Sunday, December 29, 2013

‘आप’ के सामने सरकार से अधिक साख बचाने की चुनौती


अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली में गठित आम आदमी पार्टी की सरकार ने अच्छी शुरुआत कर दी है।
उसने जल्द ही कई ठोस जनहितकारी कदम उठाने का आश्वासन भी आम लोगों को दिया है। पर इस सरकार की सफलता को लेकर कुछ हलकों में अपशकुन भी किये जा रहे हैं। दरअसल कई लोगों को यह लग रहा है कि ‘आप’ प्रयोग अंततः विफल हो जाएगा। क्योंकि ‘आप’ के नेतागण राजनीति व प्रशासन से भ्रष्टाचार का खात्मा कर देना चाहते हैं। अपशकुन करने वाले वही लोग हैं जो यह मान बैठे हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार तो राजनीति व प्रशासन की गाड़ी को चलाने के लिए मोबिल का काम करते हैं और मोबिल के बिना गाड़ी चल ही नहीं सकती। फिर ‘आप’ की गाड़ी भला कैसे चल पाएगी !

  इसके साथ ही यह भी आशंका जाहिर की जा रही है कि कुछ विध्वंसक तत्व को ‘आप’ की सरकार को बदनाम व विफल करने के प्रयास में लग गये होंगे। इस पृष्ठभूमि में आम आदमी पार्टी के सामने अब अपनी सरकार से अधिक अपनी साख बचाये रखने की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

राजनीतिक प्रेक्षक बताते हैं कि यदि ‘आप’ की साख बची नहीं रही तो देश का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक बार फिर दशकों पीछे चला जाएगा। इसके विपरीत यदि दिल्ली की आप सरकार ने अपने बेहतर कामों के जरिए अपनी साख बढ़ाई तो उसे पूरे देश में फैल जाने से कोई रोक नहीं सकता। क्योंकि पूरा देश आज राजनीति व प्रशासन में फैले भीषण भ्रष्टाचार से ऊब गया है।

  आप के एक विधायक विनोद कुमार बिन्नी के सामने नहीं झुक कर ‘आप’ ने अच्छे संकेत दिये हैं। पर उसे आगे भी और अधिक सावधान रहने की जरुरत पड़ेगी। याद रहे कि बिन्नी मंत्री पद नहीं मिलने के कारण सख्त खफा थे और वे विद्रोह की मुद्रा में थे।

इस पर आप ने साफ साफ कह दिया कि उसके दल में सत्तालोलुपों के लिए कोई जगह नहीं है। नतीजतन बिन्नी शांत हो गये। पर ‘आप’ के सामने यह तो एक छोटी समस्या थी। समस्याएं और भी हैं। कठिन चुनौतियां सामने हैं। क्योंकि ‘आप’ के सत्तारोहन की आहट पर ही इस देश के भ्रष्ट सरकारी व गैर सरकारी लोग डरे हुए हैं। वे आप की साख खराब करने के लिए कोई भी षड्यंत्र कर सकते हैं। दूसरी ओर स्टिंग आॅपरेशन का खतरा भी सामने है। कुछ ‘आप’ नेताओं की यह आशंका सही है कि कांग्रेस का समर्थन केवल केजरीवाल को कुर्सी पर बिठाने तक है। उसके बाद वह चाहेगी कि केजरीवाल विफल हों ताकि भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन देश में जड़ नहीं पकड़ सके। कुछ अन्य दल भी ‘आप’ को सफल देखना नहीं चाहेंगे।

इससे पहले कांग्रेस पार्टी ने समय समय पर चैधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा और गुजराल के साथ यही किया। पर इस जाल से निकलने की जिम्मेदारी खुद आप नेताओं की ही है। उन्हें अपने चाल, चरित्र और चेहरे को बचाये रखना होगा। अन्यथा इस देश का भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन एक बार फिर काफी पीछे चला जाएगा।
 इसके पहले के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के साथ इस देश में यही हुआ। 1966-67 का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन विफल होने पर दोबारा उसे शुरू करने में सात साल लग गये थे। इस बीच सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचार बढ़ता गया। तानाशाही भी बढ़ी। यानी 1973 में ही गुजरात और 1974 में बिहार में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरू हो सका।

  1966-67 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रमुख नेता डा.राम मनोहर लोहिया थे। उन्होंने जनसंघ और भाकपा सहित कई प्रतिपक्षी दलों को एक मंच पर लाया था। सन 1974 के आंदोलन के नेता जय प्रकाश नारायण थे। याद रहे कि गुजरात और बिहार आंदोलन छात्रों -युवकों ने शुरू किया था न कि राजनीतिक दलों ने। क्योंकि लोगों को उन गैर कांग्रेसी नेताओं पर भरोसा नहीं रह गया था जिन्होंने 1967 और 1972 के बीच देश के कई राज्यों में सत्तारुढ़ होकर अपनी सत्तालोलुपता दिखा दी थी।

  1974 के आंदोलन व उसके कारण बनी सरकारों ने जब पदलोलुपता दिखाई तो कोई नया आंदोलन शुरू होने में 13 साल लग गये। यानी वी.पी.सिंह का बोफर्स घोटाला विरोधी अभियान 1987 में ही शुरू हो सका। पर उस आंदोलन से उपजी सरकारें भी जनता की उम्मीदों पर खड़ी नहीं उतर सकी तो 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में जनलोकपाल विधेयक के लिए आंदोलन शुरू हो सका।

