Sunday, December 10, 2017

भारत के राष्ट्रपति बनते -बनते रह गए थे सी.राज गोपालाचारी



    
सी.राज गोपालाचारी यानी राजा जी कई बातों के लिए याद किए जाते हैं।
वे न सिर्फ आजाद भारत के पहले और आखिरी भारतीय गवर्नर जनरल थे बल्कि उन्होंने 1959 में एक ऐसी गैर कांग्रेसी पार्टी यानी स्वतंत्र पार्टी बनाई जिसे 1967 में  लोक सभा में 44 सीटें मिलीं।
तब तक इतनी अधिक सीट किसी अन्य प्रतिपक्षी पार्टी को नहीं मिल सकी थी।
  आजादी के बाद तब के गवर्नर जनरल लाॅर्ड माउंट बेटन वापस जाने लगे तो सवाल उठा कि उनकी जगह कौन लेगा।
 कांग्रेस पार्टी  की राय सरदार बल्लभ भाई पटेल के पक्ष में थी ।किंतु प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू की जिद पर राज गोपालाचारी गवर्नर जनरल बने।उससे पहले राजा जी पश्चिम बंगाल के गवर्नर रह चुके थे।
 सन 1950 में जवाहरल लाल जी, राजा जी को राष्ट्रपति बनवाना चाहते थे।पर , सरदार पटेल की जिद पर डा.राजंेद्र प्रसाद बने।
 सरदार पटेल के निधन के बाद राजा जी देश के गृह मंत्री बने थे।पर नेहरू के साथ सैद्धांतिक मतभेद के कारण वे उस पद से 10 महीने में ही हट गए।
हालांकि बाद में भी राजा जी मद्रास के मुख्य मंत्री बने।
वे 1937-39 में भी वहां के मुख्य मंत्री यानी प्रीमियर रह चुके थे।
पर कभी उन्होंने अपने विचारों से समझौता नहीं किया।
राजा जी खुली अर्थ व्यवस्था के कट्टर समर्थक थे।
इसीलिए जब उन्होंने स्वतंत्र पार्टी बनाई तो उससे बड़े -बड़े उद्योगपति व राजा महाराजा जुड़े।फिर भी कुछ कारणवश जवाहर लाल नेहरू उन्हें पसंद करते थे।
राजा जी 1952 से 1954 तक मद्रास के मुख्य मंत्री थे।उनके ही मुख्य मंत्रित्व काल में मद्रास से अलग होकर 1953 में भाषा के आधार पर आंध्र प्रदेश अलग राज्य बना।
  गांव के स्कूल से अपनी शिक्षा प्रारंभ करने वाले राजा जी विद्वान लेखक ,वकील और राज नेता थे ।उन्होंने ऊंची शिक्षा हासिल की थी।राजा जी का जन्म मद्रास प्रेसिडेंसी के एक गांव में 10 दिसंबर 1878 को हुआ था।उनका निधन 25 दिसंबर 1972 को हुआ।
उन्होंने बाल गंगाधर तिलक के प्रभाव में आकर 1911 में सार्वजनिक जीवन की शुरूआत की।
सन 1919 में वे गांधी जी से जुड़े।
वे गांधी जी से पारिवारिक रूप से जुड़ गए थे।
राजा जी की बेटी लक्ष्मी की शादी महात्मा गांधी के चैथे पुत्र देव दास गांधी से हुई थी।देवदास गांधी हिन्दुस्तान टाइम्स के प्रबंध संपादक  थे।
देव दास गांधी -लक्ष्मी के पुत्र राज मोहन गांधी, राम चंद्र गांधी और गोपाल कृष्ण गांधी हुए।राम चंद्र गांधी का 2007 में निधन हो गया।गोपाल कृष्ण गांधी पश्चिम बंगाल के गवर्नर थे।
  राजा जी हमेशा ही स्वतंत्र विचार के राज नेता रहे ।
वे जो ठीक समझते थे,वही करते थे।उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया था।उनके अपने तर्क थे जो गांधी जी से नहीं मिलते थे।
इसीलिए जब जवाहरलाल नेहरू ने उन्होंने राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव किया तो कांग्रेस पार्टी ने उनका कड़ा विरोध कर दिया।
विरोध इसी आधार पर हुआ कि जिस व्यक्ति ने कांग्रेस की सबसे कठिन लड़ाई में हमारा साथ नहीं दिया ,उन्हें हम राष्ट्रपति कैसे बनाएं।
  हालांकि दूसरी ओर अपने निधन से पहले राजाजी ने एक बार सार्वजनिक रूप से कहा था कि आजादी के बाद यदि जवाहर लाल नेहरू की जगह सरदार पटेल प्रधान मंत्री बने होते तो देश के लिए बेहतर  होता।
@ फस्र्टपोस्ट हिंदी में 10 दिसंबर 2017 को प्रकाशित मेरा लेख@
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Saturday, December 9, 2017

  इन दिनों इस देश के अनेक बुद्धजीवी एक बात को 
लेकर  चिंतित लग रहे हैं।
उनकी चिंता है कि प्रतिपक्ष कमजोर होता जा रहा है।यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
व्यक्तिगत रूप से मेरी भी यही राय है।
 इस समस्या का समाधान आखिर कौन करेगा ?
  वही करेगा जिसने प्रतिपक्ष को कमजोेर किया है।
मेरा मानना है कि प्रतिपक्ष ने खुद ही प्रतिपक्ष को कमजोर किया है।
 आज का प्रतिपक्ष जब  सत्ता में था तो उनमें से बहुलांश   पर लगातार घोटालों और महा घोटालों के आरोप लगते रहे।
उन पर यह आरोप भी था कि उसने अल्पसंख्यकों के बीच के अतिवादियों का तुष्टिकरण किया।अल्पसंख्यकों को लेकर खुद कांग्रेस की ए.के.एंटोनी कमेटी की रपट में भी इस तरह की  बात कही गयी है।
  इन दो बातों का भाजपा ने पूरा लाभ उठाया।
  अब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बनने जा रहे हैं।
बल्कि कहिए कि बन ही चुके हैं।घोषणा बाकी है।
क्या राहुल जी  उपर्युक्त कारणों से सहमत हैं ?
यदि नहीं तो अपनी पार्टी की लगातार हार के असली कारणों
का वे खुद पता लगाएं और लगवाएं। जरूरत समझें तो देश-विदेश की किसी निष्पक्ष एजेंसी से जांच करवा लें।
चिंतित बुद्धिजीवी उन्हें इस काम में मदद करें।सब मिल कर उन कारणों को दूर करने के गंभीर उपाय करें।
उसके बाद  ही वे मतदाताओं से उम्मीद करें कि वे उन्हें दोबारा मजबूत करेंगे।
  यह मान कर चलें कि मतदाता कभी गलत नहीं होते।
मेरी समझ से गत विधान सभा चुनाव में न पंजाब के मतदाता गलत थे और न ही उत्तर प्रदेश के ।
आम मतदाताओं को बेहतर सरकार चाहिए।यहां वैसे मतदाताओं की बात नहीं की जा रही है जो धर्म और जाति के नशे में डूबे रहते हैं।
 इसे नहीं भूलना चाहिए कि सोफ्मा जैसी ज्यादा अच्छी तोप को छोड़कर जब केंद्र सरकार ने कम अच्छी तोप बोफर्स खरीद ली तो जनता नाराज हो गयी थी। इसीलिए 1989 में कांग्रेस हार गयी।जनता सब जानती है। 
  
     


मैंने अपने पोस्ट की अंतिम लाइन में  वी.पी.सिंह को उधृत करते हुए यह लिखा  है कि ‘मैंने कभी यह आरोप नहीं लगाया कि राजीव गांधी को पैसे मिले हैं।’
 दरअसल 1989 के लेास चुनाव में कांग्रेस इसलिए हार गयी क्योंकि वी.पी.सिंह बोफर्स के दलालों पर आरोप लगा रहे थे और राजीव और उनके दल के लोग दलालों का बचाव कर रहे थे।
मतदाताओं ने समझा कि जरूर दाल में कुछ काला है।इसलिए कांग्रेस हार गयी। 1988 में पटना के एक प्रेस कांफंे्रस में मैंने वी.पी.सिंह से यह सवाल किया था कि ....तब आप राजीव गांधी से इस्तीफा की मांग क्यों नहीं करते ? इस पर उन्होंने कहा कि आप कोई सिरियस सवाल कीजिए।
  जहां तक जल्दीबाजी में केस के निपटारे का सवाल है, तो उसके बारे में कुछ बातें।
2 दिसंबर, 1989 को वी.पी.प्रधान मंत्री बने और 22 जनवरी को 
बोफर्स में प्राथमिकी दर्ज कर दी गयी।
जिस घोटाले का अतंरराष्ट्रीय विस्तार हो,उसमें आखिर कितनी जल्दीबाजी हो सकती थी ?
एक बात और थी।कांग्रेस के अलावा भी कुछ दूसरे दलों के बड़े -बड़े नेता भी इस केस को दबाने में लगे थे।देश -विदेश की अदालतों में तरह -तरह की अपील करके मामले को लंबा खींचा जा रहा था।
जब -जब कांग्रेस या कांग्रेस समर्थित सरकारें आईं  , केस को कमजोर करने के काम हुए।
  इसके बावजूद  अटल सरकार के कार्यकाल में  1999 में  आरोप पत्र दाखिल किया गया।आरोप पत्र के सेकेंड काॅलम में आरोपित के रूप में राजीव गांधी का भी नाम है।  
   मृतक आरोपित का नाम उसी कालम में होता हैं।यदि वी.पी.सिंह और जांच एजेंसियों ने सारे संबंधित सबूत एकत्र नहीं किए होते तो आरोप पत्र कैसे तैयार होता ? केस इतना मजबूत था कि कांग्रेस सरकार भी कोर्ट में ट्रायल का सामना करने को कभी तैयार नहीं हुई।वह केस वापस ही कर रही थी। 
 बिहार के तब के एक कांग्रेसी विधायक ने इस संबंध में मुझे एक सनसनीखेज बात बताई थी।उस विधायक को राजीव जी के कारण ही  1985 ं टिकट दिया गया था।वह अब भी राजीव के कट्टर प्रशंसक हैं।राजीव से बातचीत के  आधार पर  बोफर्स पर उस विधायक @अब पूर्व@ ने किताब लिखी है।वह किताब मेरे पास भी है।
  उसमें यह कहा गया है कि बोफर्स सौदे में दलाली राष्ट्र हित के एक खास काम के लिए  ली गयी थी।वह राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित  काम था।
वह गुप्त काम था।
 उस गुप्त काम की चर्चा उस किताब में है।पर मैं  उसे जाहिर करना नहीं चाहता।
पूर्व विधायक के अनुसार उसे राजीव जी देशहित में सार्वजनिक नहीं कर सकते थे चाहे उनकी गददी ही क्यों न चली जाए।इसीलिए उन्होंने लगातार क्वात्रोचि का बचाव किया। 


  


  मेरे आवास के पास में ही सरकारी मिडिल स्कूल है।
स्कूल से  प्रार्थना और राष्ट्रगीत की आवाज मुझे रोज सुनाई पड़ती है।
  कल उसी स्कूल की एक छात्रा मेरे घर के पास से गुजर रही थी कि इसी बीच स्कूल में राष्ट्र गान शुरू हो गया।छात्रा जहां थी, तत्काल सावधान की मुद्रा में सड़क पर ही खड़ी हो गयी।
जब राष्ट्रगान समाप्त हुआ, तभी वह आगे बढ़ी।
मैं उसे जानता नहीं।पर उस छात्रा में यह अनुशासन और संस्कार देख कर मुझे अच्छा लगा।स्वाभाविक है कि इसमें परिवार के साथ-साथ संबंधित स्कूल का भी योगदान है।



मणि शंकर अय्यर जी,
 आप गत लोक सभा चुनाव से ठीक पहले नरेंद्र मोदी के लिए प्रधान मंत्री पद की जगह  चाय की दुकान का स्थल दे रहे थे।
 आपके इस बयान से  लोक सभा चुनाव में कांग्रेस को कितना फायदा मिला ?
बाद में आपने पाकिस्तान जाकर वहां के लोगों से सार्वजनिक रूप से यह अपील की कि आप लोग मोदी की सरकार को हटवाइए।
 आपके इस बयान से उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को कितना लाभ मिला ?
अब आपने कहा कि नरेंद्र मोदी  नीच इनसान है।
गुजरात में इस बयान से कांग्रेस का कितना वोट बढ़ेगा ? 
   आप तो विदेश सेवा में थे।काफी प्रतिभाशाली हैं।राजीव के अत्यंत करीबी रह चुके हैं।आप जरूर सोच- समझ कर ही  बयान देते होंगे।बस उसके ,उददेश्य, कारण व परिणाम के बारे में भी कभी कुछ लोगों को बता दीजिएगा। 
@ 7 दिसंबर 2017@

