Tuesday, December 22, 2015

नीतीश के प्रामाणिक नेतृत्व के कारण महागठबंधन का फैलाव अधिक आसान

   जदयू ने बिहार के  बाद अब पूरे देश में राजग विरोधी दलों का महागठबंधन खड़ा करने का निर्णय किया है। बिहार की चुनावी सफलता के बाद यह स्वाभाविक है। साथ ही, यह मौजू भी है। क्योंकि राजग राष्ट्रीय स्तर पर भी पहले की अपेक्षा अब कमजोर पड़ रहा है। नरेंद्र मोदी की तेजस्विता भी मद्धिम पड़ रही है।

जिन भारी-भरसक घोषित-अघोषित वायदों के साथ नरेंद्र मोदी सत्ता में आये थे, उन्हें पूरा करने में राजग सरकार को अब तक सीमित सफलता ही मिल सकी है। मोदी जी समस्याओं की सर्जरी के बदले उनका होमियोपैथी इलाज कर रहे हैं। ऐसे में देरी होती है। लोगों को उतना धैर्य नहीं होता। हालांकि लोगबाग अभी उनसे निराश नहीं हुए हैं, पर केंद्र की राजग सरकार के प्रति समर्थन के उत्साह में कमी आ रही है। यदि आने वाले महीनों में मोदी सरकार ने जनहित में कुछ चैंकाने वाले काम नहीं किये तो राजग के लिए महंगा पड़ेगा।

लोकतंात्रिक व्यवस्था की यह मांग है कि इस बीच मजबूत विकल्प खड़ा किया जाये। अब अकेले कांग्रेस तो विकल्प बनने की स्थिति में बिलकुल नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि कांग्रेस के अनेक बड़े नेता भ्रष्टाचार, संपत्ति विवाद और अन्य तरह के गैर राजनीतिक आरोपों को लेकर बचाव की मुद्रा में हैं। 

ऐसी ही स्थिति में यानी महाघोटालों के गंभीर आरोपों के बीच 2014 के लोकसभा चुनाव में मनमोहन सरकार को जनता ने धूल चटा दी। यानी भ्रष्टाचार के आरोपों से सने नेताओं और दलों को आम तौर पर जनता सत्ता नहीं सौंपती जब तक कि उनका कोई मजबूत जातीय वोट बैंक नहीं हो।

  कभी कांग्रेस का अपना मजबूत जातीय वोट बैंक हुआ करता था। पर वह कई कारणों से छिजता चला गया। अब कांग्रेस यदि किसी गठबंधन में राष्ट्रीय स्तर पर भी सहयोगी रोल में ही रहे तो बेहतर होगा। कांग्रेस की यह कमजोरी भी खुलकर सामने आ रही है कि उसका अपना नेतृत्व न तो प्रामाणिक है और न ही कल्पनाशील। वंशवाद की यही तो सबसे बड़ी बुराई है। उसमें लचर नेतृत्व को भी पार्टियां ‘ढोती’ हैं।

      इधर जदयू के पास नीतीश कुमार के रूप में एक प्रामाणिक नेता  उपलब्ध है। किसी अन्य नेता की अपेक्षा नीतीश कुमार के नाम पर देश के अधिकाधिक दलों को जुटा लेने की अधिक संभावना है।

  वैसे जदयू यह जरूर कहता है कि नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। खुद नीतीश कुमार ने भी कभी यह नहीं कहा कि वे इस पद के उम्मीदवार हंै। पर उनके समर्थक और प्रशंसक यदि ऐसा कहते हैं तो वैसा कहने का समय अब आया है।

  ऐसा कहने का समय तब नहीं था जब गत लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी यू.पी.ए. सरकार के साथ चुनावी मुकाबले में थे।

महा भ्रष्टाचार और एकतरफा व ढोंगी धर्मनिरपेक्षता की नीति पर चल रहे यू.पी.ए. सरकार के खिलाफ नरेंद्र मोदी इस देश के अधिकतर मतदाताओं को बेहतर लगे। नरेंद्र मोदी के पास भाजपा के रुप में  एक मजबूत पार्टी भी थी जिसमें लोगों ने कांग्रेस का विकल्प देखा। पर 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या होगा ? राजग सरकार और नरेंद्र मोदी की छवि में छीजन जारी रही तो लोगबाग विकल्प खोजेंगे ही। 

