Saturday, October 21, 2017

सरदार हरिहर सिंह की नजर में श्रीबाबू

बिहार में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे डा. श्रीकृष्ण सिंह के बारे में तरह -तरह के लोग तरह -तरह के विचार रखते हैं।ऐसा स्वाभाविक ही है क्योंकि उन्होंने आजादी के बाद व पहले की कांग्रेसी राजनीति व शासन को काफी प्रभावित किया था।

   पर एक अन्य मुख्य मंत्री सरदार हरिहर सिंह की नजरों से डा.श्रीकृष्ण सिंह को देखना अधिक महत्वपूर्ण बात होगी।सरदार साहब सन 1969 में बिहार के मुख्य मंत्री बने थे।

डा.श्रीकृष्ण सिंह यानी श्रीबाबू के बारे में सरदार साहब ने लिखा है कि ‘आजादी की लड़ाई के दिनों  श्रीबाबू खास तौर पर युवकों के नेता थे।ऐसे तो वे संपूर्ण जनता के नेता थे,पर अपने उग्र राष्ट्रीय विचारों के कारण वे युवकों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते थे।उनके अपने स्वतंत्र विचार थे।वे किसी के ‘हिज मास्टर्स वायस’ नहीं थे।उनका अपना स्टैंड होता था,इसलिए वे हमारे जैसे युवकों के लिए ग्राह्य और प्रिय थे।

  सरदार हरिहर सिंह खुद भी एक महत्वपूर्ण हस्ती थे और आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उनका नाम सरदार पड़ा था।

   सरदार साहब ने लिखा है कि श्रीबाबू सन 1930 से पहले मुंगेर जिले की राजनीति तक अपने को सीमित रखे हुए थे।वे राज्य के नेतृत्व में भाग लेते थे,लेकिन मुंगेर को अपना मुख्य केंद्र बना कर चलते थे।नमक सत्याग्रह के बाद वे बिहार के राजनीतिक क्षितिज पर छा गये।

तब से लेकर मरते दम तक छाये रहे।याद रहे कि डा.राजेंद्र प्रसाद व डा.अनुग्रह नारायण सिंह सहित कई नेतागण चंपारण सत्याग्रह के समय ही गांधी के साथ हो लिये थे।

  बिहार के  अत्यंत महत्वपूर्ण नेता  डा.अनुग्रह नारायण सिंह को लोग बाबू साहब कहते थे।बाबू साहब के  बारे में सरदार साहब ने लिखा है कि अनुग्रह बाबू से मेरा संबंध 1916 से था।हमारा उनका व्यक्तिगत संबंध था।
हम बाबू साहब के बहुत करीब थे।उनके साथ मेरा घनिष्ठ संबंध था,पर राजनीतिक स्तर पर हम श्रीबाबू से संबंधित थे।राजेंद्र बाबू और बाबू साहब सुधारवादी व नरमपंथी विचार के थे।उस जमाने के लिहाज से श्रीबाबू प्रगतिशील और उग्र विचार के थे।इसी कारण श्रीबाबू को युवको का समर्थन मिला।बहुत से उग्रवादी नेता जैसे राम विनोद सिंह,श्यामा बाबू ,योगेंद्र शुक्ल आदि श्रीबाबू के साथ जाना पसंद करते थे और साथ चले भी।याद रहे सरदार साहब ने क्रांतिकारियों के लिए अपने लेख में उग्रवादी शब्द का इस्तेमाल किया है।

   राजनीति में शालीनता के बारे में हरिहर सिंह ने लिखा कि उस समय के लोगों की सबसे बड़ी बात थी कि  राजनीति में शालीनता थी।श्रीबाबू का अपना स्टैंड जरूर होता था,लेकिन इसका मतलब दूसरे के प्रति अनादर और दुश्मनी नहीं थी।

बाबू साहब हों या राजेंद्र बाबू वे सबका आदर करते थे और सबको सम्मान देते थे।प्रारंभ में बाबू कष्ण बल्लभ सहाय बाबू साहब के साथ थे।उन्होंने 1937 में श्रीबाबू का विरोध किया।उसके बाद वे श्रीबाबू के संपर्क में आये।सहाय जी 1952 में श्रीबाबू के साथ थे।पर 1957 के चुनाव उन्होंने श्रीबाबू को हराने का असफल प्रयास किया।तब बिहार कांग्रेस विधायक दल के नेता पद का चुनाव श्रीबाबू और बाबू साहब के बीच हुआ था।श्रीबाबू जीते।

   उन दिनों की राजनीति की शालीनता का एक और उदाहरण देते हुए सरदार साहब ने लिखा कि एक बार श्रीबाबू महेश प्रसाद सिंह को मंत्री बनाना चाहते थे और बाबू साहब  दीप नारायण सिंह को।एक बार तो लगा कि दोनों में से कोई एक ही मंत्री बनंेगे।क्योंकि दोनों नेता एक ही जिले के थे।पर ंदोनों मंत्री बने । इसमें यह खूबी रही कि डा.अनुग्रह नारायण सिंह ने   महेश प्रसाद सिंह का नाम प्रस्तावित किया और डा.श्रीकृष्ण सिंह ने  दीप नारायण सिंह का।श्रीबाबू के मंत्रिमंडल में अनुग्रह बाबू हमेशा मुख्य मंत्री के बाद दूसरे स्थान पर रहे।

   सरदार साहब के अनुसार श्रीबाबू के भाइयों ने जब आजादी की लड़ाई के दिनों उनका साथ छोड़ दिया था तो महेश प्रसाद सिंह ने श्रीबाबू का साथ दिया था।डा.श्रीकष्ण सिंह का जीवन तो निष्कलंक था,पर महेश प्रसाद सिंह को लेकर कुछ लेागों ने डा.श्रीकृष्ण सिंह  को बदनाम करने की कोशिश की।पर श्रीबाबू ने उपकार का बदला व्यावहारिक ही नहीं,बल्कि सांस्कतिक स्तर पर भी महेश बाबू को चुकाया।जब श्रीबाबू ने अपनी सबसे प्रिय निधि यानी अपनी पुस्तकों को मुंगेर के श्रीकृष्ण सेवा सदन को सौंपा तो उस पुस्तकालय का नाम कमला-महेश पुस्तकालय रखा।लेकिन महेश प्रसाद सिंह ने डा.श्रीकृष्ण सिंह  की उदारता और व्यक्तिगत संबंध का उपयोग अपने को राजनीति में स्थापित करने तथा आगे बढ़ाने में किया।

  अपने खुद के  कटु अनुभव की चर्चा करते हुए सरदार हरिहर सिंह ने लिखा कि सन 1957 के चुनाव में टिकट को लेकर सत्य नारायण सिंह और महेश प्रसाद सिंह ने मेरे नाम का विरोध किया।इसके परिणामस्वरूप मुझे टिकट नहीं मिला।इससे मैं कुछ खिन्न था।बाद की राजनीतिक स्थिति को देखकर मुझे तकलीफ हुई।श्रीबाबू के निधन के कुछ समय पहले मैंने एक दिन कुछ दुःखी होकर कह दिया--‘मरने के वक्त आप भूमिहार हो गये और मैं राजपूत।नहीं तो कोई नहीं जानता था कि हम दोनों एक ही जाति के नहीं हैं।’यह सुनते ही श्रीबाबू रो पड़े।न कोई शब्द थे और न कोई सफाई।मात्र अश्रु धार मेरे सवाल का जवाब दे रहे थे।

(श्रीबाबू के जन्म दिन के अवसर पर विशेष)

Thursday, October 19, 2017

भ्रष्टाचारियों से सार्वजनिक धन बचाने की समस्या

मेरी समझ से भ्रष्टाचार इस गरीब देश की सबसे बड़ी समस्या है। इसी समस्या से अन्य अनेक तरह की समस्याएं पैदा होती रहती  हैं।

मैं 1967 से लगातार सरकारों और नेताओं को कभी नजदीक और कभी दूर से देखने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं।पहले राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप में और बाद में पत्रकार की भूमिका  में।

भ्रष्टाचारवाद यानी पैसावाद यानी धन लोलुपतावाद  ने सभी राजनीतिक विचारधाराओं और वादों को लगभग पछाड़ दिया है।यदि यह जारी रहा तो भविष्य में भ्रष्टाचार और भी घृणित खेल दिखाएगा।

अपवादस्वरूप कई ईमानदार नेताओं को भी देखा है,पर पूरी व्यवस्था में आम तौर पर वे कारगर नहीं हो पाते।क्योंकि वे अल्पमत में होते हैं। चूंकि हर जाति और समुदाय में अच्छे -बुरे लोग हैं,इसीलिए भ्रष्ट लोगों में भी हर जाति और समुदाय के लोग हैं।

आम लोगों में से जो लोग अपनी अगली पीढि़यों के लिए एक बेहतर देश और समाज छोड़कर जाना चाहते हैं,उन्हें मेरी राय में एक काम जरूर करना चाहिए। राष्ट्री स्तर पर  और हर राज्य के पांच सबसे भ्रष्ट नेताओं की पहचान कर उनके खिलाफ अभियान चलाना चाहिए।और इसी तरह पांच सबसे कम भ्रष्ट या ईमानदार नेताओं को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि वे जनहित में और भी अच्छे काम कर सकें।

यदि ऐसा हुआ तो बीच के नेता खुद ही सबक ले लेंगे। यदि नेता सुधर गए तो उसका असर ब्यूरोक्रेसी और अर्थ जगत पर भी पड़ेगा।

 दरअसल ब्यूरोक्रेसी घोड़ा है और सत्ताधारी नेता सवार। सत्ताधारी जमात  किसी भ्रष्ट अफसर को सजा दे सकती है,पर कोई अफसर किसी भ्रष्ट मंत्री को उसके पद से नहीं हटा सकता।

भ्रष्टाचार नामक गंभीर बीमारी के कुछ प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं-

1.-सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि भ्रष्टाचार तो विश्व व्यापी है,इसलिए यदि इस देश में भी है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।उन्होंने यह भी कहा था कि मेरे पिता संत थे,पर मैं पालिटिशियन हूं।

2.-अस्सी के दशक में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि दिल्ली से सौ पैसे चलते हैं,पर उसमें से गांव में जनता तक सिर्फ 15 पैसे ही पहुंचते हैं। 85 पैसे बिचैलिए खा जाते हैं।

3.-नब्बे के दशक में जैन हवाला कांड हुआ था।कम्युनिस्टों को छोड़ कर लगभग सभी दलों के दर्जनों नामी -गिरामी  नेताओं ने हवाला कारोबारियों से रिश्वत ली।वही हवाला कारोबारी कश्मीरी आतंकवादियों को भी पैसे पहुंचाते थे।उन्हें नेताओं का संरक्षण चाहिए था,इसलिए उन्होंने रिश्वत दी थी। नेताओं को मिली अधिकत्तम राशि 10 करोड़ और न्यूनत्तम राशि 25 हजार रुपए थी। लाभान्वितों में एक पूर्व प्रधान मंत्री और कई पूर्व व वर्तमान केंद्रीय मंत्री शामिल थे।

सी.बी.आई.ने इस केस को रफा -दफा कर दिया।करना पड़ा क्योंकि इतने बड़े नेताओं पर वह कैसे कार्रवाई करती।सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में मन मसोस कर रह गया।

4.-कोई भी राजनीतिक दल आज चुनाव आयोग को अपने राजनीतिक चंदे का पूरा हिसाब देने को तैयार नहीं है।अधूरा देते हैं।यहां तक कि कम्युनिस्ट पार्टियां भी पूरा हिसाब नहीं देतीं।आखिर क्यों भाई ?

 5.-हमारे देश के प्रभावशाली नेतागण सांसद क्षेत्र विकास फंड को बंद करने के लिए तैयार नहीं हैं जबकि प्रशासनिक सुधार आयोग इसे खत्म करने की बहुत पहले सिफारिश कर चुका है।यह फंड राजनीति को दूषित करने वाला एक प्रमुख कारक बना हुआ है। 

6 - इस  देश के अधिकतर सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों के लिए दवाएं और रूई -पट्टी तक उपलब्ध नहीं है क्योंकि सरकार के पास पैसे नहीं हैं। गरीब लोग एम्बुलेंस के अभाव में अपने परिजन की लाश  ठेला और कंधे पर ढोकर ले जाने को मजबूर हैं। क्योंकि एम्बुलेंस खरीदने के लिए सरकार के पास  पैसे नहीं हैं।पर यहां  के सासंद अपने वेतन-भत्ते खुद ही बढ़ा लिया करते हैं । जहां के अधिकतर नेतागण गरीब जनता की मूलभूत समस्याओं के प्रति भी ऐसे संवेदनहीन हों,वहां भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या होगी ही।
          अब तो आम लोगों के पास भी सोशल मीडिया की ताकत उपलब्ध है। उन्हें जाति ,सम्प्रदाय और विचारधारा से ऊपर उठकर भ्रष्टाचार के राक्षसों को पहले पराजित करने की कोशिश करनी चाहिए।इस बात की परवाह किए बिना कि वे सफल होंगे या नहीं।  भले सफल नहीं हुए, पर 1857 में इस देश के बहादुर लोगों ने विदेशी ताकतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी न !
         भ्रष्टाचारियों के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ लड़ाई पूरी हो जाने के बाद  फरिया लीजिएगा कि इस देश में समाजवादी व्यवस्था चलेगी ,साम्यवादी व्यवस्था या पूंजीवादी।
        अभी तो भ्रष्टाचार के गिद्धों के चंगुल से देश के संसाधनों को बचाने की समस्या प्रमुख है।इसे बचाने की ईमानदार कोशिश नहीं करने पर अगली पीढि़यां हमें माफ नहीं करेंगी। 

एक बार फिर निकलेगा बंद बोफर्स का जिन्न ?


