Friday, August 6, 2010

बिहार ऐसे पा रहा है नक्सली समस्या पर काबू

देश की नक्सली समस्या और उसके समाधान के उपायों को समझने के लिए यहां प्रस्तुत एक आंकड़ा महत्वपूर्ण है। सन 2004 से 2008 तक पूरे देश मंे नक्सली हिंसा में हर साल औसतन करीब 500 नागरिक मारे गये। सन 2009 में यह संख्या बढ़ कर 591 हो गई। इस साल के जून तक 325 नागरिक मारे जा चुके हैं। दूसरी ओर, बिहार में नक्सली हिंसा में 2001 से 2004 तक कुल 668 लोग मारे गये थे। पर सन 2006 से 2009 तक नक्सली हिंसा में मृतकों की संख्या घटकर 160 रह गई। ऐसा आखिर कैसे और क्यों हुआ ? आखिर क्यों बिहार में नक्सलियों की मारक क्षमता घट रही है जबकि देश के कई अन्य हिस्सों में बढ़ रही है ? जबकि पांच -छह साल पहले बिहार में नक्सली बनाम निजी सेनाओं द्वारा जारी हिंसा-प्रतिहिंसा में आए दिन बड़े- बड़े नरसंहार होते रहते थे। बिहार के कुछ जघन्य व चर्चित नरसंहारों के स्थलों के नाम तो पूरे देश के अखबार पढ़ने वालों को संभवतः याद भी हो गये होंगे। दलेल चक बघौरा, बारा, सेनारी, मियांपुर, अरवल, लक्ष्मणपुर बाथे जैसे स्थानों के नाम अब बीते दिनों के दुःस्वप्न ही रह गये हैं जहां गत दो -तीन दशकों में बड़े -बड़े नरसंहार हुए थे। उन प्रत्येक नरसंहार में मृतकों की संख्या दर्जनों में थी। यह संयोग या दैव योग नहीं है कि बिहार मंे नक्सलियों की मारक क्षमता गत चार पांच साल में काफी घटी है। इसके लिए राज्य सरकार ने संगठित उपाय किए हैं। यदि ऐेसे ही उपाय अन्य नक्सल पीड़ित प्रदेश करें तो वहां भी बिहार जैसी सफलता मिल सकती है। बिहार में भी अभी पूरी सफलता नहीं मिली है। पूरी सफलता के लिए केंद्र सरकार को राजनीति से उपर उठकर बिहार को भरपूर आर्थिक मदद करनी होगी। साथ ही, बिहार शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के स्तर को कड़ाई से घटाना होगा ताकि विकास व कल्याण योजनाओं के लाभ गरीबों को मिल सकें। दरअसल बिहार में नीतीश सरकार ने 2005 में सत्ता संभालने के साथ ही नक्सली समस्या पर काबू पाने के लिए समेकित उपाय शुरू कर दिए थे। राज्य सरकार ने अपने ही प्रदेश के पुराने अनुभवों का भी लाभ उठाया। राज्य सरकार ने यह बात अच्छी तरह समझ ली है कि सिर्फ पुलिसिया कार्रवाइयों से इस पर काबू नहीं पाया जा सकता है। जानकार सूत्रों के अनुसार राज्य सरकार ने नक्सली आंदोलन से जुड़े विभिन्न प्रकार के तत्वों की पहचान करके उनके अनुकूल उपाय किए तभी जाकर नक्सलियों की मारक क्षमता घटी। दरअसल नक्सली समस्या के पांच प्रमुख तत्व व कारक हैं। पहला तत्व है मार्क्सवादी -लेनिनवादी-माओवादी विचारों से लैस वे थोड़े से लोग जिन्हें काबू में लाना काफी मुश्किल काम है। हां, उन्हें आम लोगों से अलग -थलग जरूर किया जा सकता है। ऐसे लोगों की मूल ताकत वे गरीब व उपेक्षित लोग ही हैं जिन्हें सरकारों ने भगवान भरोसे उनके हाल पर छोड़ रखा है। आजादी का कोई लाभ उन्हें अब तक नहीं मिला है। जहां लाभ मिलने लगा है, वहां स्थिति बदल रही है। यह दूसरा तत्व है। किसी भी सरकार के लिए यह एक बड़ी समस्या है कि किस तरह समावेशी विकास करके इन गरीबों को माओवादी विचारकों व कार्यकर्ताओं की गिरफ्त से अलग किया जाए। इस आंदोलन में एक तीसरे प्रकार के लोग भी हैं जो यह समझते हैं कि किसी भी तरह की जघन्य हिंसा कर देने के बावजूद कानून के हाथ उन तक नहीं पहुंचेंगे। जमीन को लेकर जारी विवादों के कारण भी नक्सली मजबूत हुए हैं। यह चौथा तत्व व कारक है। पांचवां तत्व है भीषण सरकारी भ्रष्टाचार। इन पांच तरह के तत्वों को ध्यान में रखते हुए नीतीश सरकार ने विभिन्न कानूनी व प्रशासनिक उपाय किए हैं। नक्सलियों की बिहार में मारक क्षमता घटने का यही कारण है। राज्य का आर्थिक विकास हो तो रहा है। पर अधूरा। सरकारी व राजनीतिक भ्रष्टाचार विकास में बाधक हैं। यदि समावेशी विकास कार्यों को जनता तक संपक्तता यानी सेचुरेशन की हद नहीं पहुंचाया गया तो नक्सली समस्या से मिली राहत क्षणिक साबित हो सकती है। अब जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर है कि वह राजनीति छोड़कर बिहार जैसे राज्यों की भरपूर आर्थिक मदद करे जो राज्य नक्सली समस्या से वास्तव में जूझ रहे हैं व एक हद तक सफलता भी पा रहे हैं। नीतीश सरकार ने विचारों से लैस उन थोड़े से लोगों के लिए बल प्रयोग का रास्ता अपनाया है जो बंदूक के बल पर राजसत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं। पर गरीबों को नक्सलियों से काटने के लिए गत पौने पांच साल में बिहार में आम विकास के व्यापक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। ताजा आंकड़े के अनुसार बिहार की विकास दर इन दिनों देश में लगभग सर्वाधिक है। पर, यह भी नाकाफी हैं। केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने गत अप्रैल में संसद में कहा कि यदि राज्य सरकारें, केंद्र सरकार के साथ मिल कर काम करें तो तीन साल के अंदर नक्सलियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। बिहार के मुत्तलिक समस्या यह है कि केंद्र सरकार बिहार सरकार की भरपूर कौन कहे, वाजिब मदद भी नहीं कर रही है, ऐसी शिकायत मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने की है। नीतीश कुमार को ऐसा कहने का हक भी है क्योंकि नक्सली समस्या पर काबू पाने में भी बिहार ने हाल में देश को राह दिखाई है। अधिक दिन नहीं हुए जब केंद्र सरकार ने अन्य राज्यों से कहा था कि वे भी ‘आपकी सरकार आपके द्वार’ कार्यक्रम चलाकर नक्सली समस्या पर काबू पाए क्योंकि इस कार्यक्रम को बिहार में सफलता मिल रही है। बिहार में जारी इस कार्यक्रम का उद्देश्य चुने हुए खास इलाके में विकास को संपक्तता की हद तक पहुंचाना है। पर सभी गांवों में ऐसे विकास के लिए पर्याप्त साधन चाहिए जो केंद्र ही मुहैया करा सकता है। प्रधानमंत्री मन मोहन सिंह ने गत 21 अप्रैल 2010 को कहा था कि माओवादी हिंसा आंतरिेक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ‘हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिन इलाकों में इस आतंकवाद ने पैर पसारा है, उनमें से ज्यादातर विकास के लिहाज से पिछड़े हैं।’ प्रधान मंत्री सिविल सेवा दिवस पर आयोजित समारोह में बोल रहे थे।’ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमण सिंह ने गत साल अगस्त मंे कहा कि नक्सलवाद की समस्या को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाना चाहिए। इस पष्ठभूमि में केंद्र की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। पर केंद्रीय राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने इसी 14 जुलाई, 2010 को पटना में कहा कि यदि बिहार में हमारी सरकार बनी तो बिहार को विशेष ‘सम्मान’ का दर्जा मिलेगा। इस सम्मान शब्द का अर्थ केंद्रीय आर्थिक मदद के रूप में लगाया गया। यानी कांग्रेस की सरकार नहीं बनेगी तो क्या बिहार पहले की तरह ही केंद्र द्वारा उपेक्षित रहेगा? यहां यह सवाल भी पूछा जा रहा है।ऐसे में कैसे होगा इस नक्सली समस्या का पूर्ण उन्मूलन जो प्रधानमंत्री के अनुसार आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है? यह बात भी याद रखने की है कि बिहार नेपाल सीमा के पास ही है। नीतीश सरकार के कार्यकाल में त्वरित अदालतों के जरिए करीब 48 हजार अपराधी लोगों यानी आरोपितों को निचली अदालतों से सजाएं दिलवाई जा चुकी है। इनमें नक्सल हिंसा-प्रतिहिंसा से जुड़े आरोपी भी हैं। इन सजाओं के भय से वैसे नक्सली या फिर नक्सल विरोधी सेनाओं के लोग डर गये हैं जो किसी तरह की सजाओं से डरते हैं। इसलिए उनलोगों ने मारकाट कम कर दी है। जमीन को लेकर जारी झगड़ों को स्थानीय स्तर पर तुरंत सुलझाने के लिए भी संस्थागत प्रशासनिक उपाय मौजूदा राज्य सरकार ने किए हैं। इसके लिए कानून भी बनाया गया है। पर उसका लाभ अभी बाद में मिलेगा।पर सरकारी भ्रष्टाचार पर काबू पाने की जिम्मेदारी नीतीश सरकार की जरूर है। आखिर इस नक्सली समस्या ने समय बीतने के साथ इतना विकराल रूप धारण ही कैसे कर लिया ? इसकी वस्तुपरक पड़ताल किए बिना इस पर काबू पाने में भी कठिनाइयां आएंगी। पहले के नक्सलियों और अब के माओवादियों के इस देश में फलने-फूलने के कई कारण रहे हैं। कई कारणों के मिले जुले असर के कारण ही माओवादी आज ताकतवर हो चुके हैं। गरीबी, विस्थापन, अर्ध सामंती समाज -व्यवस्था और कानून -व्यवस्था की लचर स्थिति के मिले जुले कुप्रभाव को कम करने से ही इस समस्या पर काबू पाया जा सकेगा, ऐसा अनेक प्रेक्षक मानते हैं। कम करने का यह प्रयोग बिहार में एक सीमा तक हो रहा है और वह एक हद तक सफल भी रहा है। हालांकि ऐसे प्रयोग को देश भर में और भी सघन, व्यापक, ठोस व प्रामाणिक बनाने की जरूरत है। ऐसे उपायों को और सघन व प्रामाणिक बनाने की क्षमता बिहार सरकार में भी फिलहाल नजर नहीं आती क्योंकि बिहार के प्रशासन व राजनीति में भी भ्रष्टाचार व निहित स्वार्थ बहुत अधिक हैं जो प्रयासों के बावजूद कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ हाल में बने एक कारगर कानून को अभी अपना रंग दिखाना अभी बाकी है। हालांकि अभियोजन पक्ष ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में धराए राज्य के दस बड़े अफसरों की करोड़ों की संपत्ति जब्त करने की गुजारिश कोर्ट से कर दी है। यदि जब्त हो गई तो उसका असर अन्य भ्रष्ट अफसरों पर पड़ेगा। याद रहे कि नक्सली आंदोलन भले सन 1967 में बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ, पर बाद के वर्षों में एक समय बिहार में इसका सर्वाधिक असर था। आंध्र प्रदेश तथा अन्य राज्यों में तो वह बिहार के बाद ही फैला। हालांकि करीब बीस -पच्चीस साल पहले भी बिहार में जब तत्कालीन सरकार ने कम से कम दो स्थानों पर नक्सली नर संहारों के मूल कारणों को समाप्त कर दिया तो वहां भी बाद के वर्षों में नक्सलियों का असर कम हो गया था। वे स्थान हैं औरंगाबाद जिले के दलेल चक - बघौरा और आसपास के इलाके तथा अरवल मुख्य बाजार। याद रहे कि अरवल में 1986 में पुलिस ने नक्सलियों की सभा पर अंधाधुंध गोलियां चलाकर 21 लोगों को मार दिया था। उधर 1987 में औरंगाबाद जिले के दलेल चक बघौरा में माओवादियों ने 54 किसानों की सामूहिक हत्याएं कर दी थीं।
