शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

    कृतज्ञता एक विरल गुण

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कई दशक पहले की बात है।

यह कहानी सच्ची है।

एक लोक सभा सदस्य ने अपने चुनाव क्षेत्र

के एक बड़े गांव के एक दबंग परिवार के चार 

बेरोजगारों को 

बारी -बारी से नौकरी दिलवा दी।

  पर,सांसद महोदय उस परिवार के पांचवें सदस्य 

को नौकरी नहीं दिलवा सके।

हालांकि कोशिश में लगे हुए थे। 

इस बीच चुनाव आ गया।

कोशिश में देरी के कारण तब तक वह दबंग परिवार सांसद महोदय पर सख्त नाराज हो चुका था।

नतीतजन नाराजगी में उस दबंग परिवार ने सासंद के खिलाफ ऐसा चुनाव अभियान चलाया कि थोड़े मतों से सांसद महोदय हार गए।

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यह बात अन्य क्षेत्रों में भी कमोवेश लागू होती है।

अत्यंत थोड़े से अपवादों की बात और है। 

यानी,कृतज्ञता आज उसी तरह एक विरल गुण है जिस तरह आर्थिक मामलों में ईमानदारी का गुण।

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--सुरेंद्र किशोर-

  24-2 -2021 


शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

 


रोहिणी आयोग की सिफारिश के लागू होने से ही समरूप लाभ संभव-सुरेंद्र किशोर

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डा.राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि आरक्षण लागू होने के बाद उसका अधिक लाभ मजबूत पिछड़े ही पहले उठाएंगे।

आरक्षण के समर्थक डा.लोहिया को शायद उम्मीद रही होगी कि बाद के वर्षों में कमजोर पिछड़ों को भी आरक्षण का लाभ मिलने लगेगा।

  किंतु उनका अनुमान सही नहीं निकला।

केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए मंडल आरक्षण 1993 में लागू हुआ था।

  पर ढाई दशक के बाद भी जब देश की करीब एक हजार पिछड़ी जातियां केंद्रीय सेवाओं में मंडल आरक्षण के लाभ से वंचित रहीं तो आरक्षण के उप वर्गीकरण की मांग उठी।

उस पर विचार करने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने 2017 में रोहिणी न्यायिक आयोग बनाया।

हाल में आयोग ने यह सिफारिश की है कि 27 प्रतिशत आरक्षण को चार श्रेणियों को बांट दिया जाना चाहिए।

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   आयोग ने की वंचितों की पहचान 

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   महीनों के सर्वेक्षण के बाद रोहिणी आयोग ने यह पाया कि 

केंद्रीय सूची में शामिल कुल 2633 पिछड़ी जातियों में से करीब एक हजार जातियों के उम्मीदवारों को मंडल आरक्षण का अब तक कोई लाभ मिला ही नहीं।

  इसलिए रोहिणी आयोग ने केंद्र सरकार से सिफारिश की है कि केंद्र सरकार की सूची में शामिल 2633 में से 97 अपेक्षाकृत सपन्न पिछड़ी जातियों के लिए 27 में से 10 प्रतिशत आरक्षण तय कर दिया  जाए।

  बाकी 17 प्रतिशत आरक्षण को तीन हिस्सों में बांट कर विभिन्न पिछड़ी जातियों को मंडल आरक्षण का लाभ दिया जाए।

यदि केंद्र सरकार ने आयोग की रपट को स्वीकार कर लिया तो पिछड़ों में से अति पिछड़ों व पूर्णतः वंचित पिछड़ों को भी मंडल आरक्षण का समुचित लाभ मिलने लगेगा।

  इस सिफारिश का बड़ा सामाजिक व राजनीतिक महत्व है।      ...........................................

    आरक्षण का औचित्य बरकरार

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जो लोग सरकारी नौकरियों में पिछड़ों 

के प्रतिनिधित्व के आंकड़े पर गौर नहीं करते,वही लोग समय -समय पर आरक्षण को समाप्त या पुनर्विचार करने की मांग करते रहते हैं।

इस मांग की प्रतिक्रिया होती है।उससे पिछड़ों के बीच के अतिवादी राजनीतिक तत्वों को एक बार फिर मजबूती मिल जाती है।

1990 में मंडल आरक्षण का विरोध करके उसी तरह की ताकत 

जाने-अनजाने पहुंचाई गई थी।

 मंडल आरक्षण से पहले केंद्र सरकार के विभागों में पिछड़ों का कितना प्रतिनिधित्व था,उसका एक नमूना यहां पेश है।

 1990 में भारत सरकार के आठ विभागों में पिछड़ी जाति का एक भी क्लास वन अफसर नहीं था।

अन्य नौ विभागों में से प्रत्येक में क्लास वन अफसरों की संख्या एक से पांच तक ही थी।

 लोकतंत्र में समुचित प्रतिनिधित्व की उम्मीद तो हर वर्ग के लोग करते ही हैं।

 हां,एक बात और !

 1990 में आरक्षण विरोधियों को उनके आरक्षण विरोधी आंदोलन के कारण उन्हें लाभ के बदले नुकसान ही हुआ था।यानी, ऐसे लोग सत्ता में मजबूत हो गए जो विकास के बदले सामाजिक समीकरण में विश्वास रखते थे।

उसी तरह यदि मजबूत पिछड़ी जातियां रोहिणी आयोग की रपट का विरोध करेंगी तो उन्हें भी उसका उसी तरह नुकसान हो सकता है।

  वैसे इस संदर्भ में एक बात खास तौर पर प्रासंगिक है।

करीब दो साल पहले एक आंकड़ा प्रकाश में आया था।वह यह कि केंद्रीय सेवाओं में मंडल आरक्षण के तहत मिल रहे  आरक्षण का प्रतिशत औसतन 15 ही है।

यानी, 27 प्रतिशत में से औसतन 12 प्रतिशत सीटें अब भी नहीं भर पा रही हैं।

1993 के बाद अनेक मंडल मसीहा केंद्र सरकार में रहे।आश्चर्य है कि उन सीटों को भरने का उपाय उन्होंने नहीं किया।  

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तमिलनाडु से सीखो

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एक समय था जब दक्षिण भारत के एक हिस्से में द्रविड पृथकतावादी आंदोलन चल रहा था।

कई कारणों से वह अधिक दिनों तक नहीं चल सका।

कहते हैं कि भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बाद वह आंदोलन ढीला पड़ गया।

किंतु इसके साथ एक और कारण रहा।

1962 में जब चीन ने भारत पर चढ़ाई करके हमारे बहुत बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया तो द्रविड पृथकतावादी के एक हिस्से की भावना बदली।

उसने सोचा कि रक्षा के लिए एक बड़े देश के रूप में हमें एकजुट बने रहना चाहिए।इस देश के एक दिन मजबूत हो जाने की गुंजाइश रहेगी। याद रहे कि चीनी सैनिक जब असम के कुछ हिस्से में  घुस गए तो तत्कालीन प्रधान मंत्री ने रेडियो पर यह संदेश दिया कि हम असम को बचा नहीं पा रहे हैं,इसका हमें दुख है। 

 खालिस्तान की मांग करने वालों को 1962 से पहले के तमिल

पृथकतावादियों से सीख लेनी चाहिए।

 कल्पना की कीजिए कि पंजाब एक अलग देश बन गया।फिर क्या होगा ?

क्या वह पंजाब अकेले पाकिस्तान के ‘लश्करों’ का मुकाबला कर पाएगा ?

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और अंत मंे

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पटना नगर निगम क्षेत्र में आधुनिक शौचालयों की व्यवस्था की गई है।

इससे आम लोगों ,खासकर महिलाओं की असुविधाएं घटी हैं।

हालांकि जरूरत के अनुपात में अब भी शौचालयों की संख्या कम है।साथ ही,उसे साफ-सुथरा बनाए रखने की समस्या अलग से है।

 पर उसी तरह राज्य की जिला व अनुमंडल अदालतों के परिसरों में भी पर्याप्त संख्या में शौचालयों की स्थापना की सख्त जरूरत है।

  अदालतों में रोज सैकड़ों लोेग आसपास के क्षेत्रों से आते हैं।

पर्याप्त संख्या में स्वच्छ शौचालयों के अभाव में कई लोग रोग्रस्त भी होते हैं।

 यानी शासन शौचालयों पर खर्च नहीं करेगा तो उसे अस्पतालों पर अधिक खर्च करना पड़ेगा। 

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प्रभात खबर,पटना-19 फरवरी 21


 


बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

 


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विदेशी धन का खतरनाक दखल

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    --सुरेंद्र किशोर-

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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में जिस नए ढंग 

की एफ.डी.आइ.के खतरे की ओर इशारा किया,

उसके पीछे विदेशी धन की ताकत है।

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   पिछले दिनों प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एफडीआइ

की एक नई परिभाषा दी।

 उन्होंने कहा कि एफडीआइ यानी फाॅरेन डिस्ट्रक्टिव आइडियोलाॅजी।

देखा जाए तो देश में इसकी नींव सन 1967 में ही पड़ गई थी।

तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री यशवंत राव चव्हाण ने तब लोक सभा में कहा था कि 

‘‘जिन दलों और नेताओं को विदेशों से धन मिले हैं,उनके नाम जाहिर नहीं किए जा सकते,क्योंकि उससे उनके हितों को नुकसान पहुंचेगा।’’

 उनके बयान के बाद विदेश से मिले नाजायज धन को लेकर इस देश के अनेक नेताओं ,संगठनों और दलों की झिझक समाप्त हो गई।

    उसके दुष्परिणाम आज तक नजर आ रहे हैं।

  याद रहे कि तब धन पाने वालों में कांग्रेस सहित कई प्रमुख दल शामिल थे।

समय बीतने के साथ इस देश की राजनीति एवं अन्य क्षेत्रों में विदेशी पैसों का दखल बढ़ता चला गया।

पहले विदेशी धन का उद्देश्य सीमित था।

अब न सिर्फ व्यापक हो गया,बल्कि खतरनाक भी बन गया है।

पहले विचारों को प्रभावित करने के लिए और लोगों को अपनी ओर मोड़ने के लिए विदेशी तत्वों ने भारत में पैसे झोंके।

पर अब तो देश को तहत -नहस करने ,अशांति फैलाने और अततः देश को तोड़ने की कोशिश में विदेशी पैसों का इस्तेमाल हो रहा है।

 यह देश के खिलाफ अघोषित युद्ध जैसा है।

इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए तदनुसार सख्त कानून बनाने की ओर अभी केंद्र सरकार का ध्यान नहीं है।

नतीजतन हमारी अदालतें भी इस नई एफडीआइ के वाहकों के खिलाफ वांछित सख्ती नहीं बरत पा रही हैं।