बोफर्स तोप खरीद घोटाले से संबंधित बंद केस सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर खुलने जा रहा है।राजनीतिक महत्व के इस केस को  बंद कर देने का निर्णय 2005 में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया था।तब की सरकार ने सी.बी.आई. को अपील की अनुमति नहीं दी थी।
 अजय अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली हाई कोर्ट के उस निर्णय को चुनौती दी है।सुप्रीम कोर्ट जल्द ही उस मामले की सुनवाई करेगा।
 इस बीच निजी जासूस माइकल हर्शमैन ने इसी महीने इस घोटाले के संबंधित कुछ नये और सनसनीखेज खुलासे किए हैं।हर्शमैन ने बोफर्स घोटाले का संबंध पाकिस्तान से भी जोड़ दिया है।
 यदि केस आगे बढ़ा  तो यह सवाल भी उठेगा कि उसे आखिर बंद ही क्यों किया गया था ? किसे बचाने के लिए यह काम किया गया था ?
  यह सवाल  भी उठेगा  कि 2005 में केंद्र  सरकार  ने जांचकत्र्ता सी.बी.आई.के हाथ  क्यों बांध दिए थे ?
   भारत सरकार के ही आयकर न्यायाधिकरण ने 2010 में यह कह दिया था कि बोफर्स के  दलाल ‘क्वात्रोच्चि और बिन चड्ढा को बोफर्स तोप खरीद की  दलाली के 41 करोड़ रुपए मिले थे।ऐसी आय पर भारत में उन पर टैक्स की देनदारी बनती है।’
तो फिर  तब सरकार ने उनसे टैक्स क्यों नहीं वसूला ? 
 बोफर्स एक अच्छी तोप है,पर इससे भी बेहतर तोप फ्रंास की सोफ्मा खरीद के लिए तब उपलब्ध थी।क्या सोफ्मा को छोड़कर बोफर्स की खरीद इसलिए हुई क्योंकि सोफ्मा कंपनी दलाली नहीं देती थी ? 
सी.बी.आई. ने स्विस बैंक की लंदन शाखा में बोफर्स की दलाली के पैसे का पता लगा लिया था।वह क्वात्रोचि के खाते में था।
उस खाते को गैर कांग्रेसी शासन काल में सी.बी.आई.ने जब्त करवा दिया  था।पर बाद में मन मोहन सिंह सरकार के एक अफसर ने लंदन जाकर उस खाते को क्यों खुलवा दिया ? न सिर्फ क्वात्रोचि को भारत से भाग जाने दिया गया,बल्कि उसने लंदन बैंक से अपने खाते से वे पैसे भी निकाल लिए ।ऐसा किसकी साठगांठ से हुआ ? इसके पीछे कोई उच्चस्तरीय साजिश थी ?
इस तरह के कई अन्य सवाल भी उठेंगे।
बोफर्स तोप खरीद घोटाले के शोर के बीच  1989 में हुए लोक सभा चुनाव में कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हो गयी थी।
 क्या उस केस के फिर से खुलने पर उस का असर अगले चुनावों में पर भी पड़ेगा ?  


Wednesday, October 18, 2017

विभाजित मीडिया के बीच पाठक-श्रोता बेचारा !

इन दिनों पाठकों और दर्शकों की ओर से इस बात की अक्सर  शिकायतें मिलती रहती हैं कि कुछ  मीडिया समूह खास कर कुछ इलेक्ट्राॅनिक मीडिया संस्थान एकतरफा हो गये हंै। उनमें से एक उत्तर है तो दूसरा बिलकुल दक्षिण।पेशेवर निष्पक्षता का अभाव है। हालांकि  अनेक  मीडिया संस्थान अब भी अपनी निष्पक्षता बनाए रखने की कोशिश करते  हैं।

पर सवाल है कि ऐसा कब नहीं था ? कमोवेश पहले भी था।
पहले कम था।अब अधिक है। आजादी के तत्काल बाद तो कुछ अत्यंत बड़े सत्तासीन नेताओं के  अपने -अपने कुछ खास  करीबी पत्रकार थे। वे तब के बड़े पत्रकारों में  थे।

कुल मिलाकर मीडिया के एक हिस्से का एकतरफा व्यवहार थोड़ा- बहुत पहले भी था। पचास के दशक में सत्ताधारियों पर यदि मुख्य धारा का मीडिया आम तौर पर मोहित था तो उसका  कारण भी था।उन लोगों  ने आजादी जो दिलाई थी।वे देश के हीरो थे। उनकी कुछ गलतियांे को भी मीडिया के एक हिस्सा समय -समय पर नजरअंदाज  कर देता था।
पर साठ -सत्तर के दशकों से इस मामले में  फर्क आने लगा।

 साठ-सत्तर के दशकों में मैं तीन साप्ताहिक पत्रिकाएं अक्सर पढ़ता था - ब्लिट्ज, दिनमान और करंट।

ब्लिट्ज वामपंथी था तो करंट दक्षिणपंथी।‘दिनमान’ मध्यमार्गी - डा.राम मनोहर लोहिया के प्रति सहानुभूति से भरा हुआ। तब एक बार तो ‘दिनमान’ में एक पाठक की चिट्ठी छपी थी- ‘आप अपनी पत्रिका का नाम दिनमान के बदले लोहियामान क्यों नहीं रख देते ?’

सच्चिदानंद वात्स्यायन तब संपादक थे।संपादक की टिप्पणी भी उस पत्र के साथ छपी थी।याद रहे कि दिनमान में उनका पूरा नाम नहीं छपता था।
उनका पूरा नाम था-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय। 
खैर,मेरे जैसे सजग पाठक तीनों पत्रिकाओं के अध्ययन के बाद देश-विदेश और राजनीति का पूरा हालचाल जान लेते थे।

पर समय बीतने के साथ बाद के दशकों में और फर्क आने लगा। वह फर्क कुछ सत्ताधारी नेताओं के मीडिया के प्रति अति संवदेनशील और रुखा हो जाने के कारण हुआ ।

 जवाहरलाल नेहरू और मोरारजी देसाई जैसे नेता मीडिया के प्रति आम तौर पर निरपेक्ष थे।दुर्गादास जैसे एक -दो घटनाएं अपवाद जरूर थीं।मशहूर स्तम्भकार दुर्गादास के खिलाफ प्रधान मंत्री ने एक अखबार के मालिक से शिकायत की थी।

वैसे नेहरू जी का प्रिय अखबार ‘हिंदू’ था।

कतिपय कारणों से कुछ दिनों के लिए नेहरू जब ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ और उसी ग्रूप के साप्ताहिक ‘द इलेस्टे्रटेड विकली आॅफ इंडिया’ से नाराज थे तो उन्होंेने तीन मूत्र्ति भवन में टाइम्स आॅफ इंडिया और ‘विकली’ मंगवाना बंद करवा दिया था।पर उन्होंने अखबार की आर्थिकी को क्षति पहुंचाने के लिए कोई  कार्रवाई  की, ऐसी कोई खबर नहीं है।
वामपंथी ‘ब्लिट्ज’ मोरारजी देसाई के खिलाफ अभियान चलाता था।उस पर मोरारजी की यही प्रतिक्रिया होती थी कि ‘मैं तो ब्लिट्ज पढ़ता ही नहीं।’

 एम.एस.एम.शर्मा के संपादकत्व में जब पटना के चर्चित दैनिक ‘सर्चलाइट’ ने बिहार के तत्कालीन मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंह के खिलाफ आपत्तिजनक खबरें परोसनी शुरू कीं तो जनसंपर्क विभाग के एक अफसर ने मुख्य मंत्री से कहा कि आप कार्रवाई क्यों नहीं करते ?

अफसर उम्मीद करता था कि मुख्य मंत्री सर्चलाइट को मिल रहा सरकारी विज्ञापन बंद करा देंगे।

पर,मुख्य मंत्री ने कहा कि मैंने तो बहुत कठोर कार्रवाई कर दी है।अफसर ने कहा कि हमारे यहां तो ऐसा कोई आपका निदेश अभी आया  नहीं है।इस पर मुख्य मंत्री ने कहा कि मैंंने सर्चलाइट पढ़ना ही बंद कर दिया है।किसी अखबार के खिलाफ इससे बड़ी कार्रवाई और कौन सी हो सकती है ?
दरअसल नेहरू, मोरारजी और श्रीबाबू जैसे नेताओं को यह लगता था कि जब जनता हमारे साथ है तो अखबारों के कुछ लिख देने से कोई  फर्क नहीं पड़ जाएगा।

  पर बाद के दशकों में जब कुछ विवादास्पद  नेता सत्ता में आने लगे तो उन्होंने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि उनके कुकर्माें की चर्चा अखबारों में न हो।होने पर अखबारों का भयादोहन शुरू हो गया।प्रेस पर अंकुश लगाने के लिए बारी- -बारी से बिहार और केंद्र सरकारों ने प्रेस विधेयक भी लाए। यदाकदा अखबारों के सरकारी विज्ञापन बंद होने लगे।

संपादक गिरफ्तार होने लगे। नेताओं  के कहने पर पत्रकार नौकरी से निकाले जाने लगे। या उनका तबादला होने लगा। इसका सीधा  असर अखबार की आर्थिकी पर पड़ा।

अखबार तो व्यवसायी ही निकालते हैं।जब राजनीति में ही गिरावट आने लगी तो व्यापारियों ने  समाज सुधार का ठेका तो ले नहीं रखा था। इसलिए रामनाथ गोयनका जैसे कुछ अत्यंत थोड़े से अपवादों  को छोड़कर अधिकतर अखबार मालिकों ने सरकारों के साथ तालमेल रखने में ही अपने उद्योग धंधे , अखबार तथा उसके स्टाफ का भला  समझा। 

मालिकों के साथ -साथ अधिकतर संपादकों को भी अखबार की आर्थिकी का ध्यान रखना पड़ा।संपादक ध्यान रखेंगे तो संपादकीय स्टाफ को भी रखना ही पड़ेगा। सरकार के खिलाफ खबरें आम तौर पर नहीं रुकीं,पर अभियानी पत्रकारिता पर काफी हद तक अंकुश लगा।

इलेक्टा्रॅनिक मीडिया के इस दौर में तो मीडिया के संचालन का खर्च बेशुमार बढ़ गया। अपवादों को छोड़ दें तो सबको कहीं  से भी पूंजी लाने, बचाने और बढ़ाने की चिंता रहने लगी। इस स्थिति में मीडिया के बड़े हिस्से के समक्ष संबंधित सरकार से सह अस्तित्व बना कर चलने की मजबूरी रही है।

इस देश में मीडिया का एक हिस्सा ऐसा भी है जो प्रतिपक्ष के एक हिस्से से तालमेल बैठाए हुए है ताकि जब वे सत्ता में आएंगे तो इनके भी अच्छे दिन आ जाएंगे।कुछ मामलों में विचारधारा भी हावी है।

एक जमाने में एक पेशवर यानी निष्पक्ष मीडिया के एक बड़े अधिकारी ने कहा था कि ‘यदि दुनिया में कहीं कम्युनिज्म आ रहा है तो हम उसे रोकने की कोशिश नहीं करेंगे।या कहीं से जा रहा है तो उसे बचाने की भी चेष्टा नहीं करेंगे।हम सिर्फ रिपोर्ट करेंगे कि फलां देश में आ रहा है और फलां देश से जा रहा है।’

अब ऐसी बात आम तौर से नहीं है।अपवादों की बात और है। कुल मिलाकर मोटा -मोटी यही स्थिति है।इसे ही स्वीकारना है।पाठकों -श्रोताओं के पास कोई और रास्ता भी नहीं है। रास्ता वही है जो मैं साठ -सत्तर के दशकों में करता था। सभी पक्षों की सुनिए,पर अपने मन की करिए। यानी आज के मीडिया के बीच के ‘ब्लिट्ज’, ‘दिनमान’ और ‘करंट’ तीनों को  वाॅच  करते रहिए। फिर किसी नतीजे पर पहुंचिए।