  देश के नामी पत्रकार और समाजवादी विचारक राज किशोर
ने ‘राष्ट्रीय सहारा’ में  अपने साप्ताहिक काॅलम ‘परत दर परत’ में  राम जन्म भूमि मंदिर-मस्जिद विवाद पर कल निम्न लिखित बातें लिखी हैं।
उनका लेख तो लंबा है और उसमें पूरी पृष्ठभूमि का संक्षिप्त विवरण है।
पर, राज किशोर ने अपने लेख के अंत में देशहित में महत्वपूर्ण सुझाव दिए  हंै जो इस प्रकार हंै--
‘ मेरी अल्प बुद्धि के अनुसार विकल्प अब दो ही हैं।एक न्यायिक समाधान का है।लेकिन यह रास्ता कंटीला है।कोर्ट में बहस मंदिर-मस्जिद पर नहीं , इस पर होगी कि विवादित जमीन पर मालिकाना हक किसका है।
यहां बाबरी मस्जिद का पक्ष मजबूत दिखाई पड़ता है,तब हिंदुओं की ओर से देशव्यापी उपद्रव का नया सिलसिला शुरू हो सकता है।
तब हमें बहुसंख्यकवाद का तांडव देखने को मिलेगा।
     इसलिए दूसरा विकल्प ही व्यावहारिक है कि मुसलमान स्वेच्छा से विवादग्रस्त भूमि हिंदूवादियों को दे दें।
इसे समर्पण या अपमान का मामला न माना जाए।मुसलमान उदारता दिखाएंगे तो उनकी प्रशंसा ही होगी।
बेशक हिंदूवादी इसे उदारता के रूप में नहीं लेंगे।
विजय दिवस मनाएंगे,लेकिन मुसलमानों को जहर का घूंट इसलिए निगल लेना चाहिए कि पूरा देश हिंदूवादी नहीं हुआ है।
मेरा मानना है कि भारत की व्यापक जनता मुसलमानों की उदारता से बहुत प्रभावित होगी जिससे राम मंदिर अभियान की हवा निकल जाएगी।
 कभी -कभी झुक जाना भी बुद्धिमानी होती है।इसलिए यह प्रयोग करके देखने में कोई हर्ज नहीं।’
    कई साल पहले खुशवंत सिंह ने भी इसी तरह का सुझाव दिया था।उन्होंने कहा था कि दावा किया जाता  है कि मध्य काल में इस देश के करीब 4000 मंदिरों को तोेड़कर वहां मस्जिदें बनायी गयीं।
 दिवंगत सिंह के अनुसार हिंदुओं को 3997 मस्जिदों पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए।उधर मुसलमान पक्ष काशी ,मथुरा और अयोध्या के मामले में हिंदुओं को सहूलियत दें।
पर ऐसा नहीं हो सका।हालांकि संघ  परिवार के कुछ सदस्य यह कह चुके हैं कि उन्हें सिर्फ राम मंदिर से मतलब है,काशी-मथुरा से नहीं।जब कि काशी का ज्ञानवापी मस्जिद ,मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
यह भी कहा जाता है कि यदि खुशवंत की बात मान ली गयी होती तो  आज भाजपा की केंद्र में बहुमत वाली सरकार नहीं होती।
  क्या इस मामले में विभिन्न पक्षों की जिद के पीछे कोई अन्य बड़ा कारण या उद्देश्य है ?  पता नहीं !

Friday, December 8, 2017

  दहेजमुक्त शादी में जो कुछ खास तरह की समस्याएं  आती हंै, आज मैं उनकी चर्चा करना चाहूंगा।
ऐसा नहीं है कि समाज के पास इन  समस्याओं का हल नहीं है।
पर, शत्र्त यह है कि समाज के कुछ जन सेवी लोगों को थोड़ा समय देना होगा।
  जातीय व सामाजिक संगठन इसमेें अच्छी भूमिका निभा सकते हैं।
कुछ तो निभाते भी हैं।पर, इसमें विस्तार की जरूरत है।
 फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर राजपूत समुदाय में जो एकता देखी जा रही है, उस एकता का सदुपयोग ऐसे  काम में हो सकता है।
   मेरे छोटे भाई नागेंद्र सन 1976 में बिहार सरकार में श्रम प्रवत्र्तन पदाधिकारी पद पर नियुक्त हुए थे।एक तो सरकारी नौकरी,दूसरे अपनी खेती-बारी और तीसरे लड़के का प्रभावशाली व्यक्तित्व।
  दहेज देने वालों की कमी नहीं थी।
पर, मेरा परिवार चाहता था कि हम दहेज के चक्कर में न पड़ें।अन्य बातों पर ध्यान दें।हमने 1979 में पटना जिले के बैकट पुर मंदिर में नागेंद्र की शादी आयोजित की।कोई दहेज नहीं ,कोई फालतू दिखावा नहीं।
 अच्छी शादी हुई।परिवार व रिश्तेदार अच्छे मिले।
   पर, उससे पहले मुझे 1978 में एक अजीब अनुभव हुआ। उन दिनों मैं दैनिक ‘आज’ के पटना ब्यूरो में काम करता था।एक विधि पदाधिकारी  मेरे एक रिश्तेदार को लेकर मेरे आॅफिस में  आए।आते ही उस पदाधिकारी ने मुझसे पूछा कि ‘आप भाई का कितना तिलक लीजिएगाा ?’
मैंने कहा कि हम लोग तिलक -दहेज नहीं लेते।
लड़की यदि पसंद आ जाएगी तो मुफ्त में शादी हो जाएगी।
 वे चले गए।उन्होंने लौटते समय मेरे रिश्तेदार से कहा कि लगता है कि लड़के में कोई दोष है,इसीलिए यह आदमी दहेज नहीं मांग रहा है।
   अब यहीं सामाजिक संगठन की भूमिका आती है।
संगठन ऐसे लोगों की सूची तैयार करें जो दहेजमुक्त और कम से कम खर्च में शादी करना चाहते हैं।
  मैरिज एक्सचेंज बनाएं।दोनों पक्षों को मिलाएं।वैसे लोग कम मिलेंगे,पर मिलेंगे जरूर।
 वैसी जातियों के समाजसेवी लोगों को यह काम पहले शुरू करना चाहिए जिन जातियों में दिखावे के लिए शादियों में अनाप -शनाप खर्च करने की परंपरा रही है।शादियों में फिजूलखर्ची के कारण कई परिवारों की आर्थिकी बिगड़ते मैंने देखा है।
   एक और कठिनाई है।
यदि किसी लड़की वाले से कहिए कि हम मंदिर में शादी करना चाहते हैं तो वे कहेंगे कि लोग क्या कहेंगे ?
बारात हमारे दरवाजे पर आनी चाहिए।
  ऐसी ही समस्या 1971 में कर्पूरी ठाकुर को भी झेलनी पड़ी थी।वे चाहते थे कि उनकी पुत्री की शादी देवघर मंदिर में हो,पर लड़की की मां की जिद पर शादी उनके गांव पितौझिया में हुई।
  मेरी अपनी शादी 1973 में सोन पुर में हुई।मैं भी चाहता था कि शादी मंदिर में हो।पर मेरी भावी पत्नी के पिता की अपनी समस्या थी।
उनकी बड़ी लड़की की दहेजमुक्त आदर्श शादी मंदिर में हुई थी।
इस बार मेरी ससुराल वाले चाहते थे कि उनके घर बारात जाए।
मेरी शादी दहेज मुक्त होनी थी।इसलिए समस्या थी कि बारात का खर्च कहां से आएगा ?
मैंेने बाबू जी को साफ मना कर दिया था कि बारात सजाने के लिए जमीन नहीं बिकेगी। 
हालांकि वे वैसा करने को तैयार थे।
 उन्होंने कहा कि जब मेरे रिश्तेदार और मित्र-परिचित बारात में नहीं जाएंगे तो मैं भी नहीं जाऊंगा।उन्हें मैं कैसे छोड़ दूं ? तुम जाओ शादी कर लो।
मुझे कोई एतराज नहीं।
 फिर क्या था ! मेरी शादी की ‘बारात’ में पटना  लाॅ कालेज  के मेरे  सहपाठी, युवजन सभा के  साथी और सोशलिस्ट नेता तथा  आधा दर्जन विधायक थे ।मेरे दोनों भाई जरूर शादी में थे।कर्पूरी ठाकुर ने एक तरह से समधी की भूमिका निभाई।
  रात में ही बारात के लोग पटना लौट आए।लगे हाथ बता दूं कि उसी साल मेरी अपनी शादी के कुछ ही दिन पहले मैं पटना के लाला लाजपत भवन में नीतीश कुमार के आदर्श विवाह में शामिल हुआ था।
मैंने अपने बड़े बेटे अमित की शादी भी उसी तरह से की।मेरे समधी उदय नारायण सिंह हजारीबाग में वकील हैं।
वे ही लोगों को बताते हैं कि ‘मुझसे  सुरेंद्र जी ने कोई दहेज नहीं ली।’
मेरे छोटे पुत्र अनुपम ने मुम्बई के टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंस से एम.एस.डब्ल्यू. किया है। उसने  ‘नेट’ भी कर लिया है।इन दिनों वह रांची में  एन. जी. ओ. में काम करता है।
उसने कहा है कि वह जब भी शादी करेगा, कोर्ट मैरिज ही करेगा।
कोई तामझाम नहीं।जाहिर है कि मुझे उसके फैसले पर गर्व है।
पर मेरा मानना है कि ऐसी शादियों के लिए जो भी और जहां भी तैयार हो, उन्हें समाज का बढ़ावा और सहयोग मिलना चाहिए ताकि ऐसे कदमों को  सामाजिक स्वीकृति मिले।
  जहां इस देश के अधिकतर सत्ताधारी नेताओं के यहां की  शादियों में अत्यंत कीमती उपहारों की झरी लगा दी जाती है, वहीं बिहार के उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी ने आज अपने पुत्र की दहेजमुक्त शादी करके मिसाल कायम की है।उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसी शादी  से अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिलेगी।
@ --सुरेंद्र किशोर--3 दिसंबर 2017@

   
  


  

 पारस नाथ तिवारी नहीं रहे। पत्रकार ब्रजनंदन जी के बाद
 इतनी जल्दी दूसरा झटका ! सोचा भी न था।
यहां से चले जाने का भला यह भी कोई उम्र होती है !
पर क्या कीजिएगा ! सब विधि का विधान है। 
 पारस नाथ तिवारी को हम सब ‘पारस बाबा’ या सिर्फ ‘बाबा’
कहा करते थे।
लगभग मेरी ही उम्र के थे।फिर भी बाबा  ? बाबा में आदर और प्यार के मिले -जुले भाव थे।
  जिन लोगों ने खुद ही खुद को बनाया हो, उनके प्रति आदर स्वाभाविक ही है।
 दैनिक अखबार ‘अमृत वर्षा’ के संपादक सह मालिक थे।
कभी उन्होंने दक्षिण बिहार से एक साप्ताहिक ‘मंगलवार’ निकाला था।
   मैं पटना से उसमें भी लिखा करता था।बाबा मुझे पारिश्रमिक भी भिजवाते थे।
 मुझे याद है कि जिन  दिनों मैं पटना में ‘पद यात्री’ था, तो उनके ही भेजे गए पारिश्रमिक के पैसे से  मैंने एक सेकेंड हैंड साइकिल खरीदी थी।
 पहले वे धनबाद-बोकारो में सक्रिय थे।समाजवादी और मजदूर नेता के  रूप में।बाद में वे अखबार निकालने लगे।
पटना और  दिल्ली से भी ‘अमृत वर्षा’ का प्रकाशन शुरू हुआ।इन दिनों बाबा दिल्ली में ही रहते थे।यदाकदा  उनसे  फोन पर मेरी बातचीत हो जाया करती थी। 
  जहां तक मुझे याद है, मैंने पहली बार उन्हें पटना में श्रीकृष्ण सिंह के आवास पर देखा था।लोहियावादी समाजवादी श्रीकृष्ण सिंह के पारसनाथ तिवारी करीबी थे।श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पूर्व मंत्री नरेंद्र
सिंह के पिता थे।वे खुद भी सांसद व बिहार में मंत्री रह चुके थे।
 पारस नाथ जी जैसा जीवंत व्यक्ति मैंने बहुत कम देखे हैं।पारस बाबा विपरीत परिस्थितियों में भी कभी घबराते नहीं थे।
किसी से भी डरते नहीं थे।
बड़े से बड़े नेता से भी वे बेबाकी से बातें करते थे।
उन्होंने अपने अखबार में भी नब्बे के दशक में बड़ी हिम्मत से खबरें छपवाईं।
उसको लेकर उन्हें कठिनाइयां भी झेलनी पड़ीं।वह दौर ही ऐसा था।
पर उसकी परवाह किसे थी ?
  बाबा से बात करना इसलिए भी ऊबाई नहीं होता था क्यांेकि वे 
जमीन से जुड़े हुए थे। हिंदी, भोजपुरी और अंग्रेजी शब्दों से  मिश्रित भाषा वे बोलते थे।
  लाइवबिहार.लाइव के राजनीतिक संपादक कन्हैया भेलाड़ी पारसनाथ तिवारी के बारे मंे कहते हैं कि ‘वैसा मस्त आदमी मैंने नहीं देखा।पारस नाथ जी समस्याओं को पराजित कर देना जानते थे।सामने वाले में सोये हुए आत्म विश्वास को जगा देते थे।’
मेरी श्रद्धांजलि।     
  

