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रविवार, 30 अगस्त 2020

22 अगस्त, 1997 : लालू के साथ चली गईं रोचक खबरें भी !


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22 अगस्त, 1997 के दैनिक ‘जनसत्ता’ में लालू प्रसाद पर मेरी एक रपट छपी थी।

उसका शीर्षक था--

‘लालू के साथ चली गईं रोचक खबरें भी !’

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लालू प्रसाद अरसे से एक बार फिर जेल में हैं। 1997 की उस खबर को एक बार फिर पढ़ना रुचिकर होगा। यहां हू ब बहू प्रस्तुत है--

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 ‘‘पटना, 21 अगस्त। लालू प्रसाद के राजनीतिक परिदृश्य से गायब होने के कारण पिछले तीन हफ्तों से बिहार में रोचक खबरों की कमी पड़ गई है। इससे संवाददाता परेशान हैं।

जेल जाने से पहले खुद लालू ने पत्रकारों से कहा था, ‘‘तू लोगिन चाहत बाड़ कि हम जेल चल जाईं।तब चटपटी खबर ना मिली।’’ उन्होंने कहा कि यदि मैं जेल चला गया तो आप लोगों की नौकरी चली जाएगी। क्योंकि तब आपको चटपटी खबर नहीं मिलेगी।


लालू प्रसाद ने ठीक ही कहा था। पटना के पत्रकार भी अब यही महसूस करने लगे हैं। अब मुख्यमंत्री आवास यानी, एक अणे मार्ग का दृश्य पूरा बदला-बदला सा है। वहीं से लालू प्रसाद की पत्नी राबड़ी देवी राज चला रही हैं। पर पत्रकारों के प्रति राबड़ी देवी का रवैया बिलकुल उल्टा है। उनकी मजबूरी भी है।

उन्हें पत्रकारों के उल्टे-सीधे सवालों के जवाब देने की अभी प्रैक्टिस नहीं हुई है। वे दे भी नहीं सकतीं।

कल तक सिर्फ एक घरेलू महिला थीं। उन्हें अभी प्रचार का चस्का भी नहीं लगा है। पति के जेल जाने से वे दुखी और उदास सी हैं।

लालू प्रसाद की हाजिर जवाबी मशहूर रही है। कई बार उनकी हाजिर जवाबी शालीनता की सीमा पार कर जाती थी। पर, पत्रकार उसमें से भी रोचक बातें निकाल ही लेते थे। पिछले माह तक पटना के कई पत्रकार तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के आवास पर करीब -करीब रोज ही जाते थे। जिस दिन संवाददाताओं को कहीं दूसरी जगह खबर नहीं मिलती थी, उस दिन भी वे लालू प्रसाद के घर से खाली हाथ नहीं लौटते थे। संवाददाता आपस में अक्सर यह कहते सुने जाते थे,‘‘आज कहीं कुछ नहीं है। चलो लालू के घर।’’


दैनिक टेलिग्राफ के संवाददाता फैजान अहमद ने स्वीकार किया कि ‘‘लालू प्रसाद अपने आप में एक खबर थे। अच्छी या बुरी खबरें उनसे निकलती रहती थीं। पर अब पहले जैसा नहीं है। रोचक और चटपटी खबरों की कमी से पटना के दूसरे संवाददाता भी परेशान हैं। अब अस्पताल जेल से बाहर छनकर आने वाली अपुष्ट खबरों से संतोष करना पड़ रहा है।

दरअसल लालू प्रसाद से संबंधित उटपटांग खबरें पढ़ने की पाठकों की आदत सी पड़ गई है। लालू प्रसाद भी जानते थे कि उनकी उटपटांग बातों और अजीब ओ गरीब हरकतों से अखबारों के लिए अच्छी खबरें बनती हैं।

करीब डेढ़ साल पहले लालू प्रसाद जब जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर पटना पहुंचे थे तो उन्होंने प्रेस से कहा था कि ‘‘अब मैं सावधानी से बोलूंगा। क्योंकि अब मैं जो कुछ बोलूंगा, वह देश के अखबारों के पहले पेज पर मोटे -मोटे अक्षरों में छपेगा। कुछ दिनों तक उनका यह संयम कायम भी रहा। पर वे तो अपनी आदत से लाचार थे। वे कहीं भी, कभी भी, कुछ भी बोल देते थे।

उन्हें छपास की बीमारी भी थी।


वे जानते थे कि किसी मुख्यमंत्री की उटपटांग चीजें खूब छपती हैं। बाद के दिनों में जब इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रसार बढ़ा तो एक दिन लालू ने प्रिंट मीडिया के संवाददाता से कहा था,‘अब तोहरा लोगिन के ग्लेमर कम हो गईल। अब तो तुरंत फोटो खींचत बा, आ ओही दिन सांझ में टी.वी. पर देखा देत बा। वीकली का वैल्यू त खतम ही हो गया।’’

लालू प्रसाद जब सत्ता में थे तो उनका प्रेस से खट्टा-मीठा संबंध रहा। कभी वे अपनी आलोचनाओं से चिढ़कर गालियां भी दे देते थे। वे कभी मिलने से इनकार भी कर देते थे। पर वे मानते थे कि प्रेस उनके लिए एक जरूरी बुराई है।

चारा घोटाले को लेकर प्रेस ने लालू प्रसाद के खिलाफ क्या- क्या नहीं लिखा ? उन्होंने कुछ किया ही ऐसा है। वे प्रेस से बीच- बीच में सख्त नाराज भी होते रहे। फिर भी प्रेस से लालू प्रसाद का काम चलाऊ रिश्ता उनके जेल जाने तक बना रहा। एक पत्रकार के अनुसार वह प्रेम और घृणा का मिलाजुला रिश्ता था। अब तो प्रेस के लिए रोचक खबरों का सवाल है। रोचक खबरें अब कौन देगा ?

सोमवार, 18 मई 2020

डेढ़ दशक पहले ही राज्यपाल बूटा सिंह ने कह दिया था कि आजादी मिलने के समय से ही बिहार पिछड़ा राज्य बना हुआ है।


करीब डेढ़ दशक पहले बिहार के तत्कालीन राज्यपाल सरदार बूटा सिंह ने पटना में कहा था कि ‘‘आजादी के समय से ही बिहार देश का निर्धनत्तम घोषित राज्य है। आजादी के 50 वर्षों से अधिक समय बाद भी इसकी स्थिति तस की तस बनी हुई है।’’

याद रहे कि पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री सरदार बूटा सिंह 5 नवंबर, 2004 से 29 जनवरी, 2006 तक बिहार के राज्यपाल थे। मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें राज्यपाल बनाया था। यानी, कांग्रेस से लंबे समय तक मजबूती जुड़े रहे एक राज्यपाल बिहार को लेकर कड़ी टिप्पणी कर गए।

वे केंद्र और राज्य की कांग्रेसी सरकारों पर परोक्ष रूप से गंभीर आरोप लगा रहे थे। वे इस तथ्य को जगजाहिर कर रहे थे कि देश के निर्धनत्तम राज्य बिहार के विकास के लिए कांग्रेसी सरकारों ने भी कुछ नहीं किया। नतीजतन बिहार की दयनीय स्थिति आजादी के बाद से ही जस की तस 
बनी हुई है।

अपने तब के भाषण में बूटा सिंह ने बिहार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की भी चर्चा की थी।
उन्होंने कहा था कि ‘‘आजादी के बाद भारत सरकार ने विकास का जो प्रारूप अपनाया, वह बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े राज्यों में कारगर नहीं हो सका। जबकि देश के लक्ष्य राज्यों में इसका परिणाम बेहतर निकला।’’

यानी बूटा सिंह ने यह भी कह दिया कि केंद्र सरकार ने जिन राज्यों को विकसित बनाना चाहा, वे विकसित हो गए। याद रहे कि देश में प्रवासी मजदूरों की संख्या सबसे अधिक बिहार और उत्तर प्रदेश से ही है।

लालू प्रसाद के प्रत्यक्ष-परोक्ष शासनकाल में विकास की क्या गति और नीति थी? जग जाहिर है।
खुद लालू प्रसाद सार्वजनिक रूप से यह कहा करते थे कि विकास से वोट नहीं मिलते बल्कि सामाजिक समीकरण से वोट मिलते हैं।

अब रह गई नीतीश सरकार।

जो लोग प्रवासी मजदूरों की आज की दुर्दशा के लिए नीतीश सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, वे यह उम्मीद कर रहे हैं कि जो काम 58 साल में नहीं हुए, वह काम 15 साल में ही हो जाना चाहिए था। याद रहे कि यदि बिहार और उत्तर प्रदेश का विकास हो गया होता तो इतनी बड़ी संख्या में रोजी-रोटी के लिए मजदूर दूसरे प्रदेशों में जाने को बाध्य नहीं होते।

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सुरेंद्र किशोर--18 मई 2020

शुक्रवार, 7 जून 2019

मंगलवार, 4 जून 2019

दारोगा की अपार ताकत

राष्ट्रीय सहारा के अनुसार, बिहार के डी.जी.पी. गुप्तेश्वर पांडेय रविवार देर शाम पटना के एसएसपी कार्यालय पहुंचे। बढ़ते अपराध पर चिंता प्रकट की। पुलिसकर्मियों से कहा कि ‘सुधर जाइए, वरना कार्रवाई के लिए तैयार रहिए।’

उन्होंने चेताया कि शराब, बालू और भूमि माफिया से साठगांठ रखने वाले पुलिसकर्मियों और पदाधिकारियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। डी.जी.पी. बनने के बाद पांडेय जी दूसरी बार एसएसपी आफिस गए थे। शायद इसी काम के लिए उन्हें तीसरी बार भी जाना पड़े!

यह खबर पढ़कर मुझे एक साथ कई घटनाएं याद आ गईं और पुलिसकर्मियों खासकर दारोगा की अपार ताकत भी।

आजादी से पहले की बात है। कहानी मेरे पुश्तैनी गांव के थाने यानी सारण जिले के परसा थाने की है। बचपन में सुना था कि उस थाने के निवासी दुनिया राय ने अपने पुत्र का नाम दारोगा प्रसाद राय रखा। वे चाहते थे कि उनका बेटा बड़ा होकर दारोगा बने। पर, बाद में तो दारोगा बाबू मुख्यमंत्री तक बने। 

इस बात का पूरा रहस्य तब पता चला जब अस्सी के दशक में मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ‘बिहार में दारोगा राज है।’ जबकि, आजाद जी खुद एक बड़े कड़क नेता थे।

नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण के स्थानीय संपादक दीनानाथ मिश्र ने उन्हीं दिनों एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था -‘डीजीपी हारा, दरोगा जीता।’ एक बार बिहार के एक अन्य मुख्यमंत्री ने भी कहा था कि थाने के भ्रष्टाचार को खत्म नहीं किया जा सकता।

सवाल सिर्फ बिहार का ही नहीं है। कई साल पहले केंद्रीय गृह संचिव रहे एक अफसर ने कहा था कि होम मिनिस्टर की इस बात में भी रूचि रहती थी कि दिल्ली के किस पुलिस थाने में किसे एस.एच.ओ बनाया जाए।

सड़कों पर भारी अतिक्रमण से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कई महीने पहले पटना हाईकोर्ट ने जक्कनपुर के थाना प्रभारी से पूछा था कि अतिक्रमण करवाने से आपको कितनी ऊपरी आय हो जाती है ? हाईकोर्ट की उक्त टिप्पणी के बावजूद आज पटना में अतिक्रमण का हाल जस का तस है। बल्कि बढ़ ही रहा है।

डी.जी.पी. फटकार ही रहे हैं। मुख्यमंत्री भी समय -समय पर चिंता प्रकट करते ही रहते हैं। फिर आखिर कौन से ‘अदृश्य निर्मल बाबा’ हैं जो थानेदारों पर लगतार कृपा पर कृपा बरसाते जा रहे हैं ?!

एक और कहानी सारण जिले की ही। डा.राजेंद्र प्रसाद जब राष्ट्रपति बने तो उनके गांव की एक महिला से किसी ने कहा था कि वे बहुत बड़े आदमी बन गए हैं। इस पर उस महिला ने भोजपुरी में सवाल किया कि ‘का दारोगा बन गईल बाड़ें ?’

जून 2019

शनिवार, 1 जून 2019

अपहरण : इसे कहते हैं हैंगओवर ! ! !

हाल में पटना में पास से गुजर रहे एक व्यक्ति के बारे में मेरे परिचित ने मुझसे पूछा, ‘ आप जानते हैं इन्हें ? चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जैसे तरह लग रहे थे। मैंने हवाई चप्पल पहने उस व्यक्ति के बारे में अनभिज्ञता जाहिर की।

उन्होंने उस हस्ती का नाम बताया। मैं चौंक गया। अच्छा तो यही हैं ?! इनका तो नब्बे के दशक में अपहरण हुआ था ! पर, आज इस स्थिति में क्यों ? सुना है कि अब तो शांतिपूर्वक अच्छा-खास कमा रहे हैं। यह तो बहुत ही अमीर व्यक्ति हैं ?

