गुरुवार, 29 नवंबर 2012

आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने ठीक ही कहा है कि चुनाव जीतना उनकी पार्टी का एकमात्र उद्देश्य नहीं है। बल्कि वैकल्पिक राजनीति खड़ी करना उनका लक्ष्य है।

इस लक्ष्य की राह पर चलने से आम लोगों को यह पता चलेगा कि सिद्धांतनिष्ठ राजनीति के रास्ते चल कर चुनाव भी जीता जा सकता है। अधिकतर मौजूदा राजनीतिक दल तो दबे स्वर से यह बताते या फिर संकेत देते रहे हैं कि कुछ-कुछ गड़बड़ी किये बिना चुनाव जीतना कठिन है क्योंकि आम लोग भी अब वोट देने के लिए पैसे मांगते हैं।

   आम आदमी पार्टी का यह भी दायित्व है कि वह अपने चरित्र और काम के जरिए इस कुप्रचार को आने वाले दिनों में गलत साबित कर दे।

पर, एक पार्टी के सिद्धांतनिष्ठ व जनाभिमुखी बने रहने के लिए यह जरूरी है कि उसके कुछ प्रमुख नेता खुद चुनाव नहीं लड़ें और अवसर मिलने पर भी किसी सरकारी पद पर नहीं बैठें। तभी पार्टी पर उनकी नैतिक धाक बनी रह सकेगी। इससे वे पार्टी के किसी भटकाव को रोक सकेंगे। क्या नवगठित ‘आप’ के कुछ बड़े नेतागण खुद ऐसा कर पाएंगे ? आज आर.एस.एस. की भाजपा पर धाक इसलिए भी कायम है क्योंकि संघ वाले खुद चुनाव नहीं लड़ते।

कांगे्रस और सी.बी.आई.

    आज मुलायम सिंह और मायावती पर सी.बी.आई. ने केस नहीं कर रखा होता तो केंद्र की मनमोहन सरकार स्थिर रह पाती ?

यदि सी.बी.आई. के निदेशक के पद पर यू.एन. विश्वास जैसे कर्तव्यनिष्ठ अफसर तैनात होते तो क्या मुलायम-मायावती का मनमोहन सरकार भयादोहन कर पाती ?

याद रहे कि सी.बी.आई. केंद्र सरकार के इशारे पर अदालत में कभी इन नेताओं के खिलाफ कड़ा रुख अपनाती है तो कभी नरम।

कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि अल्पमत मनमोहन सरकार सी.बी.आई. के भरोसे ही चल रही है। ऐसे में केंद्र सरकार इसके निदेशक पद पर रणजीत सिन्हा को नहीं बैठाती तो आखिर किसे बैठाती ?

     आरोप लगाया गया था कि चर्चित चारा घोटाला केस में रणजीत सिन्हा की सहानुभूति आरोपित लालू प्रसाद के प्रति थी।यह भी कि  सिन्हा सी.बी.आई. के तत्कालीन संयुक्त निदेशक यू.एन. विश्वास के विरुद्ध जाकर काम कर रहे थे। तब सिन्हा सी.बी.आई. में ही थे। पटना हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया होता और विश्वास जैसे ईमानदार व निर्भीक अफसर उस घोटाले की जांच के प्रधान नहीं होते तो चारा घोटाला भी रफा-दफा कर दिया गया होता। सर्वदलीय चारा घोटाले को लेकर यू.एन. विश्वास ने अपनी जान हथेली पर लेकर ऐसा मजबूत केस तैयार कर दिया था कि आज उनमें से प्रत्येक केस में किसी न किसी आरोपित को कोर्ट से सजा मिल ही रही है।

   याद रहे कि बाद में रणजीत सिन्हा को यू.पी.ए.-वन की सरकार के रेल मंत्री लालू प्रसाद ने आर.पी.एफ. का प्रधान बनाया था। वह उनके रेल मंत्री रहने तक महानिदेशक पद पर बने रहे।

अब जबकि लोकपाल विधेयक पास होने जा रहा है तो ऐसे में भ्रष्टाचार से घृणा करने वाले किसी आई.पी.एस. अफसर को तो कांग्रेस सरकार सी.बी.आई. का निदेशक बना नहीं सकती थी। कांग्रेस की अपनी राजनीतिक मजबूरी भी तो है।

लोकपाल से डर क्यों ?

  समाजवादी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल ने लोकपाल विधेयक का कड़ा विरोध करते हुए कहा है कि ‘हम लोकपाल की अवधारणा के ही खिलाफ हैं। चुनाव में जनता द्वारा चुने गये लोग बेइमान और और लोकपाल ईमानदार ? यह बात लोकतंत्र के आधार के ही खिलाफ है।’

   यानी नरेश अग्रवाल कहना चाहते हैं कि जो चुनाव जीत गया, उसे कानून से ऊपर मान लिया जाना चाहिए। ऐसा विचार रखने वाले वह देश के अकेले नेता नहीं हैं। फर्क यही है, वह सार्वजनिक रूप से यह बात बोल रहे हैं। बाकी लोग दबे स्वर से यह बोलते रहे हैं। हालांकि लोकपाल विधेयक पर लोकसभा में बहस के दौरान भी ऐसे कई स्वर फूटे थे जो नरेश अग्रवाल से मिलते जुलते थे।

 नब्बे के दशक मेंं बिहार के एक बड़े नेता से पूछा गया था कि आपने एक अपराधी को टिकट देकर सांसद क्यों बनवा दिया ? उसके जवाब में नेता जी ने कहा कि जिसे जनता ने जिता दिया, वह अब अपराधी कैसा ?

  आपातकाल में भी इंदिरा सरकार ने एक कानून लाने का विचार किया था। उसके अनुसार राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित कुछ प्रमुख पदधारकों पर कोई  फौजदारी मुकदमा दायर नहीं हो सकता था। बाद में सरकार को सुबुद्धि आई और उस कानून को संसद से पास नहीं कराया गया। पर वह प्रस्तावित कानून आपातकाल की मानसिकता की देन थी। आज तो आपातकाल के बिना भी इस देश के कुछ नेतागण आपातकाल वाली मानसिकता रखते हैं और खुद को कानून से ऊपर मानते हैं। लोकसभा में पूर्ण बहुमत यदि ऐसे नेताओं को मिल जाए तो वे इंदिरा गांधी के उस अधूरे सपने को भी पूरा कर देंगे, ऐसा लगता है।

हर महीने तीन हजार

  एक अच्छी सलाह को मानने में केंद्र सरकार को पूरे दस साल लग गये। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के तत्कालीन सचिव एन.सी. सक्सेना ने दस साल पहले ही यह सुझाव दिया था कि गरीबों की मदद के लिए आवंटित पैसों को सीधे उन्हें मनिआर्डर के जरिए भिजवा दिया जाना चाहिए।

अब जाकर यह काम केंद्र सरकार करने जा रही है। यह एक अच्छा काम है। इसका लाभ कांग्रेस को मिल सकता है यदि इसे ठीक से लागू करा दिया जाए। गरीबों के बैंक खातों में सरकार द्वारा पैसे डाले जाएंगे। इस मद में केंद्र सरकार हर साल करीब 4 लाख करोड़ रुपये खर्च करेगी।

   अस्सी के दशक में भी तत्कालीन प्र्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि हम दिल्ली से सौ पैसे भेजते हैं, पर उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही लोगों तक पहुंचते हैं। बाकी पैसे बिचैलिये खा जाते हैं।

इस हिसाब से देखा जाए तो गत दस साल में कितने पैसे बिचैलियों ने लूट लिये? इस लूट के लिए कौन जिम्मेदार है ?  बैंकों के जरिए भेजे जाने वाले पैसे को  बिचैलिये से बचाने की जिम्मेदारी सरकार की होगी।

और अंत में

  केंद्र सरकार कहती है कि 2 जी स्पैक्ट्रम आवंटन में कोई घोटाला नहीं हुआ। तो फिर ए. राजा पर केस क्यों चल रहा है और वह लंबे समय तक जेल में क्यों रहे ?

(दैनिक प्रभात खबर में 26 नवंबर 2012 को प्रकाशित)

एक महाराजा लीक से हटकर

जयपुर के आखिरी महाराजा सवाई मान सिंह की कई विशेषताएं थीं। वह एक साथ कुशल प्रशासक, देशभक्त, सैनिक और खिलाड़ी थे।

वह न सिर्फ पोलो के बहुत अच्छे खिलाड़ी थे, बल्कि दुनिया की दस सबसे सुंदर महिलाओं में से एक गायत्री देवी के पति भी थे। सन् 1958 में उनके नेतृत्व में भारत ने पोलो खेल में विश्व का स्वर्ण कप जीता था। पोलो खेलते समय हुई दुर्घटना में 24 जून 1970 को उनका निधन हो गया। निधन के समय उनकी आयु सिर्फ 58 साल थी।

21 अगस्त 1912 को जन्मे मान सिंह जयपुर के महाराजा लेफ्टिनेंट जनरल सवाई माधो सिंह के दत्तक पुत्र थे। सवाई मान सिंह पोलो मैच खेलते हुए अचानक अस्वस्थ हो गये। उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। पर अस्पताल ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

इससे एक माह पहले भी एक पोलो मैच के दौरान वह गिर पड़े थे। तब उन्हें गहरी चोट लगी थी। पर एक माह के आराम के बाद वह फिर पोलो के खेल में जुट गये। राजपूत घरानों के इस नारे को कि ‘रण में लड़ते -लड़ते शहीद हो जाओ,’ उन्होंने पोलो के खेल में लागू कर दिया। पोलो का मैदान उनके लिए रणक्षेत्र था और उसी में वह शहीद हो गये। उनकी मौत महारानी गायत्री देवी के लिए एक बड़ा सदमा था।

कूच बिहार के महाराजा जितेंद्र नारायण की पुत्री गायत्री देवी से मान सिंह ने 1940 में प्रेम विवाह किया था। यह अंतरजातीय विवाह था। यह उनकी तीसरी शादी थी। इससे पहले की दो शादियां उन्होंने जोधपुर राजघराने में की थीं। जोधपुर के महाराजा सुमेर सिंह की बहन से मान सिंह की पहली शादी हुई थी। दूसरी शादी उनकी बेटी से हुई। गायत्री देवी से उनका परिचय तब हुआ था जब मान सिंह पोलो खेलने कलकत्ता गये थे और वह कूच बिहार के महाराजा के अतिथि थे।

मानसिंह के निधन के बाद गायत्री देवी को इंदिरा सरकार से कठिन संघर्ष करना पड़ा। आपातकाल में गायत्री देवी को सरकार ने जेल में बंद कर दिया था। बड़े अमानवीय तरीके से उन्हें जेल में रखा गया था। हालांकि उससे पहले वह 1962, 1967 और 1971 में लोकसभा की सदस्या रह चुकी थीं। प्राप्त मतों की संख्या की दृष्टि से उन्होंने रिकार्ड कायम किया था। गायत्री देवी का निधन सन 2009 में 90 साल की उम्र में हुआ।

मानसिंह को  7 सितंंबर 1922 को महाराजा सवाई माधो सिंह ने अपना उत्तराधिकारी बनाया था। पर जयपुर रियासत की सत्ता उन्होंने 1937 में संभाली। अपने शासन के दौरान उन्होंने लोगों की भलाई, सेवा और सहायता पर अधिक जोर दिया।

आजादी के बाद तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने रियासत को भारत में मिलाने का प्रस्ताव जब जयपुर महाराज के सामने रखा तो उन्होंने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। याद रहे कि तब 565 रियासतें थीं जिन्हें मिलाया गया था।

याद रहे कि तब सभी राजाओं का रुख ऐसा नहीं था। जयपुर रियासत देश की सबसे बड़ी कुछ रियासतों में एक थी। उन्हें 18 लाख रुपये सालाना प्रिवी पर्स मिलता था जिसे बाद में इंदिरा गांधी सरकार ने समाप्त कर दिया। इनके अलावा हैदराबाद, मैसूर, त्रावणकोर, बड़ौदा और पटियाला के पूर्व शासक ही दस लाख रुपये से अधिक प्रिवी पर्स पाते थे। हैदराबाद के पूर्व शासक को बीस लाख रुपये सालाना मिलता था। जयपुर महाराजा के विपरीत उन्हीं दिनों कुछ रियासतों ने भारत में विलयन में भारी हिचक दिखाई थी। हैदराबाद रियासत को तो पुलिस कार्रवाई के बाद हासिल किया गया था। संयोगवश उस पुलिस कार्रवाई का नाम दिया गया आपरेशन पोलो। पोलो जयपुर के पूर्व शासक का प्रिय खेल था।