Saturday, October 14, 2017

स्वच्छ भारत के लिए सफाई का ‘सूरत माॅडल’ जरूरी



प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि चाहे जितने महात्मा गांधी और  नरेंद्र मोदी आ जाएं, जब तक व्यापक जन भागीदारी नहीं होगी ,देश में स्वच्छता नहीं लाई जा सकती।
  इस तरह प्रधान मंत्री ने यह स्वीकार किया कि उनका महत्वकांक्षी 
स्वच्छ भारत अभियान फिल्हाल  विफल रहा।
 पर इस संबंध में उम्मीद की किरण खुद गुजरात के सूरत से आती रही है।उसे खुद प्रधान मंत्री ने भी नजरअंदाज कर दिया है।
यदि उन्होंने पूरे देश में सफाई का ‘सूरत माॅडल’ लागू करवाने का प्रयास किया होता तो शायद उनका स्वच्छता अभियान इस तरह विफल नहीं होता।
 एक बात तो समझ ही लेनी चाहिए । पूरे देश में स्वच्छता अभियान की सफलता के लिए यह जरूरी है कि पहले नगरों और महा नगरांे की सफाई हो।बाद में अन्य स्थानों के लोग उससे सबक और प्रेरणा लेंगे।
  अन्यथा वह दिन दूर नहीं कि  नगरों-महा नगरों में महामारी फैल सकती है जैसा भारी गंदगी के कारण मई, 1995 में सूरत में फैला  था।
 तब वहां प्लेग से 52 लोगों की मृत्यु हो गयी थी।सूरत से लोगों का पलायन होने लगा था।
 पर इस स्थिति को बदलने मंे एक आई.ए.एस.अफसर, एस.आर.राव ने ऐतिहासिक काम किया था।
 थोड़े ही समय में उन्होंने सूरत को गुजरात का सर्वाधिक स्वच्छ नगर बना दिया।पूरे देश में भी तब से सूरत को नमूने के रूप में पेश किया जाने लगा ।
इस काम के लिए उस अफसर की इतनी तारीफ हुई कि लोगबाग उनका आॅटोग्राफ लेने लगे थे।
  श्री राव  सूरत के नगरपालिका आयुक्त थे।
राव ने सबसे पहले  अपने अधीनस्थ अफसरों को ए.सी.दफ्तरों से बाहर निकाल पर सड़कों पर खड़ा कर दिया।उन्हें उस काम में लगा दिया जिस काम के लिए उन्हें वेतन मिलता था।
 साथ ही उन्होंने बड़े -बड़े नेताओं और बिल्डरों की नाराजगी की परवाह किए बिना नगर से अतिक्रमण हटवा दिया।जो अमीर लोग अधिक गंदगी  फैलाते थे,उन पर सबसे पहले कार्रवाई हुई।
इसके अलावा भी उन्होंने कई कदम उठाए।
ऐसे कदमों के कारण न सिर्फ जनता वाहवाह कह उठी,बल्कि उसे अफसर को बाद में जन भागीदारी का भी पूरा लाभ मिला।  क्या प्रधान मंत्री जी राज्य सरकारों की मदद से देश के कम से कम एक दर्जन नगरों में ‘सूरत माॅडल’ नहीं दुहरा सकते हैं ? शुरूआत छोटे पैमाने पर ही  हो।बाकी बाद में करने लगेंगे।
 तमाम गिरावट के बावजूद अब भी इस देश में एस.आर.राव जैसे कुछ अफसर मिल जाएंगे ।पर शत्र्त है कि निहितस्वार्थियों के कोप से ऐसे अफसरों को  बचाना सरकार का काम है।
  यदि पटना, वाराणसी और दिल्ली जैसे महा नगरों को सफाई के मामले में ‘सूरत’ बना दिया गया तो छोटी जगहों के लोगबाग भी उसका अनुसरण करेंगे।
 लोगों से सफाई की अपील करने से  पहले सरकारों को चाहिए कि वे अपने महा पालिकाओं के अफसरों और कर्मचारियों को टाइट करें।जरूरत के अनुसार उनकी संख्या बढ़ाएं।
आप देश के नगर और महा पालिकाओं के अधिकतर अफसरों 
को जनता के पैसे लूटने की छूट दिए रहेंगे और जनता से कहेंगे कि वह सफाई करे तो यह तो जनता के प्रति अन्याय है।
 भगवान भी उसी की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करता है।पहल तो शासन को ही करनी होगी।
  अतिक्रमणकारियों का अमानवीय रवैया
पूरे बिहार के शहरी क्षेत्रों में मुख्य सड़कों पर भी अतिक्रमणकारियों का ही राज चलता है।उन्हें पुलिस और नगर निकायों के भ्रष्ट अफसरों से  पूरा सहयोग मिलता है।
‘गरीबों की रोजी -रोटी’ के बहाने सरकार भी उन पर कभी कड़ाई नहीं करती। वैकल्पिक व्यवस्था का आश्वासन भी पूरा नहीं किया जाता।बेचारी अदालत भी लाचार नजर आती है।
 स्मार्ट सिटी के शोर के बीच दरअसल अतिक्रमणकारियों ने न सिर्फ नगरों की सूरत बिगाड़ कर रख दी  है बल्कि वाहन चालकों के लिए  तो रोज ही ‘मरण’ का दिन होता है।
  भारी अतिक्रमणों से  लगातार हो रहे जाम के कारण कई बार न तो गंभीर मरीज समय पर अस्पताल जा पाते हैं और न छात्र-शिक्षक स्कूल -कालेज।
 सरकारी कमियों के लिए भी यह एक अच्छा -खासा बहाना मिल गया है।लेट पहुंचने पर वे अपने नियंत्रक पदाधिकारी  से आसानी कह देते  हैं कि ‘क्या करें सर, जाम में फंस गए थे।’ सड़कों की हालत देखकर अफसरों को भी उनकी बात मान लेनी पड़ती है।
जब अतिक्रमणकारी शासन से  लड़कर भी अपनी जगह पर बने रहते हैं तो अन्य कानून तोड़कों का भी मनोबल बढ़ता है।इस तरह शासन का दबदबा  कम होता है।इसका असर आम कानून-व्यवस्था पर भी पड़ता है। 
 इतनी बड़ी कीमत चुका कर सरकार अतिक्रमणकारियों के प्रति नरम बनी हुई है।ऐसा करके वह गरीबों की रोजी- रोटी की रक्षा कर रही है।अरे भई, उनके लिए कोई अन्य वैकल्पिक उपाय भी ढंूढ़े जा सकते हैं।यदि आपने शहर बसाया है तो क्या उस पर सिर्फ अतिक्रमणकारियों का ही राज चलेगा ? अन्य आम बांशिंदे कब तक कष्ट झेलते रहेंगे ?
     संघ प्रमुख का समयोचित आह्वान
  आर.एस.एस.प्रमुख मोहन भागवत ने आरा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय  धर्म सम्मेलन के मंच से एक अच्छी बात कही है।उन्होंने आह्वान किया है कि  लोगों को उंच-नीच की भावना से उपर उठकर जाति विहीन भारत का निर्माण करना चाहिए।
   संघ प्रमुख के इस आह्वान को कार्य रूप देने की दिशा में खुद संघ कई तरह से महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
 दरअसल संघ के कुछ प्रमुख नेता समय-समय पर पिछड़ों के लिए सरकारी नौकरियों में दिए गए जारी आरक्षण को लेकर तरह-तरह के बयान देते रहते हैं।हालांकि संघ दावा करता  है कि वह आरक्षण के खिलाफ नहीं है।वह उसमें सुधार चाहता है।
पर ऐसे बयानों से आरक्षण के दायरे में आने वाले समूहों को यह नाहक आशंका होने लगती है कि संघ आरक्षण पर ही पुनर्विचार के पक्ष में है।पिछड़ों -दलितों के लिए आरक्षण का प्रावधान भी जातीय भेदभाव कम करने की दिशा में एक छोटा सा कदम ही है।यह एक संवैधानिक प्रावधान है जिस पर 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी मुहर लगा दी है।
  इसलिए संघ यदि अपने परिवार के राजनीतिक संगठन  भाजपा को उलझन में नहीं डालना चाहता है तो उसके बड़े नेताओं को चाहिए कि वे आरक्षण पर कोई विचार व्यक्त करने से खुद को अलग ही रखें।   
       एक भूली बिसरी याद
  दिल्ली के एडिशनल चीफ मेट्रोपाॅलिटन मजिस्ट्रेट आर.दयाल ने 4 अक्तूबर 1977 को आरोपों को अपर्याप्त बताते हुए इंदिरा गांधी को तुरंत रिहा करने का आदेश दे दिया।उन्हें एक दिन पहले सी.बी.आई.ने गिरफ्तार किया था।
इस रिहाई पर तत्कालीन कें्रदीय गृह मंत्री चरण सिंह ने कहा था कि 
‘जिन आरोपों के तहत उन्हें गिरफ्तार किया गया था,वे गंभीर हैं।जांच के बाद कुछ और सबूत मिलेंगे।’
जय प्रकाश नारायण ने इस गिरफ्तारी पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया था।उन दिनों खबर थी कि इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी को लेकर मोरारजी सरकार के मंत्रियों के बीच मतभेद था।पर गृह मंत्री जल्दबाजी में थे।जल्दीबाजी में सी.बी.आई. ने आधे मन से केस तैयार किया था।
पर गिरफ्तारी और रिहाई का राजनीतिक असर पड़ा।सत्ता में वापसी की इंदिरा गांधी की राह कुछ आसान हो गयी।बाद की कुछ अन्य राजनीतिक घटनाओं ने तो 1980 में इंदिरा गांधी को एक बार फिर सत्ता में पहुंचा ही दिया।  
   और अंत में
 केंद्र सरकार उन मुखबिरों को 15 लाख से एक करोड़ रुपए तक का इनाम देने की तैयारी में है जो उसे बेनामी संपत्ति रखने वालों के खिलाफ खुफिया जानकारी देंगे।
  यह एक सराहनीय पहल है।पर इसमें थोड़ा संशोधन की जरूरत है।
एक करोड़ रुपए की अधिकत्तम सीमा  के बदले उद्घाटित बेनामी संपत्ति की कुल कीमत  का एक खास प्रतिशत खुफिया जानकारी देने वालों को मिलना चाहिए।तब यह पहल अधिक कारगर होगी।
@प्रभात खबर-- बिहार-- में 6 अक्तूबर 2017 को प्रकाशित मेेरे कानोंकान काॅलम से@ 






इंद्रदीप सिंहा एक प्रतिभाशाली छात्र


पटना विश्व विद्यालय जब अपना सौ साल पूरा करने
जा रहा है तो ऐसे समय में मुझे इस विश्व विद्यालय के 
एक अत्यंत मेधावी छात्र इंद्रदीप सिंहा की याद आ रही है।
 सच पूछिए तो कोई किसी विचार धारा का हो,पर यदि उसने 
समाज के लिए अपना सुखी जीवन छोड़ कर कष्टमय जीवन अपनाया,तो वैसे लोगों के प्रति मेरे मन में अत्यंत सम्मान का भाव रहता है।
इंद्र दीप सिंहा वैसे ही व्यक्तियों में थे।एक बेदाग जीवन जिए।
  उनसे मेरी कभी मुलाकात या बातचीत तो नहीं हुई ,किंतु मैं उनका प्रशंसक रहा हूं।
उन्होंने सन 1939 में जब पटना विश्व विद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए.पास किया था,तब विभागाध्यक्ष डा.ज्ञान चंद थे। डा.ज्ञान चंद जाने माने अर्थशास्त्री थे और आई.एम.एफ.और भारत सरकार के बड़े पदों पर भी रहे।इंद्रदीप सिंहा डा.ज्ञान चंद के छात्र थे।
  हां, तो इंद्रदीप सिंहा ने एम.ए.में विश्वविद्यालय में टाॅप किया था।कई वर्षों से किसी छात्र को अर्थशास्त्र में फस्र्ट क्लास भी नहीं मिला।
  इस उपलब्धि के बाद डा.ज्ञान चंद ने इंद्रदीप सिंहा से कहा कि तुम मेरा विभाग ज्वाइन कर लो।
लैक्चररशिप में तुमको हर माह 144 रुपए मिलेंगे।दो साल काम कर लो।बाद में तुम्हें फाॅरेन स्कालरशिप दिलाकर डाक्टरेट करने के लिए इंगलैंड भेज दूंगा।
इस पर इंद्रदीप सिंहा ने कहा कि नहीं,डाक्टर साहब मैंने स्कूली जीवन से  ही यह प्रण कर लिया है कि मुझे नौकरी नहीं करनी है।अंग्रेजी राज में तो नौकरी बिलकुल ही नहीं करनी है।
  इस तरह इंद्रदीप सिंहा ने राजनीति में कदम रखा।संघर्ष के पथ पर आगे बढ़ते चले गए।
बिहार सरकार में 1967-68 में राजस्व मंत्री रहे।राज्य सभा के सदस्य भी रहे।
भाकपा में भी बड़े पदों पर रहे।
अब वह इस दुनिया में नहीं हैं।
  

