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गुरुवार, 21 मई 2020

राजीव गांधी के 3 अच्छे कदम

उनके विवादास्पद कामों की चर्चा आज नहीं क्योंकि आज उनकी पुण्यतिथि है


1981 के प्रारंभ में राजीव गांधी लोकसभा के सदस्य बने। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सदन में उनकी सीट हरि जी की सीट के बगल में दिलवा दी। इंदिरा जी चाहती थीं कि बिहार विधानसभा के पूर्व स्पीकर हरिनाथ मिश्र राजीव को संसदीय कार्यवाही का ज्ञान करा दें।

स्वतंत्रता सेनानी, अत्यंत ईमानदार व राष्ट्रहित चिंतक नेता हरि जी कांग्रेस की ‘नगदनारायण राजनीति’ से उन दिनों काफी क्षुब्ध थे। जानकार लोग बताते हैं कि उन्होंने दोनों ज्ञान राजीव को दे दिए। संसदीय ज्ञान के साथ -साथ उन्होंने कतिपय कांग्रेसी नेताओं के भ्रष्टाचार को खत्म करने की जरुरत भी राजीव को बता दी।

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उसके निम्न लिखित नतीजे निकले

1.-देश के तीन कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को, जिनपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे, कांग्रेस महासचिव राजीव गांधी ने उनके पदों से हटवा दिया।

2.-प्रधानमंत्री बनकर राजीव गांधी ने ‘सत्ता के दलालों’ के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आवाज उठाई।

3.-साथ ही, 85 पैसे बनाम 15 पैसे का रहस्योद्घाटन भी कर दिया।

प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ओड़िशा के कालहांडी की सभा में कहा कि केंद्र सरकार 100 पैसे दिल्ली से भेजती है, पर लोगों के पास उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही पहुंचते हैं।

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नतीजतन राजीव गांधी ‘मिस्टर क्लीन’ कहलाए।

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रामनाथ गोयनका भी राजीव से प्रभावित हो गए। उन्होंने राजीव के बाल सखा सुमन दुबे को इंडियन एक्सप्रेस का संपादक बना दिया।

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पर, वह हनीमून अवधि छोटी ही साबित हुई। बाद में क्या -क्या हुआ,वह सब कहने का अवसर आज नहीं है। किसी और दिन !

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21 मई 2020

   


   

मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

के.बी. सहाय : खट्टी-मिठी यादें

गोल्ड मेडलिस्ट के.बी. सहाय आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे


सन 1963-67 में बिहार के मुख्यमंत्री रहे के.बी.सहाय के बारे में अनेक खट्टी-मिठी यादें हैं। कृष्ण बल्लभ सहाय अत्यंत मेधावी छात्र थे। उन्हें एक बार स्वर्ण पदक भी मिला था। उन्हें अच्छी से अच्छी नौकरी मिल सकती थी। पर उन्होंने संघर्ष का जीवन चुना। आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।

1937 में संसदीय सचिव व 1946 में राजस्व मंत्री बने। जमीन्दारी उन्मूलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। बाद के वर्षों में वे विवादों में भी रहे। 1957 में चुनाव हार गए। एक अन्य बड़े कांग्रेसी नेता महेश प्रसाद सिंहा भी तब हारे थे।

इस पर जयप्रकाश नारायण ने तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिन्हा को पत्र लिखा कि आपने महेश प्रसाद सिन्हा को तो खादी बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया, पर के.बी. सहाय को कुछ नहीं बनाया। इसपर दोनों नेताओं के बीच तीखा व लंबा पत्र-व्यवहार हुआ था।

जेपी ने श्रीबाबू पर जातिवाद का आरोप लगाया तो श्रीबाबू ने जेपी पर वैसा ही आरोप लगाया। उन पत्रों पर आधारित एक पुस्तक डा. एन.एम. पी श्रीवास्तव ने लिखी है। खैर, के.बी. सहाय को बहुत ही सफल प्रशासक माना जाता था। ब्यूरोक्रेसी पर उनकी पूरी पकड़ रहती थी। पर, उनके ही कार्यकाल में पहली बार कांग्रेस 1967 में बिहार विधानसभा का चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हो गई।

कुल मिलाकर सहाय जी को इस रूप में याद किया जा सकता है कि उन्होंने अपने निजी जीवन में सुखमय कैरियर का लोभ छोड़कर आजादी की लड़ाई लड़ी थी। आज तो आम तौर पर किसी को जब कोई नौकरी नहीं मिलती तो वह राजनीति में कूद पड़ता है। अपवादों की बात और है।

वंशवाद-परिवारवाद के आधार पर राजनीति में आए अधिकतर लोगों की योग्यता-क्षमता आज अक्सर सवालों के घेरे में रहती है। इसलिए भी राजनीति व प्रशासन का हाल आज देश भर में असंतोषजनक है।

के.बी. सहाय का जन्म 31 दिसंबर 1898 और निधन 3 जून 1974 को हुआ। एक सड़क दुर्घटना में उनकी जान चली गई।

शुक्रवार, 15 जून 2018

राजेंद्र काॅलेज (छपरा) : जरा याद कर लें प्राचार्य भोला प्रसाद सिंह को


18 दिसंबर, 1967 की बात है। बिहार के अनेक राजनीतिक तथा गैर राजनीतिक संगठनों ने राजभाषा संशोधन विधेयक के खिलाफ ‘बिहार बंद’ का आह्वान किया था। मैं उन दिनों संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े क्रांतिकारी विद्यार्थी संघ की सारण जिला शाखा का सचिव था। हम छात्रों ने इस अवसर पर छपरा में जुलूस निकालने का निर्णय किया था। उस दिन मैं सुबह सात बजे ही एक रिक्शे पर माइक लेकर राजेंद्र कालेज के गेट पर पहुंच गया।



मैं छात्रों से क्लास का बहिष्कार करके जुलूस में शामिल होने की अपील कर रहा था। जिस दिन काॅलेज में असामान्य स्थिति रहती थी, उस दिन राजेंद्र कालेज के प्राचार्य भोला प्रसाद सिंह समय से पहले ही काॅलेज पहुंच जाते थे। उस दिन भी पहंुच गए थे।

वे गेट पर मेरे पास आए और मुझसे कहा कि ‘तुम यहां से माइक लेकर चले जाओ।’ जब मैंने हटने से इनकार कर दिया तो उन्होंने कहा कि ‘तुमसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी।’ मैंने कहा कि मैं आज आपका हुक्म नहीं मानूंगा। दरअसल मेरे साथ छात्र थे और उस काॅलेज के प्रो. राम श्रेष्ठ मिश्र का भी मुझे समर्थन हासिल था।

उसके बाद काॅलेज के अहाते में छात्रों -प्राध्यापकों की एक सभा बुलाई गयी। कई छात्रों और प्राध्यापकों ने जुलूस के खिलाफ अपनी राय जाहिर की। अंत में प्रो. रामश्रेष्ठ मिश्र बोलने को खड़े हुए। वे बोल ही रहे थे कि बगल के एक वृक्ष से एक काग कांव- कांव करता हुआ उड़ा। इस पर भोला बाबू ने कहा कि ‘ देखो काग बोल रहा है। आज जरूर कुछ बुरा होगा।’

विरोध के बावजूद हमने जुलूस निकाला। सैकड़ों छात्र जुलूस में शामिल हो गए। हमारा संगठन मजबूत था। पर इतने बड़े जुलूस की मुझे भी उम्मीद नहीं थी। मुझे कुछ शंका होने लगी। संभवतः भोला बाबू को यह लगता था छात्रों की जमात को मैं संभाल नहीं पाऊंगा।