  यानी पहला आंदोलन विफल होने पर दूसरा शुरू करने मेंे सात साल लगे। दूसरा विफल होने पर तीसरा शुरू होने में 12 साल लग गये। तीसरा विफल होने पर चैथा शुरू करने में 20 साल लगे। अब यदि यह भी विफल हो जाएगा तो कल्पना कीजिए कि अगला आंदोलन शुरू होने में कितने साल लग जाएंगे ?
इस बीच इस गरीब देश की हालत और कितनी बुरी हो चुकी होगी। साथ ही परंपरागत राजनीति तब तक और कितनी गर्हित हो चुकी होगी !

   यदि डा.राम मनोहर लोहिया को थोड़ा लंबा जीवन मिला होता तो शायद 1967 के आंदोलन और उससे निकली सरकार को वे भरसक विफल नहीं होने देते। जय प्रकाश नारायण का स्वास्थ्य ठीक रहता तो वे जनता प्रयोग को सफल करने का प्रयास करते। अन्यथा वे फिर जनता के बीच जाते।

यदि भाजपा ने मंडल आरक्षण के खिलाफ मंदिर का बहाना बनाकर वी.पी.सिंह को सरकार को गिराया नहीं होता तो इस देश के भ्रष्टाचारियों का एक हद तक इलाज वी.पी. सिंह की सरकार कर चुकी होती। और उससे यह होता कि राजनीति के प्रति लोगों इतना मोहभंग नहीं हेाता जितना आज हो चुका है।

  आप विधायक विनोद कुमार बिन्नी के आगे नहीं झुक आम आदमी पार्टी ने अच्छा संकेत दिया है। पर आप को 1967 के डा.राम मनोहर लोहिया के कुछ कदमों को भी याद रखना होगा।

  1967 के चुनाव के बाद सात राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गई थीं। अन्य दो राज्यों में कांग्रेसी नेताओं के दलबदल के कारण गैरकांग्रेसी सरकारें बनीं। इन सरकारों को डा.लोहिया ने सलाह दी थी कि वे छह महीने के भीतर जनहित में कुछ ऐसे बड़े फैसले कर दें ताकि लोग यह समझ जायें कि ये सरकारें कांग्रेसी सरकारों से काफी अलग ढंग की सरकारें हैंे। ऐसा नहीं होने पर कांग्रेस फिर सत्ता में आ जाएगी।

   डा.लोहिया के अनुसार कुछ फैसले तो उन राज्य सरकारों को सत्ता में आने के कुछ ही हफ्तों के भीतर ही करने थे। बिहार पर डा.लोहिया की सबसे अधिक नजर थी क्योंकि आनुपातिक दृष्टि में लोहियावादियों की बिहार में अन्य राज्यों की अपेक्षा सबसे बड़ी चुनावी जीत हुई थी।

 बिहार में गैरकांग्रेसी सरकार ने जब डा.लोहिया के निदेश को नजरअंदाज किया तो लोहिया ने अपने दल के एक बड़े बिहारी नेता से मिलने से भी इनकार कर दिया था।  इस पर उस नेता जी को होश आये। उन्होंने कुछ सरकारी काम तो किये। पर पूरे काम नहीं हो सके।

 1967 में बिहार में ही बी.पी. मंडल को, जो बाद में मंडल आयोग के अध्यक्ष बने थे, मंत्री बना दिया गया था जबकि वे 1967 के लोकसभा चुनाव में संसोपा के टिकट पर मधेपुरा से सांसद चुने गये थे। उन्हें मंत्री बनाने से पहले डा.लोहिया की राय नहीं ली गई थी। डा.लोहिया मानते थे कि जो जहां के लिए चुना जाए , वह उसी सदन का काम करे। डा.लोहिया को जब पता चला तो उन्होंने निदेश दिया कि बी.पी.मंडल मंत्री पद से इस्तीफा देकर लोकसभा के सदस्य के रूप में काम करें। पर मंडल ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। मंडल कांग्रेस से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए थे।

  बिहार के कुछ संसोपा नेताओं ने डा.लोहिया को समझाने की कोशिश की कि मंडल को मंत्री पद छोड़ने के लिए मजबूर कीजिएगा तो वे सरकार गिरा देंगे। लोहिया ने कहा कि भले वे सरकार गिरा दें पर उनके लिए पार्टी की नीति नहीं बदली जाएगी। मंडल ने आखिरकार सरकार गिरा ही दी।

  सन 1968 में वे खुद मुख्यमंत्री बन गये। इससे संसोपा की साख घटी। हालांकि उससे पहले डा.लोहिया का अक्तूबर, 1967 में असामयिक निधन हो चुका था। यदि दिल्ली की आम आदमी पार्टी अपनी सरकार की चिंता किये बिना ऐसे ही  नीतिपरक रुख कायम रखे तो वह भविष्य में भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की अगुआ बनी रह सकती है।

अन्यथा इस देश के घाघ भ्रष्टाचारी गण एक बार फिर सांड़ की तरह जनता के खेत चरने लगेंगे।


Wednesday, December 18, 2013

‘बकरे की बलि’ चढ़ाने से बच जाएगी कांग्रेस की इज्जत ?

