Friday, December 23, 2016

जैन से सहारा तक डायरियों का नतीजा सिफर ही रहा है

सहारा समूह पर छापे के दौरान मिली एक डायरी इस समय देश भर में चर्चा का केंद्र है। लेकिन क्या इस डायरी में दर्ज सूची का हाल भी वही होने वाला है जो पहले की सूचियों का हुआ ?

नब्बे के दशक में चंदे की एक ऐसी ही सूची जैन हवाला डायरी में मिली थी।

  हवाला घोटाले की वह  सूची तो  आखिरकार दबा ही दी  गयी।

अब देखते हैं कि सहारा सूची का क्या होता है ! जब किसी सूची में अनेक दलों के बड़े-बड़े नेताओं के नाम होते हंै तो उसके अंततः दब जाने की ही आशंका रहती है। बिहार का चारा घोटाला भी एक हद तक सर्वदलीय और बहुपक्षीय प्रेरित घोटाला ही था।उस घोटाले की जांच के सिलसिले में भी एक सूची मिली थी।उस सूची में करीब चार दर्जन पत्रकारों के नाम भी थे। 

चलिए चारा घोटाले में कुछ लोगों को निचली अदालतों से  सजाएं होने लगीं हैं।पर चारा घोटाला के मामलों को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने और वहां अंतिम फैसला होने में अभी वर्षों लगेंगे।

  इस देश में व्हिसिल ब्लोअर  एक सूची से दूसरी सूची की ओर दौड़ रहे हैं।इस बीच एक से बढ़कर एक सूची सामने आती रहती है।

 भला सिस्टम से कोई कितना और कैसे लड़ सकता है ! तब जबकि सिस्टम में ही घुन लग गया हो !
  व्हिसिल ब्लोअर विनीत नारायण हवाला मामले को उसकी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचा सके।अब देखना है कि सहारा डायरी मामले में  प्रशांत भूषण को कितनी सफलता मिलती है ! पर एक बात जरूर है।अदालती फैसला आने से पहले जागरूक मीडिया के कारण असली बातें लोगों तक पहुंच ही जाती हैं।आजकल तो सोशल मीडिया भी ताकतवर होता जा रहा है जो कुछ भटकावों के बावजूद कमाल कर रहा है।सकारात्मक बात यह है कि  विनीत नारायण और प्रशांत भूषण जैसे बहादुर लोग उपलब्ध हैं।सिस्टम से  लड़ने का जोखिम उठाना भी बहुत बड़ी बात है।यहां तक कि हवाला डायरी मामले में भी विनीत नारायण के अलावा भी कुछ लोगों ने सराहनीय भूमिकाएं  निभाई थीं।

 सहारा सूची का क्या हश्र होगा,यह तो बाद की बात है।इस अवसर पर पहले जैन हवाला कांड का हश्र देख लेना मौजूं होगा।उससे आगे का संकेत मिल सकता है।

  1991 की बात है।उन दिनों भी देश में  आतंकी घटनाएं हो रही  थीं।

दिल्ली पुलिस ने जे.एन.यू. के एक छात्र शहाबुददीन गोरी को जामा मस्जिद इलाके से पकड़ा।उस पर आरोप था कि वह कश्मीरी आतंकियों को पैसे पहुंचाता था।पैसे हवाला के जरिए बाहर से आते थे।गोरी के यहां से जैन बंधुओं का सुराग मिला।

मामला सी.बी.आई.को सौंपा गया। सी.बी.आई. ने दिल्ली के साकेत में एस.के. जैन बंधुओं के यहां  छापा मारा।वहां भारी रकम के अलावा सनसनीखेज डायरी भी मिली।उससे पता चला कि इन हवाला कारोबारियों ने देश के विभिन्न दलों के करीब 115 बड़े नेताओं और अफसरों को कुल मिलाकर 64 करोड़ रुपए दिये।

उन नेताओं में  पूर्व प्रधान मंत्री ,पूर्व व वत्र्तमान केंद्रीय मंत्री, पूर्व मुख्य मंत्री तथा अन्य प्रमुख नेता शामिल थे ।
 उनमें से सिर्फ शरद यादव ने यह स्वीकार किया कि उन्हें जैन से 5 लाख रुपए मिले थे।क्या जैन बंधुओं के पैसे  सिर्फ शरद यादव के लिए थे  ?
ऐसा कत्तई नहीं था।

   पैसे लेने वाले अन्य नेताओं ने इस आरोप को साजिश बताया। विनीत नारायण की जान पर खतरा भी आया।उन्हें धमकियां मिल रही थीं।याद रहे कि विनीत  इस मामले को अदालत ले गए थे।आरोपित नेता गण इतने ताकतवर थे कि इस बीच उन नेताओं के प्रभाव में आकर एक बहुत बड़े वकील ने विनीत का साथ छोड़ दिया।
हालांकि ‘दान’ लेने वालों के नाम अखबारांें में छपे।लोकलाज से मुख्यतः लालकृष्ण आडवाणी और तीन केंद्रीय मंत्रियों ने अपने पदों से इस्तीफा भी दिया।

विदेश राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद ने तब यह स्वीकार किया कि  चुनाव फंड में पारदर्शिता न होने के कारण हवाला कांड होते हैं।

 पर सवाल है कि खुर्शीद और उनकी पार्टी बाद  में अनेक वर्षों तक सत्ता में रहे।क्यों नहीं पारदर्शिता लाने की कोशिश की ?

जैन हवाला रिश्वत कांड का यह मामला जब अदालत में पहुंचने वाला था तो जांच एजेंसी सी.बी.आई पर भारी दबाव पड़ा।जब सत्ताधारी दल और मुख्य प्रतिपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं पर आरोप हों तो ‘सरकारी तोता’ यानी सी.बी.आई.आखिर कर भी क्या सकती है ?

  पर आरोपितों को इतने से संतोष नहीं हुआ।उनमें से किसी ने सुप्रीम कोर्ट पर भी दबाव डलवाया।यह सब ऐसे कांड में हुआ जिस कांड में आतंकवाद का तत्व भी जुड़ा हुआ था।यानी जैन बंधुओं ने संभवतः इसलिए भी देश के लगभग सभी प्रभावशाली नेताओं और अफसरों को रिश्वत दी ताकि कश्मीरी आतंकवादियों को पैसे पहुंचाते रहने में उन्हें कोई बाधा नहीं आए।चिंताजनक बात यह है कि  आतंकवाद के प्रति हमारे अधिकतर हुंक्मरानों का ऐसा ही रवैया रहा है।हालांकि यह भी कहा गया कि कुछ नेताओं के पैसे उनकी काली कमाई के थे। 

   ताजा सहारा डायरी के अनुसार लाभुकों की दमदार सूची देखकर यह अंदाज लगाया जा सकता है कि इनके साथ जांच एजेंसियां कैसा सलूक करेंगी ! भूतकाल के अनुभव अच्छे नहीं हैं।

  आगे का अंदाजा न्यायमूत्र्ति जे.एस.वर्मा की पिछली टिप्पणी से लगाया जा सकता है।

14 जुलाई 1997 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जे.एस.वर्मा ने अदालत में कहा था कि हवाला कांड को दबाने के लिए हम पर लगातार दबाव पड़ रहा है।

हालांकि उन्हें दबाव में आने की जरूरत ही नहीं पड़ी।सी.बी.आई.ने ही इस कांड की ठीक से जांच  नहीं की।वर्मा ने बाद में सी.बी.आई.तथा अन्य जांच एजेंसियों के प्रति अपनी नाराजगी भी दर्ज कराई।

(इस लेख का संपादित अंश वेबसाइट हिंदी फस्र्ट पोस्ट के 23 दिसंबर 2016 के अंक में प्रकाशित )
       

Friday, December 16, 2016

मिनी युद्ध है नोटबंदी और काले धन के खिलाफ अभियान


शुरू में तो ऐसा नहीं लग रहा था । पर जैसे -जैसे नोटबंदी अभियान आगे बढ़ा तो लगने लगा कि यह तो मिनी युद्ध है। काले धन की काली ताकत के खिलाफ सरकार का युद्ध ! काफी ताकतवर साबित हो रही हैं ये काली ताकतें।

 इन काली शक्तियों को देश के प्रभु वर्ग का पूरा समर्थन मिला हुआ है। किसी तरह के युद्ध में दोतरफा क्षति होती ही है। नोटबंदी में भी यही हो रहा है। युद्ध में निर्दोष लोग भी मरते हैं और परेशान होते हैं।

 जब बेनामी संपत्ति पर बड़े पैमाने पर सरकारी हमले शुरू होंगे तो युद्ध भीषण रूप धारण कर सकता है।

  काली ताकतों की शक्ति तो देखिए! एक तरफ आम लोग कतारों में एक-दो हजार रुपए के लिए तरसते रहे तो दूसरी ओर काली ताकतों ने बैंकों के पिछले दरवाजों से करीब एक लाख करोड़ रुपये के अपने काले धन को सफेद बना लिया। यह रकम और बढ़ेगी।

 काले धन को सफेद करते हुए कुछ प्रमुख राजनीतिक दलों के कुछ नेता भी स्टिंग आपरेशन में कैमरों पर धरे गये।

 बैंकों के छोटे-बड़े कर्मचारियों की साठगांठ के बिना तो यह संभव ही नहीं था। ऐसे ही बैंक अफसरों और नेताओं की साठगांठ से बैंकों के लाखों करोड़ रुपए एन.पी.ए. बना दिये गये हैं।.

   रिजर्व बैंक ने बैंकों को निदेश दिया है कि वे सीसीटीवी रेकाॅर्डिंग को संभाल कर रखें। इस निदेश के बदले रिकाॅर्डिंग को तत्काल जब्त करना चाहिए था। क्योंकि जो बैंककर्मी काउंटर पर लगी कतार को तरसता छोड़ पिछले दरवाजे से काले धन का सफेद कर सकता है, वह अपने बचाव में सीसीटीवी की रिकाॅर्डिंग को भी सफेद करा सकता है।




देश में भुखमरी के बीच भ्रष्टों की चांदी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भ्रष्टाचार ने देश के विकास को रोक रखा है। यह आधा सच है। पूरा सच  है कि एक तरफ तो 40 प्रतिशत अन्न बर्बाद हो जाता है और दूसरी ओर करीब 20 करोड़ लोग हर शाम बिना भोजन के सो जाते हैं। अब भी एक तिहाई लोग गरीब हैंे। एड्स, मलेरिया और टीबी से कुल मिलाकर जितने लोग मरते हैं, उतने ही लोग भूख और कुपोषण से भी मर जाते हैं। देश के अधिकतर प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों में मरहम पट्टी तक के लिए रूई तक नहीं है। क्योंकि सरकारों के पास पैसे नहीं है। जितने पैसे हैं भी, उनमें से अधिकांश सरकारी-गैर सरकारी बिचैलिए हड़प लेते हैं। जरूरत के अनुसार न तो स्कूल बन रहे हैं और न ही अस्पताल। अदालत भवनों का भी यही हाल है।

 प्रभावशाली लोगों ने सरकारी  बैंकों से कर्ज लेकर करीब 7 लाख करोड़ रुपए पचा लिये हैं। उन लुटेरों के नाम तक जाहिर करने की हिम्मत किसी सरकार में नहीं है। वही काली ताकत नोटबंदी अभियान को भी विफल करने के काम में लगी हुई है।.