   हालांकि सन 2014 के बाद एनजीओ के बहाने गलत उद्देश्यों की पूत्र्ति के लिए आने वाले धन पर काफी हद तक रोक लगी है।

पर हवाला चैनलों पर प्रभावकारी रोक लगना अब भी बाकी है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस नए ढंग की एफडीआइ के खतरे की ओर इशारा किया है ,उसके पीछे विदेशी धन की ताकत है।

 अब यह बात छिपी हुई नहीं है कि कुछ देसी-विदेशी शक्तियों का घोषित और अघोषित उद्देश्य इस देश को तोड़ना है।

काश ! सन 1967 में ही इस स्त्रोत पर प्रभावी रोक लगा दी गई होती तो आज स्थिति इतनी नहीं बिगड़ती।

 चिंताजनक बात यह है कि बाद के वर्षों में भी विदेशी धन की आवक पर कारगर रोक नहीं लग सकी।

    अब जरा हम सन 1967 में चलें।

तब आम चुनाव के बाद देश के नौ राज्यों से (सात राज्यों से आम चुनाव के जरिए और दो से दल बदल के जरिए)कांग्रेस सत्ताच्युत हो गई।

लोक सभा में भी कांग्रेस का बहुमत घट गया।

इस हार से चिंतित तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने अनुमान लगाया कि शायद विदेशी पैसों ने चुनाव नतीजे पर असर डाला है।

(तब इंदिरा जी को लगा था कि विदेशी पैसों का चुनाव में इस्तेमाल सिर्फ गैर कांग्रेसी दलों ने कांग्रेस के खिलाफ किया।)

   इंदिरा जी ने (विदेश से मिले)चुनावी चंदे के बारे में खुफिया एजेंसी से जांच कराई।

उसकी रपट के अनुसार तब कांग्रेस सहित कई प्रमुख दलों ने (सिर्फ एक दल अपवाद था)चुनाव लड़ने के लिए किसी न किसी देश से धन लिया था।

(जब खुफिया रपट में सरकार ने कांग्रेस का भी नाम देखा तो उस रपट को दबा दिया गया।

 किंतु ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने उसे छाप दिया।

उस अमरीकी अखबार की खबर इस देश में फैल गई।) 

   लोक सभा में यह मांग की गई कि सरकार उन दलों व व्यक्तियों के नाम बताए।(दिलचस्प बात यह रही कि उन दलों के नेता भी मांग कर रहे थे जिन दलों ने पैसे लिए थे।)

पर चव्हाण ने वह मांग नहीं मानी।

 तब दुनिया में शीत युद्ध का दौर था।

भारत सहित अनेक देशों में अमरीका और सोवियत संघ अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाने की कोशिश में लगे हुए थे।

इसके लिए वे पैसे खर्च कर रहे थे।

कम्युनिस्ट देश भारत में भी कम्युनिस्टों पर निर्भर सरकार चाहते थे।

 दूसरी ओर, अमेरिका ऐसी किसी कोशिश को विफल कर देना चाहता था।

यानी, यहां के.जी.बी.और सी.आइ.ए.दोनों सक्रिय थे।

  देश में ‘सोवियत सक्रियता’ का ठोस सबूत तब मिला जब  वहां की खुफिया एजेंसी के.जी.बी.की भारत में गतिविधियों पर लिखित पुस्तक ‘द मित्रोखिन अर्काइव-दो’ सन 2005 में सामने आई।

इसके अनुसार के.जी.बी.ने भारत में विचारधारा के प्रचार और सरकारी नीतियों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए पैसे बांटे थे।

 बाद में जैन हवाला कांड ने तो विदेशी धन के आगमन को और भी आसान बना दिया।

 पुलिस ने 25 मार्च, 1991 को श्रीनगर में अशफाक हुसैन लोन को गिरफ्तार किया।

वह हिजबुल मुजाहिद्दीन का सदस्य था।

उसके पास से 16 लाख रुपए बरामद किए गए।

वे रुपए कश्मीर में आतंकवादियों को बांटे जाने थे।

उससे पूछताछ के आधार पर पुलिस ने जे.एन.यू. के एक शोध छात्र शहाबुद्दीन गौरी को गिरफ्तार किया।

उससे मिली जानकारी के आधार पर सी.बी.आई.ने हवाला व्यापारी जैन बंधुओं के यहां छापा मारा।

उसमें भारी रकम के अलावा एक डायरी भी मिली।

छानबीन से पता चला कि उन्होंने देश के 115 बड़े नेताओं (पैसे पाने वालों में कोई कम्युनिस्ट नेता शामिल नहीं था)

और अफसरों को कुल 64 करोड़ रुपए दिए थे।

 तब के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के अनुसार चुनाव फंड में पारदर्शिता न होने के कारण हवाला कांड जैसे कांड होते हैं।

पर सवाल यह भी उठा कि क्या कोई व्यक्ति आपको पैसे देने आएगा तो बिना उसका कुल-गोत्र जाने उससे आप पैसे ले लेंगे ?

उसका असल परिचय जानने की कोशिश भी नहीं करेंगे ?

यदि तब सही से जांच हो जाती तो और कुछ बड़ी हस्तियों को जेल की हवा खानी पड़ती तो आज नई एफडीआइ की चर्चा नहीं हो रही होती।

(एक बड़े नेता ने हवाला व्यापारी से तब 60 लाख रुपए लिए थे।

30 लाख अपने दल को और 30 लाख अपने दामाद को दे दिए।) 

   माना जाता है कि राजनीतिक हित सध जाने के बाद हवाला कांड में लीपापोती करा दी गई।

  यह लीपापोती ऐसे कांड में हुई जिसमें आतंकवाद का तत्व भी जुड़ा हुआ था।

साफ है कि हवाला कारोबारियों पर शुरू से ही कड़ी नजर रखी गई होती तो आज इस देश के टुकड़े -टुकड़े गिरोह को विदेशी पैसे मिलने में दिक्कत आती।

 हालांकि आतंकवाद के प्रति मौजूदा शासकों का रवैया हाल के वर्षों में काफी बदला जरूर है। (नरेंद्र मोदी के लिए जन समर्थन बढ़ने का यह एक बड़ा कारण है।)पर,अभी बहुत कुछ करना बाकी है।

  आज कृषि कानून विरोधी आंदोलन के बहाने जो कुछ लोग राज सत्ता को चुनौती दे रहे हैं,उनमें से कतिपय के विदेशी कनेक्शन हैं।

कुछ ‘आंदोलनजीवियों’ के तो विदेशी कनेक्शन हैं ही।

कैसे कोई एक ही व्यक्ति जो कभी जेएनयू में आतंकी अफजल गुरु की बरखी मनाने वालों के साथ होता था,वही कृषि कानून विरोधी आंदोलन के साथ दिखता है।

वही शख्स शाहीन बाग में भी भीड़ को बौद्धिक खुराक देता नजर आता था।

  तोड़फोड़ एवं देशद्रोही नारे लगाने वाले तत्व बारी -बारी से तीनों जगह पाए गए हैं।

  इससे पता चलता है कि आज हमारे देश के सामने कितने बड़े -बड़े खतरे मौजूद हैं।

उनसे हमें मुकाबला करना ही होगा।

इसके लिए यह जरूरी है कि हमारा देश आर्थिक रूप से काफी मजबूत हो जाए।

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17 फरवरी 21

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 (कोष्ठक में लिखी गई बातें दैनिक जागरण में इस लेख के छपने के बाद जोड़ी गई है ताकि बातें और स्पष्ट हो सकें।)

 

  

 



  

      



 रोहिणी न्यायिक आयोग

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27 प्रतिशत मंडल आरक्षण को चार 

हिस्सों में बांट देने की सिफारिश

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मजबूत पिछड़ों को 27 में से 10 प्रतिशत मिलेगा

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जे.ए.यू.राष्ट्रद्रोह मुकदमे की सुनवाई 15 मार्च से शुरू होगी

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     --सुरेंद्र किशोर-

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रोहिणी न्यायिक आयोग ने मंडल आरक्षण के तहत निर्धारित 

27 प्रतिशत आरक्षण को चार भागों में बांट देने की 

सिफारिश केंद्र सरकार से की है।

   यदि सिफारिश मान ली गई तो केंद्र की सूची में शामिल 97 मजबूत पिछड़ी जातियों को 27 में 10 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा।

  1674 जातियों को दो प्रतिशत, 534 जातियों को 6 प्रतिशत और 328 जातियों को 9 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा।

  वर्षों से यह एक संवदनशील मामला रहा है।

आरोप लगता रहा है कि आरक्षण का अधिक लाभ मजबूत पिछड़ी जातियों को ही मिलता रहा है।

रोहिणी आयोग ने भी पाया कि कुल 2633 पिछड़ी जातियों में से करीब 1000 जातियों को तो आज तक आरक्षण को कोई लाभ मिला ही नहीं।

  याद रहे कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2017 में रोहिणी आयोग बनाई थी।

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दूसरी खबर

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जेन.एन.यू.राष्ट्रद्रोह केस की सनवाई,जिसमें कन्हैया कुमार तथा अन्य नौ आरोपित हैं, 15 मार्च 21 से दिल्ली कोर्ट में 

शुरू हो जाएगी।

  उन पर आरोप है कि इन्होंने 2016 में जे.एन.यू. में अफजल गुरू की बरखी मनाई और इस देश को 

 टुकड़े -टुकड़े करने के पक्ष में नारे लगाए।

मामले की सुनवाई देर से शुरू हो रही है।

क्योंकि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने मुकदमा चलाने की अनुमति देने में काफी देर कर दी।

पहले तो राजनीतिक कारणों से अनुमति देने से ही इनकार कर दिया था,किंतु सबूतों की गंभीरता देखर केजरीवाल सरकार को अनुमति देनी पड़ी।

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इन दोनों खबरों का खास राजनीतिक महत्व है।

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16 फरवरी 21

  

   


मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

 


  जन प्रतिनिधियों को चाहिए कि वे सम्मान ‘कमांड’ करें न कि डिमांड -सुरेंद्र किशोर 

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बिहार विधान सभा शताब्दी वर्ष समारोह में कुछ नेताओं ने  कहा कि 

‘‘सरकारी अफसर विधायकों से मिलने के समय खड़े भी नहीं होते।

प्रोटोकल व शिष्टाचार का पालन नहीं हो रहा है।’’

  विधायकों की यह शिकायत सही है।यह शिकायत आम है।

पर, सवाल है कि ऐसा अब होता क्यों है ?

कुछ दशक पहले तक तो ऐसी शिकायत इक्की-दुक्की ही थी।

इसके लिए क्या सिर्फ अफसर जिम्मेदार हैं ?