जूनागढ़ के शासक भी विद्रोह की मुद्रा में थे। कश्मीर के महाराजा के तो आरंम्भिक इनकार के कारण पाकिस्तान को हमला करने का मौका मिल गया। ऐसे में विलय के प्रस्ताव को जयपुर  महाराजा द्वारा तुरंत स्वीकारने के रुख की  सराहना हुई थी।

जयपुर महाराज ने देश की नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लिया था। सवाई मान सिंह के बारे में प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक जाॅन गुंटर ने लिखा था कि वह अपने आप को नई परिस्थितियों में ढालने में ऐसे अभ्यस्त हो चुके थे जिस तरह वह पोलो खेल के दौरान अपने घोड़े बदलते थे।

पूर्व महाराजा के असामयिक निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने कहा था कि देश ने एक महान खिलाड़ी, एक योग्य प्रशासक और राजनीतिक खोया है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गायत्री देवी के नाम शोक संदेश भेजा था। उसमें उन्होंने सवाई मान सिंह के विभिन्न पदों की सेवाओं का जिक्र करते हुए अपनी संवेदना व्यक्त की थी।

उनके निधन की खबर सुनकर राजस्थान के विभिन्न हिस्सों से भारी संख्या में लोग जयपुर में इकट्ठे हो गये थे। तब के एक अखबार की खबर के अनुसार निधन के समाचार से सारे राजस्थान में मुर्दनी छा गई। गांवों और शहरों से भीड़ एकत्र हो गई। लोगों की आंखें इस प्रकार सूजी हुई थीं, जैसे कि उन्होंने अपना कोई बहुत ही करीबी रिश्तेदार खोया है। जयपुर के महाराज सचमुच एक इनसान थे जिनसे सभी प्रेम करते थे और आदर देते थे।

(प्रभात खबर में 23 नवंबर 2012 को प्रकाशित)

शनिवार, 24 नवंबर 2012

बाल ठाकरे की अंतिम इच्छा लीक से हटकर थी


    शिव सेना सुप्रीमो बाल ठाकरे ने गत 9 सितंबर को कहा था कि भाजपा की ओर से सुषमा स्वराज को ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय राजनीति को लेकर बाल ठाकरे की यह संभवतः अंतिम इच्छा थी। भावी प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के नाम के शोर के बीच बाल ठाकरे की यह संतुलित आवाज सामने आई थी।

   बाल ठाकरे की इस इच्छा पर उनकी विचार धारा या फिर उनकी रणनीति का कोई असर नहीं था।
याद रहे कि सुषमा स्वराज न तो महाराष्ट्र की हैं और न ही कट्टर हिंदुत्व की पैरोकार हैं। हालांकि वह आज भाजपा की राजनीति में भले घुल -मिल गई लगती हैं, पर मूलतः वह समाजवादी धारा की राजनीति से निकल कर भाजपा में आई हैं।

  बाल ठाकरे में सुषमा स्वराज को प्रतिभाशाली और बुद्धिमान बताते हुए कहा था कि वह एकमात्र नेता हैं जो इस पद के योग्य हैं। प्रधानमंत्री के रूप में वह अच्छा काम करेंगी।

बाल ठाकरे की इस राय पर भाजपा नेताओं ने तब सधी हुई प्रतिक्रिया दी थी। बलवीर पुंज ने कहा था कि हमारे दल में प्रधानमंत्री पद के कई योग्य उम्मीदवार हैं। श्री पुंज की प्रतिक्रिया वाजिब भी थी। क्योंकि जब तक पार्टी या फिर राजग में इस मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला नहीं हो जाता है, तब तक बाल ठाकरे की इस सलाह पर सार्वजनिक रूप से यही प्रतिक्रिया हो सकती थी।

वैसे भी भाजपा पर आर.एस.एस. के बढ़ते दबदबे के इस दौर में इस बात की उम्मीद कम ही है कि  भाजपा के बहुमत सुषमा के पक्ष में हो जाए। पर सहयोगी दल का क्या रुख होगा, यह अभी तय नहीं है। लोकसभा की चुनावी राजनीति के जानकार लोग बताते हैं कि यदि भाजपा नरेंद्र मोदी को भी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर चुनाव लड़े तो भी अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने बूते बहुमत नहीं मिलेगा। क्योंकि भाजपा करीब पौने तीन सौ सीटों पर ही पहले या दूसरे नंबर पर रहती आई है।

    हालांकि यह बात गौर करने की है कि बाल ठाकरे ने इस मुद्दे पर अपनी विचार धारा और राजनीतिक राय से अलग हट कर बात कही थी। उनके ऐसे संतुलित बयान शायद ही कभी आते थे।

 लगता है कि बाल ठाकरे ने सुषमा स्वराज के बारे में ऐसी राय संभवतः कई बातों पर ध्यान रख कर ही दी थी। उन बातों की चर्चा कुछ राजग नेताओं व राजनीतिक प्रेक्षकों की ओर से भी होती रहती है।

  जानकार सूत्रों के अनुसार जहां नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी का सर्वाधिक विरोध हो रहा है, उस बिहार के भी कुछ राजग नेतागण सुषमा स्वराज को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में हैं। पर वे अभी इसकी सार्वजनिक तौर पर मांग नहीं कर रहे हैं। वैसे तो इस बारे में अंतिम फैसला राजग को ही करना है, पर उम्मीदवारों की पात्रता को लेकर अभी से चर्चा स्वाभाविक हो चुकी है। सपा ने लोकसभा के अपने उम्मीदवारों की घोषणा करके ऐसी चर्चा को तेज कर दिया है।

    गंगा-यमुनी संस्कृति वाले देश में नरेंद्र मोदी के बारे में कुछ आशंकाएं कई लोगों के दिलो -दिमाग में हैं। हालांकि उनके खिलाफ कोई आरोप अदालत में अभी साबित नहीं हुआ है, पर मुख्य सवाल उनकी छवि को लेकर हंै। सबको साथ लेकर चलने की उनकी क्षमता पर भी प्रश्न चिह्न लगाये जाते हैं।

  दूसरी ओर यह कहा जाता है कि सुषमा स्वराज लोकसभा में भाजपा की नेता हैं। ब्रिटेन में तो प्रतिपक्षी दल अपना छाया मंत्रिमंडल भी बना लेता है। फिर प्रतिपक्ष के नेता को छाया प्रधानमंत्री यानी भावी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार क्यों नहीं माना जाना चाहिए ?

   वैसे भी सुषमा स्वराज समाजवादी पृष्ठभूमि की है जो नरंेद्र मोदी की पृष्ठभूमि से बिलकुल अलग है। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार सुषमा स्वराज के पक्ष में एक बात यह भी है कि वह महिला हैं। इस देश में इंदिरा गांधी को महिला होने का भी राजनीतिक खास कर चुनावी लाभ मिला था। कुछ चुनाव विश्लेषकों का यह भी मानना है कि सन 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बढ़त इसलिए भी मिल गई थी क्योंकि भाजपा की ओर से उस समय प्रधानमंत्री के उम्मीदवार एक गैर ब्राह्मण यानी लाल कृष्ण आडवाणी थे। उधर कांग्रेस के पास राहुल गांधी  थे। सुषमा स्वराज के उम्मीदवार होने के बाद यह लाभ कांग्रेस को अगली बार शायद नहीं मिल सकेगा क्योंकि सुषमा गैर ब्राह्मण नहीं हैं।

यह अकारण नहीं था कि गत विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को कम सीटें व वोट मिले जबकि लोकसभा चुनावों में उसे अधिक सीटें व वोट मिल गये। बिहार में भी लगभग यही हुआ।

   बाल ठाकरे ने यदि सुषमा स्वराज का नाम सुझाया था तो इसलिए नहीं कि सुषमा ठाकरे की विचार धारा के करीब हैं। बल्कि ठाकरे को देश के चुनावी गणित और भाजपा के भीतर की गुटबंदी का अधिक ज्ञान था। कई बार दिल्ली से दूर बैठा व्यक्ति ऐसे मामले में निरपेक्ष ढंग से बेहतर निर्णय करने की स्थिति में होता है।

(जनसत्ता ः20 नवंबर 2012 से साभार)

बुधवार, 21 नवंबर 2012

कुनबापरस्ती में सबको पछाड़ा मुलायम ने

(जनसत्ता ः 17 नवंबर 2012 से साभार)


  राजनीति में परिवारवाद के मामले में मुलायम सिंह यादव ने नेहरू-इंदिरा परिवार को भी पीछे छोड़ दिया। लोकसभा के अगले चुनाव में मुलायम परिवार के चार सदस्य उम्मीदवार होंगे।

55 सीटों के उम्मीदवारों की सूची सामने आ जाने के बाद यह पता चला है। उत्तर प्रदेश की अस्सी में से 25 सीटों पर अभी समाजवादी पार्टी ने उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। संभव है कि उनमें से भी कुछ सीटें मुलायम परिवार के किसी सदस्य को मिल जाए। बड़े परिवार के कुछ सदस्यों को आप राजनीति में आगे बढ़ाएंगे तो अन्य बचे सदस्य भी कुछ पाने के लिए जिद कर देते हैं।

   नेहरू परिवार केंद्र की सत्ता में रहा है। कल्पना कीजिए कि मुलायम सिंह किसी दिन देश के प्रधानमंत्री बन जाएं तो फिर क्या होगा ? क्या चुनावी टिकट या फिर सत्ता की मलाई पाने से मुलायम परिवार का कोई सदस्य तब वंचित रहेगा ?

सबसे शर्मनाक बात यह है कि मुलायम सिंह यादव खुद को लोहियावादी कहते हैं। डा. राम मनोहर लोहिया राजनीति में परिवारवाद के भी घोर विरोधी थे। नई पीढ़ी के जो लोग डा. लोहिया को नहीं जानते हैं, वे लोहिया के बारे में क्या सोचेंगे जिनका नाम लेते मुलायम नहीं थकते? नई पीढ़ी के कुछ लोग यह सवाल कर सकते हंै कि क्या डा. लोहिया भी मुलायम सिंह यादव की तरह ही थे? याद रहे कि मुलायम सिंह यादव ने लोहिया के नाम पर उत्तर प्रदेश में अनेक स्मारक बनवाये हैं। बेहतर होगा कि वह और उनकी पार्टी की सरकार अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर ही स्मारक बनवाना अब शुरू कर दें। नेहरू-इंदिरा परिवार महात्मा गांधी से अधिक अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर ही स्मारक बनवा रहे हैं और सरकारी कार्यक्रम घोषित करवा रहे हैं। कांगेस पार्टी ने गांधी जी के चरित्र व विचार को ही कौन कहे, उनकी नीतियों उनके सपनों के भारत को भी भुला दिया है। यह एक अच्छी बात है। कम से कम आज के कांग्रेसियों को देखकर नई पीढ़ी यह सवाल तो नहीं करेगी कि क्या गांधी जी आज के कांग्रेसियों की तरह ही थे ?

क्या मुलायम सिंह यादव डा. लोहिया का नाम लेना अब भी बंद करेंगे जिन्होंने लोहिया की नीतियों को कूड़ेदान में डाल दिया है ?

