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गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

पटना—सारण के बीच होगा नया पुल


आखिर वह अच्छी खबर मिल ही गई जिसकी मुझे बेसब्री से प्रतीक्षा थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गंगा नदी पर दानापुर यानी शेरपुर व दिघवारा के बीच नए पुल निर्माण के लिए अपनी सहमति दे दी।


उन्होंने पथ निर्माण मंत्री नंदकिशोर यादव से फोन पर बातचीत की और कहा कि आप इस पुल के लिए निजी तौर पर पहल करें।इसके लिए कवायद तेज कर दें। इसके लिए सारण के भाजपा सांसद व राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी और जिले के प्रमुख जदयू नेता शैलेंद्र प्रताप मंगलवार को मुख्यमंत्री से मिले थे।


इस पुल में मेरा निजी स्वार्थ भी है और इससे सार्वजनिक भला भी होने वाला है। प्रस्तावित शेरपुर-दिघवारा पुल जिस दिन बन कर तैयार हो जाएगा, उस दिन से पटना महानगर पर से आबादी का बोझ घटना शुरू हो जाएगा।


यानी सारण जिले के दिघवारा से लेकर सोनपुर तक एक "नये नोयडा" के निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार हो जाएगी। गाजियाबाद से दिल्ली की जितनी दूरी है, उससे काफी कम दूरी दिघवारा से पटना महानगर की होगी। गंगा पार जमीन व आवास सस्ते मिलेंगे। पटना पर से आबादी का बोझ कम यानी पटना में बेहतर पर्यावरण।


मेरा स्वार्थ यह है कि मेरा पुश्तैनी गांव जाना आसान हो जाएगा।  



गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

भारतीय खातेदारों के नाम बताने को तैयार है विदेशी बैंक का बर्खास्त कर्मचारी

उस बैंक का एक बर्खास्त कर्मचारी एक विदेशी बैंक के गुप्त खातेदारों के नाम -पते बताने को तैयार है।फिर भारत सरकार क्यों उस कर्मचारी से मदद लेने को तैयार नहीं है ? हालांकि मदद लेने की शर्त यही है कि भारत सरकार को उसके बदले में कुछ धन खर्च करने पड़ेंगे। खबर है कि उस बैंक में अनेक भारतीयों के भारी मात्रा में काला धन जमा हैं।

वैसे भी विदेशों में सक्रिय खुफिया एजेंसियां तरह -तरह की गुप्त सूचनाएं एकत्र करने के लिए धन खर्च करती ही हैं। खबर मिली है कि अपने- अपने देशों के भ्रष्ट लोगों के काले धन के गुप्त खातों के विवरण कई देशों ने पहले ही प्राप्त कर लिए हैं।इसी सिलसिले में जर्मनी सरकार की खुफिया एजेंसी ने 40 लाख पाउंड और ब्रिटेन सरकार ने एक लाख पाउंड में उस पूर्व बैंक कर्मचारी से खरीद लिए हंै। यही काम भारत सरकार क्यों नहीं कर सकती ? 16 मई 2008 को ही भारत के वित्त मंत्री पी.चिदम्बरम ने एल.के. आडवाणी को पत्र लिखा था कि ‘भारत सरकार ने जर्मनी सरकार से गत फरवरी में ही उन खातों का विवरण मांगा था। पर जर्मनी सरकार ने कह दिया कि कुछ कारणवश वह तत्काल ऐसा करने की स्थिति मेें नहीं है।’ बाद में यह खबर आई कि एक जर्मन वकील ने कानूनी बाधा खड़ी करके भारत सरकार को जर्मन सरकार से गुप्त खातों का विवरण नहीं लेने दिया। पर इसके बावजूद उस बर्खास्त बैंक कर्मचारी से तो खातों ंका विवरण प्राप्त किया ही जा सकता है। याद रहे कि श्री आडवाणी के पत्र के जवाब में चिदम्बरम ने उन्हें गत साल भाजपा नेता को लिखा था। पूरी दुनिया की मीडिया में यह खबर कई महीनों से आ रही है कि कई देशों ने बारी -बारी से उस कर्मचारी से अपने -अपने देश के काला धन वालों के विवरण प्राप्त कर लिए।

पहले यह खबर आई थी कि जर्मनी सरकार, भारत के लोगों के गुप्त खातों के उस विवरण को भारत सरकार को मुफ्त देने को तैयार है। पर, पता नहीं किस षड्यंत्र के तहत एक जर्मन वकील से इस काम में बाधा खड़ी करवा दी गई ? जर्मनी सरकार बाद में क्यों पलट गई ? या फिर चिदम्बरम साहब ने देश को गुमराह किया ? खैर जो हो, फिलहाल यह मान भी लिया जाए कि जर्मनी सरकार ने खाते का विवरण देने से फिलहाल मना कर दिया, पर खुद जर्मनी सरकार ने जिस तरीके से गुप्त खातों के विवरण प्राप्त किए, उसी तरीके से भारत सरकार ने क्यों हासिल नहीं किया ? गुप्त बैंक खातों की यह कहानी भारत तथा कुछ अन्य देशों की मीडिया में विस्तार से गत साल आई थी। दरअसल यह कहानी स्विस बैंक के खातों की नहीं है।यह मामला स्विट्जर लैंड के बगल के एक देश का है। इस छोटे देश लाइखटेंस्टाइन के एल.जी.टी. बैंक में पड़े भारतीयों के अपार काले धन का विवरण देने के लिए उस बैंक का एक पूर्व कर्मचारी तैयार है। पर भारत सरकार उस विवरण को उससे हासिल करने को तैयार ही नहीं है।

एल.जी.टी. बैंक के बारे में कम ही लोगों को पता है। यह तब चर्चा में आया जब स्विस बैंकों ने अमेरिका के भारी दबाव के तहत अपने यहां के बैंकों के खातों की गोपनीयता से संबंिधत नियमों में ढील देने का निर्णय किया। उसके बाद दुनिया भर के काला धन वालों ने लाइखटेंस्टाइन के एल.जी.टी. बैंक की ओर रुख कर लिया।वह बैंक वहां के राजा के परिवार का है और वहां गोपनीयता की अब भी गारंटी है।

जर्मनी को उन खातों का विवरण कैसे मिला ? इसके पीछे भी एक कहानी है। लाइखस्टेंस्टाइन के एल.जी.टी. बैंक के साथ कुछ समय पहले एक हादसा हो गया।उस बैंक का एक कम्प्यूटर कर्मचारी हेनरिक कीबर कुछ कारणवश बैंक प्रबंधन से बागी हो गया। उसे नौकरी से निकाल दिया गया। वह बैंक के सारे गुप्त खातेदारों के नाम पते वाला वाला कम्प्यूटर डिस्क लेकर फरार हो गया। इस तरह दुनिया के अनेक देशों के भ्रष्ट लोगों के गुप्त खातों का विवरण कीबर के पास आ गया। उसने उस पूरी सी. डी.की काॅपी को जर्मनी की खुफिया पुलिस को 40 लाख पाउंड में बेच दिया। ब्रिटेन ने सिर्फ अपने देश के गुप्त खातेदारों के नाम उससे लिए। इसलिए उसे सिर्फ एक लाख पाउंड में विवरण मिल गया। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, बेल्जियम और अन्य दूसरे देश कीबर से बारी -बारी से अपने -अपने देश के भ्रष्ट लोगों के गुप्त खातों के विवरण ले गए। ब्रिटेन ने कहा कि उसे मात्र एक लाख पाउंड लगे।पर उस विवरण के आधार पर कार्रवाई करने पर सरकार को टैक्स के रूप में भारी धन राशि मिल गई। इस तरह यह सौदा ब्रिटेन के लिए काफी फायदे का साबित हुआ।

याद रहे कि यह सौदा भारत के लिए और भी फायदे का साबित हो सकता है। यह खबर गत साल ही पक्के तौर पर आ गई थी कि लाइखटेंस्टाइन के उस बैंक में बड़ी संख्या में भारतीयों के भारी मात्रा में काला धन जमा है। इसी की सूचना पाकर लोक सभा में प्रतिपक्ष के नेता एल.के. आडवाणी ने वित्त मंत्री को पत्र लिख कर उसे वापस लाने का उनसे आग्रह किया था।

एक अन्य खबर के अनुसार भारत के टैक्स चोर हर साल नौ लाख करोड़ रुपए की टैक्स चोरी करते हैं। इनमंे से अधिकांश राशि दुनिया भर में फैले ऐसे विदेशी बैंकों के गुप्त खातों में जमा कर दी जाती है। ये पैसे आम तौर पर भ्रष्ट नेताओं, व्यापारियों और अफसरों के होते हैं। इन पैसों का इस्तेमाल भारत में आतंकवादी गतिविधियां फैलाने और चुनावों को प्रभावित करने के लिए भी होता है। इस देश के काला धन वाले और भारतीय बैंकांे के रुपए मारने वाले इतने ताकतवर हैं कि उन पर कोई कार्रवाई करने की ताकत एल.के.आडवाणी सहित किसी नेता या दल की नहीं है जो अब तक केंद्र की सत्ता में रहे हैं।कांग्रेसी नेता व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने ठीक ही सवाल उठाया है कि एन.डी.ए. जब छह साल तक सत्ता में था तो उसने विदेशी बैंकों के गुप्त खातांे की खोज -खबर क्यों नहीं ली ?