जब जुलूस के रास्ते में नये -नये युवक जुड़ने लगे तो  मेरी शंका बढ़ गयी। क्योंकि वे अनजान चेहरे थे। लगा कि जुलूस के जरिए तोड़-फोड़ करवाने की कोई बाहरी राजनीतिक साजिश थी। याद रहे कि उन दिनों बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार चल रही थी। खैर, भोला बाबू की आशंका सच होने वाली थी और हो ही गयी। जुलूस छपरा कोर्ट परिसर स्थित स्टेट बैंक के पास पहुंचा। वहां जुलूस में शामिल कुछ युवक अनियंत्रित हो गए। बैंक के गार्ड ने गोली चला दी। एक राहगीर मारा गया। जुलूस तितर -बितर हो गया।

हालांकि इसको लेकर किसी छात्र की गिरफ्तारी नहीं हुई। दरअसल उस जुलूस का आयोजन मैंने ही किया था। संभवतः भोला बाबू को यह लग गया था कि मेरे जैसे अपरिपक्व व्यक्ति के लिए जुलूस में शामिल छात्रों -युवकों को नियंत्रित कर पाना संभव नहीं होगा। उन्हें ठीक ही लगा था।

खैर, दूसरी घटना कुछ समय बाद की है।

16 जनवरी, 1968 को बिहार विधानसभा भवन के समक्ष संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का प्रदर्शन होने वाला था। उससे दो दिन पहले हमने सारण जिले में कुछ नेताओं के साथ सघन भ्रमण कर लोगों को पटना पहुंचने का संदेश दिया था। थककर चूर हो गया था। जुकाम हो गया।

इसलिए मैं खुद पटना नहीं जा सका। 16 जनवरी की शाम में जब भोला बाबू ने मुझे काॅलेज परिसर में देखा तो पूछा कि ‘तुम लोगों का प्रदर्शन है न। तुम यहां हो ?’ उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि ‘तुम जीवन में कुछ नहीं कर सकते। कभी नेता नहीं बनोगे।’

यह एक अभिभावक की फटकार थी। वे मुझे राजनीति में आगे बढ़ते देखना चाहते थे। मेरी बी.एससी. परीक्षा का रिजल्ट हो चुका था। मैं अंक पत्र लेने काॅलेज गया था। भोला बाबू अपने कक्ष के सामने खड़ा होकर उन कुछ छात्रों को समझा रहे थे जो छात्रसंघ का चुनाव कराने की जिद पर अड़े थे। मैं भोला बाबू के पीछे से गुजरा। थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्होंने मुझे वापस बुलाया। पूछा, ‘पास कर गए?’

जब मैंने ना कह दी तो उन्होंने हड़ताली लड़कों का ध्यान मेरी ओर खींचते हुए अभिनय की मुद्रा में कहा कि ‘देखो, यही था जो फाटक पर माइक लेकर कहता था, साथियों साथ दो। और आज जब फेल हो गया तो मुझसे मिले बिना ही जा रहा है। तुम लोगों की भी यही हालत होगी।’ फिर मेरी ओर मुखातिब होकर उन्होंने कहा कि ‘कोई बात नहीं। फिर परीक्षा दो। मैं तुम्हारी मदद करूंगा।’ दरअसल मैं फेल कैसे नहीं करता! पढ़ाई-परीक्षा मेरी प्राथमिकता से काफी दूर चली गयी थी।

शिक्षक के रूप में उनके अतुलनीय योगदान की चर्चा किए बिना बात पूरी नहीं हो सकती। भोला बाबू केमिस्ट्री पढ़ाते थे। मैं विज्ञान का छात्र होने के कारण उनका क्लास करता था। राजेंद्र कालेज में विज्ञान संकाय में छात्र बहुत थे। इसलिए भोला बाबू सबको एक साथ शामियाना में बैठाकर पढ़ाते थे। रसायन शास्त्र जैसे निरस और जटिल विषय को इस तरह से मनोरंजक ढंग से पढ़ा देते थे कि उसे फिर घर  जाकर पढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। लगातार घंटों तक पढ़ाते जाना उनके ही वश की बात थी। हमें हमेशा उनके क्लास की प्रतीक्षा रहती थी।

बी.एससी. फेल कर जाने के बाद मैं पटना रहने लगा था। समाजवादी साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकमुख’ में काम करने लगा। उसके संपादक प्रो. देवी दत्त पोद्दार थे। इस बीच मेरे एक शुभचिंतक ने मुझे सलाह दी कि पहले तुम गे्रजुएट तो हो जाओ। बाद में जीवन में जो करना हो, करो। मुझे बात अच्छी लगी।

मैं गांव लौट गया। सारण जिला संसोपा के आॅफिस सेके्रट्री के रूप में काम करने लगा। मुझे हर माह सौ रुपए मिलते थे। साथ ही राजेंद्र काॅलेज में ही हिस्ट्री आॅनर्स में दाखिला करा लिया। आॅनर्स के साथ पास भी कर गया।
इस बीच भोला बाबू से मेरा पहले जैसा संपर्क नहीं रहा। गांव से रोज ट्रेन से छपरा जाता था। क्लास करना और पार्टी आॅफिस में काम करना। इसी में समय बीत जाता था।

इस बीच 26 अप्रैल, 1971 को यह दुःखद खबर मिली कि भोला बाबू की काॅलेज परिसर में ही किसी ने हत्या कर दी। मेरे लिए तो सदमे वाली खबर थी। मैंने ‘सारण संदेश’ में उन पर संस्मरणात्मक लेख लिखा था।

किन्हीं और के लिए भोला बाबू जो कुछ भी हों, पर मेरे लिए तो भोला बाबू अभिभावक तुल्य थे। मैं उनके शिक्षक रूप से सर्वाधिक प्रभावित था। कमेस्ट्री का वैसा बढि़या टीचर मैंने नहीं देखा।

(नोट-आपने ध्यान दिया होगा। मैं उन शिक्षकों के बारे में फेसबुक पर बारी-बारी से लगातार लिख रहा हूं जिन्होंने मुझे किसी न किसी रूप से प्रभावित किया। या जिनके बारे में पढ़कर -जानकर प्रभावित हुआ हूं। अगली बार किन्हीं अन्य गुरू देव के बारे में लिखूंगा।)

शनिवार, 5 मई 2018

आज भी याद आते हैं ‘फिरंगिया’ के लेखक प्रिंसिपल मनोरंजन बाबू

मैंने जब छपरा के राजेंद्र काॅलेज में अपना नाम लिखवाया, उससे करीब तीन या चार साल पहले ही मनोरंजन बाबू उस काॅलेज के प्राचार्य पद से रिटायर हो चुके थे। पर बाद में भी  कालेज में अक्सर उनका नाम बहुत आदर से लिया जाता था। कोई उनके एक गुण की चर्चा करता तो कोई उनकी  दूसरी  उपलब्धियों की।उनकी मशहूर रचना ‘फिरंगिया’ तो अनेक लोगों की जुबान पर थीं।

वे मूलतः अंग्रेजी के शिक्षक थे, पर वे भोजपुरी बहुत सहजता से बोलते-लिखते थे। फिरंगिया भोजपुरी में ही है। एक बार कालेज परिसर में  कुछ छात्र किसी बात पर शोर कर रहे थे। मनोरंजन बाबू उनके पास गए। उन्होंने छात्रों से भी कविता में बात कर  ली।
‘ हड़बड़ कइले, गड़गड़ होई, बढ़-चढ़ बात करे ना कोई !’
इस पर वे हंसते हुए अपने -अपने क्लास में चले गए।
दरअसल उनकी नैतिक धाक का कमाल था।