 ऐसे भ्रष्ट लोगों को अनेक नेताओं, सरकारी अफसरों और अन्य लोगों का समर्थन हासिल है। नोटबंदी पर कुछ नेताओं की बौखलाहट उसी का प्रतीक है। जिस नेता पर भ्रष्टाचार के जितने गंभीर आरोप हैं, वे उतने ही अधिक बौखला गए हैं।

  एन एन वोहरा कमेटी ने देश के लुटेरा गिरोहों की उपस्थिति की ओर इशारा किया था। इस गिरोह में अपराधी तत्व, माफिया सिंडिकेट, भ्रष्ट नेता, सरकारी अफसर, ड्रग कारोबारी और हवाला कारोबारी शामिल हैं। नीरा राडिया टेप पर भरोसा करें तो उस गिरोह में अब मीडिया के भी कुछ प्रभावशाली लोग शामिल हो चुके हैं।




क्यों है यह मिनी युद्ध 
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 स्वाभाविक ही है कि ऐसी ताकतवर काली जनद्रोही शक्तियों के खिलाफ जब कोई छोटी कार्रवाई भी होगी तो वे पूरी तरह बौखला जाएंगे। नोटबंदी छोटी कार्रवाई है। शुरुआती कार्रवाई। नारों से हटकर यदि इस देश के गरीबों को उनका हक दिलाना है तो काली शक्तियों के खिलाफ जनसमर्थन के बल पर सरकार को मिनी क्या पूर्ण युद्ध लड़ना होगा। अभी केंद्र सरकार लड़ भी रही है। वह हार जाएगी तो जनता लड़ेगी।

 क्योंकि इस ‘युद्ध’ के सिलसिले में काली ताकतों के असली कारनामों का पता लोगों को लग जाएगा। इससे जनता का गुस्सा और बढ़ेगा।

 वैसे कारनामों का पता लगना शुरू भी हो गया है। इसलिए बैंकों और एटीएम के सामने लंबी और उबाऊ कतारों में घंटों खड़े होने के बावजूद कई लोग मीडिया को बता रहे हैं कि भले हमें तकलीफ हो रही है, पर नोटबंदी का फैसला सही है।




ऐसे-वैसे दलों के कैसे-कैसे नेता !
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समाजवादी पार्टी ने पूर्व सांसद अतीक अहमद को उत्तर प्रदेश विधान सभा का उम्मीदवार घोषित किया है। इस बीच उन पर आरोप लगा है कि उन्होंने अपने हथियारबंद समर्थकों के साथ इलाहाबाद के एक शिक्षण संस्थान में घुस कर वहां के स्टाफ के साथ मारपीट करवाई। इस सिलसिले में अतीक पर डकैती का मुकदमा कायम हुआ है।

 उधर मध्य प्रदेश के एक भाजपा विधायक पर आरोप लगा है कि उन्होंने शराब के नशे में धुत्त होकर एक सामाजिक समारोह में अपने आग्नेयास्त्र से धुआंधार फायरिंग की। फायरिंग करते समय वे लड़खड़ा रहे थे।

  इधर पटना में भाजपा नेता सुशील मोदी ने आरोप लगाया कि फर्जीवाड़ा के आरोप में एक जदयू विधायक की पत्नी फरार हैं। उधर जदयू के प्रवक्ता संजय सिंह का आरोप है कि भाजपा के 53 विधायकों में से 34 पर आपराधिक मुकदमे हैं। दिल्ली के एक वकील के यहां जब भारी मात्रा में कालाधन पकड़ा गया तो पता चला कि एक पूर्व केंद्रीय मंत्री का भी उसमें हिस्सा है।

कर्नाटक के आबकारी मंत्री को सेक्स स्कैंडल के आरोप में इस्तीफा देना पड़ा। रांची की अदालत ने झारखंड सरकार के एक पूर्व मंत्री को आय से अधिक संपत्ति एकत्र करने के आरोप में पांच साल की कैद की सजा सुनाई। नोटबंदी के दौरान तीन प्रमुख दलों के नेता भी काला धन को सफेद करते कैमरे पर पकड़े जा चुके हैं।

 केंद्रीय राज्य मंत्री किरण रिजिजू आरोपों के घेरे में हैं तो भाजपा के अनुसार अगस्ता हेलिकाॅप्टर खरीद घोटाले में एक राजनीतिक परिवार को रिश्वत मिली है।

 राहुल गांधी ने आरोप दुहराया है कि यदि वह प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का खुलासा कर दें तो भूकम्प आ जाएगा।

 इस बीच नरेंद्र मोदी ने अपना यह संकल्प दुहराया है कि सिस्टम से भ्रष्टाचार मिटाना मेरी प्राथमिकता है।
उपर्युक्त सारी खबरें इसी सप्ताह की हैं। ऐसी खबरें पहले भी आती रही हैं। इस देश में आखिर क्या हो रहा है ? विभिन्न दलों के नेताओं के परस्पर विरोधी बयानों से साफ है कि सिस्टम पर जन विरोधी और लालची तत्व पूरी तरह हावी हैं। ऐसे ही तत्व राजनीति और सत्तानीति को गहरे प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे निहितस्वाथियों से सिस्टम को मुक्त करने के लिए कुछ लोग ‘मिनी युद्ध’ की जरूरत महसूस कर रहे हैं।




सारे बैंककर्मी एक जैसे नहीं
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  यह सच है कि कुछ बैंककर्मियों की मदद से ही  अनेक धंधेबाजों ने अपने काले धन सफेद किये। साथ ही अधिकतर बैंककर्मियों ने तो इस बीच रात दिन ग्राहकों की सेवा की है।

 गांवों से मिल रही खबरों के अनुसार अनेक लोग नोटबंदी के फैसले के कारण पहले से ही केंद्र सरकार से खुश है। अब जब बारी-बारी से भ्रष्ट बैंककर्मियों की गिरफ्तारी हो रही है तो वे और खुश हैं।उन्हें समाज के उन अन्य  बड़े धन पशुओं की भी गिरफ्तारी का इंतजार है जिनके धन बैंककर्मी सफेद कर रहे हैं। उन गिरफ्तारियों के बाद तो आम लोग और भी गदगद होंगे।

 लोगबाग यह देख रहे हैं कि एक तरफ आम लोग हजार-दो हजार रुपए के लिए तरस रहे हैं तो दूसरी ओर इस देश के कुछ भ्रष्ट लोग करोड़ों-अरबों में खेल रहे हैं।



और अंत में
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ताजा खबर के अनुसार बिहार के मेडिकल कालेजों के एमबीबीएस के 145 छात्र फस्र्ट इयर की फाइनल परीक्षा में फेल कर गये। कुछ साल पहले यह खबर आई थी कि पटना मेडिकल कालेज के प्रथम वर्ष के आधे छात्र फाइनल परीक्षा में फेल कर गये थे।

ये खबरें यह साफ बता रही हैं कि मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में व्यापक धांधली हो रही है। कैसे-कैसे  डाक्टर तैयार कर रही है सरकार ?


( 16 दिसंबर, 2016 के प्रभात खबर के बिहार संस्करण में प्रकाशित)
 




Saturday, December 10, 2016

भूपेंद्र अबोध को हार्दिक श्रद्धांजलि



एक बार मैंने यूंही भूपेंद्र अबोध से पूछ दिया था कि आखिर मनोहर श्याम जोशी आपको और प्रभाष जोशी मुझे इतना प्यार क्यों करते हैं ?

अबोध जी ने बिना देर किए कहा कि ‘जोशी लोग बड़े उदार होते हैं।’ बाद में जब नवीन जोशी का भी स्नेह मुझे मिला तो अबोध जी की बात मुझे और भी सही लगने लगी।

 मनोहर श्याम जोशी जब साप्ताहिक हिंदुस्तान के संपादक थे तो दिलीप कुमार ने इंटरव्यू देना मंजूर किया था। जोशी जी ने बिहार से भूपेंद्र अबोध को ही इस काम के लिए बंबई भेजा था। अबोध जी की प्रतिभा पर ऐसा विश्वास था मनोहर श्याम जोशी का। अबोध जी ने तो फिल्मी दुनिया की बहुत सी रपटें लिखीं। पटना में स्वामी दादा फिल्म की कहानी को लेकर जब केस हुआ था तो देवानंद ने कल्पना कार्तिक के भाई को पटना जाकर भूपेंद्र अबोध से मिलने को कहा था।

  पर अबोध जी का रचना संसार सिर्फ फिल्मी क्षेत्र ही नहीं था। टेलीफोन एक्सचेंज की साधारण नौकरी और बड़े परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी के बावजूद उन्होंने कविता -कहानी के साथ-साथ कथा रिपोर्ताज भी खूब लिखे।

  महेंद्र मिसिर और नक्षत्र मालाकार पर अबोध जी की खोजपूर्ण रपट मुझे याद हंै। संभवतः किन्हीं बड़ी हस्तियों के लिए वे ‘घोस्ट राइटिंग’ भी करते थे। उनके साथ बातचीत में इसका संकेत भी मुझे मिला था। हालांकि वे इसका खुलासा नहीं करते थे। लगता है कि परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उठाने के लिए उन्हें यह सब करना पड़ता था। क्षमता से अधिक मेहनत।

इलाहाबाद के मित्र प्रकाशन की पत्रिकाओं के लिए भी उन्होंने जम कर लेखन किया।

 अबोध जी नये पत्रकारों के लिए मार्ग दर्शक भी थे। मैं भी उनके साथ लंबी बैठकी करता था और कुछ सीखता था। हम दोनों की बैठकी के बीच एक ही बाधा थी उनकी चेन स्मोकिंग की लत। अतिशय सिगरेट ने उनके शरीर को जर्जर बना दिया था। ऐसे बहुमूल्य जीवन को अपने लिए नहीं तो कम से कम समाज के लिए अपने स्वास्थ्य को बचाकर रखना चाहिए।

अब अबोध जी हमारे बीच नहीं रहे। खैर उनकी निशानी के रूप में उनकी बहुत सारी रचनाएं और उनका प्रतिभाशाली कार्टूनिस्ट पुत्र पवन हमलोगों के बीच है। योग्य पिता के योग्य पुत्र।
पवन जैसा कार्टूनिस्ट विरले हैं।

एक से अधिक लोगों ने मुझे बताया कि हिंदुस्तान के प्रति उनके आकर्षण का सबसे बड़ा कारण पवन के कार्टून हंै।

नंद किशोर नवल ने 2007 में लिखा था कि ‘मनोहर श्याम जोशी ने भूपेंद्र अबोध की प्रतिभा को पहचाना था जिससे वे साप्ताहिक हिंदुस्तान के अनिवार्य लेखक हो गए थे। वे मूलतः कवि और कथाकार थे। अखबारी और सामयिक लेखन उनके लिए उपयुक्त क्षेत्र नहीं था। लेकिन जब वे उस तरफ मुड़े तो वहां भी अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा का चमत्कार दिखाया।’    

Thursday, December 8, 2016

झाड़ दीजिए रपट की धूल

   काले धन की झाड़ी साफ करने की कोशिश जारी है।पर झाड़ी की जड़ में मट्ठा कब डाला जाएगा? जड़ खोदे बिना काले नोटों की झाड़ी फिर- फिर उग आएगी। 

 वोहरा कमेटी ने भ्रष्टाचार, अपराध और आतंक के त्रिगुट की चर्चा की है। जड़ तो वही है। नीरा राडिया टेप प्रकरण के अनुसार उस त्रिगुट में कुछ अन्य तत्व भी जुड़ चुके हैं।

 भ्रष्टाचार को जड़ से मिटा देने से संबंधित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ताजा वायदा देशवासियों को संतोष और दिलासा देने वाला है।

 पर, वायदा पूरा करने के सिलसिले में उन्हें वोहरा समिति की रपट पर से भी धूल झाड़नी पड़ेगी। वह रपट कें्रदीय सचिवालय में 1993 से पड़ी हुई है। 

 23 साल पहले वोहरा रपट आने के बाद तो इस बीच भ्रष्टाचार, अपराध  और आतंक की जड़ें और भी  गहरी हो चुकी हैं। इनसे   कुछ अन्य अवांछित तत्व जुड़कर उन्हें बेहद ताकतवर बना रहे हैं।
रपट में उन तत्वों की बेबाक चर्चा है।

तत्कालीन गृह सचिव एन.एन.वोहरा के नेतृत्व में बनी समिति की रपट में सरकारी अफसरों, नेताओं और देश के माफिया गिरोहों के बीच के अपवित्र गठबंधन का जिक्र है। गठबंधन को तोड़ने के  उपाय भी  सुझाए गये हैं। यह गठजोड़ अब अधिक खतरनाक स्तर पर पहुंच  चुका है। 
   माफिया तत्वों, आर्थिक क्षेत्र में सक्रिय लाॅबियों, तस्कर गिरोहों के साथ कतिपय प्रभावशाली नेताओं और अफसरों की सांठगाठ की विस्तृत चर्चा वोहरा समिति की रपट में है। पर, 1993 और उसके बाद की किसी भी सरकार ने उसकी सिफारिश पर अमल करने का साहस नहीं दिखाया। इससे माफिया तत्वों की ताकत का पता चलता है।

 याद रहे कि 1993 के बंबई बम विस्फोट की पृष्ठभूमि में ही वोहरा समिति का गठन किया गया था। श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोट बाहर-भीतर के आतंकी और देशद्रोही तत्वों की आपसी साठगांठ का परिणाम था। उसमें करीब 300 निर्दोष लोगों की जानें गई थीं।
  
  पांच दिसंबर, 1993 को वोहरा ने अपनी सनसनीखेज रपट गृह मंत्री को सौंपी थी। रपट में कहा गया कि ‘इस देश में अपराधी गिरोहों, हथियारबंद सेनाओं, नशीली दवाओं का व्यापार करने वाले माफिया गिरोहों, तस्कर गिरोहों, आर्थिक क्षेत्रों में सक्रिय लाॅबियों का तेजी से प्रसार हुआ है। इन लोगों ने विगत कुछ वर्षों के दौरान स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों, सरकारी पदों पर आसीन लोगों, राज नेताओं, मीडिया से जुड़े व्यक्तियों तथा गैर सरकारी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों के साथ व्यापक संपर्क विकसित किये हैं। इनमें से कुछ सिंडिकेटों की विदेशी खुफिया एजेंसियों के साथ-साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय सबंध भी हैं।’

