गुरुवार, 13 मई 2021

 2019 के लोक सभा चुनाव में पश्चिम बंगाल के संदर्भ में अपने एग्जिट पोल के नतीजे के मामले में प्रदीप भंडारी सही साबित हुए थे।

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देखना है कि इस बार के एग्जिट पोल में वे सही साबित होते हैं या नहीं !!

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प्रदीप भंडारी के नेतृत्व वाली ‘जन की बात’(चुनाव विश्लेषण कत्र्ता)

ने 2019 के लोक सभा चुनाव के समय एक्जिट पोल कराया था। 

पश्चिम बंगाल के बारे में जन की बात का आकलन था-

भाजपा को 18 से 20 सीटें मिलेंगी।

टी.एम.सी.को 13 से 22 के बीच सीटें मिलेंगी।

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तब सीटें मिलीं थीं--टी.एम.सी.-22

और भाजपा को 18

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यानी, 2019 में ‘जन की बात’ का लगभग सटीक आकलन रहा।

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इस बार पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के समय जन की बात द्वारा किए गए एग्जिट पोल

का नतीजा है-- 

भाजपा--162 से 185 के बीच

तृणमूल कांग्रेस--104-121

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इंडिया न्यूज चैनल पर आज प्रदीप भंडारी ने यह भी भविष्यवाणी की है कि ममता बनर्जी नंदीग्राम में हार रही हैं।

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देखना है कि इस बार प्रदीप भंडारी सही साबित होते हैं या नहीं।

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--सुरेंद्र किशोर

29 अप्रैल 21











 मौत के सौदागरों से निपटने के लिए   

 तीन सूत्री बदलाव की सलाह

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     --सुरेंद्र किशोर--

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मौत के सौदागरों , क्रूर अपराधियों , बड़े -बड़े भ्रष्टाचारियों और  माफियाओं के लिए सबक सिखाने लायक सजा सुनिश्चित करनी है ?

यदि हां तो  

इस देश में कम से कम 

तीन काम तुरंत करने होंगे।

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1.-अदालतें इस मुहावरे पर पुनर्विचार करे कि 

‘‘बेल इज रूल एंड जेल इज एक्सेप्सन।’’

यानी, जमानत नियम है और जेल अपवाद।

अब बेल अपवाद हो और जेल नियम।

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2.-इस न्याय शास्त्र को बदला जाए कि

 ‘‘जब तक कोई व्यक्ति अदालत से दोषी सिद्ध नहीं हो

 जाता, तब तक उसे निर्दोष ही माना जाए।’’

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अब होना चाहिए इससे ठीक उलट।

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3.-सुप्रीम कोर्ट ने यह कह रखा है कि किसी आरोपी का

डी.एन.ए.,पाॅलीग्राफी व ब्रेन मैपिंग टेस्ट उसकी मर्जी के बिना नहीं कराया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि करीब दस साल पहले के अपने इस निर्णय को वह बदल दे।

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सुप्रीम कोर्ट तथा दूसरी अदालतांे ने कोरोना काल में विभिन्न सरकारों को अच्छी -खासी फटकार लगाई है।

अच्छा किया।

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पर, उपर्युक्त तीन काम यदि हो जाए तो मौत के सौदागरों का हौसला पस्त होगा।

और, किसी भी सरकार को कोरोना जैसी महा विपदा से लड़ने में सुविधा होगी।

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कोरोना काल में इस देश व विश्व के लोगों को जो अभूतपूर्व विपदा झेलनी पड़ी है और पड़ रही है,उसके लिए दो तरह के तत्व जिम्मेदार हैं।

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एक तत्व ‘आसमानी’ है।

दूसरा सुलतानी !

आसमानी पर तो विश्व की किसी भी सरकार का कोई वश नहीं चल रहा है।

   भारत जैसी जर्जर व्यवस्था वाली सरकारों का भला क्या चलेगा ।

आजादी के बाद से ही इस व्यवस्था को जर्जर ,भ्रष्ट व पक्षपातपूर्ण बना दिया गया।

यह भ्रष्टों के लिए स्वर्ग माना जाता है।

अपवादों की बात और है।

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पर, इस देश की सरकारें जितना कर सकती थीं,उतना भी नहीं कर पाई तो उसके दो कारण हैं।

वे कारण आसमानी नहीं बल्कि ‘सुलतानी’ हैं।

इनमें तो बदलाव व सुधार हो ही सकता है।

कुछ ईमानदार सत्ताधारी

उसकी कोशिश करते भी रहे हैं।

किंतु सफलता सीमित है।

एक तो भारी भ्रष्टाचार के कारण आजादी के बाद से ही अपवादों को छोड़कर इस देश के सिस्टम को ध्वस्त और शासन व सेवा तंत्र के अधिकांश को निकम्मा व लापारवाह बना दिया गया।

  मनुष्य देहधारी तरह- तरह के गिद्धों को तो यह लगता है कि उन्हें तो कभी कोई सजा हो ही नहीं सकती।

अधिकतर मामलों में होती भी नहीं।

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एक तत्व यह भी है कि कोरोना की पहली

लहर के बाद सरकारें थोड़ी लापरवाह हो गईं।

दूसरी लहर के लिए वे कम ही तैयार थीं।

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एक छोटा उदाहरण --

दवा की कालाबाजारी व मिलावटखोरी पहले भी होती रही है।

इस बार आॅक्सीजन सिलेंडर व दवाओं की भीषण कालाबाजारी ने तो न जाने कितने मरीजों को यह दुनिया छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया।

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इन अपराधों में गिरफ्तार हो रहे गिद्धों को सबक सिखाने वाली सजा सुनिश्चित तभी हो सकती है जब ऊपर के तीन सूत्री बदलाव के लिए न्यायालय सरकार से मिलकर ठोस करें।

यदि यह बदलाव हो गया तो सरकारों को फटकार लगाने की 

जरूरत अदालतों को भरसक नहीं पड़ेगी। 

क्या कभी ऐसा हो पाएगा ?

पता नहीं !

भले न हो, पर कहना मेरा कत्र्तव्य है एक नागरिक के नाते।

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--सुरेंद्र किशोर

    8 मई 21


 ममता बनर्जी की असली ताकत

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सुरेंद्र किशोर

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पश्चिम बंगाल विधान सभा के गत चुनाव में ममता बनर्जी को यानी तृणमूल कांग्रेस को करीब 48 प्रतिशत मत मिले ।

  इस 48 प्रतिशत के घटक तत्व कौन -कौन हैं ?

इसमें लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम वोट है।

बाकी बचे 18 प्रतिशत।

ममता बनर्जी ने गत चुनाव प्रचार के दौरान अपना गोत्र भी बता दिया था।

उन्होंने यह नहीं कहा था कि मैं हिन्दू हूं।

इस देश में आजादी के बाद से ही मतदान का एक तरीका रहा है।

अपवादों को छोड़कर किसी भी प्रधानमंत्री या मुख्य मंत्री या उस पद के उम्मीदवार को उनकी जाति के अधिकतर वोट मांगे-बिन मांगे मिल जाते रहे हैं।

 यानी, बचे 18 प्रतिशत में ममता बनर्जी की जाति के अधिकतर लोग उन्हें मतदान किया होगा।

  अब बचे 15 प्रतिशत मत।

 इतने ही मत ममता बनर्जी को उनके कामों के आधार पर मिले होंगे।

हालांकि इस 15 प्रतिशत में भी गैर मुस्लिमों के बीच के कट्टर भाजपा विरोधी लोग भी रहे होंगे।

   चुनावी आंकड़ों के इस ब्रेक-अप को नजरअंदाज करके कोई भी सटीक राजनीतिक आकलन नहीं किया जा सकता।

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12 मई 21


 प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह तो रुपए पेड़ों पर नहीं उगा पाए !

पर, लगता है कि अब सोनिया जी यह चाहती हंै कि यह काम मौजूदा प्रधान मंत्री मोदी जी करके दिखाएं !!!

टैक्स वगैरह वसूलने की भला क्या जरूरत है ? !!

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  --सुरेंद्र किशोर--

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21 सितंबर, 2012 को तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि 

‘‘पैसे पेड़ों पर नहीं उगते।’’

वे डीजल आदि की मृल्य वृद्धि के अपने सरकारी निर्णय का बचाव कर रहे थे।

  अब जब कांग्रेस प्रतिपक्ष में है तो सोनिया गांधी कह रही  हैं कि कोविड के इलाज से संबंधित दवाओं व उपकरणों को जी.एस.टी.से मुक्त कर दिया जाए।

गत साल कांग्रेस ने पेट्रोल-डीजल की मूल्य वृद्धि के खिलाफ आंदोलन तक किया था।

  क्या सोनिया गांधी प्रकारांतर से नरेंद्र मोदी से कह रही हैं कि हमारे मनमोहन सिंह जो काम नहीं कर पाए, यानी पेड़ों पर रुपए नहीं उगा पाए, 

वह काम आप करिए ???

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दरअसल प्रतिपक्ष में रहने पर एक मापदंड और सत्ता में आ जाने पर ठीक विपरीत !

अपने देश की राजनीति की मुख्य पहचानों में यह एक है।

इसके उदाहरण अनेक हैं।

नमूना पेश है।

भाजपा जब प्रतिपक्ष में थी तो वह कहती थी कि संसद में हंगामा करना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही हिस्सा है।

पर,अब जब प्रतिपक्ष ने संसद को ‘हंगामा सभा’ में बदल दिया है तो भाजपा प्रतिपक्ष के रवैए की निंदा करती है।

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--सुरेंद्र किशोर

  11 मई 21


 जो इतिहास से नहीं सीखता,वह उसे दुहराने 

    को अभिशप्त होता है।

    और, जो  इतिहास पढ़े ही नहीं ?!!

   हमारे नेता कितना पढ़ते हैं इतिहास ?     

