Saturday, June 2, 2012

नरसंहारों के पीछे की राजनीति



  बिहार में सन् 1971 से 1989 तक कुल 16 ऐसे नरसंहार हुए थे जिनमें दस या उससे अधिक लोग मारे गये। इसी तरह सन् 1990 से 2004 तक कुल 15 ऐसे नरसंहार हुए जिनमें दस या उससे अधिक लोग मारे गये।
सन 2005 और 20012 के बीच ऐसा नरसंहार सिर्फ खगड़िया में हुआ जिसमें 2009 में 16 लोगों की जानें गईं। सत्ता बदलने के बाद आखिर नरसंहारों का दौर लगभग थम क्यों गया ?

   इस बीच की सत्ता के स्वरूप पर विचार करने पर कुछ खास बातें सामने आती हैं। इससे नरसंहारों पर कंट्रोल करने का फार्मूला भी निकलता है। ये आंकड़े बताते हैं कि धुआंधार नरसंहारों के पीछे राजनीतिक व प्रशासनिक इच्छा शक्ति की कमी थी। या फिर हत्यारों से कतिपय नेताओं की मिलीभगत थी।

ये आरोप सच मालूम पड़ते हैं। याद रहे कि 1971 से 1989 तक तीन साल को छोड़ कर आमतौर पर बिहार में कांग्रेस की ही सरकार रही। 1990 से 2000 तक लालू प्रसाद -राबड़ी देवी की सरकारें थीं और 2000 से 2005 तक राजद और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार थी। सन 2005 में नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली। सन 2000 में बिहार से झारखंड अलग हो गया। उससे पहले उपर्युक्त अवधि में नरसंहार की सिर्फ चार घटनाएं झारखंड इलाके में हुई थीं।

   खगड़िया जिले के अमौसी में हुए नरसंहार के मुकदमे का फैसला गत 14 फरवरी 2012 को आया जिसमंें निचली अदालत ने दस अपराधियों को मृत्युदंड दिया और 4 को आजीवन कारावास की सजा दी। ऐसे नरसंहारों में
कम समय में अदालती फैसले का संभवतः बिहार में यह एक रिकार्ड है।

    बिहार में नरसंहार करने वाले गिरोहों में भूमि सेना, लाल सेना, लोरिक सेना, सनलाइट सेना, रणवीर सेना, सवर्ण लिबरेशन फ्रंट और ब्रहमर्षि सेना प्रमुख रहे। एक जमाने में इनकी तूती बोलती थी।
  इनमें से लाल सेना को छोड़ कर बाकी सब भूमिपतियों के हितों की रक्षा के लिए बने थे। अब इनका कहीं अता -पता नहीं है।

लेकिन जब ये सक्रिय थे तो इनका लाभ विभिन्न राजनीतिक दल उठाते थे।
क्योंकि नरसंहारों के कारण समाज दो परस्परविरोधी हिस्सों में बंट जाया करता था और चुनाव आने पर एक पक्ष एक दल को और दूसरा पक्ष दूसरे दल को वोट देता था। इस तरह नरसंहारों से बैठे-बिठाये वोट बैंक तैयार हो जाते थे। जाहिर है कि उसके बदले में नेतागण उन लोगों को मुकदमे में बचायंे जिनपर नरसंहार के आरोप लगे होते थे। इससे हत्यारों का मनोबल बढ़ता था। उन्हें लगता था कि कोई भी अपराध करके वे बच सकते हैं। इस कारण नरसंहार रुकते नहीं थे।

   अनेक मामलों में तो नरसंहारों के पीछे राजनीतिक नेताओं के निजी हित भी निहित होते थे। नरसंहार आम तौर पर जमीन, मजदूरी और मान- सम्मान को लेकर होते थे।