     रपट में यह भी कहा गया है कि इस देश के कुछ बड़े प्रदेशों  में इन गिरोहों को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों के नेताओं और सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों का संरक्षण हासिल है। तस्करों के बड़े-बड़े सिंडिकेट देश के भीतर छा गये हैं। उन्होंने हवाला लेन-देनों, काला धन के परिसंचरण सहित विभिन्न आर्थिक कार्यकलापों को प्रदूषित कर दिया है। उनकी  समानांतर अर्थव्यवस्था के कारण देश के आर्थिक ढांचे को गंभीर क्षति पहुंची है। इन सिंडिकेटों ने सरकारी तंत्र को सभी स्तरों पर सफलतापूर्वक भ्रष्ट किया हुआ है। इन तत्वों ने जांच-पड़ताल तथा अभियोजन अभिकरणों को इस तरह प्रभावित किया हुआ है कि उन्हें  अपना काम चलाने में अत्यंत कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।’
  रपट के अनुसार ‘कुछ माफिया तत्व नारकोटिक्स, ड्रग्स और हथियारों की तस्करी में संलिप्त हैं। चुनाव लड़ने जैसे कार्यों में खर्च की जाने वाली राशि के मददेनजर नेता भी इन तत्वों के चंगुल में आ गये हैं। रपट में आई.बी. के निदेशक की बातें दर्ज की गयी हैं। उनके अनुसार ‘माफिया तंत्र ने वास्तव में एक समानांतर सरकार चलाकर राज्य तंत्र को एक विसंगति में धकेल दिया है।’

‘इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि इस प्रकार के संकट से प्रभावी रूप से निपटने के लिए एक संस्थान स्थापित किया जाए। इस समय ऐसा कोई तंत्र मौजूद नहीं है जो विशेषकर अपराध सिंडिकेट और माफिया के सरकारी तंत्र के साथ बने संबंधों के बारे में सूचनाएं एकत्रित और समेकित कर सके।’

सी.बी.आई. के निदेशक के अनुसार बड़े शहरों में संगठित अपराधी सिंडिकेट/माफिया की आय का प्रमुख साधन भू संपदा आदि है। वे भूमि और भवनों पर जबरन कब्जा कर लेते हैं। इस प्रकार से अर्जित धनशक्ति का इस्तेमाल नौकरशाहोंं तथा नेताओं के साथ संपर्क बनाने के लिए किया जाता है ताकि वे बेरोकटोक अपनी गतिविधियां चालू रख सकें। वे लठैत पालते हैं। उनका इस्तेमाल चुनावों में भी होता है।

छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी लठैतों का दबदबा आम बात हो गयी है। भाड़े के हत्यारे इन संगठनों के अभिन्न अंग हैं। अपराधी गिरोहों, पुलिस, नौकरशाही तथा नेताओं के बीच साठगांठ अब देश के विभिन्न हिस्सों में खुलकर सामने आ चुकी है। वर्तमान आपराधिक न्याय प्रणाली, जो मूलतः व्यक्तिगत अपराधों से निपटने के लिए बनाई गयी थी, माफिया की गतिविधियों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है। आर्थिक अपराधों के संबंध में भी हमारे कानून के उपबंध कमजोर हैं।’

  रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के अफसर ने कहा कि विदेशों में स्थित इस एजेंसी के कार्यालयों की वर्तमान क्षमता इतनी अधिक नहीं है कि वह अपनी गतिविधियों के क्षेत्र को व्यापक बना सके।   

    1993 के बाद देश के संसाधनों को लूटने वालों ने अपनी कार्यशैली व रणनीति में थोड़ा बदलाव जरूर किया है, पर मूल तत्व वहीं हंै। इस बीच नये कानून व संस्थान भी बने हैं। पर वे अपर्याप्त हैं।

   समिति की मुख्य सलाह यह है कि गृह मंत्रालय के तहत एक  नोडल एजेंसी तैयार हो जो देश मेंे जो भी गलत काम हो रहे हैं, उसकी सूचना वह एजेंसी एकत्र करे। ऐसी पक्की व्यवस्था भी की जाए ताकि सूचनाएं लीक नहीं हों।

   सावधानी बरतते हुए  वोहरा ने इस रपट की सिर्फ तीन प्रतियां तैयार की थीं। यह काम उन्होंने खुद किया।ऐसा उन्होंने लीक होने के डर से किया। वोहरा ने रपट की  प्रति तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री और गृह राज्य मंत्री (आंतरिक सुरक्षा) को सौंपी। तीसरी प्रति वोहरा ने अपने पास रखी। 

वोहरा ने उस रपट में लिखा कि ‘गृह मंत्री द्वारा इस रपट के अवलोकन के बाद मैं उनसे अनुरोध करूंगा कि वे आगे की कार्रवाई के लिए वित्त मंत्री,राज्य मंत्री @आंतरिक सुरक्षा@ और मेरे साथ विचार विमर्श करने का कष्ट करें। उससे जो रास्ता निकलेगा, उसको अमल में लाने से पहले प्रधानमंत्री जी की मंजूरी प्राप्त की जा सकती है।’
  पर जानकार लोग बताते हैं कि वोहरा की इस सलाह को सरकार ने कुल मिलाकर नजरअंदाज ही कर दिया।

( 8 दिसंबर 2016 के राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित)

Friday, December 2, 2016

एनडीए में जाने की कयासबाजी !

हकीकत है या फसाना ? किसी को हकीकत लग रहा है तो किसी को फसाना। जो बिहार की राजनीति को जानते हैं ,वे इसे पूरी तरह फसाना ही मान  रहे हैं। नोटबंदी पर नीतीश  का समर्थन देखकर अकारण  तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

 इसमें  अचरज  भी नहीं।क्योंकि कई बार नेता पाला बदलने से पहले अपने बयानों का रुख भी उसी दिशा में कर लेते हैं।पर इस कसौटी पर नीतीश कुमार को कसने पर धोखा ही मिलेगा।

 नीतीश  की राजनीतिक शैली के जानकार लोग राजग में उनके जाने की  संभावना को  हकीकत से कोसों दूर बता रहे हैं।यदि बीच में कोई राजनीतिक पहाड़ न टूट पड़े  तो  अगले  लोस चुनाव तक तो इसकी कोई संभावना नहीं।

 नीतीश कह चुके हैं कि वह प्रधान मंत्री पद की तमन्ना नहीं पालते।पर  अक्तूबर में जब उन्होंने जदयू  अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला तो जदयू के कुछ नेताओं ने कहा कि नीतीश कुमार पी.एम.मेटेरियल हैं।

 पूर्व मुख्य मंत्री बाबूलाल मरांडी भी यही मानते हैं।

  गत अप्रैल में तो लालू प्रसाद ने कह दिया था कि मैं प्रधानमंत्री पद के लिए नीतीश का समर्थन करूंगा।
 वैसे भी खुद नीतीश देश के कुछ राजग विरोधी दलों को एकत्र करने की कोशिश करते रहे हैं। यदि राजनीतिक संभावना और अवसरवादिता की दृष्टि से भी देखें तो नीतीश के राजग में जाने की संभावना अभी कहां बनती है ?

 अगले लोकसभा चुनाव का क्या नतीजा होगा, यह अनिश्चित है। वैसे तो अभी नरेंद्र मोदी की बढ़त लग रही है। पर अगले ढाई साल में राजनीति कैसी करवट लेगी, यह भला कौन जानता है !

 यदि तब राजग विरोधी दलों के लिए कोई संभावना बनती है तो नीतीश भी प्रधानमंत्री पद के एक उम्मीदवार बन सकते हैं। 

अपनी विनम्रता के तहत भले नीतीश आज कहें कि वह प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं,पर उस संभावना को वह अभी से क्यों समाप्त करना चाहेंगे ? देश के  कई नेता कभी उम्मीदवार नहीं थे, पर प्रधान मंत्री बने।गुजराल और देवगौड़ा इसके उदाहरण हैं। मुलायम और ज्योति बसु के नाम भी कभी गंभीरता लिये गये थे।

  क्या राजग में जाने के बाद नीतीश की वह संभावना समाप्त नहीं हो जाएगी ? और राजग में जाने पर अभी नीतीश को अतिरिक्त मिल क्या जाएगा ?     

  राजग में जाने की अफवाह उड़ने के पीछे नीतीश का नोटबंदी समर्थक बयान है।इस पृष्ठभूमि में अमित शाह से उनकी मुलाकात और प्रधान मंत्री से उनकी बातचीत की अफवाहें भी उड़ने लगीं।जबकि राजग या जदयू के किसी सूत्र ने इस खबर की पुष्टि नहीं की।इससे दुःखी होकर नीतीश कुमार ने कहा कि  ‘मेरे राजनीतिक जीवन को खत्म करने की साजिश चल रही है।देश के राजनीतिक सवालों पर अपना नजरिया रखने पर अनर्गल राजनीतिक व्याख्या की जाती है। यह साजिश है जिसकी मैं चिंता नहीं करता हूं।’

  दरअसल यह पीड़ा नीतीश की खास राजनीतिक शैली का परिणाम है। यह शैली अन्य  अधिकतर नेताओं  से उन्हें अलग करती है। पर अफवाहें फैलाने का मौका भी दे देती है।

  नीतीश ने नोटबंदी के मोदी सरकार के फैसले का समर्थन क्या किया कि राजग में उनके शामिल होने की भविष्यवाणियां की जाने लगीं। नीतीश कुमार इसका कई बार खंडन कर चुके हैं।

 आम राजनीतिक चलन तो यही है कि अपने राजनीतिक विरोधियों  के हर काम का विरोध करना चाहिए।आम नेतागण अपने विरोध के दल का समर्थन तभी करते हैं जब उन्हें उस दल से साठगांठ करनी होती है। हालांकि आए दिन बदलते राजनीतिक समीकरणों के इस दौर में  किसी दल के अगले कदम के  बारे में कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है। खुद जदयू भी अपना समीकरण बदलता रहा है।पर जदयू के बारे में फिलहाल यह कहा जा सकता है कि  कोई अत्यंत मजबूरी नहीं हो गयी तो वह दलीय  समीकरण सन 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कत्तई नहीं बदलेगा। 

 अपने विरोधी के भी अच्छे कामों का देशहित में समर्थन की शैली नीतीश की पहले से भी रही है।वह कभी-कभी सहयोग भी करते रहे।

विरोध करने वाली बातों का विरोध तो करते ही हैं। हालांकि कुल मिलाकर नीतीश कुमार कम बोलने वाले नेता हैं। हाल में नोटबंदी के मोदी सरकार फैसले का समर्थन कर दिया तो अनेक लोगों, नेताओं और राजनीतिक प्रेक्षकों को मौका मिल गया। अनुमान लगाया जाने लगा है कि जदयू राजग में शामिल होने वाला है।

 एक जदयू नेता ने कहा कि ऐसा यह सोचे बिना हो रहा है कि   ऐसी अपुष्ट खबरों यानी अफवाहों का कैसा असर राजद और कांग्रेस पर पड़ेगा जिनके समर्थन से नीतीश कुमार आज मुख्यमंत्री हैं।

 याद रहे कि न तो जदयू और न ही भाजपा के किसी जिम्मेदार नेता ने इस खबर या इसकी संभावना की पुष्टि की है।

 जहां तक नीतीश की अलग तरह की राजनीतिक शैली का सवाल है,सन 2012 में जदयू  ने राष्ट्रपति पद के चुनाव में यू.पी.ए. के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी को वोट दिए थे।नीतीश तब राजग में थे । 

 उन्हीं दिनों राजग में रहते हुए नीतीश कुमार ने जी.एस.टी. विधेयक का समर्थन किया जबकि भाजपा ने मनमोहन सरकार के जी.एस.टी. विधेयक को पास नहीं होने दिया।

  भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक का भी नीतीश कुमार ने समर्थन किया था। कुछ अन्य विरोधी दल सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगते रहे।

संकेत हैं कि नोटबंदी के मूल फैसले का अधिकतर आम लोगों ने विरोध नहीं किया है। यदि विरोध किया होता तो भाजपा हाल के लोकसभा -विधानसभा उपचुनावांें में अपनी सीटें गंवा बैठती।

  महाराष्ट्र और गुजरात में नोटबंदी के बाद हुए निकाय चुनावों में भी भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की है। यानी शहरों में भी जीत और गांवों में भी। नीतीश कुमार की राजनीतिक घ्राणशक्ति कमजोर नहीं मानी जाती। वह जनता के खिलाफ क्यों जाते ?

   नीतीश नोटबंदी का विरोध करके देश के कुछ अन्य विवादास्पद नेताओं की कतार में खुद को क्यों शामिल कर लेते जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं ?

भाजपा का यह आरोप रहा है कि नोटबंदी पर जनता की पीड़ा के बहाने कई नेता अपनी पीड़ा का एजहार कर रहे हैं। यानी  नीतीश के बयान को राजग से दोस्ती की संभावना से भला कैसे जोड़ा जा सकता है ?  

