Kanokan लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Kanokan लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 23 मई 2020

त्रुटिहीन प्रश्न पत्रों की तैयारी व काॅपियों की सही जांच की समस्या

बिहार बोर्ड ने हाल में माध्यमिक शिक्षक पात्रता परीक्षा रद कर दी। परीक्षा में भारी गड़बड़ी पाई गई थी। प्रश्नपत्र भी गलत सेट किए गए थे। देश -प्रदेश की अन्य अनेक परीक्षाओं के मामलों में भी अक्सर ऐसी शिकायतें मिलती रहती हैं। कहीं प्रश्न -सेटर में अयोग्यता पाई जाती है तो कहीं उत्तर पुस्तिकाओं की जांच करने वालों की अक्षमता। कहीं कुछ अन्य तरह की गड़बड़ियां।

पिछले साल ही यह खबर आई थी कि बिहार के सरकारी स्कूलों की कक्षा पांच के करीब 53 प्रतिशत बच्चे घटाव नहीं कर सकते। इस तरह के अन्य अनेक उदाहरण हैं। अपवादों को छोड़कर देश-प्रदेश के अधिकतर सरकारी स्कूलों की हालत भी कमोवेश यही है।

कुछ ही साल पहले बिहार के तत्कालीन गवर्नर ने कहा था कि ‘बिहार की उच्च शिक्षा ध्वस्त होने के कगार पर है।’ यानी, अपवादों को छोड़कर प्राथमिक से लेकर विश्व विद्यालय स्तर तक की शिक्षा-परीक्षा का हाल संतोषजनक नहीं है।

अधिकतर दाखिले और नौकरियों के लिए आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं का हाल भी असंतोषजनक पाए जाते हैं। ऐसे में हम कैसी पीढ़ियां तैयार कर रहे हैं ! 



इस पृष्ठभूमि में बिहार सरकार को चाहिए कि विशेष कदाचारमुक्त 


परीक्षाएं आयोजित करके पहले वह योग्य शिक्षकों की एक मजबूत टीम तैयार करे। उस टीम में शामिल शिक्षकगण हर स्तर के लिए त्रुटिरहित प्रश्नपत्र तैयार करें। मौजूदा शिक्षकों में से ही अत्यंत योग्य शिक्षकों के चयन के लिए छोटी-छोटी जांच परीक्षाएं समय -समय पर ली जा सकती हैं।

पटना में ही पांच हजार व्यक्तियों के बैठने की जगह वाला हाॅल उपलब्ध है। ईमानदार अफसरों की देखरेख में कड़ी निगरानी कराई जाए तो उस हाॅल में कदाचारमुक्त परीक्षाएं संभव भी है। 

साथ ही, उन चयनित योग्य शिक्षकों के जरिए उत्तर पुस्तिकाओं की सही जांच कराई जा सकती है। उत्तर पुस्तिकाओं के जांच कर्ताओं की टीम की निगरानी योग्यत्तम शिक्षकों की टीम से करवाई जा सकती है। प्रश्न पत्रों को सेट करने में जो गड़बड़ियां होती हैं, उन्हें भी दूर किया जा सकता है। 

शिक्षा और परीक्षा के काम को कैसे सुधारा जाए,उसके लिए तो एक उच्चाधिकारप्राप्त आयोग बनाने की जरूरत है ताकि कुछ कारगर सुझाव आ सके।


हरियाणा सरकार की सदाशयता

बिहारी मजदूरों के साथ हरियाणा सरकार का व्यवहार सराहनीय रहा। यदि अन्य राज्यों ने भी प्रवासी मजदूरों के साथ वैसा ही अपनापन दिखाया होता तो इस अभूतपूर्व आकस्मिक समस्या को हल करने में सुविधा होती।

याद रहे कि बिहार सरकार ने श्रमिकों पर हुए खर्च के पैसों को हरियाणा सरकार को देने की पेशकश की थी। मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने उसे ठुकराते हुए कहा कि प्रवासी मजदूरों की देखभाल की जिम्मेवारी हमारी है।  

दरअसल कोरोना से उत्पन्न समस्याओं के मुकाबला करने में जब संपन्न देश विफल रहे तो हमारा देश तो अब भी विकासशील है।

यहां तक कि बेहतर प्रशासन वाले केरल राज्य से भी यह खबर आई कि वहां बिहार व यू.पी. के मजदूर पैदल ही निकल पड़े थे। केरल पुलिस ने उन्हें रोका और शिविरों में फिर पहुंचाया। मजदूरों की शिकयत थी कि उन्हें वहां पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल रहा था। याद रहे कि केरल सरकार ने अन्य कई राज्यों की अपेक्षा इस महामारी का बेहतर ढंग से मुकाबला किया है।


भूली-बिसरी याद


राष्ट्रकवि  मैथिलीशरण गुप्त की भारी भरकम लौह तिजोरी गामा पहलवान ने उठाई थी। सन् 1901-02 में भयंकर प्लेग की महामारी आई हुई थी। तब मैथिलीशरण गुप्त का परिवार उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के चिरगांव से पलायन कर दतिया चला गया था जो मध्य प्रदेश में है। उनके  संग लोहे की एक भारी तिजोरी थी। मैथिलीशरण जी ससुराल दतिया में थी। उनकी ससुराल के परिवार में विश्व प्रसिद्ध पहलवान गामा का आना-जाना था।

तिजोरी को दसियों लोगों ने मिलकर किसी तरह बैलगाड़ी पर चिरगांव में चढ़ाया था। पर, उसे जब दतिया में उतारना हुआ तो गामा ने अपने भाई के साथ मिलकर आसानी से उतार लिया।
गामा का जन्म अमृतसर में 1880 में हुआ था। उनका निधन 22 मई 1963 को लाहौर में हुआ।
पहलवान गामा रूस्तम ए हिंद ही नहीं बल्कि रूस्तम ए बर्तानिया भी बने थे।

रीवां के महाराज बेंकटेश सिंह गामा के प्रतिपालक थे। रूस्तम ए हिंद का मुकाबला 1911 में प्रयाग में हुआ था। रीवां महाराज भी मौजूद थे। गामा का मुकाबला करीम पहलवान से थे।

कलियुगी भीम राममूर्ति करीम के पृष्ठपोषक थे। पर गामा विजयी हुए। उन्हें इनाम स्वरूप जो गदा मिली, उसे उन्होंने रीवां महाराज के चरणों में ले जाकर रख दिया। विभाजन के बाद गामा पाकिस्तान चले गए थे।

आज यानी 22 मई गामा की पुण्यतिथि है। गामा अपने जीवनकाल में ही संज्ञा से विशेषण बन चुके थे। हमारे  बचपन में भी गांव में लोगबाग किसी की ताकत पर जब सवाल उठाते थे तो कह देते थे,‘‘तुम गामा पहलवान हो क्या ?’’


और अंत में

कोरोना महामारी ने हमारे देश के शासनतंत्र को और अधिक कार्यकुशल बनाने की जरुरत एक बार फिर रेखांकित कर दी है। जब विकसित देश का तंत्र इस समस्या से सफलतापूर्वक निपटने में नाकामयाब रहा है तो हमारा देश तो अब भी विकासशील ही है।

पर हमारे यहां के शासनतंत्र को और अधिक भ्रष्टाचारमुक्त और कार्यकुशल बनाने की गुंजाइश लगातार बनी हुई है। यदि शासनतंत्र बेहतर रहेगा तो अगली किसी विपत्ति का हम बेहतर ढंग से मुकाबला कर पाएंगे।   

......................................

22 मई, 20 के ‘प्रभात खबर’,पटना में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से।

शनिवार, 16 मई 2020

राष्ट्रीय प्रवासी मजदूर नीति निर्धारित करने की सख्त जरूरत

सुरेंद्र किशोर


राष्ट्रीय स्तर पर प्रवासी मजदूर कल्याण नीति निर्धारित करने की जरुरत महसूस की जाती रही है। कोरोना महामारी ने इसकी जरूरत बढ़ा दी है। केंद्र सरकार को इस दिशा में जल्द ठोस कदम उठाना चाहिए। इस बार प्रवासी मजदूरों को अपार कष्ट का सामना करना पड़ रहा है।

लाॅकडाउन के बाद से ही उनकी परेशानियां शुरू हो गईं। जब उन्होंने घर लौटने की कोशिश की तो रास्ते में उन्हें अपार कष्ट हुआ और हो रहा है। संकट में न तो उनके नियोक्ता काम आए और न ही वे राज्य सरकारें जहां वे काम करने गए थे। परदेश में मजदूरों को उनकी तकदीर के हवाले कर दिया गया। अपवादों की बात और है।

मजदूरों ने अपने घरों से सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर आपके काम-धंधे चमकाने में मदद की। उनसे नियोजकों ने मुनाफा कमाया और राज्य सरकारों ने राजस्व। उनके बिना आपका आगे भी काम चलने वाला नहीं। फिर भी संकट में उनपर किसी ने जरूरत के अनुसार खर्च नहीं किया। किसी संकट की स्थिति में नियोक्ता व सरकारें प्रवासी मजदूरों को मदद करने को बाध्य हों, ऐसा नियम-कानून बनाया जाना चाहिए।

यदि इस संबंध में आज कोई कारगर नीति, नियम और कानून होते तो नियोजकगण ऐसी विपत्ति में मजदूरों की देखभाल करने को मजबूर होते। लौटने वाले लाखों मजदूरों में से बड़ी संख्या में ऐसे मजदूर भी हैं जिनकी मानसिकता कष्ट के बाद बदली हुई लग रही है। वे कह रहे हैं कि दुबारा दूसरे प्रांतों में हम नहीं जाएंगे। पर संभव है कि बाद में उनमें से कुछ लोग अपने विचार बदल लें। दुबारा जाएं।

यदि इस बीच कोई नीति निर्धारित नहीं होगी तो आशंका है कि दुबारा कोरोना जैसी विपत्ति आई तो उनका फिर वही हाल होगा। वैसे फिलहाल बिहार लौटे प्रवासी मजदूरों की बिहार सरकार भरसक देखभाल कर रही है।
..............................................

