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गुरुवार, 20 अगस्त 2020

राजीव गांधी -: संभावनाओं का असमय अंत

जन्मदिन पर


सन 1984 में प्रधानमंत्री बनने से पहले ही राजीव गांधी की छवि ‘मिस्टर क्लिन’ की बननी शुरू हो गई थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से दो महत्वपूर्ण बातें कह दीं। उन बातों से लगा कि वे इंदिरा गांधी की कमी को भी पूरा कर देंगे।


इंदिरा गांधी भ्रष्टाचार के प्रति सहिष्णु थीं। इस देश के लिए उस सबसे बड़े मर्ज के बारे में श्रीमती गांधी कहती थीं कि ‘‘भ्रष्टाचार तो वर्ल्ड फेनोमेना है।’’ यानी, यह जब पूरे विश्व में है तो यहां भी है, फिर इसमें कौन सी बड़ी बात है ?


इसके उलट राजीव गांधी ने ‘‘सत्ता के दलालों’’ के खिलाफ जोरदार आवाज उठा दी। उन्होंने एक अन्य अवसर पर यह भी कह दिया कि केंद्र सरकार दिल्ली से 100 पैसे भेजती है, किंतु गांव तक उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही पहुंचते हैं। उससे पहले देश के तीन राज्यों के विवादास्पद कांग्रेसी मुख्यमंत्री जब एक साथ हटा दिए गए थे तो यह कहा गया कि इसके पीछे पार्टी महासचिव राजीव गांधी का ही हाथ है। उन्हें भ्रष्टाचार पसंद नहीं है।


इन बातों से अनेक लोगों में यह धारणा बनी कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक कदम उठाएंगे।

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पर, अंततः ऐसा नहीं हो सका। कई कारणों से प्रधानमंत्री के रूप में उनके कदम डगमगाने लगे।

राजनीतिक रूप से दूरदर्शी लोगों को लगने लगा कि मिस्टर क्लीन से जो उम्मीद की गई थी, वह पूरी नहीं होती लगती है। यानी एक विराट संभावना का असमय अंत होने लगा।

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राजीव की पहली गलती

बोफर्स तोप सौदा घोटाला और एक-एक कर अन्य घोटाले सामने आने लगे। सर्वाधिक चर्चा बोफर्स की हुई क्योंकि उसके दलालों में एक क्वात्रोचि इटली का था। उसकी प्रधानमंत्री के आवास में किसी सुरक्षा जांच के बिना सीधी पहुंच थी। 

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दूसरी गलती

1989 के भागलपुर सांप्रदायिक दंगे के समय वहां के विवादास्पद एस.पी. का तबादला प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने रुकवा दिया। मुख्यमंत्री से पूछे बिना। दंगे के दौरान ही मुख्यमंत्री ने तबादला कर दिया था। तबादला रुकने के बाद और अधिक हत्याएं हुईं। नतीजतन कांग्रेस का वोट बैंक पूरे देश में उससे अलग हो गया।

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तीसरी गलती

1990 में जब मंडल आरक्षण आया तो कांग्रेस हाईकमान को उस पर कोई स्टैंड लेना था। ‘‘राजीव गांधी के कहने पर मणिशंकर अय्यर ने आरक्षण पर एक प्रस्ताव तैयार किया। उसमें कहा गया था कि आरक्षण को पूरी तरह ठुकरा दिया जाना चाहिए।


मणि द्वारा तैयार प्रस्ताव पर कांग्रेस कार्यसमिति व राजनीतिक मामलों की समिति की साझी बैठक में विचार होना था। प्रस्ताव पेश होते ही समिति में शामिल पिछड़ी जाति के नेताओं ने मणि द्वारा तैयार प्रस्ताव का कड़ा विरोध कर दिया।’’

--इंडिया टूडे-30 सितंबर 1990


इस पर राजीव दुविधा में पड़ गए। फिर भी उनपर मणिशंकर अय्यर का असर कायम रहा। मंडल आरक्षण पर राजीव गांधी ने संसद में तीन घंटे तक भाषण किया। उस भाषण से इस देश के अधिकतर पिछड़ों को ऐसा लगा कि कांग्रेस आरक्षण का दिल खोलकर समर्थन नहीं कर रही है।


1989 के बाद एक बार फिर 1991 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला। उसके बाद तो किसी चुनाव में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला।

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राजीव गांधी अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर में सच्चे, सहृदय और शालीन नेता के रूप में उभरे थे। वे कोरे कागज थे। लोगबाग उनसे प्रभावित भी थे। किंतु अपनी अनुभवहीनता या गलत सलाहकारों के कारण संभावनाओं का असमय अंत हो गया।

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कहानी का मोरल --

यदि भविष्य में किसी ऐसे ही कोरे कागज नुमा नेता को जिसके खिलाफ कोई शिकायत न हो, मौका मिले तो वह राजीव की खूबियों के साथ-साथ गलतियों को भी याद रखें, उनसे सबक लें, अच्छा करेंगे।

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--सुरेंद्र किशोर 20 अगस्त 2020

शुक्रवार, 15 जून 2018

राजेंद्र काॅलेज (छपरा) : जरा याद कर लें प्राचार्य भोला प्रसाद सिंह को


18 दिसंबर, 1967 की बात है। बिहार के अनेक राजनीतिक तथा गैर राजनीतिक संगठनों ने राजभाषा संशोधन विधेयक के खिलाफ ‘बिहार बंद’ का आह्वान किया था। मैं उन दिनों संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े क्रांतिकारी विद्यार्थी संघ की सारण जिला शाखा का सचिव था। हम छात्रों ने इस अवसर पर छपरा में जुलूस निकालने का निर्णय किया था। उस दिन मैं सुबह सात बजे ही एक रिक्शे पर माइक लेकर राजेंद्र कालेज के गेट पर पहुंच गया।



मैं छात्रों से क्लास का बहिष्कार करके जुलूस में शामिल होने की अपील कर रहा था। जिस दिन काॅलेज में असामान्य स्थिति रहती थी, उस दिन राजेंद्र कालेज के प्राचार्य भोला प्रसाद सिंह समय से पहले ही काॅलेज पहुंच जाते थे। उस दिन भी पहंुच गए थे।

वे गेट पर मेरे पास आए और मुझसे कहा कि ‘तुम यहां से माइक लेकर चले जाओ।’ जब मैंने हटने से इनकार कर दिया तो उन्होंने कहा कि ‘तुमसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी।’ मैंने कहा कि मैं आज आपका हुक्म नहीं मानूंगा। दरअसल मेरे साथ छात्र थे और उस काॅलेज के प्रो. राम श्रेष्ठ मिश्र का भी मुझे समर्थन हासिल था।

उसके बाद काॅलेज के अहाते में छात्रों -प्राध्यापकों की एक सभा बुलाई गयी। कई छात्रों और प्राध्यापकों ने जुलूस के खिलाफ अपनी राय जाहिर की। अंत में प्रो. रामश्रेष्ठ मिश्र बोलने को खड़े हुए। वे बोल ही रहे थे कि बगल के एक वृक्ष से एक काग कांव- कांव करता हुआ उड़ा। इस पर भोला बाबू ने कहा कि ‘ देखो काग बोल रहा है। आज जरूर कुछ बुरा होगा।’