परिचित ने कहा कि अपहरण के बाद से ही दहशत में रहते हैं। अच्छे कपड़े पहनना और सजना- संवरना इन्होंने छोड़ दिया है। इनकी गाड़ी भी जर्जर जैसी ही लगती है। यह सब ऐहतियाती तौर पर करते हैं। शायद फिर किसी अपहरणकर्ता की उनपर नजर न पड़ जाए।

ऐसे कुछ अन्य धनपति भी हैं जो सबसे महंगी गाड़ी खरीद सकते हैं, पर आज भी मामूली सेकेंड हैंड कार पर चलते हैं।

इसे कहते हैं हैंगओवर ! ! !

शनिवार, 25 मई 2019

समकालीन इतिहास की भी गहरी समझ का अभाव


एक और राजनीतिक पंडित ने आज लिखा है कि ‘साल 1971 के बाद पहली बार कोई प्रधानमंत्री न सिर्फ अपने दम पर दूसरी बार सत्ता में लौटा है, बल्कि बहुमत में भी इजाफा किया है।’

इस पूरे वाक्य पर ध्यान दें। 

लेखक का आशय यह है कि 1967 में ‘अपने दम’ पर इंदिरा गांधी ने लोकसभा में बहुमत हासिल किया था। क्या यह सच है ? कत्तई नहीं।

1969 के पूर्वाद्ध तक कांग्रेस पार्टी सिर्फ किसी एक नेता पर निर्भर भी नहीं थी। तब तक स्वतंत्रता सेनाननियों की बड़ी जमात का देश के अलग-अलग हिस्सों पर भारी असर था। बिहार में भी आजादी के बाद के कई वर्षों तक श्रीबाबू-अनुग्रह बाबू की जोड़ी की तूती बोलती थी।

एक बार जवाहरलाल नेहरू ने लक्ष्मी नारायण सुधांशु को मुख्यमंत्री बनाना चाहा था। सुधांशु जी ने यह कहते हुए मना कर दिया कि बिहार की जनता श्रीबाबू और अनुग्रह बाबू के साथ है। मेरे साथ जनता नहीं है। जिसके साथ जनता न हो, उसे मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहिए।

हां, 1969 में कांग्रेस में हुए महाविभाजन के बाद इंदिरा जी जरूर अपने गुट की एकछत्र नेता बन गईं। 1971 के चुनाव के बाद तो यह साफ हो गया कि इंदिरा जी की कांग्रेस ही असली कांग्रेस है। 

1967 में तो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वी.के. कृष्ण मेनन को लोकसभा का टिकट तक नहीं दिलवा पाई थीं। जबकि, वे निवर्तमान सांसद थे। उनकी जगह कांग्रेस ने डा. बर्वे को दिया और वे जीते भी। इस तरह के कई अन्य उदाहरण भी हैं।

शुक्रवार, 24 मई 2019

प्रतिपक्ष के लिए चेतावनी और सत्तापक्ष के लिए नई जिम्मेवारी


इस चुनाव नतीजे ने 1977 के लोकसभा चुनाव की याद दिला दी। इमरजेंसी की पृष्ठभूमि में हुए चुनाव में अविभाजित बिहार की सभी 54 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस हार गई थी। इस बार भी बिहार में कमोवेश वैसा ही रिजल्ट आया है। यानी आमजन में इमरजेंसी से थोड़ा ही कम गुस्सा इस बार था। गुस्सा प्रतिपक्ष पर निकला। गुस्सा बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर प्रतिपक्ष के विरोध पर था।

एक ओर काम करने वाली मोदी-नीतीश सरकार तो दूसरी ओर कथित भ्रष्टाचार, वंशवाद व महत्वाकांक्षी नेताओं की अव्यवस्थित भीड़ से जूझ रहा प्रतिपक्ष था। ऐसे में जीतना उसे ही था, जिसकी जीत हुई। पर इस चुनावी संघर्ष में कई व्यक्तिवादी नेताओं की वास्तविक राजनीतिक ताकत का भी पता चल गया।

जातीय व साम्प्रदायिक वोट बैंक की ताकत पर गुमान करने वाले कुछ बिहारी नेताओं को राजग ने औकात बता दी। एक खास संकेत भी मिल रहा है। डबल इंजन की सरकार अगले वर्षों में ऐेसे -ऐसे काम करने वाली है जिससे वोट के ठेकदारों की ताकत और भी कम हो सकती है।

एक उदाहरण काफी होगा। कल्पना कीजिए कि किसानों को मिल रही छह हजार रुपए सालाना की राशि में केंद्र सरकार वृद्धि कर दे। जमीन की मौजूदा सीमा को हटा दे तो उसका क्या असर पड़ेगा ? इस तरह के कई अन्य काम केंद्र की पाइप लाइन में हैं। इसलिए वोट बैंक के आधार पर चलने वाले दलों के लिए यह चुनाव परिणाम एक संदेश दे रहा है। संदेश यह कि आप अपना चाल, चरित्र और चेहरा बदलिए। यदि बदलाव का तरीका समझ में नहीं आ रहा है तो किन्हीं विशेषज्ञों से पूछिए।

अपने उन बचे -खुचे समर्थकों का ध्यान रखते हुए भी आपका राजनीति में प्रासंगिक बने रहने जरूरी है। अब भी अनेक लोग आपकी ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए भी यह जरूरी है कि प्रतिपक्ष में बेदम नहीं हो।

यह चुनाव शत्रुघ्न सिन्हा, उपेंद्र कुशवाहा और शरद यादव जैसे बड़े नेताओं के लिए भी एक कड़ा संदेश है। ऐसे नेताओं को समझना होगा कि आप खुद क्या चाहते हैं और आम जनता आपसे क्या चाहती है। यह बात आप जानें और समझें, समय रहते। उसी के अनुसार अपने राजनीतिक कदम उठाएं। आपके सामने सीरियस नेता हैं जिनसे आपका मुकाबला है।

इस चुनाव में भारी जीत का श्रेय तो नरेंद्र मोदी को ही जाता है। पर राजग के लिए यह अनुकूल स्थिति रही कि यहां नीतीश के रूप में एक अच्छी छवि वाले मुख्यमंत्री हैं। नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की मिलीजुली ताकत का लाभ इस पिछड़े बिहार को पूर्ण विकसित करने में अब होना चाहिए। नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार का विकास तो हुआ है, पर आर्थिक सीमाओं के कारण पूर्ण विकास की राह में बाधाएं बनी हुई हैं।

बिहार में उद्योगीकरण के लिए केंद्र से मदद की उम्मीद अब बढ़ी है। मुख्यमंत्री कहते हैं कि  विशेष राज्य का दर्जा देने से ही यहां उद्योग बढ़ेंगे। श्री कुमार ने चुनाव प्रचार में मतदाताओं से अपील की कि यदि आप हमें 15 या उससे अधिक सीटें जितवाएंगे तो हम बिहार को विशेष राज्य का दर्जा के लिए केंद्र के समक्ष मजबूती से अपनी मांग रख पाएंगे। पर, चौदहवें वित्त आयोग ने कह दिया है कि किसी भी राज्य को विशेष दर्जा नहीं दिया जाएगा।

इस पृष्ठभूमि में केंद्र के सामने भी संभवतः दिक्कत आएगी। पर एक रास्ता बीच का भी है। केंद्र सरकार यदि एक्साइज ड्यूटी, आयकर और जी.एस.टी. में बिहार में छूट दे दे तो उद्योगपतियों को बिहार आमंत्रित किया जा सकता है।

मोदी सरकार ने अन्य धनराशि के अलावा सिर्फ सड़कों  के लिए बिहार को 50 हजार करोड़ रुपए दिए हैं। बिजली के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण काम हुए हैं।

(24 मई 2019 के दैनिक भास्कर,पटना में प्रकाशित)

मंगलवार, 12 जून 2018

उपचुनाव नतीजों से आगे के संकेत

बिहार में आप यदि किसी स्कूली छात्र से भी पूछेंगे कि जिस चुनाव क्षेत्र में 70 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी हो तो वहां से कौन पार्टी जीतेगी तो वह बिना देर किए बता देगा-राजद।

जोकी हाट में यही हुआ है। वहां 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इसलिए जोकी हाट विधानसभा क्षेत्र में राजद उम्मीदवार की जीत को किसी लालू वाद से कोई संबंध नहीं है। वैसे कोई कुछ भी कहे, पर पूरे बिहार में मुस्लिम और यादव मतदाताओं के अधिकतर वोट उसे ही मिलेंगे जिस उम्मीदवार पर लालू प्रसाद की मुहर होगी। चाहे राजद गठबंधन जितनी सीटें जीते।

राज्य के जिन चुनाव क्षेत्रों में यादव-मुस्लिम वोटर मिलकर निर्णायक होंगे, वहां अगले किसी भी चुनाव में राजद या उसके सहयोगी दल ही जीतेंगे। यह बात पिछले कई चुनावों मेंं भी साबित हुई है। इक्के—दुक्के अपवादों की बात और है। इस बार भी जोकीहाट में यह साबित हुई।

जोकीहाट में जीत के बाद राजद का यह कहना कि यह लालूवाद की जीत है, एक राजनीतिक बयानबाजी से कुछ अधिक नहीं। इसे एक नया जुमला भी कह सकते हैं। इसी तरह की बयानबाजी बिहार में हुए गत मार्च के उपचुनाव के बाद भी हुई थी।

मार्च में अररिया लोकसभा चुनाव क्षेत्र और भभुआ तथा जहानाबाद विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव हुए थे। खाली होने से पहले जो सीट जिसके पास थी, वह उस दल को मिली। यानी न तो किसी की हार हुई न किसी की जीत। फिर भी उस रिजल्ट को भी कुछ इसी तरह परिभाषित किया गया। हालांकि मार्च उपचुनाव के रिजल्ट का सघन विश्लेषण किया जाए तो उससे राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन को खुश होने का कोई कारण नहीं था। 

यदि कोई दलीय गठबंधन आठ में से पांच विधानसभा सीटें जीत जाए तो उसे खुशी मनानी चाहिए या उस अन्य गठबंधन को खुश होना चाहिए जिसे उनमें से सिर्फ तीन ही सीटें ही मिलीं ?

अररिया लोकसभा उपचुनाव नतीजे को विस्तार से समझिए। राज्य में अररिया लोकसभा और भभुआ तथा जहानाबाद विधानसभा क्षेत्रों के लिए 11 मार्च को उपचुनाव हुए थे।

 राजद ने अररिया और जहानाबाद सीटें जीतीं।पहले भी ये सीटें उसी के पास थीं। भाजपा ने भी अपनी भभुआ सीट बचा ली।

 2014 के लोक सभा चुनाव में अररिया से राजद के तसलीमुद्दीन विजयी हुए थे। 2015 के विधान सभा चुनाव में भभुआ

से भाजपा और जहानाबाद से राजद की जीत हुई थी । राजद,जदयू और कांग्रेस ने महा गठबंधन बना कर 2015 को बिहार विधान सभा का चुनाव लड़ा था। 

मार्च के  उप चुनावों के नतीजे के गहन अध्ययन से राजग को फायदा मिलता नजर आया। अररिया लोक सभा चुनाव क्षेत्र के भीतर छह विधान सभा क्षेत्र हैं। उप चुनाव में छह में से चार सीटों पर राजग की बढ़त रही और सिर्फ दो सीटों पर राजद को बढ़त मिली। इसमें भभुआ को मिला दें तो राजग  कुल पांच विधान सभा सीटों पर राजद से आगे रहा।

    हां, मार्च के उप चुनाव नतीजों से यह बात साफ हुई थी कि  राजद के पक्ष में मुस्लिम -यादव समीकरण के मतों की एकजुटता पहले की अपेक्षा बढ गय़ी। मतदान में आक्रामकता भी बढ़ी। हालांकि अररिया लोक सभा उप चुनाव में अल्पसंख्यक मतदाताओं के ध्यान में नरेंद्र मोदी अधिक थे।अगले लोक सभा चुनाव में भी वैसा ही रहने की उम्मीद है।

   नरेंद्र मोदी की लहर के बावजूद सन 2014 के लोक सभा चुनाव में मुस्लिम-यादव  बहुल क्षेत्र अररिया से राजद के तसलीमुद्दीन विजयी हुए थे। तसलीमुद्दीन के निधन से सीट खाली हुई थी। तसलीमुद्दीन के पुत्र सरफराज आलम मार्च में  राजद के उम्मीदवार थे।उप चुनाव में सरफराज विजयी रहे।

सरफराज हाल तक जदयू विधायक थे।उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया। उसके बाद राजद की ओर अपने पिता की सीट पर उम्मीदवार बने। अररिया लोक सभा क्षेत्र के भीतर पड़ने वाले जोकीहाट और अररिया विधान सभा चुनाव क्षेत्रों में राजद को भारी बढ़त मिली।

दशकों से वह तसलीमुददीन के प्रभाव वाला इलाका रहा। तसलीमुददीन भी कई बार सांसद व विधायक रहे। केंद्र में राज्य मंत्री भी थे। फिर भी गत लोक सभा उप चुनाव में अररिया के  चार विधान सभा खंडों में भाजपा के उम्मीदवार प्रदीप कमार सिंह को बढ़त मिल गयी।

    इसके अलावा भभुआ विधान सभा चुनाव क्षेत्र में भाजपा की जीत से राजग बिहार में चुनावी भविष्य के प्रति आशान्वित हुआ।क्योंकि वहां जातियों की दृष्टि से लगभग मिलीजुली  आबादी है।

 यानी भभुआ विधान सभा क्षेत्र तथा अररिया लोक सभा चुनाव क्षेत्र के नीचे पड़ने वाले चार विधान सभा खंडों के चुनाव नतीजे को देखकर यह तब भी कहा गया   कि बिहार की राजग सरकार से आम लोगों का अभी मोहभंग नहीं हुआ है।इसलिए कि ऐसी ही मिलीजुली आबादी वाले बिहार में अधिकतर विधान सभा क्षेत्र हैं।मिलीजुली आबादी यानी  जातीय दृष्टि से भी मिली जुली आबादी वाला चुनाव क्षेत्र । 

  हां, राजद के वोट बैंक यानी एम.वार्इ. वर्चस्व वाले चुनाव  क्षेत्र  अररिया और जहानाबाद में राजद उम्मीदवारों के पहले की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन को लेकर तरह -तरह के अनुमान लगाए गए।क्या लालू प्रसाद के जेल जाने से  मतदाताओं के एक वर्ग में बढ़ी सहानुभूति के कारण उनके वोट बैंक में एकजुटता और आक्रामकता बढ़ी  ?

