शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

    संसद (सन 2001)जैसे हमले की पाक 

    साजिश पर भी भारत के ‘सेक्युलर’ दलों 

     व बुद्धिजीवियों की खतरनाक चुप्पी 

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  स्थानीय पलिस को सूचना दिए बिना 

   मुम्बई से एक आतंकी को दिल्ली 

   पुलिस ने किया गिरफ्तार

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      --सुरेंद्र किशोर--

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 पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइ.एस.आइ.के आतंकियों से हाल में पूछताछ की गई।

उससे यह पता चला कि इस देश में संसद जैसे हमले की उनकी एक और साजिश थी।

   उस साजिश को पुलिस ने विफल कर दिया है।

यानी, लगता है कि सरकार देश की सुरक्षा के लिए कारगर कदम उठा रही है।

यह भी लगता है कि खुफिया जानकारी एकत्र करने के लिए सरकार जो राशि आबंटित करती है,उसका अब बेहतर इस्तेमाल हो रहा है।

  किंतु क्या किसी राजग विरोधी दल के किसी नेता ने

इस साजिश के लिए पाकिस्तान व उसकी खुफिया एजेंसी की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है ?

हां,कुछ अखबारों ने इस साजिश के खिलाफ संपादकीय जरूर लिखा है।

यहां तक कि दिल्ली पुलिस के विशेष कोषांग ने महाराष्ट्र से एक आतंकी जान मोहम्मद शेख को गिरफ्तार किया।

ऐसा करने से पहले दिल्ली पुलिस ने महाराष्ट्र पुलिस को कोई जानकारी नहीं दी।

क्यों नहीं दी ?

इस पर अटकलें लगाई जा रही हैं।

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किसी ने ठीक ही कहा है कि कुछ राजग विरोधी दल पाक के खिलाफ ऐसे अवसर पर कोई बयान कैसे दे सकते हैं जबकि अगले साल यहां कई राज्यों में चुनाव होेने वाला है ?

 क्या आप पाकिस्तान में जाकर वहां के मुसलमानों से कह सकते हैं कि आप लोग मोदी को हराइए ?

शायद नहीं।

पर, पाक पहुंच कर कांग्रेस नेता मणिशंकर अयर ने 2015 में एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल से बातचीत करते हुए कह दिया था कि ‘‘पहले तो मोदी को सत्ता से निकालो।’’

  ऐसा वही नेता कह सकता है जो यह समझता या जानता है कि भारत के चुनाव में पाक के लोगों की भी परोक्ष भूमिका होती है।

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16 सितंबर 21


बुधवार, 15 सितंबर 2021

    16 वीं सदी का चित्तौड़ और

    आज का अफगानिस्तान !

    कितना फर्क-कितनी समानता ???

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--सुरेंद्र किशोर--

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16 वीं सदी में चित्तौड़ की तीन हजार महिलाओं ने

एक साथ खुद को जला लिया था।

उसे जौहर कहा गया।

  अफगानिस्तान में महिलाओं के साथ आज जो अत्याचार तालबानी कर रहे हैं,उसकी तस्वीरें टी.वी. पर देख कर

 चित्तौड़ की महिलाओं के बलिदान का कारण समझ में नहीं आया ? !!!

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तब कथित ‘‘महान अकबर’’ ने चित्तौड़ गढ़ के किले को घेर

रखा था।

 राजपूत महिलाएं समझ गईं थी कि यदि वे जिंदा रह गईं तो उनके साथ आतताई क्या-क्या करेंगे।

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जिन लोगों के हाथों में तलवारें थीं,उनकी महिलाओं को तो जौहर करना पड़ा था।

मुगल काल में इस देश के जिन आम लोगों के पास हथियार नहीं थे,उनके व उनके परिवार के साथ क्या-क्या हुआ था ?

उसकी कल्पना आज के अफगानिस्तान को देख कर आसानी से की ही जा सकती है।

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कुछ देशी-विदेशी शक्तियां भारत में भी ‘तालिबान सदृश्य शासन कायम करने की कोशिश में हैं।

हमारे यहां के वोटलोलुप नेतागण व कुछ खास विचार धारा के बुद्धिजीवी व इतिहास लेखक उनकी ऐसी घृणित कोशिश को जाने-अनजाने दशकों से बल पहुंचाते रहे हैं।

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अब समझ लीजिए कि यहां भी क्या-क्या  हो सकता है !

यदि आप संभले नहीं ,सचेत नहीं हुए और वैसे तत्वों का डटकर विरोध नहीं किया तो एक बार फिर ‘जौहर’ करना पड़ेगा।

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अफगानिस्तान में हो रहे अत्याचारों पर आज के भी कुछ भारतीय

नेता व बुद्धिजीवी पर्दा डाल रहे हैं।

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ठीक उसी तरह जिस तरह तीन हजार महिलाओं को जौहर करने पर मजबूर कर देने वाले शासक को भारत के कुछ इतिहासकारों व वोटलोलुप नेताओं ने ‘महान’ बताया।

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15 सितंबर 21


मंगलवार, 14 सितंबर 2021

     खाद्य सामग्री में आर्सेनिक

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    --सुरेंद्र किशोर--

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दैनिक ‘प्रभात खबर’,पटना ने यह खबर दी है कि बक्सर से भागलपुर तक गेहूं -आलू में आर्सेनिक के असर की पुष्टि की गई है।

इंडो -यूके रिसर्च प्रोजेक्ट में यह खुलासा हुआ है।

  अत्यधिक भू-जल दोहन को आर्सेनिक के बढ़ते असर की वजह बताया गया है।

 आर्सेनिक दिल,गुर्दा,फेफड़े पर असर करता है।

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पर्यावरण विज्ञानी और बिहार राज्य प्रदूषण बोर्ड के अध्यक्ष डा.अशोक कुमार घोष इस संबंध में बताते हैं कि 

‘‘डोर टू डोर जाकर लिए गए सैंपल के बाद यह पहली बार खुलासा हुआ है कि बिहार के विभिन्न इलाकों में पहुंच रहे गेहूं और आलू में आर्सेनिक मौजूद है।

 यह सामान्य लिमिट से अधिक है।

सैंपल में लिये गए गेहूं या आलू बिहार से बाहर से आए बताए जाते हैं।

फिलहाल इस संबंध में घबराने की जरूरत नहीं है।

व्यापक जागरूकता की जरूरत है।

हमें अत्यधिक गहराई वाले नलकूप खनन को हतोत्साहित करने की जरूरत है।’’

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रिसर्च प्रोजेक्ट, डा.घोष और प्रभात खबर को धन्यवाद।

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पर, उससे हटकर मेरी समझ से बिहार में इस पर और अधिक जांच करने की जरूरत है।

पंजाब में आर्सेनिक और उससे बढ़ रहे कैंसर की समस्या बहुत अधिक है।देश में सबसे अधिक।

वहां की एक रपट के अनुसार किसान रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं का बहुत ही अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं।

वहां भी भूजल दोहन की गंभीर समस्या है।

पंजाब से आ रही खबर के अनुसार वहां भूजल दोहन के कारण पानी के साथ नीचे से निकल कर बालू जमीन की सतह पर आ जा रहा है।

उससे जमीन अनुर्वर होती जा रही है।

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निष्कर्ष--हमें ‘हरित क्रांति’ से पहले वाले जमाने में फिर से लौटना होगा।

यानी, जैविक खाद का इस्तेमाल करना होगा।

मैंने बचपन में गोबर खाद से उपजाए गए देसी गेहूं की रोटी खाई है।

 उसकी मिठास अब दुर्लभ है भले उसके दाने छोटे होते थे। 

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13 सितंबर 21 


 आमने-सामने की बातचीत हो 

या सोशल मीडिया पर चर्चा !

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बेहतर है कि बहस हार जाओ,पर दोस्त मत ‘हारो’।

   यानी, 

दोस्त मत छोड़ो।संबंध खराब मत करो।

बहस में जीतने के चक्कर में कई लोग, कई बार संबंध 

खराब कर लेते हैं।

बीच का रास्ता यह है कि ‘अनफंे्रड’ कर दो।

इससे यह होगा कि कभी मिलोगे तो शर्मिंदा नहंीं होना पड़ेगा।

सबको अपनी -अपनी राय रखने व उस पर अड़े रहने का पूरा अधिकार है।

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लोकतंत्र में हर पांच साल पर जनता किसी को गलत व किसी को सही साबित कर ही देती है।

मैंने दशकों से देखा है कि अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर इस देश के मतदाता अक्सर सही ही होते हैं।

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--सुरेंद्र किशोर

14 सितंबर 21   


सोमवार, 13 सितंबर 2021

     महाराणा प्रताप के बारे में 

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  (एक खास संदर्भ में )‘‘.......डूंगरपुर के महारावल ने पत्र लिखकर प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू को याद दिलाया था कि

 ‘‘राजस्थान के सभी राजा, (महाराणा प्रताप के परिजन) महाराणा को शाष्टांग नमस्कार करते हैं।

 जनता में उनका जितना मान है,वह तो भारत सरकार ने भी राज्यों के अधिमिलन के समय उनको देश का एकमात्र ‘महा राज प्रमुख’ बनाकर स्वीकार किया था।’’

( तब अन्य राजा ‘राज प्रमुख’ बने थे।)

   महारावल ने यह भी लिखा कि 

‘‘अंग्रेजी सरकार ने भी उनके विशिष्ट स्थान को स्वीकार कर 

उन्हें ब्रिटिश सम्राट् जार्ज पंचम के दिल्ली दरबार में ,जहां भारतीय राजाओं को अंग्रेज महाराजाधिराज के सामने झुककर उन्हें नजराना देना पड़ा था, हाजिर होने से बरी कर दिया था।’’(जबकि महाराणा उस दिन दिल्ली में ही थे।उन्होंने कोई उपहार भी जार्ज पंचम को नहीं भेजा था।

यह तो मानी हुई बात है कि उनके पूर्वज महाराणा प्रताप ने कभी मुगल यानी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की थी।)