विरोध के बावजूद हमने जुलूस निकाला। सैकड़ों छात्र जुलूस में शामिल हो गए। हमारा संगठन मजबूत था। पर इतने बड़े जुलूस की मुझे भी उम्मीद नहीं थी। मुझे कुछ शंका होने लगी। संभवतः भोला बाबू को यह लगता था छात्रों की जमात को मैं संभाल नहीं पाऊंगा।

जब जुलूस के रास्ते में नये -नये युवक जुड़ने लगे तो  मेरी शंका बढ़ गयी। क्योंकि वे अनजान चेहरे थे। लगा कि जुलूस के जरिए तोड़-फोड़ करवाने की कोई बाहरी राजनीतिक साजिश थी। याद रहे कि उन दिनों बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार चल रही थी। खैर, भोला बाबू की आशंका सच होने वाली थी और हो ही गयी। जुलूस छपरा कोर्ट परिसर स्थित स्टेट बैंक के पास पहुंचा। वहां जुलूस में शामिल कुछ युवक अनियंत्रित हो गए। बैंक के गार्ड ने गोली चला दी। एक राहगीर मारा गया। जुलूस तितर -बितर हो गया।

हालांकि इसको लेकर किसी छात्र की गिरफ्तारी नहीं हुई। दरअसल उस जुलूस का आयोजन मैंने ही किया था। संभवतः भोला बाबू को यह लग गया था कि मेरे जैसे अपरिपक्व व्यक्ति के लिए जुलूस में शामिल छात्रों -युवकों को नियंत्रित कर पाना संभव नहीं होगा। उन्हें ठीक ही लगा था।

खैर, दूसरी घटना कुछ समय बाद की है।

16 जनवरी, 1968 को बिहार विधानसभा भवन के समक्ष संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का प्रदर्शन होने वाला था। उससे दो दिन पहले हमने सारण जिले में कुछ नेताओं के साथ सघन भ्रमण कर लोगों को पटना पहुंचने का संदेश दिया था। थककर चूर हो गया था। जुकाम हो गया।

इसलिए मैं खुद पटना नहीं जा सका। 16 जनवरी की शाम में जब भोला बाबू ने मुझे काॅलेज परिसर में देखा तो पूछा कि ‘तुम लोगों का प्रदर्शन है न। तुम यहां हो ?’ उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि ‘तुम जीवन में कुछ नहीं कर सकते। कभी नेता नहीं बनोगे।’

यह एक अभिभावक की फटकार थी। वे मुझे राजनीति में आगे बढ़ते देखना चाहते थे। मेरी बी.एससी. परीक्षा का रिजल्ट हो चुका था। मैं अंक पत्र लेने काॅलेज गया था। भोला बाबू अपने कक्ष के सामने खड़ा होकर उन कुछ छात्रों को समझा रहे थे जो छात्रसंघ का चुनाव कराने की जिद पर अड़े थे। मैं भोला बाबू के पीछे से गुजरा। थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्होंने मुझे वापस बुलाया। पूछा, ‘पास कर गए?’

जब मैंने ना कह दी तो उन्होंने हड़ताली लड़कों का ध्यान मेरी ओर खींचते हुए अभिनय की मुद्रा में कहा कि ‘देखो, यही था जो फाटक पर माइक लेकर कहता था, साथियों साथ दो। और आज जब फेल हो गया तो मुझसे मिले बिना ही जा रहा है। तुम लोगों की भी यही हालत होगी।’ फिर मेरी ओर मुखातिब होकर उन्होंने कहा कि ‘कोई बात नहीं। फिर परीक्षा दो। मैं तुम्हारी मदद करूंगा।’ दरअसल मैं फेल कैसे नहीं करता! पढ़ाई-परीक्षा मेरी प्राथमिकता से काफी दूर चली गयी थी।

शिक्षक के रूप में उनके अतुलनीय योगदान की चर्चा किए बिना बात पूरी नहीं हो सकती। भोला बाबू केमिस्ट्री पढ़ाते थे। मैं विज्ञान का छात्र होने के कारण उनका क्लास करता था। राजेंद्र कालेज में विज्ञान संकाय में छात्र बहुत थे। इसलिए भोला बाबू सबको एक साथ शामियाना में बैठाकर पढ़ाते थे। रसायन शास्त्र जैसे निरस और जटिल विषय को इस तरह से मनोरंजक ढंग से पढ़ा देते थे कि उसे फिर घर  जाकर पढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। लगातार घंटों तक पढ़ाते जाना उनके ही वश की बात थी। हमें हमेशा उनके क्लास की प्रतीक्षा रहती थी।

बी.एससी. फेल कर जाने के बाद मैं पटना रहने लगा था। समाजवादी साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकमुख’ में काम करने लगा। उसके संपादक प्रो. देवी दत्त पोद्दार थे। इस बीच मेरे एक शुभचिंतक ने मुझे सलाह दी कि पहले तुम गे्रजुएट तो हो जाओ। बाद में जीवन में जो करना हो, करो। मुझे बात अच्छी लगी।

मैं गांव लौट गया। सारण जिला संसोपा के आॅफिस सेके्रट्री के रूप में काम करने लगा। मुझे हर माह सौ रुपए मिलते थे। साथ ही राजेंद्र काॅलेज में ही हिस्ट्री आॅनर्स में दाखिला करा लिया। आॅनर्स के साथ पास भी कर गया।
इस बीच भोला बाबू से मेरा पहले जैसा संपर्क नहीं रहा। गांव से रोज ट्रेन से छपरा जाता था। क्लास करना और पार्टी आॅफिस में काम करना। इसी में समय बीत जाता था।

इस बीच 26 अप्रैल, 1971 को यह दुःखद खबर मिली कि भोला बाबू की काॅलेज परिसर में ही किसी ने हत्या कर दी। मेरे लिए तो सदमे वाली खबर थी। मैंने ‘सारण संदेश’ में उन पर संस्मरणात्मक लेख लिखा था।

किन्हीं और के लिए भोला बाबू जो कुछ भी हों, पर मेरे लिए तो भोला बाबू अभिभावक तुल्य थे। मैं उनके शिक्षक रूप से सर्वाधिक प्रभावित था। कमेस्ट्री का वैसा बढि़या टीचर मैंने नहीं देखा।

(नोट-आपने ध्यान दिया होगा। मैं उन शिक्षकों के बारे में फेसबुक पर बारी-बारी से लगातार लिख रहा हूं जिन्होंने मुझे किसी न किसी रूप से प्रभावित किया। या जिनके बारे में पढ़कर -जानकर प्रभावित हुआ हूं। अगली बार किन्हीं अन्य गुरू देव के बारे में लिखूंगा।)

शुक्रवार, 1 जून 2018

प्रभावशाली नेत्री तारकेश्वरी सिन्हा : चार बार सांसद

कभी की प्रभावशाली नेत्री तारकेश्वरी सिन्हा को आज कम ही लोग  याद करते हैं। पहली बार 1952 में बिहार से लोकसभा की सदस्य चुन ली गयी थीं। कुल चार बार सांसद रहीं। जवाहर लाल नेहरू मंत्रिमंडल में उपमंत्री रही थीं। 