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       --सुरेंद्र किशोर--

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मुख्य मंत्री ममता बनर्जी को गत चुनाव में पराजित कर चुके भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी का आज के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लेख छपा है।

उनके लेख से पश्चिम बंगाल की राजनीति की ताजा व स्पष्ट तस्वीर सामने आती है।

  उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के काॅडर को कृतघ्न करार दिया है।

पश्चिम बंगाल विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता श्री अधिकारी लिखते हैं कि 

  ‘‘जिन कांग्रेस और सी.पी.एम. ने भाजपा को हराने के लिए खुद को शून्य बना लेने की कीमत पर भी तृणमूल कांग्रेस की  मदद की, उन दलों के बचे-खुचे दफ्तरों पर भी तृणमूल कार्यकत्र्ताओं ने हमले किए।’’

   दरअसल सुवेंदु अधिकारी का समकालीन इतिहास का ज्ञान तो अधूरा है ही,मध्यकालीन इतिहास का भी पूरा ज्ञान नहीं है।

  जो इतिहास से नहीं सीखता, वह उसे दुहराने को अभिशप्त होता है।

 मध्यकालीन इतिहास क्या कहता है ?

मुहम्मद गोरी ने जयचंद की तटस्थता का लाभ उठाकर तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चैहान को हरा दिया।

तराइन के प्रथम युद्ध में चैहान ने गोरी से हराया था।

पर गोरी ने उस कृतज्ञता का एहसान मानने की जगह बाद में जयचंद पर भी हमला कर दिया।

बचने के लिए जयचंद भागा।

भागने के क्रम में नदी में डूब कर मर गया।

(किसी इतिहासवेता को इस विवरण में कुछ संशोधन करना हो तो उनका स्वागत है)

   जिस तरह गोरी एक खास उद्देश्य के लिए लड़ रहा था,उसी तरह हमलावर तृणमूल कार्यकत्र्तागण भी एक बड़े उद्देश्य के लिए बंगाल में ‘युद्धरत’ हैं।

 जिन्हें उस उद्देश्य को समझना

 हो, वे समय रहते समझ लें, अन्यथा भुगतने को तैयार हो जाएं। 

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याद रहे कि सुवेंदु अधिकरी ने हाल में यह कहा था कि ममता बनर्जी पहली नेता हैं जो हार कर भी मुख्य मंत्री बन रही हैं।

जबकि, सच यह है कि इस तरह के पहले नेता मोरारजी देसाई थे जो 1952 के आम चुनाव में अपनी सीट हार गए थे।

फिर भी कांग्रेस ने उन्हें बंबई राज्य का मुख्य मंत्री बना दिया था।

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11 मई 21


  


सोमवार, 10 मई 2021

      बिहार की विधायिका पर एक 

     सर्वज्ञान विषयक किताब

     के ताजा संस्करण की जरूरत

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     --सुरेंद्र किशोर--

1982 में एक बहुत ही उपयोगी किताब प्रकाशित हुई थी।

उसका नाम है--‘‘ओरिजिन एंड डेवलपमेंट आॅफ बिहार लेजिस्लेचर।’’

उसे लिखा था बिहार विधान सभा के अध्यक्ष राधानंदन झा ने।

 बाद में बिहार विधान परिषद के सभापति प्रो.जाबिर हुसेन की सलाह पर उसका दूसरा संस्करण 1998 में छपा।

दूसरे संस्करण को तैयार करने में भी राधानंदन झा का योगदान था।

उनकी मदद की थी कि इंडियन नेशन व बाद में टाइम्स आॅफ इंडिया के नामी पत्रकार डी.एन.झा ने।  

 1912 से 1998 तक की विधायिका पर यह सर्वज्ञान विषयक पुस्तक है।

  दूसरे संस्करण के आए करीब 23 साल हो चुके हैं।

यानी, इस बहुमूल्य पुस्तक का ताजा संस्करण अब जरूरी है।

एक उम्मीद तो की ही जा सकती है।

 वह यह कि इसका ताजा संस्करण ‘कोरोना काल’ के बाद जरूर छपे।

जिन्हें आज के भौतिक युग में भी पढ़ने -लिखने में रूचि हो,वे  इसकी जरूरत मौजूदा स्पीकर विजय कुमार सिन्हा के समक्ष रखें।

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यह पुस्तक गंभीर ढंग से पत्रकारिता या शोध कार्य करने वालों के लिए एक जरूरी दस्तावेज है।

मोटा -मोटी बता दें कि इस पुस्तक में 1912 से 1998 तक के बिहार विधान परिषद,विधान सभा के सदस्यों के नाम हैं।

बिहार से संविधान सभा,लोक सभा व राज्य सभा के सदस्यों के भी नाम हैं।

बड़े साइज में करीब सवा तीन सौ पेज की इस किताब में इसके अलावा भी बहुत सारी जानकारियां हैं।

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10 मई 21



    


   

      ममता से बेहतर लालू !

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      --सुरेंद्र किशोर--

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 मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने कल केंद्रीय चुनाव आयोग में बड़े सुधार की जरूरत बताई है।

  उन्होंने कहा है कि इस संस्था को यदि बचाना है तो बड़े सुधार जरूरी हंै।

  उनके अनुसार चुनाव आयोग निष्पक्ष होता तो भाजपा को पश्चिम बंगान विधान सभा में 30 से अधिक सीटें नहीं मिलतीं।

    अब सवाल है कि ममता जी कैसा सुधार चाहती हैं ?

क्या केंद्रीय स्तर पर भी वैसा ही चुनाव आयोग वह चाहती हंै जैसा राज्य स्तर पर होता है ?

2018 में पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनाव में तृणमूल के खिलाफ के करीब 20 हजार उम्मीदवारों को नामंाकन पत्र तक नहीं दाखिल करने दिया गया था।

तब नख-दंत विहीन राज्य चुनाव आयोग मूक दर्शक बना रहा था।

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2019 के लोक सभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में भाजपा को 42 में से 18 सीटें मिली थीं।

  उस अनुपात में या थोडा़ ही कम विधान सभा चुनाव में भी भाजपा को सीटें मिलनी चाहिए थीं।

पर उससे काफी कम मिलीं।

क्या 2019 के चुनाव में केंद्रीय चुनाव आयोग के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस ने कोई आरोप लगाया था ?

मुझे नहीं मालूम।

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ममता जी के अनुसार जो चुनाव आयोग उन्हें 294 में से 264 सीटें जितवाने का रास्ता साफ कर देता , वही आयोग निष्पक्ष माना जाएगा !!

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  नब्बे के दशक के अदमनीय मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषन ने आलमारी में धूल खा रही चुनाव नियमों वाली किताब को बाहर निकाला ।

  उन्होंने एक-एक कर उसके नियम लागू करने की कोशिश की। 

  उस पर देश के कई धांधली प्रिय नेताओं के साथ-साथ बिहार के मुख्य मंत्री लालू प्रसाद भी शेषन से नाराज हो गए। 

लालू प्रसाद को लगा कि अब वे शेषन के रहते चुनाव में धांधली नहीं करा पाएंगे।

  हालांकि उन्हें इस बात का भरोसा नहीं था कि इतनी बड़ी संख्या में जनता अब उनके साथ है कि धांधली की उन्हें कोई जरूरत ही नहीं है।

   उस चुनाव में लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले जनता दल को बिहार विधान सभा की कुल 324 में से 167 सीटें मिली ।

मंडल आरक्षण विवाद के बाद पिछड़े लालू के साथ गोलबंद हो गए थे।

  अनुकूल रिजल्ट के बाद लालू प्रसाद ने स्वच्छ-निष्पक्ष  चुनाव के लिए टी.एन.शेषण को सार्वजनिक रूप से धन्यवाद दिया था।

याद रहे कि शेषन के कारण कमजोर वर्ग के लोगों को भी वोट देने का अवसर मिला।उससे लालू खुश हुए।

किंतु ममता बनर्जी 294 में से 213 विधान सभा सीटें मिलने के बावजूद आयोग से खुश नहीं हैं।

यह उनकी खास तरह की प्रवृति का द्योतक है जो प्रवृति आने वाले दिनों में अनेक संकट पैदा कर सकती है।

कम से कम इस मामले में क्या आप लालू प्रसाद को ममता बनर्जी से अधिक लोकतांत्रिक नहींे मानेंगे ?

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9 मई 21


शनिवार, 8 मई 2021

 सीट खाली करवा कर उप चुनाव के जरिए 

ममता बनर्जी बन जाएंगी विधान सभा की सदस्य

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--सुरेंद्र किशोर--

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कुछ लोग फेसबुक पर लिख रहे हैं कि चूंकि पश्चिम बंगाल में विधान परिषद है नहीं, इसलिए ममता बनर्जी की गद्दी 6 माह के बाद चली जाएगी।

अरे भई, सामान्य ज्ञान से काम लीजिए।

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सामान्य ज्ञान की कमी के कारण ही सुवेंदु अधिकारी ने यह भी कह दिया कि 

‘‘ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब चुनाव हारने के बाद भी कोई सी.एम.बना हो’’। 

   अधिकारी जी को नहीं मालूम कि 1952 में आम चुनाव हार जाने के बावजूद मोररजी देसाई बुंबई के मुख्य मंत्री बने थे।

राजनीति में पढ़ने-लिखने की परंपरा के निरंतर लोप होते जाने के कारण ऐसी टिप्पणियां आती-रहती  हैं।

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 ममता जी कोई अनुकूल सीट देख कर अपने दल के किसी विधान सभा सदस्य से आसानी से इस्तीफा दिलवा दंेगी।

उस इस्तीफे के कारण जो सीट खाली होगी,उससे उप चुनाव लड़कर छह महीने के भीतर विधान सभा सदस्य बन जाएंगी।

1977 में कर्पूरी ठाकुर ने यही काम किया था।

जिन देवेंद्र प्रसाद यादव ने उनके लिए फुलपरास से इस्तीफा दिया,उन्हें एम.एल.सी.बनवा दिया गया।