कांग्रेस में एक बार फिर बलि के बकरे की तलाश हो रही है। केंद्र में और राज्यों में भी। मणि शंकर अयर का ताजा बयान उसी तलाश का हिस्सा है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से भी ऐसी ही तलाश की सूचना आ रही है।

    पर, क्या बकरे की बलि देने से कांग्रेस को कभी कोई लाभ मिला है जो इस बार मिलेगा ?

दरअसल इतिहास बताता है कि नीयत और नीतियां बदलने की मंशा नहीं हो तो सिर्फ नेता बदलने से कांग्रेस को कभी लाभ मिला ही नहीं है। हां, पर बलि का कोई बकरा खोजना ही है तो वे खोज रहे हैं। ऐसे अवसरों पर हर बार खोजा जाता रहा है तो इस बार भी खोजा जा रहा है। चीन के हाथों भारत की पराजय के लिए तत्कालीन रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन को बलि का बकरा बनाया गया था।

  यह सब ऐसे देश में हो रहा है जहां 2004 से ही पद किसी और के पास है तो पावर किसी अन्य नेता के पास।
  पूरा पावर अपने पास रखने वाले संविधानेत्तर केंद्र की कमियों की चर्चा तो मणि जी करेंगे नहीं, इसलिए वे पद रखने वाले पर लाल-पीले हो रहे हैं। सवाल यह है कि मनमोहन सिंह ने अब तक कौन सा बड़ा फैसला सोनिया गांधी और राहुल गांधी की इच्छा के खिलाफ जाकर किया है? बल्कि चर्चा तो यही है कि उन्होंने यथा प्रस्तावित ही काम किया है। प्रस्ताव किसका होता है, यह सब जानते हैं।

  यहां तक कि हाल में राहुल गांधी ने जब एक अध्यादेश को सार्वजनिक रूप से बकवास बताया तो मनमोहन सिंह ने सर्वदलीय बैठक और पूरे केंद्रीय कैबिनेट के फैसले तक को ताक पर रखकर उसे वापस कर लिया। यह और बात है कि सुप्रीम कोर्ट व राष्ट्रपति के रुख को भांप कर ही राहुल गांधी ने वह कदम उठाया था।
उससे लगा था कि उससे उन्हें चुनावी लाभ मिलेगा, पर मिला नहीं। क्योंकि हकीकत लोग जानते हैं।

   लगता है कि कांग्रेस के प्रथम परिवार के करीबी मणिशंकर अयर एक नया कामराज योजना लागू करना चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि 2009 में मनमोहन सिंह को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय गलत था। यानी वे यह कहना चाहते हैं कि मनमोहन के कारण ही कांग्रेस की शर्मनाक हार हुई है। ऐसा कहकर वे मनमोहन को हटवाना चाहते हैंं। यानी वे एक बार फिर मिनी कामराज योजना लागू करना चाहते हैं।

   मणि शंकर अयर संभवतः छात्र रहे होंगे जब उन्हीं के प्रदेश के एक प्रमुख कांग्रेसी नेता के. कामराज ने कांग्रेस हाईकमान को एक सुझाव दिया था। वह कामराज योजना के नाम से जाना गया। तब कामराज योजना लागू की गई थी।
 
हार के बाद लागू हुई थी कामराज योजना

 जवाहर लाल नेहरु के प्रधानमंत्रित्व काल में चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय और दूसरी सरकारी विफलताओं की पृष्ठभूमि में कामराज योजना लागू की गई थी। उन दिनों लगातार कई लोकसभा उपचुनाव कांग्रेस हार रही थी।

  कहा गया कि कांग्रेस संगठन की कमजोरी के कारण हार हो रही है। तय हुआ था कि कांग्रेस के कुछ बड़े नेता केंद्रीय मंत्री पद और मुख्यमंत्री पद छोड़कर संगठन के काम में लगें। नतीजतन करीब आधा दर्जन केंद्रीय मंत्री और आधा दर्जन मुख्यमंत्री 1963 में अपने पदों से हटा दिये गये।

  पर 1967 के आम चुनाव में इसका क्या नतीजा हुआ? कामराज योजना के नाम पर  जिन राज्यों के मुख्यमंत्री हटाये गये थे, उन राज्यों में भी कांगे्रस चुनाव हार गई और सत्ता से हटा दी गई। वहां गैर कांग्रेसी सरकार बन गई। लोकसभा में भी कांग्रेस का बहुमत पहले की अपेक्षा काफी कम हो गया। क्योंकि सिर्फ नेता हटे थे, जनपक्षी नीतियां नहीं बनी थीं। नीयत भी पहले ही जैसी ही थी। इसलिए कामराज योजना का कोई लाभ नहीं हुआ? आज भी क्या कांग्रेस और केंद्र सरकार अपनी नीतियां और नीयत बदलने को तैयार है ?

