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शुक्रवार, 15 जून 2018

सिर्फ अपनी अंगुलियों से बड़े -बड़े ताले खोल देने वाले एक डाकू की कहानी

बिहार के अविभाजित सारण जिले का एक डाकू कोई भी ताला किसी भी औजार की मदद के बिना ही खोल देता था। ताला कितना भी मजबूत हो, उसके लिए सिर्फ उस डाकू की अंगुलियां ही पर्याप्त थीं। अदालत इस आरोप पर भरोसा नहीं कर के हर बार उस डाकू को सजामुक्त कर देती थी।

चम्पारण जिले के एक दूसरे व्यक्ति ने एक ऐसा ताला बनाया था जिसे उसके परिवार का सदस्य ही खोल सकता है। वह ताला अब भी मौजूद है और खोलने वाला भी। दोनों कहानियां पिछली सदी की हैं।

जगन्नाथ मंदिर के खजाने की चाभी खो जाने की ताजा खबर के साथ ही उन तालों की कहानियां याद आ गईं।

सारण की कहानी तो वहां के एक मशहूर वकील हेमचंद्र मित्रा ने लिखी है। ‘मेरे संस्मरण’ नाम से उनकी किताब अंग्रेजी में छप चुकी है। मित्रा छपरा बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी थे। मित्रा ने सन 1898 में छपरा जिला अदालत में वकालत शुरू की थी। वे एक नामी व तेजस्वी वकील थे। उन दिनों अविभाजित सारण जिले के सिवान अनुमंडल के एक डाकू पर यह आरोप था कि वह मजबूत से मजबूत ताले को भी अपनी अंगुलियों से ही खोल देता था। वह इस काम के लिए किसी चाभी या किसी अन्य औजार का इस्तेमाल नहीं करता था।


सिवान के एस.डी.ओ. ने उस पर सी.आर.पी.सी की धारा -110 के तहत कानूनी कार्रवाई कर रखी थी। उसने उस कार्रवाई के खिलाफ छपरा कोर्ट में अपील की। उसने ए.एच. मित्रा को अपना वकील रखा। कोर्ट में कई गवाहों ने बताया कि वह सिर्फ अपनी अंगुलियों से ताला खोल देता हैं। मित्र ने यह दलील पेश की कि कोई भी व्यक्ति सिर्फ अंगुलियों से कोई ताला खोल ही नहीं सकता है। अनेक गवाहों को गलत बताते हुए कोर्ट ने मित्र के तर्क को माना और डाकू को रिहा कर दिया।

मेरे संस्मरण में यह कहानी लिखते समय मित्र ने लिखा कि ‘ट्रूथ इज स्ट्रेंजर दैन फिक्सन।’ मित्र ने अपनी किताब में उस डकैत का नाम नहीं लिखा है। उन दिनों फोटो का आज जैसा चलन तो था नहीं। कई महीनों के बाद वह डाकू किसी अन्य केस के सिलसिले में वकील मित्र के यहां गया। मित्र ने उससे पूछा कि क्या इस आरोप में सच्चाई भी है कि तुम सिर्फ हाथ की अंगुलियों की मदद से ही ताले खोल देते हो ?

वकील ने यह सवाल इसलिए भी पूछा क्योंकि उन्हें लगा था कि सारे के सारे गवाह झूठ तो नहीं हो सकते। इस सवाल पर उस डाकू ने मुस्कराते हुए कहा कि यह आरोप सही है। उसने मित्र से कहा कि कोई ताला लाइए। मित्र ने लिखा है कि उन्होंने एक मजबूत ताले को बंद करके उस डाकू को दे दिया। उसे उसने अपने हाथ में लिया। मित्र लिखते हैं कि मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि जब उसने अपने हाथों से ही उस ताले को तुरंत खोल दिया। उसने मेरी आंखों के सामने ही यह काम इतनी जल्द कर दिया कि मैं कुछ समझ नहीं पाया।

पांच किलोग्राम का ताला, जिसे कोई खोल नहीं सकता था

कुछ इसी तरह की कहानी संदीप भास्कर ने हाल में टेलिग्राफ में लिखी है। सन 1940 में बेतिया के नारायण प्रसाद ने 5 किलोग्राम का एक ताला बनाया था। उस ताले की खूबी यह है कि उसे नारायण प्रसाद के सिवा कोई और नहीं खोल सकता था। बाद में नारायण प्रसाद ने यह हुनर अपने पुत्र लाल बाबू को सिखा दिया। अब वह अजूबा ताला सिर्फ लाल बाबू या उनके कोई परिवारीजन ही खोल सकते हैं। दरअसल उसे खोलने के लिए एक खास तरह की ‘हाथ की सफाई’ चाहिए। वह कौशल सिर्फ उस परिवार को ही हासिल है।

1940 में बेतिया के महाराजा ने एक प्रदर्शनी आयोजित की थी। नारायण प्रसाद ने उस ताले को  उस प्रदर्शनी में शामिल किया। महाराजा ने घोषणा की कि जो भी उस ताले को खोल देगा, उसे चांदी के 11 सिक्के दिए जाएंगे। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला। लाल बाबू के अनुसार महाराजा ने उस ताले को खरीदने की इच्छा जाहिर की। नारायण प्रसाद ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।

इतना ही नहीं 1972 में गादरेज इंडिया लिमिटेड ने उस ताले के पेटेंट का अधिकार मांगा। उसके बदले 1 लाख रुपए देने का आॅफर दिया। पर नारायण प्रसाद को यह स्वीकार नहीं था। दरअसल नारायण का परिवार उस हुनर को अपनी संतानों तक ही सीमित रखना चाहता है।

1972 में तत्कालीन मुख्यमंत्री केदार पांडेय ने जो चम्पारण जिले के ही मूल निवासी थे, ताला व राइफल कारखाना खोलने में मदद करने का इस परिवार को आश्वासन दिया था। पर वह पूरा नहीं हो सका। लालबाबू के अनुसार कुछ पैसे तो एकत्र किए गए, पर कारखाने के लिए वे काफी नहीं थे। आश्चर्य है कि बाद के मुख्यमंत्रियों का ध्यान भी उस परिवार के इस हुनर की ओर  नहीं गया!   

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

भ्रष्टाचारियों से सार्वजनिक धन बचाने की समस्या

मेरी समझ से भ्रष्टाचार इस गरीब देश की सबसे बड़ी समस्या है। इसी समस्या से अन्य अनेक तरह की समस्याएं पैदा होती रहती  हैं।

मैं 1967 से लगातार सरकारों और नेताओं को कभी नजदीक और कभी दूर से देखने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं।पहले राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप में और बाद में पत्रकार की भूमिका  में।

भ्रष्टाचारवाद यानी पैसावाद यानी धन लोलुपतावाद  ने सभी राजनीतिक विचारधाराओं और वादों को लगभग पछाड़ दिया है।यदि यह जारी रहा तो भविष्य में भ्रष्टाचार और भी घृणित खेल दिखाएगा।

अपवादस्वरूप कई ईमानदार नेताओं को भी देखा है,पर पूरी व्यवस्था में आम तौर पर वे कारगर नहीं हो पाते।क्योंकि वे अल्पमत में होते हैं। चूंकि हर जाति और समुदाय में अच्छे -बुरे लोग हैं,इसीलिए भ्रष्ट लोगों में भी हर जाति और समुदाय के लोग हैं।

