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सोमवार, 16 सितंबर 2019

चीनी उइगर मुस्लिमों की पीड़ा के बारे में इमरान खान कुछ नहीं जानते !


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प्रश्न-चीन में उइगर मुस्लिमों पर अत्याचार पर आप क्या कहेंगे ?

इमरान खान-उइगर मुसलमानों के साथ चीन क्या कर रहा है, इसके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं।

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इमरान खान ही नहीं, भारत के उन अतिवादी मुसलमानों को भी उइगर के यातना-नजरबंदी शिविरों-सुधार गृहों के बारे में कुछ भी नहीं पता जो फिलस्तीन के मुसलमानों और डेनमार्क के कार्टून आदि को लेकर भारत की सड़कों पर मरने -मारने पर उतारू हो जाते हैं।

यदि भारत के कम्युनिस्टों को उइगर के 2 करोड़ पीड़ित मुसलमानोंं के बारे में कुछ नहीं पता तो बात समझ में आती है। क्योंकि यहां के कोई कम्युनिस्ट कहता है कि 1962 में चीन ने नहीं बल्कि भारत ने ही चीन पर हमला किया था। दूसरी श्रेणी के कम्युनिस्ट कहते रहे कि चीन का चेयरमैन माओ हमारा चेयरमैन।

एक ही साल पहले केरल माकपा के सचिव ने कहा था कि भारत, अमेरिका और आस्ट्रेलिया मिलकर चीन को घेरना चाहते हैं। क्या आपने कभी सुना या देखा कि राहुल गांधी, ममता बनर्जी, लालू प्रसाद, मुलायम यादव तथा एन. राम जैसे किसी सेक्युलर-समाजवादी पत्रकार नेता -संपादक ने उइगर के यातना-नजरबंदी शिविरों के बारे में कभी कुछ कहा या लिखा ?

हां, वे रोहिंग्या को भारत में बसाने के पक्ष में जरुर रहे।

शनिवार, 14 सितंबर 2019

जम्मू—कश्मीर मई, 1989 : राज्यपाल की रिपोर्ट — ‘हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं ’


मई, 1989 में जम्मू कश्मीर के राज्यपाल जगमोहन ने केंद्र सरकार को जो रपट भेजी, उसका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है।

‘हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं। सब कुछ तकरीबन बेकाबू हो गया है। पिछले पांच दिनों में बड़े पैमाने पर हिंसा, आगजनी, हड़तालें, फायरिंग, मौतेें और न जाने क्या -क्या सामने आया है।
हालात सचमुच नियंत्रण से बाहर जा रहे हैं। हर दिन कोई न कोई मसला सिर उठाता रहता है।
कल बारी थी मकबूल बट्ट की, आज सैटेनिक वर्सेज की, कल दमन दिवस होगा और उसके बाद कुछ और।

मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला की कोई विसात नहीं बची। उनका प्रभाव समाप्त हो चुका है--राजनीतिक प्रशासनिक दोनों ही, सिर्फ संवैधानिक खानापूरी की देर है। हालात की मांग है कि तुरंत प्रभावी हस्तक्षेप किया जाए। आज समय है। कल तक हो सकता है बहुत देर हो जाए।’’


‘‘ 8 से 13 मई के दौरान बम विस्फोट की 14 घटनाएं हुईं हैं। फायरिंग और आपस में गोलियां चलने के छह मामले सामने आए हैं। चार लोग मारे गए और 20 घायल हो गए। एक पर्यटन बस पर गोलियां चलीं। चार पर्यटक जख्मी हुए। वर्तमान प्रशासनिक और राजनीतिक ढांचा एक बार फिर नकारा साबित हुआ है।

हड़ताल के दौरान तोड़फोड़ करने वालों के इरादों को नाकाम करने के लिए राजनीतिक हलकों की ओर से कोई ठोस प्रयत्न नहीं हुआ। सबसे चिंताजनतक बात यह है कि हर ‘जीत’ तोड़फोड़ करने वालों के हौसले बुलंद कर रही है। वे केंंद्रीय अधिकारियों के खिलाफ दुश्मनी साधने लगे हैं।
मैंने मुख्यमंत्री को अपनी चिंता से अवगत करा दिया है।

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— याद रहे कि 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जगमोहन को राज्यपाल बनाया और 1989 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें हटा दिया।

— प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने जनवरी 1990 में जगमोहन को जम्मू एंड कश्मीर का राज्यपाल बनाया। उन्होंने ही मई 1990 में उन्हें हटा दिया।

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हाल में गृहमंत्री अमित शाह जगमोहन से उनके आवास पर जाकर मिले थे।

बुधवार, 26 जून 2019

1946 : तब बहुमत पटेल को था लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू बने


महात्मा गांधी ने सरदार पटेल के पक्ष में कांग्रेस में अपार बहुमत रहते हुए भी 1946 में जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनवा दिया था।  एक गुजराती के साथ तब अलोकतांत्रिक ढंग से अन्याय हुआ था।

लगता है कि अब दो गुजराती नरेंद्र मोदी और अमित शाह मिलकर नेहरू खानदान से लोकतांत्रिक तरीके से बदला ले रहे हैं।


कांग्रेसमुक्त भारत का नारा देकर सत्ता में आए नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार अगले पांच साल जनहित में ऐसे-ऐसे चैंकाने वाले काम करेगी कि कांग्रेस या किसी अन्य दल के लिए फिर से सत्ता में आने की शायद ही गुंजाइश बचे, ऐसा अनेक लोगों का अब मानना है।


इस देश के जिन नेताओं ने आज तक निजी व्यवसाय मानकर राजनीति व सत्ता को चलाया है, उन्हें राजनीति छोड़कर शायद कोई व्यवसाय ही करना पड़ेगा, ऐसा भी कई लोगों को लगता है। वैसे उनमें से अनेक नेता तो इस बीच जेल में होंगे।


अब 1946 की कहानी नई पीढ़ी के लिए ।


1946 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद का चुनाव होने वाला था। तब प्रदेश कांग्रेस कमेटियां चुनाव करती थीं। देश की कुल 15 में से 12 प्रदेश कांग्रेस कमेटियों ने सरदार के पक्ष में अपनी राय भेजी थी। तीन कमेटियों की कोई राय नहीं थी।


पर गांधी ने सरदार पटेल को दरकिनार करके नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष  बनवा दिया। चूंकि कांग्रेस अध्यक्ष को ही प्रधानमंत्री बनना था, इसलिए जवाहरलाल जी प्रधानमंत्री बन गए। 


बन गए तो वे आगे का भी इंतजाम कर गए।


रविवार, 23 जून 2019

लालू, मुलायम और रामविलास सिमी पर प्रतिबंध के खिलाफ थे

अवैध गतिविधियां संचालित करने के आरोप में प्रतिबंधित सिमी के संस्थापक सदस्य सफदर नागौरी को भोपाल की जिला अदालत ने शनिवार को सात साल की सजा सुनाई। नागौरी के साथ दो अन्य व्यक्तियों को भी सजा हुई है।

याद रहे कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में पहली बार प्रतिबंध लगने के बाद सिमी के सदस्यों ने इंडियन मुजाहिददीन नामक संगठन बना लिया।

9 अप्रैल 2008 के हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार नागौरी ने कहा था कि हमारा लक्ष्य जेहाद के जरिए भारत में इस्लामिक शासल कायम करने का है।

7 अगस्त 2008 के टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार लालू प्रसाद ने कहा था कि यदि सिमी पर प्रतिबंध लग गया तो आर.एस.एस. पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए। मुलायम सिंह यादव ने भी 2008 में सिमी का बचाव किया।

12 अगस्त 2008 को रामविलास पासवान ने भी सिमी पर से प्रतिबंध हटाने की मांग की। 2008 में यू.पी.ए. सरकार ने सिमी पर रोक जारी रखने की सुप्रीम कोर्ट से गुहार की। पर कांग्रेस के ही सलमान खुर्शीद सिमी के वकील थे।

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार सिमी के अहमदाबाद के जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने कहा था कि जब भी हम सत्ता में आएंगे तो हम इस देश के सभी मंदिरों को तोड़ देंगे और वहां मस्जिद बनवाएंगे।..टाइम्स ऑफ इंडिया..30 सितंबर 2001  

शुक्रवार, 14 जून 2019

गरीब देश में भी कम्युनिस्टों का यह हाल


सन् 1929 के चर्चित मेरठ षड्यंत्र केस ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को मजबूत बनाया तो 2007 की सिंगूर-नंदीग्राम की घटनाओं ने साम्यवादी दलों के अवसान की बुनियाद रख दी। याद रहे कि मेरठ षडयंत्र केस में कई कम्युनिस्ट नेता आरोपित थे। आज तो कम्युनिस्ट दलों की चुनावी दुर्दशा देख कर उनके कुछ राजनीतिक विरोधियों को भी उन पर दया आ रही होगी। अनेक गरीब मर्माहत और पस्तहिम्मत होंगे।