     इतना ही नहीं, 1980 से 1990 के बीच कांग्रेस हाईकमान ने बिहार में पांच  मुख्यमंत्री बदले। इसके बावजूद छठे मुख्यमंत्री भी 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता में नहीं ला सके।

ऐसे कई अन्य उदाहरण भी हैं। इसके बावजूद मणि शंकर अयर जैसे नेता समझते  हैं कि कांग्रेस की चुनावी विफलता के लिए सिर्फ मनमोहन सिंह जिम्मेदार हैं।

लगातार बलि का बकरा खोजते रहने वाले दल में मणि शंकर अयर ऐसे अकेले नेता नहीं होंगे। अंतर यही है कि मणि शंकर स्पष्टवादी व बड़बोले नेता हैं और दूसरे ऐसा नहीं हैं।

‘परिवार’ को सिर्फ सफलता का श्रेय

  जिस दल में प्रथम परिवार में किसी तरह गलती ढूंढ़ना ईशनिंदा मानी जाती हो, वहां यही होना है। वहां तो उस परिवार को सिर्फ किसी सफलता के लिए श्रेय देने की परंपरा है।

   वैसे कांग्रेस से नाराज मतदाता यह अच्छी तरह जानते हैं कि भ्रष्टाचार और महंगाई के लिए कोई जिम्मेदार है तो वही है जिसके हाथों में केंद्र सरकार का पावर है। जिसके पास राजनीतिक कार्यपालिका का सर्वोच्च पद है, वह आदेश का पालन करने वाला भर है।

 महंगाई का भी मूल कारण सरकारी भ्रष्टाचार ही है। अन्यथा क्या कारण है कि जब  केंद्र में गैरकांग्रेसी सरकार बनती है कि महंगाई अरिथमेटिकल प्रोग्रेशन यानी अंकगणतीय गति से बढ़ती है और जब कांग्रेस की सरकार होती है तो ज्योमेट्रिकल प्रोग्रेशन यानी ज्यामितीय गति से ? भ्रष्टाचार गैर कांग्रेसी सरकारों में भी होता रहा है, पर कांग्रेसी सरकार की अपेक्षा कम।

मुख्यतः महंगाई व भ्रष्टाचार के मुद्दों पर कांग्रेस सरकार की विफलता के कारण मतदाता कांग्रेस से विमुख हो रहे हैं।

पर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह का अब तक क्या रुख रहा है?

  यही रुख रहा कि भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वालों पर कार्रवाई करो और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए कुछ नहीं करो। अशोक खेमका प्रकरण इसका एक उदाहरण है। हाल के वर्षों में बड़े भ्रष्टाचारों के मामलों में भी तभी कोई कार्रवाई हुई जब सी.ए.जी. ने रपट दी और अदालत ने जांच का आदेश दिया। कोयला घोटाला हो या टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला। इसके अलावा भी इस बीच कई बातें हुईंं हैं। सब कुछ सोनिया गांधी और राहुल गांधी की जानकारी में हुआ। ताजा चुनाव रिजल्ट आने से पहले तक कांग्रेस के प्रवक्तागण भी यह कहते रहे हैं कि किसी मुद्दे पर सोनिया जी-राहुल जी और मनमोहन सिंह में कोई मतभेद नहीं है। फिर अचानक बलि के बकरे की तलाश व पहचान क्यों ?

मनमोहन सिंह एक बेचारे प्रधानमंत्री

 देश के अधिकतर लोग यह जानते हैं कि मनमोहन सिंह एक बेचारे प्रधानमंत्री की तरह आदेशानुसार ही काम करते रहे हैं।

मतदाताओं ने इसे समझा और उसके अनुसार हाल के चुनाव में मतदान किया। लोकसभा चुनाव में भी यही होगा, इसके संकेत साफ है। इसलिए यह कहा जा रहा है कि नेता बदलने के बदले नीयत और नीति बदलने से ही कांग्रेस आशंकित पराजय से बच सकती है। या फिर पराजय का प्रभाव कम हो सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी पार्टी का जो रुख सामने आया है, वह इस देश की राजनीति के लिए कसौटी बन गई है। अन्य पार्टियों को जनता उसी कसौटी पर कसेगी, इसके भी संकेत साफ हैं।
( 13 दिसंबर, 2013 के जनसत्ता में प्रकाशित)


Wednesday, December 11, 2013

आम आदमी पार्टी पर करोड़ों नजरें


इस मिनी आम चुनाव (दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव 2013) की सबसे बड़ी उपलब्धि आम आदमी पार्टी का उभार है। उभार भी ऐसा वैसा नहीं बल्कि बेमिसाल है। ‘आप’ को भारी जीत दिलाकर दिल्ली के बहुमत मतदाताओं ने देश को एक नयी राजनीतिक दिशा भी दिखाई है। इस तरह मतदाताओं ने देश की राजधानी का नागरिक होने का फर्ज भी निभाया है।

    दिल्ली की जनसंख्या की विविधता का आज जो स्वरूप है, उसे लगभग पूरे देश की प्रतिनिधि आबादी भी कहा जा सकता है। इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि यदि पहले से आम आदमी पार्टी के काम व प्रचार अन्य राज्यों में हुए होते और ‘आप’ ने वहां भी चुनाव लड़ा होता तो वह उन राज्यों में भी चुनाव को प्रभावित कर सकती थी जहां हाल में (2013) चुनाव हुए।


