी से पैसे वसूल लेते हैं। कल्पना कीजिए कि जो बैंकों के कर्ज की किश्तें जान बूझकर नहीं दे रहा है। उसके दरवाजे पर पुलिस की सुरक्षा में रोज दस-पांच किन्नर पहुंच जाएं। वे रोज तीन -चार घंटे उसके घर के सामने अपना कार्यक्रम चलाएं। उनसे कर्ज लौटाने की गुजारिश करे। फिर क्या होगा ? अधिकतर मामलों में तीन चार दिनों में ही पैसे निकलने लगेंगे। 


और अंत में

महागठबंधन के आंतरिक विवाद को लेकर जिस तरह की टिप्पणी की प्रतीक्षा थी, अंततः वह भी आ ही गयी। एक बड़े नेता ने कहा कि कोई मतभेद नहीं है। सब मीडिया की साजिश है। ऐसी टिप्पणी चुनाव के दिनों में अधिक सुनने को मिलती है।

जब कोई पार्टी चुनाव जीतती है, तब तो वह कहती है कि ऐसा हमारे पुण्य प्रताप से हुआ। पर जब हारती है तो कह देती है कि मीडिया ने कुप्रचार करके हरवा दिया। मीडिया के लोगों को ऐसी बातें सुनने की आदत सी पड़ गयी है। 

वैसे अच्छा हुआ कि महागठबंधन का झगड़ा सुलझ गया। उम्मीद है कि उसकी सरकार विकास और सुशासन के काम में नए उत्साह के साथ लग जाएगी।

(प्रभात खबर पटना में 30 जून 2017 को प्रकाशित )

Friday, June 23, 2017

भ्रष्टों के खिलाफ स्टिंग आॅपरेशन में क्यों नहीं लगते ईमानदार लोग !

कल्पना कीजिए कि कुछ उत्साही और ईमानदार लोग मिलकर एक ऐसा संगठन बना लें जो भ्रष्टाचार व अपराध के खिलाफ सिर्फ स्टिंग आपरेशन करें यानी ‘डंक अभियान’ चलाए ? जाहिर है कि वह संगठन रातोंरात देश में लोकप्रिय हो जाएगा।

क्योंकि आज बिहार सहित पूरे देश में आम लोग सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचार से काफी परेशान हैं। आज हर क्षेत्र के भ्रष्ट लोग इतने अधिक ताकतवर हो चुके हैं कि उनके खिलाफ अधिकतर मामलों में शासन की ओर से निर्णायक और सबक सिखाने वाली कार्रवाई नहीं हो पा रही है। ईमानदार मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री भी भ्रष्ट सरकारी अफसरों और कर्मियों पर काबू पाने में कई बार खुद को असमर्थ पाते हैं।

अपने मुख्यमंत्रित्व काल के प्रारंम्भिक वर्षों में नीतीश कुमार ने अपने दल के लोगों  से अपील की थी कि वे भ्रष्ट सरकारी कर्मियों को पकड़ने में निगरानी ब्यूरो की मदद करें। पर ऐसा नहीं हो सका। क्योंकि अपवादों को छोड़ दें तो आज अधिकतर राजनीतिक दलों में ऐसे ही कार्यकर्ताओं की भरमार है जो बिना कुछ किए रातोंरात कुछ पा लेना चाहते हैं। 

दरअसल स्टिंग आपरेशन वही लोग चला सकते हैं जो निःस्वार्थ समाज सेवा की भावना से ओतप्रोत हों। कुछ निजी चैनल के पत्रकार ‘डंक अभियान’ चलाते रहते हैं। उस अभियान का सकारात्मक असर भी पड़ता है। कई बार सरकार और विधायिका भी डंक अभियान पर कार्रवाई करने को बाध्य हो जाती है। 2005 में संसद ने अपने 11 सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने भी बाद में संसद के उस फैसले पर अपनी मुहर लगायी। उन सांसदों पर सदन में प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत लेने का आरोप था। उनमें से राज्य सभा के एक सदस्य पर तो सांसद फंड के बदले में घूस लेने का आरोप था। ये सभी सांसद एक स्ंिटग आपरेशन में पकड़ में आ गए थे। पर इस देश में भ्रष्टाचार की भीषण समस्या की व्यापकता को देखते हुए इस काम में अधिकाधिक लोगों के लग जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। अन्यथा देर हो जाएगी। 