  पश्चिम बंगाल में विधान परिषद को 1969 में समाप्त कर दिया गया।

तब बांग्ला कांगेस के अजय मुखर्जी मुख्य मंत्री थे।

वाम दलों के समर्थन व सहयोग से उनकी सरकार चल रही थी।

वाम दलों के दबाव में परिषद को खत्म किया गया था।

सरकारी खर्च घटाना उद्देश्य था।

वाम दलों में तब तक आदर्शवादिता अधिक थी।

देखा-देखी 1970 में सी.पी.आई. के एक विधायक पूर्वे जी ने बिहार विधान परिषद को समाप्त करने का प्रस्ताव विधान सभा से पास करवा दिया।

पर केंद्र यानी संसद से उस पर सहमति नहीं मिल सकी।

1972 में सी.पी.आई. के उक्त विधायक हार गए।

तब उन्हें बिहार विधान परिषद में ही शरण मिली थी।

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अभी देश में जिन राज्यों में विधान परिषद मौजूद है,उनके नाम हैं--आंध्र प्रदेश, तेलांगना, कर्नाटका, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश।

 यह खबर आई थी कि बंगाल में सत्ता संभालने के कुछ समय बाद ममता बनर्जी ने वहां भी विधान परिषद की पुनस्र्थापना की पहल की थी।

पर, यह नहीं पता चल सका कि ममता सफल क्यों नहीं हुई।

अनुमान यही है कि ‘‘वोट बैंक’’ को खुश रखने के लिए केंद्र सरकार से निरंतर झगड़ते रहिएगा तो आपका ऐसा बड़ा काम कैसे होगा ? ़

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8 मई 21


    

 


 जो परिवार एक से अधिक गाड़ी खरीदने की क्षमता

रखता है ,वह एक ऐसी गाड़ी भी खरीदे जिसे जरूरत पड़ने पर तुरंत एम्बुलेंस में बदला जा सके।

  वह गाड़ी इमरजेंसी में उनके तो काम आएगी ही,

वे अपने मित्रों-रिश्तेदारों-पड़ोसियों की सेवा भी कर सकते हैं।

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--सुरेंद्र किशोर

7 मई 21  


गुरुवार, 6 मई 2021

     भ्रष्टाचार के खिलाफ महायुद्ध के बिना हमारी खैर नहीं 

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दुनिया का कोई भी देश आक्सीजन, बेड, वेंटिलेटर, आई.सी.यू. में कई गुना बढ़ोत्तरी करके भी कोरोना पर काबू नहीं कर सका।

   यह असंभव,अस्थायी और महंगा हल है।

   स्थायी हल है घर में रहना, शारीरिक दूरी का पालन और मास्क पहनना।

    याद रखिए कि सड़क दुर्घटनाएं रोकने के लिए अस्पताल नहीं बनाए जाते,बल्कि गाड़ी ढंग से चलानी पड़ती है।

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  ---डा.प्रवीण झा,

  दैनिक जागरण

   6 मई 21 

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यह बात सही है जो डा.झा ने कही।

किंतु अन्य कई देशों की तरह ही हमारे देश की सबसे गंभीर समस्या सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार है।

भीषण भ्रष्टाचार है।

भ्रष्टाचार आजादी के साथ ही गंभीर से गंभीरत्तम होता चला गया।

वोट बैंक,जातिवाद व वंशवाद की राजनीति ने इसे बढ़ाया।

अधिकतर लोग ईमानदारों की तलाश अपनी जाति में और भ्रष्टों की तलाश दूसरी जाति में करते हैं।

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इस देश के जो सार्वजनिक धन भ्रष्टाचार में चले गए,जा भी  रहे हैं, वे अन्य सुविधाओं के साथ -साथ शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्रों में भी लगे होते तो कोरोना के कारण आई महा विपत्ति से हम आज अपेक्षाकृत कम पीड़ित होते।

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पर,सवाल है कि जो लोग व संस्थान यहां तक कि अदालत तक, कोरोना को लेकर आज विभिन्न सरकारों पर आग- बबूला हो रहे हैं,वे कब यह महसूस करेंगे कि सरकारी-गैर सरकारी भीषण भ्रष्टाचार के खिलाफ महा युद्ध किए बिना हमारा असित्त्व नहीं बचेगा ?

भ्रष्टाचार से अन्य अधिकतर समस्याएं भी पैदा होती हैं और बढ़ती रहती हैं-यहां तक आतंकवाद भी।

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--सुरेंद्र किशोर

6 मई 21 

     


    पश्चिम बंगाल में आने वाले

    दिन और भी डरावने

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भाजपा ने कहा है कि हमारे कार्यकत्र्ताओं को आतंकित करने के लिए पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस शासन की मदद से अभूतपूर्व हिंसा कर रही है।

कांग्रेस और माकपा ने भाजपा के इस आरोप को सही बताया है।

साथ ही, इन दोनों दलों ने कहा है कि हमारे कार्यकत्र्ताओं को भी टी.एम.सी.द्वारा निशाना बनाया जा रहा है।

(इस बीच दिल्ली के कुछ बुद्धिजीवी यह चाहते हैं कि कांग्रेस,वाम और अन्य दल मिलकर ममता के नेतृत्व में अगली बार लोस चुनाव लड़ें और नरेंद्र मोदी को सत्ताच्युत कर दें।)

दूसरी ओर, तृणमूल नेता कह रहे हैं कि जो भी हिंसा बंगाल में हो रही है,वह भाजपा के भीेतर के आपसी झगड़े के कारण हो रही है।

अब आप ही बताइए कि कौन गलत और कौन सही है ?

  खबर है कि भाजपा के कार्यकत्र्ता पश्चिम बंगाल छोड़कर 

असम में शरण ले रहे हैं।

  भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को यह भी आशंका है कि तृणमूल कांग्रेस की इस भारी हिंसा से तंग आकर उनके कुछ कार्यकत्र्ता तृणमूल ज्वाइन कर सकते है।

  कहा जा रहा है कि मौजूदा हिंसा आजादी के समय की सांप्रदायिक हिंसा की याद दिला रही है।

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कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चैधरी ने कहा है कि ‘‘हमारे मुस्लिम वोट तृणमूल कांग्रेस में चले गए और वाम दलों ने अपने वोट तृणमूल को ट्रांसफर कर दिए।’’(दैनिक आज-5 मई 21)

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अब आप पश्चिम बंगाल की गंभीर स्थिति अनुमान लगा लीजिए।

एक समुदाय के लोग अभूतपूर्व एकजुटता आखिर क्यों दिखा रहे हैं ?जाहिर है कि उद्देश्य गैर राजनीतिक है।

दरअसल उन्हें आशंका है कि भाजपा सी.ए.ए.और एन.आर.सी.लागू कर सकती है।.

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जानकार लोग बताते हैं कि वह तो भाजपा की केंद्र सरकार को लागू करना ही पड़ेगा।

अन्यथा, देश नहीं बचेगा।

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केंद्र को कुछ और काम करने ही पड़ंेगे।

तृणमूल  के जितने नेताओं पर तरह -तरह के भ्रष्टाचार के  आरोप में मुकदमे चल रहे हैं,जांच चल रही है,उन्हें उनकी तार्किक परिणति तक पहुंचाना ही पड़ेगा।

 साथ ही,सीमा पर बाड़ लगाना ही पड़ेगा।

बाड़ लगाने के लिए ममता सरकार पहले जमीन अधिग्रहण करने में आनकानी कर रही थी।

बाद में राजी हुई थी।

पता नहीं, नई ताकत के साथ एक बार फिर सत्ता में आने के बाद अब वह क्या करंेगी ? 

 यह सब करने के सिलसिले में केंद्र सरकार को कितना विरोध झेलना पड़ेगा,उसकी झलक केंद्र को अभी से मिलनी शुरू हो गई है।

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--सुरेंद्र किशोर

5 मई 21

 


मंगलवार, 4 मई 2021

    ‘सेक्युलरिस्टों’ की फेल होती रणनीति

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 टुकड़े -टुकड़े गिरोह और जेहादी तत्व इस देश में

मजबूती से सक्रिय हैं।

बाहरी-भीतरी मदद से वे अपनी ताकत बढ़ाते जा रहे हैं।

 दूसरी ओर इस देश के अधिकतर लोग चाहते हैं कि इन तत्वों का सख्त विरोध हो।

किंतु इस देश के कितने ‘सेक्युलर’ दल,‘सेक्युलर’ 

बुद्धिजीवी तथा ‘सेक्युलर’ संगठन ऐसे तत्वों का विरोध कर रहे हैं ?

 शायद कोई नहीं।

बल्कि वे ऐसे तत्वों का प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से समर्थन ही कर रहे हैं।

नतीजतन तथाकथित सेक्युलर शक्तियां कमजोर होती जा रही हैं। 

  दूसरी ओर, जो राजनीतिक व गैर राजनीतिक शक्तियां देश तोड़कों का विरोध कर रही हैं,उनका जन समर्थन बढ़ता जा रहा है।

  पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी यही हो रहा है।

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अरे तथाकथित सेक्युलरिस्टो,अब भी तो चेत जाओ !

क्यों अपनी ही गलतियों से उन शक्तियों को मजबूत कर रहे हो जिन्हें तुम सांप्रदायिक कहते हो ?

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  अपने ही समकालीन इतिहास से सबक क्यों नहीं लेते ?

नब्बे के दशक में जब तथाकथित प्रगतिशील व सेक्युलर दल व बुद्धिजीवी देश की कुछ महा भ्रष्ट्र ,जातिवादी व अपराधी तत्वों की सरकारों का समर्थन कर रहे थे तो उस समर्थन का कारण उनसे पूछा जाता था।

वे जवाब देते थे कि ‘‘हम सांप्रदायिक ताकतों यानी भाजपा को  सत्ता में आने से रोकने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

  पर, सवाल है कि क्या आप सत्ता में आने से रोक सके जिन्हें आप सांप्रदायिक कहते हैं ?