मोदीत्व बनाम ‘आप’वाद में राजनीतिक मुकाबले

    संकेत बताते हैं कि आने वाले समय में धीरे -धीरे कांग्रेस राजनीति के हाशिये पर जाएगी। ‘आप’ धीरे -धीरे उसकी जगह लेगी। देश भर के अच्छे तत्व आम आदमी पार्टी से जुड़ेंगे। मोदीत्व बनाम ‘आप’वाद के बीच आने वाले दिनों में राजनीतिक मुकाबले होंगे। क्योंकि मोदीत्व को हराने में अभी उनके विरोधियों को भी समय लगेगा। क्योंकि भाजपा के हिन्दुत्व की चाशनी और कांग्रेस की नकली धर्मनिरपेक्षता से मोदीत्व को ताकत मिली है। इसके हालांकि कुछ अन्य कारण भी हैं। वैसे तसलीमा नसरीन के खिलाफ फतवा देने वाले व्यक्ति की तरह के लोगों के साथ ‘आप’ ने यदि अधिक मेलजोल बढ़ाया तो उससे मोदीत्व को ही बढ़ावा मिलेगा।
 यह भी उम्मीद की जाती है कि इतनी बड़ी चुनावी सफलता के बाद ‘आप’ वास्तविक धर्मनिरपेक्ष बने न कि अन्य कुछ दलों की तरह एकतरफा या ढोंगी धर्म निरपेक्ष।


कांग्रेस के भ्रष्टाचार से परेशान जनता

   उधर कांग्रेस के भ्रष्टाचार, अहंकार, वंशवाद, काला धन और चमचागिरी से परेशान इस देश की आम व खास जनता को आम आदमी पार्टी के रूप में देर- सवेर एक खेवनहार मिल सकता है। एक हद तक मिल भी गया है।
बशर्ते कि ‘आप‘ ने अपने चाल, चरित्र व चेहरे को आगे भी ठीकठाक रखा। इसके लिए यह जरूरी है कि गंदे और अवसरवादी तत्व आप में घुसपैठ नहीं कर पायें। कांग्रेस की लगातार नाकामयाबियों से उभरे मोदीत्व ने दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी के विजय रथ को रोक लिया है, पर आने वाले समय में पूरे देश में ‘आप’वाद बनाम मोदीत्व के बीच मुकाबले की ही संभावना नजर आ रही है।

 सरकारी भ्रष्टाचार से पीडि़त इस गरीब देश में अगले चुनावों में अंततः आम आदमी की ही जीत की संभावना जाहिर की जा सकती है। हालांकि इसमें समय लग सकता है। आप के नेताओं की मौजूदा साख को देखते हुए देश के अन्य हिस्सों की जनता भी आप को स्वीकार कर सकती है।


घाघ नेताओं ने विफल किए जनता के बदलाव

   पर, इससे पहले के दशकों में जनता ने ऐसे ही तीन प्रयास किये थे जिन्हें घुटे हुए घाघ नेताओं ने अंततः विफल कर दिये। उम्मीद की जानी चाहिए कि आम आदमी पार्टी में वैसे घुटे हुए घाघ नेताओं का कभी वर्चस्व नहीं हो पाएगा। क्योंकि आप में अभी तो  नये ढंग के लोग हैं जो ‘राजनीति का विकल्प’ नहीं बल्कि वैकल्पिक राजनीति के पक्षधर हैं।

  याद रहे कि दिल्ली में शानदार प्रदर्शन के बाद यह उम्मीद की जाती है कि आम आदमी पार्टी देश के अन्य हिस्सों में भी अगला चुनाव लड़ेगी। देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी मांग भी ‘आप’ के पास अब आएगी। बल्कि आनी शुरु हो चुकी होगी। सीमित शक्ति व साधनों के कारण भले उसे आगे भी सीमित चुनावी सफलता ही मिले, पर यह बात पक्की मानी जा रही है कि वह विकल्प की राजनीति नहीं, बल्कि वैकल्पिक राजनीति ही करेगी और आने वाले दिनों में देश का नेतृत्व भी करेगी।

  दिल्ली में प्रबुद्ध से लेकर आम मतदाताओं ने यही देख-समझकर आम आदमी पार्टी को अपनाया है क्योंकि ‘आप’ देश के सामने वैकल्पिक राजनीति पेश कर रही है।


’आप’ को जातपात से ऊपर उठकर मिले वोट

  याद रखने की बात है कि ‘आप’ को लोगों ने जातपात से ऊपर उठकर वोट दिये हैं। जब भी बेहतर विकल्प लोगों को दिखा है, इस देश के लोगांे ंने जातपात तथा अन्य लाभ-लोभ-दबाव से ऊपर उठकर ही वोट दिया है। हां, जब विकल्पों के बीच अंतर कम हो तो लोगों का एक हिस्सा संकीर्ण स्वार्थों में लिप्त हो जाता है। वही हिस्सा कभी -कभी चुनावों में निर्णायक भी हो जाता है।