प्रभावशाली वक्ता थीं। साफ बोलती थीं। शेर ओ शायरी के लिए मशहूर थीं। हाजिर जवाबी भी। अपने जमाने में संसद में प्रभावशाली भूमिका निभाती थीं। सत्ताधारी कांग्रेस में थीं, पर प्रतिपक्ष के नेताओं के साथ भी तारकेश्वरी जी का अच्छा संबंध था। 

समाजवादी सांसद डॉ. राम मनोहर लोहिया पर लिखा हुआ तारकेश्वरी सिन्हा का एक संस्मरण यहां प्रस्तुत है। 

‘एक बार गाड़ी के पास खड़ी मैं किसी से बात कर रही थी। लोहिया वहां आए तो मैंने कहा कि ‘चलिए आपको छोड़ दूं।’ कहने लगे,‘मुझे जनता कॉफी हाउस जाना है।’ उन्हें पता था, मैं वहां नहीं जाती।

मुझे ऊहापोह में देख कर बोले, ‘अच्छा तो साधारण लोगों में जाने में आपकी बेइज्जती होती है। पांच सितारा में नहीं होती।’ खैर, मैं उन्हें छोड़ने गयी तो बोले, ‘ उतरो नीचे, नहीं तो सबके सामने कान पकड़कर उतारूंगा।’ मैं उतरी तो काफी हाउस में लोग इकट्ठे हो गए। सबको कॉफी पिलाई। बिल आया बयालीस रुपए का। लोहिया जी की पॉकिट में आठ रुपए थे। बाकी लोगों ने इकट्ठे करके दिए। एक बैरे ने साढ़े चार रुपए निकाल कर दिए तो लोहिया जी ने मनाकर दिया।

बाद में मैंने उनसे कहा कि ‘आप कमाल के आदमी हैं। पैसा जेब में नहीं है, ऑर्डर पर आर्डर दिए जाते हैं।’ पर, डाक्टर साहब (यानी डाक्टर लोहिया) तो खनाबदोश किस्म के आदमी थे। उन्हें कोई बांध नहीं सकता था।’

तारकेश्वरी जी का जन्म 1926 में हुआ था। सन 2007 में उनका निधन हुआ।

 (प्रभात खबर - बिहार - में प्रकाशित मेरे कॉलम कानोंकान से)

शनिवार, 5 मई 2018

आज भी याद आते हैं ‘फिरंगिया’ के लेखक प्रिंसिपल मनोरंजन बाबू

मैंने जब छपरा के राजेंद्र काॅलेज में अपना नाम लिखवाया, उससे करीब तीन या चार साल पहले ही मनोरंजन बाबू उस काॅलेज के प्राचार्य पद से रिटायर हो चुके थे। पर बाद में भी  कालेज में अक्सर उनका नाम बहुत आदर से लिया जाता था। कोई उनके एक गुण की चर्चा करता तो कोई उनकी  दूसरी  उपलब्धियों की।उनकी मशहूर रचना ‘फिरंगिया’ तो अनेक लोगों की जुबान पर थीं।

वे मूलतः अंग्रेजी के शिक्षक थे, पर वे भोजपुरी बहुत सहजता से बोलते-लिखते थे। फिरंगिया भोजपुरी में ही है। एक बार कालेज परिसर में  कुछ छात्र किसी बात पर शोर कर रहे थे। मनोरंजन बाबू उनके पास गए। उन्होंने छात्रों से भी कविता में बात कर  ली।
‘ हड़बड़ कइले, गड़गड़ होई, बढ़-चढ़ बात करे ना कोई !’
इस पर वे हंसते हुए अपने -अपने क्लास में चले गए।
दरअसल उनकी नैतिक धाक का कमाल था।

मनोरंजन बाबू ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में  एम.ए. अंग्रेजी में टाॅप किया था। मदन मोहन मालवीय  उन्हें बी.एच.यू. में ले गए। वहां कुछ दिनों तक उन्होंने अंग्रेजी पढ़ाई। बाद में राजेंद्र कालेज में प्राचार्य होकर आ गए।
असहयोग आंदोलन के समय मनोरंजन बाबू ने ‘फिरंगिया’ नाम से  देशभक्ति का गीत लिखा।बाद में वह गीत स्वतंत्रता सेनानियों की जुबान पर था।

एक शिक्षक,एक प्रशासक व एक साहित्यकार के रूप में उन्होंने अपना एक विशेष स्थान बनाया था। हालांकि उनके प्रशंसकों को यह अफसोस रहा कि उन्होंने अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने के कारण अधिक लेखन नहीं किया। जबकि उनमें लेखन प्रतिभा अद्भुत थी। हालांकि  उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखी थीं।
1942 में वे बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के मोतिहारी अधिवेशन के अध्यक्ष हुए थे। 

 वैसे राजेंद्र काॅलेज को एक बेहतर काॅलेज बनाने में उनका योगदान अतुलनीय रहा। उन दिनों भी बिहार में ऐसे कम ही काॅलेज थे जहां आर्ट, साइंस और काॅमर्स तीनों की पढ़ाई होती थी। राजेंद्र कालेज में भी ऐसा था।
राजेंद्र काॅलेज के विस्तृत परिसर और बड़े -बड़े क्लास रूम और समृद्ध प्रयोगशालाओं को तो मैंने एक छात्र के रूप में खुद भी देखा और उपयोग किया था। 

 मुझे भी इस बात का अफसोस रहा कि मैं उन्हें वहां काम करते नहीं देख सका था। पर उनके नाम की सुगंध तब भी मौजूद थी। फिलहाल देश प्रेम जगाने वाली उनकी ऐतिहासिक रचना ‘फिरंगिया’ यहां प्रस्तुत है।
संभव है कि मुझसे उसकी एक- दो पंक्तियां छूट गयी हों।--

      --फिरंगिया--
 सुन्दर सुघर भूमि भारत के रहे रामा,
आज उहे भइल मलीन रे फिरंगिया।
अन्न-धन-जन -बल बुद्धि सब नास भइल,
कवनो  के ना रहल निसान रे फिरंगिया।
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जहवां थोड़े ही दिन पहिले होत रहे,
लाखों मन गल्ला और धान रे फिरंगिया।
उंहवे पर आज रामा मथवा पर हाथ धके,
बिलखी के रोवे ला, किसान रे फिरंगिया।
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घिउवा आ दूधवा के नदिया बहत जहां,
उहवां बहेला रक्तधार रे फिरंगिया।
जहवां के लोग सब खात ना अघात रहे,
रुपया से रहे मालामाल रे फिरंगिया।