सरकारी मकानों पर कब्जा कराने वाले अफसरों पर कार्रवाई जरूरी ---


पटना के बहादुर पुर में बिहार राज्य आवास बोर्ड ने बहुत पहले सैकड़ों फ्लैट्स बनवाए ।
  आज उनकी  स्थिति क्या है ? उनकी स्थिति की एक झलक खुद आवास बोर्ड के एक विज्ञापन से मिलती है।वह विज्ञापन इसी 27 नवंबर को स्थानीय अखबार में छपा है।
विज्ञापन में  दो सौ से अधिक फ्लैटों के नंबर प्रकाशित किए गए हैं।
साथ ही, उसी विज्ञापन के जरिए कार्यपालक अधिकारी की ओर से यह नोटिस निकाला गया है कि ‘ इन अनावंटित फ्लैटों में रह रहे अवैध अतिक्रमणकारियों को सूचित किया जाता है कि सूची प्रकाशन के पंद्रह दिनों के भीतर  वर्णित फ्लैटों को खाली कर उन्हें बोर्ड को सौंप दें।अन्यथा, कानूनी प्रक्रिया अपना कर उन्हें खाली करवा दिया जाएगा।’
  उधर इसी बुधवार को यह खबर भी आई कि दाना पुर रेल मंडल के सैकड़ों सरकारी आवास अवैध कब्जे में हैं।
 सवाल यह है कि क्या इतनी अधिक संख्या में फ्लैट्स व मकान पर कब्जा एक दिन  हुआ होगा ? ऐसा नहीं है।इन मकानों पर कब्जे की खबर  देख कर लगता है कि ये फ्लैट्स न हों, मानो फुटपाथ हों !
जो चाहे जब चाहे, कब्जा कर ले ! शासन लाचार !
 क्या संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना ऐसा कब्जा संभव है ?
यह कब्जा क्या सिर्फ इन्हीं दो जगहों  में ही है ?
कत्तई नहीं।बल्कि ऐसी खबरें देश के विभिन्न स्थानों  से आए दिन आती रहती हैं।
 इस समस्या के स्थायी हल के लिए सरकार के पास कौन- कौन से  उपाय हंै ?
 उपाय होंगे ही ।पर वे उपाय अब कारगर नहीं हो पा रहे हैं।अब सरकारों को  कुछ नया सोचना होगा।
  यह तो मानी हुई बात है कि संबंधित अफसरों की सांठगाठ या मौन सहमति के बिना ऐसे अतिक्रमण नहीं हो सकते हैं।
उन अफसरों पर जब तक सबक सिखाने लायक कार्रवाइयां नहीं होंंगी , तब तक सरकारी मकानों पर कब्जे होते ही रहेंगे।
और उसके असली हकदार कठिनाइयां  झेलते रहेंगे।
     एक पुण्य स्मृति ऐसी भी----
कोई नेता अपनी पुस्तक किसी पत्रकार की पुण्य स्मृति में समर्पित करे,यह मैंने पहली बार देखा।
झारखंड के संसदीय कार्य मंत्री सरयू राय ने अपनी नयी पुस्तक ‘समय का लेख’ अपने  पत्रकार मित्र दिवंगत फरजंद अहमद को समर्पित की है।
   एक बड़े नेता और बड़े पत्रकार का यह संबंध अलग ढंग का  लगता है।
जीवन काल और पत्रकारिता के सक्रिय काल में तो कई पत्रकार कई नेताओं बड़े करीबी रहते हैं।पर रिटायर होते ही  आम तौर से एक-दूसरे को भुला देने की परंपरा रही है।पर यहां रिटायर कौन कहे, दिवंगत हो जाने के बाद भी सरयू राय अपने मित्र  पत्रकार को याद कर रहे  हंै।  
  कैसे बढ़े सिद्ध दोषियों की संख्या ----
  अदालती सजाओं का प्रतिशत घट रहा है।यही हाल लगभग पूरे देश का है।पर, अभी दिल्ली का एक नमूना पेश है।
 सिद्ध दोषियों की संख्या कम होने का एक बड़ा कारण है फाॅरेंसिक जांच प्रयोगशालाओं की देश भर में  भारी कमी।
 पूरी दिल्ली में ऐसी सिर्फ एक ही प्रयोगशाला है।
ताजा खबर के अनुसार उस प्रयोगशाला में डी.एन.ए.के करीब 5 हजार नमूने जांच के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
वैसे वहां नमूनों की कुल संख्या 9 हजार हैं।
  याद रहे कि दोषियों को अदालतों से सजा दिलाने में डी.एन.ए.के जांच नतीजे बड़े काम आते हैं।
पर उसके अभाव में अधिकतर मामलों में केस कमजोर हो जाते हैं।
हालांकि अपराधियों के बच जाने के कई और कारण भी हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश है कि किसी की इच्छा के खिलाफ उसके डी.एन.ए.के नमूने नहीं लिए जा सकते।
  इस फैसले का लाभ उठाकर अनेक शातिर अपराधी अपने नमूने नहीं देते।
शासन को चाहिए कि वह उपर्युक्त फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से गुहार करे।    
     आखिर कौन करेगा गंगा की सफाई ?---
यदि मोदी-योगी  की सरकारें गंगा की सफाई नहीं करेंगी तो फिर भला कौन करेगा ?
गाय और गंगा की बात करने वाली भाजपा की केंद्र में बहुमत की सरकार है।उत्तर प्रदेश में भी।यहां तक कि उत्तराखंड में भी।हालांकि भाजपाई ही कौन कहे, समाजवादी नेता डा. राम मनोहर लोहिया ने भी कभी सरकार से मांग की थी कि ‘नदियां साफ करो ।’
 पर पिछली सरकारों ने तो गंगा जैसी बहुमूल्य नदी को जहां-तहां बड़े नाले में परिणत कर दिया।यही आरोप पहले भाजपा लगाती थी।
अब वही सरकार में है तो  कुछ करे।मौजूदा सरकार कुछ तो रही है।नितिन गडकरी ने गंगा रिवर फ्रंट विकसित करने के लिए भारतीय मूल के कुछ विदेशी पूंजीपतियों को तैयार किया है।वह अच्छी बात है।वह काम भी जरूरी है।
पर गंगा के पानी के औषधीय गुणों को बरकरार रखने के लिए क्या हो रहा है ? पटना के पास  गंगा नदी में जो पानी है,क्या वह गंगा जल है ?
या सहायक नदियों और नाले-नालियों का जल है ? क्या गंगा के किनारे बसे नगरों के गंदे पानी को साफ करके उसे गंगा में गिराया जाएगा और उसे ही गंगा जल कह दिया जाएगा ?
 वास्तविक गंगा जल में औषधीय गुण हैं।
गंगा जल पर  19 वीं सदी मंे ब्रिटिश वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैन्किन ने रिसर्च किया था।जांच के बाद उसने पाया था कि गंगा जल के वायरस हैजा फैलाने वाले बैक्टीरिया में घुस कर उसे नष्ट कर देते हैं।
  इनके अलावा भी गंगा जल में अनेक गुण हैं।गंगा नदी के ऊपरी हिस्से में वैसे गुणों वाला गंगा जल मौजूद है।उसे फिर से हासिल करने का अधिकार बिहार और बंगाल के लोगों को कब मिलेगा ?
    उत्तर प्रदेश में  विधान सभा उप चुनाव---
बहुजन समाज पार्टी उप चुनाव नहीं लड़ती।उत्तर प्रदेश की सिकंदरा विधान सभा उप चुनाव भी वह नहीं लड़ रही है।क्या उसका लाभ सपा को मिलेगा ? या कांग्रेस को ?
पिछले आम चुनाव में भाजपा के मथुरा प्रसाद पाल करीब 38 हजार मतों से विजयी हुए थे।बसपा दूसरे स्थान पर थी।
भाजपा ने दिवंगत विधायक के पुत्र
को टिकट दिया है।कांग्रेस के भी उम्मीदवार हैं।
  नगर निकायों के चुनावों में बाजी मार लेने के बाद अब मुख्य मंत्री योगी की परीक्षा सिकंदरा में होगी।
वहां 21 दिसंबर को मतदान होगा और 24 दिसंबर को रिजल्ट।
याद रहे कि इससे पहले के विधान सभा उप चुनावों में बसपा की अनुपस्थिति का लाभ आम तौर पर सपा को मिलता रहा है।
  एक भूली बिसरी याद---
पंडित सुंदर लाल ने ‘भारत में अंग्रेजी राज’ नामक पुस्तक लिखी है।किताब दो भागों में है। अंग्रेजों के छल-कपट के उदाहरण देते हुए उन्होंने लिखा है कि कच्छ के राजा को अंग्रेजों ने यह कह कर डराया कि तुम पर सिंध के मुसलमान और अमीर हमला करने वाले हैं।
यदि तुमने अंग्रेज कंपनी के संरक्षण में आना स्वीकार नहीं किया तो अंग्रेज भी तुम्हारे खिलाफ सिंध के अमीरों को मदद देने को मजबूर हो जाएंगे।
सुंदर लाल ने लिखा कि इस विचित्र न्याय के औचित्य पर बहस करने की आवश्यकता नहीं।न ही यह बताने की आवश्यकता है कि कच्छ पर सिंध के हमले की आशंका बिलकुल झूठ थी।
लाचार होकर सन 1816 में कच्छ के राव ने कंपनी के साथ संधि कर ली।
इस तरह कच्छ की स्वाधीनता समाप्त हो गयी और पश्चिमी भारत में
अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ गया।
पडित सुंदर लाल ने छल कपट से सत्ता हथियाने के कुछ अन्य उदाहरण भी दिए हैं। 
और अंत में---
सन 1967 से पहले कई राजनीतिक दल छोटे जरूर थे,पर उनमें 
नैतिक बल अधिक था। सन् 2017 आते -आते कई राजनीतिक दल आकार में तो बड़े हो चुके हैं,पर उनमें नैतिक बल घट चुका है।
@ 8 दिसंबर 2017 को प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे कानोंकान काॅलम से@



इंदिरा ने कठोरता से ठुकरा दी थी पाक युद्ध बंदियों को छोड़ देने की बुद्धिजीवियों की अपील


           
बंगला देश युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने देश के कुछ शीर्ष बुद्धिजीवियों की इस अपील को कठोरतापूर्वक ठुकरा दिया था कि 93 हजार पाक युद्धबंदियों को जल्द रिहा कर दिया  जाए।
  लेखक व पत्रकार खुशवंत सिंह के नेतृत्व में बुद्धिजीवियों का प्रतिनिधिमंडल इंदिरा गांधी से इस उद्देश्य से मिला था।खुशवंत सिंह तब चर्चित इलेस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया के संपादक थे।
खुशवंत ने अपने संपादकीय कौशल से वीकली का सर्कुलेशन 60 हजार से बढ़ा कर 4 लाख कर दिया था।इसको लेकर उनका बड़ा दबदबा था।
पर इंदिरा ने उस दबदबे की परवाह नहीं की।
इदिरा गांधी से उस मुलाकात का विवरण खुद खुशवंत सिंह ने ईमानदारी से लिखा है।
 उनके अनुसार ‘एक मुलाकात के दौरान मैंने इंदिरा गांधी का गरम मिजाज देखा।मैं पाकिस्तानी युद्धबंदियों की रिहाई की मांग करने एक प्रतिनिधि मंडल लेकर उनके पास गया था।प्रतिनिधिमंडल में अमेरिका में हमारे भूतपूर्व राजदूत गगन विहारी मेहता, प्रसिद्ध उर्दू लेखक कृशन चंदर और ख्वाजा अहमद अब्बास थे।
    खुशवंत सिंह ने लिखा कि मैं उनसे कुछ कहूं, उसके पहले ही इंदिरा जी ने तपाक से मुझे कहा ‘मिस्टर सिंह, आपने पाकिस्तान के युद्धबंदियों के बारे में जो लिखा है ,वह सरकार के लिए अत्यधिक परेशानी का सबब बना है।’
मैंने भी तपाक से जवाब दिया,‘यही तो मेरा उद्देश्य था।
मुझे इस बात की खुशी है कि मैंने आपकी सरकार को परेशानी में डाला।’
इस पर इंदिरा गांधी ने बड़ी तिक्तता से खुशवंत से कहा कि ‘आप अपने को शायद महान संपादक मानते हैं,पर आपको राजनीति का क ख ग नहीं मालूम।’ खुशवंत का जवाब था, ‘मैं मानता हूं कि मैं राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानता।लेकिन नैतिकता के बारे में जरूर जानता हूं।जो नैतिक दृष्टि से गलत है , वह राजनीतिक दृष्टि से सही कैसे हो सकता है ?’
  इस पर  इंदिरा जी ने कहा कि ‘उपदेश के लिए धन्यवाद !’
यह कहते हुए प्रधान मंत्री ने खुशवंत की ओर से मुंह फेर लिया।
 अब गगन विहारी  की बारी थी।
वयोवृद्ध मेहता बोलना शुरू ही कर रहे थे कि श्रीमती गांधी ने बड़ी रुखाई से उन्हें टोकते हुए कहा कि ‘मैं आपसे कुछ भी सुनना नहीं चाहता।मुझे आपके अमेरिका समर्थक दृष्टिकोण का पता है।’
इस पर बूढ़े गगन विहारी ने अपने को अत्यधिक अपमानित महसूस किया।
कृशन चंदर और अब्बास की बातों पर तो उन्होंने कोई ध्यान ही नहीं दिया।मशहूर काॅलम लेखक और फिल्म निर्माता अब्बास ने भी मेहता की तरह ही महसूस किया।
  पर वह इंदिरा गांधी ही थीं जो किसी तरह के दबाव में नहीं आने वाली थीं।बंगला देश युद्ध को लेकर जब वह अमेरिका के दबाव में नहीं आईं तो किसी और का कितना महत्व था ?
याद रहे कि 1971 के बंगला देश मुक्ति संग्राम के समय अमेरिका ने अपनी नेवी का सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी में उतार दिया था।
तब यह कहा गया था कि उसका उद्देश्य पूर्वी पाकिस्तान से अमेरिकी नागरिकों को निकालना था।
पर, 2011 में मिले गुप्त अमेरिकी दस्तावेज से यह पता चला कि निक्सन सरकार का उद्देश्य भारतीय सेना को निशाना बनाना था।
इसके बावजूद इंदिरा सरकार ने बंगला देश को आजाद करा ही दिया।
जुलाई, 1972 में भारत-पाक के बीच शिमला समझौता हुआ।
उस समझौते के जरिए पाक राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत सरकार के साथ शांति कायम रखने  का आश्वासन दिया था।
इस द्विपक्षीय समझौते से भारत सरकार ने यह धारणा बनाई थी कि 
इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ का वह प्रस्ताव निरस्त हो गया है जिसमें कश्मीर में जनमत संगंह कराने की बात कही गयी थी।
  यह और बात है कि भुट्टो ने बाद में समझौते की धज्जियां उड़ा दी और अपना वादा नहीं निभाया।हालांकि 93 हजार युद्ध बंदी शिमला समझौते के बाद ही रिहा किए जा सके थे।
 यदि इस देश के कुछ बद्धिजीवियों के कहने पर इंदिरा ने पहले ही युद्ध बंदियों को छोड़ दिया होता तो भुट्टो जैसा जिद्दी नेता शिमला समझौता क्यों करता ? शिमला समझौता हुआ तो यह भी माना गया कि  पाक ने बंगला देश के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया। 
@फस्र्टपोस्ट हिंदी में 19 नवंबर 2017 को प्रकाशित मेरा लेख@



आकाशवाणी-दूर दर्शन की खबरों की स्क्रिप्ट पी.एम.को नहीं दिखाने के कारण छिन गया था गुजराल का मंत्रालय