नहीं रोक सके।

यानी, आपकी रणनीति फेल कर गई।

आप आज तक नहीं सीख सके कि उन्हें सत्ता में आने व उनके ताकतवर बनते जाने से उन्हें कैसे रोका जा सकता है। 

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आज जो रणनीति आपकी है,वह भी फेल ही होने वाली है।

फिर आप कहीं के नहीं रहेंगे।

फेल इसलिए होगी क्योंकि इस देश की अधिकतर जनता यह चाहती है कि जेहादी ताकतों का सख्त विरोध हो।

हां,सभी समुदायों के जरूरतमंद लोगों को उनकी जरूरत के अनुपात में सरकार की ओर से भरपूर मदद मिले।

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--सुरेंद्र किशोर

 12 अप्रैल 21  


    मोदी की बांग्ला देश यात्रा और चुनाव 

     --सुरेंद्र किशोर-- 

 कुछ लोग प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की बांग्ला देश यात्रा को 

पश्चिम बंगाल के चुनाव से जोड़कर आज देख रहे हैं।

  उन्हें 1972 में इस देश में हुए कुछ विधान सभाओं के चुनावों की यह कहानी पढ़ लेनी चाहिए।

   सर्जिकल स्ट्राइक के समय कांग्रेस के संचार विभाग के प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि 

‘‘कांग्रेस पार्टी किसी भी स्तर पर सेना की बहादुरी का राजनीतिक लाभ लेेेने का विरोध करती है।’’

पर, सुरजेवाला की बात इतिहास की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

   सवाल है कि क्या कांग्रेस ने सन 1971 के बांग्ला देश युद्ध में विजय का चुनावी लाभ लेने का प्रयास नहीं किया था ?

वैसे कुछ साल पहले मोदी सरकार को ‘सर्जिकल स्ट्राइक डे’ मनाने की कोई जरूरत नहीं थी।

भाजपा सर्जिकल स्ट्राइक डे नहीं भी मनाती तो भी उसे उसका राजनीतिक या चुनावी लाभ मिलता।

उसी तरह कांग्रेस पार्टी बांग्ला देश युद्ध का चुनावी लाभ उठाने के लिए अतिरिक्त प्रचार नहीं भी करती तो भी उसे उसका लाभ मिल ही जाता।अतिरिक्त प्रचार कांग्रेस ने 1972 के विधान सभाओं के चुनाव के दौरान किया था।

  इंदिरा गांधी को तो आंध्र प्रदेश के एक कांग्रेसी सांसद ने ‘दुर्गा’ का दर्जा दे ही दिया था।देश के अधिकतर लोग भी इंदिरा गांधी की प्रशंसा कर रहे थे।

 पर धैर्य किसे है !उन्हें भी नहीं था।

 इस देश की राजनीति में न तो एक दूसरे पर आरोप लगाने में कोई धैर्य रहता है और न ही राजनीतिक लाभ उठाने में।

अब देखिए बांग्ला देश युद्ध के बाद तत्कालीन इंदिरा सरकार और कांग्रेस ने क्या किया था ?

उत्तर प्रदेश के प्रमुख कांग्रेसी नेताओं के विरोध के बावजूद समय से दो साल पहले यानी 1972 में विधान सभा चुनाव इंदिरा गांधी ने करवा दिया।

  प्रधान मंत्री को लग गया था कि दो साल बाद युद्ध में विजय का चुनावी लाभ उनके दल को शायद नहीं मिल सकेगा।याद रहे कि उत्तर प्रदेश विधान सभा का 1969 में चुनाव हुआ था।कांग्रेस को सदन में पूर्ण बहुमत भी हासिल था। 

  1972 के विधान सभा चुनाव के समय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने मतदाताओं के नाम जो चिट्ठी जारी की उसके अनुसार,

‘‘देशवासियों की एकता और उच्च आदर्शों के प्रति निष्ठा ने हमें युद्ध में जिताया।

अब उसी लगन से हमें गरीबी हटानी है।

इसके लिए हमें विभिन्न प्रदेशों में ऐसी स्थायी सरकारों की जरूरत है जिनकी साझेदारी केंद्रीय सरकार के साथ हो सके।’’

(आज तो डबल इंजन की सरकार पश्चिम बंगाल में और भी जरूरी है।विकास-कल्याण की कीमत पर भी ममता सरकार मोदी सरकार से लगातार असहयोग कर रही है।आंतरिक-बाह्य सुरक्षा लगातार खतरे में है सो अलग !)

  मार्च, 1972 के साप्ताहिक ‘दिनमान’ के अनुसार,

‘जहां तक कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र का संबंध है,उसने यह बात छिपाने की कोशिश नहीं की है कि भारत पाक युद्ध में भारत की विजय इंदिरा गांधी के सफल नेतृत्व का प्रतीक है।  इंदिरा गांधी के हाथ मजबूत करने के लिए विभिन्न प्रदेशों में अब कांग्रेेस की ही सरकार होनी चाहिए।’ 

  कोई भी बयान देने से पहले नेताओं को यह याद कर लेना चाहिए कि उसी सवाल पर उसने पहले खुद क्या रुख अपनाया था।

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         जरा ऐसे करके देखिए !

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अहंकारी, अशिष्ट और बदजुबान लोगों को बुढ़ापे में

उन्हें काफी अकेलापन झेलना पड़ता है।

  तब अत्यंत थोड़े लोग ही उनका हालचाल पूछते हंै ।

या, फिर मदद को आगे आते हैं।

 गांवों व शहरों में मैंने दशकों से यही अनुभव किया है।

  इसलिए जब आज आप जवान हैं या फिर आपके पास धन या कोई और शक्ति है तो कुछ अधिक ही विनीत व शिष्ट बन जाइए।

 मीठी जुबान के इस्तेमाल में कुछ  खर्च तो होता नहीं !

  साथ ही, किसी से मिलिए तो अपने बारे में कम बताइए,उसके बारे में अधिक पूछिए।

बल्कि अपने बारे में तभी बताइए जब वह पूछे।

ताकि, उसे यह लगे कि उसके गुण व उसकी तरक्की से कुछ लोग खुश भी होते हैं।

फिर देखिए संबंधों पर कितना व कैसा चमत्कारिक व स्थायी असर पड़ता है।

   --सुरेंद्र किशोर 


      

कई साल पहले मैं हड्डी विशेषज्ञ डा.एच.एन.दिवाकर 

से मिला था।

उन्होंने मुझे अनुलोम-विलोम भी करने की सलाह दी थी।

उन्होंने बताया था कि उससे स्वांस की नलियों को ताकत मिलेगी जो गर्दन की ह्डी को थामे रहती हंै।

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  अब कोरोना काल में डा.नरेश त्रेहन को यह कहते हुए सुना कि अनुलोम -विलोम करना चाहिए।

उनके अनुसार, उससे फेफड़ों को ताकत मिलेगी।

उससे फेफड़े कोरोना का मुकाबला कर पाएंगे।

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खुद मेरा विश्वास सर्वधारा चिकित्सा पद्धति में है जिसके लिए दिवंगत डा.श्रीनिवास जाने जाते थे।

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मेरी राय में 

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आयुर्वेद पद्धति--लोअर कोर्ट है,

होमियोपैथ--हाईकोर्ट है,

एलोपैथ--सुप्रीम कोर्ट है।

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योग व एक्युप्रेसर को भी आप लोअर कोर्ट ही मान सकते हैं।

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आजकल तो लोग कानूनी मदद के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट चले जाते हैं।

किंतु सामान्यतः इलाज के लिए पहले लोअर कोर्ट,फिर हाईकोर्ट व अंत में 

सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए।

वैसे अपवादों की बात और है।

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--सुरेंद्र किशोर

26 अप्रैल 21  


   सी.ए.ए.-एन.आर.सी. विरोधी और घुसपैठियां समर्थक अभियान-‘यज्ञ’ में दो तथाकथित ‘सेक्युलर’ दलों ने एक खास ‘सेक्युलर’ दल के पक्ष में एकजुटता के क्रम में खुद को ‘होम’ कर दिया। 

     सुरेंद्र किशोर

    3 मई 21

   


       

   जरूरी सेवा समझकर शासन मीडियाकर्मियों 

     के टीकाकरण पर प्राथमिकता से ध्यान दे

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--सुरेंद्र किशोर--

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सर्दी हो या गरमी, डाकिया जरूर आता है।

यह कहावत अब अखबार पर फिट हो गया है।

इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की तो अनेक लोगों को लत सी लग गई है,भले उनमें से कुछ पर बेकार की बक -बक होती रहे और ‘‘कुत्ता भुकाओ कार्यक्रम’’ चलता रहे।

हालंाकि सारे इलेक्ट्रानिक मीडिया वैसे गैर जिम्मेदार नहीं हैं।

 कुछ ऐसे भी हैं जिनके एंकर व अतिथियों को देख-सुनकर लगता है कि वे संस्कारी परिवारों से हैं और वे सड़कछाप  गुंडे तो कत्तई नहीं हैं।

खैर,उन्हें भी इस कोरोना काल में फिलहाल माफ कर दिया जाना चाहिए।

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पानी पड़े या ओला,अखबार जरूर आता है।

पर, उस अखबार को तैयार करने वाले कितनी 

मेहनत करते हैं,इसका अनुुमान कम ही लोगों को रहा होगा।  

उनमें से कुछ तो रात भर जागते हैं।

कुछ अन्य अपनी जान जोखिम में डालते है।

ऐसा सामान्य दिनों में भी होता ही है।

पर, इस कोरोना विपत्ति में तो सबकी जान जोखिम में है।

कुछ मीडियाकर्मी परदे के पीछे रहकर तो कुछ अन्य पूर्णतः दृष्टिगोचर होकर काम में लगे रहते हैं।