याद रहे कि महारावल के पत्र के बाद नेहरू ने युवक महाराणा को दिल्ली आमंत्रित किया और उन्हें प्रधान मंत्री आवास में ठहराया।   

(--उपर्युक्त विवरण के मुख्य अंश एम.ओ.मथाई की पुस्तक ‘नेहरू के साथ तेरह वर्ष’ से साभार ।)

  आजादी के बाद नेहरू सरकार ने इतिहासकारों को निदेश दे दिया था कि छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप के शौर्य व वीरता का बखान करते हुए कोई इतिहास न लिखा जाए क्योंकि उससे हिन्दुत्व फैलेगा।

सेक्युलर व वामपंथी इतिहासकारों ने उस निदेश का पालन किया।

   दूसरी ओर, मुगल शासकों के सिर्फ अच्छे गुणों को उभारा गया और देसी राजाओं की सिर्फ कमियों का बखान किया गया।

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उस विकृत इतिहास का भारतीय जन मानस पर आज भी इतना अधिक असर है कि यदि आप महाराणा प्रताप के पक्ष में कोई सकारात्मक पोस्ट भी लिखें तो लाइक करने वाले मात्र एक-डेढ़ दर्जन से अधिक लोग नहीं होंगे।

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जबकि इधर यह खबर भी आई है कि वियतनाम के शासक की समाधि पर लिखा हुआ है कि 

‘‘यह महाराणा प्रताप के शिष्य की समाधि है।’’

(वैसे मैं अभी इस खबर की पुष्टि नहीं कर रहा हूं।हालांकि यह खबर तार्किक है।)

याद रहे कि अमेरिका के साथ युद्ध में वियतनाम के लोगों ने महाराणा प्रताप की युद्ध शैली अपनाई थी।

अमेरिका वियतनाम छोड़कर भाग गया था।

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  हमें यू.पी.के पूर्व राजा सुहलदेव की वीरता का पता भी तब चला जब वहां के एक पिछड़ा नेता ने उनके नाम पर एक राजनीतिक दल बना लिया।

याद रहे कि राजा सुहेलदेव ने सन 1033 में मुस्लिम हमलावर 

गाजी सल्लार मसूद को बहराइच में हुए युद्ध में 

हराया और उसे मार डाला था।

ऐसी बहुत सारी दबी हुई कहानियां हंै जिन्हें 1947 के बाद आम लोगों को जानबूझ कर नहीं बताया गया। 

याद रहे कि सुहेलदेव व महाराणा प्रताप जैसे राजाओं के समक्ष भी वैसी ही परिस्थितियां थीं जैसी परिस्थिति से आज अफगानिस्तान में है।

हालांकि हमारे सेक्युलर व नेहरूपंथी इतिहासकार लिख रहे थे कि तब राजा भूभाग के फैलाव के लिए आपस में लड़ रहे थे ।उन लड़ाइयों में कोई दूसरा तत्व नहीं था।  

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    सन 2005 में पश्चिम बंगाल की बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने ललित सूरी गू्रप को कोलकाता का ग्रेट ईस्टर्न होटल मात्र 52 करोड़ रुपए में आखिर क्यों बेच दिया ?

सार्वजनिक क्षेत्र के भारी समर्थक वाम मोर्चा को ऐसा क्यों करना पड़ा ?

 इतने सस्ते में क्यों बेचा ?

मैं नहीं मानता कि इसके बदले किसी वाम नेता को कोई रिश्वत मिली होगी या उन्होंने ली होगी।

 इस देश की राजनीति में भारी नैतिक गिरावट के बावजूद अब भी सामान्यतः वाम दलों के अधिकतर लोग अन्य अधिकतर राजनीतिक दलों के नेताओं की अपेक्षा अधिक ईमानदार हैं,रुपए पैसे के मामलों में।

  राष्ट्रहित के बारे में भले न हों !

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दरअसल मेरा अनुमान है कि ग्रेट ईस्टर्न होटल के प्रबंधन में ईमानदारी व कार्य कुशलता लाने में विफल वाम सरकार औने -पौने दाम में बेचने बेच देने को मजबूर हो गई।

ग्रेट ईस्टर्न होटल को बनाए रखने का अर्थ था-रोज -रोज सरकारी खजाने से घाटा पूरा करना।

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नब्बे के दशक में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने जब बड़े पैमाने पर विनिवेश शुरू किया अटल सरकार ने उसे जारी रखा तो उनके सामने भी वैसी ही मजबूरी थी।

मौजूदा मोदी सरकार के समक्ष भी वैसी ही मजबूरी है।

हां,मोदी सरकार जो कर रही है ,उसे ‘लीज’ करण कहते हैं न कि बिक्रीकरण।

बिक्रीकरण वही लोग बोल रहे है जो या तो अनजान हैं या राजनीतिक रूप से बेईमान। 

--सुरेंद्र किशोर

13 सितंबर 21

  

 


शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

     मीडिया क्या करे और क्या न करे ?

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      --सुरेंद्र किशोर--

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सन 1997 में पटना के जिस दैनिक अखबार का दाम 

ढाई रुपए था,वह अखबार आज 5 रुपए में बिक रहा है।

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1997 में गेहूं की कीमत प्रति क्ंिवटल 510 रुपए थी।

2021 में 1975 रुपए है।

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यानी, 24 साल में अखबार की कीमत बढ़कर सिर्फ दोगुनी हुई,पर अनाज की कीमत लगभग चैगुनी।

इस तरह अखबार प्रबंधन ने अपने दाम को आम मूल्य वृद्धि के अनुपात में बढ़ने नहीं दिया।

जबकि अखबार का लागत खर्च भी तो इस बीच बहुत बढ़ा।

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दुनिया में अखबार ही ऐसा उत्पाद है जो लागत खर्च से कम पर बिकता है।

दरअसल अखबार का घाटा विज्ञापनों से पूरा होता है।

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विाज्ञापन कौन देता है ?

सरकारी और निजी विज्ञापनदाता।

अखबार की बिक्री से भी कुछ राजस्व मिल जाता है।

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अब इस देश के कुछ राजनीतिक ,गैर राजनीतिक व बौद्धिक  ‘‘क्रांतिकारी’’ लोग यह चाहते हैं कि 

उनके बदले व उनके लिए अखबार ही ‘क्रांति’ कर दे।

जो काम क्रांतिकारी लोग नहीं कर सके,वह काम अखबार 

अपने विज्ञापनदाताओं को नाराज करने की कीमत पर भी उनके लिए करके दिखाए।

अन्यथा,वह ‘गोदी मीडिया’ है।

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मीडिया का कत्र्तव्य क्या है ?

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वही है जो बात नब्बे के दशक में बी.बी.सी.के एक पदाधिकारी ने बताई थी।

   नब्बे के दशक में मैंने पटना के दैनिक ‘इंडियन नेशन’ में सिंगापुर डेटलाइन से बीबीसी. के उप प्रधान की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी पढ़ी थी।

 उनसे पूछा गया था कि बी.बी.सी. की साख का राज 

क्या है ?

उन्होंने बताया कि 

‘‘यदि दुनिया के किसी देश में कम्युनिज्म आ रहा है तो हम यह सूचना लोगों को देते हैं कि आ रहा है।

उसे रोकने की कोशिश नहीं करते।

दूसरी ओर, यदि किसी देश से कम्युनिज्म जा रहा है तो हम रिपोर्ट करते हैं कि जा रहा है।

हम उसे बचाने की भी कोशिश नहीं करते।

 यही हमारी साख का राज है।’’

   (यह और बात है कि लगता है कि बी बी सी का इस बीच पुराना ध्येय बदल चुका है।)

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एक और बात।

सन् 1983 के जून की बात है।

  मैं नई दिल्ली में  नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर के आॅफिस में बैठा हुआ था।

एक खास संदर्भ में मैंने उनसे कह दिया कि आपका अखबार दब्बू है।

 वह इंदिरा गांधी के खिलाफ नहीं लिख सकता।

इस पर उन्होंने कहा कि ‘‘ नहीं सुरेंद्र जी , यू आर मिस्टेकन।

मेरा अखबार दब्बू नहीं है।

 आप इंदिरा जी के खिलाफ जितनी भी कड़ी खबरें  लाकर मुझे दीजिए, मैं उसे जरूर छापूंगा।

पर इंदिरा जी में बहुत से गुण भी हैं।

मैं उन्हें भी छापूंगा।

 एक बात समझ  लीजिए।

मेरा अखबार अभियानी भी नहीं है।’’

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और अंत में 

मेरी टिप्पणी--थोड़ा लिखना,अधिक समझना !!!

मेरा मानना है कि मीडिया यदि बीबीसी के तब के उप प्रधान व राजेंद्र माथुर की राह पर चले तो कोई भी विवेकशील व्यक्ति उसे 

गोदी मीडिया नहीं कहेगा।

(अविवेकशील लोगों की कोई जिम्मेवारी नहीं ले सकता।)  

न ही कोई सरकार उसका विज्ञापन बंद या कम करेगी।

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10 सितंबर 21


 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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    निष्क्रिय दलों के निबंधन 

   रद करने की आयोग की सरकार से मांग

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इस देश के चुनाव आयोग को यह अधिकार तो हासिल है कि वह किसी राजनीतिक दल का निबंधन करे।

पर, आयोग को निबंधन रद करने का अधिकार नहीं है।

इसलिए आयोग ने एक बार फिर केंद्र सरकार से अनुरोध किया है कि वह यह अधिकार प्रदान करे।

चुनाव आयोग यह मांग दशकों से केंद्र सरकार से करता रहा है।

पर निहितस्वार्थ ने इस मांग को पूरा नहीं होने दिया।

उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी सरकार इस मांग पर निरेपक्ष ढंग से देशहित में विचार करेगी।