सरकार के भ्रष्ट कारिंदों व हदबंदी से अधिक गैर कानूनी तरीके से जमीन रखने वाले अन्यायी लोगों ने अनेक मामलों में गरीबों को नक्सलियों की शरण में जाने के लिए बाध्य कर दिया। बिहार के कई उदाहरण मौजूद हैं जहां -जहां देर से ही सही प्रशासन व सरकार ने गरीबों की सुधि ली, वहां -वहां से नक्सलियों के तम्बू उखड़़ गये।
यदि बिहार में सख्त व सभी पक्षों को मान्य बटाईदारी कानून बन जाता तो नक्सली समस्या से निजात पाने में राज्य सरकार को कुछ और भी सुविधा हो जाती। पर चुनाव लड़ने वाली किसी पार्टी के लिए यह काम अब असंभव नहीं तो कठिन जरूर हो गया है। योजना आयोग के पूर्व सचिव एन.सी. सक्सेना ने गत 18 अप्रैल को कहा कि ‘बिहार के मगध क्षेत्र में 30 प्रतिशत बटाईदार हैं। जाहिर है कि सरकार की सब्सिडी योजना का उन्हें कोई फायदा नहीं मिलता।’ हालांकि नक्सली समस्या के पीछे बटाईदारी समस्या का कम ही हाथ है। समस्याएं और भी हैं और गहरी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी गत 16 फरवरी 2010 को कहा कि ‘केवल हथियारों का सहारा लेने के बजाए सरकार को विकास कार्य तेज करना चाहिए।’
जून, 2006 में बिहार में भूमि सुधार आयोग बना। रिटायर आई.ए.एस., डी. बंदोपाध्याय उसके अध्यक्ष थे। आयोग ने अपनी रपट राज्य सरकार को दी। उस रपट में अन्य बातों के अलावा बटाईदारों को कारगर हक देने की सिफारिश है। गत साल जुलाई में नीतीश सरकार के एक मंत्री ने यह बयान दे दिया कि इसे लागू करने पर बिहार सरकार विचार कर रही है। फिर क्या था ! जमीन वालों की जमात नाराज हो गई और सितंबर में हुए उप चुनावों में राजग उम्मीदवारों को बुरी तरह हरा दिया। 18 विधान सभा क्षेत्रों में से 13 सीटों पर राजग हार गया। अब यह बात तय है कि नीतीश सरकार इसे लागू नहीं करेगी। यदि नीतीश सरकार अगले विधानसभा चुनाव के बाद फिर से सत्ता में आ भी जाए तोभी उसे वह लागू नहीं करेगी, ऐसा संकेत मिल रहा है। क्योंकि इस मुददे पर नीतीश सरकार काफी डर गई है। पर प्रतिपक्षी दल जमीन वालों को इस भावी बटाईदारी कानून का भय दिखा कर राजग के खिलाफ हवा बनाने की कोशिश जरूर कर रहे हैं। पता नहंीं अगले बिहार विधानसभा चुनाव में इसका क्या नतीजा होगा। इससे इस मामले की संवेदनशीलता और फिर इसकी गंभीरता का पता चलता है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि इससे यह भी पता चलता है कि इस समस्या को हल करना कितना जरूरी है। पर कई अन्य लोग इस स्थापना से सहमत नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में इस भूमि आयोग को जो सफलता मिली, उससे श्री बंदोपाध्याय को एक खास तरह की विश्वसनीयता मिली हुई है। तब बंगाल में नक्सली आंदोलन ठंडा पड़ा था। पर जब गरीबों के विकास व कल्याण के दूसरे काम वाम सरकार ने नहीं किए तो नक्सली फिर पनप गये। बंदोपाध्याय ने भी कहा था कि बिहार की भूमि समस्या पश्चिम बंगाल की समस्या से बिल्कुल अलग हैं। बिहार की भूमि समस्या अधिक जटिल है। इसीलिए उन्होंने भूमि हदबंदी, चकबंदी, भूमि अभिलेख , बटाईदारी, अतिक्रमण, भूदान में प्राप्त जमीन के वितरण की समस्याओं पर अपनी रपट दी। बंगाल का कथित क्रांतिकारी बटाईदारी कानून जब नक्सलियों को पनपने से अंततः नहीं रोक सका तो बिहार में बंदोपाध्याय रपट कैसी क्रांति कर देगी,यह देखना दिलचस्प होगा।याद रहे कि बंगाल में बंटाईदारी कानून कुछ ही दिनों तक नक्सलियों को उभरने से रोक सका था।असल काम तो हर जगह आम विकास का अधिक होना चाहिए था जो देश में काफी कम हो रहा है। बिहार में करीब सत्तर प्रतिशत लोग खेती और उससे जुड़े धंधे पर निर्भर करते हैं।खेती को लेकर अनेक समस्याएं हैं।खेती के विकास से राज्य का विकास भी जुड़ा हुआ है।खेती से जुड़े लोगों की आमदनी बढ़ाए बिना राज्य में उद्योगों के विकास की कल्पना भी फिजूल है। सत्तर प्रतिशत लोगों की आय नहीं बढ़ेगी तो छोटे बड़े कारखानों से उत्पादित माल खरीदेंगे कितने लोग ? जनवरी, 2007 में नीतीश कुमार की सरकार ने पटना में एक शानदार ग्लोबल मीट कराया। इस मीट में बाहर से आए लोगों से राज्य में उद्योग लगाने की अपील की गईं।उद्योग लगाने के लिए लोगों को आमंत्रित करना भी जरूरी है।पर, क्या घोड़े के आगे तांगे को लगाया जाएगा ? खेती में आय बढ़ेगी तभी उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी और तभी किसान अपने परिवार के सदस्यों की जरूरतों के अनुसार सामान खरीदेगा जो कारखानों में पैदा होते हैं। अभी गांवों की बहुत बड़ी आबादी अपने बच्चों के लिए जरूरत के मुताबिक जूते,कपड़े,स्लेट,कागज, कलम, पेंसिल आदि भी नहीं खरीद पाती। खेती के विकास में सबसे बड़ी बाधा यह है कि खेती लायक जमीन का बहुत बड़ा हिस्सा उनके पास है जो खुद खेती नहीं करते।ऐसी स्थिति में खेती के साथ भारी लापारवाही होती है।कुछ खेत ऐसे ही बंजर छोड़ दिए जाते हैं।खेती में सिंचाई का उचित प्रबंध नहीं रहने के कारण भी खेती से आय कम है। खेती की पैदावार को बाजारों तक आसानी से पहुंचाने के लिए बिहार में अच्छी सड़कों की पिछले वर्षों में भारी कमी रही है।अब जरूर बन रही हैं।पर उन सड़कों की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं।खेती योग्य जमीन का असमान बंटवारा भी अविकास का एक बड़ा कारण है।एक मोटे अनुमान के अनुसार बिहार में अब भी करीब सवा लाख ऐसे भूमिपति हैं जिनके पास औसतन 45 एकड़ या उससे अधिक जमीन है। अस्सी भूमिपतियों के पास 500 से 2000 एकड़ जमीन अब भी है।याद रहे कि बिहार में भूमि हदबंदी की अधिकतम सीमा 15 एकड़ से 45 एकड़ तक ही है।यानी सिंचाईयुक्त जमीन 15 एकड़ और अन्य 45 एकड़।पर इस कानून का राज्य भर में भारी उलंघन हो रहा है।जो गलती जमींदारी उन्मूलन के समय हुई,उसका खामियाजा राज्य अब तक भुगत रहा है।भूमि सुधार कानून तो बने ,पर उनका उलंघन भी बड़े पैमाने पर हुआ।उलंघन में राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यपालिका का एक हिस्सा भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सहयोगी रहा है।ऐसा स्वार्थवश हुआ।राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यपालिका के सदस्यों का आमतौर पर बड़ा हिस्सा आजादी के बाद भूमिपति परिवारों से ही आया।बिहार में नक्सलियों को अपनी जड़ें जमाने का जो मौका मिला,उसका यह सब कारण रहा है।यानी नक्सली समस्या भूमि समस्या से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। नक्सलियों ने साठ के दशक में जिन तीन प्रमुख मांगों को लेकर बिहार के गरीबों को संगठित किया,उनमें भूमिपतियों से हदबंदी से फाजिल जमीन को छीनने का एजेंडा मुख्य रहा।दूसरी लड़ाई गैर मजरूआ जमीन को दबंगों के हाथों से निकाल कर उन्हें जरूरतमंद गरीब लोगों में वितरित करने के लिए थी।वे ही उनके असली कानूनी हकदार भी हैं।तीसरी मांग यह होती रही कि सरकार ने खेतिहर मजदूरों के लिए जो न्यूनत्तम मजदूरी तय की है,उसे लागू किया जाए।ये तीनों काम खुद सरकारी मशीनरी को करने चाहिए थे।इन्हें करने के लिए राज्य सरकार ने प्रखंड से लेकर राज्य मुख्यालय तक कर्मचारियों और अफसरों की भारी फौज भी खड़ी कर रखी है।उस पर तनख्वाह के रूप में सरकार भारी खर्च भी करती है।पर उसका इच्छित लाभ नहीं होता। परिणामस्वरूप जहां तहां नर संहार होते रहे हैं।इन नर संहारों में अधिक गरीब लोग ही मारे जाते हैं।औरंगाबाद जिले के दलेलचक बघौरा में माओवादी कम्युनिस्ट केंद्र के हथियारबंद गिरोह ने 1987 में 41 लोगों की हत्या कर दी। गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार 54 लोग मारे गए।कई लोग घायल हुए थे।घायलों में से कुछ लोगों की बाद में मौत हो गई।इससे पहले दलेल चक के आसपास के परसडीह,दरमिया,आंजन और छोटकी छेछानी में हत्याएं हुई थीं।यानी नरसंहारों की श्रृंखला बनी थी।दलेल चक बघौरा हत्याकांड तो अंतिम कड़ी था।दलेल चक बघौरा कांड को अंजाम देने वालों ने घटनास्थल पर नारा लगाया था कि ‘छोटकी छेछानी का बदला ले लिया।’ इन हत्याकांडों की जड़ में जमीन विवाद ही था।जमीन विवाद को समय पर हल करने में सरकारी विफलता के कारण ही इतने लोगों की जानें गईं।ऐसे उदाहरण राज्य में और भी हैं।पर भूमि सुधार कानून को लागू करने में सरकारी विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण यही है। औरंगा बाद जिले के मदन पुर प्रखंड के सलुपरा मठ की जमीन को लेकर खून खराबा हुआ। बगल के गया जिले के जानी बिगहा मठ के महंत ही इस सलुपरा मठ की संपत्ति के मालिक थे। सलुपरा मठ के पास कुल 117 एकड़ जमीन थी। मठ की वह जमीन हदबंदी से फाजिल थी। कानून से बचने के लिए ही जानी पुर मठ के महंत ने अपने एक चेले के नाम सलुपरा मठ की जमीन लिख दी।यह काम उसने गैर कानूनी तरीके से किया।सलुपरा मठ की जमीन वहां के गरीब और पिछड़ी जातियों के लोग बटाई पर जोतते थे।इन गरीबों को उम्मीद थी कि एक न एक दिन जानी बिगहा का महंत इन गरीबों के नाम वह जमीन लिख देगा।महंत तो कभी सलुपरा मठ की जमीन पर जाता भी नहीं था। इस बीच महंत के चेले ने सलुपरा मठ की जमीन में से सत्रह एकड़ जमीन एक दबंग नेता के नाम बेच दी।अब जानी पुर का महंत यह कहने लगा कि उस जमीन को उस नेता के नाम बेचने का अधिकार उसके चेले को था ही नहीं।जानी पुर का महंत बाद में यह चाहने लगा कि सलुपरा मठ की जमीन उससे सरकार ले ले और उसे गरीबों में बांट दे।उधर नेता जी यह कहने लगे कि उन्होंने वह जमीन कानूनी तरीके से ही खरीदी है। यानी यह जमीन विवाद में पड़ गई।मामला राजस्व बोर्ड के विचारार्थ चला गया।राजस्व बोर्ड को भी चाहिए था कि वह मामले का शीघ्र निपटारा कर दे।पर उसने नहीं किया।उधर नेता जी ने उस जमीन पर अपना कब्जा करना चाहा जिसे उन्होंने खरीद लिया था।सलुपरा मठ की जमीन से बटाईदार बेदखल होने लगे।बटाईदारों ने पहले प्रशासन के यहां गुहार लगाई।पर प्रशासन ने अपनी आदत का यहां भी परिचय दिया।फिर बटाईदारों ने माओवादियों की शरण ली।एम.सी.सी.ने उन बटाईदारों की मदद की।नेता जी ने उस जमीन पर अपने एक आदमी को तैनात कर रखा था।माओवादियों ने उसकी हत्या कर दी। नेता जी के एक और मददगार की हत्या कर दी गई। इसके जवाब में नेता जी के लोगों ने बगल के गांव परस डीह में छह लोगों की हत्या कर दी।मृतकों में एम.सी.सी.के दो कार्यकर्ता भी थे। उन पर आरोप था कि इन लोगों ने नेता जी के उस आदमी की हत्या की थी।ये सब होता रहा और प्रशासन सोया रहा।परस डीह का बदला लेने के लिए माओवादियों के नेतृत्व में गरीबों ने दरमिया के ग्यारह राजपूतों की हत्या कर दी।