 (2 दिसंबर 2016 के राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित)

पदों के साथ-साथ पिछड़ों को चाहिए कल्याणकारी योजनाएं

केंद्र सरकार अगले कुछ वर्षों में पिछड़ों के कल्याण के लिए कितने ठोस काम करने वाली है ?

  यदि सचमुच कुछ चैंकाने वाले कल्याणकारी काम हुए तो उससे नवनियुक्त प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नित्यानंद राय की पैठ पिछड़ों में बढ़ेगी।अन्यथा वह भी उसी तरह लालू प्रसाद के सामने प्रभावहीन रहेंगे जिस तरह उनके समुदाय से आने वाले पहले के दो प्रदेश अध्यक्ष रहे।

 हां, नित्यानंद राय की नियुक्ति के साथ एक बात जरूर हुई है। वह यह कि संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण पर गत साल दिए बयान के कारण पिछड़ों के एक हिस्से में जो गुस्सा पैदा हुआ था,वह संभवतः थोड़ा कुंद होगा।

नित्यानंद राय की नियुक्ति के साथ डा.प्रेम कुमार और सुशील कुमार मोदी की नियुक्तियों को जोड़ कर देखा जाए तो बिहार भाजपा की अब एक भिन्न छवि उभरती है। यह छवि भाजपा की परंपरागत सवर्ण बहुल छवि से भिन्न है।

   छवि बनना एक बात है, पर पिछड़ों में पैठ बनाना दूसरी बात है। बिहार में भाजपा के लिए लालू-नीतीश की दमदार जोड़ी से मुकाबला करना आसान नहीं है। नीतीश कुमार की छवि तो समावेशी नेता की है। वह न्याय के साथ विकास के पक्षधर रहे हैं।

नीतीश की धारणा है कि जिस समुदाय की जितनी मदद की जरूरत है, उतनी मदद उसे मिलनी चाहिए। वह सवर्णों का भी ध्यान रखते रहे हैं।

 पर 1990 के मंडल आरक्षण आंदोलन के दौरान लालू प्रसाद  अपनी बेजोड, साहसी और ऐतिहासिक भूमिका के कारण पिछड़ों खास यादवों के डार्लिंंग बने हुए हैं।

लालू की ताकत को कमजोर करना टेढी खीर है।

हां, इन दिनों प्रधान मंत्री जिस तरह आक्रामक मुद्रा में हैं,जिस तरह वे भ्रष्टाचार व काला धन के दानव से लड़ रहे हैं,उससे यह उम्मीद बनती है कि वह देर सवेर एक दिन इस देश के उपेक्षित पिछड़ों के लिए भी कुछ ठोस काम कर देंगे।पिछड़ों के विकास के बिना देश का सम्यक विकास कैसे होगा ?  भागवत के बयान की वास्तविक क्षतिपूर्ति तभी होगी।

पिछड़ों के लिए पहला काम तो यह हो सकता है कि केंद्र सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग की इस सिफारिश को मान ले कि 27 प्रतिशत आरक्षण को तीन भागों में बांट दिया जाए।उससे पिछड़ों के बीच के कमजोर तबकों को भी आरक्षण का लाभ मिलने लगेगा।

 आम पिछड़ों के व्यापक भले  के लिए भी कई काम हो सकते हैं ताकि वे समाज में आगे बढ़ चुके लोगों के समकक्ष आ सकें।



बिहार भाजपा के भीतर 
राज्य भाजपा के कई सवर्ण नेता प्रदेश अध्यक्ष पद के उम्मीदवार थे। पर उन्हें नजरअंदाज करके नित्यानंद को यह सम्मान मिला। हाईकमान का यह फैसला गलत नहीं है। पर सवाल है कि वैसे नेतागण नित्यानंद राय को सहयोग करेंगे? ऐसी उम्मीद करना जल्दीबाजी होगी।

पर राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार वैसे नेता नित्यानंद के साथ  पार्टी के भीतर जितना असहयोग करेंगे, पिछड़ों में नित्यानंद की पैठ उतनी ही बढ़ेगी नित्यानंद संघ पृष्ठभूमि के हैं। इसलिए वह संघ के बड़े नेताओं को यह बताने की बेहतर स्थिति में हैं कि भविष्य में आरक्षण पर बयान देने से पहले सोच विचार कर लिया जाए।

  बड़े कामों के लिए अधिक जन समर्थन जरूरी

 नरेंद्र मोदी ने कुछ बड़े काम करने का बीड़ा उठाया है। ऐसे काम जिनके बारे में किसी पिछली सरकार ने सोचा तक नहीं। वैसे कामों को अंजाम देने के लिए सरकार को जनता की ताकत चाहिए। पिछले लोक सभा चुनाव में देश के सिर्फ एक तिहाई मतदाताओं का ही समर्थन राजग को मिला था। पिछड़ गए समुदायों के बीच अपनी पैठ बनाये बिना मोदी का समर्थन नहीं बढ़ सकता। कम समर्थन वाली किसी सरकार को निहितस्वार्थी तत्व ऐसे  काम करने नहीं देंगे।

काम क्या हैं ? इस देश में आम तौर पर जो व्यापार होता हैं, उसके दो खाते होते हैं। एक सफेद खाता और दूसरा काला खाता। मोदी काले धन के, खाते को बंद करना चाहते हैं। क्या यह मामूली काम है ?

अधिकतर सरकारी दफ्तरों में अधिकतर सरकार निर्णय बिकाऊ हैं। मोदी जी इसे बंद करना चाहते हैं। यह आसान काम है ?

चुनावों में खर्च के दो हिसाब होते हैं। चुनाव आयोग को देने वाला  कागजी हिसाब और दूसरा काले धन का प्रयोग।

क्या चुनाव में काले धन का प्रयोग बंद करना आसान काम है? संपत्ति खरीद में कुछ पैसे चेक से दिया जाते हंै और अधिक पैसे नकद। क्या सारे पैसे चेक देने के लिए मजबूर किया जा सकता है?

जानकार लोग बताते हैं कि इस तरह के कुछ और काम केंद्र सरकार की सूची में हैं। विमुद्रीकरण उसी सूची में था।

 इन सब कामों को करने के लिए सरकार को बड़ी ताकतों से टकराना होगा। इनमें से कुछ शक्तियां खुद मोदी सरकार के भीतर हैं। वे शक्तियां सरकार गिराने की भी कोशिश कर सकती हैं।उन काली शक्तियों का मुकाबला सरकार भारी जन समर्थन से ही कर सकती है। यह समर्थन मोदी सरकार को तभी मिलेगा जब वह सदियों से पिछड़ गए लोगों के भले के लिए कुछ चैंकाने वाले काम करके दिखाए। तभी नित्यानंद राय की नियुक्ति भी सार्थक मानी जाएगी।


ममता के गद्दार वाले बयान पर

 पूर्व केंद्रीय मंत्री डा. रघुवंश प्रसाद सिंह ने ममता बनर्जी के साथ नोटबंदी के खिलाफ पटना में धरना दिया। ठीक किया। लोकतंत्र में इसकी अनुमति है। पर ममता जी ने नोटबंदी के समर्थकों को गददार कह दिया। क्या यह उचित है ?

क्या रघुवंश जी उस बयान से खुद को अलग करेंगे? राजग के बाहर के कुछ राजनेता भी नोटबंदी का समर्थन कर रहे हैं।क्या उन्हें गददार कहा जाना चाहिए?


 कब तक चलेगी लर्नर लाइसेंस पर गाड़ी ! 

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गत सितंबर में यह सही कहा था  कि दिल्ली सरकार एक कलम खरीदने में भी सक्षम नहीं है। वह और उनके कैबिनेट सहयोगी अधिकारों से पूरी तरह वंचित हैं।’

यह भी सही बात है कि दिल्ली की राजनीतिक कार्यपालिका को उतने अधिकार नहीं हैं जितने बिहार, पंजाब तथा इस तरह के पूर्ण दर्जा वाले राज्यों की राजनीतिक कार्यपालिकाओं को हंै।

 पर केंद्र की मोदी सरकार ने केजरीवाल सरकार को उतने अधिकारों का भी उपयोग नहीं करने दिया जितना शीला दीक्षित मुख्यमंत्री के रूप में करती थीं।

दिल्ली के अगले विधान सभा चुनाव में केजरीवाल की पार्टी जनता से यह कह सकती है कि हमें तो अधिकार ही नहीं दिया तो हम  काम कैसे कर पाते ? पर पंजाब में आप को यदि मौका मिला तो शायद वहां उनके हाथ नहीं रुकेंगे।

  पर सवाल है कि केजरीवाल साहब कब तक ‘लर्नर लाइसेंस’ के साथ गाड़ी चलाते रहेंगे? प्रौढ राजनीति करना कब सीखेंगे ? ताजा उदाहरण नोटबंदी पर उनका विरोध है। वह शारदा-नारदा के दागियों  और आय से अधिक संपत्ति जुटाने का आरोप झेल रहे नेताओं की कतार में खड़े नजर आए।


बड़ा  संकट आ गया तो क्या होगा ? 

साठ के दशक में अन्न संकट से उबरने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने रेडियो संदेश के जरिए देशवासियों से अपील की कि वे हर  सोमवार को एक वक्त का भोजन त्याग दें। लोगों ने इसे ‘शास्त्री व्रत’ कह कर उसका पालन किया।यहां तक कि तब रेस्त्रां और होटल भी सोमवार की शाम में बंद रहते थे।

पर अर्थ संकट से उबरने के लिए लागू नोटबंदी पर अनेक लोग अड़ंगे लगा रहे हैं। खुदा न करे, पर यदि भारत को कोई युद्ध लड़ना पड़ गया तो वैसे लोग क्या करेंगे ?


और अंत में
  नरेंद्र मोदी सरकार ने नोटबंदी के साथ ही राष्ट्रीय विमर्श का मुद्दा ही बदल दिया है। एक तरफ साक्षी महाराज, साध्वी प्राची तो दूसरी ओर असदुददीन ओवैसी और दिग्विजय सिंह जैसे नेता अभी बेरोजगार से हो गए लगते हैं। यह देशहित में होगा कि दोनों पक्षों के ऐसे नेतागण कम से कम अगले कुछ समय के लिए ‘शांति’ बनाए रखें।

(प्रभात खबर, बिहार संस्करण ः 2 दिसंबर 2016 से साभार)
     




Friday, November 4, 2016

पुलिस सुधार की जरूरत बता रहीं दिल्ली-भोपाल की घटनाएं

  नई दिल्ली की बुधवार की घटना पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि ‘पूर्व सैनिक के परिजनों को हिरासत में क्यों रखा गया है? दिल्ली पुलिस की कार्रवाई मोदी सरकार की अलोकतांत्रिक मानसिकता का प्रतीक है।’

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंंत्री ममता बनर्जी ने भोपालकांड पर कहा कि ‘हमलोग कथित मुठभेड़ की कहानी से सहमत नहीं हैं। लोगों के मन में कई ऐसे सवाल उठ रहे हैं जिनका जवाब अब तक नहीं मिल पाया है।’

 ये दोनों बयान एक बार फिर पुलिस और जेल सुधार की जरूरत बता रहे हैं। पर सुधार करेगा कौन? क्या ममता बनर्जी के राज्य में पुलिस की ज्यादतियों का रोना रोने वाली भाजपा मध्य प्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्यों में पुलिस सुधार करेगी ? क्या खुद ममता जी यही काम बंगाल में करेंगी जहां राजनीतिक व अन्य आधारों पर कार्रवाई करने या नहीं करने के ंगंभीर आरोप लगते रहते हैं? याद रहे कि जेल और पुलिस की स्थिति देश भर में कमोवेश एक ही तरह की है।

   कर्नाटका में कांग्रेस सरकार ऐसी कानूनी व्यवस्था करेगी ताकि वहां ‘भोपाल’ नहीं दुहराया जाए ? यहां मिलीजुली राज्य सरकारों की बात नहीं की जा रही है।

संकेत तो यही है कि ऐसा कोई राज्य नहीं करेगा। सब सिर्फ वोट बैंक की राजनीति करेंगे और एक दूसरे को सिर्फ नीचा दिखाने का काम करेंगे। अब तक तो यही होता भी रहा है।

पुलिस सुधार के लिए मोरारजी देसाई सरकार ने 1977 में धर्मवीर के नेतृत्व में राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन किया था। उस  आयोग ने 1979 से 1981 तक अपनी कुल आठ रपटें सरकार को दी थी। साथ ही उसने माॅडल पुलिस एक्ट का मसविदा भी पेश किया था। रपट की मुख्य बात यही थी कि पुलिस व्यवस्था में व्यापक सुधार किया जाना चाहिए।