मनोरंजन बाबू ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में  एम.ए. अंग्रेजी में टाॅप किया था। मदन मोहन मालवीय  उन्हें बी.एच.यू. में ले गए। वहां कुछ दिनों तक उन्होंने अंग्रेजी पढ़ाई। बाद में राजेंद्र कालेज में प्राचार्य होकर आ गए।
असहयोग आंदोलन के समय मनोरंजन बाबू ने ‘फिरंगिया’ नाम से  देशभक्ति का गीत लिखा।बाद में वह गीत स्वतंत्रता सेनानियों की जुबान पर था।

एक शिक्षक,एक प्रशासक व एक साहित्यकार के रूप में उन्होंने अपना एक विशेष स्थान बनाया था। हालांकि उनके प्रशंसकों को यह अफसोस रहा कि उन्होंने अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने के कारण अधिक लेखन नहीं किया। जबकि उनमें लेखन प्रतिभा अद्भुत थी। हालांकि  उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखी थीं।
1942 में वे बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के मोतिहारी अधिवेशन के अध्यक्ष हुए थे। 

 वैसे राजेंद्र काॅलेज को एक बेहतर काॅलेज बनाने में उनका योगदान अतुलनीय रहा। उन दिनों भी बिहार में ऐसे कम ही काॅलेज थे जहां आर्ट, साइंस और काॅमर्स तीनों की पढ़ाई होती थी। राजेंद्र कालेज में भी ऐसा था।
राजेंद्र काॅलेज के विस्तृत परिसर और बड़े -बड़े क्लास रूम और समृद्ध प्रयोगशालाओं को तो मैंने एक छात्र के रूप में खुद भी देखा और उपयोग किया था। 

 मुझे भी इस बात का अफसोस रहा कि मैं उन्हें वहां काम करते नहीं देख सका था। पर उनके नाम की सुगंध तब भी मौजूद थी। फिलहाल देश प्रेम जगाने वाली उनकी ऐतिहासिक रचना ‘फिरंगिया’ यहां प्रस्तुत है।
संभव है कि मुझसे उसकी एक- दो पंक्तियां छूट गयी हों।--

      --फिरंगिया--
 सुन्दर सुघर भूमि भारत के रहे रामा,
आज उहे भइल मलीन रे फिरंगिया।
अन्न-धन-जन -बल बुद्धि सब नास भइल,
कवनो  के ना रहल निसान रे फिरंगिया।
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जहवां थोड़े ही दिन पहिले होत रहे,
लाखों मन गल्ला और धान रे फिरंगिया।
उंहवे पर आज रामा मथवा पर हाथ धके,
बिलखी के रोवे ला, किसान रे फिरंगिया।
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घिउवा आ दूधवा के नदिया बहत जहां,
उहवां बहेला रक्तधार रे फिरंगिया।
जहवां के लोग सब खात ना अघात रहे,
रुपया से रहे मालामाल रे फिरंगिया।

उहें आज जेने जेने अखियां घुमा के देखीं,

तेने तेने देखबे कंगाल रे फिरंगिया।
हमनी के पसु से रे हालत खराब कइले,
पेटवा के बल रेंगवउले रे फिरंगिया।
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एको जो रोऊवा निरदोसिया के कलपी ते,
तोर नास होई जाई सुन रे फिरंगिया।
दुखिया के आह तोर देहिया के भसम कै देई,
जरि भुनि होई जइबे रे फिरंगिया।
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स्वाधीनता हमनी के नामो के रहल नाहीं,
अइसन कानून के बा जाल रे फिरंगिया।
प्रेस एैक्ट, आर्म्स ऐक्ट, इंडिया डिफेंस एैक्ट,
सब मिली कइलस ई हाल रे फिरंगिया।
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भारत के छाती पर भारत के बचपन के,
बहल रक्तवा के धार रे फिरंगिया।
घरे लोग भूख मरे गेहुंआ विदेस जाए,
कइसन बा विधि के विधान रे फिरंगिया।
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मरदानापन अब तनिको रहल नाहीं,
ठकुरसुहाती बोले रे फिरंगिया।
रात दिन करेले खुसामद सहेबवा के,
सहेले विदेसिया के लात रे फिरंगिया।
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चेति जाउ,चेति जाउ भैया रे फिरंगिया तें,
छोड़ दे अधरम के पंथ रे फिरंगिया।
छोड़ के कुनीतियां सुनीतिया के बांह गहु,
भला तोर करी भगवान रे फिरंगिया।
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गुरुवार, 3 मई 2018

‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ पर मैं खुशवंत सिंह को याद कर रहा हूंं। पर, उन्हें ही क्यों ? इसलिए कि वे आपने पाठकों की भी स्वतंत्रता के  प्रबल पक्षधर थे। जब वे ‘इलेस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया के संपादक थे तो उन्होंने अपने पाठकों की उन चिट्ठियों को भी छापा जिनमें उन्हें खुशामद सिंह, संजय गांधी के चमचा और न जाने क्या -क्या लिखा रहता था।

2005 में  खुशवंत सिंह ने ‘आउटलुक’ को दिए गए इंटरव्यू में  कहा भी था कि ‘ संजय गांधी के कहने पर मैं दुबारा  संपादक बना था।’ सरदार जी  1969 से 1977 तक इलेस्ट्रेटेड विकली आॅफ इंडिया के संपादक थे। बाद में  वे ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के संपादक बने।

इंदिरा गांधी के एक बार फिर 1980 में सत्ता में आ जाने के बाद संजय गांधी ने खुशवंत सिंह को कुछ आॅफर दिए। खुशवंत सिंह के अनुसार, संजय ने कहा ‘आप ब्रिटेन में भारत के  उच्चायुक्त या दुनिया में कहीं के राजदूत बनना चाहते हों या फिर राज्यसभा के सदस्य और हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक ।’ खुशवंत जी ने कहा कि मुझे बाद वाला प्रस्ताव बेहतर लगा।
खुशवंत ने कहा कि एक दो बार प्रधान मंत्री (इंदिरा गांधी) के दफ्तर से संदेश आया कि मैं ऐसा करूं, या ऐसा न करूं, लेकिन मैंने उसकी परवाह नहीं की।
इंदिरा जी के बारे में उन्होंने लिखा कि इंदिरा मुझे पसंद करने लगी थीं। क्योंकि मैं संजय का समर्थन कर रहा था। दरअसल संजय पर गलत आरोप लगा कर आक्रमण किए जा रहे थे। मैं सभी आरोपों की तह में गया, उन्हें गलत पाया।

यानी खुशवंत सिंह अपनी शर्तों पर काम करते थे। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। पर अनेक लोग यह मानते हैं कि वे एक अत्यंत योग्य लेखक व पत्रकार थे। हालांकि उन्हें पत्रकार रहना अधिक पसंद था। वे उन कुछ लोगों के कथन से असहमत थे कि ‘पत्रकारिता साहित्य की हरामी औलाद है।’  वे कहते थे कि आज मेरी जो प्रसिद्धि है, वह पत्रकारिता के कारण है।

यूनेस्को की अपनी नौकरी छोड़कर लेखक पत्रकार के अनजाने से पेशे में खुशवंत सिंह आ गए थे। पर वीकली के संपादक के रूप में उन्होंने कमाल किया था।

इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं तो न्यूयार्क टाइम्स ने उन पर लिखने के लिए कहा था। सरदार जी ने लिखा कि इंदिरा गांधी सरकार में एक क्लर्क का काम करने लायक भी नहीं हैं क्योंकि वह मैट्रिक पास भी नहीं हैं।
सम्पादकों के बारे में खुशवंत ने कहा था कि ‘संपादक जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वह यह कि वे अपना उत्तराधिकारी तैयार नहीं करते।’

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

एक आदर्श शिक्षक जंगल बाबा

सारण जिले के दिघवारा का जय गोविंद उच्च विद्यालय कोई गुरुकुल तो नहीं था,एक सामान्य स्कूल था,पर उसके शिक्षक राम जंगल सिंह गुरु जरूर थे।
 मैं 1959 से 1961 तक वहां का छात्र था। तब के वहां के प्रधानाध्यापक हरिहर बाबू भी बहुत योग्य व सम्मानित शिक्षक थे,पर राम जंगल बाबू जिन्हें हम लोग 
‘जंगल बाबा’ कहते थे,की अपनी अलग एक नैतिक सत्ता थी।

 जंगल बाबा वेश भूषा और पोशाक से लेकर विषयों की जानकारी तक नीचे से ऊपर तक गुरु दिखते थे।
  स्कूल के बरामदे पर उनके पैर  रखते ही हम विद्यार्थी जल्द अपनी- अपनी कक्षाओं में प्रवेश कर जाते थे और स्कूल का वातावरण बिलकुल शांत हो जाता था।
 वे एक तरह के स्कूल के अभिभावक ही थे। इलाके एक संपन्न व्यक्ति जय गोविंद पांडेय ने जंगल बाब की प्रेरणा सेे ही हाई स्कूल की स्थापना की। पांडेय जी की शत्र्त थी कि राम जंगल बाबू को भी शिक्षक और अभिभावक स्वरूप स्कूल में कार्यरत रहना पड़ेगा।
वे रहे भी।

हमारे जमाने में एक से एक योग्य शिक्षक उस स्कूल में थे। पर जंगल बाबा सबके गुरु थे।  किसी भी अन्य शिक्षक की अनुपस्थिति में कोई क्लास खाली नहीं जाता था। क्योंकि जंगल बाबा हर ताले की चाभी थें। वे हर विषय आसानी से पढ़ा लेते थे।

बी.एच.यू. के छात्र रहे जंगल बाबा दो साल तक इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी कर चुके थे। पर स्वास्थ्य खराब रहने के कारण वे आगे पढ़ाई नहीं कर सके थे।उन्हें दिघवारा लौटना पड़ा था।

सारण जिले के दिघवारा के मूल निवासी जंगल बाबा का जन्म 1902 में हुआ था और नवंबर, 1985 में निधन हो गया। पर जब तक जीवित रहे, उन्हें सब लोग सम्मान की नजरों से देखते थे। कभी किसी विवाद में नहीं रहे। उनके नाम पर इन दिनों राम जंगल सिंह इंटर कालेज दिघवारा में चलता है। जंगल बाबा के परिवार के सदस्य अशोक कुमार सिंह के अनुसार उन्हें राहुल सांकृत्यायन का भी सानिध्य मिला था।

जंगल बाबा ने छपरा स्थित राजपूत उच्च विद्यालय  से इंट्रेंस की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी। उसके बाद काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में दाखिला लिया।
जंगल बाबा वहां भरूचा छात्रावास में रहते थे जहां जगजीवन राम और जयप्रकाश नारायण के छोटे भाई राजेश्वर लाल इनकी मित्र मंडली में थे।

 आईएससी करने के बाद राम जंगल सिंह ने इंजीनियरिंग काॅलेज में दाखिला लिया। पर अचानक अस्वस्थ हो जाने के कारण पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी।
चाहे गांधी की आंधी हो या जेपी का आंदोलन, जंगल बाबा ने लोगों की चेतना जगाने का काम किया।

मुझे गर्व है कि मैंने भी जय गोविंद विद्यालय में जंगल बाबा से शिक्षा पाई।उन्हें आटर््स व साइंस सभी विषयों में  समान रूप से महारत हासिल था।जंगल बाबा न सिर्फ एक आदर्श शिक्षक थे बल्कि उनका व्यक्तित्व भी आदर्श था। 
  

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

सरदार हरिहर सिंह की नजर में श्रीबाबू

बिहार में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे डा. श्रीकृष्ण सिंह के बारे में तरह -तरह के लोग तरह -तरह के विचार रखते हैं।ऐसा स्वाभाविक ही है क्योंकि उन्होंने आजादी के बाद व पहले की कांग्रेसी राजनीति व शासन को काफी प्रभावित किया था।


   पर एक अन्य मुख्य मंत्री सरदार हरिहर सिंह की नजरों से डा.श्रीकृष्ण सिंह को देखना अधिक महत्वपूर्ण बात होगी।सरदार साहब सन 1969 में बिहार के मुख्य मंत्री बने थे।

डा.श्रीकृष्ण सिंह यानी श्रीबाबू के बारे में सरदार साहब ने लिखा है कि ‘आजादी की लड़ाई के दिनों  श्रीबाबू खास तौर पर युवकों के नेता थे।ऐसे तो वे संपूर्ण जनता के नेता थे,पर अपने उग्र राष्ट्रीय विचारों के कारण वे युवकों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते थे।उनके अपने स्वतंत्र विचार थे।वे किसी के ‘हिज मास्टर्स वायस’ नहीं थे।उनका अपना स्टैंड होता था,इसलिए वे हमारे जैसे युवकों के लिए ग्राह्य और प्रिय थे।

  सरदार हरिहर सिंह खुद भी एक महत्वपूर्ण हस्ती थे और आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उनका नाम सरदार पड़ा था।

   सरदार साहब ने लिखा है कि श्रीबाबू सन 1930 से पहले मुंगेर जिले की राजनीति तक अपने को सीमित रखे हुए थे।वे राज्य के नेतृत्व में भाग लेते थे,लेकिन मुंगेर को अपना मुख्य केंद्र बना कर चलते थे।नमक सत्याग्रह के बाद वे बिहार के राजनीतिक क्षितिज पर छा गये।

तब से लेकर मरते दम तक छाये रहे।याद रहे कि डा.राजेंद्र प्रसाद व डा.अनुग्रह नारायण सिंह सहित कई नेतागण चंपारण सत्याग्रह के समय ही गांधी के साथ हो लिये थे।

  बिहार के  अत्यंत महत्वपूर्ण नेता  डा.अनुग्रह नारायण सिंह को लोग बाबू साहब कहते थे।बाबू साहब के  बारे में सरदार साहब ने लिखा है कि अनुग्रह बाबू से मेरा संबंध 1916 से था।हमारा उनका व्यक्तिगत संबंध था।
हम बाबू साहब के बहुत करीब थे।उनके साथ मेरा घनिष्ठ संबंध था,पर राजनीतिक स्तर पर हम श्रीबाबू से संबंधित थे।राजेंद्र बाबू और बाबू साहब सुधारवादी व नरमपंथी विचार के थे।उस जमाने के लिहाज से श्रीबाबू प्रगतिशील और उग्र विचार के थे।इसी कारण श्रीबाबू को युवको का समर्थन मिला।बहुत से उग्रवादी नेता जैसे राम विनोद सिंह,श्यामा बाबू ,योगेंद्र शुक्ल आदि श्रीबाबू के साथ जाना पसंद करते थे और साथ चले भी।याद रहे सरदार साहब ने क्रांतिकारियों के लिए अपने लेख में उग्रवादी शब्द का इस्तेमाल किया है।