सत्तर के दशक में पटना विश्व विद्यालय


  इतिहासकार डा.ओम प्रकाश प्रसाद ने ठीक ही लिखा है कि पटना विश्व विद्यालय में दाखिला लेने से ही समाज में प्रतिष्ठा बढ़ जाती थी।
  हालांकि 1972 जब मैंने पटना लाॅ कालेज में दाखिला लिया,तब तक वैसी बात नहीं रह गयी थी। फिर भी चीजें उतनी बिगड़ी भी नहीं थी।कभी ‘पूरब का आॅक्सफोर्ड’ कहलाने वाले इस विश्व विद्यालय में मेरे जमाने में  क्लासेज होते थे और छात्रावासों में पढ़ने के समय छात्र सिर्फ पढ़ा करते  थे।
परिसर में अपेक्षाकृत शांति रहती थी।
हां, इस विश्व विद्यालय से जुड़े लाॅ कालेज में थोड़ी स्थिति भिन्न जरूर थी।थोड़ी उन्मुक्तता थी।
 फिर भी वहां भी रेगुलर क्लासेज होते थे ।यहां तक कि मूट कोर्ट भी।
  हां, मेरे जैसे कुछ छात्रों को पढ़ने में रूचि कम थी।राजनीति में अधिक थी।
इसलिए हाजिरी लगा कर हम पास की  चाय  दुकान पर अड्डा मारने और राजनीतिक गपशप करने चले जाते थे।
 इस काम में मुख्य तौर पर मेरे साथ होते थे दीनानाथ पांडेय जो इन दिनों कलिम्पांग में वकालत करते हैं।
  दरअसल तब तक मैं सक्रिय राजनीति में था और सोद्देश्य पत्रिकाओं के लिए लिखता भी था।
  मैंने लाॅ कालेज में दाखिला इसलिए भी कराया था ताकि जरूरत पड़ने पर रोजी -रोटी  के लिए वकालत कर सकूं।
  उससे पहले राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप में मैं छपरा के  वकील रवींद्र प्रसाद वर्मा के यहां रहता था।वर्मा जी एक समर्पित लोहियावादी थे और कम में ही गुजारा कर लेने की आदत मैंने उनसे सीखी थी।
अब वह नहीं रहे।पर मैं इतना कह सकता हूं कि वह यदि किसी बहुसंख्या वाली जाति से होते तो कम से कम विधायक तो जरूर ही हो गए होते ।
 खैर धीरे -धीरे  मैंने यह महसूस किया कि न तो राजनीति मेरे वश की बात है और न ही वकालत।इसलिए लाॅ कालेज में तीन साल पढ़ा जरूर , पर कोई परीक्षा नहीं दी।
प्रथम वर्ष की परीक्षा नहीं देने के बावजूद सेकेंड और बाद में थर्ड इयर में प्रवेश ले लेने की छूट थी।
 इस तरह मैं करीब तीन साल तक कभी के  ‘पूरब के आॅक्सफोर्ड’ कहलाने वाले विश्व विद्यालय का छात्र होने का सुख हासिल करता रहा। आपातकाल में सी.बी.आई.मेरी तलाश में लाॅ कालेज तक भी गयी थी।
सी.बी.आई. बड़ौदा डायनामाइट केस की जांच कर रही थी।उसे मेरे सिर्फ एक ही पक्के ठिकाने का पता चल सका था यानी पटना लाॅ कालेज। 
 लाॅ कालेज में  प्रेम प्रकाश सिंहा और महितोष मिश्र जैसे सिरियस छात्र भी मेरे मित्र थे और अक्षय कुमार सिंह जैसे छात्र नेता भी।
इन्हें राजनीति में गहरी रूचि थी।प्रेम प्रकाश तो शिक्षा अधिकारी बने थे,पर महितोष से बाद में कोई संपर्क नहीं रहा।
 कुछ अन्य  मित्र भी याद आते हैं जिनसे संपर्क नहीं रहा।वैसे लव कुमार मिश्र से लगातार संपर्क रहता है क्योंकि वह भी पत्रकारिता में ही हैं।
मेरे सहपाठी दुबले -पतले किंतु तेजस्वी अशोक जी
भी थे जो पटना हाईकोर्ट में वकालत करते हैं।कभी -कभी उनसे फोन पर बात हो जाती है।कभी देखना है कि वे अब भी उतने ही दुबले हैं क्या ?
अशोक जी  विदेशी लहजे में फर्राटे से अंग्रेजी बोलते थे।
तब लाॅ कालेज में बी.एन.श्रीवास्तव  प्राचार्य थे।पोद्दार साहब,प्रयाग सिंह  और हिंगोरानी जी प्रमुख  शिक्षकों में थे।
 1972 से पहले भी पटना विश्व विद्यालय के छात्रावासों में मैं जाता  था राजनीतिक चर्चाओं के लिए।
उन दिनों की एक खास बात मुझे याद है ,वह यह कि शाम में पढ़ाई के समय छात्रावासों में कोई बाहरी व्यक्ति जाकर गपशप नहीं कर सकता था।
  छात्रावासों के मेरे समाजवादी मित्र राम उदगार महतो,राम नरेश शर्मा ,राज किशोर सिंहा और सुरेश शेखर याद आते हैं।
 सुरेश प्रसाद सिंह उर्फ सुरेश शेखर ने 1966 में मैट्रिक में पूरे बिहार में टाॅप किया था।वह डा.लोहिया से प्रभावित थे।
 प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले सुरेश अत्यंत तेजस्वी और दबंग थे।
उन्होंने तब के युवा तुर्क चंद्र शेखर से प्रभावित होकर अपने नाम के साथ शेखर जोड़ा था।बाद में उन्हें राजनीति से निराशा हुई और रिजर्व बैंक की नौकरी में चले गये।अब वह इस दुनिया में नहीं रहे।वह नीतीश कुमार के दोस्त  थे।
  बातें तो बहुत है।फिलहाल इतना ही।
हां,एक इच्छा जरूर है । काश ! पटना विश्व विद्यालय में एक बार फिर कम से कम 1972 का भी माहौल कोई लौटा देता तो वह राज्य का बड़ा कल्याण करता।उससे पहले जाना तो बहुत कठिन काम है। 






Friday, September 22, 2017

भूख से अधिक भोजन के खिलाफ भी अभियान जरूरी

इन दिनों ‘चीनी छोड़ो अभियान’ की चर्चा है। पटना के बड़े चिकित्सकों के इससे जुड़ जाने से इसकी गंभीरता और भी बढ़ी है। लोगों पर इसका अच्छा असर दिख रहा है। पर एक दिक्कत आ रही है। सवाल है ंकि चीनी के बदले में हम जो गुड़ खरीदते हैं, वह कितना शुद्ध है!

कभी -कभी नकली और हानिकारक गुड़ कृत्रिम तरीके से बनाते हुए मिलावटखोर टी.वी. चैनलों पर नजर आते रहते हैं। ‘चीनी छोड़ो अभियान’ के साथ -साथ भूख से ‘कम खाओ अभियान’ की भी आज जरूरत है।
पांच साल पहले हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया भर में अति भोजन जनित मोटापा की समस्या, कुपोषण और भुखमरी की अपेक्षा अधिक बड़ी समस्या बन चुकी थी। उससे पहले बात उल्टी थी। आज तो स्थिति और भी खराब बताई जा रही है।

भारत के बारे में एक पुरानी कहावत है कि जितने लोग अति भोजन से मरते हैं, उससे कम ही लोग भोजन के अभाव में मरते हैं। मैंने खुद अपने कई परिचितों को अति भोजन का अभ्यस्त पाया। उनमें से शायद ही कोई व्यक्ति अपने शरीर की नियमित डाक्टरी या पैथोलाॅजिकल जांच कराता था। उनमें से कई व्यक्ति कम ही उम्र में  दुनिया से उठ गए।

अस्सी के दशक की बात है। न्यूयार्क टाइम्स के नई दिल्ली ब्यूरो चीफ माइकल टी. काॅफमैन पटना आए थे। उनके साथ भोजन का मौका मिला था। उन्होंने सिर्फ तली मछली के कुछ टुकड़े खाए। इधर मैंने चार रोटियों के साथ-साथ और भी बहुत कुछ खा लिया। बाद में मैंने अपने खानपान पर विचार किया। देखा कि मैं अति भोजन का आदी हो गया था। बहुत प्रयास के बाद आदत छूटी। आज यदि मैं एक रोटी से अधिक खा लूं तो असहज महसूस करता हूं। इसके बावजूद मैं बिना थके घंटांे काम करता हूं।

नियमित पैथोलाजिकल जांच कराने और अति भोजन से बचने का अभियान यदि बड़े डाॅक्टर चलाएं तो उसका अच्छा असर पड़ेगा। पर साथ-साथ राज्य सरकार कुकुरमुत्ते की तरह उग आए मानकरहित  पैथालाजिकल जांच केंद्रों पर ताले लगवाए। अच्छा है कि पटना हाईकोर्ट इस समस्या पर गंभीर है।  


अतिवादियों से दूर ही रहें नेता

अहमदाबाद विस्फोट के आरोपित तौसीफ का संबंध सिमी की बिहार शाखा का प्रधान रह चुका गुलाम सरवर से था। याद रहे कि तौसीफ को हाल में गया से गिरफ्तार किया गया। तौसीफ पर  आतंकवादी तैयार करने का आरोप है।

सिमी कैसा संगठन था, इस बात का पता एक बार फिरं देश को चला है। उसका घोषित उद्देश्य हथियारों के बल पर भारत में इस्लामिक शासन कायम करना था। जमात-ए-इस्लामी के छात्र संगठन के रूप में 1977 में सिमी का गठन अलीगढ़ में हुआ था। पर जब सिमी की अतिवादी गतिविधियों की खबर जमात-ए-इस्लामी को मिली तो उसने सिमी से अपना संबंध तोड़ लिया।

सिमी को 2001 में प्रतिबंधित किया गया। बाद में सिमी के लोगों ने मिल कर इंडियन मुजाहिद्दीन बना लिया है। इन दिनों आई.एम. किस तरह विस्फोटक कार्रवाइयां कर रहा है, यह हर जागरूक नागरिक को मालूम है। जिसे जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन से दुत्कार दिया, उसे हमारे देश के कुछ तथाकथित ‘सेक्युलर’ नेताओं ने अपना लिया।

करीब 15 साल पहले सिमी के समर्थन में कई राजनीतिक दल और उनके बड़े नेता सार्वजनिक रूप से उठ खड़े हुए थे। उनमें बिहार और उत्तर प्रदेश के चार बड़े नेता प्रमुख  थे। क्या वे नेता लोग जनता से इस बात के लिए अब माफी मांगेंगे कि सिमी को पहचानने में उनसे गलती हुई थी ? दरअसल ऐसी गलतियों के कारण ही भाजपा इस देश में मजबूत हुई है। पता नहीं माफी मांगेंगे या नहीं , पर कुछ ऐसे ‘सेक्युलरिस्ट’ नेतागण आज भी उसी तरह की गलतियां दुहरा रहे हैं।


डाॅ. स्वामी की चेतावनी

भाजपा के राज्यसभा सदस्य डाॅ. सुब्रमणियन स्वामी ने कहा है कि मैं अपनी जीवनी लिखूंगा और उसके बाद कई लोगों की प्रतिष्ठा समाप्त हो जाएगी। कौन -कौन लोग उनके दिमाग में हैं, यह तो वे ही जानते हैं। पर कुछ अनुमान जरूर लगाया जा सकता है। यानी राजनीतिक क्षेत्र के कुछ दिग्गज।

दरअसल डाॅ. स्वामी ने मनमोहन ंिसंह के शासनकाल में अनेक महाघोटालों को उजागर किया था। उन्होंने केस करके कई बड़ी हस्तियों को जेल भिजवाया। इस तरह 2014 चुनाव से पहले उन्होंने राजग के लिए राजनीतिक जमीन मजबूत की थी।

यानी 2014 की जीत में कुछ योगदान तो स्वामी का भी रहा। इसके एवज में उन्हें कैबिनेट मंे एक सीट तो मिलनी ही चाहिए थी। इसकी उम्मीद वह कर रहे थे। पर उनका दबंग व्यक्तित्व और कुछ मामलों में उनकी अतिवादी सोच के कारण वह नहीं हो सका।

उधर मोदी कैबिनेट में डाॅ. स्वामी के एक कट्टर विरोधी मजबूत स्थिति में हैं। अतः भविष्य में भी कोई चांस नहीं लगता। इस पृष्ठभूूमि में यदि डाॅ. स्वामी कोई विस्फोटक किताब लिखकर कुछ लोगों को बेनकाब करते हैं तो इसमें किसी को एतराज नहीं होना चाहिए। आम लोगों को भी यह जानने का हक है कि किस दल का कौन नेता देश की सेवा कर रहा है या कोई और धंधा। यह सब बताने की हिम्मत कम ही लोग में है। उन साहसी लोगों में डाॅ.  स्वामी भी  हंै।


बुलेट ट्रेन तो ठीक, पर आम यात्रियों की भी सुध लीजिए!

इस देश में बुलेट ट्रेन आ रही है। कुछ लोगांे को वह भी चाहिए। सरकार तो सबके लिए होती है। पर अब रेल ंत्री को चाहिए कि वह आम यात्रियों पर भी ध्यान दें। पिछली बार जब मैंने रेल यात्रा की थी तो यह अनुभव हुआ कि सेकेंड ए.सी. के शौचालय का दरवाजा टूटा हुआ है। किसी तरह काम चलाया।

अन्य समस्याएं अनेेक हैं। मोदी सरकार के आने के बाद लोगांे में उम्मीद बंधी थी। पर पता नहीं क्यों चीजें नहीं सुधर रही हैं। 

क्यों नहीं सुधर रही हैं, उस संबंध में एक खबर जवाब देगी। हजारों गैंग मैन रेलवे के बड़े अफसरों की निजी सेवा मंे हैं और उधर पटरियां असुरक्षित हैं। दुर्घटनाएं हो रही हैं। जिस महकमे में ऐसे -ऐसे अफसर हों, वहां किस तरह की उम्मीद आप कर सकते हैं? 


एक भूली बिसरी याद 

प्रधानमंत्री बनने से पहले तक लाल बहादुर शास्त्री के पास अपनी कोई निजी कार नहीं थी। याद रहे कि उससे पहले वे देश के गृहमंत्री और रेलमंत्री रह चुके थे। प्रधानमत्री बनने के बाद परिवार के सदस्यों ने उनसे कहा कि कम से कम अब तो एक अपनी कार होनी चाहिए। शास्त्री जी मान गए। उन्होंने अपना बैंक खाता चेक किया। उसमें 7 हजार रुपए थे। फिएट कार की कीमत उन दिनों 12 हजार रुपए थी। उन्होंने 5 हजार रुपए बैंक से कर्ज लिया।

कर्ज वापस करने से पहले ही शास्त्री जी का निधन हो गया। परवर्ती प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा कि इस कर्ज को हम माफ कर देना चाहते हैं। दिवंगत नेता की विधवा ललिता शास्त्री ने मना कर दिया। पेंशन के पैसे से कर्ज का भुगतान हुआ।   


और अंत में

स्वच्छ भारत अभियान का काम जहां से शुरू करना चाहिए था, वहां से नहीं हो रहा है। पहले तो देखना चाहिए कि देश के महानगरों और नगरों में जो वेतन भोगी सफाईकर्मी हैं, क्या उनकी संख्या पर्याप्त हैं ?
कार्यरत सफाई कर्मियों में से कितने कर्मी अफसरों के घरेलू नौकर बने हुए हैं और कितने सरजमीन सक्रिय हंै ? जिन सफाईकर्मियों को वेतन मिल रहे हैं, उनमें से कितने बोगस हैं और कितने असली ?
सफाई के काम के लिए ठीके पर लगाई गयी निजी एजेंसियों के साथ निकायों के अफसरों के घूसखोरी के रिश्ते की खबर में कितनी सच्चाई है ? 

(प्रभात खबर पटना में 22 सितंबर 2017 को प्रकाशित)

Saturday, September 16, 2017

वंशवादी राजनीति के बुरे नतीजे

सबसे पहले कांग्रेस ने इस देश की राजनीति में वंशवाद की शुरुआत की और जब कुछ अन्य दलों ने उसे अपना लिया तो अब राहुल गांधी कह रहे हैं कि ‘भारत ऐसे ही चलता है। यह भारत के अधिकतर दलों की समस्या है।’ जिसने शुरू किया, वही इसे समाप्त करने की पहल करे तो कांग्रेस भी बच सकती है और अन्य दल भी।
कांगे्रस यदाकदा यह कहती रही है कि जवाहर लाल नेहरू ने इस देश को वैज्ञानिक सोच दी। अनेक उच्चस्तरीय संस्थान भी दिए। पर वह यह कहना भूल जाती है कि सर्वाधिक समय तक इस देश पर राज करने वाली कांग्रेस के शासनकाल में यदि गरीबी बढ़ी, भ्रष्टाचार फैला और वंशवाद-परिवारवाद कायम हुआ तो उसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाए ?