 आपातकाल में हुई पुलिस ज्यादतियों की पुनरावृत्ति रोकने के उपाय के तहत धर्मवीर आयोग का गठन किया गया था। पर उस आयोग की सिफारिशों को बाद की किसी भी सरकार ने लागू नहीं किया। जबकि इस बीच लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से केंद्र और राज्यों में सत्ता में रहे।

  अंततः देश के दो पूर्व डी.जी.पी. ने सुप्रीम कोर्ट में लोकहित याचिका दायर की। उनकी मांग थी कि सरकारें धर्मवीर आयोग की सिफारिशें लागू करें। सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में ऐसा करने का आदेश सरकार को दे दिया। पर आज तक किसी भी सरकार ने इसे लागू नहीं किया।

  इस बीच कहीं भी जब पुलिस ज्यादतियां करती है तो राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार बयान दे देते हैं। वे अपने वोट बैंक को ध्यान में रखकर तत्कालीन सरकारों को कोसते हैं। पर जब वे खुद सत्ता में होते हैं तो पुलिस सुधार की दिशा में कुछ नहीं करते।

 यदि धर्मवीर आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया गया होता तो पुलिसकर्मी निष्पक्ष ढंग से काम करने को मजबूर होते। अपवादों को छोड़ दें तो अभी तो देश भर की पुलिस मोटे तौर पर सत्ताधारी दल की इच्छा के अनुसार ही काम करती है। जैसा काम पुलिस भोपाल और दिल्ली में कर रही है, वैसा ही काम कर्नाटका और पश्चिम बंगाल में हो रहा है।


जेल मैनुअल भगोड़ों को मारने वालों के पक्ष में 

जिन पुलिसकर्मियों ने भोपाल जेल से भाग रहे कथित आतंकियों पर गोलियां चलाईं, जेल मैनुअल की एक धारा उनके बचाव में काम आ सकती है।

द प्रिजन एक्ट, 1894 की धारा -433 यह कहती है कि ‘जेल से भागे या भागने की कोशिश करने वालों पर सुरक्षा अधिकारी चेतावनी के बाद तलवार, संगीन, आग्नेयास्त्र या अन्य किसी हथियार से वार कर सकता है।’ वैसी स्थिति में कमर से ऊपर भी वार करने की छूट है। क्योंकि संगीन या तलवार से तो कमर के नीचे वार करना कठिन और अव्यावहारिक ही है।

 अब सवाल है कि ऐसे प्रावधान वाले जेल मैनुअल को आजादी के बाद बदला क्यों नहीं गया ? यह सवाल उन सभी दलों से है जो आज भोपाल कांड पर सवाल उठा रहे हैं। क्यों वे बारी-बारी से सत्ता में रहे हैं।

 आजादी के बाद जेल मैनुअल में संशोधन की मांग जरूर की गयी। कुछ राज्यों ने संभवत थोड़ा -बहुत संशोधन किये भी। पर मध्य प्रदेश सरकार की सेवा से हाल में रिटायर हुए एक बड़े जेल अधिकारी ने बताया कि वहां धारा-433 अब भी ज्यों की त्यों है।

 याद रहे कि मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भोपाल कांड की न्यायिक जांच की मांग की है। श्री सिंह वहां लगातार दस साल तक पूर्ण बहुमत के साथ मुख्यमंत्री थे।

 यदि धारा -433 में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तो कोई भी न्यायिक जंाच आयोग भोपाल जेल के भगोड़े कैदियों को मारने वालों का भला क्या बिगाड़ लेगा ?


बिहार में भी उनका कुछ नहीं बिगड़ा 

1971 के जुलाई में हजारीबाग जेल में जेल अधिकारियों के कथित निदेश पर अपराधी कैदियों ने 15 नक्सलियों को पीट-पीट कर मार डाला। उस घटना में तो एक जेल अधिकारी ने खुद एक नक्सली को गोली मार दी थी। यानी कुल 16 मरे थे।

 मई, 1976 में भागलपुर जेल से भागने के प्रयास में चर्चित प्रशांत चैधरी सहित 4 नक्सलवादी कैदी मार डाले गए थे। वे भी विचाराधीन कैदी ही थे। उन घटनाओं में किसी जेल या पुलिस अधिकारी का कुछ बिगड़ा ? मुझे तो इस संबंध में अब तक कुछ पता नहीं चल सका है। संभवतः उन अधिकारियों के लिए जेल मैनुअल की धारा -433 ने ही कवच का काम किया होगा।


कितने स्वतंत्रता सेनानी जाली !

आजाद हिंद फौज के अंतिम सिपाही डैनियल काले का गत माह मुम्बई में निधन हो गया। वह 95 साल के थे। पर, इस देश के पेंशनधारी स्वतंत्रता सेनानियों और उनके आश्रितों की संख्या अब भी दसियों हजार में है।

2015 में सरकार ने राज्यसभा में बताया था कि स्टेेट बैंक ने तीन हजार से अधिक ऐसे स्वतंत्रता सेनानियोें को वर्षों तक पेंशन दिया जिनका निधन पहले ही हो चुका है।

 हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर महाराष्ट्र के 298 जाली स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन जारी रखने का आदेश दे दिया। क्योंकि अदालत ने यह महसूस किया कि पेंशन बंद होने पर उनके परिवारों में भुखमरी की नौबत आ जाएगी।

पर सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐसी नौबत किसने लाई? जाहिर है कि शासन ने। भ्रष्ट व सड़ी-गली व्यवस्था ने। जहां रिश्वत देकर कुछ भी कराया जा सकता हे।

स्वतंत्रता सेनानी कभी पवित्र शब्द थे। पर भ्रष्ट अफसरों और कर्मचारियों ने लोभी लोगों से मिलकर उन शब्दों को दागदार बना दिया।


खेती की उपेक्षा का परिणाम

महाराष्ट्र के मराठा, गुजरात के पटेल और हरियाणा के जाट मुख्यतः खेती -बारी पर निर्भर समुदाय हैं। वे सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग के लिए आंदोलित हैं।

चूंकि खेती अलाभकर पेशा बनती जा रही है, इसलिए उनका उद्वेलित होना स्वाभाविक है। देश के ऐसे कुछ अन्य समुदायों के भी सड़कों पर उतरने की संभावना है। खेतिहरों का यह संकट देश भर में राजनीतिक संकट का रूप ले ले, उससे पहले ही केंद्र सरकार को चेत जाना चाहिए। फिलहाल दो उपाय नजर आ रहे हैं। कृषि आधारित उद्योगों को अधिक बढ़ावा मिले और साठ साल से अधिक उम्र के खेतिहरों के लिए सरकार पेंशन का प्रावधान करे।


और अंत में

  हाल में भोपाल में जेल के भीतर और बाहर जो कुछ हुआ, वह सामान्य कानून-व्यवस्था का मामला है या फिर इस देश के खिलाफ युद्ध या जेहाद? या दोनों ?

 पहले इन सवालों का जवाब तलाशना होगा।

जवाब मिल जाने के बाद यह तय करना होगा कि ऐसी घटनाओं को हमें लेकर कैसा रुख-रवैया अपनाना चाहिए।
( चार नवंबर 2016 के प्रभात खबर ,पटना में प्रकाशित)

ओसामा बिन लादेन को अपना आदर्श मानता है सिमी

 
‘इस्लाम का गाजी कुफ्र शिकन, मेरा शेर ओसामा बिन लादेन।’ 

2001 में पटना और लखनऊ में सिमी ने अपने समर्थकों के बीच एक मैगजीन बांटी थी। उसमें उपर्युक्त शेर लिखा हुआ था।

सिमी 1977 में अपने गठन के समय से ही लगातार विवादास्पद रहा। उसने कई बार यह घोषणा की कि वह हथियार के बल पर पूरी दुनिया में इस्लाम का शासन कायम करना चाहता है। आश्चर्य है कि इसके बावजूद इस देश के कई बुद्धिजीवी और अनेक नेता सिमी को छात्रों का निर्दोष संगठन बताते रहे।


‘कुरान हमारा संविधान’

सिमी के बिहार जोन के सचिव रियाजुल मुशाहिल ने 20 सितंबर 2001 को कहा था कि ‘कुरान हमारा संविधान है। यदि भारतीय संविधान का कुरान से टकराव होता है तो हम संविधान से बंधे हुए नहीं हैं। हम भारत सहित पूरी दुनिया में खलीफा का शासन चाहते हैं।’ इस बीच सिमी अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हिंसक गतिविधियों में शामिल रहा।

जब 1986 में सिमी ने ‘इस्लाम के जरिए भारत की मुक्ति’ का नारा दिया तो ‘जमात ए इस्लामी’ ने सिमी से अपना संबंध पूरी तरह तोड़ लिया। याद रहे कि सिमी का गठन ‘जमात ए इस्लामी’ हिंद के छात्र संगठन के रूप में हुआ था।

  2001 में सिमी पर प्रतिबंध लग जाने के बाद सिमी के कुछ प्रमुख लोगों ने मिलकर इंडियन मुजाहिद्दीन बना लिया। पर उसके कई सदस्यों के नाम के साथ सिमी जुड़ा रहा। क्योंकि उनके खिलाफ के मुकदमों में सिमी का नाम भी जुड़ा रहा।

प्रतिबंध के बाद भी बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ बड़े राजनीतिक नेतागण कई वर्षों तक सिमी को निर्दोष संगठन बताते रहे। आरोप लगा कि वोट के लिए वे नेता ऐसा करते रहे। इससे भी भाजपा को राजनीतिक लाभ मिला।


‘लोकतांत्रिक तरीके से इस्लामिक शासन संभव नहीं’

 अहमदाबाद धमाकों के बाद पकड़े गए सिमी सदस्य अबुल बशर ने बताया था कि ‘सिमी की इस नीति से प्रभावित हूं कि लोकतांत्रिक तरीके से इस्लामिक शासन संभव नहीं है। उसके लिए एकमात्र रास्ता जेहाद है।’
याद रहे कि 26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में एक साथ 21 बम विस्फोट हुए थे जिनमें 56 लोगों की जानें गयीं थीं। इंडियन मुजाहिदीन ने विस्फोट की जिम्मेदारी ली थी। याद रहे कि सिमी के सदस्य ही आई.एम. में सक्रिय हो गये थे।


‘मंदिरों को नष्ट कर वहां मस्जिद बना देंगे’

  सिमी के अहमदाबाद के जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने 2001 में एक अखबार से बातचीत  में कहा था कि ‘जब हम सत्ता में आएंगे तो सभी मंदिरों को नष्ट कर देंगे और वहां मस्जिद बना देंगे।’ मंसूरी का बयान 30 सितंबर 2001 के उस अखबार में छपा था। उपर्यक्त तथ्य  सिमी और इंडियान मुजाहिददीन की कार्य शैली को समझने के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

 भोपाल की जेल से भागे सिमी के सदस्यों की मौत असली मुठभेड़ में हुई या नकली ? यह एक अलग सवाल है। इस पर तरह -तरह की बातें आती रहेंगी और पहले की तरह ही ऐसे विवाद से राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश राजनीतिक दल करते रहेंगे।
एक नवंबर 2016 को प्रभात खबर में प्रकाशित  

Sunday, October 30, 2016

एम.पी.एस.-2 हंटर सिन्ड्रोम : सिर्फ सरकार के ही पास है ऐसी बीमारी का इलाज

 इन दिनों इस देश के कोई डेढ़ सौ बच्चे एक विरल और जटिल आनुवांशिक रोग से पीडि़त हैं। उस रोग का नाम है एम.पी.एस.-2 हंटर सिन्ड्रोम।

 बिहार और झारखंड में भी ऐसे मरीजों की पहचान हुई है। रांची का शौर्य सिंह उन मरीज बच्चों में से एक है। पर, पैसे के अभाव में देश के अन्य अनेक मरीजों के अभिभावकों के साथ-साथ शौर्य के अभिभावक सौरभ सिंह के लिए भी इलाज कराना संभव नहीं हो पा रहा है।

 इस जानलेवा रोग के इलाज का खर्च मरीज के वजन पर निर्भर करता है। यदि बच्चा दस किलोग्राम का है तो उस पर 50 लाख रुपए। बीस किलो का होने पर एक करोड़ रुपए। इस मर्ज की दवा ब्रिटेन की शायर फार्मास्यूटिकल कंपनी   बनाती है। वह काफी महंगी है।

 नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तभी वह ऐसे मरीज से मिले भी थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस संबंध में विशेषज्ञ चिकित्सकों की एक उच्चाधिकारप्राप्त समिति का गठन भी कराया है। सर गंगाराम अस्पताल के जेनटिक्स विभाग के अध्यक्ष  डा. आई.सी. वर्मा उस कमेटी के प्रधान हैं। पर कमेटी के काम में तेजी नहीं आ पा रही है।

