Monday, October 26, 2015

बुरे प्रत्याशियों के साथ कैसा सलूक करे मतदाता !

मतदाता क्या करे जब किसी भले दल से भी किसी बुरे  प्रत्याशी को टिकट मिल जाए ?
आज के राजनीतिक दौर में यह  बड़ा सवाल है जिसका जवाब आसान नहीं है।
दरअसल कई मतदाताओं के दिल तो कहते हंै कि उसे वोट न दिया जाए।पर, राजनीतिक परिस्थिति और उनके दिमाग कुछ और कहते हंै । यह राय भी है कि किसी अधिक बुरे दल या उम्मीदवार को हराने के लिए किसी कम बुरे उम्मीदवार को आधे मन से ही सही,पर  स्वीकार कर लिया जाए।

  अपनी-अपनी सोच और सुविधा के अनुसार मतदातागण बिहार विधान सभा के अगले चुनाव में भी अच्छे के साथ-साथ बुरे प्रत्याशियों से भी निपट लेंगे।अब तो नतीजे ही बताएंगे कि बुरे प्रत्याशियों के साथ लोगों ने कैसा व्यवहार किया।पर, इस संबंध में कम से कम तीन दिवंगत राजनीतिक हस्तियों के विचार उपलब्ध हैं।जवाहरलाल नेहरु,दीन दयाल उपाध्याय और चैधरी चरण सिंह ने समय-समय पर बुरे उम्मीदवारों के बारे में अपनी जाहिर कर दी थी।

  अस्सी के दशक की बात है।इन पंक्तियों का लेखक बिहार में चैधरी चरण सिंह की एक चुनावी सभा में था।उन्होंने अन्य बातों के साथ -साथ मंच से मतदाताओं से यह अपील भी कर दी कि ‘यदि हमारे दल ने भी यहां किसी गलत उम्मीदवार को टिकट दे दिया हो तो तुम उसे वोट मत देना।’बाद में पता चला कि कई अन्य चुनाव सभाओं में भी तब उन्होंने इसी तरह की बात कही थी।

  पचास के दशक की बात है।मध्य प्रदेश के शिव बहादुर सिंह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे।वे नेहरु मंत्रिमंडल में भी रह चुके थे।पर जवाहर लाल नेहरु ने मतदाताओं से अपील कर दी कि वे शिव बहादुर सिंह को वोट न दें क्योंकि उन पर भ्रष्टाचार का आरोप था।

  ऐसे मामले में पंडित  दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी राय अपनी डायरी में दर्ज कर दी है।
11 दिसंबर, 1961 को जनसंघ के वरिष्ठ नेता और विचारक दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी  डायरी में लिखा कि ‘कोई बुरा प्रत्याशी केवल इसलिए आपका मत पाने का दावा नहीं कर सकता कि वह किसी अच्छे दल की ओर से खड़ा है।दल के  ‘हाईकमान’ ने ऐसे व्यक्ति को टिकट देते समय पक्षपात किया होगा।अतः ऐसी गलती को सुधारना मतदाता का कत्र्तव्य है।’

  बिहार  में जो दल चुनाव लड़ रहे हैं उनमें से प्रमुख दलों के नेताओं का संबंध उपर्युक्त तीन नेताओं या उनके दलों से रहा है।इसलिए भी उन दिवंगत नेताओं का उल्लेख मौजूं है।क्योंकि विवादास्पद लोगों को टिकट देने का आरोप आज किसी एक ही दल पर नहीं है।

 (27 सितंबर 2015)




बाते हाथी पाइए,बाते हाथी पांव

मध्य युग की यह कहावत  आज भी दूसरे रुप में लागू होती है। दरबार में अच्छी बातें बोलने पर तब इनाम में हाथी भी  मिल जाता था।गलत  बोलने पर कई बार हाथी के पांव से कुचलवा दिया जाता  था।

 चुनाव के मौसम मेें  जनता के दरबार में अनेक नेताओं के बोल, कुबोल हो गए हैं। ऐसे कुबोल का जवाब मतदातागण वोट की चोट से देते हैं।उस चोट को हाथी का पांव मान लीजिए।