अब याद आ रहीं बुजुर्गों की बातें

कुछ ही दशक पहले सामूहिक परिवारों में हमारे बुजुर्ग हमें स्वास्थ्य संबंधी कई बातों के लिए हमें सावधान किया करते थे। एकल परिवार के दौर में हमें ऐसी बातें भला अब कौन बताए! कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि में वहीं बातें हमें फिर सुनने को मिल रही हैं। हम अब उसका भरसक पालन भी करने को बाध्य हैं।

परंपरागत विवेक के आधार पर हमारे बुजुर्ग बताते थे कि ‘एक बार पहना हुआ कपड़ा धोए बिना फिर मत पहनो।’ यह परंपरागत विवेक उन्हें हमारे प्राचीन ग्रंथों से मिला था। 

कभी हमें यह बताया जाता था कि 
  • ‘बाल कटाने और श्मशान से लौटने के बाद स्नान जरुर करो।’ 
  • ‘पूजा के समय का कपड़ा अलग हो।’ 
  • ‘घर से बाहर जाने पर अलग कपड़ा पहनो।’
  • ‘सोने के समय का कपड़ा अलग होना चाहिए।’
  • ‘भोजन करने से पहले हाथ,पैर और मुंह धो लो।’
  • ‘गीला कपड़ा मत पहनो।’


कई बातों को लेकर चर्चित रही पुस्तक ‘मनुस्मृति’ में लिखा गया है कि ‘अकारण कान, आंख या नाक मत छुओ।’ बुजुर्ग यह भी बताते थे कि स्नान के बाद ऐसे कपड़े से देह मत पोछो जिसका इस्तेमाल किसी अन्य ने किया है। दूसरे का पहना कपड़ा मत पहनो। आदि आदि......।

अच्छा है कि कोरोना महामारी के दौर में हमें वही सब बातें आधुनिक चिकित्सक भी बता रहे हैं।

.................................................

सुदृढ सुरक्षा बल जरूरी


देश की भीतरी-बाहरी सुरक्षा के लिए सेना-पुलिस की सुदृढता अत्यंत जरूरी है। यह अच्छी बात है कि भारत सरकार इस जरुरत के प्रति जागरूक है। गृह मंत्री अमितशाह ने गत अक्तूबर में कहा था कि सरकार पुलिसकर्मियों के लिए अच्छा माहौल सुनिश्चित करेगी। पुलिसकर्मियों की स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी चिंताओं को दूर किया जाएगा।

उन्होंने कहा था कि एक लाख नागरिकों पर न्यूनत्तम 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए। पर अभी इस देश में सिर्फ 144 हैं। इसलिए उनके काम के घंटे अधिक हैं। उम्मीद है कि गृह मंत्री ने अक्तूबर के बाद इस स्थिति में सुधार की दिशा में जरूर कदम उठाया होगा।

इस बीच जिस तरह देश भर के पुलिसकर्मी कोराना महामारी के बीच कठिन परिस्थितियों में अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं, उसे भी ध्यान में रखना चाहिए। इस बीच आम नागरिकों को तीन साल के लिए सेना में शामिल करने के प्रस्ताव पर केंद्र सरकार विचार कर रही है। थल सेना में सुधार के लिए ऐसा किया जा रहा है। बाहर-भीतर के देश विरोधी तत्वों से मुकाबले के लिए यह सब जरूरी है।  

   .......................

और अंत में 


लाॅकडाउन के शुरुआती दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जो जहां हैं, वे वहीं रहें। पर तरह-तरह के राजनीतिक-गैर राजनीतिक दबावों के बाद वह निर्णय उन्हें बदलना पड़ा। प्रवासियों की वापसी के बाद कोरोना के मामले बढ़े। यानी पिछला फैसला बदलना सही साबित नहीं हुआ।

राष्ट्रीय स्तर पर प्रवासी मजदूर कल्याण नीति या कानून की गैरमौजूदगी के कारण प्रवासी मजदूरों को अपने कार्यस्थलों पर रोके रखना संभव नहीं हुआ। इस संबंध में कोई नियम-कानून होता तो संबंधित राज्य सरकार और नियोक्तागण मिलकर प्रवासी मजदूरों का वहीं ठीक से देखभाल करते।यदि आप लाखों की संख्या में मजदूर अपने यहां बुलाते हैं तो किसी विपत्ति की स्थिति में उनकी देखभाल का भी इंतजाम कीजिए। 

 --------------

कानोंकान, प्रभात खबर, पटना, 15 मई, 2020

शनिवार, 2 मई 2020

मजदूरों का पलायन रुकेगा यदि देश का समरूप विकास हो

कोरोना महामारी के समय एक बात फिर खुल कर सामने आई है। वह यह कि कितनी बड़ी संख्या में बिहार के मजदूरों को हर साल दूसरे राज्यों में रोजी-रोटी के लिए जाना पड़ता है! अपुष्ट आकलन 30 लाख मजदूरों का है।

आजादी के बाद यदि देश का समरूप विकास हुआ होता तो शायद बिहार से मजदूरों का असामान्य पलायन हर साल नहीं होता। आजादी के बाद के वर्षों में विकास की असमान नीति के कारण कुछ राज्य उन्नत तो हुए। पर, बिहार जैसे कुछ राज्य पिछड़ गए।

बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान को तो ‘बीमारू’ राज्य कहा गया। बेहतर जीवन के लिए किसी अन्य देश या प्रदेश में किसी का जाना चिंता की बात नहीं। पर, बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए घर-द्वार-परिवार से लाखों लोगों को कोसों दूर जाना पड़े तो यह स्थिति जरूर चिंताजनक हो जाती है। उस चिंता को कोरोना जैसी विपत्ति कई गुणा बढ़ा देती है। कोई नहीं कह सकता कि यह आखिरी विपत्ति है।

..............................
अविभाजित बिहार में इसलिए बसा टाटा नगर 
.................................... 

आजादी से पहले अविभाजित बिहार के खनिज बहुल हिस्से में जमशेदजी नौसरवान जी टाटा ने उन्नीसवीं सदी में बड़ा उद्योग लगाया। उस जगह का नाम पड़ा जमशेदपुर। खनिज पदार्थों के मामले में देश संपन्न राज्य होने के कारण टाटा को गुजरात से बिहार आना पड़ा था।

रेल भाड़ा को लेकर यदि पहले की स्थिति बनी रहती तो आज भी क्या होता! जमशेदपुर की तरह अन्य अनेक बड़े आद्योगिक केंद्र बनते। लोगों को रोजगार मिलते। इस राज्य का पिछड़ापन कम होता। पर, पचास के दशक में केंद्र सरकार ने बिहार से वह बढ़त छीन ली। रेल भाड़ा समानीकरण नीति, 1952 ने अविभाजित बिहार की आर्थिक प्रगति रोक दी।

पंजाब की तरह यहां खेती का विकास हुआ होता तो एक हद तक क्षतिपूर्ति होती। पर वह भी नहीं होने दिया गया। कोसी और गंडक सिंचाई योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गईं।

रेल भाड़ा समानीकरण नीति के तहत खनिज पदार्थों की ढुलाई का रेल भाड़ा पूरे देश के लिए एक समान कर दिया गया था। नियम बना कि धनबाद से सौ टन कोयला रांची पहुंचाने का जितना रेल भाड़ा लगेगा, उतना ही रेल भाड़ा उसे मद्रास या बंबई पहुंचाने में लगेगा। फिर बंबई का कोई उद्योगपति बंदरगाह के पास का इलाका छोड़कर बिहार में उद्योग क्यों लगाता?

इस नीति का जब भारी विरोध हुआ तो नब्बे के दशक में केंद्र सरकार ने इसे समाप्त किया। पर एक अनुमान के अनुसार उस नीति से अविभाजित बिहार को इस बीच 10 लाख करोड़ रुपए का नुकसान पहुंच चुका था। उसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी। विशेष राज्य के दर्जे की मांग उसी क्षतिपूर्ति के लिए होती रही है। नतीजतन बिहार से मजदूरों का पलायन अवश्यंवी हो गया।

................................
अब नहीं होगी खेती के लिए मजदूरों की कमी
.......................................

बाहर से आए और आ रहे मजदूरों में से अनेक लोग अब बिहार में ही रहकर कुछ काम -धंधा करना चाहते हैं। यदि ऐसा हुआ तो खेती के लिए मजदूरों की अब पहले जैसी कमी नहीं रहेगी। पर, इसके साथ ऐसे उपाय भी किए जा सकते हैं जिनसे मजदूर और किसान दोनों पहले की अपेक्षा बेहतर स्थिति में रहें। 

एक उपाय तुरंत दिखाई पड़ रहा है। यदि मनरेगा मजदूरों को किसानों की खेती से जोड़ दिया जाए तो दोनों फायदे में रहेंगे। किसान के खेत में काम के लिए मजदूरों को मनरेगा फंड से भी यदि अलग से कुछ पैसे मिलने लगे तो खेती के काम तेजी से आगे बढ़ेंगे।

तब मनरेगा का बजट भी थोड़ा कम हो जाएगा और किसानों को भी कम मजदूरी देनी पड़ेगी।इसके बावजूद दोनों को मिलाकर पहले की अपेक्षा मजदूरों को अधिक मजदूरी मिलेगी। इन दिनों खेती में लागत अधिक और आय कम है। नतीजतन कई किसान अपनी कुछ ही जमीन पर खेती  कर पा रहे हैं। यदि मजदूरी कम देने पड़ें तो किसान जमीन परती नहीं छोड़ेगा। 

..............   
 भूली-बिसरी याद
..............

आज मधु लिमये का जन्म दिन है। इस अवसर पर उनके बारे में कुछ बातें! वे बिहार से बारी -बारी से चार बार लोकसभा सदस्य चुने गए थे। उनके बारे में बिहार के अनेक लोग कई बातें तो पहले से ही जानते हैं। पर, कुछ जिज्ञासु लोग एक सवाल अक्सर करते हैं। वह यह कि सन 1977 में मधु लिमये मोरारजी देसाई मंत्रिमंडल में शामिल क्यों नहीं हुए? क्या मोरारजी ने उनके नाम पर एतराज किया था ?

इस सवाल का जवाब दिया था उनकी पत्नी चंपा लिमये ने। चंपा जी के अनुसार, ‘‘मोरारजी देसाई ने मधु जी से कहा था कि ‘तुम, जार्ज और मधु दंडवते में से दो लोग मुझे चाहिए अपने मंत्रिमंडल में। पर मधु लिमये ने मोरारजी से कहा कि आप जार्ज फर्नांडिस और मधु दंडवते को  मंत्रिमंडल में शामिल कर लीजिए।’ वे शामिल हुए भी।

लिमये ने इसका यह कारण बताया था, ‘‘ जार्ज पर बड़ौदा डायनामाइट केस चल रहा है। एक मानी में वह केस उस पर टंगी हुई तलवार है। और बाहर रह कर वह रेल हड़ताल आदि कामों से जनता सरकार को परेशानी में डाल देगा। इसलिए जार्ज को मंत्रिमंडल में शामिल करके उसे रचनात्मक काम करने देना चाहिए।’’

..................
और अंत में
..................

