Saturday, February 20, 2010

निंदक नियरे राखिए

चीन ने कहा है कि भारत, मिसाइल टैक्नोलाजी के मामले में, चीन से अभी दस साल पीछे है। संभव है कि यह बात चीन ने अपने लोगों का मनोबल बढ़ाने के लिए कही होगी! यह बात भी संभव है कि इसमें शायद सच्चाई भी हो। इस संबंध में अंतिम वाक्य तो कोई वैज्ञानिक ही बोल सकता है। याद रहे कि अग्नि -3 के सफल परीक्षण के बाद यह खबर आई थी कि चीन के सुदूर उत्तरी इलाके भी अब भारत के हमले की जद में हैं।

खैर जो हो, पर निंदक नियरे राखिए........वाली कबीर वाणी कम से कम कुछ मामलों में तो इस देश को माननी चाहिए। इससे पहले चीन ने यह भी कहा था कि ‘भारत में सरकारी भ्रष्टाचार इतना अधिक बढ़ चुका है कि विकास व कल्याण कार्यों के लिए आवंटित पैसों में से अधिकांश, वैसे ही जाया हो जाता है जिस तरह छेद वाले किसी लोटे में से उसका अधिकांश पानी नीचे गिर जाता है। ’याद रहे कि चीन में भ्रष्ट लोगों के लिए फांसी की व्यवस्था है जबकि भारत में जो जितना अधिक भ्रष्ट है, उस व्यक्ति के लिए उतना ही अधिक महत्वपूर्ण पद पर पहुंच जाने की गुंजाइश है।

चीन की इन बातों का मनन करके यदि भारत खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करे तो यह कोई हेठी की बात नहीं होगी। हमारे बाद आजाद हुए चीन ने अनेक मामलों में हमसे बेहतर ढंग से अपने देश को बनाया है तो उसे उपदेश देने का नैतिक अधिकार भी है।

सरकारी भ्रष्टाचार को कम करने के मामले में हमारे देश का यदि खराब रिकार्ड है तो इसके लिए हमारे हुकमरान ही जिम्मेदार रहे हैं। पर यह भ्रष्टाचार रक्षा खरीद मामलों में भी अपना असर दिखा रहा है जो देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक बात है। हाल में यह भी खबर आई थी कि मुम्बई के ताज होटल आदि पर हुए आतंकी हमले के समय हमारे पुलिस अफसरों ने जो बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखे थे, वे घटिया थे क्योंकि उसकी खरीद में घोटाला हुआ था। सोफमा जैसी बेहतर तोप को छोड़कर हमने बोफर्स तोप खरीदी थी, यह बात तो जगजाहिर है। पर इसके अलावा बहुत सी बातें जगजाहिर नहीं होतीं और बड़े बड़े घोटाले पलते रहते हैं। इससे हमारी रक्षा तैयारियां पीड़ित होती है।

भले अब हम सन 1962 की स्थिति में नहीं हैं जब हमारी चीन से शर्मनाक हार हुई थी। पर हमें जो चीन तक पहुंचना चाहिए था, हम वह काम भी नहीं कर पा रहे हैं तो इसके पीछे विभिन्न सरकारी स्तरों पर व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार ही है। इस समस्या के कोढ़ में खाज का काम करती है उस भीषण भ्रष्टाचार के प्रति हमारे यहां की विभिन्न सरकारों व नेताओं की भारी सहिष्णुता।

कई बार यह कहा जा चुका है कि रक्षा मामलों में हमारी बदतर तैयारियों ने इस देश को विदेशी हमलावरों के समक्ष लाचार भी बना दिया था।

मध्य युग में बाबर कीे फौज में तोप थी तो राणा सांगा के सैनिकों के पास महज तलवारें और भालें। युद्ध में बाबर की ओर से एक तोप चलती थी और अनेक राजपूत वीर , तत्काल वीर गति को प्राप्त कर जाते थे। एक बार फिर तोप के सामने तलवार लेकर खड़े हो जाने के लिए सैनिकों की जमात तैयार हो जाती थी।