   राज्य का सबसे बड़ा और पहला नरसंहार 1971 में पूर्णिया जिले के रूपसपुर चंदवा में हुआ था। वहां 14 आदिवासी मारे गये थे। उस केस में जिन लोगों को सजा हुई थी, उनमें बिहार विधानसभा के एक पूर्व स्पीकर भी थे। यह झगड़ा जमीन को लेकर था। 1987 में औरंगाबाद जिले के दलेल चक बघौरा में माओवादी कम्युनिस्ट केंद्र यानी एम.सी.सी. के हथियारबंद दस्ते ने 54 भूमिपतियों व उनके समर्थकों की हत्या कर दी।

यह झगड़ा एक कांग्रेसी नेता की जमीन-लोलुपता के कारण शुरू हुआ था जो इतने बड़े नरसंहार में बदल गया। उस नेता ने एक मठ के महंत से एक ऐसी विवादास्पद जमीन खरीद ली थी जिस पर एम.सी.सी. समर्थित मजदूर बटाई पर खेती करते थे। जमीन हदबंदी कानून से बाहर की थी और कानूनन उसपर गरीबों का ही हक होना चाहिए था। नेता जी ने उन बटाईदारों को उस जमीन से जबरन बेदखल करना चाहा। इसको लेकर हिंसा -प्रतिहिंसा हुई और अनेक लोगों की जानें गई। पर दलेल चक बघौरा कांड के बाद तत्कालीन राज्य सरकार ने जब उस जमीन को भूमिहीनों में बांट दिया तो वहां एम.सी.सी. भी कमजोर हो गया और नेता जी की जमीन की भूख भी मर गई। पर इस कांड को लेकर उस जिले में जो तनाव पैदा हुआ, उसका लाभ बाद में उस नेता जी को मिला जो आसानी से चुनाव जीत गये।

  यानी चुनाव जीतने के लिए बिहार के अनेक स्थानों में नेताओं ने नरसंहारों को वरदान माना।

 इसलिए नरसंहार की जड़ को समाप्त करने की तब कभी गंभीर कोशिश सरकार की तरफ से नहीं हुई। दलेल चक बघौरा कांड जिस जमीन को लेकर हुआ, उस जमीन के मामले को प्रशासन ने समय पर सुलझा दिया होता तो 54 लोगों की जानें नहीं जातीं। आखिर वह काम हुआ, पर दर्जनों जानें लेने के बाद।

   आज भी बिहार में जमीन का मामला बड़ा जटिल है जिसे सुलझाना बाकी है। पर इस बीच प्रशासनिक और पुलिसिया उपायों और राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण नरसंहारों पर काबू पाया जा सका है। इसके साथ ही सांप्रदायिक दंगे भी बिहार में अब नहीं हो रहे हैं जो राज्य कभी भागलपुर जैसे बड़े दंगों के लिए देश भर में चर्चित हुआ था।

   नीतीश कुमार के नेतृत्व में 2005 में गठित सरकार ने आपराधिक मुकदमों को त्वरित अदालतों के जरिए तेजी से निपटाया। लालू-राबड़ी के जंगल राज की समाप्ति के मुद्दे पर ही नीतीश कुमार को जनादेश मिला था। अब तक करीब 70 हजार अपराधियों को निचली अदालतांे से सजा हो चुकी है। इनमें जातीय आम अपराध, नरसंहार, नक्सली हिंसा-प्रति हिंसा और सांप्रदायिक दंगों के दोषी शामिल हैं। अब सब तरह के नरसंहारों के अपराधियों को ऐसा लग रहा है कि नरसंहार करने पर आम तौर पर कोई उन्हें बचाने वाला नहीं होगा। इसलिए बड़े कांड नहीं हो रहे हैं। ऐसा नहीं है कि कानून -व्यवस्था के मामले में बिहार में कोई राम-राज आ गया है। पर पहले से स्थिति बेहतर है। इसके विपरीत कांग्रेस राज की अपेक्षा लालू  -राबड़ी राज में कानून व्यवस्था की स्थिति काफी बिगड़ चुकी थी। उन दिनों भाजपा आरोप लगाती थी कि लालू प्रसाद की माओवादियों से सांठगांठ है और लालू प्रसाद आरोप लगाते थे कि रणवीर सेना के भाजपा का संरक्षण हासिल है।