अपनी सरकार में भ्रष्टाचार से परेशान एक राज्य के मुख्यमंत्री ने कई साल पहले अपने उत्साही और सिद्धांतवादी युवकों से अपील की कि वे भ्रष्टों के खिलाफ ‘डंक अभियान’ चलाएं। पर दूसरे ही दिन उस राज्य के बड़े अफसरों के संगठन ने प्रेस कांफ्रेंस करके मुख्यमंत्री की इस अपील का खुलेआम विरोध कर दिया। मुख्यमंत्री ने फिर अपनी बात नहीं दुहरायी।

इससे भी समझा जा सकता है कि यह समस्या कितनी गहरी है और उसके सामने ईमानदार नेता भी कितने लाचार हैं। हालांकि आम नेताओं में ईमानदारी तो और भी तेजी से घटती जा रही है। सरकारी भ्रष्टाचार के कारण देश के विकास की गति धीमी है।

कई बार अपने ड्राइंग रूम की बातचीत में कुछ लोग यह रोना रोते हैं कि भले लोगों के लिए राजनीतिक दलों में कोई जगह ही नहीं है। उनमें से कई अच्छी मंशा वाले लोग भी होते हैं। वैसे लोग डंक अभियान को परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से मदद कर सकते हैं। 

हां, इस मामले में सरकार को भी डंक अभियान के बारे में स्पष्ट गाइडलाइन जारी करनी चाहिए। यदि सरकारों की मंशा अच्छी है तो उसे ऐसे अभियानों से मदद ही मिलेगी। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में कुछ बंधनों के साथ स्टिंग आपरेशन की पूरी छूट है। इसे कानून के कार्यान्वयन की दिशा में विधिसम्मत तरीका माना जाता है। 2003 में  भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी डंक अभियान पर कुछ दिशा निदेश दिए थे। उससे ठीक पहले एक केंद्रीय मंत्री का मीडिया द्वारा स्टिंग आपरेशन हुआ था। उस घूसखोर मंत्री को यह कहते हुए कैमरे पर पकड़ा गया था कि ‘पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा की कसम, खुदा से कम भी नहीं।’

अदालत के दिशा निर्देश का मूल तत्व यही है कि आम आदमी या पत्रकार व्यापक जनहित में ऐसा कर सकते हैं। पर किसी के भयादोहन के लिए इस तरीके का इस्तेमाल नहीं हो सकता। जाहिर है कि उस समय की अपेक्षा देश में भ्रष्टाचार बढ़ा है।



जी.एस.टी. के बेहतर नतीजों का इंतजार 

आर्थिक इतिहासकार अंगस मेडिसन के अनुसार पहली सदी से लेकर दसवीं सदी तक भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। पहली सदी में विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में भारत का योगदान 32 दशमलव 9 प्रतिशत था।

संभवतः भारत को सोने की चिडि़या जानकर ही अनेक विदेशी हमलावरों ने समय समय पर इस देश पर हमला किया। पंद्रहवी सदी में भारत का योगदान करीब 25 प्रतिशत था। सन् 1820 में यह आंकड़ा घटकर 16 प्रतिशत रह गया।