बाद के दिनों में भी इस देश में शाहजहां ने ताज महल और विशाल किलों के निर्माण में समय, शक्ति व धन तो खूब लगाये जबकि उसे देश की हमलावरों से रक्षा के लिए नेवी पर भी खर्च करना चाहिए था। हमलावर समुद्री मार्ग से भारत आये थे।

आज जब भारत का अपने पड़ोस से अच्छा संबंध नहीं है तो हमारी तैयारी भी ऐसी होनी चाहिए ताकि दुश्मन हमारे खिलाफ कोई खिलवाड़ करने से पहले थोड़ा रुक कर सोंचें। परमाणु संपन्न देश बन जाने के कारण भारत की सैनिक धाक जरूर बढ़ी है। पर वही काफी नहीं है। हमें आर्थिक रूप से भी एक संपन्न देश बनना पड़ेगा। इसके लिए भ्रष्टाचार पर काफी हद तक काबू पाना होगा। भ्रष्टाचार कम होने से रक्षा तैयरियों में भी बेहतरी आएगी। साथ ही देश का आर्थिक स्वास्थ्य भी सुधरेगा। गांवों में भी जो व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न होता है, उसे उसके विरोधी भी जल्दी उससे नहीं उलझते।

चीन का मन इसलिए भी बढ़ा रहता है क्योंकि भारत ने आजादी के बाद खुद को बुलंद नहीं बनाया। अब भी यहां 84 करोड़ लोग औसतन बीस रुपये रोज पर किसी तरह पेट को पीठ से अलग रखने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरी ओर इस देश में धनपशुओं, कालाबाजारियों, करोड़पति-अरबपति नेताओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है। इस देश का भारी धन विदेशी बैंकों की शोभा बढ़ा रहे हैं। ऐसे में चीन की निंदा को कबीर तरह हम लें तो हमारा ही भला होगा।

(दैनिक ‘जागरण’ पटना संस्करण:16 फरवरी 2010 से साभार)

Tuesday, February 2, 2010

राजनयज्ञों की उठती पीढ़ी

इस देश में नेता कई तरह के होते हैं। अत्यंत थोड़े से राजनयज्ञ यानी स्टेटसमैन होते हैं। कुछ अन्य नेता होते हैं। कुछ कबीलाई सरदार होते हैं। कुछ शुद्ध माफिया व हत्यारे होते हैं जो राजनीति भी करते हैं। कुछ जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंकों के सौदागर होते हैं। कुछ अन्य कोटियां भी हैं जिनकी चर्चा यहां उचित नहीं।

जब देश की सत्ता राजनयज्ञों या कम से कम नेताओं के हाथों में आती है तो देश भरसक सुरक्षित माना जाता है। पर जब बाकी श्रेणियों के राजनीतिक कर्मियों के हाथों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सत्ता आ जाती है तो देश या प्रदेश असुरक्षित माना जाने लगता है।

इस देश के साथ परेशानी यह पैदा हो रही है कि यहां एक-एक करके राजनयज्ञ यानी स्टेटसमैन उठते जा रहे हैं। ज्योति बसु अब हमारे बीच नहीं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी और जार्ज फर्नांडीस बुरी तरह बीमार हैं और सक्रिय राजनीति से दूर जा चुके हैं। एल.के. आडवाणी को परिस्थितियों ने किनारे कर दिया। उनके अर्ध-संन्यास के लिए वे खुद कतई जिम्मेदार नहीं हैं। यदि पूरे देश के राजनीतिक नजारे को गौर से देखें तो स्टेटसमैन शायद ही कहीं नजर आएगा। यदि इक्के-दुक्के हैं भी तो उनकी संख्या इतनी कम है कि वे देश पर आने वाले किसी संकट में कोई निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं हैं।