  कुछ कारण तो समझ में आता है।

बाकी के बारे में खुद विधायकों को आत्म चिंतन करना होगा।

आजादी के तत्काल बाद के वर्षों में आम तौर पर राजनीति ‘सेवा’ थी।

  दूसरी ओर, सरकारी सेवक आम तौर पर ‘नौकरी’ करते थे।

दोनों के बीच तब भी अपवाद थे और आज भी हैं।

  समय बीतने के साथ आम तौर पर राजनीति भी ‘नौकरी’ की तरह होती गई।

  अब तो पेंशन का भी प्रावधान है।

संविधान निर्माताओं ने तो पेंशन के बारे में सोचा भी नहीं था।

 फिर तो दोनों यानी नेता व अफसर बराबरी के स्थान पर आ गए।

विधायक -सांसद फंड ने राजनीति की गरिमा को  और  भी घटा दिया।

 विधायक -सांसद फंड में जारी घोटालों के खिलाफ खुद सांसदों-विधायकों को उठ खड़ा होना होगा।

एक बार फिर बता दूं कि अब भी राजनीति में सेवाभाव वाले लोग मौजूद हैं।

पर, बहुत थोड़े।

  इस गरिमा की वापसी कैसे होगी ?

उस पर सेवाभाव वाले नेतागण गंभीर विचार करें ।

उपाय कीजिए।

उस काम में सफल होइए।

फिर आप आदर-सम्मान ‘कमांड’ करेंगे।

आपको देखते लोगों के मन में आदर का भाव उमड़ आएगा।

आपको ‘डिमांड’ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

इस दिशा में एक ठोस  कदम पर विचार करें।

बेहतर तो यह होगा कि खुद सांसद और विधायकगण क्रमशः सांसद और विधायक फंड की समाप्ति की मांग करें यदि घोटाला -कमीशनखोरी न रोक पाते  हांे तो।

  अपवादों को छोड़कर  आज देश में सांसद व विधायक फंडों के खर्चे के सिलसिले में क्या-क्या हो रहा है,यह किसी से छिपा हुआ है ?   

  जन प्रतिनिधि गण मिलने पर अफसरों को खड़ा होने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

क्योंकि वैसा नियम है।

पर, इसके बदले अपना व्यक्तित्व ऐसा बनाइए ताकि अफसर का दिल कहे कि आपको देखते ही उसे खड़ा हो जाना चाहिए। 

 कल्पना कीजिए कि कर्पूरी ठाकुर किसी अफसर के आॅफिस में जाते तो क्या अफसर उठकर खड़ा नहीं हो जाता ?

आप कहेंगे कि सब लोग कर्पूरी ठाकुर नहीं बन सकते।

पर,बनने की कोशिश तो कीजिए।

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    विरोध,विरोध और सिर्फ 

     अतार्किक विरोध !

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प्रधान मंत्री  नरेंद्र मोदी ने कहा है कि नए कृषि कानून किसी के लिए बंधन नहीं,बल्कि विकल्प हैं।

इसलिए इसके विरोध का कोई कारण नहीं है।

उन्होंने ठीक ही कहा है।

किंतु जो प्रतिपक्ष सी.ए.ए.के विरोध में हुई भीषण हिंसा करने वालों का भी समर्थन कर सकता है, उससे विवेकपूर्ण राजनीति की उम्मीद करना ही फिजूल है।

याद रहे कि सी.ए.ए.के जरिए इस देश के बाहर से यहां आए लोगों को नागरिकता देनी है।

यहां के किसी वैध नागरिक की नागरिकता पर उस कानून का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ने वाला है।

  फिर भी सी.ए.ए.के खिलाफ कुछ महीना पहले इस देश में भीषण दंगे कराए गए।

  उसी तरह एन.आर.सी.से भी इस देश के असली नागरिकों को कोई नुकसान नहीं पहुंचने वाला है।

फिर भी कुछ खास लोग एन.आर.सी.के खिलाफ खड्गहस्त हैं।

  जबकि चीन और पाकिस्तान सहित हर सार्वभौम देश में नागरिकों का रजिस्टर रखा जाता है।

पर,हमारे यहां के जो लोग इस देश को देश नहीं,बल्कि धर्मशाला मानते हैं,वे सी.ए.ए.और एन.आर.सी.का विरोध करते हैं।

  ऐसे लोगों को क्या किया जाए ?

आम लोगों को सोचना है।

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छोटी नदियों पर चेक डैम 

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बिहार की छोटी नदियों पर चेक डैम बनाने की जरूरत बताई जाती रही है।

पर पता नहीं,इसका क्रियान्वयन क्यों नहीं हो पाता।

खबर है कि इस संबंध में कई महीने पहले एक सामाजिक कार्यकत्र्ता ने मुख्य मंत्री नीतीश कुमार को चिट्ठी लिखी थी।

मुख्य मंत्री ने उस चिट्ठी को अपने निदेश के साथ संबंधित विभाग को भेज भी दिया।

पर,बात अभी आगे नहीं बढ़ी है।

  जानकार लोग बताते हैं कि यदि छोटी-छोटी नदियों पर

कुछ -कुछ दूरी पर चेक डैम बन जाएं तो रुके हुए पानी से सिंचाई का प्रबंध हो पाएगा।

इससे भूजल स्तर के गिरने की समस्या कम होगी।

 उस पानी को साफ करके  पीने के काम में भी इस्तेमाल हो सकता है।

यदि राज्य में उद्योग-धंधे बढं़े तो उनमें इस्तेमाल करने के लिए भी  जल की कमी नहीं रहेगी।   

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  और अंत में

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जयप्रकाश नारायण अपने जीवन के प्रारंभिक वर्षों में माक्र्सवादी थे।

बाद के वर्षों में ‘लोकतांत्रिक समाजवादी’ बने।

उसके बाद सर्वोदयी हुए।

अंत में कांग्रेस सरकार के विरोध में जारी आंदोलन का सफल नेतृत्व किया।

डा.राम मनोहर लोहिया कभी कम्युनिस्टों के खिलाफ थे।

किंतु साठ के दशक में उन्होंने जनसंघ के साथ-साथ कम्युनिस्टों से भी राजनीतिक तालमेल किया।

 यानी इन नेताओं ने देश,काल और पात्र के भले को ध्यान में रखते हुए अपना राजनीतिक व वैचारिक रुख-रवैया तय किया।

उन बदलाव में जेपी-लोहिया का खुद का कोई निजी स्वार्थ नहीं था।

वे कभी सत्ता के पीछे नहीं दोड़े।

एक  सवाल आज खास तौर पर जेपी व लोहिया के अनुयायियों से है।

कल्पना कीजिए कि आज जेपी और लोहिया हमलोगों के बीच होते तो आज की स्थिति में उनकी कैसी राजनीतिक भूमिका होती ? 

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प्रभात खबर,पटना ,12 फरवरी 21


 सुरेंद्र किशोर के फेसबुक वाॅल से

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सुषमा स्वराज के जन्म दिन( 14 फरवरी ) पर

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1977 में हरियाणा सरकार में मंत्री पद का 

कामकाज संभालने 

से पहले सुषमा स्वराज जेपी का 

आशीर्वाद लेने पटना आई थीं

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--सुरेंद्र किशोर--

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पटना रेलवे जंक्शन स्टेशन पर सुषमा स्वराज ने मुझे देखते ही कहा था कि ‘‘बड़ौदा डायनामाइट केस के एफ.आई.आर.में कई जगह आपका नाम आया है।’’

   याद रहे कि आपातकाल में उस केस के सिलसिले में मुझे भी सी.बी.आई.बेचैनी से खोज रही थी।

पर, मैं फरार हो गया था।

मैं मेघालय में अपने रिश्तेदार के यहां छिपकर रहता था।

पकड़ा नहीं जा सका।

 पटना जंक्शन पर ही सुषमा जी से मेरी पहली मुलाकात थी।

हालांकि उससे पहले मुजफ्फरपुर में जार्ज के चुनाव प्रचार 

में उनके ओजस्वी व प्रभावशाली भाषण मैंने सुने थे।

 उनके पति स्वराज कौशल मुझे जार्ज के जरिए पहले से जानते थे।

वे भी समाजवादी आंदोलन में जार्ज के साथ थे।

बड़ौदा डायनामाइट केस के, जिसके जार्ज फर्नांडिस मुख्य आरोपित थे,स्वराज दंपत्ति वकील थे।

  उन दिनों डायनामाइट केस के आरोपी का वकील बनना भी बहुत साहस की बात थी।

 हरियाणा में मंत्री बनने के बाद सुषमा जेपी का आशीर्वाद लेने पटना आई थीं।  

तब तक मैं दैनिक ‘आज’ का संवाददाता बन गया था।

 स्वराज कौशल ने मुझे दिल्ली से फोन किया कि ‘‘आप जेपी से हमारी मुलाकात तय करा दीजिए।

मंत्री पद का कार्य भार संभालने से पहले सुषमा जेपी का आशीर्वाद लेना चाहती हैं।’’

मैंने जेपी के यहां से समय ले लिया। 

स्वराज दंपत्ति नियत समय पर ट्रेन से पटना पहुंचे।

हम तीन जन उन्हें रिसिव करने के लिए स्टेशन पर गए थे।

छायाकार कृष्ण मुरारी किशन, मेरे मित्र व अंग्रेजी दैनिक ‘सर्चलाइट’ के संवाददाता लव कुमार मिश्र और मैं।

   हमलोग जेपी के आवास कदम कुआं पहुंचे।

 वहां प्रारंभिक दिक्कत के बाद दंपत्ति की जेपी से मुलाकात हो गई।

  दरअसल जेपी के निजी सचिव सच्चिदानंद,जो जेपी के स्वास्थ्य का बहुत ध्यान रखते थे, इस जिद पर अड़े थे कि जेपी से आशीर्वाद लेने सिर्फ सुषमा ऊपर-यानी

चरखा समिति की पहली मंजिल पर जेपी के पास जाएंगी।

मुझे उन्हें इस बात पर सच्चिदा बाबू को राजी करने में काफी समय लग गया कि कम से कम उनके साथ स्वराज कौशल को भी ऊपर जाने दीजिए।हम भले न जाएं।

खैर,यह तो यूं ही प्रसंगवश कह दिया।

 सुषमा स्वराज उत्कृष्ट वक्ता व समझदार

 नेत्री थीं।

गत साल जब उनका असमय निधन हुआ तो उनके अनेक राजनीतिक विरोधियों को भी दुख हुआ।

वह केंद्रीय मंत्री रह चुकी थीं।

लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता थीं।

 नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर आ जाने से पहले तक सुषमा जी को प्रधान मंत्री मेटेरियल माना जाता था। 

  हरियाणा सरकार में भी उनकी तेजस्विता-योग्यता देखते हुए उन्हें आठ  विभाग मिले थे।

बाद में पता चला था कि ओम प्रकाश चैटाला के अलग ढंग के व्यवहार को देखते हुए 

सुषमा जी का राज्य की राजनीति से जल्द ही मन उचट गया।

वैसे भी हरियाणा सुषमा जी के लिए छोटी जगह थी।

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 समाचार विश्लेषण

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आगे की राजनीति हलचल भरी 

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--सुरेंद्र किशोर-

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कल घोषणा

कर दी कि टीकाकरण खत्म होने के बाद सी.ए.ए.