याद रहे कि विशेष आर्थिक जोन के लिए जबरन भूमि अधिग्रहण के कारण सिंगूर-नंदीग्राम में वाम मोरचा सरकार के खिलाफ बड़ा जन आंदोलन हुआ था। भारत जैसे गरीब देश में कम्युनिस्टों की दिन प्रति दिन पतली हो रही हालत के लिए आखिर कौन जिम्मेवार रहे ? कम्युनिस्ट नेतृत्व, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता, सर्वहारा, आम जन, आर्थिक उदारीकरण या कोई अन्य तत्व? इसी के साथ यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि इस देश में कम्युनिस्ट दलों का पुनरुद्धार अब संभव भी है या नहीं।

पहली नजर में ही यह लगता है कि जिस तरह कम्युनिस्ट आंदोलन के उत्थान के लिए मुख्यतः उसके नेतृत्व को श्रेय जाता है तो उसके अवसान के लिए भी तो उसी को जिम्मेवारी लेनी होगी। जहां तक पुनरुत्थान की बात है तो इस मामले में कुछ भी भविष्यवाणी करना जोखिम भरा काम है।

इस देश की कम्युनिस्ट पार्टियां शुरू से ही भारत भूमि के अनुसार खुद को कभी पूरी तरह ढाल नहीं सकी। दुनिया के अन्य कम्युनिस्ट देश तो अपनी भूमि के एक-एक इंच की रक्षा के मामले में वे ‘राष्ट्रवादी’ रहे हैं। पर, हमारे देश के कम्युनिस्ट रक्षा में लगी सरकार को ‘अंध राष्ट्रवादी’ तो कभी हिन्दूवादी कहने लगते हैं।

इस दुनिया में जब-जब दो कम्युनिस्ट देश आपस में लड़े तो वहां कौन अंध राष्ट्रवादी था और कौन किसी धर्म का शासन अपने देश पर थोपना चाहता था? दूसरे देश के कम्युनिस्ट इस बात की चिंता करते हैं कि उनके देश को कौन- कौन से देश घेरने की कोशिश कर रहे हैं। पर केरल सी.पी.एम. के सचिव कहते हैं कि अमेरिका, आस्ट्रेलिया और भारत मिलकर चीन को घेरना चाहते हैं। 

सामाजिक न्याय यानी पिछड़ा आरक्षण की कोई अवधारणा कम्युनिस्ट शब्दकोष में नहीं है। कम्युनिस्टों ने लगातार इस रणनीति पर काम किया कि साम्प्रदायिक तत्वों यानी भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए किसी भी राजनीतिक दल का, चाहे वह कितना भी भ्रष्ट, वंश-तंत्रवादी और अक्षम हो, साथ दिया जाना चाहिए।

क्या वे भाजपा को रोक पाए ?

नब्बे के दशक तक यहां के कम्युनिस्टों के एक बड़े तबके की स्थानीय रणनीति इसी आधार पर बनती थी जिससे सोवियत संघ या चीन के हितों को नुकसान न हो। अब भला ऐसी नीतियां इस देश की कितनी जनता को प्रभावित कर सकती हैं ?

स्थापना के शुरू के वर्षों में तो युवाओं में कम्युनिस्ट रूमानियत और सोवियत तथा चीन की क्रांतियों की प्रेरणा से दल बढ़े। बोलेविया के जंगलों में क्रांति के लिए शहादत देने वाले क्यूबा के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री चे ग्वेवारा एक जमाने में यहां के हजारों युवाओं के प्रेरणा स्रोत थे।

पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु सरकार ने भूमि सुधार के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम उठाए थे। उससे वाम मोरचा को भारी जन समर्थन मिला। तब अधिकतर कम्युनिस्टों के साफ-सुथरे निजी जीवन ने भी लोगों को प्रभावित किया।

पर, लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के कारण किसी भी दल में जो कमजोरियां पनपती हैं, उनके शिकार होने से कम्युनिस्ट भी बचे नहीं रहे। तालाब का पानी सड़ने लगा। पश्चिम बंगाल की वाम सरकार की अलोकप्रियता बढ़ती गई। शासन के अंतिम वर्षों में बूथ जाम और साइंटिफिक रिगिंग के जरिए चुनाव जीता गया। पर वह कब तक चलता? 

वैसे भी सफेद कमीज पर हल्का धब्बा भी कुछ अधिक ही दिखाई पडने लग़ता है।

कम्युनिस्ट नेताओं में एक खास खूबी है। वे यदाकदा अपनी गलतियों को भरसक सार्वजनिक रूप से स्वीकारते हैं। उन्हें दुरुस्त करने की कोशिश भी करते है। पर एक समय ऐसा आया जब कम्युनिस्ट नेतृत्व ने सुधार की ताकत खो दी। पश्चिम बंगाल के मुख्य मंत्री ज्योति बसु यह लगातार कहते रहे कि हमारी पार्टी में भ्रष्ट और अपराधी तत्व घुस आए हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। कुछ कार्रवाइयां हुईं भी। पर जरूरत के अनुपात में काफी कम। यानी नेता कमजोरियों की चर्चा करते रहे और कमजोरियां बढ़ती चली गईं। इसे किसकी विफलता मानें ?

2009 में सी.पी.एम. के महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि सत्ता और पैसों की लालच ने पश्चिम बंगाल के कम्युनिस्ट आंदोलन के शानदार इतिहास को धूमिल कर दिया। उधर सीताराम येचुरी ने 2016 में अपनी ही पार्टी की केरल सरकार में जारी भाई-भतीजावाद के खिलाफ आवाज उठाई। उधर ज्योति बसु ने 1994 में कहा कि ‘भारत की विशेष परिस्थितियों में जाति भी महत्वपूर्ण है, उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।’ क्या ध्यान दिया गया ?

हां, 2009 में लोकसभा चुनाव में हार के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने कुछ कदम जरूर उठाए।पर तब तक देर हो चुकी थी। 2011 में राज्य की सत्ता वाम मोरचा के हाथों से निकल गई।  सी.पी.आई. के महासचिव ए.बी. वर्धन ने तब कहा था कि ‘भ्रष्टाचार और अहंकार ने वाम मोर्चा को आमजन से अलग कर दिया और हम चुनाव हार गए। वामपंथी खुद को बदलें।’    

कतिपय वाम नेताओं ने पहले तो वोटबैंक को मजबूत करने के लिए पश्चिम बंगाल में बंगला देशियों के अवैध प्रवेश का रास्ता साफ किया, पर जब पश्चिम बंगाल के राज्य सात जिलों में शासन चलाना कठिन हो गया तो राजनीतिक कार्यपालिका की तरफ से कहा गया कि राज्य में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. सक्रिय हो गया है। मदरसों में खास तरह की शिक्षा दी जा रही है।

वाम नेताओं के इस आरोप का अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक नेताओं ने सख्त विरोध किया। ममता बनर्जी ने उन्हें हाथों -हाथ लिया। इस तरह अल्पसंख्यक मतदाता धीरे -धीरे ममता बनर्जी की ओर खिसकते चले गए। अल्पसंख्यकों के बीच के अतिवादियों के तुष्टिकरण के मामले में ममता वाम से आगे निकल गई। आम अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए दोनों में से किसी ने भी कोई खास नहीं किया। उसका राजनीतिक खामियाजा अब ममता बनर्जी भी भुगत रही हैं।

यदि हिंदी प्रदेशों में वाम दल मजबूत रहे होते तो बंगाल-केरल-त्रिपुरा के नुकसानों की क्षतिपूर्ति अखिल भारतीय स्तर पर हो सकती थी। पर नेतृत्व की अदूरदर्शी नीतियों के कारण कभी बिहार में मजबूत रही सी.पी.आई. भी समय के साथ कमजोर होती चली गई।

मंडल आंदोलन और मंदिर आंदोलन के कारण भी कम्युनिस्ट पार्टियां कमजोर हुई हैं। अनेक वर्णों  के बदले सिर्फ दो वर्गों की उपस्थिति में विश्वास करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों को हिंदी प्रदेशों में मंडल आंदोलन ने नुकसान पहुंचाया है।

लालू प्रसाद-मुलायम सिंह यादव का बिना शर्त साथ देने के कारण सवर्णों का कम्युनिस्टों के प्रति आकर्षण घटा। साथ ही, पिछड़ों का समर्थन नहीं बढ़ा क्योंकि पिछड़ों का आकर्षण राजद, सपा और जदयू की ओर अधिक रहा । बिहार में तो लालू प्रसाद के धृतराष्ट्र आलिंगन में कम्युनिस्ट चकनाचूर हो गए।

हिंदी पट्टी में अपेक्षाकृत अधिक गरीबी भी है। गरीबों के बीच कम्युनिस्टों के प्रसार की गुंजाइश अधिक रहती है। इसके बावजूद यदि कम्युनिस्ट पार्टियां मुरझा गईं तो इसके लिए इन दलों की रणनीतियां और कार्य नीतियां ही जिम्मेदार रही हैं।

क्या उनमें सुधारकी कोई गुंजाइश बची है ?