सपा की ताजा सूची के अनुसार मुलायम सिंह यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव लोकसभा के लिए सपा उम्मीदवार होंगे। मुलायम सिंह, डिंपल यादव और धर्मेंद्र यादव मौजूदा लोकसभा के भी सदस्य हैं। अक्षय यादव राम गोपाल यादव के पुत्र हैं। राम गोपाल यादव राज्यसभा के सदस्य हैं। धर्मेंद्र मुलायम के भतीजे और डिम्पल पतोहू हैं।

   यदि मुलायम परिवार के चारों उम्मीदवार चुनाव जीत जाएं तो वह एक रिकार्ड होगा। नेहरू-इंदिरा परिवार के भी इतने सदस्य संभवतः एक साथ कभी दल, संसद व सत्ता के पद पर नहीं थे। हालांकि बारी-बारी से नेहरू-इंदिरा परिवार के जितने सदस्य विभिन्न पदों पर रहे, वह भी एक रिकार्ड ही है। पर वैसे भी केंद्र की राजनीति में गुंजाइश अधिक होती है।

एक राज्य का नेता होकर भी मुलायम सिंह ने राजनीति में परिवारवाद का इतना अधिक विस्तार किया है जो एक रिकार्ड है। उनकी इच्छा प्रधानमंत्री बनने की भी है। यह बात वह छिपाते भी नहीं हैं। पता नहीं अगले चुनाव में क्या होगा! खंडित जनादेशों के इस दौर में पता नहीं कौन कब प्रधानमंत्री बन जाए।

   यह बात सही है कि इस आजाद देश की राजनीति में परिवारवाद की शुरुआत जवाहर लाल नेहरू ने 1959 में इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनवा कर की थी। तब वह खुद प्रधानमंत्री थे। लालू प्रसाद ने जब बिहार में परिवारवाद शुरू किया तो वह कहा करते थे कि हमारा परिवार बिहार का नेहरू परिवार है। अब तो देश में हर जगह परिवारवाद की धूम है। परिवारवाद की सबसे बड़ी बुराई यह है कि उत्तराधिकरियों में गुण नहीं बल्कि सिर्फ वंश वृक्ष देखा जाता है। इससे राजनीति और शासन को भारी नुकसान पहुंचता है। कल्पना कीजिए कि कल राहुल गांधी इस देश के प्रधानमंत्री बन जाएं। फिर इस देश का क्या होगा जिन्हें न तो देश की समझ है और न ही राजनीति या प्रशासन की ? अब तक के उनके भाषणों और कामों से तो कांग्रेसियों को छोड़कर किसी और को उनमें उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती।

   इसी तरह कल्पना कीजिए कि मुलायम परिवार के अधिकतर सदस्य एक दिन देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठ जाएं। फिर क्या होगा ? उत्तर प्रदेश में आज क्या हो रहा है जहां उनके पुत्र अखिलेश यादव मुख्यमंत्री हैं ? उत्तर प्रदेश से आने वाले लोग कोई अच्छी बात नहीं बताते। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि राजनीति का परिवारवाद पता नहीं इस देश को कहा ले जाएगा!

इस पर अब मतदाताओं को ही विचार और फैसला करना होगा।

(जनसत्ता ः 17 नवंबर 2012 से साभार)



मंगलवार, 13 नवंबर 2012

भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का कठिन दौर


    भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों पर भी इस देश का लगभग पूरा राजनीतिक वर्ग  आरोपितों का इन दिनों अतार्किक ढंग से बचाव करता नजर आ रहा है। कोई दल या नेता अपनी कमी या गलती मानने को आज तैयार ही नहीं है। सुधरने का तो कहीं से कोई संकेत ही नहीं है। इससे भी भ्रष्टाचार की समस्या की गंभीरता का   पता चलता है।

    देश के  अधिकतर नेताओं के इस पर ताजा रुख से यह भी साफ है कि इस जानलेवा समस्या का हल दूर -दूर तक नजर नहीं आ रहा है। अगला चुनाव भी इसका कोई हल है, ऐसा फिलहाल नहीं लगता।वैसे भी पिछले अनुभव यही बताते हैं कि चुनाव अब मात्र राजनीतिक विकल्प दे रहे हैं न कि वैकल्पिक राजनीति प्रस्तुत कर रहे हैं।

  प्राप्त संकेतों और खबरों के अनुसार इस देश में चूंकि भ्रष्टाचार का मर्ज काफी  गहरा हो चुका है कि इसलिए इसे समाप्त करने की कौन कहे,कम करने में भी अभी काफी समय लगेगा।विभिन्न राजनीतिक दलों की इस मुददे पर घोषित और अघोषित  राय जानने के बाद यह साफ लगता है कि भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारियों के खिलाफ इस देश मंे लंबे,  कठिन और संघर्षपूर्ण  अभियान की जरूरत पड़ेगी। यह तो आजादी की लड़ाई की अपेक्षा भी अधिक कठिन लड़ाई प्रतीत हो रही है।

    कई चुनावी बुराइयों की मौजूदगी और उनमें वृद्धि  के साथ-साथ जातीगत और सांप्रदायिक  वोट बैंक की राजनीति के इस दौर में अगले किसी चुनाव नतीजे से अन्ना हजारे या फिर अरविंद केजरीवाल को किसी तरह की बेहतरी की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। इसलिए  अरविंद को चुनावी अभियान के साथ-साथ लंबे  और कठिनतर संघर्ष के लिए भी तैयार रहना चाहिए। क्योंकि निर्णायक जन जागरण में अभी और समय लग सकता है।

  भ्रष्टाचार की  समस्या पुरानी है। एक दिन में नहीं पैदा हुई। आजादी के तत्काल बाद ही इसका पौधरोपण हो चुका था। प्रथम प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू से जब किसी ने शासन में बढ़ते भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने को कहा तो उनका जवाब था कि इससे शासन में पस्तहिम्मती आएगी।

नेहरू खुद तो ईमानदार नेता थे, पर उनके कार्यकाल में भी आम तौर पर भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई तभी हो सकी जब सरकार ऐसा करने को मजबूर हो गई।इससे सदाचारियों में धीरे -धीरे पस्तहिम्मती बढ़ी और समय के साथ भ्रष्टाचारियों का हौसला बुलंद होता  गया।आज स्थिति यह हो गई है कि भ्रष्ट तत्व गुर्रा  रहे हैं और अरविंद केजरीवाल जैसों  पर आफत आ पड़ी है।

  भ्रष्टाचार को परोक्ष-प्रत्यक्ष सरकारी संरक्षण का इतिहास तो देखिए। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में यह खबर आई  थी कि सन् 1967 के आम चुनाव के समय एक दल को छोड़कर सारे प्रमुख भारतीय राजनीतिक दलों ने अपने चुनाव खर्चे के लिए विदेशों से नाजायज तरीके से पैसे लिये थे। किसी और एजेंसी या संस्था की जांच से नहीं, खुद भारत सरकार की खुफिया एजेंसी आई.बी. की एक जांच से यह पता चला था। पर उस रपट को तत्कालीन केंद्र सरकार ने दबा दिया। अगर तब इस पर कार्रवाई होती तो राजनीतिक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगता।

  पर, इस रपट का संक्षिप्त विवरण न्यूयार्क टाइम्स में छप गया ।तब लोक सभा में मांग उठी  कि उस रपट को सार्वजनिक किया जाए।पर गृह मंत्री वाई.बी.चव्हाण ने कहा कि उस ‘रपट के प्रकाशन से अनेक व्यक्तियों और दलों के हितों को हानि होगी।’यानी तब भी सरकार का यही रुख था कि भले देश का नुकसान हो जाए,पर व्यक्तियों व दलों का नहीं होना चाहिए।

आज भी तो इस देश में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच तभी हो पा रही है जब समय समय पर विभिन्न अदालतें इस काम के लिए सरकार को मजबूर कर दे रही हैं।इसके अलावा पक्का सबूत आने के बावजूद अनेक नेताओं के द्वारा यह कहा जा रहा है कि नेताओं के रिश्तेदारों के खिलाफ हमें कुछ नहीं बोलना चाहिए।यदि एक लाख करोड़ से अधिक का आरोप सामने आता है तो कहा जाता है कि सी.ए.जी. का आंकड़ा गलत है। पर,जब 71 लाख रुपये का आरोप आता है तो कहा जाता है कि एक केंद्रीय मंत्री के लिए यह तो एक छोटी राशि है। यानी वह इतने कम की चोरी क्यों करेगा ? यानी एक कें्रदीय मंत्री का रेट भी खुलेआम बताया जा रहा है। जब किसानों की सौ एकड़ जमीन को सत्ताधारी नेता से मिलकर हथियाने का आरोप लग रहा है तो भाजपा अध्यक्ष कह रहे हैं कि यह तो चिल्लर टाइप का आरोप है।आखिर इस देश के नेताओं को क्या हो गया है ?

   कभी जवाहर लाल नेहरू ने अपना आनंद भवन कांग्रेस पार्टी को दे दिया था। जनसंघ व भाजपा के भी कई पुराने नेताओं ने अपनी जमीन व मकान सार्वजनिक काम के लिए दान कर दिया। पर उसी दल के नेताओं पर आज आरोप लग रहा है कि वे जायज -नाजायज तरीके से अधिक से अधिक जमीन व संपत्ति के  मालिक बनने की होड़ में शामिल हो गये हैं। राजनीति कहां से चल कर कहां पहुंच चुकी है और आगे और कहां तक जाएगी ? राजीव गांधी ने 1984 में ही कहा था कि हम सौ पैसे दिल्ली से भेजते हैं ,पर उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं।इसे रोकने के लिए हमारे हुक्मरानों ने क्या किया ? उल्टे अब तो अनेक सत्ताधारी और अन्य  प्रभावशाली लोग  जनता की जेब से भी कहीं पैसे निकालते जा  रहे हैं तो कहीं जमीन हड़प कर  उससे निजी संपति बढ़ा रहे हैं।

यही सब देख समझ कर 2003 में ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार निरोधक कानून अपने उददेश्यों की प्राप्ति में बुरी तरह विफल रहा है।’

मार्च , 2007 में तो चारा घोटाले से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा कि ‘सब इस देश को लूटना चाहते हैं।इसलिए इस लूट को रोकने का एक ही उपाय है कि भ्रष्टाचारियों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान किया जाए।’

 इससे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त रहे जे.एम. लिंगदोह ने 2003 में कहा था कि राज नेता एक कैंसर हैं। हालांकि यह टिप्पणी कुछ ज्यादा ही तल्ख थी, फिर भी इस टिप्पणी को लेकर आत्म निरीक्षण करने के बदले सत्ताधारी भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष एम.वेंकैया नायडु ने कहा कि ‘ऐसी टिप्पणी से एक ऊंचे संवैधानिक पद की गरिमा कम होती है।’याद रहे कि  उससे पहले राजनीतिक दलों ने न सिर्फ चुनाव सुधार की कोशिश विफल कर दी थी और यही दर्शाया कि गंभीर चुनावी अनियमितताओं को दूर करने में भी राजनीति की मुख्य धारा की कोई रूचि नहीं रह गई है। इसे लिंगदोह ने करीब से अनुभव किया था।

   स्थिति बिगड़ती ही चली जा रही है और आज तो प्रमुख राजनीतिक दलों के नेतागण सार्वजनिक रूप से यह कह रहे हैं कि हम नेताओं के करीबी रिश्तेदारों के खिलाफ कोई टीका-टिप्पंणी नहीं करते।
जबकि पूरे देश में राजनीति पर  अब परिवारवाद बुरी तरह होवी है और अधिकतर नेताओं के परिजन सार्वजनिक हितों को नुकसान पहुंचा कर जायज -नाजायज तरीकों से अपार धन संपत्ति इकट्ठा करने  में दिन -रात लगे हुए हंै।

   जब तक अदालत  मजबूर न कर दे तब तक किसी भ्रष्ट नेता के खिलाफ आज कोई कार्रवाई नहीं हो पाती  है।जन लोकपाल या कारगर  लोकपाल कानून बनाने से मुख्य राजनीति ने साफ इनकार कर दिया है।

सी.बी.आई. के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह का अनुभव यह है कि ‘नेता-अफसर का गठजोड़ इतना मजबूत हो चुका है कि इसने स्वार्थवश शासन की सारी संस्थाओं को प्रभावहीन बना दिया है।दूसरे विकसित देशों में नाजायज काम कराने के लिए रिश्वत दी जाती है।पर हमारे देश में नियमतः मुफ्त में मिलने वाली  सरकारी सुविधाएं व सेवाएं हासिल करने के लिए भी जनता को रिश्वत देने को बाध्य होना पड़ता है।

   देश में भ्रष्टाचार की व्यापकता का हाल यह है कि गरीबों को जरूरी स्वास्थ्य व शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध कराने के नाम पर भी सरकारी-गैर सरकारी माफिया पाले-पोसे जा रहे हैं।