सन् 1950 में दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान सिर्फ 3 प्रतिशत रह गया था। यानी विदेशी लुटेरों ने पूरा दोहन किया। अब करीब छह प्रतिशत है। आजादी के बाद यह और भी बढ़ता, पर देसी लुटेरे भी कम नहीं हैं।
केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि जी.एस.टी. लागू हो जाने के बाद केंद्र और राज्यों का राजस्व बढ़ेगा। अब देखना है कि वह कितना बढ़ता है। राजस्व के बढ़ने का सीधा और सकारात्मक असर विकास पर होगा।

वैसे कोई कितनी भी अच्छी व्यवस्था बनाए, उसमें छेद करने का रास्ता भ्रष्ट लोग निकाल ही लेते हैंं। जी.एस.टी. एक अच्छी व्यवस्था मानी जा रही है। पर, भगवान इसे भ्रष्टों की नजर से बचाएं !



क्या हुआ महेश शाह की घोषणा का ?

गुजरात के एक बिंिल्ंडग व्यवसायी महेश शाह गत साल 30 सितंबर को अहमदाबाद स्थित आयकर कार्यालय गये। उन्होंने स्टेचुरी फार्म जमाकर अपने पास नकद 13 हजार 860 करोड़ रुपए होने की जानकारी दे दी। आयकर विभाग ने उनका फार्म स्वीकार कर लिया। यानी विभाग ने उनकी घोषणा को मान लिया।

पर दिसंबर, 2016 में  शाह ने कह दिया कि ‘कुछ व्यवसायियों और नेताओं ने उनका इस्तेमाल किया। नेता और व्यवसायी पीछे हट गए। इसलिए मैं पहली किस्त नहीं दे पाया।’ शाह को गिरफ्तार भी किया गया था। पर बाद में आयकर महकमे ने शाह के साथ क्या सलूक किया, यह पता नहीं चल सका। आयकर विभाग को चाहिए कि वह अब भी शाह के उस दावे और पीछे हटने के बारे में पूरा विवरण देश को बता दे। 

 केंद्र सरकार काला धन और बेनामी संपत्ति की खोज खबर के काम में गंभीरता से लगी हुई है। इस काम पर अधिकतर लोग सरकार से खुश हंै। यदि लोगों को महेश शाह के बारे में भी बता दिया जाता तो वे और भी खुश होते। क्योंकि अधिकतर लोग अब यह समझने लगे हैं कि प्रभावशाली लोगों के पास जो बेनामी संपत्ति या काला धन है, वह आम जनता का हक मार कर ही जुटाए गए हैं।  



 मजदूरी मद में किसानों को सब्सिडी देने का सुझाव

सन 2012 में तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने सुझाव दिया था कि  सरकार खेतिहर मजदूरों की मजदूरी के मद में 50 प्रतिशत सब्सिडी किसानों को देने का प्रावधान करे। आत्महत्याओं की घटनाओं को ध्यान में रखते हुए उन्होंने यह सिफारिश की थी। पर मनमोहन सरकार ने उस सिफारिश पर ध्यान नहीं दिया। वह तो दूसरे ही कामों में व्यस्त थी। वैसे मनरेगा कार्यक्रम को किसानों की खेती से जोड़ने की भी सलाह दी गयी थी।

याद रहे कि दिनानुदिन खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है। उसे उबारने के लिए सुझाव तो बहुत हैं, पर उन पर अमल कम ही होता है। एक बार फिर कर्ज माफी का दौर जारी है। यह भी जरूरी काम है। पर यह स्थायी हल नहीं है। किसानों को राहत देने के लिए कुछ स्थायी काम करने होंगे।पता नहीं यह कौन सरकार करेगी ! 



और अंत में

एक फेसबुक मित्र ने टिप्पणी की है कि ‘हे ईश्वर, मुझे कभी इतना बड़ा आदमी मत बनाना ताकि निहितस्वार्थवश मैं साहुकार को साहुकार और चोर को चोर कह पाने का साहस खो दूं!’