    1986 में हुए अरवल नरसंहार में पुलिस ने 24 गरीबों को गोलियों से भून दिया था। वे लोग नक्सली संगठन से जुड़े एम.के.एस.एस. के झंडे तले अपने वाजिब हक की मांग के समर्थन में आम सभा कर रहे थे। उनकी मांग थी कि अरवल बाजार की उस जमीन पर बगल के भूमिहीनों का ही दखल कब्जा हो जिन्हें एक न्यायपक्षी एस.डी.ओ. व्यास जी ने पहले बासगीत का पर्चा दे दिया था। पर बाद में उसी जमीन को एक भूमिपति को प्रशासन ने दे दिया।

  उन गरीबों को न्याय दिलाने की जगह पुलिस ने नरसंहार कर दिया और ऐसा जघन्य काम करने वाले एस.पी. का कुछ नहीं बिगड़ा। क्योंकि प्रशासन बंटा हुआ था और नेता ऐसे विवादों पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे थे। तब के मुख्यमंत्री ने कहा था कि नक्सली चोर -डकैत से अधिक कुछ नहीं हैं। जबकि उनकी ही सरकार ने अपने नोट में लिखा था कि नक्सली समस्या सामाजिक-आर्थिक समस्या है और इसका समाधान सिर्फ पुलिस बल से नहीं हो सकता है।

  सिवान की कहानी भी कुछ इसी तरह की है जहां लालू-राबड़ी राज में आये दिन हत्याएं होती रहती थीं। राज्य के अन्य स्थानों की तरह ही वहां भी गरीब मजदूरों को भूमिपतियों द्वारा शोषण से प्रशासन ने नहीं बचाया। वहां माले सक्रिय हुआ। माले ने गरीबों का पक्ष लिया। उसके जवाब में मोहम्मद शहाबुद्दीन भूमिपतियों की तरफ से उठ खड़े हुए। दोनों पक्षों की ओर से वर्षों से हिंसा -प्रति हिंसा होती रही। समाज में आपसी तनाव बढ़ा। इससे वोट का धु्रवीकरण हुआ। एक तरफ शहाबुद्दीन विजयी होते रहे और दूसरी तरफ माले के सदस्य। अब वहां इनमें से कोई नहीं जीत रहा है। हत्याओं का दौर भी लगभग बंद ही है। इसलिए कि कानून के शासन का लोगों को आभास होने लगा है। अब अनेक तरह के हिंसक तत्वों व अपराधियों को यह लग रहा है कि अपराध करके वे आम तौर पर बच नहीं सकते। अपवाद की बात कुछ और है।

   सन्  1981 में मध्य बिहार के जहानाबाद जिले के परसबिगहा में ग्यारह दलित उनके घरों में जिंदा जला दिये गये थे। झगड़ा जमीन का ही था। मुकदमा चला। कुछ नेताओं न,े जिनमें बिहार के एक पूर्व मंत्री भी शामिल थे, आरोपी के पक्ष में कोर्ट में यह गवाही दी कि घटना के समय आरोपी हमारे  साथ था। पर कोर्ट ने उस गवाही को झूठ माना।  
 
सन 1977 में बेलछी नरसंहार उस समय हुआ जब बिहार में राष्ट्रपति शासन था। उस कांड में कमजोर वर्ग के 11 लोग मार दिये गये थे। इंदिरा गांधी ने बेलछी का दौरा किया था। बेलछी कांड के बाद वहां जातीय तनाव बढ़ा था। उस कांड के एक आरोपी उस तनाव का लाभ उठाकर बिहार विधानसभा के सदस्य भी चुन लिये गये थे। यानी जो नरसंहार आसानी से चुनाव जितवाये, उसे जारी रखने में अनेक लोगों का निहितस्वार्थ हो जाता है। वैसे भी भूमि सुधार के लिए तरसते बिहार में संपन्न लोगों का स्वार्थ आए दिन कमजोर वर्ग के लोगों से टकराता रहता है। जमीन के आपसी झगड़े को निपटाने के लिए नीतीश सरकार एक कड़ा कानून बनाने जा रही है। सरकार ने पाया है कि आज भी अधिकतर हत्याएं जमीन विवाद को लेकर ही हो रही हैं। पर भूमि सुधार का काम एक ऐसा नाजुक मसला है जिसपर नीतीश कुमार अभी हाथ डालना नहीं चाहती।