अपना बेस्ट देने की कोशिश करते रहते हैं।

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   कोरोना काल में मीडिया (प्रिंट,इलेक्ट्राॅनिक व आॅनलाइन मीडिया)के संवाददाता जान जोखिम में डाल कर शासन व समाज के लिए खबरें जुटा रहे हैं।

परेशान शासन का संदेश आम लोगों तक पहुंचाने का माध्यम बन रहे हैं।

  इस विपरीत समय में चिकित्सकों ,स्वास्थ्य

कर्मियों व सुरक्षाकर्मियों आदि की तो ऐतिहासिक भूमिका है।

  उनका कोई मुकाबला नहीं।

पर, मीडियाकर्मियों का भी महत्वपूर्ण योगदान हो रहा है।

 बस,उनमें से कुछ को थोड़ा और सकारात्मक होने की जरूरत है ताकि आम लोगों का हौसला न टूटे।

खैर, वे हों या नहीं हों,वे जानें।

पर, उनकी भी जान की रक्षा करना सरकार व समाज का कत्र्तव्य है।

 कई मीडियाकर्मी इन दिनों अपना काम करते -करते अपनी जान भी गंवा रहे हैं।

   जब 18 $ आयु वाले को भी टीके लगाने हैं तो अब मीडियाकर्मियों पर भी शासन ध्यान दे।

मीडिया को भी जरूरी सेवा माने।

  कुछ अखबार तो ‘वर्क फ्राॅम होम’ से काम चला रहे हैं।

  ऐसा करके वे अपने बहुमूल्य कर्मियों की जान जोखिम में पड़ने से बचा रहे हैं।

पर, सारे मीडिया समूह वैसे नहीं हैं।

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 28 अप्रैल 21


  जन्म दिन पर (1 मई )

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मधु लिमये को एक खास बात के लिए 

भी याद कर सकते हैं।

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मधु लिमये सन 1982 में सक्रिय राजनीति से अलग हो गए थे।

तब उनकी उम्र करीब 60 साल थी।

आज ऐसे कई बड़े नेता अस्सी की उम्र में पहुंच रहे हैं, फिर भी सत्ता की उनकी लालसा अभी मरी नहीं है।

  व्याकुल भारत बने हुए हैं,साथ ही हंसी के पात्र भी।

 ऐसे दिग्गज नेता लोग पहले केंद्र की सत्ता में भी रह चुके हैं।ऐसे नेताओं के नाम का अनुमान आप लगा ही सकते हैं।

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जनसंघ नेता नानाजी देशमुख  भी करीब 64 साल की उम्र में ही सक्रिय राजनीति से अलग हो गए।

देशमुख और लिमये कभी सत्ता की कुर्सी पर रहे ही नहीं।

चाहते तो कुर्सी पा ही सकते थे।

वे दूसरों को कुर्सी दिलाते थे।

अतिवादी बलराज मधोक को जनसंघ में किनारे करके मध्यमार्गी अटल बिहारी वाजपेयी को आगे करने के पीछे नानाजी की बड़ी भूमिका थी।

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--सुरेंद्र किशोर

1 मई 21


     एक कोरोनाकारक पीड़ा यह भी !!

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     --सुरेंद्र किशोर --

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जो व्यक्ति कोविड-19 के शिकार हो रहे हैं,उनमें से कई के परिजन को तो अपूरणीय क्षति हो रही है।

 उनकी पूरी दुनिया ही उजड़ जा रही है।

वे मर्मांतक पीड़ा झेल रहे हैं।

   पर, इसी समस्या से जुड़ी एक पीड़ा दूसरे ढंग की भी है।

किसी संवदेनशील लोगों के लिए वह भी कम नहीं।

  हमारे एक दिल्लीवासी रिश्तेदार को आॅक्सीजन की सख्त जरूरत है।

हम यहां से उनके लिए प्राणवायु का प्रबंध नहीं करा पा रहे हैं।

 क्या यह भी कोई मामूली पीड़ा है ?

मदद न कर पाने की पीड़ा !

जैसे लगता है मानो मैं भी परोक्ष रूप से इस घातक बीमारी का शिकार हो चुका हूं ! 

वैसे इस मामले में मैं कोई अकेला व्यक्ति नहीं हूं।

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--सुरेंद्र किशोर--

  1 मई 21 


 हार की नई परिभाषा ?

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जिस दल ने पश्चिम बंगाल में विधान सभा की सीटें 3 से बढ़ाकर 77 कर ली, उसके बारे में यह शोर मचा है कि वह हार गया !

 इसलिए नरेंद्र मोदी को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

दूसरी ओर , जिन दलों ने अपनी पिछली सभी सीटें गंवा दीं,

उन पर कोई टिप्पणी नहीं।

  भाजपा का यही कसूर था कि उसने यह हौसला बांधा था कि हम सरकार बनाएंगे।

  क्या कोई भी बड़ा दल जब चुनाव में उतरता है तो यह कहता है कि हम सरकार नहीं बनाएंगे ? !

खैर, यहां तो कुछ भी बोलने -लिखने की पूरी आजादी है,चाहे वह तार्किक हो या न हो।

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    --सुरेंद्र किशोर

  4 मई 21



   सी.ए.ए.-एन.आर.सी. विरोधी और घुसपैठियां समर्थक अभियान-‘यज्ञ’ में दो तथाकथित ‘सेक्युलर’ दलों ने एक खास ‘सेक्युलर’ दल के पक्ष में एकजुटता के क्रम में खुद को ‘होम’ कर दिया। 

     सुरेंद्र किशोर

    3 मई 21

   


सोमवार, 3 मई 2021

     सावधानी हटी, दुर्घटना घटी !!

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    --सुरेंद्र किशोर--   

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इस कोरोना महामारी के काले दिनों में भी कुछ लोग अपने मित्रों-परिचितों को निर्भीक, निडर, निधड़क और बेखटक बनने की सलाह देते रहते हैं।

 कहते हैं कि घूमते-फिरते और मिलते -जुलते रहिए।

कुछ नहीं होगा,सिर्फ मास्क कसकर नाक पर चढ़ा लीजिए।

ऐसी किसी सलाह को आप अगले एक-डेढ़ महीने तक हंस कर टाल दिया कीजिए।

उसी में सबकी भलाई है।

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किसी ‘इमरजेंसी’ में ही घर से बाहर कदम रखिए।

कोरोना संभवतः अगले महीने के मध्य में अपने शीर्ष पर होगा।

उसके बाद उसकी ढलान शुरू होनी ही है।

इस बीच बेड-आॅक्सीजन वगैरह की मांग व आपूत्र्ति के बीच 

फासले बहुत कम रह जाएंगे।

   फिर आप मित्रों के साथ यदाकदा उठने-बैठने लगेंगे ही,

वैसे फिर भी कुछ सावधानियों के साथ ही।

 ऐसे मर्जों के साथ हमको, आपको, जग को लंबे समय तक रहना सीख लेना ही पड़ेगा।

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 प्रकृति साल भर की हमारी जरूरतों के लिए तरह -तरह की चीजें भरपूर मात्रा में पैदा करती है,प्रदान करती है।

लेकिन उन्हें यदि हम सात महीने में ही चट कर जाते हैं,तो वैसी स्थिति में यह सब झेलना ही तो पड़ेगा।

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--सुरेंद्र किशोर

25 अप्रैल 21

  


रविवार, 2 मई 2021

 संकेत मिल रहे हैं कि पश्चिम बंगाल के आने वाले दिन-महीने-साल बड़े हलचल भरे होंगे।

  वैसे जो कुछ होगा,उसके लिए हलचल शब्द बहुत ही हल्का है।

कम लिखना,अधिक समझना !!

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सुरेंद्र किशोर

2 मई 21 


शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

        अरबपति नेताओं से  

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पटना के अदालतगंज स्थित जनशक्ति भवन में सी.पी.आई. के नेताओं ने कोरोना संक्रमितों के लिए हेल्पलाइन सेंटर खोला है।

भामाशाह फांउडेशन अपने ढंग से राहत के काम में जुटा है।

पटना के महिला काॅलेज की शिक्षिका अपराजिता कृष्णा भोजन का इंतजाम कर रही हैं तो गौरव राय आक्सीजन का।

 यह सूची लंबी है।

 इस बीच इस देश के वैसे नेतागण याद आते हैं जिन्होंने सरकारी कोष व अन्य तरीकों से अरबों रुपए लूट रखे हैं।

उनकी ओर से भी तो कोरोना मरीजों को कुछ मदद मिले !!

इससे उनके कुछ पाप धुल जाएंगे।

  आप जानते हैं कि देश भर में फैले वैसे अरबपति नेतागण कौन -कौन हैं !

यहां नाम लेने की जरूरत नहीं।

   जिस गरीब देश का नेता हर हफ्ते अपनी पुलिस से अपने व अपने आका के लिए सौ करोड़ रुपए की वसूली करवाता हो,उसकी ओर से या उसके आका की ओर से कोरोना पीड़ितों की कितनी व क्या मदद हो रही है ?

वैसे वह सौ करोड़ी नेता अकेला नहीं है।

अनेक ने कंबल ओढ़ की घी पिया है।

कुछ अब भी पी भी रहे हैं।

  जियो के टावर तोड़ने वालों व अंबानी

 को इस देश के हर मर्ज की वजह बताने वालों की अब उनके प्रति कैसी राय है जो अंबानी 

जीवनदायी आक्सीजन का इंतजाम कर रहा है ?