नेताओं की नई नई पीढ़ियां आंदोलनों की आंच से तप कर निकलती हैं। अब परिवारवाद के घरौदों से राजनीति में नई पीढ़ियां जबरन निकाली जा रही हैं। और इस अभागे व गरीब देश पर थोपी जा रही है। परिवारवाद की कल्पना ही स्वार्थ व जातिवाद पर आधारित है। इसलिए आम तौर पर परिवारवादी राजनीति का स्वरूप भी वैसा ही बनता जा रहा है। शायद ही किसी परिवारवादी नेता ने देश का भला किया हो। अपवादों की बात और है।

ब्रिटेन के प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल को स्टटेसमैन कहा जाता है। स्टेटसमैन न सिर्फ देश व दुनिया के सामने मौजूद समस्याओं से मजबूती व होशियारी से लड़ता है बल्कि राजनीति का स्वरूप भविष्य में कैसा हो सकता है, इसका भी सही अनुमान रखता है। चर्चिल ने सफलतापूर्वक द्वितीय विश्व युद्ध का नेतृत्व किया था। साथ ही उसे यह भी पता था कि आजादी दे देने के बाद भारत के नेतागण उस देश के साथ क्या कर गुजरेंगे। उनकी यह भविष्यवाणी भारत में सही साबित हुुई है जिसकी यहां अक्सर चर्चा होती रहती है। हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि भारत को आजाद करना गलत था।ं

पर आज जब हम भारत में स्टटेसमैन की कमी की चर्चा करते हैं तो हमारे दिलोदिमाग में यह बात रहती है कि यदि देश के सामने कोई बहुत बड़ी व खतरनाक समस्या आ जाए तो हमारे नेतागण उससे कैसे निपटेंगे।

आज भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या सरकारी भ्रष्टाचार है। इसी से लगभग अन्य सभी समस्याएं पैदा हो रही हैं। आज की भीषण महंगाई की समस्या भी सरकारी भ्रष्टाचार से ही पैदा हुई है। महंगाई से जूझने में हमारे देश व प्रदेश के नेतागण विफल हैं। जबकि निष्पक्ष विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यदि ईमानदारी, दूरदर्शिता व कड़ाई से इस समस्या का समय पर समाधान कर दिया गया होता तो आज यह इतना भीषण रूप नहीं ले पाता। सरकारी भ्रष्टाचार की समस्या से सफलतापूर्वक जूझने के लिए ऐसे राजनयज्ञों की सख्त जरूरत है जो ईमानदारी से इस बीमारी पर हमला करे। इसके लिए यह जरूरी है कि वह राजनयज्ञ खुद भी ईमानदार हांे। वैसे भी व्यक्तिगत ईमानदारी के बिना कोई राजनयज्ञ का दर्जा पा ही नहीं सकता।

आज इस देश में कितने नेता बच गये हैं जिनकी व्यक्तिगत ईमानदारी ‘सीजर की पत्नी की तरह संदेह से परे’ है ? ऐसे माहौल में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जरूरी कदम कौन उठाएगा ? यह एक बड़ी समस्या है जो समय के साथ इस देश में बढ़ती ही जा रही है। यह बात सही है कि अटल बिहारी वाजपेयी, जार्ज फर्नांडीस और ज्योति बसु ऐसी सरकारों में रहे जो भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं थी। पर ये तीन नेता कम से कम ऐसे तो माने ही गये जो सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर अपने तथा अपने परिवार के घर नहीं भरते थे। ये नेता जिन पदों पर रहे, उन पदें को तो कम से कम पैसे कमाने की मशीन बनाने से उन्होंने रोके रखा। पर आज अधिकतर सत्ताधारी व प्रतिपक्षी नेताओं की हालत कैसी है? एम.पी.-विधायक फंड ने तो अधिकतर नेताओं की बखिया उधेड़ कर रख ही दी है।

इस माहौल में ज्योति बसु जैसे राज नेताओं का जाना अखरता है। राजनयज्ञों की दिनानुदिन घटती संख्या और भी अखरने वाली बात है। यह देश व इसके लोकतंत्र के भविष्य के लिए कतई शुभ नहीं है। आगे- आगे देखिए होता है क्या !

साभार दैनिक जागरण पटना