जानकार सूत्रों के अनुसार बिहार सहित देश के 17 राज्यों में केंद्रीय सचिवालय की शाखाएं खुलेंगी। इस पर केंद्र सरकार ने प्रारंभिक काम भी शुरू कर दिया है। राज्य मुख्यालयों में स्थित केंद्र सरकार के सारे कार्यालय एक जगह रहेंगे। उसके लिए 140 एकड़ जमीन की जरूरत पड़ेगी।

.................................................

(1 मई 2020 के प्रभात खबर, पटना में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक काॅलम ‘कानोंकान’ से।)

  



सोमवार, 16 सितंबर 2019

ट्रैफिक की तरह ही भ्रष्टाचार के खिलाफ भी सजा में बढ़ोत्तरी जरुरी


यातायात नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने की रकम में भारी वृद्धि की जरुरत महसूस की गई थी।
नतीजतन जुर्माना बढ़ाया गया। काफी बढ़ा दिया गया। सरकार को लगा कि कम बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। इस कदम का आम तौर पर स्वागत ही हुआ है। उसी तरह भ्रष्टाचारियों के लिए भी सजा में बढ़ोत्तरी जरुरी मानी जा रही है। ट्रैफिक नियम भंग पर जुर्माने में हाल की बढ़ोत्तरी से पहले वाले जुर्माने का कोई असर नहीं हो रहा था। 2016 में देशभर में सड़क दर्घटनाओं में करीब डेढ़ लाख लोग मरे। उसी अवधि में बिहार में करीब 5 हजार लोगों की जानें गईं। 

याद रहे कि इस देश में भ्रष्टाचार के आरोप में दोषियों के लिए सामान्यतः तीन से सात साल तक की कैद की सजा का अभी प्रावधान है। वह सजा बुरी तरह नाकाफी साबित हो रही है। पर, चीन में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप साबित हो जाने के बाद फांसी तक की सजा का प्रावधान है।

हर साल डेढ़ लाख लोगों की जान जाने पर तो यातायात उल्लंघन के मामले में यहां सजा बढ़ा दी गई। पर, सवाल है कि भ्रष्टाचार के कारण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हर साल कितने लोगों की जानें जाती हैं ? निश्चित तौर पर डेढ़ लाख से काफी अधिक लोगों की जानें जाती हैं।

नकली और मिलावटी दवाओं के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जानें जाती हैं। मिलावटी खाद्य व भोज्य पदार्थ और भी अधिक लोगों की जानें लेते हैं। भ्रष्टाचार के कारण मौतों के और भी उदाहरण हैं। संबंधित सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतने बडे़ पैमाने पर नकली सामान तैयार हो ही नहीं सकते जितने अपने देश में तैयार होते हैं।

इस देश में अब कितने ऐसे सरकारी दफ्तर बचे हैं जहां बिना रिश्वत के लोगों के काम हो जाते हैं? यदि भ्रष्टाचारियों के लिए सजा बढ़ा दी जाए तो उसका सकारात्मक असर यातायात पर भी पड़ेगा।




आर्यभट्ट का भव्य स्मारक 





भारत के प्रथम उपग्रह का नाम आर्यभट्ट था, जो 19 अप्रैल, 1975 को अंतरिक्ष में छोड़ा गया था। चंद्रमा पर उपस्थित एक बड़ी दरार का नाम आर्यभट्ट रखा गया है। 1976 में यूनेस्को ने आर्यभट्ट की 1500 वीं जयंती मनाई थी। प्राचीन पाटलिपुत्र के वैज्ञाानिक आर्यभट्ट ने जो खोज की, उसने धरती से चांद तक की यात्रा में बड़ी मदद की। यानी मिशन मून का पटना से 1500 साल पुराना रिश्ता है।

इधर आर्यभट् के जन्मस्थान और शोधस्थल पर उनका स्मारक बनाने के लिए भी बिहार सरकार सचेष्ट रही है। ताजा खबर है कि पटना के उपनगर खगौल में आर्यभट्ट का भव्य स्मारक बनाने का प्रस्ताव है। आर्यभट्ट का जन्म पटना में ही हुआ था। पटना का तब नाम कुछ और था। संभवतः खगौल के मोतीचौक पर आर्यभट्ट की एक मूर्ति लगेगी।

एक सामाजिक कार्यकर्ता के अनुसार खगौल को आसपास के मुख्य मार्गों से जोड़ा जाना है।आसपास के इलाकों को विकसित किया जाना है। इसके लिए खगौल और एन.एच.-98 के बीच की सड़क के चौड़ीकरण का प्रस्ताव है। यह सड़क अभी पतली है जो नवरतनपुर और कोरजी होते हुए चकमुसा के पास एन.एच.-98 से मिलती है। आर्यभट्ट की प्रतिष्ठा के अनुरुप किसी स्मारक की लंबे समय से जरुरत महसूस की जाती रही है। 



 बहाल हों ऊर्जा बचत सेवक





यह आम दृश्य है ! सरकारी कार्यालय खाली है, किन्तु बत्तियां जल रही हैं और पंखे चल रहे हैं।
जो सरकारी सेवक सबसे अंत में कार्यालय से निकला, उसका कर्तव्य था कि वह बत्ती -पंखा बंद कर देता। पर, अधिकतर सेवक ऐसा नहीं करते। नतीजतन बिहार में मंत्रियों, अफसरों और कर्मचारियों की सुविधा के लिए चलने वाले बत्ती, पंखे, एसी और बिजली के अन्य उपकरणों पर हर साल 12 सौ करोड़ रुपए खर्च होते हैं। इसे कम करके छह सौ करोड़ रुपए आसानी से किया जा सकता है। पर यह काम भला कौन करेगा ?

इसलिए क्यों नहीं हर सरकारी बिल्डिंग के लिए ‘ऊर्जा बचत कर्मचारी’ की बहाली हो। उसका काम सिर्फ यही हो कि वह घूम -घूम कर यह देखता रहे कि कहां के कमरे -हाॅल में अकारण बिजली का उपयोग हो रहा है।  


और अंत में



राघव बाबा ! संभवतः यही नाम था उनका। वे 1957 में उत्तर प्रदेश के एक विधानसभा चुनाव क्षेत्र में खड़े हो गए। निर्दलीय उम्मीदवार थे। पराजय के बाद उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उनको मतदाताओं पर गुस्सा आया। फिर तो उन्होंने एक अनोखा काम किया। न भूतो ,न भविष्यति!
वैसा काम उससे पहले या बाद में किसी ने नहीं किया। राघव बाबा ने कुछ बच्चों को जुटाया।
एक रिक्शे पर लाउड स्पीकर रखवाया। बच्चों का जुलूस निकला। आगे- आगे राघव बाबा। वे माइक पर खुद नारा लगाने लगे। ‘राघव बाबा जिंदावाद !’ ‘इस क्षेत्र की जनता मुर्दाबाद !!’

राघव बाबा का यह नारा बच्चे दुहराते जाते थे। सड़क के किनारे खड़े दर्शकों का खूब मनोरंजन हुआ। राजनीतिक हलकों में दशकों तक इस रोचक घटना की चर्चा रही। हालांकि आज के पराजित लोग भी अपनी या अपने मनपसंद दल की हार की खीझ कुछ दूसरे तरीकों से निकालते रहते हैं।

(13 सितंबर 2019--कानोंकान-प्रभात खबर-बिहार-से)

शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

एंटोनी समिति की रपट में मौजूद है कांग्रेस के पुनरुद्धार का मंत्र


लोकतंत्र की मजबूती के लिए कांग्रेस यानी मुख्य प्रतिपक्ष का पुनरुद्धार जरूरी है। पर, उसके पुनरुद्धार के लिए यह आवश्यक है कि कांग्रेस अपनी चुनावी दुर्दशा का असली कारण समझे। उसे स्वीकार करे और तत्संबंधी सुधार का प्रयास भी करे।

नब्बे के दशक में समाजवादी नेता मधुलिमये ने भी कहा था कि देश को चलाने के लिए कांग्रेस में सुधार जरूरी है क्योंकि कांग्रेस ही देशव्यापी पार्टी है।

खैर, अभी तो देश को चलाने का भार जनता राजग व नरेंद्र मोदी को सौंप कर निश्चिंत हो गई है। पर एक जिम्मेवार प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने के लिए भी जरूरी है कि कांग्रेस आत्मचिंतन करे। खुद को मजबूत बनाने का वह वास्तविक प्रयास करे।

सिर्फ इस बात की प्रतीक्षा न करे कि मोदी सरकार की छवि जब धूमिल होगी तो जनता खुद ही कांग्रेस को एक बार फिर सत्ता में पहुंचा देगी। ऐसे में कांग्रेस को धोखा हो सकता है। क्योंकि मोदी सरकार की कार्यशैली कुछ अलग ढंग की हैै। इसलिए कांग्रेस खुद भी कुछ उपाय करे।इसके लिए यह जरूरी है कि वह चेहरे के बदले आईना साफ करने में समय बर्बाद न करे। मर्ज सिर में है तो सिर के बदले पैर के इलाज में समय नष्ट न करे।

राहुल गांधी ने अपने इस्तीफे में जो बातें लिखी हैं, वे सब ‘राजनीतिक’ बातें ही हैं। राजनीतिक हलकों में यही माना जा रहा है। कांग्रेस की विफलता के असली कारण 2014 में ही ए.के. एंटोनी समिति ने बता दिए थे। एंटोनी की वह बात आज भी लागू है। उन कारणों का निदान जरूरी है।

2014 के लोकसभा चुनाव में भारी पराजय के बाद पूर्व रक्षामंत्री एंटोनी से कांग्रेस हाईकमान ने कहा था कि वह हार के कारणों का पता लगाएं। एंटोनी ने अपनी रपट में साफ -साफ कह दिया था कि 2014 के लोकसभा चुनाव में हमारी हार इसलिए हुई क्योंकि लोगों में यह धारणा बनी कि कांग्रेस धार्मिक अल्पसंख्यकों के पक्ष में पूर्वाग्रस्त है। इसलिए बहुमत मतदाताओं का झुकाव भाजपा की ओर हुआ।

एंटोनी के अनुसार भ्रष्टाचार, मुद्रास्फीति और दल में अनुशासनहीनता हार के अन्य कारण थे। पर 2014 के बाद कांग्रेस ने एंटोनी समिति की रपट पर कोई ध्यान ही नहीं दिया। बल्कि उसी गलत दिशा में कांग्रेस आगे बढ़ती चली गई। नतीजा सामने है।



राहुल गांधी को धन्यवाद !