  इस देश करीब 2700 राजनीतिक दल चुनाव आयोग में निबंधित हैं।

किंतु चुनाव आयोग सूत्र बताते हैं कि इनमें से करीब 4 से पांच सौ दल ही सक्रिय हैं।

इनके अलावा अधिकतर दल वर्षों तक कहीं कोई उम्मीदवार तक खड़ा नहीं करते।

किंतु वे राजनीतिक दलों को सरकार की ओर से मिली सुविधाओं का लाभ जरूर उठाते हैं।

  अधिकतर निबंधित दलों के खिलाफ यह शिकायत मिलती रहती है कि वे ‘मनी लांैड्रिंग’ यानी काले धन को उजला बनाने के धंधे में लगे हुए हैं।साथ ही, वे कर वंचना का काम भी करते हैं।

  याद रहे कि राजनीतिक दलों को चंदा लेने और आयकर से छूट पाने का विशेष अधिकार मिला हुआ है।  

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उच्च सदन में मनोनयन

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राज्य सभा और विधान परिषद के लिए क्रमशः राष्ट्रपति और राज्यपाल सीमित संख्या में सदस्य मनोनीत करते हैं।

संवैधानिक प्रावधान के अनुसार ‘‘वैसे व्यक्तियों को मनोनीत किया जाना चाहिए जिन्हें साहित्य,विज्ञान,कला और समाजसेवा 

में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव हासिल हो।’’

  इस संवैधानिक प्रावधान का जितना उलंघन होता है,उतना शायद ही किसी अन्य प्रावधान का होता होगा।

 राज्य सभा और विधान परिषद में मनोनयन के मामले में लगभग सभी दलों का रवैया एक जैसा ही रहा है।

यह रवैया पुराना है।

जहां तक मेरी जानकारी है, बिहार में विधान परिषद में मनोनयन के मामले में अंतिम बार सन 1978 में नियम का पालन हुआ था।

कर्पूरी ठाकुर के मुख्य मंत्रित्वकाल में पोद्दार रामावतार अरूण,डा.जयनारायण मंडल,सियाराम तिवारी और जगदीश सिंह बिहार विधान परिषद में मनोनीत हुए थे।

  साठ और सत्तर के दशकों में तीन पत्रकार जरूर मनोनीत  हुए।

  किंतु पत्रकारों को मनोनीत करने की अनुमति संविधान नहीं देता।

  याद रहे कि जो पत्रकार तब मनोनीत किए गए थे,उनके नाम हैं-श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार(आर्यावर्त),शम्भूनाथ झा (सर्चलाइट)और एस.के.घोष(पी.टी.आई.)।

  राज्य सभा में मनोनयन के मामले में भी संवैधानिक प्रावधान का उलंघन होता  रहा है।

हाल में राष्ट्रपति ने एक पत्रकार और एक वकील को मनोनीत किया ।

  जब खुद सरकार कानून या संविधान का उलंघन करती है तो दूसरे लोगों को भी उलंघन करने की अघोषित छूट मिल जाती है।

  इस मामले में केंद्र सरकार एक काम कर सकती है।

वह संविधान के अनुच्छेद-80 (3) में संशोधन कर दे।

या फिर मौजूदा अनुच्छेद का अक्षरशः पालन करे।

संशोधन इस तरह हो सकता है।

राष्ट्रपति या राज्यपाल ऐसे लोगों को मनोनीत करेंगे जिन पेशों के लोगों का निम्न सदन में समुचित प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता है।  

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भूली-बिसरी याद

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सन 1977 में जब प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने लोक सभा चुनाव की घोषणा की तो जार्ज फर्नंडिस ने शंका जताई थी कि चुनाव में धांधली होगी ।इस तरह कांग्रेस चुनाव जीत जाएगी।

उससे इमरजेंसी को वैधता मिल जाएगी।

 खुद जार्ज चुनाव लड़ने को तैयार नहीं थे।

  बड़ैदा डायनामाइट केस के सिलसिले में 

जार्ज को दिल्ली

कोर्ट में हाजिर होना पड़ता था।तब वे तिहाड़ जेल में थे।

एक दिन खुद मोरारजी देसाई नामांकन पत्र का फार्म लेकर अदालत पहुंच गए।तब जार्ज ने उस पर हस्ताक्षर कर दिया।

जार्ज मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़े और भारी बहुमत से विजयी हुए।

  किंतु मेरी समझ से चुनाव लड़ने से मना करने का एक कारण और भी था।

आपातकाल के दौरान मैं जार्ज फर्नांडिस से पटना के अलावा बारी -बारी से बंगलोर,दिल्ली और कलकता में मिला था।

 याद रहे कि वह गहरे भूमिगत (डीप अंडरग्राउंड)थे।

  उनमें से किसी एक मुलाकात में जार्ज ने एक अखबार की रिर्पोटिंग की चर्चा की।

वह रपट इंदिरा गांधी की एक सभा की थी।

रपट के साथ संवाददाता का नाम भी छपा था।

उस संवाददाता के लिए जार्ज के मन बहुत सम्मान था। 

वह समझते थे कि वह संवाददाता गलत लिख ही नहीं सकता।

उस संवाददाता ने लिखा था कि बीस सूत्री कार्यक्रम ने गरीब जनता पर सरकार के पक्ष में भारी सकारात्मक असर डाला है।

संवाददाता ने लिखा कि मैंने सभा में उपस्थित श्रोताओं की आखों में इंदिरा जी के लिए भारी समर्थन के भाव देखे।

यानी जब चुनाव की घोषणा हुई तो जार्ज को लगा होगा कि 

धांधली व जन समर्थन के मिले-जुले प्रभावों के कारण कांग्रेस चुनाव जीत जाएगी।

   एक विशेष परिस्थिति यानी इमरजेंसी में भी किसी संवाददाता की रिपोर्टिंग से कोई नेता कितना गुमराह हो सकता है,उसका यह एक उदाहरण था।

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और अंत में

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जब भी किसी नेता या उसके रिश्तेदार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में मुकदमे शुरू होते हैं।

 या, जांच शुरू होती है ।

तो नेता झट से कह देता है कि बदले की भावना से सरकार एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है।

नेता  यह नहीं कहता  कि आरोप गलत है या सही।बदले की भावना वाला आरोप दशकों से लगाया जाता रहा है।

ऐसे में एक सवाल उठता है।

यदि आरोप कोर्ट में अंततः गलत साबित होता है तो पीड़ित व्यक्ति कानून की संबंधित धाराओं के तहत जांच एजेंसी पर अदालत में केस कर सकता है।पर ऐसा वह कभी नहीं करता।

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प्रभात खबर

पटना

10 सितंबर 21

 


गुरुवार, 9 सितंबर 2021

 नरेंद्र मोदी बहुत अच्छे प्रधान मंत्री हैं।

 किंतु कुल मिलाकर सबसे अच्छा प्रधान मंत्री होना बाकी है।

   यदि वे सांसद फंड समाप्त कर देने का साहस करें तो मेरी राय में वह सबसे अच्छा प्रधान मंत्री माने जाएंगे।

दरअसल सांसद फंड इस देश के ‘‘भ्रष्टाचार के रावण की नाभि का अमृत कुंड’’ बन चुका है।


सोमवार, 6 सितंबर 2021

 किसान महा पंचायत के लिए कूच कर रही लक्जरी कारों और एस.यू.वी.का लंबा काफिला देखकर बहुत अच्छा लगा।

  हमारा देश बदल रहा है।

उम्मीद है कि एक वक्त ऐसा भी आएगा कि सामान्य मध्यम वर्ग भी इतनी महंगी कारों और लंबे सैर सपाटों के लिए खर्च वहन कर पाएगा।

     --संदीप घोष

      दैनिक जागरण

       6 सितंबर 21


रविवार, 5 सितंबर 2021

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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 करीब एक हजार जातियों में से किसी को भी आरक्षण का लाभ नहीं 

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सन 1993 में केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए मंडल आरक्षण लागू हुआ।

सरकारी अधिसूचना भले 1990 में जारी हुई थी।

इस बीच मामला कोर्ट में था।

केंद्रीय सूची में पिछड़ी जातियों की कुल संख्या 2633 है।

इनमें से करीब 1000 जातियों में से किसी व्यक्ति को मंडल आरक्षण का लाभ अब तक नहीं मिल सका है।

   इसके लिए कौन -कौन से तत्व जिम्मेदार हैं ?

इस बात का पता कैसे लगाया जाए ?

पता लगेगा तभी तो उसका निदान होगा।

तभी देश का समरूप विकास होगा।

  यदि जातीय और आर्थिक गणना होगी तभी तो इस बात का पता चल पाएगा कि उन एक हजार जातियों  की कुल आबादी कितनी है ? 

उनकी आर्थिक -शैक्षणिक स्थिति कैसी है ?

उसे कैसे बेहतर बनाया जाए ?

   इसी तरह यह भी देखा जाना चाहिए कि गैर आरक्षित समूह में भी किस हिस्से को योजना और नौकरियों में लाभ कम मिल रहा है ।

  याद रहे कि सन 2017 में गठित रोहिणी न्यायिक आयोग की पड़ताल से पिछड़ों के बारे में उपर्युक्त आंकड़ा सामने आया है।

  रोहिणी आयोग ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी है।

  मिली जानकारी के अनुसार आयोग ने 27 प्रतिशत आरक्षण को चार भागों में बांट देने की सिफारिश की है।

   यदि यह सिफारिश मान ली गई तो केंद्र की सूची में शामिल 97 मजबूत पिछड़ी जातियों को 27 में 10 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा।

  1674 जातियों को दो प्रतिशत, 534 जातियों को 6 प्रतिशत और शेष 328 जातियों को 9 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा।

  याद रहे कि यह आरोप लगता रहा है कि आरक्षण का  लाभ मजबूत पिछड़ी जातियों को ही अधिक मिलता रहा है।

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उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद ही 

तैयार हो सकेगा दलीय गठबंधन

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लोक सभा के अगले चुनाव को ध्यान में रखते हुए 

गैर राजग दल एकजुट होने की गंभीर कोशिश कर रहे हैं।

पर उन्हें मन वांछित सफलता नहीं मिल रही है।

अभी सफलता मिलेगी भी नहीं।

आखिर क्यों ?