क्या दिवंगत जन प्रतिनिधियों के परिजन के लिए मतदाताओं में भारी सहानुभूति के कारण वोट बढ़े  ? या कोई और बात रही ? पर सवाल यह भी है कि क्या अगले किसी चुनाव में बिहार के वैसे चुनाव क्षेत्रों में भी राजद को बढ़त मिलेगी जहां यादव-मुस्लिम वोट निर्णायक नहीं हैं ?

यदि ऐसा हुआ तो माना जाएगा कि वह लालू वाद की जीत है।

लाूल प्रसाद की राजनीतिक ताकत का अनुमान लगाने के लिए दो पिछले चुनावों की चर्चा प्रासंगिक होगी। राजद और लोजपा ने 2010 में   बिहार विधान सभा चुनाव मिल कर लड़ा था। 243 सदस्यीय विधान सभा में इन्हें 25 सीटें आईं।

चारा घोटाला केस में सन 2013 में लालू प्रसाद को पहली बार सजा हुई थी।
सजा की घोषणा के तत्काल बाद राजद नेताओं ने कहा था कि हम अब लोक सभा की सभी 40 सीटें जीत लेंगे।क्योंकि जनता लालू प्रसाद को परेशान करने का बदला लेगी।

पर 2014 के लोक सभा चुनाव में राजद को बिहार में सिर्फ 4 सीटें ही मिलीं। हाल के उप चुनाव नतीजे भी पूरे बिहार में राजद के लिए कोई खास उम्मीद नहीं जगा रहे हैं। वैसे दल का हौसला बनाये रखने के लिए बड़े -बड़े दावे तो हर दल करता ही  रहता  है।यदि राजद भी कर रहा है तो उसमें किसी कोई एतराज नहीं होना चाहिए।

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जोकीहाट विधान सभा उप चुनाव रिजल्ट--2018

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शाहनवाज आलम -राजद- 81240

मुर्शीद आलम---जदयू--40016

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अररिया लोक सभा क्षेत्र--उप चुनाव-मार्च,2018

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 विधान सभा क्षेत्र--  राजग --- महागठबंधन

नरपत गंज--        88349 ---- 69697

रानी गंज ----     82004 ---- 66708

फरबिस गंज         93739 -----74498

सिकटी-------   87070 ----- 70400

जोकी हाट-----   39517------120765

अररिया------    56834 ----- 107260

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(3 जून 2018 को हस्तक्षेप -राष्ट्रीय सहारा -में प्रकाशित)


    

  



शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

सरदार हरिहर सिंह की नजर में श्रीबाबू

बिहार में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे डा. श्रीकृष्ण सिंह के बारे में तरह -तरह के लोग तरह -तरह के विचार रखते हैं।ऐसा स्वाभाविक ही है क्योंकि उन्होंने आजादी के बाद व पहले की कांग्रेसी राजनीति व शासन को काफी प्रभावित किया था।


   पर एक अन्य मुख्य मंत्री सरदार हरिहर सिंह की नजरों से डा.श्रीकृष्ण सिंह को देखना अधिक महत्वपूर्ण बात होगी।सरदार साहब सन 1969 में बिहार के मुख्य मंत्री बने थे।

डा.श्रीकृष्ण सिंह यानी श्रीबाबू के बारे में सरदार साहब ने लिखा है कि ‘आजादी की लड़ाई के दिनों  श्रीबाबू खास तौर पर युवकों के नेता थे।ऐसे तो वे संपूर्ण जनता के नेता थे,पर अपने उग्र राष्ट्रीय विचारों के कारण वे युवकों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते थे।उनके अपने स्वतंत्र विचार थे।वे किसी के ‘हिज मास्टर्स वायस’ नहीं थे।उनका अपना स्टैंड होता था,इसलिए वे हमारे जैसे युवकों के लिए ग्राह्य और प्रिय थे।

  सरदार हरिहर सिंह खुद भी एक महत्वपूर्ण हस्ती थे और आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उनका नाम सरदार पड़ा था।

   सरदार साहब ने लिखा है कि श्रीबाबू सन 1930 से पहले मुंगेर जिले की राजनीति तक अपने को सीमित रखे हुए थे।वे राज्य के नेतृत्व में भाग लेते थे,लेकिन मुंगेर को अपना मुख्य केंद्र बना कर चलते थे।नमक सत्याग्रह के बाद वे बिहार के राजनीतिक क्षितिज पर छा गये।

तब से लेकर मरते दम तक छाये रहे।याद रहे कि डा.राजेंद्र प्रसाद व डा.अनुग्रह नारायण सिंह सहित कई नेतागण चंपारण सत्याग्रह के समय ही गांधी के साथ हो लिये थे।

  बिहार के  अत्यंत महत्वपूर्ण नेता  डा.अनुग्रह नारायण सिंह को लोग बाबू साहब कहते थे।बाबू साहब के  बारे में सरदार साहब ने लिखा है कि अनुग्रह बाबू से मेरा संबंध 1916 से था।हमारा उनका व्यक्तिगत संबंध था।
हम बाबू साहब के बहुत करीब थे।उनके साथ मेरा घनिष्ठ संबंध था,पर राजनीतिक स्तर पर हम श्रीबाबू से संबंधित थे।राजेंद्र बाबू और बाबू साहब सुधारवादी व नरमपंथी विचार के थे।उस जमाने के लिहाज से श्रीबाबू प्रगतिशील और उग्र विचार के थे।इसी कारण श्रीबाबू को युवको का समर्थन मिला।बहुत से उग्रवादी नेता जैसे राम विनोद सिंह,श्यामा बाबू ,योगेंद्र शुक्ल आदि श्रीबाबू के साथ जाना पसंद करते थे और साथ चले भी।याद रहे सरदार साहब ने क्रांतिकारियों के लिए अपने लेख में उग्रवादी शब्द का इस्तेमाल किया है।

   राजनीति में शालीनता के बारे में हरिहर सिंह ने लिखा कि उस समय के लोगों की सबसे बड़ी बात थी कि  राजनीति में शालीनता थी।श्रीबाबू का अपना स्टैंड जरूर होता था,लेकिन इसका मतलब दूसरे के प्रति अनादर और दुश्मनी नहीं थी।

बाबू साहब हों या राजेंद्र बाबू वे सबका आदर करते थे और सबको सम्मान देते थे।प्रारंभ में बाबू कष्ण बल्लभ सहाय बाबू साहब के साथ थे।उन्होंने 1937 में श्रीबाबू का विरोध किया।उसके बाद वे श्रीबाबू के संपर्क में आये।सहाय जी 1952 में श्रीबाबू के साथ थे।पर 1957 के चुनाव उन्होंने श्रीबाबू को हराने का असफल प्रयास किया।तब बिहार कांग्रेस विधायक दल के नेता पद का चुनाव श्रीबाबू और बाबू साहब के बीच हुआ था।श्रीबाबू जीते।

   उन दिनों की राजनीति की शालीनता का एक और उदाहरण देते हुए सरदार साहब ने लिखा कि एक बार श्रीबाबू महेश प्रसाद सिंह को मंत्री बनाना चाहते थे और बाबू साहब  दीप नारायण सिंह को।एक बार तो लगा कि दोनों में से कोई एक ही मंत्री बनंेगे।क्योंकि दोनों नेता एक ही जिले के थे।पर ंदोनों मंत्री बने । इसमें यह खूबी रही कि डा.अनुग्रह नारायण सिंह ने   महेश प्रसाद सिंह का नाम प्रस्तावित किया और डा.श्रीकृष्ण सिंह ने  दीप नारायण सिंह का।श्रीबाबू के मंत्रिमंडल में अनुग्रह बाबू हमेशा मुख्य मंत्री के बाद दूसरे स्थान पर रहे।

   सरदार साहब के अनुसार श्रीबाबू के भाइयों ने जब आजादी की लड़ाई के दिनों उनका साथ छोड़ दिया था तो महेश प्रसाद सिंह ने श्रीबाबू का साथ दिया था।डा.श्रीकष्ण सिंह का जीवन तो निष्कलंक था,पर महेश प्रसाद सिंह को लेकर कुछ लेागों ने डा.श्रीकृष्ण सिंह  को बदनाम करने की कोशिश की।पर श्रीबाबू ने उपकार का बदला व्यावहारिक ही नहीं,बल्कि सांस्कतिक स्तर पर भी महेश बाबू को चुकाया।जब श्रीबाबू ने अपनी सबसे प्रिय निधि यानी अपनी पुस्तकों को मुंगेर के श्रीकृष्ण सेवा सदन को सौंपा तो उस पुस्तकालय का नाम कमला-महेश पुस्तकालय रखा।लेकिन महेश प्रसाद सिंह ने डा.श्रीकृष्ण सिंह  की उदारता और व्यक्तिगत संबंध का उपयोग अपने को राजनीति में स्थापित करने तथा आगे बढ़ाने में किया।

  अपने खुद के  कटु अनुभव की चर्चा करते हुए सरदार हरिहर सिंह ने लिखा कि सन 1957 के चुनाव में टिकट को लेकर सत्य नारायण सिंह और महेश प्रसाद सिंह ने मेरे नाम का विरोध किया।इसके परिणामस्वरूप मुझे टिकट नहीं मिला।इससे मैं कुछ खिन्न था।बाद की राजनीतिक स्थिति को देखकर मुझे तकलीफ हुई।श्रीबाबू के निधन के कुछ समय पहले मैंने एक दिन कुछ दुःखी होकर कह दिया--‘मरने के वक्त आप भूमिहार हो गये और मैं राजपूत।नहीं तो कोई नहीं जानता था कि हम दोनों एक ही जाति के नहीं हैं।’यह सुनते ही श्रीबाबू रो पड़े।न कोई शब्द थे और न कोई सफाई।मात्र अश्रु धार मेरे सवाल का जवाब दे रहे थे।

(श्रीबाबू के जन्म दिन के अवसर पर विशेष)

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

महागठबंधन की राह के कांटें

बिहार जैसा महागठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बनाने की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सलाह मौजूं है। उत्तर प्रदेश की चुनावी हार के बाद प्रतिपक्ष इन दिनों पस्तहिम्मत है। इस पृष्ठभूमि में यदि महागठबंधन बनाने का गंभीर प्रयास भी शुरू हो जाए तो उससे गैर राजग दलों में एक नयी ऊर्जा का संचार हो सकता है।

वैसे भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह ठीक नहीं है कि छितराये प्रतिपक्षी दल अधिक दिनों तक पस्तहिम्मत बने रहें। प्रतिपक्ष की पस्तहिम्मती के माहौल में सत्ताधारी जमात द्वारा मनमानी किए जाने का खतरा बढ़ जाता है।

  नीतीश कुमार की यह सलाह भी सही है कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट महागठबंधन बनाने की दिशा में पहल करें। इससे पहले मणि श्ांकर अय्यर तथा कुछ अन्य नेताओं ने भी ऐसी ही सलाह दी है।