इस देश में पदलोलुप नेताओं की अपार भीड़ है। वैसे में राहुल गांधी धन्यवाद के पात्र हैं। पद पर बने रहने के तमाम आग्रहों के बावजूद उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष जैसा महत्वपूर्ण पद अंततः छोड़ ही दिया। 


कैसे बंद हो गवाहों पर दबाव


आदतन अपराधी खास कर बड़े अपराधी यानी माफिया अक्सर अपने खिलाफ जारी मुकदमों के गवाहों को पटा लेते हैं। या, डरा- धमका कर गवाही बदलवा देते हैं। इस तरह वे सजा से बच जाते हैं। फिर वे अगले अपराध कार्य में लग जाते हैं। अपराध बढ़ने का यह एक बड़ा कारण है।

कई बार तो ऐसा होता है कि एक ही अपराधी अनेक मामलों में बारी -बारी से गवाहों को डरा-धमका कर सजा से बच जाते हैं।

गवाह के पलट जाने के कारण कोई आरोपित यदि लगातार दो से अधिक बार सजा से बच जाता है तो तीसरी बार उसके मामले में एक खास उपाय किया जाना चाहिए। उसके खिलाफ गवाह की गवाही पुलिस के साथ—साथ न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-164 के तहत भी दिलवा दी जानी चाहिए।

वैसी स्थिति में पलटी मारने पर गवाह पर मुकदमा भी हो सकता है। उससे गवाह डरेंगे। सामान्यतः अपनी गवाही नहीं बदलेंगे। यदि आरोपित कोई बड़ा अपराधी हो तो गवाह को सुरक्षा देने का पोख्ता प्रबंध भी शासन करे। सुप्रीम कोर्ट ऐसा आदेश कई बार दे चुका है। साथ ही ऐसे मामलों की सुनवाई जल्द से जल्द पूरी हो। ऐसे उपाय करने से अपराध घटेंगे।

भूली बिसरी याद


कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष दामोदरन संजीवैया ने इंदौर में 1963 में कहा था कि ‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे।’ गुस्से में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा था कि ‘झोपडि़यों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’

इधर संजीवैया के बारे में पढ़ रहा था।यह जानकर आश्चर्य हुआ कि सिर्फ 51 साल की आयु में ही 1972 में उनका निधन हो गया था। पर उससे पहले वे अपनी प्रतिभा और नेकनीयती  के बल पर बड़े -बड़े पदों पर रहे।

पेशे से वकील संजीवैया अनुसूचित जाति से आते थे। वे 1950 में अस्थायी संसद के सदस्य बनाए गए। 1952 में मद्रास मंत्रिमंडल के सदस्य बने। वहां बाद के मंत्रिमंडलों में भी रहे। आंध्र के मुख्य मंत्री भी बने। दलित समुदाय से आने वाले किसी राज्य के वे पहले मुख्य मंत्री थे। 

संजीवैया कांग्रेस अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्रिमंडल के भी सदस्य रहे। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वे पार्टी में नई जान फूंकना चाहते थे,पर इस बीच उनका निधन हो गया। 

और अंत में



बिहार विधान मंडल के प्रतिपक्षी दलों के विधायकों ने विरोधस्वरूप आम और आम के पौधे लौटा दिए। राज्य सरकार उन्हें उपहारस्वरूप दे रही थी। आम लौटाकर तो अच्छा किया। पर आम के पौधे ले लिए होते तो यह माना जाता कि हमारे विधायकगण पर्यावरण संरक्षण की चिंता करते हैं। 

(5 जुलाई, 2019 के प्रभात खबर-बिहार -में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान में )

बुधवार, 3 जुलाई 2019

धावा दलों के अलावा रिश्वतखोरों के खिलाफ स्टिंग आपरेशन भी जरूरी


मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डी.जी.पी गुप्तेश्वर पांडेय पुलिस तंत्र को चुस्त करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। बार -बार उच्चस्तरीय बैठकें हो रही हैं। पर इन बैठकों का फील्ड अफसरों पर कम ही असर हो रहा है।

सरकारी योजनाओं की प्रगति और कर्मियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए सरकारी धावा दल भी सक्रिय हैं। कर्मी घूस लेते पकड़े भी जा रहे हैं। पर भ्रष्टाचार है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है।

अपने मुख्यमंत्रित्व काल के प्रारंभिक दिनों में नीतीश कुमार ने लोगों से अपील की थी कि वे उन भ्रष्ट सरकारी कर्मियों का स्टिंग आपरेशन करें जिन पर घूस लेने का अक्सर आरोप लगता है। बिहार प्रशासनिक सेवा संघ ने इसका सार्वजनिक रूप से विरोध कर दिया। तर्क था कि इससे प्रशासन में पस्तहिम्मती आएगी।

पर सवाल है कि तब से अब तक प्रशासनिक सेवा संगठनों ने अपने बीच व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए क्या किया ? दूसरी ओर सरकारी दफ्तरों की इस मामले में हालत बिगड़ती ही जा रही है। कुछ अन्य उपाय भी करने होंगे। दरअसल धावा दल के साथ -साथ शासन को चाहिए कि वह स्टिंग आपरेशन भी कराए। यह काम प्रामाणिक एजेंसियों को  सौंपा जा सकता है। या कोई स्वयं करता है तो सरकार उसे अच्छा -खासा इनाम देकर प्रोत्साहित करे।

सूचना देने वालों को इनाम

आज भी आयकर महकमा उन लोगों को भारी इनाम देता है जो कर वंचकों के बारे में जानकारियां देते हैं। सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के शासनकाल में काला धन के बारे में सूचना देने वालों के लिए इनाम देने का प्रावधान था।

सही सूचना देने पर एक बार चंद्रशेखर, जो बाद में प्रधानमंत्री बने, को भी सरकार ने इनाम दिया था। बिहार में कुछ सरकारी कर्मियों के बारे में यह कहा जाता है कि वे आॅफिस आने के लिए वेतन लेते हैं और काम करने के लिए नजराना और शुकराना।

ऐसे ‘नजराना-शुकराना’ वालों के खिलाफ शासन को सूचना मुहैया कराए या फिर स्टिंग आपरेशन का सबूत कोई दे तो राज्य सरकार को चाहिए कि वह उन्हें इनाम दे। अब तो स्मार्ट फोन अनेक हाथों में रहता है। इसलिए स्टिंग को काम आसान है।

माप-तौल महकमे की निष्क्रियता  

कम माप- तौल की शिकायत पुरानी है। व्यापक है। पर उस अनुपात में प्रशासनिक इंतजाम नहीं है। चूंकि उपभोक्ता तराजू लेकर तो खरीददारी करने जाता नहीं, इसलिए उसका फायदा मुनाफाखोर खूब उठाते रहते हैं।

जिस तरह कुछ महकमों के कामकाज की पड़ताल के लिए बिहार सरकार ने धावा दलों से काम लेना शुरू किया है, उसी तरह कम माप -तौल के मामले में भी उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा होनी ही चाहिए। कई साल हुए। मैंने पटना के न्यू मार्केट से दो किलोग्राम लीची खरीदी। घर आकर तौला तो डेढ़ किलोग्राम ही निकली।

समझदार राहुल गांधी !

कौन कहता है कि राहुल गांधी कभी समझदार नेता नहीं बन सकते !
कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने का राहुल गांधी का निर्णय अत्यंत समझदारी भरा है।

दरअसल वे समझ गए हैं कि जब तक नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी आमने-सामने रहेंगे, तब तक मोदी की बल्ले -बल्ले ही रहेगी। कांग्रेस इसी तरह दुबली होती जाएगी। नतीजतन कांग्रेस के भले के लिए ही राहुल गांधी ने अपना इस्तीफा वापस न लेने का अंतिम निर्णय कर लिया है।

भूली बिसरी याद

आपातकाल में जेपी की गिरफ्तारी का विवरण चंद्रशेखर के शब्दों में --
‘साढ़े तीन बजे भोर में हमारे पास अचानक फोन आया कि जेपी को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंच गई है। हमलोग गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंचे।

जब हम पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में आए तो वे लोग जेपी को अंदर ले गए। मैं साथ जा रहा था तो एक दारोगा ने मुझे रोक दिया। मैं बाहर खड़ा था। उसी समय कोई डी.एस.पी. या डिप्टी कमीश्नर आया। उन्होंने वहां स्थानीय एस.पी. के कान में कुछ कहा। उन्होंने मुझे कहा कि आपसे अलग से बात करना चाहते हैं।

बाहर जाकर उन्होंने कहा कि जेपी के लिए गाड़ी आ गई है। मेरी हिम्मत नहीं होती यह कहने की। आप उनसे कहिए। आपको तो दूसरी जगह जाना है। मैं समझ नहीं पाया। पूछा, क्या मुझ पर भी वारंट है ? उसने कहा, हां, पुलिस आपके घर गई थी।

उसी समय यू.एन.आई. के संवाददाता अरूण कुमार भी आ गए। जेपी से मैंने कहा कि आप तो जाइए आपकी गाड़ी आ गई है। मुझे दूसरी जगह जाना है। उन्होंने पूछा, आप भी गिरफ्तार हैं ? मैंने कहा, हां, तभी उन्होंने थाने से निकलते हुए कहा, ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि।’

और अंत में

भारतीय महिलाएं औसतन रोज छह घंटे घर के काम करती हैं। यह चीन की महिलाओं से 40 प्रतिशत अधिक है।

(28 जून 2019 को प्रभात खबर-बिहार- में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक काॅलम कानोंकान से)


बुधवार, 26 जून 2019

प्रस्तावित स्मार्ट सिटी में अधिकाधिक पार्किंग - स्मार्ट शौचालय की अपेक्षा


पटना के बकरी बाजार-कबाड़ी बाजार में स्मार्ट सिटी के तहत स्मार्ट मार्केट बनाने का प्रस्ताव है। जीपीओ गोलंबर के पास के इस लंबे- चौड़े भूखंड से अतिक्रमण हटाने के बाद घेराबंदी कर इसे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट  के लिए चुनी गई एजेंसी को सौंप दिया जाएगा। वहां स्मार्ट संरचना के निर्माण की योजना है। उस स्थल से विस्थापित लोगों को भी वहां जगह देने का प्रस्ताव है।