इसलिए कि कुछ दल उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव का नतीजा देख लेना चाहते हैं।

विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यदि वहां भाजपा जीत गई तो 

प्रतिपक्षी एकता की पूर्ण सफलता संदिग्ध हो जाएगी।

क्योंकि तब राजनीति के मौसम वैज्ञानिक सक्रिय हो जाएंगे।

यदि यू.पी.मंे भाजपा हार गई तब तो 

गैर राजग दलों का मनोबल बढ़ जाएगा और उनकी उम्मीदें भी।

हालांकि यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि 

सन 2024 में नरेंद्र मोदी सत्ताच्युत ही हो जाएंगे। 

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     अंचल कार्यालय में मंत्री लगाएं 

     जनता का दरबार 

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रिश्वतखोरी से पीड़ित जनता की वास्तविक व्यथा राज्य सरकार को समझनी -जाननी है ?

यह जानना है कि अंचल और पुलिस थाना स्तर पर लोगों का कैसे दोहन किया जाता है ?

कैसे -कैसे बहाने बनाकर काम को लटकाया जाता है ?

एक ईमानदार मुख्य मंत्री भला क्यों नहीं जानना चाहेगा ?

फिर तो एक काम कीजिए।

हर तीन महीने पर प्रत्येक जिले के एक अंचल कार्यालय मंे जनता का दरबार लगाइए।

पर उस दरबार में जिले के किसी मंत्री या जन प्रतिनिधि को मत रखिए।

 किसी अन्य जिले से आने वाले किसी मंत्री के साथ सचिवालय स्तर के किसी वरीय अफसर को लगा दीजिए।

 जनता का ऐसा ही दरबार पुलिस थाने में भी लगे।

थाना भवन से थोड़ा हटकर। 

यदि हर जिले के एक- एक अंचल व थाने को कवर कर लिया गया तो हांड़ी के चावल की स्थिति का पता चल जाएगा।

उससे जनता की व्यथा कम करने में राज्य सरकार को सुविधा होगी।

  किसी भी सरकार की लोकप्रियता का सीधा संबंध थानों व अंचल कार्यालयों के कामकाज पर निर्भर करता है।

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सांसदों-विधायकों के खिलाफ मामले

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जांच एजेंसियों की सुस्ती पर सुप्रीम कोर्ट नाराज है।

सबसे बड़ी अदालत की शिकायत है कि प्रवर्तन निदेशालय और सी.बी.आई.जैसी एजेंसियां भी कुछ खास नहीं कर रही हैं।

क्या सुप्रीम कोर्ट को जैन हवाला घोटाले का अनुभव याद नहीं है ?

दरअसल जहां घोटाला सर्वदलीय हो,वहां जांच एजेंसियां सुस्त पड़ ही जाती हैं।नब्बे के दशक के हवाला कांड में भी यही हुआ था।

 जहां तक वत्र्तमान व पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ जारी मुकदमों का सवाल है,वहां मौजूदा परिस्थिति में कुछ खास नहीं हो सकता।इसलिए कि समस्या सिर्फ मानव संसाधन की कमी की नहीं है। मंशा ही साफ नहीं है।

 कुछ खास हो,इसके लिए सबसे पहले आपराधिक मुकदमों की सुनवाई अन्य राज्य में करानी पड़ेगी।

अपने राज्य में गवाहों को धमकाना आसान हो जाता है।

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अपराधीकरण पर नकली आंसू

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राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ इस देश में सिर्फ नकली आंसू ही अब तक बहाए जाते रहे हैं।

होता कुछ नहीं है।

वैसे मौजूदा सरकार चाहे तो एक काम तो वह कर ही सकती है।

जिनके खिलाफ हत्या या बलात्कार के मामले में अदालत में आरोप पत्र दाखिल किए जा चुके हैं,उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया जाए।

इसके लिए कानून बने।

ऐसे उम्मीदवार को जो दल टिकट दे,उस दल की मान्यता चुनाव आयोग रद कर दे,यह भी नियम बने।

यदि सरकार कानून न बनाए तो सुप्रीम कोर्ट तत्संबंधी आदेश पारित कर दे।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी कानून का रूप ले लेता है।

संविधान के अनुच्छेद-142 का सहारा लेकर सुप्रीम कोर्ट ने करीब दो साल पहले राम मंदिर विवाद को सुलझा दिया था।

अब जब लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद व विधायिका की प्रतिष्ठा खतरे में है तो उस अनुच्छेद का इस्तेमाल करके सुप्रीम कोर्ट इसे भी बचा सकता है।बचाना भी चाहिए।

अन्यथा, अपराधियों व आर्थिक घोटालेबाजों से जब विधायिका पूरी तरह भर जाएगी तो फिर लोकतंत्र सिर्फ नाम के लिए ही तो रह जाएगा।

वैसे भी ‘वंशवादी राजनीति’ के बढ़ते असर से लोकतंत्र कराह रहा है। 

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और अंत में

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अगले लोक सभा चुनाव को लेकर एक जगह बात चल रही थी।

एक ने दूसरे से कहा,

‘‘मिलीजुली सरकारों के प्रधानमंत्री का पद अल्पायु होता है।’’

दूसरे ने जवाब दिया,

‘‘तो क्या हुआ ?

 किसी पर्वतारोही को हिमालय की चोटी पर अपना घर बनाते कभी देखा है आपने ?’’

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प्रभात खबर

पटना-27 अगस्त 21




 शिक्षक दिवस पर

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याद आए हमारे शिक्षक 

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सुरेंद्र किशोर

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इस अवसर पर मुझे वे सारे शिक्षक मुझे याद आते हैं 

जिन्होंने मुझे बारी -बारी से अपर प्राइमरी स्कूल

 से लेकर विश्व विद्यालय तक पढ़ाया।

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अपर प्राइमरी स्कूल,खानपुर

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सबके नाम तो याद नहीं किंतु सारण जिले के दरियापुर अंचल स्थित खानपुर अपर प्राइमरी स्कूल के हेड मास्टर धनुषधारी राय जरूर याद आते हैं।

 पास के गांव सुलतानपुर के निवासी थे।

उनका जीवन सादगीपूर्ण था।

वे अनुशासनप्रिय थे।

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मिडिल इंगलिस स्कूल, दिघवारा

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सहायक शिक्षक जनक सिंह याद आते हैं।

हेडमास्टर के पद पर बंगाली बाबू थे।

नाम याद नहीं।

उनकी छड़ी खूब चलती थी।

उसका छात्रों पर सकारात्मक असर होता था।

अब तो छड़ी रखने की भी मनाही हो गई है,चलाने की बात कौन कहे।

शिक्षा में गिरावट का एक कारण यह भी है।

अंग्रेजी में एक पुरानी कहावत है- 

स्पेयर द स्टिक एंड स्प्वायल द चाइल्ड।

यानी ‘‘छड़ी छोड़ दो और बच्चों को बिगाड़ दो।’’

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जयगोविंद हाई स्कूल,दिघवारा 

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याद आते हैं प्रधानाध्यापक हरिहर प्रसाद सिंह उप प्रधानाध्यापक जनार्दन राय और राम जंगल सिंह उर्फ जंगल बाबा।

  हरिहर बाबू अत्यंत योग्य शिक्षक थे।शालीनता की प्रतिमूत्र्ति।

वैसे भी उन दिनों अधिकतर शिक्षक योग्य होते ही थे।

निजी प्रबंधन वाले स्कूल में अयोग्य शिक्षक टिक भी नहीं सकते थे।

 जंगल बाबा तो कोई भी विषय पढ़ा सकते थे।

जगजीवन राम और जंगल बाबा बी.एच.यू. में सहपाठी थे।

जंगल बाबा इंजीनियरिंग भी पढ़े।

पर स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने के कारण बीच में पढ़ाई छोड़कर दिघवारा यानी अपने घर आ गए।

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अलख नारायण उच्च विद्यालय ,एकमा ,सारण

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बैकुंठनाथ सिंह हेडमास्टर थे।

साठ के दशक में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला था।

सिताब दियारा के मूल निवासी बैकुंठ बाबू के शिक्षण के कारण ही मेरी हिन्दी बेहतर हो सकी।

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महाराजा काॅलेज,आरा में एक साल

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कोई खास याद नहीं।

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राजेंद्र काॅलेज,छपरा

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प्रिंसिपल भोला प्रसाद सिंह केमेस्ट्री के अद्भुत शिक्षक थे।

कई सेक्सन के छात्रों को मैदान में शामियाना लगवाकर माइक-लाउड स्पीकर से पढ़ाते थे।

उनका क्लास करने के बाद घर आकर फिर वह चैप्टर पढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।

हिन्दी विभाग के डा.मुरलीधर श्रीवास्तव ‘शेखर’ की कक्षाओं ने हिन्दी साहित्य सिखाने के साथ-साथ हमें राजनीतिक रूप से भी जागरूक बनाया।

दिवंगत सांसद शैलेंद्रनाथ श्रीवास्तव के पिता शेखर जी हिन्दी के प्रचार के लिए कभी गांधी जी से जुड़े थे।

पर हिन्दी बनाम हिन्दुस्तानी के सवाल पर उनका गांधी जी से 

मतभेद हो गया । उन्होंने गांधी जी का साथ छोड़ दिया।

सुना है कि शेखर जी ने गांधी से कह दिया था कि हम पत्नी को बेगम नहीं कह सकते।

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पटना लाॅ काॅलेज

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मैंने यूं ही रानीघाट स्थित लाॅ कालेज 

में दाखिला जरूर करा लिया था,पर पढ़ने में जी नहीं लगा।

क्योंकि तब तक मैं राजनीतिक कार्यकत्र्ता बन चुका था।

हाजिरी बनाकर हम कक्षा से निकल जाते थे।

तीनों साल मैंने क्लास किया।

पर एक साल की भी परीक्षा नहीं दी।

 खैर,वहां इलाहाबाद के निवासी श्रीवास्तव जी प्राचार्य थे।

शिक्षक के.एन.पोद्दार व प्रयाग सिंह याद आते हैं।

‘‘मूट कोर्ट’’ में मेरे सहपाठी अशोक जी (कदम कुंआ निवासी) खूब जमते थे।

अंग्रेजों जैसी अंग्रेजी बोलते थे।

अब पटना हाईकोर्ट में वकालत करते हैं।

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शिक्षक दिवस पर मेरे गांव के विज्ञान शिक्षक चंद्रदेव राय याद आते हैं।