मीठा-मीठा गप और कड़ुआ कड़ुआ थू ?

आज तो केंद्र के चारों शीर्ष पदों पर बैठे कोई नेता परिवारवाद की उपज नहीं हैं। फिर भी देश बेहतर ढंग से चल रहा है। अधिकतर आम लोगों की सोच है कि देश बेहतर चलना चाहिए चाहे वंशवादी चलाएं या गैर वंशवादी। पर घटनाएं बताती हैं कि अपवादों को छोड़कर गैर वंशवादियों ने ही देश को बेहतर ढंग से चलाया है।
आज शीर्ष पदों पर गैरवंशवादी ही क्यों बैठे हैं ? आखिर यह कैसे संभव हुआ ? इसलिए संभव हुआ क्योंकि मतदाताओं ने 2014 में कांग्रेस को सत्ता से हटा दिया जो अनेक बुराइयों और विफलताओं की प्रतीक बन चुकी थी। उनमें से अपनी एक -दो विफलताएं तो खुद राहुल गांधी ने भी स्वीकारी हैं।
पर विफलताएं तो अनेक हैं।


राहुल गांधी अपने वंशवाद को जायज ठहराने के लिए 

अखिलेश यादव से लेकर स्टालिन तक का उदाहरण दे रहे हैं। इस तरह वे अपने वंशवाद का बचाव करना चाहते हैं। पर 1928 में तो न कोई अखिलेश थे और न ही कोई स्टालिन। तब कांग्रेस अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे। महात्मा गांधी सर्वोच्च नेता थे।

मोतीलाल ने महात्मा गांधी को लिखा कि ‘वैसे तो सरदार बल्लभ भाई पटेल कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सर्वोत्तम उम्मीदवार हैं, पर आप जवाहर लाल नेहरू को अध्यक्ष बना दीजिए।’

नेहरू मेमोरियल में मोतीलाल पेपर्स पढ़ने के बाद इतिहासकार रिजवान कादरी ने लिखा कि ‘मोतीलाल नेहरू युवा को आगे बढ़ाना चाहते थे।’

आखिर किसी युवा की तलाश सिर्फ अपने ही घर से क्यों? एक चिट्ठी आने के बावजूद महात्मा गांधी जवाहर लाल को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने को तैयार नहीं थे। इसीलिए इसके लिए मोतीलाल नेहरू ने उन्हें दो  चिट्ठयां और लिखीं। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने अन्य हस्तियों से भी गांधी जी को लिखवाया। गांधी भारी दबाव में आ गए।
दरअसल यही तो वंशवाद है जिसे देश के अन्य दलों ने अपने स्वार्थवश बाद में अपनाया। ‘महाजनो येन गतः स पंथाः !’ नब्बे के दशक में लालू प्रसाद ने कहा था कि ‘मेरा परिवार बिहार का नेहरू परिवार है।’ उन्होंने इसे साबित करके भी दिखाया।

वंश को आगे बढ़ाने में मोतीलाल जी को थोड़ी कठिनाई जरूर हुई थी, पर जवाहर लाल नेहरू को नहीं हुई। उन्होंने 1958 में इंदिरा गांधी को 24 सदस्यीय कांग्रेस कार्यसमिति का सदस्य बनवा दिया। उससे पहले जवाहर लाल जी फिरोज गांधी तथा अपने परिवार के अन्य अनेक सदस्यों को महत्वपूर्ण पदों को बिठवा चुके थे।
1959 में जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाने की प्रक्रिया शुरू हुई तो कांग्रेसी सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री महावीर त्यागी ने जवाहर लाल नेहरू को चिट्ठी लिखी। त्यागी ने कई वजहें गिनाते हुए 31 जनवरी 1959 को लिखा कि ‘मेरी राय है कि इंदु को कांग्रेस प्रधान चुने जाने से रोको। या फिर आप प्रधानमंत्री पद से अलग हो जाओ।’उसके जवाब में जवाहर लाल नेहरू ने त्यागी को 1 फरवरी 1959 को लिखा कि ‘मेरा यह भी ख्याल है कि बहुत तरह से उसका इस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष बनना मुफीद होगा।’

आज राहुल गांधी अन्य दलों के वंशवाद की चर्चा कर रहे हैं। पर 1959 में किस दल के किस नेता ने अपनी पार्टी का अध्यक्ष पद अपनी संतान के हवाले कर दिया था ?  अब देखिए इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद क्या किया ? उन्होंने अपने पुत्र संजय गांधी को शासन  का संविधानेत्तर केंद्र बनातेे हुए आपातकाल में उनके जिम्मे एक तरह से सरकार ही सौंप दी थी। संजय गांधी के नहीं रहने के बाद इंदिरा जी ने राजीव गांधी को पार्टी सौंप दी। वे किसी राजनीतिक अनुभव के बिना महासचिव बना दिए गए।

हाल के वर्षों में सोनिया गांधी ने दस साल तक परदे के पीछे से राज चलाया। कैसा राज चला ? लोकसभा में 44 सीटें लायक ही तो। अब राहुल कह रहे हैं कि वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने को तैयार हैं।

वंशवाद की तारीफ होती, यदि वंशवादियों ने सत्ता में आकर देश का सचमुच देश का भला किया होता। यदि भला हुआ होता तो 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा नहीं दिया होता।
आजादी के बाइस साल बाद भी, जिसमें 19 साल एक वंश का शासन रहा हो, आखिर गरीबी क्यों नहीं हटी थी? क्या गरीबी हटाओ का नारा 17 साला शासन पर टिप्पणी नहीं था ?


अमरीकी शोधकर्ता पाॅल आर ब्रास का शोध


अमरीकी शोधकर्ता पाॅल आर ब्रास ने साठ के दशक में उत्तर प्रदेश सरकार में भ्रष्टाचार पर गहन शोध किया था। ब्रास के शोध का नतीजा था कि मंत्रियों ने जिलों में अपने गुटों को ताकत देने के लिए ऊपर से नीचे की ओर सरकारी भ्रष्टाचार को फैलाया।

 जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव ने लिखा है कि नेहरू ने भ्रष्ट मंत्रियों और अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की पोख्ता व्यवस्था इसलिए नहीं की क्योंकि वे मानते थे कि इससे शासन में पस्तहिम्मती आएगी।

जवाहर लाल और इंदिरा गांधी के शासनकाल मंे भ्रष्टाचार का क्या हाल था, उसका जवाब खुद राजीव गांधी ने अस्सी के दशक में दिया था। तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधीे ने कहा था कि हम सौ पैसे दिल्ली से भेजते हैं और गांवों तक उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही मिल पाते हैं।क्या यह एक दिन में हुआ ?

कोई पूछे कि ऐसी नौबत किसने लाई थी ? तो इस सवाल के जवाब के लिए किसी को सिर खुजलाना नहीं पड़ेगा।
 वंशवाद ने तो देश को यही दिया है ! कभी मिस्टर क्लिन कहलाने वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सत्ता के दलालों के खिलाफ आवाज उठाई थी। पर विडंबना यह रही कि बोफर्स तोप सौदे के दलाल को बचाने के प्रयास में ही उन्होंने अपनी गद्दी गंवा दी। यह अनुभवहीनता का परिणाम था या कुछ और ?

 उधर अधिकतर वंशवादी क्षेत्रीय दलों ने सत्ता में आकर तो हदें पार कर दी हैं। वैसे अनेक नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के तहत मुकदमे चल रहे हैं।

इस बीच इन दिनों गैर वंशवादी प्रधानमंत्री सत्ता में हैं। खुद नरेंद्र मोदी कौन कहे, उनके मंत्रिमंडल के किसी सदस्य के खिलाफ किसी भ्रष्टाचार के आरोप की कोई खबर नहीं मिल रही है।

यही नहीं, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो को उनके पद से तभी हटाया जा सका जब 1964 में लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने थे। उनपर और उनके परिजन पर भ्रष्टाचार के आरोप थे। जबकि कैरो के खिलाफ जांच आयोग ने पहले ही अपनी रपट दे रखी थी।
  दरअसल अधिकतर मामलों में वंशवाद और जातिवाद जुड़वा भाई हैं। वंशवादी नेता अपने जातीय वोट बैंक को लेकर निश्चिंत रहते हैं। फिर तो वह समझने लगते हंै कि वह कोई भी अनर्थ करके बच सकते हंै। उसके मतदातागण हर हाल में उसका साथ देते ही रहेंगे। इस प्रचलन-प्रवृत्ति से देश का अधिक नुकसान हुआ है।
 पर जो वंशवादी नहीं हैं, उन्हें सरकार में आने पर कुछ काम करके दिखाना पड़ता है।

(इस लेख का संपादित अंश 15 सितंबर 2017 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)

Friday, August 18, 2017

अपनी ही सुरक्षा से बेपारवाह नेता

 गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बीते दिनों लोकसभा में जब यह   सनसनीखेज जानकारी दी कि राहुल गांधी ने गत दो साल में सौ बार सुरक्षा नियमों को तोड़ा है तो कांग्रेसी सांसद नाराज हो गए। समझना कठिन है कि इसमें नाराज होने की क्या बात थी ? खैर इस खबर के साथ इस देश के उन तमाम बड़े नेताओं के नाम स्मृति पटल पर उभर आये जिन नेताओं ने अपनी सुरक्षा में लापरवाही के कारण अपनी जान गंवाई। न सिर्फ इंदिरा गांधी और राजीव गांधी, बल्कि खुद महात्मा गांधी ने भी अपनी सुरक्षा संबंधी पूर्व चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया था।

 इसका खामियाजा न सिर्फ खुद उन नेताओं को बल्कि इस देश को भी भुगतना पड़ा। ऐसे नेताओं की ओर इस देश के करोड़ों लोग बड़ी उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं। इसलिए उनकी जान पर सिर्फ उनका ही नहीं बल्कि देश का भी अधिकार है।

आजादी के बाद एक बार महात्मा गांधी ने कहा था कि वह सौ साल जीना चाहते हैं। पर देश के तनावपूर्ण माहौल में भी अपनी लंबी उम्र के लिए उन्होंने कोई प्रयास नहीं किया। नई दिल्ली की प्रार्थना सभा में सरकारी सुरक्षा की उच्चस्तरीय  पहल को महात्मा गांधी ने इसलिए भी बार-बार ठुकरा दिया था क्योंकि उन्हें ईश्वर पर अटूट विश्वास था। 

    दूसरी ओर तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ईश्वर के साथ-साथ सुरक्षा प्रबंध पर भी भरोसा करते थे। उन्होंने गांधी जी से कई बार विनती की थी कि वे बिड़ला भवन के आसपास हल्की सुरक्षा व्यवस्था भी मंजूर कर लें।  

     बिड़ला भवन के पास 20 जनवरी 1948 को हुए बम विस्फोट की घटना के बाद भी गांधी जी ने सरदार पटेल को धमकी दे दी थी कि यदि प्रार्थना सभा में आने वाले किसी भी व्यक्ति की तलाशी ली गई तो वे उसी क्षण से आमरण अनशन शुरू कर देंगे। आखिर वही हुआ जो गांधी जी के अनुसार ईश्वर को मंजूर था। 30 जनवरी 1948 को प्रार्थना सभा में नाथू राम गोड्से ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी। वह पिस्तौल लेकर प्रार्थना सभा में गांधी जी के पास तक आसानी से पहुंच गया था। यदि आगंतुकों की तलाशी हुई होती तो गोड्से की पिस्तौल तो पकड़ ही ली गई होती। महात्मा गांधी यदि सौ साल तक जीवित रहते तो इस देश की तस्वीर शायद कुछ और ही बन सकती थी। शायद बेहतर होती।

     जब महात्मा गांधी की जान नहीं बचा पाने के लिए कसूरवार ठहराते हुए जय प्रकाश नारायण और डा. राम मनोहर लोहिया ने तत्कालीन स्वराष्ट्र मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल पर तीखा वाक् प्रहार किये तो पटेल ने इन शब्दों में उसका प्रत्युत्तर दिया, ‘समाजवादी कहते हैं कि मैं महात्मा की रक्षा करने में असफल रहा। मैं महात्मा गांधी की सुरक्षा के लिए किए गए अनेक उपाय, जो मानव मस्तिष्क में आ सकते हैं, का यहां ब्योरा देते हुए उनके आरोप को अस्वीकार करता हूं।’ दरअसल गांधी जी तलाशी को ही राजी नहीं थे तो सरदार पटेल कितना कुछ करते!

    इसी तरह जून, 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हुए ‘ब्लू स्टार आपरेशन’ के बाद प्रधानमंत्री आवास से सारे सिख सुरक्षाकर्मी हटा दिए गए थे। ऐसा इंदिरा जी को बताए बिना किया गया था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस पर सख्त नाराजगी जाहिर की। उनके सचिव आर.के. धवन ने संबंधित सुरक्षा अधिकारी को बुलाकर पूछताछ की। अधिकारी से धवन ने कहा कि मैडम बहुत नाराज हैं। डी.सी. (पुलिस-सुरक्षा) ने कहा कि ब्लू स्टार आपरेशन के बाद अभी देश का माहौल तनावपूर्ण है। ऐसे में धार्मिक भावना में आकर कोई गार्ड प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर खतरा पैदा कर सकता है।

   इस तर्क के बावजूद इंदिरा गांधी के सख्त आदेश के मद्देनजर धवन ने उस अफसर को निदेश दिया। आदेश यह था कि वह सिख सुरक्षाकर्मियों को प्रधानमंत्री आवास में इस तरह तैनात करें ताकि वे अक्सर प्रधानमंत्री की नजरों के सामने आते रहंे। ऐसा ही हुआ। नतीजा सामने था। सिख संतरियों ने उनके आवास में ही इंदिरा गांधी की हत्या कर दी। प्रतिक्रियास्वरूप हजारों सिख मार डाले गये।

प्रधानमंत्री आवास में यदि सिख संतरी नहीं होते तो हजारों निर्दोष सिखों की जान तो बच जाती। सिख संतरियों को हटाये जाने से जो नुकसान होना था, उससे अधिक कीमती हजारों सिखों की जान थी। पर इस देश के नेता यह समझें तब तो !