भूमि सुधार की मांग पर सरकारी पक्ष कहता है कि बिहार में पहले कानून के शासन को और अधिक मजबूत करना है और आम विकास और राहत के काम और भी तेज करने हैं। यदि भूमि सुधार जैसे जटिल मामले में यह सरकार फंस जाएगी तो अगले चुनाव में इस सरकार के गिरने और एक बार फिर जंगल राज के लौटने का खतरा है। वैसी स्थिति में न तो भूमि सुधार या विकास हो पाएगा, बल्कि एक बार फिर कानून -व्यवस्था चौपट हो जाएगी।

 सबके अपने- अपने तर्क हैं। शांतिप्रिय लोगों को राहत जरूर है कि नरसंहार नहीं हो रहे हैं। गत पांच -छह वर्षों में वोट पाने के दूसरे शांतिपूर्ण तरीके आजमाए गये हैं और आजमाए जा भी रहे हैं। वे सफल भी हुए हैं।

  पर बथानी टोला नरसंहार में आरोपितों की हाईकोर्ट से रिहाई पर अनेक लोग परेशान हैं। इस कांड में निचली अदालत ने सजा सुनाई थी। अब यह बात कही जा रही है कि पुलिस ने केस को जानबूझ कर इतना कमजोर  बना दिया था कि हाईकोर्ट ने सबूत को पर्याप्त नहीं माना।

 अब राज्य सरकार इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। पर इसको लेकर इस कांड के एक आरेापी ने कहा है कि सरकार को अपील नहीं करनी चाहिए क्योंकि ज्वाला सिंह हत्याकांड में सरकार ने अपील नहीं की थी।
भोजपुर जिले के एक प्रखंड प्रमुख ज्वाला सिंह की हत्या का आरोप माले के एक नेता पर लगा था। निचली अदालत ने माले नेता को रिहा कर दिया। पर सरकार ने उस निर्णय के खिलाफ ऊपर की अदालत में अपील नहीं की। इसे दोहरा मापदंड माना गया। ऐसे दोहरे मापदंडों से असंतोष व तनाव बढ़ता है।


(इस लेख का संपादित अंश द पब्लिक एजेंडा: 31 मई 2012: में प्रकाशित)

नेता अभिमुख या देश अभिमुख राष्ट्रपति ?



मन के लायक राष्ट्रपति या देश के लायक राष्ट्रपति? विभिन्न दलों द्वारा अपने अनुकूल राष्ट्रपति बनाने की कोशिश इस देश में 1950 से ही जारी है।
सन् 1950 मेें देश में संविधान लागू हुआ और डा. राजेंद्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति बने जो 1962 तक उस पद पर रहे।

लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री और देश के लोकप्रिय नेता जवाहर लाल नेहरू यह चाहते थे कि सी. राजागोपालाचारी राष्ट्रपति बनें न कि डा. राजेंद्र प्रसाद। राजा जी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था। यह बात उनके खिलाफ जाती थी। तीन उच्चत्तम पदों पर सामाजिक संतुलन का भी सवाल था। सरदार पटेल ने राजा जी के नाम का सख्त विरोध किया और डा. राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनवा दिया। एक लोकतांत्रिक नेता के रूप में जवाहर लाल नेहरू ने आधे मन से यह स्वीकार भी कर लिया।

  पर, आश्चर्य की बात यह थी कि समाजवादी विचारधारा के जवाहर लाल जी ने कैसे एक घनघोर पूंजीवाद समर्थक राजा जी के नाम पर जिद कर ली थी। एक समय तो यह भी आया था कि जब कांग्रेस की एक महत्वपूर्ण बैठक में जवाहर लाल जी ने धमकी तक दे डाली थी कि यदि राजा जी को नहीं बनाया गया तो वे प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे।