मैट्रिक स्तर पर मैंने उनसे उनके घर जाकर पढ़ा था।

उनकी अच्छी पढ़ाई के कारण मुझे मैट्रिक (1963) में अच्छा डिविजन आया।

वह जमाना परीक्षा में कदाचार का नहीं था।

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आज भी कोई ईमानदार सर्वे हो तो तो पता चलेगा कि किसी 

अन्य पेशे की अपेक्षा अब भी (जाली सर्टिफिकेट पर बहाल शिक्षकों को छोड़कर) समाज में आम शिक्षकों की इज्जत सबसे अधिक है।

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5 सितंबर, 21


 हमने नहीं जीता, बल्कि खुद भारतीयों ने 

भारत को जीत कर हमारे प्लेट पर रख दिया

 ---उदारवादी ब्रिटिश इतिहासकार 

      सर जे.आर. सिली

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--सुरेंद्र किशोर--

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 ब्रिटिश इतिहासकार सर जे.आर.सिली (1834-1895)ने लिखा है कि ब्रिटिशर्स ने भारत को कैसे जीता।

मशहूर किताब ‘द एक्सपेंसन आॅफ इंगलैंड’ के लेखक सिली  की स्थापना थी कि 

‘‘हमने (यानी अंग्रेजों ने) नहीं जीता,बल्कि खुद भारतीयों ने ही भारत को जीत कर हमारे प्लेट पर रख दिया।’’

  चैधरी चरण सिंह ने सर जे.आर.सिली की पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद करवाकर बंटवाया था।

  चरण सिंह ने एक तरह से हमें चेताया था कि यदि इस देश में गद्दार मजबूत होंगे तो देश नहीं बचेगा।

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मध्य युग में भी वीरता की कमी के कारण हम नहीं हारे।

बल्कि आधुनिक हथियारों की कमी और आपसी फूट के कारण हारे।

हमारे राजा अपने विदेशी दुश्मन की माफी को बार-बार स्वीकार कर उसे बख्श देते थे।

  पर, दुश्मन एक बार भी नहीं बख्शता था।

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आजादी के तत्काल बाद के हमारे हुक्मरानों ने यह सुनिश्चित किया कि ऐसा इतिहास लिखवाया जाए जिसमें हमारे देश के शूरमाओं के शौर्य और वीरता की चर्चा तक नहीं हो।

वे इस काम में सफल रहे।

उनका तर्क था कि इससे हिन्दुत्व पनपेगा।

यानी, भले दूसरा धर्म पनप जाए किंतु हिन्दुत्व न पनपे।

यही थी अपने वोट बैंक की रक्षा की उनकी रणनीति।

अब उनकी वह रणनीति फेल हो रही है।

पर उसने देश का नुकसान तो कर ही दिया।

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आज की स्थिति क्या है ?

आज की स्थिति का पता ठीकठाक यानी ईमानदार अध्ययन 

हो तो चल जाएगा।

वैसे वास्तविक स्थिति यह है कि आज इस देश में गद्दारों की संख्या मध्य युग और ब्रिटिश काल से भी काफी अधिक हो चुकी है।

  जिन्हें मेरी बात पर विश्वास न हो,वे कम से कम निजी टी.वी.चैनलों के डिबेट्स को ही ध्यान से देख-सुन लें।

इस तरह आज उपस्थित भीषण व चैतरफा खतरों के समक्ष इस देश का भगवान ही मालिक है।

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    3 सितंबर 21


 


आज के राजनीतिक कार्यकत्र्ता लोहिया

-जेपी के इस पक्ष को भी जरा जान लें !

उन्हें सिलेबस तक ही सीमित रखोगे ??

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पर,सवाल है कि उनकी यह सब ‘‘अव्यावहारिक

 बातें’’ जानने में कितनों की रूचि है ?

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खैर, मेरी रूचि बताने में जरूर है,चाहे कोई सुने या नहीं।

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--सुरेंद्र किशोर--

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1.-डा.राममनोहर लोहिया ने शादी नहीं की।

घर नहीं बसाया।

क्योंकि उनका मानना था कि जिन्हें सार्वजनिक जीवन में 

जाना है,उन्हें शादी नहीं करनी चाहिए।

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आज राजनीति में वंशवाद-परिवारवाद की ‘महामारी’ को देखने से यह लगता है कि शायद डा.लोहिया यह जान गए थे कि एक दिन यही सब होने वाला है।

नेहरू परिवार को तो वे देख भी चुके थे।

इन दिनों तो इन बुराइयों के कारण कुछ राजनीतिक दल मुरझाते भी जा रहे हैं।

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2.-लोक सभा के सदस्य रहने के बावजूद डा.लोहिया ने अपने लिए कार नहीं खरीदी।

वे कहते थे कि कार को मेन्टेन करने लायक मेरी आय नहीं है।

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लोहिया यह भी जान गए थे कि नेताओं को जायज आय से अधिक खर्च करने की आदत पड़ जाएगी तो देश घोटालों-महा घोटालों में डूब जाएगा ।

आज देश के कितने छोटे -बड़े नेतागण भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में मुकदमे झेल रहे हैं,उनकी गिनती की है आपने ?

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3.-लोहिया का नारा था-‘‘पिछड़े पावें सौ में साठ।’’

वे सभी जातियों-समुदायों की महिलाओं को भी पिछड़ा मानते थे।

 वे ऊंची जातियों के विरोधी नहीं थे।

बारी-बारी से उनके जितने भी निजी सचिव हुए,

सब के सब ब्राह्मण थे।

यह बात बहुत मायने रखती है कि कोई नेता किसे अपना निजी सचिव रखता है।

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याद रहे कि जातीय-साम्प्रदायिक वोट बैंक के किले में सुरक्षित हो जाने के कारण इस देश के अनेक नेताओं ने जितने भ्रष्टाचार व अनर्थ किए हैं,वह एक रिकाॅर्ड है।

यह आजादी के बाद से ही शुरू हो गया था।कुछ लोग कहते हैं कि उसके पहले से ही जारी था।

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4.-लोहिया ने एक बार एक ऐसे व्यक्ति को पार्टी छोड़ देने को कहा था कि जिसके भोजनालय में शराब भी बिकती थी।

रांची के उस व्यक्ति ने शराब का व्यापार छोड़ दिया,पर पार्टी नहीं छोड़ी। 

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इस देश में आज कितने नेता हैं जो शराब नहीं पीते ?

उसका राजनीतिक व गैर राजनीतिक युवा पीढ़ी पर कैसा असर पड़ता है ?

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5.-लोहिया ने 1967 के चुनाव से ठीक पहले कहा कि मैं सामान्य नागरिक संहिता के पक्ष में हूं।

इस पर उनके एक सहकर्मी ने कहा कि यह आपने क्या कह दिया ?!!

आप तो अब चुनाव हार जाएंगे।

उस पर डा.लोहिया ने कहा कि ‘‘मैं सिर्फ चुनाव जीतने के लिए राजनीति नहीं करता।

देश बनाने के लिए राजनीति करता हूं।’’ 

उस बयान के बाद वे चुनाव हारते -हारते जीते थे।

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सामान्य नागरिक संहिता संविधान के नीति निदेशक तत्वों वाले चैप्टर में है।

आज कितने नेता हैं जो अपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण संविधान या उसकी भावना की उपेक्षा नहीं करते हैं ?

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ये तो बानगी भर हैं।

उनके बारे में और

भी बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो राजनीति में आज कहीं नजर नहीं आतीं।

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अब जरा जयप्रकाश नारायण के बारे में

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जयप्रकाश नारायण का निजी खर्च कैसे चलता था,

आपको पता है ?

उनके गांव से अनाज आता था।

मेगसायसाय पुरस्कार में मिले पैसों को बैंक में जमा कर दिया गया था जिसके सूद से उनका खर्च चलता था।

उनके लिए कपड़े उनके कुछ संपन्न मित्र बनवा देते थे।फर्नीचर भी मित्रों से मिले थे।

उनके निजी सचिव का वेतन ‘‘इंडियन एक्सप्रेस’’ यानी राम नाथ गोयनका देते थे।

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ऐसा जीवन वे सत्ता को ठोकर मार कर खुशी -खुशी बिता रहे थे।

पचास के दशक में तत्कालीन प्रधान मंत्री व उनके मुंहबोले ‘‘बड़े भाई’’ जवाहरलाल नेहरू ने सरकार से सहयोग करने के लिए जेपी को आमंत्रित किया था।

पर जेपी ने उनके सामने कार्यक्रमों की सूची संभवतः 14 या 15 सूत्री पेश कर दी ।उसमें  बैंकों का राष्ट्रीयकरण भी शामिल था।

कहा कि इन्हें मान लीजिएगा तो हम आपकी सरकार को सहयोग करेंगे।

नेहरू ने उसे मानने में अपनी असमर्थता दिखाई।

जेपी भी पीछे हट गए।

जानकार लोग बताते हैं कि यदि जेपी नहीं हटे होते तो बाद में जो पद लालबहादुर शास्त्री को मिला,वह जेपी को मिल सकता था।

  पर जेपी तो उसके लिए नहीं बने थे।

जेपी की चिट्ठी पर नेहरू ने दिनकर जी को राज्य सभा का सदस्य बना दिया तो उन्हें क्या नहीं बना देते !

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लोहिया की तरह ही जेपी के बारे में भी और बहुत सारी बातें हैं जिसके लिए यह जगह यानी वाॅल छोटी पड़ती है।

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पहले के जमाने में ऐसे त्यागी-तपस्वी नेताओं के बारे में बड़े नेतागण अपने कार्यकत्र्ताओं को बताते हैं।

आज भी इक्के -दुक्के बताते होंगे।

पर अधिकतर नेता कहते हैं कि वह जमाना ही कुछ और था।

वह सब आज संभव नहीं है।

फिर सिलेबस से निकाले जाने पर हो -हल्ला क्यों ?