 हाल में एक बड़ी हस्ती ने आरक्षण-व्यवस्था के पुनरीक्षण  की जरुरत बता दी।दूसरे पक्ष के एक  नेता ने फरमाया कि  हिंदू भी कभी गोमांस खाते थे।  ये बातेें पहली बार नहीं कही गईं ।पर अभी  गलत समय पर कही गई।
  अब इसका खामियाजा ऐसी बात कहने वालों को भुगतना पड़ सकता है।क्योंकि बिहार में  आरक्षण और गोमंास बहुत ही नाजुक मुददे रहे हंै।

 हिंदुओं के गोमांस खाने की सूचना देने वाले नेता जी के बारे में भी मतदाताओं के एक वर्ग में अच्छी धारणा नहीं बनी है। हमारे पूर्वज ने ठीक ही कहा था कि  ‘सत्य बोलिए, प्रिय बोलिए, पर अप्रिय सत्य मत बोलिए।’

नाच न जाने आंगन टेढ़ा

   केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने लोगों से ठीक ही कहा है कि ‘हम लोग यह कह कर नहीं बच सकते कि बयान तोड़-मरोड़ कर पेश कर दिया गया।हमें बोलते समय सावधान रहना होगा।’

  इसके साथ ही उन्हें  यह सलाह भी देनी चाहिए थी कि जिस विषय पर आपका बोलना जरुरी नहीं है,उस पर आप अपना मुंह बंद ही रखिए।
नो कमेंट कहना सीखिए।

  पर दरअसल दृश्य मीडिया के इस युग में  ऐसे अनेक नेता उभरकर सामने आ गए हैं जो कुछ भी बोलकर पब्लिसिटी पाने से खुद को रोक ही नहीं पाते।जबकि,
उन्हें  यह सीखना बाकी है कि मीडिया से किस मुद्दे पर किस तरह और दलहित तथा  देशहित में बातेें की जानी चाहिए।


ऐसी सर्वसम्मति के कैसे संकेत ?

  इस देश की सीमा पर कोई हमला भी हो जाता है तो उस मुददे पर भी आम तौर पर संसद या  राजनीति में सर्वसम्मति नहीं होती। महाघोटालों पर भी संसद में सर्वसम्मति नहीं देखी जाती।

पर जब भी सांसदों के वेतन -भत्ते की वृद्धि का प्रस्ताव आता है तो सदन में  सर्वसम्मति हो जाती है। आखिर ऐसा क्यों है  ! ?

 हाल में एक और मामले में संसद में सर्वसम्मति हो गई थी।उसके पीछे क्या है ?
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक  संसद से  सर्वसम्मति से पास हुआ।
पर जब सुप्रीम कोर्ट ने इस  एक्ट को रद कर दिया तो  केंद्रीय कानून मंत्री  ने कहा कि ‘संसद और विधायिका के जरिए लोगों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व होता है।इसे किसी अन्य माध्यम से पूरी दुनिया के संज्ञान में नहीं लाया जा सकता।’

  क्या इस देश के दूसरे लाचार लोगों को उनके हाल पर छोड़कर खुद के वेतन-भत्ते में भारी वृद्धि कर लेने वाले सांसदगण पीएफ पेंशनधारियों को भरोसा दे सकते हैं कि वे पेंशनधरियों की आकांक्षाओं का भी प्रतिनिधित्व करते हैं ?हालांकि इस देश में ऐसे पीडि़तजनों में  सिर्फ पीएफ पेंशनधारी ही नहीं हैं।


सांसद बनाम आम जन

   पटना के एक पत्रकार को आज भी पीएफ पेंशन के रुप में  हर माह 1046 रुपए मिलते हंै। सन् 2005 में यह राशि तय हुई थी। नियमानुसार  उस पत्रकार को आजीवन 1046 रुपए ही मिलेंगे। पर,दूसरी ओर सांसदों के वेतन में दुगुनी वृद्धि का प्रस्ताव है। इस बढ़ोत्तरी की सिफारिश संसदीय समिति ने की है।

 याद रहे कि 2010 में ही सांसदों के वेतन-भत्ते में  300 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। महंगाई और कार्य कुशलता को ध्यान में रखते हुए सांसदों के वेतन-भत्ते में  वृद्धि का प्रस्ताव है।याद रहे कि 1968 में सासंदों का वेतन 400 रुपए और दैनिक भत्ता 31 रुपए थे। क्या तब के सांसद कार्यकुशल नहीं थे ? क्या उन्हें महंगाई की मार नहीं झेलनी पड़ती थी ?