उहें आज जेने जेने अखियां घुमा के देखीं,

तेने तेने देखबे कंगाल रे फिरंगिया।
हमनी के पसु से रे हालत खराब कइले,
पेटवा के बल रेंगवउले रे फिरंगिया।
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एको जो रोऊवा निरदोसिया के कलपी ते,
तोर नास होई जाई सुन रे फिरंगिया।
दुखिया के आह तोर देहिया के भसम कै देई,
जरि भुनि होई जइबे रे फिरंगिया।
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स्वाधीनता हमनी के नामो के रहल नाहीं,
अइसन कानून के बा जाल रे फिरंगिया।
प्रेस एैक्ट, आर्म्स ऐक्ट, इंडिया डिफेंस एैक्ट,
सब मिली कइलस ई हाल रे फिरंगिया।
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भारत के छाती पर भारत के बचपन के,
बहल रक्तवा के धार रे फिरंगिया।
घरे लोग भूख मरे गेहुंआ विदेस जाए,
कइसन बा विधि के विधान रे फिरंगिया।
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मरदानापन अब तनिको रहल नाहीं,
ठकुरसुहाती बोले रे फिरंगिया।
रात दिन करेले खुसामद सहेबवा के,
सहेले विदेसिया के लात रे फिरंगिया।
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चेति जाउ,चेति जाउ भैया रे फिरंगिया तें,
छोड़ दे अधरम के पंथ रे फिरंगिया।
छोड़ के कुनीतियां सुनीतिया के बांह गहु,
भला तोर करी भगवान रे फिरंगिया।
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गुरुवार, 3 मई 2018

‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ पर मैं खुशवंत सिंह को याद कर रहा हूंं। पर, उन्हें ही क्यों ? इसलिए कि वे आपने पाठकों की भी स्वतंत्रता के  प्रबल पक्षधर थे। जब वे ‘इलेस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया के संपादक थे तो उन्होंने अपने पाठकों की उन चिट्ठियों को भी छापा जिनमें उन्हें खुशामद सिंह, संजय गांधी के चमचा और न जाने क्या -क्या लिखा रहता था।

2005 में  खुशवंत सिंह ने ‘आउटलुक’ को दिए गए इंटरव्यू में  कहा भी था कि ‘ संजय गांधी के कहने पर मैं दुबारा  संपादक बना था।’ सरदार जी  1969 से 1977 तक इलेस्ट्रेटेड विकली आॅफ इंडिया के संपादक थे। बाद में  वे ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के संपादक बने।

इंदिरा गांधी के एक बार फिर 1980 में सत्ता में आ जाने के बाद संजय गांधी ने खुशवंत सिंह को कुछ आॅफर दिए। खुशवंत सिंह के अनुसार, संजय ने कहा ‘आप ब्रिटेन में भारत के  उच्चायुक्त या दुनिया में कहीं के राजदूत बनना चाहते हों या फिर राज्यसभा के सदस्य और हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक ।’ खुशवंत जी ने कहा कि मुझे बाद वाला प्रस्ताव बेहतर लगा।
खुशवंत ने कहा कि एक दो बार प्रधान मंत्री (इंदिरा गांधी) के दफ्तर से संदेश आया कि मैं ऐसा करूं, या ऐसा न करूं, लेकिन मैंने उसकी परवाह नहीं की।
इंदिरा जी के बारे में उन्होंने लिखा कि इंदिरा मुझे पसंद करने लगी थीं। क्योंकि मैं संजय का समर्थन कर रहा था। दरअसल संजय पर गलत आरोप लगा कर आक्रमण किए जा रहे थे। मैं सभी आरोपों की तह में गया, उन्हें गलत पाया।

यानी खुशवंत सिंह अपनी शर्तों पर काम करते थे। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। पर अनेक लोग यह मानते हैं कि वे एक अत्यंत योग्य लेखक व पत्रकार थे। हालांकि उन्हें पत्रकार रहना अधिक पसंद था। वे उन कुछ लोगों के कथन से असहमत थे कि ‘पत्रकारिता साहित्य की हरामी औलाद है।’  वे कहते थे कि आज मेरी जो प्रसिद्धि है, वह पत्रकारिता के कारण है।

यूनेस्को की अपनी नौकरी छोड़कर लेखक पत्रकार के अनजाने से पेशे में खुशवंत सिंह आ गए थे। पर वीकली के संपादक के रूप में उन्होंने कमाल किया था।

इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं तो न्यूयार्क टाइम्स ने उन पर लिखने के लिए कहा था। सरदार जी ने लिखा कि इंदिरा गांधी सरकार में एक क्लर्क का काम करने लायक भी नहीं हैं क्योंकि वह मैट्रिक पास भी नहीं हैं।
सम्पादकों के बारे में खुशवंत ने कहा था कि ‘संपादक जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वह यह कि वे अपना उत्तराधिकारी तैयार नहीं करते।’

मंगलवार, 1 मई 2018

हंगामे के बिना ही संसद को हिलाया था बिहार से सांसद मधु लिमये ने

उनके जन्म दिन के अवसर पर मधु लिमये पर लिखा अपना एक पुराना लेख मैं यहां प्रस्तुत  कर रहा हूं।
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बिहार के मुंगेर व बांका से बारी- बारी से लोकसभा में चार बार गये मधु लिमये ने यह सिखाया था कि किसी हंगामे के बिना भी विधायका में किस तरह कटु सत्य भी प्रभावकारी तरीके से बोले जा सकते हैं।

 पर इसके लिए सदन के नियमों की बेहतर जानकारी होनी चाहिए और उसके इस्तेमाल की सलाहियत भी।यह सब सन 1964 में बिहार से पहली बार लोक सभा में गये मधु लिमये को अच्छी तरह आता था।दुःख की बात है कि आज विधायिकाओं में अपनी बातें  कहने के लिए भाजपा व कांग्रेस जैसे बड़े दलों को भी  अक्सर हंगामे का सहारा लेना पड़ता है।जबकि, मधु लिमये तो ‘वन मैन आर्मी’ थे।संसद व विधान सभाओं  की गरिमा का अवमूल्यन आज की तरह ही  जारी रहा तो इस देश की लोकतांित्रक व्यवस्था के प्रति ही लोगों के मन में इज्जत घट जाएगी।यह और भी दुःख की बात है कि आज संसद या फिर विधायिका की गरिमा घटाने में करीब- करीब सभी दलों का योगदान है।ऐसे में मधु लिमये जैसे सभा -चतुर नेता अधिक ही याद आते है।

वैसे बिहार से चुनाव जीत कर संसद के दोनों सदनों में बारी -बारी से  गये नामी -गिरामी राष्ट्रीय नेताओं  नेताओं की भी कमी नहीं रही।उन बड़े नेताओं व काबिल पार्लियामेंटेरियनों में बिहारी भी थे और गैर बिहारी भी।पर सबमें मधु लिमये का स्थान बेजोड़ था।आजादी के बाद बिहार से लोक सभा व राज्य सभा के संदस्य बने नेताओं में जे.बी.कृपलानी, अशेाक मेहता, जार्ज फर्नाडिस, आई.के.गुजराल, युनूस सलीम, कपिल सिब्बल, रवींद्र वर्मा, नीतीश भारद्वाज, मीनू मसानी, लक्ष्मी मेनन और एम.एस. ओबराय प्रमुख थे। पर इनमें मधु लिमये का स्थान अलग था।

इनके कारण भी बिहार और मुंगेर के नाम दुनिया भर में गौरवान्वित हुए।मधु लिमये का बिहार से कुछ खास तरह का लगाव भी रहा।वे बिहार से मात्र सांसद ही नहीं थे बल्कि वे राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के साथ-साथ   बिहार की समस्याओं को भी समान ऊर्जा व मनोयोग से संसद के भीतर व बाहर उजागर करते थे।बिहार पर उनके लेखन व भाषण  चर्चित हुए। 