स्विस बैंक कौन कहे, इस देश के राष्ट्रीयकृत बैंकों ंसे कर्ज के बहाने अरबों रुपए दबाकर बैठे बड़े बड़े व्यापरियों तथा अन्य लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की ताकत भी एन.डी.ए. या यू.पी.ए. नेताओं में है ? सन् 2002 में इंडियन एक्सप्रेस ने यह खबर छापी थी कि ‘इस देश के व्यापारियों और उद्योगपतियों ने बैंकों के ग्यारह खरब रुपए दबा रखे हैं। उन उद्योगपतियों और व्यापारियों के नाम तक प्रकाशित करने की हिम्मत अब तक रिजर्व बैंक को नहीं हो रही है। ये रुपए कर्ज के रूप में लिए गए हैं। पर लौटाए नहीं जा रहे हैं।’ इस खबर के छपने के बाद तत्कालीन प्रतिपक्षी नेताओं यानी मनमोहन सिंह और पी. चिदम्बरम के उसी तरह के सरकार विरोधी कड़े बयान मीडिया में आए थे जिस तरह के बयान गुप्त विदेशी खातों पर इन दिनों एल.के. आडवाणी, शरद यादव तथा अन्य एन.डी.ए. नेताओं के आ रहे हैं।
मनमोहन सिंह और पी. चिदम्बरम गत पांच साल से सत्ता में हैं। क्या आपने कभी सुना कि इन सत्ताधारियों ने उस 11 खरब रुपए की कभी चर्चा भी की हो ? यदि अगली मई में आडवाणी जी सत्ता में आ जाएंगे, तो आप देखेंगे कि वे गुप्त विदेशी खातों की बात वे भी भूल जाएंगे। यदि वे खुदा न खास्ता याद रखेंगे, तो भारतीय राजनीति का इसे चमत्कार ही माना जाएगा ! इस देश के पक्ष -विपक्ष के नेताओं के बारे में पिछले अनुभव तो यही बताते हंै।


सन्मार्ग, पटना से साभार

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

सुप्रीम कोर्ट उम्मीद की आखिरी किरण


सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त के मामले में जो फैसला किया है,उससे इस देश के लोकतंत्र के प्रति शांतिप्रिय लोगों की उम्मीद बंधती है। अन्यथा,तो बुद्ध और गांधी के इस देश की सबसे बड़ी पंचायत को बाहुबलियों और उनके परिजनों का अड्डा बनाने पर इस देश के अधिकतर नेता व दल अमादा हो ही चुके हैं।

वैसे तो सबसे बड़ी अदालत का यह निर्णय एक संकेतक है। साथ ही, ‘बाहुबलवादी’ नेताओं के गाल पर करारा तमाचा भी है। पर, यह उम्मीद करना फिजूल है कि ‘बाहुबलवादी’ नेतागण इससे कोई शिक्षा ग्रहण करेंगे। पर, इससे आम मतदाता जरूर मनोबल उंचा करके चाहें तो अपराधियों और उनके परिजनों को इस चुनाव में धूल चटा सकते हैं।अन्यथा,ये बाहुबलवादी एक दिन लोकतंत्र की ऐसी दुर्गत कर देंगे कि आम जनता का इस सिस्टम पर से ही भरोसा उठ जाएगा और या तो माओवादी छा जाएंगे या फिर सेना। इन दोनों में से कोई भी लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं रहेगा।

पहले गांधीवादी होते थे। थोड़े लोग अब भी हैं। पहले समाजवादी और संघवादी होते थे।थोड़े अब भी हैं। पहले लोहियावादी और साम्यवादी हुआ करते थे। थोड़े लोग अब भी है।पर, वे सब हाशिए पर ही हैं।राजनीति की मुख्य धारा पर तो अब दूसरे ही तरह के लोगों का ही कब्जा होता और बढ़ता जा रहा है।अब परिवारवादी होते हैं। जातीय समीकरणवादी हैं। पैसावादी होते हैं।अपहरणवादी होते हैं।हत्यावादी होते हैं।संविधानविरोधवादी होते हैं।कानूनविरोधवादी और बाहुबलवादी होते हैं।और न जाने क्या क्या वादी होते हैं।

क्या यह देश के लोकतंत्र के लिए कोई मामूली घटना है कि जिसे देशद्रोह के आरोप में अदालत सजा सुना चुकी है,उसे एक राजनीतिक दल लोक सभा में भेजने पर अमादा हो ? क्या यह कोई सराहनीय बात है कि कोई अन्य दल यह कहे कि उसके खिलाफ हम उम्मीदवार ही खड़ा नहीं करेगे क्योंकि उस सजायाफ्ता के परिवार का बड़ा योगदान रहा है ?

भला हो,सुप्रीम कोर्ट का जिसने संजय दत्त को इस लायक नहीं समझा कि वे चुनाव लड़ सके। उन दूसरे सजायाफ्ताओं के बारे में क्या फैसला होगा,इससे यह भी साफ हो गया। पर बिहार के नेतागण कुछ अधिक ही चतुर निकले।उन्होंने उन बाहुबलियों के परिजनों को टिकट दे दिया जिन्हें अदालत ने सजा सुना रखी है।यानी बिहार के कुछ नेताओं ने प्रकारांतर से अदालत के फैसले और मंशा को पराजित करने की चतुर कोशिश की है।हालांकि बाहुबलियों के परिजनों के भी ताकतवर होने पर कुल मिलाकर समाज व सरकार पर नतीजा वही होगा जो खुद बाहुबलियों के चुनाव लड़ने और जीतने से होता रहा है।आखिर ऐसे बाहुबलवादी नेतागण अपने क्षणिक स्वार्थ में इस देश और लोकतंत्र के साथ और खास कर आने वाली अपनी ही पीढ़ियों के साथ क्या करना चाहते हैं ?

लगता यह है कि एक चुनावी लड़ाई तो जनता के बीच लड़ी जा रही है जिसमें विभिन्न दल आमने -सामने हैं। पर दूसरी लड़ाई अदालतों में लड़ी जा रही है जहां कई दलों के लोग यह लड़ाई लड़ रहे हैं कि उन्हें बाहुबलियों और देशद्रोहियों ंसे लोक सभा को भर लेने दिया जाए। इस देश के लिए सौभाग्य की बात है कि काफी हद तक न्यापालिका और एक हद तक मीडिया ऐसे बाहुबलवादियों के खिलाफ देशहित में चट्टान की तरह खड़ी हंै। इस लड़ाई में इस बार मतदाताओं की अधिक मदद की जरूरत है।मतदाताओं ने यदि जातपांत से उपर उठकर अपराधी, जातिवादी व भ्रष्ट तत्वों को लोक सभा में जाने से नहीं रोका तो ये गर्हित तत्व देश के लिए बहुत बुरा दिन ला देंगे।फिर बाद में पछतावा ही रह जाएगा। हमारा देश जब गुलाम हुआ था,तब शायद उन दिनों इसी तरह की परिस्थितियां बन गई होंगी।

संजय दत्त को चुनाव लड़ाने का निर्णय इतना गलत था कि गत एक फरवरी 2009 को ही एक अखबार में लेख लिख कर राम जेठमलानी ने कहा था कि संजय दत्त का लोक सभा में जाना देशहित में नहीं है।यह वही राम जेठमलानी हैं जिन्होंने संजय दत्त को पहली बार ं जमानत दिला देने जैसा असंभव काम किया था। उन्होंने अपने मित्र और एक अति शालीन हस्ती सुनील दत्त के कहने पर संजय का वकील बनना मंजूर किया था।सुनील दत्त ऐसे भले व शालीन अभिनेता थे जो अपनी फिल्म की हीरोइन के हाथ पकड़ने में भी संकोच करते थे।यह उनके अभिनय के शुरूआती दौर की बात है।पर उसी देशभक्त का पुत्र ऐसा निकला कि राम जेठमलानी को लेख लिख कर यह कहना पड़ा कि उसे लोक सभा में नहीं जाना चाहिए। पर इस देश के पक्ष-विपक्ष की पतनशील राजनीति को तो देखिए कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद ऐसे लोगों को और उनके परिजनों को टिकट देने वाला थोड़ा भी शरमा नहीं रहा है।

इस संदर्भ में सन् 2002 के एक प्रकरण को एक बार फिर याद कर लेना मौजूं होगा।इससे पक्ष- विपक्ष के बाहुबलवादी चेहरे का पता चलता है। जून 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि जन प्रतिनिधि बनने की इच्छा रखने वालों को अपने धन-संपत्ति,शिक्षा और केस वगैरह के बारे में सूचनाएं सार्वजनिक करनी होंगी।इसके बाद लगभग सारे राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ एकजुट हो गए।तब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी।सरकार ने इस फैसले को पराजित करने के लिए तत्काल राष्ट्रपति से एक अध्यादेश भी जारी करवा दिया। बाद में उसे कानून का रूप भी दे दिया।पर जब मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में गया तो सर्वोच्च अदालत ने इस नए कानून को रद कर दिया। आखिर हार कर यह व्यवस्था करनी पड़ी कि उम्मीदवार अपने धन संपत्ति, शिक्षा और आपराधिक मुकदमों का विवरण नामांकन के समय ही जााहिर कर देंगे जो सार्वजनिक कर दिया जाएगा।

यानी राजनीतिक दल अदालत के दबाव के कारण ही इस बात पर राजी हुए।ऐसे नहीं। ऐसे तो उनमें से अधिकतर लोगों ंके पास छिपाने के लिए अब भी बहुत कुछ है। क्या हो रहा है इस सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्य श्यामलम् देश के साथ ?