 1963 से 1967 तक सांसद रहे डा.राम मनोहर लोहिया को  निजी कार खरीद लेने की सलाह दी गई थी।इस पर  उन्होंने कह दिया था कि कार का खर्च उठाने लायक मेरी  आय नहीं है।आज कौन सांसद  है जिसने राजनीति और समाज को लोहिया से अधिक प्रभावित किया है ?

 क्या सरकार यह मानती है कि पीएफ पेंशनधारियों पर महंगाई का कोई असर नहीं होता ?


और अंत में

   राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति कानून पर उठे विवाद को लेकर एक न्यायविद् ने सवाल उठाया ।उन्होंने  कहा कि व्यापम घोटाला करनेवाले और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में धांधलियों को पराकाष्ठा पर पहुंचाने वाले नेतागण यदि कभी केंद्र की सत्ता में आ गए तो वे इस  कानून का कितना  सदुपयोग  करंेगे ?

(24 अक्तूबर 2015)


Wednesday, October 21, 2015

कितना जरुरी चुनाव सुधार !

   भाजपा सांसद गोपीनाथ मुंडे ने  27 जून, 2013 को सार्वजनिक रुप से एक बड़ी बात कह दी।उन्होंने  स्वीकार किया कि  2009 में अपने चुनाव क्षेत्र में उन्होंने आठ करोड़ रुपये खर्च किये।हालांकि उन्होंने चुनाव आयोग को अपने खर्च का जो विवरण दिया था,उसमें उन्होंने अपना खर्च मात्र 19 लाख 36 हजार रुपये बताया था।

    तब नियमतः खर्च की अधिकत्तम सीमा 25 लाख थी ।वह सीमा  2011 में बढ़ कर 40 लाख रुपये हो गई। उसी साल मिलिंद देवड़ा ने अपना चुनावी खर्च 10 लाख 63 हजार रुपये बताया तो राहुल गांधी ने 11 लाख 8 हजार रुपये।सुषमा स्वराज ने   8 लाख 92 हजार रुपये बताया तो शरद यादव ने 15 लाख 89 हजार रुपये।

 अब भला बताइए कि जब मुंडे को आठ करोड़ खर्च करने पड़े तो उसी राज्य से विजयी बड़े नेता शरद पवार को कितने रुपये खर्च करने पड़े होंगे ! यह खुला सत्य है कि इस देश के  अधिकतर नेतागण खर्च तो करोड़ों में करते हैं और आयोग को जो व्योरा देते हैं,वह तय सीमा के भीतर का ही होता है।

  आखिर ऐसा असत्य व अविश्वसनीय आंकड़ा देश के बड़े-बड़े नेता लोग क्यों चुनाव आयोग को समर्पित करते हैं ? यह तो एक मामूली उदाहरण है। ऐसे-ऐसे अनेक कारनामों के कारण  इस देश के अधिकतर नेताओं पर  से जनता का विश्वास उठता जा रहा है।पर, जनता भी आखिर क्या करे ! आखिर उसे इन्हीं नेताओं  में से किसी न किसी को हर पांच साल पर चुुनना पड़ता है।ऐसे में राजनीति और चुनाव प्रक्रिया को सुधारने के लिए सुप्रीम कोर्ट कोई निदेश देता है तो आम लोगों को बड़ी खुशी होती है।पर अधिकतर नेतागण उस फैसले से  नाराज हो उठते हैं।एक बार फिर यही हो रहा है।


सुधार के खिलाफ राजनीतिक वर्ग

  सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के खिलाफ इस बार भी अधिकतर नेतागण  उठ खडे़ हुए हंै। हाल का राजनीतिक इतिहास देखते हुए ऐसी ही उम्मीद की भी जा रही थी।उन फैसलों को निरर्थक करने की कोशिश में शायद जल्दी ही कुछ कदम उठाए जाएंगे।कदम उठाने के पक्ष में केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के साथ साथ  प्रतिपक्ष के भी कुछ  दल हैं। याद रहे कि हाल में बारी -बारी से सुप्रीम कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण फैसले किये ।चुनाव सुधार की दिशा में एक ठोस कदम के तहत अदालत ने कहा कि कोर्ट से दोषी करार जन प्रतिनिधियों की सदस्यता तत्काल प्रभाव से खत्म हो जाएगी।एक अन्य निर्णय के तहत देश की सर्वोच्च अदालत  ने कहा कि जेल में रहने पर कोई व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकेगा।