हंगामे के बिना आज जिन छोटे -बड़े सांसदों व दलों के लिए अपनी बातें कह पाना कठिन होता है,उन्हें मधु लिमये की संसदीय शैली से इस मामले में अब भी कुछ सूत्र सीख लेना चाहिए । हालांकि यह थोड़ा कठिन दिमागी कसरत का काम है जिससे हमारे अधिकतर नेता जरा दूर ही रहना चाहते हैं।

समाजवादी विचारक व सभा चतुर मधु लिमये का जन्म 1 मई 1922 को पूणे में हुआ था।उनका निधन 8 जनवरी 1995 को दिल्ली में हुआ।वे दो बार मुंगेर (1964 और 1967) और दो बार बांका (1973 और 1977) से लोकसभा सदस्य चुने गये। सांसद के रूप में मधु लिमये ने तत्कालीन केंद्र सरकार को इतना हिला दिया था कि इंदिरा गांधी ने 1971 में तत्कालीन बलशाली कांग्रेसी नेता व शेरे बिहार के नाम से चर्चित राम लखन सिंह यादव के सामने अपनी आंचल पसार कर उनसे यह आग्रह किया था कि  आप मुंगेर और बाढ़ की  सीटें हमें विशेष तौर पर उपहार में दे दीजिए।

यानी इंदिरा जी मधु लिमये और तारकेश्वरी सिंहा को किसी भी कीमत पर हरवाना चाहती थीं।इस काम में यादव जी ने उनकी भारी मदद भी की थी। दोनों हार गए थे।लालू प्रसाद से पहले राम लखन जी ही बिहार के यादवांें के सबसे बड़े नेता थे।
 वैसे भी तब गरीबी हटाओ का नारे का इंदिरा जी के पास बल  था।  पर दो साल बाद ही यदि मधु लिमये एक उप चुनाव के जरिए बिहार के ही बांका से लोकसभा मे ंचले गये थे तो यह उनके प्रति बिहारी कृतज्ञ मानस का उपकार का भाव ही था। मधु ने बिहार का नाम ऊंचा ही किया था। मधु लिमये की चर्चा करने पर कुछ  विदेशी राजनयिक भी दिल्ली में यह पूछते थे कि वे कहां से चुनाव जीतते हैं ? याद रहे कि मुंगेर या बांका  चुनाव क्षेत्र ब्राहमण बहुल नहीं माना जाता।इस सूचना  के बाद कई विदेशी राजनयिकों  के मन में यह बात भी कुलबुलाने लगती थी कि तब क्यों बिहार को जातिवादी राज्य कहा जाता है ? 

मधु लिमये ने ऐसे समय में लोक सभा में अपनी संसदीय योग्यता की धाक जमाई थी जब के स्पीकर सरदार हुकुम सिंह लोहियावादी समाजवादी सांसदों के सदन में खड़ा होने के साथ ही उन्हें  तत्काल बैठा देने की कोशिश करने लगते थे। क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि वे जवाहर लाल नेहरू या इंदिरा गांधी  के खिलाफ कोई कटु बात बोल दंे। नेहरू 1964 तक प्रधान मंत्री थे।नेहरू के कटु आलोचक व अदमनीय समाजवादी नेता डा.राम मनोहर लोहिया ने 1963 में लोक सभा में प्रवेश करने के साथ ही नेहरू पर ऐसे कठोर प्रहार शुरू कर दिये थे कि स्पीकर सदा सतर्क रहते थे।

पर यदि मधु के पास संसदीय फोरम के इस्तेमाल की चतुराई थी, तो उन्हें अपनी बात कहने से 
 स्पीकर रोक भी नहीं सकते थे। स्पीकर उन दिनों  लोक लाज का काफी ध्यान रखने वाले नेता हुआ करते  थे।संविधान व लोक सभा की कार्य संचालन नियमावली का सहारा लेकर जब मधु लिमये  प्रस्ताव व सूचनाएं देते थे तो उन पर चर्चाएं कराने पर स्पीकर मजबूर हो जाते थे। इस तरह संसदीय ज्ञानों का उपयोग करके मधु लिमये देश व समाज के लिए काफी कुछ कर पायेे।

उनसे सकारात्मक ईष्र्या रखने वाले एक अन्य समाजवादी चिंतक व पूर्व सांसद किशन पटनायक ने मधु लिमये के बारे में उनके निधन के बाद  लिखा था कि ‘एक श्रेष्ठ कोटि के सांसद के रूप में मधु की प्रतिष्ठा हुई।मंत्रियों के भ्रष्टाचार के विरोध में उनका हमला इतना कारगर होने लगा था कि बड़े नेताओं में उनके प्रति भय हुआ। सन 1964 से 1967 के बीच सांसद के रूप में उनका जो उत्थान हुआ ,उसका मैं सदन के भीतर प्रत्यक्षदर्शी था। संसदीय प्रणाली व संविधान के बारे में उनका ज्ञान अद्वितीय था। मधु लिमये शुरू से मेरे लिए आदर, ईष्र्या व असंतोष के पात्र रहे। मेरे स्वभाव में है कि ईष्र्या उस व्यक्ति के लिए होती है जिसके लिए मेरे मन प्यार होता है।’
   गौरव की बात है कि मधु लिमये जैसे संसदीय महारथि सिफ्र्र बिहार से ही सांसद रहे। काश ! बिहार को वैसा गौरव  एक बार फिर मिल पाता ।   

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था, ‘इस पके आम के लिए आमों के पेड़ मत काटो’


28 फरवरी 1963 को राजेन बाबू को जहानाबाद से एक तार मिला। उसे पढ़ते ही उनकी तबियत बिगड़ने लगी। तार के जरिए यह सूचना आई थी कि उनके मित्र सुलतान अहमद नहीं रहे। नर्स से ऑक्सीजन लाने के लिए कहा। ऑक्सीजन सिंलेडर आने में थोड़ी देर हुई। वैसे ऑक्सीजन दरवाजे पर आया ही था कि राजेन बाबू नहीं रहे। एक आम आदमी  की तरह जिए और मरे।

1962 में राष्ट्रपति पद से अवकाश मिलने के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद पटना आए । सदाकत आश्रम परिसर में रहने लगे। यह वही मकान था जहां से वे आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। अत्यंत सामान्य किस्म का वह घर था। बाद में रहने लायक भी नहीं रह गया था। 

जयप्रकाश नारायण ने चंदा करके उसे रहने लायक बनाया। हालांकि जेपी उनके लिए एक मकान बनवाना चाहते थे। पर उसके लिए आम के पेड़ काटने पड़ते।
राजेंद्र बाबू ने इस पर कहा था कि ‘इस पके आम के लिए आम के पेड़ों को मत काटो।’

देश के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, संविधान सभा के अध्यक्ष और  12 साल तक राष्ट्रपति रहे डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बुढ़ापे में देखभाल करने में सरकार का शायद कोई खास योगदान नहीं था। समकालीन पत्रकार रवि रंजन सिन्हा के अनुसार पटना में राजेंद्र बाबू के आसपास कहीं सरकारी तंत्र नजर नहीं आता था।