 वन व खनिज संपदा जैसे सार्वजनिक संसाधनों की सरकारी मदद से खुली लूट जारी है।जनता से करों के रूप में वसूले जा रहे पैसों में से हर साल लाखों करोड़ रुपये बड़े -बड़े कारोबारियों  को तरह तरह की रियायतोंं के रूप में सरकार दान कर रही है।दूसरी ओर संसाधनों की कमी का रोना रोकर सरकारें  देश के बड़े हिस्से में आजादी के छह दशक बाद भी विकास की किरण नहीं पहुंचा सकीं।गरीबी व अन्याय के कारण नक्सली बढ़ रहे हैं।सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के करीब 270 जिलों में नक्सलियों ने शासन को अप्रभावी बना  दिया है।
भ्रष्टाचार के कारण देश में अन्य कई समस्याएं भी बढ़ रही हैं।भुखमरी बढ़ रही है।किसान आत्म हत्या कर रहे हैं। सीमा पर खतरा मंड़रा रहा है।भीतर भी तरह तरह की अशांति है। महंगी और गरीबी के कारण अनेक युवा गलत हाथो ंमें पड़ रहे हैं।यह देश के बाहरी व भीतरी दुश्मनों के लिए अनुकूल स्थिति है।पर इसकी कोई चिंता हमारे अधिकतर हुक्मरानों में नहीं दिखती। देश की मूल समस्याओं का समाधान सरकारी संसाधनों के बिना नहीं होगा। संसाधन तब जुटेंगे जब वे भ्रष्टाचार में जाया होने  से रुकेंगे।पर इस काम में  देश की मुख्य धारा की मौजूदा राजनीति की कोई रूचि दिखाई नहीं पड़ती।हाल में भ्रष्टाचार के आरोपों पर उनकी प्रतिक्रियाओं से यह साफ है कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं।

  चाणक्य ने कहा था कि ‘जब किसी देश के नागरिक सताए जाते हैं , ,उनके साथ दुव्यवहार होता  है,गरीब परेशान और बिखरे हुए होते हंै ,तभी उस देश पर दुश्मन देश को आक्रमण का मौका मिलता है ताकि वे वहां के असंतुष्ट लोगों को तोड़ सके।’

  आज भारत में गरीबों के साथ,जिनकी संख्या कुल आबादी का करीब तीन-चैथाई  हैं, क्या हो रहा है ? उनके कल्याण के लिए संसाधन को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने से बचाने  की चिंता किस दल में है ? इसके लिए सर्वदलीय चिंता या फिर  सहमति क्यों नहीं है ?

  उल्टे जब कैंसर की तरह राज्य-व्यवस्था के रोम -रोम में फैले भ्रष्टाचार और उसमेंें उच्चस्तरीय संलिप्तता के सबूत  सामने लाएं जाते हैं तो यह कहा जा रहा है कि इससे लोकतंत्र में जनता की आस्था कमजोर होगी।व्यक्तिगत आरोप लगाना  ठीक नहीं है। दूसरी बड़ी समस्याएं उठानी चाहिए।

 यानी कुछ नेताओं के अनुसार  लोकतंत्र को भ्रष्टाचार से नहीं बल्कि उसकी चर्चा से खतरा है। जिस देश को ऐसे नेताओं से पाला पड़ा हो,वहां भ्रष्टाचार विरोधियों की लड़ाई आसान नहीं है। क्या यह सिर्फ एक चुनाव के बूते की बात है ? हां, यह कहना जरूरी है कि सभी नेता भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं है।अनेक पाक साफ भी  हैं।पर उनकी आज कोई नहीं सुन रहा है।

(जनसत्ता में 22 अक्तूबर 2012 को प्रकाशित)
 


शनिवार, 2 जून 2012

नरसंहारों के पीछे की राजनीति


  
बिहार में सन् 1971 से 1989 तक कुल 16 ऐसे नरसंहार हुए थे जिनमें दस या उससे अधिक लोग मारे गये। इसी तरह सन् 1990 से 2004 तक कुल 15 ऐसे नरसंहार हुए जिनमें दस या उससे अधिक लोग मारे गये।

सन 2005 और 20012 के बीच ऐसा नरसंहार सिर्फ खगड़िया में हुआ जिसमें 2009 में 16 लोगों की जानें गईं। सत्ता बदलने के बाद आखिर नरसंहारों का दौर लगभग थम क्यों गया ?

इस बीच की सत्ता के स्वरूप पर विचार करने पर कुछ खास बातें सामने आती हैं। इससे नरसंहारों पर कंट्रोल करने का फार्मूला भी निकलता है। ये आंकड़े बताते हैं कि धुआंधार नरसंहारों के पीछे राजनीतिक व प्रशासनिक इच्छा शक्ति की कमी थी। या फिर हत्यारों से कतिपय नेताओं की मिलीभगत थी।

ये आरोप सच मालूम पड़ते हैं। याद रहे कि 1971 से 1989 तक तीन साल को छोड़ कर आमतौर पर बिहार में कांग्रेस की ही सरकार रही। 1990 से 2000 तक लालू प्रसाद -राबड़ी देवी की सरकारें थीं और 2000 से 2005 तक राजद और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार थी। सन 2005 में नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली। सन 2000 में बिहार से झारखंड अलग हो गया। उससे पहले उपर्युक्त अवधि में नरसंहार की सिर्फ चार घटनाएं झारखंड इलाके में हुई थीं।

खगड़िया जिले के अमौसी में हुए नरसंहार के मुकदमे का फैसला गत 14 फरवरी 2012 को आया जिसमें निचली अदालत ने दस अपराधियों को मृत्युदंड दिया और 4 को आजीवन कारावास की सजा दी। ऐसे नरसंहारों में कम समय में अदालती फैसले का संभवतः बिहार में यह एक रिकार्ड है।

बिहार में नरसंहार करने वाले गिरोहों में भूमि सेना, लाल सेना, लोरिक सेना, सनलाइट सेना, रणवीर सेना, सवर्ण लिबरेशन फ्रंट और ब्रहमर्षि सेना प्रमुख रहे। एक जमाने में इनकी तूती बोलती थी। इनमें से लाल सेना को छोड़ कर बाकी सब भूमिपतियों के हितों की रक्षा के लिए बने थे। अब इनका कहीं अता -पता नहीं है। लेकिन जब ये सक्रिय थे तो इनका लाभ विभिन्न राजनीतिक दल उठाते थे।

क्योंकि नरसंहारों के कारण समाज दो परस्परविरोधी हिस्सों में बंट जाया करता था और चुनाव आने पर एक पक्ष एक दल को और दूसरा पक्ष दूसरे दल को वोट देता था। इस तरह नरसंहारों से बैठे-बिठाये वोट बैंक तैयार हो जाते थे। जाहिर है कि उसके बदले में नेतागण उन लोगों को मुकदमे में बचाए जिनपर नरसंहार के आरोप लगे होते थे। इससे हत्यारों का मनोबल बढ़ता था। उन्हें लगता था कि कोई भी अपराध करके वे बच सकते हैं। इस कारण नरसंहार रुकते नहीं थे।

अनेक मामलों में तो नरसंहारों के पीछे राजनीतिक नेताओं के निजी हित भी निहित होते थे। नरसंहार आम तौर पर जमीन, मजदूरी और मान- सम्मान को लेकर होते थे।

राज्य का सबसे बड़ा और पहला नरसंहार 1971 में पूर्णिया जिले के रूपसपुर चंदवा में हुआ था। वहां 14 आदिवासी मारे गये थे। उस केस में जिन लोगों को सजा हुई थी, उनमें बिहार विधानसभा के एक पूर्व स्पीकर भी थे। यह झगड़ा जमीन को लेकर था। 1987 में औरंगाबाद जिले के दलेल चक बघौरा में माओवादी कम्युनिस्ट केंद्र यानी एम.सी.सी. के हथियारबंद दस्ते ने 54 भूमिपतियों व उनके समर्थकों की हत्या कर दी।

यह झगड़ा एक कांग्रेसी नेता की जमीन-लोलुपता के कारण शुरू हुआ था जो इतने बड़े नरसंहार में बदल गया। उस नेता ने एक मठ के महंत से एक ऐसी विवादास्पद जमीन खरीद ली थी जिस पर एम.सी.सी. समर्थित मजदूर बटाई पर खेती करते थे। जमीन हदबंदी कानून से बाहर की थी और कानूनन उसपर गरीबों का ही हक होना चाहिए था। नेता जी ने उन बटाईदारों को उस जमीन से जबरन बेदखल करना चाहा। इसको लेकर हिंसा -प्रतिहिंसा हुई और अनेक लोगों की जानें गई। पर दलेल चक बघौरा कांड के बाद तत्कालीन राज्य सरकार ने जब उस जमीन को भूमिहीनों में बांट दिया तो वहां एम.सी.सी. भी कमजोर हो गया और नेता जी की जमीन की भूख भी मर गई। पर इस कांड को लेकर उस जिले में जो तनाव पैदा हुआ, उसका लाभ बाद में उस नेता जी को मिला जो आसानी से चुनाव जीत गये।

यानी चुनाव जीतने के लिए बिहार के अनेक स्थानों में नेताओं ने नरसंहारों को वरदान माना।

इसलिए नरसंहार की जड़ को समाप्त करने की तब कभी गंभीर कोशिश सरकार की तरफ से नहीं हुई। दलेल चक बघौरा कांड जिस जमीन को लेकर हुआ, उस जमीन के मामले को प्रशासन ने समय पर सुलझा दिया होता तो 54 लोगों की जानें नहीं जातीं। आखिर वह काम हुआ, पर दर्जनों जानें लेने के बाद।

आज भी बिहार में जमीन का मामला बड़ा जटिल है जिसे सुलझाना बाकी है। पर इस बीच प्रशासनिक और पुलिसिया उपायों और राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण नरसंहारों पर काबू पाया जा सका है। इसके साथ ही सांप्रदायिक दंगे भी बिहार में अब नहीं हो रहे हैं जो राज्य कभी भागलपुर जैसे बड़े दंगों के लिए देश भर में चर्चित हुआ था।

नीतीश कुमार के नेतृत्व में 2005 में गठित सरकार ने आपराधिक मुकदमों को त्वरित अदालतों के जरिए तेजी से निपटाया। लालू-राबड़ी के जंगल राज की समाप्ति के मुद्दे पर ही नीतीश कुमार को जनादेश मिला था। अब तक करीब 70 हजार अपराधियों को निचली अदालतों से सजा हो चुकी है। इनमें जातीय आम अपराध, नरसंहार, नक्सली हिंसा-प्रति हिंसा और सांप्रदायिक दंगों के दोषी शामिल हैं। अब सब तरह के नरसंहारों के अपराधियों को ऐसा लग रहा है कि नरसंहार करने पर आम तौर पर कोई उन्हें बचाने वाला नहीं होगा। इसलिए बड़े कांड नहीं हो रहे हैं। ऐसा नहीं है कि कानून -व्यवस्था के मामले में बिहार में कोई राम-राज आ गया है। पर पहले से स्थिति बेहतर है। इसके विपरीत कांग्रेस राज की अपेक्षा लालू  -राबड़ी राज में कानून व्यवस्था की स्थिति काफी बिगड़ चुकी थी। उन दिनों भाजपा आरोप लगाती थी कि लालू प्रसाद की माओवादियों से सांठगांठ है और लालू प्रसाद आरोप लगाते थे कि रणवीर सेना के भाजपा का संरक्षण हासिल है।

1986 में हुए अरवल नरसंहार में पुलिस ने 24 गरीबों को गोलियों से भून दिया था। वे लोग नक्सली संगठन से जुड़े एम.के.एस.एस. के झंडे तले अपने वाजिब हक की मांग के समर्थन में आमसभा कर रहे थे। उनकी मांग थी कि अरवल बाजार की उस जमीन पर बगल के भूमिहीनों का ही दखल कब्जा हो जिन्हें एक न्यायपक्षी एस.डी.ओ. व्यास जी ने पहले बासगीत का पर्चा दे दिया था। पर बाद में उसी जमीन को एक भूमिपति को प्रशासन ने दे दिया।

उन गरीबों को न्याय दिलाने की जगह पुलिस ने नरसंहार कर दिया और ऐसा जघन्य काम करने वाले एस.पी. का कुछ नहीं बिगड़ा। क्योंकि प्रशासन बंटा हुआ था और नेता ऐसे विवादों पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे थे। तब के मुख्यमंत्री ने कहा था कि नक्सली चोर -डकैत से अधिक कुछ नहीं हैं। जबकि उनकी ही सरकार ने अपने नोट में लिखा था कि नक्सली समस्या सामाजिक-आर्थिक समस्या है और इसका समाधान सिर्फ पुलिस बल से नहीं हो सकता है।