   पर उनकी धमकी काम नहीं आई। दरअसल पंडित नेहरू की चिंता अपने मन के राष्ट्रपति बनाने की थी ताकि राजपाट किसी बिघ्न बाधा के चलता रहे। हालांकि भारतीय संविधान में भारत के राष्ट्रपति के पद को करीब- करीब शोभा के पद का दर्जा दिया गया है। उससे थोड़ा ही अधिक। पर संविधान का कार्यान्वयन किस रूप में होता है। आने वाले वर्षों में चीजें किस तरह विकसित होती हैं, इसको लेकर कुछ नेताओं को आजादी के तत्काल बाद कुछ आशंकाएं रही होंगी। इसीलिए किसी अनहोनी को रोकने के लिए यह स्वाभाविक ही था कि कोई प्रधानमंत्री अपने मन लायक राष्ट्रपति चुनवाने की कोशिश करे।
   यह प्रवृति बाद के वर्षों में बढ़ी। आज कुछ और भी ज्यादा है। क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता व उथल पुथल के दौर में राष्ट्रपति का प्रधानमंत्री के पक्ष में खड़ा होना प्रधानमंत्री के लिए जरूरी माना गया।

सन् 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को यह लगा होगा कि जिन नीतियों को वह लागू करना चाहती हैं, उनके समर्थन के लिए उनके अनुकूल राष्ट्रपति जरूरी है। इसीलिए उन्होंने वी.वी. गिरि को राष्ट्रपति बनवा दिया। ऐसा उन्होंने पार्टी से विद्रोह करके किया। बाद में कांग्रेस पार्टी में महाविभाजन भी हुआ। अविभाजित पार्टी की बैठक में तो इंदिरा गांधी ने नीलम संजीव रेडड्ी की उम्मीदवारी पर अपनी मुहर लगाई, पर बाद में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार गिरि को जितवा दिया। इसका राजनीतिक लाभ भी उन्हें मिला। जो प्रगतिशील नीतियां वे लागू करना चाहती थीं, उस काम में उन्हें वी.वी. गिरि का सहयोग मिला। सन् 1975 में आपातकाल लागू करने के समय तो फखरूद्दीन अली अहमद जैसे अत्यंत अनुकूल राष्ट्रपति की भारी जरूरत इंदिरा गांधी को थी। आपातकाल की अधिसूचना पर राष्ट्रपति का दस्तखत पहले हुआ और उस पर कैबिनेट की मुहर बाद में लगी।

खैर वे तो कम उथल पुथल के दिन थे। कम से कम तब तो एक ऐसा कैबिनेट होता था जो प्रधानमंत्री की उचित-अनुचित इच्छा पर तुरंत मुहर लगा देता था। पर आज की मिलीजुली सरकारों के दौर में कोई प्रधानमंत्री अपने कैबिनेट से हर हाल में ऐसी उम्मीद नहीं कर सकता है। राजनीतिक अस्थिरता के इस दौर में राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

   सन् 2014 का लोकसभा चुनाव सामने है। अभी देश के जैसे राजनीतिक हालात हैं, उसमें कोई राष्ट्रीय दल अकेले बहुमत पाने की उम्मीद नहीं कर सकता। फिर तो पहला मौका मंत्रिमंडल के गठन के लिए किसी दल या गठबंधन के नेता को बुलाने का आएगा। सन् 1996 में एक राजनीतिक हादसा हो चुका है। तत्कालीन राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा ने अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी थी जबकि उन्हें लोकसभा में बहुमत का समर्थन हासिल नहीं था और न होने की संभावना थी। इसलिए तेरह दिनों तक ही वे प्रधानमंत्री पद पर बने रह सके।