       आकाशवाणी -दूरदर्शन के हर समाचार बुलेटिन को प्रसारित करने से पहले प्रधान मंत्री को दिखा लेने के काम में असमर्थता व्यक्त करने के कारण 1975 में आई.के.गुजराल से सूचना व प्रसारण मंत्रालय छिन गया था।
  बाद में डी.एम.के.के मंत्रियों को सरकार से निकालने से इनकार कर देने के बाद 1998 में गुजराल का प्रधान मंत्री पद छिन गया था।ऐसे थे आई.के.गुजराल।
उनका 1919 में जन्म और 2012 में निधन हो गया।वे अपने ढंग से जिये।
 हालांकि बिहार को लेकर गुजराल ने कुछ समझौते भी किए थे।
 बात 1975 की है।तब इंदर कुमार गुजराल सूचना व प्रसारण मंत्री थे।
 तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के संयुक्त सचिव बिशन टंडन उन दिनों अपनी डायरी लिखते थे।बाद मंे उस  डायरी कव प्रकाशन भी हुआ।
 टंडन साहब ने 21 जून 1975 को अपनी उस डायरी मेें गुजराल से संबंधित प्रकरण को साफ -साफ ढंग से लिखा ।
 ‘आज गुजराल से पता चला कि उन्हें संजय @गांधी@ने बुला कर बहुत फटकारा कि कल की रैली का प्रचार ठीक से नहीं हुआ।प्रधान मंत्री के पक्ष में जो अभियान चल रहा है,उसका भी प्रचार अपर्याप्त है।
गुजराल को बुरा लगा कि  संजय उन्हें डांटे -फटकारे।
बुलाया गया था उन्हें प्रधान मंत्री के नाम पर ,किंतु मिलने को कहा गया संजय से।संजय ने गुजराल से कहा कि समाचार बुलेटिन प्रधान मंत्री आवास पर भेजा जाए।
इस पर गुजराल ने संजय गांधी से कहा कि कार्य की दृष्टि से अच्छा होगा कि किसी अधिकारी को इस काम के लिए मनोनीत कर दिया जाए।
वह आकाशवाणी केंद्र में ही रहें।उन्हें सब बुलेटिन दिखा दिए जाएंगे।उन्होंने शारदा का नाम सुझाया। पर संजय गांधी ने इस काम के लिए बहल की ड्यूटी लगा दी।
  बिशन टंडन की डायरी के अनुसार प्रधान मंत्री से भी उनकी जो भंेट हुई, वह अप्रिय ही रही।
प्रधान मंत्री ने कहा कि आज मोरारजी  के घर प्रदर्शन का आयोजन होगा,उसका बहुत व्यापक प्रचार होना चाहिए।
  प्रधान मंत्री ने यह भी इच्छा प्रकट की कि वे रेडियो और टी.वी.स्क्रिप्ट देखना चाहेंगी।सिर्फ इसी घटना से संबंधित नहीं ,बल्कि हर बुलेटिन प्रसारित होने से पहले मुझे दिखाया जाए।
   इस पर गुजराल ने प्रधान मंत्री से कहा कि स्क्रिप्ट बुलेटिन आदि तो सामान्यतः मैं भी प्रसारण से पहले कभी नहीं देखता।
इस पर प्रधान मंत्री ने बिगड़ते हुए कहा कि यदि आप पहले नहीं देखते तो सूचना मंत्री किस बात के हैं ?
खैर आप देखें या न देखें,प्रधान मंत्री यह सब देखना चाहती हैं।
 बाद में पता चला कि 20-25 आदमी मोरारजी के घर गए।कुछ लोगों ने पथराव किया।पर जब तक मोरारजी बाहर निकले,वे सब गायब हो गए।
पता नहीं इसका कितना रेडियो-टीवी पर प्रचार हुआ ,पर गुजराल शेषन से अपना दुखड़ा रो रहे थे।मैं चुपचाप सुन रहा था।’
  यह सब उन दिनों हो रहा था जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का रायबरेली से लोक सभा कव चुनाव रद कर दिया था।सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक तो लगाई,पर इंदिरा गांधी को सदन में मतदान करने से रोक दिया।
  इस राजनीतिक उथल -पुथल की स्थिति में एक तरफ जेपी और प्रतिपक्षी दल प्रधान मंत्री से इस्तीफे की मांग कर रहे थे,दूसरी ओर कांग्रेस इंदिरा गांधी के पक्ष में अभियान चला रही थी।
  25 जून 1975 की रात में आपातकाल लग गया और 28 जून को विद्याचरण शुक्ल ने नये सूचना व प्रसारण मंत्री का पद भार संभाल लिया।
उससे पहले टंडन ने अपनी डायरी में लिखा कि ‘शारदा ने यह बताया कि प्रधान मंत्री आवास पर पूरा कंट्रेाल संजय ने अपने हाथ में ले लिया है।’
  गुजराल जब 1997 में संयुक्त मोर्चा सरकार के  प्रधान मंत्री बने तो उन्हें कुछ ही महीनों में नाहक प्रधान मंत्री पद से हटवा दिया गया।यह काम तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने किया।
 उन दिनों जस्टिस एम.एल.जैन आयोग की रपट आई थी।
रपट में राजीव गांधी की हत्या के लिए डी.एम.के. को जिम्मेदार ठहरा दिया गया था।हालांकि जैन आयोग ने उसका कोई सबूत नहीं दिया था।
याद रहे कि 1991 में तमिल नाडु में राजीव गांधी की लिट्टे द्वारा हत्या कर दी गयी थी।हत्या की परिस्थियों की जांच के लिए जैन के नेतृत्व में न्यायिक जांच आयोग बना था।
जैन आयोग ने अंतरिम रिपोर्ट दी थी।
पर सीताराम केसरी समझ रहे थे कि गुजराल के हटने के बाद खुद उनके प्रधान मंत्री बनने के चांस होंगे।
केसरी ने पहले गुजराल से कहा कि वे डी.एम.के. के तीनों मंत्रियों को बर्खास्त कर दें।गुजराल जब नहीं माने तो केसरी ने मोर्चा सरकार से कांग्रेस का समर्थन वापस ले लिया।
1998 में फिर से लोक सभा का चुनाव हुआ।अटल बिहारी वजपेयी के नेतृत्व में राजग की सरकार बन गयी।
@सुरेंद्र किशोर -हिंदी फस्र्टपोस्ट@
@ 30 नवंबर 2017@
   
       

Sunday, December 3, 2017

उप प्रधान मंत्री पद से सरदार पटेल ने की थी अपने इस्तीफे की पेशकश


  सरदार पटेल ने 1948 में  उप प्रधान मंत्री पद 
से अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी थी।
इस संबंध में दुःखी मन से उन्होंने गांधी जी को 12 जनवरी 1948 को पत्र लिखा था।
पर गांधी की मंजूरी नहीं मिलने के कारण वह इस्तीफा नहीं दे सके। सरदार बल्लभ भाई पटेल गांधी युग के वैसे कुछ नेताओं में शामिल थे जो सिर्फ सत्ता सुख भोगने के लिए नहीं बल्कि अपने सिद्धांतों पर अड़े रहते हुए जन सेवा के लिए सरकार में जाते थे।
किसी कारणवश यदि वे जन सेवा नहीं कर पाते थे तो उनका पद खुद उन्हें बोझ लगने लगता था।
सरदार पटेल ने गांधी जी को लिखा कि ‘काम का बोझ इतना अधिक है कि उसे उठाते हुए मैं दबा जा रहा हूंं।
मैं समझ चुका हूं कि अब और अधिक समय तक बोझ उठाने से देश का भला नहीं होगा,बल्कि इसके विपरीत देश का नुकसान होगा।’
 उन्होंने लिखा कि ‘जवाहर लाल पर और भी अधिक बोझ है।उनके हृदय में दर्द जमा हो रहा है।मेरी आयु के कारण मैं उनका बोझ हल्का करने में सहायक नहीं हो पाऊंगा।
मौलाना@अबुल कलाम आजाद@मेरे कार्य से नाखुश हैं तथा मुझे यह विचार सहन नहीं हो पा रहा कि हर बार आपको मेरा बचाव करना पड़े।
  इन परिस्थितियों में यदि मुझे शीघ्र मुक्त कर दें तो इससे मेरा और देश का भला होगा।
पटेल ने लिखा कि मैं वत्र्तमान में जिस ढंग से काम कर रहा हूं,उससे भिन्न रूप से कार्य नहीं कर सकता।
यदि मैं पद नहीं छोड़ता हूं और आंख बंद कर इससे चिपका रहता हूं तो लोग यह सोचेंगे कि मैं सत्ता सुख के लिए ऐसा कर रहा हूं।

 ऐसी स्थिति में मुझे मुक्ति दिलाई जानी चाहिए।मैं जानता हूं कि आपके उपवास के समय इन बातों पर विचार नहीं किया जा सकता।
लेकिन मैं आपका उपवास समाप्त करने में सहायक नहीं हो पा रहा हूं।
 इसलिए मैं किंकत्र्तव्यविमूढ़ हो रहा हूं।
 यदि आप शीघ्र उपवास समाप्त कर दें और इस संबंध में  
निर्णय करें तो आपके उपवास के कारण भी दूर हो जाएंगे।
  13 जनवरी से 18 जनवरी 1948 तक गांधी जी का उपवास जारी रहा।विभिन्न समुदायों में शांति कायम करने की जरूरत पर जोर डालने के लिए गांधी जी ने उपवास किया था।
 जब दोनों पक्षों के लोगों ने शांति का भरोसा दिया तो उन्होंने उपवास खत्म कर दिया।
 देश के बंटवारे की तनावपूर्ण व हिंसक पृष्ठभूमि में उन दिनों के अधिकतर लोग जहां गांधी जी के उपवासों को तोड़वाने की कोशिश में लगे थे,वहीं कुछ लोग यह भी नारा लगा रहे थे कि ‘गांधी को मरने दो।’
 वैसे ही लोगों ने 20 जनवरी 1948 को गांधी की प्रार्थना सभा के पास बम फोड़ा और 30 जनवरी को तो उनकी हत्या ही कर दी।
 सांप्रदायिक उपद्रवों से निपटने के तरीके के सवाल पर केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी मतभेद था।
शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद और उप प्रधान मंत्री  सह गृह मंत्री सरदार पटेल आमने -सामने थे।
  विभिन्न मुददों पर पटेल की अपनी अलग राय रहती थी।
अपनी राय से अलग हट कर वे गद्दी से चिपके नहीं रहना चाहते थे।इसीलिए उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की थी।
 सवाल है कि आज के किसी बड़े नेता को ऐसी समस्या 
झेलनी पड़ती जो पटेल को झेलनी पड़ी थी तो  उस स्थिति में आज के सत्ताधारी नेता क्या करते ?
इस सवाल पर सोचिए और बदली हुई राजनीति पर थोड़ी देर के लिए चिंतन कर लीजिए।
उसके बाद पटेल के बड़प्पन का अनुमान लग जाएगा। 
--सुरेंद्र किशोर  
@ फस्र्टपोर्ट हिंदी-से अक्तूबर 2017 @

  
   