साठ- सत्तर के दशक तक कम्युनिस्ट व सोशलिस्ट दलों के नेता व कार्यकर्ता हर साल कोई न कोई आंदोलन करके जेल जाते थे। जेलों में वे अपने काॅडर का राजनीतिक शिक्षण भी करते थे।  पर, लगता है कि उनमें संघर्ष का पहले जैसा माद्दा नहीं बचा। नए लोग दल से जुड़ नहीं रहे हैं।

याद रहे कि संघर्ष और शिक्षण के कारण जनता की नई जमात पार्टी से जुड़ती है। पर, दुर्भाग्यवश भारत जैसे गरीब देश में, जहां विषमता बढ़ती जा रही है, कम्युनिस्ट पार्टियां मुरझा रही हैं।

(14 जून 2019 के प्रभात खबर में प्रकाशित)

बुधवार, 5 जून 2019

चौकीदार और ‘गोदी मीडिया’

चौकीदार चोर है, मोदी जी ने 30 हजार

करोड़ रुपए अनिल अंबानी की जेब में 

डाल दिए और ‘गोदी मीडिया’ का शोर 

23 मई के चुनावी रिजल्ट के बाद से 

अब बंद है।

क्या अब चौकीदार चोर नहीं है ?

उस 30 हजार करोड़ रुपए का क्या हुआ ?

तेजाबी संबंधों का नुकसान !

यदि किन्हीं दो जातियों के बीच कभी ‘तेजाबी संबंध’ रहा हो तो उसका असर जल्दी नहीं जाता।  यानी, यदि वे दोनों कभी मिलकर भी चुनाव लड़ेंगे तो आम तौर पर केमिस्ट्री से गणित पराजित हो जाएगा।

2016 में पश्चिम बंगाल में यही हुआ था। इस बार उत्तर प्रदेश में भी यही हुआ।

बिहार में भी फसल काट लेने वाले समुदाय यदि अपनी फसल बचाने की कोशिश में लगे समुदाय से चुनावी तालमेल भी करें तो उसका कोई लाभ नहीं होगा।

इस कहानी का यही मोरल है कि राजनीतिक दल विभिन्न जातियों के बीच के झगड़े को न बढ़ाएं।बल्कि उसे कम करने की कोशिश करें। अन्यथा, उन्हें लाभ के बदले कभी भारी नुकसान भी  हो सकता है।

2016 में सी.पी.एम. ने सोचा था कि यदि वह कांग्रेस के साथ तालमेल करके पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव लड़ेगी तो दो जोड़ तीन बराबर पांच हो जाएगा जो चार से अधिक होगा। पर ऐसा नहीं हुआ। सी.पी.एम. को 23 सीटें ही मिल सकी जबकि कांग्रेस 43 सीटें जीत कर प्रमुख विपक्षी दल बन गया।

ऐसा इसलिए हुआ कि सी.पी.एम. के लोगों ने तो कांग्रेसी उम्मीदवारों को मत दे और दिला दिए, पर कांग्रेस समर्थकों ने ऐसा कम ही किया। क्योंकि दशकों तक कांग्रेस समर्थक लोग वाम मोरचा की भीषण हिंसा के शिकार हुए थे।

उत्तर प्रदेश में इस बार के लोकसभा चुनाव में बसपा को 10 सीटें मिल गई जबकि सपा पांच पर ही अटक कर रह गई। जानकार लोग कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में भी पश्चिम बंगाल दुहरा दिया गया।  

सोमवार, 3 जून 2019

देश के अधिकतर मतदाता कभी गलत नहीं हुए

‘गरीबी हटाओ’ के नारे की पृष्ठभूमि में इंदिरा गांधी ने 1971 का लोकसभा चुनाव अकेले बल पर भारी बहुमत से जीत लिया था। जनसंघ नेता बलराज मधोक ने तब आरोप लगाया कि मतपत्रों पर रसियन स्याही का यह कमाल है।

तब तो संभावतः एक ही ‘मधोक’ थे। तब तक की राजनीति में आज जितने गैर जिम्मेवार नेता पैदा नहीं हुए थे।

2019 के जनादेश को झुठलाने की असफल कोशिश में आज अनेक ‘मधोक’ लग गए हैं। एक बुद्धिजीवी ने तो 2019 के मतदाताओं को इडिएट तक कह डाला। जबकि मेरा तो मानना रहा है कि इस देश के अधिकतर मतदाता कभी गलत नहीं हुए।

यहां तक कि तब भी नहीं जब बिहार में 1991 के लोकसभा चुनाव में और 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद को भारी बहुमत मिला था। 

शनिवार, 1 जून 2019

चिदम्बरम परिवार को कोर्ट से लगातार मिल रही राहत तो अभूतपूर्व है


कल जिन-जिन नेताओं ने शपथ ली, उनमें से एक व्यक्ति आर.के. सिंह को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सहनशीलता शब्द के सही अर्थों में जीरो है। ऐसे मंत्री और भी होंगे, पर मैं उन्हें नहीं जानता।

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मंत्री का तो कहना ही क्या! इतने दिनों तक सत्ता में रहने के बावजूद अपने लिए दुनिया के किसी हिस्से में एक—दो कमरे का फ्लैट तक नहीं खरीदा। मोदी का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान अब तेज होने वाला है।

गत पांच साल में भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम में उन्हें अपनी ही सरकार के बड़े अफसरों व अदालतों से जितना सहयोग मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। चिदम्बरम परिवार को कोर्ट से लगातार मिल रही राहत तो अभूतपूर्व है। इससे लोगों में कोर्ट के बारे में अच्छी राय नहीं बनती।

मोदी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की धार कोई कुंद न कर सके, इसके लिए भ्रष्टाचार विरोधी मंत्रालय बनाकर उसकी जिम्मेवारी उस खास मंत्री को दे देनी चाहिए जिसकी ओर मेरा इशारा है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ आम तौर पर एजेंसियां रिएक्टिव कार्रवाई करती है। उसे प्री एन्टिव याानी पहल करके पहले ही कार्रवाई करनी चाहिए। उसके लिए कोई खास एजेंसी सारे मंत्रालयों, मंत्रियों और अफसरों पर नजर रखे। साथ ही उन माफिया गिरोहों पर भी जिनकी ओर वोहरा कमेटी ने नब्बे के दशक में ही इशारा किया था।

ताजा खबर यह है कि केंद्र सरकार 36 बड़े अफसरों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति सी.बी.आई. को नहीं दे रही है। मोदी के शासनकाल में भी सी.बी.आई. का यह आरोप रहा है कि केंद्र सरकार के संबंधित अफसर जल्दी अनुमति नहीं देते या फिर लटकाए रहते हैं। यह बीमारी पुरानी है। इससे इस देश के भ्रष्टाचारियों का मनोबल बढ़ा रहता है।

असम के मुख्यमंत्री प्रफुल्ल महंत के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति राज्यपाल जनरल सिन्हा ने नहीं दी थी। जबकि उन पर लालू प्रसाद की अपेक्षा अधिक गंभीर आरोप थे। 2007 में मायावती और 2013 में अशोक चव्हाण के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति संबंधित राज्यपालों ने नहीं दी।

इन घटनाओं से भ्रष्टाचार की राह में रोड़ों की ताकत का अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसे में सही जगह पर सही व्यक्ति को जिम्मेवारी देने से मोदी का लक्ष्य पूरा होगा और अंततः जनता को राहत मिलेगी।

इस बीच इसी महीने यह खबर आई है कि डी.ओ.पी.टी ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय करेगा। यह विभाग प्रधानमंत्री के अधीन है। मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि भ्रष्टाचार इस देश की सबसे बड़ी समस्या है। इसी से अन्य अधिकतर समस्याएं पैदा होती हैं।

गुरुवार, 30 मई 2019

‘टुकड़े -टुकड़े गिरोह’

अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि हम दिल्ली में इसलिए हार गए क्योंकि हम जनता को यह नहीं बता सके कि वे हमें क्यों वोट दें।

पर, जनता तो आपको वोट न देने का कारण पहले से अच्छी तरह जानती थी।

एक बड़ा कारण यह भी था कि आपने ‘टुकड़े -टुकड़े गिरोह’ के खिलाफ राजद्रोह के मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति अभियोजन पक्ष को नहीं दी।

बुधवार, 29 मई 2019

सी.पी.एम. : पुनरुद्धार की कोई उम्मीद नहीं ?

पश्चिम बंगाल के एक सी.पी.एम. विधायक आज भाजपा में शामिल हो गए। सी.पी.एम. के कार्यकर्ता और समर्थक तो भाजपा में जा ही रहे थे, अब विधायक भी ?