  ऐसे मर्ज से पीडि़त बच्चों के अभिभावकगण बुरी तरह परेशान रहते हैं। एक तो अपने अबोध बच्चे की बीमारी का कष्ट और ऊपर से अपनी आर्थिक लाचारी की पीड़ा ! इतने रुपए इकट्ठा करना उनके वश में जो नहीं है! कुछ सरकारें बी.पी.एल. परिवार को ही इलाज का खर्च देती हैं। पर सवाल है कि इस देश के कितने मध्य वर्गीय परिवार एक करोड़ रुपए खर्च कर सकने की स्थिति हैं? इसलिए ऐसे मरीजों के अभिभावकगण  सरकारों की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।  विभिन्न सरकारों  मदद से अब तक करीब एक दर्जन मरीजों का ही इलाज संभव हो पाया है। ई.एस.आई.सी.  8 मरीजों और पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग एक मरीज के इलाज पर खर्च उठा रहा है। दिल्ली और कर्नाटका उच्च न्यायालयों के आदेश पर वहां की राज्य सरकारों ने कुछ मरीजों का खर्च उठाया है।

 पर अधिकतर मरीजों का समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है। मरीजों के अभिभावक  सरकार की ओर टकटकी लगाकर देख रहे हैं।

    दो से चार साल के शिशु के शरीर को यह जानलेवा रोग अपनी गिरफ्त में ले लेता है।  इस रोग के कारण बच्चे के सिर का आकार असामान्य रूप से बढ़ जाता है। धीरे -धीरे हड्डियों के जोड़ों में अकड़न आ जाती है। श्रवण शक्ति कम होने लगती है। आंखों की रोशनी धीमी पड़ने लगती है। लीवर का आकार बढ़ जाता है। शरीर में कुछ अन्य विकार भी पैदा होने लगते हैं। यदि समय पर इलाज नहीं हुआ तो ऐसे रोगग्रस्त बच्चे की आयु सिर्फ दस से पंद्रह साल की ही होती है।

  पैसे के अभाव में अपने अबोध बच्चे को तिल -तिल कर मरते देखना किसी मां-बाप के लिए कितना दुःखदायी होता है, इसका अनुमान कठिन नहीं है।

  इस रोग से संबंधित सर्वाधिक दुःखदायी बात यही है कि इलाज अत्यंत महंगा है। हाल ही में कर्नाटका सरकार ने नेशनल हेल्थ मिशन के फंड से एक मरीज के लिए एक करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। वहां के हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद राज्य सरकार ने ऐसा किया। याद रहे कि इस संबंध में कर्नाटका हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गयी थी।

 दिल्ली हाईकोर्ट ने भी याचिकाकर्ता की मदद की है। क्या इस देश की अन्य सरकारें कर्नाटका सरकार की तरह ही नेशनल हेल्थ मिशन के फंड से इस मर्ज के इलाज के लिए राशि खर्च करेगी? क्योंकि हाईकोर्ट में मुकदमे का खर्च उठाने की आर्थिक स्थिति भी अधिकतर अभिभावकों की नहीं है। याद रहे कि नेशनल हेल्थ मिशन में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम भी शामिल है।

 झारखंड के मरीज शौर्य के लिए भाजपा सांसद राम टहल चैधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। श्री चैधरी ने शौर्य के इलाज का खर्च उठाने का आग्रह करते हुए लिखा है कि सरकार ऐसे अन्य मरीजों की आर्थिक मदद के लिए विशेष कोष बनाये।

  इस बीच एक राज्य सरकार ने यह कह दिया कि हंटर सिंड्रोम असाध्य रोग नहीं है। साथ ही, मरीज के अभिभावक गरीबी रेखा के नीचे नहीं आते। यानी इस मानवीय समस्या को लेकर सभी राज्यों का रवैया एक तरह का नहीं है। ऐसे में केंद्रीय सरकार का हस्तक्षेप जरूरी हो गया है।

इसी साल के प्रारंभ में दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल काॅलेज में विशेषज्ञ चिकित्सकों की तत्संबंधी उच्चाधिकारप्राप्त समिति की बैठक हुई। डा. वर्मा उस समिति के प्रधान हैं। बैठक में इस गंभीर बीमारी के इलाज के खर्च को लेकर  अदालत के 2015 के एक निर्णय की विस्तार से चर्चा हुई।

उपर्युक्त समिति में कुछ अन्य विशेषज्ञों को शामिल करने का फैसला हुआ। मरीजों के अभिभावक उस समिति की सिफारिशों की बेचैनी से प्रतीक्षा कर रहे हैं। याद रहे कि सांसद राम टहल चैधरी ने प्रधानमंत्री से यह भी आग्रह किया है कि वह उपर्युक्त उच्चाधिकारप्राप्त कमेटी के काम में तेजी लाने का निदेश दें। उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार बीमार अबोध बच्चों की जल्द ही सुध लेगी।

Wednesday, October 12, 2016

राम एकबाल बरसी जैसे नेता अब पैदा नहीं होते

डाॅ. राम मनोहर लोहिया ने कभी राम एकबाल सिंह को ‘पीरो का गांधी’ कहा था। डाॅ. लोहिया ऐसे नेता थे जो न तो अपनी चापलूसी सुनना चाहते थे और न ही किसी को महज खुश करने के लिए ऐसा कोई नाम देते थे।

 जो लोग लोहिया को जानते रहे हैं, उन लोगों ने यह मान लिया था कि यदि लोहिया ने राम एकबाल जी को ‘पीरो का गांधी’ कहा था तो जरूर राम एकबाल जी में ऐसी कोई विशेष बात होगी। बात थी भी। राम एकबाल जी एक अनोखे नेता थे। समाजवादी आंदोलन के लोग राम एक बाल जी को आदर की दृष्टि से देखते थे। वैसे इसके कुछ लोग अपवाद भी थे।

 यह अकारण नहीं था कि हाल में जब पटना के अस्पताल में इलाज के लिए राम एकबाल जी को लाया गया तो लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दोनों उन्हें देखने के लिए वहां गये। ऐसा कम होता है।

  यह भी संयोग ही रहा कि राम एकबाल जी का निधन उसी महीने में हुआ जिस अक्तूबर में राम मनोहर लोहिया का 1967 में निधन हुआ था।

 समाजवादी नेता राम एकबाल सिंह 1969 में पीरो से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गये थे।  1972 में भी वह पीरो से ही चुनाव लड़े, पर उनका तीसरा स्थान रहा। उसके बाद उन्होंने कोई चुनाव नहीं लड़ा।

 1977 में उन्हें जनता पार्टी का टिकट आॅफर किया गया था। पर उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। उनकी जगह रघुपति गोप को टिकट मिला और वह जीते भी। जनता पार्टी का टिकट उन दिनों जीत की गारंटी माना जाता था। इसके बावजूद राम एकबाल ने तब कह दिया था कि एक ही व्यक्ति बार -बार चुनाव क्यों लड़ेगा ? कोई और लड़े।

 1977 में ही बिहार विधानसभा से पहले लोकसभा का चुनाव हो चुका था। बिहार की सभी 54 लोस सीटें जनता पार्टी को मिल चुकी थीं। इसके बावजूद जनता पार्टी का टिकट अस्वीकार करने का काम कोई आदर्शवादी व्यक्ति ही कर सकता था। राम एकबाल जी आदर्शवादी थे भी।

बाद के दिनों में राम एकबाल जी ने अपने नाम के आगे से सिंह शब्द हटाकर उसकी जगह बरसी जोड़ लिया था। बरसी उनके गांव का नाम है। यह नाम उनके साथ अंत तक रहा।

 आदर्शवादी तो ऐसे थे कि एक समाजवादी मित्र की लड़की की शादी में हसुआ और खुरपी लेकर चले गये थे। नब्बे के दशक की बात है। उनके मित्र पटना के लोहिया नगर में रहते हैं। राम एकबाल जी के पास वर-बधू को देने के लिए यही उपहार था। मित्र से कहा कि नवजीवन शुरू करने वाले दंपत्ति थोड़ा खेती भी करें।

 वह कभी -कभी थोड़ा कटु भी बोलते थे। पर उनकी बोली का उनके परिचित मित्र बुरा नहीं मानते थे। साठ के दशक में मैं उनसे मिला था। संसोपा के सम्मेलनों में उन्हें देखता था। विधायक के रूप में भी उनकी भूमिका करीब से देखी।

सब जगह निर्भीक, स्पष्टवादी और अपने विचारों पर अडिग।

कमजोर वर्ग उनकी राजनीति के कंेद्र में होता था। मेरे जानते उनमें निजी स्वार्थ की भावना कतई नहीं थी। संभवतः इसलिए भी किसी भी बड़ी हस्ती से बहस करने और लड़ लेने की ताकत थी उनमें। अपने दल के अंदर और पार्टी के बाहर भी।

डाॅ. लोहिया कहा करते थे कि सोशलिस्ट कार्यकर्ताओं की वाणी स्वतंत्र रहनी चाहिए, पर उनमें कर्म की प्रतिबद्धता भी होनी चाहिए। लोहिया के नहीं रहने बाद भी लोहियावादी राम एकबाल जी इसका पालन करते थे। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि मैं दो सौ साल जीना चाहता हूं। बहुत काम करने हैं। इसके लिए वह प्रयत्नशील भी रहते थे।

दो सौ साल जीना तो असंभव है। पर उन्होंने ऊंचा लक्ष्य रखा तो 94 साल जीए।

राजनीतिक कार्यकर्ता के जीवन में दौड़-धूप काफी रहती है। संयम और उचित खानपान के लिए जो साधन, समय और स्थान चाहिए, उसका अभाव ही रहा होगा। फिर भी इतना जीना बड़ी बात है।

  एक बार उन्होंने निश्चय किया था कि एक खास कालावधि में वह पक्की सड़क पर पांव तक नहीं रखेंगे।
इसका उन्होंने लंबे समय तक भी पालन किया। पिता की सेवा के लिए वह लंबे समय तक गांव में ही रहे। इस तरह के कई असामान्य काम थे जो उन्होंने किए।

राम एकबाल बरसी जैसे राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता-नेता शायद उसी युग में पैदा होते थे जब राम एकबाल पैदा हुए थे। अब इस मामले में यह भूमि बंजर सी हो चुकी है। इसलिए भी वे अनेक लोगों को याद आते रहेंगे।

Friday, July 1, 2016

आपातकाल में फरारी के मेरे वे दिन !


आपातकाल में बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में सी.बी.आई. की विशेष टीम मेरी तलाश कर रही थी। पर, समय रहते पूर्व सूचना मिल गई और मैं किसी तरह उस टीम की गिरफ्त में आने से बच गया। मैं फरार हो गया।

 पर फरारी के महीनों में मुझे इतना अधिक परेशानी, अभाव और कष्ट से गुजरना पड़ा जिसका वर्णन मुश्किल है। मेरा काफी समय मेघालय के एक छोटे बाजार में बीता। वहां तब आॅल पार्टी हिल लीडर्स कांफे्रंस की सरकार थी। इसलिए आपातकाल का अत्याचार नहीं था।

 भूमिगत जीवन के कष्टों को देखकर कई बार मैं यह सोचता था कि बेहतर होता कि मैं गिरफ्तार ही हो जाता। पर,दूसरे ही क्षण यह डर समा जाता कि मुझे मार-मार कर सी.बी.आई. डायनामाइट केस में मुखबिर बना देगी। जिस रेवतीकांत सिन्हा को सी.बी.आई. ने मुखबिर बनाया, उन्हें मेरी अपेक्षा फर्नांडिस की गतिविधियों के बारे में कम ही जानकारियां थीं।

 मेरे जैसे दुबले-पतले और कमजोर से दिखने वाले व्यक्ति को धमका कर मुखबिर बनाने की कोशिश जांच एजेंसियां करती रही हैं।

  17 फरवरी, 1977 को मुखबिर रेवतीकांत सिन्हा का इकबालिया बयान देश के सभी अखबारों में छपा था। वह बयान उन्होंने दिल्ली के चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्टेªट मोहम्मद शमीम की अदालत में दिया था। उस बयान में अन्य बातों के अलावा सिन्हा ने यह भी कहा था कि ‘मेरे पटना स्थित आवास पर चार लोगों की बैठक हुई।

जुलाई, 1975 के पहले हफ्ते में हुई उस बैठक में मेरे अलावा जार्ज फर्नांडिस, महेंद्र नारायण वाजपेयी और सुरेंद्र अकेला थे। बैठक में जार्ज ने घोषणा की कि वह इंदिरा सरकार को उखाड़ फेंकने की योजना बना रहे हैं।

इसके लिए उन्हें कुछ विश्वस्त कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है।’