1967, 1977 और 1989 में नेताओं ने दिया धोखा

  इससे पहले 1967, 1977 और 1989 मेंे भी देश के अधिकतर लोगों ने वैकल्पिक राजनीति की उम्मीद में संकीर्णता से ऊपर उठकर मतदान किये थे। 1967 के नेता डा. राम मनोहर लोहिया, 1977 के नेता जय प्रकाश नारायण और 1989 के नेता वीपी. सिंह थे। पर इस देश के जनतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही कि तीनों बार लोगों ने नेताओं से अंततः धोखा ही खाया। उम्मीद की जानी चाहिए कि आम आदमी पार्टी से उन्हें धोखा नहीं मिलेगा।

1967, 1977 और 1989 में आम लोगों ने मूलतः सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ मतदान किये थे। दरअसल किसी गरीब देश में सरकारी भ्रष्टाचार ही अन्य कई गंभीर समस्याएं भी पैदा कर देता है। 1967 के चुनाव में तो नौ राज्यों से कांग्रे्रेस का एकाधिकार खत्म हुआ था, पर 1977 में तो केंद्र से ही उसका एकाधिकार समाप्त हो गया था। 1984 में चार सौ से अधिक लोकसभा सीटें जीत चुकी कांग्रेस 1989 में बुरी तरह हार गई थी। बोफोर्स भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों का गुस्सा इतना अधिक था।


आज कदम-कदम पर भ्रष्टाचार

 अब तो कदम -कदम पर बोफोर्स हैंं। आज इस देश की अधिकतर जनता यह चाहती है कि काला धन, भ्रष्टाचार, सत्ताधारियों के अहंकार, वंशवाद और चमचागिरी से देश को जल्द मुक्ति मिले। गरीब से लेकर अमीर जनता तक से  टैक्स में मिले पैसे जनता के लिए ही खर्च हों। वे घोटालों की भेंट नहीं चढे़। इस पृष्ठभूमि में आज मोदीत्व बनाम कांग्रेस के बीच ‘आप’ उम्मीद की नयी किरण बन कर उभरी है।

( 9 दिसंबर 2013 के जनसत्ता से साभार)

देश ही नहीं, खुद के साथ भी मनमोहनी धोखा

 प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इतिहास किस रूप में याद करेगा? उनकी उपलब्धियों और विफलताओं को कसने के लिए कई अन्य कसौटियां भी होंगी। पर, उन्हें इस रूप में अधिक याद किया जाएगा कि उन्होंने इस गरीब देश के साथ -साथ खुद अपने साथ भी न्याय नहीं किया।
   
 सर्वाधिक घोटाले वाली सरकार चला रहे मनमोहन सिंह के खिलाफ अब तक नाजायज तरीके से पैसे कमाने का आरोप या सबूत सामने नहीं आया है। तो फिर सबसे भ्रष्ट सरकार के ‘सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री’ आखिर
अपने पद पर क्यों बने हुए हैं ?

     आखिर क्यों वह ‘ईमानदारी के साथ’ अपनी सरकार से बेईमानी करवा रहे हैं ? क्या वे ऐसा किसी अन्य शक्ति के आदेश पर बेमन से कर रहे हैं ? अपनी ही पुरानी मान्यताओं व बयानों के खिलाफ वह रोज -रोज कदम उठा रहे हैं ?

     यह बात मानी हुई है कि उनके पास कुर्सी जरूर है, पर सत्ता कहीं और है। तो फिर वह उस कुर्सी पर क्यों बैठे हुए हैं जिसकी ताकत का वे देश के भले के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते ? क्या सिर्फ कुर्सी पर बैठे रहने का मोह उनके लिए इतना बड़ा मोह होता है कि वर्षों से जतन से बनाई हुई अपनी ही छवि को खुद ही ध्वस्त कर दिया जाए ?

    अब तक यह धारणा रही है कि कोई भी सत्ताधारी नेता लूट में हिस्सा मिले बिना बेईमान लोगों का साथ नहीं देता। पर मनमोहन सिंह ने इस धारणा को भी गलत साबित कर दिया। इस रूप में वह याद किये जाएंगे। वह एक और कारण से भी इतिहास में याद किये जाएंगे। उन्होंने इस धारणा को भी झूठा साबित कर दिया कि किसी सरकार के शीर्ष पद पर बैठे किसी ईमानदार व्यक्ति की ईमानदारी का सुप्रभाव उसके अधीनस्थ लोगों पर भी थोड़ा जरूर पड़ता है।
     मनमोहन सिंह के मामले में गंगा उल्टी दिशा में बह रही है। मनमोहन यह कहकर साफ बच निकलना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार गठबंधन युग की मजबूरी है। क्या मनमोहन सिंह कहीं और से आदेश पाकर अपनी सरकार से ईमानदारी पूर्वक बेईमानी करवा रहे हैं ?
 