क्या कभी के महाबली संगठन सी.पी.एम. का पश्चिम बंगाल से तम्बू पूरी तरह उखड़ जाएगा ? पुनरुद्धार की कोई उम्मीद नहीं ?

इसके लिए कौन जिम्मेवार है ?

सी.पी.एम. नेतृत्व ? 

नया जमाना ?

या फिर सांप्रदायिक ताकतें ? 

रविवार, 26 मई 2019

नेहरू देश भर में शौचालय बनवा दें तो मैं उनका समर्थक हो जाऊंगा : डा. लोहिया

नरेंद्र मोदी गांधी, दीनदयाल उपाध्याय और डा. लोहिया का नाम लेते हैं। उन्होंने आज भी लिया। डा. राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि कम्युनिस्टोंं में राष्ट्रवाद की भावना नहीं है तो जनसंघ में गरीबों के प्रति दर्द नहीं है। हमारी पार्टी में दोनों है।

कम्युनिस्ट तो अब भी उस पर कायम हैं, पर लगता है कि भाजपा ने दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय और लोहिया की गरीबपक्षी नीतियों से प्रभावित होकर मोदी सरकार ने गत पांच साल में अंतिम व्यक्ति के लिए कई काम किए हैं।

इस बार के जनादेश सर्जिकल स्ट्राइक के लिए है तो गरीबपक्षी कार्यक्रमों के लिए भी। उनमें बड़े पैमाने पर शौचालय का निर्माण शामिल है।

शौचालय के अभाव में ग्रामीण महिलाओं की पीड़ा की चर्चा करते हुए डा. लोहिया ने एक बार कहा था कि यदि जवाहरलाल नेहरू देश भर में शौचालय बनवा दें तो मैं उनका समर्थक हो जाऊंगा। 

शनिवार, 25 मई 2019

समकालीन इतिहास की भी गहरी समझ का अभाव


एक और राजनीतिक पंडित ने आज लिखा है कि ‘साल 1971 के बाद पहली बार कोई प्रधानमंत्री न सिर्फ अपने दम पर दूसरी बार सत्ता में लौटा है, बल्कि बहुमत में भी इजाफा किया है।’

इस पूरे वाक्य पर ध्यान दें। 

लेखक का आशय यह है कि 1967 में ‘अपने दम’ पर इंदिरा गांधी ने लोकसभा में बहुमत हासिल किया था। क्या यह सच है ? कत्तई नहीं।

1969 के पूर्वाद्ध तक कांग्रेस पार्टी सिर्फ किसी एक नेता पर निर्भर भी नहीं थी। तब तक स्वतंत्रता सेनाननियों की बड़ी जमात का देश के अलग-अलग हिस्सों पर भारी असर था। बिहार में भी आजादी के बाद के कई वर्षों तक श्रीबाबू-अनुग्रह बाबू की जोड़ी की तूती बोलती थी।

एक बार जवाहरलाल नेहरू ने लक्ष्मी नारायण सुधांशु को मुख्यमंत्री बनाना चाहा था। सुधांशु जी ने यह कहते हुए मना कर दिया कि बिहार की जनता श्रीबाबू और अनुग्रह बाबू के साथ है। मेरे साथ जनता नहीं है। जिसके साथ जनता न हो, उसे मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहिए।

हां, 1969 में कांग्रेस में हुए महाविभाजन के बाद इंदिरा जी जरूर अपने गुट की एकछत्र नेता बन गईं। 1971 के चुनाव के बाद तो यह साफ हो गया कि इंदिरा जी की कांग्रेस ही असली कांग्रेस है। 

1967 में तो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वी.के. कृष्ण मेनन को लोकसभा का टिकट तक नहीं दिलवा पाई थीं। जबकि, वे निवर्तमान सांसद थे। उनकी जगह कांग्रेस ने डा. बर्वे को दिया और वे जीते भी। इस तरह के कई अन्य उदाहरण भी हैं।

शुक्रवार, 24 मई 2019

प्रतिपक्ष के लिए चेतावनी और सत्तापक्ष के लिए नई जिम्मेवारी


इस चुनाव नतीजे ने 1977 के लोकसभा चुनाव की याद दिला दी। इमरजेंसी की पृष्ठभूमि में हुए चुनाव में अविभाजित बिहार की सभी 54 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस हार गई थी। इस बार भी बिहार में कमोवेश वैसा ही रिजल्ट आया है। यानी आमजन में इमरजेंसी से थोड़ा ही कम गुस्सा इस बार था। गुस्सा प्रतिपक्ष पर निकला। गुस्सा बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर प्रतिपक्ष के विरोध पर था।

एक ओर काम करने वाली मोदी-नीतीश सरकार तो दूसरी ओर कथित भ्रष्टाचार, वंशवाद व महत्वाकांक्षी नेताओं की अव्यवस्थित भीड़ से जूझ रहा प्रतिपक्ष था। ऐसे में जीतना उसे ही था, जिसकी जीत हुई। पर इस चुनावी संघर्ष में कई व्यक्तिवादी नेताओं की वास्तविक राजनीतिक ताकत का भी पता चल गया।

जातीय व साम्प्रदायिक वोट बैंक की ताकत पर गुमान करने वाले कुछ बिहारी नेताओं को राजग ने औकात बता दी। एक खास संकेत भी मिल रहा है। डबल इंजन की सरकार अगले वर्षों में ऐेसे -ऐसे काम करने वाली है जिससे वोट के ठेकदारों की ताकत और भी कम हो सकती है।

एक उदाहरण काफी होगा। कल्पना कीजिए कि किसानों को मिल रही छह हजार रुपए सालाना की राशि में केंद्र सरकार वृद्धि कर दे। जमीन की मौजूदा सीमा को हटा दे तो उसका क्या असर पड़ेगा ? इस तरह के कई अन्य काम केंद्र की पाइप लाइन में हैं। इसलिए वोट बैंक के आधार पर चलने वाले दलों के लिए यह चुनाव परिणाम एक संदेश दे रहा है। संदेश यह कि आप अपना चाल, चरित्र और चेहरा बदलिए। यदि बदलाव का तरीका समझ में नहीं आ रहा है तो किन्हीं विशेषज्ञों से पूछिए।

अपने उन बचे -खुचे समर्थकों का ध्यान रखते हुए भी आपका राजनीति में प्रासंगिक बने रहने जरूरी है। अब भी अनेक लोग आपकी ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए भी यह जरूरी है कि प्रतिपक्ष में बेदम नहीं हो।

यह चुनाव शत्रुघ्न सिन्हा, उपेंद्र कुशवाहा और शरद यादव जैसे बड़े नेताओं के लिए भी एक कड़ा संदेश है। ऐसे नेताओं को समझना होगा कि आप खुद क्या चाहते हैं और आम जनता आपसे क्या चाहती है। यह बात आप जानें और समझें, समय रहते। उसी के अनुसार अपने राजनीतिक कदम उठाएं। आपके सामने सीरियस नेता हैं जिनसे आपका मुकाबला है।

इस चुनाव में भारी जीत का श्रेय तो नरेंद्र मोदी को ही जाता है। पर राजग के लिए यह अनुकूल स्थिति रही कि यहां नीतीश के रूप में एक अच्छी छवि वाले मुख्यमंत्री हैं। नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की मिलीजुली ताकत का लाभ इस पिछड़े बिहार को पूर्ण विकसित करने में अब होना चाहिए। नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार का विकास तो हुआ है, पर आर्थिक सीमाओं के कारण पूर्ण विकास की राह में बाधाएं बनी हुई हैं।

बिहार में उद्योगीकरण के लिए केंद्र से मदद की उम्मीद अब बढ़ी है। मुख्यमंत्री कहते हैं कि  विशेष राज्य का दर्जा देने से ही यहां उद्योग बढ़ेंगे। श्री कुमार ने चुनाव प्रचार में मतदाताओं से अपील की कि यदि आप हमें 15 या उससे अधिक सीटें जितवाएंगे तो हम बिहार को विशेष राज्य का दर्जा के लिए केंद्र के समक्ष मजबूती से अपनी मांग रख पाएंगे। पर, चौदहवें वित्त आयोग ने कह दिया है कि किसी भी राज्य को विशेष दर्जा नहीं दिया जाएगा।

इस पृष्ठभूमि में केंद्र के सामने भी संभवतः दिक्कत आएगी। पर एक रास्ता बीच का भी है। केंद्र सरकार यदि एक्साइज ड्यूटी, आयकर और जी.एस.टी. में बिहार में छूट दे दे तो उद्योगपतियों को बिहार आमंत्रित किया जा सकता है।

मोदी सरकार ने अन्य धनराशि के अलावा सिर्फ सड़कों  के लिए बिहार को 50 हजार करोड़ रुपए दिए हैं। बिजली के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण काम हुए हैं।

(24 मई 2019 के दैनिक भास्कर,पटना में प्रकाशित)