पर नीतीश कुमार की सलाह का महत्व अधिक इसलिए भी है क्योंकि उनके नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार कुछ कठिनाइयों और शिकायतों के बावजूद आराम से चल रही है। इस चर्चा के बीच कि नीतीश राजग में ंजा सकते हैं, बिहार के मुख्यमंत्री की ताजा सलाह प्रतिपक्ष का हौसला बढ़ाने वाली है।

पर अब सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय स्तर पर बिहार जैसा कोई महागठबंधन बनाना आज की स्थिति में संभव भी है ? अभी तो असंभव जरूर लगता है। पर यदि इसके लिए गंभीर और ईमानदार प्रयास अभी से शुरू हो जाएं तो आने वाले दिनों में शायद एक हद तक यह कल्पना साकार रूप ग्रहण कर ले।

यह नरेंद्र मोदी की सरकार अपने लोकलुभावन कामों के जरिए अपनी लोकप्रियता बढ़ाती जा रही है। उसे देशव्यापी दलीय गठजोड़ के जरिए पराजित करने के विचार को एक ठोस राजनीतिक पहल की संज्ञा दी जा सकती है। पर सवाल यह भी है कि क्या मोदी सरकार अगले दो साल में नोटबंदी और बेनामी संपत्ति पर हमला जैसे अपने अन्य चौंकाने वाले कामों से आगे निकल जाती है या प्रतिपक्ष महागठबंधन बना कर 2019 के लोकसभा चुनाव में राजग को मात दे देता है।  

पर, किसी भी महागठबंधन के निर्माण में मुख्यतः तीन कठिनाइयां सामने आ सकती हैं। महागठबंधन का नेता कौन होगा? कुछ दल चाहेंगे कि यह बात पहले ही तय हो जाए।

महागठबंधन को नीति -रीति कैसी होगी? राज्यों के परस्पर विरोधी क्षत्रपों को एक मंच पर कैसे लाया जा सकेगा? प्रतिपक्ष के लिए एक और कठिनाई नरेंद्र मोदी सरकार इस बीच पैदा कर सकती है।

संभव है कि अगले लोकसभा चुनाव के पहले तक मोदी सरकार कुछ ऐसे चौंकाने वाले काम कर दे ताकि महागठबंधन के निर्माण के बावजूद राजग  अपराजेय रहे।

याद रहे कि हाल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राजग को 325 सीटें मिलीं। जबकि उसे 2014 के लोकसभा चुनाव में विधानसभा की 328 सीटों पर बढ़त मिली थी। यानी उसकी 3 सीटें ही घटीं। आम तौर पर लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में विजयी दलों की सीटें काफी घट जाती हैं।

1977 में उत्तर प्रदेश में जनता पार्टी को 425 में से 352 सीटें मिल सकी थीं जबकि उससे तीन ही महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी को लोकसभा की सभी 85 सीटें मिल गयी थीं।

यानी अनेक मतदाताओं के अनुसार नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पौने तीन साल के कार्यकाल में अच्छे काम किये। उतने काम 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय तक लोगों को नजर नहीं आए थे। दूसरी बात वहां महागठबंधन का भी कमाल था।

वैसे आरक्षण की समीक्षा की मांग करते हुए चुनाव की पूर्व संध्या पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के आए तीन बयानों ने भी बिहार में महागठबंधन के काम और भी आसान कर दिया था। आरक्षण पर खतरे का शोर तो उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान भी राजग विरोधी दलों ने किया था। पर उसका असर नहीं हुआ। क्योंकि मतदाताओं के दिलो दिमाग पर वहां अन्य तत्व अधिक हावी थे।

क्योंकि एक तो मोदी सरकार के काम और मंशा लोगों को पसंद आए, दूसरी बात यह भी हुई कि सांप्रदायिक तत्व भी चुनाव प्रचार के साथ जुड़ गये। अब गैर राजग दलों को इस बात भी विचार करना होगा कि वे नरेंद्र मोदी के लोकलुभावन कामों का मुकाबला कैसे करेंगे ?

क्या जहां-जहां गैर राजग दलों की सरकारें बची हुई हैं, वहां वे सुशासन व विकास की रफ्तार को तेज करेंगे ? क्या बिहार में भी सुशासन की ढीली होती लगाम को ठीक ढंग से कसा जा सकेगा ?

क्योंकि सिर्फ दलीय या फिर जातीय समीकरण ही हर जगह राजग का मुकाबला नहीं कर पाएगा।

महागठबंधन के निर्माण में सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम को एक मंच पर कैसे लाया जाए ? क्या मायावती 1995 में हुए लखनऊ गेस्ट हाउस का कांड भूल जाएंगी ? तब सपा के बाहुबलियों ने उनके कमरे में जबरन घुस कर उस मायावती के साथ काफी बदतमीजी की थी।

मायावती भूल सकती हैं यदि उन्हें अपनी ताजा चुनावी हार उस कांड की अपेक्षा अधिक पीड़ादायक लग रही हो।
याद रहे कि उत्तर प्रदेश के ताजा चुनाव में राजग की अपेक्षा कांग्रेस-सपा- बसपा को कुल मिलाकर दस प्रतिशत अधिक वोट मिले।

लगभग यही समस्या पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और कम्युनिस्टों के बीच आएगी। इन दोनों के कार्यकर्ताओं के बीच यदाकदा खूनी झड़पें होती  रही हैं। क्या ममता वह कांड भूल जाएगी जिसमें उनपर वाम मोर्चे की सरकार की पुलिस ने निर्मम प्रहार किया था और ममता को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा था ?

तमिलनाडु में क्या होगा ? क्या अन्नाद्रमुक और द्रमुक को कभी एक मंच पर लाना संभव होगा? 1989 में जयललिता तमिलनाडु विधानसभा में प्रतिपक्ष की नेता थीं। के. करूणानिधि मुख्य मंत्री थे। एक सवाल पूछने पर कुछ द्रमुक सदस्यों ने जयललिता को सदन के अंदर ही इस कदर अपमानित किया जैसा अपमान शायद ही किसी महिला नेत्री का कभी किसी सदन में हुआ हो।

जयललिता अंत-अंत तक वह अपमान भूल नहीं पायी थीं। क्या उनके उत्तराधिकारी उस घटना को भुला कर द्रमुक से समझौता कर लेंगे?

ऐसी  समस्याएं कुछ अन्य राज्यों में भी है।

इस तरह सारे गैर राजग दलों को एक मंच पर लाना असंभव नहीं तो  अत्यंत कठिन जरूर है। इस महती काम को संभव बनाने के लिए कुशल मध्यस्थों की जरूरत पड़ेगी। फिर भी इस काम में काफी समय लग सकता है।
लोकसभा के अगले चुनाव के सिर्फ दो साल बाकी हैं। यह समय देखते -देखते बीत जाएंगे। इसलिए गैर राजग दल इस काम में यदि अभी से लग जाएं तो पूर्ण नहीं तो कम से कम शायद आंशिक सफलता मिल जाए!
एक मजबूत विकल्प तैयार करने में यदि प्रतिपक्ष विफल रहता है तो वह उसकी विफलता है। जनता की नहीं। गत 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता के तो करीब 61 प्रतिशत वोट राजग के खिलाफ पड़े थे।

(इस लेख का संपादित अंश ‘प्रभात खबर’ के 6 अप्रैल 2017 के अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 25 मई 2016

जंगल राज नहीं, उसकी आहट

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और बिहार में अपनी जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाये रखने की कोशिश कर रहे हैं। नशाबंदी से मिली लोकप्रियता को राष्ट्रीय स्तर पर भंजाने की कोशिश में हैं। यह प्रयास स्वाभाविक ही है। सचमुच नशाबंदी में देर-सवेर देशव्यापी मुद्दा बन जाने की संभावना है।
पर, बिहार में इन दिनों घट रही दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को लेकर राज्य में नीतीश कुमार की उपस्थिति की अधिक जरूरत महसूस की जा रही है। इन घटनाओं के कारण सुशासन और विकास के क्षेत्रों में उनकी पिछली उपलब्धियांें के मद्धिम पड़ने की आशंका है।

 नीतीश कुमार ने गत साल 20 नवंबर को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। इस छह माह में राज्य में सब कुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है। प्रतिपक्ष और विघ्नसंतोषी इसे ‘जंगल राज’ करार दे रहे हैं। इनमें से कुछ लोग तो इसे महाजंगल राज की उपमा भी दे रहे हैं।

 पर जिन लोगों ने 1990-2005 का ‘जंगल राज’ देखा और भुगता है, वे इन उपमाओं से सहमत नहीं हैं। दरअसल आज के कई नेतागण इमरजेंसी और जंगल राज की उपमा देने में जरा जल्दीबाजी कर देते हैं।
 बिहार में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वह जंगल राज तो नहीं है, पर जंगल राज की आहट जरूर है।
नब्बे के दशक में जो कुछ हो रहा था, उसको लेकर पटना हाईकोर्ट ने कई बार कहा था कि ‘बिहार में जंगल राज है।’ अदालत ने तो एक बार यह भी कहा था कि ‘जंगल राज के भी कुछ नियम होते हैं, पर बिहार में वह भी नहीं है।’

 नीतीश कुमार के शासनकाल में अदालत ने संभवतः अब तक ऐसा कुछ नहीं कहा है।

 इसका कारण यह है कि अपवादों को छोड़ दें तो नीतीश ने अपने पूरे कार्यकाल में इस वायदे का पालन किया है कि ‘हमारी सरकार न तो किसी को बचाएगी और न ही फंसाएगी।’

 हाल की जघन्य घटनाओं को लेकर भी शासन कमोवेश यही कर रहा है।

 बिहार में सबसे बड़ा सकारात्मक फर्क यह आया है कि लालू प्रसाद ने कानून-व्यवस्था के मामले में अपना रुख बदल लिया है। नब्बे के दशक में लालू प्रसाद राजनीति में सक्रिय अपराधियों के बारे में भी कहा करते थे कि ‘जिसे जनता ने जिता दिया, वह अपराधी कैसा ?’ उनका दल अपराध की घटनाओं को सामाजिक उथल-पुथल से भी जोड़कर उसे उचित ठहराता था।

पर, अब कानून-व्यवस्था लागू करने में लालू प्रसाद, नीतीश कुमार को पूरा समर्थन देने की लगातार घोषणा कर रहे हैं। एक तो उन्होंने अपनी पिछली गलतियों से सीखा है।साथ ही  उन्होंने यह बात भी समझ ली है कि उनके पुत्रों का राजनीतिक कैरियर तभी निखरेगा जब वे नीतीश कुमार के सुशासन-विकास की लाइन पर काम करेंगे।

वैसे भी लालू प्रसाद की संतानों ने लालू की शैली नहीं सीखी है। खुद लालू समझ रहे हैं कि उनकी शैली में अब राजनीति हो भी नहीं सकती। राजनीति तो होगी, पर उस शैली के बल पर सत्ता नहीं मिल सकती।

राजद के नीतीश कुमार की सरकार में शामिल होने के तत्काल बाद ही सार्वजनिक रूप से लालू प्रसाद ने यह कह दिया था कि ‘राज्य में कानून -व्यवस्था लागू करने में राजद नीतीश कुमार को पूरा साथ देगा। कोई यह नहीं समझे कि वह किसी खास जाति का होने के कारण अपराध करके बच जाएगा।’

 उनका ऐसा रुख नब्बे के दशक में नहीं था। इसीलिए उसे जंगलराज कहा गया। पर एक चिंताजनक बात यह है कि लालू प्रसाद की अपील के बावजूद राजनीति के भीतर और बाहर के कुछ अपराधी उनकी बात नहीं सुन रहे हैं। लालू प्रसाद ने एक बार कहा था कि वे राज्य भर में घुम कर लोगों को समझाएंगे। पर अभी इसके लिए उन्हें समय नहीं मिला है। यह काम वे जितनी जल्दी कर लें, उतना ही अच्छा होगा।

क्योंकि कई बार सख्त-सटीक पुलिसिया कार्रवाइयों के बावजूद कुछ नेता-सह -अपराधी बार-बार जघन्य घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।

 क्योंकि उनमें गवाहों को खरीदने, धमकाने और अभियोजन पक्ष को प्रभावित करने की अपार शक्ति है। इस समस्या से राज्य सरकार कैसे निपटेगी, सब काम छोड़कर इस मुद्दे पर नीतीश कुमार को विचार करने की अधिक जरूरत है।

 सुशासन व विकास के क्षेत्र में मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार की बिहार में जितनी बड़ी उपलब्धियां हंै, उसमें कोई भी नेता अपने लिए अपेक्षाकृत बड़ी राजनीतिक स्पेस चाहेगा। दशकों से विकसित गुजरात में कुछ बेहतर काम कर लेना किसी नेता के लिए आसान है। क्योंकि वहां कुल मिलाकर सिस्टम काम करता है। पर, बिहार जैसे बिगड़े शासन व उससे भी अधिक बिगड़ी राजनीति वाले बीहड़ प्रदेश को पटरी पर ला देना मुश्किल काम माना जाता था। वह मुश्किल काम भी नीतीश ने कर दिखाया।