(23 जून 2017 को प्रभात खबर में प्रकाशित)

जून में देश के साथ-साथ बिहार की राजनीति भी रहेगी गरम

1975 के जून में इस देश की राजनीति में दूरगामी परिणामों वाली घटनाएं हुई थीं। वैसी बड़ी तो नहीं, पर कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं की आहट इस जून में भी जरूर सुनाई दे रही हैं।

बिहार में राजद और भाजपा के कुछ बड़े नेताओं के बीच गंभीर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। आरोप भ्रष्टाचार को लेकर हैं। पता नहीं, इस मामले मंे आगे क्या-क्या होने वाला है। रोज नये-नये खुलासे हो रहे हैं। यदि इन आरोप-प्रत्यारोपों में कोई बड़ा मोड़ आ गया तो वह राजनीति और कुछ नेताओं के लिए यादगार बन सकता है। बिहार की जनता के लिए भी।

  इस बार की बिहार इंटर परीक्षा के रिजल्ट ने भी देश  का ध्यान खींचा है। दो-तिहाई परीक्षार्थी फेल कर गए हैं। इसको लेकर पीडि़त छात्र उद्वेलित हैं। राज्य सरकार उनकी समस्या के समाधान का भरोसा दिला रही है। देखना है कि वैसे परीक्षार्थियों की वाजिब मांगों का समाधान कब तक होता है ! जितनी जल्द हो जाए,उतना ही अच्छा है।

इस महीने यह भी देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव में दलीय जोड़तोड़ को लेकर बिहार के महागठबंधन के नेतागण राष्ट्रीय स्तर पर कैसी भूमिका निभाते हैं! जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए अभी होने वाली दलीय गोलबंदी, 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए पूर्व पीठिका का काम कर सकती है।

यह महीना कश्मीर को लेकर भी काफी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान ने पूरा जोर लगा दिया है। भारतीय सेना पहले की अपेक्षा अधिक ताकत से भारत विरोधी ताकतों को जवाब दे रही है। केंद्र सरकार ने जरूरत के अनुसार फौजी कार्रवाइयां करने की पूरी छूट सेना को दे दी है। ऐसा कम ही होता है जब सेना को पूरी छूट मिल जाए !

हाल में पशु बाजारों में वध के लिए मवेशियों की खरीद-बिक्री पर केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। इसको लेकर ‘सेक्युलर दल’ और उनकी राज्य सरकारें रोष में हैं। इससे ध्रुवीकरण का खतरा भी सामने है। हालांकि ताजा खबर के अनुसार केंद्र सरकार इस मामले में कुछ सहूलियत देने को तैयार लग रही है।

खबर यह भी आ रही है कि यू.पी.ए. सरकार के कार्यकाल में दिग्विजय सिंह ने जाकिर नाइक को कानूनी परेशानियों से बचाया था। हालांकि जाकिर ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके साथ किसी देशभक्त की सहानुभूति हो सकती है। भारत के कई मुस्लिम धर्म गुरू भी जाकिर की कार्यशैली के खिलाफ रहे हैं।

याद रहे कि पुलिस ने जाकिर नाइक की आपत्तिजनक गतिविधियों के लिए उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रस्ताव किया था। उस पर धर्म परिवर्तन का आरोप है। वह सार्वजनिक रूप से अन्य धर्मों की निंदा करता है।
इन दिनों वह इस देश की पुलिस के डर से फरार है। पर सवाल है कि यह दिग्विजय सिंह भी कैसे नेता हैं जिनका नाम ऐसे विवादास्पद लोगों से यदाकदा जुड़ता रहता है ? या फिर ऐसे लोगों से श्री सिंह खुद को जोड़ लेते हैं ?
कपिल मिश्र जैसे अपने ही पूर्व सहयोगी द्वारा अरविंद केजरीवाल तथा उनके सहकर्मियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों से एक नयी शैली की राजनीति के पतन की आहट मिल रही है। किसी ने अनुमान भी नहीं लगाया होगा कि जनलोकपाल आंदोलन के जरिए 2011 में अन्ना हजारे के साथ उभरे अरविंद केजरीवाल की सरकार पर कुछ ही वर्षों में इतने संगीन आरोप लगेंगे।