रविवार, 1 मार्च 2009

एक सुदूर गांव में बिजली


मेरे गांव में इस महीने बिजली पहुंच गई। लोगबाग खुश हो रहे हैं। इलाके के एक प्रमुख व्यक्ति ने तो इसे जादू कहा। खुश होना स्वाभाविक ही है। गत दो साल के भीतर ही दिघवारा (सारण, बिहार) से उत्तर स्थित मेरे गांव तक जानेवाली ग्रामीण सड़क भी प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत बननी शुरू हो गई। मेरे गांव के पास बह रही मही नदी के किनारे के जमींदारी बांध के पुनर्निर्माण का काम भी साल के भीतर ही हो गया। उस बांध पर भी पक्की सड़क बनेगी।

इतने कम समय में एक साथ इतने अधिक काम ! गांव का दृश्य अब बदला- बदला नजर आ रहा है। इसके अलावा गांव के बाजार में अब पहले की अपेक्षा अधिक अमन-चैन है। उस बाजार और आसपास से निकलने वाली कई ग्रामीण सड़कें भी प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत निर्माणाधीन हैं, पर इन कई खुशियों में से सर्वाधिक खुशी बिजली पहुंचने की है। क्योंकि बिजली की नियमित आपूर्ति यदि आगे भी बनी रही, तो इससे और भी कई खुशियां निकलंेगीं। ये खुशियां इसलिए भी अधिक उजागर हुई हैं, क्योंकि आजादी की आधी सदी तक दिघवारा (सारण, बिहार) से तीन किलोमीटर दूर स्थित इस भरहापुर गांव में सरकार ने एक ईंट भी नहीं लगाई थी। जबकि हमारे सहपाठी विजय भाई को इस बात पर गर्व है कि उनके गांव आमी में सन् 1962 में ही बिजली भी पहुंचा दी गई थी। आमी मेरे गांव से करीब 6 किलोमीटर पर है। यानी बिजली ने 6 किलोमीटर की यात्रा 47 साल में पूरी की।

जब मैं गांव में रहता था, तो वहां टार्च की कई बैटरियों को एक साथ सटा कर और फिर उसे तार के जरिए टार्च के ही बल्ब से जोड़ कर गांव के अपने दालान के घोर अंधेरे में बिजली की रोशनी का आभास पैदा करता था। इससे बिजली बुलाने की उत्कंठा का पता चलता है, पर आज वहां बिजली एक हकीकत है। मनिआॅर्डरी अर्थव्यवस्था वाले सारण जिले के मेरे और आसपास के गावों के बेरोजगार नौजवानों के समक्ष इससे स्वरोजगार का एक नया रास्ता खुला है।

बिहार वाणिज्य मंडल के पूर्व अध्यक्ष युगेश्वर पांडेय का गांव सुलतानपुर मेरे गांव से तीन किलोमीटर दूर स्थित है। हाल में जब सुलतानपुर में बिजली पहुंची, तो पांडेय जी की प्रतिक्रिया थी कि ‘यह जादू हो गया।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘सरकार यदि तत्पर हो, तो कोई काम असंभव नहीं।’ मेरे गांव में बिजली पहुंचने से पहले मैं अपने बेरोजगार भतीजे को वर्षों से यह दिलासा देता रहा कि राज्य का जब सामान्य विकास होगा, तो तुम्हें भी कोई न कोई छोटा -मोटा स्वरोजगार करने की सुविधा हासिल हो जाएगी। अब यदि वह चाहे, तो दिघवारा - भेल्दी रोड पर स्थित खानपुर -भरहापुर विकासशील बाजार में स्थित अपनी खाली पड़ी कीमती जमीन में कोई स्वरोजगार का रास्ता निकाल सकता है। यह बात गांव तथा आसपास के अन्य बेरोजगार और अर्ध बेरोजगार युवकों पर भी लागू होती है, जिनके लिए बिजली और सड़क ने आधार तैयार कर दिया है।

वैसे मेरे गांव के कुछ बुजुर्ग लोग मेरे नकारापन की अक्सर चर्चा करते रहे हैं कि किस तरह मैं अपने भतीजे को कोई क्लास फोर की नौकरी भी नहीं दिलवा सका, जबकि इस राज्य के अनेक नेताओं से मेरा परिचय है। मैंने अपने गांव के अपने अनेक प्रिय जनों से कहा था कि व्यक्तिगत काम के मामले में तो मैं पूरी तरह निकम्मा हूं, यदि कोई सार्वजनिक काम हो, तो उसके लिए कोशिश करूंगा।

कुछ साल पहले वह अवसर आ ही गया था। दिघवारा-भेल्दी रोड पर भरहापुर स्थित पुल ध्वस्त हो गया था। उसकी मरम्मत की सख्त जरूरत थी। सड़क ग्रामीण विकास विभाग की है। मैंने राज्य सरकार के तत्कालीन मंत्री उपेंद्र प्रसाद वर्मा से आग्रह किया। उन्होंने कुछ भी करने से साफ मना कर दिया, जबकि वे 1972 से ही मेरे परिचित थे, जब वे सोशलिस्ट पार्टी के नया टोला दफ्तर आते थे। भला हो बिहार विधान परिषद के तत्कालीन सभापति प्रो जाबिर हुसेन और भाकपा के विधान पार्षद केदारनाथ पांडेय का जिन्होंने विधान परिषद में दबाव डाल कर उन्हीं मंत्री जी से उस पुल की मरम्मत करवा दी। परिणामस्वरूप गांव से सब्जी लदा ट्रक एक बार फिर बाहर जाने लगा। गरीब किसानों को फिर कुछ आय होने लगी।

यह इलाका जातीय दृष्टि से मिलीजुली आबादी वाला क्षेत्र है। याद रहे कि वह पुल अंग्रेजों का ही बनाया हुआ था। हाल के महीनों में मेरे गांव और आसपास विकास की जो किरणें पहुंची हैं, उसमें मेरा कोई योगदान नहीं है। धुआंधार विकास के काम में लगी राज्य सरकार के छोटे या बड़े मंत्री या अधिकारी लोगों में से कोई यह भी नहीं जानता कि मेरा गांव कौन सा है। यह इसलिए यहां कहा जा रहा है कि मेरे गांव का विकास, बिहार में जारी सामान्य विकास कार्यों का ही एक छोटा हिस्सा है, जो मेरे गांव तक पहुंचा है। सामान्य विकास के कारण वैसे लोगांे पर छोटी-मोटी नौकरियां दिलवाने के लिए दबाव पड़ना कम हो जाता है, जो लोग नौकरियां देनेवालों को जानते हैं।

वैसे भी मेरे गांव के लोग मेहनती और उद्यमी हैं। खानपुर के शिवशंकर सिंह का नाम उदाहरणार्थ लिया जा सकता है, जिन्होंने किसी सरकारी मदद के बिना ही मेहनत और उद्यम के बल पर पिछले कुछ दशकों में अपनी आर्थिक परेशानियां दूर कर लीं। वैसे कुछ और लोग भी हैं। अब जब सरकार सुदूर इलाकों में भी साधन पहुंचा रही है, तो आर्थिक परेशानियों से अब भी जूझ रहे बचे-खुचे लोग भी देर सवेर उसकी बदौलत अपनी आर्थिक परेशानियां कम कर सकते हैं। इससे पहले भी सरकार ने सिंचाई के लिए जब मेरे इलाके में एक सरकारी नलकूप भी नहीं लगाया, तो लोगों ने अपने प्रयासों से सत्तर-अस्सी के दशक में अपने खेतों में बेचने के लिए तरह-तरह की हरी सब्जियां उगानी शुरू कीं। वहां से सब्जियां ट्रकांे में लद कर दूर -दूर तक जाने लगीं हैं। उससे पहले जो कई सीमांत किसान महाजनों और जमीन खरीदनेवालों पर निर्भर रहते थे, वे अब अपने लिए ईंट के मकान भी बनाने लगे।

पर इस खुशी के साथ दिघवारा के चिकित्सक डाॅ मदन राय को एक खुशी का लम्बे समय से इंतजार है। लोकप्रिय चिकित्सक डाॅ राय दिघवारा के साथ- साथ खानपुर - भरहापुर बाजार में भी प्रैक्टिस करते हैं और जदयू के नेता भी हैं। पर, दिघवारा में बिजली उपकेंद्र की स्थापना के उनके व दिघवारा की जनता के प्रयास को अब तक सफलता नहीं मिल पाई है, जबकि डाॅ राय कहते हैं कि वहां उपकेंद्र बनाने के लिए सरकारी जमीन उपलब्ध है और योजना को बिहार कैबिनेट की भी मंजूरी मिल चुकी है। दिघवारा की जनता इस संबंध में बिजली बोर्ड, बिजली मंत्री और मुख्यमंत्री को आवेदन पत्र दे चुकी है।

(27 फरवरी, 2009)

सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

पर्यावरण,सरकार और मीडिया

पर्यावरण संतुलन कायम रखने में इस देश की सरकारें पूरी तरह विफल रही हैं। पर्यावरण संतुलन बिगड़ते जाने की इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए अब मीडिया का एक हिस्सा इस ओर पहले की अपेक्षा अधिक ध्यान देने लगा है। यह खुश खबरी है। ‘डाउन टू अथर्’’ पत्रिका की संपादक सुनीता नारायण तो पहले से ही इस मामले में ऐतिहासिक काम कर रही हैं। पर हाल में एक ’ाालीन व जिम्मेवार इलेक्ट्रोनिक चैनेल एनडीटीवी ने भी यह सामाजिक जिम्मेदारी उठाई है। यह चैनल इन दिनों पर्यावरण जागरूकता के क्ष्ेात्र में भी बढि़या काम कर रहा है। उम्मीद है कि कुछ अन्य चैनल भी इस दिशा में जल्दी ही आगे आएंगे। इलेक्ट्रानिक चैनलों का भारतीयों के मानस पर भारी असर है।
अखबारों को भी चाहिए कि वे अब पर्यावरण को अलग एक प्रमुख ‘बिट’ के रूप में स्वीकार करें। क्योंकि बढ़ते पर्यावरण असंतुलन की यह समस्या काफी गंभीर बनती जा रही है। वैसे भी मीडिया का काम सूचना, शिक्षण और मनोरंजन ही तो है, पर केंद्र और राज्य सरकारें पर्यावरण के क्षेत्र में पहले जैसे ही अब भी लापारवाह हंै। यह लापारवाही इस बात के बावजूद है कि सुप्रीम कोर्ट ने सन् 1991 और उसके बाद बार -बार केंद्र और राज्य सरकारों को यह हिदायत दी कि वे प्राथमिक से विश्वविद्यालय स्तर तक पर्यावरण की पढ़ाई पृथक और अनिवार्य विषय के रूप में करे, ताकि कम- से-कम आनेवाली पीढियां तो इस गंभीर समस्या के प्रति जागरूक हों। इस आदेश को मानते हुए सीबीएसई और आईसीएसई से जुड़े विद्यालयों ने तो पृथक और अनिवार्य विषय के रूप से पर्यावरण की पढ़ाई शुरू कर दी । पर बिहार सरकार, विश्वविद्यालय तथा अन्य कुछ सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को नजरअंदाज ही कर दिया। या फिर इस तरह उसका पालन किया ताकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मंशा ही पराजित हो जाए। बिहार सरकार ने पर्यावरण विषय को अन्य कई विषयों के साथ मिला दिया और उस समाज अध्ययन को पढ़ाने के लिए भूगोल के टीचर पर जिम्मेदारी सौंप दी।
पटना के एएन काॅलेज तथा कुछ अन्य काॅलेजों में पर्यावरण विज्ञान व जल प्रबंधन विषय में बीएससी और एमएससी स्तर की पढ़ाई होती है और हर साल उनकी डिग्रियां दी जाती हैं, पर बिहार सरकार के पास उन डिग्रियों का कोई मोल नहीं है। यानी इन विषयों में पास करके कोई छात्र बिहार सरकार के किसी स्कूल या यहां के किसी विश्वविद्यालय या काॅलेज में शिक्षक नहीं बन सकता। सामाजिक कार्यकर्ता मिथिलेश कुमार सिंह ने सूचना के अधिकार के तहत बिहार सरकार के शिक्षा विभाग से कई महीना पहले एक सूचना मांगी। उन्होंने पूछा है कि बिहार सरकार के शिक्षा विभाग, शिक्षण संस्थान या यहां किसी भी विश्व विद्यालय में ऐसा कौन सा पद है जो सिर्फ पर्यावरण विज्ञान में एमएससी की डिग्री पाए उम्मीदवार को ही दिया जा सकता है ? ठीक उसी तरह, जिस तरह किसी कालेज के गणित विभाग में वही टीचर बन सकता है जिसके पास गणित में स्नातकोत्तर की डिग्री हो। पर इसका उत्तर अब तक शिक्षा विभाग की तरफ से नहीं आया है। लगता है कि ऐसा कोई भी पद नहीं है। यदि कोई पद ही नहीं है तो बिहार सरकार या फिर यहां के विश्व विद्यालय पर्यावरण विज्ञान की पढ़ाई करा कर छात्र छात्राओं के जीवन और कैरियर को क्यों बर्बाद कर रहे हैं ? यदि पर्यावरण विज्ञान के बदले वे गणित पढ़ते तो कम से कम विश्वविद्यालयों और काॅलेजों के गणित विभागों में नौकरी की उम्मीद रख सकते थे। पर बिहार सरकार के कुछ खास नीति निर्धारकों को किसी के जीवन बर्बाद होने या नहीं होने से कितना मतलब रह गया है ? उनकी प्राथमिकताएं तो कुछ और ही हैं।
इस देश में बढ़ते पर्यावरण असंतुलन को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण आंदोलन के महत्वपूर्ण नेता एम.सी.मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में लोकहित याचिका दायर की।सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका संख्या-860-91 पर विचार करते हुए 22 नवंबर 1991 को यह आदेश दिया कि राज्य सरकारें मैट्रिक स्तर या फिर इंटर स्तर तक पर्यावरण विषय को पृथक और अनिवार्य रूप से पढ़ाने की व्यवस्था करे। काॅलेज और विश्व विश्वविद्यालय स्तर पर भी इस विषय की पढ़ाई की अनिवार्यता कायम करने की संभावना पर इस देश के विश्वविद्यालय विचार करें। किंतु इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं हुआ। जहां तक बिहार के स्कूलों में पर्यावरण की पढ़ाई का सवाल है तो इसे समाज विज्ञान का हिस्सा बना दिया गया है और इसे भूगोल के टीचर पढ़ाते हैं।
पर पर्यावरण विज्ञानी डा बिहारी सिंह बताते हैं कि आज पर्यावरण विज्ञान का जो सिलेबस है, उसमें भूगोल का हिस्सा मात्र सात प्रतिशत ही है।कोई भूगोल का टीचर उस विषय के साथ न्याय नहीं कर सकता।
खैर, अब बिगड़ते पर्यावरण की एक झलक। पर्यावरण से जुड़ी दुनिया की मशहूर संस्था वल्र्ड वाइल्डलाइफ फंड ने भविष्यवाणी की है कि जिस रफ्तार से संसाधनों की लूट हो रही है, उस हिसाब से अगले 50 साल के अंदर कार्बन डायआक्साइड सोंखने वाले सारे जंगल उजड़ जाएंगे और समुद्र की मछलियां गायब हो जाएंगी। न शुद्ध हवा मिलेगी और न शुद्ध पानी मिलेगा। इस बिगड़ती स्थिति को संभाल लेन के लिए हमारे पास सिर्फ सात साल का समय ही बचा है। तब तक नहीं संभला तो बाद में हम चाहते हुए भी नहीं संभाल पाएंगे।
सूखती और गंदे नाले में तब्दील होती गंगा नदी की दशा देख कर हम भविष्य की कल्पना कर सकते हैं। हाल में स्वामी रामदेव के नेतृत्व में संतों ने कान पुर से ही गंगा को बचाने के लिए अभियान शुरू करने का फैसला किया तो वहां के सांसद व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल घबरा गए और उन्होंने प्रधान मंत्री से संतों को मिलवाया। इसके बाद गंगा बेसिन प्राधिकार बनाने का केंद्र सरकार ने फैेसला भी किया। पर बाद में इसे भी भुला दिया गया। अब तक ऐसी कोई खबर नहीं मिली है कि प्राधिकार ने कोई बैठक भी की हो।पता नहीं ,हमारी तकदीर में क्या लिखा हुआ है जहां की विभिन्न सरकारों में ऐसे ऐसे नीति निर्धारक बैठे हुए हैं जो पर्यावरण की रक्षा का महत्व ही समझने को तैयार नहीं हैं।अब तो इस देश का भगवान ही मालिक है। सरकारों को जगाने के काम में लगा कोर्ट भी अब थक चुका।शायद मीडिया खास कर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया ही कोई असर पैदा करे !
(8 फरवरी, 2009)