आम लोगों में से जो लोग अपनी अगली पीढि़यों के लिए एक बेहतर देश और समाज छोड़कर जाना चाहते हैं,उन्हें मेरी राय में एक काम जरूर करना चाहिए। राष्ट्री स्तर पर  और हर राज्य के पांच सबसे भ्रष्ट नेताओं की पहचान कर उनके खिलाफ अभियान चलाना चाहिए।और इसी तरह पांच सबसे कम भ्रष्ट या ईमानदार नेताओं को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि वे जनहित में और भी अच्छे काम कर सकें।

यदि ऐसा हुआ तो बीच के नेता खुद ही सबक ले लेंगे। यदि नेता सुधर गए तो उसका असर ब्यूरोक्रेसी और अर्थ जगत पर भी पड़ेगा।

 दरअसल ब्यूरोक्रेसी घोड़ा है और सत्ताधारी नेता सवार। सत्ताधारी जमात  किसी भ्रष्ट अफसर को सजा दे सकती है,पर कोई अफसर किसी भ्रष्ट मंत्री को उसके पद से नहीं हटा सकता।

भ्रष्टाचार नामक गंभीर बीमारी के कुछ प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं-

1.-सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि भ्रष्टाचार तो विश्व व्यापी है,इसलिए यदि इस देश में भी है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।उन्होंने यह भी कहा था कि मेरे पिता संत थे,पर मैं पालिटिशियन हूं।

2.-अस्सी के दशक में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि दिल्ली से सौ पैसे चलते हैं,पर उसमें से गांव में जनता तक सिर्फ 15 पैसे ही पहुंचते हैं। 85 पैसे बिचैलिए खा जाते हैं।

3.-नब्बे के दशक में जैन हवाला कांड हुआ था।कम्युनिस्टों को छोड़ कर लगभग सभी दलों के दर्जनों नामी -गिरामी  नेताओं ने हवाला कारोबारियों से रिश्वत ली।वही हवाला कारोबारी कश्मीरी आतंकवादियों को भी पैसे पहुंचाते थे।उन्हें नेताओं का संरक्षण चाहिए था,इसलिए उन्होंने रिश्वत दी थी। नेताओं को मिली अधिकत्तम राशि 10 करोड़ और न्यूनत्तम राशि 25 हजार रुपए थी। लाभान्वितों में एक पूर्व प्रधान मंत्री और कई पूर्व व वर्तमान केंद्रीय मंत्री शामिल थे।

सी.बी.आई.ने इस केस को रफा -दफा कर दिया।करना पड़ा क्योंकि इतने बड़े नेताओं पर वह कैसे कार्रवाई करती।सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में मन मसोस कर रह गया।

4.-कोई भी राजनीतिक दल आज चुनाव आयोग को अपने राजनीतिक चंदे का पूरा हिसाब देने को तैयार नहीं है।अधूरा देते हैं।यहां तक कि कम्युनिस्ट पार्टियां भी पूरा हिसाब नहीं देतीं।आखिर क्यों भाई ?

 5.-हमारे देश के प्रभावशाली नेतागण सांसद क्षेत्र विकास फंड को बंद करने के लिए तैयार नहीं हैं जबकि प्रशासनिक सुधार आयोग इसे खत्म करने की बहुत पहले सिफारिश कर चुका है।यह फंड राजनीति को दूषित करने वाला एक प्रमुख कारक बना हुआ है। 

6 - इस  देश के अधिकतर सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों के लिए दवाएं और रूई -पट्टी तक उपलब्ध नहीं है क्योंकि सरकार के पास पैसे नहीं हैं। गरीब लोग एम्बुलेंस के अभाव में अपने परिजन की लाश  ठेला और कंधे पर ढोकर ले जाने को मजबूर हैं। क्योंकि एम्बुलेंस खरीदने के लिए सरकार के पास  पैसे नहीं हैं।पर यहां  के सासंद अपने वेतन-भत्ते खुद ही बढ़ा लिया करते हैं । जहां के अधिकतर नेतागण गरीब जनता की मूलभूत समस्याओं के प्रति भी ऐसे संवेदनहीन हों,वहां भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या होगी ही।
          अब तो आम लोगों के पास भी सोशल मीडिया की ताकत उपलब्ध है। उन्हें जाति ,सम्प्रदाय और विचारधारा से ऊपर उठकर भ्रष्टाचार के राक्षसों को पहले पराजित करने की कोशिश करनी चाहिए।इस बात की परवाह किए बिना कि वे सफल होंगे या नहीं।  भले सफल नहीं हुए, पर 1857 में इस देश के बहादुर लोगों ने विदेशी ताकतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी न !
         भ्रष्टाचारियों के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ लड़ाई पूरी हो जाने के बाद  फरिया लीजिएगा कि इस देश में समाजवादी व्यवस्था चलेगी ,साम्यवादी व्यवस्था या पूंजीवादी।
        अभी तो भ्रष्टाचार के गिद्धों के चंगुल से देश के संसाधनों को बचाने की समस्या प्रमुख है।इसे बचाने की ईमानदार कोशिश नहीं करने पर अगली पीढि़यां हमें माफ नहीं करेंगी। 

रविवार, 17 मई 2009

एक विदेशी बैंक में भारत के खरबों डूबने की कहानी

यह कथा बिहार के दरभंगा की है। यह नीदरलैंड के एक बैंक में 77 अरब रुपए डूबने की कहानी है। यह धन दरभंगा के मोहम्मद मोहसिन का था। यह कहानी सन् 1984 में दरभंगा के ही एक शिक्षक वैद्यनाथ मिश्र ने इन पंक्तियों के लेखक को सुनाई थी। वे उस धन को निकालने की कोशिश करते-करते दिवंगत हो गए। अब उनके करीबी रिश्तेदार इस कोशिश में लगे हैं। पर, सफलता हाथ नहीं लग रही है।

इनके दावे में कितना दम है? ऐसे माहौल में एक बार फिर इस पुरानी कहानी पर एक नजर डालना मौजंू होगा, जब स्विस बैंकों मेें जमा भारतीयों के काला धन को लेकर इस देश में चर्चा गर्म है।

मोहसिन ने मरने से पहले वैद्यनाथ मिश्र को दान पत्र के जरिए इस विदेशी बैंक में जमा धन का उत्तराधिकारी बना दिया था। मोहसिन, मिश्र परिवार के कर्जदार थे। मोहसिन हैदराबाद निजाम के यहां जौहरी का काम करते थे। कहते हैं कि वहां से उन्होंने किसी-न-किसी तरीके से काफी हीरे -जवाहरात लाए थे। मोहसिन ने उस हीरे-जवाहरात को नीदरलैंड ट्रेडिंग एजेंसी की कलकत्ता शाखा में जमा कर दी थी। बाद में ट्रेडिंग सोसायटी एक बैंक में परिवर्तित हो गई, जिसका नाम पड़ा एल्जीमीन बैंक नीदरलैंड एन.वी।

उस हीरे -जवाहरात की कीमत आंक कर ट्रेडिंग सोसायटी ने मोहसिन को 21 अगस्त, 1923 को 21 करोड़ मार्क की रसीद दे दी थी। वह रसीद अब भी मिश्र परिवार के पास है, पर जब वैद्यनाथ मिश्र ने इस धन को विदेश से वापस लाने के लिए उस बैंक से पत्र व्यवहार शुरू किया, तो एल्जीमीन बैंक ने कभी तो लिखा कि वह लौटाने को तैयार है, तो कभी कहा कि उस रिश मार्क का अब न तो कोई विनिमय मूल्य है और न ही कोई कीमत। मोहसिन से मिश्र को इस जमा धन का उत्तराधिकार कैसे मिला? यह भी कथा के भीतर की एक कथा है।