यह बात और है कि आरोपों को अभी साबित किया जाना है। पर आरोप लग ही क्यों रहे हैं ? ऐसे आरोपों से स्वच्छ राजनीति की उम्मीद में बैठे आम नागरिकों को झटका लगता है। लगता है कि इसी जून में अरविंद मंडली पर लग रहे आरोपों को उनकी तार्किक परिणति तक पहुंचा दिया जाएगा।



जरा याद कर लें जून 1975 भी !

5 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण ने पटना के गांधी मैदान की सभा में ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया था। यह और बात है कि वह सपना भी पूरा नहीं हुआ। 12 जून 1975 को  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रायबरेली से लोकसभा का चुनाव खारिज कर दिया। अदालत ने लोकसभा में वोट देने का प्रधानमंत्री का अधिकार भी समाप्त कर दिया। उसी दिन यह खबर आई कि गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी हार गयी।

जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी से मांग की कि वह अब प्रधानमंत्री पद छोड़ दें। उस मांग पर जोर डालने के लिए 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी ने जनसभा की। सभा बड़ी थी। स्वतःस्फूर्त भी। उसी रात देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गयी। देश के लगभग सारे गैर कांग्रेसी नेता जेलों में बंद कर दिए गए। अखबारों पर कठोर सेंसरशीप लगा दी गयी। किसी एक महीने में एक साथ इतनी बड़ी घटनाएं संभवतः कभी नहीं हुईं जितनी जून 1975 में हुईं। 



देश बचाने के लिए कठोर कार्रवाई जरूरी 

गत 29 मई 2017 को यह खबर आई कि कश्मीर में अलगाववादियों को मिल रही वित्तीय मदद के तार दिल्ली के हवाला कारोबारियों से जुड़े होने के सबूत एन.आई.ए. को मिले हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। क्योंकि हमारे देश का तंत्र चुस्त नहीं है। हवाला कारोबारियों पर कारगर कार्रवाई नहीं हो पाती। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हमारे देश के अनेक नेताओं और बड़े अफसरों का हवाला कारोबारियों से करीबी संबंध हैं।

नब्बे के दशक में वह संबंध उजागर हुआ था। तभी दोषियों को सजा हो गयी होती तो संभवतः आज कश्मीर के आतंकवादियों व अलगाववादियों को हवाला करोबारियों की ‘सेवाएं’ नहीं मिल पातीं।

27 मार्च 1991 में जे.एन.यू. का एक छात्र शहाबुददीन गोरी लाखों रुपए के साथ पकड़ा गया था। वे पैसे कश्मीर के आतंवादियों के लिए थे। इसी तरह के राष्ट्रविरोधी धंधे में लगा हिजबुल मुजाहिद्दीन का अशफाक लोन उन्हीं दिनों गिरफ्तार हुआ था। इन लोगों से मिले सुराग के बाद पांच हवाला कारोबारी  गिरफ्तार हुए।

सी.बी.आई. ने 3 मई 1991 को 20 स्थानों पर एक साथ छापे मारे। जिन स्थानों में छापामारी की गई, उनमें  जे.के. जैन का परिसर भी था। उसके यहां से सनसनीखेज डायरी मिली। उस डायरी में दर्ज था कि देश के कई दलों के 115 अत्यंत ताकवर नेताओं और बड़े अफसरों को हवाला के पैसों में से लाखों-करोड़ों रुपए दिए गए।

नेताओं में कई पूर्व केंद्रीय मंत्री भी थे। यानी जो कश्मीर के आतंकवादियों को पैसे दे रहे थे, वही इस देश के बड़े नेताओं को भी खुश कर रहे थे। जांच हुई, पर सी.बी.आई. नामक तोता ने उसे रफादफा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने भी कहा था कि इस जैन हवालाकांड की तो सी.बी.आई. ने कोई जांच ही नहीं की।