इस पर तत्कालीन मुख्य मंत्री बिंदेश्वरी दुबे दरमिया पहुंच गए।उन्होंने घोषणा की कि अब ‘दरमिया’ नहीं होने दिया जाएगा।औरंगा बाद जिले में एम.सी.सी.के सफाए के लिए टास्क फोर्स लगाया गया।जिले के तेरह प्रमुख नक्सलियों की गिरफ्तारी के लिए इनाम की घोषणा की गई।जिले में सशस़्त्र पुलिस बल की सात कंपनियां तैनात की गईं। उधर नक्सलियों ने अपने समर्थकों को समझाया कि मुख्य मंत्री दरमिया तो गए,पर वे परसडीह नहीं गए।नक्सलियों ने पर्चा छपवाया और बंटवाया,‘परस डीह होता रहे और दरमिया नहीं हो,यह कत्तई नहीं होगा।’औरंगा बाद की खुफिया पुलिस ने यह रपट दी कि सलुपरा मठ की जमीन को लेकर ये सब हत्याएं हो रही हैं। जिले के एस.पी.ने पर्यवेक्षण रपट में लिखा कि उस खास नेता जी की जीप का इस्तेमाल परस डीह हत्याकांड में हुआ।पर नेता जी ने अपनी अग्रिम जमानत के लिए जब जिला अदालत में अर्जी लगाई तो उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक कारणों से उन्हें इस केस में फंसाया गया।दरमिया नर संहार के बदला लेते हुए छोटकी छेछानी में एक और नर संहार कर दिया गया।छोटकी छेछानी कांड के प्रतिशोध में माओवादियों ने 29 मई 1987 की रात में दलेल चक बघौरा के 4 1 राजपूतों की हत्या कर दी। इस कांड की गूंज पूरे देश में सुनी गई।इसके बाद ही राज्य सरकार ने सलुपरा मठ की जमीन को भूमिहीनों में बंटवाया।तब जाकर वहां नर संहार रुका।पर उसके पहले नहीं।जमीन के बंटवारे के बाद उस इलाके में इस तरह की हिंसा-प्रतिहिंसा की घटना नहीं ंहुई।जिन भूमिहीनों को सलुपरा मठ की जमीन मिल गई,उन्हें अब माओवादियों के कॉडर बने रहने की जरूरत ही कहां थी ? जमीन विवाद के मामले में औरंगा बाद जिले का शुरू से बुरा हाल रहा है।सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस जिले में 30 सितंबर,1986 तक 4445 एकड़ जमीन हदबंदी से फाजिल घोषित की गई थी।किंतु इनमें से सिर्फ 1438 एकड़ जमीन का ही भूमिहीनों में वितरण हो पाया था।नक्सली समस्या के गहराते जाने के बावजूद राज्य सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।जब नर संहार तेज हुआ तभी सलुपरा मठ की जमीन बांटी गई।औरंगा बाद जिले का यह मामला तो नमूना मात्र है।पूरे राज्य में राज्य सरकार ने भूमि समस्याओं को इसी तरह लटकाया।तब नक्सलियों के बारे में अस्सी के दशक की तत्कालीन राज्य सरकार की राय थी कि वे चोर डकैत से अलग नहीं हैं। ऐसा ही वाकया सन् 1986 में अरवल में हुआ था।अरवल भी औरंगाबाद से बहुत दूर नहीं है।तब नक्सलियों के फं्रट संगठन एम.के.एस.एस.के नेत्त्व में जुटी भीड़ पर पुलिस ने अरवल में धुंआधार फायरिंग की थी।पुलिस दल का नेत्त्व खुद एस.पी. सी.आर.कासवान कर रहे थे।पुलिस की गोलियों से गरीब लोग मारे गए।गरीब लोग अरवल में स्थित गैर मजरूआ जमीन के एक टुकड़े पर अपना कानूनी हक चाहते थे।जमीन गरीब भूमिहीनों की झोपड़ियों के पास ही थी।बल्कि उनके घर के नाले का पानी भी उसी जमीन पर गिरता था।नहर और झोपड़ी के बीच वह जमीन थी। वे गरीब पकौड़ी बनाकर अरवल बाजार में बेचते थे और अपना जीविकोपार्जन करते थे।वह जमीन उनके लिए बहुत जरूरी थी।जहानाबाद के तब के कर्तव्यनिष्ठ एस.डी.ओ. व्यासजी मिश्र ने उन भूमिहीनों के नाम वह जमीन आवंटित कर दी थी।पर बाद के अफसरों ने उसी जमीन को रिश्वत लेकर एक धनी व्यक्ति के नाम कर दिया। एक ऐसे परिवार के नाम भ्रष्ट अफसरों ने जमीन बंदोबस्त कर दी जिस परिवार में इंजीनियर तथा दूसरे अफसर थे।उस परिवार का बड़ा पक्का मकान इन पंक्तियों के लेखक ने अरवल में देखा था।उसके पास अपनी काफी जमीन भी थी।उस धनी व्यक्ति ने उस जमीन पर जबरन चहारदिवारी खड़ी कर दी तो भूमिहीनों से उसका झगड़ा बढ़ गया।प्रशासन से निराश गरीबों ने मजदूर किसान संग्राम समिति से मदद मांगी।यह संगठन नक्सली संगठन सी.पी.आई./एम.एल.-पार्टी यूनिटी/से जुड़ा हुआ था।बाद में पार्टी यूनिटी और एम.सी.सी.का पीपुल्स वार में विलयन हो गया और संगठन का नया नाम पड़ा,भाकपा/माओवादी/। समिति ने इस प्रशासनिक अन्याय के खिलाफ अरवल में एक जन सभा की।समिति की सभा पर एस.पी.सी.आर.कासवान के निदेश पर पुलिस ने नाहक गोलियां चलाईं और करीब दो दर्जन लोगों को मार डाला।।वहां के कलक्टर अशोक कुमार सिंह ने घटनास्थल के निरीक्षण के बाद गोलीकांड को गैर जरूरी बताया था।फिर भी सरकार ने कासवान के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।भूमि समस्या के प्रति सरकार के रूख का इससे साफ पता चलता है।हां,अरवल में जिस भूमि विवाद के चलते नर संहार हुआ था,उस भूमि को राज्य सरकार ने उन्हीं गरीबों में वितरित कर दिया जिन्हें व्यास जी ने पहले एलाट किया था।नतीजतन अब वहां नरसंहार की कोई और घटना नहीं हुई।यानी दलेल चक बघौरा की जमीन विवाद को जिस तरह राज्य सरकार ने बाद में मजबूर होकर सुलझाया,ऐसा ही काम देश की विभिन्न सरकारें अन्य स्थानों में अभियान चला कर पहले ही कर दिया करे तो माओवादियों को कमजोर करने में ठोस मदद सरकारों को मिल जाएगी। श् अरवल और दलेल चक बघौरा जैसी घटनाएं बताती हैं कि पहले से ही मौजूद भूमि सुधार कानूनों को लागू करने के लिए कितनी प्रशासनिक तत्परता की जरूरत है।इन्हें लागू करने से तनावों को दूर किया जा सकता है और नर संहारों को रोका जा सकता है।इन्हें लागू करने के लिए किसी भूमि सुधार आयोग की रपट के इंतजार की जरूरत ही नहीं है।बस राजनीतिक कार्यपालिका में राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिए।क्या वह इच्छा शक्ति है ? छत्तीस गढ़ तथा कुछ अन्य प्रदेशों के आदिवासियों की समस्याएं कुछ दूसरी होंगी।जिन बिंदुओं पर वे प्रशासन से निराश होकर माअेावादियों के पास जा रहे हैं ,उन समस्याओं को हल करके माओवादियों का कमजोर किया जा सकता है।हालांकि ये प्रशासनिक उपाय बल प्रयोग के अलावा और साथ साथ ही होने चाहिए। ऐसा न हो कि राजस्व तथा अन्य विभागों की गलतियों का खामियाजा पुलिस व केंद्रीय बल को ही लगातार भुगतना पडे।नक्सली हिंसा में पुलिसकर्मी ही अधिक मारे जाते हैं।क्योंकि घटनास्थल पर तो उसे ही जाना पड़ता है।चाहे अपराध रोकने के लिए या फिर अपराधहो जाने के बाद।गलती करने वाला संबंधित राजस्व,वन तथा अन्य विभागों के अधिकारी व कर्मचारी तो अनेक मामलों में रिश्वत के पैसों से ऐश कर रहे होते हैं। बिहार सरकार ने 1982 के अपने एक नोट में कहा था कि ‘नक्सली समस्या सामाजिक आर्थिक समस्या है।इसे सिर्फ पुलिस बल से समाप्त नहीं किया जा सकता।’ भूमि हदबंदी से फाजिल जमीन को भूमिपतियों से छीनकर गरीबों में बांटने के काम में थोड़ी बहुत जोर जबर्दस्ती करनी पड़ सकती है।पर पुलिस के लिए वह काम हथियारबंद नक्सलियों से लड़ने की अपेक्षा सस्ता ही पड़ेगा।गैर मजरूआ जमीन को गलत कब्जे से निकालने के लिए भी पुलिस को बल लगाना चाहिए।साथ ही यदि हदबंदी की सीमा कम कर दी जाए तो लाखों एकड़ जमीन निकाल कर गरीबों में बांटी जा सकती है।इससे गरीब लोगों को हिंसा, अपराध और देशद्रोह की राह पर जाने से काफी हद तक रोका जा सकता है।हालांकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ गरीब लोग ही इन रास्तों पर जाते हैं।एक बात और।एक विशेषज्ञ ने काफी पहले यह कहा था कि यदि बिहार में जमीन का सही रिकार्ड तैयार हो जाए तो मिनी क्रांति हो जाएगी।इस काम को करने के लिए भी किसी आयोग की रपट के इंतजार की जरूरत नहीं है।आयोग की रपट आ जाने पर भी उसे लागू करने के लिए भी सही रिकार्ड तैयार करना ही होगा।क्या पहले से ही बने भूमि सुधार कानूनों को लागू करने के लिए किसी आयोग की सिफारिशों की प्रतीक्षा करने की जरूरत है ? आदिवासी इलाकों में गरीबी व शोषण की समस्या पर एक सामाजिक कार्यकर्त्ता लक्ष्मी प्रसाद शुक्ल के लंबे नोट के कुछ हिस्से को यहां उधत करना मौजूं होगा।इससे नक्सली समस्या को हल करने की दिशा मंे सरजमीन से एक रोशनी मिल सकती है।वे लिखते हैं,‘उग्रवाद के विकास के कुछ प्रमुख कारण निम्न लिखित हैं1, सामंती महाजनी और वन विभाग के शोषण उत्पीड़न की क्रूर और अमानवीय परंपरा।2.पुलिस प्रशासन की संवेदन शून्यता,शोषकों-उत्पीड़कों की तरफदारी और विरोध और प्रतिरोध की आवाज का दमन।3.लोकतांत्रिक आंदेालनों की निरर्थकता।4.प्रतिनिधि सभाओं में क्षेत्र की आम जनता की समस्याओं के एहसास का अभाव।5.जीविका के साधनों का अभाव तथा आम लोगों की बेरोजगारी और फटेहाली।6.शिक्षा का अभाव और अत्यंत पिछड़ी मानसिकता।7.यातायात सुविधाओं और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव।8.अधिकारियों, ब्लाक अंचल द्वारा संचालित रोजगार योजनाओं की राशि,आत्म समर्पित सामंतों-महाजनों तथा केंद्रु पत्ता ठेकेदारों और वन विभाग से नक्सलियों को मिलने वाली भारी धन राशि।9.हथियारबंद दस्तों का विकास और पुलिस प्रशासन का भ्रष्टाचार तथा निकम्मापन। नक्सली समस्या के समाधान के सिलसिले में अनेक विशेषज्ञ समय समय पर उसका हल सुझाते रहते हैं।पर इस देश के जो मौजूदा हालात हैं,उनमें उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती।अधिकतर नेता और दल अपनी -अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार हल सुझाते हैं और सत्ता में आने पर उपाय करते हैं।पर मोटा -मोटी यही उपाय नजर आता है कि देश में वास्तव में यथासंभव कानून का शासन लागू हो।वह सबके लिए समान हो।सरकारी धन को भरसक गरीबों तक पहुंचने देने में जो भी तत्व बाधक हों, उनके खिलाफ जारी मुकदमों को राजनीतिक कारणों से कमजोर नहीं किया जाए।नक्सलियों से अपने चुनाव जीतने के लिए बातचीत की जाए और बाद में उन्हें खत्म करने की घोषणा की जाए ,कई नेताओं और दलों द्वारा समय समय पर अपनाया गया यह दोहरा मापदंड नहीं चलेगा।भ्रष्टाचार और हिंसा के अपराधी कत्तई नहीं बख्शे जाएं।अरवल व दलेल चक बघौरा के नरसंहारों की घटनाओं से नसीहत लेकर राजस्व महकमा और पुलिस थानोें को नियम कानून के पालन के लिए बाध्य किया जाए।नीतीश कुमार सरकार के हाल के उपायों पर ध्यान दिया जाए।विस्थापितों और भीषण गरीबी व भुखमरी की समस्या से जूझ रहे लोगों को कटटर माओवादियों की गिरफत में जाने व उनकी फौज के सिपाही बनने से येन केण प्रकारेण रोका जाए।क्या यह सब करने के लिए इस देश की पक्ष-विपक्ष की राजनीति में पर्याप्त राजनीतिक इच्छा शक्ति मौजूद है ? पता नहीं।