दरअसल बड़ी संपत्ति के मालिक मोहसिन शाह खर्च निकले। अपनी जमा पूंजी खत्म हो गई, तो इस कारण वे मिश्र परिवार के कर्जदार हो गए थे। उन्होंने इसी कारण इस बैंक जमा खाते का मिश्र परिवार को लिखित तौर पर उत्तराधिकारी बना दिया। उसके बाद वैद्यनाथ मिश्र ने इस संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और बाद के अन्य सत्ताधिकारी नेताओं से बारी- बारी से गुहार लगाई। वे पैसे की वापसी की कोशिश में देश भर में चक्कर काटते रहे। इस संबंध में उचित कार्रवाई का लोगों से आग्रह करते रहे। पर सफलता नहीं मिली।

27 जुलाई, 1989 को सी.पीआई. के चतुरानन मिश्र ने यह मामला राज्य सभा में उठाया। केंद्र सरकार ने सीधा हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।पर चतुरानन मिश्र ने 18 जुलाई 1990 को संसद में धरना देने की धमकी दी, तो भारत सरकार ने जांच करके बताया कि यह मामला सिर्फ 70.80 गिल्डर का है। इतने छोटे मामले में भारत सरकार हस्तक्षेप नहीं करेगी। सन् 15 अगस्त, 1990 को भी हुकुम देव नारायण यादव के नेतृत्व में 14 सांसदों ने इस संबंध में तत्कालीन प्रधान मंत्री वी.पी. सिंह को पत्र लिखा और धन की वापसी के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया।

इस बीच वैद्यनाथ मिश्र का परिवार विभिन्न अदालतों में भी मामला दायर करता रहा, पर अब तक कोई नतीजा नहीं निकला। वैद्यनाथ मिश्र के बाद डाॅ. मुनींद्र भट्ट इस मामले का पीछा करते रहे। ं

दिल्ली हाई कोर्ट के वकील आर.के. जैन ने 1999 में मुख्य सतर्कता आयुक्त को लिखा कि वह इस बात की जांच कराएं कि इस धन के विदेश से वापस लाने में भारतीय सरकारी बैंकों ने किस तरह की लापरवाही बरती है।

इस संबंध में दरभंगा के वैद्यनाथ मिश्र के साथ इन पंक्तियों के लेखक की सन् 1984 में हुई लंबी बातचीत का विवरण यहां पेश है।

प्रश्न-आपके दावे में कोई दम भी है या फिर आप सिर्फ हवा मंे हाथ-पैर मार रहे हैं ? क्योंकि जितनी बड़ी रकम आप बता रहे हैं, वह तो अविश्वसनीय लगती है?

जवाब-मैं हवा में नहीं हूं। मेरी प्रत्येक बात ठोस सबूतों के आधार पर है। यदि एल्जीमीन बैंक समझता है कि मेरे दावे में दम नहीं है, तो वह मूल मुद्दे को अदालत के सामने क्यों नहीं आने दे रहा है ? यदि दम नहीं होगा, तो अदालत मेरे दावे को खारिज कर देगी। पर बैंक तकनीकी आधार पर प्रारंभिक दौर में ही इस मामले को खत्म करा देने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है।

प्रश्न-यह तकनीकी आधार क्या है ?

उत्तर-यही कि मैंने कोर्ट फीस जमा नहीं की है और दावे के मामले में तमादी हो चुकी है।

प्रश्न-जब आपके दावे में इतना दम है, तो फिर कोर्ट फीस की रकम जमा कर देने के लिए कोई फिनांसर मिल जाना चाहिए था?

उत्तर-इस मुकदमे के बारे में अभी लोगों को मालूम ही नहीं है। क्योंकि अखबारों ने भी अब तक इस ओर ध्यान नहीं दिया। अन्यथा कोई फिनांसर मिल जाता। वैसे तो इस केस को खुद भारत सरकार को लड़ना चाहिए था। क्योंकि प्राप्त होनेवाली रकम में से कानूनन 80 प्रतिशत तो भारत सरकार को ही मिलनी है। यह तो भारत की आर्थिक आजादी के लिए लड़ाई है, जो मैं अकेले लड़ रहा हूं।

प्रश्न-अब जरा मूल मुद्दे पर आइए। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मोहम्मद मोहसीन ने एल्जीमीन बैंक में वही जर्मन रीश मार्क जमा किया हो, जो उन दिनों हजारों में देने पर एक कप चाय मिलती थी ?

उत्तर-असंभव ! बिलकुल असंभव ! ! मरते समय मोहसिन ने मुझे बताया था कि उसने हीरे- जवाहरात ही जमा किए थे और मरते समय सामान्यतः कोई झूठ नहीं बोलता। साथ ही आपको तो मालूम ही होगा कि जर्मनी एक देश है और नीदरलैंड दूसरा देश। नीदरलंैड पर कुछ वर्षों को छोड़कर कभी किसी देश का अधिकार नहीं रहा। पड़ोस का देश होने के कारण नीदरलैंड के भारत स्थित बैंक को यह मालूम था कि जर्मन रीश मार्क को उसी देश के लोग लेने से इनकार कर रहे थे। यहां तक कि जर्मन सरकार ने रीश मार्क अस्वीकार करने के जुर्म में अपने कुछ नागरिकों को फांसी भी दे दी थी। रीश मार्क उन दिनों जर्मनी के निजी छापाखानों में भी छपने लगे थे। जर्मन सरकार भी जो नोट छाप रही थी, उस पर भी सरकार की ओर से ऐसा कोई प्रामिस नहीं होता था जैसा कि भारतीय नोट पर रिजर्व बैंक के गवर्नर की तरफ से लिखा रहता था कि ‘मैं धारक को ......रुपए अदा करने का वचन देता हूं।’ऐसी स्थिति में ऐसा हो ही नहीं सकता कि जो रीश मार्क जर्मनी में ही अस्वीकृत हो रहा हो, उसे साढ़े 4 प्रतिशत ऊंचे सूद पर कोई दूसरा देश लेता। फिर बात यह भी है कि जो मोहसिन कभी विदेश नहीं गया, वह इतना अधिक जर्मन रीश मार्क लाता कहां से? सबसे बड़ी बात यह है कि एल्जीमीन बैंक के पास यदि मोहसिन का दिया हुआ जर्मन रीश मार्क है, तो उसने 1968 में लिखित वायदा करने के बावजूद उस जमाकर्ता को लौटाया क्यों नहीं ?दरअसल बात यह है कि जौहरी मोहसिन ने हीरे-जवाहरात जमा किए थे, जिसकी कीमत मार्क में लगा कर बैंक ने रसीद दे दी थी। इतिहास बताता है कि उन दिनों मार्क नीदरलैंड में मनी आॅफ एकाउंट था।

प्रश्न - क्या आपने नीदरलैंड का आर्थिक इतिहास भी पढ़ा है ?