सिवान की कहानी भी कुछ इसी तरह की है जहां लालू-राबड़ी राज में आये दिन हत्याएं होती रहती थीं। राज्य के अन्य स्थानों की तरह ही वहां भी गरीब मजदूरों को भूमिपतियों द्वारा शोषण से प्रशासन ने नहीं बचाया। वहां माले सक्रिय हुआ। माले ने गरीबों का पक्ष लिया। उसके जवाब में मोहम्मद शहाबुद्दीन भूमिपतियों की तरफ से उठ खड़े हुए। दोनों पक्षों की ओर से वर्षों से हिंसा -प्रति हिंसा होती रही। समाज में आपसी तनाव बढ़ा। इससे वोट का ध्रुवीकरण हुआ। एक तरफ शहाबुद्दीन विजयी होते रहे और दूसरी तरफ माले के सदस्य। अब वहां इनमें से कोई नहीं जीत रहा है। हत्याओं का दौर भी लगभग बंद ही है। इसलिए कि कानून के शासन का लोगों को आभास होने लगा है। अब अनेक तरह के हिंसक तत्वों व अपराधियों को यह लग रहा है कि अपराध करके वे आम तौर पर बच नहीं सकते। अपवाद की बात कुछ और है।

सन्  1981 में मध्य बिहार के जहानाबाद जिले के परसबिगहा में ग्यारह दलित उनके घरों में जिंदा जला दिये गये थे। झगड़ा जमीन का ही था। मुकदमा चला। कुछ नेताओं ने जिनमें बिहार के एक पूर्व मंत्री भी शामिल थे, आरोपी के पक्ष में कोर्ट में यह गवाही दी कि घटना के समय आरोपी हमारे साथ था। पर कोर्ट ने उस गवाही को झूठ माना।  

सन 1977 में बेलछी नरसंहार उस समय हुआ जब बिहार में राष्ट्रपति शासन था। उस कांड में कमजोर वर्ग के 11 लोग मार दिये गये थे। इंदिरा गांधी ने बेलछी का दौरा किया था। बेलछी कांड के बाद वहां जातीय तनाव बढ़ा था। उस कांड के एक आरोपी उस तनाव का लाभ उठाकर बिहार विधानसभा के सदस्य भी चुन लिये गये थे। यानी जो नरसंहार आसानी से चुनाव जितवाये, उसे जारी रखने में अनेक लोगों का निहितस्वार्थ हो जाता है। वैसे भी भूमि सुधार के लिए तरसते बिहार में संपन्न लोगों का स्वार्थ आए दिन कमजोर वर्ग के लोगों से टकराता रहता है। जमीन के आपसी झगड़े को निपटाने के लिए नीतीश सरकार एक कड़ा कानून बनाने जा रही है। सरकार ने पाया है कि आज भी अधिकतर हत्याएं जमीन विवाद को लेकर ही हो रही हैं। पर भूमि सुधार का काम एक ऐसा नाजुक मसला है जिसपर नीतीश कुमार अभी हाथ डालना नहीं चाहती।

भूमि सुधार की मांग पर सरकारी पक्ष कहता है कि बिहार में पहले कानून के शासन को और अधिक मजबूत करना है और आम विकास और राहत के काम और भी तेज करने हैं। यदि भूमि सुधार जैसे जटिल मामले में यह सरकार फंस जाएगी तो अगले चुनाव में इस सरकार के गिरने और एक बार फिर जंगल राज के लौटने का खतरा है। वैसी स्थिति में न तो भूमि सुधार या विकास हो पाएगा, बल्कि एक बार फिर कानून -व्यवस्था चौपट हो जाएगी।

सबके अपने- अपने तर्क हैं। शांतिप्रिय लोगों को राहत जरूर है कि नरसंहार नहीं हो रहे हैं। गत पांच -छह वर्षों में वोट पाने के दूसरे शांतिपूर्ण तरीके आजमाए गये हैं और आजमाए जा भी रहे हैं। वे सफल भी हुए हैं।

पर बथानी टोला नरसंहार में आरोपितों की हाईकोर्ट से रिहाई पर अनेक लोग परेशान हैं। इस कांड में निचली अदालत ने सजा सुनाई थी। अब यह बात कही जा रही है कि पुलिस ने केस को जानबूझ कर इतना कमजोर बना दिया था कि हाईकोर्ट ने सबूत को पर्याप्त नहीं माना।

अब राज्य सरकार इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। पर इसको लेकर इस कांड के एक आरोपी ने कहा है कि सरकार को अपील नहीं करनी चाहिए क्योंकि ज्वाला सिंह हत्याकांड में सरकार ने अपील नहीं की थी।

भोजपुर जिले के एक प्रखंड प्रमुख ज्वाला सिंह की हत्या का आरोप माले के एक नेता पर लगा था। निचली अदालत ने माले नेता को रिहा कर दिया। पर सरकार ने उस निर्णय के खिलाफ ऊपर की अदालत में अपील नहीं की। इसे दोहरा मापदंड माना गया। ऐसे दोहरे मापदंडों से असंतोष व तनाव बढ़ता है।


(इस लेख का संपादित अंश द पब्लिक एजेंडा: 31 मई 2012: में प्रकाशित)









नेता अभिमुख या देश अभिमुख राष्ट्रपति ?



मन के लायक राष्ट्रपति या देश के लायक राष्ट्रपति? विभिन्न दलों द्वारा अपने अनुकूल राष्ट्रपति बनाने की कोशिश इस देश में 1950 से ही जारी है। सन् 1950 मेें देश में संविधान लागू हुआ और डा. राजेंद्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति बने जो 1962 तक उस पद पर रहे।

लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री और देश के लोकप्रिय नेता जवाहर लाल नेहरू यह चाहते थे कि सी. राजागोपालाचारी राष्ट्रपति बनें न कि डा. राजेंद्र प्रसाद। राजा जी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था। यह बात उनके खिलाफ जाती थी। तीन उच्चत्तम पदों पर सामाजिक संतुलन का भी सवाल था। सरदार पटेल ने राजा जी के नाम का सख्त विरोध किया और डा. राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनवा दिया। एक लोकतांत्रिक नेता के रूप में जवाहर लाल नेहरू ने आधे मन से यह स्वीकार भी कर लिया।

  पर, आश्चर्य की बात यह थी कि समाजवादी विचारधारा के जवाहर लाल जी ने कैसे एक घनघोर पूंजीवाद समर्थक राजा जी के नाम पर जिद कर ली थी। एक समय तो यह भी आया था कि जब कांग्रेस की एक महत्वपूर्ण बैठक में जवाहर लाल जी ने धमकी तक दे डाली थी कि यदि राजा जी को नहीं बनाया गया तो वे प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे।

   पर उनकी धमकी काम नहीं आई। दरअसल पंडित नेहरू की चिंता अपने मन के राष्ट्रपति बनाने की थी ताकि राजपाट किसी बिघ्न बाधा के चलता रहे। हालांकि भारतीय संविधान में भारत के राष्ट्रपति के पद को करीब- करीब शोभा के पद का दर्जा दिया गया है। उससे थोड़ा ही अधिक। पर संविधान का कार्यान्वयन किस रूप में होता है। आने वाले वर्षों में चीजें किस तरह विकसित होती हैं, इसको लेकर कुछ नेताओं को आजादी के तत्काल बाद कुछ आशंकाएं रही होंगी। इसीलिए किसी अनहोनी को रोकने के लिए यह स्वाभाविक ही था कि कोई प्रधानमंत्री अपने मन लायक राष्ट्रपति चुनवाने की कोशिश करे।

   यह प्रवृति बाद के वर्षों में बढ़ी। आज कुछ और भी ज्यादा है। क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता व उथल पुथल के दौर में राष्ट्रपति का प्रधानमंत्री के पक्ष में खड़ा होना प्रधानमंत्री के लिए जरूरी माना गया।

सन् 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को यह लगा होगा कि जिन नीतियों को वह लागू करना चाहती हैं, उनके समर्थन के लिए उनके अनुकूल राष्ट्रपति जरूरी है। इसीलिए उन्होंने वी.वी. गिरि को राष्ट्रपति बनवा दिया। ऐसा उन्होंने पार्टी से विद्रोह करके किया। बाद में कांग्रेस पार्टी में महाविभाजन भी हुआ। अविभाजित पार्टी की बैठक में तो इंदिरा गांधी ने नीलम संजीव रेडड्ी की उम्मीदवारी पर अपनी मुहर लगाई, पर बाद में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार गिरि को जितवा दिया। इसका राजनीतिक लाभ भी उन्हें मिला। जो प्रगतिशील नीतियां वे लागू करना चाहती थीं, उस काम में उन्हें वी.वी. गिरि का सहयोग मिला। सन् 1975 में आपातकाल लागू करने के समय तो फखरूद्दीन अली अहमद जैसे अत्यंत अनुकूल राष्ट्रपति की भारी जरूरत इंदिरा गांधी को थी। आपातकाल की अधिसूचना पर राष्ट्रपति का दस्तखत पहले हुआ और उस पर कैबिनेट की मुहर बाद में लगी।

खैर वे तो कम उथल पुथल के दिन थे। कम से कम तब तो एक ऐसा कैबिनेट होता था जो प्रधानमंत्री की उचित-अनुचित इच्छा पर तुरंत मुहर लगा देता था। पर आज की मिलीजुली सरकारों के दौर में कोई प्रधानमंत्री अपने कैबिनेट से हर हाल में ऐसी उम्मीद नहीं कर सकता है। राजनीतिक अस्थिरता के इस दौर में राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

   सन् 2014 का लोकसभा चुनाव सामने है। अभी देश के जैसे राजनीतिक हालात हैं, उसमें कोई राष्ट्रीय दल अकेले बहुमत पाने की उम्मीद नहीं कर सकता। फिर तो पहला मौका मंत्रिमंडल के गठन के लिए किसी दल या गठबंधन के नेता को बुलाने का आएगा। सन् 1996 में एक राजनीतिक हादसा हो चुका है। तत्कालीन राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा ने अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी थी जबकि उन्हें लोकसभा में बहुमत का समर्थन हासिल नहीं था और न होने की संभावना थी। इसलिए तेरह दिनों तक ही वे प्रधानमंत्री पद पर बने रह सके।

  किसी राष्ट्रपति या राज्यपाल को यह देखना चाहिए कि जिस व्यक्ति को वह सरकार बनाने के लिए बुला रहे हैं उसे सदन के बहुमत का समर्थन हासिल है भी या नहीं। सिर्फ इससे काम नहीं चलेगा कि कोई व्यक्ति सबसे बड़े दल का नेता चुनाव गया है। पर इस सामान्य नियम का उलंघन होता रहा है।

   अगले लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर ऐसी नौबत आ सकती है। तब यदि राष्ट्रपति के पद पर कोई न्याय और संविधानप्रिय व्यक्ति नहीं बैठा हो तो किसी अल्पमत के नेता को प्रधानमंत्री बनने के बाद खरीद-फरोख्त करके बहुमत जुंटाने का मौका मिल सकता है। फिर इस देश का क्या होगा? जब खरीद-फरोख्त से सरकार बनेगी तो वह चलेगी भी उसी तरीके से।

 इसलिए अगला राष्ट्रपति किसी ऐसे व्यक्ति को ही होना चाहिए जो ऐसे मामले में वास्तविक स्थिति को देख कर यानी बहुमत की जांच करके निर्णय करे न कि अपनी इच्छा के अनुसार जिसे चाहे शपथ ग्रहण करा दे। ऐसा व्यक्ति मिलना जरा कठिन होता है, पर असंभव नहीं। आज इस देश की राजनीति में गिरावट के जो हालात हैं, उसमें यह लगता है कि कोई प्रमुख दल निष्पक्ष ढंग से काम करने वाले ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति नहीं बनाएगा। पर, किसी ऐसे -वैसे व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाने के जो खतरे हैं, उसकी ओर देश का ध्यान दिला देना जरूरी है।

   भले संविधान में राष्ट्रपति को कोई खास अधिकार प्राप्त नहीं है, पर विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

 आने वाले समय राजनीतिक व आर्थिक दृष्टि से देश की हालत उथल पुथल वाले होंगे, ऐसी संभावना जाहिर की जा रही है। अधिकतर दलों व नेताओं के अपने अपने स्वार्थ जग जाहिर हैं। अधिकतर लोगों की नजर में देश बाद में और दल व निजी हित पहले है। गठबंधन की सरकारों के दौर में प्रधानमंत्री अक्सर निस्सहाय नजर आते हैं। केंद्र सरकार में कोई कमी रह गई या फिर कोई गलती हो गई तो प्रधानमंत्री तुरंत कह देते हैं कि यह तो गठबंधन सरकार की मजबूरी है।