लागू करेंगे।

 केंद्र सरकार के वकील सुप्रीम कोर्ट को पहले ही यह कह चुके हंै कि किसी भी सार्वभौम देश के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एन.आर.सी.जरूरी है। 

सी.ए.ए. के तहत शरणार्थी दर्जाप्राप्त गैर मुसलमानों को भारत की नागरिकता दी जाएगी।

इन शरणार्थियों मंे पश्चिम बंगाल के मतुआ समुदाय के लोग भी शामिल हंै।

यह एक ऐसा समुदाय है जो हिन्दू तो है,पर वर्ण व्यवस्था को नहीं मानता।

क्या इसीलिए उसे नागरिकता अब तक नहीं दी गई ?

  मतुआ लोग पश्चिम बंगाल के तीन जिलों के 21 विधान सभा क्षेत्रों के  चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

1947 में पूर्वी पाक से ये भारत आ गए थे।   

उन्हें मतदाता तो बना दिया गया किंतु नागरिकता नहीं दी गई।

 अब उनमें से अधिकतर भाजपा के साथ हैं।

   अब टी.एम.सी.के राज्य सभा सदस्य दिनेश त्रिवेदी ने भी तृणमूल कांग्रेस व राज्य सभा से इस्तीफा दे दिया।

गत डेढ़ साल में तृणमूल कांग्रेस के 6 सांसदों व 14 विधायकों ने भाजपा ज्वाइन किया है।

ऐसी लगभग  एकतरफा महा भगदड़ इससे पहले किस दल से और कब हुई है ?

इससे कम भगदड़ पर भी कई सरकारें चली गईं। 

  इस महा भगदड़ के विपरीत इस बीच किसी अन्य दल के किसी विधायक या सांसद ने टी.एम.सी ज्वाइन किया क्या ?

पता नहीं।

आपको पता चले तो बता दीजिएगा।

  अब समझिए कि हवा का रुख किधर है ?

वैसे यह हवा है या आंधी ? !!

उसका जवाब चुनाव नतीजा देगा।

  यदि अगले चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बन गई तो क्या -क्या होगा ?

  बंगलादेशी घुसपैठियों में से अनेक लोग वापस भागने की कोशिश करेंगे।

वैसे वे भागने भी लगे हैं।

खबर है कि भागने के लिए वे 

रिश्वत भी दे रहे हैं।

यानी रिश्वखोरी का नुकसान है तो फायदा भी।

  उन्हें डर है कि उन्हें कहीं किसी घेरेबंदी वाले परिसर में डाल न दिया जाए !

बाकी का क्या होगा ?

कम से कम मतदाता सूची से तो वे बाहर हो ही जाएंगे।

  खैर सी.ए.ए. के खिलाफ आप ‘शाहीन बाग’ का तमाशा देख चुके हैं।

  बंगाल चुनाव के बाद जब अमित शाह अपना वादा पूरा करने लगेंगे तो आशंका है कि देश में कई ‘शाहीनबाग’ बनेंगे।

इस देश के वोटलोलुप नेता भी वहां जमावड़ा लगाएंगे।

राजनीतिक व अन्य तरह का तनाव बढ़ेगा।

उस तनाव की पृष्ठभूमि में किस दल के वोट घटेंगे और किस दल के बढ़ंेगे ?

इस बारे में आप ही अनुमान लगाइए।

हालांकि पिछले अनुभव आपके सामने हैं।

इस पृष्ठभूमि में 2024 के लोक सभा चुनाव का क्या नतीजा होगा ?

एक विश्लेषक के अनुसार ‘‘यदि मोदी 2024 में भी आ गया तो कोई नहीं बचेगा।

इसलिए सब एक हो रहे हैं।’’

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12 फरवरी 21

  

  

  

  

  


शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

 


रवि शंकर प्रसाद की चेतावनी सराहनीय

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सोशल मीडिया मंचों पर जारी 

 गाली-गलौज को तो तत्काल 

 रोकवाए भारत सरकार

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      --सुरेंद्र किशोर-- 

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केंद्रीय सूचना -प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसााद ने 

ट्विटर-फेसबुक को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि

‘‘सोशल मीडिया मीडिया मंचों को इस देश के कानून 

का पालन करना ही होगा।’’

   केंद्र सरकार व खास कर संबंधित मंत्री का यह रुख सराहनीय है।

फिलहाल मंत्री जी सोशल मीडिया मंचों से कहें कि वे  

अपमानजनक व गाली- गलौज वाले शब्दों को प्रतिबंधित कर दें।

वे कम्प्यूटर में ऐसी आॅटोमेटिक तकनीकी व्यवस्था करा दें ताकि  गाली -गलौज वाले शब्दों को स्वीकार ही नहीं करे।

  मैंने हाल में सोशल मीडिया में  कुछ अत्यंत आपतिजनक शब्द  देखे हैं।

उनके कुछ नमूने यहां पेश कर रहा हूं।

जैसे-साला,

चुतिया,

बकचोदी,

भांेसरीवाला,

एम.सी.-बी.सी. आदि।

ऐसे कुछ अन्य शब्द तो मैं यहां लिख भी नहीं सकता।

आप उसकी कल्पना ही कर सकते हैं।

इन शब्दों का इस्तेमाल उनके लिए किया जाता है जो किसी के राजनीतिक विरोधी या समर्थक हैं।

   सिर्फ उन्हीं शब्दों -शब्दावलियों के प्रयोग की इजाजत सोशल मीडिया मंचों पर मिलनी चाहिए जिनका इस्तेमाल प्रिंट मीडिया करता है या फिर जिनका इस्तेमाल संसद व विधान मंडलों में नियमतः संभव है।

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12 फरवरी 21

 


शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

 


  जन प्रतिनिधियों को चाहिए कि वे सम्मान ‘कमांड’ करें न कि डिमांड -सुरेंद्र किशोर 

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बिहार विधान सभा शताब्दी वर्ष समारोह में कुछ नेताओं ने  कहा कि 

‘‘सरकारी अफसर विधायकों से मिलने के समय खड़े भी नहीं होते।

प्रोटोकल व शिष्टाचार का पालन नहीं हो रहा है।’’

  विधायकों की यह शिकायत सही है।यह शिकायत आम है।

पर, सवाल है कि ऐसा अब होता क्यों है ?

कुछ दशक पहले तक तो ऐसी शिकायत इक्की-दुक्की ही थी।

इसके लिए क्या सिर्फ अफसर जिम्मेदार हैं ?

  कुछ कारण तो समझ में आता है।

बाकी के बारे में खुद विधायकों को आत्म चिंतन करना होगा।

आजादी के तत्काल बाद के वर्षों में आम तौर पर राजनीति ‘सेवा’ थी।

  दूसरी ओर, सरकारी सेवक आम तौर पर ‘नौकरी’ करते थे।

दोनों के बीच तब भी अपवाद थे और आज भी हैं।

  समय बीतने के साथ आम तौर पर राजनीति भी ‘नौकरी’ की तरह होती गई।

  अब तो पेंशन का भी प्रावधान है।

संविधान निर्माताओं ने तो पेंशन के बारे में सोचा भी नहीं था।

 फिर तो दोनों यानी नेता व अफसर बराबरी के स्थान पर आ गए।

विधायक -सांसद फंड ने राजनीति की गरिमा को  और  भी घटा दिया।

 विधायक -सांसद फंड में जारी घोटालों के खिलाफ खुद सांसदों-विधायकों को उठ खड़ा होना होगा।

एक बार फिर बता दूं कि अब भी राजनीति में सेवाभाव वाले लोग मौजूद हैं।

पर, बहुत थोड़े।

  इस गरिमा की वापसी कैसे होगी ?

उस पर सेवाभाव वाले नेतागण गंभीर विचार करें ।

उपाय कीजिए।

उस काम में सफल होइए।

फिर आप आदर-सम्मान ‘कमांड’ करेंगे।

आपको देखते लोगों के मन में आदर का भाव उमड़ आएगा।

आपको ‘डिमांड’ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

इस दिशा में एक ठोस  कदम पर विचार करें।

बेहतर तो यह होगा कि खुद सांसद और विधायकगण क्रमशः सांसद और विधायक फंड की समाप्ति की मांग करें यदि घोटाला -कमीशनखोरी न रोक पाते  हांे तो।

  अपवादों को छोड़कर  आज देश में सांसद व विधायक फंडों के खर्चे के सिलसिले में क्या-क्या हो रहा है,यह किसी से छिपा हुआ है ?   

  जन प्रतिनिधि गण मिलने पर अफसरों को खड़ा होने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

क्योंकि वैसा नियम है।

पर, इसके बदले अपना व्यक्तित्व ऐसा बनाइए ताकि अफसर का दिल कहे कि आपको देखते ही उसे खड़ा हो जाना चाहिए। 

 कल्पना कीजिए कि कर्पूरी ठाकुर किसी अफसर के आॅफिस में जाते तो क्या अफसर उठकर खड़ा नहीं हो जाता ?

आप कहेंगे कि सब लोग कर्पूरी ठाकुर नहीं बन सकते।

पर,बनने की कोशिश तो कीजिए।

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    विरोध,विरोध और सिर्फ 

     अतार्किक विरोध !

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प्रधान मंत्री  नरेंद्र मोदी ने कहा है कि नए कृषि कानून किसी के लिए बंधन नहीं,बल्कि विकल्प हैं।

इसलिए इसके विरोध का कोई कारण नहीं है।

उन्होंने ठीक ही कहा है।

किंतु जो प्रतिपक्ष सी.ए.ए.के विरोध में हुई भीषण हिंसा करने वालों का भी समर्थन कर सकता है, उससे विवेकपूर्ण राजनीति की उम्मीद करना ही फिजूल है।

याद रहे कि सी.ए.ए.के जरिए इस देश के बाहर से यहां आए लोगों को नागरिकता देनी है।

यहां के किसी वैध नागरिक की नागरिकता पर उस कानून का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ने वाला है।

  फिर भी सी.ए.ए.के खिलाफ कुछ महीना पहले इस देश में भीषण दंगे कराए गए।

  उसी तरह एन.आर.सी.से भी इस देश के असली नागरिकों को कोई नुकसान नहीं पहुंचने वाला है।

फिर भी कुछ खास लोग एन.आर.सी.के खिलाफ खड्गहस्त हैं।

  जबकि चीन और पाकिस्तान सहित हर सार्वभौम देश में नागरिकों का रजिस्टर रखा जाता है।

पर,हमारे यहां के जो लोग इस देश को देश नहीं,बल्कि धर्मशाला मानते हैं,वे सी.ए.ए.और एन.आर.सी.का विरोध करते हैं।

  ऐसे लोगों को क्या किया जाए ?