उत्तर-इस मामले को लेकर मैंेने इस देश के लगभग सभी पुस्तकालयों को छान मारा है। विदेशों से भी कुछ सहित्य मंगाया है । मैंने यहां तक कि जर्मन रीश मार्क का एक नोट भी जर्मनी से मंगाया है, जो उन दिनों प्रचलित था। (मिश्र ने वह नोट भी इस संवाददाता को दिखाया।)

प्रश्न-क्या यह जर्मन नोट वही नोट है, जिसे मोहसिन द्वारा जमा करने की बात एल्जीमीन बैंक कर रहा है ?

उत्तर - इसमें भी घपला है। मोहसिन ने 21 अगस्त, 1923 को जमा किया। जर्मन रीश मार्क सितंबर, 1923 में पहली बार छपा। पर उसी पर यह भी लिखा हुआ है कि यह दो वर्षों के बाद प्रचलन में आएगा, तो फिर ऐसे रीश मार्क को एल्जीमीन बैंक कैसे स्वीकार कर सकता था, जो अभी प्रचलन में नहीं था और छपा भी नहीं था ?

प्रश्न-ःक्या मार्क सिर्फ जर्मनी में ही चलता है ?

उत्तर-नहीं मार्क भिन्न-भिन्न रूपों में फ्रांस, आस्ट्रिया, फिनलैड और बावेरिया आदि देशों में प्रचलित रहा है। किस देश में मार्क का क्या रूप था, इस पर मैंने बहुत साहित्य पढ़ा है। मैं एक बार फिर कह दूं कि नीदरलैंड में मार्क मनी आॅफ एकाउंट ही था। जैसे आज भी कुछ देशों के लिए पाउंड और डाॅलर मनी आॅफ एकाउंट है, हालांकि यह वहां की करेंसी नहीं है।

प्रश्न-इस बात के आपके पास और क्या प्रमाण हैं कि मोहसिन ने नोट नहीं, बल्कि हीरे-जवाहरात ही जमा किए थे ?

उत्तर-एल्जीमीन बैंक इतना अधिक सूद (साढ़े चार प्रतिशत प्रति वर्ष) किसी कीमती सामग्री पर ही दे सकता है। मोहसिन जौहरी थे और और बाद में ‘नवाब’ हो गए थे।इसलिए उनके पास इतने हीरे-जवाहरात होना नामुमकिन नहीं था।

प्रश्न-मोहसिन ने आपको अधिकार कैसे दे दिया, जबकि उसकी बेटी का बेटा मंजुरूल हसन मौजूद है और काफी गरीबी में है?

उत्तर-मोहसिन मेरे परिवार का कर्जदार था। इसलिए उसने मरने से एक वर्ष पूर्व मेरे नाम बजाप्ता दान पत्र लिखा। फिर भी मुझे इस संपत्ति का कोई लोभ नहीं है। मैं तो इसलिए यह लड़ाई लड़ रहा हूं, ताकि यूरोप से अपने गरीब भारत को इसका वाजिब पैसा मिल जाए और यह देश के विकास के काम में खर्च हो।

प्रश्न- इस लड़ाई में आपको क्या- क्या कठिनाइयां आईं ?

उत्तर-शारीरिक और आर्थिक परेशानी के साथ- साथ मुझे जान से मारने की भी कोशिश की गई। जब मैं रिजर्व बैंक के गवर्नर से मिलने बंबई गया था, तो मेरी हत्या का प्रयास हुआ। एल्जीमीन बैंक की शाखा कलकत्ता के अलावा बंबई और मद्रास में भी है। नीदरलैंड के दिल्ली स्थित दूतावास में वार्ता के दौरान वहां का एक अधिकारी मुझ पर गोली चलाने पर अमादा हो गया था। किसी तरह जान बची। इसलिए मैं अपने शहर में भी सावधान रहता हूं। कागजात बैंक लाॅकर में रखता हूं।

प्रश्न-इस संबंध में रिजर्व बैंक और स्टेट बैंक की कैसी भूमिका रही ?

उत्तर-इन बैंकों की भूमिका पर आश्चर्य होता है। लगता है कि इनके अधिकारियों में देशप्रेम है ही नहीं। जब भी मैंने उन्हें लिखा, इन बैंकों ने बंधा -बंधाया जवाब दे दिया कि एल्जीमीन बैंक के जरिए पत्र व्यवहार कीजिए। अब भला आप ही बताइए कि जिस एल्जीमीन बैंक के विरुद्ध मैं शिकायत कर रहा हूं, उसी बैंक के जरिए इस पर कोई लाभप्रद पत्र व्यवहार कैसे हो सकता है ?

प्रश्न-मोहसिन के उस हीरे-जवाहरात की वास्तविक कीमत कितनी है ?

उत्तर-मैंने कलकत्ता के चार्टर्ड एकाउंटेंड आर.एस.पी. गुप्त एंड कंपनी से 19 जून, 1980 को इसकी गणना कराई थी। इक्कीस करोड़ मार्क की भारतीय रुपए मंे कीमत बीस अरब 49 करोड़ 60 लाख रुपए होती है। उस तारीख तक सूद की रकम 52 अरब 41 करोड़ 24 लाख 13 हजार 315 रुपए थी। अब यह राशि बढ़कर 77 अरब रुपए हो गई है। इधर मैंेने मार्क पर कुछ और साहित्य पढ़ा है। यूरोप में खास कर नीदरलैंड में एक मार्क की कीमत आठ औंस चांदी से लेकर 8 औंस सोना तक बताई गई है। सोना की बात छोड़ भी दी जाए, तो चांदी के आधार पर ही 21 करोड़ मार्क की कीमत आंकी जाए, तो वह 2 खरब 19 अरब रुपए तक पहुंच जाती है।मैं तो देश के धनवानों से अपील करता हूं कि वे इस देश को समृद्ध बनाने के लिए इसमें थोड़ा धन लगाएं।

वैद्यनाथ मिश्र से इन पंक्तियों के लेखक की बातचीत के 25 साल बीत चुके है। यदि उस धन की कीमत का आकलन आज की तारीख में किया जाए, तो उसके भारी आकार की सहज ही कल्पना की जा सकती है। मिश्र को अफसोस रहा कि इस मामले को उसकी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचाया जा सका।

साभार पब्लिक एजेंडा

रविवार, 19 अप्रैल 2009

जार्ज का एक वो भी जमाना था, एक ये भी जमाना है !