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

तब ‘अंतराष्ट्रीय कम्युनिस्ट’ हो गए थे हमारे देश के कुछ कम्युनिस्ट

1979 में दो कम्युनिस्ट देश चीन और वियतनाम के बीच भीषण युद्ध हुआ था। चीन के 26 हजार सैनिक मरे, 37 हजार घायल हुए। वियतनाम के 30 हजार मरे, 32 हजार घायल हुए। तब चीन के नागरिक चीन सरकार और वहां की सेना के साथ थे।

वियतनाम के नागरिक वियतनाम की सेना का हौसला बढ़ा रहे थे जबकि दोनों कम्युनिस्ट देश थे। पर, हमारे देश के कुछ कम्युनिस्ट तब ‘अंतराष्ट्रीय कम्युनिस्ट’ हो गए थे जब चीन ने हम पर हमला किया था।

1962 में चीन ने भारत पर हमला किया था। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के आधे से अधिक नेताओं ने कहा कि चीन ने नहीं बल्कि भारत ने ही चीन पर हमला किया। जिन्होंने कहा, उन्हें सी.पी.आई. ने पार्टी से निकाल दिया। नेहरू सरकार ने उन्हें जेलों में डाल दिया। निष्कासित कम्युनिस्टों ने 1964 में सी.पी.एम. बनाई।

आज विभिन्न विचार धाराओं को मानने वाले अनेक भारतीय उसी पुरानी भूमिका में हैं जिस भूमिका में 1962 में अनेक कम्युनिस्ट थे। पर मोदी सरकार उनके प्रति नरम है।

गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

सिमी ने वर्ष 2001 में ही बताया दिया था अपना लक्ष्य, अब संगठन का नाम ही बदला है ...


यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी के नेतृत्व में भाजपा का शिष्टमंडल 19 अगस्त, 2008 को चुनाव आयोग दफ्तर गया था। शिष्टमंडल ने आयोग से मांग की थी कि सिमी जैसे आतंकवादी संगठन का पक्ष लेने वाले दलों की मान्यता खत्म की जाए। सिन्हा व शौरी ने तब सही काम किया था।

पर कल राॅकेट लांचर के साथ मौलवी और इंजीनियरिंग छात्र सहित 10 लोग धराए हैं। एन.आई.ए. ने उन आतंकियों को पकड़ा है। देश को दहलाने व कुछ हस्तियों को नुकसान पहुंचाने की उनकी योजना थी। वे बगदादी के आइएस से प्रभावित हैं। विदेश से दिशा—निदेश ले रहे थे।

कल टी.वी. चैनलों के डिबेट शो में बैठकर कुछ हस्तियां उल्टे राष्ट्रीय जांच एजेंसी की इस कार्रवाई का कड़ा विरोध कर रही थीं। इस पर यशवंत सिन्हा व अरुण शौरी जैसे समझदार नेताओं के भी विचार आने अभी बाकी हैं।

भाजपा विरोधी अन्य दल भी चुप हैं।

2019 में उनकी सरकार बन सकती है। फिर वे ऐसे आतंकियों के साथ कैसा सलूक करेंगे? यह यक्ष प्रश्न है। क्या जिस तरह कांग्रेसी सलमान खुर्शीद ने प्रतिबंधित सिमी की कोर्ट में वकालत की थी, एक बार फिर वैसा ही काम वे करेंगे?

याद रहे कि जब सिमी पर प्रतिबंध लगा तो उसके लोगों ने इंडियन मुजाहिददीन बना लिया।

केरल पुलिस सूत्रों के अनुसार  पोपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया सिमी का ही नया रूप है। सिमी की पत्रिका ‘इस्लामिक मूवमेंट’ सितंबर 1999 के संपादकीय ने सेक्यूलर लोकतंत्र के बजाए जेहाद और शहादत की अपील की।

सिमी (अहमदाबाद) के जोनल सेक्रेटरी साजिद मंसूरी ने टाइम्स आॅफ इंडिया (30 सितंबर 2001) को बताया था कि ‘जब भी हम सत्ता में आएंगे, हम मंदिरों को नष्ट कर देंगे और वहां मस्जिद बनाएंगे।’

अब तो ‘बगदादी की सेना’ से इस देश का सामना हो रहा है। आई.एस.आई.एस. ने वरीय ओवैसी को जान से मारने की पहले ही धमकी दे रखी है। क्योंकि ओवैसी ने आईएसआईएस का विरोध किया था।

यानी आईएसआईएस ऐसा संगठन है जिसे ओवैसी का ‘अतिवाद’ भी बहुत हल्का लगता है। वह अतिवादिता में सिमी से भी बहुत आगे है। इसके बावजूद इस देश के तथाकथित सेक्युलर दल व बुद्धिजीवी कल के खुलासे से कहीं से भी चिंतित नहीं हैं। बल्कि उन में से कुछ लोग एन.आई.ए. की ही आलोचना कर रहे हैं।

कल टीवी चैनलों में बैठकर कुछ लोग सनातन संस्था से इसकी तुलना कर रहे थे।

सनातन संस्था एक विवादास्पद सगठन है। पर क्या सनातन संस्था ने कभी यह बयान दिया है कि हम हथियारों के बल पर राजसत्ता पर कब्जा कर लेंगे और सत्ता में आने पर किसी के धार्मिक स्थलों को ध्वस्त करके अपना धार्मिक स्थल वहां बना देंगे ? याद रहे कि जिन लोगों ने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया, उन पर केस चल रहा है।  

हे टी.वी.के बहसबाजो !


बगदादी नीत आई.एस.आई.एस. प्रेरित आतंकवादी गिरोहों के भारतीय ठिकानों पर एन.आई.ए. ने कल छापे मारे। हथियार व अन्य आपत्तिजनक सामग्री बरामद की गयी। यह भी पता चला कि वे व्हाटसेप व इस तरह के आधुनिक साधनों का भी इस्तेमाल करते हैं। विदेश शक्ति से जुड़े हुए हैं।

कम्प्यूटर निगरानी के लिए हाल के केंद्र सरकार के निदेश का विरोध करने वाले लोग इस पर एक बार फिर सोचेंगे ? पता नहीं। लगता तो नहीं। बगदादी के स्थानीय चेलों का इरादा इस देश को दहलाने का था और है।

इस छापेमारी-गिरफ्तारी पर कल टी.वी. चैनलों पर गर्मागर्म बहसें हुईं। उन बहसों में कुछ लोगों के तर्कों को सुनकर मध्य युग के इस देश के इतिहास की याद आ गई।

आई.एस.आई.एस.का प्रकारातंर से बचाव करने वाले लोगों को यह भी खबर है कि उस दुर्दांत संगठन ने वरीय ओवैसी को भी जान से मार देने की धमकी दे रखी है। यानी ओवैसी बंधुओं का अतिवाद भी उन्हें हल्का लगता है। वे हथियारों के बल पर इस देश में कैसा अतिवादी शासन स्थापित करना चाहते हैं ?

बगदादी के ऐसे मानस पुत्रों का बचाव करने वाले लोग खुद के और इस देश के भविष्य के बारे में जरा सोच लें। इस स्थिति का फायदा उठाकर इस देश में कोई तानाशाह पैदा हो जाए तो क्या होगा ? 

हे टी.वी.के बहसबाजो ! वैसी स्थिति मत पैदा करो। 

चीन अपने यहां के ऐसे मामले में पूरी दुनिया को एक राह दिखा भी रहा है।  

भारत एक गंगा -जमुनी संस्कृति वाला देश है। लाखों गांवों में अल्पसंख्यक मुसलमान—हिन्दू भाइयों के साथ शांति से मिलजुल कर रह रहे हैं। शहरों के मुस्लिम बहुल इलाकों में बसने वाले अतिवादियों को चाहिए कि वे उनके सुख—शांति का भी ध्यान रखें।

रविवार, 17 जून 2018

पद के लिए विश्वास, सिद्धांत व पार्टी को तिलांजलि दे रहे नेता

विश्वास यानी सिद्धांतों के लिए पद को तिलांजलि देने वालों के इस देश में आज अनेक नेता पद के लिए विश्वास, सिद्धांत व पार्टी को तिलांजलि दे रहे हैं।

वे कल तक जिस दल व नेता पर अपार विश्वास करते थे, आज तनिक नहीं करते। इस देश की राजनीति में गिरावट का यह सबसे बड़ा लक्षण है। लक्षण तो और भी हैं।

जिस देश की राजनीति गिर जाती है, उसका कुपरिणाम समाज के अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ता है। पड़ भी रहा है। संभव है कि कुछ लोगों को अपने पुराने दलों से ‘ईमानदार वैचारिक मतभेद’ हों। यहां वैसे लोगों की बात नहीं की जा रही है।

पर, संकेत साफ हैं कि अधिकतर नेताओं के मामले में ऐसी बात नहीं है। वे या तो पद प्राप्ति न होने के कारण अपने मूल दल से खफा हो जाते हैं या फिर अगली बार टिकट न मिलने की आशंका में पार्टी छोड़ देते हैं।