  हालांकि अभी तो असम, पश्चिम बंगाल (2016) और उत्तर प्रदेश (2017) जैसे प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों के राजनीतिक दलों यह तय करना है कि वे अकेले लड़ेंगे या बिहार माॅडल अपना कर प्रतिद्वंद्वी दलों को पराजित करेंगे।

 इन राज्यों में महागठबंधन के गठन की राह में बाधाएं हंै। क्योंकि वहां नेताओं के बीच व्यक्तिगत अहं का भीषण टकराव है।

 हालांकि असम में महागठबंधन की राह आसान हो सकती है। वैसे कुल मिलाकर महागठबंधन के नेताओं खासकर नीतीश कुमार का राजनीतिक कौशल में कसौटी पर होगा। यदि इन राज्योंे में सफलता मिल गई तो 2019 का चुनाव महागठबंधन के लिए आसान हो जाएगा।

महागठबंधन का अंतिम लक्ष्य 2019 का लोकसभा चुनाव रहेगा।

 तब यदि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग को चुनावी सफलता नहीं मिलती है तो गैर राजग दलों में से ही किसी न किसी नेता को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिलेगा।

 देश के विभिन्न नेताओं की छवि और उपलब्धियों के तुलनात्मक अध्ययन के बाद अधिकतर राजनीतिक प्रेक्षक इस नतीजे पर आसानी से पहुंच सकते हंै कि नीतीश कुमार का स्थान सबसे ऊपर रहेगा। यह बिहार के लिए भी गौरव की बात है। यदि नीतीश प्रधानमंत्री बने तो वे बिहार से पहले पी.एम. होंगे।

हालांकि तब भी नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं, यह अन्य अनेक बातों पर निर्भर करेगा।

  इस देश के छह पूर्व मुख्यमंत्री अब तक प्रधानमंत्री बन चुके हैं। वे हैं मोरारजी देसाई (बंबई), चरण सिंह व वी.पी. सिंह (उत्तर प्रदेश), नरसिंह राव (आंध्र प्रदेश), एच.डी. देवगौड़ा (कर्नाटका) और नरेंद्र मोदी (गुजरात)।

इसलिए यह सवाल उठाना भी बेमानी है कि कोई क्षेत्रीय नेता, प्रधानमंत्री के रूप में कितना ठीक रहेगा।

    यहां यह कहना प्रासंगिक होगा कि जो लोग गत लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री मेटेरियल बता रहे थे, वे जल्दीबाजी कर रहे हैं। क्योंकि देश की उम्मीदों के केंद्र नरेंद्र मोदी की तेजस्विता तब तक मद्धिम नहीं पड़ी थी।

  हाल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि जिस अनुपात में सत्ताधारी नेता का करिश्मा कम होने लगता है, उसी अनुपात में मुख्य प्रतिद्वंद्वी दल के नेता की छवि भी निखरती है। यदि महागठबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने में नीतीश कुमार सफल हो गये तो राष्ट्रीय स्तर पर मुख्य प्रतिद्वंद्वी नीतीश कुमार बन सकते हैं।

  यहां यह मानकर भी चला जा रहा है कि कांग्रेस के बड़े -बड़े नेताओं को विवादास्पद कानूनी परेशानियों से अगले लोकसभा चुनाव तक शायद फुर्सत नहीं मिल पाएगी। 

  कुल मिलाकर आने वाली राजनीति के संकेत यह हैं कि महागठबंधन के कारगर विस्तार व चुनावी सफलता का श्रेय बिहार के नेता को मिल सकता है। पर इसके साथ एक शर्त है। इस बीच बिहार की नीतीश सरकार और भी बेहतर काम करे। शर्त यह है कि कांग्रेस तथा राजद के राज्य भर के छोटे- बड़े नेतागण सुशासन और न्याय के साथ विकास के काम में नीतीश कुमार का पूरे दिल से साथ देते रहें। अब तक राजद और कांग्रेस ने अच्छे संकेत दिए हैं। पर पता नहीं  आगे क्या होगा! नीतीश सरकार की उपलब्धियां  2019 के लोकसभा चुनाव में राजग विरोधी दलों के काम आएंगीं। गुजरात की उपलब्धियों की पृष्ठभूमि में लोगों ने 2014 में नरेंद्र मोदी को हाथों-हाथ लिया था। क्या ऐसा हो पाएगा ?  