  राजीव गांधी की हत्या तमिल उग्रवादियों ने 1991 में कर दी। उससे तीन सप्ताह पहले राजीव गांधी के सुरक्षा अधिकारी प्रदीप गुप्त ने एक पत्रकार को बताया था कि ‘मैं जानता हूं कि राजीव गांधी अपनी सुरक्षा के प्रति लापारवाह हैं। पर हम सावधान हैं। यदि कुछ होता है तो वह मेरी लाश पर होगा।’

  अब एक रपट पढि़ए जिसमें यह दर्ज है कि किस तरह  राजीव गांधी ने मौत को अपने पास बुलाया था। ‘राजीव गांधी 10 बजे रात में पहुंचे और तुरंत माला पहनानेवाले लोगों ने उन्हें घेर लिया। महिला सब इंस्पेक्टर अनुसूया ने एक बार फिर धनु को राजीव के निकट जाने से रोकने की कोशिश की। उन्होंने करीब- करीब उस हत्यारिन को पकड़ ही लिया था। लेकिन अनुसूया के अनुसार खुद राजीव गांधी ने कहा कि सबको मौका दो। उसके बाद अनसूया वहां से दूर चली गयी। इस तरह खुद उसकी जान बच गयी। धनु इस प्रकार झुुकी ंंजैसे राजीव के पैर छूना चाहती है। फिर राजीव उसे उठाने के लिए झुके। तभी धनु के दाहिने हाथ की उंगली ने बम का स्विच दबा दिया।’

  सन 2002 में लोकसभा के स्पीकर बालयोगी की आंध्र प्रदेश में हेलिकाॅप्टर दुर्घटना में मौत हो गयी। इस मामले में भी सुरक्षा नियमों का सरासर उलंघन किया गया था। नियम है कि वी.वी.आई.पी. जिस विमान या हेलिकाॅप्टर से यात्रा करेंगे, वह दो इंजन वाला होना चाहिए। उसमें दो पायलट भी होने जरूरी हैं। बालयोगी के मामले में इस में से किसी भी नियम का पालन नहीं किया गया था।

  सन् 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के लिए एस.पी.जी.सुरक्षा का कानूनी प्रावधान किया गया। पर यह सुविधा तब लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता को नहीं दी गयी थी। दरअसल जब नेता सत्ता में होते हैं तो वे सत्ता के नशे में यह नहीं समझ पाते कि वे खुद कभी प्रतिपक्ष में भी जाएंगे।

 इस तरह 1989 में जब राजीव गांधी प्रतिपक्ष के नेता बने तो उन्हें एस.पी.जी. सुविधा उपलब्ध नहीं थी। 1989 में वी.पी. सिंह की सरकार ने भी प्रतिपक्ष के नेता के लिए इसकी जरूरत नहीं समझी थी। यहां तक कि जब 1990 में कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तौभी राजीव गांधी के लिए एस.पी.जी.सुरक्षा का प्रावधान नहीं किया गया। कांग्रेस ने इसकी मांग भी नहीं की।

 पर जब तमिलनाडु में 1991 में राजीव गांधी की हत्या हो गयी तो कांग्रेस ने वी.पी. सिंह पर आरोप लगाया कि उन्होंने राजीव गांधी को यह सुविधा नहीं दी थी। इस तरह वी.पी. ने राजीव की सुरक्षा को नजरअंदाज किया। पर जब कोई नेता खुद ही अपनी सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहा हो तो भला कोई क्या कर सकता है ?

 राहुल गांधी को तो एस.पी.जी. की सुरक्षा मिली हुई है। फिर भी वह कई बार उसका उपयोग ही नहीं करते। राहुल अपनी विदेश यात्रा में एस.पी.जी. का सुरक्षा कवर नहीं लेते। हाल के गुजरात दौरे में भी राहुल गांधी अपने बुलेट प्रूफ कार के बदले एक अन्य कार पर सवार थे। उसी पर रोड़े लगे थे।

इस मामले में भी कांग्रेसी नेतागण सरकार पर आरोप लगा रहे हैं। राजनीतिक लाभ के लिए वे सिर्फ यही कर सकते हैं। क्योंकि वे सुरक्षा के प्रति सावधान रहने की सलाह राहुल गांधी को देने की हिम्मत तो कर नहीं सकते!
हालांकि यदि बड़े नेताओं के साथ कुछ बुरा घटित होता है तो उसका कुपरिणाम देश और संबंधित पार्टी को भी भुगतना पड़ता है। कल्पना कीजिए कि यदि राजीव गांधी हमारे बीच आज भी होते तो क्या होता ? कम से कम कांग्रेस लोकसभा में 44 सीटों पर तो नहीं ही सिमटती !  

(इस लेख का संपादित अंश 18 अगस्त, 2017 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)


Saturday, July 22, 2017

भ्रष्टाचार को क्यों बनने दिया गया लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज

महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार और पाखण्ड को लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज नहीं बनने दिया जाना चाहिए जैसा कि आज हो गया है।’ आजादी के तत्काल बाद सरकारों में जो कुछ हो रहा था, उससे महात्मा गांधी चिंतित थे। उन्होंने भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलने पर बिहार के एक कैबिनेट मंत्री को पदच्युत कर देने की सलाह दी थी। पर उनकी बात नहीं मानी गयी।

1967 के आम चुनाव में बिहार में कांग्रेस की पहली बार पराजय हुई थी। उस पराजय के लिए जिम्मेवार नेताओं में उस खास नेता के भ्रष्टाचरण का सबसे बड़ा ‘योगदान’ बताया गया।

आजादी के तत्काल बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका दिया जाना चाहिए।’ नेहरू ने इसकी जरूरत समझी होगी तभी तो कहा होगा। पर यह काम भी वह नहीं कर सके। भ्रष्ट लोग फलते-फूलते गये।

पहले भ्रष्ट लोग ‘अंडे’ से अपना काम चला लेते थे। बाद में ‘मुर्गी’ को ही मार कर खाने लगे। समय बीतने के साथ सरकारी पैसों की इतनी लूट होने लगी कि टिकाऊ संरचना बनना भी कठिन होने लगा। अब तो देश में ‘प्राक्कलन घोटाले’ का दौर है।

प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने कहा था कि ‘सत्ता के दलालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।’ राजीव ने सत्ता के दलालों का वर्चस्व देखा होगा तभी तो कहा होगा। पर दलालों के खिलाफ भी कार्रवाई नहीं हो सकी। उल्टे विडंबना यह रही कि बोफर्स दलाली के शोर के बीच ही 1989 के चुनाव में केंद्र में कांग्रेस की सरकार की पराजय हो गयी। 1991-1996 की नरसिंह राव की सरकार अल्पमत की  सरकार थी। बाद के वर्षों में कभी कांग्रेस को लोकसभा में अपना बहुमत नहीं हुआ। समय बीतने के साथ स्थिति बिगड़ती चली गयी। इसी पृष्ठभूमि में सन 2003 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह ने कह दिया था कि ‘राजनेता कैंसर हैं जिनका इलाज अब संभव नहीं।’ तब अनेक लोग लिंगदोह से असहमत थे। पर यह जरूर मानने लगे थे कि चीजें तेजी से बिगड़ रही हैं।

राज्यसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता मनमोहन सिंह ने 1998 में कहा था कि ‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है।’ उन्होंने सड़न देखी होगी तभी तो कहा होगा। पर जब श्री सिंह खुद प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उस सड़न को रोकने के लिए क्या किया ?

उल्टे उन्होंने जो कुछ किया, वह सब देश ने देखा और भोगा। 2014 के चुनाव में कांग्रेस लोकसभा में 44 सीटों पर सिमट गयी। इस देश के अधिकतर नेताओं ने प्रतिपक्ष में रहने पर तो अपने राजनीतिक विरोधियों के भ्रष्टाचार पर खूब हायतोबा मचायी। पर जब वे सत्ता में आए तो खुद बहती गंगा में हाथ धोया। अपवादों की बात और है।
अपवाद स्वरूप जो भी अच्छे नेता इस देश में बचे हुए हैं, वे या तो सत्ता के मोह में डूबे हुए हैं या फिर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ बौने साबित हो रहे हैं। सत्ता संभालते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को आश्वासन दिया था कि ‘मैं न तो खाऊंगा और न ही किसी को खाने दूंगा।’ मोदी मंत्रिमंडल के किसी सदस्य पर तो घोटाले का अब तक कोई आरोप नहीं लगा है, पर सरकार के दूसरे अंग लगभग पहले ही जैसे ‘काम’ कर रहे हैं। लगता है कि वे मोदी से भी अधिक ताकतवर हैं।

संभवतः इसीलिए तीन साल के शासनकाल के बाद भी प्रधानमंत्री को 6 अप्रैल 2017 को साहिबगंज में यह कहना पड़ा कि ‘भ्रष्टाचार और ब्लैक मनी ने दीमक की तरह चाटकर इस लोकतंत्र को बर्बाद कर दिया है। इसके खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा।’ पर सवाल है कि लोगबाग कब तक प्रतीक्षा करेंगे ?

मोदी सरकार की उपलब्धि और विफलताओं का सही आकलन तो 2019 में हो जाएगा। पर इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी याद आती है। उसने 5 अगस्त 2008 को ही कह दिया था कि ‘भगवान भी इस देश को नहीं बचा सकता है।’ इस विकट स्थिति में इस देश के नेताओं तथा अन्य क्षेत्रों के जागरूक और देशभक्त लोगों का क्या कर्तव्य बनता है ?

क्या भ्रष्ट नेताओं और अफसरों तथा इसी तरह के अन्य लोगों के खिलाफ देशहित में कठोर कार्रवाई होनी चाहिए या फिर यह तर्क दिया जाना चाहिए कि चूंकि पहले के लोगों ने इस देश को लूटा है, इसलिए हमें भी लूट लेने का जन्मसिद्ध अधिकार हासिल है?


मधु लिमये से एन.सी. सक्सेना तक के एक ही स्वर 

वैसे मधु लिमये तो 1988 में ही इस नतीजे पर पहुंच गए थे कि ‘मुल्क के शक्तिशाली लोग इस देश को बेच कर खा रहे हैं।’ सन 1998 में तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एनसी. सक्सेना ने कहा कि ‘इस देश में भ्रष्टाचार में जोखिम कम और लाभ ज्यादा है।’

याद रहे कि सक्सेना की इस टिप्पणी के बावजूद ‘जोखिम अधिक और लाभ कम’ करने वाले किन्हीं कानूनी प्रावधानों की जरूरत इस देश की सरकारें नहीं समझ पा रही हैं। इस दिशा में आधे -अधूरे मन से कहीं कुछ काम भी हुए हैं तो उसका कोई खास लाभ देश को नहीं मिल रहा है। याद रहे कि मधु लिमये ऐसे नेता थे जो न तो स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेते थे और न ही पूर्व सांसद पेंशन। अखबारों में लिखे अपने लेखों के पारिश्रमिक से ही वह जीवन यापन करते थे।


अब जरा आज के नेता को देखिए !

केंद्र सरकार प्रत्येक सांसद पर हर माह 2 लाख 70 हजार रुपए खर्च करती है। यह आंकड़ा 2015 का है। इसके बावजूद इस बुधवार को राज्यसभा में सपा के नरेंश अग्रवाल ने कहा कि मौजूदा तनख्वाह से सांसदों का काम नहीं चल रहा है। सांसदों का दबाव जारी रहा तो सरकार 2.70 लाख की राशि देर-सवेर बढ़ा ही देगी।

यह सब ऐसे देश में हो रहा है जहां के सरकारी अस्पतालों के पास सभी गंभीर मरीजों के लिए भी इलाज की व्यवस्था तक नहीं है। क्योंकि सरकारें धनाभाव से जूझ रही हंै। आए दिन यह खबर आती रहती है कि अस्पताल में मृतक मरीज के लिए शव वाहन का प्रबंध नहीं हो सका। कहीं शव दोपहिया पर ढोया जाता है तो कहीं ठेले पर।

पटना के एक बड़े सरकारी अस्पताल की ताजा खबर यह है कि अस्पताल के भीतर गंभीर मरीज को परिजन चादर पर रखकर उठा रहे हैं और एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा रहे हैं।


पटना एम्स की मारक उपेक्षा

पटना में स्थापित एम्स में भी साधन के अभाव में मरीजों का उचित इलाज नहीं हो पा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अस्सी के दशक में पटना में विद्यार्थी परिषद के नेता थे। परिषद की खबरों के हैंड आउट लेकर अखबारों के दफ्तरों का चक्कर लगाते मैंने उन्हें देखा था। यानी उनका बिहार से जो लगाव होना चाहिए था, वह नहीं है।
जबकि दिल्ली एम्स के कुल मरीजों में बिहार के मरीजों का प्रतिशत 40 है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पटना के निर्माणाधीन एम्स का निर्माण जल्द पूरा कर लिया जाना चाहिए था।

2004 में इस पटना एम्स का शिलान्यास हुआ था। अब तक 50 प्रतिशत काम भी पूरा नहीं हुआ है। दरअसल केंद्र सरकार पूरा फंड ही नहीं देती। हां,सांसदों के वेतन भत्ते के लिए उसके पास पैसों की कभी कोई कमी नहीं रहती।


लोकसभा टी.वी. और राज्यसभा टी.वी.