यह कोई नया विकास नहीं है। पर इन दिनों ऐसे मामले बढ़े हैं। जबकि दल-दल विरोधी कानून चलन में है। इसलिए आम तौर पर दल-बदल चुनाव से कुछ महीने पहले होते हैं।

याद रहे कि दल-बदल विरोधी कानून की चपेट में आने के बाद सदन की सदस्यता चली जाती है। पर यह सजा सबक देने वाली साबित नहीं हो रही है। यदि कानून में ऐसा संशोधन हो जिसके तहत दल बदलुओं को चुनाव लड़ने से हमेशा के लिए रोक दिया जाए तो शायद फर्क आएगा।

खबर है कि बिहार के कम से कम चार मौजूदा सांसद 2019 में किन्हीं अन्य दल से चुनाव लड़ेंगे। यह संख्या बढ़ सकती है। पूरे देश को ध्यान में रखें तो अगले लोकसभा चुनाव तक दल बदलने वाले नेताओं की संख्या काफी होगी।

अब जरा कुछ पुराने नेताओं की चर्चा कर ली जाए जिन्होंने आजादी के बाद ऐसे मामले में भी स्वस्थ परंपरा कायम की थी। दरअसल वे आज के अधिकतर नेताओं की तरह निजी संपत्ति, वंश और अपनी जाति को आगे बढ़ाने के लिए चुनाव नहीं लड़ रहे होते थे। वे देश बनाने व राजनीति में स्वस्थ परंपरा कायम करने लिए राजनीति कर रहे थे।

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के 13 सदस्य सन 1946 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गये थे। उनमें मशहूर समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र देव भी थे। आजादी मिलने के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने 1948 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं से कह दिया कि आप या तो कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की सदस्यता छोड़ दें या कांग्रेस पार्टी से अलग हो जाएं।

आचार्य नरेंद्र देव और उनके साथियों ने कांग्रेस छोड़ दी। जबकि, कांग्रेस आचार्य जी को अंतरिम सरकार में मंत्री बनाना चाहती थी। आचार्य जी
और उनके 12 साथी विधायकों ने नैतिकता के आधार पर उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्यता भी छोड़ दी। हालांकि उन दिनों दल-बदल विरोधी कानून का अस्तित्व में नहीं था।

यानी दल छोड़ने के साथ सदन की सदस्यता जाने का कोई खतरा नहीं था। वे चाहते तो विधानसभा के सदस्य बने रह सकते थे। आचार्य जी और उनके 12 साथी विधायकों ने उस ‘सुविधा’ का लाभ नहीं उठाया।

उन्होंने कहा कि चूंकि जनता ने हमें कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में विधानसभा के लिए चुना था, इसलिए अब हमें सदन का सदस्य बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

याद रहे कि 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का पटना में गठन हुआ था। उस पार्टी के प्रमुख नेताओं में आचार्य नरेंद्र देव, जय प्रकाश नारायण और डा. राम मनोहर लोहिया थे। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के लोग आजादी की लड़ाई कांग्रेस के झंडे तले लड़ रहे थे।

आचार्य जी और उनके साथी जब सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे रहे थे तो उनके कई कांग्रेसी मित्रों ने भी ऐसा न करने की सलाह दी थी। कहा था कि आपके इस्तीफे के बाद जो उप चुनाव होंगे, उनमें आप लोग जीत नहीं पाएंगे। क्योंकि अभी काग्रेस के पक्ष में हवा है।

पर आचार्य जी नहीं माने। उन्होंने इस्तीफा दिया। उन 13 सीटों पर उपचुनाव हुए। एक सीट को छोड़ कर बाकी 12 सीटों पर वे हार गए। आचार्य जी भी उप चुनाव नहीं जीत सके। इतना ही नहीं ,उप चुनाव में आचार्य जी के खिलाफ कांग्रेस ने एक कट्टर हिंदूवादी बाबा राघव दास  को खड़ा कर दिया था। उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी ने यह प्रचार किया कि आचार्य जी नास्तिक हैं। इन्हें वोट मत दीजिए। आचार्य जी ने इस प्रचार का खंडन तक नहीं किया। क्योंकि वे नास्तिक थे। नतीजतन आचार्य जी  चुनाव हार गये। पर इस हार का आचार्य जी को कोई अफसोस नहीं था।

दरअसल वे यह स्वस्थ परंपरा कायम करना चाहते थे कि यदि कोई नेता पार्टी छोड़े तो सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे दे। पर स्वार्थी राजनीति ने इस परंपरा को बाद में चलने नहीं दिया।

समय के साथ दल-बदल का घिनौना रूप सामने आने लगा। हरियाणा के एक विधायक गया राम का नाम ‘आया राम गया राम’ पड़ गया। क्योंकि उन्होंने कई बार दल बदले।

साठ के दशक में बिहार का एक मंत्री तो सदन में सरकारी फाइल के साथ ही प्रतिपक्ष में जा बैठा था। एक नेता ने तो अपने पूरे विधायक दल के साथ दल बदल कर लिया। मुख्य मंत्री बन बैठे।

ऐसे अनेक उदाहरण हैं। अंततः  दल बदल विरोधी कानून बना। पर वह कानून भी पूर्ण कारगर साबित नहीं हो पा रहा है। अब तो एक दल के सांसद अपने दल के नेतृत्व के खिलाफ आए दिन बयान देते रहते हैं।

अगले चुनाव के लिए वे दूसरे दल से टिकट का जुगाड़ कर रहे हैं। दूसरा सांसद मूल दल छोड़ देने के बाद भी किसी न किसी बहाने सदन की सदस्यता नहीं छोड़ना चाहता।

एकाधिक जनप्रतिनिधि अपनी लोभजनित पहल को जारी रखने के लिए अदालत तक का समय बर्बाद करते हैं।

हर आम चुनाव से पहले अनेक सांसदों व पूर्व सांसद या विधायकों-पूर्व विधायकों के बारे में अटकलों का बाजार गर्म रहता है कि पता नहीं उन्हें इस बार किस दल से टिकट मिलेगा। ऐसे में राजनीति की विश्वसनीय कम होती है। ऐसे दलबदलू नेता सत्ता में आते हैं तो आम तौर पर सरकार की विश्वसनीयता भी नहीं रह पाती। देश ऐसे ही चल रहा है। इस मामले में अधिकतर दलों की हालत एक जैसी है।

इसलिए लगता है कि दल-बदलुओं को सबक सिखाने लायक सजा का जब तक प्रावधान नहीं होगा, तब तक दल बदल होते रहेंगे।

सबक सिखने वाली सजा यही है कि जैसे ही तकनीकी तौर दल-बदल करने का आरोप साबित हो जाए, वैसे ही दल-बदलू की सदन की सदस्यता भी चली जाए। फिर उसे आगे भी कभी कोई चुनाव लड़ने लायक न रहने दिया जाए।

क्या ऐसा हो पाएगा ?

काम तो कठिन है। क्योंकि लगभग सारे दल समय -समय पर दल बदलुओं का स्वागत करते रहे हैं। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ तो राजनीति की साख गिरती ही चली जाएगी।

(मेरा यह लेख ‘राष्ट्रीय सहारा’ के 17 जून 2018 के अंक में प्रकाशित)

 


मंगलवार, 12 जून 2018

दोहरे मापदंड की एक और मिसाल

संघ परिवार को लेकर कांग्रेसियों-कम्युनिस्टों का एक बार फिर दोहरा रवैया सामने आया है। तथाकथित ‘सेक्युलर’ जमात का कोई बड़ा नेता जब आर.एस.एस. से संपर्क साधता है तो उसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठती। पर कोई दूसरा नेता जब संघ मुख्यालय जाता है तो हाय -तौबा मचा दिया जाता है। कहा जाता है कि संघ परिवार को प्रतिष्ठा दी जा रही है। उसे ताकतवर बनाया जा रहा है। इससे भाजपा ताकतवर होती है।

जबकि संघ परिवार के ताकतवर बनने के कारण कुछ और होते हैं। दरअसल तथाकथित सेक्युलर जमात की कमजोरियों -विफलताओं का लाभ संघ परिवार को मिलता रहा है। पर सेक्युलर जमात उन कमजोरियों पर काबू पाने की जगह आरोप-प्रत्यारोप से ही अपना काम निकाल लेना चाहती है। इन दिनों उनका प्रयास देश में महागठबंधन बनाकर संघ परिवार यानी भाजपा यानी राजग को पराजित करने का है। संभव है कि वे उसमें सफल भी हो जाएं। पर क्या वह जीत स्थायी होेगी?