/इस लेख के संपादित अंश जनसत्ता के ं 17 ,18 और 19 जुलाई 2010 के अंकों में प्रकाशित/

Tuesday, April 6, 2010

अवांछित तत्वों से कांग्रेस को बचाने की समस्या

बिहार कांग्रेस के निर्वाची पदाधिकारी और सांसद डा. गिरीश संघी ने कहा है कि आपराधिक तत्वों को संगठन में स्थान नहीं मिलेगा।

डा. संघी ने ठीक ही कहा है। इससे पहले एक पूर्व सांसद ने सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगाया था कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी गुंडों की जमात है। दूसरी ओर, बिहार की राजनीति के कुछ खास बाहुबली तत्वों की ओर से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा की जान पर खतरे की खबर भी आती रही है। कहा जाता है कि खतरा दल के भीतर से ही है। हाल में आरा और छपरा में कांग्रेस की सभाओं में हुई हिंसक घटनाओं से भी यह लगा कि प्रदेश कांग्रेस पर आपराधिक मनोवृति वाले तत्व हावी होते जा रहे हैं। इस पष्ठभूमि में डा. संघी का यह आश्वासन उम्मीद जगाता है कि कांग्रेस में आपराधिक पष्ठभूमि वालों के लिए कोई जगह नहीं है।

दरअसल जब किसी दल पर आपराधिक तत्व हावी हो जातेे हैं तो देर-सवेर उस दल के सरकार में आने के बाद उस सरकार पर भी आपराधिक तत्वों का कब्जा हो जाता है। फिर तो आम शांतिप्रिय जनता का कष्ट बढ़ जाता है। अभी तो आपराधिक तत्वों से बिहार कांग्रेस के सभा स्थल ही पीड़ित हो रहे हैं। यदि खुदा न खास्ता कांग्रेस बिहार में सरकार में आ जाए तब तो उन आपराधिक तत्वों से आम जनता भी जहां-तहां रोज-ब-रोज पीड़ित होने लगेगी।

बिहार की निरीह जनता को सरकारी संरक्षण प्राप्त अपराधियों को झेलने का लंबा अनुभव रहा है। अब तो वैसी स्थिति नहीं है, पर वह पिछला कटु अनुभव एक दुःस्वप्न की तरह अब भी लोगों को कचोटता रहता है। डा. संघी जैसे समझदार नेताओं का यह कर्तव्य बनता है कि वह उस दुःस्वप्न की पुनरावृति नहीं होने दें। याद रहे कि कांग्रेस भी बिहार में अगले विधानसभा चुनाव के बाद अपनी सरकार बनाने का दावा कर रही है। सरकार किसकी बनेगी, यह तो मतदाताओं के हाथों में है। पर सरकार बनाने का दावा करने वाले दलों का यह कर्तव्य है कि वे अभी से ऐसा आचरण दिखाएं जिससे मतदाता साफ-साफ यह देख सकें कि कौन दल अपराधियों को गले लगाने वाला दल है और कौन दल अवांछित तत्वों को ‘गर्दनिया पासपोर्ट’ देकर अपने यहां से तत्काल भगा देने वाला दल है।

कांग्रेस की एक खूबी है कि वह आम तौर पर ऐसे किसी नेता को चुनावी टिकट नहीं देती जिसके खिलाफ किसी अदालत में आरोप पत्र दाखिल हो चुका होता है। यह बात कई अन्य दलों से कांग्रेस को भिन्न दिखाती है। इसका थेाड़ा बहुत लाभ भी कांग्रेस को मिलता रहा है।

पर अब कांग्रेस को बिहार में जब अपना प्रभाव कुछ और जमाना है तो उसे एक काम और करना चाहिए। उसे ऐसे लोगों को भी अगली बार चुनावी टिकट नहीं देना चाहिए जिनके कार्यकलाप ऐसे हैं जो आरोप पत्र के लायक बन सकते हैं। छपरा और आरा में जिन तत्वों ने कांग्रेस की सभाओं में हिंसा की, क्या वे आरोप पत्र के पात्र नहीं हैं ? क्या जरूरी है कि ऐसे उपद्रवी तत्वों व उन्हें संरक्षण देने वाले नेताओं के खिलाफ सचमुच किसी अदालत में आरोप पत्र दाखिल होने की कांग्रेस प्रतीक्षा करे ? यदि कांग्रेस पहले ही यह घोषित कर दे कि ऐसे लोगों को वह अगले विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं देगी तो ऐसे लोग दूसरे दलों का दामन पहले ही पकड़ लेंगे। कांग्रेस को आपराधिक पष्ठभूमि वालों से मुक्ति पाने में इससे सुविधा होगी।

गत लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बिहार कांग्रेस ने कई विवादास्पद छवि वालों को दूसरे दलों से बुलाकर टिकट दे दिया। ऐसे-ऐसे लोगों को भी टिकट मिले जिनका चरित्र कांगे्रस की आम राजनीतिक संस्कति से कतई मेल नहीं खाता। हालांकि ऐसे लोगों को टिकट देने का कोई ठोस चुनावी लाभ कांग्रेस को नहीं मिला। कांग्रेस पर अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप जरूर लगता रहा है, पर कांग्रेस अपराधियों की ही पार्टी है, ऐसा आरोप नहीं लगा। कांग्रेस की संस्कति आम तौर पर एक शालीन संस्कृति रही है। पर गत लोकसभा चुनाव के समय से उस संस्कृति को धक्का लगा है।

कांग्रेस और बिहार के हक में है कि काग्रेस इस आरोप से जल्दी मुक्ति पा ले कि उस सवा सौ साल पुराने दल पर कम से कम बिहार में धीरे-धीरे बाहुबली तत्वों का कब्जा होता जा रहा है। इस पष्ठभूमि में डा. संघी का बयान उम्मीद की एक किरण के रूप में सामने आया है। अंत में एक यह बात भी कह देनी जरूरी है कि कांग्रेस के जो कुछ लोग बाहुबलियों के बल पर बिहार में सत्ता पर कब्जा करने का ख्वाब देख रहे हैं, वे भारी गलतफहमी में हैं। क्योंकि एक तो बाहुबली मार्का दल कांग्रेस की अपेक्षा अधिक ताकत के साथ पहले से ही बिहार में मौजूद हैं। जिस किसी को बाहुबली मार्का दल को वोट देना होगा, वह असली बाहुबली दलों को छोड़ कर किसी कार्बन काॅपी को वोट क्यों देगा ? दूसरी बात यह भी है कि अब बिहार में इस तरह अपेक्षाकृत साफ सुथरे और शांतिपूर्ण ढंग से मतदान हो रहे हैं कि बाहुबलियों की किसी चुनाव में भूमिका अब अत्यंत सीमित हो चुकी है।


( दैनिक जागरण: पटना संस्करण में 6 अप्रैल 2010 को प्रकाशित )


Sunday, April 4, 2010

पत्रकारिता के 40 साल पूरे कर चुके वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर से ‘ ‘प्रभात खबर ’ की बातचीत

कोई सरकारी परसादी लेनी होती तो नीतीश कुमार का शासन आने की प्रतीक्षा क्यों करता ?



अपना यही है सहन/आंगन/,यही सायबान/छप्पर/है,

फैली हुई जमीन,खुला आसमान है,

---- मख्मूर सईदी



मैं पूरी ताकत के साथ

शब्दों को फेंकता हूं आदमी की तरफ

यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा

मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूं वह धमाका

जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है

यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा

मैं लिखना चाहता हूं ।

----- केदार नाथ सिंह



मशहूर शायर मख्मूर सईदी और प्रख्यात कवि केदार नाथ सिंह की इन पंक्तियों से गुजरते हुए सुरेंद्र किशोर का चेहरा सामने आता है। बिहार के जाने-माने पत्रकार सुरेंद्र किशोर के लिए फैली हुई जमीन ही आंगन और खुला आसमान ही छप्पर है, और वह लिखने और बिना किसी लाग लपेट के लिखने की असीम ऊर्जा से लैस हैं, यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा, वह लिखने की चाहत से भरे रहे और भरे हैं, शायद यही वजह है कि क्लीन सेव के कारण साफ-सुथरा और लंबा चेहरा या घने बालों को पूरी मजबूती से दाहिनी ओर रखने का उनका हेयर स्टाइल, अहंकारशून्य व्यक्तित्व या फिर साधारण पहनावा ही उनकी पहचान नहीं, सुरेंद्र किशोर, आज सुरेंद्र किशोर हैं, क्योंकि गोपाल सिंह नेपाली की तरह उनका भी धन रही स्वाधीन कलम, और कलम इसलिए भी स्वाधीन रही कि उन्होंने न बहुत कुछ पाने की चाहत पाली और न ही कुछ नहीं मिल पाने का मलाल रहा।



बीते 40 वर्षों से निरंतर लिखते रहे सुरेंद्र किशोर को पढ़कर न सिर्फ बिहार और झारखंड, बल्कि एक हद तक हिंदी पटटी की पत्रकारिता की दो पीढ़ियां जवान हुईं हैं। समाजवादी राजनीति की सीढ़ी से सत्ता और शक्ति के शीर्ष पर जाने की जगह पत्रकारिता व लेखन का क्षेत्र चुनने वाले सुरेंद्र किशोर ने अपनी जिंदगी को अपने मायनों में आकार देने की आजादी दी। अपनी ईमानदारी, अपनी कर्तव्यनिष्ठा, अपने हुनर, अपनी दढ़ता से वह खुद को तरासते गये। संघर्ष के चिराग की रोशनी से जीवन को रोशन किया। मोटे फ्रेम और पावर के शीशे से बने चश्मे के पीछे उनकी आंखों की गहराई काफी कुछ कहती है, बशर्ते आप सुनना चाहें। लेखन व पत्रकारिता के क्षेत्र में चार दशक गुजारने के बहाने ‘प्रभात खबर’ के संपादकीय समन्वयक माधवेंद्र ने श्री किशोर से लंबी बातचीत की।



प्रश्न - कितने साल से आप पत्रकारिता में हैं ?

उत्तर - वैसे तो मैं सन 1969-70 से ही इस पेशे में हूं, पर शब्दों के सही अर्थों में पेशेवर पत्रकारिता की शुरुआत मैंने सन 1977 में दैनिक ‘आज’ से की थी।

हालांकि 1969 से ही पत्रकारिता से रोटी कमानी जरूर शुरू कर दी थी। तब पटना से ‘लोकमुख’ नाम से लोहियावादी समाजवादियों की एक साप्ताहिक पत्रिका निकलती थी। मैंने 120 रुपये महीने पर कुछ समय तक वहां काम किया था। मेैंने जार्ज फर्नांडिस के संपादकत्व में निकल रही चर्चित पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ और जेपी द्वारा संस्थापित ‘जनता’ साप्ताहिक में भी सत्तर के दशक में काम किया।

प्रश्न - पेशेवर पत्रकार के रूप में आपने अनेक मंत्रिमंडलों को काम करते हुए देखा। अपने अनुभव बताइए।

उत्तर - दैनिक आज ज्वाइन करने के बाद सत्ता व प्रतिपक्ष की राजनीति व विभिन्न मुख्यमंत्रियों के काम काज को करीब से देखने का अवसर मिला।

हालांकि उससे पहले के कुछ मुख्यमंत्रियों की कार्य शैलियों के बारे में बहुत कुछ जान सुन व पढ़ रखा है। मैं विभिन्न मुख्यमंत्रियों के कामकाज के मोटा-मोटी तुलनात्मक अध्ययन की स्थिति में अब हूं।

प्रश्न - आपके बारे में यह कहा जाता है कि अपने पत्रकारिता जीवन में आपने कभी किसी मुख्यमंत्री की तारीफ नहीं की । क्या कारण है कि आप इन दिनों नीतीश कुमार के प्रशंसक बने हुए हैं ? इस अति प्रशंसा के कारण आपकी पुरानी छवि को धक्का लग रहा है?