अब तक राज्यसभा टी.वी. और लोकसभा टी.वी. के अलग- अलग राजनीतिक स्वर रहे हैं। अब वह बात नहीं रहेगी। वैसे पहले दो स्वर होने के कारण भी रहे हैं। लोकसभा की स्पीकर पहले भाजपा की नेता थीं। राजग का बहुमत राज्यसभा में नहीं है। राज्यसभा के निवर्तमान सभापति यानी उपराष्ट्रपति कांग्रेसी पृष्ठभूमि के रहे हंै। अब उस पद को अगले उपराष्ट्रपति संभालेंगे। वह भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

अब या तो राज्यसभा टी.वी. और लोकसभा टी.वी. का विलयन हो जाएगा या फिर पिछले विरोधाभास की समाप्ति हो जाएगी।


और अंत में

  संविधान के अनुच्छेद- 212 के अनुसार ‘न्यायालयों द्वारा विधायिकाओं की कार्यवाहियों की जांच नहीं की जा सकेगी।’ जब संविधान बना था, उन दिनों सदन की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की सुविधा नहीं थी। देवताओं के बारे में राज्यसभा में एक सपा नेता के कुवचन को देखते हुए अब नयी व्यवस्था की जरूरत आ पड़ी है। या तो सदनों में उच्चारित ऐसे कुवचनों के खिलाफ अदालत में मुकदमा चलाने की संवैधानिक छूट मिले या फिर सदन की कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण यथाशीघ्र बंद हो।

 (इसका संक्षिप्त अंश 21 जुलाई 2017 के प्रभात खबर (बिहार) में प्रकाशित)

Sunday, July 16, 2017

सजायाफ्ता कर्मचारी मंजूर नहीं तो नेताओं को क्यों मिले छूट

इस देश की सरकार किसी सजायाफ्ता को चपरासी तक की नौकरी नहीं देती। पर  सजायाफ्ता नेता, प्रधानमंत्री के पद तक भी पहुंच सकता है। इस तरह की विसंगतियों को दूर करने की उम्मीद नरेंद्र मोदी सरकार से कुछ लोग कर रहे थे। पर उन्हें अब निराशा हो रही है। जब सजायाफ्ता नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक की मांग को लेकर जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी तो केंद्र सरकार ने उस पर अपनी मंशा जाहिर कर दी।

केंद्र सरकार के वकील ने कहा कि यह मामला सुनवाई के लायक ही नहीं। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने यह ठीक ही सवाल उठाया है कि ऐसे में जब सरकारी कर्मचारियों और न्यायिक पदाधिकारियों पर आजीवन पाबंदी लग जाती है तो जनप्रतिनिधियों पर क्यों नहीं लगे ? उन्होंने राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण और भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि में यह याचिका दायर की है। इस याचिका पर 19 जुलाई को  सुनवाई होगी।

गत बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को फटकारा। आयोग इस मुद्दे पर कोर्ट को यह नहीं बता रहा है कि वह आजीवन प्रतिबंध के पक्ष में है या नहीं। संभवतः आयोग इस मामले में केंद्र सरकार के रुख के अनुसार ही काम कर रहा है। राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टीकरण से ऊबे इस देश के अनेक लोग सुप्रीम कोर्ट से ही यह उम्मीद कर रहे हैं कि वह इस मामले में सरकार को सख्त निर्देश दे। अन्यथा कुछ दिनों के बाद संविधान की रक्षा करना और भी मुश्किल हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट को ही तो देखना है कि इस देश में संविधान के अनुसार काम चल रहा है या नहीं। यदि राजनीति में भ्रष्ट और अपराधी लोगों की बढ़ती संख्या की रफ्तार को तत्काल नहीं रोका गया तो विधायिकाएं भ्रष्टाचार और अपराध के आरोपियों से पूरी तरह भर जाएंगी। अभी उनकी संख्या सदन की कुल संख्या की एक तिहाई है। याद रहे कि  किसी सांसद या विधायक को कम से कम दो साल की सजा मिलने के तत्काल बाद उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है। पर सजा पूरी हो जाने के छह साल बाद वह फिर से चुनाव लड़ सकता है।



यूं हुई अच्छे कार्यकर्ताओं की कमी

जब तक इस देश में संयुक्त परिवारांे का दौर चलता रहा, अच्छी मंशा वाले राजनीतिक कार्यकर्ता विभिन्न राजनीतिक दलों को मिलते रहे। पर अब तो लघु परिवारों का जमाना है। अब भी जहां-तहां संयुक्त परिवार मौजूद हैं, पर उनकी संख्या कम होती जा रही है।

पहले संयुक्त परिवार से निकले राजनीतिक कार्यकर्ता के पत्नी और बाल-बच्चों की देखरेख संयुक्त परिवार कर देता था। यानी सच्चे राजनीतिक कार्यकर्ता बनने की इच्छा रखने वालों के लिए नौकरी करने की मजबूरी नहीं थी।

पर आज तो सबको अपने-अपने लघु परिवार का पालन-पोषण खुद ही करना है। इसलिए कोई व्यक्ति राजनीतिक कर्म में लगता भी है तो वह निजी खर्चे के लिए राजनीति या शासन से ही पैसे निकालना चाहता है। हालांकि सारे राजनीतिक कार्यकर्ता ऐसे नहीं हैं। कुछ कार्यकर्ता अब भी निःस्वार्थ भाव से राजनीति में लगे हुए हैं। पर अनेक कार्यकर्ताओं को या तो कोई ठेकेदारी चाहिए या दलाली का धंधा।

अपराध के धंधे में भी काफी पैसे हैं। राजनीति के पतन का यह बड़ा कारण है। पता नहीं इस स्थिति से देश की राजनीति को कौन बचाएगा ? मौजूदा राजनीति न  तो भ्रष्टाचार और न ही अपराध पर निर्णायक हमले की स्थिति में है। राजनीति की इन दो विपदाओं को जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक की ताकत भी बढ़ाती जा रही है।



संकट में दोस्तों की पहचान

1967 में विदेश मंत्री एम.सी. छागला ने लोकसभा में कहा था कि भारत-चीन सीमा विवाद पर सोवियत संघ अब भारत के पक्ष को समझ गया है और वह हमें ही सही मानता है। पर 1962 में चीन ने जब भारत पर हमला किया तो सोवियत संघ ने हमें मदद करने से साफ मना कर दिया था। तब वह हमारे देश का पक्ष समझने को भी तैयार नहीं था। उसने कहा था कि चीन हमारा भाई है और भारत हमारा दोस्त। यानी दोस्त के लिए कोई भाई से झगड़ा नहीं करता।

हां, तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने न चाहते हुए भी अमेरिका से मदद मांगी। चीन सीमा से इस आशंका से पीछे हट गया था कि कहीं अमेरिका हस्तक्षेप न कर दे। उससे पहले भारत अमेरिका से दोस्ताना संबंध नहीं रखना चाहता था। दूसरी ओर वह सोवियत संघ से घनिष्ठ संबंध के पक्ष में रहा।

आज भी जब हमारे  देश पर युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, तो हमें विभिन्न देशों से दोस्ती के सिलसिले में अपने हितों को ध्यान में रखना चाहिए न कि किन्हीं अन्य बातों कोे। दुनिया के अन्य सभी देश भी अपने राष्ट्रीय हितों का ही ध्यान रखते हैं। पर हमारे ही देश में ऐसी राजनीतिक शक्तियां भी हैं जो परमाणु परीक्षण करने पर   चीन की तो तारीफ करती हैं, पर वही काम जब भारत सरकार करती है तो वह उसका विरोध करती है। 



कांग्रेसी वकील क्यों नहीं दिखाते करामात  

टू जी स्पैक्ट्रम आवंटन घोटाले में जीरो लाॅस का सिद्धांत पेश करने वाले मशहूर वकील कपिल सिब्बल ने अब एक नयी ‘थ्योरी’ पेश की है। स्पैक्ट्रम की नीलामी शुरू होते ही सिब्बल की जीरो लाॅस थ्योरी तो फेल हो गयी। अब देखना है कि उनकी नयी थ्योरी पास होती है या फेल!

सिब्बल का आरोप है कि भाजपा के सत्ताधारी नेताओं के यहां आयकर और ईडी के छापे क्यों नहीं पड़ रहे हैं ? क्या वे सब के सब स्वच्छ हैं ? सिर्फ गैर राजग दलों के नेता ही दागी हैं ? कपिल साहब के सवाल में दम है। यदि जनहित याचिकाओें के मामलों में कपिल सिब्बल, डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी और प्रशांत भूषण की राह अपना लें तो उन्हें इसका रोना नहीं रोना पड़ेगा कि केंद्र सरकार एकतरफा कार्रवाई कर रही है।

डाॅ. स्वामी और प्रशांत भूषण ने मनमोहन सिंह के शासनकाल में सिर्फ कपिल सिब्बल की तरह रोना तो नहीं रोया था। उन्होंने जनहित याचिकाओं के जरिए जांच एजेंसियों को ऐसी हस्तियों के खिलाफ भी कार्रवाई करने को मजबूर कर दिया था  जिन्हें मनमोहन सरकार बचा रही थी। 

यदि सिब्बल के पास भाजपा नेताओं के खिलाफ वैसे ही ठोस सबूत हैं तो वह जनहित याचिकाओं का सहारा क्यों नहीं ले रहे हैं ? सिब्बल तो बड़े काबिल वकील हैं। क्या उनके लिए जनहित याचिकाओं का रास्ता बंद है ? या फिर उनके पास कोई सबूत ही नहीं है ? क्या सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए बयान देना इतने बड़े वकील को शोभा देता है ?

अपनी सरकार में शामिल लुटेरों के खिलाफ मनमोहन सिंह सरकार जब कार्रवाई नहीं कर सकी जिस सरकार के खुद सिब्बल भी मंत्री थे तो वह मोदी सरकार से ऐसी उम्मीद क्यों कर रहे हंै ? आम धारणा यह है कि लगभग सभी दलों में चोर और लुटेरे घुसे हुए हैं। हालांकि उन्हीं के बीच ईमानदार नेता भी हैं। सत्ताधारी दल अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई करेगा ही।

पर राजग विरोधी दलों को भी चाहिए कि वे भी अपने बीच से ‘डाॅ. स्वामी’ और ‘प्रशांत भूषण’ तैयार करंे ताकि दोनों पक्षों के लुटेरों को उनके सही स्थान पर पहुंचाया जा सके।



और अंत में

एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता ने गुरुवार को मीडिया से कहा कि सी.बी.आई.जितने मामलों की जांच करती है, उनमें से सिर्फ 30 प्रतिशत मामलों में ही वह आरोपितों को अदालतों से सजा दिलवा पाती है। पर सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार ने गत अप्रैल में लोकसभा में बताया कि वह दर 66 दशमलव 8 प्रतिशत है। प्रवक्ता जी यह कहना चाहते थे कि बहुधा सी.बी.आई. झूठे केस तैयार करती है  जो अदालतों में नहीं टिकते। सी.बी.आई. की आलोचना से पहले अपने आंकड़े तो ठीक कर लीजिए प्रवक्ता जी ! 

(प्रभात खबर में 14 जुलाई 2017 को प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से)

इस गरीब बिहार में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा है भी या नहीं ?

ऊपरी तौर पर तो अब यह लग रहा है कि बिहार का सत्ताधारी महागठबंधन बिखराव के कगार पर है, पर राजनीति में कभी भी कुछ भी संभव है। इस बीच कोई दूसरा मोड़ भी आ सकता है। अगले कुछ दिन  महत्वपूर्ण होंगे। तब सब कुछ साफ हो जाएगा।

ताजा टकराव उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के इस्तीफे की मांग को लेकर है। पर क्या जदयू और राजद के बीच मतभेद का सिर्फ यही कारण है ? या फिर पहले से ही कुछ मुद्दों पर महागठबंधन के घटक दलों में भीतर -भीतर टकराव जारी था ? क्या वह राजनीतिक शैलियों का टकराव नहीं रहा है ?

क्या ताजा विवाद ऊंट की पीठ पर अंतिम तिनके के रूप में सामने आया है? पता नहीं। आने वाले दिन इन सवालों का जवाब दे सकते हैं।

याद रहे कि गठबंधन में टूट के बाद आरोप-प्रत्यारोपांे का दौर शुरू होता है। उस दौरान बहुत सारी अनकही बातें सामने आती हैं। इस मामले में वह नौबत आएगी ही, ऐसा यहां नहीं कहा जा रहा है। पर नहीं ही आएंगी, यह भी तय नहीं है।

यदि जदयू और राजद के बीच टकराव ऐसे ही जारी रहा तो आने वाले दिनों में कुछ भीतरी बातें भी खुल कर सामने आ ही सकती हैं। लगता है कि मूलतः यह शैलियों के बीच के टकराव की समस्या है। राजद और जदयू की शैलियों पर क्रमशः लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की छाप रही है। वैसे नीतीश सरकार के वरिष्ठ मंत्री और जदयू नेता बिजेंद्र प्रसाद यादव का यह सवाल एक हद तक सही है कि जब जदयू और राजद के बीच समझौता हुआ था तब नहीं जानते थे कि लालू चार्जशीटेड हैं?