लगता है कि  उतना ही करना उनके वश में है।

तो मैं कौन  होता हूं रोकने वाला ?

जन्म दिन -पुण्यतिथि मनाइए,कभी कभी सिलेबस जैसे मामले उठा दीजिए, और फिर अपनी राह पर 

चलते रहिए !

पर कई बार यह राह नेता को कहीं और भी ले जाती है,यह भी याद रहे।

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कोई व्यक्ति आपको कितना महत्व देता है ?

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इसकी जांच कैसे होगी ?

उसकी जांच की अभी मैं सिर्फ दो कसौटियां बताता हूं।

1.- जो व्यक्ति अक्सर आपको फोन करके अकारण आपका बहुमूल्य समय जाया करता है,उसी से कभी किसी का मोबाइल/फोन नंबर पूछ कर देख लीजिए।

आम तौर पर वह नहीं बताएगा।

अपवादस्वरूप ही शायद कोई बता भी दे !

कोई बहाना बना देगा जबकि उसके पास वह नंबर मौजूद रहने के ठोस कारण होंगे।

यदि वह आपसे अधिक उम्र का है, तब तो कत्तई नहीं बताएगा।

अपवादोें की बात और है।

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2.- किसी जानकार व्यक्ति से कभी आप यह कह कर देखिए कि 

‘‘भई, फलां तथ्य का जरा पता लगाकर बता दीजिए।’’

 यदि बता दे तो समझिए कि वह आपको महत्व देता है।

यदि नहीं बताए,तब आप अपना बहुमूल्य समय उसे फोन पर क्यों देते हैं ?

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कसौटियां और भी हैं।

पर,मैंने सिर्फ वैसी ही दो बातें बताईं जिनमें किसी का कोई खास खर्च नहीं होता-एक फोन काॅल के खर्च के सिवा।

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--सुरेंद्र किशोर

28 अगस्त 21


    यासीन मलिक के खिलाफ सुनवाई जारी

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     यासीन मलिक ने ‘इंडिया टूडे’ से 

     बातचीत में स्वीकारा  था कि उसने 

    5 एयरफोर्स अफसरों की हत्या की थी।

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       --सुरेंद्र किशोर--

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कश्मीर में सन 1990 में 5 एयर फोर्स अधिकारियों की हत्या कर दी गई थी।

 आरोप जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के प्रधान यासीन मलिक 

तथा अन्य पर लगा।

उस मामले में आरोप पत्र कोर्ट में दाखिल हो चुका है।

जम्मू की अदालत में उस मुकदमे की सुनवाई चल रही है। 

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    अभियोजन पक्ष के पास आरोपितों के खिलाफ सबूत उपलब्ध हैं।

पर, अपने खिलाफ खास सबूत तो खुद यासीन मलिक ने ही ‘उपलब्ध’ करा दिया है।

  ‘इंडिया टूडे’ के संवाददाता के साथ बातचीत में मलिक ने स्वीकार किया था कि ‘‘मैंने ही एयरफोर्स अधिकारियों को मारा।क्योंकि वे निर्दोष नहीं थे।’’

   मैंने कुछ साल पहले इंडिया टूडे के एक अंक में वह इंटरव्यू पढ़ा था।

   अभियोजन पक्ष ऐसे स्वीकारात्मक इंटरव्यू के साथ अतिरिक्त चार्जशीट कोर्ट में दाखिल करता है।

धनबाद के मशहर मजदूर नेता बी.पी.सिन्हा हत्याकांड में अभियोजन पक्ष ने एडिशनल चार्जशीट लगाया था।

शूटर ने ‘जनसत्ता’ से बातचीत में स्वीकारा था कि मैंने फलां व्यक्ति के कहने पर सिन्हा को मारा।

पता नहीं, इंडिया टूडे के इंटरव्यू को आधार बनाते हुए अभियोजन पक्ष ने एडिशनल चार्जशीट दाखिल किया था या नहीं।

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5 सितंबर 21

 


 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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  40 मंजिली इमारत ध्वस्त करने का आदेश अन्य के लिए कड़ा संदेश

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सुप्रीम कोर्ट ने नोयडा में  सुपरटेक के एमराल्ड कोर्ट प्रोजेक्ट के 40 मंजिला टावरों को गिरा देने का आदेश दे दिया है।

 नियमों का उलंघन करके इसे बनाया गया है।

  यह अच्छी बात है कि मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अक्षरशः पालन करने का निदेश अफसरों को दे दिया है।

याद रहे कि ऐसे गैरकानूनी निर्माण संबंधित सरकारी अफसरों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं होता।

योगी आदित्यनाथ ने अफसरों की समिति बनाकर इस बात की जांच कराने का निदेश दिया है कि किन -किन अफसरों ने 

बिल्डर को गैर कानूनी तरीके से मदद की थी।

उन दोषी अफसरों को सजा देने का भी निदेश मुख्य मंत्री ने दे दिया है।

 यदि अंततः यह इमारत ध्वस्त कर दी गई और अफसरों को सजा मिल गई तो वह कार्रवाई देश-प्रदेश के अन्य कानून तोड़कों को भी कड़ा संदेश देगी।

 संबंधित अफसरों को ‘पटाकर’ गैरकानूनी इमारतें बना लेने की प्रवृति इस देश में आम हो गई है।

बिहार में भी ऐसी गैरकानूनी इमारतों की कमी नहीं है।

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     पटना का दीघा जमीन विवाद 

     दोहरे मापदंड की उपज 

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     पटना में एक व्यवस्थित काॅलोनी के निर्माण के लिए सत्तर के दशक में दीघा में 1024 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हुआ।

पर, इस मामले में प्रारंभ में ही दो महत्वपूर्ण गलतियां र्हुइं।

 एक तो जमीन के मुआवजे की राशि काफी कम रखी गई।

  दूसरी गलती यह हुई कि एक बड़े आई.ए.एस.अफसर की दीघास्थित जमीन को अधिग्रहण से मुक्त कर दिया गया।

इस ‘मुक्ति’ से भूमि मालिकों को लगा कि उनकी जमीन तो औने -पौने दाम पर ली जा रही है।पर  एक प्रभावशाली व्यक्ति की  4 एकड़ जमीन को मुक्ति मिल गई है।

   याद रहे कि किसानों की दीघा की जमीन के साथ ही उस अफसर की भी 4 एकड़ जमीन का अधिग्रहण  हुआ था।

 इस दोहरे मापदंड के खिलाफ गुस्साए किसानों ने अधिग्रहीत जमीन को  अधिक कीमत पर निजी हाथों बेचना शुरू कर दिया।

 किसानों ने मुआवजे की सरकारी राशि जानबूझ कर नहीं उठाई ।

 सरकारी खजाने में मुआवजे की राशि पड़ी रह गई।

  इस तरह दीघा की जमीन पर अवैध कब्जा आज तक बिहार सरकार के लिए समस्या बनी हुई है।

सबसे खराब बात यह हुई कि दीघा विवाद व बाद के विजया जमीन विवाद के बाद बिहार सरकार ने खुद जमीन अधिग्रहीत कर आवासीय काॅलोनी बनाने की अपनी जिम्मेदारी त्याग दी।

नतीजतन पटना के आसपास बड़े पैमाने पर अव्यवस्थित काॅलोनियां बस रही हैं ।वे  एक दिन भीषण जल जमाव का कारण बनंेगी।

वह जल जमाव  राज्य सरकार की आलोचना का एक और आधार बनेगा।

यदि बिहार सरकार अभी से पब्लिक -प्रायवेट- पार्टनरशिप के आधार पर काॅलोनियां विकसित करे तो बेहतर होता।

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कैंसर के फैलाव पर नजर रखे सरकार

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बिहार के किन इलाकों में कैंसर के अपेक्षाकृत अधिक मरीज पाए जा रहे हैं ? 

गंगा किनारे तो यह समस्या लंबे मय से देखी ही जा रही है।

पर,राज्य के कुछ अन्य हिस्सों में भी इसकी सघन जांच होनी चाहिए।

सरसरी सर्वेक्षण तो फिलहाल पटना स्थित उन अस्पतालों से हो सकता है जहां कैंसर का इलाज होता है।

क्या कैंसर मरीज वहां अधिक हंै जहां के खेतों में रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है ?

यदि ऐसा है तो उन इलाकों में जैविक खेती पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए।

इस बीच खबर है कि कतरनी चावल की भी खूशबू कम हो रही है।

यह खबर चिंताजनक है।

जांच से पता चला है कि रासायनिक खाद का अधिक इस्तेमाल इसका प्रमुख कारण है।

दूसरा कारण बढ़ता तापमान भी है। 

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भूली-बिसरी याद 

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 एक बार मैंने राम विलास पासवान से पूछा था,‘‘क्या आप

मुख्य मंत्री पद के उम्मीदवार हैं ?’’

उन्होंने पलट कर सवाल किया,

‘‘क्या आप किसी स्थानीय अखबार के ब्यूरो चीफ बन सकते हैं ?’’

तब मैं दिल्ली के एक 

अखबार का पटना में विशेष संवाददाता था।)

मैंने कहा- नहीं।

उस पर उन्होंने कहा कि ‘‘तो फिर मैं मुख्य मंत्री क्यों बनूंगा ?’’

मेरा सवाल था-तो फिर चुनाव के समय आपके समर्थक लोग आपको भावी मुख्य मंत्री के रूप में पेश क्यों करते हैं ?