हाल के कुछ उपचुनाव नतीजों ने सेक्युलर जमात का मनोबल बढ़ाया है। पर, जब तक सेक्युलर जमात अपनी कमजोरियों पर काबू पाने की कोशिश नहीं करेगी तब तक उसे कोई स्थायी राजनीतिक लाभ नहीं मिलेगा। इस बीच वह जमात आरोप -प्रत्यारोप से ही अपना काम चला लेना चाहती है। पर उन आरोपों में भी दोहरा मापदंड नजर आता है।  

एक राजनीतिक दल जब भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाता है तो उसे बुरा नहीं माना जाता।पर दूसरे दल को ऐसी छूट देने को सेक्युलर जमात तैयार ही नहीं है।

नेहरू, इंदिरा और लाल बहादुर शास्त्री 

यदि 1963 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को बुलाया था तो कम्युनिस्टों व कांग्रेसियों के लिए वह कोई हर्ज की बात नहीं थी। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि बुलाने की खबर ही सही नहीं है। यदि नहीं बुलाया गया था तो बुलाने की उस खबर का कांग्रेस खंडन क्यों नहीं करती ? जबकि खुद जवाहर लाल नेहरू ने तब कहा था कि ‘मेरी पार्टी का संघ के साथ वैचारिक मतभेद हो सकता है, पर जब देश संकट में हो तो हम सबको एकजुट होकर काम करना चाहिए।’ बाद के वर्षों में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिल्ली की ट्राफिक व्यवस्था के संचालन का भार संघ को दिया था तो भी कोई एतराज नहीं हुआ।

पर, जब पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इस महीने नागपुर गए तो माकपा महासचिव सीताराम येचुरी को इस बात से सख्त एतराज था कि प्रणव जी ने वहां गांधी हत्याकांड की चर्चा क्यों नहीं की! कांग्रेस के कुछ नेताओं ने पहले तो उन्हें जाने से ही रोकने की कोशिश की। नहीं माने तो उन लोगों ने कुछ आशंकाएं भी जाहिर कीं। पर, प्रणव मुखर्जी वहां से जब एक संतुलित भाषण देकर आए तो कांग्रेसी ठंडे पड़ गए। पर उनमें से कुछ कांग्रेसियों के मन में यह मलाल फिर भी रहा कि वे गए ही क्यों ?  

ऐसा ही मलाल उन्हें इंदिरा गांधी को लेकर नहीं हुआ था जब 1977 में संघ परिवार के निमंत्रण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने विवेकानंद राॅक मेमोरियल का उद्घाटन किया था। तब किसी कम्युनिस्ट या कांग्रेसी नेता ने संघ की पृष्ठभूमि को लेकर कोई विवाद खड़ा करने की कोशिश नहीं की।
यह नहीं कहा गया कि इंदिरा जी ने वहां गांधी हत्याकांड का मामला क्यों नहीं उठाया।

जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी को लेकर कोई कांग्रेसी या कम्युनिस्ट आज भी सवाल नहीं उठा रहा हैं। इस पर भी कोई चर्चा नहीं है कि देश के सामने जो संकट उस समय था, उतना ही बड़ा संकट आज है या नहीं।

पर प्रणव मुखर्जी की नागपुर यात्रा पर तरह -तरह की बातें की गयी। कुछ कम्युनिस्ट नेता अब भी मीन -मेख निकालने में लगे हैं। एक बड़े कम्युनिस्ट नेता यह उम्मीद कर रहे थे कि जिसके आमंत्रण पर जाओ, उसके यहां जाकर उसे ही खरी -खोटी सुना कर वापस आ जाओ। कम से कम प्रणव मुखर्जी की यह संस्कृति नहीं रही है।

इससे पहले भी संघ को लेकर कई कम्युनिस्ट नेता समाजवादियों पर भी आरोप लगाते रहे हैं।
आरोप बे सिर पैर का है। क्योंकि कम्युनिस्टों की कसौटी मानी जाए तो ऐसा ही आरोप खुद उन पर भी है। उनका आरोप यह रहा है कि सोशलिस्टों ने ही संघ परिवार के लिए इस देश में राजनीतिक जमीन तैयार की। यानी संघ -जनसंघ-भाजपा को मजबूत किया। 

इस संबंध में भी उनका तर्क यह है कि जनसंघ और बाद में भाजपा के साथ मिली -जुली सरकार बनाकर सोशलिस्टों ने संघ परिवार को समाज मेंं प्रतिष्ठा भी दिला दी। उससे पहले उसे राजनीतिक तौर पर अछूत माना जाता था।

दरअसल 1966-67 में प्रतिष्ठा तो सी.पी.एम. के नेताओं को भी मिली जो 1962 में अपनी चीनपक्षी रवैये के कारण अलग -थलग पड़ गए लगते थे। दरअसल 1967 के आम चुनाव के बाद में देश के सात राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गयीं। बाद में अन्य दो राज्यों में कुछ कांग्रेसी विधायकों के दलबदल के कारण कांग्रेसी सरकारें गिर गयीं। वहां भी गैर कांग्रेसी सरकारें बन गयीं।

बिहार और उत्तर प्रदेश के मंत्रिमंडलों में एक साथ सी.पी.आई. और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य शामिल किए गए थे। उन सरकारों में जनसंघ के प्रतिनिधि भी थे। देश में सोशलिस्टों व जनसंघियों ने पहली बार सत्ता में हिस्सेदारी की थी। पर उन मंत्रिमंडलों में सी.पी.आई. के प्रतिनिधि भी तो थे। यदि सोशलिस्टों ने इस तरह जनसंघ को बढ़ाया और सम्मानित किया तो उसका श्रेय सी.पी.आई. को भी तो जाता है। आखिर वे उन मंत्रिमंडलों में क्यों शामिल हो गए थे जिनमें जनसंघ भी था ?

पर सी.पी.आई. के नेता खुद को उसके लिए जिम्मेदार नहीं मानते। दोहरे मापदंड का इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है ? याद रहे कि 1966 में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कुछ गैर कांग्रेसी दलों को एक साथ आने पर राजी किया था। उनका तर्क था कि गैर कांग्रेसी दलों के आपस में मिलने के सिवा और कोई उपाय नहीं है। क्योंकि कांग्रेस प्रतिपक्ष के वोट के बंटवारे का लाभ उठाकर चुनाव—दर चुनाव सत्ता हासिल करती जा रही है। 

परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से भाजपा के साथ थे कम्युनिस्ट

यही नहीं, सन 1989 में जब केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी तो भाजपा और कम्युनिस्ट उस सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे। क्या उससे भाजपा की ताकत नहीं बढ़ी ? यानी परोक्ष या प्रत्यक्ष ढंग से भाजपा के साथ काम करने के बावजूद  कम्युनिस्ट खुद को जिम्मेदार नहीं मानते, पर दूसरे दल को जिम्मेदार जरूर ठहरा देते हैं।

सन 2014 के लोकसभा चुनाव में राजग की भारी जीत के बाद कांग्रेस ने पूर्व रक्षामंत्री ए.के. एंटोनी के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई। हार के कारणों की जांच का भार उसे दिया गया। जून, 2014 में एंटोनी ने अन्य बातों के साथ-साथ यह भी कहा कि ‘मुस्लिम तुष्टिकरण कांग्रेस की हार का मुख्य कारण है। जनता में संतुलित धर्म निरपेक्षता वाली हमारी साख अब नहीं रही।’

जो बात एंटोनी ने नहीं कही, वह यह है कि राजग खासकर भाजपा के उभार का दूसरा बड़ा कारण मनमोहन सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। याद रहे कि अपने शासनकाल में जांच के बदले मनमोहन सरकार उन आरोप को गलत बताती रही। इससे जनरोष बढ़ा जिसका लाभ सबसे बड़े विपक्षी गठबंधन यानी राजग को मिला। यानी राजग की जीत में राजग से अधिक यू.पी.ए. सरकार का ‘योगदान’ था।

हाल के दिनों में भी कुछ नेता यह कहते रहे कि यह सब सोशलिस्टों की ही कारस्तानी है।
अधिकतर राजग विरोधी दल आज भी उन दो प्रमुख कारणों को समाप्त करने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं जो 2014 में हार के कारण बने थे। इसके बदले वे दलीय गठजोड़ पर जोर दे रहे हैं।यानी गुण के बदले मात्रा पर जोर है। पता नहीं, यह कितना कारगर व स्थायी साबित होगा? 