उत्तर - आपने बिलकुल सही कहा। कुछ लोग तो नेट पर यह भी लिख रहे हैं कि मैं किसी तरह की ‘परसादी’ पाने के लिए नीतीश कुमार की चापलूसी कर रहा हूं। दरअसल ऐसे लोग न तो मुझे जानते हैं और न ही बिहार व देश के सामने आज जो गंभीर समस्याएं हैं, उनका उन्हें कोई अनुमान है। यदि किसी को अनुमान है भी तो वे स्वार्थ या किसी अन्य कारणवश उन्हें देख नहीं पा रहे हैं।

यह बात सही नहीं है कि मैंने किसी मुख्यमंत्री की अपने लेखन में आम तौर पर कभी कोई सराहना ही नहीं की। जिस नेता के बारे में मुझे सबसे अधिक लिखने का मौका मिला, वे हैं लालू प्रसाद यादव। उन्होंने भी अपना काम किया और मेरे खिलाफ कुछ ऐसे कदम उठाए जो अभूतपूर्व रहे। इसके बावजूद 1990 में मंडल आरक्षण आंदोलन के दौरान मैंने लालू प्रसाद के पक्ष में और आरक्षण विरोधियों के खिलाफ लगातार जोरदार लेखन किया।

इस लेखन के कारण मुझे अपने स्वजातीय, सवर्णों और यहां तक कि अपने परिजनों से भी आलोचनाएं सुननी पड़ी थीं। अनेक मुख्यमंत्रियों को देखने के बाद मैं यह कह सकता हूं कि नीतीश कुमार जैसा मुख्यमंत्री कुल मिलाकर इससे पहले मैंेने तो नहीं देखा। यदि यह बात मैं किसी लाभ की प्राप्ति के लिए कहूं तो मेरी इस बात पर किसी को ध्यान देने की जरूरत नहीं है। पर यदि राज्यहित में कह रहा हूं तो मेरी बात सुनी जानी चाहिए अन्यथा बाद में राज्य का नुकसान होगा। मंडल आरक्षण विवाद के समय मेरी बातें नहीं सुनी गईं जिसका नुकसान खुद उनको अधिक हुआ जो आरक्षण के खिलाफ आंदोलनरत थे। बाद में वे थान हार गये, पर पहले वे गज फाड़ने को तैयार नहीं थे। यदि 1990 में बिहार में आरक्षण का उस तरह अतार्किक विरोध नहीं हुआ होता तो लालू प्रसाद का दल 15 साल तक सत्ता में नहीं बना रहता। कांग्रेस के पूर्व विधायक हरखू झा अब भी यह कहते हैं कि ‘सुरेंद्र जी तब आरक्षण विरोधियों से कहा करते थे कि गज नहीं फाड़ोगे तो थान हारना पड़ेगा।’

प्रश्न - आपका लेखन इन दिनों नीतीश सरकार के पक्ष में एकतरफा लगता है। यह किसी पत्रकार के लिए अच्छा नहीं माना जाता। इस पर आपकी क्या राय है ? क्या नीतीश जी सारे काम ठीक ही कर रहे हैं ?

उत्तर - इस आरोप को एक हद तक में स्वीकरता हूं। हालांकि यह पूरी तरह सच नहीं है। नीतीश कुमार की सरकार की कुछ गलत नीतियों की मैंेने लिखकर समय-समय पर आलोचना की है। आगे भी यह स्वतंत्रता मैं अपने पास रिजर्व रखता हूं क्योंकि न तो मैंने खुद को कभी किसी के यहां गिरवी रखा है और न ही ऐसा कोई इरादा है। जब जीवन के कष्टपूर्ण क्षण मैंेने काट लिए तो अब किसी से किसी तरह के समझौते की जरूरत ही कहां है?

यदि मैं किसी लाभ या लोभ के चक्कर में किसी सरकार या नेता का विरोध या समर्थन करूं तो जरूर मेरे नाम पर थूक दीजिएगा। पर यदि देश और प्रदेश के व्यापक हित में ऐसा करता हूं तो उसे उसी संदर्भ में देखनेे की जरूरत है।

मैं पूछता हूं कि आजादी की लड़ाई के दिनों में क्या भारतीय पत्रकारों से यह सवाल पूछा जाता था कि आप आजादी की लड़ाई के पक्ष में एकतरफा क्यों हैं ? आज देश व प्रदेश में उससे मिलती-जुलती स्थिति है।

खतरे उससे कई मामलों में अधिक गंभीर हैं। खतरा लोकतांत्रिक व्यवस्था की समाप्ति का है। खतरा अलोकतांत्रिक अतिवाद व आतंकवाद के काबिज हो जाने का है। इन दोनों खतरों को हमारे देश व प्रदेश के कुछ खास नेतागण अपने स्वार्थ में अंधा होकर जाने अनजाने आमंत्रित कर रहे हैं। इस स्थिति में जो नेता सुशासन लाने की कोशिश कर रहा है, जो नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाना चाहता है और भरसक उठा भी रहा है। और जो नेता सांप्रदायिक मसलों पर संतुलित रवैया अपनाता है, वही इन खतरों से सफलतापूर्वक लड़ भी सकता है। वैसे नेताओं के प्रति पक्षधरता दिखाना ही आज देशहित व राज्यहित है। लोकतंत्र बना रहेगा तभी तो स्वतंत्र प्रेस भी रहेगा।

प्रश्न - आप तो पहले राजनीतिक रूप से सक्रिय थे। क्या अब दुबारा राजनीति में आने की इच्छा नहीं होती ? राजनीति में शामिल होकर आप नीतीश कुमार के कामों को और भी आगे बढ़ा सकते हैं।

उत्तर - मैंने 1973 में ही यह तय कर लिया था कि मैं राजनीति छोड़कर पत्रकारिता करूंगा। विशेष परिस्थिति में आपातकाल के दौरान जरूर राजनीतिक काम कर रहा था। यदि मैं पत्रकारिता को जिस दिन राजनीतिक कर्म की अपेक्षा दोयम दर्जे का काम मान लूंगा, उसी दिन सक्रिय राजनीति के प्रति मेरा आकर्षण हो जाएगा! या फिर मेरी इच्छा यदि निजी धनोपार्जन की हो जाए तो मैं राजनीति में दुबारा जाउंगा। एमपी-विधायक फंड ने तो राजनीति को काजल की कोठरी बना दिया है। वैसे भी जो लोग मुझे जानते हैं, वे मुझसे कभी यह नहीं कहते कि मुझे राजनीति में आना चाहिए। क्योंकि मुझे वे उस काम के लिए अनफिट मानते हैं।

प्रश्न - क्या आपको ऐसा कोई आॅफर मिला था ?

उत्तर - आॅफर तो सक्रिय राजनीति में शामिल होने के लिए नहीं हुआ था, पर ‘राजनीतिक नौकरियों’ का आॅफर जरूर हुुआ था। पर मैंने विनम्रतापूर्वक तब उसे अस्वीकार ही कर दिया था।

प्रश्न - अपने बारे में कुछ और बताइए।

उत्तर - सन 1966 में के.बी. सहाय की सरकार के खिलाफ छात्र आंदोलन के कारण मेरी पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी। उन दिनों मैं सारण जिला क्रांतिकारी विद्यार्थी संघ का सचिव था। वह लोहियावादी समाजवादी छात्रों का संगठन था। 1969 में मैं बिहार प्रदेश समाजवादी युवजन सभा के तीन में से एक संयुक्त सचिव चुना गया था। उनमें से एक अन्य संयुक्त सचिव लालू प्रसाद थे। सचिव थे शिवानंद तिवारी। संसद पर युवजनों के प्रदर्शन के सिलसिले में मैं अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार होकर तिहाड़ जेल भी गया था।

मैं 1972-1973 में कर्पूरी ठाकुर का गैर सरकारी निजी सचिव था। आपातकाल में सी.बी.आई. ने बड़ौदा डायनामाइट मुकदमे का एक केस तैयार किया था। उसमें मेरा नाम उन चार मुख्य षडयंत्रकारियों में एक था जिन पर आपातकाल में देशभर में सरकारी प्रतिष्ठानों को डायनामाइट से उड़ाने का षडयंत्र रचने का आरोप लगाया गया था। अन्य तीन थे जार्ज फर्नाडिस, रेवतीकांत सिन्हा और महेंद्र नारायण वाजपेयी। वाजपेयी जी रेलवे यूनियन के नेता हैं और इन दिनों पटना में ही रहते हैं। यह खबर 1976 के देशभर के अखबारों में पहले पेज पर छपी थी।

ऐसे में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि कर्पूरी ठाकुर की सरकार के कोई सदस्य या फिर मोरारजी देसाई मंत्रिमंडल के प्रभावशाली सदस्य जार्ज फर्नांडीस मेरे लिए कुछ सोचें ओर आॅफर भी करें। उन लोगों ने किया भी ,पर मुझे वह सब मंजूर ही नहीं था। क्योंकि मैं एक मामूली पत्रकार के रूप में ही संतुष्ट था और हूं भी।

यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि मुझे कभी कोई सरकारी परसादी लेनी होती तो नीतीश कुमार का शासन आने तक मैं प्रतीक्षा ही क्यों करता ? क्या दूसरे ऐसे लोग अवसर मिलने पर ऐसी कोई प्रतीक्षा करते भी हैं ? जब मेरी पत्नी मेरे सुख-दुःख में साथ देने के लिए हमेशा तैयार रहती हंै। जब मेरी संतानें आज्ञाकारी हैं। और मेरी जरूरतें जब सीमित हैं तो फिर अपनी स्वतंत्र लेखनी की कीमत पर किसी सत्ताधारी नेता के सामने मुझे हाथ पसारने या फिर याचक बनने की जरूरत ही क्या है? परसादी लेने की बात वही लोग करते हैं जो खुद छोटे मन-मिजाज के हैं। यह बात यहां मैं इसलिए भी कह रहा हूं कि लोग यह समझें कि करीब 40 साल के अनुभव वाला एक पत्रकार किसी लाभ-लोभ की इच्छा रखे बिना यदि यह बात कह रहा है कि किस तरह एक मुख्यमंत्री आज बिहार को पटरी पर लाने का ईमानदार प्रयास रात दिन कर रहा है तो इस बात को गंभीरता से समझना चाहिए और मुख्यमंत्री के इस प्रयास में उन तमाम लोगों को मदद करनी चाहिए जिनका अपना कोई निजी एजेंडा नहीं है। अन्यथा प्रदेश और देश को बचाना एक दिन असंभव हो जाएगा। मैं राजनीतिक दलों की बात नहीं कर रहा हूं। उनका तो काम ही विरोध करना और मौका मिलने पर सत्ता में आना है।

प्रश्न - पर नीतीश कुमार की एक ऐसी सरकार के समर्थन के कारण आपने अपनी छवि दांव पर लगा दी है जिस सरकार में भ्रष्टाचार बहुत अधिक है?

उत्तर - सरकारी भ्रष्टाचार के मामले में आपकी टिप्पणी सही है। पर सवाल मुख्यमंत्री की मंशा का है। राहुल गांधी ने भी नीतीश कुमार की मंशा को सही बताया है।

मैंने पिछले 40 साल से बिहार के मुख्यमंत्रियों को करीब और दूर से काम करते हुए देखा है। विपरीत परिस्थितियों में भी इतना अच्छा काम करते हुए मैंने इससे पहले किसी अन्य मुख्यमंत्री को नहीं देखा। ऐसा नहीं कि वे बाकी सब भ्रष्ट व निकम्मे थे। उनमें कई अच्छी मंशा के ईमानदार नेता थे। पर उनमें से कोई नीतीश कुमार जैसा नहीं थे।

नीतीश के काम के रिजल्ट भी बिहार की जनता को मिल रहे हैं। गत लोकसभा चुनाव में बिहार में 40 में से 32 सीटें राजग को देकर आम जनता ने भी नीतीश सरकार के काम पर अपने भारी समर्थन की मुहर ही लगाई। पर बटाईदारी के बारे में नीतीश सरकार की एक घोषणा से नीतीश कुमार थोड़े दबाव में जरूर आ गये हैं। पर यह बिहार के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बात ही होगी कि अगले चुनाव के बाद नीतीश कुमार को मौका नहीं मिलेगा।

मैं बिहार के बाकी सारे नेताओं को भी जानता हूं। नीतीश कुमार और अन्य मुख्यमंत्रियों में मैं यह अंतर पाता हूं कि अन्य मुख्य मंत्रियों में से कुछ ने राजनीतिक व प्रशासनिक भ्रष्टाचार से समझौता कर लिया, कुछ ने खुद को किनारा कर लिया, कुछ ने लड़ने की कोशिश की तो वे हटा दिए गए। पर नीतीश कुमार अब भी भ्रष्टाचार से भरसक लड़ रहे हैं। साढ़े चार साल तक बिहार का मुख्यमंत्री कोई रहे और इस काजल की कोठरी में कोई दाग नहीं लगे, यह बिहार के लिए बड़ी बात है। पर यह सहसा या संयोगवश नहीं हुआ है, बल्कि ऐसा नीतीश कुमार की सावधानी के कारण हुआ है। दरअसल सरकारी व राजनीतिक भ्रष्टाचार कम नहीं होगा तेा गरीबी नहीं कम होगी। गरीबी कम नहीं होगी तो अराजकतावादी अलोकतांत्रिक तत्व देर-सवेर बिहार में पूरी तरह छा जाएंगे। जब यहां भी छा जाएंगे तो पूरे देश पर छा जाने में उन्हें काफी सुविधा हो जाएगी।

कमजोर नजर वाले लोग या फिर स्वार्थ में अंधे लोग इस खतरे को देख नहीं पा रहे हैं। आज देश और प्रदेश के सामने विशेष परिस्थिति उत्पन्न कर दी गई है। पत्रकार सहित हर नागरिक को आज अपनी विशेष भूमिका निभानी चाहिए,ऐसा मैं मानता हूं।



राजनीति में गांधी-नेहरू नहीं तो मीडिया में पराड़कर की तलाश क्यों ?