और अंत में

किसी ने ठीक ही कहा है कि ‘कफन में जेब नहीं होती।’ पर इस देश के अनेक नेताओं की तरह ही पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत जयललिता भी इस उक्ति का मर्म नहीं समझ सकीं थीं। कौन सी संपत्ति लेकर परलोक गयीं हैं जयललिता ? ताजा खबर यह है कि तमिलनाडु सरकार ने जयललिता की निजी संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। याद रहे कि अदालत ने जायज आय से अधिक संपत्ति जब्त करने का आदेश दे रखा है। 

जयललिता ने कुल कितनी संपति बनाई थी, उसके बारे में तो हमेशा अटकलों का बाजार ही गर्म रहा है। पर सवाल है कि उन्होंने किसके लिए संपत्ति बनाई ? शशिकला जिस केस में जेल की सजा भुगत रही हैं, उसी केस की मुख्य आरोपित जयललिता थीं।

बंगलुरू की विशेष अदालत ने 27 सितंबर 2014 को जयललिता को 4 साल की कैद और एक अरब रुपए का जुर्माना किया था। उन्हें जेल जाना पड़ा था। जयललिता पहले से ही अस्वस्थ चल रही थीं। जेल की  अव्यवस्था ने उनकी बीमारी को और भी गंभीर बना दिया था। नतीजतन उनका असामयिक निधन हो गया।

( दो जून 2017 को प्रभात खबर में प्रकाशित)

प्रकृति से गांधी की निकटता से सीख लेंगे आज के नेता ?

दक्षिण अफ्रीका में वकालत करते समय मोहनदास करमचंद गांधी पेट की बीमारी से ग्रस्त हो गये थे। उन्होंने दवाएं खाईं। पर कोई लाभ नहीं हुआ। वेजिटेरियन सोसायटी के एक मित्र ने उन्हें एक किताब दी। एडोल्फ जस्ट लिखित ‘रिटर्न टू नेचर’ उन्होंने ध्यान से पढ़ी। उस पुस्तक ने गांधी को बड़ी सीख दी। गांधी प्रकृति के करीब हो गए।

उन्होंने अपने आहार में बदलाव किया। उन्होंने महसूस किया कि मिट्टी, पानी, धूप और हवा मंे बड़ी ताकत है। ये चीजें शरीर को खुद-ब-खुद स्वस्थ होने और रखने में बड़ी मदद करती हैं। यह भारत जैसे देश के लिए भी अनुकूल है जहां के अधिकतर लोग गांवों में यानी प्रकृति के पास रहते हैं।

खुद महात्मा गांधी अपना इलाज धूप स्नान, पेट और शरीर पर मिट्टी की लेप तथा इसी तरह के अन्य प्राकृतिक उपायों से करते रहे। उसका उन्होंने जीवन भर पालन किया। उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र की स्थापना भी की। उनके आश्रम के अन्य सहवासी भी प्राकृतिक जीवन जीते थे। नतीजतन आजादी की लड़ाई में लगे अधिकतर गांधीवादी नेता और कार्यकर्ताओं ने लंबा जीवन जिया। 

देश गांधी के चम्पारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष मना रहा है। क्या आज के नेतागण गांधी की तरह ही भरसक प्राकृतिक जीवन जीने का संकल्प लेंगे? कुछ आधुनिक नेतागण तो प्राकृतिक जीवन से काफी दूर हैं। थोड़े से लोग पालन करते हैं। 