पटना के गंगा किनारे आम के बगीचे के बीच की उनकी ‘कुटिया’ में ए.सी. का भी  प्रबंध  नहीं था। ऐसा उनके दमा के मरीज होने के कारण था या साधन के अभाव में, इस पर कई बार चर्चा चलती रहती है।

जवाहर लाल नेहरू के साथ मनमुटाव 

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ उनके ठंडे संबंधों के कारण ऐसी चर्चाओं को बल मिलता रहा।
दोनों के बीच मनमुटाव और बढ़ गया था जब चीनी आक्रमण के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पटना के गांधी मैदान में ‘हिमालय बचाओ’ बैनर तले हुई सभा को संबोधित किया। डॉ. राम मनोहर लोहिया द्वारा आयोजित उस सभा में जनरल करियप्पा भी शामिल हुए थे। उस सभा में सरकार के खिलाफ भी कुछ बातें कहीं गयीं।

पुराने समाजवादी उमेश जी ने बताया कि राजेंद्र बाबू के निधन के समय डॉ. लोहिया भी पटना में थे। लोहिया के साथ पत्रकार जितेंद्र सिंह भी उस दिन राजेन बाबू से मिलने गए थे। राजेन बाबू के अंतिम संस्कार में शामिल होने जब जवाहरलाल नेहरू पटना नहीं आए तो उसका यह भी एक कारण बताया गया। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री विनोदानंद झा ने प्रधानमंत्री को फोन करके पटना आने के बारे में उनसे पूछा था। प्रधानमंत्री ने कहा था कि उन्हें जयपुर जाना है। वैसे अंत्येष्टि कार्यक्रम में राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन, लाल बहादुर शास्त्री तथा अन्य कई बड़े नेता शामिल हुए थे।

डॉ. प्रसाद बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य के बावजूद सार्वजनिक कार्यक्रमों का निमंत्रण जल्दी अस्वीकार नहीं करते थे। 28 फरवरी 1963 को उन्हें पटना विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह  को संबंोधित करना था। उसके लिए वे तैयार भी थे, पर इसी बीच मित्र के निधन की खबर मिल गयी।

जब वे राष्ट्रपति थे तो उनके स्टाफ में थे राजेंद्र कपूर । वे नौकरी छोड़ कर राजेंद्र बाबू के साथ रहने पटना आ गए थे। याद रहे कि राजेंद्र बाबू के छात्र जीवन में उनके एक परीक्षक ने उनकी उत्तर पुस्तिका में लिखा था कि ‘परीक्षार्थी, इस परीक्षक से बेहतर है।’

राजेंद्र बाबू ने किसी परीक्षा में कभी सेकेंड नहीं किया। आजादी की लड़ाई में उनका योगदान अप्रतिम था। संविधान सभा के अध्यक्ष और 12 साल तक राष्ट्रपति रहे राजेंद्र बाबू के लिए उस जगह कोई ढंग का अब तक स्मारक नहीं बन सका जहां उन्होंने अंतिम सांस ली और जहां से आजादी की लड़ाई लड़ी।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म तीन दिसंबर, 1884 को बिहार के अविभाजित सारण जिले के जीरादेई गांव में हुआ था। छपरा के जिला स्कूल में उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई। पटना के टी.के. घोष अकादमी में शिक्षक रहे राम नरेश झा को इस बात पर गर्व है कि छपरा जिला स्कूल के पहले राजेंद्र बाबू दो साल तक टी.के. घोष अकादमी के छात्र रहे। उच्च शिक्षा के लिए वे प्रेसिडेंसी कॉलेज कलकत्ता गए।

कुशाग्र बुद्धि के राजेंद्र बाबू ने एट्रेंस से बी.ए. तक की परीक्षाओं में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। एम.ए.की परीक्षा में भी प्रथम श्रेणी में विश्वविद्यालय में प्रथम आए। वकालत पढ़ी। सन 1911 में वकालत प्रारंभ की। पहले कलकत्ता और फिर पटना में। वर्ष 1917 में वे चम्पारण सत्याग्रह में गांधी जी के सहयोगी बने।

1920 में वकालत छोड़ दी। असहयोग आंदोलन में शमिल हो गए। तीन बार कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। अंतरिम सरकार में देश के खाद्य मंत्री थे।उन्हें 1962 में भारत रत्न से अलंकृत किए गए। वे बिहारी छात्र सम्मेलन के संस्थापक भी थे।


(पुण्यतिथि पर उनकी याद में)

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

भूपेंद्र अबोध को हार्दिक श्रद्धांजलि



एक बार मैंने यूंही भूपेंद्र अबोध से पूछ दिया था कि आखिर मनोहर श्याम जोशी आपको और प्रभाष जोशी मुझे इतना प्यार क्यों करते हैं ?

अबोध जी ने बिना देर किए कहा कि ‘जोशी लोग बड़े उदार होते हैं।’ बाद में जब नवीन जोशी का भी स्नेह मुझे मिला तो अबोध जी की बात मुझे और भी सही लगने लगी।

 मनोहर श्याम जोशी जब साप्ताहिक हिंदुस्तान के संपादक थे तो दिलीप कुमार ने इंटरव्यू देना मंजूर किया था। जोशी जी ने बिहार से भूपेंद्र अबोध को ही इस काम के लिए बंबई भेजा था। अबोध जी की प्रतिभा पर ऐसा विश्वास था मनोहर श्याम जोशी का। अबोध जी ने तो फिल्मी दुनिया की बहुत सी रपटें लिखीं। पटना में स्वामी दादा फिल्म की कहानी को लेकर जब केस हुआ था तो देवानंद ने कल्पना कार्तिक के भाई को पटना जाकर भूपेंद्र अबोध से मिलने को कहा था।

  पर अबोध जी का रचना संसार सिर्फ फिल्मी क्षेत्र ही नहीं था। टेलीफोन एक्सचेंज की साधारण नौकरी और बड़े परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी के बावजूद उन्होंने कविता -कहानी के साथ-साथ कथा रिपोर्ताज भी खूब लिखे।

  महेंद्र मिसिर और नक्षत्र मालाकार पर अबोध जी की खोजपूर्ण रपट मुझे याद हंै। संभवतः किन्हीं बड़ी हस्तियों के लिए वे ‘घोस्ट राइटिंग’ भी करते थे। उनके साथ बातचीत में इसका संकेत भी मुझे मिला था। हालांकि वे इसका खुलासा नहीं करते थे। लगता है कि परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उठाने के लिए उन्हें यह सब करना पड़ता था। क्षमता से अधिक मेहनत।

इलाहाबाद के मित्र प्रकाशन की पत्रिकाओं के लिए भी उन्होंने जम कर लेखन किया।

 अबोध जी नये पत्रकारों के लिए मार्ग दर्शक भी थे। मैं भी उनके साथ लंबी बैठकी करता था और कुछ सीखता था। हम दोनों की बैठकी के बीच एक ही बाधा थी उनकी चेन स्मोकिंग की लत। अतिशय सिगरेट ने उनके शरीर को जर्जर बना दिया था। ऐसे बहुमूल्य जीवन को अपने लिए नहीं तो कम से कम समाज के लिए अपने स्वास्थ्य को बचाकर रखना चाहिए।