Friday, December 1, 2017

अविरलता के बिना गंगा में निर्मलता लाने का निरर्थक प्रयास


भारतीय मूल के दो ब्रिटिश उद्योगपति अनिल अग्रवाल और रवि मेहरो़त्रा गंगा घाटों को संुदर बनाने का काम करेंगे।
‘वेदांता’ के अनिल अग्रवाल पटना के रिवर फ्रंट का रख रखाव करेंगे तो रवि मेहरोत्रा यही काम कानपुर में करेंगे।
गंगा और पटना से भावनात्मक लगाव रखने वाले अग्रवाल पटना के मिलर स्कूल के छात्र रह चुके हैं।
लंदन गए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को अग्रवाल और मेहरोत्रा ने यह आश्वासन दिया है।
 मंत्री और उद्योगपतियों की यह पहल सराहनीय है।
पर गंगा को निर्मल बनाने के लिए जो मूल काम होना चाहिए,उसकी जरूरत नरेंद्र मोदी सरकार भी शायद नहीं समझ सकी है।
 या,  यह काम उसके वश में भी नहीं है। कभी मुगल सम्राट अकबर गंगा नदी का ही पानी पीता था।पर, आज स्थिति यह है कि गंगा नदी का पानी पीने कौन कहे ,छूने लायक भी नहीं है।
इसे जहरीला बना दिया गया है।
शायद ऋषिकेश के पास  गंगा की स्वच्छता अपवाद है। 
 इसे जहरीला बनाने में आजादी के बाद की सरकारों का पूरा योगदान रहा है।अंग्रेजों के जमाने में भी इसकी स्थिति इतनी भयानक नहीं थी।
बचपन में मैंने सारण जिले के दिघवारा के पास गंगा की निर्मलता देखी थी।
   यदि गंगा जैसी दिव्य औषधीय गुणों वाली नदी किसी दूसरे
देश में होती तो इसे वहां के लोग अगली पीढि़यों के लिए संभाल कर रखते।
  अन्य बातों के अलावा दरअसल गंगा नदी पर डैम बना कर इसकी प्राकृतिक धारा को बाधित कर दिया गया है।
 जब नदी सूख जाएगी, उसमें नाले का गंदा पानी गिरने लगेगा तो उसकी जो हालत होगी,वही आज गंगा के साथ हो रहा है।
चाहिए तो यह था कि गंगा को छुए बिना उसकी सहायक नदियों में वर्षा जल को रोक कर उससे सिंचाई का काम किया जाता।
फिर भी गंगा किनारे वाले राज्यों खास कर उत्तराखंड को यदि आर्थिक नुकसान होता तो उसकी क्षतिपूत्र्ति 
केंद्र सरकार कर सकती थी।
  इससे गंगा की अविरलता कायम रहती।
आज यदि गंगा निर्मल नहीं है तो सिर्फ उसके रिवर फ्रंट को चमकाने से क्या फायदा ?
  अविरलता के बिना नाले की दुर्गंध लेने कौन जाएगा रिवर फ्रंट तक  ?
  कुछ नेताओं के उपेक्षित बाल-बच्चे----
इस देश के कई बड़े नेताओं के बाल-बच्चों की काली करतूतों को देखकर डा.राम मनोहर लोहिया की याद आती है।
डा.लोहिया कहा करते थे कि राजनीतिक जीवन बिताने का निर्णय  करने वालों को शादी नहीं करनी चाहिए।
खुद डा.लोहिया ने भी शादी नहीं की थी।
 हालांकि सभी नेताओं की संतानों में ऐसा भटकाव नहीं देखा जाता । पर अनेक नेताओं के बाल -बच्चों के  भटक जाने की खबरें आती रहती हंै ं।
 आजादी के तत्काल बाद गठित केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक दक्षिण भारतीय सदस्य को ऐसी ही परेशानी झेलनी पड़ी थी।
उनके बेलगाम पुत्र ने उत्तर प्रदेश में एक हत्या कर दी।
किसी तरह उसे जमानत दिलवा कर विदेश भिजवा दिया गया था।
यह और बात है कि बाद में अपने जीवन में उसने अच्छे काम किए। 
ऐसी घटनाओं का  सबसे बड़ा कारण यह है कि सार्वजनिक जीवन इतनी व्यस्तता वाला जीवन होता है कि नेताओं को अपने बाल-बच्चों को उचित शिक्षा और समुचित संस्कार देने की फर्सत ही नहीं मिलती।यह तो ईमानदार नेताओं की बात हुई।
 पर यदि नेता भ्रष्ट हो और उसे सत्ता भी मिल जाए तब तो उनके बाल -बच्चों के बिगड़ने का  बहुत अधिक चांस रहता है।
 ऐसे अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं।
 कुछ ऐसे नेताओं को जानता हूं जो अपनी संतान के अपराध व उदंडता के कारण खुद भी भारी पीड़ा झेलते रहे हैं।पर वे कहें तो किससे  ? यहां वैसे अभिभावकों की बात नहीं की जा रही है जो जानबूझ कर अपनी संतानों को विवादास्पद रास्तों पर ढकेल देते हैं।
ऐसे कटु अनुभवों को देखते हुए वे लोग सबक ले सकते हैं  जिनकी अभी शादी नहीं हुई है और वे सार्वजनिक जीवन को अपनाना चाहते हैं। 
   जनेऊ के बारे में कुछ बातें ऐसी भी ----
मैं खुद तो नियमित रूप से जनेऊ नहीं पहनता, पर इतना भी ‘क्रांतिकारी’ नहीं हूं कि यह कह दूं  कि ‘जनेऊ एक अश्लील धागा है।’
  हां, विनोबा भावे की एक बात मुझे ठीक लगती है।उन्होंने कहा था कि जनेऊ के दो ही उपयोग हैं - एक तो उसमें चाबियां बांधी जा सकती हैं और उससे पीठ खुजलाई जा सकती है।
याद रहे कि विनोबा जी भी जन्मना ब्राह्मण थे।
मैंने बचपन में अपने गांव में जनेऊ के दो अन्य उपयोग भी देखे हैं।
 मेरे पड़ोस के  बाबा लगते थे।वे पत्ते तोड़ने के लिए बांस पर चढ़ गए।बहुत मोटा जनेऊ पहनते थे।एक बांस से गिरे ,पर उनका जनेऊ दूसरे बांस में फंस गया।
गांव- जवार में चर्चा हो गयी कि फलां बाबा को जनेऊ ने बचा लिया।
दरसल बांस के निचले हिस्से में बांस की नुकीली जड़ेंं होती हंै ।उस पर गिरने से बाबा को जनेऊ ने बचा लिया था।
  एक अन्य अवसर पर एक किसान ने रस्सी से गेहूं का ‘बोझा’ बांधा था।
रस्सी टूट गयी।आसपास कोई रस्सी नहीं मिली।उसने अपने जनेऊ का सदुपयोग कर लिया।    
  एक भूली-बिसरी याद-----
जेपी आदोलन व आपातकाल की पृष्ठभूमि में सन् 1977 में लोक सभा का चुनाव हुआ था।जनता पार्टी की भारी जीत हुई थी।
पहली बार केंद्र की सत्ता से कांग्रेस का एकाधिकार टूटा था।उस जीत का सर्वाधिक श्रेय जयप्रकाश नारायण को मिला था।प्रधान मंत्री का नाम तय करने में भी जेपी-कृपलानी  की प्रमुख भूमिका थी।
  पर केंद्र की मोरारजी सरकार ने थोड़े ही दिनों में जेपी को निराश कर दिया था।
जेपी  देसाई की शासन -पद्धति से संतुष्ट नहीं थे।
वह प्रकट हुआ था जेपी के एक इंटरव्यू से ।जय प्रकाश नारायण ने  1978 में एक हिंदंी साप्ताहिक से बातचीत में यहां तक कह दिया कि 
‘यदि अब देश में कोई हिंसक आंदोलन भी होगा तो मैं उसका विरोध नहीं करूंगा।’
यह टिप्पणी जेपी की खिन्न मनोदशा को अभिव्यक्त कर रही थी।
याद रहे कि मुसहरी में हुए नक्सलियों के हिंसक आंदोलन की पृष्ठभूमि में 1969 में जेपी ने वहां शांति स्थापित करने के लिए  अभियान चलाया था।
1974 के छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए  जेपी तभी तैयार हुए थे जब छात्र-युवा नेताओं ने उन्हें यह आश्वासन दिया था कि आंदोलन में शांति बनी रहेगी।
 यह प्रकरण इसलिए भी मौजूं है क्योंकि अपने देश में कई बार ऐसा हुआ कि राजनीतिक दल लुभावने नारे के बल पर सत्ता में तो आ गए पर  गददी मिलते ही अपने वायदे भूल गए।
   लीज पर लेने का प्रावधान सही----
बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकार @संशोधन@विधेयक में जमीन लीज पर लेने या खरीदने का प्रावधान सही और मौजूं है ।पर, मुआवजा समुचित मिलना चाहिए।जिस तरह नेशनल हाईवे के लिए केंद्र सरकार देती है।
इससे बिहार में उद्योग के लिए जमीन मिलने की संभावना बढ़ेगी।
इसके साथ ही कानून -व्यवस्था में सुधार जारी रहा तो औद्योगिकीकरण भी बढ़ेगा।
बिजली की व्यवस्था तो सरकार कर ही रही है।  
    और अंत में----
 उत्तर प्रदेश में नगर निकायों के चुनाव हो चुके हैं।रिजल्ट 
बाकी है।
एग्जिट पोल के नतीजे बता रहे हैं कि 16 नगर निकायों में से 15 में भाजपा को बहुमत मिलेगा।
 प्रदेश की योगी सरकार ने अब तक ऐसा कोई चैंकाने वाला काम नहीं किया है जिससे यह लगेगा कि वह रिजल्ट उन कामों का नतीजा है।हां, एक बात हो सकती है।भाजपा की  जीत होगी तो माना जाएगा कि शायद लोगों ने योगी सरकार की उपलब्धियों से अधिक उसकी मंशा पर अधिक भरोसा किया होगा।    
@ 1 दिसबंर 2017 को प्रभात खबर -बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@ 


Thursday, November 30, 2017

सत्तर के दशक में पटना विश्व विद्यालय


  इतिहासकार डा.ओम प्रकाश प्रसाद ने ठीक ही लिखा है कि पटना विश्व विद्यालय में दाखिला लेने से ही समाज में प्रतिष्ठा बढ़ जाती थी। 
  हालांकि 1972 जब मैंने पटना लाॅ कालेज में दाखिला लिया,तब तक वैसी बात नहीं रह गयी थी। फिर भी चीजें उतनी बिगड़ी भी नहीं थी।कभी ‘पूरब का आॅक्सफोर्ड’ कहलाने वाले इस विश्व विद्यालय में मेरे जमाने में  क्लासेज होते थे और छात्रावासों में पढ़ने के समय छात्र सिर्फ पढ़ा करते  थे।
परिसर में अपेक्षाकृत शांति रहती थी।
हां, इस विश्व विद्यालय से जुड़े लाॅ कालेज में थोड़ी स्थिति भिन्न जरूर थी।थोड़ी उन्मुक्तता थी।
 फिर भी वहां भी रेगुलर क्लासेज होते थे ।यहां तक कि मूट कोर्ट भी।
  हां, मेरे जैसे कुछ छात्रों को पढ़ने में रूचि कम थी।राजनीति में अधिक थी।
इसलिए हाजिरी लगा कर हम पास की  चाय  दुकान पर अड्डा मारने और राजनीतिक गपशप करने चले जाते थे।
 इस काम में मुख्य तौर पर मेरे साथ होते थे दीनानाथ पांडेय जो इन दिनों कलिम्पांग में वकालत करते हैं।
  दरअसल तब तक मैं सक्रिय राजनीति में था और सोद्देश्य पत्रिकाओं के लिए लिखता भी था।
  मैंने लाॅ कालेज में दाखिला इसलिए भी कराया था ताकि जरूरत पड़ने पर रोजी -रोटी  के लिए वकालत कर सकूं।
  उससे पहले राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप में मैं छपरा के  वकील रवींद्र प्रसाद वर्मा के यहां रहता था।वर्मा जी एक समर्पित लोहियावादी थे और कम में ही गुजारा कर लेने की आदत मैंने उनसे सीखी थी।
अब वह नहीं रहे।पर मैं इतना कह सकता हूं कि वह यदि किसी बहुसंख्या वाली जाति से होते तो कम से कम विधायक तो जरूर ही हो गए होते ।
 खैर धीरे -धीरे  मैंने यह महसूस किया कि न तो राजनीति मेरे वश की बात है और न ही वकालत।इसलिए लाॅ कालेज में तीन साल पढ़ा जरूर , पर कोई परीक्षा नहीं दी।
प्रथम वर्ष की परीक्षा नहीं देने के बावजूद सेकेंड और बाद में थर्ड इयर में प्रवेश ले लेने की छूट थी।
 इस तरह मैं करीब तीन साल तक कभी के  ‘पूरब के आॅक्सफोर्ड’ कहलाने वाले विश्व विद्यालय का छात्र होने का सुख हासिल करता रहा। आपातकाल में सी.बी.आई.मेरी तलाश में लाॅ कालेज तक भी गयी थी।
सी.बी.आई. बड़ौदा डायनामाइट केस की जांच कर रही थी।उसे मेरे सिर्फ एक ही पक्के ठिकाने का पता चल सका था यानी पटना लाॅ कालेज।  
 लाॅ कालेज में  प्रेम प्रकाश सिंहा और महितोष मिश्र जैसे सिरियस छात्र भी मेरे मित्र थे और अक्षय कुमार सिंह जैसे छात्र नेता भी।
इन्हें राजनीति में गहरी रूचि थी।प्रेम प्रकाश तो शिक्षा अधिकारी बने थे,पर महितोष से बाद में कोई संपर्क नहीं रहा।
 कुछ अन्य  मित्र भी याद आते हैं जिनसे संपर्क नहीं रहा।वैसे लव कुमार मिश्र से लगातार संपर्क रहता है क्योंकि वह भी पत्रकारिता में ही हैं।
मेरे सहपाठी दुबले -पतले किंतु तेजस्वी अशोक जी
भी थे जो पटना हाईकोर्ट में वकालत करते हैं।कभी -कभी उनसे फोन पर बात हो जाती है।कभी देखना है कि वे अब भी उतने ही दुबले हैं क्या ?
अशोक जी  विदेशी लहजे में फर्राटे से अंग्रेजी बोलते थे।
तब लाॅ कालेज में बी.एन.श्रीवास्तव  प्राचार्य थे।पोद्दार साहब,प्रयाग सिंह  और हिंगोरानी जी प्रमुख  शिक्षकों में थे। 
 1972 से पहले भी पटना विश्व विद्यालय के छात्रावासों में मैं जाता  था राजनीतिक चर्चाओं के लिए।
उन दिनों की एक खास बात मुझे याद है ,वह यह कि शाम में पढ़ाई के समय छात्रावासों में कोई बाहरी व्यक्ति जाकर गपशप नहीं कर सकता था।
  छात्रावासों के मेरे समाजवादी मित्र राम उदगार महतो,राम नरेश शर्मा ,राज किशोर सिंहा और सुरेश शेखर याद आते हैं।
 सुरेश प्रसाद सिंह उर्फ सुरेश शेखर ने 1966 में मैट्रिक में पूरे बिहार में टाॅप किया था।वह डा.लोहिया से प्रभावित थे।
 प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले सुरेश अत्यंत तेजस्वी और दबंग थे।
उन्होंने तब के युवा तुर्क चंद्र शेखर से प्रभावित होकर अपने नाम के साथ शेखर जोड़ा था।बाद में उन्हें राजनीति से निराशा हुई और रिजर्व बैंक की नौकरी में चले गये।अब वह इस दुनिया में नहीं रहे।वह नीतीश कुमार के दोस्त  थे।
  बातें तो बहुत है।फिलहाल इतना ही।
हां,एक इच्छा जरूर है । काश ! पटना विश्व विद्यालय में एक बार फिर कम से कम 1972 का भी माहौल कोई लौटा देता तो वह राज्य का बड़ा कल्याण करता।उससे पहले जाना तो बहुत कठिन काम है।  


  