   राजनीति में शालीनता के बारे में हरिहर सिंह ने लिखा कि उस समय के लोगों की सबसे बड़ी बात थी कि  राजनीति में शालीनता थी।श्रीबाबू का अपना स्टैंड जरूर होता था,लेकिन इसका मतलब दूसरे के प्रति अनादर और दुश्मनी नहीं थी।

बाबू साहब हों या राजेंद्र बाबू वे सबका आदर करते थे और सबको सम्मान देते थे।प्रारंभ में बाबू कष्ण बल्लभ सहाय बाबू साहब के साथ थे।उन्होंने 1937 में श्रीबाबू का विरोध किया।उसके बाद वे श्रीबाबू के संपर्क में आये।सहाय जी 1952 में श्रीबाबू के साथ थे।पर 1957 के चुनाव उन्होंने श्रीबाबू को हराने का असफल प्रयास किया।तब बिहार कांग्रेस विधायक दल के नेता पद का चुनाव श्रीबाबू और बाबू साहब के बीच हुआ था।श्रीबाबू जीते।

   उन दिनों की राजनीति की शालीनता का एक और उदाहरण देते हुए सरदार साहब ने लिखा कि एक बार श्रीबाबू महेश प्रसाद सिंह को मंत्री बनाना चाहते थे और बाबू साहब  दीप नारायण सिंह को।एक बार तो लगा कि दोनों में से कोई एक ही मंत्री बनंेगे।क्योंकि दोनों नेता एक ही जिले के थे।पर ंदोनों मंत्री बने । इसमें यह खूबी रही कि डा.अनुग्रह नारायण सिंह ने   महेश प्रसाद सिंह का नाम प्रस्तावित किया और डा.श्रीकृष्ण सिंह ने  दीप नारायण सिंह का।श्रीबाबू के मंत्रिमंडल में अनुग्रह बाबू हमेशा मुख्य मंत्री के बाद दूसरे स्थान पर रहे।

   सरदार साहब के अनुसार श्रीबाबू के भाइयों ने जब आजादी की लड़ाई के दिनों उनका साथ छोड़ दिया था तो महेश प्रसाद सिंह ने श्रीबाबू का साथ दिया था।डा.श्रीकष्ण सिंह का जीवन तो निष्कलंक था,पर महेश प्रसाद सिंह को लेकर कुछ लेागों ने डा.श्रीकृष्ण सिंह  को बदनाम करने की कोशिश की।पर श्रीबाबू ने उपकार का बदला व्यावहारिक ही नहीं,बल्कि सांस्कतिक स्तर पर भी महेश बाबू को चुकाया।जब श्रीबाबू ने अपनी सबसे प्रिय निधि यानी अपनी पुस्तकों को मुंगेर के श्रीकृष्ण सेवा सदन को सौंपा तो उस पुस्तकालय का नाम कमला-महेश पुस्तकालय रखा।लेकिन महेश प्रसाद सिंह ने डा.श्रीकृष्ण सिंह  की उदारता और व्यक्तिगत संबंध का उपयोग अपने को राजनीति में स्थापित करने तथा आगे बढ़ाने में किया।

  अपने खुद के  कटु अनुभव की चर्चा करते हुए सरदार हरिहर सिंह ने लिखा कि सन 1957 के चुनाव में टिकट को लेकर सत्य नारायण सिंह और महेश प्रसाद सिंह ने मेरे नाम का विरोध किया।इसके परिणामस्वरूप मुझे टिकट नहीं मिला।इससे मैं कुछ खिन्न था।बाद की राजनीतिक स्थिति को देखकर मुझे तकलीफ हुई।श्रीबाबू के निधन के कुछ समय पहले मैंने एक दिन कुछ दुःखी होकर कह दिया--‘मरने के वक्त आप भूमिहार हो गये और मैं राजपूत।नहीं तो कोई नहीं जानता था कि हम दोनों एक ही जाति के नहीं हैं।’यह सुनते ही श्रीबाबू रो पड़े।न कोई शब्द थे और न कोई सफाई।मात्र अश्रु धार मेरे सवाल का जवाब दे रहे थे।

(श्रीबाबू के जन्म दिन के अवसर पर विशेष)

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

राम एकबाल बरसी जैसे नेता अब पैदा नहीं होते

डाॅ. राम मनोहर लोहिया ने कभी राम एकबाल सिंह को ‘पीरो का गांधी’ कहा था। डाॅ. लोहिया ऐसे नेता थे जो न तो अपनी चापलूसी सुनना चाहते थे और न ही किसी को महज खुश करने के लिए ऐसा कोई नाम देते थे।

 जो लोग लोहिया को जानते रहे हैं, उन लोगों ने यह मान लिया था कि यदि लोहिया ने राम एकबाल जी को ‘पीरो का गांधी’ कहा था तो जरूर राम एकबाल जी में ऐसी कोई विशेष बात होगी। बात थी भी। राम एकबाल जी एक अनोखे नेता थे। समाजवादी आंदोलन के लोग राम एक बाल जी को आदर की दृष्टि से देखते थे। वैसे इसके कुछ लोग अपवाद भी थे।

 यह अकारण नहीं था कि हाल में जब पटना के अस्पताल में इलाज के लिए राम एकबाल जी को लाया गया तो लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दोनों उन्हें देखने के लिए वहां गये। ऐसा कम होता है।

  यह भी संयोग ही रहा कि राम एकबाल जी का निधन उसी महीने में हुआ जिस अक्तूबर में राम मनोहर लोहिया का 1967 में निधन हुआ था।

 समाजवादी नेता राम एकबाल सिंह 1969 में पीरो से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गये थे।  1972 में भी वह पीरो से ही चुनाव लड़े, पर उनका तीसरा स्थान रहा। उसके बाद उन्होंने कोई चुनाव नहीं लड़ा।

 1977 में उन्हें जनता पार्टी का टिकट आॅफर किया गया था। पर उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। उनकी जगह रघुपति गोप को टिकट मिला और वह जीते भी। जनता पार्टी का टिकट उन दिनों जीत की गारंटी माना जाता था। इसके बावजूद राम एकबाल ने तब कह दिया था कि एक ही व्यक्ति बार -बार चुनाव क्यों लड़ेगा ? कोई और लड़े।

 1977 में ही बिहार विधानसभा से पहले लोकसभा का चुनाव हो चुका था। बिहार की सभी 54 लोस सीटें जनता पार्टी को मिल चुकी थीं। इसके बावजूद जनता पार्टी का टिकट अस्वीकार करने का काम कोई आदर्शवादी व्यक्ति ही कर सकता था। राम एकबाल जी आदर्शवादी थे भी।

बाद के दिनों में राम एकबाल जी ने अपने नाम के आगे से सिंह शब्द हटाकर उसकी जगह बरसी जोड़ लिया था। बरसी उनके गांव का नाम है। यह नाम उनके साथ अंत तक रहा।

 आदर्शवादी तो ऐसे थे कि एक समाजवादी मित्र की लड़की की शादी में हसुआ और खुरपी लेकर चले गये थे। नब्बे के दशक की बात है। उनके मित्र पटना के लोहिया नगर में रहते हैं। राम एकबाल जी के पास वर-बधू को देने के लिए यही उपहार था। मित्र से कहा कि नवजीवन शुरू करने वाले दंपत्ति थोड़ा खेती भी करें।

 वह कभी -कभी थोड़ा कटु भी बोलते थे। पर उनकी बोली का उनके परिचित मित्र बुरा नहीं मानते थे। साठ के दशक में मैं उनसे मिला था। संसोपा के सम्मेलनों में उन्हें देखता था। विधायक के रूप में भी उनकी भूमिका करीब से देखी।