स्मार्ट सिटी तो बसेगा, पर क्या उसमें स्मार्ट जनसुविधाएं भी उपलब्ध हो सकेंगी ? नगरों के मार्केट में आज सबसे बड़ी समस्या शौचालय और पार्किंग की रही है। यदि किसी मार्केट में सुविधा है भी तो अपर्याप्त। शौचालय है भी उसकी नियमित सफाई की व्यवस्था नहीं। इसलिए इस्तेमाल के लायक नहीं।

बिलकुल नए मार्केट प्लेस में इन दो सुविधाओं की नए ढंग से व्यवस्था की जा सकती है। वह अन्य के लिए नमूना बनेगा। यथा, स्मार्ट सिटी में शौचालय की साफ -सफाई करते रहने की चौबीस घंटे व्यवस्था हो। उसका खर्च उठाने के लिए मार्केट के व्यवसायियों से कुछ अलग से शुल्क लिया जा सकता है।

जिस मार्केट में पार्किंग और शौचालयों की बेहतर व्यवस्था होगी, वहां अपेक्षाकृत अधिक ग्राहक जाएंगे। बाजारों में शौचालयों को लेकर सर्वाधिक परेशानी महिलाओं को होती है। वैसे आम तौर अधिक खरीदारी महिलाएं ही तो करती हैं। 

बलि के बकरे की तलाश

लड़े सिपाही नाम हवलदार के ! यह एक बहुत पुरानी कहावत है। वह राजनीति पर भी खूब लागू होती है। यदि कोई दल चुनाव जीत जाए तो उसका श्रेय तुरंत सुप्रीमो को चला जाता है। यदि हार जाए तो उसका ठीकरा अपने कार्यकर्ताओं, मीडिया, ई.वी.एम. या फिर किसी अन्य तत्व पर फोड़ा जाता है।

हाल में कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर गुस्सा उतारते हुए कहा कि मैं उन कार्यकर्ताओं के नाम का पता लगाउंगी जिन्होंने दल के लिए काम नहीं किया। कमोवेश अन्य दलों का भी यही हाल है।

200 करोड़ पेड़ लगाने की योजना

देश में राष्ट्रीय राजमार्ग की लंबाई एक लाख किलोमीटर है। संबंधित केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि हमारी सरकार देशभर में एन.एच. के किनारे 200 करोड़ पेड़ लगाने की योजना बना रही है। उद्देश्य पर्यावरण की रक्षा और रोजगार सृजन हैं।

यह सराहनीय काम है। पर, क्या पीपल और नीम लगाने की भी कोई योजना है ? जानकार लोगों के अनुसार यदि हर पांच सौ मीटर पर पीपल का एक पेड़ लगे तो ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं रहेगी। यानी उससे पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में काफी मदद मिलेगी।

नीम भी इस मामले में बहुत ही लाभदायक होता है। पर यह देखा जाता है कि इन उपयोगी पेड़ों की जगह सरकार सजावटी-दिखावर्टी पेड़ लगाने में अधिक रुचि रखती है। उम्मीद है कि गडकरी साहब इस स्थिति को बदलेंगे।

सोशल मीडिया पर अभद्र टिप्पणियां

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करने के आरोप में हाल में पत्रकार प्रशांत कनौजिया को गिरफ्तार तक होना पड़ा था। केरल के मुख्यमंत्री के खिलाफ सोशल मीडिया पर कथित फेक खबर देने वाले अनुपम पाॅल को गिरफ्तार किया गया।

केरल के मुख्यमंत्री के खिलाफ सोशल मीडिया पर लिखने वाले 119 लोगों के खिलाफ मुकदमे किए गए हैं। मुख्यमंत्रियों के पास तो साधन होते हैं। वे आसानी से केस कर या करवा सकते हैं। पर उन लोगों का क्या जिन्होंने पिछले चुनाव -प्रचार के दौरान सोशल मीडिया पर खूब गालियां सुनी हैं। पर वे कुछ कर नहीं सके। वे सोशल मीडिया पर अपने विचार प्रकट कर रहे थे। वे अपने विचारों के लिए अपमानित हुए ।

अपमानित होने वालों में दोनों पक्षों के लोग शामिल हैं। जिन्होंने नरेंद्र मोदी का पक्ष लिया, उन्हें मोदी विरोधियों की गालियों का सामना करना पड़ा। जिन लोगों ने मोदी विरोधियों के पक्ष में लेखन किया, वे मोदी के पक्षधरों के शिकार हुए।

कुछ लोग बारी -बारी से दोनों पक्षों के निशाने पर थे। कई लोगों के  विरोध में भी शालीनता देखी गई, पर अन्य अनेक लोगों ने भारी अशिष्टता और घटियापन दिखाए। अब सामान्य लोग तो केस  कर नहीं सकते।

पर एक सवाल जरूर पैदा हो गया है। अपने विचारों के लिए किसी का इतना अपमान क्यों ? सोशल मीडिया के अराजक तत्वों से अपमानित होने से लोगों को कैसे बचाया जाए ? यह स्वाभाविक ही है कि निजी स्वार्थ के वशीभूत होकर कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर किसी खास पक्ष का प्रचार कर रहा हो।

उसे भी आप शालीन भाषा में तार्किक जवाब दे सकते हैं। यदि आप इसके बदले अपमानित करते हैं तो आपके पास तर्कों की भारी कमी है।

और अंत में 

भाजपा हाईकमान कभी -कभी इस बात से परेशान हो उठता है कि उसके कुछ बड़े नेता दलीय लाइन से उपर उठकर ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ देने लगते हैं।

पर कुछ अन्य दलों की कुछ दूसरी ही समस्या है। उनके अधिकृत प्रवक्ता भी ऐसे -ऐसे बयान देने लगते हैं जो उनके दल या सुप्रीमो के विचार और राजनीतिक लाइन से तनिक मेल ही नहीं खाते।

(14 जून, 2019 के -प्रभात खबर-बिहार- में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से )   


   


शुक्रवार, 7 जून 2019

आदतन दल—बदलुओं को बुलाना, यानी अपने कार्यकर्ताओं का हक मारना

मौसमी पक्षियों के डाल-बदल यानी दल—बदल के लिए हर चुनाव एक अच्छा मौसम होता है। चुनाव से पहले और चुनाव के बाद खूब दल—बदल होते हैं। इस बार के चुनाव से पहले भी दल बदल हुए। चुनाव के बाद भी होंगे, इसके संकेत मिल रहे हैं।

कई पराजित उम्मीदवारों के बयानों और हाव—भाव से संकेत साफ हैं। वे किसी ऐसे दल में प्रवेश करने की कोशिश में हैं जिसके बल पर वे अगले चुनाव में जीत हासिल कर सकें। लोकसभा नहीं तो विधानसभा ही सही। जो ट्रेन पहले खुल रही हो, उसी पर चढ़ जाना है!

इनमें से कुछ दल—बदलू प्रवेश भी पा जाएंगे। कुछ तो आदतन दल—बदलू हैं। होना तो यह चाहिए कि जो नेता तीन बार पहले ही दल—बदल कर चुका हो, उसे चौथी बार कोई दल स्वीकार न करे। चौथी बार स्वीकार करने का मतलब है बिच्छू की माला पहनना है।

पर कुछ दल डंक झेलने की कीमत पर भी वह माला भी समय-समय पर ग्रहण करते ही रहते हैं। इस बार भी करेंगे ही। पर, उन कार्यकर्ताओं का क्या होगा, जहां के कार्यकर्ताओं का हक मार कर आदतन दल—बदलू उस मजबूत दल के टिकट भी पा जाएंगे?

दरअसल ये आदतन दल—बदलू ताश के पत्तों की तरह हैं। कभी एक हाथ में, तो कभी दूसरे हाथ में। इससे नए लोगों का राजनीति में प्रवेश और विकास रुकता है। इस कारण भी कुछ राजनीतिक दल नदी की जगह तालाब बन गए हैं। तालाब का पानी सड़ सकता है, पर नदी का नहीं।


एंटोनी की सलाह थरूर से बेहतर

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद ए.के. एंटोनी ने हार के कुछ कारण बताए थे। उसी साल शशि थरूर ने भी कांग्रेस में नई जान फूंकने के लिए आठ सूत्री सुझाव हाईकमान तक पहुंचाए थे।

हार के कारणों को लेकर एंटोनी की बातें सच से अधिक करीब थीं। पर, कांग्रेस ने गत पांच साल में न तो एंटानी की बातों पर ध्यान दिया और न ही थरूर की बातों को कोई तवज्जो दी।

एक बार फिर थरूर सहित कुछ अन्य लोग कांग्रेस के पुनरुद्धार के लिए सलाह दे रहे हैं। जाहिर है कि उनपर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाएगा। दरअसल कांग्रेस जैसी कुछ पार्टियों के साथ दिक्कत यह है कि कोई भी सलाह उन दलों के सुप्रीमो के चाल, चरित्र, चिंतन में बदलाव की जरूरत नहीं बताती। उतनी हिम्मत है ही नहीं। पर वे भी क्या करें ? सुप्रीमो पर ही पार्टी आधारित है। उन्हें हटा दीजिएगा तो पार्टी बिखर जाएगी। यदि नहीं हटाइएगा तो धीरे -धीरे दुबली होती जाएगी।


नल-जल योजना, घर-घर की कहानी

नल जल योजना, यानी घर- घर की कहानी। इस महत्वाकांक्षी योजना के जरिए सरकार घर -घर पहुंच रही है।   इस योजना के साथ सरकार की छवि भी पहुंच रही है। इसलिए इसके बेहतर कार्यान्वयन की सख्त जरूरत है।

पर शिकायतें आ रही हैं। सोशल आडिट से गड़बडि़यों को रोका जा सकता है। मुजफ्फरपुर शेल्टर होम की सही जांच ‘टिस’ की जिस टीम ने की थी, वैसे ही कर्तव्यनिष्ठ लोगों की टीम से या उसी से नल—जल योजना की भी जांच कराने की जरूरत है।


साथ-साथ चुनाव से 60 हजार करोड़ की बचत

2019 के लोकसभा चुनाव में लगभग 60 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए। इनमें सरकारी और गैरसरकारी खर्च शामिल हैं। इसी तरह पूरे देश के विधानसभा चुनावों में अलग से इतने ही या फिर इससे भी अधिक खर्च होंगे। क्या यह जनता के धन का दुरुपयोग नहीं है?