आप उसका विरोध भी नहीं करते।

इस पर पासवानजी ने कहा कि ‘‘मेरे लाखों समर्थक जब यह सुनते हैं कि मैं मुख्य मंत्री बन सकता हूं तो वे और भी अधिक उत्साहित होकर हमारी पार्टी के लिए काम करते हैं।’’ 

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और अंत में

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जब किसी राष्ट्रीय दल के अपने ‘वोट बैंक’ की पूंजी घटने लगती है तो उस दल के कुछ महत्वाकांक्षी क्षेत्रीय सूबेदार कई दफा हाईकमान के निदेशों का पालन करने से इनकार कर देते हैं।

कांग्रेस में इन दिनों यही हो रहा है।

कांगे्रस की अधिकतर राज्य शाखाओं में भारी गुटबंदी चल रही है ।

 हाईकमान वैसे कई मामलों में लाचार नजर आ रहा है।

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने हाल में कहा कि ‘‘जालियांवाला बाग का नवीनीकरण शहीदों का अपमान है।’’

  पर, दूसरी ओर पंजाब के मुख्य मंत्री अमरिंदर सिंह ने सार्वजनिक रूप से कह दिया कि ‘‘नवीकरण में कुछ भी गलत नहीं है।’’

इंदिरा गांधी के कार्यकाल में कोई क्षेत्रीय कांग्रेसी नेता ऐसा बयान देकर पार्टी मेें बना नहीं रह सकता था।क्योंकि तब कांग्रेस के पास अपना मजबूत वोट बैंक था जो इंदिरा गांधी

से जुड़ा हुआ था। 

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3 अगस्त 21


गुरुवार, 2 सितंबर 2021

     नेकी कर दरिया में डाल !

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     --सुरेंद्र किशोर--

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मेरा मानना है कि किसी प्रतिफल यानी रिटर्न की उम्मीद 

किए बिना ही भरसक व्यक्ति व समष्टि का हित करते जाना चाहिए,यदि करने की स्थिति में हैं तो।

  क्योंकि ईश्वर ने हमें जीवों में श्रेष्ठ बनाकर हम पर बड़ा उपकार किया है।

मेरी समझ से इस उपकार के लिए ईश्वर को धन्यवाद इसी तरह दिया जा सकता है।

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हां, किसी से किसी तरह के रिटर्न की प्रतीक्षा कीजिएगा तो घोर निराशा होगी।

वैसे इस दुनिया में अब भी जमीर वाले कुछ लोग तो हैं।

इसलिए संभव है कि आपको बिन मांगे किसी तरह का रिटर्न मिल जाए।

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बल्कि कुछ अनुभवी लोगों के अनुभव तो इसके विपरीत हैं।

एक बार किसी ने स्वामी विवेकानंद से कहा -‘‘फलां व्यक्ति आप की बड़ी आलोचना कर रहा था।’’

उस पर विवेकानंद ने कहा -- ‘‘ऐसा हो ही नहीं सकता।’’

प्रश्न--क्यों ?

जवाब-क्योंकि मैंने तो कभी उसका कोई भला किया ही नहीं।

विवेकानंद की जगह आप किसी और का नाम उधृत कर सकते हैंे।

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आचार्य रजनीश यानी ओशो ने उसका कारण बताया है।

उन्होंने कहा कि तुम जिसका भला करते हो,उसके मन में हीन भावना पैदा हो जाती है।

तुम्हारे सम्मुख आने से उसकी वह भावना और भी बलवती हो जाती है।

इसलिए वह तुम्हारे सामने आने से बचना चाहता है।

यदि ऐसे बचने में उसे कठिनाई होती है तो वह तुमसे झगड़ा कर लेता है।

बचने का इससे बेहतर उपाय और भला क्या हो सकता है ?

आप यहां भी ओशो की जगह किसी और का नाम ‘फिट’ कर सकते हैं।

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मैंने विवेकानंद और ओशो की ये उक्तियां कहीं पढ़ी या सुनी हैं।

किंतु अभी लिखंत में वे मेरे पास नहीं हंै।

संभव है कि मेरी

स्मरण शक्ति जवाब दे रही हो,इसीलिए अपने बचाव के लिए यह लिख दिया कि इनके बदले किसी अन्य का नाम उधृत कर सकते हैं।

दरअसल महत्व बात का अधिक है।

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और अंत में 

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सुर नर मुनि सब कै यह रीति,

  स्वारथ लागि करहीं सब प्रीति । 

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जब गोस्वामी तुलसीदास के काल में यानी सोलहवीं सदी में समाज का यह हाल था तो आज तो घोर कलियुग है।

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29 अगस्त 21


 टैक्स चोरी को ‘लोहे के हाथों’ से रोक

कर कंेद्र सरकार पैसे बचाए।

उन पैसों से देश में अधिक संख्या ‘एम्स’ 

की स्थापना की पहल करे।

तभी यह माना जाएगा कि उसने 

कोविड-19 महा विपत्ति 

से सबक सीखा है।

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  --सुरेंद्र किशोर--

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कल्पना कीजिए कि कम साधन वाले किसी गंभीर मरीज 

का दिल्ली ‘एम्स’ में आपरेशन होने वाला है।

किंतु लंबी प्रतीक्षा सूची के कारण उसे बेड उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

इस बीच मरीज की हालत खराब हो जाती है।

और, आपरेशन के बिना ही अंततः वह गुजर जाता है।

फिर उसके परिवार पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ता है।

खैर, यह समस्या किसी एक मरीज के साथ नहीं है।

ऐसी घटना आए दिन देखी जाती है।

ऐसे में देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी की भीषण समस्या सामने आती है।

खासकर ‘एम्स’ जैसे गुणवत्तापूर्ण अस्पताल की कमी की समस्या।

पर,केंद्र सरकार के पास उतने पैसे नहीं हैं जिससे जरूरत के अनुपात में ‘एम्स’ का निर्माण हो सके।

इस देश में सरकारी पैसे की कमी का बड़ा कारण भीषण भ्रष्टाचार ,लूट और घोटाला है।

अभी जी.एस.टी.पर ध्यान जाता है।

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वित्तीय वर्ष 2020-21 में जी.एस.टी. में देश में 

49 हजार 384 करोड़ रुपए की कर वंचना का 

पता चला था।

उच्चपदस्थ पदाधिकारियों से सांठगांठ के बिना यह संभव नहीं।

  मौजूदा वित्तीय वर्ष के अप्रैल-जून में भी टैक्स चोरी का आंकड़ा चिंताजनक रहा है।

 उधर पैसों की कमी के कारण जरूरत के हिसाब न तो अस्पतालों की संख्या बढ़ाई जा रही है और न ही मौजूदा अस्पतालों का विस्तार व विकास हो पा रहा है।

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उधर एम्स जैसे विश्वसनीय अस्पतालों में समुचित इलाज-आॅपरेशन आदि के लिए लंबी  प्रतीक्षा सूची रहती हैं।

सबसे अधिक दबाव दिल्ली एम्स पर है।

 क्या दिल्ली में एक और एम्स की स्थापना नहीं हो सकती ?  

चंूकि दिल्ली एम्स में न सिर्फ चिकित्सा -प्रक्रिया विश्वसनीय व गुणवत्तापूर्ण है बल्कि मरीजों के प्रति वहां के चिकित्सकों का व्यवहार भी अन्य सरकारी अस्पतालों से बेहतर है।     

पटना एम्स का भी अनुभव वैसा ही है।

सुना है कि यहां भी चिकित्सकगण गरीब मरीजों के साथ भी अच्छे ढंग से पेश आते हैं।

दूसरी ओर, बिहार सरकार के अस्पतालों में चिकित्सकों के सामान्य मरीजों के साथ व्यवहार में धैर्य की कमी रहती है।

  

 



    हमारे देश के कई लोग व संगठन 

    इसलिए नहीं कर रहे 

   ‘तालिबान’ की आलोचना ?

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अफगान पाॅप स्टार अरयाना सईद ने अपने मंगेतर

से कहा कि ‘‘इससे पहले कि तालिबान मुझे पकड़

लें, तुम मुझे गोली मार दो।’’

     बाइडन ने ऐसे बर्बर लोगों को सत्ता की चाबी 

सौंप दी है और अब अमेरिका चाहता है कि हम यह मान लें कि तालिबान इतने सज्जन हैं जो आइ एस के खिलाफ लड़ रहे हैं।

                 --- तारेक फतह

         दैनिक जागरण --31 अगस्त 21

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1.-तारेक फतेह साहब !

क्या इस दुनिया में बर्बर इस्लामी जेहादियों से लड़ने की जिम्मेदारी सिर्फ अमेरिका की है ?

अमेरिका तो अपने दुश्मनों के सफाए के लिए अफगानिस्तान आया था।

उसका उद्देश्य पूरा हो गया।

वह लौट गया।

 ऐसे बर्बर लोगों से आज भारत सहित जो -जो देश पीड़ित हैं,उन्हें मिलकर सामूहिक रूप से कदम उठाना पड़ेगा।उसके बाद ही अमेरिका से मदद मांगिए।

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2.-भारत के जिन लोगों ने मध्य युग के राजस्थान

की महिलाओं के ‘जौहर’ की गंभीरता को अब तक नहीं समझा है ,वे अरयाना सईद का प्रसंग जानकार अब तो समझ लें।

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3.-भारत के जो राजनीतिक व गैर राजनीतिक लोग व संगठन आज तालिबान की तारीफ कर रहे हैं या उसकी बर्बरताओं के खिलाफ न बोल रहे हैं और न लिख रहे हैं, वे दरअसल जाने-अनजाने इस देश में भी ‘तालिबान राज’ ही चाहते हैं।

  वोट लोलुपता जो न कराए !!!