(22 दिसंबर, 2015 के दैनिक भास्कर,पटना से साभार) 
  
  

संसदीय सक्रियता बढ़ जाने से कम हो जाएगी अदालती अति सक्रियता

  सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाइयों को लेकर दो बड़ी और महत्वपूर्ण खबरें आई हैं। एक उदासी की है तो दूसरी खुश करने वाली।

  सुप्रीम कोर्ट ने बिहार और ओडिसा के उस कानून को वैध करार दे दिया जिसमें आरोपित की संपत्ति जब्त करने की व्यवस्था की गई है। अदालत ने कहा कि ‘रिश्वतखोरी जैसी सामाजिक बुराई अब राष्ट्रीय आतंकवाद का रूप ले चुकी है।’

  याद रहे कि बिहार विशेष अदालत अधिनियम, 2009 के तहत कई बड़े अफसरों की संपत्ति जब्त की जा चुकी है।

 अदालत के ताजा निर्णय के बाद यह उम्मीद है कि भ्रष्टाचार के  मुकदमे झेल रहे लोगों की संपत्ति जब्त करने के काम में तेजी आएगी।

  याद रहे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अक्सर कहते रहे हैं कि भ्रष्टाचार के प्रति हमारी शून्य सहनशीलता की नीति है। यह अच्छी बात है कि उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी मुख्यमंत्री की बात दुहरायी है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में लाल किले के भाषण में कहा था कि जब कोई व्यक्ति किसी काम से किसी अफसर के यहां जाता है तो अफसर पूछता है कि ‘इसमें मेरा क्या ?’ पर जब उसे पता चलता है कि उसमें उसे कुछ नहीं मिलने वाला है तो वह कहता है कि ‘तो फिर मुझे क्या ?’

यानी कुछ नहीं मिलेगा तो वह काम नहीं करेगा। प्रधानमंत्री ने यह कहकर इस बात की जरूरत बताई कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाइयां करने की कितनी अधिक जरुरत है।

  पिछले कुछ वर्षों में इस देश की विभिन्न अदालतों ने भ्रष्टाचार के आरोपों में प्रभावशाली लोगों के खिलाफ चल रही सी.बी.आई. जांच की निगरानी की है। जानकार लोग बताते हैं कि निगरानी के कारण ही कई मामलों में उन प्रभावशाली लोगों को जेल भिजवाया जा सका जिनके खिलाफ केस चल रहे थे।

  जिस देश की सर्वोच्च अदालत कह रही है कि भ्रष्टाचार राष्ट्रीय आतंकवाद बन चुका है, प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार पर चिंता जता रहे हैं, उसी देश की एक संसदीय समिति की एक चैंकानेवाली सिफारिश हाल में सामने आई है।

समिति ने अदालतों की न्यायिक अति सक्रियता की आलोचना की है। उसने राज्यों के विभिन्न जिलों में विशेष सी.बी.आई. अदालतें गठित किये जाने पर भी आपत्ति जाहिर की है।

  कार्मिक, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने कहा है कि ‘अदालतों की अति सक्रियता, शासन की पिरामिड व्यवस्था को और बढ़ाएगी।’

  यह बात सही है कि आज सभी तरह के अपराधों की जांच की मांग सी.बी.आई. से कराने की मांग की जाने लगी है। संसदीय समिति को इस बात पर पहले विचार कर लेना चाहिए था कि ऐसा क्यों हो रहा है ?

क्यों लोगों को राज्य पुलिस पर विश्वास नहीं रहा? क्या इसलिए कि अधिकतर राज्यों में पुलिस राजनीतिक कार्यपालिका के हाथों की कठपुतली बन चुकी है ?

पुलिस सुधार के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निदेशों का पालन करने में राज्य सरकारों को आखिर क्या दिक्कतें हैं ?

  क्यों सी.बी.आई. को यदाकदा पिजड़े का तोता बना दिया जाता है?

जब पुलिस लाचार और सी.बी.आई. तोता हो तो अदालती निगरानी के सिवा कौन सा रास्ता बचता है ?

 आंकड़े बताएंगे कि जिन हाई प्रोफाइल मामलों में अदालती निगरानी नहीं रही, उन मामलों का क्या हश्र हुआ और जिनमें निगरानी रही, उनका क्या हुआ?