पर गत छह महीने से जो कुछ हो रहा है, वह नीतीश के राजनीतिक भविष्य के लिए भी सुखदायी नहीं होगा। क्या प्रतिपक्षी दलों की यह भविष्यवाणी अंततः सही साबित होगी कि जिस सरकार में राजद रहेगा, वह सरकार न तो विकास कर सकती है और न ही सुशासन ? हालांकि इस बीच जदयू के कुछ नेताओं के भी घृणित कारनामे सामने आते रहते हैं। हां, उनके खिलाफ भी राजनीतिक और प्रशासनिक कार्रवाइयां करने में नीतीश ने देरी नहीं की।

  यह सच है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में हाल में अपराध घटे हैं। पर चिंताजनक बात यह है कि अपराध की घटनाओं में सत्ताधारी दलों से जुड़े नेताओं और विधायकों के हाथ भी रहे हैं। जब सत्ता के लोग ही अपराध करने लगें तो लोगबाग अधिक भयभीत हो जाते हैं भले सामान्य अपराध का आंकड़ा नीचे गिर रहा हो।

 यानी धारणा और आंकड़ा अलग-अलग हैं।

 राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार नीतीश कुमार जैसे संयमी और ईमानदार नेता के लिए यह चिंता की बात होनी चाहिए। उन्हें अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को थोड़े समय के लिए भुलाकर बिहार को किसी भी कीमत पर फिर वैसा ही शासन देना चाहिए जैसा शासन उन्होंने जून, 2013 से पहले दिया था जब भाजपा उनकी सरकार में थी।

  जदयू के राष्ट्रीय महासचिव के.सी. त्यागी ने ठीक ही कहा है कि नीतीश कुमार में प्रधानमंत्री बनने के सारे गुण हैं। पर राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार जदयू जैसे एक छोटे दल के अच्छे नेता को भी उनकी अच्छाइयों को देखकर इस देश के अन्य दल प्रधानमंत्री बना देंगे, ऐसी अच्छी राजनीति इस देश में अभी नहीं है।
 इस देश के छोटे दलों के कुछ नेता झटके में या गठबंधन की मजबूरी के तहत प्रधानमंत्री बने हैं। पर वह अवसर भिन्न परिस्थितियों में आया था। अभी तो 2019 के चुनाव में देर है।

 वी.पी. सिंह तो प्रधानमंत्री बनने से पहले ही कई गैर कांगेेसी दलों के समूह के नेता बन चुके थे। यहां तो सहयोगी राजद भी नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री बनाना दिल से चाहता है या नहीं, यह भी एक बड़ा सवाल है। हालांकि लालू प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से यह कह दिया है कि नीतीश प्रधानमंत्री बनें तो यह अच्छा होगा। सन 2019 में नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं इस बारे में अभी कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है।
पर संस्कृत के एक श्लोक को नीतीश कुमार को याद रख लेना चाहिए। उसका अर्थ है -जो ध्रुव को छोड़कर अध्रुव की ओर जाता है, उसका ध्रुव भी चला जाता है। अध्रुव तो अधु्रव है ही।

    आज नीतीश कुमार ने नशाबंदी को जो मुद्दा उठाया है, वह बोफर्स मुद्दे से कम महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि अधिक है। याद रहे कि उन्होंने बिहार मेंं नशाबंदी की शुरुआत भी कर दी है। पर इसको लेकर गैर भाजपा राजनीतिक दलों में आम सहमति बननी अभी बाकी है।

उस आम सहमति की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इससे पहले बिहार को फिर से पटरी पर लाने के लिए नीतीश कुमार को एक बार फिर जी-जान लगा देनी चाहिए। इस काम में उन्हें लालू प्रसाद के दल के भरपूर सहयोग की जरूरत होगी।

 कोई सफल मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री बनना चाहता है तो इसमें किसी को कोई एतराज भी नहीं होना चाहिए। वैसे भी कई लोग यह मानते हैं कि बिहार के विकास के लिए यह जरूरी है कि इस राज्य से कोई प्रधानमंत्री बने।
लंबे समय से बिहार का शासन-संचालन के दौरान नीतीश ने भी यह अनुभव किया है कि केंद्र सरकार से भरपूर आर्थिक मदद मिले बिना बिहार को विकसित राज्य बनाया ही नहीं जा सकता है। यदि सिर्फ लंबे समय तक वह मुख्यमंत्री बने भी रहें और इसका अर्थाभाव में विकास नहीं कर सकें तो फिर कुछ साल के बाद उनकी पिछली उपलब्धियां भी फीकी पड़ जाएंगी। यदि इसलिए वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो बात समझ में आती है। पर अभी तो बिहार में ही उनका काम अधूरा है।

   (इस लेख का संपादित अंश 18 मई 2016 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)
     


शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

राजबल्लभ जैसों को टिकट देने से तोबा करेंगे दल !

 विधायक राजबल्लभ यादव के खिलाफ राजद का कदम सराहनीय है। पर, क्या यह दल भविष्य में ऐसे विवादास्पद नेताओं को टिकट देना बंद करेगा ? क्या अन्य दल भी विवादास्पद लोगों का अपने दल में प्रवेश रोकेंगे ?

यदि कभी ऐसा हुआ तो फिर लोकतंत्र को शर्मिंदा होना नहीं पड़ेगा। याद रहे कि बदल रहे राजद ने बलात्कार के आरोप के कारण राजबल्लभ को पार्टी से निलंबित कर दिया है। गत माह अपेक्षाकृत हल्के आरोप में जदयू ने अपने विधायक सरफराज आलम को दल से निलंबित किया था।

 राज्य के शांतिप्रिय लोग, राजनीतिक दलों से इसी तरह की उम्मीद करते हैं।

 राजद की ताजा कार्रवाई का विशेष महत्व है। क्योंकि 1990 से 2005 तक के कालखंड में गंभीर आरोपों के बावजूद लालू प्रसाद का दल आम तौर पर कार्रवाई नहीं करता था।

 1995 में राज बल्लभ यादव का टिकट इसलिए कट सका था क्योंकि अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले उसी दल के एक महत्वपूर्ण नेता ने राज बल्लभ के खिलाफ अभियान चला दिया था।

  लालू प्रसाद बदल रहे हैं, ताजा कार्रवाई उसका सबूत है। इस बदलाव की सराहना होनी चाहिए ताकि और अधिक बदलाव हो। अब लालू प्रसाद चाहते हैं कि कानून को अपना काम करने दिया जाना चाहिए। इसी कार्यशैली पर पहले से नीतीश सरकार काम करती रही है।

यह और बात है कि लालू प्रसाद की बदली हुई कार्यशैली को अपनाने में राजद के मंझले और छोटे दरजे के कुछ नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को कठिनाई हो रही है। राज बल्लभ यादव प्रकरण इसका नमूना है। अच्छा होगा यदि ऐसे अन्य राजदाई इस बात को समय रहते समझ लें। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि इस सरकार के नेता नीतीश कुमार को सत्ता से अधिक अपनी छवि प्यारी है।

   सब जानते हैं कि विवादास्पद नेता और आदतन अपराधी राजनीतिक कार्यकर्ता कौन-कौन हैं। क्या घटनाएं घट जाने के बाद ही ऐसे लोगों को दल से निष्कासित या निलंबित किया जाएगा ?

 लालू और नीतीश कुमार के साझे वोट बैंक की ताकत अब इतनी बढ़ चुकी है कि  उनके प्रभाव क्षेत्रों में शायद ही कोई स्थानीय क्षत्रप राजद-जदयू की इच्छा के खिलाफ चुनाव जीत पाएगा। यदि दस-पांच जीत भी जाएं तो उससे राजद-जदयू  पर कोई फर्क नहीं पड़ सकता है।

  अब यह स्थिति बन गयी है कि जदयू और राजद स्वच्छ छवि के राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं को भी टिकट देकर चुनाव जितवा सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो सामान्य अपराधों पर काबू पाने में भी सरकार को सुविधा होगी। साथ ही, जंगलराज का आरोप लगाने वालों की बोलती बंद हो जाएगी। हां, राजनीतिक विरोधियों के पास एक काम जरूर बच जाएगा। गैंगवार में ‘शहीद’ हुए बाहुबलियों के शवोंं पर रोने का काम।

(15 फरवरी, 2016 के दैनिक भास्कर,पटना से साभार)


सोमवार, 11 जनवरी 2016

बदले की भावना का आरोप लगा देने मात्र से ही नहीं मिल जाएगा राजनीतिक लाभ


इंदिरा की बहू सोनिया गांधी, इंदिरा की कहानी भला कैसे दुहरा सकंेगीं ? सी.बी.आई. ने 1977 में जब इंदिरा गांधी को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया था तो मजिस्ट्रेट ने पूर्व प्रधानमंत्री को तुरंत रिहा कर दिया
था। क्योंकि उनके खिलाफ सी.बी.आई. तब तक पूरा सबूत जुटा ही नहीं पाई थी।

उसके उलट दिल्ली हाईकोर्ट ने नेशनल हेराल्ड केस में आरोपियों के आचरण को प्रथम दृष्टि में ही संदिग्ध माना है। 1977 में इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेसियों के हंगामे का असर जनता के एक हिस्से पर पड़ा था।वह असर कांग्रेस के पक्ष में गया। क्योंकि उन्हें लगा कि सबूत के बिना ही उन्हें गिरफ्तार किया गया।

पर, ताजा हंगामे का कोई लाभ सोनिया-राहुल और कांग्रेस को मिलेगा, इस बात में अनेक लोगों को अभी संदेह है। यानी नाहक फंसाने की आशंका पर तो आरोपियों को लाभ मिल सकता है, पर ठोस सबूत पर लाभ नहीं मिलता। चारा घोटाले का केस भी इसका एक नमूना है। तब लालू प्रसाद के लोगों ने भी सड़कों पर काफी हंगामा किया था। 

सिर्फ नेशनल हेराल्ड का ही मामला नहीं है जो सोनिया-राबर्ट वाड्रा परिवार पर चल रहा है। इसलिए कांग्रेस हंगामे से कोई खास राजनीतिक लाभ पाने की स्थिति में लगती नहीं है। अब कांग्रेस के इस प्रथम परिवार
पर भ्रष्टाचार के जितने आरोप लग रहे हैं, उतने और इस तरह के आरोप इंदिरा परिवार पर तब नहीं थे। भले अन्य तरह के आरोप अधिक गंभीर थे। उनमें इमरजंसी लगाकर देश में लोकतंत्र समाप्त करने का आरोप
शामिल था।

वैसे कानूनी मामले को राजनीतिक स्वरुप देने की कोशिश अंततः सफल होगी या नहीं, इसका पता तभी चलेगा जब इस केस में अदालत का फाइनल निर्णय आएगा। वैसे भी केंद्र में कांग्रेस की सरकार है नहीं जो बोफर्स जैसे मामले को दफना दिया जाएगा।

याद रहे कि पहले तो बोफर्स मामले को दफना दिया गया। क्वात्रोची को देश से भगा देने का प्रबंध कर दिया गया। स्विस बैंक की लंदन शाखा में स्थित क्वात्रोची के खाते को फिर से चालू करा देने का प्रबंध करा दिया
गया जिसमें बोफर्स की दलाली के पैसे थे। उसके बाद कांग्रेस द्वारा यह प्रचार कर दिया गया कि बोफर्स घोटाले का आरोप ही गलत था।

नेशनल हेराल्ड मामले में अदालत को केस को तार्किक परिणति तक पहुंचा देने का पूरा मौका मिलेगा। क्योंकि अगला लोकसभा चुनाव 2019 में है। यानी कांग्रेस के सत्ता में लौटने की उम्मीद मई, 2019 तक तो बिलकुल ही नहीं है।

यदि इस बीच अदालत हेराल्ड केस में सोनिया-राहुल गांधी को दोषमुक्त कर देती है तब शायद कांग्रेस उसका राजनीतिक लाभ उठाने की स्थिति में हो सकती है। पर इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की प्रारंम्भिक टिप्पणी से लगता है कि डा. सुब्रहमण्यम स्वामी द्वारा तैयार यह केस काफी मजबूत है।

इससे पहले इस तरह के कम से कम दो मामले हाल के वर्षों में इस देश में सामने आये थे। इंदिरा गांधी का मामला 1977 का है। सन 1996 में चारा घोटाला सामने आया जिसके मुख्य आरोपी लालू प्रसाद हैं।