1967 तक दोनों चुनाव एक ही साथ होते थे। इसलिए दोहरे खर्च की नौबत नहीं थी। अब भी यदि देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होने लगे तो कितने पैसे बचेंगे ?

2018 में विधि आयोग को नौ राजनीतिक दलों ने साफ—साफ बता दिया कि हम साथ-साथ चुनाव के खिलाफ हैं। क्या 60 हजार करोड़ रुपए बचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए? पर इस गरीब देश के कितने नेता इस कोशिश के लिए तैयार हैं ? यदि नहीं हैं तो उन्हें इस गरीब देश की जनता किस नाम से पुकारे ? नाम तय कर लीजिए।

सी.पी.एम. ने तो यहां तक कह दिया कि साथ-साथ चुनाव लोकतंत्र के ही खिलाफ है। क्या 1952 से 1967 तक देश में लोकतंत्र नहीं था जब साथ- साथ चुनाव होते थे ?


और अंत में

खबर है कि इस कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार ने कई बड़े महत्व के काम करने का मन बनाया है। पर वैसे कुछ कामों की राह में दिक्कत यह है कि राज्यसभा में राजग का अभी  बहुमत नहीं है। बहुमत के लिए 24 सदस्यों की कमी है।

एक आकलन के अनुसार 2022 तक राजग को बहुमत मिल जाएगा। यानी 2022 से 2025 तक की अवधि केंद्र सरकार के लिए सर्वाधिक अनुकूल होगी। 

(सात जून 2019 को प्रभात खबर -बिहार-में प्रकाशित मेरे कालम कानोंकान से )

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

भूख से अधिक भोजन के खिलाफ भी अभियान जरूरी

इन दिनों ‘चीनी छोड़ो अभियान’ की चर्चा है। पटना के बड़े चिकित्सकों के इससे जुड़ जाने से इसकी गंभीरता और भी बढ़ी है। लोगों पर इसका अच्छा असर दिख रहा है। पर एक दिक्कत आ रही है। सवाल है ंकि चीनी के बदले में हम जो गुड़ खरीदते हैं, वह कितना शुद्ध है!

कभी -कभी नकली और हानिकारक गुड़ कृत्रिम तरीके से बनाते हुए मिलावटखोर टी.वी. चैनलों पर नजर आते रहते हैं। ‘चीनी छोड़ो अभियान’ के साथ -साथ भूख से ‘कम खाओ अभियान’ की भी आज जरूरत है।
पांच साल पहले हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया भर में अति भोजन जनित मोटापा की समस्या, कुपोषण और भुखमरी की अपेक्षा अधिक बड़ी समस्या बन चुकी थी। उससे पहले बात उल्टी थी। आज तो स्थिति और भी खराब बताई जा रही है।

भारत के बारे में एक पुरानी कहावत है कि जितने लोग अति भोजन से मरते हैं, उससे कम ही लोग भोजन के अभाव में मरते हैं। मैंने खुद अपने कई परिचितों को अति भोजन का अभ्यस्त पाया। उनमें से शायद ही कोई व्यक्ति अपने शरीर की नियमित डाक्टरी या पैथोलाॅजिकल जांच कराता था। उनमें से कई व्यक्ति कम ही उम्र में  दुनिया से उठ गए।

अस्सी के दशक की बात है। न्यूयार्क टाइम्स के नई दिल्ली ब्यूरो चीफ माइकल टी. काॅफमैन पटना आए थे। उनके साथ भोजन का मौका मिला था। उन्होंने सिर्फ तली मछली के कुछ टुकड़े खाए। इधर मैंने चार रोटियों के साथ-साथ और भी बहुत कुछ खा लिया। बाद में मैंने अपने खानपान पर विचार किया। देखा कि मैं अति भोजन का आदी हो गया था। बहुत प्रयास के बाद आदत छूटी। आज यदि मैं एक रोटी से अधिक खा लूं तो असहज महसूस करता हूं। इसके बावजूद मैं बिना थके घंटांे काम करता हूं।

नियमित पैथोलाजिकल जांच कराने और अति भोजन से बचने का अभियान यदि बड़े डाॅक्टर चलाएं तो उसका अच्छा असर पड़ेगा। पर साथ-साथ राज्य सरकार कुकुरमुत्ते की तरह उग आए मानकरहित  पैथालाजिकल जांच केंद्रों पर ताले लगवाए। अच्छा है कि पटना हाईकोर्ट इस समस्या पर गंभीर है।  


अतिवादियों से दूर ही रहें नेता

अहमदाबाद विस्फोट के आरोपित तौसीफ का संबंध सिमी की बिहार शाखा का प्रधान रह चुका गुलाम सरवर से था। याद रहे कि तौसीफ को हाल में गया से गिरफ्तार किया गया। तौसीफ पर  आतंकवादी तैयार करने का आरोप है।

सिमी कैसा संगठन था, इस बात का पता एक बार फिरं देश को चला है। उसका घोषित उद्देश्य हथियारों के बल पर भारत में इस्लामिक शासन कायम करना था। जमात-ए-इस्लामी के छात्र संगठन के रूप में 1977 में सिमी का गठन अलीगढ़ में हुआ था। पर जब सिमी की अतिवादी गतिविधियों की खबर जमात-ए-इस्लामी को मिली तो उसने सिमी से अपना संबंध तोड़ लिया।

सिमी को 2001 में प्रतिबंधित किया गया। बाद में सिमी के लोगों ने मिल कर इंडियन मुजाहिद्दीन बना लिया है। इन दिनों आई.एम. किस तरह विस्फोटक कार्रवाइयां कर रहा है, यह हर जागरूक नागरिक को मालूम है। जिसे जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन से दुत्कार दिया, उसे हमारे देश के कुछ तथाकथित ‘सेक्युलर’ नेताओं ने अपना लिया।

करीब 15 साल पहले सिमी के समर्थन में कई राजनीतिक दल और उनके बड़े नेता सार्वजनिक रूप से उठ खड़े हुए थे। उनमें बिहार और उत्तर प्रदेश के चार बड़े नेता प्रमुख  थे। क्या वे नेता लोग जनता से इस बात के लिए अब माफी मांगेंगे कि सिमी को पहचानने में उनसे गलती हुई थी ? दरअसल ऐसी गलतियों के कारण ही भाजपा इस देश में मजबूत हुई है। पता नहीं माफी मांगेंगे या नहीं , पर कुछ ऐसे ‘सेक्युलरिस्ट’ नेतागण आज भी उसी तरह की गलतियां दुहरा रहे हैं।


डाॅ. स्वामी की चेतावनी

भाजपा के राज्यसभा सदस्य डाॅ. सुब्रमणियन स्वामी ने कहा है कि मैं अपनी जीवनी लिखूंगा और उसके बाद कई लोगों की प्रतिष्ठा समाप्त हो जाएगी। कौन -कौन लोग उनके दिमाग में हैं, यह तो वे ही जानते हैं। पर कुछ अनुमान जरूर लगाया जा सकता है। यानी राजनीतिक क्षेत्र के कुछ दिग्गज।

दरअसल डाॅ. स्वामी ने मनमोहन ंिसंह के शासनकाल में अनेक महाघोटालों को उजागर किया था। उन्होंने केस करके कई बड़ी हस्तियों को जेल भिजवाया। इस तरह 2014 चुनाव से पहले उन्होंने राजग के लिए राजनीतिक जमीन मजबूत की थी।

यानी 2014 की जीत में कुछ योगदान तो स्वामी का भी रहा। इसके एवज में उन्हें कैबिनेट मंे एक सीट तो मिलनी ही चाहिए थी। इसकी उम्मीद वह कर रहे थे। पर उनका दबंग व्यक्तित्व और कुछ मामलों में उनकी अतिवादी सोच के कारण वह नहीं हो सका।

उधर मोदी कैबिनेट में डाॅ. स्वामी के एक कट्टर विरोधी मजबूत स्थिति में हैं। अतः भविष्य में भी कोई चांस नहीं लगता। इस पृष्ठभूूमि में यदि डाॅ. स्वामी कोई विस्फोटक किताब लिखकर कुछ लोगों को बेनकाब करते हैं तो इसमें किसी को एतराज नहीं होना चाहिए। आम लोगों को भी यह जानने का हक है कि किस दल का कौन नेता देश की सेवा कर रहा है या कोई और धंधा। यह सब बताने की हिम्मत कम ही लोग में है। उन साहसी लोगों में डाॅ.  स्वामी भी  हंै।


बुलेट ट्रेन तो ठीक, पर आम यात्रियों की भी सुध लीजिए!

इस देश में बुलेट ट्रेन आ रही है। कुछ लोगांे को वह भी चाहिए। सरकार तो सबके लिए होती है। पर अब रेल ंत्री को चाहिए कि वह आम यात्रियों पर भी ध्यान दें। पिछली बार जब मैंने रेल यात्रा की थी तो यह अनुभव हुआ कि सेकेंड ए.सी. के शौचालय का दरवाजा टूटा हुआ है। किसी तरह काम चलाया।

अन्य समस्याएं अनेेक हैं। मोदी सरकार के आने के बाद लोगांे में उम्मीद बंधी थी। पर पता नहीं क्यों चीजें नहीं सुधर रही हैं। 

क्यों नहीं सुधर रही हैं, उस संबंध में एक खबर जवाब देगी। हजारों गैंग मैन रेलवे के बड़े अफसरों की निजी सेवा मंे हैं और उधर पटरियां असुरक्षित हैं। दुर्घटनाएं हो रही हैं। जिस महकमे में ऐसे -ऐसे अफसर हों, वहां किस तरह की उम्मीद आप कर सकते हैं? 