        सुप्रीम कोर्ट के साथ जनता
  एक राष्ट्रीय अखबार ने हाल में अपने पाठकों से एक  सवाल पूछा।वह सवाल यह था कि ‘ क्या आप सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से खुश हैं कि अब जेल में रहने वाले नेता चुनाव नहीं लड़ पाएंगे ?  इसके जवाब में 96 दशमलव 70 प्रतिशत पाठकों ने कहा कि हम खुश हैं। सिर्फ 3 दशमलव 30 प्रतिशत पाठकों ने अपनी नाखुशी जाहिर की।
क्या इस देश के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच इस फैसले पर खुशी और नाखुशी का यही अनुपात है ?हमारे नेतागण आम लोगों के विचारों के कितने पास या कितने दूर हैं ?   टी.वी चैनलों पर नेताओं के उद्गारों और अखबारों में उनके बयानों से इस सवाल का जवाब मिल जाएगा।


नायडु के साथ अन्याय

  इस देश में जब भी हाई टेक और शहरी विकास की चर्चा चलती है तो  कुछ नेतागण तुरंत यह बयान दे देते हैं कि ‘देखा न, हाईटेक के कारण किस तरह चंद्र बाबू नायडु चुनाव हार गये ! ’

   ऐसे बयान संभवतः आंध्र प्रदेश में तब के चुनावी समीकरण  की गैर जानकारी के कारण आते रहते हैं।याद रहे कि आंध्र प्रदेश में लोक सभा और विधान सभा के चुनाव साथ -साथ ही होते हैं।

  1999 के चुनाव में नायडु के दल को 44 प्रतिशत वोट मिले थे।उसमें अल्पसंख्यकों के वोट भी शामिल थे।नायडु मुख्य मंत्री बने थे।नायडु का दल केंद्र में अटल  सरकार का बाहर से समर्थन कर रहा था।

  इस बीच 2002 में गुजरात में  सांप्रदायिक दंगा हो गया।आंध्र  के अल्पसंख्यक नेताओं ने नायडु से कहा कि आप  अब अटल सरकार से अपना समर्थन वापस कर लें।नायडु ने ऐसा नहीं किया।नतीजतन आंध्र के अल्पसंख्यकों ने 2004 के चुनाव में नायडु के दल तेलुगु देशम पार्टी को वोट नहीं दिया। इस कारण टी.डी.पी.का वोट प्रतिशत 44 से घटकर 37 रह गया।

 नतीजतन  नायडु सत्ता से बाहर हो गये ।  अब सवाल उठता है कि क्या 37 प्रतिशत वोट उन्हें  सिर्फ शहरों से मिले थे ? क्या ये मत सिर्फ हाई टेक के कारण मिले थे ? क्या आंध्र में शहरों और हाईटेक के समर्थकों के वोट मिल कर भी 37 प्रतिशत हो सकते हैं ? हां, नौ प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी वाले राज्य में 7 प्रतिशत मतों के कम हो जाने का सीधा मतलब यही था कि वहां भी गुजरात दंगे का असर पड़ गया।ऐसे में हाईटेक और शहरी विकास के क्षेत्र में भी काम करने वाले नेताओं  को भयभीत करना सही नहीं होगा।किसी दल की जीत या हार में एक साथ कई तत्व काम करते हैं।


और अंत में

सुख-शांति के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा यह है कि हमारे पास जो कुछ है,उसे हम कम करके देखते हैं।साथ ही,जो कुछ दूसरे के पास है,उसके बारे में हम बढ़ा -चढ़ाकर आकलन करते हैं।

(जुलाई 2013)

चुनावी घूसखोरी से बिहार को बचाने की चुनौती

एक अध्ययन के अनुसार दक्षिण भारत के तीन राज्य चुनावी घूसखोरी के मामले में
अब तक देश में सबसे आगे रहे हैं। इस बार बिहार में भी कोई अच्छे संकेत नहीं हैं। यहां  इस बार  प्रचार में जितने अधिक पैसे खर्च हो रहे हैं,वह तो अभूतपूर्व है। इस राज्य (Bihar) में भी घूस देकर वोट लेने के छिटपुट प्रयास पहले भी होते रहे हैं।