कई बार इस कारण देश ही नहीं पूरी दुनिया में भारत सरकार की स्थिति अजीब दिखाई पड़ने लगती है। ऐसी स्थिति में किसी ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाना और भी जरूरी है जिसमें नैतिक धाक हो और समय पर सरकार को उचित सलाह दे। क्या ऐसा हो पाएगा ? यदि ऐसा हो जाता तो अनौपचारिक तौर पर ही सही, पर सरकार के लिए यदा -कदा जरूरत पड़ने  पर अधिकार विहीन अभिभावक व सलाहकार की भूमिका निभाता। वैसी नौबत आ सकती है जो देश के हालात बनते जा रहे हैं। ऐसा भी हो सकता है कि कोई भी अगला राष्ट्रपति इस बात का ध्यान रखे कि देश सही दिशा में आगे बढ़े और संविधान व कानून का शासन कायम हो। अभी तो कई बार यह लगता है कि देश में कानून व संविधान का शासन नहीं है।

राष्ट्रपति को संविधान ने यह अधिकार जरूर दिया है कि वह संसद के दोनों
सदनों को संदेश भेज सकते हैं। यदि कोई सरकार अपने कर्तव्यों को भूल कर कोई ऐसा कदम उठाए जो देशहित में नहीं हो तो वैसी आपात स्थिति में राष्ट्रपति संसद को संदेश भेज सकते हैं। किसी नैतिक धाक वाले राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए उस संदेश से कम से कम देश को यह तो पता चलेगा कि कहां गलत या कहां सही हो रहा है। भले सरकार उनके संदेश की उपेक्षा करे। या यह भी हो सकता है कि गठबंधन की मजबूरी का रोना रोने वाले प्रधानमंत्रियों के इस दौर में राष्ट्रपति के किसी निर्दोष हस्तक्षेप को आधार बना कर ही शायद सरकार कुछ अच्छे काम कर दे। या फिर किसी गलत कदम को रोक दिया जाए।

   सीमित अधिकारों के बावजूद कई बार राष्ट्रपतियों  राष्ट्रपतियों ने आजादी के बाद से ही सरकार के रूटीन कामों में हस्तक्षेप किया है। यह संवैधानिक व्यवस्था है कि संसद में पारित कोई विधेयक तब तक कानून नहीं बन सकता जब तक कि राष्ट्रपति का उस पर दस्तखत नहीं हो जाए। कई बार राष्ट्रपतियों ने विवादास्पद विधेयक पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया है। हालांकि इस मामले में भी राष्ट्रपति को सीमित अधिकार है। पर, एक बार इनकार की खबर और इनकार के कारणों की सूचना देश को मिल जाएगी तो उसका जन मानस पर सकारात्मक असर पड़ेगा। पर इसके लिए जरूरी है कि राष्ट्रपति पद पर बैठा व्यक्ति विवेकवान हो।

  कम से कम राष्ट्रपति के पद को किसी जातीय, क्षेत्रीय या सामाजिक कोटे से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके लिए बहुत सारे अन्य पद इस देश में उपलब्ध हैं। वे पद अधिक अधिकार वाले भी हैं। अभी प्रतिभा सिंह पाटील महामहिम राष्ट्रपति हैं। जब वह बनी थीं तो कहा गया था कि इससे महिलाओं का सम्मान बढ़ेगा, उनपर जुल्म कम होगा और उनका सशक्तीकरण होगा। पर क्या ऐसा हुआ? कोई नहीं कहेगा कि प्रतिभा पाटील के राष्ट्रपति बनने से देश की महिलाओं के जीवन में कोई फर्क आया है। यही बात अन्य समुदायों, जातियों व क्षेत्रों का भी है। उनके राष्ट्रपति पद पर पहुंचने से क्या हुआ?  मुस्लिम समुदाय से आने वाली तीन हस्तियां अब तक राष्ट्रपति बन चुकी हैं। इससे क्या फर्क पड़ा मुस्लिम समुदाय की दशा-दिशा पर ? सच्चर समिति की रपट बताती है कि कोई फर्क नहीं पड़ा। सबसे लंबे समय तक डा. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति रहे। वह बिहार के थे। आज बिहार देश के सबसे पिछड़े प्रदेशों में है।

  इसलिए लिंग, जाति या समुदाय के बदले व्यक्तियों के व्यक्तित्व पर ध्यान देने की आज अधिक जरूरत है चाहे वे किसी वर्ग से आते हों। क्योंकि देश के सामने नाजुक समस्याएं आने वाली हैं, ऐसी आशंका जाहिर की जा रही है। उस समस्या के मुकाबले के लिए न सिर्फ प्रधानमंत्री के पद पर बल्कि राष्ट्रपति के पद पर भी ऐसे व्यक्ति होने चाहिए जो व्यक्ति या दल की ओर देख कर निर्णय नहीं करे बल्कि देश और देशवासियों की ओर देख कर फैसले करें। ऐसे व्यक्ति मिल जाएंगे, यदि ईमानदारी से उसकी तलाश हो।

यह जरूरी है। या जो भी व्यक्ति उस पद पर आने वाले दिनों में बैठें, वे अन्य बातों को भूल कर सिर्फ देश और जनता का ध्यान रखें न कि आपातकाल के समय के राष्ट्रपति की तरह सरकार का रबर स्टाम्प बनें।

(इसका संपादित अंश हिंदी पाक्षिक द पब्लिक एजेंडा :  31 मई 2012: में प्रकाशित) 

शुक्रवार, 25 मई 2012

भाजपा के गले की हड्डी बने येदियुरप्पा

 कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा भारतीय जनता पार्टी के गले की हड्डी बन गये हैं। जातीय वोट बैंक के आधार पर राजनीतिक ताकत पाये इस देश के अन्य नेताओं की तरह येदियुरप्पा भी अपने राज्य में अपनी मर्जी चलाना चाहते हैं। उधर माया और राम के बीच डोलती भाजपा को  इस मामले में न माया मिलेगी और न राम। अभी तो यही लगता है।

     भ्रष्टाचार को लेकर भाजपा नेतृत्व के दोहरे चरित्र के कारण ही येदियुरप्पा जैसे नेताओं को विद्रोह करने के लिए बल मिलता है। इस मामले में येदियुरप्पा की यह टिप्पणी आंशिक रूप से ही सही है कि ‘सोनिया गांधी का नेतृत्व भाजपा से बेहतर है, क्योंकि कांग्रेस में कोई गलती करे तो पार्टी उसका साथ देती है, पर भाजपा में उसे छोड़ दिया जाता है।
 
 बंगारू लक्ष्मण के मामले में भी भाजपा ने उन्हें तब छोड़ा जब कोर्ट ने हाल में उन्हें सजा दे दी। अन्यथा दल की राष्ट्रीय कार्यसमिति से बंगारू ने पहले ही इस्तीफा दे दिया होता। कोर्ट की सजा के बाद तो आम जनता भी आम तौर पर अपने पुराने नेताओं को छोड़ने लगती है।

  बंगारू जी जब एक लाख रुपये रिश्वत लेते हुए कैमरे पर पकड़े गये थे तब तो पार्टी प्रवक्ता विजय कुमार मल्होत्रा ने कहा था कि उन्होंने अपने लिए नहीं बल्कि पार्टी फंड के लिए वे पैसे लिये थे। भाजपा ने अगले चुनाव में बंगारू की पत्नी को टिकट भी दे दिया था। दिलीप सिंह जू देव के साथ भी पार्टी ने कुछ नहीं किया, जिन्हें लोगों ने अपने टी.वी. सेट पर कहते हुए सुना था कि पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा कसम खुदा से कम भी नहीं।

   यदि भाजपा ने इससे पहले भी भ्रष्टाचार के आरोपितों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया होता तो येदियुरप्पा का मनोबल नहीं बढ़ता। जब किसी अधिक वजन के बोरे के कारण कोई नाव डूबने लगती है तो होशियार नाविक अन्य सामान व सवारियों को बचाने के लिए उस बोरे को बीच नदी में पानी में फेंक देता है। पर भाजपा सहित इस देश के कुछ दलों के साथ दिक्कत यह है कि वे इस रणनीति का अनुसरण करते हैं कि भले पूरी नाव डूब जाए, पर अवांछित सामान को भी ढोये जाना है।

  ऐसा हो भी क्यों नहीं ? कई बार राजनीतिक बोझोें को उठाये रखने में राजनीतिक व आर्थिक फायदे भी तो होते हैं। हालांकि वे अततः क्षणिक ही साबित होते हैं।

 अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने येदियुरप्पा के खिलाफ के आरोपों की जांच सीबी.आई. से कराने का आदेश दे दिया, तब वे चाहते हंै कि कर्नाटक में उनके मन मुताबिक का मुख्यमंत्री बनें। सन 1997 में इसी तरह की परिस्थितियों में लालू यादव ने अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनवाया था। सन 2000 के चुनाव में लालू को बिहार विधानसभा में बहुमत नहीं मिला। वह तो कांग्रेस थी जिसने लालू के दल के साथ मिलकर राबड़ी देवी की सरकार फिर बनवा दी अन्यथा राजद तभी सत्ता से बाहर हो जाता। सत्ता से बाहर होने का यह काम हुआ 2005 में। कांग्रेस ने 1997 में कहा था कि भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए वह राजद के साथ बिहार में मिलकर सरकार बना रही है। पर कांगेेस न तो भाजपा को सत्ता में आने से रोक सकी और न ही अगले चुनावों में अपनी पार्टी की इज्जत बचा सकी।

   दरअसल नीति -सिद्धांतांे के बदले जातीय वोट बैंक के आधार पर राजनीतिक ताकत बढ़ाने वाले येदियुरप्पा पर भाजपा अपना दांव खेलेगी तो वही होगा जो आज कर्नाटक में हो रहा है।

 दलीय सिद्धांत, सुशासन, सर्वजन कल्याण और राजनीतिक शुचिता के आधार पर जब कोई पार्टी संगठित होगी तो येदियुरप्पा जैसा कोई वोट का ठेकेदार पैदा नहीं होगा। भाजपा के साथ- साथ अन्य दलों के लिए भी यह एक सीख है। हालांकि ऐसे जातीय -सह-राजनीतिक महंत को भी भ्रष्टाचार के आरोप में जब कोई अदालत सजा दे देती है तो उसका प्रभाव उस जाति में भी कम होने लगता है। अभी तो आरोप लगे हैं, इसके बावजूद कर्नाटक से यह खबर आ रही है कि येदियुरप्पा का लिंगायतों के बीच भी पहले जैसा दबदबा नहीं है।

  यदि भाजपा ने येदियुरप्पा के मामले में कछुए की तरह कभी मुंह बाहर और कभी मुंह भीतर किया तो उसे न सिर्फ सन 2013 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में ,बल्कि सन 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

   अगर इसके विपरीत कर्नाटक में सत्ता गंवाने की कीमत पर भी भाजपा ने येदियुरप्पा से किसी तरह का समझौता करने से इनकार कर दिया तो उसका राजनीतिक लाभ भाजपा को लोकसभा चुनाव में पूरे देश में मिल सकता है।
 ऐसे भी यदि कांग्रेस की गलतियों का लाभ उठाकर 2014 में भाजपा केंद्र में सत्ता में आ ही गई तो वह येदियुरप्पा जैसे नेताओं को पाल पोस और अपने दाये-बाएं रखकर देश में कौन सा अच्छा काम कर पाएगी। येदियुरप्पा से निबटते समय भाजपा यह भूल रही है कि अभी देश में भ्रष्टाचार विरोधी माहौल है और भ्रष्टाचार के आरोप से सने नेताओं के प्रति कोई भी कमजोरी भाजपा को महंगी पड़ सकती है। जिस तरह भाजपा ने येदियुरप्पा को सी.एम.पद से हटाया, उसी तरह उसे अब येदियुरप्पा को साफ -साफ यह कह देना चाहिए था कि अब आप सी.बी.आई. और कोर्ट से स्वच्छता प्रमाण पत्र ले लेने के बाद ही कर्नाटक भाजपा के कामों में हस्तक्षेप करेंगे। कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने भी कहा है कि येदियुरप्पा के खिलाफ  आरोप गंभीर हैं। पर क्या येदियुरप्पा से यह कहने का नैतिक साहस आज भाजपा में है ? क्या भाजपा एक भारी बोरे को बचाने के चक्कर में नाव को ही डूबो देगी? यह अब उसे ही तय करना है।