पर सवाल सिर्फ लालू प्रसाद का ही नहीं है। अब तो नीतीश कुमार के बगल में बैठने वाले उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का भी है। याद रहे कि लालू प्रसाद के दोनों पुत्र तेजस्वी और तेज प्रसाद नीतीश मंत्रिमंडल में हैं।
रेलवे के होटलों की नीलामी जिसके नाम हुई, उसी व्यापारी से पटना में जमीन लेने का आरोप लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव पर लगा है। इस मामले में सी.बी.आई. ने इन तीनों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है।

इस पर जब भाजपा ने तेजस्वी के इस्तीफे की मांग की तो जदयू ने कहा कि जिन पर आरोप है, वे अपने जवाब से जनता को संतुष्ट करें। जदयू का इशारा तेजस्वी की ओर है। तेजस्वी और राजद अपने ढंग से जवाब दे रहे हैं। राजद ने कहा है कि तेजस्वी निर्दोष हैं और वह इस्तीफा नहीं देंगे। अब देखना है कि तेजस्वी के बारे में राजद के इस जवाब से जदयू संतुष्ट होता भी है या नहीं। उम्मीद तो कम है।  

तेजस्वी के इस्तीेफे की संभावना से साफ इनकार के बाद अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर यह निर्भर है कि वह तेजस्वी सहित राजद खेमे के मंत्रियों से खुद को अलग कर लेने के लिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देते हैं या तेजस्वी को बर्खास्त करने की राज्यपाल से सिफारिश करते हैं। वह घड़ी आने से पहले इस बीच जितने दिन दागी उपमुख्यमंत्री के साथ सरकार चलाएंगे, उतने ही दिन नीतीश की छवि पर प्रश्न चिह्न बना रहेगा।
वैसे राजद से नाता तोड़ने की स्थिति में भाजपा नीतीश की सरकार को बाहर से समर्थन देने को तैयार है। अब फैसला नीतीश को ही करना है। 

इस बीच महागठबंधन के नेताओं के बीच भ्रष्टाचार के सवाल पर बहस शुरू हो गयी है। एक लालू समर्थक नेता और पूर्व जदयू सांसद शिवानंद तिवारी ने सवाल किया है कि क्या नीतीश के साथ बैठने वाले नेता हरिश्चंद्र की औलाद हैं ?

यानी राजद का यह तर्क है कि जब आपके साथ भी दागी लोग मौजूद ही हैं तो हमारे नेता पर प्राथमिकी दर्ज होने मात्र से इस्तीफा क्यों मांग रहे हैं? राजद का यह भी तर्क है कि भाजपा जब लालू परिवार को जेल भिजवा देगी तो नीतीश कुमार को मसलने में उसे कितना समय लगेगा।

पर जदयू का तर्क है कि खुद नीतीश कुमार पर कोई दाग नहीं है और वह अपनी सरकार की छवि साफ-सुथरी रखना चाहते हैं। इससे कोई समझौता नहीं होगा, चाहे सरकार रहे या जाए।

दरअसल राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार भ्रष्टाचार के आरोपों के मामले में ‘गुण’ के साथ-साथ ‘मात्रा’ का भी अब सवाल है। भ्रष्टाचार के आरोपी को  सहने की क्षमता अलग -अलग नेताओं की अलग -अलग रही है। इस मामले में नीतीश की तो बहुत कम है। दरअसल हाल के दिनों में लालू परिवार के खिलाफ जितने घोटालों की खबरें सामने आती जा रही  हैं, उनको यदि जांच एजेंसियां तार्किक परिणति तक पहुंचाने लगंेगी तो लालू परिवार के अनेक सदस्य जांच के दायरे और न्याय के कठघरे में होंगे।

ऐसे में सवाल यह है कि एक ऐसी पार्टी के साथ मिलकर साफ छवि वाले नीतीश, सरकार चलाएंगे जिस दल के अधिकतर प्रमुख नेता जांच के घेरे में हो ? जदयू के सामने यह एक बड़ा सवाल है। यदि सरकार चलाएंगे तो नीतीश की छवि पर उसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। यदि छवि बची रहेगी तो आगे भी नीतीश मुख्यमंत्री बन सकते हैं। यदि वही नहीं रहेगी तो फिर क्या होगा ?

पर इस राजद-जदयू मुठभेड़ में जदयू के ही दो वरिष्ठ नेता नीतीश से अलग राय रखते हैं। बिजेंद्र प्रसाद यादव के बयान का चुनावी राजनीति की नजर में भी खास महत्वपूर्ण है। उधर जदयू सांसद शरद यादव ने भी इस मामले में जदयू की लाइन से अलग राह पकड़ ली है। शरद-बिजेंद्र की लाइन पर जदयू के और कितने विधायक हैं ? यह देखना दिलचस्प होगा। क्या इन दोनों नेताओं पर अपने ‘खास’ मतदाताओं की ओर से कोई दबाव है? क्या उन मतदाताओं की सहानुभूति लालू परिवार के साथ है ?

यदि ऐसा है तब तो बिहारी समाज में उसकी प्रतिक्रिया भी संभव है। न्यूटन का सिद्धांत लागू हो सकता है। इसकी प्रतिक्रिया राजद और कांग्रेस विधायक दलों में भी हो सकती है। फिर इस राज्य की अगली राजनीति कुछ अलग ढंग की होगी।

इसी माहौल में इस बीच यदि बिहार विधानसभा के मध्यावधि चुनाव की नौबत आ जाए तो फिर कैसे नतीजे आएंगे ? मध्यावधि चुनाव की आशंका जाहिर करने का कारण मौजूद हैं। मौजूदा महागठबंधन यदि टूटेगा तो नया गठबंधन बन सकता है। इस बनने-बिगड़ने के क्रम में यह भी संभव है कि कुछ विधायक दलों में भी छोटी-मोटी टूट-फूट हो। फिर तो राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बन सकती है। वैसी स्थिति में विधानसभा के मध्यावधि चुनाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

यदि चुनाव होगा तो उसके नतीजों से इस बात का पता चल जाएगा कि इस गरीब प्रदेश बिहार के आम मतदातागण भ्रष्टाचार और अपराध को कितना बुरा मानते हैं। या फिर इन दोनों तत्वों को वे राजनीति का अनिवार्य अंग मानते हैं। चुनाव नतीजे के जरिए इस सवाल का भी जवाब मिल जाएगा कि मतदातागण राजनीति और प्रशासन में भ्रष्टाचार को दाल में नमक के बराबर ही बर्दाश्त करेंगे या अतिशय भ्रष्टाचार से भी उन्हें कोई एतराज नहीं है। सामाजिक न्याय, धर्म निरपेक्षता, सुशासन और स्वच्छ छवि के भी सवाल उठंेगे। वे भी मतदाताओं की कसौटी पर होंगे। याद रहे कि इन सभी तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले दल और नेतागण बिहार की राजनीति में अलग -अलग अपनी उपस्थिति बनाये हुए हैं।

बिहार में यह सवाल भी उठता रहा है कि आजादी के तत्काल बाद के कुछ सत्ताधारी नेतागण जब लूट रहे थे तो इतना हंगामा क्यों नहीं हुआ ? मीडिया तथा सवर्ण शक्तियां तब क्यों चुप थीं ? अब क्यों हंगामा हो रहा है? पर मौजूदा भ्रष्टाचार पर तो एतराज जदयू को भी है जो पिछड़ा नेतृत्व वाली पार्टी है। पिछड़ा नेतृत्व जरूर है, पर जदयू में विभिन्न सामाजिक जमातें अन्य दलों की अपेक्षा बेहतर अनुपात में उपस्थित हैं।


( 15 जुलाई 2017 के राष्ट्रीय सहारा के ‘हस्तक्षेप’ में प्रकाशित)

Sunday, July 9, 2017

कहां से चले थे कहां पहुंच गए लालू!

लोकसभा में 2013 में लोकपाल विधेयक पर चर्चा के दौरान उस विधेयक का विरोध करते हुए लालू प्रसाद ने कहा था कि यदि राजनीतिक दलों ने व्हीप जारी नहीं किया होता तो लोकपाल बिल के पक्ष में पांच प्रतिशत सांसद भी वोट नहीं देते। लोकपाल को नेताओं के लिए फांसीघर मानने वाले लालू प्रसाद ने संभवतः अनेक सांसदों से व्यक्तिगत बातचीत के आधार पर ही ऐसा कहा था। इसीलिए तब सदन में उपस्थित किसी सदस्य ने खड़ा होकर लालू की बात का खंडन नहीं किया। लोकपाल विधेयक के खिलाफ लालू प्रसाद जब बोल रहे थे तो सदन में उपस्थित अधिकतर सांसदों के हाव भाव व प्रतिक्रियाओं से भी यह लग रहा था कि लालू प्रसाद को उन लोगों का भीतरी समर्थन प्राप्त है।

  यानी 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद भ्रष्टाचार के प्रति लालू प्रसाद ने जो अपना कठोर रुख प्रदर्शित किया था, 2013 आते आते वह लालू पूरी तरह बदल चुके थे।

    1992 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने इन पंक्तियों के लेखक से बातचीत में कहा था कि ‘भ्रष्ट और माफिया तत्वों के ऊपर मैंने प्रहार किया है। वे तत्व चूं भी नहीं कर सके। वे मेरे सामने भी नहीं आए। कोई पैरवी भी नहीं आई। पहले के राज में मजाल था कि किसी पर आप एक्शन कर लेते ? वे तत्व पिछले मुख्यमंत्रियों की छाती पर चढ़ जाते थे। जब चीफ मिनिस्टर ही उसमें संलग्न रहेगा तो वह आंख कैसे तरेरेगा ?’

  अपने मुख्य मंत्रित्वकाल के प्रारंभिक दिनों में लालू प्रसाद न सिर्फ सामाजिक अन्याय के मामले में, बल्कि भ्रष्टाचार के मामले में भी कठोर दिखाई पड़ते थे। 1990 के मंडल आरक्षण आंदोलन के दौरान तो लालू ‘मंडल मसीहा’ भी कहलाए। तब बिहार के पिछड़ा वर्ग के अधिकतर लोग उन्हें अपना नेता मानने लगे थे।

पर आज क्या हो रहा है ? आज लालू प्रसाद करीब- करीब हर मामले में यथास्थितिवादी नजर आ रहे हैं। लगता है कि मसीहा भटक गया है। उसी भटकाव की सजा उन्हें आज मिल रही है।

उनकी यथास्थितिवादिता लोकपाल विधेयक पर उनकी टिप्पणी से साफ हो गयी थी। कई कारणों से समय के साथ लालू प्रसाद पूरे पिछड़ोंं के नेता भी अब नहीं रहे।

आज जो कुछ उनके साथ हो रहा है, उसके लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है। खुद  और अपने पूरे परिवार के चारों ओर येन केन प्रकारेण आर्थिक सुरक्षा की ऊंची  और मजबूत दिवाल खड़ी करने के लोभ में उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ गया है। इससे उनके अनेक समर्थकों में भी उदासी है।

 लालू प्रसाद कभी कहा करते थे कि विषमताओं और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ कोई आंदोलन इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि पोथी -पतरा उसमें बाधक है। पोथी - पतरा वाले गरीबोंं को समझा देते हैं कि भगवान की वजह से ही तुम गरीब हो।

पर, अब लालू प्रसाद ही नहीं, बल्कि  उनके परिजन भी जब मुकदमों में फंसे तो पोथी-पतरा का विरोध छोड़कर खुद मंदिरों के चक्कर लगाने लगे हैं। पर उन्हें न तो कोर्ट से राहत मिल रही है और न ही मंदिरों से।

खुद लालू प्रसाद नब्बे के दशक में कहा करते थे कि ‘लाख करो चतुराई करम गति टारत नाहीं टरै’ यह सब अब चलने वाला नहीं है। पर अब खुद लालू परिवार पर यह कहावत लागू हो रही है।

लालू प्रसाद ने 1990 में मंडल आरक्षण के विरोधियों के खिलाफ बड़ी हिम्मत से संघर्ष किया था। याद रहे कि आरक्षण एक संवैधानिक प्रावधान था जिसका तब नाहक विरोध हो रहा था। उस संघर्ष में जीत के बाद पूरे पिछड़े वर्ग में लालू प्रसाद की प्रतिष्ठा काफी बढ़ी थी। उतना समर्थन बिहार में किसी अन्य नेता को नहीं मिला था। अनेक लोंगों का यह मानना है कि बाद के वर्षों में यदि लालू प्रसाद अपने परिवार की ‘आर्थिक सुरक्षा के इंतजाम’ के काम में नहीं लग गए होते तो गांव -गांव में उनकी मूर्तियां लगतीं। हालांकि अब भी उनके समर्थकों की कमी नहीं हैं। पर पहले जैसी बात नहीं है।

भ्रष्टाचार के मामले में किसी नेता के खिलाफ जब कोई कानूनी कार्रवाई होती है तो वह आरोप लगा देता है कि राजनीतिक बदले की भावना से ऐसा हो रहा है। लालू प्रसाद इसके साथ यह भी कह रहे हैं कि यह पिछड़ों पर हमला है।

पर यह तर्क शायद ही चले। पहले भी नहीं चला था। चारा घोटाले में जब 1997 में पहली बार लालू प्रसाद जेल गए तो भी यही तर्क उनकी ओर से दिया गया था। पर 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू के दल का बहुमत समाप्त हो गया था। जबकि 1995 में उन्हें बहुमत मिला था।

अब तो उन्हें कोर्ट का ही सहारा होगा। इसलिए कि लालू परिवार को राजनीतिक मदद मिलती नहीं दिख रही है जैसी मदद मुलायम सिंह यादव तथा इस देश के  कुछ दूसरे नेताओं को मिलती रही। देखना होगा कि कोर्ट से लालू प्रसाद और उनके परिजनों को किस तरह का न्याय मिलता है।

वैसे लालू परिवार पर आरोपों की लंबी सूची देखकर यह जरूर कहा जा सकता है कि परिवार का राजनीतिक भविष्य अभी तो अनिश्चित नजर आ रहा है। बाद में भले जो हो!

हां, यदि इसी तरह के आरोपों से घिरे देश के किन्हीं भाजपा नेताओं पर भी जब केंद्रीय एजेंसियां इसी तरह की कार्रवाई नहीं करंेगी तो वह दोहरा मापदंड भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से जरूर महंगा पड़ सकता है।