आम लोगों को सोचना है।

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छोटी नदियों पर चेक डैम 

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बिहार की छोटी नदियों पर चेक डैम बनाने की जरूरत बताई जाती रही है।

पर पता नहीं,इसका क्रियान्वयन क्यों नहीं हो पाता।

खबर है कि इस संबंध में कई महीने पहले एक सामाजिक कार्यकत्र्ता ने मुख्य मंत्री नीतीश कुमार को चिट्ठी लिखी थी।

मुख्य मंत्री ने उस चिट्ठी को अपने निदेश के साथ संबंधित विभाग को भेज भी दिया।

पर,बात अभी आगे नहीं बढ़ी है।

  जानकार लोग बताते हैं कि यदि छोटी-छोटी नदियों पर

कुछ -कुछ दूरी पर चेक डैम बन जाएं तो रुके हुए पानी से सिंचाई का प्रबंध हो पाएगा।

इससे भूजल स्तर के गिरने की समस्या कम होगी।

 उस पानी को साफ करके  पीने के काम में भी इस्तेमाल हो सकता है।

यदि राज्य में उद्योग-धंधे बढं़े तो उनमें इस्तेमाल करने के लिए भी  जल की कमी नहीं रहेगी।   

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  और अंत में

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जयप्रकाश नारायण अपने जीवन के प्रारंभिक वर्षों में माक्र्सवादी थे।

बाद के वर्षों में ‘लोकतांत्रिक समाजवादी’ बने।

उसके बाद सर्वोदयी हुए।

अंत में कांग्रेस सरकार के विरोध में जारी आंदोलन का सफल नेतृत्व किया।

डा.राम मनोहर लोहिया कभी कम्युनिस्टों के खिलाफ थे।

किंतु साठ के दशक में उन्होंने जनसंघ के साथ-साथ कम्युनिस्टों से भी राजनीतिक तालमेल किया।

 यानी इन नेताओं ने देश,काल और पात्र के भले को ध्यान में रखते हुए अपना राजनीतिक व वैचारिक रुख-रवैया तय किया।

उन बदलाव में जेपी-लोहिया का खुद का कोई निजी स्वार्थ नहीं था।

वे कभी सत्ता के पीछे नहीं दोड़े।

एक  सवाल आज खास तौर पर जेपी व लोहिया के अनुयायियों से है।

कल्पना कीजिए कि आज जेपी और लोहिया हमलोगों के बीच होते तो आज की स्थिति में उनकी कैसी राजनीतिक भूमिका होती ? 

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प्रभात खबर,पटना ,12 फरवरी 21


गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

   सन 1980 में भी सुप्रीम कोर्ट के जज 

  ने प्रधान मंत्री की तारीफ की थी।

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   --सुरेंद्र किशोर--

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गत शनिवार को आयोजित गुजरात हाईकोर्ट समारोह में सुप्रीम कोर्ट के जज एम.आर.शाह ने कहा कि 

‘‘प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी सबसे प्रिय,लोकप्रिय और दूरदर्शी नेता हैं।’’

उन्होंने कोई गलत बात नहीं कही।पर, परंपरा रही है कि आम तौर पर जज सार्वजनिक रूप से नेता की तारीफ नहीं करते।

    इसलिए नई पीढ़ी को इस तारीफ पर अचरज हुआ होगा।

पर, पुरानी पीढ़ी को मालूम है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट के एक जज सन 1980 में भी तब के पी.एम.की तारीफ कर चुके हैं।

 साथ ही,

सबसे बड़ी अदालत के जज रिटायर होकर राज्य सभा में जाते रहे हैं और गवर्नर पद भी स्वीकार करते रहे हैं।

हां, इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा उन न्यायाधीशों में प्रमुख हैं जिन्होंने कोई पद स्वीकार नहीं किया।

आॅफर करने वाले सरकारी प्रतिनिधि से उन्होंने कह दिया था कि मुझे किताबें पढ़ने और बागवानी करने में अधिक सुख मिलता है।

याद रहे कि उन्होंने 1975 में इंदिरा गांधी का लोक सभा चुनाव रद कर दिया था।इमरजेंसी लगने का वह कारण बना।

   सन 1980 में जब इंदिरा गांधी एक बार फिर प्रधान मंत्री बनीं तो सुप्रीम कोर्ट के जज पी.एन.भगवती ने बाजाप्ते चिट्ठी लिख कर उनकी प्रशंसा की।

 मशहूर पत्रकार बलबीर दत्त लिखित व बहुमूल्य जानकारियों से भरी चर्चित पुस्तक 

‘‘इमरजेंसी का कहर और सेंसर का जहर ’’ 

में लिखा गया है कि भगवती जी की चिट्ठी पहले तो गुप्त रही,पर बाद में जग जाहिर हो गई।

चुनावी विजय व प्रधान मंत्री बनने पर जस्टिस भगवती ने उन्हें बधाई देते हुए अन्य बातों के साथ-साथ यह भी लिखा कि

‘‘आप भारत की उन लाखों गरीबों व भूखों की आशा व आकांक्षा का प्रतीक बन गई हैं जिन्हें अब तक न कोई आशा थी और न जीने का सपना।

अब वे आपकी ओर टकटकी लगाए हुए हैं कि आप उन्हें धूल और गंदगी से ऊपर उठाएं।

और उन्हें गरीबी व अज्ञानता से मुक्ति दिलाएं।........।’’

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--सुरेंद्र किशोर--10 अगस्त 21


सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

   सुरेंद्र किशोर के फेसबुक वाॅल से

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    मुझे इसलिए बेचनी पड़ी अपनी जमीन

       --सुरेंद्र किशोर--

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 अपनी जमीन बिक्री का रजिस्ट्रेशन कराने 

कल मैं पटना रजिस्ट्री आॅफिस गया था।

मार्च तक यह आॅफिस रविवार को भी खुला रहेगा।

जमीन क्यों बेची,यह कहानी बाद में।

पहले आॅफिस परिसर के बारे में दो बातें।

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छज्जुबाग स्थित विस्तृत परिसर में इन दिनों यह आॅफिस अवस्थित है।

पहले गंगा किनारे कलक्टरी के पास था।

कलक्टरी का नया भवन बन रहा है।

इसलिए छज्जु बाग में स्थानांतरित कर दिया गया।

पहले इस बंगले में मंत्री रहते थे।

आगे भी रजिस्ट्री आॅफिस छज्जुबाग में ही बना रहेगा।

कलक्टरी भवन बन जाने के बाद भी वहां नहीं जाएगा,ऐसा मुझे बताया गया।

यह अच्छा फैसला है।

मौजूदा परिसर को देखकर अच्छा लगा।

सिर्फ एक बात को छोड़कर।

  साफ-सुथरी जगह है।

लोगों के बैठने के लिए बहुत सारी कुर्सियां लगी हंै।

स्वच्छ पेयजल की भी व्यवस्था है।

परिसर में बड़े -बड़े वृक्ष हैं-गर्मी से राहत देने वाले। 

कम्प्यूटरीकरण -मशीनीकरण से काम आसान हो गया है।

एप्वंाटमेंट पहले ही मिल जाता है कि दिन में कितने बजे आपको आना है।

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  पर,शौचालय की दुर्दशा देखकर मन क्षोभ से भर उठा।

उसमें प्रबंधन से अधिक इस्तेमाल करने वालों का कसूर लगा।

अब स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए कि टाॅयलेट का इस्तेमाल कैसे किया जाए।

यह पीढ़ी तो सीखने से रही।

अगली पीढ़ियां तो सीख जाएं !

 समय -समय पर मैंने यह पाया है कि चाहे पटना के आलीशान ज्ञान भवन की बात हो या मौर्यलोक परिसर की,

कहीं भी शौचालय इस्तेमाल के लायक नहीं मिले।

मजबूरी में करना पड़ा।

उसकी देखरेख की स्थायी व्यवस्था होनी चाहिए।

उससे बिहार की छवि बेहतर बनेगी।

एक कहावत है कि व्यक्ति की सफाई-पसंदगी का पता उसके बैठकखाने से नहीं बल्कि उसके शौचालय के रख-रखाव से चलता है।

मैं जोड़ता हूं--सरकारी दफ्तरों का पता ‘साहब’ के चेम्बर से नहीं बल्कि शौचालय से चलता है।वैसे कोई एक ‘साहब’ भला क्या करेंगे ?

इस संबंध में तो राज्य स्तर पर कोई नीति तय हो।

नीतीश कुमार ऐसे नए -नए कामों करने के लिए जाने भी जाते हैं।

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खैर, अब जमीन के बारे में।

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करीब 25 साल पहले मैंने पटना के पास के एक गांव में बहुत ही सस्ती जमीन खरीद ली थी।

मुख्य नगर में बसने की आर्थिक क्षमता नहीं थी।

घर बनाने के लिए और उसमें से कुछ जमीन को बेचकर बुढ़ापे के गुजारे के लिए।

  मेरी शिक्षिका पत्नी के नाम पर लिए गए एल.आई.सी. लोन और उनके सेवांत लाभ के पैसों से घर तो बन गया।

उनकी पेंशन राशि से चैके के खर्च तथा अन्य बुनियादी खर्च पूरे हो जाते हैं।

अब जमीन बेचकर मैं अपने निजी खर्चे का प्रबंध कर रहा हूं।

जमीन से मिले पैसों को बैंक में रखने से सूद मिलेगा।

  उधर सरकार को आयकर का लाभ मिलेगा।

क्योंकि मैंने जमीन के सारे पैसे ‘व्हाइट’ में ही लिए हैं।

जमीन बच जाती तो हमारे बाल- बच्चों के लिए बहुत उपयोगी होती। 

पर, मैं बेच देने को लाचार था।

   मैं अपनी प्रस्तावित पुस्तकों पर काम कर रहा हूूं।

इस सिलसिले में लोगों से मिलने और पुस्तकालयों में जाने-आने में पैसे लगेंगे।

जमीन से मिले ये पैसे काम आएंगे।

पत्नी की पेंशन राशि पर पूर्ण निर्भरता वैसे भी सही नहीं है।

उन पैसों पर उनका ही पहला हक है।

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बिहार सरकार ने पत्रकारों के लिए पेंशन का प्रावधान किया है।