सब जगह निर्भीक, स्पष्टवादी और अपने विचारों पर अडिग।

कमजोर वर्ग उनकी राजनीति के कंेद्र में होता था। मेरे जानते उनमें निजी स्वार्थ की भावना कतई नहीं थी। संभवतः इसलिए भी किसी भी बड़ी हस्ती से बहस करने और लड़ लेने की ताकत थी उनमें। अपने दल के अंदर और पार्टी के बाहर भी।

डाॅ. लोहिया कहा करते थे कि सोशलिस्ट कार्यकर्ताओं की वाणी स्वतंत्र रहनी चाहिए, पर उनमें कर्म की प्रतिबद्धता भी होनी चाहिए। लोहिया के नहीं रहने बाद भी लोहियावादी राम एकबाल जी इसका पालन करते थे। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि मैं दो सौ साल जीना चाहता हूं। बहुत काम करने हैं। इसके लिए वह प्रयत्नशील भी रहते थे।

दो सौ साल जीना तो असंभव है। पर उन्होंने ऊंचा लक्ष्य रखा तो 94 साल जीए।

राजनीतिक कार्यकर्ता के जीवन में दौड़-धूप काफी रहती है। संयम और उचित खानपान के लिए जो साधन, समय और स्थान चाहिए, उसका अभाव ही रहा होगा। फिर भी इतना जीना बड़ी बात है।

  एक बार उन्होंने निश्चय किया था कि एक खास कालावधि में वह पक्की सड़क पर पांव तक नहीं रखेंगे।
इसका उन्होंने लंबे समय तक भी पालन किया। पिता की सेवा के लिए वह लंबे समय तक गांव में ही रहे। इस तरह के कई असामान्य काम थे जो उन्होंने किए।

राम एकबाल बरसी जैसे राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता-नेता शायद उसी युग में पैदा होते थे जब राम एकबाल पैदा हुए थे। अब इस मामले में यह भूमि बंजर सी हो चुकी है। इसलिए भी वे अनेक लोगों को याद आते रहेंगे।

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

आदर्शवादी पीढ़ी के एक संपादक का निधन


एक सौ एक बसंत देख चुके पारसनाथ सिंह संपादकों की उस पीढ़ी के थे जो  लगभग विलुप्त हो रही है। आज उनके गांव में उनका निधन हो गया। वर्षों तक उनके साथ काम करने के अनुभव के बाद मैं यह कह सकता हूं कि उन्होंने कभी अपनी जीवन शैली नहीं बदली। न ही पत्रकारिता के उन मूल्यों से समझौता किया जो उन्होंने अपने पूर्ववर्ती संपादकों  से सीखा था।

  बाबूराव विष्णु पराड़कर को अपना आदर्श मानने वाले पारस बाबू ने हमें विद्याव्यसनी और विनयी बनने का पाठ पढ़ाया। उत्तर प्रदेश और बिहार के तीन अखबारों के संपादक रहे पारसनाथ सिंह ने न तो कभी अपने पद का लाभ उठाया और न ही पत्रकारिता की धौंस जमाई।

हमेशा सीमित आर्थिक साधनों के जरिए ही परिवार चलाते और संतुष्ट रहते उन्हें देखा। उन्होंने अपनी संतानों को भी अच्छे संस्कार दिए। उनके दीर्घ जीवन का राज यह था कि उनका खाने -पीने में भी भारी संयम था। वे अक्सर पैदल चलते देखे जाते थे।
  ऐसा ही अनुशासन वे संपादन कार्यों में भी रखते थे। वे शब्दानुशासन और खबरों के शीर्षक में शालीनता के घोर पक्षधर थे। वे अपने  संवाददाताओं से कहा रहते थे कि वे छोटे-छोटे वाक्य लिखें। साथ ही  स्पष्टता और संक्षिप्तता का भी पूरा ध्यान रखें।

  वे अंग्रेजी की खबरों के हिन्दी अनुवाद को लेकर डेस्क से कहा करते थे कि शब्दानुवाद के बदले भावानुवाद करें। पटना जिले के पुनपुन के पास के तारणपुर के मूल निवासी पारस बाबू ने अपना अधिक समय वाराणसी और कानपुर में बिताया।

बाद में वे बारी-बारी से पटना के दो अखबारों के भी संपादक रहे। अपने जीवन के
अंतिम वर्षों में यह देखकर वे दुःखी रहते थे कि इन दिनों अधितर हिन्दी अखबारों में  शब्दानुशासन पर कम ही ध्यान दिया जाता है। कभी हिन्दी अखबार पढ़कर कई लोग अपनी हिन्दी सुधारते थे।


बुधवार, 26 मार्च 2014

खुशवंत के जीवन में एक अफसोस और एक कुख्याति

खुशवंत सिंह को इस बात का अफसोस रहा कि ‘मैंने जीवन का बहुत सा हिस्सा वकालत और राजनयिक सेवा जैसी व्यर्थ की नौकरी में गंवा डाला। काश ! मेरा वह समय भी लिखने में लगा होता।’

  याद रहे कि 1939 से 1947 तक उन्होंने लाहौर हाईकोर्ट में वकालत की। वकालत चल नहीं रही थी। बैठे -बैठे मक्खियां मारने की नौबत थी।

1947 में विदेश मंत्रालय की नौकरी कर ली। लंदन में भारतीय उच्चायोग में सूचना अधिकारी बन गये। पर तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन से तालमेल नहीं बना पाने के कारण खुशवंत का ओटावा तबादला कर दिया गया। 

   एक साक्षात्कार में उन्होंने लेखिका उषा महाजन को 1997 में एक और बात बताई थी, ‘लोग मुझे नाहक शराबी, कबाबी और व्यभिचारी समझते हैं जबकि मैं ऐसा नहीं हूं। इस नाहक कुख्याति का भी उन्हें अफसोस रहा। पर उन्होंने यह स्वीकारा कि मानता हूं कि अपनी इस कुख्याति के लिए मैं खुद ही जिम्मेदार हूं।

उन्होंने कहा ः दरअसल मेरी यह छवि बंबई में इलेस्ट्रेटेड वीकली के संपादन के दौरान बीते नौ वर्षों की देन है। वहांं मैंने सेक्स जैसे प्रतिबंधित विषयों पर लिखने की शुरुआत की और लड़कियों की अर्धनग्न तस्वीरें छापीं। इससे पत्रिका की प्रसार संख्या 80 हजार से बढ़कर चार लाख से भी अधिक हो गई।ल ेकिन दुर्भाग्यवश इसके साथ ही एक ऐसी छवि भी अर्जित कर ली जो मेरी सही तस्वीर न होते हुए भी आज तक मुझसे चिपकी हुई है। मेरे परिवारवाले और मुझे करीब से जानने वाले जानते हैं कि मैं वैसा नहीं हूं।

मैं न तो शराबी हूं और न ही औरतों आशिक हूं। दिन भर पढ़ने -लिखने और लोगों से मिलने का इतना काम रहता है कि इन सब चीजों की फुर्सत ही नहीं मिल सकती।

सिर्फ शाम में मैं अपनी ड्रिंक के साथ रिलैक्स करता हूं। ज्यादा कभी नहीं पीता वरना दूसरे दिन काम कैसे करूंगा ? अपनी पूरी जिंदगी में मैंने एक बार भी शराब पीकर अपने होश नहीं खोये।

  खुशवंत सिंह ने जब भी किसी को कोई इंटरव्यू दिया, उन्होंने सच्ची बातें बता दीं। ऐसी बातें भी जिन्हें आम तौर पर लोग छिपा जाते हैं।