हाल में जार्ज फर्नांडीस और उनके समर्थक खुद जार्ज के लिए जदयू से एक अदद चुनावी टिकट के लिए जद्दोजहद कर रहे थे । यह दयनीय दृश्य देखकर कुछ पुराने लोगों को उनका सन् 1977 का उनका वह गौरवपूर्ण जमाना याद आ गया । तब उन्हें मुजफ्फर पुर की जनता ने 3 लाख 34 हजार मतों से जिताया था। मुजफ्फरपुर की अधिकतर जनता ने जब उन्हें जिताया, तब तक उन्हें देखा भी नहीं था। पर आज उसी जार्ज की अब कैसी स्थिति बन चुकी है ! इस पर कुछ लोगों को दया आ रही है तो कुछ लोगांे ंको गुस्सा। कई लोग यह भी कह रहे हैं कि उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी और ज्योति बसु की तरह शालीनतापूूर्वक सक्रिय राजनीति से रिटायर कर जाना चाहिए था। क्योंकि जार्ज का स्वास्थ्य सचमुच सक्रिय राजनीति करने लायक नहीं है। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि जब जार्ज चाहते थे तो जदयू को चाहिए था कि वह उन्हें टिकट दे देता।यदि किसी कारण टिकट नहीं दिया तो जार्ज को चाहिए था कि अपने लिए एक अदद टिकट के लिए बच्चे की तरह जिद नहीं करते। जार्ज देश के एक बड़े नेता रहे हैं।जब वे स्वस्थ थे तो उन्होंने अपनी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका भारतीय राजनीति में निभाई।ऐसी भूमिका, जिस तरह की भूमिका पर अधिकतर नेताओं को ईष्र्या ही हो सकती है। पर अंत में एक टिकट के लिए उनकी ऐसी दयनीय स्थिति ? इस पृष्ठभूमि में इन पंक्तियों के लेखक की वह रिपोर्ट यहां प्रस्तुत की जा रही है जो सन् 77 में जार्ज के चुनाव क्षेत्र से लिखी गई थी। मुजफ्फर पुर,13 मार्च 1977। जनता पार्टी के उम्मीदवार जार्ज फर्नांडीस के यहां सशरीर उपस्थित नहीं रहने के बावजूद लाखों मतदाताओं की जुबान पर वे छाए हुए हैं।जेल में बंद रहने के कारण लोगों में सर्वत्र उनके प्रति अतिरिक्त समर्थन और सहानुभूति देखी जा रही है।पिंजरे में बंद उनके पुतले तथा हथकड़ियों में जकड़े उनके चित्र वाले पोस्टर शासक दल के प्रति लोगों में गुस्सा पैदा कर रहे हैं। मुजफ्फर पुर संसदीय क्षेत्र के सघन दौरे के बाद यह संवाददाता इस नतीजे पर पहुंचा है कि जार्ज फर्नांडीस के चुनाव अभिकत्र्ता शारदा मल्ल के इस दावे में काफी दम है कि ‘सवाल जीत -हार का नहीं बल्कि इस बात का है कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट उम्मीदवारों की जमानत भी बच पाती है या नहीं।’ पर, जनता पार्टी के कार्यकत्र्ताओं के समक्ष एक और सवाल है कि लोगों की सद्भावना को 16 मार्च को पूरे तौर पर वोट में कैसे बदला जाए और इस सवाल का जवाब ही जनता पार्टी के भाग्य का फैसला करेगा।एक कांग्रेसी बुद्धिजीवी के अनुसार ‘भावनाओं से अधिक वस्तुगत स्थिति अधिक प्रभावकारी होगी।’ चुनाव की वस्तुगत स्थिति समझाते हुए जार्ज फर्नांडीस के सहयोगी प्रो.विनोद ने कहा कि मुजफ्फरपुर संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत 6 विधानसभा क्षेत्रों में से कुढहनी, बोचहा और सकरा से पिछले कई चुनावों से समाजवादी विधायक विजयी होते रहे हैं। मीना पुर और गायघाट में कांग्रेस पार्टी का प्रभाव रहा है, परंतु मुजफ्फरपुर नगर कम्युनिस्टों का कार्य क्षेत्र है। फिर भी कुल मिलाकर इन तीन क्षेत्रों में भी जनता पार्टी कांग्रेस और कम्युनिस्ट उम्मीदवारों से आगे है।’ प्रोफेसर विनोद के अनुसार कई स्थानों पर प्रतिपक्षियों द्वारा चुनाव में जोर-जबरदस्ती की भी आशंका है, जिसका जनता समुचित जवाब देगी। पर जनता पार्टी चुनाव कार्यालय के प्रभारी श्री नरेंद्र ने जिलाधिकारी को पत्र लिखकर मांग की है कि शहर के सर्किट हाउस के निकट निजी मकानों पर टंगे जनता पार्टी के झंडों को काजी मुहम्मदपुर थाने के दारोगा द्वारा जबरदस्ती उतरवाने तथा लोगों को झंडे टांगने से मना करने की घटना की जांच करायी जाये तथा ऐसी घटनाओं को रोका जाये। श्री नरेंद्र ने भाकपा कार्यकर्ताओं द्वारा चंदवारा मुहल्ले में जनता पार्टी के झंडों को जलाने की घटना की भी निंदा की है। जनता पार्टी के प्रवक्ता के अनुसार ‘‘कम्युनिस्टों की बौखलाहट इसलिए है कि जाॅर्ज फर्नांडीज की उम्मीदवारी से मजदूरों के बीच उनका प्रभाव लगभग समाप्त हो गया है।’’ सचमुच जार्ज फर्नाडीज को डाक-तार विभाग के भाकपा प्रभावित लोगों को छोड़कर शहर के लगभग सभी मजदूर संघटनों का समर्थन प्राप्त है। भाकपा से विद्रोह कर चुनाव लड़नेवाले निर्दलीय उम्मीदवार ने परंपरागत कम्युनिस्ट वोट को भी छिन्न-भिन्न कर दिया है। यह उम्मीदवार जिले भर के कार्यकर्ताओं में लोकप्रिय हैं। मीनापुर क्षेत्र में उनका विशेष प्रभाव है। उनके सहयोगियों का तो यह भी दावा है कि उन्हें भाकपा उम्मीदवार रामदेव शर्मा से अधिक मत प्राप्त होंगे। दूसरी ओर, माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के श्री नन्दकिशोर शुक्ल अपने दल-बल के साथ श्री फर्नांडीज के लिए काम कर रहे हैं। कई इलाकों में श्री शुक्ल का प्रभाव है। उन्होंने इस संवाददाता को बताया कि श्री फर्नाडीज जैसे मजदूर नेता के विरुद्ध भाकपा मजदूरों के समक्ष तर्कहीन हो गयी है। फिर भी शहरी क्षेत्र में भ्रमण के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि भाकपा वहां एक ताकत है, जो भले श्री फर्नांडीज से पीछे हो, पर कांग्रेस से आगे है। शहर में कांग्रेस का कोई नामलेवा नजर नहीं आता। तिलक मैदान स्थित कांग्रेस पार्टी के कार्यालय में जब यह संवाददाता पहुंचा, तो देखा कि वहां श्मशान की शांति थी। न कोई गाड़ी, न कार्यकर्ता, न ही चुनाव-कार्यों की चहल-पहल। एक कांग्रेसी नेता ने मरे स्वर में कहा, ‘‘ पता नहीं क्या हो गया है पार्टी को।’’ तभी समस्तीपुर से फोन आया। जिला कांग्रेस कामेटी के अध्यक्ष श्री रामसंजीवन ठाकुर ने फोन उठाया, ‘‘ हलो, क्या हाल है।’’ उधर से आवाज आई, ‘सन् 67 से भी बदतर हाल है।’ श्री ठाकुर के फोन रख देने के बाद एक अन्य कांग्रेसी नेता ने अपना अनुभव सुनाते हुए कहा, ‘‘ मैं एक गांव में अपने समर्थक के यहां गया, उसकी मैंने काफी मदद की थी। उससे वोट के बारे में बातें कीं। उसने कहा कि ‘‘अबकी बार छोड़ दिअउ, माफ कर दिअउ, उन्नीस महीने में बड़ जुलुम भेलई हअ।’’ कांग्रेस पार्टी के दफ्तर में भी जनता पार्टी की बड़ी- बड़ी चुनाव सभाओं की चर्चा होने लगी।एक ने कहा कि ‘लोग भी उसी तरह की बातें सुनना पसंद करते हैं।पता नहीं लोगोंको क्या हो गया है।’ जिला कांग्रेस कमेटी के सचिव शकूर अंसारी से जब हमने इस पर बातें की तो उन्होंने कहा कि ‘शहर में कांग्रेस पार्टी जरूर उदास है,उसके कारण हैं क्योंकि यहां तो कालाबाजारी,मुनाफाखोर और भ्रष्ट व्यापारी रहते हैं और वे सब के सब जनता पार्टी के साथ हैं।गांवों में हमारी स्थिति अच्छी है और प्रतिदिन स्थिति मजबूत होती जा रही है।’ पर अन्य सूत्रों से प्राप्त सूचनाओं के अनुसार जिला कांग्रेस पार्टी भीतर -भीतर दो खेमों में बंट गई है और कांग्रेसी उम्मीदवार नीतीश्वर प्रसाद सिंह कार्यकत्र्ताओं का अभाव महसूस कर रहे हैं।कांग्रेस के एक व्यक्ति ,जिसका अपनी जाति में काफी प्रभाव माना जाता है,टिकट न मिलने के कारण क्षुब्ध है और तथा वे भीतर ही भीतर कांग्रेस उम्मीदवार नीतीश्वर प्रसाद सिंह के विरूद्ध काम कर रहे हैं।बोचहा और सकरा के दोनों हरिजन विधायक रमई राम और हीरालाल पासवान ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है।वे जनता पार्टी के लिए समर्थन जुटाने में लग गए हैं।इसके अतिरिक्त मुजफ्फर पुर जिले के कई भूतपूर्व सांसदों,विधायकों और युवा कांग्रेस के अनेक कार्यकत्र्ताओं ने दल से इस्तीफा दे दिया है और जनता पार्टी के उम्मीदवार के लिए काम करना प्रारंभ कर दिया है। छात्र आंदोलन के दौरान विश्व विद्यालय की नौकरी से निकाले गए आठ शिक्षक और दर्जनों छात्र जनता पार्टी की जीत के लिए दिन रात काम कर रहे हैं।इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र से शरद राव,दिल्ली से सुषमा कौशल ,उत्तर प्रदेश से जगदीश लाल श्रीवास्तव,कलकत्ता से अशोक सेकसरिया अपने दर्जनों सहयोगियांे के साथ चुनाव कार्य में लगे हुए हैं।इसके अतिरिक्त श्री फर्नांडीस की मां एलिस फर्नांडीस ने महिलाओं का ध्यान आकृष्ट किया है।कांपती हुई बूढ़ी एलिस फर्नांडीस का हाथ जोड़ अपने तीन बेटों की रिहाई की खातिर वोट मांगना प्रभावोत्पादक दृश्य उपस्थित करता है। श्री फर्नांडीस का चुनाव कार्यालय बहुत ही चुस्त और कार्यकुशल दिखाई पड़ा।श्री फर्नांडिस ने बड़ी संख्या में चुनाव साहित्य बंटवाए हैं।श्री फर्नांडीस भले रिहा नहीं किए गए,पर वे अपने सहयोगियों से निरंतर संपर्क बनाए हुए हैं।एक सूचना के अनुसार श्री फर्नांडीस ने देश भर में फैले अपने प्रशंसकों और शुभचिंतकों को मुजफ्फर चुनाव क्षेत्र में जाकर काम करने के लिए जेल से ही पत्र लिखे हैं।उन्होंने जनता पार्टी तथा जनतांत्रिक कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेताओं को पत्र लिख कर मुजफ्फर पुर पहुंचने का आग्रह किया है।यही कारण है कि मुजफ्फर पुर में जनता पार्टी की ओर से न तो बड़ी बड़ी आम सभाओं की कमी हुई,न कार्यकत्र्ताओं की और न साधनों की।देश भर से छेाटी छोटी रकम की मदद लगातार आ रही है।देश विदेश के लगभग सभी समाचार पत्रों ,संवाद समितियों तथा रेडियो-टेलीविजन संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने मुजफ्फर पुर का दौरा किया है। दुनिया भर के लोगों की आंखें मुजफ्फर पुर की ओर लगी हुई है जहां 16 मार्च को सुबह 7.30 बजे और शाम 4.30 बजे के बीच लगभग पौने सात लाख मतदाता बड़ोदा डायनामाइट मुकदमे के मुख्य अभियुक्त ,सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष तथा अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त मजदूर नेता श्री जार्ज फर्नांडीस के भाग्य का फैसला करेंगे। जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अब्दुला बुखारी ने श्री फर्नांडीस को लिखे पत्र में कहा है कि ‘........हर सही सोचने वाला आदमी तुम्हारे कार्यों और जिस बहादुरी से तुम तानाशाह का सामना कर रहे हो,उसका आदर किए बिना नहीं रह सकता।तुम इस महान देश को दल -दल से निकालने की कोशिश कर रहे हो,तुम्हारी इस कोशिश में मैं तुम्हारे साथ हूं और तुम्हारी कामयाबी की कामना करता हूं।’ श्री बुखारी के पत्र और पटना के उर्दू दैनिक ‘संगम’ के संपादक व ओजस्वी वक्ता श्री गुलाम सरवर के भाषणों का मुजफ्फर पुर की जनता खास कर अल्पसंख्यकों पर ,प्रभाव पड़ा है जिससे सी.पी.आइ.को क्षति पहुंची है।क्योंकि अब तक भाकपा को ही मुसलमानों के अधिकतर वोट मिलते रहे हैं। दूसरी ओर गंवई इलाकों में जातिवाद टूटा है।लोग छोटी छोटी बातों से उपर उठकर परिवार नियाोजन,पारिवारिक तानाशाही और आपातकाल की ज्यादतियों पर चर्चा करने लगे हैं। जनता पार्टी के प्रवक्ता ने बताया कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां जनता पार्टी की समर्थक भोली भाली जनता को गाय बछड़ा और हंसिया बाल दिखा कर प्रचार कर रही है कि यही जनता पार्टी का चुनाव चिह्न है।प्रवक्ता के अनुसार जनता पार्टी के स्वयंसेवक इस भ्रम को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। जनता पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि वे तिहाड़ जेल में बंद हैं और उनके समर्थकों ने इस स्थिति से सर्वाधिक लाभ उठाने की कोशिश की है।मुजफ्फर पुर निर्वाचन क्षेत्र में श्री फर्नांडीस के समर्थन में जारी किए गए पोस्टरों,परचों,पुस्तिकाओं और अन्य प्रचार सामग्री में उनके जेल जीवन को अधिकाधिक उभारा गया है।मतदाताओं पर इसकी अनुकूल प्रतिक्रियाएं हुई हैं। जेलनुमा पिंजरे में बंदी फर्नांडीस के हथकड़ी-बेड़ी लगे पुतले तथा पोस्टरों पर जेल में बंद हथकड़ी लगे दो हाथ लोगों का ध्यान अनायास अपनी ओर खींच लेते हैं।इससे जनता में उनके प्रति सहज सहानुभूति पैदा हो जाती है। इसके अतिरिक्त श्री फर्नांडीस की 66 वर्षीया बूढ़ी मां की मतदाताओं से मार्मिक अपील ,उनके भाई लाॅरेंस फर्नांडीस पर ढाए गए पुलिस जुल्म की खबर और स्वयं जार्ज फर्नांडीस द्वारा तिहाड़ जेल में अनिश्चितकालीन अनशन की खबर ने सामान्य जन जीवन को स्पर्श किया है जो धूम धड़ाके के प्रचार से कहीं अधिक प्रभावकारी प्रतीत हो रहे हैं।
पब्लिक एजेंडा से साभार