बढ़ते प्रदूषण और जानलेवा मिलावट के इस दौर में यह और भी जरूरी है कि लोग प्रकृति के करीब जाएं। नेता इस मामले में भी देश को नेतृत्व दे सकते हैं। इस संदर्भ में भी आज के कई बड़े नेताओं के बारे में अच्छी खबरें नहीं आतीं। सुना जाता है कि साठ-सत्तर की उम्र में ही बीमार रहने लगते हैं। उन्हें देश-विदेश के अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ते हैं। इससे खुद उन्हें, उनके परिजन और उनके समर्थकों -प्रशंसकों में निराशा फैलती है। इनमें से तो कुछ नेता समाज के एक बड़े हिस्से में बड़े लोकप्रिय होते हैं। उन्हें कोई अधिकार नहंीं है कि वे खानपान,  रहन- सहन और आहार -विहार में अतिशय कुसंयम अपनाकर अपने प्रश्ंासकों को निराश करें।
आज के नेता यदि चाहें तो प्राकृतिक जीवन और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति अपना कर वे इस चम्पारण शताब्दी वर्ष में बापू को बेहतर श्रद्धांजलि दे सकते हैं।
   
क्यों बार-बार टूट जाता है पीपा पुल 

खबर है कि दानापुर के पास गंगा नदी पर बना पीपा पुल गत चार महीनों में तीसरी बार विसंधित हो गया यानी टूट गया। नदी में पानी कम होने पर हर साल पीपा पुल बनता है। डेढ़ करोड़ रुपए की लागत आती है। इतने अधिक खर्च के बावजूद निर्मित पुल को आंधी से बचाने का कोई उपाय क्यों नहीं है, यह बात समझ में नहीं आती। क्या हर साल नये पीपे का निर्माण कराया जाता है ?

गांधी सेतु के जर्जर हो जाने की स्थिति में दानापुर का यह अस्थायी पुल लाखों लोगों को राहत देता है। इसके बावजूद इसके निर्माण और रखरखाव में इतनी बड़ी लापरवाही ? आश्चर्य होता है।

अच्छा तो होता कि दानापुर से दिघवारा के बीच गंगा नदी पर स्थायी पुल के निर्माण पर सरकार विचार करती। उससे पटना महानगर के विस्तार में भी सुविधा होती। पर जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक ऐसा पीपा पुल तो बने जो आंधियों को झेल सके !



कोयला सचिव को तो सजा, पर कोयला मंत्री ? 

दिल्ली की विशेष अदालत ने गत 22 मई को पूर्व केंद्रीय कोयला सचिव तथा दो अन्य कार्यरत आई.ए.एस. अफसरों को दो -दो साल की सजा सुनाई है। इस मामले में कुछ अन्य संबंधित लोगों को भी सजा दी गयी है। अदालत ने यह अच्छा किया है। हालांकि सजा कम लगती है। बड़े अफसरों को इस तरह सजा होगी तो शायद देश के संसाधनों की लूट कम होगी। क्योंकि यदि बड़े अफसरगण सरकारी भ्रष्टाचार के धंधे में पूरी हिम्मत से असहयोग करने लगें तो सत्ताधारी नेतागण देश को लूट नहीं सकेंगे।

हालांकि खबर तो यह भी आती रहती है कि पहले से लगभग ईमानदार रहे मंत्रियों को भी कुछ घाघ अफसर ही लूटने का मंत्र सिखा देते हैं। पर इस मामले में एक बड़ा सवाल देश के सामने है। सिर्फ अफसरों को ही क्यों सजा दी जाए?