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

राजनीति में एक और प्रयोग

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कल कहा कि ‘हम रहेंगे या भ्रष्टाचार ।’ अपनी ही सरकार के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ नीतीश कुमार की जारी जंग को देख कर सन् 1969 की इंदिरा गांधी और 1990 के लालू यादव की जंगों की याद आती है। इन नेताओं ने भी तब अलग- अलग तरह से जंग की थी। यह और बात है कि दोनों नेताओं को अपनी जंग में आंशिक सफलता ही मिली थी। अब देखना है कि नीतीश कुमार को अपनी मौजूदा जंग में पूरी सफलता मिलती या नहीं ! पर मौजूदा जंग की पूर्ण सफलता के लिए यह जरूरी है कि पुरानी जंगों की गलतियों से शिक्षा ली जाए। सन् 1990 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की जंग आरक्षण विरोधियों के खिलाफ थी। वीपी सिंह की सरकार ने केंद्रीय सेवाओं में पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की तो आतुर आरक्षण विरोधी सड़कों पर आ गए। आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है जिसका विरोध अदूरदर्शितापूर्ण कदम रहा है। इसी विरोध और प्रति-विरोध की जंग में लालू प्रसाद बिहार की राजनीति के महाबली हो गए थे।यह और बात है कि इस जंग से मिली राजनीतिक ताकत का उन्होंने सदुपयोग नहीं किया। पर एक बात जरूर हो गई कि योग्यता के बावजूद अब बिहार में किसी सवर्ण के मुख्य मंत्री बनने की फिलहाल कोई संभावना नहीं नजर आ रही है। यानी अपनी अदूरर्शिता के कारण सवर्णों के बीच के आरक्षण विरोधियों ने खुद सवर्ण नेताओं का ही नुकसान कर दिया। उन दिनों जब आरक्षण विरोधी और आरक्षणपक्षी लोग आपस में जहां तहां भिड़ रहे थे तो बिहार विधान सभा के प्रेस रूम में बैठकर यदा कदा मैं कहा करता था कि यदि ‘सवर्ण लोग गज नहीं फाड़ेंगे तो उन्हें एक दिन थान हारना पड़ेगा। ’कांग्रेस के पूर्व विधायक हरखू झा मेरी इस टिप्पणी के गवाह हैं। पर कई लोग इसे मेरा लालू समर्थन मानते थे। ठीक उसी तरह कई लोग आज नीतीश सरकार के विकास कार्यों को लेकर मेरी तरफ से कभी कभी हो रही तारीफ को एक व्यक्ति का नाहक गुणगान मानते हैं। आज के हालात की तुलना इंदिरा गांधी के कार्यकाल और लालू प्रसाद के कार्यकाल की से जा सकती है। तब आम लोगों को लगा था कि इंदिरा जी उनके भले के लिए निहितस्वार्थियों से लड़ रही हैं। सन् 1990 में पिछड़ों को लगा था कि लालू प्रसाद उनके लिए लड़ रहे हैं। याद रहे कि पिछड़ों की आबादी आरक्षण विरोधियों की अपेक्षा काफी अधिक है। इसी तरह गरीबों की आबादी इस देश में काफी अधिक है। परिणामस्वरूप 1971 के लोक सभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत हुई और सन् 1991 के चुनाव में लालू प्रसाद की भारी विजय हुई। अब उसी तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ जब नीतीश कुमार मुख्य मंत्री की कुर्सी पर बैठ कर लड़ रहे हैं तो उन्हें भी इसका लाभ जन समर्थन के रूप में मिलेगा ही। क्योंकि देश -प्रदेश की बहुमत आबादी किसिम -किसिम के भ्रष्टाचारों से इन दिनों काफी पीडि़त है। सन् 1969 में कांग्रेस के महा विभाजन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया और पूर्व राजाओं को हासिल प्रीवी पर्स समाप्त कर दिए। गरीब लोगों को लगा कि इंदिरा गांधी सचमुच गरीबी हटाना चाहती हैं। इंदिरा गांधी ने उन दिनों बार बार यह बयान दिया कि ‘इंदिरा गांधी चाहती है गरीबी हटाना और प्रतिपक्ष चाहता है इंदिरा गांधी हटाना।’ इस नारे का काफी असर हुआ।हालांकि तब मैं एक लोहियावादी समाजवादी कार्यकर्ता था, फिर भी मैं भी इंदिरा गांधी के इस लुभावने नारे से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। तब मैं सुरेंद्र अकेला के नाम से प्रतिष्ठित साप्ताहिक ‘दिनमान’ तथा अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में चिट्ठयां तथा लेख लिखा करता था। दिनमान में छपा एक पत्र भी किसी लेख से कम असरदार नहीं होता था। तब मैंने इंदिरा जी के गरीबपक्षी कदमों की तारीफ में दिनमान में पत्र लिखा, जो छपा। उन्हीं दिनों मैं दिल्ली गया हुआ था। पत्रिका ‘जन’ और मेनकाइंड के दफ्तर में मुझे ओम प्रकाश दीपक, विनय कुमार तथा कुछ अन्य समाजवादी बुद्धिजीवी मिले। उन्होंने देखते ही मुझे झाड़ लगानी शुरू कर दी। ‘अकेला, तुम कैसे इंदिरा के झूठ के प्रभाव में आ गए ? यह सब जनता को धोखा देने का उनका एक तरीका मात्र है।’ उनकी वरीयता और विद्वता को देखते हुए मैं चुप रह गया। पर मैं तब उनकी बातों से तनिक भी प्रभावित नहीं हुआ था। पर बाद के वर्षों में मुझे लगा कि वे कितना सही थे और मैं कितना गलत। इंदिरा जी ने सन् 1971 में लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल कर लेने के बाद आम लोगों की गरीबी हटाने के बदले अपने पुत्र की अमीरी बढ़ाने के लिए सरकारी साधन झोंक दिए। यानी मारुति कार कारखाना खोलवा कर वे अपने परिवार को इंडिया का फोर्ड बनाने की कोशिश में लग गईं। इंदिरा जी के शासनकाल में भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप जरूर मिल गया। इसका प्रमाण बाद में खुद उनके पुत्र राजीव गांधी ने दिया। सन् 1984 में प्रधान मंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि दिल्ली से एक रुपया चलता है, पर जनता तक उसमें से मात्र 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। बाकी पैसे बिचैलिए खा जाते हैं। ऐसी व्यवस्था किसने तैयार की ? समय के साथ देश व प्रदेश में भ्रष्टाचार बढ़ता गया। उसी के खिलाफ नीतीश कुमार इन दिनों जंग कर रहे हैं। पता नहीं, इस जंग में वे सफल होंगे या नहीं। पर, यदि सफल होते हैं, तो उससे उन्हें इंदिरा गांधी और लालू प्रसाद की तरह ही राजनीतिक ताकत मिलेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि यदि ताकत मिली, तो नीतीश कुुमार उस ताकत को इंदिरा गंाधी और लालू प्रसाद की तरह जाया नहीं करेंगे।
(6 फरवरी, 2009)

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

पड़ोसी -निरपेक्ष शहरी जीवन

आज सुबह सोकर उठा, तो देखा कि मेरा फोन कई दिनों के बाद एक बार फिर ‘डेड’ हो गया। आशंका थी कि संभवतः गत रात में भी किसी उदंड ट्रक ड्रायवर ने फोन के तार की परवाह किए बिना गाड़ी दौरा दी होगी। घर से बाहर निकला, तो दूर से ही यह लग गया कि तार फिर टूटा हुआ है। पर पोल के निकट जाने पर लग गया कि यह तो किसी तार कटवा की कारस्तानी है। कटे हुए फोन तार का बचा हुआ, हिस्सा साफ इसकी गवाही दे रहा था। इतना ही नहीं, तार का जो हिस्सा घर से भीतर बच गया है, उसके आस-पास के सामान की हालत दयनीय हो गई। बाहर तो तार काटा गया, पर भीतर से झटके से उसे खींच लिया गया, जिससे ट्यूब लाइट क्षतिग्रस्त हो गई। यानी आशियाना नगर फेज वन सरीखे शांत और शालीन मुहल्ले में भी चोर निर्भीक हो गए हैं। बड़े अपराधी जरूर इन दिनों अपेक्षाकृत शंात हैं । पर, छोटों पर लगाम कस जाना अभी बाकी है। पटना का यह एक ऐसा मुहल्ला है, जहां महिलाएं रात में भी भोजन के बाद सड़क पर टहल सकती हैं। यहां किसी भी मकान के साथ एक दूकान खोल देने की छूट नहीं है। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस मुहल्ले के सभी गेट एक साथ नहीं खुले रहते हंै। सफाई -व्यवस्था ठीक -ठाक है। जलापूर्ति को लेकर भी कोई शिकायत नहीं है, पर किसी अन्य शहरी इलाके की तरह यहां भी यह जरूरी नहीं है कि एक पड़ोसी अपने बगल के किसी मकान में रहनेवाले के बारे में जाने। किराए के मेरे आवास के पड़ोस के मकान मालिक साल में एक -दो बार ही कुछ दिनों के लिए ही यहां आते हैं। बाकी महीने वह घर खाली यानी बंद रहता है। उस मकान में यदा -कदा चोर ऐसे ही चोरी की कोशिश करते पाए जाते हैं, जिस तरह किसी बंद पड़े मकान में चूहे या तेलचट्टे उछल कूद करते रहते हंै। उस मकान मालिक ने किसी स्थानीय व्यक्ति को अपना फोन नंबर तक नहीं दिया है, ताकि किसी दुर्घटना की स्थिति में उन्हें सूचना दी जा सके। मेरे घर के भीतर आया फोन का तार उसी बंद पड़े मकान के अहाते से होकर गुजरता है। शायद चोर को लगा होगा कि वह उसी खाली मकान में लगे फोन का तार काट रहा है। उसे किसी तरह के प्रतिरोध का भय नहीं रहा होगा। हालांकि मेरा यह अनुमान गलत भी हो सकता है। तार कटने का कोई और कारण भी हो सकता है। हालांकि इस घटना ने मुझे चैंकन्ना कर दिया है। अब हमें कुछ अधिक ही सावधान रहना पड़ेगा। क्यांेकि बीट पुलिसिंग की कोई झलक मेरे घर तक अभी नहीं पहुंची है। अपनी रक्षा खुद ही करनी है। इसके साथ ही फोन महकमे के बारे में भी दो शब्द। इस बार तो मेरे फोन का तार ट्रक से नहीं टूटा है, पर इससे पहले कई बार ट्रकों या बड़े वाहनों का कोप मैं झेल चुका हूं। वाहन के टकराने से फोन का तार टूटने का एक मात्र कारण है कि मेरे घर के सामने फोन का पोल जरूरत के अनुसार पर्याप्त ऊंचा नहीं है। मैं तो इस मुहल्ले के लिए नया हूं, पर देखने से लगता है कि फोन के पोल जब लगे होंगे, तो सड़क की ऊंचाई कम रही होगी। अब ऊंचाई बढ़ गई है और पोल छोटा पड़ चुका है। इसलिए छोटे वाहनों से तो तारों को कोई कष्ट नहीं होता, पर कभी -कभी बड़े वाहन आते हैं तो फोन को डेड कर जाते हंै। एक पत्रकार के लिए फोन कितना जरूरी है, यह बात कोई पत्रकार ही समझ सकता है। फोन महकमे वालों के लिए इस महत्व का कोई मतलब नहीं है। एक समय था कि जबकि पत्रकारों सहित कुछ महत्वपूर्ण नागरिक सेवाओं से जुड़े लोगों के फोनों की समय -समय पर टेस्टिंग होती रहती थी, ताकि यह देख लिया जाए कि फोन किसी कारणवश बंद तो नहीं है। ऐसे फोनों की एक सूची फोन महकमा अपने पास रखता था। इस टेस्टिंग के लिए किसी तरह की शिकायत करने की जरूरत नहीं पड़ती थी।पर जिस तरह अन्य क्षेत्रों में भ्रष्टाचार, गिरावट और काहिली ने घर कर लिया है, उससे फोन महकमा अछूता कैसे रह सकता है ? अब शिकायत कीजिए और कई दिनों तक इंतजार कीजिए। इसके अलावा कोई चारा ही नहीं है। बड़े अफसरों को कहने का भी अब आम तौर पर कोई फायदा नहीं होता। अब तो मैंने कुछ कहना भी छोड़ दिया है। एक कटु अनुभव के बाद मुझे फोन महकमे से काफी निराशा हुई। जब मैं मजिस्ट्रेट कालोनी में रहता था, तो मेरे पास दो फोन थे। एक का नंबर 2586562 है, जो अब भी मेरे पास है। और दूसरे का नंबर था- 2586732 । दूसरा नंबर सन् 1996 में मैंेने अपने एक रिश्तेदार को दे दिया। उसके नाम फोन ट्रांसफर भी हो गया। उस व्यक्ति ने अलग से जमानत राशि भी जमा कराई जैसा कि नियम है। अब मेरे द्वारा जमा कराई गई जमानत राशि वापस होनी चाहिए थी। पर, करीब तेरह साल होने को है। अब भी मैं उस जमानत राशि का इंतजार कर रहा हूं। प्रारंभ के कुछ वर्षों तक तो मैंेने काफी दौड़- धूप की, पर बाद में हार कर छोड़ दिया। हालांकि इससे पहले संबंधित दफ्तर में फोटोग्राफर नरेंद्र देव के साथ जाकर वहां सुनील कुमार सिन्हा नामक एक अफसर को संबंधित सारे कागजात मैंने सौंप दिए थे और यह भी लिख कर दे दिया था कि फोन सेट की कीमत मेरी जमानत राशि में से काट ली जाए। याद रहे कि जिस रिश्तेदार को मैंने फोन ट्रांसफर किया था, उसे फोन महकमे ने कोई फोन सेट नहीं ही दिया। ऐसे कटु अनुभव के बावजूद मैं यह उम्मीद करता हूं कि फोन महकमे से अब और अधिक लोगों की नाराजगी नहीं बढ़े। क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र का भी जीवित रहना जरूरी है।
(तीन फरवरी, 2009)