कभी लालू प्रसाद तथा उनके दल ने चारा घोटाले को लेकर राजनीतिक लाभ उठाने की भरपूर कोशिश की थी।सन 1996 में पटना हाईकोर्ट ने चारा घोटाले की जांच का भार सी.बी.आई. को सौंपा था। तब अदालत ने कह
दिया था कि ‘उच्चस्तरीय साजिश के बगैर इतना बड़ा घोटाला नहीं हो सकता था।’ पटना हाईकोर्ट की निगरानी में जब इस घोटाले की जांच आगे बढ़ी तो लालू प्रसाद और उनके दल ने विधायिका के भीतर और बाहर काफी हंगामा किया। पटना में सी.बी.आई. की जांच के खिलाफ राजद ने
तलवार जुलूस तक निकाला।

मुख्य जांचकत्र्ता और सी.बी.आई.के तत्कालीन संयुक्त निदेशक डा. यू.एन विश्वास को जान से मारने की धमकी तक दी गई। डा.विश्वास को पटना में विशेष सुरक्षा देनी पड़ी थी। डा.विश्वास ने पटना आने से पहले कोलकाता में अपनी पत्नी से कह रखा था कि इस जांच के सिलसिले में उनकी जान भी जा सकती है।

राजद ने सी.बी.आई., अदालत और अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ अपने लोगों की भावना भड़काने की काफी कोशिश की। इसके बावजूद न सिर्फ लालू प्रसाद जेल गये बल्कि सन 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजद की सीटें काफी घट गयीं। यानी उस सी.बीआई. विरोधी राजनीतिक अभियान का राजद को कोई चुनावी लाभ नहीं मिला।

इस घोटाले के सामने आने के बाद लालू प्रसाद की राजनीतिक ताकत इतनी घट गई कि सन 2000 में बिहार में सरकार के गठन के लिए राजद को कांग्रेस की मदद लेनी पड़ी थी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि चारा घोटाला केस मजबूत था। इस केस के कारण जनता के बीच के लालू प्रसाद के पुराने समर्थकों के एक बड़े हिस्से
का उन पर विश्वास नहीं रहा। आखिरकार निचली अदालत ने लालू प्रसाद को सजा दे दी है। उनकी अपील हाईकोर्ट में विचाराधीन है।

अब भी लालू प्रसाद का कहना है कि उन पर कोई केस नहीं बनता है। आज भी लालू की पार्टी सत्ता में है तो अकेले नहीं बल्कि साझी सरकार के जरिए है। हालांकि लगता है कि कटु अनुभवों के बाद लालू प्रसाद और
उनका परिवार बदला- बदला नजर आ रहा है। वे कहते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी शून्य सहनशीलता रहेगी और बिहार में विकास होगा। लालू प्रसाद अपने लोगों से लगातार यह अपील कर रहे हैं कि वे कानून को
अपने हाथों में नहीं लें।

देश के लिए यह अच्छा होगा यदि नेशनल हेराल्ड केस के जरिए इसी तरह सोनिया परिवार में भी बदलाव आ जाये। याद रहे कि 1977 में जब इंदिरा गांधी को सी.बी.आई. ने गिरफ्तार किया तो वह गिरफ्तारी केंद्र की तत्कालीन मोरारजी देसाई सरकार को उल्टा पड़ी।

हालांकि देसाई सरकार के पतन के पीछे सिर्फ यही एक कारण नहीं था। बल्कि जनता पार्टी का अंतरिक कलह मुख्य कारण था। तब के तीन बड़े नेताओं के बीच प्रारंभ से ही नहीं बन रही थी। हालांकि उस सरकार ने जनता के हक में अनेक अच्छे काम किये थे। 

दरअसल तत्कालीन गृहमंत्री चरण सिंह बदले की भावना से ओतप्रोत थे। वे जल्द से जल्द इंदिरा गांधी को जेल के भीतर देखना चाहते थे। इमरजंसी के अत्याचारों को लेकर चरण सिंह खास तौर से खफा थे।
परिणामस्वरुप 1977 में सी.बी.आई. ने इंदिरा गांधी के खिलाफ सबूत एकत्र करने से पहले ही इंदिरा गांधी को जल्दीबाजी में गिरफ्तार कर लिया था। सी.बी.आई. के अफसर जब इंदिरा गांधी के आवास पर गये तो इंदिरा
गांधी ने गुस्से में ऊंची आवाज में कहा कि ‘आपकी हथकडि़यां कहां हैं ? आप मुझे हथकड़ी लगाने ही आए होंगे।क्या गृहमंत्री ने आपको ऐसा करने का निदेश नहीं दिया है ?’

काफी हीला हवाला, शोरगुल और ड्रामे के बाद इंदिरा गांधी को अदालत मं पेश किया गया। अदालत में इंदिरा गांधी की ओर से बड़े -बड़े वकील खड़े थे जबकि अभियोजन पक्ष की तरफ से मामूली वकील थे। सरकारी वकील ने बार-बार अदालत का ध्यान एफ. आई. आर. की ओर खींचा जिसमें श्रीमती गांधी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों का जिक्र था।

जब मजिस्ट्रेट ने सबूत के बारे में पूछा तो सरकारी वकील ने कहा कि मामला एक ही दिन पहले दर्ज हुआ था लिहाजा और सबूत इकट्ठा करने का समय नहीं था। मजिस्ट्रेट ने इंदिरा गांधी को तत्काल मुक्त कर दिया।
इससे अनेक लोगों में यह धारणा बनी कि उन्हें नाहक फंसाया जा रहा था जिस कोशिश को अदालत ने विफल कर दिया।

याद रहे कि आरोप यह था कि चुनाव कार्यों के लिए एक फर्म से बड़ी संख्या में जीपें हासिल की गयी थीं। उस सिलसिले में इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री के रुप में अपने पद का दुरुपयोग किया था। ऐसा नहीं कि सबूत नहीं
थे। पर उन्हें हड़बड़ी में जुटाए नहीं जा सके थे। हड़बड़ी में इस बात का भी ध्यान नहीं रखा गया था कि अभियोजन की ओर से बड़े वकील अदालत में रहने चाहिए थे।

कुल मिलाकर अनेक लोगों की यह धारणा बनी कि बदले की भावना से ही इंदिरा गांधी को गिरफ्तार किया गया था। इसका लाभ 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिला। इंदिरा गांधी दुबारा सत्ता में आ गयी।लगता है कि कांगेस नेशनल हेराल्ड केस के जरिए 1980 दुहराना चाहती है। शायद इसीलिए सोनिया गांधी ने कहा कि मैं इंदिरा गांधी की बहू हूं। पर डा. स्वामी जल्दीबाजी में नहीं रहे। उन्होंने नेशनल हेराल्ड की संपत्ति
को कथित तौर पर हड़पने को लेकर मजबूत केस तैयार किया है। सुब्रह्मण्यम स्वामी के जो आरोप हैं,वे पहली नजर में ही मजिस्ट्रेट को भी मजबूत लगे।

इसको लेकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी तथा कुछ अन्य लोगों पर जो मामले बन रहे हैं, उस पर अनेक लोग विश्वास कर लेंगे, ऐसा संभव है। इसलिए बदले की भावना से नरेंद्र मोदी सरकार पर काम करने का
सिर्फ आरोप लगा देने से कांग्रेसी नेताओं का इस बार काम ंनहीं चलेगा।

केंद्र सरकार ने राहुल गांधी से उस आरोप का सबूत मांगा है जिसके तहत उन्होंने इसके लिए पी.एम.ओ. को दोषी ठहराया है। याद रहे कि सोनिया गांधी ने कहा है कि ‘मैं इंदिरा गांधी की बहू हूं। मैं किसी से नहीं डरती।’ उन्हें किसी से डरने की जरुरत ही नहीं है। उन्हें सिर्फ कोर्ट में जवाब देना है। कोर्ट के प्रति निरादर का भाव कांग्रेस का खास कर नेहरु-गांधी परिवार का पुराना है। 

हाल में भी जब सुप्रीम कोर्ट ने आर.एस.एस.से माफी मांगने का निदेश राहुल गांधी को दिया तो ऐसा करने से राहुल ने मना कर दिया। इससे पहले इमरजंसी में उन चुनाव कानूनों को ही इंदिरा गांधी ने बदलवा दिया था जिसके तहत 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनका चुनाव रद किया था। इतना ही नहीं आपातकाल में इंदिरा गांधी ने संविधान में 39 वें संशोधन के जरिए राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, स्पीकर और प्रधानमंत्री के चुनाव को
अदालती जांच के दायरे से बाहर कर दिया था। पर अब तो आपातकाल नहीं है। अदालतें स्वतंत्र हैं। बदली हुई स्थिति में नेशनल हेराल्ड केस में ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन को जायज ठहराते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने गत 7 दिसंबर, 2015 को कहा कि ‘सभी आरोपी एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल से जुड़े हैं। उन पर लगे अपराध के आरोप
की गंभीरता को देखते हुए उनके संदिग्ध आचरण की सच्चाई का पता लगाने के लिए जांच जरुरी है।’

याद रहे कि जब सी.बी.आई. ने इंदिरा गांधी को 1977 में गिरफ्तार करके अदालत में हाजिर किया था तो अदालत ने ऐसी कोई बात नहीं कही थी। बल्कि सी.बी.आई. से सबूत मांगा था जिसे जांच एजेंसी तत्काल पेश नहीं कर सकी थी । हालांकि यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि इंदिरा गांधी के खिलाफ सबूत थे ही नहीं। दरअसल तब की राजनीतिक कार्यपालिका को इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करवाने की जल्दीबाजी थी। इसलिए उसे जुटाने से पहले ही इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के लिए सी.बी.आई. को उनके आवास पर भेज दिया गया।

इस पृष्ठभूमि में सोनिया गांधी के यह कहने का कोई अर्थ नहीं है कि ‘मैं इंदिरा गांधी की बहू हैं।’ क्या आज इंदिरा गांधी की कहानी दुहराना संभव है? शायद नहीं। सोनिया गांधी को सी.बी.आई. द्वारा गिरफ्तारी और कोर्ट द्वारा समन भेजे जाने के बीच के फर्क को समझना होगा। कोर्ट के किसी कार्रवाई या आदेश के प्रति आम तौर पर लोगों में सम्मान का भाव रहता है।

बिहार में हाल के वर्षों में कई मामलों में यह देखा गया है कि किसी नेता के खिलाफ जब किसी कोर्ट का आदेश सामने आता है तो उस नेता के प्रभाव क्षेत्र के मतों में से कुछ वोट उनके हाथ से बाहर हो जाते
हैं। कई बार वे चुनाव हार भी जाते हैं।

(09 दिसंबर 2015 )

मोदी पर नीतीश के बयान पीछे राजनीति नहीं


सत्तर के दशक की बात है। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई सोवियत संघ के दौरे पर थे। एक विदेशी संवाददाता ने उनसे पूछा कि दोनों देशों की बातचीत में असहमति के कौन-कौन से मुद्दे थे ? देसाई ने प्रति सवाल किया कि ‘क्या आप सहमति के मुददों को लेकर कोई सवाल नहीं कर सकते थे ?’

इसी तरह इन दिनों लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के बीच असहमति के मुददों की कुछ अधिक ही खोज हो रही है। हो सकता है कि कुछ मुद्दों पर दोनों नेताओं में असहमति हों। पर राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार ऐसे मुददों में भी टकराव का आविष्कार किसी के हित में नहीं है जहां ऐसा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की
पाकिस्तान यात्रा भी ऐसा ही एक मुद्दा था। उस पर नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के अलग-अलग तरह के बयान जरुर आये थे। पर, उन बयानांे का बिहार की महागठबंधन सरकार से भला क्या संबंध ?

जो लोग यह मानकर चलते हैं कि किसी एक गठबंधन के दलों के नेताओं को हर मुददे पर एक ही स्वर में बोलना चाहिए, उनलोगों ने दोनों नेताओं के अलग -अलग तरह के उपर्युक्त बयानों में राजनीति खोज ही ली। पर अब तो लालू प्रसाद ने यह कह दिया कि ‘मैंने नीतीश कुमार की बात नहीं काटी थी। मेरा यही कहना है कि देश सुरक्षित हाथों में नहीं है।’

उधर प्रधानमंत्री की पाकिस्तान यात्रा पर नीतीश कुमार ने कहा था कि उनकी यात्रा सही दिशा में एक कदम थी। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार ने देशहित को ध्यान में रखते हुए उनकी पाकिस्तान यात्रा की सराहना की। वैसे भी आज पाकिस्तान से संवाद बनाये रखने के सिवा भारत जैसे शांतिप्रिय देश के पास और रास्ता ही क्या है ?