अब अबोध जी हमारे बीच नहीं रहे। खैर उनकी निशानी के रूप में उनकी बहुत सारी रचनाएं और उनका प्रतिभाशाली कार्टूनिस्ट पुत्र पवन हमलोगों के बीच है। योग्य पिता के योग्य पुत्र।
पवन जैसा कार्टूनिस्ट विरले हैं।

एक से अधिक लोगों ने मुझे बताया कि हिंदुस्तान के प्रति उनके आकर्षण का सबसे बड़ा कारण पवन के कार्टून हंै।

नंद किशोर नवल ने 2007 में लिखा था कि ‘मनोहर श्याम जोशी ने भूपेंद्र अबोध की प्रतिभा को पहचाना था जिससे वे साप्ताहिक हिंदुस्तान के अनिवार्य लेखक हो गए थे। वे मूलतः कवि और कथाकार थे। अखबारी और सामयिक लेखन उनके लिए उपयुक्त क्षेत्र नहीं था। लेकिन जब वे उस तरफ मुड़े तो वहां भी अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा का चमत्कार दिखाया।’    

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

राम एकबाल बरसी जैसे नेता अब पैदा नहीं होते

डाॅ. राम मनोहर लोहिया ने कभी राम एकबाल सिंह को ‘पीरो का गांधी’ कहा था। डाॅ. लोहिया ऐसे नेता थे जो न तो अपनी चापलूसी सुनना चाहते थे और न ही किसी को महज खुश करने के लिए ऐसा कोई नाम देते थे।

 जो लोग लोहिया को जानते रहे हैं, उन लोगों ने यह मान लिया था कि यदि लोहिया ने राम एकबाल जी को ‘पीरो का गांधी’ कहा था तो जरूर राम एकबाल जी में ऐसी कोई विशेष बात होगी। बात थी भी। राम एकबाल जी एक अनोखे नेता थे। समाजवादी आंदोलन के लोग राम एक बाल जी को आदर की दृष्टि से देखते थे। वैसे इसके कुछ लोग अपवाद भी थे।

 यह अकारण नहीं था कि हाल में जब पटना के अस्पताल में इलाज के लिए राम एकबाल जी को लाया गया तो लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दोनों उन्हें देखने के लिए वहां गये। ऐसा कम होता है।

  यह भी संयोग ही रहा कि राम एकबाल जी का निधन उसी महीने में हुआ जिस अक्तूबर में राम मनोहर लोहिया का 1967 में निधन हुआ था।

 समाजवादी नेता राम एकबाल सिंह 1969 में पीरो से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गये थे।  1972 में भी वह पीरो से ही चुनाव लड़े, पर उनका तीसरा स्थान रहा। उसके बाद उन्होंने कोई चुनाव नहीं लड़ा।

 1977 में उन्हें जनता पार्टी का टिकट आॅफर किया गया था। पर उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। उनकी जगह रघुपति गोप को टिकट मिला और वह जीते भी। जनता पार्टी का टिकट उन दिनों जीत की गारंटी माना जाता था। इसके बावजूद राम एकबाल ने तब कह दिया था कि एक ही व्यक्ति बार -बार चुनाव क्यों लड़ेगा ? कोई और लड़े।

 1977 में ही बिहार विधानसभा से पहले लोकसभा का चुनाव हो चुका था। बिहार की सभी 54 लोस सीटें जनता पार्टी को मिल चुकी थीं। इसके बावजूद जनता पार्टी का टिकट अस्वीकार करने का काम कोई आदर्शवादी व्यक्ति ही कर सकता था। राम एकबाल जी आदर्शवादी थे भी।

बाद के दिनों में राम एकबाल जी ने अपने नाम के आगे से सिंह शब्द हटाकर उसकी जगह बरसी जोड़ लिया था। बरसी उनके गांव का नाम है। यह नाम उनके साथ अंत तक रहा।

 आदर्शवादी तो ऐसे थे कि एक समाजवादी मित्र की लड़की की शादी में हसुआ और खुरपी लेकर चले गये थे। नब्बे के दशक की बात है। उनके मित्र पटना के लोहिया नगर में रहते हैं। राम एकबाल जी के पास वर-बधू को देने के लिए यही उपहार था। मित्र से कहा कि नवजीवन शुरू करने वाले दंपत्ति थोड़ा खेती भी करें।

 वह कभी -कभी थोड़ा कटु भी बोलते थे। पर उनकी बोली का उनके परिचित मित्र बुरा नहीं मानते थे। साठ के दशक में मैं उनसे मिला था। संसोपा के सम्मेलनों में उन्हें देखता था। विधायक के रूप में भी उनकी भूमिका करीब से देखी।

सब जगह निर्भीक, स्पष्टवादी और अपने विचारों पर अडिग।

कमजोर वर्ग उनकी राजनीति के कंेद्र में होता था। मेरे जानते उनमें निजी स्वार्थ की भावना कतई नहीं थी। संभवतः इसलिए भी किसी भी बड़ी हस्ती से बहस करने और लड़ लेने की ताकत थी उनमें। अपने दल के अंदर और पार्टी के बाहर भी।

डाॅ. लोहिया कहा करते थे कि सोशलिस्ट कार्यकर्ताओं की वाणी स्वतंत्र रहनी चाहिए, पर उनमें कर्म की प्रतिबद्धता भी होनी चाहिए। लोहिया के नहीं रहने बाद भी लोहियावादी राम एकबाल जी इसका पालन करते थे। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि मैं दो सौ साल जीना चाहता हूं। बहुत काम करने हैं। इसके लिए वह प्रयत्नशील भी रहते थे।

दो सौ साल जीना तो असंभव है। पर उन्होंने ऊंचा लक्ष्य रखा तो 94 साल जीए।

राजनीतिक कार्यकर्ता के जीवन में दौड़-धूप काफी रहती है। संयम और उचित खानपान के लिए जो साधन, समय और स्थान चाहिए, उसका अभाव ही रहा होगा। फिर भी इतना जीना बड़ी बात है।

  एक बार उन्होंने निश्चय किया था कि एक खास कालावधि में वह पक्की सड़क पर पांव तक नहीं रखेंगे।
इसका उन्होंने लंबे समय तक भी पालन किया। पिता की सेवा के लिए वह लंबे समय तक गांव में ही रहे। इस तरह के कई असामान्य काम थे जो उन्होंने किए।

राम एकबाल बरसी जैसे राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता-नेता शायद उसी युग में पैदा होते थे जब राम एकबाल पैदा हुए थे। अब इस मामले में यह भूमि बंजर सी हो चुकी है। इसलिए भी वे अनेक लोगों को याद आते रहेंगे।

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

आदर्शवादी पीढ़ी के एक संपादक का निधन


एक सौ एक बसंत देख चुके पारसनाथ सिंह संपादकों की उस पीढ़ी के थे जो  लगभग विलुप्त हो रही है। आज उनके गांव में उनका निधन हो गया। वर्षों तक उनके साथ काम करने के अनुभव के बाद मैं यह कह सकता हूं कि उन्होंने कभी अपनी जीवन शैली नहीं बदली। न ही पत्रकारिता के उन मूल्यों से समझौता किया जो उन्होंने अपने पूर्ववर्ती संपादकों  से सीखा था।