प्रश्न - नीतीश कुमार की कौन सी बात आपको सबसे अधिक पसंद है ?

उत्तर - जब वे कें्रदीय मंत्री थे तो मुझे उनके कामकाज को करीब से देखने का मौका नहीं मिला था। इसलिए उनके बारे में मेरी कोई विशेष राय नहीं बन पाई थी। पर पूत के पांव उसी समय पालने में दिखाई पड़ने लगे जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। सत्ता में आते ही उनकी सरकार ने बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण का काम शुरू करवा दिया। यह भी कोई अजूबी बात नहीं थी। नई बात यह थी कि सड़क की बगल में नालियों का भी साथ-साथ नीतीश सरकार ने निर्माण कराना शुरू कर दिया। ऐसा पहले नहीं होता था। यहीं ईमानदार मंशा की झलक मिली।

मुझे उर्दू पत्रकार मोईन अंसारी ने एक बार बताया था कि पटना जिले के ही एक शहर में पहले से बनी एक सीमेंटी सड़क को एक भ्रष्ट मंत्री ने साठ के दशक में किस तरह तोेड़वा कर उसे अलकतरा वाली सड़क में परिणत करवा दिया था। पूछने पर उसने मोईन चचा को बेशर्मी से बताया था कि मेरे और मेरे ठेकेदारों के पास भी अपने पेट हैं। सड़कें टूटेंगी नहीं तो उनकी मरमत कैेसे होगी ? हर साल मरम्मत नहीं होगी तो ठेकदार जिएगा कैसे ? तब से बिहार में भ्रष्टाचार आगे ही बढ़ता गया है।

सन 1971 के लोकसभा चुनाव के बाद तो उसने संस्थागत रूप ले लिया। सरकारी धन की इसी लूट-खसोट की भावना और संस्थागत भ्रष्टाचार को विभिन्न मुख्यमंत्रियों ने पाला पोसा, आगे बढ़ाया या फिर उसके साथ सह अस्तित्व का जीवन जिया। कुछ ईमानदार मुख्यमंत्री थोड़े ही दिनों में हटा दिए गए। सबका नतीजा यह हुआ कि विकास नहीं हुआ। गरीबी बढ़ी, साथ में नक्सली भी।

देश में नक्सली आंदोलन का हाल यह है कि उसे बिहार का गढ़ फतह करके नेपाल तक का कोरीडोर पूरा कर लेना है। यदि यह हो गया तो मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था समाप्त हो जाएगी। नीतीश जैसे मुख्यमंत्री विकास व सुशासन के जरिए उस स्थिति को टालने की कोशिश कर रहे हैं। पर राजनीतिक कार्यपालिका तथा प्रशासनिक कार्यपालिका नीतीश कुमार के अनुकूल उतना नहीं बन पा रही है जितना मुख्यमंत्रीे चाहते हैं।

उनके ही दल के कुछ नेता लोकतंत्र पर उस खतरे को स्वार्थवश नहीं देख पा रहे हैं। जदयू के अनेक नेताओं के लिए पुत्र मोह, पैसा मोह और जाति मोह अधिक महत्वपूर्ण है। ऐसे लोग सकीर्ण स्वार्थ में पड़ कर अपनी ही आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय कर रहे हैं। आज बिहार में जितने नेता मुख्यमंत्री के घोषित -अघोषित उम्मीदवार हैं जितना उन्हें मैं जानता हूं, उसके अनुसार उनमें से किसी में भी भ्रष्टाचार व अपराधियांे से लड़ने की नीतीश कुमार जैसा माददा नहीं है। नीतीश कुमार की यही बात मुझे सर्वाधिक पसंद है।

आज बिहार में कोई रामराज नहीं आया है। पर एक बात जरूर हुई है कि इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतीश कुमार उम्मीद की आखिरी किरण के रूप में जरूर उभरे हैं। कोई अन्य राजनीतिक व्यवस्था देश-प्रदेश के जनजीवन में कैसे फर्क ला पाएगी, यह मैं नहीं जानता।

प्रश्न - नीतीश कुमार की सरकार में आपको कोई भी खराबी नजर आती है या नहीं ?

उत्तर - क्यों नहीं नजर आती ? मैंने कई बार लिखा भी है कि नीतीश सरकार ने प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की बहाली के लिए प्राप्तांकों को आधार बना कर भयंकर भूल की है। बहाली के पहले उनके लिए प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन किया जाना चाहिए था। साथ ही, शराब की दुकानों की संख्या बढ़ाने का काम भी गलत हुआ। इससे उलट शराबबंदी की दिशा में राज्य सरकार को आगे बढ़ना चाहिए था जैसा कि संविधान के नीति निदेशक तत्व चैप्टर में राज्य को निदेश दर्ज है।

जिस प्रदेश के ब्यूरोक्रेसी व राजनीति के रग -रग में भ्रष्टाचार प्रवेश कर चुका हो, वहां नीतीश कुमार क्या ब्रहमा-विष्णु-महेश भी एक साथ आ जाएं तो इतने थोड़े समय में उसे सुधार नहीं सकते। यहां अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कोई मुख्यमंत्री स्थिति को सुधारने की भरसक कोशिश कर रहा है या फिर सरकारी भ्रष्टाचार के समुद्र में खुद डुबकी लगा रहा है।

प्रश्न - आपका प्रारंभिक जीवन कैसा रहा और आप पत्रकारिता में कैसे आये?

उत्तर - मेरा प्रारंभिक जीवन गांव में बीता। छठवीं कक्षा में भी पढ़ने के लिए अपने गांव भरहापुर से 4 किलोमीटर दूर दिघवारा रोज पैदल जाना पड़ता था। पैर में चप्पल-जूता कुछ नहीं। सड़क कच्ची। गर्मी के दिनों में धूल में पैर वैसे ही जलते थे मानो गर्म तवे पर शरीर का कोई अंग।

मेरे पिता जी कम ही पढ़े-लिखे थे। पर वे परंपरागत विवेक से लैस थे। उन्होंने जमीन बेच कर भी हम भाइयों को उच्च शिक्षा दिलाई। मैंने 1963 में साइंस से फस्र्ट डिवीजन से मैट्रिक पास किया। मैं परिवार का पहला मैट्रिकुलेट था। बाबू जी मेरी सफलता पर काफी खुश थे। मैं परिवार का पहला मैट्रिकुलेट जो था। मेरे छोटे भाई नागेंद्र पढ़ाई में मुझसे एक साल जूनियर थे, पर अधिक गंभीर थे। बाबू जी चाहते थे कि में ओवरसियर बनूं और मेरा छोटा भाई वकील बने।
मैट्रिक में प्रथम श्रेणी वालों के लिए ओवरसियरी में प्राप्तांक के आधार पर ही नामांकन संभव हो जाता था। पर मेरी इच्छा वैसी नहीं थी। मैट्रिक में पढ़ते समय ही मैं गांधीवाद से प्रभावित हो गया। कालेज जाने के बाद लोहियावादी हो गया। कालेज जाने के बाद पढ़ाई में मन नहीं लगने लगा। पहले अध्यात्म व फिर राजनीति की ओर मुखातिब हुआ। पर जब सक्रिय राजनीति से जब मन उचटा तो पत्रिकाओं व अखबारों से जुड़ा।

छपरा में राजेंद्र कालेज में बिताये गये अपने छात्र जीवन में ‘सारण संदेश’ जैसी छोटी पत्रिकाओं में लेख लिखता ही था। वहीं रवींद्र कुमार ने मुझे 1965 में दिनमान पढ़ने की प्रेरणा दी जिसने मुझे पत्रकार बनाया।

राजनीति प्रसाद ने जार्ज फर्नांडीस से मेरा परिचय कराया और मुझे प्रतिपक्ष का पटना संवाददाता बनवा दिया। इधर ‘जनता’ साप्ताहिक में भी काम करता था। उसे रामानंद तिवारी निकालते थे। आपातकाल तक यही चलता रहा। क्योंकि स्थापित अखबारों में नौकरी पाना मेरे जैसे व्यक्ति के लिए तब कठिन था। पर सन 1977 में ‘आज’ में नौकरी पाई।

प्रश्न - बड़े अखबारों में काम करने का अपना कुछ अनुभव बताएं। आप जब पत्रकारिता में आये थे, उस समय और आज के समय में कितना फर्क आया है ?

उत्तर - यदि पारसनाथ सिंह और प्रभाष जोशी जैसे ऋषितुल्य संपादक मुझे नहीं मिले होते तो मैं वह सब नहीं कर पाता जितना कुछ भी कर पाया। आज यदि मैं अपने पत्रकार जीवन से संतुष्ट हूं तो वह सब ‘आज’ के पारसनाथ सिंह और जनसत्ता के प्रभाष जोशी की कपा से ही यह संभव हो पाया।

वैसे एक बात जरूर कहूंगा कि राजनीति व खास कर सत्तापक्ष की राजनीति का पत्रकारिता पर असर पड़ता ही है। जब गांधी -नेहरू जैसे नेता राजनीति में थे तो बाबू राव विष्णु पराड़कर जैसे संपादक भी हुआ करते थे। जब मैं पत्रकारिता में आया तब तक गांधी युग के अनेक नेता जीवित थे और राजनीति में सक्रिय भी थे। उनकी मीडिया के प्रति अलग राय थी। मीडिया से निपटने का उनका तरीका आज के नेताओं से बिल्कुल भिन्न था।। मोरारजी देसाई तब सक्रिय थे। जवाहर लाल नेहरू के निधन के कोई पांच साल ही हुए थे। डा. श्रीकष्ण सिंह आठ साल पहले ही गुजरे थे। इनके कार्यकाल का हैंगओवर बाकी था।

इन लोगों के नाम इसलिए ले रहा हूं क्योंकि मैं बताना चाहता हूं कि उनके कार्यकाल में मीडिया को काम करने की कैसी आजादी थी। यह बात नहीं है कि मीडिया इन नेताओं की तीखी आलोचना नहीं करती थी। पर नेहरू, मोरारजी और श्रीबाबू उन अखबारों व पत्रिकाओं को पढ़ना ही छोड़ देते थे जिन प्रकाशनों के बारे में वे समझते थे कि वे प्रकाशन उनके साथ लेखन के स्तर पर अन्याय कर रहे हैं। वे बदले की भावना से मीडिया या फिर मीडियाकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते थे।

बाद के वर्षों में तो आलोचना करने वाले अखबारों के मालिकों के व्यवसाय नष्ट किए गये, संपादकों को सत्ताधारी दल के नेताओं ने नौकरियों से हटवा दिया। पत्रकार जेल तक भिजवा दिए गए। धमकियां दी गईं और उन पर नाहक परेशान करने के लिए मुकदमे किए गए। अब ऐसे में अखबार मालिक व्यापारीगण अखबारों को युद्ध का मैदान तो बनाने से रहे।

यह संयोग नहीं है कि मीडिया को उसी सत्ताधारी नेताओं ने तंग तबाह किया जिन पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगे। जब राजनीति में ही आदर्श नहीं रहा तो सिर्फ मीडिया में ही उसे क्यों खोजा जा रहा है। यह बात और है कि मीडिया व राजनीति में आदर्श के कुछ टापू जरूर आज भी जहां- तहां मौजूद हैं।

( 15 मार्च और 16 मार्च 2010 को ‘प्रभात खबर’ के पटना संस्करण में दो किस्तों में प्रकाशित )

Friday, March 12, 2010

बिहार को मिला एक नया चुनावी मुद्दा

बिहार में विधान सभा का चुनाव इसी साल होना है। महिला आरक्षण एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन जाए तो यह कोई अजूबी बात नहीं होगी।

महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप के सबसे बड़े विरोधी नेताआंें में से एक नेता लालू प्रसाद इसी प्रदेश से हैं। विधान सभा चुनाव में मतदाता अन्य बातों के साथ -साथ इस बात पर भी अपना मत देंगे कि महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप का किस दल ने विरोध और किसने समर्थन किया।

लालू प्रसाद तथा अन्य विरोधियांे को तो यह लगता है कि चूंकि इस देश में पिछड़ों की आबादी अन्य समुदायों की अपेक्षा काफी अधिक है, इसलिए उन्हें इस आरक्षण के विरोध का चुनावी लाभ जरूर मिलेगा। पर क्या ऐसा हो पाएगा? इसका जवाब तो बिहार का अगला चुनाव नतीजा ही देगा।

हालांकि लालू-मुलायम से अलग राय रखने वाले लोग बताते हैं कि इस विरोध का नुकसान ही लालू प्रसाद को बिहार में होगा क्योंकि उनका विरोध पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं के हितों को ध्यान में रख कर कम बल्कि अपने कुछ खास चुनाव क्षेत्रों को महिलाओं से बचाने की समस्या को ध्यान में रख कर अधिक है।

लालू प्रसाद ने कहा है कि दुनिया के किसी देश में महिलाओं के लिए संसद में आरक्षण नहीं हैं। फिर यहीं क्यों ? उन्होंने यह भी कहा है कि यह पुरुष प्रधान समाज है। इसमें पति जहां वोट देने को कहता है, पत्नी वहीं वोट देती है। इसलिए इस विधेयक के पास हो जाने से कांग्रेस या भाजपा को महिलाओं के वोट नहीं बढ़ जाएंगे।

लालू प्रसाद ने यह कह कर समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति का वर्णन खुद ही कर दिया है। इससे भी शीघ्र महिला आरक्षण की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसे पुरुष प्रधान समाज में यदि आरक्षण देकर महिलाओं का सशक्तीकरण कर दिया जाए तो वे किसी को वोट देने के बारे में खुद निर्णय लेने की स्थिति में हो जाएंगी। लोकतंत्र के लिए यह जरूरी भी है। लोकतंत्र के लिए यह कोई अच्छी बात तो है नहीं कि एक बड़ी आबादी अपने पतियों के कहने पर ही मतदान किया करे !