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि नीतीश कुमार ने गठबंधन में शामिल दल की लाइन के खिलाफ अपनी स्वतंत्र राजनीतिक लाइन ली है। जदयू ने राष्ट्रपति चुनाव में प्रणव मुखर्जी को वोट दिये थे। भाजपा की लाइन अलग
थी। याद रहे कि तब बिहार में जदयू-भाजपा की मिलीजुली सरकार थी और नीतीश कुमार मुख्य मंत्री थे।

दरअसल नेता अगले चुनाव को ध्यान में रखकर काम करते हैं और ‘स्टेट्समैन’ अगली पीढि़यों को ध्यान में रखकर अपने कदम उठाते हैं। 

इस संबंध में डा. राम मनोहर लोहिया का एक उदाहरण मौजूं होगा। डा.लोहिया ने 1967 में चुनाव की पूर्व संध्या पर यह कह दिया था कि देश में समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए। तब वे खुद एक ऐसे क्षेत्र में उम्मीदवार थे जहां अल्पसंख्यकों की बड़ी संख्या थी। इस पर उनके समाजवादी मित्रों ने कहा कि ऐसे बयान के बाद तो अब आपको अल्पसंख्यकों के मत नहीं मिलेंगे। इस पर डा. लोहिया ने कहा कि ‘मैं वोट के लिए नहीं बल्कि देश के हित के लिए राजनीति करता हूं।’

शनिवार, 2 जनवरी 2016

संतोष गिरोह से कम नहीं गुणवत्ता से समझौता करने वाले

न तो समयबद्धता का ध्यान और न ही निर्माण में गुणवत्ता। ऐसे में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाराज होना स्वाभाविक ही था। राजगीर में बिहार पुलिस अकादमी के निर्माणाधीन भवन का हाल देख-सुनकर किसी को भी गुस्सा आ जाये ! 

मुख्यमंत्री के गृह जिले में यह हाल है जहां वे अक्सर जाते रहते हैं। राज्य के दूर-दराज इलाकों में सरकारी
निर्माण कैसे चल रहा होगा, इसकी कल्पना कठिन नहीं है। 

इस सिलसिले में एक उदाहरण पर्याप्त होगा।

2014 के अगस्त की बात है। मुजफफरपुर जिले से यह खबर आई कि 25 करोड़ रुपये की लागत से बना पुल उद्घाटन से पहले ही ध्वस्त हो गया। बागमती नदी की उपधारा पर बसघटा के पास बिहार राज्य पुल निर्माण निगम ने वह पुल बनवाया था।

स्थानीय लोगों ने बताया कि घटिया सामग्री के इस्तेमाल के कारण ऐसा हुआ।शासन ने भी कहा कि इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। पता नहीं चला कि कोई कार्रवाई हुई भी या नहीं।

दरअसल ऐसे मामलों में आम तौर पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती। इसलिए भी गलत काम करने वालों का धंधा चलता रहता है। आम लोगों के जानमाल की कीमत पर ऐसा हो रहा है। राजगीर का मामला भी उसी कड़ी में है। बागमती पुल जैसे मामले यदाकदा सामने आते रहते हैं।

क्या ऐसे घोटालेबाज और कामचोर लोग संतोष झा गिरोह की अपेक्षा राज्य को कम नुकसान पहुंचाते हैं ? याद रहे कि दरभंगा जिले में निर्माण कार्य में लगे दो इंजीनियरों की हाल में हत्या कर दी गयी। संतोष गिरोह ने 75 करोड़ रुपये की रंगदारी मांगी थी। न देने पर हत्या की गयी।

हालांकि यह समस्या सिर्फ बिहार सरकार में ही नहीं है। पिछले महीने रेलवे सुरक्षा आयुक्त पी.के. आचार्य पटना आये थे। वे दीघा-पहलेजा रेल पुल का निरीक्षण कर रहे थे। उन्होंने उसमें कई गड़बडि़यां पायीं।
जांच स्थल पर ही उन्हें यह कहना पड़ा कि जब तक कुछ लोगों को निलंबित नहीं किया जाएगा, तब तक वे सुधरेंगे नहीं। इस देश में आखिर यह सब क्या हो रहा है ?

राजगीर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब स्थल निरीक्षण किया, तब उन्हें यह पता चला कि सब कुछ ठीकठाक नहीं है।

स्थानीय रेलवे अधिकारियों द्वारा सब कुछ ठीकठाक घोषित कर देने के बाद ही मुख्य सुरक्षा आयुक्त स्थल निरीक्षण पर जाते हैं। इसके बावजूद आचार्य ने गत 17 दिसंबर को यह पाया था कि रेल की पटरी से दो बोल्ट गायब थे। एक अन्य स्थान पर उन्होंने पटरियों को जोड़ने के स्थान पर ‘होल’ को गलत पाया।

सवाल यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और सुरक्षा आयुक्त पी.के आचायर् से पहले नीचे के अन्य संबंधित अधिकारी गण इन चीजों को ठीक क्यों नहीं करते ? इसके पीछे काहिली है या भ्रष्टाचार ? या फिर तकनीकी
पक्ष की कमजोरी ? क्या इस देश के अभियंताओं की शिक्षा-दीक्षा में ही कुछ कमी रह जा रही है। 

संतोष झा गिरोह की धरपकड़ के लिए विशेष पुलिस दस्ते गठन हुआ है। क्या निर्माण की गुणवत्ता और समयबद्धता बनाये रखने के लिए भी किसी स्पेशल टास्क फोर्स का गठन किया जाएगा? मुख्यमंत्री तो हर जगह निरीक्षण कर नहीं सकते।


( 2 जनवरी, 2016 के दैनिक भास्कर,पटना से साभार)

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

नीतीश के प्रामाणिक नेतृत्व के कारण महागठबंधन का फैलाव अधिक आसान

   जदयू ने बिहार के  बाद अब पूरे देश में राजग विरोधी दलों का महागठबंधन खड़ा करने का निर्णय किया है। बिहार की चुनावी सफलता के बाद यह स्वाभाविक है। साथ ही, यह मौजू भी है। क्योंकि राजग राष्ट्रीय स्तर पर भी पहले की अपेक्षा अब कमजोर पड़ रहा है। नरेंद्र मोदी की तेजस्विता भी मद्धिम पड़ रही है।

जिन भारी-भरसक घोषित-अघोषित वायदों के साथ नरेंद्र मोदी सत्ता में आये थे, उन्हें पूरा करने में राजग सरकार को अब तक सीमित सफलता ही मिल सकी है। मोदी जी समस्याओं की सर्जरी के बदले उनका होमियोपैथी इलाज कर रहे हैं। ऐसे में देरी होती है। लोगों को उतना धैर्य नहीं होता। हालांकि लोगबाग अभी उनसे निराश नहीं हुए हैं, पर केंद्र की राजग सरकार के प्रति समर्थन के उत्साह में कमी आ रही है। यदि आने वाले महीनों में मोदी सरकार ने जनहित में कुछ चैंकाने वाले काम नहीं किये तो राजग के लिए महंगा पड़ेगा।

लोकतंात्रिक व्यवस्था की यह मांग है कि इस बीच मजबूत विकल्प खड़ा किया जाये। अब अकेले कांग्रेस तो विकल्प बनने की स्थिति में बिलकुल नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि कांग्रेस के अनेक बड़े नेता भ्रष्टाचार, संपत्ति विवाद और अन्य तरह के गैर राजनीतिक आरोपों को लेकर बचाव की मुद्रा में हैं। 

ऐसी ही स्थिति में यानी महाघोटालों के गंभीर आरोपों के बीच 2014 के लोकसभा चुनाव में मनमोहन सरकार को जनता ने धूल चटा दी। यानी भ्रष्टाचार के आरोपों से सने नेताओं और दलों को आम तौर पर जनता सत्ता नहीं सौंपती जब तक कि उनका कोई मजबूत जातीय वोट बैंक नहीं हो।

  कभी कांग्रेस का अपना मजबूत जातीय वोट बैंक हुआ करता था। पर वह कई कारणों से छिजता चला गया। अब कांग्रेस यदि किसी गठबंधन में राष्ट्रीय स्तर पर भी सहयोगी रोल में ही रहे तो बेहतर होगा। कांग्रेस की यह कमजोरी भी खुलकर सामने आ रही है कि उसका अपना नेतृत्व न तो प्रामाणिक है और न ही कल्पनाशील। वंशवाद की यही तो सबसे बड़ी बुराई है। उसमें लचर नेतृत्व को भी पार्टियां ‘ढोती’ हैं।

      इधर जदयू के पास नीतीश कुमार के रूप में एक प्रामाणिक नेता  उपलब्ध है। किसी अन्य नेता की अपेक्षा नीतीश कुमार के नाम पर देश के अधिकाधिक दलों को जुटा लेने की अधिक संभावना है।

  वैसे जदयू यह जरूर कहता है कि नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। खुद नीतीश कुमार ने भी कभी यह नहीं कहा कि वे इस पद के उम्मीदवार हंै। पर उनके समर्थक और प्रशंसक यदि ऐसा कहते हैं तो वैसा कहने का समय अब आया है।

  ऐसा कहने का समय तब नहीं था जब गत लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी यू.पी.ए. सरकार के साथ चुनावी मुकाबले में थे।

महा भ्रष्टाचार और एकतरफा व ढोंगी धर्मनिरपेक्षता की नीति पर चल रहे यू.पी.ए. सरकार के खिलाफ नरेंद्र मोदी इस देश के अधिकतर मतदाताओं को बेहतर लगे। नरेंद्र मोदी के पास भाजपा के रुप में  एक मजबूत पार्टी भी थी जिसमें लोगों ने कांग्रेस का विकल्प देखा। पर 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या होगा ? राजग सरकार और नरेंद्र मोदी की छवि में छीजन जारी रही तो लोगबाग विकल्प खोजेंगे ही। 

  हालांकि अभी तो असम, पश्चिम बंगाल (2016) और उत्तर प्रदेश (2017) जैसे प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों के राजनीतिक दलों यह तय करना है कि वे अकेले लड़ेंगे या बिहार माॅडल अपना कर प्रतिद्वंद्वी दलों को पराजित करेंगे।

 इन राज्यों में महागठबंधन के गठन की राह में बाधाएं हंै। क्योंकि वहां नेताओं के बीच व्यक्तिगत अहं का भीषण टकराव है।

 हालांकि असम में महागठबंधन की राह आसान हो सकती है। वैसे कुल मिलाकर महागठबंधन के नेताओं खासकर नीतीश कुमार का राजनीतिक कौशल में कसौटी पर होगा। यदि इन राज्योंे में सफलता मिल गई तो 2019 का चुनाव महागठबंधन के लिए आसान हो जाएगा।

महागठबंधन का अंतिम लक्ष्य 2019 का लोकसभा चुनाव रहेगा।

 तब यदि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग को चुनावी सफलता नहीं मिलती है तो गैर राजग दलों में से ही किसी न किसी नेता को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिलेगा।

 देश के विभिन्न नेताओं की छवि और उपलब्धियों के तुलनात्मक अध्ययन के बाद अधिकतर राजनीतिक प्रेक्षक इस नतीजे पर आसानी से पहुंच सकते हंै कि नीतीश कुमार का स्थान सबसे ऊपर रहेगा। यह बिहार के लिए भी गौरव की बात है। यदि नीतीश प्रधानमंत्री बने तो वे बिहार से पहले पी.एम. होंगे।

हालांकि तब भी नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं, यह अन्य अनेक बातों पर निर्भर करेगा।

  इस देश के छह पूर्व मुख्यमंत्री अब तक प्रधानमंत्री बन चुके हैं। वे हैं मोरारजी देसाई (बंबई), चरण सिंह व वी.पी. सिंह (उत्तर प्रदेश), नरसिंह राव (आंध्र प्रदेश), एच.डी. देवगौड़ा (कर्नाटका) और नरेंद्र मोदी (गुजरात)।

इसलिए यह सवाल उठाना भी बेमानी है कि कोई क्षेत्रीय नेता, प्रधानमंत्री के रूप में कितना ठीक रहेगा।

    यहां यह कहना प्रासंगिक होगा कि जो लोग गत लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री मेटेरियल बता रहे थे, वे जल्दीबाजी कर रहे हैं। क्योंकि देश की उम्मीदों के केंद्र नरेंद्र मोदी की तेजस्विता तब तक मद्धिम नहीं पड़ी थी।

  हाल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि जिस अनुपात में सत्ताधारी नेता का करिश्मा कम होने लगता है, उसी अनुपात में मुख्य प्रतिद्वंद्वी दल के नेता की छवि भी निखरती है। यदि महागठबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने में नीतीश कुमार सफल हो गये तो राष्ट्रीय स्तर पर मुख्य प्रतिद्वंद्वी नीतीश कुमार बन सकते हैं।

  यहां यह मानकर भी चला जा रहा है कि कांग्रेस के बड़े -बड़े नेताओं को विवादास्पद कानूनी परेशानियों से अगले लोकसभा चुनाव तक शायद फुर्सत नहीं मिल पाएगी। 

  कुल मिलाकर आने वाली राजनीति के संकेत यह हैं कि महागठबंधन के कारगर विस्तार व चुनावी सफलता का श्रेय बिहार के नेता को मिल सकता है। पर इसके साथ एक शर्त है। इस बीच बिहार की नीतीश सरकार और भी बेहतर काम करे। शर्त यह है कि कांग्रेस तथा राजद के राज्य भर के छोटे- बड़े नेतागण सुशासन और न्याय के साथ विकास के काम में नीतीश कुमार का पूरे दिल से साथ देते रहें। अब तक राजद और कांग्रेस ने अच्छे संकेत दिए हैं। पर पता नहीं  आगे क्या होगा! नीतीश सरकार की उपलब्धियां  2019 के लोकसभा चुनाव में राजग विरोधी दलों के काम आएंगीं। गुजरात की उपलब्धियों की पृष्ठभूमि में लोगों ने 2014 में नरेंद्र मोदी को हाथों-हाथ लिया था। क्या ऐसा हो पाएगा ?  