  बाबूराव विष्णु पराड़कर को अपना आदर्श मानने वाले पारस बाबू ने हमें विद्याव्यसनी और विनयी बनने का पाठ पढ़ाया। उत्तर प्रदेश और बिहार के तीन अखबारों के संपादक रहे पारसनाथ सिंह ने न तो कभी अपने पद का लाभ उठाया और न ही पत्रकारिता की धौंस जमाई।

हमेशा सीमित आर्थिक साधनों के जरिए ही परिवार चलाते और संतुष्ट रहते उन्हें देखा। उन्होंने अपनी संतानों को भी अच्छे संस्कार दिए। उनके दीर्घ जीवन का राज यह था कि उनका खाने -पीने में भी भारी संयम था। वे अक्सर पैदल चलते देखे जाते थे।
  ऐसा ही अनुशासन वे संपादन कार्यों में भी रखते थे। वे शब्दानुशासन और खबरों के शीर्षक में शालीनता के घोर पक्षधर थे। वे अपने  संवाददाताओं से कहा रहते थे कि वे छोटे-छोटे वाक्य लिखें। साथ ही  स्पष्टता और संक्षिप्तता का भी पूरा ध्यान रखें।

  वे अंग्रेजी की खबरों के हिन्दी अनुवाद को लेकर डेस्क से कहा करते थे कि शब्दानुवाद के बदले भावानुवाद करें। पटना जिले के पुनपुन के पास के तारणपुर के मूल निवासी पारस बाबू ने अपना अधिक समय वाराणसी और कानपुर में बिताया।

बाद में वे बारी-बारी से पटना के दो अखबारों के भी संपादक रहे। अपने जीवन के
अंतिम वर्षों में यह देखकर वे दुःखी रहते थे कि इन दिनों अधितर हिन्दी अखबारों में  शब्दानुशासन पर कम ही ध्यान दिया जाता है। कभी हिन्दी अखबार पढ़कर कई लोग अपनी हिन्दी सुधारते थे।


बुधवार, 19 मार्च 2014

आसान नहीं है मणिकांत वाजपेयी को भूल जाना

 जिन थोड़े से पत्रकारों को मैं श्रद्धापूर्वक याद करता हूं, उनमें मणिकांत वाजपेयी शामिल हैं। उनका इसी 18 मार्च, 2014 को निधन हो गया।

उन्हें भूल पाना मेरे लिए आसान नहीं होगा। पटना में उनके साथ बैठकर मैं देर तक उनसे बातें किया करता था। उनसे भी मैंने कुछ सीखा है। उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी, उनकी विनम्रता और अपने काम के प्रति उनकी अटूट निष्ठा अनुकरणीय थी।

मेरे पत्रकार जीवन का वह निर्माण काल था जब मैं पहली बार वाजपेयी जी से पटना में मिला था। अच्छा हुआ कि तब वाजपेयी जी के साथ बैठने व बतियाने का मुझे सौभाग्य मिला।,तब मैं उनके सामने हर तरह से जूनियर था। पर उन्होंने ऐसा कभी मुझे आभास नहीं होने दिया।

,  पटना रेडियो स्टेशन के महत्वपूर्ण पद पर रहकर काम करना हमेशा ही एक चुनौती भरा दायित्व रहा है। उन दिनों तो रेडियो का और भी अधिक महत्व था। क्योंकि तब तक मीडिया का आज की तरह विस्तार नहीं हुआ था। प्रभावशाली नेता कौन कहे, छुटभैया नेताओं की भी यही इच्छा रहती थी कि उनका नाम शाम के बुलेटिन में जरुर आ जाये।

  इसको लेकर वाजपेयी जी को अक्सर धमकियां मिलती थीं। पर वे धमकियों में नहीं आते थे। वे खबरों के साथ कोई पक्षपात नहीं करते थे। ऐसा उनके सहकर्मी भी बताते रहे हैं।

  वाजपेयी जी सूचना सेवा के बड़े -बड़े पदों पर रहे। सेवाकाल के अंतिम दिनों में वे डिपुटी प्रिंसिपल इंफोर्मेशन अफसर थे। इसके बावजूद जब वे रिटायर हुए तो उनका बनवाया हुआ अपना कोई मकान या फ्लैट नहीं था।
 हां, उनकी तपस्या का फल उन्हें इस रूप में जरूर मिला कि उनकी संतानें संस्कारी हैं।

उनके यशस्वी पुत्र पुण्य प्रसून वाजपेयी की ईमानदारी की चर्चा दिल्ली से पटना तक वे सब लोग करते हैं जो उन्हें किसी न किसी रूप में जानते हैं।

आज के समय में टी.वी. पत्रकारिता का इतना बड़ा नाम और इतनी कठोर ईमानदारी !

सुखद आश्चर्य होता है। पिता के संस्कार और परवरिश का इसमें बड़ा योगदान माना जाएगा। पिछले कुछ साल से वाजपेयी जी बीमार थे। वे एक लाइज बीमारी से ग्रस्त थे। उनके परिवार ने उनकी बड़ी सेवा की।

  मणिकांत जी के साथ रेडियो में काम कर चुके महेश कुमार सिन्हा और पत्रकार मोहन सहाय ने बारी -बारी से दिल्ली से फोन पर मंगलवार को मुझे यह दुःखद समाचार दिया। वे मेरे प्रति वाजपेयी जी के स्नेहल व्यवहार को जानते थे। हालांकि तब तक दूरदर्शन का पटना केंद्र यह समाचार दे चुका था।

  महेश कुमार सिन्हा के अनुसार वाजपेयी जी अपने काम के प्रति ईमानदार पत्रकार थे। खबर देने के मामले में वे हमेशा तत्पर रहते थे।

 स्टेट्समैन के पटना संवाददाता रह चुके मोहन सहाय बताते हैं कि वे स्वच्छ दिल के मिलनसार व्यक्ति थे। उनके बारे में अनेक समकालीन लोगों की भी ऐसी ही राय रही है।

  अच्छा लगता ,यदि पटना के अखबारों में भी उनके निधन की खबर आज आ गई होती।

  दरअसल अपवादों को छोड़ दें तो पुरानी पीढ़ी के पत्रकारों की खोज -खबर आज का मीडिया ऐसे भी कम ही लिया करता है। जबकि उन पत्रकारों के पास राजनीति, प्रशासन तथा समाज के अन्य वर्गों के बारे में एक तुलनात्मक दृष्टि होती है। उनसे सीखा जा सकता है।

 उनके अनुभव बांटे जाने चाहिए। वैसे भी उन में से कई पत्रकार अपने जमाने में राजनीति व प्रशासन को प्रभावित कर चुके होते हैं। पर आज उनमें से अधिकतर पत्रकार उपेक्षित जीवन बिता रहे होते हैं। वैसे भी कुछ दशक पहले तक पत्रकारिता में पैसे भी तो कम ही मिलते थे।

  विडंबना यह है कि उनमें से कुछ पत्रकारों के निधन की खबर उनको जानने वाले थोड़े से लोगों के जरिए ही मिल पाती है। जबकि उन पत्रकारों ने खुद अपने कार्यकाल में न जाने कितने लोगों की खबरें आम लोगों तक पहुंचाईं होगी।