कोयला मंत्री को क्यों नहीं ? सचिव के प्रस्ताव पर कोयला ब्लाॅक के आवंटन का अंतिम आदेश तो कोयला मंत्री का ही था ! उन दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही तो कोयला मंत्री भी थे। शायद इस मामले में ऊपरी अदालत मंे अपील होगी तो यह सवाल उठेगा कि कोयला मंत्री कैसे सजा से बच सकते हैं ? यह मामला मध्य प्रदेश में गलत ढंग से कोयला खान आवंटन का था।

वैसे तो देश भर में ऐसे घोटाले हुए थे। सी.ए.जी. ने कहा था कि इस तरह के आवंटन से सरकारी खजाने को एक लाख 86 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। हालांकि वास्तविक नुकसान और अधिक था। 24 सितंबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने 214 कोल ब्लाॅक के आवंटन को रद कर दिया था। अब सवाल है कि 214 कोल ब्लाॅक के आवंटन में घोटाला सिर्फ सचिव स्तर के अफसरों की मिलीभगत से संभव है ?

 जब यह घोटाला सामने आया था तो चर्चा यह थी कि इस घोटाले में परदे के पीछे बड़ी हस्तियां शामिल थीं। पर उम्मीद है कि ऊपरी अदालत उन लोगों को भी सजा देगी जिन सत्ताधारियों के दस्तखत से कोयला घोटाले को अंजाम दिया गया।



त्रिशंकु शत्रुघ्न सिन्हा

 
अन्य लाखों लोगों के साथ -साथ मैं भी कुछ बातों को लेकर शत्रुघ्न सिन्हा का प्रशंसक रहा हूं। आगे भी रहूंगा। वह एक अच्छे कलाकार हैं। कैरियर के शुरुआती दौर में उन्होंने विलेन के रूप में भी दर्शकों की तालियां बटोरी थी। यह एक नयी बात थी। जब पूरे देश में बिहारियों को उपहास की नजर से देखा जाता था, उस समय भी उन्होंने खुद को ‘बिहारी बाबू’ कहलाना पसंद किया।

जब फिल्मी दुनिया के लोग आम तौर पर प्रतिपक्षी राजनीति का दामन नहीं थामते थे, शत्रुघ्न सिन्हा ने सत्ता के खिलाफ जेपी का साथ दिया था। पर अनेक शालीन हलकों में शत्रुघ्न सिन्हा की मौजूदा राजनीतिक भूमिका अच्छी नहीं मानी जा रही है। कायदे की राजनीति की मांग तो यही है कि या तो भाजपा बिहारी बाबू को पार्टी से निकाल दे या फिर वह खुद ही पार्टी छोड़ दें। खुद दल छोड़ने में उन्हें दिक्कत हो सकती है। क्योंकि तब उनकी लोकसभा की सदस्यता चली जाएगी। पर कार्रवाई करने में पार्टी को क्या दिक्कत है ? यह बात अनेक लोगों की समझ से बाहर है।



और अंत में

बिहार भाजपा के मंत्री ऋतुराज सिन्हा ने कहा है कि शत्रुघ्न सिन्हा को ख्याल रखना चाहिए कि वह भाजपा के चुनाव चिह्न पर सांसद बने हैं। ऋतुराज ने ठीक ही कहा है। पर सवाल है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की शत्रुघ्न सिन्हा के बारे में क्या राय है ? क्या शाह जी ने बिहारी बाबू को कभी इस बात की याद दिलाई कि वे भाजपा के सांसद हैं ? यदि दिलाई भी होगी तो इस बात का पता आम लोगों को नहीं है।

दरअसल ‘शत्रु जी’ फिल्म में तो विलेन से हीरो बने थे।

राजनीति में वे विपरीत दिशा में चल रहे हैं। कम से कम भाजपा के लिए तो विलेन ही बन  गये हैं। हां, भाजपा विरोधी दलों के लिए शत्रुघ्न सिन्हा जरूर हीरो बने हुए हैं। टेढ़े-मेढ़े और परोक्ष-प्रत्यक्ष बयानों के जरिए अपनी ही पार्टी को सार्वजनिक रूप से जितनी परेशानी में बिहारी बाबू ने डाला, वह भी एक रिकाॅर्ड है।
अभी और क्या - क्या करेंगे, वह सब देखना दिलचस्प होगा।


(26 मई 2017 को प्रभात खबर में प्रकाशित)