याद रहे कि उन दिनों मैं सुरेंद्र अकेला के नाम से लिखता था।

 जार्ज फर्नांडिस प्रतिपक्ष के प्रधान संपादक थे। मैं उसका बिहार संवाददाता था। इस लिहाज से जार्ज से मेरी निकटता थी। याद रहे कि लाइसेंस घोटाले से संबंधित ‘प्रतिपक्ष’ की एक रिपोर्ट पर लोकसभा मंे लगातार पांच दिनों तक गर्मागर्म चर्चा हुई थी। यह बात सितंबर, 1974 की है। सदन में पांच दिनों तक कोई दूसरा कामकाज नहीं हुआ था।  

 बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में 24 सितंबर 1976 को अदालत में आरोेप पत्र दाखिल कर दिया गया था। केस की सुनवाई चल रही थी। सी.बी.आई. ने इस केस के सिलसिले मेंे जिन्हें गिरफ्तार किया, उन्हें बड़ा कष्ट दिया।

दिल्ली विश्वविश्वविद्यालय के व्याख्याता विनोदानंद सिंह को तो कुर्सी से बांध कर रखा गया था। विनोद जी को बाद में सी.बी.आई. ने छोड़ दिया था।

वह 1977 में बिहार के गायघाट से जनता पार्टी के विधायक बने थे।

 सी.बी.आई. को इस केस के सिलसिले में कई झूठी जानकारियां भी मिली थीं। उनमें एक गलत जानकारी यह भी थी कि मैं जार्ज के लिए नेपाल से पैसे लाता था। सी.बी.आई. के अनुसार काठमांडु स्थित चीनी दूतावास से मैं संपर्क में था।

सी.बी.आई. के एक जांच अधिकारी ने मेरे एक मित्र को बताया था कि यदि सुरेंद्र अकेला गिरफ्तार हो जाता तो हमें जार्ज से चीन के रिश्ते का पता चल जाता।

 पर, सच्चाई यह है कि मैं आज तक नेपाल नहीं गया हूं। चीनी दूतावास से किसी तरह के संपर्क का सवाल ही नहीं उठता।

 पर, यह तब की जांच एजेंसी की ‘कार्य कुशलता’ का एक नमूना था।

 खैर मुझे गिरफ्तारी से बचाया था मुख्य मंत्रीसचिवालय के एक अफसर ने। समाजवादी पृष्ठभूमि के शिवनंदन पासवान तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र के सचिवालय में तैनात थे।

 दिल्ली से सी.बी.आई. की टीम आई हुई थी। उसने मुख्यमंत्री सचिवालय से संपर्क करके पटना का मेरा पता-ठिकाना पूछा। पासवान के अलावा किसी को मेरे बारे में कोई बात मालूम नहीं थी।

 पासवान ने हमारे परिचित लक्ष्मी साहु को इस बात की सूचना देते हुए कहा कि अकेला जी को शीघ्र खबर कर दीजिए कि वे फरार हो जाएं।

कर्पूरी ठाकुर के निजी सचिव रहे लक्ष्मी साहु ने किसी तरह पटना के जक्कनपुर स्थित मेरा घर खोजा। वहां मैं किराए के मकान में रहता था। मुझे छिप जाने को कहकर लक्ष्मी जी तुरंत वहां से चल दिए।

आपातकाल का इतना आतंक ही था कि किसी ऐसे व्यक्ति के पास फटकना भी कोई नहीं चाहता था जिसे सी.बी.आई. कौन कहे पुलिस भी खोज रही हो।

मैं फरार हो गया। प्रतिपक्ष के संवाददाता के रूप में मुझे हर माह दो सौ रुपए मिलते थे। जार्ज ने आपातकाल लागू हो जाने के बाद भी वह राशि मुझे भिजवानी जारी रखी। हालांकि प्रतिपक्ष का प्रकाशन 25 जून, 1975 के बाद बंद हो गया था।

फिर भी पैसे भिजवाने का बड़ा कारण यह था कि आपातकालीन भूमिगत गतिविधियों में मैं जार्ज का सहयोग कर रहा था।

 मेरा असल कष्ट शुरू हुआ 1976 के मार्च में। तब बड़ौदा में डायनामाइट पकड़ा गया था। उससे जोड़कर जार्ज फर्नांडिस के साथियों की गिरफ्तारियां शुरू हुईं।

 फरारी समय में कोई मुझे शरण देने को तैयार ही नहीं था। रिश्तेदार भी भला नाहक क्यों संकट मोल लेते !
 मेरे मित्र और पटना सचिवालय में सहायक रामबिहारी सिंह ने एक अन्य सरकारी कर्मचारी श्रीवास्तव के पटना स्थित आवास में मुझे रखवा दिया।

पटना के बांसघाट के पास की उस घनी आबादी वाले मोहल्ले में कुछ दिन तो बीत गए, पर एक जगह अधिक दिनों तक रहा भी नहीं जा सकता था। पैसों की भारी दिक्कत थी। मेरे जैसे मामूली अभियानी पत्रकार को आपातकाल में कोई पैसे क्यों देता ?

राजनीतिक लोग या तो जेल में थे या काफी डरे हुए थे। इस बीच जार्ज से मिलना भी बंद हो गया। उनके पत्र जरूर आ रहे थे।

आपातकाल लागू होने के बाद मैं जार्ज से बंगलुरू, कोलकाता और दिल्ली में बारी -बारी से मिला था।
 जार्ज की गिरफ्तारी के बाद मैंने बिहार छोड़ देना ही बेहतर समझा।

मेरे बहनोई मेघालय के गारो हिल्स जिले के फुलबाड़ी बाजार में अपना छोटा व्यापार करते थे। मेरी बहन भी वहीं थीं।

 मैं जाकर वहीं रहने लगा। वहां चूंकि आपातकाल का कोई अत्याचार था ही नहीं, इसलिए मेरे रिश्तेदार यह समझ ही नहीं सके कि सी.बी.आई. को मेरी कितनी तलाश है। उनके यहां कोई अखबार भी नहीं आता था।
 पर मैं यह समझ रहा था कि मुझे यहां बैठकर रहने के बदले किसी काम में लग जाना चाहिए। मैं अपने बहनोई की दुकान पर ही बैठना चाहता था। बहनोई राजी थे। पर मेरी दीदी ने साफ मना कर दिया। उसने कहा कि आपको जो करना हो करिए, पर बबुआ दुकान नहीं चलाएगा। बाबू जी सुनेंगे तो उन्हें इस बात का बुरा लगेगा कि राजपूत का लड़का दुकान चला रहा है।

  जीजा जी भी मान गए।

 नतीजतन मैं बहन के घर खाता और सोता था। शाम को बाजार जाता था। एक बंगाली की चाय की दुकान में बैठकर चाय पीता था और ‘असम ट्रिब्यून’ पढ़ता था।

कुछ दिनों तक तो यह ठीक ठाक चलता रहा। फुलबाड़ी तब एक छोटी जगह थी। बंगलादेश की सीमा के पास है। वहां सब एक दूसरे को जानते थे। समय बीतने के साथ इस बात की चर्चा शुरू होने लग गयी कि अंग्रेजी पढ़ने वाला यह व्यक्ति यहां निट्ठला क्यों बैठा हुआ है ? क्या इंदिरा गांधी का सी.आई.डी. है ? क्या स्थानीय सरकार पर नजर रखने के लिए इसकी तैनाती हुई है ?

 जब यह चर्चा मुझ तक भी पहुंची तो मैं चिंतित हो गया। आशंका हुई कि यदि स्थानीय पुलिस मुझसे पूछताछ करने लगेगी तो मैं क्या जवाब दूंगा ? जल्दी-जल्दी मैं वहां से भागकर पटना पहुंचा। क्योंकि इस बीच नवंबर, 1976 में मेघालय के मुख्यमंत्री विलियमसन ए. संगमा कांग्रेस में शामिल हो चुके थे। मेघालय की राजनीतिक स्थिति बदल चुकी थी।

हालांकि तब तक पूरे देश में आपातकाल की कठोरता कम होने लगी थी। बड़े नेतागण जेलों से रिहा होने लगे थे। चुनाव होने वाले थे। हालांकि बड़ौदा डायनामाइट केस की सुनवाई चल ही रही थी। जब 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनी तभी वह केस वापस हुआ।

लोकसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही यह लगने लगा था कि कांग्रेस हार जाएगी। फिर तो मैंने ‘आज’ अखबार के पटना दफ्तर में नौकरी शुरू कर दी।

 मंत्री बनने के बाद जार्ज ने मुझसे कहा कि ‘दिल्ली चलकर प्रतिपक्ष निकालो।’

मेरे कुछ ‘शुभचिंतकों’ ने भी कहा कि ‘चले जाओ, उद्योगमंत्री से कुछ व्यापारियों की मुलाकात भी करवा दोगे तो जीवन संवर जाएगा। कई उद्योगपतियों के जायज बड़े काम भी मंत्री से मुलाकात नहीं होने के कारण रुका रहता है।’

इस पर मैंने कहा कि मुझे ऐसा जीवन मंजूर नहीं है। मैंने साफ मना कर दिया। क्योंकि संघर्षशील  जार्ज मुझे जरूर प्रभावित करते थे, पर मंत्री जार्ज कत्तई नहीं। वैसे भी मैं राजनीतिक गतिविधियांे से अलग हो जाने का पहले ही मन बना चुका था। आपातकाल के विशेष कालखंड में आपात धर्म ही निभा रहा था। उससे पहले किसी पेशेवर अखबार में नौकरी पाने की प्रतीक्षा में प्रतिपक्ष और जनता जैसे अभियानी और सोद्देश्य पत्रिकाओं में काम कर रहा था।
(दैनिक नया इंडिया में प्रकाशित) 

Thursday, May 26, 2016

अच्छा हुआ जो राजनीति में नहीं रहा

मैंने पटना के विधायक आवास के कमरे में प्रवेश किया ही था कि एक समाजवादी ‘नेता जी’ ने सामने से मेरी गर्दन को मजबूती से पकड़ा और धकेलते हुए झटके में बाहर कर दिया।

 वह ‘गर्दनिया पासपोर्ट’ ही मुख्य कारण बना सक्रिय राजनीति से मेरे ‘निष्कासन’ का। इस घटना को अपने लिए मैं वरदान मानता हूं। पर,यह घटना राजनीतिक कार्यकर्ताओं की पीड़ा भी बयान करती है। इस पर अलग से देश के राजनीतिक नेताओं को विचार करना चाहिए।

 राजनीति से निकल जाने का फैसला तो खैर मेरा अपना था। पर उस नेता जी का ऐसा कोई उद्देश्य शायद नहीं रहा होगा। अधिकतर नेताओं की तरह वे भी बस यही चाहते थे कि मेरे जैसे छोटे राजनीतिक कार्यकर्ता इसी तरह का सलूक झेलते रहें। फिर भी कार्यकर्ता की तरह खटते रहें।

 संभवतः यह 1970 की बात रही होगी।

 उससे पहले मैं डा. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित होकर 1966 में राजनीति में आया था। बिहार में कांग्रेस सरकार के खिलाफ एक बड़े छात्र आंदोलन में शामिल रहने के कारण मेरी बी.एससी. की परीक्षा भी छूट गयी।

बाद में यानी 1971 में मैंने बी.ए. पास किया।

लोहिया के मुख्य विचार थे कि सवर्ण लोग खासकर समाजवादी पार्टी के सवर्ण लोग पिछड़ों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाने के क्रम में खुद को खाद बनाएं। लोहिया  पिछड़ों के लिए साठ प्रतिशत की हिस्सेदारी देने के पक्षधर थे। सवर्ण पृष्ठभूमि से आने के कारण लोहियावादी राजनीति में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति की वैसे भी मेरे लिए बहुत कम ही गंुजाइश थी। इसके बावजूद लोहियावादी राजनीति से जुड़ा क्योंकि मेरी कोई व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी ही नहीं।

 सन 1963 में मैंने साइंस से मैट्रिक प्रथम श्रेणी में पास किया था। तब सिर्फ माक्र्स के आधार पर ही तीसरी श्रेणी की सरकारी नौकरी मिल जाती थी। मेरे जैसे एक किसान के बेटे के लिए यह स्वाभाविक ही था कि उसके पिता यह चाहें कि वह जल्द से जल्द कोई पक्की यानी सरकारी नौकरी पकड़ ले।

पर मैंने तय किया था कि न तो मैं शादी करूंगा और न ही नौकरी। मुझसे उम्मीद पाले बाबू जी को भी मैंने कह दिया था कि मुझे पुश्तैनी संपत्ति में कोई हिस्सेदारी नहीं चाहिए।

राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में अब काम करूंगा। मैं परिवार को कोई आर्थिक मदद नहीं कर पाऊंगा। तब एक भोली आशा थी कि डा. लोहिया के नेतृत्व में देश में एक न एक दिन समाजवाद आएगा। एक बेहतर समाज बनेगा। उस काम में मेरा भी थोड़ा योगदान होना चाहिए।