 इतिहास इस सवाल का भी जवाब ढूंढ़ेगा।

     कोई नेता अपनी ही बातों को बाद में किस तरह चबा जाता है, उसका उदाहरण संासद क्षेत्र विकास फंड है। एक विवादास्पद परिस्थिति में 23 दिसंबर 1993 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने सांसद फंड की शुरुआत की थी। उससे ठीक पहले राम जेठमलानी ने आरोप लगाया था कि नरसिंह राव को शेयर दलाल हर्षद मेहता ने एक करोड़ रुपये की रिश्वत दी थी। वह रकम नंदियाल लोकसभा उपचुनाव में खर्च करने के लिए नरसिंह राव को दी गई थी।

     राव नंदियाल से उपचुनाव जीत कर लोकसभा में पहुंचे थेे। 1991 का आम चुनाव उन्होंने नहीं लड़ा था, पर गैर सांसद नरसिंह राव को विशेष राजनीतिक परिस्थितियों में प्रधानमंत्री बना दिया गया था। जब हर्षद मेहता का आरोप नरसिंह राव पर लगा तो शायद राव साहब ने यह सोचा होगा कि संासद फंड शुरू करा कर ऐसा ही आरोप अन्य सांसदों पर भी लगते रहने का रास्ता बना दिया जाए ताकि हम पर लग रहे आरोप की तीव्रता कम हो जाए। एक बात और थी। नरसिंह राव की सरकार को लोकसभा में बहुमत का समर्थन हासिल नहीं था। सांसद फंड के जरिए सांसदों को खुश करना जरूरी था।

याद रहे कि यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि संासद फंड घोटाले में सारे सांसद फंसे रहते हैं। अनेक सांसदों पर आरोप तो लगत ही रहते हैं।

  मनमोहन सिंह राव सरकार में वित्त मंत्री थे। वे ऐसे फंड के सख्त खिलाफ थे। इसलिए मनमोहन सिंह जब विदेश दौरे पर थे, जानबूझकर उस समय नरसिंह राव ने इस फंड की शुरुआत की थी। बाद की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इस फंड को एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर दो करोड़ रुपये सालाना कर दिया।


शुरू में सांसद फंड का विरोध, बाद में खुद ही बढ़ा दिया फंड

     सन् 1998 मेंं राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता मनमोहन सिंह ने इस फंड की बढ़ी राशि का विरोध करते हुए तत्कालीन अटल सरकार से कहा था कि ‘आप चीजों को इसी रास्ते पर जाने देंगे तो जनता नेताओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास खो देगी। संसद में इस मुद्दे पर कपिल सिब्बल ने भी तब कहा था कि ‘पब्लिक फंड का इस्तेमाल प्राइवेट उद्देश्यों के लिए हो रहा है और हम भ्रष्टाचार के नये मील के पत्थर को पार कर रहे हैं।’ तब की अटल बिहारी सरकार ने एक करोड़ रुपये से बढ़कर दो करोड़ सालाना किया था।

   पर वही मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने 2011 में सांसद फंड की राशि दो करोड़ रुपये से बढ़ा कर पांच करोड़ रुपये कर दी। या यूं कहें कि उन्हें करनी पड़ी। जबकि योजना आयोग ने इस बढ़ोतरी का विरोध किया था।

  यह बात गौर करने लायक है कि एक संसदीय समिति ने इसे बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये सालाना कर देने की सिफारिश की थी। इस बात के लिए आप मनमोहन को जरूर धन्यवाद दे सकते हैं कि उन्होंने दस करोड़ के बदले पांच करोड़ ही किया।

   सन् 1993 में जब पी.वी. नरसिंह राव की सरकार ने सांसद क्षेत्र विकास निधि की शुरुआत की थी, तभी कुछ लोगों ने यह आशंका जाहिर की थी कि यह निधि इस देश की राजनीति की शुचिता के लिए घातक साबित होगी।

   मनमोहन सिंह की तब यह राय थी कि सांसद फंड में जो पैसे खर्च किये जाने हैं, उसको लेकर एक चुनाव फंड बनाया जाए जिसे दलों या उम्मीदवारों को खर्च करने के लिए सरकार दे दिया करे। इससे राजनीति में शुचिता आएगी। पर प्रधानमंत्री बनने के बाद वह काम मनमोहन नहीं कर सके। यानी उन्हें गद्दी पर बैठाने व बनाये रखने में मदद करने वाले दूसरे लोगों के इशारे पर मनमोहन सिंह फैसले करते रहे।

   इस रूप में इतिहास उन्हें याद रखेगा। किसी ने ठीक ही कहा है कि जीवन लंबा नहीं बल्कि ऊंचा होना चाहिए। मनमोहन ने अपनी कुर्सी की अवधि को लंबा करने के लिए अपनी खुद की ऊंचाई को भी घटा लिया। इस रूप में भी वे याद किये जाएंगे। जवाहर लाल और इंदिरा के बाद मनमोहन सिंह सर्वाधिक लंबे समय तक प्रधानमंत्री बनने के लिए याद किये जाएंगे। पर ऐसी लंबाई का क्या मतलब कि जिससे आम लोगों को कोई फायदा नहीं हो।