(22 दिसंबर, 2015 के दैनिक भास्कर,पटना से साभार) 
  
  

सही सबक के लिए परिणाम का वस्तुपरक आकलन जरूरी

बिहार चुनाव का नतीजा एक महीना पहले आ गया था। इतना समय बीत जाने के बावजूद उसके नतीजों के कारणों को लेकर कुछ हलकों में अब भी कन्फ्यूजन बना हुआ है। या, फिर  यह कन्फ्यूजन भी राजनीतिक ही है?

  इस संबंध में ताजा बयान पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती और माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य के आये हैं। जानकार लोगों के अनुसार इन बयानों से भी सही नतीजों तक पहुंचने में मदद नहीं मिलती।

 पहले के अधिकतर बयान भी ऐसे ही थे। हालांकि दोनों पक्षों में कुछ नेता ऐसे जरूर हैं जो हकीकत जानते हैं। चुनाव हारने वाले को हार के सही कारणों की जानकारी होनी ही चाहिए। इससे उसे आगे की राह तय करने में सुविधा होती है। जीतने वाले दल को आगे भी विजयी होते जाने की राह मिलती है।

पर बिहार विधानसभा चुनाव के बाद दोनों पक्षों के अनेक नेताओं को रिजल्ट के असली कारणों का पता ही नहीं है। उनके बयानों से तो यही लगता है।

  2004 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार तब लोकसभा चुनाव में हार गयी थी। उससे पहले राजग सरकार ने इंडिया साइनिंग का नारा दिया था।

अटल के कार्यकाल में कई अच्छे काम हुए भी थे। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडु की राज्य सरकार ने भी बहुत अच्छे काम किये थे। लोकसभा चुनाव के साथ ही आंध्र में विधानसभा का चुनाव भी हुआ था। तब नायडु का दल भी सत्ता से बाहर हो गया था।
तब कांग्रेस को लगा था कि विकास से वोट नहीं मिलते। अनेक बुद्धिजीवियों ने ऐसा ही प्रचार भी किया था। वे कहते थे कि दलीय व जातीय समीकरण से वोट मिलते हैं। पर,यह अधूरा सच था।

  अटल सरकार और नायडु सरकार की हार का कारण दूसरा था। उसने विकास पर तो ध्यान दिया, पर जातीय समीकरण को नजरअंदाज कर दिया। याद रहे कि आम तौर पर क्षेत्रीय दल जातीय पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं। भाजपा ने 2004 के चुनाव से ठीक पहले एक-एक करके अपने कई सहयोगी दलों को राजग से अलग हो जाने पर मजबूर कर दिया था। 2004 में आंध्र में नायडु इसलिए हारे क्योंकि अल्पसंख्यक मतदताओं ने नायडु सरकार का साथ छोड़ दिया था। नायडु के विकास की हार नहीं थी। उन्हें फिर भी 37 प्रतिशत मत मिले थे।

2004 में कांग्रेसनीत यू.पी.ए. सरकार बनी। आंध में भी कांगे्रस की सरकार बनी। इन दोनों सरकारों ने नायडु और अटल सरकारों के विकास और सुशासन से कोई शिक्षा ग्रहण नहीं की। दोनों सरकारेंं भ्रष्टाचार में डूब गयीं।

  यू.पी.ए. सरकार के कार्यकाल में महाघोटालों की बाढ़ आ गयी। साथ ही एकपक्षीय धर्मनिरपेक्षता अभियान चलाया गया। नरेंद्र मोदी ने इसका लाभ उठाया।

  बिहार की ताजा जीत में सुशासन, विकास और मजबूत सामाजिक समीकरण की मुख्य भूमिका थी। अन्य तत्वों की भूमिका कम थी। हां,नीतीश कुमार के रूप में एक प्रामाणिक नेतृत्व मतदाताओं के सामने था।

 निष्पक्ष प्रेक्षकों के अनुसार महागठबंधन की जीत में संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान ने निर्णायक भूमिका निभाई जिसमें उन्होंने आरक्षण की समीक्षा करने की जरूरत बताई थी।

 एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के अनुसार राजग को बिहार में महागठबंधन पर करीब चार प्रतिशत की बढ़त मिल रही थी। पर भागवत के आरक्षण पर लगातार तीन बयानों के बाद स्थिति बदल गयी। यहां तक कि दलितों पर भी इस बयान का असर पड़ा। इसके बावजूद नतीजे आने के बाद भाजपा के नेतृत्व से नाराज नेतागण हार के लिए नरेंद्र मोदी, अमित शाह और बिहार भाजपा के नेतृत्व को दोषी ठहराने लगे।

 हां, बिहार चुनाव का एक बड़ा सबक भाजपा के लिए है। भाजपा नेतृत्व आरक्षण के दायरे में आने वाले लोगों को अपने कर्मों के जरिए विश्वास दिलाये। यह कि न सिर्फ वह आरक्षण का बिना शर्त समर्थन करता है बल्कि उन लोगों के लिए अब कुछ अधिक ही करना चाहता है।

  एक समाजशास्त्री ने केंद्र की भाजपानीत सरकार को यह सलाह दी थी  कि वह 27 प्रतिशत आरक्षण में से अति पिछड़ों के लिए 15 प्रतिशत सीटें अलग से आरक्षित कर दे। पर केंद्र सरकार ने इस सलाह पर अभी ध्यान नहीं दिया है। सरकार को दलितों के लिए भी कुछ खास करना पड़ेगा अन्यथा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी भाजपा का हाल बिहार जैसा ही हो सकता है।

 क्या भाजपा देश की इस सामाजिक सच्चाई को अब भी समझेगी? दरअसल आरक्षण को लेकर भाजपा का इतिहास संदिग्ध रहा है। मंडल आरक्षण लागू करने वाले वी.पी. सिंह की सरकार भाजपा ने ही 1990 में गिरा दी थी।

  शायद पिछड़ों-दलितों के लिए कुछ खास करना नहीं पड़े, शायद इसीलिए भी भाजपा के अनेक नेता मोहन भागवत को जिम्मेदार नहीं मान रहे हैं। जबकि जिन भाजपा नेताओं ने अपने पुत्रों को बिहार विधानसभा चुनाव में खड़ा करा रखा था, उन्होंने जरूर भागवत को जिम्मेदार ठहराया था। ये नेता अपने पुत्र के लिए चुनाव प्रचार के दौरान जनता के काफी करीब गये थे। 

 अधिकतर भाजपा नेता तो भागवत पर अंगुली उठाने से डरते हैं। कुछ भाजपा नेताओं को नरेंद्र मोदी-अमित शाह से बदला लेने का बहाना भी  मिल गया है। 

  इसी तरह महागठबंधन के दल भी जीत के सही कारणों को नहीं समझेंगे तो उन्हें आगे भी चुनावी जीत हासिल करते रहने में दिक्कत आएगी।

 दरअसल चुनावी राजनीति के साथ समस्या यह है कि नतीजे का विश्लेषण अक्सर वस्तुपरक की जगह व्यक्तिपरक होकर किया जाता है।

   अब रही महबूबा और दीपंकर की बातें तो वे अपनी बनी-बनायी राजनीतिक लाइन के अनुसार ही बयान दे रहे थे।

 माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य राम मंदिर पर भागवत के बयान की चर्चा करते हुए हाल में कहा कि बिहार में शिकस्त  के बावजूद भाजपा ने कुछ नहीं सीखा है।

   उधर महबूबा मुफ्ती ने शनिवार को कहा कि बिहार के नतीजों ने वैसे तत्वों को अच्छा सबक सिखाया जो हिन्दुत्व के नाम पर राष्ट्रवाद का दुरुपयोग कर रहे हैं। महबूबा का इशारा भाजपा के उन कुछ अतिवादी नेताओं की ओर था जो अपने विवादास्पद बयानों से उत्तेजना पैदा करते रहते हैं। पर जानकार लोगों के अनुसार वे तत्व इस बार कोई कारगर भूमिका नहीं निभा सके। बल्कि उससे पहले लोकसभा चुनाव में वैसे बयानों ने कुछ मतदाताओं की भावनाएं भड़काई थीं। बिहार विधानसभा चुनाव में हिन्दुत्व के मुद्दों की अपेक्षा आरक्षण तथा अन्य तत्व काफी अधिक महत्वपूर्ण रहे। पर यह समझने से कुछ नेता अब भी इनकार कर रहे हैं।


           (08 दिसंबर, 2015 के दैनिक भास्कर, पटना से साभार )
  

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

देश के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल छोड़ दिया था त्यागी जी ने

चुनावी टिकट के लिए अपनी पार्टी कौन कहे, आज  कुछ नेता तो अपने रिश्तेदारों तक से भी बगावत पर उतारू हैं। राजनीति में गिरावट की इंतिहा वाले इस दौर में पचास साल पहले की एक राजनीतिक घटना को याद कर लेना मौजूं होगा। तब एक नेता ने देशहित में केंद्रीय कैबिनेट तक से इस्तीफा दे दिया था।

ऐसे समय पर उस घटना को याद करना और भी जरुरी है क्योंकि  इन दिनों अपना देश 1965 के युद्ध की स्वर्ण जयंती मना रहा है।

नई पीढ़ी के लिए यह जानना जरुरी है कि हमारे नेताओं ने  50 साल में राजनीति को कहां से कहां पहुंचा दिया है। आज खुलेआम कई बड़े नेताओें पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने पैसे लेकर टिकट बेच दिए।

1965 में  भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ था। 1962 में चीन के हाथों पराजय के तीन ही साल बाद 1965 के युद्ध में भारत को भारी कामयाबी मिली थी। पर, ताशकंद समझौते से वह कामयाबी कायम नहीं रह सकी।

तत्कालीन केंद्रीय पुनर्वास मंत्री महावीर त्यागी इस बात के सख्त खिलाफ थे कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ताशकंंद समझौते पर मुहर लगाए।

उस समझौते मंे  पाकिस्तान की जीती हुई जमीन वापस कर देनी थी। मंत्रिमंडल को  अमादा देख त्यागी जी ने मंत्रिमंडल से ही इस्तीफा दे दिया। उन्होंने  कहा था कि ‘मैं ताशकंद समझौते के ध्येय  से सहमत हूं। पर समझौते में कुछ बातें ऐसी हैं जो हमारी सरकार और हमारी पार्टी की ओर से सितंबर, 1965 के बाद की गई घोषणाओं के  विपरीत हंै। 

5 अगस्त, 1965 को जीती हुई हाजी पीर की चैकियों को छोड़ना भयंकर भूल होगी, विशेषकर जबतक पाकिस्तान अपने छापामारों, गुप्तचरों और बिना वर्दी के हथियारबंद सैनिकों को वापस बुलाने और भविष्य में ऐसे आक्रमण न करने को राजी नहीं होता है।

 त्यागी जी ने यह भी कहा था कि हाजी पीर सैनिक दृष्टि से इतना महत्व का स्थान है कि जिस सेना का इस मोर्चे पर कब्जा होगा, उसे किसी भी हालत में हटाना संभव नहीं होगा। बिना इस मोर्चे को अपने हाथ में लिए हमें कश्मीर के उस हिस्से को अपने कब्जे में लेना असंभव है जिसको पाकिस्तान ने हड़प रखा है।

  याद रहे कि युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कई बार यह घोषणा की थी कि कश्मीर की वह भूमि, जिसका पाकिस्तान ने अपहरण कर लिया था और जिसे हमने इस युद्ध में पाकिस्तान से छीन लिया है, उसे हम किसी भी शत्र्त पर नहीं लौटाएंगे।

  यह और बात है कि किसी खास परिस्थिति में उन्हें ताशकंद समझौता करना पड़ा। पर उसके लिए महावीर त्यागी जिम्मेदार नहीं थे। वह मंत्रिमंडल में आराम से बने रह सकते थे। पर उन्होंने जब  महसूस किया कि हाजी पीर लौटाना देश की सुरक्षा के लिए उचित नहीं है तो उन्होंने मंत्री पद को ठोकर मार दी।

    आज बिहार  चुनावी  टिकट के लिए बेशर्मी का नंगा नाच कर रहे अनेक नेतागण महावीर त्यागी के त्याग की कहानी पढ़कर थोड़ा भी  शर्म करेंगे ? पता नहीं ! 

(23 सितंबर, 2015 )