महिला आरक्षण के मामले को गत 14 साल से लटका कर रखना कहां का लोकतंत्र है जबकि इस विधेयक के पक्षधर दलों व सांसदों की संख्या हमेशा ही विरोधियों की अपेक्षा अधिक रही है ? अब जब मौजूदा लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक के घोषित विरोधियों की संख्या और भी कम हो गई है तो लालू प्रसाद कहते हैं कि इस विधेयक के खिलाफ ‘युद्ध’ होगा। ऐसे ही युद्ध की घोषणा जब अल्पमत सवर्ण लोग सन 1990 में मंडल आरक्षण के खिलाफ कर रहे थे तो खुद लालू प्रसाद की उस पर कैसी प्रतिक्रिया थी ? यह भी याद रखने की जरूरत है कि वी.पी. सिंह की सरकार को जितने सांसद समर्थन कर रहे थे, उन सांसदों का बहुमत मंडल आरक्षण के खिलाफ ही था। फिर भी जरूरत समझ कर वी.पी. सिंह सरकार ने वह काम कर दिया था।

दरअसल लोकतंत्र का तकाजा यह है कि लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव यह कहते कि अभी तो मौजूदा स्वरूप में भले कांग्रेस इस विधेयक को पारित करा ले ,पर जब हमारे मत के लोग बहुमत में आएंगे तो हम आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान कर देंगे।

पर सवाल है कि पिछड़ा बहुल इस देश में लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं के दल संसद में बहुमत क्यों नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं ताकि वे आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान करा पाएं ? दरअसल वे इसलिए बहुमत नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि पिछड़े और अल्पसंख्यकों को भी उनकी कथनी और करनी पर अब कम ही भरोसा हो रहा है। पिछड़े वर्ग के एक नेता जी ने गत लोकसभा चुनाव में अपने दल के एक निवर्तमान अल्पसंख्यक सांसद का टिकट काट कर उनकी जगह अपने एक करीबी रिश्तेदार को टिकट देकर वहां से लोकसभा में पहुंचा दिया। वे नेताजी आज गला फाड़ कर यह ़कह रहे हंै कि मौजूदा महिला आरक्षण विधेयक अल्पसंख्यक विरोधी है।

बिहार विधानसभा के अगले चुनाव में महिला आरक्षण मुद्दा इस रूप में भी चर्चित हो सकता है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण के बहाने इस आरक्षण को अनंतकाल तक टाले रखना उचित है या फिर विधायिकाओं में महिलाओं को बड़ी संख्या में भेज कर उनका जल्द सशक्तीकरण जरूरी है ? यह मानी हुई बात है कि गाड़ी के दोनों पहिए यानी स्त्री-पुरुष समान रूप से मजबूत होंगे तो ही गाड़ी ठीक से चलेगी।

बिहार में पंचायतों व नगर निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान नीतीश सरकार ने किया। इन निकायों के चुनावों का अनुभव यह रहा कि ऐसी कुछ सामान्य सीटों से भी पिछड़ी जातियों की महिलाएं विजयी हुई जो सीटें सामान्य महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। संभवत इसी अनुभव के आधार पर नीतीश कुमार ने यह समझा है कि संसद में पेश महिला आरक्षण विधेयक के लागू हो जाने के बाद भी पिछड़े वर्ग की महिलाओं को कोई नुकसान नहीं होगा। यह जाहिर बात है कि जिस चुनाव क्षेत्र में जिस जाति की बहुलता होती है,उस क्षेत्र में उस जाति के उम्मीदवार की ही जीत की अधिक गुंजाइश रहती ही है चाहे उम्मीदवार महिला हो या पुरुष।

आजादी की लड़ाई के समय भी कुछ नेताओं ने ऐसे सवाल उठाए थे। कुछ दलित, अल्पसंख्यक व कमजोर वर्ग के नेतागण तब यह चाहते थे कि आजादी से पहले ही यह तय हो जाए कि आजाद भारत में उन समुदायों की स्थिति क्या होगी। उनकी बात सुनी जाती तो आज तक अंग्रेज यहीं रहते।

साभार: दैनिक जागरण पटना संस्करण (09 मार्च, 2010)

Saturday, February 20, 2010

निंदक नियरे राखिए

चीन ने कहा है कि भारत, मिसाइल टैक्नोलाजी के मामले में, चीन से अभी दस साल पीछे है। संभव है कि यह बात चीन ने अपने लोगों का मनोबल बढ़ाने के लिए कही होगी! यह बात भी संभव है कि इसमें शायद सच्चाई भी हो। इस संबंध में अंतिम वाक्य तो कोई वैज्ञानिक ही बोल सकता है। याद रहे कि अग्नि -3 के सफल परीक्षण के बाद यह खबर आई थी कि चीन के सुदूर उत्तरी इलाके भी अब भारत के हमले की जद में हैं।

खैर जो हो, पर निंदक नियरे राखिए........वाली कबीर वाणी कम से कम कुछ मामलों में तो इस देश को माननी चाहिए। इससे पहले चीन ने यह भी कहा था कि ‘भारत में सरकारी भ्रष्टाचार इतना अधिक बढ़ चुका है कि विकास व कल्याण कार्यों के लिए आवंटित पैसों में से अधिकांश, वैसे ही जाया हो जाता है जिस तरह छेद वाले किसी लोटे में से उसका अधिकांश पानी नीचे गिर जाता है। ’याद रहे कि चीन में भ्रष्ट लोगों के लिए फांसी की व्यवस्था है जबकि भारत में जो जितना अधिक भ्रष्ट है, उस व्यक्ति के लिए उतना ही अधिक महत्वपूर्ण पद पर पहुंच जाने की गुंजाइश है।

चीन की इन बातों का मनन करके यदि भारत खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करे तो यह कोई हेठी की बात नहीं होगी। हमारे बाद आजाद हुए चीन ने अनेक मामलों में हमसे बेहतर ढंग से अपने देश को बनाया है तो उसे उपदेश देने का नैतिक अधिकार भी है।

सरकारी भ्रष्टाचार को कम करने के मामले में हमारे देश का यदि खराब रिकार्ड है तो इसके लिए हमारे हुकमरान ही जिम्मेदार रहे हैं। पर यह भ्रष्टाचार रक्षा खरीद मामलों में भी अपना असर दिखा रहा है जो देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक बात है। हाल में यह भी खबर आई थी कि मुम्बई के ताज होटल आदि पर हुए आतंकी हमले के समय हमारे पुलिस अफसरों ने जो बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखे थे, वे घटिया थे क्योंकि उसकी खरीद में घोटाला हुआ था। सोफमा जैसी बेहतर तोप को छोड़कर हमने बोफर्स तोप खरीदी थी, यह बात तो जगजाहिर है। पर इसके अलावा बहुत सी बातें जगजाहिर नहीं होतीं और बड़े बड़े घोटाले पलते रहते हैं। इससे हमारी रक्षा तैयारियां पीड़ित होती है।

भले अब हम सन 1962 की स्थिति में नहीं हैं जब हमारी चीन से शर्मनाक हार हुई थी। पर हमें जो चीन तक पहुंचना चाहिए था, हम वह काम भी नहीं कर पा रहे हैं तो इसके पीछे विभिन्न सरकारी स्तरों पर व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार ही है। इस समस्या के कोढ़ में खाज का काम करती है उस भीषण भ्रष्टाचार के प्रति हमारे यहां की विभिन्न सरकारों व नेताओं की भारी सहिष्णुता।

कई बार यह कहा जा चुका है कि रक्षा मामलों में हमारी बदतर तैयारियों ने इस देश को विदेशी हमलावरों के समक्ष लाचार भी बना दिया था।

मध्य युग में बाबर कीे फौज में तोप थी तो राणा सांगा के सैनिकों के पास महज तलवारें और भालें। युद्ध में बाबर की ओर से एक तोप चलती थी और अनेक राजपूत वीर , तत्काल वीर गति को प्राप्त कर जाते थे। एक बार फिर तोप के सामने तलवार लेकर खड़े हो जाने के लिए सैनिकों की जमात तैयार हो जाती थी।

बाद के दिनों में भी इस देश में शाहजहां ने ताज महल और विशाल किलों के निर्माण में समय, शक्ति व धन तो खूब लगाये जबकि उसे देश की हमलावरों से रक्षा के लिए नेवी पर भी खर्च करना चाहिए था। हमलावर समुद्री मार्ग से भारत आये थे।

आज जब भारत का अपने पड़ोस से अच्छा संबंध नहीं है तो हमारी तैयारी भी ऐसी होनी चाहिए ताकि दुश्मन हमारे खिलाफ कोई खिलवाड़ करने से पहले थोड़ा रुक कर सोंचें। परमाणु संपन्न देश बन जाने के कारण भारत की सैनिक धाक जरूर बढ़ी है। पर वही काफी नहीं है। हमें आर्थिक रूप से भी एक संपन्न देश बनना पड़ेगा। इसके लिए भ्रष्टाचार पर काफी हद तक काबू पाना होगा। भ्रष्टाचार कम होने से रक्षा तैयरियों में भी बेहतरी आएगी। साथ ही देश का आर्थिक स्वास्थ्य भी सुधरेगा। गांवों में भी जो व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न होता है, उसे उसके विरोधी भी जल्दी उससे नहीं उलझते।

चीन का मन इसलिए भी बढ़ा रहता है क्योंकि भारत ने आजादी के बाद खुद को बुलंद नहीं बनाया। अब भी यहां 84 करोड़ लोग औसतन बीस रुपये रोज पर किसी तरह पेट को पीठ से अलग रखने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरी ओर इस देश में धनपशुओं, कालाबाजारियों, करोड़पति-अरबपति नेताओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है। इस देश का भारी धन विदेशी बैंकों की शोभा बढ़ा रहे हैं। ऐसे में चीन की निंदा को कबीर तरह हम लें तो हमारा ही भला होगा।

(दैनिक ‘जागरण’ पटना संस्करण:16 फरवरी 2010 से साभार)

Tuesday, February 2, 2010

राजनयज्ञों की उठती पीढ़ी

इस देश में नेता कई तरह के होते हैं। अत्यंत थोड़े से राजनयज्ञ यानी स्टेटसमैन होते हैं। कुछ अन्य नेता होते हैं। कुछ कबीलाई सरदार होते हैं। कुछ शुद्ध माफिया व हत्यारे होते हैं जो राजनीति भी करते हैं। कुछ जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंकों के सौदागर होते हैं। कुछ अन्य कोटियां भी हैं जिनकी चर्चा यहां उचित नहीं।

जब देश की सत्ता राजनयज्ञों या कम से कम नेताओं के हाथों में आती है तो देश भरसक सुरक्षित माना जाता है। पर जब बाकी श्रेणियों के राजनीतिक कर्मियों के हाथों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सत्ता आ जाती है तो देश या प्रदेश असुरक्षित माना जाने लगता है।