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29 अप्रैल 21



1 मई मधु लिमये का जन्म दिन है

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अपवादों को छोड़कर आज संसद सहित इस देश की विधायिकाओं मेें आए दिन हंगामा,अराजकता और अशोभन दृश्य उपस्थित होते रहते हैं।

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कई सांसद व विधायक मानते हैं कि हंगामा करके ही वे मीडिया में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं।

क्योंकि पढ़ने-लिखने,रिसर्च करने व तथ्य एकत्र करके 

सदन के भीतर शासन को निरूत्तर करने की क्षमता-योग्यता उनमें नहीं है।

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वे योग्यता हासिल करना भी नहीं करना चाहते।क्योंकि सांसद बनने के लिए वह कोई अनिवार्य गुण रहा नहीं।

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लोकतंत्र की शालीनता-गरिमा पर छाए ऐसे विकट संकट की घड़ी में मधु लिमये याद आते हैं।वे किसी 

हंगामे के बिना ही संसद व सरकार को हिलाते रहते थे।

लिमये अपनी सीट छोड़कर कभी सदन के वेल में गए

हों,ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिला।

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    ---सुरेंद्र किशोर--  

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    बिहार के मुंगेर व बांका से बारी- बारी से लोक सभा में चार बार गये मधु लिमये ने यह सिखाया था कि किसी हंगामे के बिना भी विधायका में किस तरह कटु सत्य भी प्रभावकारी तरीके से बोले जा सकते हैं।

 पर इसके लिए सदन के नियमों की बेहतर जानकारी होनी चाहिए।

   उसके इस्तेमाल की सलाहियत भी।

यह सब सन 1964 में बिहार से पहली बार लोक सभा में गये मधु लिमये को अच्छी तरह आता था।

   दुःख की बात है कि आज विधायिकाओं में अपनी बातें  कहने के लिए प्रमुख दलों को भी  अक्सर हंगामे का सहारा लेना पड़ता है।

  जबकि, मधु लिमये तो ‘वन मैन आर्मी’ थे।

संसद व विधान सभाओं  की गरिमा का अवमूल्यन आज की तरह ही  जारी रहा तो इस देश की लोकतांित्रक व्यवस्था के प्रति ही लोगों के मन में इज्जत बहुत घट जाएगी।

   यह और भी दुःख की बात है कि आज संसद या फिर विधायिका की गरिमा घटाने में करीब- करीब सभी दलों का योगदान है।

  ऐसे में मधु लिमये जैसे ‘‘सभा -चतुर’’ नेता अधिक ही याद आते है।

  वैसे बिहार से चुनाव जीत कर संसद के दोनों सदनों में बारी -बारी से  गये नामी -गिरामी राष्ट्रीय नेताओं की भी कमी नहीं रही।

 उन बड़े नेताओं व काबिल पार्लियामेंटेरियनों में बिहारी भी थे और गैर बिहारी भी।

   पर सबमें मधु लिमये का स्थान बेजोड़ था।

आजादी के बाद बिहार से लोक सभा व राज्य सभा के संदस्य बने नेताओं में जे.बी.कृपलानी,अशेाक मेहता,जार्ज फर्नाडिस,

आई.के.गुजराल,युनूस सलीम,कपिल सिब्बल,रवींद्र वर्मा,नीतीश भारद्वाज,मीनू मसानी,लक्ष्मी मेनन और एम.एस.ओबराय प्रमुख थे।

   पर इनमें मधु लिमये का स्थान अलग था।

   इनके कारण भी बिहार और मुंगेर के नाम दुनिया भर में गौरवान्वित हुए।

  मधु लिमये का बिहार से कुछ खास तरह का लगाव भी रहा।

   वे बिहार से मात्र सांसद ही नहीं थे बल्कि वे राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के साथ-साथ  बिहार की समस्याओं को भी समान ऊर्जा व मनोयोग से संसद के भीतर व बाहर उजागर करते थे।

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   बिहार पर उनके लेखन व भाषण  चर्चित हुए। 

हंगामे के बिना आज जिन छोटे -बड़े सांसदों व दलों के लिए अपनी बातें कह पाना कठिन होता है,उन्हें मधु लिमये की संसदीय शैली से इस मामले में अब भी कुछ सूत्र सीख लेना चाहिए । 

   हालांकि यह थोड़ा कठिन दिमागी कसरत का काम है जिससे हमारे अधिकतर नेता जरा दूर ही रहना चाहते हैं।

समाजवादी विचारक मधु लिमये का जन्म 1 मई 1922 को पूणे में हुआ था।

   उनका निधन 8 जनवरी 1995 को दिल्ली में हुआ।

  वे दो बार मुंगेर/1964 और 1967 /और दो बार बांका /1973 और 1977/से लोक सभा सदस्य चुने गये।

   सांसद के रूप में मधु लिमये ने तत्कालीन केंद्र सरकार को इतना हिला दिया था कि इंदिरा गांधी ने 1971 में तत्कालीन बलशाली कांग्रेसी नेता व शेरे बिहार के नाम से चर्चित राम लखन सिंह यादव के सामने अपनी आंचल पसार कर उनसे यह आग्रह किया था कि  आप मुंगेर और बाढ़ की  सीटें हमें विशेष तौर पर उपहार में दे दीजिए।

यानी, इंदिरा जी मधु लिमये और तारकेश्वरी सिंहा को किसी भी कीमत पर हरवाना चाहती थीं।

 इस काम में यादव जी ने उनकी भारी मदद भी की थी। 

दोनों हार गए थे।

  लालू प्रसाद से पहले राम लखन जी ही बिहार के यादवांें के सबसे बड़े नेता थे।

 वैसे भी तब गरीबी हटाओ का नारे का इंदिरा जी के पास बल  था। 

   पर दो साल बाद ही यदि मधु लिमये एक उप चुनाव के जरिए बिहार के ही बांका से 

लोक सभा मंे ंचले गये थे तो यह उनके प्रति बिहारी कृतज्ञ मानस का उपकार का भाव ही था।

  मधु ने बिहार का नाम और भी ऊंचा किया था।

मधु लिमये की चर्चा करने पर 

कुछ  विदेशी राजनयिक भी दिल्ली में यह पूछते थे कि वे कहां से चुनाव जीतते हैं ? 

   याद रहे कि मुंगेर या बांका चुनाव क्षेत्र ब्राहमण बहुल नहीं माना जाता।

   इस सूचना के बाद कई विदेशी राजनयिकों  के मन में यह बात भी कुलबुलाने लगती थी कि तब क्यों बिहार को जातिवादी राज्य कहा जाता है ?

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    मधु लिमये ने ऐसे समय में लोक सभा में अपनी संसदीय योग्यता की धाक जमाई थी जब के स्पीकर सरदार हुकुम सिंह लोहियावादी समाजवादी सांसदों के सदन में खड़ा होने के साथ ही उन्हें  तत्काल बैठा देने की कोशिश करने लगते थे। क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि वे जवाहर लाल नेहरू या इंदिरा गांधी  के खिलाफ कोई कटु बात बोल दे।

   नेहरू 1964 तक प्रधान मंत्री थे।

  नेहरू के कटु आलोचक व अदमनीय समाजवादी नेता डा.राममनोहर लोहिया ने 1963 में लोक सभा में प्रवेश करने के साथ ही नेहरू पर ऐसे कठोर प्रहार शुरू कर दिये थे कि स्पीकर सदा सतर्क रहते थे।

    पर यदि मधु के पास संसदीय फोरम के इस्तेमाल की चतुराई थी,तो उन्हें अपनी बात कहने से 

 स्पीकर रोक भी नहीं सकते थे।

   स्पीकर उन दिनों  लोकलाज का ध्यान रखने वाले नेता हुआ करते  थे।

  संविधान व लोक सभा की कार्य संचालन नियमावली का सहारा लेकर जब मधु लिमये  प्रस्ताव व सूचनाएं देते थे तो उन पर चर्चाएं कराने पर स्पीकर मजबूर हो जाते थे।

   इस तरह संसदीय ज्ञानों का उपयोग करके मधु लिमये देश व समाज के लिए काफी कुछ कर पायेे।

   उनसे ‘‘सकारात्मक ईष्र्या’’ रखने वाले एक अन्य समाजवादी चिंतक व पूर्व सांसद किशन

 पटनायक ने मधु लिमये के बारे में उनके निधन के बाद  लिखा था कि ‘एक श्रेष्ठ कोटि के सांसद के रूप में मधु की प्रतिष्ठा हुई।

  मंत्रियों के भ्रष्टाचार के विरोध में उनका हमला इतना कारगर होने लगा था कि बड़े नेताओं में उनके प्रति भय हुआ।

   सन 1964 से 1967 के बीच सांसद के रूप में उनका जो उत्थान हुआ ,उसका मैं सदन के भीतर प्रत्यक्षदर्शी था।

   संसदीय प्रणाली व संविधान के बारे में उनका ज्ञान अद्वितीय था।

   मधु लिमये शुरू से मेरे लिए आदर, ईष्र्या व असंतोष के पात्र रहे।

   मेरे स्वभाव में है कि ईष्र्या उस व्यक्ति के लिए होती है जिसके लिए मेरे मन प्यार होता है।’

   गौरव की बात है कि मधु लिमये जैसे संसदीय महारथि सिर्फ बिहार से ही सांसद रहे।

   काश ! बिहार को वैसा गौरव  एक बार फिर मिल पाता ।   

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गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

 सौ पैसे का घिसकर 15 पैसे बन जाना !

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सन 1985 में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि 

जन कल्याण के लिए केंद्र सरकार जो खर्च करती है,उसके प्रत्येक रुपए यानी सौ पैसों में से सिर्फ 15 पैसे ही उन तक पहुंच पाते हैं जिनके लिए पैसे आबंटित होते हैं।

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अब सवाल है कि सौ पैसों में से 85 पैसे बीच में ही लूट लिए जाने के लिए कौन-कौन लोग जिम्मेदार रहे हैं ?

क्या राजीव गांधी से पहले बने प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू,इंदिरा गांधी या लाल बहादुर शास्त्री जिम्मेदार थे ?

इनमें से कोई एक जिम्मेदार था ?

या तीनों जिम्मेदार थे ?

यानी, जिस  शीर्ष सत्तासीन व्यक्ति को सरकारी खजाने की रक्षा की जिम्मेदारी थी,उन्होंने उसकी रक्षा क्यों नहीं की ?

उनकी क्या मजबूरी थी ?

ऐसे में क्या वे सफल नेता माने जाएंगे ?