मंडल आरक्षण लागू कर गोल तो कर दिया पर अपनी टांगंे तुडव़ा लीं वी.पी.ने


         
सन् 1990 में ‘मंडल आरक्षण’ लागू करने के बाद तत्कालीन प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कहा था कि ‘ मैंने गोल तो कर दिया,पर अपनी टांगें तुड़वा लीं।’
हालांकि सच यह भी है कि उस एक फैसले का ऐसा राजनीतिक असर हुआ कि उसके बाद कभी कांग्रेस को लोक सभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका।
  साथ ही मंडल आरक्षण के खिलाफ शुरू हुए मंदिर आंदोलन के
कारण भाजपा को केंद्र में सत्ता मिलनी शुरू हो गयी।
   मंडल आरक्षण के कारण तब न सिर्फ वी.पी.सिंह की सरकार गिरा दी गयी थी बल्कि राजनीतिक तौर पर खुदवी.पी.हाशिए पर चले गए।
एक तरफ जहां आरक्षण विरोधी लोग उनके कट्टर दुश्मन बन गए तो दूसरी ओर आरक्षण समर्थकों ने वी.पी.को नहीं स्वीकारा।क्योंकि वे उनके ‘बीच’ से नहीं थे।
 इतना ही नहीं, जो वी.पी.सिंह  1987-89 के ‘बोफर्स अभियान’ के जमाने में  मीडिया के अधिकतर हिस्से के हीरो थे, वे मंडल आरक्षण के बाद खलनायक बन गए।
मीडिया के बड़े हिस्से के उनके प्रति बदले रुख से वी.पी.इतना दुःखी हुए थे कि उन्होंने 1996 में प्रधान मंत्री का पद ठुकरा दिया।ज्योति बसु से लेकर संयुक्त मोर्चा के कई नेता उन्हें प्रधान मंत्री बनाने के लिए दिल्ली में खोज रहे थे और वी.पी. भूमिगत हो गए थे।
  इस संबंध में वी.पी.सिंह ने बाद में पत्रकार राम बहाुदर राय को बताया कि ‘जब मैंने  मंडल आयोग की सिफारिशों को  लागू किया तो मीडिया का मेरे प्रति दृष्टिकोण बदल गया।वे लोग कहने लगे कि विश्वनाथ प्रताप सिंह पद लोलुप हैं।याद दिलाया गया कि मैंने कहा था कि मैं प्रधान मंत्री पद नहीं लूंगा।जो लोग तब 1989 के जनादेश   की व्याख्या मेरे पक्ष में करते थे ,वे ही मुझे पद लोलुप कहने लगे।उन लोगों को यह कहां मालूम है कि लालकृष्ण आडवाणी ने मेरी पत्नी को कई बार फोन किया था कि मैं जनता दल संसदीय दल के नेता के पद को स्वीकार कर लूं।
इसलिए इस बार यानी 1996 में मैं यह नहीं चाहता था कि मेरे बाल -बच्चों को यह सुनना पड़े कि तुम्हारे पिता पद लोलुप थे।
मैं चाहता था कि वे  यह कह सकें कि मेरे पिता ने प्रधान मंत्री पद ठुकराया भी।’
  उत्तर प्रदेश के डैया रियासत में वी.पी.सिंह का 25 जून 1931 को जन्म हुआ था।पांच साल की उम्र में माण्डा रियासत के राजा ने विश्वनाथ को दत्तक पुत्र के रूप में अपना लिया।
  उथल -पुथल वाला जीवन जीने वाले विश्वनाथ जी 1969 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य बने थे।
बाद में तो वे मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्री भी बने।
वी.पी. का  विवादों से लगातार संबध रहा।उन्होंने उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री पद भी विवादास्पद परिस्थितियों में छोड़ा।
केंद्रीय मंत्री के रूप में भ्रष्टाचार के सवाल पर उनका प्रधान मंत्री राजीव गांधी से लंबा विवाद चला।
 पर जब 1989 के लोक सभा चुनाव के बाद  गैर कांग्रेसी सरकार के गठन का वक्त आया तो भी विवाद उठा।
   जनता दल संसदीय दल ने पहले चैधरी देवी लाल को नेता चुना और उसके तुरंत बाद देवी लाल ने अपनी पगड़ी 
 वी.पी.के सिर पर बांध दी।
उससे पहले देवी लाल और वी.पी. के बीच अकेले में दिलचस्प संवाद हुआ था।
 मंच पर पेश होने वाले राजनीतिक नाटक का स्क्रिप्ट तैयार करते समय देवीलाल ने वी.पी.सिंह को व्यक्तिगत बातचीत में कहा कि ‘नेता पद के लिए पहले मेरे नाम का प्रस्ताव पास हो जाएगा,फिर मैं मना कर दूंगा और आप हो जाइएगा।’
इस पर वी.पी.ने उनसे कहा कि आपको मना करने की क्या जरूरत है ?
आप प्रधान मंत्री बनिए।
देवीलाल ने कहा कि ‘वोट आपके नाम पर मिला है।मैं बनूंगा तो जनता डंडा लेकर मारेगी।’
फिर वही हुआ जो नेपथ्य में तय हुआ था।उस पर चंद्र शेखर ने सभा भवन से वाॅकआउट किया क्योंकि इस स्क्रिप्ट की पूर्व सूचना उन्हें नहीं थी।
  किसी बड़े नेता के अनशन के दौरान भी कितनी  बड़ी बदइंतजामी हो सकती है, वह 1993 में मुम्बई में साबित हुआ।उसके शिकार वी.पी.सिंह हुए।
 वहां उनकी किडनी खराब हो गयी तथा समय बीतने के साथ उनकी स्थिति बिगड़ती  चली गयी।कुछ अन्य बीमारियों ने भी उनके शरीर में घर बना लिया।
अंततः 27 नवंबर 2008 को वी.पी.सिंह का निधन हो गया।
उस अनशन के बारे में कुछ बातें वी.पी.सिंह के शब्दों में ‘जहां मैं भूख हड़ताल पर बैठा था ,वह बहुत व्यस्त चैराहा था।
जनता दल वालों ने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि वे पेशाब वगैरह के लिए कोई प्रबंध  करते।
और लोग तो उठकर इधर -उधर चले जाते थे ।मैंने उस दौरान पानी कम पिया जिससे मेरी किडनी को नुकसान पहंुचा।’
  इस बात को लेकर भी वी.पी.सिंह की बदनामी हुई थी कि बोफर्स घोटाले के बारे अपने पहले के आरोप से  बाद में वे पलट गए थे।
  पर 6 फरवरी 2004 को वी.पी सिंह ने मीडिया से कहा कि ‘मैं अपने आरोप पर कायम हूंं।बोफर्स में दलाली दी गयी थी।मैंने उस बैंक खाते का नंबर भी बताया था जिसमें दलाली के पैसे जमा किए गए। जांच में नंबर सही पाया गया।पर मैंने कभी यह आरोप नहीं लगाया था कि राजीव गांधी को पैसे मिले हैं।’ 
@ फस्र्टपोस्ट हिंदी 27 नवंबर 2017 @



       
  

Wednesday, November 29, 2017

संयोग से मैंने आज सुबह इ टी नाउ चैनल लगा दिया।
उस पर न्यायपालिका पर गंभीर चर्चा चल रही थी।
मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि अतिथियों में कोई
 व्यक्ति अपनी बारी से पहले नहीं बोल रहा था।
विभिन्न  चैनलों पर इन दिनों जारी  टाॅक शो के भारी शोर गुल, हंगामे और अशालीन शब्दों के प्रयोग के कारण उत्पन्न भीषण गर्मी के बीच  इ टी नाउ पर  आज की चर्चा ठंडीे हवा के झोंके की तरह थी।
   अन्य चैनलों को भी चाहिए कि जहां तक संभव हो सके वे शालीन स्वभाव के वैसे अतिथियों को ही बुलाएं जिनकी आदत बारी से पहले बोलने की ना हो।यदि कोई बोलते हैं तो उनकी आवाज बंद कर दी जानी चाहिए।
इससे होगा यह कि श्रोतागण  बातें सुन और समझ सकेंगे ।उनके समय का सदुपयोग होगा।चैनलों और एंकरों की साख बढ़ेगी।
 चैनलों पर आने वाले कुछ खास नेता तथा अन्य पेशे के कुछ ऐसे लोग हैं जो अपनी उदंडता के लिए कुख्यात हैं।वे न तो शालीनता का ध्यान रखते हैं और न ही एंकरों की बात मानते हैं।यह भी नहीं सोचते कि उनकी बात  कोई सुन या समझ पा रहा है भी या नहीं ।
पता नहीं, कुछ एंकर भी ऐसे शोरगुल की अनुमति क्यों देते हैं ! जहां भी मैं किसी चैनल पर ऐसे उदंड वक्ताओं-प्रवक्ताओं  को देखता हूं, तुरंत चैनल बदल देता हूं।
 वैसे भी शोरगुल और हंगामे के कारण ऐसी टी वी चर्चाओं में मेरी रूचि कम होती जा रही है।
आप कहेंगे कि इ टी नाउ की आज की चर्चा में जितने प्रतिष्ठित व शालीन लोगों को बुलाया गया था,उतनी संख्या में  प्रतिष्ठित व शालीन लोग राजनीतिक चर्चाओं के लिए  उपलब्ध ही नहीं हैं।पर मेरी समझ है कि चैनल वाले यदि खोजेंगे तो मिल सकते हैं।राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं में से भी कुछ शालीन हैं तो कुछ अन्य अशालीन।
 हालांकि मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जितने अतिथि इन दिनों चैनलों पर आते हैं, वे सब के सब अशालीन ही हैं।उनमें कुछ  शालीन लोग भी हैं।पर उनकी आवाज दब  जाती है। 
@ 2017@  

Tuesday, November 28, 2017

नब्बे के दशक में केंद्र में निदेशक पद पर तैनाती के लिए लगते थे दस लाख रुपए


      
नब्बे के दशक में केंद्रीय कृषि मंत्रालय से जुड़े संस्थान के   निदेशक पद पर तैनाती के लिए उम्मीदवार को दस लाख रुपए की रिश्वत देनी पड़ती थी।
  यह रहस्योद्घाटन तब के केंद्रीय कृषि मंत्री चतुरानन मिश्र ने अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक में किया है। मिश्र जी 1996 से 1998 तक केंद्र में मंत्री थे।तब संयुक्त मोर्चा की सरकार थी।बारी -बारी से एच.डी.देवगौड़ा और आई.के.गुजराल प्रधान मंत्री थे।
 देश में  पहली बार कम्युनिस्ट नेता केंद्र सरकार में शामिल हुए थे।
  ‘मंत्रित्व के अनुभव’ नामक अपनी पुस्तक में दिवंगत कम्युनिस्ट नेता चतुरानन मिश्र ने लिखा कि ‘ एक बार एक वैज्ञानिक संस्थान के निदेशक की नियुक्ति के लिए मेरे पास विभाग से तीन नाम आए।
मैंने योग्यता को देख कर  नियुक्ति के लिए उनमें से एक का चयन किया।
  जिन्हें चुना गया था,वे इस बात से अकचका गए कि वे डायरेक्टर कैसे हो गये ? मेरा उनसे न कोई परिचय था और न ही कोई पैरवी आई थी।
बाद में वे मुझसे मिलने आए तो कहा कि डायरेक्टर की नियुक्ति में दस लाख रुपए लगते थे, इसलिए मैं निराश बैठा था।
उन्होंने बताया कि वे बिहार के बक्सर जिले के हैं।
 वैसा ही बम्बई स्थित मछली अनुसंधान संस्थान के निदेशक की बहाली में हुआ।
वह मुसलमान थे।
 वह ताज्जुब में पड़े कि उनकी बहाली कैसे हो गयी।उच्च पदों पर नियुक्ति में दलितों और कम्युनिस्टों के बारे में विरोध होता था।
  जब कोई कम्युनिस्ट नेता पहली बार सत्ता में आता है,उसे तरह -तरह के नये  अनुभव होते हैं।कई बार उन्हें कुछ अजीब लगता है।
चतुरानन मिश्र ने भी अपने कई तरह के  अनुभव विस्तार से लिखे हैं।
 उन्हें एक अनुभव यह भी हुआ कि ‘मंत्रियों के यहां उनके अधीनस्थ 
सहकारी संगठन और लोक उपक्रम से जरूरत से अधिक अनेक गाडि़यां आ जाती हैं।
उनके अनुसार ‘मैं संासद वाला मकान में ही रह गया था।जब देखा कि चार गाडिय़ां लगी हुई हैं तो उन्हें हटवा दिया।
बाद में पता चला कि दफ्तर में भी ऐसे संसाधन राजकीय क्षेत्र से लिए जाते हैं।
संबंधित अफसर डर से कुछ नहीं बोलते।’
एक महत्वपूर्ण बात मिश्र जी ने लिखी है।उन्होंने लिखा कि ‘ मुझे सूचित किया गया था कि मंत्रियों के भ्रष्टाचार के संबंध में प्रधान मंत्री को खुफिया तंत्र द्वारा खबर चली जाती है।
गठबंधन सरकार में इस पर काम करना प्रधान मंत्री के लिए कठिन होता है।इसलिए वे चुप रह जातें हैं।
मगर प्रधान मंत्री की यदि अपनी बड़ी पार्टी है तो इस विषय पर चुप क्यों रह जाते हैं,यह समझ में नहीं आता है।’
  मंत्रिमंडल की कार्य प्रणाली के बारे में भी उन्होंने लिखा है। कार्य -पद्धति में  एक बड़ी कमी उन्होंने  महसूस की।उन्होंने लिखा कि  राष्ट्र की  सबसे महत्वपूर्ण समस्याओं जैसे वित्तीय संकट, सब्सीडी ,बेरोजगारी,गरीबी रेखा वालों के सवाल ,कृषि समस्या आदि पर सर्वांगीण रूप से वहां कभी विचार नहीं होता है।
ऐसा विचार योजना आयोग में हुआ था लेकिन वह भी सीमित था।
मं़ित्रमंडल में प्रधान मंत्री जो चाहे ,वह तो होता ही है,लेकिन उनके सामने मंत्रियों के विचार आने की जरूरत है।
वे सिर्फ सचिवों की राय पर काम करते हैं।
दूसरे विभागों के एजेंडा पर भी वे बोलते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि हर विभाग अलग -अलग सरकार है।’
  चतुरानन जी ने मंत्री के रूप में एक नयी परंपरा डाली थी।पता नहीं वह बाद में कायम रही या नहीं।
वे लिखते हैं कि ‘रोजाना जो पत्र आते थे, उसकी सिर्फ प्राप्ति का पत्र भेजने का रिवाज था।किंतु मैंने ए.पी.एस.को कहा कि किस पदाधिकारी के पास उनकी शिकायत भेजी जा रही है,वह भी प्राप्ति पत्र में लिखा करें।उस पदाधिकारी से ंसंपर्क के लिए लिख दें।’
  सांसदों के बारे में अपना अनुभव उन्होंने इन शब्दों में व्यक्त किया,‘ मंत्री के रूप में मेरे पूरे  कार्यकाल में कामरेड ए.के.राय ही एकमात्र थे जिन्होंने आकर मुझसे पूछा कि यह तो नया काम है, आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?
 बाकी साथी कुछ काम-धंधा के लिए ही आते थे।
जब उनसे बताया कि यहां बैठकर पूंजीवाद का विकास कर रहा हूं तो वे आश्चर्य में पड़े और पूछा कि तब फिर क्यों हैं  यहां ?
मैंने कहा कि पूंजीवाद में विकास कार्यों में भी दर्द अवश्यम्भावी है।मैं यही कोशिश कर रहा हूं कि न्यूनत्तम दर्द हो।’मेरे इस दृष्टिकोण के बावजूद एक बड़ा टकराव हुआ जिसमें मैंने इस्तीफा दे दिया।निदान होने पर फिर वापस ले लिया।’
  जाहिर है कि चतुरानन जी बिहार से थे।उन दिनों बिहार में कुख्यात चारा घोटाले की धूम थी।
जिन नेताओं पर चारा घोटाले के आरोप थे,वे केंद्र सरकार पर दबाव डाल रहे थे।
 उस घटना पर खुद मिश्र जी और तब के केंद्रीय गृह मंत्री की क्या राय थी, इस संबध्ंा में मिश्र जी कोई ठोस बात लिख देते तो उनकी संस्मरणात्मक पुस्तक अधिक  पठनीय होती।
याद रहे कि तब के सी.बी. आई. के निदेशक जोगिंदर सिंह ने उस बारे में अपनी किताब में खुल कर लिखा है।  
  @ लाइवबिहार.लाइव पर भूले-बिसरे काॅलम के तहत  28 नवंबर 2017 को प्रकाशित मेरा लेख@