(जनसत्ता: 16 मई 2012:से साभार)
 
  

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

काटजू उवाच - नब्बे प्रतिशत भारतीय बेवकूफ

  भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष की टिप्पणियों पर अक्सर विवाद हो जाया करता है। पर, उनकी हाल की एक अत्यंत विवादास्पद टिप्पणी पर कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ जबकि उनका यह ताजा बयान आए कई दिन बीत चुके। क्या न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू की विवादास्पद टिप्पणियों को लोगों ने नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है ? इस बात के बावजूद कि श्री काटजू का ताजा बयान अब तक का सर्वाधिक विवादास्पद है ? न्यायमूर्ति काटजू ने 24 मार्च को दिल्ली में कहा था कि नब्बे प्रतिशत भारतीय बेवकूफ हैं क्योंकि उनके दिमाग में अंध-विश्वास, सांप्रदायिकता और जातीयता भरी हुई हैं। वे इसी आधार पर वोट देते हैं। ऐसे ही लोगों ने फूलन देवी तक को भी लोकसभा में इसलिए पहुंचा दिया था क्योंकि वह पिछड़ी जाति की थीं।

    इस देश में ऐसे विचार रखने वाले काटजू साहब अकेले नहीं हैं। इसलिए भी इस पर चर्चा जरूरी है। इस मामले में आजादी के तत्काल बाद भी कई प्रमुख लोगों ने यह सलाह दी थी कि मतदान का अधिकार सबको नहीं बल्कि चुने हुए पढ़े लिखे लोगों को ही मिलना चाहिए। पर संविधान निर्माताओं ने उन लोगों की सलाह नहीं मानी।

  आजादी के तत्काल बाद के पहले आम चुनाव में भी कुछ ऐसे लोग व दल उम्मीदवार थे जिन पर यह आरोप था कि वे अंधविश्वास, सांप्रदायिकता और जातिवाद फैलाने की कोशिश करते थे। पर उन उम्मीदवारों को आम तौर से नजरअंदाज करके इस देश की अधिसंख्य जनता ने कांग्रेस को बड़े बहुमत से सत्ता में बैठा दिया था। ऐसा इसलिए हुआ कि आजादी की लड़ाई में तपे -तपाये कांग्रेसी नेताओं पर अधिकतर जनता ने अधिक भरोसा किया। ऐसा नहीं है आज भी अंधविश्वासी, सांप्रदायिक और जातिवादी तत्वों की इस देश में उपस्थिति नहीं है। पर क्या उनकी संख्या नब्बे प्रतिशत है और वे चुनाव में भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं ? हां, कभी- कभी और जहां- तहां वे तत्व जरूर चुनाव में निर्णायक हो जाते हैं जहां के नेताओं की साख गिर चुकी होती है। और जनता को दो बुरे लोगों में से ही किसी कम बुरे को चुनना  पड़ता  है। क्या इसके लिए आप जनता को दोषी ठहराएंगे या नेता या फिर राजनीतिक दलों को या शासन को ?

 कोई भी कहेगा कि आम अंधविश्वास के मामले में 1952 में आज की अपेक्षा बदतर स्थिति थी। इसके बावजूद अधिसंख्य जनता ने तब आजादी की लड़ाई की मुख्य पार्टी कांग्रेस को हाथों -हाथ लिया। उस समय वही विवेकशीलता थी। अंधविश्वासी तत्वों के लिए प्रथम आम चुनाव अनुकूल नहीं रहा।

   विद्वान न्यायाधीश काटजू साहब को किसी अगले अवसर पर यह बताना चाहिए कि यदि अंधविश्वासी थी तो क्यों अधिसंख्य जनता यानी मतदाताओं ने सन 1952, 1957 ओर 1962 के आम चुनाव में कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया ?

   क्या अधिकतर भारतीयों ने आजादी दिलाने वाली प्रमुख पार्टी कांग्रेस को वोट देकर अंधविश्वास, जातीयता और सांप्रदायिकता का ही परिचय दिया था?

   हां, जब बाद के वर्षों में कांग्रेसी सरकारों के खिलाफ शिकायतें अधिक बढ़ने लगीं तो इस देश की अधिसंख्य जनता ने सत्ता पर से उनके एकाधिकार को भी तोड़ दिया।

 सन 1967 के चुनाव में मतदाताओं ने देश के नौ राज्यों में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। क्या ऐसा करके जनता ने बेवकूफी का परिचय दिया था? क्या 1971 में अधिकतर जनता ने इंदिरा गांधी की गरीबपक्षी घोषणाओं के पक्ष में खड़ा होकर गलत काम किया था ? क्या सन 1977 के चुनाव में कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से हटाकर और पूरे उत्तर भारत से कांग्रेस का लगभग सफाया करके अधिकतर जनता ने बेवकूफी का परिचय दिया ? दरअसल तब अधिकतर लोगों के दिलो दिमाग में आपातकाल की ज्यादतियां हावी थीं न कि कोई अंधविश्वास या दूसरा कुछ। क्या सन 1980 के चुनाव में आपसी कलह के लिए जनता पार्टी को सजा देने वाली जनता बेवकूफ थी?

क्या बोफोर्स तथा अन्य कई घोटालों की पृष्ठभूमि में 1989 में हुए आम चुनाव में राजीव सरकार को गद्दी से उतारकर मतदाताओं ने बेवकूफी की थी ?

क्या जंगल राज के खिलाफ 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में वोट देकर नीतीश कुमार को गद्दी पर बैठाने वाली बिहार की जनता अंधविश्वासी, सांप्रदायिक और जातिवादी थी ?

काटजू साहब को इस बात का भी जवाब ढूंढ़ना चाहिए कि पांच साल के अंतराल के बाद मुलायम सिंह यादव की पार्टी तो यू.पी. में फिर से सत्ता में आ गई, पर लालू प्रसाद की पार्टी बिहार में 2010 के चुनाव के बाद भी ंफिर से सत्ता में क्यों नहीं आ सकी ? दोनों प्रदेश तो भारत में ही है। दोनों प्रदेशों के लोगों का मनमिजाज करीब- करीब मिलता -जुलता भी है।

   कभी फुर्सत के क्षणों में इन प्रश्नों के जवाब ढूंढ़ने के लिए इसके मूल में काटजू साहब को जरूर जाना चहिए। काटजू साहब तो मीडियाकर्मियों को अनपढ़ या अधपढ़ बता चुके हैं। इसलिए विद्वान न्यायाधीश अपने गहन अध्ययन के जरिए शायद किसी सही नतीजे पर पहुंच जाएं। यदि ऐसा हुआ तो देश को कोई सही दिशा -निदेश भी मिल जाएगा।

 हाल के वर्षों के चुनावों में कतिपय विवादास्पद तत्वों की चुनावी सफलताओं को लेकर काटजू साहब की उपर्युक्त टिप्पणी की प्रासंगिकता एक हद तक समझी जा सकती है। पर उसके लिए 90 प्रतिशत जनता को दोषी ठहरा देने के अपने निर्णय पर उन्हें एक बार फिर विचार करना चाहिए। क्योंकि उसके लिए जनता नहीं बल्कि राजनीतिक दल व सरकारें जिम्मेदार रही हैं। इसको समझने के लिए बिहार के कुछ उदाहरण पेश कियो जा सकते हैं।

  अधिक साल नहीं हुए जब बिहार में राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव, आनंद मोहन और मोहम्मद शहाबुद्दीन जैसे बाहुबली लोकसभा के चुनाव भी भारी बहुमत से जीत जाते थे। कई बार वे अपने समर्थकों को भी चुनाव जितवा देते थे। पर आज बिहार में इनका राजनीतिक सिक्का क्यों नहीं चल पा रहा है ?
  इस सवाल के जवाब में सिवान लोकसभा चुनाव क्षेत्र का उदाहरण दिया जा सकता है।

 वहां गरीबों-मजदूरों के शोषण के खिलाफ सी.पी.एम. (माले) सक्रिय हुआ। क्योंकि शासन-प्रशासन गरीबों के हितों की रक्षा करने में आम तौर पर विफल रहता था। वहां मजदूर बनाम भूमिपति तनाव बढ़ा और मोहम्मद शहाबुद्दीन भूमिपतियों के पक्ष में उठ खड़े हुए। नतीजतन वे भूमिपतियों के एक बड़े हिस्से के हीरो बन गये।

  ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि शासन ने न तो माले कार्यकर्ताओं, समर्थकों व गरीबों के साथ न्याय किया और न ही भूमिपतियों के साथ। शासन ने न गरीबों के खिलाफ भूमिपतियों की हिंसक कार्रवाइयांें को रोका और न ही भूमिपतियों पर माले समर्थकों की हिंसक कार्रवाइयों पर लगाम लगाई।

शासनहीनता की स्थिति लंबे समय तक बनी रही। परिणामस्वरूप समाज के एक हिस्से के लिए माले के नेतागण पुलिस थाने की तरह काम करने लगे  और दूसरे हिस्से के लिए मोहम्मद शहाबुद्दीन।
पर, जब 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद सिवान सहित पूरे बिहार में राज्य शासन तंत्र सक्रिय हुआ और कानून -व्यवस्था बेहतर हुई तो चुनाव की दृष्टि से एक तरफ माले कमजोर हुआ तो दूसरी तरफ अनेक लोगों के लिए शहाबुद्दीन की अनिवार्यता भी कम हो गई। यह अकारण नहीं है कि आज न तो शहाबुद्दीन या उनके कोई परिजन किसी सदन के सदस्य हैं और न ही माले का ही कोई प्रतिनिधित्व है।

    यानी जब शासन कमजोर होता है या फिर तरह -तरह के हिंसक तत्वों से उसकी सांठगांठ हो जाती है तो हिंसक तत्व राजनीति में भी हावी हो जाते हैं। पर जहां साख वाला नेता या शासन उपलब्ध होता है तो वहां ऐसी नौबत नहीं आती। ऐसी स्थिति के लिए 90 प्रतिशत जनता दोषी है या वे लोग जो सरकार या पार्टी चलाते हैं ? इस सवाल का जवाब काटजू साहब को अगली बार देना चाहिए।
       
(जनसत्ता में 10 अप्रैल 2012 को प्रकाशित)

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

तुम करोे तो पुण्य और मैं करूं तो पाप ?