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

सराहनीय श्रवण कुमार पुरस्कार

इससे बेहतर कोई खबर नहीं हो सकती थी जो अभी -अभी मिली है। महावीर मंदिर न्यास समिति ने श्रवण कुमार पुरस्कार के लिए समिति की घोषणा कर दी। शारीरिक रूप से अक्षम माता-पिता की निःस्वार्थ सेवा के लिए श्रवण कुमार पुरस्कार कायम किया गया है। इसके लिए अनुशंसा भेजने की आखिरी तारीख 31 मार्च, 2009 तय कर दी गई है। पटना स्थित महावीर मंदिर की न्यास समिति और किशोर कुणाल इसके लिए बधाई के पात्र हैं। कु-पुतों और कु-पतोहुओं की बढ़ती संख्या के बीच उपेक्षित माता-पिता के लिए बड़ी राहत भरी खबर है। शायद इन पुरस्कारों के जरिए उनकी उपेक्षा कुछ कम हो सके। मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एसएन झा ने पुरस्कार समिति की अध्यक्षता स्वीकारी है। इससे इस समिति की विश्वसनीयता भी बढ़ी है। साथ ही पुरस्कार की राशि भी आकर्षक है। यानी प्रथम पुरस्कार एक लाख रुपए का है। दूसरा पुरस्कार 50 हजार रुपए का। तीसरा पुरस्कार 25 हजार रुपए का है। इसके अलावा 25 लोगों के लिए सांत्वना पुरस्कार एक -एक हजार रुपए का है। शिशु कन्या भ्रूण हत्या और दहेज प्रताड़ना की तरह ही उपेक्षित माता-पिता की समस्या भी इस देश और प्रदेश में चिंताजनक होती जा रही है। सरकार की तरफ से समुचित सामाजिक सुरक्षा के अभाव में यह समस्या और भी विकराल होने वाली है। ऐसे में अपने ढंग से महावीर मंदिर न्यास ने सकारात्मक पहल की है। अभी तो इसकी शुरुआत हो रही है, पर यदि साधन-सुविधा में बढ़ोतरी हो तो बाद के वर्षों में ऐसे अनेक पुरस्कारों की व्यवस्था जिला स्तर पर भी की जानी चाहिए। पर सवाल यह भी है कि एक किशोर कुणाल कहां -कहां क्या -क्या करेंगे ! एक व्यक्ति की अपनी सीमा भी है। बुजुर्गों की उपेक्षा संयुक्त परिवार के टूटते जाने से और भी बढ़ी है। स्व-केंद्रित युवा वर्ग अभी यह महसूस ही नहीं कर रहा है कि उसके घर में भी एक दिन ‘बागवान’ फिल्म की कहानी दुहराने की नौबत आ सकती है। मैं हर सुनने वाले को कहता हूं कि तुम अपने पिता-माता को बीच- बीच में गांव से बुला कर अपने पास रखो और उनकी सेवा करो, ताकि तुम्हारे बढ़ते हुए बच्चे भी देख कर यह सीख सकें। इससे होगा यह कि तुम्हारे बच्चे जब बड़े हो जाएंगे, तो वे भी तुम्हारा ध्यान रखेंगे। जिन कुछ देशों में भारत की तरह बड़ी संख्या में अरबपति पैदा नहीं होते, वहां भी बेरोजगारी और वृद्धावस्था पेंशन की राशि इतनी अधिक होती है, जिससे उनका जीवन चल जाता है। पर हमारे यहां जहां जनता के पैसे ही लूट कर कुछ लाख लोगों को तो अत्यंत अमीर बनने की छूट सरकार ने दे रखी है, पर मुझे हर माह सिर्फ 1046 रुपए पेंशन देती है। यदि मैं पत्नी और संतान के मामले में सौभाग्यशाली नहीं होता, तो क्या होता ? यदि रिटायर होने के बाद भी मुझमें काम करते रहने की शारीरिक क्षमता नहीं होती तो क्या होता ? यदि देश के संपादकों की मेरे प्रति सदाशयता नहीं होती, तो क्या होता ? पर, अमीर लोगों से भरे पड़े इस गरीब देश में मेरे जैसे कितने सौभाग्यशाली बुजुर्ग हैं ? मैंने अपनी पेंशन राशि सिर्फ उदाहरण के रूप में यहां पेश की। इसका कोई और उद्देश्य कतई नहीं है। यदि मेरी पेंशन राशि कम है, तो इसकी खुद मुझे कोई परवाह नहीं है। पर इससे इस देश की पेंशन व्यवस्था का पता तो चल ही जाता है। मेरी 1046 रुपए की पेंशन के बारे में भी कुछ शब्द और। यह पेंशन राशि भविष्य निधि के साथ जुड़ी हुई है। सरकार ने ठीक ही कल्पना की थी कि रिटायर करने के बाद भविष्य निधि की एकमुश्त राशि से तो आम तौर पर मकान निर्माण, लड़की की शादी तथा दूसरी जिम्मेदारियां पूरी होती हैं। यदि किसी रिटायरकर्मी का पुत्र दबंग और निकम्मा हुआ, तो वह उस एकमुश्त राशि को किसी-न-किसी बहाने झपट लेता है। फिर जीवन भर नौकरी निभा कर घर लौटा बुजुर्ग कैसे खाएगा ? इसी समस्या को ध्यान में रखकर शुरू की गई यह पेंशन योजना। पर इसकी अत्यल्प राशि तो देखिए। अन्य पेंशन राशि के विपरीत इस राशि में सालाना बढ़ोतरी भी नहीं होती। खैर यह तो एक अलग विषय है। इस पर सोचने की फुर्सत हमारे हुक्मरानों को नहीं है, जो आए दिन अपने वेतन, सुविधा और पेंशन बेशर्मी से बढ़ाते रहते हैं। जबकि उनमें से अधिकतर हुक्मरानों ने इन लाखों अत्यल्प पेंशनधारी बुजुर्गों की तरह जीवन भर लोक सेवा नहीं की है। जो हो, ऐसे लाखों लोग रिटयर होने के बाद इसी तरह की अत्यल्प राशि हर माह उठाते हैं। इनमें कुछ लोगों को तो मुझसे भी कम राशि मिलती है। ऐसे लोग अपनी संतान पर बुरी तरह निर्भर हंै, पर अधिकतर संतानों के लिए वे बोझ ही हैं। जिन बुजुर्ग लोगों के जीवन में किसी तरह की कोई पेंशन राशि नहीं है और यदि वे अपनी संतान की ओर से उपेक्षित हैं, तो कैसे उनका जीवन कटता होगा, इसकी कल्पना किशोर कुणाल ने की है। इसीलिए श्रवण कुमार पुरस्कार सामने आया है। शायद इन पुरस्कारों से उनमें से कुछ के जीवन में कुछ फर्क आए !
(दो फरवरी 2009)