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या, सौ पैसे के घिस कर 15 पैसे बने जाने के लिए अफसरशाही जिम्मेदार थी ?

क्या अन्य राजनीतिक लोग जिम्मेदार थे ?

या कोई अन्य जिम्मेदार थे ?

क्या इसका तार्किक जवाब देश को कभी मिल पाएगा ?

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--सुरेंद्र किशोर

28 अप्रैल 21


   अमेरिका में प्रति 10 लाख आबादी पर 1754 मौत

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दस लाख आबादी पर भारत में 133 मौत

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हालांकि हर जीवन बहुमूल्य है।

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इस देश के बिघ्नसंतोषी फिर भी कह रहे हैं 

कि भारत गर्त में जा रहा है।

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अमेरिका में कोरोना से 5 लाख 86 हजार लोगों की मौत हो चुकी है।

भारत, जिसे गर्त में जाता बताया जा रहा है,वहां यह आंकड़ा दो लाख अब पहुंचा है।

अमेरिका की आबादी 33 करोड़ है।

भारत की आबादी 135 करोड़ है।

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 .भारत में प्रति दस लाख आबादी पर मृत्यु दर सबसे कम है।

अंतरराष्ट्रीय औसत दस लाख पर 395 है और भारत में 133  है।

अमेरिका में प्रत्येक 10 लाख आबादी पर कोरोना से मृतकों का  आंकड़ा 1754 है।

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प्रदीप सिंह,दैनिक जागरण-29 अप्रैल 21 

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भारत में अमेरिका जैसा कानून का कठोर शासन होता तो 

तो यहां और भी जानें बचाई जा सकती थीं।

अमेरिका में अदालती सजा की दर 93 प्रतिशत है।

भारत में सजा की दर 67 प्रतिशत है।

यानी, इस देश में कानून का डर कम है।

लोग खुलेआम कोरोना नियमों का उलंघन कर रहे हैं।

यदि यहां भी लोगों में कानून का डर होता तो यहां मृत्यु कम होती।

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इसलिए अदालत, भारत सरकार व राज्य सरकारों को सोचना चाहिए की सजा की दर यहां कैसे बढ़े।

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--सुरेंद्र किशोर

29 अप्रैल 21

 


सोमवार, 26 अप्रैल 2021

     भगत सिंह पड़ोसी के घर में पैदा हो !

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  दिक्कत यह है कि अधिकतर लोग यह चाहते हैं कि सत्ता 

में बैठा व्यक्ति तो राजा हरिश्चंद्र हो,पर मेरे अपने बेटे को ऐसी सरकारी नौकरी मिल जाए,जिसमें ऊपरी आमदनी अपार हो।

मैं भी जब वोट देने मतदान केंद्र पर जाऊंगा

तब मेरे मन में कुछ अन्य प्राथमिकताएं होंगी।

हम चाहते हैं कि भगत सिंह मेरे पड़ोस के घर में पैदा हो, मेरे घर में नहीं।

 पर, हम खुद लोकतांत्रिक सक्रिय राजनीति के कंटकाकीर्ण मार्ग पर चार कदम भी नहीं चलेंगे।

   आप जैसे ईमानदार लोग सक्रिय राजनीति में नहीं जाएंगे तो जो जाएगा,वहां वर्षों तक डटा रहेगा ,वही तो राजपाट चलाएगा।

राजपाट चलाने वालों में कुछ ईमानदार होंगे तो कुछ बेईमान भी होंगे।

   यदि आप चाहते हैं कि राजनीति में सक्रिय बेईमानों की संख्या से ईमानदार लोगों की संख्या किसी दिन बहुत अधिक हो जाए तो आप आरामदायक व रूटीन लाइफ त्याग कर बड़ी संख्या में राजनीति में प्रवेश करें ।

इस तरह एक दिन संख्या की दृष्टि से बेईमानों पर हावी हो जाएं।

  किस तरह अरविंद केजरीवाल व उसके गैरराजनीतिक उत्साही साथियों ने दिल्ली की राजनीति पर कब्जा कर लिया।

लेकिन क्या आप ऐसा कर पाएंगे ? 

मुझे तो नहीं लगता।

क्योंकि वह आपके वश की बात नहीं।

आपके वश में जो है,आप वही करेंगे।

कर ही रहे हैं !

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सुरेंद्र किशोर 

26 अप्रैल 21


 

  


   पक्ष-विपक्ष के जिन नेताओं ने आजादी के बाद से ही इस देश के संसाधनों को चूस-चूस कर अपने व अपने लगुए-भगुए के घर भरे हैं,आज भी भर रहे हैं ,वे ही इस बात के लिए जवाबदेह हैं कि बेड और आॅक्सीजन के बिना इतनी बड़ी संख्या में मरीज आज तड़प -तड़प कर क्यों मर रहे हैं ?

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सच तो यह है कि कोरोना वैश्विक महामारी से सफलतापूर्वक मुकाबला करने में तो अमीर देश भी असमर्थ हैं।

पर, अपने देश में आजादी के बाद से ही भीषण भ्रष्टाचार नहीं जम गया होता तो हम आज की अपेक्षा थोड़ा बेहतर ढंग से कोरोना महामारी का मुकाबला कर सकते थे,भले पूरी तरह से फिर भी नहीं।क्योंकि इसकी विकरालता की कल्पना किसी को कभी नहीं रही है।

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   --सुरेंद्र किशोर-

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महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख के खिलाफ सी.बी.आई.ने प्राथमिकी दर्ज कर ली है।

याद करिए ये वही गृह मंत्री हैं जिन्होंने हर महीने 100 करोड़ रुपए की ‘उगाही’ का लक्ष्य मुम्बई के एक कनीय पुलिस अफसर को सौंपा था।

  अपेक्षा के अनुसार ही चर्चित शिवसेना नेता व राज्य सभा सदस्य संजय राउत ने कहा कि 

‘‘यह सी.बी.आई.का एजेंडा है।’’

 यदि मान भी लिया जाए कि यह सी.बी.आई.का एजेंडा है तो गैर बेईमान लोग इसे सकारात्मक एजेंडा ही मान रहे हैं।

संजय जी,

आपका एजेंडा तो नकारात्मक लगता है।

यूं कहें कि भ्रष्टाचार के साथ सहयोगात्मक है।

यानी ‘तुम भी लूटो, हम भी लूटें,लूटने की आजादी है,सबसे ज्यादा वही लूटे,जिसके तन पर खाकी-खादी है।’’

 सहयोग ऐसा कि दोनों राजनीतिक पक्षों में से कोई भी एक दूसरे को डिस्टर्ब न करे।

     देश के संकट का यही सबसे बड़ा कारण रहा है।

एक गैरकांग्रेसी प्रधान मंत्री तो कहा करते थे कि 

‘‘फस्र्ट फेमिली’’ को टच नहीं करना है।’’

  उनके कार्यकाल के पहले से भी यही अघोषित परंपरा चलती रही थी।

फस्र्ट फेमिली कौन है,इसका अनुमान आप लगा लीजिए ।

  पर, आज के प्रधान मंत्री ने इस परंपरा को तोड़ दिया है।

इसे क्या कहा जाए ?

अच्छा या बुरा ?

यदि आज के प्रधान मंत्री के खिलाफ भी किसी को कोई शिकायत है तो कानूनी रास्ता खुला है, कोर्ट जाइए उसके खिलाफ।

डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अपने प्रयास से रास्ता खोलने का यह आदेश सुप्रीम कोर्ट से जारी करवा ही दिया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी नागरिक कितनी भी बड़ी हस्ती के खिलाफ कोर्ट में जा सकता है।

खुद स्वामी इस आदेश का लाभ उठाते रहे हैं।  

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कुछ महीने पहले राज्य सभा सदस्य संजय राउत की पत्नी पर पैसों को लेकर कुछ आरोप लगे थे।

अन्य अनेक नेताओं की तरह राउत ने भी कहा कि जिस तरह का आरोप मेरी पत्नी पर लगा है,उसी तरह का आरोप भाजपा के सौ नेताओं पर भी है।

पर, कार्रवाई नहीं हो रही है।

   यदि कार्रवाई नहीं हो रही है तो संजय राउत जी आप उनके खिलाफ अदालत क्यों नहीं गये ?

डा.स्वामी ने तो अदालत जा -जाकर जयललिता और न जाने कितने बड़े-बड़े नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करवाई है।

   पर,संजय राउत अदालत नहीं जाएंगे।

  वे तो यही चाहेंगे कि तुम सत्ता में हो तो हमें बचाओ।हम सत्ता में आएंगे तो हम तुम्हें बचाएंगे।

  इसी तरह एक दूसरे को बचते -बचाते हुए इस देश के विभिन्न दलों के अधिकतर नेताओं ने सत्ता के भीतर व बाहर रहकर इस देश के साधनों को अपने घरों को भरने के लिए इतना चूसा है कि आज अस्पतालों में बेड व आॅक्सीजन के बिना लोग तड़प-तड़त कर मर रहे हैं।

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1985 तक भ्रष्टाचार के मामले में इस देश की स्थिति यह बन चुकी थी कि सौ सरकारी पैसों को हमारे सत्ताधारियों ने घिस कर पंद्रह पैसा बना दिया था।

तब तक इस देश के प्रधान मंत्री कौन -कौन थे ?

याद है न !