नीतीश कुमार का यह सराहनीय काम है।

मैं ऐसे कई प्रतिभाशाली लोगों को जानता हूं जो सरकारी नौकरी पा सकते थे, किंतु पत्रकारिता में आए।

क्योंकि पत्रकारिता कुछ दशक पहले तक सिर्फ रोजी-रोटी या धन कमाने वाला पेशा नहीं थी।

  पर, पत्रकारिता की नौकरी में गुजारे लायक पेंशन का प्रावधान नहीं होने के कारण वैसे पत्रकार बुढ़ापे में कष्ट में रहे।

रिटायर हो जाने के बाद अधिकतर पत्रकारों को कोई नहीं पूछता जिनकी सेवा काल में बड़े -बड़े लोग खुशामद करते रहते हैं।

यह बात मैं पहले से जानता रहा हूं।

नियमतः मैं भी बिहार सरकार की पेंशन का हकदार था।

सन 1977 से ही पी.एफ. वाली नौकरी में रहा।

पर मैंने उसके लिए आवेदन नहीं किया।

  इसलिए नहीं कि मैं पेंशन का विरोधी हूं।

मैं तो बिहार पत्रकार पेंशन योजना के विस्तार का पक्षधर हूं।

‘संख्या-वार’ और ‘राशि-वार’ भी।

 वैसे मेरा काम उस पेंशन के बिना भी चल जाएगा।

अधिक जरूरतमंद को अधिक मिले,यह कामना है।

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 पेशेवर पत्रकारिता में आने के समय ही मैंने अपने लिए कुछ ‘लक्ष्मण रेखाएं’ खींची थीं।

उसमें एक यह भी है कि जिस पैसे के लिए मैंने मेहनत नहीं की,उसे मैं स्वीकार नहीं करूंगा।

हां,मैं पी.एफ.से जुड़ी अपनी पेंशन राशि में बढ़ोत्तरी के पक्ष में जरूर हूं जो अभी हास्यास्पद ढंग से अत्यल्प है।

मुझे हर माह 1231 रुपए मिलते हैं।

केंद्र सरकार से उसकी बढ़ोत्तरी की लगातार मांग हो रही है।

पर कोई नतीजा नहीं।

उप सभापति बनने से पहले हरिवंश जी ने मेरा नाम लेकर राज्य सभा में यह बात उठाई थी।

फिर भी कुछ नहीं हुआ।

पी.एफ.पेंशन में वार्षिक बढ़ोत्तरी का कोई प्रावधान नहीं।

शायद दुनिया की यह ऐसी एकमात्र पेंशन व्यवस्था है जिसमें वार्षिक बढ़ोत्तरी या महंगाई के अनुपात में वृद्धि का कोई प्रावधान नहीं।

‘‘सबका साथ,सबका विश्वास’’ की कामना करने वाले प्रधान मंत्री तक शायद इस अन्याय की खबर नहीं पहुंच सकी है।

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8 फरवरी 21


शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

          राज्य बनाएं कृषि कानून

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          केंद्र अपने कानून वापस ले

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          सी.ए.ए.लागू करना अधिक जरूरी

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         केंद्र एक साथ कई फं्रट न खोले

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         --सुरेंद्र किशोर-

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कई बार ‘‘दो कदम आगे और एक कदम’’ 

पीछे की रणनीति अपनानी पड़ती है।

इसलिए, क्यों नहीं कृषक कानून बनाने की जिम्मेदारी राज्यों पर छोड़ दी जानी चाहिए !

अभी संसद ने जो कानून बनाया है,उसे रद करिए।

राज्यों पर यह काम छोड़िए।

केंद्र सरकार ने नमूना कानून के साथ उसे बनाने का रास्ता दिखा ही दिया है।

कुछ राज्य कानून बनाएंगे।

कुछ अन्य नहीं बनाएंगे।

जो नहीं बनाएंगे, उन्हें बिचैलियों व मंडी के दलालों को खुश जो रखना है !

जो बनाएंगे,उनके राज्य में आम किसानों की आय दुगुनी होगी।

जो नहीं बनाएंगे,वे खामियाजा भुगतेंगे।

उसी तरह, जिस तरह पश्चिम बंगाल के सत्ताधारी इस बार चुनाव में भुगत सकते हैं।

ममता सरकार ने न तो पी.एम.किसान योजना लागू की और न ही आयुष्मान योजना।

इसको लेकर अगले विधान सभा चुनाव की पृष्ठभूमि में  अनेक मतदातागण तृणमूल कांग्रेस से सवाल पूछ रहे हैं।

जवाब देना उनके लिए मुश्किल हो रहा है।

जनता का मूड देखकर तृणमेल कांग्रेस के बड़े बड़े नेता ममता का साथ छोड़ रहे हैं।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में इतनी बड़ी भगदड़ कभी किसी दल से नहीं हुई।

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5 फरवरी 21


गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

 बिहार में प्रयोग के तौर पर एक 

ऐसी सब्जी की खेती की शुरुआत 

हुई है जो 82 हजार रुपए प्रतिकिलो 

की दर से विदेश में बिकती है।

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--सुरेंद्र किशोर -- 

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  दैनिक ‘प्रभात खबर’,पटना ने आज एक अद्भुत जानकारी दी है।

 बिहार के औरंगाबाद जिले में एक ऐसी सब्जी की खेती हो रही है जो विदेश में 82 हजार रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिक सकती है।

  अभी उस दर पर वहां बिक भी रही है।

 पश्चिम के कुछ देशों में इसकी खेती पहले से ही होती रही है।

नबी नगर प्रखंड के करमडीह गांव के किसान अमरेश कुमार सिंह प्रयोग के तौर पर यहां यह खेती कर रहे हैं।

वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिक डा.लाल की देखरेख में वे यह खेती कर रहे हैं।

अभी सिर्फ पांच कट्ठे में ही खेती कर रहे हैं।

पौधा बड़ा हो रहा है। 

 यदि यह प्रयोग सफल रहा तो इस देश के किसानों को अपार लाभ मिलेगा !

  याद रहे कि इस सब्जी से दवा व बीयर बनती है।

   इस नए प्रयोग की खूबी यह है कि खेत के छोटे रकबे से भी किसान अच्छी -खासी आय कर सकते हैं।

 उम्मीद है कि प्रभात खबर के औरंगाबाद संवाददाता शुभाशीष पांडेय इस खबर का पीछा करते रहेंगे।

 क्योंकि यदि यह प्रयोग सफल रहा तो इससे भारत के अनेक गरीब किसानों का कायालट हो सकता है।

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--सुरेंद्र किशोर-31 जनवरी 21


     कहां थी मुम्बई की स्काॅटलैंड मार्का पुलिस ??

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केंद्र सरकार के नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के दस्ते इन दिनों मुम्बई में प्रभावशाली लोगों को गिरफ्तार कर रहे हैं।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद ब्यूरो ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हंै।

 अब देश के लोगों को भी यह पता चल रहा है कि महाराष्ट्र के सत्ताधारी दलों से जुड़े कई लोगों पर ड्रग्स के व्यापार का आरोप रहा हैं।

   यदि अन्य दलों से जुड़े लोगों पर भी है तो उन्हें भी पकड़ा जाना चाहिए।

  उन्हें मुम्बई पुलिस पकड़े,यदि उनके खिलाफ एन.सी.बी.कुछ नहीं कर रही है।

  इससे पहले मुम्बई पुलिस के बारे में उद्धव सरकार कह रही थी कि वह तो स्कार्टलैंड यार्ड पुलिस की तरह ही कार्य कुशल है।

 लोग अब समझ रहे हैं कि मुम्बई पुलिस ने सुशांत की मौत से पहले तक ड्रग्स के किसी कारोबारी पर शायद ही हाथ डाले थे !

  वोहरा कमेटी की रपट (1993)में ड्रग्स के सौदागरों की ताकत व संरक्षण का विवरण मौजूद है।

  वैसे मुम्बई पुलिस की कार्यकुशलता का पता तभी चल गया था कि जब उसने सुशांत और दिशा सालियान की मौत की जांच के सिलसिले में जान बूझकर आपराधिक लापरवाही बरती।

किन हस्तियों के इशारे पर ???

शायद आने वाले दिनों में कभी उसका भी खुलासा हो जाए !

हां, अब मुम्बई पुलिस अर्नब गोस्वामी के खिलाफ कार्रवाई में जरूर अपनी ‘‘कार्य कुशलता’’ का भरपूर इस्तेमाल कर रही है।

जिन पर भी केस बने,उनके खिलाफ कार्रवाई करे।

पर यदि वह सभी तरफ नजर रखेगी तो उस पर कोई आरोप नहीं लगाएगा। 

कितना अच्छा होता यदि मुम्बई पुलिस और एन.सी.बी.के अफसर एक गुप्त बैठक करके तय करते कि हम दिल्ली के सत्ताधारियों से जुड़े स्थानीय लोगों पर कार्रवाई करते हैं आप महाराष्ट्र सरकार सेजुड़े कानून तोड़कों पर कार्रवाई करते हैं।ऐसा हुआ तो दाऊद के राजनीतिक-गैर राजनीतिक गुर्गे सचमुच कमजोर होंगे।

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  --सुरेंद्र किशोर-3 फरवरी 21


बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

       अब भी लोकप्रियता के 

      शिखर पर नरेंद्र मोदी

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कोविड ,नकारात्मक आर्थिक उन्नति और चीनी अतिक्रमण के बावजूद ,लोगों का नरेंद्र मोदी पर विश्वास बना हुआ है।

उनकी पार्टी के दक्षिणपंथी एजेंडे के लिए भी समर्थन बढ़ा है।

---राज चेंगप्पा,

  इंडिया टूडे

 3 फरवरी 2021

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इंडिया टूडे देश का मिजाज सर्वेक्षण,जनवरी 2021 के अनुसार

आज की तारीख में लोक सभा चुनाव हुए तो 

ऐसा रिजल्ट आएगा--

राजग-321 सीटें 

यूपीए-93 सीटें 

अन्य 129 सीटें 

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 मेरी समझ से अन्य कारणों के अलावा अधिकतर मोदी विरोधी

राजनीतिक दल ‘राजनीतिक त्रिदोष’ से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं।

उसका लाभ नरेंद्र मोदी को मिल रहा है।

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राजनीतिक त्रिदोष हैं-

वंशवाद-परिवारवाद

भ्रष्टाचार 

और तुष्टिकरण।

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मोदी यदि आज भी शीर्ष पर हैं तो

उसके लिए मोदी की खूबियों के साथ-साथ प्रतिपक्ष की खामियां भी जिम्मेदार हैं।

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नरेंद्र मोदी के बारे में अनेक लोग यह कहते मिल जाएंगे  कि मोदी गलती कर सकता है,किंतु बेईमानी नहीं।

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अब देखिए, आगे क्या होता है !!