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

नेता नहीं तो बाबा सही

कभी जेपी तो कभी वीपी और अब बाबा राम देव ! भ्रष्टाचार के खिलाफ इनके धारावाहिक अभियानों को यह देश देख रहा है। जेपी और वीपी के अभियान व संघर्ष तो बाद में कुछ भ्रष्ट व निकम्मे नेताओं के चलते एक तरह से निष्फल कर दिए गए। पर, अब बाबा राम देव के अभियान का क्या होगा ? इस प्रस्तावित अभियान के अच्छे नतीजों का देश को इंतजार रहेगा। जय प्रकाश नारायण ने सत्तर के दशक में भ्रष्टाचार तथा कुछ अन्य समस्याओं के खिलाफ अभियान शुरू किया था। अस्सी के दशक में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफर्स तथा अन्य कई घोटालों को लेकर देश में ऐसा समां बांधा था कि सन् 1989 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हार गई। सन् 1990 में देश की कई विधान सभाओं के चुनावों में भी कांग्रेस सरकारें बुरी तरह हार गईं। पर तब जिस तरह की जनता दल सरकारें बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में बनीं, उसने अपने काम काज से कांग्रेसियों को भी लजा दिया। भ्रष्टाचार बेतहासा बढ़ा। 1974 के जेपी आंदोलन के बाद केंद्र और राज्यों में जो सरकारें बनीं थीं,वे भी जेपी की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकीं, किंतु 1990 के बाद राज्यों में बनी सरकारों से फिर भी वे बेहतर थीं।जेपी आंदोलन से उपजी केंद्र की सरकार के मुखिया मोरारजी देसाई थे।बिहार में सन् 1977 में मुख्य मंत्री बने थे कर्पूरी ठाकुर और उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव।तीनों नेता व्यक्तिगत रूप से ईमानदार थे। इसीलिए शासन-प्रशासन में वैसी गिरावट नहीं आई जैसी बाद के वर्षों में आई। अब तो भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है कि नेताओं के बीच से भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाने वाला कोई नेता भी उपलब्ध नहीं है। भ्रष्टाचार से जर्जर राजनीति में अब वह नैतिक ताकत ही नहीं बची है।राज्य स्तर पर बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने जरूर भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान शुरू किया है,पर उस अभियान का भी बाहर-भीतर से इतना परोक्ष और प्रत्यक्ष विरोध हो रहा है कि मुख्य मंत्री अपने ही संघर्ष में हांफते नजर आ रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में स्वामी राम देव ने देश की राजनीति और शासन में कैंसर की तरह फैल रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के लिए कमर कस ली है।जेपी और वी।पी.की ताकत भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने से बढ़ी थी।जेपी हालांकि आजादी की लड़ाई के अप्रतिम योद्धा थे,पर सर्वोदय मेंे चले जाने के बाद उनकी सभाओं में कुछ सौ या हजार लोग ही आम तौर पर जुट पाते थे।पर जब उन्होंने 1974 में बिहार आंदोलन का नेतृत्व संभाला तो उन्हें सुनने के लिए लाखों लोग जुटने लगे थे। वीपी सिंह ने राजीव सरकार से संघर्ष का खतरा उठाया और भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया।लोगों ने उन पर विश्वास किया। क्योंकि वे भी व्यक्तिगत रूप से ईमानदार थे।पर अपने निधन के कुछ साल पहले वीपी सिंह ने यह कह कर देश को चैंका दिया कि उन्होंने बोफर्स को लेकर राजीव गांधी पर कोई आरोप ही नहीं लगाया था। उनका यह कहना सच नहीं था। सही बात यह है कि वी.पी.सिंह ने अपना पूरा बोफर्स अभियान राजीव गांधी के खिलाफ ही चलाया था। वीपी के पलटने से भी राज नेताओं की विश्वसनीय घटी। वैसे भी राजनीति में ं कितने लोग अब भी माजूद हैं जिनकी कुछ ताकत बची है और फिर भी वे भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाना चाहते हैं ? ऐसा नहीं हैं। संभवतः इसीलिए स्वामी राम देव को सामने आना पड़ रहा है। शारीरिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्वामी राम देव ने देश को जितना दिया है, उतना कम ही लोगों ने दिया है। जनता के एक बड़े हिस्से में उनकी काफी साख है। इसलिए उनको यह पूरा अधिकार है कि जनता की अन्य ज्वलंत समस्याओं पर अपनी राय रखें और उसके निराकरण के लिए अभियान चलाएं।गंगा की सफाई को लेकर उन्होंने जो अभियान चलाया,उसी का नतीजा है कि केंद्र सरकार ने गंगा बेसिन प्राधिकार बनाया। अब भ्रष्टाचार के खिलाफ जब भी वे अभियान शुरू करेंगे ,लोग उसे गंभीरता से लेंगे। शायद उसके कुछ अच्छे नतीजे भी सामने आएं।पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाना जितना जरूरी है, उसी अनुपात में उस अभियान में सफल होना उतना ही कठिन है। क्योंकि देश के हर क्षेत्र के प्रभावशाली लोगों में से अधिकतर लोग इस देश को अपनी पूरी ताकत से लूटने में लगे हुए हैं। जेपी और वीपी के विपरीत रामदेव ने अपने अन्य उपायों से संचित जन समर्थन की ताकत के बल पर अभियान शुरू करने का निर्णय किया है। वे यह भी कहते हैं कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय बाबा राम देव की यह समझ सही है कि देश की 99 प्रतिशत जनता ईमानदार है और 99 प्रतिशत नेता बेईमान हैं। याद रहे कि अनेक नेता यह तर्क देते हैं कि जब जनता ही चोर है तो नेताओं को भी वैसा बनने की मजबूरी है। बाबा ऐसा नहीं मानते। राम देव यह भी नहीं मानते कि देश की सिर्फ 5 प्रतिशत जनता ही टैक्स देती है। ऐसा प्रचार वहीं लोग करते हैं जो इस बात की अघोषित छूट चाहते हैं कि कुछ ही लोगांे ंको इस देश के संसाधनों के इस्तेमाल का हक हे। बल्कि सही बात यह है कि जो गरीब व्यक्ति नमक भी खरीदता है,वह भी टैक्स देता है और सरकार के संसाधनों पर उसका भी हक है। कुछ नेता यह कहते हैं कि भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता।रामदेव ऐसा नहीं मानते। इसी तरह की कुछ और बातें राम देव कहते हैं। यानी,देश की बीमारी की सही पहचान रामदेव ने कर ली है। जिस ईमानदार व योग्य डाक्टर ने मर्ज की सही पहचान कर ली,उसने बीमारी दूर भी कर दी। देखना है कि राम देव क्या कर पाते हैं। दुःखद बात यह है कि इस देश में जेपी कौन कहे, वीपी जैसे नेता भी अब उपलब्ध नहीं है। यह इस देश की राजनीति पर टिप्पणी है। इसीलिए राम देव को आगे आना पड़ रहा है। जबकि आज जेपी और वीपी के समय की अपेक्षा देश को अधिक गंभीर समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। (एक फरवरी, 2009)
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रविवार, 1 फ़रवरी 2009