  भ्रष्टाचार का ‘‘रावणी अमृत कुंड’’ आज सांसद फंड बन चुका है जिसमें से अधिकतर सांसद(सब नहीं) खुलेआम नजराना-शुकराना ले रहे हैं । 

इसके साथ ही वे छोटे -बड़े सरकारी अफसरों को यही काम दूसरे महकमों में भी करने के लिए हरी झंडी भी दे रहे हैं।

हालांकि वहां भी सब अफसर एक ही तरह के नहीं हैं।

हां,एक बात में लगातारता है।

आज तक कोई प्रधान मंत्री सांसद फंड खत्म नहीं कर सका।

 खत्म करने की हिम्मत नहीं हुई।

नरेंद्र मोदी जैसे ईमानदार नेता को भी खत्म करने की हिम्मत नहीं हो रही है।

यह अधिक चिंताजनक स्थिति है। 

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और अंत में

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एक बार बिहार के मुख्य मंत्री डा.जगन्नाथ मिश्र ने प्रतिपक्ष के नेता कर्पूरी ठाकुर पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया।

जाहिर है कि आरोप झूठा था।

उस पर कर्पूरी ठाकुर ने बारी -बारी से कई बार मुख्य मंत्री से मांग की कि वे इस मुझ पर लगाए आरोप की जांच कराएं।

पर डा.मिश्र ने जांच नहीं करवाई।

उस पर एक दिन विधान सभा में कर्पूरी जी ने कहा कि आप मेरे खिलाफ जांच इसलिए नहीं करवा रहे हैं क्योंकि आपको डर है कि आपके खिलाफ भी जांच होने लगेगी।

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रविवार, 25 अप्रैल 2021

    जान है तो जहान है !

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      सुरेंद्र किशोर  

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शिक्षा,स्वास्थ्य,संचार और सेना !

 सरकार के लिए ये प्रमुख जिम्मेवारी वाले क्षेत्र हैं।

प्राथमिकता वाले क्षेत्र हैं।

रहने भी चाहिए।

सरकार के लिए किसी तरह का व्यापार द्वितीय प्राथमिकता वाला क्षेत्र होना चाहिए।

कोरोना महामारी ने स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारांे 

की भूमिका में बढ़ोत्तरी की जरुरत रेखांकित की है।

इसके साथ ही, इन चार क्षेत्रों में भ्रष्टाचार के मौजूदा स्तर को भी कड़ाई से कम करना होगा।

मौजूदा महामारी संकट के दौर में देश की विभिन्न सरकारें व चिकित्सकगण भरसक 

अच्छा काम कर रहे हैं।

हां, कुछ राजनीतिक बयानबाजियांे को नजरअंदाज ही कर देना चाहिए।

 पर, इस संकट के दौर से निकल जाने के बाद सरकारों को  स्वास्थ्य के क्षेत्र पर खास तौर पर फोकस करना होगा।

आज अन्य लोगों के साथ -साथ राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं की परेशानी भी देखने लायक है।

अधिकतर छोटे -बड़े नेता लोग आॅक्सीजन, बेड या अन्य तरह की सुविधाएं , लोगों को दिलाने में बुरी तरह 

असमर्थ हो रहे हैं।

बड़े -बड़े चिकित्सक भी कभ- कभी इस काम में खुद को लाचार पा  रहे हैं।

उन्हें भी इस समस्या पर सोच-विचार करना होगा।

पुरानी कार्य शैली अब किसी की नहीं चलेगी। 

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23 अप्रैल 21



 किसी ने ठीक ही कहा था,

‘‘पुस्तक देने वाला मूर्ख !

लौटाने वाला महामूर्ख !!’’

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पुस्तक के साथ अन्य पठन-पाठन व संदर्भ सामग्री को भी अब आप जोड़ लीजिए।

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जिस दिन इस देश के लोग होल्डर के साथ लिखने के लिए कलम देने लगें,उसी दिन से आप किताब भी पढ़ने के लिए किसी को देना शुरू कर दीजिएगा।

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आपने ध्यान दिया होगा,बैंक में या कहीं और जब कोई अनजान व्यक्ति कुछ लिखने के लिए आपसे कलम मंागता है तो आप क्या करते हैं ?

आप होल्डर को अपने पास रखकर कलम उसे दे देते हैं।

  क्योंकि होल्डर के बिना उसके लिए कलम व्यर्थ ही साबित होगी।

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--सुरेंद्र किशोर

25 अप्रैल 21


शनिवार, 24 अप्रैल 2021

    कारोना की महा विपत्ति में भी कुछ लोग  

 खोज रहे हैं अपने लिए सत्ता और संपत्ति !!

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    --सुरेंद्र किशोर--

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नोटबंदी के ठीक बाद उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव हुआ था।

तब राजग विरोधी दल यह अनुमान लगा रहे थे कि वहां उनकी ही सरकार बनेगी।

क्योंकि मोदी सरकार ने नोटबंदी 

करके पूरे देश को बैंकों के सामने लाइन में खड़ा कर दिया।

लोगों से रोजगार छिन गए।

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पर, राजग विरोधियों का वह अनुमान गलत निकला।

क्योंकि अधिकतर मतदाताओं को ‘मुख्तार अंसारी’ जैसों का राज मंजूर नहीं था।

उन्होंने छोटी विपत्ति (नोटबंदी ) को मंजूर करते हुए बड़ी विपत्ति की वापसी को रोक दिया।

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गुजरात विधान सभा चुनाव से ठीक पहले जी.एस.टी.लागू हुआ।

मुख्य प्रतिपक्ष ने उसे ‘गब्बर सिंह टैक्स’ कहा।

उसने गुजरात चुनाव नतीजे में अपनी सत्ता की वापसी की उम्मीद देखी।

पर उनकी उम्मीद पूरी नहीं हुई्र।

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गत साल कोरोना की शुरूआत के समय लाखों बिहारी मजदूरों की पीड़ादायक पैदल वापसी लोगों ने अपने टी.वी.सेटों पर देखी।

बिहार के प्रतिपक्ष को लगा कि नीतीश सरकार अब नहीं रहेगी।

  पर, मतदाताओं ने उनकी इच्छा पूरी नहीं की।

क्योंकि उन्हें लगा कि बिहार में भी ‘‘मुख्तार अंसारी’’ जैसों का राज वापस नहीं आना चाहिए।

हां,बिहार विधान सभा में राजग की सीटें जरूर घटीं।पर उसके दो अलग कारण थे ।उन कारणों का मजदूरों के कष्टप्रद पलायन से कोई संबंध नहीं था।

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अब आइए कोरोना नए व भयंकर रूप की चर्चा करें।

कुछ राजग विरोधी दल और नेतागण तो अब 2024 के लोस चुनाव में केंद्र से मोदी सरकार के सफाए का सपना भी देखने  लगे  हैं।

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क्या ऐसा हो जाएगा ?

पिछले अनुभवों को देखकर तो नहीं लगता।

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क्योंकि ऐसी प्राकृतिक विपत्ति के लेकर अधिकतर लोग किसी सरकार से यह उम्मीद करते हैं कि उसने राहत-सेवा की भरसक कोशिश की या नहीं ?

या उसने भी विपत्ति को अपने लिए लूट का अवसर बनाया ?

इस मामले में जनता जिस नतीजे पर पहुंचती है,उसके अनुसार निर्णय करती है।

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वैसे पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव और 2022 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों के नतीजे कुछ ठोस राजनीतिक संकेत दे सकते हैं।

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कल्पना कीजिए कि 2024 के लोक सभा चुनाव में राजग हार गया।

प्रतिपक्ष को बहुमत मिल गया।

फिर क्या होगा ?

प्रधान मंत्री कौन बनेगा ?

कांग्रेस का कोई अन्य ‘‘मनमोहन सिंह’’ ?

क्षेत्रीय दलों में से कोई ‘‘देवगौड़ा’’ ?

ममता बनर्जी या कोई और ?

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कल्पना कीजिए गैर राजग सरकार केंद्र में बन गई।

उस सरकार का पहला काम क्या होेगा ?

इस मामले में पिछले अनुभव आपको राह दिखाते हैं।

 पहला काम होगा-गैर राजग दलों खासकर कांग्रेसी नेताओं के नेताओं के खिलाफ जितने मुकदमे चल रहे हैं, उन्हें उठा लेना या कमजोर कर देना।

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दूसरा काम होगा-जिस तरह मनमोहन सिंह की सरकार चल रही थी,उसी तरह की सरकार को चलाना।

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1979 के प्रधान मंत्री चरण सिंह ने संजय गांधी के खिलाफ जारी मुकदमों को वापस लेने से मना कर दिया था।

 नतीजतन उनकी सरकार गिरा दी  गई।

  चंद्रशेखर की सरकार ने बोफोर्स केस उठाने से इनकार कर दिया।

नतीजतन उनकी सरकार चली गई।

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अब एक नई स्थिति की कल्पना कीजिए।

नए ‘मनमोहन सिंह’ तो वैसा कोई भी काम कर देंगे।

पर, कोई गैरकांग्रेसी प्रधान मंत्री क्या करेगा ?

कितना गरल पान करेगा ?

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अब 1971 के बिहार के गांव की एक कहानी।

तब मैं गांव में रहता था।

भीषण बाढ़ आई थी।

सारण जिले के दिघवारा के सिनेमा हाॅल के पास हम नाव पर सवार होते थे और करीब साढ़े तीन किलोमीटर दूर अपने दालान के पास ही उतरते थे।

उससे पहले कांग्रेसी सरकार से नदी पर बांध बनाने की गुहार की जाती थी।

सरकार की प्राथमिकता में वह बात नहीं थी।

लोग मान रहे थे कि इस बार यानी 1972 के बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के विधायक रामजयपाल सिंह यादव तो हारेंगे ही।

पर, हुआ उल्टा।

वे जीत गए।

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मैंने दिघवारा के एक मतदाता से पूछा,

‘‘ऐसा क्यों हुआ ?’’

उसने भोजपुरी में कहा कि बाढ़ तो भगवान ने भेजा था।

किंतु भरपूर रिलीफ (सामग्री)तो हमें जयपाल बाबू ने ही  दिया।

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अब देखना है कि मौजूदा कोरोना महा विपत्ति के दौरान चल रहे सरकारी राहत कार्यों से देश के लोग कितने संतुष्ट या नाराज हैं ?

इसका भी असर अगले किसी चुनाव पर पड़ेगा।

वैसे देश में कोरोना के अलावा भी चुनावी मुद्दे और भी हैं और रहेंगे भी।

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  24 अप्रैल 21