एक भूली बिसरी याद 

प्रधानमंत्री बनने से पहले तक लाल बहादुर शास्त्री के पास अपनी कोई निजी कार नहीं थी। याद रहे कि उससे पहले वे देश के गृहमंत्री और रेलमंत्री रह चुके थे। प्रधानमत्री बनने के बाद परिवार के सदस्यों ने उनसे कहा कि कम से कम अब तो एक अपनी कार होनी चाहिए। शास्त्री जी मान गए। उन्होंने अपना बैंक खाता चेक किया। उसमें 7 हजार रुपए थे। फिएट कार की कीमत उन दिनों 12 हजार रुपए थी। उन्होंने 5 हजार रुपए बैंक से कर्ज लिया।

कर्ज वापस करने से पहले ही शास्त्री जी का निधन हो गया। परवर्ती प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा कि इस कर्ज को हम माफ कर देना चाहते हैं। दिवंगत नेता की विधवा ललिता शास्त्री ने मना कर दिया। पेंशन के पैसे से कर्ज का भुगतान हुआ।   


और अंत में

स्वच्छ भारत अभियान का काम जहां से शुरू करना चाहिए था, वहां से नहीं हो रहा है। पहले तो देखना चाहिए कि देश के महानगरों और नगरों में जो वेतन भोगी सफाईकर्मी हैं, क्या उनकी संख्या पर्याप्त हैं ?
कार्यरत सफाई कर्मियों में से कितने कर्मी अफसरों के घरेलू नौकर बने हुए हैं और कितने सरजमीन सक्रिय हंै ? जिन सफाईकर्मियों को वेतन मिल रहे हैं, उनमें से कितने बोगस हैं और कितने असली ?
सफाई के काम के लिए ठीके पर लगाई गयी निजी एजेंसियों के साथ निकायों के अफसरों के घूसखोरी के रिश्ते की खबर में कितनी सच्चाई है ? 

(प्रभात खबर पटना में 22 सितंबर 2017 को प्रकाशित)

शनिवार, 22 जुलाई 2017

भ्रष्टाचार को क्यों बनने दिया गया लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज

महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार और पाखण्ड को लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज नहीं बनने दिया जाना चाहिए जैसा कि आज हो गया है।’ आजादी के तत्काल बाद सरकारों में जो कुछ हो रहा था, उससे महात्मा गांधी चिंतित थे। उन्होंने भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलने पर बिहार के एक कैबिनेट मंत्री को पदच्युत कर देने की सलाह दी थी। पर उनकी बात नहीं मानी गयी।

1967 के आम चुनाव में बिहार में कांग्रेस की पहली बार पराजय हुई थी। उस पराजय के लिए जिम्मेवार नेताओं में उस खास नेता के भ्रष्टाचरण का सबसे बड़ा ‘योगदान’ बताया गया।

आजादी के तत्काल बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका दिया जाना चाहिए।’ नेहरू ने इसकी जरूरत समझी होगी तभी तो कहा होगा। पर यह काम भी वह नहीं कर सके। भ्रष्ट लोग फलते-फूलते गये।

पहले भ्रष्ट लोग ‘अंडे’ से अपना काम चला लेते थे। बाद में ‘मुर्गी’ को ही मार कर खाने लगे। समय बीतने के साथ सरकारी पैसों की इतनी लूट होने लगी कि टिकाऊ संरचना बनना भी कठिन होने लगा। अब तो देश में ‘प्राक्कलन घोटाले’ का दौर है।

प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने कहा था कि ‘सत्ता के दलालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।’ राजीव ने सत्ता के दलालों का वर्चस्व देखा होगा तभी तो कहा होगा। पर दलालों के खिलाफ भी कार्रवाई नहीं हो सकी। उल्टे विडंबना यह रही कि बोफर्स दलाली के शोर के बीच ही 1989 के चुनाव में केंद्र में कांग्रेस की सरकार की पराजय हो गयी। 1991-1996 की नरसिंह राव की सरकार अल्पमत की  सरकार थी। बाद के वर्षों में कभी कांग्रेस को लोकसभा में अपना बहुमत नहीं हुआ। समय बीतने के साथ स्थिति बिगड़ती चली गयी। इसी पृष्ठभूमि में सन 2003 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह ने कह दिया था कि ‘राजनेता कैंसर हैं जिनका इलाज अब संभव नहीं।’ तब अनेक लोग लिंगदोह से असहमत थे। पर यह जरूर मानने लगे थे कि चीजें तेजी से बिगड़ रही हैं।

राज्यसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता मनमोहन सिंह ने 1998 में कहा था कि ‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है।’ उन्होंने सड़न देखी होगी तभी तो कहा होगा। पर जब श्री सिंह खुद प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उस सड़न को रोकने के लिए क्या किया ?

उल्टे उन्होंने जो कुछ किया, वह सब देश ने देखा और भोगा। 2014 के चुनाव में कांग्रेस लोकसभा में 44 सीटों पर सिमट गयी। इस देश के अधिकतर नेताओं ने प्रतिपक्ष में रहने पर तो अपने राजनीतिक विरोधियों के भ्रष्टाचार पर खूब हायतोबा मचायी। पर जब वे सत्ता में आए तो खुद बहती गंगा में हाथ धोया। अपवादों की बात और है।
अपवाद स्वरूप जो भी अच्छे नेता इस देश में बचे हुए हैं, वे या तो सत्ता के मोह में डूबे हुए हैं या फिर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ बौने साबित हो रहे हैं। सत्ता संभालते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को आश्वासन दिया था कि ‘मैं न तो खाऊंगा और न ही किसी को खाने दूंगा।’ मोदी मंत्रिमंडल के किसी सदस्य पर तो घोटाले का अब तक कोई आरोप नहीं लगा है, पर सरकार के दूसरे अंग लगभग पहले ही जैसे ‘काम’ कर रहे हैं। लगता है कि वे मोदी से भी अधिक ताकतवर हैं।

संभवतः इसीलिए तीन साल के शासनकाल के बाद भी प्रधानमंत्री को 6 अप्रैल 2017 को साहिबगंज में यह कहना पड़ा कि ‘भ्रष्टाचार और ब्लैक मनी ने दीमक की तरह चाटकर इस लोकतंत्र को बर्बाद कर दिया है। इसके खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा।’ पर सवाल है कि लोगबाग कब तक प्रतीक्षा करेंगे ?

मोदी सरकार की उपलब्धि और विफलताओं का सही आकलन तो 2019 में हो जाएगा। पर इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी याद आती है। उसने 5 अगस्त 2008 को ही कह दिया था कि ‘भगवान भी इस देश को नहीं बचा सकता है।’ इस विकट स्थिति में इस देश के नेताओं तथा अन्य क्षेत्रों के जागरूक और देशभक्त लोगों का क्या कर्तव्य बनता है ?

क्या भ्रष्ट नेताओं और अफसरों तथा इसी तरह के अन्य लोगों के खिलाफ देशहित में कठोर कार्रवाई होनी चाहिए या फिर यह तर्क दिया जाना चाहिए कि चूंकि पहले के लोगों ने इस देश को लूटा है, इसलिए हमें भी लूट लेने का जन्मसिद्ध अधिकार हासिल है?


मधु लिमये से एन.सी. सक्सेना तक के एक ही स्वर 

वैसे मधु लिमये तो 1988 में ही इस नतीजे पर पहुंच गए थे कि ‘मुल्क के शक्तिशाली लोग इस देश को बेच कर खा रहे हैं।’ सन 1998 में तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एनसी. सक्सेना ने कहा कि ‘इस देश में भ्रष्टाचार में जोखिम कम और लाभ ज्यादा है।’

याद रहे कि सक्सेना की इस टिप्पणी के बावजूद ‘जोखिम अधिक और लाभ कम’ करने वाले किन्हीं कानूनी प्रावधानों की जरूरत इस देश की सरकारें नहीं समझ पा रही हैं। इस दिशा में आधे -अधूरे मन से कहीं कुछ काम भी हुए हैं तो उसका कोई खास लाभ देश को नहीं मिल रहा है। याद रहे कि मधु लिमये ऐसे नेता थे जो न तो स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेते थे और न ही पूर्व सांसद पेंशन। अखबारों में लिखे अपने लेखों के पारिश्रमिक से ही वह जीवन यापन करते थे।


अब जरा आज के नेता को देखिए !

केंद्र सरकार प्रत्येक सांसद पर हर माह 2 लाख 70 हजार रुपए खर्च करती है। यह आंकड़ा 2015 का है। इसके बावजूद इस बुधवार को राज्यसभा में सपा के नरेंश अग्रवाल ने कहा कि मौजूदा तनख्वाह से सांसदों का काम नहीं चल रहा है। सांसदों का दबाव जारी रहा तो सरकार 2.70 लाख की राशि देर-सवेर बढ़ा ही देगी।

यह सब ऐसे देश में हो रहा है जहां के सरकारी अस्पतालों के पास सभी गंभीर मरीजों के लिए भी इलाज की व्यवस्था तक नहीं है। क्योंकि सरकारें धनाभाव से जूझ रही हंै। आए दिन यह खबर आती रहती है कि अस्पताल में मृतक मरीज के लिए शव वाहन का प्रबंध नहीं हो सका। कहीं शव दोपहिया पर ढोया जाता है तो कहीं ठेले पर।

पटना के एक बड़े सरकारी अस्पताल की ताजा खबर यह है कि अस्पताल के भीतर गंभीर मरीज को परिजन चादर पर रखकर उठा रहे हैं और एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा रहे हैं।


पटना एम्स की मारक उपेक्षा

पटना में स्थापित एम्स में भी साधन के अभाव में मरीजों का उचित इलाज नहीं हो पा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अस्सी के दशक में पटना में विद्यार्थी परिषद के नेता थे। परिषद की खबरों के हैंड आउट लेकर अखबारों के दफ्तरों का चक्कर लगाते मैंने उन्हें देखा था। यानी उनका बिहार से जो लगाव होना चाहिए था, वह नहीं है।
जबकि दिल्ली एम्स के कुल मरीजों में बिहार के मरीजों का प्रतिशत 40 है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पटना के निर्माणाधीन एम्स का निर्माण जल्द पूरा कर लिया जाना चाहिए था।

2004 में इस पटना एम्स का शिलान्यास हुआ था। अब तक 50 प्रतिशत काम भी पूरा नहीं हुआ है। दरअसल केंद्र सरकार पूरा फंड ही नहीं देती। हां,सांसदों के वेतन भत्ते के लिए उसके पास पैसों की कभी कोई कमी नहीं रहती।


लोकसभा टी.वी. और राज्यसभा टी.वी.