 हाल ही में दिल्ली की एक हिंदी पाक्षिक पत्रिका से बातचीत में उन्होंने कहा था कि संजय गांधी के कहने पर मुझे एक अंग्रेजी दैनिक का संपादक बनाया गया था।

 उन्होंने यह भी स्वीकारा था कि उनकी नेहरु-इंदिरा परिवार से नहीं बल्कि सिर्फ संजय गांधी से घनिष्ठता थी। इंदिरा गांधी के कहने पर मुझे उस अखबार के संपादक पद से हटा दिया गया था।

इस साल के प्रारंभ में उनसे पूछा गया था कि इस उम्र में भी सक्रिय रहने का राज क्या है ? उन्होंने बताया कि मैं अपने जीवन में बहुत सख्त हूं। कम खाता हूं। मैं बहुत कम पीता हूं। ज्यादातर तरल लेता हूं। क्योंकि वह पचाने में आसान होता है।

 कई विधाओं में कलम चलाने वाले खुशवंत सिंह ने सिख इतिहास भी लिखा था जिसकी शुरू के दिनों में व्यापक चर्चा भी हुई।वे कथाकार थे। ट्रेन टू पाकिस्तान उनका चर्चित उपन्यास है जिस पर फिल्म भी बनी। अपनी पुस्तकों में से ‘दिल्ली’ को वे सर्वाधिक पसंद करते थे।

साहित्यिक पुरस्कारों के बारे में उन्होंने अपनी राय करीब डेढ़ दशक पहले ही बता दी थी। उन्होंने कहा था कि ‘जिनको अवार्ड मिलते हैं, वे अपने आप को वोट देकर अवार्ड ले लेते हैं। खुद को कैनवैस करके, लोगों के आगे -पीछे लग कर न जाने कितनी सेकेंड ग्रेड की किताबों को मिल जाते हैं पुरस्कार ! मैंने उनमें से एक भी किताब बाजार में नहीं देखी।

    ‘राज्यसभा की सदस्यता के बारे में उन्होंने कहा था कि राज्यसभा की सदस्यता ऐसे नहीं मिलती है। मांगनी पड़ती है। कैनवेसिंग करनी पड़ती है। इसके लिए बहुत तरफ से दबाव पड़ रहे होते हंै उन पर।’ उनसे पूछा गया था कि आपके मित्र इंदर कुमार गुजराल अब प्रधानमंत्री हैं। क्या आपको पुनः राज्यसभा की सदस्यता कर उम्मीद है ? खुशवंत सिंह 1980 से 1986 तक राज्यसभा के सदस्य थे।

 खुशवंत सिंह की याद आते ही एक और सवाल बरबस जेहन में कौंध जाता है। खुशवंत सिंह ने अधिक पुस्तकें लिखीं या उनके पिता सर सोभा सिंह और दादा सरदार सुजान सिंह ने अधिक बिल्डिंगें बनवार्इं ?

वे दिल्ली के सबसे बड़े ठेकेदार थे। सचिवालय का साउथ ब्लाॅक, इंडिया गेट, आकाशवाणी भवन, राष्ट्रीय संग्रहालय, बड़ौदा हाउस और सैकड़़ों सरकारी बंगले उन्होंने बनवाये।

  (जनसत्ता के 21 मार्च 2014 के अंक में प्रकाशित)  
     
      


बुधवार, 19 मार्च 2014

आसान नहीं है मणिकांत वाजपेयी को भूल जाना

 जिन थोड़े से पत्रकारों को मैं श्रद्धापूर्वक याद करता हूं, उनमें मणिकांत वाजपेयी शामिल हैं। उनका इसी 18 मार्च, 2014 को निधन हो गया।

उन्हें भूल पाना मेरे लिए आसान नहीं होगा। पटना में उनके साथ बैठकर मैं देर तक उनसे बातें किया करता था। उनसे भी मैंने कुछ सीखा है। उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी, उनकी विनम्रता और अपने काम के प्रति उनकी अटूट निष्ठा अनुकरणीय थी।

मेरे पत्रकार जीवन का वह निर्माण काल था जब मैं पहली बार वाजपेयी जी से पटना में मिला था। अच्छा हुआ कि तब वाजपेयी जी के साथ बैठने व बतियाने का मुझे सौभाग्य मिला।,तब मैं उनके सामने हर तरह से जूनियर था। पर उन्होंने ऐसा कभी मुझे आभास नहीं होने दिया।

,  पटना रेडियो स्टेशन के महत्वपूर्ण पद पर रहकर काम करना हमेशा ही एक चुनौती भरा दायित्व रहा है। उन दिनों तो रेडियो का और भी अधिक महत्व था। क्योंकि तब तक मीडिया का आज की तरह विस्तार नहीं हुआ था। प्रभावशाली नेता कौन कहे, छुटभैया नेताओं की भी यही इच्छा रहती थी कि उनका नाम शाम के बुलेटिन में जरुर आ जाये।

  इसको लेकर वाजपेयी जी को अक्सर धमकियां मिलती थीं। पर वे धमकियों में नहीं आते थे। वे खबरों के साथ कोई पक्षपात नहीं करते थे। ऐसा उनके सहकर्मी भी बताते रहे हैं।

  वाजपेयी जी सूचना सेवा के बड़े -बड़े पदों पर रहे। सेवाकाल के अंतिम दिनों में वे डिपुटी प्रिंसिपल इंफोर्मेशन अफसर थे। इसके बावजूद जब वे रिटायर हुए तो उनका बनवाया हुआ अपना कोई मकान या फ्लैट नहीं था।
 हां, उनकी तपस्या का फल उन्हें इस रूप में जरूर मिला कि उनकी संतानें संस्कारी हैं।

उनके यशस्वी पुत्र पुण्य प्रसून वाजपेयी की ईमानदारी की चर्चा दिल्ली से पटना तक वे सब लोग करते हैं जो उन्हें किसी न किसी रूप में जानते हैं।

आज के समय में टी.वी. पत्रकारिता का इतना बड़ा नाम और इतनी कठोर ईमानदारी !

सुखद आश्चर्य होता है। पिता के संस्कार और परवरिश का इसमें बड़ा योगदान माना जाएगा। पिछले कुछ साल से वाजपेयी जी बीमार थे। वे एक लाइज बीमारी से ग्रस्त थे। उनके परिवार ने उनकी बड़ी सेवा की।

  मणिकांत जी के साथ रेडियो में काम कर चुके महेश कुमार सिन्हा और पत्रकार मोहन सहाय ने बारी -बारी से दिल्ली से फोन पर मंगलवार को मुझे यह दुःखद समाचार दिया। वे मेरे प्रति वाजपेयी जी के स्नेहल व्यवहार को जानते थे। हालांकि तब तक दूरदर्शन का पटना केंद्र यह समाचार दे चुका था।

  महेश कुमार सिन्हा के अनुसार वाजपेयी जी अपने काम के प्रति ईमानदार पत्रकार थे। खबर देने के मामले में वे हमेशा तत्पर रहते थे।

 स्टेट्समैन के पटना संवाददाता रह चुके मोहन सहाय बताते हैं कि वे स्वच्छ दिल के मिलनसार व्यक्ति थे। उनके बारे में अनेक समकालीन लोगों की भी ऐसी ही राय रही है।