इस देश के साथ परेशानी यह पैदा हो रही है कि यहां एक-एक करके राजनयज्ञ यानी स्टेटसमैन उठते जा रहे हैं। ज्योति बसु अब हमारे बीच नहीं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी और जार्ज फर्नांडीस बुरी तरह बीमार हैं और सक्रिय राजनीति से दूर जा चुके हैं। एल.के. आडवाणी को परिस्थितियों ने किनारे कर दिया। उनके अर्ध-संन्यास के लिए वे खुद कतई जिम्मेदार नहीं हैं। यदि पूरे देश के राजनीतिक नजारे को गौर से देखें तो स्टेटसमैन शायद ही कहीं नजर आएगा। यदि इक्के-दुक्के हैं भी तो उनकी संख्या इतनी कम है कि वे देश पर आने वाले किसी संकट में कोई निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं हैं।

नेताओं की नई नई पीढ़ियां आंदोलनों की आंच से तप कर निकलती हैं। अब परिवारवाद के घरौदों से राजनीति में नई पीढ़ियां जबरन निकाली जा रही हैं। और इस अभागे व गरीब देश पर थोपी जा रही है। परिवारवाद की कल्पना ही स्वार्थ व जातिवाद पर आधारित है। इसलिए आम तौर पर परिवारवादी राजनीति का स्वरूप भी वैसा ही बनता जा रहा है। शायद ही किसी परिवारवादी नेता ने देश का भला किया हो। अपवादों की बात और है।

ब्रिटेन के प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल को स्टटेसमैन कहा जाता है। स्टेटसमैन न सिर्फ देश व दुनिया के सामने मौजूद समस्याओं से मजबूती व होशियारी से लड़ता है बल्कि राजनीति का स्वरूप भविष्य में कैसा हो सकता है, इसका भी सही अनुमान रखता है। चर्चिल ने सफलतापूर्वक द्वितीय विश्व युद्ध का नेतृत्व किया था। साथ ही उसे यह भी पता था कि आजादी दे देने के बाद भारत के नेतागण उस देश के साथ क्या कर गुजरेंगे। उनकी यह भविष्यवाणी भारत में सही साबित हुुई है जिसकी यहां अक्सर चर्चा होती रहती है। हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि भारत को आजाद करना गलत था।ं

पर आज जब हम भारत में स्टटेसमैन की कमी की चर्चा करते हैं तो हमारे दिलोदिमाग में यह बात रहती है कि यदि देश के सामने कोई बहुत बड़ी व खतरनाक समस्या आ जाए तो हमारे नेतागण उससे कैसे निपटेंगे।

आज भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या सरकारी भ्रष्टाचार है। इसी से लगभग अन्य सभी समस्याएं पैदा हो रही हैं। आज की भीषण महंगाई की समस्या भी सरकारी भ्रष्टाचार से ही पैदा हुई है। महंगाई से जूझने में हमारे देश व प्रदेश के नेतागण विफल हैं। जबकि निष्पक्ष विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यदि ईमानदारी, दूरदर्शिता व कड़ाई से इस समस्या का समय पर समाधान कर दिया गया होता तो आज यह इतना भीषण रूप नहीं ले पाता। सरकारी भ्रष्टाचार की समस्या से सफलतापूर्वक जूझने के लिए ऐसे राजनयज्ञों की सख्त जरूरत है जो ईमानदारी से इस बीमारी पर हमला करे। इसके लिए यह जरूरी है कि वह राजनयज्ञ खुद भी ईमानदार हांे। वैसे भी व्यक्तिगत ईमानदारी के बिना कोई राजनयज्ञ का दर्जा पा ही नहीं सकता।

आज इस देश में कितने नेता बच गये हैं जिनकी व्यक्तिगत ईमानदारी ‘सीजर की पत्नी की तरह संदेह से परे’ है ? ऐसे माहौल में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जरूरी कदम कौन उठाएगा ? यह एक बड़ी समस्या है जो समय के साथ इस देश में बढ़ती ही जा रही है। यह बात सही है कि अटल बिहारी वाजपेयी, जार्ज फर्नांडीस और ज्योति बसु ऐसी सरकारों में रहे जो भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं थी। पर ये तीन नेता कम से कम ऐसे तो माने ही गये जो सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर अपने तथा अपने परिवार के घर नहीं भरते थे। ये नेता जिन पदों पर रहे, उन पदें को तो कम से कम पैसे कमाने की मशीन बनाने से उन्होंने रोके रखा। पर आज अधिकतर सत्ताधारी व प्रतिपक्षी नेताओं की हालत कैसी है? एम.पी.-विधायक फंड ने तो अधिकतर नेताओं की बखिया उधेड़ कर रख ही दी है।

इस माहौल में ज्योति बसु जैसे राज नेताओं का जाना अखरता है। राजनयज्ञों की दिनानुदिन घटती संख्या और भी अखरने वाली बात है। यह देश व इसके लोकतंत्र के भविष्य के लिए कतई शुभ नहीं है। आगे- आगे देखिए होता है क्या !

साभार दैनिक जागरण पटना

Saturday, January 30, 2010

तीन-तीन बार उनके दरवाजे पर आकर लौट गया था प्रधान मंत्री का पद

प्रधान मंत्री का पद तीन-तीन बार ज्योति बसु के दरवाजे पर आकर लौट गया था। एक बार तो सी.पी.एम. की केंद्रीय कमेटी ने उन्हें प्रधान मंत्री पद स्वीकारने ही नहीं दिया। यह 1996 की बात है। अन्य दो अवसरों पर खुद ज्योति बसु ने यह पद ठुकरा दिया। 1996 से पहले उन्हंे ऐसा आफर 1989 और 1990 में भी मिला था।

संभवतः ऐसा इस देश में सिर्फ ज्योति बसु के ही साथ हुआ। इस बारे में खुद ज्योति बसु ने कहा था कि ‘भारत का प्रधान मंत्री बनने का प्रस्ताव मेरे सामने पिछले कई वर्षों से विभिन्न स्त्रोतों से आता रहा है। 1996 में जब वी.पी. सिंह ने प्रस्ताव दिया तब मुझे लगा कि इसे स्वीकार करने का समय आ गया है।’ इस बात का पता तो पूरे देश को तभी चल गया था कि किस तरह सी.पी.एम. ने ज्योति बसु को प्रधान मंत्री नहीं बनने दिया था। पर यह बात कम ही लोग जानते हैं कि 1989 में भी प्रधान मंत्री बनने का प्रस्ताव अरुण नेहरू ने ज्योति बसु को दिया था। यह प्रस्ताव राजीव गांधी की ओर से अरुण नेहरू ने ज्योति बाबू तक पहुंचाया था।

ज्योति बसु के जीवन पर लिखित अरुण पांडेय की पुस्तक में इस बात का जिक्र है। पुस्तक 1997 में राज कमल प्रकाशन ने प्रकाशित की थी। ज्योति बसु ने बताया था कि ‘मैंने तब अरुण नेहरू का आॅफर अस्वीकार कर दिया था।’

अरूण पांडेय लिखते हैं कि ‘उनके स्वीकारों व अस्वीकारों का अर्थ समझा जा सकता है। यदि वे 1989 में प्रधान मंत्री पद का ख्वाब देखने लगे होते तो भारतीय मतदाता उन्हें खलनायक मानते। क्योंकि 1989 के नायक तो विश्वनाथ प्रताप सिंह थे। ठीक उसी तरह यदि वे 1990 में राजीव गांधी से हाथ मिला कर प्रधान मंत्री बनते तो उन्हें विश्वासघाती कहा जाता। इससे अलग 1996 का प्रस्ताव उन्हें नायक बनाता लग रहा था। क्योंकि वे समूचे तीसरे मोर्चे की आखिरी पसंद थे। चुनौतियां विकट थीं, पर उनसे टकराने का पर्याप्त अनुभव उनके पास था। इसीलिए ज्योति बसु ने माकपा के इस निर्णय को भयंकर ऐतिहासिक भूल घोषित किया। याद रहे कि उनकी पार्टी ने ही उन्हें 1996 में प्रधान मंत्री नहीं बनने दिया था।’

इस संबंध में ज्योति बसु ने कहा था कि ‘सरकार में शामिल होने के सवाल पर पार्टी ने जैसा अड़ियल और अनम्य रूख अख्तियार किया, उसका कारण था मेरे अपने पाॅलिट ब्यूरो और केंद्रीय कमेटी के साथियों में उपयुक्त राजनीतिक समझ का अभाव। इसीलिए वे स्थिति का सामना सकारात्मक रूप से नहीं कर सके। अधिकतर के विचार युक्तियुक्त नहीं थे। उन्होंने भयंकर भूल की। इस बात का हमें दिली अफसोस है कि सरकार में शामिल न होने का निर्णय करके हमारी पार्टी के साथियों ने मेरे सुझाव को महत्वहीन माना और एक प्रकार से मेरे विवेक को अपमानित किया। लोग हमें इस निर्णय के लिए उसी प्रकार दोषी ठहराएंगे जिस प्रकार उन्होंने तब दोषी ठहराया था जब हमने मोरारजी सरकार को समर्थन नहीं दिया था।’

1979 में चैधरी चरण सिंह मोरारजी की सरकार गिराने पर अमादा थे। ज्योति बसु उसी समय की चर्चा कर रहे थे। तब ज्योति बसु विदेश में थे। बसु ने इस संबंध में कहा था कि ‘तत्कालीन प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने अपनी सरकार बचाने के लिए समर्थन की मांग मुझसे तब की थी, जब मैं बुखारेस्ट में छुटिटयां मना रहा था। उन्होंने मुझे फौरन भारत लौटने को कहा था। मैंने स्थिति का अध्ययन कर मन ही मन फैसला कर लिया कि मोरारजी देसाई को पद पर बैठाए रखने के लिए हमारी पार्टी को उनका समर्थन करना चाहिए। लेकिन इससे पहले कि मैं भारत पहुंचता, हमारी पार्टी उन्हें समर्थन नहीं देने का फैसला कर चुकी थी। मैं कुछ नहीं कर पाया। क्योंकि मैं पार्टी के भीतर अल्पमत में था। मेरी दृष्टि में यह भी भारी भूल थी। इंदिरा गांधी ने राजनीतिक निर्णय लेते समय राजनीतिक नैतिकता की कतई परवाह नहीं की। हमारी पार्टी पर मोरारजी देसाई सरकार को गिराने का आरेाप लगा। हमारी गलती ही इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी का कारण बनी। याद रहे कि इंदिरा गांधी ने समर्थन देकर चरण सिंह को प्रधान मंत्री बनवा दिया था और लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने से पहले समर्थन भी वापस ले लिया था।

माकपा में मौजूद उनके विरोधियों ने इस तरह के मामलों में ज्योति बसु के तर्कों को खारिज कर दिया था। उनके विरोधियों का मानना था कि पार्टी ऐसी किसी सरकार में शामिल नहीं हो सकती, जिसकी नीतियों को प्रभावित करने की स्थिति में वह नहीं हो। दूसरा तर्क यह था कि कांग्रेस के समर्थन से सरकार चलाने का हर अभियान पार्टी के विस्तार में बाधक होगा। तीसरा तर्क यह था कि सरकार से बाहर रहते हुए पार्टी सरकार पर अपना दबाव भी बना सकती हेै। साथ ही पार्टी मोर्चे के विभिन्न धड़ों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में अधिक सक्षम हो सकती है। ज्योति बसु को गम इस बात का नहीं था कि वे प्रधान मंत्री नहीं बन सके, बल्कि उन्हें इस बात का गम रहा कि उनकी पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति में सशक्त हस्तक्षेप करने का एक सुनहरा अवसर खो दिया।

सुरभि बनर्जी ज्योति बसु की अधिकृत जीवनीकार रही हैं। उन्होंने लिखा है कि ज्योति बसु किसी भी पद को स्वीकार करने में सदा संकोची रहे। उन्होंने यानी ज्योति बसु ने हंसते हुए जीवनीकार से कहा था कि ‘सरकार में शामिल नहीं होने का निर्णय लेकर केंद्रीय कमेटी के बहुमत ने मुझे बचा लिया। क्योंकि प्रधान मंत्री बनने के बाद मेरे उपर बोझ बढ़ जाता। स्वास्थ्य खराब होने के कारण मुझे तकलीफ होती।’ इस पर सुरभि बनर्जी ने लिखा है कि ‘केंद्रीय कमेटी के फैसले के बाद मैंेने माकपा के ढेर सारे सदस्यों और कई अन्य राजनीतिक विश्लेषकों से बात की। लगभग सभी ने कहा कि यह फैसला देशहित को ध्यान में रख कर किया गया फैसला नहीं था बल्कि पार्टी में मौजूद परंपरागत द्वंद्व का परिणाम था। ज्योति बसु से अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी और विचारधारात्मक विरोधों के चलते केंद्रीय कमेटी के अधिकतर सदस्यों ने बैठक में आने से पहले ही यह तय कर लिया था कि किसी भी कीमत पर उन्हें प्रधान मंत्री नहीं बने देना है।’

इस मसले पर बंगाल बनाम केरल वाला पुराना निष्कर्ष निकालने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। क्योंकि उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी किससे थी और विचारधारात्मक मतभेद किससे था, इस सवाल का किसी महत्वपूर्ण नेता की तरफ से कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है।

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