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 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर 

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 ‘‘कृष्ण असाधारण,असंभव और अपूर्व’’ 

  --डा.राम मनेाहर लोहिया

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कृष्ण संपूर्ण पुरुष थेे।

उनके चेहरे पर मुस्कान और आनंद की छाप बराबर बनी रही।

खराब से खराब हालत में भी उनकी आखें मुस्कराती रहीं।

चाहे दुःख कितना ही बड़ा क्यों न हो,कोई भी ईमानदार आदमी वयस्क होने के बाद अपने पूरे जीवन में एक या दो बार से अधिक नहीं रोता।

राम अपने पूरे वयस्क जीवन में दो या शायद केवल एक बार रोए।

राम और कृष्ण के देश में ऐसे लोगों की भरमार है जिनकी आंखों में बराबर आंसू डबडबाए रहते हैं।

अज्ञानी लोग उन्हें बहुत ही भावुक आदमी मान बैठते हैं।

 एक हद तक इसमें कृष्ण का दोष है।

वे कभी नहीं रोए।

लेकिन लाखों को आज तक रुलाते रहे हैं।

जब वे जिंदा थे , वृंदावन की गोपियां इतनी दुःखी थीं कि आज तक गीत गाए जाते हैं।

‘‘निसि दिन वर्षत नैन हमार,े

कंचुकि पट सूखत नहिं कबहूं,

उर बिच बहत पनारे।’’

 उनके रुदन की कामना की ललक भी झलती है।

लेकिन साथ ही साथ इतना संपूर्ण आत्म समर्पण है कि स्व का कोई अस्तित्व नहीं रह गया हो।

कृष्ण एक महान प्रेमी थे।

जिन्हें अद्भुत आत्म समर्पण मिलता रहा।

आज तक लाखों स्त्री -पुरुष और स्त्री वेश में पुरुष ,जो अपने प्रेमी को रिझाने के लिए स्त्रियों जैसा व्यवहार करते हैं,उनके नाम पर आंसू बहाते हैं और उनमें लीन होते हैं।

यह अनुभव कभी -कभी राजनीति में आ जाता है और नपुंसकता के साथ -साथ जाल-फरेब शुरू हो जाता है।

  जन्म से मृत्यु तक कृष्ण असाधारण ,असंभव और अपूर्व थे।

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दुनिया के महानत्तम ग्रंथ भगवद्गीता के रचयिता कृष्ण को कौन नहीं जानता ?

दुनिया में हिंदुस्तान एक अकेला देश है जहां दश्र्शन को संगीत के माध्यम से पेश किया गया है।

कृष्ण ने अपना विचार ‘गीता’ के माध्यम से ध्वनित किया।

(अपूर्ण)

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--राम,कृष्ण और शिव,नदियां साफ करो (--डा.राम मनोहर लोहिया)पुस्तिका से साभार।

प्रकाशक -पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग,आईटीएम यूनिवर्सिटी,ग्वालियर,मध्य प्रदेश।

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30 अगस्त 21



 


 लचर जांच से अटका न्याय

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पूर्व रेल मंत्री एलएन मिश्र हत्याकांड 

मामला हमारी आपराधिक न्याय व्यवस्था 

पर किसी काले धब्बे जैसा है।

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सुरेंद्र किशोर

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 पूर्व रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र हत्याकांड की यदि सही ढंग से जोच हुई तो चैंकानेवाले रहस्य सामने आ सकते हैं।

  हाल में दिल्ली हाईकोर्ट ने सी.बी.आई.को इसकी दोबारा जांच की मांग पर विचार करने का निदेश दिया है।

  दिवंगत ललित नारायण मिश्र के पोते वैभव मिश्र ने हाईकोर्ट से जांच की गुहार लगाई थी।

   हाईकोर्ट ने पहली नजर में पाया है कि साढ़े चार दशक पुराने इस मामले की जांच-पड़ताल में गड़बड़ी की गई थी।

  याद रहे कि आज के सत्ताधारी दल भी मिश्र हत्याकांड की जांच में धांधली का तब आरोप लगा रहे थे।

यह हत्या और इसकी जांच शुरू से ही कुछ ऐसे रहस्यों से भरी रही जिनका कभी पर्दाफाश नहीं हो सका।

 या यूं कहें कि ऐसा होने ही नहीं दिया गया।

 उम्मीद की जाती है कि सी.बी.आई.दिल्ली हाईकोर्ट के इस निदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं देगी।

 यह मामला बहुत पुराना है।

 बिहार के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर 2 जनवरी 1975 को समस्तीपुर-मुजफ्फरपुर बड़ी लाइन का उद्घाटन समारोह था।

  उसी बीच सभास्थल पर हैंड ग्रेनेड से हमला कर दिया गया।

 उस हमले में तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र और उनके भाई एवं बाद में मुख्य मंत्री बने डा.जगन्नाथ मिश्र सहित कई लोग घायल हो गए।

  बिहार के ऐसे कुछ नेता भी तब घटनास्थल पर देखे गए थे, जिनके नाम बाद में इस कांड में षड्यंत्रकारी के रूप में जुड़े।

 वे लोग पहले ललित बाबू के काफी करीबी माने जाते थे।

मगर बाद में भीतर ही भीतर उनके दुश्मन बन गए थे।

 इसकी जांच व अदालती सुनवाई के दौरान कई मोड़ आए।

बिहार पुलिस ने जांच आरंभ की।

हत्याकांड के आरोपी अरूण कुमार मिश्र और अरूण कुमार ठाकुर ने दफा -164 के तहत न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष यह बयान दिया था कि उन लोगों ने कांग्रेस की ही एक बड़ी हस्ती के इशारे पर सभा में ललित नारायण मिश्र पर हैंड ग्रेनेड फेंके थे।

  उसके तत्काल बाद सी.बी.आई.के तत्कालीन निदेशक डी.सेन समस्तीपुर पहंुचे और जांच की जिम्मेदारी संभाली।

उन्होंने समस्तीपुर पहुंचते ही कह दिया था कि अरूण कुमार मिश्र और अरूण कुमार ठोकुर निर्दोष हैं।

 और ललित नारायण मिश्र की हत्या में आनंदमार्गियों का हाथ है।

मालूम हो कि अरूण कुमार मिश्र और अरूण कुमार ठाकुर के बयानों में दिल्ली के एक बड़े प्रभावशाली व चर्चित कांग्रेस नेता का नाम सामने आया था।

कहा जाता है कि इससे केंद्र सरकार चिंतित हो गई थी।

  इस तरह सी.बी.आई.ने मिश्र हत्याकांड की जांच का काम अपने हाथ में लेकर तत्काल ही मामले को दूसरी दिशा दे दी।

मशहूर वकील और मानवाधिकार कार्यकत्र्ता वी.एम.तारकुंडे ने भी सन 1979 में अपनी जांच के बाद पाया था कि सी.बी.आई.ने जांच में अनियमितताएं कीं।

   बिहार पुलिस असली हत्यारे को पकड़ कर मुख्य षड्यंत्रकारियों तक पहुंचने ही वाली थी कि उच्चस्तरीय निदेश से मामला उलट दिया गया।

इस मामले की सुनवाई पहले पटना और बाद में दिल्ली में हुईं।

  अंततः सन 2014 में दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट ने इस हत्याकांड में 4 आनंद मार्गियों को उम्रकैद की सजा दे दी।

 उस फैसले के बाद ललित नारायण मिश्र के पुत्र विजय कुमार मिश्र ने कहा था कि निर्दोष लोगों को फंसा दिया गया है।

 इस हत्याकांड की  ठीक से जांच ही नहीं हुई।

पूर्व मुख्य मंत्री डा.जगन्नाथ मिश्र ने भी दिल्ली के कोर्ट को बताया था कि आनंदमार्गियों से हमारे परिवार की कोई दुश्मनी नहीं थी।

विजय कुमार मिश्र के अलावा बिहार के अनेक लोग इस हत्या के रहस्य का सच जानते रहे हैं।

दबी जुबान में उसकी चर्चा भी करते रहे हैं।

सिर्फ सी.बी.आई.के तत्कालीन निदेशक डी.सेन ने रहस्यमय कारणों से उसकी ओर से अपनी आंखें मूंद लीं।अब यदि सी.बी.आई.इस मामले की सही ढंग से जांच करती है तो इससे देश की राजनीति भी एक हद तक प्रभावित हो सकती है।

   मिश्र हत्याकांड की जांच के लिए मैथ्यू आयोग भी बना था।

उसके समक्ष समस्तीपुर रेल पुलिस के तत्कालीन अधीक्षक सरयुग राय और अतिरिक्त कलक्टर आर.बी.शुक्ल ने कहा था कि ललित नारायण मिश्र को घायलावस्था में समस्तीपुर से दानापुर ले जाने वाली गाड़ी को समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर शंटिंग में ही एक घंटा 10 मिनट लग गए।

बताया गया कि यह देरी जानबूझकर की गई।

बाद में दानापुर के रेलवे अस्पताल में घायल मिश्र का आॅपरेशन हुआ।

मिश्र के परिजन के अनुसार आॅपरेशन में भी लापारवाही हुई ।

यादे रहे कि 3 जनवरी 1975 को उनकी मृत्ुय हो गई।

तब यह भी कहा गया कि समस्तीपुर से दानापुर न ले जाकर उनको इलाज के लिए निकटवर्ती दरभंगा पहुंचाया जा सकता था।

पर ऐसा नहीं किया गया।

क्या यह गलत फैसला जानबूझकर लिया गया ?

इसी कांड में जो घायल व्यक्ति दरभंगा के प्रायवेट अस्पताल में इलाज के लिए गए और वे बच गए।

याद रहे कि तब सरकारी अस्पतालों के डाक्टरों की राज्यव्यापी हड़ताल थी।

नई जांच से दशकों पुराने रहस्य पर से पर्दा हटने की उम्मीद की जा सकती है।

इससे मिश्र परिवार को भी संतोष होगा। 

कुल मिलाकर ललित नारायण मिश्र हत्याकांड की जांच और अदालती सुनवाई का मामला इस देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था पर एक काला धब्बा बना हुआ है।

   इससे साबित होता है कि यदि प्रभावशाली लोग चाहें तो अपने स्वार्थ में एक केंद्रीय मंत्री की हत्या की जांच को भी मजाक बना सकते हैं।

ललित नारायण मिश्र बिहार के मिथिला क्षेत्र में खासे लोकप्रिय थे। वैसे बाद के वर्षों में राजनीतिक उतार -चढ़ाव होता रहा।

इस बीच एक बात आज भी देखी जाती है।

वह यह कि सन 1975 से पहले कांग्रेस के प्रथम परिवार के प्रति मिथिला के एक खास समुदाय का जो स्नेह और समर्थन भाव था,उसमें मिश्र हत्याकांड के बाद कमी आई।

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2 सितंबर, 2021 के दैनिक जागरण और नईदुनिया(मध्य प्रदेश)में एक साथ प्रकाशित