कई बार उम्मीदवार इस प्रयास में सफल होते रहे हैं तो कई बार विफल।विफल इसलिए भी  होते हैं क्योंकि यह  राजनीतिक रुप से अत्यंत जागरुक प्रदेश है।

यहां अधिकतर मतदाताओं के दिलो दिमाग पर पैसे के अलावा दूसरे तत्व अधिक हावी रहते हैं।पर इस बार क्या होगा ?कई बार प्रलोभनों की अधिकता के बीच कई लोगों के संयम टूट जाते हंै। इस बार जितनी बड़ी संख्या में धनवान उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं,उससे भी यह सवाल उठता है।

 विधान परिषद के हाल के चुनाव में भी पैसे का खूब खेल चला। सवाल है कि क्या इस मामले में  दक्षिण भारत ही अब भी आगे रहेगा ? या फिर बिहार उसका एकाधिकार तोड़ेगा ? इस पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी बढ़ गई है।उसकी प्रतिष्ठा दांव पर है।


बिगड़े बोल कहीं बिगाड़ न दे किया-धरा !

  सन 1962 के आम चुनाव में सहरसा लोक सभा क्षेत्र में समाजवादी नेता भूपंेद्र नारायण मंडल ने कांग्रेस के ललित नारायण मिश्र को हराया था। पर इस चुनाव के खिलाफ याचिका दायर की गई।आरोप लगा कि भूपेंद्र नारायण मंडल की ओर से  वोट के लिए जातीय आधार पर मतदाताओं से अपील की गई थी। मंडल जी का चुनाव खारिज हो गया था।

  एक पुराने समाजवादी नेता ने बताया कि आज  विधान सभा  चुनाव प्रचार के दौरान  जिस तरह से कुछ नेतागण वोट के लिए मतदाताओं की जातीय और धार्मिक भावनाएं उभारने की कोशिश कर रहे हैं, वे 1962 की अपेक्षा अधिक प्रत्यक्ष और भोंड़ा है।

कल्पना कीजिए कि इस चुनाव के बाद इस आधार पर चुनाव याचिकाएं दायर होने लगें तो क्या होगा ?

क्या पराजित उम्मीदवार इस आधार पर चुनाव याचिका दायर नहीं कर सकता  कि किसी राष्ट्रीय या प्रादेशिक  नेता ने हमारे चुनाव क्षेत्र में आयोजित अपनी सभा में धार्मिक या जातीय भावना उभारी और उसका लाभ उठाकर प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार जीत गया ?

 इस आरोप पर पता नहीं अदालत कैसा रुख अपनाएगी ? इस आशंका को ध्यान में रखते हुए कम से कम चुनाव प्रचार के अगले दौर में तो जातीय और धार्मिक भावनाएं उभारने का प्रयास बंद हो जाना चाहिए।


वंशवाद की आंधी के बीच  अडिग

 वंशवादी राजनीति की आंधी में एक वंशवाद विरोधी नेता आज भी अडिग खड़ा है।
वह नेता हैं राजद के जगदानंद सिंह। जरा ऐसे लोगों की भी चर्चा कर लेनी चाहिए।

राज्य के पूर्व सिंचाई मंत्री श्री सिंह 2009 में बक्सर से लोक सभा के लिए चुन लिए गए थे।
इस कारण उन्हें विधान सभा की अपनी सीट खाली करनी पड़ी थी।

जानकार सूत्रों के अनुसार राजद ने उनसे कहा था कि आप  अपने पुत्र को उप चुनाव में खड़ा करा दीजिए। पर,जगदानंद ने मना कर दिया।

 राजपूत वर्चस्व वाले रामगढ़ चुनाव क्षेत्र से जगदानंद ने एक कार्यकत्र्ता अम्बिका सिंह यादव को राजद का उम्मीदवार बनवा दिया। जगदानंद के पुत्र पिता से विद्रोह करके  भाजपा से खड़ा हो गए। उन्होंने अपने पुत्र को  हरवाकर  राजद उम्मीदवार को जितवा दिया।