 विधायक बनने, पैसे कमाने या फिर अखबारों में नाम छपवाने की कोई चाहत तो कत्तई नंहीं थी। अपनी पढ़ाई के बारे में भी एक कारणवश बताया। मैं उन लोगों में भी नहीं था जिन्हें कहीं कोई नौकरी नहीं मिलती थी तो राजनीतिक कार्यकत्र्ता बन जाते थे।

 तब मैं छात्र होने के कारण बिहार के विश्वविद्यालय परिसरों में जाकर  लोहियावादी समाजवादी विचारधारा का प्रचार करता था और समाजवादी संगठन में छात्रों को शामिल करता था। शामिल होने वालों में से एक तो बाद में राजनीति में काफी ऊपर उठे।

  उन दिनों ‘दिनमान’ एक अत्यंत प्रतिष्ठित पत्रिका थी। समाजवादियों की चहेती पत्रिका। उसमें संपादक के नाम पत्र छप जाने पर भी कोई राजनीतिक कार्यकत्र्ता देश भर के समाजवादियों के बीच जाना जाने लगता था। तब मैं सुरेंद्र अकेला के नाम से पत्र लिखता था। दिनमान में 1968 में मेरा इसी नाम से पहला पत्र छपा था। मैं डा. लोहिया और दिनमान के संपादक अज्ञेय को व्यक्तिगत चिट्ठियां भी लिखता था। उन लोगों ने जवाब भी दिए थे। छात्र जीवन में ही समाजवादी पत्रिकाओं में भी मैं पत्र और लेख लिखा करता था।

 यह सब मैं इसलिए बता रहा हूं क्योंकि एक समझदार कार्यकत्र्ता बनने की पृष्ठभूमि मुझमें मौजूद थे।

  उस नेता जी के साथ भी यदाकदा बैठकर मैं राजनीतिक चर्चा किया करता था। इसके बावजूद उन्होंने मेरे साथ यह सलूक किया। पटना के विधायक आवास में वे मुझे पीछे से नहीं बल्कि सामने से गर्दन पकड़ कर ढकेल रहे थे। मेरे गिर जाने का भी पूरा खतरा था। गिरने पर सिर के पिछले हिस्से में गंभीर चोट लगने का खतरा था। पिछले हिस्से की चोट कभी-कभी मारक भी होती है।

 पर उनके गुस्से का एक ठोस कारण था। उनके कमरे में मेरे प्रवेश से उस समाजवादी विधायक की नींद में खलल पड़ सकती थी जिसके साथ नेताजी रहते थे। नेता जी उस विधायक के स्थायी अतिथि थे। नेता जी राज्य स्तर के बड़े समाजवादी नेता थे। 

नेता जी ने एक बार भोजन के लिए मुझे दो रुपए दिए थे। तब पटना की विधायक काॅलानी में दस आने में भर पेट भोजन मिल जाता था। शायद नेता जी को यह लगा होगा कि मैं एक बार फिर रुपए के लिए तो नहीं आ गया! हालांकि मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था।

वैसे मुझे याद नहीं है कि पिछली बार उन्होंने जो दो रुपए दिए थे, वे मेरे मांगने के बाद या खुद उन्होंने अपनी पहल पर दी थी। राजनीतिक चंदा देने वाले धनपतियों से वे संबंध रखते थे। यह और बात है कि उन दिनों समाजवादी नेताओं को बहुत कम पैसे चंदा के रूप में मिलते थे।  

 कुल मिलाकर इस प्रकरण से मुझे यह लग गया कि एक ऐसे कार्यकर्ता की समाजवादी दल मेंें क्या स्थिति है जिसके पास खुद के पैसे नहीं हैं। दूसरी बात यह कि जो नेता दो रुपए देगा, वह किस तरह एक कार्यकर्ता के साथ बर्ताव करेगा।

 मेरे मीठे स्वाभाव के कारण उस नेता जी को यह मालूम होना चाहिए था कि   यदि उस दिन उन्होंने अपने हाथ से धीरे से इशारा भी कर दिया होता तो मैं उस कमरे में दरवाजे से ही लौट जाता। पर वे समझते थे कि उन्हें किसी कार्यकर्ता की  गर्दन में हाथ लगा देने का भी पूरा अधिकार है।

 उसी दिन मैंने फैसला किया कि अब मैं आर्थिक रूप में स्वावलंबी बनने की कोशिश करूंगा और शादी करके घर भी बसाऊंगा। वैसे भी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता डा. लोहिया का इस बीच निधन हो चुका था। लोहिया  कार्यकर्ताओं की उम्मीद की किरण थे।

  अंततः मैंने पत्रकारिता को जीविका का साधन बनाने का फैसला किया। हालांकि इस बीच कुछ अन्य घटनाएं भी हुई जिसकी चर्चा फिर कभी। पहले छोटे अखबार और बाद में बड़े अखबारों में रहा।

अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मैं उस नेता जी को धन्यवाद ही देता हूं जिन्होंने समय रहते मेरी आंखें खोल दीं थी। एक बेहतर समाज बनाने की कोशिश की दिशा में एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में जितना प्रयास मैं कर सकता था, उससे बेहतर प्रयास एक पत्रकार के रूप में करने की मैंने कोशिश की। इसका मुझे संतोष है।

 कई बार विफल प्रेमी, कवि बन जाता है। विफल साहित्यकार आलोचक। और, विफल राजनीतिक कार्यकर्ता पत्रकार बन जाता है।

 मैं तीसरी श्रेणी में खुद को पा कर खुश हूं।

 पत्रकारिता जीविका के साथ-साथ एक सामाजिक काम भी है। सत्तर के दशक में मैं साप्ताहिक लोकमुख, और ‘जनता’ (पटना) तथा प्रतिपक्ष (नई दिल्ली) के लिए काम करता रहा। साथ ही बड़े अखबारों में नौकरी खोजता रहा। पर, कई कारणों से यह खोज लंबी चली।

 यह खोज 1977 में ही पूरी हो सकी जब दैनिक ‘आज’ में मेरी पक्की नौकरी हुई।  हालांकि सक्रिय राजनीति से मन उचट जाने का वही एक कारण नहीं था जिसकी चर्चा मैंने ऊपर की है। उससे पहले की दो अन्य घटनाएं भी मन पर छाई हुई थीं।

इस बार एक अन्य समाजवादी नेता के बारे मंे। उनके पटना स्थित आवास में मैं अक्सर जाया करता था। लंबी चर्चाएं होती थीं।

  एक दिन गपशप में देर शाम हो गयी। नेता जी ने अपने पुत्र से कहा कि ‘सुरेन्दर भी खाना खाएगा। मछली बनी है। इस गरीब को मछली और कहां मिलेगी?’

 एक राजनीतिक कार्यकर्ता सह बुद्धिजीवी के साथ ऐसा सलूक मुझे बहुत बुरा लगा। दरअसल नेता जी यह बात नहीं जानते थे कि मेरे जन्म के समय मेरे पिता जी 22 बीघा जमीन के मालिक थे। दो बैल, दो गाय और एक भैंस। लघुत्तम जमींदार थे और एक बड़े जमींदार के तहसीलदार थे। यदि नहीं जानते थे तौभी किसी गरीब कार्यकर्ता की गरीबी का ऐसा उपहास!

मेरे घर में दो नौकर थे। जमींदारी पृष्ठभूमि के कारण पास की नदी में मछली मारने वाले मुफ्त में मछली पहुंचाते थे। मेरे परिवार में मांस-मछली से लगभग परहेज था। इसलिए हमलोग अन्य लोगों में मछली बांट देते थे या नौकर -मजदूर खाते थे।

 दूसरी ओर इस नेता जी का जब जन्म हुआ था, तब उनका परिवार लगभग भूमिहीन था। समय बीतने के साथ नेता जी अमीर होते चले गये और मेरे परिवार की जमीन में से इस बीच 12 बीघा बिक गयी।

यहां दरअसल मैं राजनीतिक दलों खास कर मध्यमार्गी दलों के कार्यकर्ताओं की बेबसी का विवरण पेश करने के लिए अपनी यह कहानी लिख रहा हूं। ऐसा सिर्फ मेरे ही साथ थोड़े ही हुआ होगा! 

वाम दलों में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के जीवन यापन का दल की ओर से प्रबंध रहता था। आजादी की लड़ाई के दिनों और उसके कुछ साल बाद तक जयप्रकाश नारायण अपने दल के कुछ चुने हुए अच्छे कार्यकर्ताओं के लिए तीस रुपए माहवार का इंतजाम करते थे।

ऐसे कार्यकर्ताओं में से कुछ लोग बाद में केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और राज्य में मंत्री भी बने।

  अपवादों को छोड़ दें तो अब अधिकतर राजनीतिक कार्यकर्तागण सांसद -विधायक फंड के ठेकेदार हैं। या घर के जायज -नाजायज पैसे खर्च कर विधायक सांसद मंत्री बनने के लिए कार्यकर्ता बन रहे हैं।

 देश सेवा और समाज सेवा का कहीं कोई जुनून है भी तो वह अपवाद है। अपवाद से देश नहीं चलता। इसलिए देश जैसे चल रहा है,उसका तो भगवान ही मालिक है।

 गायत्री परिवार के मुखिया डा. प्रणव पण्डया ने राज्यसभा की सदस्यता ठुकराते समय जो कुछ कहा, क्या उससे भी इस देश की राजनीति कुछ सीखेगी ? एक गरिमापूर्ण सदन को नेताओं ने ऐसा बना रखा है कि प्रणव पण्डया को यह कहना पड़ता है कि मैं तो वहां अपनी बात रख ही नहीं पाऊंगा। 

 अपनी तीसरी कहानी सुनाकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं की पीड़ा की बात खत्म करूंगा।

 बिहार के सारण जिले के एक सुदूर देहात के डाकबंगला में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की बैठक हो रही थी। पार्टी का सम्मेलन चाहे अंचल मुख्यालय में हो या देश के किसी अन्य हिस्से में, मैं वहां जरूर जाता था। समाजवादी पत्रिकाओं के जरिए देश भर के हिंदीभाषी समाजवादी मुझे जानते ही थे। उनसे मिलकर अच्छा लगता  था।
अब बात सारण के उस डाकबंगले की।

एक समाजवादी नेता पहली बार विधायक बने थे। उनके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। उनके बोल चाल और हाव भाव से यह साफ लग रहा था कि वे रातोंरात समाजवादी से सामंतवादी बन चुके हैं।

 जब विधायक जी उस डाकबंगले के शौचालय से निकल रहे थे तो मैं संयोग से उनके सामने पड़ गया। उनसे मेरी कोई खास निकटता भी नहीं थी। क्योंकि सोचने समझने और पढ़ने लिखने से उनका नाता कम ही था। उन्होंने बिना किसी संकोच के कहा, ‘अकेला, जरा पखाना में एक बाल्टी पानी डाल देना।’

 मैंने पानी जरूर डाल दिया, पर सोचा कि विधायक जी कोई कट्टर गांधीवादी तो हैं नहीं जो शौचालय खुद ही साफ करते हैं। दरअसल ये सामंती हो चुके हैं। और उनकी नजर में एक पढ़ने लिखने वाले कार्यकर्ता का यही सही उपयोग है।

याद रहे कि जो व्यक्ति खुद शौचालय साफ नहीं करता, उसे दूसरे से कहने का अधिकार नहीं होना चाहिए। इन उदाहरणों से यह तो पता चल ही गया होगा कि  वास्तविक और समझदार राजनीतिक कार्यकर्ताओं को किस तरह दरकिनार और निरुत्साहित किया गया।

 नतीजतन अपवादों को छोड़ दें तो मध्यमार्गी राजनीतिक दलों में आज कैसे-कैसे कार्यकर्ता और नेता हैं! यदि उपर्युक्त व्यवहार झेलने के बावजूद यदि मैं राजनीतिक कार्यकर्ता बना रह गया होता तो आज मेरा हाल क्या होता ? !

 कल्पना करके ही डर जाता हूं। अच्छा हुआ कि गर्दनिया पासपोर्ट देकर अनजाने में ही एक नेताजी ने एक बेहतर काम मंे मुझे ढकेल दिया।

 मेरी रुझान और प्रवृत्ति देख कर किसी संपादक ने मुझ पर कभी किसी ऐसे काम के लिए दबाव नहीं बनाया जिसे मैं करना नहीं चाहता। यानी राजनीति की अपेक्षा पत्रकारिता ने मुझे अधिक संतुष्टि दी।

कुल मिलाकर यह बात कहनी चाहिए कि इस देश की राजनीति मौजूदा संसद को ऐसी गरिमायुक्त और शालीन बनाए जिसमें डा. पण्डया जैसे लोग अपनी बात रख सकें। साथ ही राजनीति को हर स्तर पर ऐसा बनाया जाए जिसमें एक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाविहीन कोई कार्यकर्ता रहकर सेवा का काम कर सके। क्या ऐसा कभी हो पाएगा ? 
(14 मई 2016  के हिंदी दैनिक ‘नया इंडिया’ में प्रकाशित)