   





ब्रज नंदन जी नहीं रहे।यह सुन कर झटका लगा।
क्योंकि मुझे तो ऐसी उम्मीद कत्तई नहीं थी।
वे पत्रकारिता में अंतिम समय तक सक्रिय रहे ।
उन्होंने अपनी सक्रिय पत्रकारिता की लगभग आधी सदी से भी अधिक की अवधि पूरी की। 
उन्होंने जवाहर लाल नेहरू से लेकर बाद के लगभग
सभी प्रधान मंत्रियों को ‘कवर’ किया।
  बहुत पहले मैंने उनके आवास पर जवाहर लाल जी के साथ ब्रज नंदन जी का फोटो देखा था।
पूछा तो उन्होंने बताया कि यह फोटो रांची हवाई अड्डे का है।
तब रांची के किसी प्रकाशन के लिए ब्रज नंदन जी काम कर रहे थे।
 करीब दस साल तक  राजनीति में सक्रिय रहने  के बाद जब मैं पत्रकारिता में आया, तब तक ब्रजनंदन जी  पटना के प्रमुख पत्रकार बन चुके थे। उन दिनों वे समाचार एजेंसी हिंन्दुस्तान समाचार में काम करते थे।
मैंने उन्हें हमेशा स्नेहिल पाया।
 संभवतः वे पहले पत्रकार थे जिनके पास स्कूटर था।
मेरे पास तो तब साइकिल भी नहीं थी।उनके स्कूटर पर सवार होकर मुझे कई बार प्रेस कांफ्रेंस में जाने का मौका मिला।मैंने 1977 में दैनिक ‘आज’ से मुख्य धारा की पत्रकारिता शुरू की थी।  
  तब संवाददाताओं को फ्रेजर रोड और बुद्ध मार्ग से सचिवालय या मंत्रियों के आवास पर ले जाने के लिए सरकारी एम्बेसडर गाडि़यां आती थीं।
 पर, ब्रज नंदन जी और टाइम्स आॅफ इंडिया के संवाददाता अपने वाहन से जाते थे।
 टाइम्स आॅफ इंडिया के जितेंद्र सिंह के अलावा पेट्रियट के संवाददाता चंद्र मोहन मिश्र के पास भी  कार थी। किसी अन्य पत्रकार के पास उस समय निजी कार या स्कूटर थी या नहीं, मुझे याद नहीं। 
  पर तब हम कुछ पत्रकार यह सोचते थे कि काश ! हमारे पास भी होती तो खबरें एकत्र करने में अधिक सुविधा होती।
  ब्रजनंदन जी हमेशा समय से पहले संवाददाता संम्मेलनों या अन्य कार्यक्रमों में पहुंच जाते थे।
 संवाददाता सम्मेलनों में वे अक्सर आगे की सीट पर बैठते थे।सवाल जरूर पूछते थे।
 ऐसे सवाल पूछते थे जिनसे अक्सर खबर बन जाती थी।आंकड़ों के प्रति उनका विशेष आग्रह रहता था।
   गरिमायुक्त व्यक्तित्व के धनी ब्रज नंदन जी को मैंने कभी किसी की निंदा करते नहीं सुना ।
हिन्दुस्तान समाचार और आर्यावत्र्त होते हुए जब उन्होंने दैनिक आज ज्वाइन किया तो उनके समकालीन पत्रकारों को आश्चर्य हुआ कि आखिर वे कितने दिनों तक काम करेंगे ?
 पर वे तो कर्मयोगी थे।अंत तक काम ही करते रहे।उन्होंने एक सार्थक जीवन जिया। 
    

Friday, November 24, 2017

शिक्षा-परीक्षा में सुधार के लिए सर्जिकल स्ट्राइक अब जरूरी----


बिहार ही नहीं ,बल्कि इस देश की शिक्षा की दुर्गति के कारणों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज के नेतृत्व में न्यायिक जांच आयोग का गठन होना चाहिए। आयोग अपनी रपट में सुधार के उपायों को रेखांकित करे।
पर पहले दुर्दशा के असली कारणोें का पता जरूर होना चाहिए।
साथ ही, केंद्र और राज्य सरकारें उन सिफारिशों को कड़ाई से लागू करेें , यदि सरकार के लोगों को अपनी अगली पीढि़यों के भले का कुछ भी खयाल हो।
  दरअसल शिक्षा-सुधार  को लेकर कई समितियों और आयोगों की सिफारिशें धूल फांकती रह जाती हैं।कुछ लागू भी होती है तो आधे मन से।
  शायद सुप्रीम कोर्ट के जज के नेतृत्व वाले किसी आयोग की सिफारिशों में अधिक नैतिक बल हो।
उससे आम जनता का भी समर्थन उन सिफारिशों को मिलेगा।
  दरअसल शिक्षण-परीक्षण को बिगाड़ने में समाज के लगभग हर हिस्से के अनेक प्रभावशाली लोगों का हाथ रहा है।
उनके व्यक्तिगत स्वार्थ भी उससे जुड़ गए हैं।वे शिक्षा को सुधरने नहीं देते ।
किसी अच्छे कदम का बाहर या भीतर से विरोध कर देते हैं।
 इस बीच शिक्षा की स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि बिल गेट्स को  भी हाल में  यह कहना पड़ा कि  आज इस देश में शिक्षा की जो स्थिति से उसकी अपेक्षा  इसे बहुत -बहुत  बेहतर करने की जरूरत है।यानी एक विदेशी को भी इस देश की शिक्षा की खराब स्थिति अखर रही है।भारत के कुछ सत्तावानों को इसलिए नहीं अखरती क्योंकि उनमें से अनेक लोग तो अपने बाल -बच्चों को विदेशों में पढ़ाते हैं और विदेशों में ही बसा भी देते हैं।
इधर इस देश और खास कर बिहार जैसे पिछड़े राज्यों की शिक्षा चैपट होती जा रही है।
  चैपट शिक्षा का इतना अधिक कुप्रभाव पड़ रहा है कि 
न सिर्फ  सही प्रश्न पत्र तैयार करने वाले शिक्षकों की कमी पड़ रही है ,बल्कि उत्तर पुस्तिकाएं जांचने की क्षमता वाले शिक्षक भी कम हो रहे हैं।
 उत्तर पुस्तिकाओं में दिए गए अंकों को जोड़ने में भी कई शिक्षकों को दिक्कत आ रही है। 
 बिहार की  ताजा खबर यह है कि  इंटर  हिंदी के माॅडल पेपर में
गलतियां सामने आईं हैं।
मैट्रिक के माॅडल पेपर में भी गलतियां मिली थीं।
उसके लिए संबंधित शिक्षिका को निलंबित किया गया था।
ऐसी गलतियां आए दिन सामने आती रहती हैं।
  पर किसी को सिर्फ निलंबित करने से काम चलने वाला नहीं है।
क्योंकि दोष व्यक्ति से अधिक व्यवस्था का है।
शिक्षण-परीक्षण की जो हालत है,यदि वह जारी रही तो कुछ साल के बाद ऐसे ही शिक्षक मिलेंगे जो दो जोड़ दो बराबर पांच पढ़ाएंगे।
उस पढ़ाई से निकले छात्र जो- जो  गुल खिलाएंगे, भविष्य में उसे भी झेलना पड़ेगा।
  सामान्य शिक्षा की बात कौन कहे,मेडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों की स्थिति भी बदतर होती जा रही है।
देश के सैकड़ों इंजीनियरिंग कालेज हाल के वर्षों में बंद हो गए।
अनेक मेडिकल काॅलेजों में रिश्वत के बल पर दाखिले होते हैं।कई मेडिकल काॅलेजों के छात्रों को शिक्षा-परीक्षा में कोई खास रूचि नहीं।
फिर भी वहां के छात्र डाक्टर बन कर निकल रहे हैं।
ऐसे डाक्टर -इंजीनियर इस देश व जनता के साथ कैसा सलूक करेंगे ?हालांकि यहां यह नहीं कहा जा सरहा है कि देश के सारे सामान्य ग्रेजुएट, डाक्टर और इंजीनियर अयोग्य ही हैं।उनमें बहुत लोग योग्य हैं।पर अपवादों से देश नहीं चलता। 
शिक्षा -परीक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए निहितस्वार्थियों के खिलाफ शीघ्र सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है।
 तब अपराधी छोड़ देते थे पटना-----
बिहार में कुछ पुलिस  अफसर ऐसे भी हुए हैं जिनके डर से 
खूंखार अपराधी जिला छोड़ देते थे।
पटना के कम से कम दो एस.एस.पी. के कार्यकाल में भी ऐसा ही हुआ था।
एक एस.एस.पी. नब्बे के दशक में थे।
उन्होंने अपराध नियंत्रण की कुछ ऐसी  तकनीकी अपनाई कि अपराधी बाप-बाप करने लगे।कुछ ने पटना छोड़ा तो कुछ अन्य की  दुनिया ही छूट गयी।यानी पुलिस से मुंठभेड़ करना उन्हें महंगा पड़ा।
  2005 के बाद एक अन्य एस.एस.पी.ने भी उसी तरह की करामात दिखाई।बल्कि पहले वाले एस.एस.पी. से भी बेहतर।
पहले वाले पर तो आरोप था कि उनकी  एक खास समूह के अपराधियों पर उनकी अधिक नाराजगी थी।
पर दूसरे वाले ‘समदर्शी’ थे।
पटना के मौजूदा एस.एस.पी. भी कत्र्तव्यनिष्ठ हैं और कई बार अपनी  जान
हथेली पर लेकर  अपराधियों से मुकाबला करते हैं।पर लगता है कि 
इन्हें वह तकनीकी नहीं मालूम जो उन अफसरों को  मालूम थी जिनकी चर्चा मैंने उपर की पंक्तियों में की है।
कोई हर्ज नहीं कि उन पूर्ववर्ती अफसरों से मौजूदा अफसर दिशा -निदेश ले लें।
 उधर राम जेठमलानी के पास राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय जेहादियों से कारगर ढंग से निपटने का एक खास तकनीकी है।जेठमलानी  ने उसकी चर्चा एक बार सार्वजनिक रूप से भी की थी।
पर,लगता है कि  उनकी तकनीकी को अपनाने की इच्छा शक्ति किसी में नहीं है।
ऐसे कैसे चलेगा ?
जब समस्याओं से निपटने के लिए तकनीकी उपलब्ध है ही तो फिर देशहित और राज्यहित में उन्हें अपना लेने में क्यों संकोच होना चाहिए ?    
     क्या देनी पड़ी थी दहेज ?-----
  बिहार में जब से दहेज विरोधी अभियान चल रहा है, वर पक्ष के कुछ व्यक्ति  सार्वजनिक रूप से  दावा कर रहे हैं कि उन्होंने दहेज नहीं ली थी।संभव है कि उनका दावा सही हो।कुछ लोग नहीं लेते।यह भी सच है।पर अधिकतर लोग लेते ही लेते हैं।पर बेहतर तो यह होगा कि बधू पक्ष के लोग स्वेच्छा से यह बात सार्वजनिक रूप से कहें कि उन्हें दहेज नहीं देनी पड़ी थी।जब वे ऐसा कहेंगे तभी  संबंधित वर पक्ष की साख बढ़ेगी।
      एक भूली बिसरी याद-----
बात तब की है कि जब मैं राजनीतिक कार्यकत्र्ता था।
पूर्व मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर ने मुझे अपना एक बयान लिख कर दिया। कहा कि यह संपादक के नाम पत्र है।सर्चलाइट के एडिटर को जाकर दे आइए।
उन दिनों सुभाष चंद्र सरकार संपादक थे।मैं उनसे मिला और कहा 
कि यह कर्पूरी जी का ‘संपादक के नाम पत्र’ है।उन्होंने मुझे बैठा लिया और कहा कि  जिन-जिन नेताओं के खिलाफ हमारे अखबार में छपा, वे सब मुझसे नाराज हो गए।पर खिलाफ लिखने पर भी कर्पूरी जी कभी नाराज नहीं हुए।मैं उनसे मिलना चाहता हूं।
आप उनसे मुझे समय दिलवा दीजिए।
 आकर मैंने कर्पूरी जी से कहा।दोनों की फोन पर बात भी हुई।दोनों मिले भी ।मुझे नहीं मालूम कि वे कहां मिले।पर जितना मैं कर्पूरी जी को जानता था,उसके अनुसार उन्होंने संपादक जी को नहीं बुलाया होगा बल्कि वे खुद ही उनके घर चले गए होंगे।
  खैर जो ‘संपादक के नाम पत्र’  मैं सरकार साहब को दे आया था,वह बयान के रूप मंें  दूसरे दिन सर्चलाइट के पहले पेज पर छपा ।
    यानी पहले के कई बड़े नेता किसी अखबार में संपादक के नाम पत्र छप जाने पर ही  संतुष्ट हो जाते थे।पर, आज  ?
अज्ञेय के संपादकत्व वाले साप्ताहिक ‘दिनमान’ में मैंने पूर्व गवर्नर जनरल राज गोपालाचारी जैसे बड़े नेताओं के विचार ‘मत सम्मत’ कालम में छपे देखे थे।
और अंत में----
सिंगापुर के पूर्व प्रधान मंत्री ली कुआन यू के 2015 में निधन के बाद मशहूर कूटनीतिज्ञ हेनरी किसिंजर ने कहा था कि ‘ली और उनके सहयोगियों ने अपने देश के लोगों की प्रति व्यक्ति आय ,जो आजादी के बाद 1965 में 5 सौ डालर थी ,को वत्र्तमान में 55 हजार डाॅलर तक पहुंचा दिया।
एक पीढ़ी की अवधि में सिंगापुर एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र ,दक्षिण पूर्व एशिया का प्रमुख बौद्धिक महा नगर, क्षेत्र के बड़े अस्पतालों का स्थान और अंतरराष्ट्रीय मामलों से संबद्ध सम्मेलनों की पसंदीदा जगह बन गया।’
   कुछ अन्य राजनीतिक विचारकों ने तब कहा था कि सिंगापुर की प्रगति को  देख कर यह तर्क गलत साबित हो गया है कि सिर्फ कम्युनिस्ट तानाशाही वाले देश में ही तेज विकास संभव है।पर भारत  ली कुआन से भी कुछ नहीं सीख सका।
@ 24 नवंबर 2017 के प्रभात खबर --बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@ 
  