 याद रहे कि 1952 से अब तक किसी भी महत्वपूर्ण पार्टी ने रामगढ़ से किसी यादव उम्मीदवार को खड़ा तक नहीं किया था।

 गत लोक सभा चुनाव में जगदानंद हार गए। इन दिनों लोकसभा चुनाव में पराजित कुछ नेता भी विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। क्योंकि किसी सदन का सदस्य बन जाने के बाद आज के अधिकतर नेतागण एक खास तरह की जीवनशैली अपना लेते हैं। वे उसे बनाये रखने के लिए किसी न किसी सदन मेें जल्द से जल्द प्रवेश चाहते हैं।

 पर,इस बार भी जगदानंद ने अपने पुत्र को अपने दल से खड़ा नहीं कराया। न ही अम्बिका यादव का टिकट कटवा कर वे खुद लड़े।


और अंत में

  कुछ दशक पहले तक कई राजनीतिक दल अपने कार्यकत्र्ताओं के लिए अक्सर राजनीतिक प्रशिक्षण शिविर आयोजित करते थे।वह सब अब लगभग बंद है। चुनाव भी कार्यकत्र्ताओं को शिक्षित-प्रशिक्षित करने के अवसर होते थे।आज के चुनाव में जो कुछ हो रहे हैं,उनसे राजनीतिक कार्यकत्र्तागण कैसी शिक्षा ग्रहण करेंगे ?कौन-कौन से र्गिर्हत शब्द ग्रहण करेंगे  ? पता नहीं।

(दैनिक भास्कर, पटना - 17 अक्तूबर,2015)

   

Friday, October 16, 2015

आदर्शवादी पीढ़ी के एक संपादक का निधन


एक सौ एक बसंत देख चुके पारसनाथ सिंह संपादकों की उस पीढ़ी के थे जो  लगभग विलुप्त हो रही है। आज उनके गांव में उनका निधन हो गया। वर्षों तक उनके साथ काम करने के अनुभव के बाद मैं यह कह सकता हूं कि उन्होंने कभी अपनी जीवन शैली नहीं बदली। न ही पत्रकारिता के उन मूल्यों से समझौता किया जो उन्होंने अपने पूर्ववर्ती संपादकों  से सीखा था।

  बाबूराव विष्णु पराड़कर को अपना आदर्श मानने वाले पारस बाबू ने हमें विद्याव्यसनी और विनयी बनने का पाठ पढ़ाया। उत्तर प्रदेश और बिहार के तीन अखबारों के संपादक रहे पारसनाथ सिंह ने न तो कभी अपने पद का लाभ उठाया और न ही पत्रकारिता की धौंस जमाई।

हमेशा सीमित आर्थिक साधनों के जरिए ही परिवार चलाते और संतुष्ट रहते उन्हें देखा। उन्होंने अपनी संतानों को भी अच्छे संस्कार दिए। उनके दीर्घ जीवन का राज यह था कि उनका खाने -पीने में भी भारी संयम था। वे अक्सर पैदल चलते देखे जाते थे।
  ऐसा ही अनुशासन वे संपादन कार्यों में भी रखते थे। वे शब्दानुशासन और खबरों के शीर्षक में शालीनता के घोर पक्षधर थे। वे अपने  संवाददाताओं से कहा रहते थे कि वे छोटे-छोटे वाक्य लिखें। साथ ही  स्पष्टता और संक्षिप्तता का भी पूरा ध्यान रखें।

  वे अंग्रेजी की खबरों के हिन्दी अनुवाद को लेकर डेस्क से कहा करते थे कि शब्दानुवाद के बदले भावानुवाद करें। पटना जिले के पुनपुन के पास के तारणपुर के मूल निवासी पारस बाबू ने अपना अधिक समय वाराणसी और कानपुर में बिताया।

बाद में वे बारी-बारी से पटना के दो अखबारों के भी संपादक रहे। अपने जीवन के
अंतिम वर्षों में यह देखकर वे दुःखी रहते थे कि इन दिनों अधितर हिन्दी अखबारों में  शब्दानुशासन पर कम ही ध्यान दिया जाता है। कभी हिन्दी अखबार पढ़कर कई लोग अपनी हिन्दी सुधारते थे।