  किसी राष्ट्रपतिया राज्यपाल को यह देखना चाहिए कि जिस व्यक्ति को वह सरकार बनाने के लिए बुला रहे हैं उसे सदन के बहुमत का समर्थन हासिल है भी या नहीं। सिर्फ इससे काम नहीं चलेगा कि कोई व्यक्ति सबसे बड़े दल का नेता चुनाव गया है। पर इस सामान्य नियम का उलंघन होता रहा है।

   अगले लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर ऐसी नौबत आ सकती है। तब यदि राष्ट्रपति के पद पर कोई न्याय और संविधानप्रिय व्यक्ति नहीं बैठा हो तो किसी अल्पमत के नेता को प्रधानमंत्री बनने के बाद खरीद-फरोख्त करके बहुमत जुंटाने का मौका मिल सकता है। फिर इस देश का क्या होगा? जब खरीद-फरोख्त से सरकार बनेगी तो वह चलेगी भी उसी तरीके से।

 इसलिए अगला राष्ट्रपति किसी ऐसे व्यक्ति को ही होना चाहिए जो ऐसे मामले में वास्तविक स्थिति को देख कर यानी बहुमत की जांच करके निर्णय करे न कि अपनी इच्छा के अनुसार जिसे चाहे शपथ ग्रहण करा दे। ऐसा व्यक्ति मिलना जरा कठिन होता है, पर असंभव नहीं। आज इस देश की राजनीति में गिरावट के जो हालात हैं, उसमें यह लगता है कि कोई प्रमुख दल निष्पक्ष ढंग से काम करने वाले ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति नहीं बनाएगा। पर, किसी ऐसे -वैसे व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाने के जो खतरे हैं, उसकी ओर देश का ध्यान दिला देना जरूरी है।

   भले संविधान में राष्ट्रपति को कोई खास अधिकार प्राप्त नहीं है, पर विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

 आने वाले समय राजनीतिक व आर्थिक दृष्टि से देश की हालत उथल पुथल वाले होंगे, ऐसी संभावना जाहिर की जा रही है। अधिकतर दलों व नेताओं के अपने अपने स्वार्थ जग जाहिर हैं। अधिकतर लोगों की नजर में देश बाद में और दल व निजी हित पहले है। गठबंधन की सरकारों के दौर में प्रधानमंत्री अक्सर निस्सहाय नजर आते हैं। केंद्र सरकार में कोई कमी रह गई या फिर कोई गलती हो गई तो प्रधानमंत्री तुरंत कह देते हैं कि यह तो गठबंधन सरकार की मजबूरी है।

कई बार इस कारण देश ही नहीं पूरी दुनिया में भारत सरकार की स्थिति अजीब दिखाई पड़ने लगती है। ऐसी स्थिति में किसी ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाना और भी जरूरी है जिसमें नैतिक धाक हो और समय पर सरकार को उचित सलाह दे। क्या ऐसा हो पाएगा ? यदि ऐसा हो जाता तो अनौपचारिक तौर पर ही सही, पर सरकार के लिए यदा -कदा जरूरत पड़ने  पर अधिकार विहीन अभिभावक व सलाहकार की भूमिका निभाता। वैसी नौबत आ सकती है जो देश के हालात बनते जा रहे हैं। ऐसा भी हो सकता है कि कोई भी अगला राष्ट्रपति इस बात का ध्यान रखे कि देश सही दिशा में आगे बढ़े और संविधान व कानून का शासन कायम हो। अभी तो कई बार यह लगता है कि देश में कानून व संविधान का शासन नहीं है।

राष्ट्रपति को संविधान ने यह अधिकार जरूर दिया है कि वह संसद के दोनों
सदनों को संदेश भेज सकते हैं। यदि कोई सरकार अपने कर्तव्यों को भूल कर कोई ऐसा कदम उठाए जो देशहित में नहीं हो तो वैसी आपात स्थिति में राष्ट्रपति संसद को संदेश भेज सकते हैं। किसी नैतिक धाक वाले राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए उस संदेश से कम से कम देश को यह तो पता चलेगा कि कहां गलत या कहां सही हो रहा है। भले सरकार उनके संदेश की उपेक्षा करे। या यह भी हो सकता है कि गठबंधन की मजबूरी का रोना रोने वाले प्रधानमंत्रियों के इस दौर में राष्ट्रपति के किसी निर्दोष हस्तक्षेप को आधार बना कर ही शायद सरकार कुछ अच्छे काम कर दे। या फिर किसी गलत कदम को रोक दिया जाए।
 