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--सुरेंद्र किशोर--3 फरवरी 21

  


मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

    भारत (में) एक खोज 

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मीडिया से जुड़ी ऐसी हस्तियों के 

नामों की सूची तैयार करना 

चाहता हूं जो मोदी 

सरकार की खामियों की 

आलोचना करती हैं और

 साथ ही मोदी सरकार की 

खूबियों की सराहना भी करती हंै।

क्या आप इस काम में मेरी मदद करेंगे ?

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   --सुरेंद्र किशोर-

    2 फरवरी 2021


रविवार, 31 जनवरी 2021

     हामिद अंसारी का सेक्युलरिज्म

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पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा है कि वह सेक्युलरिज्म मौजूदा सरकार के शब्दकोश में नहीं है जो 2014 से पहले की केंद्र सरकार के शब्दकोश में था।  

  क्या हामिद अंसारी और कांग्रेस का सेक्युलरिज्म,पी.एफ.आई.के सेक्युलरिज्म से मेल खाता है ?

यदि ऐसा नहीं है तो पूर्व उप राष्ट्रपति अंसारी पी.एफ.आई.की महिला शाखा के समारोह में शामिल होने के लिए सितंबर, 2017 में कोझीकोड क्यों गए थे ?

  पी.एफ.आई.के राजनीतिक संगठन एस.डी.पी.आई.का गत कर्नाटका विधान सभा चुनाव में कांग्रेस से तालमेल क्यों हुआ था।

क्या पी.एफ.आई.सेक्युलर संगठन है ?

  केरल सरकार ने  24 दिसंबर, 2012 को हाईकोर्ट से कहा कि सिमी का ही नया रूप पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया है।

  याद रहे कि यह आरोप है कि गत साल दिल्ली व उत्तर प्रदेश में भीषण दंगे कराने में पी.एफ.आई.का हाथ था।.

    सिमी के बारे में जानिए।

 उस संगठन के अहमदाबाद जोन के सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने 2001 में  मीडिया से  बातचीत  में कहा था कि

 ‘जब हम भारत में सत्ता में आएंगे तो सभी मंदिरों को नष्ट कर देंगे और वहां मस्जिद बना देंगे।’

सिमी के एक दूसरे नेता ने मीडिया से कहा था कि लोकतांत्रिक तरीके से भारत में इस्लामिक शासन संभव नहीं है।इसलिए हमारा  एकमात्र रास्ता जेहाद है।

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार सन 2001 में सिमी पर प्रतिबंध लगा दिया था।

बाद की मनमोहन सरकार ने भी उस पर प्रतिबंध जारी रखा।क्योंकि खुफिया रपट ही वैसी थी।

प्रतिबंध के खिलाफ कांग्रेस नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद सुप्रीम कोर्ट में सिमी के वकील थे।

  इस देश के अधिकतर तथाकथित ‘सेक्युलर’ दलों ने समय -समय पर सार्वजनिक रूप से सिमी का बचाव किया।

  नरेंद्र मोदी की चुनावी सफलता दूसरा सबसे बड़ा कारण यही था।

सबसे बड़ा कारण मनमोहन सरकार का भीषण भ्रष्टाचार था।

यदि कांग्रेस सरकारों ने आम मुसलमानों के कल्याण के लिए काम किए होते तो उसकी वैसी चुनावी दर्गति नहीं होती।

पर उसने मुसलमानों के बीच के जेहादी तत्वों का हमेशा साथ दिया।   

    अब समझ गए न कि हामिद अंसारी का सेक्युलरिज्म कैसा है ?

क्या हामिद ने कभी सिमी,पी.एफ.आई.या जेहादी तत्वों  का विरोध किया ?

 अन्य धर्मो के अतिवादी तत्वों की खूब आलोचना कीजिए।

 पर जरा जेहादियों के खिलाफ भी तो कुछ बोलिए।

यदि नहीं तो कांग्रेस व हामिद अंसी जैसे लोगों व बुद्धिजीवियों का कोई भविष्य नहीं है।

वे लगातार हाशिए पर पहुंचते रहेंगे।

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--सुरेंद्र किशोर --31 जनवरी 21 




बुधवार, 27 जनवरी 2021

 तथाकथित किसान आंदोलन का घिनैाना रूप

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शर्म करो किसान नेताओ !

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चेतावनी के बावजूद अपने बीच से विध्वंसक तत्वों को निकाल बाहर नहीं किया

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किसानों की नेतागिरी छोड़ो या आज के विध्वंसक हिंसक तत्वों के खिलाफ गवाही दो 

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--सुरेंद्र किशोर--

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1.-खालिस्तानी तत्व-नक्सली तत्व-पाक समर्थक तत्व-आढतिए और मंडी के दलाल-वे दल जिनके नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में मुकदमे चल रहे हैं आदि ने मिलकर दिल्ली को आज बंधक बना लिया।

2.-इससे पहले गत साल जेहादी संगठन पी.एफ.आई.ने विदेशी पैसे के बल पर दिल्ली और उत्तर प्रदेश में भीषण दंगे करवाए थे।

3.-आने वाले दिनों में जब सी.ए.ए.-एन.आर.सी.लागू करने की 

कोशिश केंद्र सरकार करेगी तो जेहादी तत्व एक बार फिर देश में आग लगाने की कोशिश करेंगे।

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प्रतिपक्ष में जो भी जिम्मेदार व देशभक्त तत्व हैं, जो पाक या चीन समर्थक नहीं हैं,उनसे मिलकर सत्ता दल इस बात पर विचार करे कि देश को कोई बंधक बनाना चाहे तो सरकार को क्या करना चाहिए ?

प्रतिपक्ष यदि साथ न दे तो भी सरकार को चाहिए कि वह बंधक बनाने वाले तत्वों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करे चाहे उसका जो भी नतीजा हो।

  जब देश बचेगा तभी तो लोकतंत्र, दल व लोग बचेंगे !

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--सुरेंद्र किशोर-26 जनवरी 21

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मंगलवार, 26 जनवरी 2021

      नाम को नहीं,काम को मिला सम्मान !

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 नरेंद्र मोदी के शासनकाल में पद्म सम्मानों की गरिमा 

स्थापित होने लगी है।

बिहार से सम्मानितों की सूची को देख कर लगा कि नाम को नहीं बल्कि काम को सम्मान मिला है।

5 सम्मानितों में से तीन का मैंने पहली बार नाम सुना है।

मैंने नहीं सुना तो इसका मतलब यह नहीं कि उनके काम -योगदान सराहनीय नहीं रहे।

हां, वे प्रचार से दूर रहकर अपने काम में लगे रहे।

  पर इस सम्मान की गरिमा तब पूरी तरह स्थापित होगी जब उन लोगों को यह सम्मान नहीं मिलेगा जिन्होंने राजनीति में घृणित अपराधियों व कू्रर माफियाओं को स्थापित किया है।

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कई दशक पहले की बात है।

एक नामी व्यक्ति को पहले पद्मश्री से सम्मानित करने का निर्णय हुआ था।

पर पता चला कि उस हस्ती ने 16 लाख रुपए खर्च करके पद्म भूषण हथिया लिया।

ऐसे ही मामलों को जान-सुनकर एक बार खुशवंत सिंह ने कहा था कि 

‘‘पद्म सम्मान देने के आधार क्या हैं,मैं आज तक जान नहीं पाया।’’

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--सुरेंद्र किशोर-26 जनवरी 21   

   


   दिल्ली में हुड़दंग,हिंसा और टकराव

यह सरकार द्रोह नहीं बल्कि देशद्रोह है।

  आंदोलनकारियों को न तो संसद पर भरोसा है

 और न सुप्रीम कोर्ट पर 

इन्हें अहिंसा में भी विश्वास नहीं हैं

फिर इनसे सरकार कैसे निपटे !

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--सुरेंद्र किशोर-

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भारत की संसद ने गत साल तीन कृषि कानून पास किए।

तीन-चार राज्यों के कुछ किसानों को ये कानून पसंद नहीं हैं।

वे आंदोलनरत-धरनारत हैं।

अब तो हिंसक हो उठे हैं।

   केंद्र सरकार उन कानूनों को रद करने की मांग नहीं मांन रही है।

क्योंकि इन कानूनों के जरिए देश के किसानों की आय दुगुनी होनी है।

किसानों के आंदोलन को आढतियों व बिचैलियों का आंदोलन बताया जा रहा है।

उनमें कुछ देशद्रोही तत्व घुस गए हैं।

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कृषि कानून विरोधी किसानों को कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए था।

कोर्ट से उन्हें मांग करनी चाहिए थी कि वह कानून को रद करे।

  पर उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर विश्वास नहीं है।

 यदि कृषि कानून देश के किसानों के खिलाफ है तो किसानों व उनके नेताओं को चाहिए था कि वे 2024 के लोक सभा चुनाव का इंतजार करते

जो सरकार किसान विरोधी होगी, वह चुनाव नहीं जीत पाएगी।

  पर आंदोलनकारी यह जानते हैं कि तीन राज्यों को छोड़कर देश के अधिकतर किसान कानून के पक्ष में हैं।

इसलिए कृषि कानून विरोधी किसान व उनके नेता आज दिल्ली की सड़कों पर पुलिस से ‘युद्ध’ कर रहे हैं।

 युद्ध का मुकाबला केंद्र सरकार को युद्ध से दे 

ही देने को मजबूर होना पड़ेगा।

दरअसल किसानों के बीच कुछ ऐसे देशद्रोही तत्व घुस गए हैं जो इस आंदोलन के जरिए कोई अन्य लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं।

   उनके उद्देश्यों का पता परंपरागत किसान नेताओं को पहले से ही था।

इसलिए उन्हें आंदोलन फिलहाल स्थगित कर देना चाहिए था।

पर उन्होंने ऐसा न करके खुद को गैर जिम्मेदार नेता साबित किया है।

  पता नहीं आज का हिंसक आंदोलन कौन सा रूप ग्रहण करेगा।

 किंतु अंततःकेंद्र सरकार को तत्काल उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करके उन्हें ठंडा करना पड़ेगा।

बाद में उन पर देशद्रेाह का मुुकदमा कायम करना होगा।

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--सुरेंद्र किशोर-

26 जनवरी, 21  


शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

 बाबू जी की पुण्य तिथि पर

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पंडित ओम व्यास ओम ने ठीक ही लिखा है कि 

‘पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।’

मुझे याद नहीं कि बाबू जी ने कभी हमें बचपन में एक थपड़ भी मारा हो।

दरअसल उनकी उपस्थिति मात्र से हम सब भाई अनुशासित रहते थे।

वैसी कद-काठी का शायद ही कोई व्यक्ति जवार में हो !