  अच्छा लगता ,यदि पटना के अखबारों में भी उनके निधन की खबर आज आ गई होती।

  दरअसल अपवादों को छोड़ दें तो पुरानी पीढ़ी के पत्रकारों की खोज -खबर आज का मीडिया ऐसे भी कम ही लिया करता है। जबकि उन पत्रकारों के पास राजनीति, प्रशासन तथा समाज के अन्य वर्गों के बारे में एक तुलनात्मक दृष्टि होती है। उनसे सीखा जा सकता है।

 उनके अनुभव बांटे जाने चाहिए। वैसे भी उन में से कई पत्रकार अपने जमाने में राजनीति व प्रशासन को प्रभावित कर चुके होते हैं। पर आज उनमें से अधिकतर पत्रकार उपेक्षित जीवन बिता रहे होते हैं। वैसे भी कुछ दशक पहले तक पत्रकारिता में पैसे भी तो कम ही मिलते थे।

  विडंबना यह है कि उनमें से कुछ पत्रकारों के निधन की खबर उनको जानने वाले थोड़े से लोगों के जरिए ही मिल पाती है। जबकि उन पत्रकारों ने खुद अपने कार्यकाल में न जाने कितने लोगों की खबरें आम लोगों तक पहुंचाईं होगी।

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

एक महाराजा लीक से हटकर

जयपुर के आखिरी महाराजा सवाई मान सिंह की कई विशेषताएं थीं। वह एक साथ कुशल प्रशासक, देशभक्त, सैनिक और खिलाड़ी थे।

वह न सिर्फ पोलो के बहुत अच्छे खिलाड़ी थे, बल्कि दुनिया की दस सबसे सुंदर महिलाओं में से एक गायत्री देवी के पति भी थे। सन् 1958 में उनके नेतृत्व में भारत ने पोलो खेल में विश्व का स्वर्ण कप जीता था। पोलो खेलते समय हुई दुर्घटना में 24 जून 1970 को उनका निधन हो गया। निधन के समय उनकी आयु सिर्फ 58 साल थी।

21 अगस्त 1912 को जन्मे मान सिंह जयपुर के महाराजा लेफ्टिनेंट जनरल सवाई माधो सिंह के दत्तक पुत्र थे। सवाई मान सिंह पोलो मैच खेलते हुए अचानक अस्वस्थ हो गये। उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। पर अस्पताल ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

इससे एक माह पहले भी एक पोलो मैच के दौरान वह गिर पड़े थे। तब उन्हें गहरी चोट लगी थी। पर एक माह के आराम के बाद वह फिर पोलो के खेल में जुट गये। राजपूत घरानों के इस नारे को कि ‘रण में लड़ते -लड़ते शहीद हो जाओ,’ उन्होंने पोलो के खेल में लागू कर दिया। पोलो का मैदान उनके लिए रणक्षेत्र था और उसी में वह शहीद हो गये। उनकी मौत महारानी गायत्री देवी के लिए एक बड़ा सदमा था।

कूच बिहार के महाराजा जितेंद्र नारायण की पुत्री गायत्री देवी से मान सिंह ने 1940 में प्रेम विवाह किया था। यह अंतरजातीय विवाह था। यह उनकी तीसरी शादी थी। इससे पहले की दो शादियां उन्होंने जोधपुर राजघराने में की थीं। जोधपुर के महाराजा सुमेर सिंह की बहन से मान सिंह की पहली शादी हुई थी। दूसरी शादी उनकी बेटी से हुई। गायत्री देवी से उनका परिचय तब हुआ था जब मान सिंह पोलो खेलने कलकत्ता गये थे और वह कूच बिहार के महाराजा के अतिथि थे।

मानसिंह के निधन के बाद गायत्री देवी को इंदिरा सरकार से कठिन संघर्ष करना पड़ा। आपातकाल में गायत्री देवी को सरकार ने जेल में बंद कर दिया था। बड़े अमानवीय तरीके से उन्हें जेल में रखा गया था। हालांकि उससे पहले वह 1962, 1967 और 1971 में लोकसभा की सदस्या रह चुकी थीं। प्राप्त मतों की संख्या की दृष्टि से उन्होंने रिकार्ड कायम किया था। गायत्री देवी का निधन सन 2009 में 90 साल की उम्र में हुआ।

मानसिंह को  7 सितंंबर 1922 को महाराजा सवाई माधो सिंह ने अपना उत्तराधिकारी बनाया था। पर जयपुर रियासत की सत्ता उन्होंने 1937 में संभाली। अपने शासन के दौरान उन्होंने लोगों की भलाई, सेवा और सहायता पर अधिक जोर दिया।

आजादी के बाद तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने रियासत को भारत में मिलाने का प्रस्ताव जब जयपुर महाराज के सामने रखा तो उन्होंने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। याद रहे कि तब 565 रियासतें थीं जिन्हें मिलाया गया था।

याद रहे कि तब सभी राजाओं का रुख ऐसा नहीं था। जयपुर रियासत देश की सबसे बड़ी कुछ रियासतों में एक थी। उन्हें 18 लाख रुपये सालाना प्रिवी पर्स मिलता था जिसे बाद में इंदिरा गांधी सरकार ने समाप्त कर दिया। इनके अलावा हैदराबाद, मैसूर, त्रावणकोर, बड़ौदा और पटियाला के पूर्व शासक ही दस लाख रुपये से अधिक प्रिवी पर्स पाते थे। हैदराबाद के पूर्व शासक को बीस लाख रुपये सालाना मिलता था। जयपुर महाराजा के विपरीत उन्हीं दिनों कुछ रियासतों ने भारत में विलयन में भारी हिचक दिखाई थी। हैदराबाद रियासत को तो पुलिस कार्रवाई के बाद हासिल किया गया था। संयोगवश उस पुलिस कार्रवाई का नाम दिया गया आपरेशन पोलो। पोलो जयपुर के पूर्व शासक का प्रिय खेल था।

जूनागढ़ के शासक भी विद्रोह की मुद्रा में थे। कश्मीर के महाराजा के तो आरंम्भिक इनकार के कारण पाकिस्तान को हमला करने का मौका मिल गया। ऐसे में विलय के प्रस्ताव को जयपुर  महाराजा द्वारा तुरंत स्वीकारने के रुख की  सराहना हुई थी।

जयपुर महाराज ने देश की नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लिया था। सवाई मान सिंह के बारे में प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक जाॅन गुंटर ने लिखा था कि वह अपने आप को नई परिस्थितियों में ढालने में ऐसे अभ्यस्त हो चुके थे जिस तरह वह पोलो खेल के दौरान अपने घोड़े बदलते थे।

पूर्व महाराजा के असामयिक निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने कहा था कि देश ने एक महान खिलाड़ी, एक योग्य प्रशासक और राजनीतिक खोया है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गायत्री देवी के नाम शोक संदेश भेजा था। उसमें उन्होंने सवाई मान सिंह के विभिन्न पदों की सेवाओं का जिक्र करते हुए अपनी संवेदना व्यक्त की थी।

उनके निधन की खबर सुनकर राजस्थान के विभिन्न हिस्सों से भारी संख्या में लोग जयपुर में इकट्ठे हो गये थे। तब के एक अखबार की खबर के अनुसार निधन के समाचार से सारे राजस्थान में मुर्दनी छा गई। गांवों और शहरों से भीड़ एकत्र हो गई। लोगों की आंखें इस प्रकार सूजी हुई थीं, जैसे कि उन्होंने अपना कोई बहुत ही करीबी रिश्तेदार खोया है। जयपुर के महाराज सचमुच एक इनसान थे जिनसे सभी प्रेम करते थे और आदर देते थे।

(प्रभात खबर में 23 नवंबर 2012 को प्रकाशित)