    
   

Thursday, November 23, 2017

 आत्म हत्याओं के संदर्भ में किशोर कुणाल ने ठीक ही कहा है कि ‘कुछ लोग परेशानियों से जुझने के बजाए हार मानना पसंद करते हैं।कह सकते हैं कि कुछ लोगों में आत्म हत्या करने की मनोवैज्ञानिक प्रवृति होती है।
जीवन में आने वाली मुसीबतों का निर्भीकता से सामना करना चाहिए।
मानसिक परेशानी हो तो मित्रों से बात कीजिए।’
@पटना  जागरण सिटी - 22 नवंबर 2017@
मुझे लगता है कि कुणाल जी जैसे जिनके मित्र हों, वे तो ऐसी स्थिति से बचा लिए जा सकते हैं।पर आम लोगों के बीच के जो लोग ऐसी परेशानियों से जूझ रहे हों,उनके लिए कोई संस्थागत उपाय होना चाहिए।
 कुणाल जी ने समाज सेवा के क्षेत्र में जितना काम किया है,वह एक मिसाल हैं।
उन्हें इस क्षेत्र में भी कदम बढ़ाना चाहिए।
उनके नेतृत्व में एक ऐसी परामर्श दात्री समिति बननी चाहिए जो आत्म हत्या के कगार पर खड़े लोगों को सामान्य जीवन जीने के लिए प्रेरित कर सके।  

  सत्तर के दशक की बात है। बिहार के एक बड़े नेता ने आत्म हत्या कर ली।उन दिनों इस बात की चर्चा थी।
नेता जी स्वतंत्रता सेनानी थे।बाद में बिहार सरकार के मंत्री बने थे।उन पर भ्रष्टाचार केे आरोप लगे थे।जेल जाने की नौबत आ गयी थी।
स्वतंत्रता सेनानी के रूप में तो वे सगर्व जेल जाते थे।पर, भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाने से बेहतर उन्होंने मर जाना समझा।
हालांकि उन पर मामूली आरोप थे।
  देश में आज के अनेक नेताओं पर सरकारी खजाने की लूट और महा लूट के जितने बड़े-बड़े आरोप लग रहे हैं,उनके मुकाबले उस नेता जी  पर जो आरोप थे,उसे अधिक से अधिक ‘पाॅकेटमारी’ का आरोप कहा जा सकता है।आज कितना फर्क आ गया है राजनीति में पहले के मुकाबले !
  

Sunday, November 19, 2017

अस्पतालों-बाजारों के शौचालयों को ठीक कराए राज्य सरकार



बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय और नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा इन दिनों अपने -अपने विभाग के कामों को ठीकठाक करने के लिए सक्रिय नजर आ रहे हैं।
  अच्छी बात है।उत्साह और अच्छी मंशा को देख कर उम्मीद की जा सकती है कि इन विभागांे में अब बेहतरी आएगी।
पर पुराने अनुभव बताते हैं कि  शुरूआती उत्साह पर पानी फिर जाता है जब वास्तविकता से पाला पड़ता है।
दरअसल  आम लोगों से संबंधित इन विभागों को भीषण भ्रष्टाचार ने जितनी मजबूती से जकड़ रखा है,उसमेंे कुछ परिणामदायक काम कर पाना असंभव नहीं तो बहुत कठिन जरूर है।
न तो सभी सरकारी डाक्टरों को उनकी ड्यूटी पर हाजिर कराना
आसान काम है और न ही नगरों की सफाई कराना।
देखना है कि नये मंत्री कितना सफल होते हैं ! मेरी शुभकामना हे।
  हां, ये मंत्री द्वय अपने- अपने महकमे के तहत आने वाले   शौचालयों को ही ठीक कर पाएं तो भी वे नाम कमा लेंगे।
 किसी व्यक्ति की सफाई पसंदगी की जांच इससे नहीं होती कि वह अपना ड्राइंग रूम कितना साफ रखता है बल्कि इससे होती है कि वह शौचालय और रसोई घर के साथ कैसा सलूक करता है।
सन 1972 के मुख्यमंत्री केदार पांडे सिर्फ एक काम के लिए आज भी यदा-कदा याद किए जाते हैं।उनकी सरकार ने परीक्षाओं में कदाचार को बिलकुल ही समाप्त कर दिया था।
    क्या पटना के मौर्य लोक मार्केट काम्प्लेक्स के शौचालयों को ठीक करना आसान काम है ? वर्षों  के अनुभव बताते हैं कि इस काम में बड़े -बड़े हुक्मरान फेल कर गए हैं।
उधर मौर्य लोक जाने वाले हजारों स्त्री -पुरुषों को कितनी परेशानी होती है, वह वे ही जानते हैं।
 वहां अभी जो शौचालय है, वह नरक तुल्य है।उसमें कोई प्रवेश भी नहीं करना चाहता।
 यही हालत राज्य के अन्य मार्केट के शौचालयों का भी  है।कई स्थानों में तो शौचालय हैं ही नहीं।
इससे अधिक मुश्किल काम तो है सरकारी अस्पतालों और निजी क्लिनिकों के शौचालयों को इस्तेमाल लायक बनाना है।
अनेक निजी क्लिनिकों में तो शौचालय का कोई प्रावधान ही नहीं होता है।हैं भी वे इस्तेमाल लायक नहीं होते जबकि चिकित्सकों की आय कम नहीं है।
वैसे विभिन्न पैथों से जुड़े वैसे चिकित्सकों के क्लिनिकों में भी शौचालय नहीं हंै जहां रोज सैकड़ों मरीज और उनके परिजन जाते हैं। इस मानवीय पक्ष की ओर संबंधित मंत्री ध्यान देंगे तो उन्हें लोगबाग याद रखेंगे।
  भ्रष्टाचार के खिलाफ हाईकोर्ट की सराहनीय पहल--
एक निजी चैनल ने स्टिंग आपरेशन के जरिए पटना लोअर कोर्ट के 
कर्मचारियों को रिश्वत लेते पकड़ा और पटना हाई कोर्ट ने तत्काल  उन्हें निलंबित कर दिया।
हाई कोर्ट की इस पहल की सराहना हो रही है।
इस कदम से हाई कोर्ट से लोगों की उम्मीदें बढ़ी हैं।
दरअसल ऐसा भ्रष्टाचार सिर्फ पटना कोर्ट तक ही सीमित नहीं है।हाईकोर्ट से उम्मीद बंधी है कि वह अन्य जिलों की ओर भी
ध्यान देगा ताकि आम लोगों की कठिनाइयां कम हो सकें। 
  कचहरियों में ऐसी घूसखोारी की खबरें पहले भी मिलती रही हैं।
पर ताजा स्टिंग आपरेशन में जिस तरह निर्भीक होकर बेशर्मी से और अधिकारपूर्ण ढंग से पैसे ऐंठते हुए कर्मचारी देखे जा रहे हैं,उससे लगता है कि हाल के वर्षों में भ्रष्ट कर्मी अधिक निर्भीक हो गए हैं।
ऐसी निर्भीकता उनमें कैसे आई ?
हाई कोर्ट प्रशासन को इस मनोवृति के पीछे के कारणों की जांच करनी होगी।तभी इस समस्या का समाधान हो पाएगा और गरीब व निःसहाय वादी -प्रतिवादी राहत पा सकेंगे।
   भ्रष्टाचार चीन में अधिक या भारत में ?---
चीन में यह कहा जा रहा है कि ‘यदि चीन खुद को सोवियत संघ की तरह तबाह होने से बचाना चाहता है तो उसे भ्रष्टाचार से और मजबूती से लड़ना होगा।’ क्या भारत के हुक्मरान और विरोधी दलों के नेतागण इस बात पर आकलन  करेंगे कि हमारे यहां चीन से कम भ्रष्टाचार है या अधिक ?
यदि इस देश में भ्रष्टाचार बढ़ता गया तो इस देश का क्या हाल होगा ?
भारत में क्यों भ्रष्टाचार हमेशा ही एक राजनीतिक मुद्दा बन जाता है ?
क्या भ्रष्टाचार कभी देशहित का मुददा  भी बनेगा ? कुछ अपवादों को छोड़ दें तो देश के हर कोने से और हर महकमे से भीषण भ्रष्टाचार की खबरें आ रही हैं।
भ्रष्टाचार को लेकर दिग्गजों की चिंता पुरानी--
महात्मा गांधी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने इस देश में व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार पर समय -समय पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
पर भ्रष्टाचार है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है।
महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार को लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज नहीं बनने दिया जाना चाहिए।’
जवाहर लाल नेहरू ने आजादी के तत्काल बाद कहा था कि ‘भ्रष्टाचारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका दिया जाना चाहिए।’
1988 में समाजवादी नेता और पूर्व सांसद मधु लिमये ने कहा था कि ‘ इस देश के शक्तिशाली लोग इस देश को बेच कर खा रहे हैं।’
सन 1998 में पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री मन मोहन सिंह ने कहा था कि ‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है।’
सन 2008 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूत्र्ति बी.एन.अग्रवाल और न्यायमूत्र्ति जी.एस.सिंघवी ने कहा कि ‘भगवान भी इस देश को नहीं बचा सकता।’
2003 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम.लिंगदोह ने कहा कि ‘राज नेता कैंसर हैं जिनका इलाज संभव नहीं है।’
सन् 1998 में केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एन. सी.सक्सेना ने कहा कि ‘भ्रष्टाचार में जोखिम कम और मुनाफा अधिक है।’
1997 में तो संसद ने राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ मिल कर अभियान चलाने के लिए सर्वसम्मत प्रस्ताव पास किया।
इन सब के बावजूद चीजें सुधरती नजर नहीं आ रही हैं।जो थोड़े लोग भ्रष्टाचार के महा दानव के खिलाफ अभियान शुरू करते हैं,उनके खिलाफ ही ताकतवर शक्तियां उठ खड़ी हो जाती हैं।  
     एक भूली बिसरी याद---
सन् 1986 में पुष्पा भारती ने ‘धर्मयुग’ के लिए  लिखे अपने लेख में इन शब्दों में इंदिरा गांधी को याद किया था-- ‘इंदिरा जी के जन्म दिवस पर सोनिया हमेशा चावल और चने से बने कश्मीरी व्यंजन ‘सरवारी’ और मीठे चावल बनवाती थीं।नेहरू परिवार में हर मांगलिक अवसर पर ये चीजें जरूर पकती हैं।
पर अब उनका मन नहीं होता।
एक हूक सी उठती है जी में।पर समय चक्र तो घूमेगा ही और 19 नवंबर आएगा ही।
सोनिया चुपचाप मां के कमरे के सामने दरवाजे पर आम की पत्तियों 
का तोरण लगवा देंगी।प्रियंका के साथ कमरे के हर कोने में फूल सजा देंगी।चादरें ,तकियों के गिलाफ, मेजपोश और तौलिये, सभी कुछ नये रखवा देंगी।
कमरे का माहौल तो नया हो जाएगा, पर क्या होगा उन यादों का जो हमेशा पुरानी ही होती हैं !’  
   और अंत में---
मशहूर भौतिकशास्त्री  स्टीफन हाॅकिन्स ने हाल में यह कहा है कि ‘सन् 2600 तक पृथ्वी आग का गोला बन जाएगी।’
हाॅकिन्स की ऐसी भविष्यवाणियां पढ़कर अनेक लोग उनका मजाक उड़ाते हैं।
पर, दिल्ली के पर्यावरण का जो हाल है,उसे देखकर आप हाॅकिन्स की बातें हवा में उड़ा सकते हैं ?
@प्रभात खबर-बिहार -में 17 नवंबर 2017 को प्रकाशित मेरे कानोंकान काॅलम से@