सांसद फंड गले में हड्डी

  याद रहे कि संासद फंड राजनीति के गले में हड्््डी की तरह अटक गया है। अब इसे न तो उगलते बनता है और न ही निगलते। जबकि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस देश में जन अभियान चल रहा है। इस बीच इस फंड में कमीशन की बंदरबांट के लिए जहां -तहां तपे- तपाये राजनीतिक कार्यकर्ता अभिकर्ता बन रहे हैं। फंड की ठेकेदारी हासिल करने के लिए जहां-तहां गोलियां चल रही हैं और हत्याएं हो रही हैं। कुछ साल पहले स्टिंग आॅपरेशन में समाजवादी सांसद साक्षी महाराज सांसद फंड के घोटाले के सिलसिले में रंगे हाथ पकड़े गये। इस कारण उनकी सदस्यता भी चली गई। इससे जुड़े हुए निहितस्वार्थ का हाल यह है कि देश के अधिकतर नेता और दल ऊपरी तौर पर तो इस फंड को समाप्त करने की मांग करते हैं, पर समाप्त करने के बारे में फैसला करने का जब वक्त आता है तो वे बहाना बनाकर साफ मुकर जाते हैं। यह सब जानते हुए भी मनमोहन ने फंड की राशि बढ़ा दी।

  अधिक उम्मीद तो इसी बात की है कि 2014 के चुनाव के बाद मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। यदि ऐसा होने वाला है तो मनमोहन की गद्दी कुछ महीनों तक ही रहेगी। ऐसे में उनके पूरे कार्यकाल का आकलन करना मौजू होगा।


प्रधानमंत्री के रूप में फ्लाप

  मनमोहन सिंह का जन्म पश्चिमी पंजाब में 1932 में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। विभाजन के समय मनमोहन का परिवार अमृतसर आ गया था। पढ़ाकू विद्यार्थी मनमोहन ने आॅक्सफोर्ड से अर्थशास्त्र में डाक्टरेट किया। उन्होंने 1966 से 1969 तक यूनाइटेड नेशन्स में काम किया। बाद में तत्कालीन विदेश व्यापार मंत्री ललित नारायण सिंह ने उन्हें अपने मंत्रालय में सलाहकार बना कर स्वदेश बुलाया।

     1991 में वित्त मंत्री बनने के पहले वे भारत सरकार में कई पदों पर रहे।  वित्त मंत्री के रूप में उनके कामों की कई हलकों में सराहना ही हुई।
पर प्रधानमंत्री के रूप में वे फलाॅप रहे। ऐसा नहीं कि मनमोहन सरकार ने कोई अच्छा काम नहीं किया। ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, आधार कार्ड, मनरेगा और सूचना अधिकार कानून सरकार के अच्छे काम माने गये। पर अधिकतर अच्छे कामों का श्रेय सोनिया गांधी के नतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने ले ली और बुरे कामों या फिर विफलताओं के जवाब देने का भार मनमोहन सिंह पर सौंप दिया गया।

     ऐसे में यदि मनमोहन ने अधिकतर समय मौन धारण किया तो इसमें आश्चर्य की कौन सी बात है ? यह कोई अजूबी बात नहीं है कि मनमोहन सिंह का एक नाम मौन मोहन सिंह के रूप में भी प्रचलित हुआ।


प्रधानमंत्री पद और कैबिनेट की संस्था की प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़

  राहुल गांधी ने तो अपनी छवि चमकाने के लिए हाल में मनमोहन सिंह व प्रधानमंत्री पद और कैबिनेट की संस्था की प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ भी कर दिया। राहुल ने उस अध्यादेश को सार्वजनिक रूप से बकवास बता था जो सांसदी बचाने के लिए तैयार किया गया था। उस अध्यादेश को वापस ले लेना पड़ा।

     इसपर राजनीतिक व गैर राजनीतिक हलकोंं में यह चर्चा थी कि यदि मनमोहन की जगह थोड़ा भी स्वाभिमान रखने वाले कोई अन्य नेता होता तो प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देता। पर जिस तरह किसी गैर सरकारी संस्थान में अपने बाॅस की सारी फटकार सुनकर कोई निम्न श्रेणी का कर्मचारी नौकरी में बने रहता है, उसी तरह मनमोहन ने अपनी गद्दी बचाई भले प्रतिष्ठा तार-तार हो गई हो। इसके साथ लोकतंत्र, कैबिनेट प्रणाली  और प्रधानमंत्री पद की संस्था की इज्जत भी मिट्टी में मिला दी गई।

 अब ऐसे प्रधानमंत्री को इतिहास किस रूप में याद करेगा, इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए दिमाग पर बहुत जोर डालने की कोई जरूरत नहीं है। मनमोहन सिंह सरकार का कार्यकाल इस देश के इतिहास का सर्वाधिक भ्रष्ट सरकार का कार्यकाल माना जाएगा।




सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप झुठलाए, कोर्ट में सही साबित हुए

    लगभग सारे भ्रष्टाचारों के आरोपों को मनमोहन सरकार सार्वजनिक रूप से झुठलाती रही। पर जब उन्हीं मामलों में अदालतों ने आदेश दिये तो उनकी जांच हुई। आरोपित जेल गये या फिर पद से हटाए गए।

  इस मामले में इतिहास मनमोहन सरकार को सर्वाधिक बेशर्म सरकार के रूप में भी याद करेगा।कुल मिलाकर महंगाई,गिरती अर्थ व्यवस्था,भ्रष्टाचार और कुशासन के लिए मन मोहन सरकार तब तक याद की जाएगी जब तक कि इससे भी बदतर कोई सरकार न आ जाए।