अब तक राज्यसभा टी.वी. और लोकसभा टी.वी. के अलग- अलग राजनीतिक स्वर रहे हैं। अब वह बात नहीं रहेगी। वैसे पहले दो स्वर होने के कारण भी रहे हैं। लोकसभा की स्पीकर पहले भाजपा की नेता थीं। राजग का बहुमत राज्यसभा में नहीं है। राज्यसभा के निवर्तमान सभापति यानी उपराष्ट्रपति कांग्रेसी पृष्ठभूमि के रहे हंै। अब उस पद को अगले उपराष्ट्रपति संभालेंगे। वह भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

अब या तो राज्यसभा टी.वी. और लोकसभा टी.वी. का विलयन हो जाएगा या फिर पिछले विरोधाभास की समाप्ति हो जाएगी।


और अंत में

  संविधान के अनुच्छेद- 212 के अनुसार ‘न्यायालयों द्वारा विधायिकाओं की कार्यवाहियों की जांच नहीं की जा सकेगी।’ जब संविधान बना था, उन दिनों सदन की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की सुविधा नहीं थी। देवताओं के बारे में राज्यसभा में एक सपा नेता के कुवचन को देखते हुए अब नयी व्यवस्था की जरूरत आ पड़ी है। या तो सदनों में उच्चारित ऐसे कुवचनों के खिलाफ अदालत में मुकदमा चलाने की संवैधानिक छूट मिले या फिर सदन की कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण यथाशीघ्र बंद हो।

 (इसका संक्षिप्त अंश 21 जुलाई 2017 के प्रभात खबर (बिहार) में प्रकाशित)

रविवार, 16 जुलाई 2017

सजायाफ्ता कर्मचारी मंजूर नहीं तो नेताओं को क्यों मिले छूट

इस देश की सरकार किसी सजायाफ्ता को चपरासी तक की नौकरी नहीं देती। पर  सजायाफ्ता नेता, प्रधानमंत्री के पद तक भी पहुंच सकता है। इस तरह की विसंगतियों को दूर करने की उम्मीद नरेंद्र मोदी सरकार से कुछ लोग कर रहे थे। पर उन्हें अब निराशा हो रही है। जब सजायाफ्ता नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक की मांग को लेकर जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी तो केंद्र सरकार ने उस पर अपनी मंशा जाहिर कर दी।

केंद्र सरकार के वकील ने कहा कि यह मामला सुनवाई के लायक ही नहीं। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने यह ठीक ही सवाल उठाया है कि ऐसे में जब सरकारी कर्मचारियों और न्यायिक पदाधिकारियों पर आजीवन पाबंदी लग जाती है तो जनप्रतिनिधियों पर क्यों नहीं लगे ? उन्होंने राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण और भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि में यह याचिका दायर की है। इस याचिका पर 19 जुलाई को  सुनवाई होगी।

गत बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को फटकारा। आयोग इस मुद्दे पर कोर्ट को यह नहीं बता रहा है कि वह आजीवन प्रतिबंध के पक्ष में है या नहीं। संभवतः आयोग इस मामले में केंद्र सरकार के रुख के अनुसार ही काम कर रहा है। राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टीकरण से ऊबे इस देश के अनेक लोग सुप्रीम कोर्ट से ही यह उम्मीद कर रहे हैं कि वह इस मामले में सरकार को सख्त निर्देश दे। अन्यथा कुछ दिनों के बाद संविधान की रक्षा करना और भी मुश्किल हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट को ही तो देखना है कि इस देश में संविधान के अनुसार काम चल रहा है या नहीं। यदि राजनीति में भ्रष्ट और अपराधी लोगों की बढ़ती संख्या की रफ्तार को तत्काल नहीं रोका गया तो विधायिकाएं भ्रष्टाचार और अपराध के आरोपियों से पूरी तरह भर जाएंगी। अभी उनकी संख्या सदन की कुल संख्या की एक तिहाई है। याद रहे कि  किसी सांसद या विधायक को कम से कम दो साल की सजा मिलने के तत्काल बाद उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है। पर सजा पूरी हो जाने के छह साल बाद वह फिर से चुनाव लड़ सकता है।



यूं हुई अच्छे कार्यकर्ताओं की कमी

जब तक इस देश में संयुक्त परिवारांे का दौर चलता रहा, अच्छी मंशा वाले राजनीतिक कार्यकर्ता विभिन्न राजनीतिक दलों को मिलते रहे। पर अब तो लघु परिवारों का जमाना है। अब भी जहां-तहां संयुक्त परिवार मौजूद हैं, पर उनकी संख्या कम होती जा रही है।

पहले संयुक्त परिवार से निकले राजनीतिक कार्यकर्ता के पत्नी और बाल-बच्चों की देखरेख संयुक्त परिवार कर देता था। यानी सच्चे राजनीतिक कार्यकर्ता बनने की इच्छा रखने वालों के लिए नौकरी करने की मजबूरी नहीं थी।

पर आज तो सबको अपने-अपने लघु परिवार का पालन-पोषण खुद ही करना है। इसलिए कोई व्यक्ति राजनीतिक कर्म में लगता भी है तो वह निजी खर्चे के लिए राजनीति या शासन से ही पैसे निकालना चाहता है। हालांकि सारे राजनीतिक कार्यकर्ता ऐसे नहीं हैं। कुछ कार्यकर्ता अब भी निःस्वार्थ भाव से राजनीति में लगे हुए हैं। पर अनेक कार्यकर्ताओं को या तो कोई ठेकेदारी चाहिए या दलाली का धंधा।

अपराध के धंधे में भी काफी पैसे हैं। राजनीति के पतन का यह बड़ा कारण है। पता नहीं इस स्थिति से देश की राजनीति को कौन बचाएगा ? मौजूदा राजनीति न  तो भ्रष्टाचार और न ही अपराध पर निर्णायक हमले की स्थिति में है। राजनीति की इन दो विपदाओं को जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक की ताकत भी बढ़ाती जा रही है।



संकट में दोस्तों की पहचान

1967 में विदेश मंत्री एम.सी. छागला ने लोकसभा में कहा था कि भारत-चीन सीमा विवाद पर सोवियत संघ अब भारत के पक्ष को समझ गया है और वह हमें ही सही मानता है। पर 1962 में चीन ने जब भारत पर हमला किया तो सोवियत संघ ने हमें मदद करने से साफ मना कर दिया था। तब वह हमारे देश का पक्ष समझने को भी तैयार नहीं था। उसने कहा था कि चीन हमारा भाई है और भारत हमारा दोस्त। यानी दोस्त के लिए कोई भाई से झगड़ा नहीं करता।

हां, तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने न चाहते हुए भी अमेरिका से मदद मांगी। चीन सीमा से इस आशंका से पीछे हट गया था कि कहीं अमेरिका हस्तक्षेप न कर दे। उससे पहले भारत अमेरिका से दोस्ताना संबंध नहीं रखना चाहता था। दूसरी ओर वह सोवियत संघ से घनिष्ठ संबंध के पक्ष में रहा।

आज भी जब हमारे  देश पर युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, तो हमें विभिन्न देशों से दोस्ती के सिलसिले में अपने हितों को ध्यान में रखना चाहिए न कि किन्हीं अन्य बातों कोे। दुनिया के अन्य सभी देश भी अपने राष्ट्रीय हितों का ही ध्यान रखते हैं। पर हमारे ही देश में ऐसी राजनीतिक शक्तियां भी हैं जो परमाणु परीक्षण करने पर   चीन की तो तारीफ करती हैं, पर वही काम जब भारत सरकार करती है तो वह उसका विरोध करती है। 



कांग्रेसी वकील क्यों नहीं दिखाते करामात  

टू जी स्पैक्ट्रम आवंटन घोटाले में जीरो लाॅस का सिद्धांत पेश करने वाले मशहूर वकील कपिल सिब्बल ने अब एक नयी ‘थ्योरी’ पेश की है। स्पैक्ट्रम की नीलामी शुरू होते ही सिब्बल की जीरो लाॅस थ्योरी तो फेल हो गयी। अब देखना है कि उनकी नयी थ्योरी पास होती है या फेल!

सिब्बल का आरोप है कि भाजपा के सत्ताधारी नेताओं के यहां आयकर और ईडी के छापे क्यों नहीं पड़ रहे हैं ? क्या वे सब के सब स्वच्छ हैं ? सिर्फ गैर राजग दलों के नेता ही दागी हैं ? कपिल साहब के सवाल में दम है। यदि जनहित याचिकाओें के मामलों में कपिल सिब्बल, डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी और प्रशांत भूषण की राह अपना लें तो उन्हें इसका रोना नहीं रोना पड़ेगा कि केंद्र सरकार एकतरफा कार्रवाई कर रही है।

डाॅ. स्वामी और प्रशांत भूषण ने मनमोहन सिंह के शासनकाल में सिर्फ कपिल सिब्बल की तरह रोना तो नहीं रोया था। उन्होंने जनहित याचिकाओं के जरिए जांच एजेंसियों को ऐसी हस्तियों के खिलाफ भी कार्रवाई करने को मजबूर कर दिया था  जिन्हें मनमोहन सरकार बचा रही थी। 

यदि सिब्बल के पास भाजपा नेताओं के खिलाफ वैसे ही ठोस सबूत हैं तो वह जनहित याचिकाओं का सहारा क्यों नहीं ले रहे हैं ? सिब्बल तो बड़े काबिल वकील हैं। क्या उनके लिए जनहित याचिकाओं का रास्ता बंद है ? या फिर उनके पास कोई सबूत ही नहीं है ? क्या सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए बयान देना इतने बड़े वकील को शोभा देता है ?

अपनी सरकार में शामिल लुटेरों के खिलाफ मनमोहन सिंह सरकार जब कार्रवाई नहीं कर सकी जिस सरकार के खुद सिब्बल भी मंत्री थे तो वह मोदी सरकार से ऐसी उम्मीद क्यों कर रहे हंै ? आम धारणा यह है कि लगभग सभी दलों में चोर और लुटेरे घुसे हुए हैं। हालांकि उन्हीं के बीच ईमानदार नेता भी हैं। सत्ताधारी दल अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई करेगा ही।

पर राजग विरोधी दलों को भी चाहिए कि वे भी अपने बीच से ‘डाॅ. स्वामी’ और ‘प्रशांत भूषण’ तैयार करंे ताकि दोनों पक्षों के लुटेरों को उनके सही स्थान पर पहुंचाया जा सके।



और अंत में

एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता ने गुरुवार को मीडिया से कहा कि सी.बी.आई.जितने मामलों की जांच करती है, उनमें से सिर्फ 30 प्रतिशत मामलों में ही वह आरोपितों को अदालतों से सजा दिलवा पाती है। पर सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार ने गत अप्रैल में लोकसभा में बताया कि वह दर 66 दशमलव 8 प्रतिशत है। प्रवक्ता जी यह कहना चाहते थे कि बहुधा सी.बी.आई. झूठे केस तैयार करती है  जो अदालतों में नहीं टिकते। सी.बी.आई. की आलोचना से पहले अपने आंकड़े तो ठीक कर लीजिए प्रवक्ता जी ! 

(प्रभात खबर में 14 जुलाई 2017 को प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से)