संसद ने सांसदों के खिलाफ टीम अन्ना की एक ताजा टिप्पणी की एकमत से मंगलवार को निंदा की। वह खास टिप्पणी निंदा के काबिल थी भी। पर, सांसदों के उस सर्वसम्मत वायदे की लगातार वादाखिलाफी की निंदा कब यह संसद करेगी जो वायदा सन् 1997 में देश के साथ किया गया था ?
आजादी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर संसद ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव में कहा था कि हम भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण को समाप्त करेंगे और चुनाव सुधार भी करेंगे। यदि संसद, सांसद व अब तक की सरकारों ने इस दिशा में ठोस कदम आगे बढ़ाया होता तो आज अन्ना टीम उभर कर सामने आती ही नहीं। उसकी जरूरत ही नहीं पड़ती। पर इसके विपरीत हकीकत तो यह है कि आज देश में सन् 1997 की अपेक्षा अधिक भ्रष्टाचार है। राजनीति का अधिक अपराधीकरण हुआ है और चुनाव सुधार के अभाव में विधायिकाओं का स्वरूप व चरित्र भी बदलता जा रहा है। इन दिनों अनेक छोटे -बड़े नेतागण व जन प्रतिनिधि सदन के भीतर व बाहर एक दूसरे को चोर, उच्चके, बदमाश, हत्यारे, बलात्कारी और न जाने क्या -क्या नहीं कहते रहते हैं। इस संबंध में इस देश में जहां -तहां मानहानि के मुकदमे भी दायर होते रहते हैं।
सन 1997 में हुए संसद के उस छह दिवसीय विशेष अधिवेशन में उस समय की दुरअवस्था को लेकर जिस तरह की कड़ी टिप्पणियां खुद सांसदों ने की थीं, सामान्यतः वैसी ही टिप्पणियां तो आज टीम अन्ना कर रही है। पर इस पर इस देश के अधिकतर नेतागण टीम अन्ना पर तमतमाये हुए हैं। यानी हम करें तो पुण्य और तुम करो तो पाप? इस देश की राजनीति आखिर आज कहां जा रही है ?
नई दिल्ली के जंतर मंतर पर टीम अन्ना के धरने के दौरान सोमवार को की गई एक आपत्तिजनक टिप्पणी पर संसद या यूं कहें कि अधिकतर सांसद तमतमा गये। वह टिप्पणी ही ऐसी थी कि संसद का तमतमाना वाजिब भी था। पर सवाल यह उठता है कि इसी संसद व उसके सदस्यों ने
पिछले 15 साल में अपने ही उस सर्वसम्मत प्रस्ताव को कूड़ेदान में आखिर क्यों फेंक दिया जो प्रस्ताव 1997 में पास हुआ था ? क्या इससे संसद या सांसदों की गरिमा बढ़ी ? क्या इस सर्वदलीय वादाखिलाफी के लिए जनता का तमतमाना उचित नहीं होगा ? क्या जनता से भी बड़ी संसद है ?
आज देश की अधिकतर जनता इसलिए भी तमतमाई हुई है क्योंकि इस बीच देश में 15 से भी अधिक महा घोटाले हो चुके हैं। नये -नये घोटाले होते ही जा रहे हैं। टीम अन्ना जनता के उसी तमतमाए तेवर को तो स्वर दे रही है। हां, स्वर कभी -कभी कर्कश हो जा रहे हैं। टीम अन्ना को उससे जरूर बचना चाहिए। पर अफसोसनाक स्थिति यह है कि घोटालों के आरोप बारी -बारी से इस बीच बारी बारी से सत्ता में आए करीब -करीब सभी प्रमुख दलों के अनेक नेताओं पर लगे। इसमें कुछ अपवाद जरूर हैं। पर अपवादों से तो देश नहीं चलता। इससे राजनीति की साख घटी या बढ़ी है? इससे संसद और उसके सदस्यों की गरिमा व साख बढ़ी या घटी ? जैसा आप बोओगे, वैसा ही तो काटोगे। यदि साख घटी है तो टीम अन्ना का भी तमतमाना कहां से गैर वाजिब है ?
अब जरा उस सर्वदलीय वायदे को एक बार फिर याद कर लिया जाए जो इस देश के करीब-करीब सभी दलों के नेताओं ने संसद के ऊंचे मंच से पूरे देश के सामने किया था। आजादी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर छह दिनों तक संसद का विशेष सत्र चला था। उसमें पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव से संबंधित खबर 2 सितंबर 1997 के अखबारों में छपी थी। खबर का इंट्रो इस प्रकार था, ‘संसद ने आज एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए भारत के भावी कार्यक्रम के रूप में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया। प्रस्ताव में भ्रष्टाचार को समाप्त करने, राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने के साथ- साथ चुनाव सुधार करने, जनसंख्या वृद्धि, निरक्षरता और बेरोजगारी को दूर करने के लिए जोरदार राष्ट्रीय अभियान चलाने का संकल्प किया गया।’
छह दिनों की चर्चा के बाद जो प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास किया गया उस प्रस्ताव को सर्वश्री अटल बिहारी वाजपेयी,इंद्रजीत गुप्त,सुरजीत सिंह बरनाला,कांसी राम,जार्ज फर्नांडीस, शरद यादव,सोम नाथ चटर्जी,एन.वी.एस.चितन,मुरासोली मारन,मुलायम सिंह यादव,डा.एम.जगन्नाथ,अजित कुमार मेहता,मधुकर सरपोतदार,सनत कुमार मंडल,वीरंेद्र कुमार बैश्य ,ओम प्रकाश जिंदल और राम बहादुर सिंह ने संयुक्त रूप से पेश किया था।
यह प्रस्ताव आने की भी एक खास पृष्ठभूमि थी।सन् 1996 में विभिन्न दलों की ओर से 40 ऐसे व्यक्ति लोक सभा के सदस्य चुन लिए गए थे जिन पर गंभीर आपाराधिक मामले अदालतों में चल रहे थे।उन मेंसे बिहार से चुने गये दो बाहुबली सदस्यों ने लोक सभा के अंदर ही एक दिन आपस में ही मारपीट कर ली।इस शर्मनाक व अभूतपूर्व घटना को लेकर अनेक बड़े नेता शर्मसार हो उठे और उन लोगों ने तय किया कि ऐसी समस्याओं पर सदन में विशेष चर्चा की जाए और इन्हें रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। इस विशेष चर्चा के दौरान सदन में कोई दूसरा कामकाज नहीं हुआ।वक्ताओं ने सदन में देशहित में भावपूर्ण भाषण किए।पैंसठ घंटे तक चर्चा हुई।कुल 218 सदस्यों ने भाषण दिये।इनके अलावा कई सांसदों ने अपने लिखित भाषण भी पेश किये।एक पर एक सदस्यों ने देश की गंभीर स्थिति पर भारी चिंता व्यक्त की।पर,उसका नतीजा शून्य रहा।यानी वे भाषण अंततः घड़िय़ाली आंसू ही साबित हुए। उस के बाद सन् 1998,1999, 2004 और 2009 में लोक सभा के चुनाव हो चुके हैं।इस बीच भाजपानीत और कांग्रेसनीत गठबंधन सरकारें केंद्र में बनीं।करीब -करीब सभी प्रमुख दलों के अनेक नेतागण बारी -बारी से केंद्र में मंत्री रहे।या फिर बाहर से समर्थन देते रहे।जो नेता 1997 में सांसद थे,उनमें कई नेता आज भी सांसद हैं। पर हमारे उन्हीं नेताओं ने अपने ही वायदे भुला दिए।इसका नतीजा यह हुआ कि ऐसे लोक सभा सदस्यों की संख्या बढ़कर आज 162 हो गई है जिन पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं।अगले चुनावों में उनकी संख्या बढ़ते जाने के ही संकेत हैं,घटने के नहीं।
इस बीच जब देश पर आतंकवादी हमले तेज हुए तो सुरक्षा मामलों के जानकारों ने केंद्र सरकार को बताया कि माफिया और आपराधिक प्रवृति के प्रभावशाली लोग विदेशी आतंकियों के लिए शरणस्थली मुहैया करते हैं।इस पृष्ठभूमि में देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक बार फिर इस समस्या पर नए ढंग से विचार करने का समय आ गया है।एन.एन.वोहरा समिति ने भी 1993 में ऐसी ही सिफारिश की थी।वोहरा समिति ने अपनी रपट में नेता-माफिया-अफसर गंठजोड़ की सक्रियता व उनकी बढ़ती ताकत की चर्चा की थी। इसलिए आज यह और भी अधिक आवश्यक हो गया है कि बड़ेे अपराधी और माफिया तत्वों के बीच से कुछ लोग चुनाव लड़ कर संसद सदस्य न बन जाएं।इसलिए भी यह जरूरी है कि जिन दलों और नेताओं ने आजादी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर संसद में बैठकर देश के सामने जो सर्वसम्मत वायदे किये थे,उन्हें वे देश की सुरक्षा को ध्यान में रख कर अब तो पूरा करें।अब भी समय है कि विभिन्न दलों के नेतागण मिल बैठकर कम से कम यह फैसला करंे कि वे अब किसी विवादास्पद व्यक्ति को अगली बार लोक सभा चुनाव का उम्मीदवार नहीं बनाएंगे।इसके विपरीत लग तो यह रहा है कि हमारे अनेक सांसद ऐसे लोगों से ही लड़ते नजर आ रहे हैं जिन लोगों ने भ्रष्टाचार व अपराधीकरण के खिलाफ अभियान चला रखा है।इससे अंततः संसद,सांसद व पूरी राजनीति के प्रति आम जनता मेें कैसी धारणा बनेगी ?
कौन ईमानदार व्यक्ति आज यह कहेगा कि जिन मुद्दों और समस्याओं को लेकर हमारे नेताओं ने 1997 में संसद में भारी चिंता प्रकट की थी,उन मामलों में इस देश की हालत तब की अपेक्षा आज बेहतर हुई है ?
तो इस स्थिति को बदलने के लिए क्या-क्या उपाय हो रहे हैं ?राजनीति तथा दूसरे प्रभावशाली हलकों में आज भ्रष्टाचार का पहले की अपेक्षा काफी अधिक बोलबाला हो चुका है।पर जब बोलबाला कम था,तब हमारे नेताओं ने 1997 में सदन में क्या- क्या कहा था,उसकी कुछ बानगियां यहां पेश हैं।इससे भी यह पता चलेगा कि इन समस्याओं को हल करना अब और भी कितनी जरूरी हो गया है।क्या आज के सांसदगण 1997 में छह दिनों तक चली संसद की कार्यवाही का पूरा विवरण एक बार पढ़ने की जहमत उठाएंगे ?
लोक सभामें तब के प्रतिपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने बहस का समापन करते हुए एक सितंबर 1997 को कहा था कि ‘इस चर्चा से एक बात सबसे प्रमुखता से उभरी है कि भ्रष्टाचार को समाप्त किया जाना चाहिए।इस बारे में कथनी ही पर्याप्त नहीं,करनी भी जरूरी है।उन्होंने यह भी कहा था कि राजनीति के अपराधीकरण के कारण भ्रष्टाचार बढ़ा है।’
पूर्व प्रधान मंत्री एच.डी.देवगौड़ा ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सभी दलों को मिलकर लड़ाई लड़नी चाहिए।तत्कालीन रेल मंत्री राम विलास पासवान ने कहा कि देश के सामने उपस्थित समस्याओं के हल के लिए सभी दलों को मिल बैठकर ठोस कदम उठाने चाहिए।लोक सभा के तत्कालीन स्पीकर पी.ए.संगमा ने तो भावावेश में आकर आजादी की दूसरी लड़ाई छेड़ देने का ही आह्वान कर दिया।आम तौर पर स्पीकर बहस में हिस्सा नहीं लेते।पर तब सदन का माहौल इतना भावपूर्ण था कि स्पीकर संगमा भी चर्चा में हिस्सा लेने से खुद को नहीं रोक सके थे।पर उस भावना की भी हमारे नेताओं ने बाद में कोई परवाह नहीं की।
1997 में संसद में जो प्रस्ताव सर्वसम्मत से पास हुआ था,उसे भाजपा नेता श्री वाजपेयी ने ही पेश किया था।यह भी दुर्भाग्यपूर्ण ही रहा कि इस बीच राजनीति के अपराधीकरण व भ्रष्टीकरण के खिलाफ जो भी प्रमुख व कारगर कदम उठाए गए,वे मुख्यतः चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट या कुछ मामलों में हाई कोर्ट की पहल पर ही उठाए गए न कि दलों,नेताओं या सरकारों द्वारा।इस बीच राजनीति में भी इक्के -दुक्के अपवाद जरूर उभर कर सामने आये हैं।पर वे समस्या के अनुपात में उंट के मुंह में जीरे के समान ही हैं।इस मामले में एन.डी.ए.सरकार का छह साल का कार्यकाल भी खुद अटल बिहारी वाजपेयी की उस भावना के अनुकूल नहीं रहा जो भावना अटल जी ने 1997 में लोक सभा में व्यक्त की थी।इस मामले में कांग्रेस सरकार का रिकार्ड तो आज लोगबाग देख ही रहे हैं जो अधिक खराब है।
आज भी टीम अन्ना पर तमतमाने के बजाये क्या पूरी संसद व केंद्र सरकार 1997 में संसद द्वारा देश को किये गये सर्वसम्मत वायदों को पूरा करने की कोशिश करेगी ?
यदि इस दिशा में ठोस काम शुरू भी कर दिया गया तो टीम अन्ना की प्रासंगिकता घट जाएगी।पर इसके बदले टीम अन्ना को ही लोकतंत्र व संसद का दुश्मन मानकर व बताकर कोई कार्रवाई की गई या अन्ना विरोधी बयानबाजी जारी रही तो उसके नतीजे प्रति -उत्पादक हो सकते हैं।यह नहीं भूलना चाहिए कि सन 1974 में जय प्रकाश नारायण को भी तब की सत्ता द्वारा लोकतंत्र का दुश्मन और विदेशी ताकतों का खिलौना कहा गया था। पर सन 1977 के चुनाव में उसका क्या नतीजा हुआ ?


(प्रभात खबर: 29 मार्च 2012 से साभार)