 जहां संस्थाएं अपना काम नहीं कर रही हों, वहां उनका काम कोई और करेगा ही। शून्य तो कहीं नहीं रहेगा।

 संसदीय समिति को इस बात की भी जांच करनी चाहिए कि राज्य पुलिस कितने प्रतिशत मुकदमों में अदालतों से सजा दिलवा पाती है और सी.बी.आई. के मामलों में यह प्रतिशत कैसा है। याद रहे कि  सी.बी.आई. द्वारा तैयार मुकदमों में सजा का प्रतिशत काफी अधिक है। जिन मामलों में अदालतें निगरानी करती हैं, उनमें तो सजा का प्रतिशत और भी अधिक होता है।

  क्या सी.बी.आई. गलत लोगों को सजा दिलवाती है? यदि ऐसा नहीं है तो भ्रष्टाचार के आतंकवाद से लड़ने के लिए संसद का क्या और कितना योगदान है, जरा इस पर भी विचार होना चाहिए।

 चीन में एक कहावत है कि भारत अपने बजट का पैसा एक ऐसे लोटे में रखता है जिसमें अनेक छेद होते हैं। अस्सी के दशक मेंे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी कहा था कि हम एक रुपए दिल्ली से भेजते हैं, उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही गांवों तक पहुंचते हैं। जब सरकारी साधनों की इस तरह लूट जारी रहेगी तो गरीबी कम नहीं होगी। गरीबी कम नहीं होगी तो देश में व्यवस्था के प्रति आम लोगों का असंतोष बढ़ेगा। फिर क्या होगा ? 

 इन बातों से नरेंद्र मोदी के लाल किले के भाषण से जोड़कर देखें तो अदालतों की सक्रियता की और भी जरूरत महसूस होगी।

ऐसी जरूरत सांसदों को भी महसूस होनी चाहिए अन्यथा वे समय के साथ अपना महत्व खो देंगे। इस बीच कई सांसद भ्रष्टाचार के कैंसर के खात्मे की जरूरत अवश्य महसूस करते हैं। पर लगता है कि वे अल्पमत में हैं।

आज इस देश के अनेक बड़े नेताओं, अफसरों और अन्य प्रभावशाली लोगों में अपार धन खास कर रियल इस्टेट जुटाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे में कई विवेकशील लोगों को अदालती अति सक्रियता और भी जरूरी लगती है। 

  इन समस्याओं को नजरअंदाज करके संसद के अनेक सदस्यगण आए दिन सदन में हंगामा करते रहते हैं। यह सब देख कर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को हाल में कहना पड़ा कि ‘संसद में बहस होनी चाहिए, हंगामा नहीं।’

 एक बात और। यदि संसद अपना काम करती होती तो अदालतों की सक्रियता नहीं बढ़ती।

  झारखंड मुक्ति मोर्चा सांसद रिश्वत कांड मुकदमे के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट ने नब्बे के दशक में कहा था कि हम जानते हैं कि सरकार को गिरने से बचाने के लिए रिश्वत ली गयी है, पर हम कुछ कर नहीं सकते। क्योंकि संविधान का अनुच्छेद -122 हमें कुछ करने से रोकता है। संसद को चाहिए था कि वह संबंधित अनुच्छेद में संशोधन कर देती ताकि कोई सांसद सदन में वोट देने के लिए घूस ले तो वह भी सजा से नहीं बच सके।

 हवाला घोटाले के बारे में उन्हीं दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस कांड की तो सी.बी.आई. ने ठीक से जांच ही नहीं की। संसद ने सी.बी.आई.को पिजड़े का तोता बन जाने से क्यों नहीं रोका ?

याद रहे कि हवाला घोटाला सर्वदलीय घोटाला था जिसमें अनेक दलों के अनेक प्रमुख नेता लिप्त पाये गये थे। उपर्युक्त संसदीय समिति के सदस्यों को इस बात की जांच कर लेनी चाहिए थी कि पिछले कुछ दशकों में  समय -समय पर विभिन्न घोटालों की जांच के लिए गठित संसदीय समिति किस नतीजे पर पहुंची और जब उन्हीं मामलों की जांच जब सी.बी.आई. ने की तो क्या नतीजा निकला। 


(15 दिसंबर 2015 के दैनिक भास्कर,पटना से साभार)     
   

सही सबक के लिए परिणाम का वस्तुपरक आकलन जरूरी

बिहार चुनाव का नतीजा एक महीना पहले आ गया था। इतना समय बीत जाने के बावजूद उसके नतीजों के कारणों को लेकर कुछ हलकों में अब भी कन्फ्यूजन बना हुआ है। या, फिर  यह कन्फ्यूजन भी राजनीतिक ही है?