मेरे परमानंद मामा (जमशेद पुर में बस गए हैं) उनके बारे में कहते थे कि मेरे बहनाई शेर हैं।

  स्वाभाविक ही है कि उनके जीवनकाल में तो हमें उनके महत्व का उतना पता नहीं चल सका।

पर, न रहने पर हम सोचते रहे कि शायद हम लोग उनसे परंपरागत विवेक को लेकर कुछ अधिक सीख सकते थे।

उनकी स्कूली शिक्षा तो नहीं थी,

किंतु वे रामायाण पढ़ते थे,

कैथी लिखते थे।

जमींदारी की रसीद काटते थे।

गांव- जवार में पंचायती करने जाते थे।

हां,वे मुकदमे के सिलसिले में अक्सर पटना-छपरा 

जाते रहते थे।

कहा करते थे कि पटना हाईकोर्ट भवन के आसपास पहले धान की खेती होती थी जिसेे उन्होंने देखा था।

विधायक काॅलोनी तो बाद में बनी।

  बाबूजी का 19 जनवरी 1986 को निधन हो गया।

मेरी बेटी अमृता ने फेसबुक पर आज उन्हें पहले याद किया।

बाद में मैं।

  ओम व्यास ओम की कविता के जरिए हमें पिता के पूरे महत्व का एहसास हुआ।

आपके साथ साझा कर रहा हूं।

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पिता

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पिता  जीवन है, संबल है, शक्ति है।

पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है।

पिता अंगुली पकड़े बच्चे का सहारा है।

पिता कभी खारा तो कभी मीठा है।

पिता पालन पोषण है,परिवार का अनुशासन है।

पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।

पिता रोटी है, कपड़ा है,मकान है।

पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है।

पिता अप्रदर्शित अनंत प्यार है।

पिता है तो बच्चों को इंतजार है।

पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं।

पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं।

पिता से प्रतिपल राग है।

पिता से ही मां की बिंदी और सुहाग है।

पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ति है।

पिता गृहस्थाश्रम में उच्च स्थिति की भक्ति है।

पिता अपनी इच्छाओं का हनन परिवार की पूत्र्ति है।

पिता रक्त में दिए हुए संस्कारों की मूत्र्ति है।

पिता एक जीवन को जीवन का दान है।

पिता दुनिया दिखाने का अहसास है।

पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हाथ है।

पिता नहीं तो बचपन अनाथ है।

पिता  से बड़ा अपना नाम करो।

पिता  का अपमान नहीं, अभिमान करो।

क्योंकि मां-बाप की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता।

ईश्वर भी इनके आशीषों को काट नहीं सकता।

दुनिया में किसी भी देवता का स्थान दूजा है।

मां-बाप की सबसे बड़ी पूजा है।

वो खुशनसीब होते हैं, मां-बाप जिनके साथ होते हैं।

       --  पंडित ओम व्यास ओम

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 डिजिटल प्लेटफार्म के लिए भी फिल्म सेंसर बोर्ड जैसी व्यवस्था अब जरूरी-सुरेंद्र किशोर

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इस देश के केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड ने 

प्रमाण पत्र देने के कुछ नियम बहुत पहले से तय कर रखे हैं।

ऐसा माना जाता रहा है कि जो फिल्म उन नियमों पर खरी उतरेगी,उसे ही पास किया जाएगा।

   कई दशक पहले तक तो इसका आम तौर से पालन होता था।

नतीजनत ,तब ऐसी फिल्में बनती थीं जिन्हें लोग सपरिवार देख सकते थे।यानी साफ-सुथरी और शालीन।शिक्षाप्रद व प्रेरक भी। 

 पर आज स्थिति बदल चुकी है।

आज उन नियमों का व्यवहार में इसका कितना पालन होता है,यह जांच का विषय है।

  डिजिटल प्लेटफार्म के लिए तो अभी ऐसा कोई नियम बना ही नहीं।

नतीजतन वाणी की स्वतंत्रता के नाम पर सोशल मीडिया में भारी अराजकता है। 

सेंसर बोर्ड का एक नियम यह है कि ‘‘जातिगत,धार्मिक या अन्य समूहों के लिए अवमाननापूर्ण दृश्य नहीं प्रदर्शित किए जाएंगे।

साथ ही अवमाननापूर्ण शब्द भी उच्चारित नहीं किए जाएंगे।’’

   चूंकि वेब सिरिज ‘‘तांडव’’ किसी सेंसरशिप प्रक्रिया से नहीं गुजरा,इसलिए तांडव जन भावना को गलत ढंग से उभारने वाला साबित हुआ है।यह चिंताजनक स्थिति है।

क्रिएटिव फ्रीडम के नाम पर तांडव के आपत्तिजनक दृश्यों-शब्दों का बचाव भी हो रहा है।

तांडव पर आपत्ति करने वालों का गुस्सा इसलिए बढ़ गया है क्योंकि तांडव का बचाव करने वाले लोग इसी तरीके से किसी अन्य समुदाय की भावना पर चोट पहुंचने पर विभिन्न मंचों से जोर -जोर से चिल्लाने लगते हैं।

  हां, यहां एक बात कहनी जरूरी है।

ओवर द टाॅप प्लेटफार्म यानी ओटीटी पर नकेल कसने के लिए

जो भी बोर्ड या समिति  बने उसे उस तरह न संचाालित किया जाए जिस तरह लुंजपुज तरीके से मौजूदा फिल्म सेंसर बोर्ड को चलाया जा रहा है। 

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फिल्म सेंसर बोर्ड की 

विवादास्पद कार्य प्रणाली 

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‘तांडव’ के बहाने फिल्म सेंसर बोर्ड पर एक बार फिर  सरसरी नजर डालने की जरूरत है।

इन दिनों की अधिकतर फिल्में सेंसर बोर्ड के अपने ही नियमों की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

 मेरे सामने बोर्ड के करीब एक दर्जन नियमों की एक लिस्ट है।

 उसे जब मैं देखता हूं तो ऐसा लगता है कि बोर्ड अपना काम नहीं कर रहा है।

 या तो वहां अब भी भ्रष्टाचार है या फिर किन्हीं माफियाओं का उस पर भारी असर है।

  नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद लगा था कि बोर्ड की स्थिति में फर्क आएगा।

किंतु लगता है कि अन्य अधिक जरूरी कामों के दबाव में केंद्र सरकार को उस ओर ध्यान देने की फुर्सत नहीं है।

2014 के अगस्त में सेंसर बोर्ड के सी.इ.ओ.राकेश कुमार को घूस लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

गिरफ्तारी के बाद राकेश कुमार ने यह रहस्योद्घाटन किया था कि बड़ी -बड़ी फिल्मों को भी बोर्ड में चढ़ावा देना पड़ा था।

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    सेंसर नियमों की बानगी

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 1.-मानवीय संवेदनाओं को चोट पहुंचाने वाली अशिष्टता,अश्लीलता और दुराचारिता वाले दृश्य न दिखाए जाएं।

2.-अपराध करने के लिए प्रेरित करने वाले दृश्य न दिखाए जाएं।

अपराधियों की कार्य प्रणाली न दिखाई जाए।

3.-महिलाओं को बदनाम करने वाला कोई भी दृश्य न दिखाया जाए।

 किसी भी प्रकार से महिलाओं का तिरस्कार करने वाला दृश्य न दिखाया जाए।

4.-उत्पीड़न या लैंगिक हिंसा के दृश्य न दिखाए जाएं।

यदि जरूरी हो तो अत्यंत संक्षेप में दिखाया जाए।

5.-हिंसा को उचित ठहराने वाले दृश्य फिल्म में न हों।

सेंसर बोर्ड के इस तरह के अन्य कई नियम व कसौटियां हैं।

फिर भी क्या उनका पालन आज की फिल्मों में हो रहा है ?

पचास-साठ के दशकों में पालन जरूर होता था।

तब लोग परिवार के साथ भी फिल्में देखा करते थे।

आज की कितनी फिल्मों को परिवार के साथ देखा जा सकता है ?

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  यू.पी.में फिल्म सिटी का निर्माण शुरू

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इस बीच यह अच्छी खबर आई है कि गौतम बुद्ध नगर में 

प्रस्तावित फिल्म सिटी का निर्माण कार्य शुरू हो गया है।

इस साल वहां फिल्मों की शूटिंग भी शुरू कर देने की योजना है।

यदि योजनानुसार काम चला तो वहां एक दिन देश की सबसे

 बड़ी फिल्म सिटी बनेगी। 

  ऐसे में सेंसर बोर्ड का मुख्यालय इसी प्रस्तावित फिल्म सिटी में रखा जाना चाहिए।

इससे मुम्बई के विवादास्पद लोगों के हाथों में सेंसर बोर्ड की  

नकेल नहीं रहेगी।

फिल्मी दुनिया पर से निहितस्वार्थी तत्वों का एकाधिकार समाप्त हो जाएगा।

  वैसे सेंसर बोर्ड में ऐसे लोगों को रखा जाना जरूरी है जो नियमों के अनुसार काम करने के अभ्यस्त हों।

देश में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है।

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  गन्ना किसानों की परेशानी 

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बिहार के सीतामढ़ी जिले की रीगा चीनी मिल गत मई 

से बंद है।

मजदूर और किसान परेशान हैं।

आसपास के गन्ना किसानों से कहा गया है कि वे गोपालगंज ,सिधवलिया और मझौलिया चीनी मिलों में अपना गन्ना पहुंचाएं।

गन्ना पहुंचाने में जिन्हें घाटा हो रहा है,वे किसान गन्ना जला रहे हैं।

संयुक्त किसान संघर्ष मोरचा ने मुख्य मंत्री नीतीश कुमार से अपील की है कि वे गन्ना मूल्य और के.सी.सी.के 140 करोड़ रुपए का भुगतान करवाने का प्रबंध करें।

   और अंत में 

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आर्यभट्ट की नगरी खगौल ज्ञान -विज्ञान के लिए मशहूर रही।

 बिहार के दानापुर के पास स्थित खगौल में दो काॅलेज चलते हैं।

पर, उनमें से किसी में भी स्नातकोत्तर की पढ़ाई तक नहीं होती।रिसर्च वगैरह की बात कौन कहे !

क्या इस पर कभी किसी ने सोचा ?

यदि नहीं, तो क्या नीति निर्धारक लोग अब तो सोचेंगे !

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साप्ताहिक काॅलम ‘कानोंकान,’

प्रभात खबर ,पटना ,

22 जनवरी 21