‘भ्रष्टाचार से आजादी’ की लड़ाई जरूरी

इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि मेरा पत्रकार जीवन उसी कालावधि में शुरू हुआ जब देश और इस प्रदेश की राजनीति में भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर प्रवेश करने लगा था। भ्रष्टाचार को फलत,े फूलते और बढ़ते हुए इन आंखों ने देखा है।प्रशासन में भीषण भ्रष्टाचार तो कुछ बाद में फैला। उससे पहले राजनीति व प्रशासन में भ्रष्टाचार दाल में नमक के बराबर था। यह सन् 1969-70-71 की कालावधि थी।यही समय तीव्र जनांदोलन के शुरू होने का ंभी है। पहले नक्सल आंदोलन और बाद में जेपी आंदोलन।इन्हीं जनांदोलनों में से निकले कई पत्रकार भी बाद में मुख्य धारा की पत्रकारिता में आए। ये पत्रकार अन्य राज्यों के पत्रकारों से थोड़ा अलग रहे।जनांदोलनों से निकले या उनसे प्रभावित पत्रकारों के दिलो- दिमाग में भ्रष्टाचार और सामाजिक व आर्थिक उत्पीड़न के खिलाफ गुस्सा था। बिहार की मीडिया के उस हिस्से की ओर से उसका जिस तीव्रता से विरोध शुरू हुआ,वैसा शायद ही किसी अन्य प्रांत में शुरू हुआ।मैं भी उस हिस्से का एक छोटा पात्र रहा।परिणामस्वरूप पत्रकार यहां सरकारी दमन के अपेक्षाकृत अधिक शिकार बने।कुछ व्यक्तिगत परेशानियां सामने आईं तो कुछ सामूहिक परेशानियां पैदा करने की कोशिश की गईं। अस्सी के दशक का बिहार प्रेस बिल इसका एक उदाहरण था।हालांकि यह सब मैंने मुख्य धारा की पत्रकारिता में आने के बाद देखा और झेला। काॅलेज छोड़ने के बाद शुरूआती दौर में तो मैंने मीर गंज से प्रकाशित साप्ताहिक ‘सारण संदेश’,पटना से प्रकाशित ‘लोकमुख’ तथा साप्ताहिक ‘जनता’ और दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ के लिए काम किया।सन् 1977 में मुख्य धारा की पत्रकारिता यानी दैनिक ‘आज’ में काम करना शुरू किया।उसके बाद चर्चित दैनिक ‘जनसत्ता’ और आखिर मेंं दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के पटना संस्करण में राजनीतिक संपादक के रूप में काम करने का सुअवसर मिला। इस दौरान मैंेने यह महसूस किया कि बिहार की गरीबी का मुख्य कारण यहां के प्रशासन और राजनीति में तेजी से बढ़ता भ्रष्टाचार ही है। हालांकि यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि पक्ष-विपक्ष की राजनीति और राज्य सरकार के सारे कत्र्ताधत्र्ता बेईमान ही रहे। उनमें भी कुछ ईमानदार व कुछ अत्यंत ईमानदार भी रहे और आज भी हैं,जो आम लोगों के बारे ही अधिक सोचते हैं, पर आम तौर पर कई कारणों से वे प्रभावकारी नहीं हो पाते। इन बेईमान लोगों को कत्र्तव्यनिष्ठ पत्रकारों से हमेशा ही वैर रहा।ऐसे लोगों की यह आम धारणा रही कि ‘पत्रकार चाहे तो मेरे विरोधी होंगे ,या फिर समर्थक।’उन्होंने बीच की किसी स्थिति की कल्पना ही नहीं की। यह भी कि ‘यदि विरोधी हैं तो मेरे राजनीतिक दुश्मन के इशारे पर ही अपना लेखन करते हैं।’ अपनी मुख्य धारा की पत्रकारिता के काल में बिहार की राजनीति के दो चर्चित व विवादास्पद दिग्गजों ने अलग-अलग अवसरों पर पटना से मेरी बदली अन्यत्र करवाने की काफी कोशिश की थी। पर, उन अखबारों का प्रबंधन उनके दबाव में नहीं आया। मुकदमे, धमकियां और अन्य तरह की प्रताड़नाएं तो आम बात रहीं। इस बीच एक दिलचस्प बात भी हुई। एक सज्जन ने जिन्होंने मुझ पर मानहानि का केस कर रखा था, मिलने पर स्वीकार भी किया कि ‘आपने तो सही ही लिखा है। पर, यदि मैंने आप पर केस नहीं किया होता तो अन्य पत्रकार भी मेरे खिलाफ लिखने लगते। पर एक बात जरूर है कि आपने जो कुछ लिखा है, मैं जानता हूं कि उसका सबूत आपके पास उपलब्ध नहीं है।’ उनकी यह बात सही थी। उन दिनों सबूत इकट्ठा करना कुछ अधिक ही कठिन था। आज अपेक्षाकृत आसान है जिसका लाभ आज के पत्रकार चाहें तो उठा सकते हैं। पर आज एक दूसरी कठिनाई पत्रकारों के सामने है। मुसीबत पड़ने पर पत्रकार को संकट से बचाने वाले मीडिया प्रबंधन की कमी होती जा रही है। जो सरकारी धन विकास और कल्याण के लिए आवंटित होते रहे, उनमें से बड़ी राशि को लूट लिया जाता है।सन् 1998 में तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एन.सी.सक्सेना ने बिहार सरकार के बारे में यही लिखा था। बिहार की गरीबी बढ़ाने वाले भ्रष्ट नेताओं और अफसरों के खिलाफ उपलब्ध सूचनाओं को पाठकों तक पहुंचाने की आज भी जरूरत है।यह काम एक पैमाने पर हो भी रहा है।पर इसे तेज करने की आवश्यकता है। यह जरूरत पिछले 40 साल से अधिक रही है।मैंने अपनी पत्रकारिता के प्रारंभिक दौर से ही राजनीति व शासन के भ्रष्टाचार को अपने लेखन का प्रमुख मुद्दा बनाया।अब जब यहां के मुख्य मंत्री बिहार में कायापलट की कोशिश में लगे हुए हैं तो उन्हें भी लग गया है कि ‘अर,े भ्रष्टाचार के खिलाफ तो मामूली कदमों से काम ही नहीं चलेगा।क्योंकि स्थिति काफी बिगाड़ दी गई है।’नीतीश कुमार ने कहा है कि ‘मैंने तो भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध का एलान कर दिया है।’यह कोई मामूली बात नहीं है कि किसी मुख्य मंत्री को अपने ही शासन के भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध का एलान करने की जरूरत पड़ जाए।इस बात से यह समझा जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में हमारे कर्णधारों ने स्थिति कितनी अधिक बिगाड़ दी है।मुझे संतोष है कि भ्रष्टाचार के इस सहश्रमुखी राक्षस के खिलाफ संघर्ष में मेरे पास भी जो थोड़ी-बहुत शक्ति और बुद्धि रही है, उसे मैंने लगाया है। देखना है कि एक ताकतवर मुख्य मंत्री इस युद्ध में कितना और कब तक सफल होते हैं।आज की पत्रकारिता को उसी तरह ‘भ्रष्टाचार से आजादी’ की पत्रकारिता बनाने की जरूरत मैं महसूस करता हूं जिस तरह इस देश के अधिकतर हिंदी पत्रकार सन् 1947 से पहले ‘ब्रिटिश शासन से आजादी’ की लड़ाई के सिपाही भी थे। यदि भ्रष्टाचार नहीं मिटा तो इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। यदि लोकतंत्र नहीं रहा तो पत्रकार कहां रहेंगे ? पटना डायरी (31 जनवरी, 2009)

शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

बिहार में हुई थी गांधी के नैतिक मूल्यों की हत्या

सुरेंद्र किशोर
अक्सर मेरे मित्र, शुभचिंतक व रिश्तेदार मुझसे यह कहते रहे हैं कि मैं अब किताबें लिखूं। मैं करीब चालीस साल से पत्रकारिता में हूं, इसलिए वे ठीक ही कहते हैं। यह माना जाना चाहिए कि मेरे पास कुछ अनुभव इकट्ठे हो चुके हैं जिन्हें पाठकों के बीच भी बांटा जाना चाहिए। मैं भी चाहता हूं कि मैं कुछ किताबों पर पहले से जारी अपना स्थगित काम अब पूरा कर लूं। पर कुछ आलस्य और कुछ कार्य व्यस्तता के कारण फिलहाल यह संभव नहीं हो पा रहा है। शायद जल्दी ही इस दिशा में कुछ काम शुरू हो जाए ! कुछ वरिष्ठ पत्रकार मुझसे यह भी कहते हैं कि मैं कम से कम पत्रकारिता को लेकर अपने कुछ अनुभव बांटू। डर लगता है। आज कितने पत्रकार हैं जो किसी वरिष्ठ पत्रकार के साथ अनुभव बांटने को तैयार हैं ? शायद अत्यंत थोड़े ही हैं। उन थोड़े लोगों को इस डायरी की पहली किस्त के जरिए मैं बिहार के पत्रकारों से एक बात कहना चाहता हूं। यदि वे बिहार में या बिहार पर राजनीतिक पत्रकारिता करते हैं तो उन्हें कम से कम तीन चीजें पढ़ लेनी चाहिए। उनमें से पहली है अय्यर कमीशन की रपट। दूसरी है मधोलकर कमीशन की रपट। तीसरा है चारा घोटाले से संबंधित अदालत में दाखिल आरोप पत्र। अय्यर कमीशन और मधोलकर कमीशन की रपटों की कापियां पटना के ही गुलजार बाग में स्थित सरकारी प्रेस में मिल जाएंगीं। चारा घोटाले के आरोप पत्र की कापी कहां मिलेगी, यह तो मैं फिलहाल नहीं कह सकता, पर कहीं न मिले तो उन दिनों के दैनिक अखबारों की फाइलें तो पढ़ी ही जा सकती हैं। बिहार की राजनीति और राजनीतिक हस्तियों की दशा-दिशा समझने के लिए ये तीन चीजें जाननी चाहिए। इन्हें पढ़ने से इस राज्य की शासन व्यवस्था और यहां के नए-पुराने नेताओं व उनकी राजनीति की प्राथमिकताओं को समझने में सुविधा होगी। साथ ही किसी मुद्दे या व्यक्ति या दल पर अपनी राय तय करने में भी सहूलियत होगी। इनमें कई ऐसी बातें दर्ज हैं जिनकी चर्चा करने पर आज की पीढ़ी के कई लोग यह कह देते हंै कि शायद ऐसा नहीं हुआ होगा। आज महात्मा गांधी की पुण्य तिथि है। उनकी हत्या तो 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में हुई थी,पर उनके नैतिक सिद्धांतों की हत्या तो उनके ही कुछ प्रमुख बिहारी अनुयायियों ने उससे कुछ महीने पहले बिहार में ही कर दी थी। महात्मा गांधी ने बिहार में 1946 में गठित अंतरिम सरकार के एक मंत्री को हटा देने के लिए सरकार के मुखिया से कहा था। उस मंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप थे। पर तब सरकार के मुखिया ने ऐसा करने से साफ इनकार करते हुए कह दिया था कि मैं खुद इस्तीफा दे दूंगा, पर उस मंत्री को नहीं हटाउंगा। महात्मा उस मंत्री के बारे में कितना सही थे, यह बात अय्यर आयोग की रपट को पढ़ने से पता चलेगा। यह तो उदाहरण है। पर यह अकेला उदाहरण है, ऐसा कहना उस मंत्री के प्रति अन्याय होगा जिसे हटाने की सलाह बापू ने दी थी। बिहार एक दिन में बीमारू राज्य नहीं बना। इसे बीमारू और हास्यास्पद राज्य भगवान ने भी नहीं बनाया। बल्कि उन स्वार्थी नेताओं, अफसरों और समाज के दूसरे हिस्से के प्रभावशाली लोगों ने ही बनाया। इस दुर्गति का सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार ही रहा। अब जब इसे बीमारू राज्य से निकालने की कोशिश चल रही है तो इस काम में अनेक तत्व बाधक बन रहे हैं। ऐसी नौबत एक दिन में नहीं आई है। यह अकारण नहीं है कि मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने अपनी हाल की विकास यात्रा के दौरान यह घोषणा की कि वे अपनी ही सरकार में व्याप्त भष्टाचार के खिलाफ युद्ध छेड़ेंगे। यह भी अकारण नहीं है कि कल समाप्त हुए राजगीर जदयू चिंतन शिविर के मंच से मुख्य मंत्री को अपने ही दल के कार्यकत्र्ताओं से यह कहना पड़ा कि ‘लूट की छूट चाहिए तो दूसरा नेता चुन चुनिए।’
(30 जनवरी, 2009)