  इस संबंध में ताजा बयान पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती और माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य के आये हैं। जानकार लोगों के अनुसार इन बयानों से भी सही नतीजों तक पहुंचने में मदद नहीं मिलती।

 पहले के अधिकतर बयान भी ऐसे ही थे। हालांकि दोनों पक्षों में कुछ नेता ऐसे जरूर हैं जो हकीकत जानते हैं। चुनाव हारने वाले को हार के सही कारणों की जानकारी होनी ही चाहिए। इससे उसे आगे की राह तय करने में सुविधा होती है। जीतने वाले दल को आगे भी विजयी होते जाने की राह मिलती है।

पर बिहार विधानसभा चुनाव के बाद दोनों पक्षों के अनेक नेताओं को रिजल्ट के असली कारणों का पता ही नहीं है। उनके बयानों से तो यही लगता है।

  2004 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार तब लोकसभा चुनाव में हार गयी थी। उससे पहले राजग सरकार ने इंडिया साइनिंग का नारा दिया था।

अटल के कार्यकाल में कई अच्छे काम हुए भी थे। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडु की राज्य सरकार ने भी बहुत अच्छे काम किये थे। लोकसभा चुनाव के साथ ही आंध्र में विधानसभा का चुनाव भी हुआ था। तब नायडु का दल भी सत्ता से बाहर हो गया था।
तब कांग्रेस को लगा था कि विकास से वोट नहीं मिलते। अनेक बुद्धिजीवियों ने ऐसा ही प्रचार भी किया था। वे कहते थे कि दलीय व जातीय समीकरण से वोट मिलते हैं। पर,यह अधूरा सच था।

  अटल सरकार और नायडु सरकार की हार का कारण दूसरा था। उसने विकास पर तो ध्यान दिया, पर जातीय समीकरण को नजरअंदाज कर दिया। याद रहे कि आम तौर पर क्षेत्रीय दल जातीय पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं। भाजपा ने 2004 के चुनाव से ठीक पहले एक-एक करके अपने कई सहयोगी दलों को राजग से अलग हो जाने पर मजबूर कर दिया था। 2004 में आंध्र में नायडु इसलिए हारे क्योंकि अल्पसंख्यक मतदताओं ने नायडु सरकार का साथ छोड़ दिया था। नायडु के विकास की हार नहीं थी। उन्हें फिर भी 37 प्रतिशत मत मिले थे।

2004 में कांग्रेसनीत यू.पी.ए. सरकार बनी। आंध में भी कांगे्रस की सरकार बनी। इन दोनों सरकारों ने नायडु और अटल सरकारों के विकास और सुशासन से कोई शिक्षा ग्रहण नहीं की। दोनों सरकारेंं भ्रष्टाचार में डूब गयीं।

  यू.पी.ए. सरकार के कार्यकाल में महाघोटालों की बाढ़ आ गयी। साथ ही एकपक्षीय धर्मनिरपेक्षता अभियान चलाया गया। नरेंद्र मोदी ने इसका लाभ उठाया।

  बिहार की ताजा जीत में सुशासन, विकास और मजबूत सामाजिक समीकरण की मुख्य भूमिका थी। अन्य तत्वों की भूमिका कम थी। हां,नीतीश कुमार के रूप में एक प्रामाणिक नेतृत्व मतदाताओं के सामने था।

 निष्पक्ष प्रेक्षकों के अनुसार महागठबंधन की जीत में संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान ने निर्णायक भूमिका निभाई जिसमें उन्होंने आरक्षण की समीक्षा करने की जरूरत बताई थी।

 एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के अनुसार राजग को बिहार में महागठबंधन पर करीब चार प्रतिशत की बढ़त मिल रही थी। पर भागवत के आरक्षण पर लगातार तीन बयानों के बाद स्थिति बदल गयी। यहां तक कि दलितों पर भी इस बयान का असर पड़ा। इसके बावजूद नतीजे आने के बाद भाजपा के नेतृत्व से नाराज नेतागण हार के लिए नरेंद्र मोदी, अमित शाह और बिहार भाजपा के नेतृत्व को दोषी ठहराने लगे।

 हां, बिहार चुनाव का एक बड़ा सबक भाजपा के लिए है। भाजपा नेतृत्व आरक्षण के दायरे में आने वाले लोगों को अपने कर्मों के जरिए विश्वास दिलाये। यह कि न सिर्फ वह आरक्षण का बिना शर्त समर्थन करता है बल्कि उन लोगों के लिए अब कुछ अधिक ही करना चाहता है।

  एक समाजशास्त्री ने केंद्र की भाजपानीत सरकार को यह सलाह दी थी  कि वह 27 प्रतिशत आरक्षण में से अति पिछड़ों के लिए 15 प्रतिशत सीटें अलग से आरक्षित कर दे। पर केंद्र सरकार ने इस सलाह पर अभी ध्यान नहीं दिया है। सरकार को दलितों के लिए भी कुछ खास करना पड़ेगा अन्यथा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी भाजपा का हाल बिहार जैसा ही हो सकता है।

 क्या भाजपा देश की इस सामाजिक सच्चाई को अब भी समझेगी? दरअसल आरक्षण को लेकर भाजपा का इतिहास संदिग्ध रहा है। मंडल आरक्षण लागू करने वाले वी.पी. सिंह की सरकार भाजपा ने ही 1990 में गिरा दी थी।

  शायद पिछड़ों-दलितों के लिए कुछ खास करना नहीं पड़े, शायद इसीलिए भी भाजपा के अनेक नेता मोहन भागवत को जिम्मेदार नहीं मान रहे हैं। जबकि जिन भाजपा नेताओं ने अपने पुत्रों को बिहार विधानसभा चुनाव में खड़ा करा रखा था, उन्होंने जरूर भागवत को जिम्मेदार ठहराया था। ये नेता अपने पुत्र के लिए चुनाव प्रचार के दौरान जनता के काफी करीब गये थे। 

 अधिकतर भाजपा नेता तो भागवत पर अंगुली उठाने से डरते हैं। कुछ भाजपा नेताओं को नरेंद्र मोदी-अमित शाह से बदला लेने का बहाना भी  मिल गया है। 

  इसी तरह महागठबंधन के दल भी जीत के सही कारणों को नहीं समझेंगे तो उन्हें आगे भी चुनावी जीत हासिल करते रहने में दिक्कत आएगी।

 दरअसल चुनावी राजनीति के साथ समस्या यह है कि नतीजे का विश्लेषण अक्सर वस्तुपरक की जगह व्यक्तिपरक होकर किया जाता है।

   अब रही महबूबा और दीपंकर की बातें तो वे अपनी बनी-बनायी राजनीतिक लाइन के अनुसार ही बयान दे रहे थे।

 माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य राम मंदिर पर भागवत के बयान की चर्चा करते हुए हाल में कहा कि बिहार में शिकस्त  के बावजूद भाजपा ने कुछ नहीं सीखा है।

   उधर महबूबा मुफ्ती ने शनिवार को कहा कि बिहार के नतीजों ने वैसे तत्वों को अच्छा सबक सिखाया जो हिन्दुत्व के नाम पर राष्ट्रवाद का दुरुपयोग कर रहे हैं। महबूबा का इशारा भाजपा के उन कुछ अतिवादी नेताओं की ओर था जो अपने विवादास्पद बयानों से उत्तेजना पैदा करते रहते हैं। पर जानकार लोगों के अनुसार वे तत्व इस बार कोई कारगर भूमिका नहीं निभा सके। बल्कि उससे पहले लोकसभा चुनाव में वैसे बयानों ने कुछ मतदाताओं की भावनाएं भड़काई थीं। बिहार विधानसभा चुनाव में हिन्दुत्व के मुद्दों की अपेक्षा आरक्षण तथा अन्य तत्व काफी अधिक महत्वपूर्ण रहे। पर यह समझने से कुछ नेता अब भी इनकार कर रहे हैं।


           (08 दिसंबर, 2015 के दैनिक भास्कर, पटना से साभार )