   सीमित अधिकारों के बावजूद कई बार राष्ट्रपतियों  राष्ट्रपतियों ने आजादी के बाद से ही सरकार के रूटीन कामों में हस्तक्षेप किया है। यह संवैधानिक व्यवस्था है कि संसद में पारित कोई विधेयक तब तक कानून नहीं बन सकता जब तक कि राष्ट्रपति का उस पर दस्तखत नहीं हो जाए। कई बार राष्ट्रपतियों ने विवादास्पद विधेयक पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया है। हालांकि इस मामले में भी राष्ट्रपति को सीमित अधिकार है। पर, एक बार इनकार की खबर और इनकार के कारणों की सूचना देश को मिल जाएगी तो उसका जन मानस पर सकारात्मक असर पड़ेगा। पर इसके लिए जरूरी है कि राष्ट्रपति पद पर बैठा व्यक्ति विवेकवान हो।

  कम से कम राष्ट्रपति के पद को किसी जातीय, क्षेत्रीय या सामाजिक कोटे से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके लिए बहुत सारे अन्य पद इस देश में उपलब्ध हैं। वे पद अधिक अधिकार वाले भी हैं। अभी प्रतिभा सिंह पाटील महामहिम राष्ट्रपति हैं। जब वह बनी थीं तो कहा गया था कि इससे महिलाओं का सम्मान बढ़ेगा, उनपर जुल्म कम होगा और उनका सशक्तीकरण होगा। पर क्या ऐसा हुआ? कोई नहीं कहेगा कि प्रतिभा पाटील के राष्ट्रपति बनने से देश की महिलाओं के जीवन में कोई फर्क आया है। यही बात अन्य समुदायों, जातियों व क्षेत्रों का भी है। उनके राष्ट्रपति पद पर पहुंचने से क्या हुआ?  मुस्लिम समुदाय से आने वाली तीन हस्तियां अब तक राष्ट्रपति बन चुकी हैं। इससे क्या फर्क पड़ा मुस्लिम समुदाय की दशा-दिशा पर ? सच्चर समिति की रपट बताती है कि कोई फर्क नहीं पड़ा। सबसे लंबे समय तक डा. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति रहे। वह बिहार के थे। आज बिहार देश के सबसे पिछड़े प्रदेशों में है।

  इसलिए लिंग, जाति या समुदाय के बदले व्यक्तियों के व्यक्तित्व पर ध्यान देने की आज अधिक जरूरत है चाहे वे किसी वर्ग से आते हों। क्योंकि देश के सामने नाजुक समस्याएं आने वाली हैं, ऐसी आशंका जाहिर की जा रही है। उस समस्या के मुकाबले के लिए न सिर्फ प्रधानमंत्री के पद पर बल्कि राष्ट्रपति के पद पर भी ऐसे व्यक्ति होने चाहिए जो व्यक्ति या दल की ओर देख कर निर्णय नहीं करे बल्कि देश और देशवासियों की ओर देख कर फैसले करें। ऐसे व्यक्ति मिल जाएंगे, यदि ईमानदारी से उसकी तलाश हो।
यह जरूरी है। या जो भी व्यक्ति उस पद पर आने वाले दिनों में बैठें, वे अन्य बातों को भूल कर सिर्फ देश और जनता का ध्यान रखें न कि आपातकाल के समय के राष्ट्रपति की तरह सरकार का रबर स्टाम्प बनें।

/इसका संपादित अंश हिंदी पाक्षिक द पब्लिक एजेंडा:
 31 मई 2012: में प्रकाशित/