पर आम धारणा यही है कि अपनी हर विफलता के लिए किसी और दोषी ठहराकर कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता।

(मेरे इस लेख का संपादित अंश 10 जून 2018 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)

उपचुनाव नतीजों से आगे के संकेत

बिहार में आप यदि किसी स्कूली छात्र से भी पूछेंगे कि जिस चुनाव क्षेत्र में 70 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी हो तो वहां से कौन पार्टी जीतेगी तो वह बिना देर किए बता देगा-राजद।

जोकी हाट में यही हुआ है। वहां 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इसलिए जोकी हाट विधानसभा क्षेत्र में राजद उम्मीदवार की जीत को किसी लालू वाद से कोई संबंध नहीं है। वैसे कोई कुछ भी कहे, पर पूरे बिहार में मुस्लिम और यादव मतदाताओं के अधिकतर वोट उसे ही मिलेंगे जिस उम्मीदवार पर लालू प्रसाद की मुहर होगी। चाहे राजद गठबंधन जितनी सीटें जीते।

राज्य के जिन चुनाव क्षेत्रों में यादव-मुस्लिम वोटर मिलकर निर्णायक होंगे, वहां अगले किसी भी चुनाव में राजद या उसके सहयोगी दल ही जीतेंगे। यह बात पिछले कई चुनावों मेंं भी साबित हुई है। इक्के—दुक्के अपवादों की बात और है। इस बार भी जोकीहाट में यह साबित हुई।

जोकीहाट में जीत के बाद राजद का यह कहना कि यह लालूवाद की जीत है, एक राजनीतिक बयानबाजी से कुछ अधिक नहीं। इसे एक नया जुमला भी कह सकते हैं। इसी तरह की बयानबाजी बिहार में हुए गत मार्च के उपचुनाव के बाद भी हुई थी।

मार्च में अररिया लोकसभा चुनाव क्षेत्र और भभुआ तथा जहानाबाद विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव हुए थे। खाली होने से पहले जो सीट जिसके पास थी, वह उस दल को मिली। यानी न तो किसी की हार हुई न किसी की जीत। फिर भी उस रिजल्ट को भी कुछ इसी तरह परिभाषित किया गया। हालांकि मार्च उपचुनाव के रिजल्ट का सघन विश्लेषण किया जाए तो उससे राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन को खुश होने का कोई कारण नहीं था। 

यदि कोई दलीय गठबंधन आठ में से पांच विधानसभा सीटें जीत जाए तो उसे खुशी मनानी चाहिए या उस अन्य गठबंधन को खुश होना चाहिए जिसे उनमें से सिर्फ तीन ही सीटें ही मिलीं ?

अररिया लोकसभा उपचुनाव नतीजे को विस्तार से समझिए। राज्य में अररिया लोकसभा और भभुआ तथा जहानाबाद विधानसभा क्षेत्रों के लिए 11 मार्च को उपचुनाव हुए थे।

 राजद ने अररिया और जहानाबाद सीटें जीतीं।पहले भी ये सीटें उसी के पास थीं। भाजपा ने भी अपनी भभुआ सीट बचा ली।

 2014 के लोक सभा चुनाव में अररिया से राजद के तसलीमुद्दीन विजयी हुए थे। 2015 के विधान सभा चुनाव में भभुआ

से भाजपा और जहानाबाद से राजद की जीत हुई थी । राजद,जदयू और कांग्रेस ने महा गठबंधन बना कर 2015 को बिहार विधान सभा का चुनाव लड़ा था। 

मार्च के  उप चुनावों के नतीजे के गहन अध्ययन से राजग को फायदा मिलता नजर आया। अररिया लोक सभा चुनाव क्षेत्र के भीतर छह विधान सभा क्षेत्र हैं। उप चुनाव में छह में से चार सीटों पर राजग की बढ़त रही और सिर्फ दो सीटों पर राजद को बढ़त मिली। इसमें भभुआ को मिला दें तो राजग  कुल पांच विधान सभा सीटों पर राजद से आगे रहा।

    हां, मार्च के उप चुनाव नतीजों से यह बात साफ हुई थी कि  राजद के पक्ष में मुस्लिम -यादव समीकरण के मतों की एकजुटता पहले की अपेक्षा बढ गय़ी। मतदान में आक्रामकता भी बढ़ी। हालांकि अररिया लोक सभा उप चुनाव में अल्पसंख्यक मतदाताओं के ध्यान में नरेंद्र मोदी अधिक थे।अगले लोक सभा चुनाव में भी वैसा ही रहने की उम्मीद है।

   नरेंद्र मोदी की लहर के बावजूद सन 2014 के लोक सभा चुनाव में मुस्लिम-यादव  बहुल क्षेत्र अररिया से राजद के तसलीमुद्दीन विजयी हुए थे। तसलीमुद्दीन के निधन से सीट खाली हुई थी। तसलीमुद्दीन के पुत्र सरफराज आलम मार्च में  राजद के उम्मीदवार थे।उप चुनाव में सरफराज विजयी रहे।

सरफराज हाल तक जदयू विधायक थे।उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया। उसके बाद राजद की ओर अपने पिता की सीट पर उम्मीदवार बने। अररिया लोक सभा क्षेत्र के भीतर पड़ने वाले जोकीहाट और अररिया विधान सभा चुनाव क्षेत्रों में राजद को भारी बढ़त मिली।

दशकों से वह तसलीमुददीन के प्रभाव वाला इलाका रहा। तसलीमुददीन भी कई बार सांसद व विधायक रहे। केंद्र में राज्य मंत्री भी थे। फिर भी गत लोक सभा उप चुनाव में अररिया के  चार विधान सभा खंडों में भाजपा के उम्मीदवार प्रदीप कमार सिंह को बढ़त मिल गयी।

    इसके अलावा भभुआ विधान सभा चुनाव क्षेत्र में भाजपा की जीत से राजग बिहार में चुनावी भविष्य के प्रति आशान्वित हुआ।क्योंकि वहां जातियों की दृष्टि से लगभग मिलीजुली  आबादी है।

 यानी भभुआ विधान सभा क्षेत्र तथा अररिया लोक सभा चुनाव क्षेत्र के नीचे पड़ने वाले चार विधान सभा खंडों के चुनाव नतीजे को देखकर यह तब भी कहा गया   कि बिहार की राजग सरकार से आम लोगों का अभी मोहभंग नहीं हुआ है।इसलिए कि ऐसी ही मिलीजुली आबादी वाले बिहार में अधिकतर विधान सभा क्षेत्र हैं।मिलीजुली आबादी यानी  जातीय दृष्टि से भी मिली जुली आबादी वाला चुनाव क्षेत्र । 

  हां, राजद के वोट बैंक यानी एम.वार्इ. वर्चस्व वाले चुनाव  क्षेत्र  अररिया और जहानाबाद में राजद उम्मीदवारों के पहले की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन को लेकर तरह -तरह के अनुमान लगाए गए।क्या लालू प्रसाद के जेल जाने से  मतदाताओं के एक वर्ग में बढ़ी सहानुभूति के कारण उनके वोट बैंक में एकजुटता और आक्रामकता बढ़ी  ?

क्या दिवंगत जन प्रतिनिधियों के परिजन के लिए मतदाताओं में भारी सहानुभूति के कारण वोट बढ़े  ? या कोई और बात रही ? पर सवाल यह भी है कि क्या अगले किसी चुनाव में बिहार के वैसे चुनाव क्षेत्रों में भी राजद को बढ़त मिलेगी जहां यादव-मुस्लिम वोट निर्णायक नहीं हैं ?

यदि ऐसा हुआ तो माना जाएगा कि वह लालू वाद की जीत है।

लाूल प्रसाद की राजनीतिक ताकत का अनुमान लगाने के लिए दो पिछले चुनावों की चर्चा प्रासंगिक होगी। राजद और लोजपा ने 2010 में   बिहार विधान सभा चुनाव मिल कर लड़ा था। 243 सदस्यीय विधान सभा में इन्हें 25 सीटें आईं।

चारा घोटाला केस में सन 2013 में लालू प्रसाद को पहली बार सजा हुई थी।
सजा की घोषणा के तत्काल बाद राजद नेताओं ने कहा था कि हम अब लोक सभा की सभी 40 सीटें जीत लेंगे।क्योंकि जनता लालू प्रसाद को परेशान करने का बदला लेगी।

पर 2014 के लोक सभा चुनाव में राजद को बिहार में सिर्फ 4 सीटें ही मिलीं। हाल के उप चुनाव नतीजे भी पूरे बिहार में राजद के लिए कोई खास उम्मीद नहीं जगा रहे हैं। वैसे दल का हौसला बनाये रखने के लिए बड़े -बड़े दावे तो हर दल करता ही  रहता  है।यदि राजद भी कर रहा है तो उसमें किसी कोई एतराज नहीं होना चाहिए।

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जोकीहाट विधान सभा उप चुनाव रिजल्ट--2018

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शाहनवाज आलम -राजद- 81240

मुर्शीद आलम---जदयू--40016

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अररिया लोक सभा क्षेत्र--उप चुनाव-मार्च,2018

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 विधान सभा क्षेत्र--  राजग --- महागठबंधन

नरपत गंज--        88349 ---- 69697

रानी गंज ----     82004 ---- 66708

फरबिस गंज         93739 -----74498

सिकटी-------   87070 ----- 70400

जोकी हाट-----   39517------120765

अररिया------    56834 ----- 107260

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(3 जून 2018 को हस्तक्षेप -राष्ट्रीय सहारा -में प्रकाशित)