बुधवार, 21 जनवरी 2009

पूरा नहीं हुआ अम्बेडकर - लोहिया - एका का सपना

डा।राम मनोहर लोहिया ने लिखा था कि ‘ मेरी बराबर आकांक्षा थी कि वे (डा.बी.आर.अम्बेडकर) हमारे साथ आएं, केवल संगठन में ही नहीं, बल्कि पूरी तौर से सिद्धांत में भी, और वह मौका करीब मालूम होता था।’ डा.अम्बेडकर के निधन के बाद डा.लोहिया ने मधु लिमये को 1 जुलाई 1957 को हैदराबाद से लिखा कि ‘ तुम समझ सकते हो कि डा.अम्बेडकर की अचानक मौत का दुःख मेरे लिए थोड़ा व्यक्तिगत रहा है, और अब भी है। मेरे लिए अम्बेडकर हिंदुस्तान की राजनीति के महान आदमी थे और गांधी को छोड़कर , बड़े से बड़े सवर्ण हिंदुओं के बराबर। इससे मुझे बराबर संतोष और विश्वास मिला है कि हिंदू धर्म की जाति प्रथा एक न एक दिन खतम की जा सकती है। ’ लोहिया ने अम्बेेडकर के बारे में और क्या कहा, उसे जानने से पहले यह जान लेना ठीक रहेगा कि खुद अम्बेडकर ने लोहिया के बारे में क्या कहा था।यह बात लिखी है, बुद्धप्रिय मौर्य ने । मौर्य न सिर्फ केंद्रीय मंत्री थे बल्कि एक चर्चित दलित नेता भी थे।मौर्य ने लिखा कि ‘ सन् 1951 में अम्बेडकर ने पूछा कि तुम डा.राम मनोहर लोहिया को जानते हो ? मैंने डा.लोहिया का नाम तो सुना था लेकिन जानने का मतलब है नजदीक से जानना, इसलिए मैं चुप रहा। बाबा साहेब ने कहा कि तुम क्या खाक पालिटिक्स करोगे, जब तुम डा.लोहिया को नहीं जानते। हिंदुओं के एक ही तो नेता हैं जो ईमानदारी से जात-पांत तोड़कर जातिविहीन समाज की स्थापना करना चाहते हैं। बाबा साहेब कभी किसी की प्रशंसा नहीं करते थे। इस मामले में वे बड़े कंजूस थे।जब उन्होंने डा.लोहिया की प्रशंसा की तो मैंने सोचा कि उनसे मिलना चाहिए।’ अब अम्बेडकर के बारे में डा.लोहिया की कुछ बातें। डा.लोहिया ने लिखा है कि ‘ मैं बराबर कोशिश करता रहा हूं कि हिंदुस्तान के हरिजनों के सामने एक विचार रखूं। मेरे लिए यह बुनियादी बात है। हिंदुस्तान के आधुनिक हरिजनों के दो प्रकार हैं,एक डा.अम्बेडकर और दूसरे जग जीवन राम।डा.अम्बेडकर विद्वान थे,उनमें स्थिरता,साहस और स्वतंत्रता थी।वे बाहरी दुनिया को हिंदुस्तान की मजबूती के प्रतीक के रूप में दिखाए जा सकते थे।लेकिन उनमें कटुता थी और वे अलग रहना चाहते थे।गैर हरिजनों के नेता बनने से उन्होंने इनकार किया।पिछले पांच हजार बरस की तकलीफ और हरिजनों पर उसका असर मैं भली प्रकार समझ सकता हूं।लेकिन वास्तव में तो यही बात थी।मुझे आशा थी कि डा.अम्बेडकर जैसे महान भारतीय किसी दिन इससे उपर उठ सकेंगे।लेकिन इस बीच मौत आ गई।श्री जग जीवन राम उपरी तौर पर हर हिंदुस्तानी और हिंदू के लिए सद्भावना रखते हैं। हालांकि सवर्ण हिंदुओं से बातचीत में उनकी तारीफ और चापलूसी करते हैं।पर यह कहा जाता है कि केवल हरिजनों की सभाओं में घृणा की कटु ध्वनि फैलाते रहते हैं।इस बुनियाद पर न तो हरिजन और न हिंदुस्तान उठ सकता है।लेकिन डा.अम्बेडकर जैसे लोगों में भी सुधार की जरूरत है।’ ‘परिगणित जाति संघ को चलाने वालों को मैं अब नहीं जानता।लेकिन मैं चाहता हूं कि हिंदुस्तान की परिगणित जाति के लोग देश की पिछले चालीस साल की राजनीति के बारे में विवेक से सोचें।मैं चाहूंगा कि श्रद्वा और सीख के लिए वे डा.अम्बेडकर को प्रतीक मानें,डा.अम्बेडकर की कटुता को छोड़कर उनकी स्वतंत्रता को लें।एक ऐसे अम्बेडकर को देखें जो केवल हरिजनों के नहीं ,बल्कि पूरे हिंदुस्तान के नेता बनें।’ इससे पहले 24 सितंबर 1956 को डा.बी.आर.अम्बेडकर ने डा.लोहिया को लिखा कि ‘ आपके दो मित्र मुझसे मिलने आए थे।मैंने उनसे काफी देर तक बातचीत की।हालांकि हमलोगों में आपके चुनाव कार्यक्रम के बारे में कोई बात नहीं हुई। अखिल भारतीय परिगणित जाति संघ की कार्य समिति की बैठक 30 सितंबर 1956 को होगी और मैं समिति के सामने आपके मित्रों का प्रस्ताव रख दूंगा।कार्य समिति की बैठक के बाद मैं चाहूंगा कि आपकी पार्टी के प्रमुख लोगों से बातचीत हो ताकि हमलोग अंतिम रूप से तय कर सकें कि साथ होने के लिए हमलोग क्या कर सकते हैं। मुझे बहुत खुशी होगी अगर आप दिल्ली में मंगलवार 2 अक्तूबर 1956 को मेरे यहां आ सकें।अगर आप आ रहे हों तो कृपया तार से सूचित करें ताकि मैं कार्य समिति के कुछ लोगों को भी आपसे मिलने के लिए रोक लूंं। ’ इस पत्र के जवाब में 1 अक्तूबर 1956 को लोहिया ने अम्बेडकर को लिखा कि ‘आपके 24 सितंबर के कृपापत्र के लिए बहुत धन्यवाद। हैदराबाद लौटने पर मैंने आज आपका पत्र पढ़ा और इसलिए आपके सुझाए समय पर दिल्ली पहुंच सकने में बिलकुल असमर्थ हूं। फिर भी जल्दी से जल्दी आपसे मिलना चाहूंगा। मैं उत्तर प्रदेश में अक्तूबर के बीच में रहूंगा और आपसे दिल्ली में 19 या 20 अक्तूबर को मिल सकूंगा ।अगर आप 29 अक्तूबर को बम्बई में हों तो वहां आपसे मिल सकता हंू।कृपया मुझे तार से सूचित करंे कि इन दो तारीखों में कौन सी आपको ठीक रहेगी।’ ‘ अन्य मित्रों से आपकी सेहत के बारे में जानकर चिंता हुई। आशा है कि आप आवश्यक सावधानी बरत रहे होंगे। मैं अलग से मैनकाइंड के तीन अंक आपको भिजवा रहा हूं। विषय का सुझाव देने का मेरा विचार हो रहा था लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगा। ‘मैनकाइंड’ (पत्रिका) के तीन अंक आपको विषय चुनने में मदद करेंगे। मैं केवल इतना ही कहूंगा कि हमारे देश में बौद्धिकता निढाल हो चुकी है।मैं आशा करता हूं कि यह वक्ती है।इसलिए आप जैसे लोगों का बिना रोक के बोलना बहुत जरूरी है।’ इससे पहले डा.लोहिया ने 10 दिसंबर 1955 को डा.अम्बेडकर को लिखा था कि ‘मैनकाइंड’ पूरे मन से जाति-समस्या को अपनी संपूर्णता में खोल कर रखने का प्रयास करेगा।इसलिए यदि आप कोई अपना लेख भेज सकें तो प्रसन्नता होगी। लेख 2500 और 4000 शब्दों के बीच हो तो अच्छा।आप जिस विषय पर चाहिए, लिखिए।हमारे देश में प्रचलित जाति प्रथा के किसी पहलू पर अगर आप लिखना पसंंद करें तो मैं चाहूंगा कि आप कुछ ऐसा लिखें कि हिंदुस्तान की जनता न सिर्फ क्रोधित हो,बल्कि आश्चर्य भी करे।मैं नहीं जानता कि मध्य प्रदेश के लोक सभा के चुनाव भाषणों में आपके बारे में मैंने जो कहा, उसे आपके अनुयायी ने जो मेरे साथ रहा, आपको बतलाया या नहीं।अब भी मैं बहुत चाहता हूं कि क्रोध के साथ दया भी जोड़नी चाहिए और आप न सिर्फ अनुसूचित जातियों के नेता बनें,बल्कि पूरी हिंदुस्तानी जनता के भी नेता बनें।’ लोहिया ने लिखा कि ‘ हमारे क्षेत्रीय शिक्षण शिविर में यदि आप आ सके तो हमें बड़ी खुशी होगी।आप अपने भाषण का सार पहले भेज दें तो बाद में उसे प्रकाशित करना अच्छा होगा।हम चाहते हैं कि एक घंटे के भाषण के बाद उस पर एक घंटे तक चर्चा भी हो। मैं नहीं जानता कि समाजवादी दल के स्थापना सम्मेलन में आपको कोई दिलचस्पी होगी या नहीं।आप सम्मेलन में विशेष आमंत्रित होकर आ सकते हैं।अन्य विषयों के अलावा सम्मेलन में खेत मजदूरों, कारीगरों, औरतों और संसदीय काम से संबंधित समस्याओं पर भी विचार होगा और इनमें से किसी एक पर आपको कुछ महत्वपूर्ण बात कहनी ही है।किसी बात को बतलाने के लिए यदि आप सम्मेलन की कार्यवाही में हिस्सा लेना चाहें तो मैं समझता हूं कि सम्मेलन और विशेष रूप से अनुमति देगा।’ इस संबंध में कान पुर के विमल मेहरोत्रा और धर्मवीर गोस्वामी ने 27 सितंबर 1956 को डा.लोहिया को लिखा कि ‘ एक दोस्त के जरिए हमलोगों को दिल्ली जाकर डा.अम्बेडकर से मिलने का न्योता मिला।हमलोग दिल्ली जाकर उनसे मिले और 75 मिनट तक बातचीत हुई।यह साफ कर दिया गया था कि हमलोग बिलकुल व्यक्तिगत रूप में आए हैं।’ मेहरोत्रा और गोस्वामी डा.लोहिया के मित्र थे। इन लोगों ने लोहिया को लिखा कि ‘जब आप दिल्ली में हों तो डा.अम्बेडकर आपसे जरूर मिलना चाहेंगे।वे बूढ़े हैं और उनकी तबीयत ठीक नहीं है। वे सहारा लेकर चलते फिरते हैं।वे पार्टी का पूरा साहित्य चाहते हैं और मैनकाइंड के सभी अंक।वे इसका पैसा देंगे।वे हमारी राय से सहमत थे कि श्री नेहरू हर एक दल को तोड़ना चाहते हैं और कि विरोधी पक्ष को मजबूत होना चाहिए।वे मजबूत जड़ों वाले एक नए राजनीतिक दल के पक्ष में हैं।वे नहीं समझते कि माक्र्सवादी ढंग का साम्यवाद या समाजवाद हिंदुस्तान के लिए लाभदायक होगा।लेकिन जब हमलोगों ने अपना दृष्टिकोण रखा तो उनकी दिलचस्पी बढ़ी।’ ‘ हमलोगों ने उन्हें कान पुर के आम क्षेत्र से लोक सभा का चुनाव लड़ने का न्योता दिया।इस ख्याल को उन्होंने नापंसद नहीं किया,लेकिन कहा कि वे आपसे पूरे हिंदुस्तान के पैमाने पर बात करना चाहते हैं।हमलोगों ने यह साफ कर दिया कि हमलोग अपनी नीति के कारण कोई समझौता नहीं कर सकते।ऐसा लगा कि वे अनुसूचित जाति संघ से बहुत मोह नहीं रखते।कार्य कारिणी की बैठक दिल्ली में 30 को हो रही है।श्री नेहरू के बारे में जानकारी करने पर उन्हें बहुत दिलचस्पी थी। (सिनेमा आउटफिट आदि की मैनकाइंड वाली चर्चा) उन्होंने कहा कि इन बातों का यथेष्ट प्रचार होना चाहिए।वे दिल्ली से एक अंग्रेजी दैनिक भी निकालना चाहते हैं।’ ‘ वे हम लोगों के दृष्टिकोण को बहुत सहानुभूति,तबियत और उत्सुकता के साथ पूरे विस्तार में समझना चाहते थे। उन्होंने थोड़े विस्तार में इंगलैंड की प्रजातांत्रिक प्रणाली की चर्चा की जिससे उम्मीदवार चुने जाते हैं और लगता है कि जनतंत्र में उनका दृढ़ विश्वास है। यह सार है। हमलोग खुद नहीं आ सके क्योंकि यह पता नहीं था कि आप कहां हैं और हमारे पास पैसा नहीं था। 23 सितंबर 1956 को हैदरा बाद दफ्तर में टेलीफोन से बात करने की कोशिश की, कोई जवाब नहीं मिला,क्योंकि वहां पर किसी ने टेलीफोन नहीं उठाया। डा.अम्बेडकर का पता ः 26 अली पुर रोड, नई दिल्ली।’ इस पत्र के जवाब में लोहिया ने 1 अक्तूबर 1956 को विमल और धर्मवीर को हैदरा बाद से लिखा कि ‘ तुम्हारी चिट्ठी मिली। मैं चाहूंगा कि तुम लोग डा.अम्बेडकर से बातचीत जारी रखो लेकिन याद रखना कि जिस दिशा का तुम लोगों ने खुद अपनी चिट्ठी में उल्लेख किया है,उससे इधर- उधर नहीं होना।डा.अम्बेडकर की सबसे बड़ी दिक्कत रही है कि वे सिद्धांत में अटलांटिक गुट से नजदीक महसूस करते हैं। मैं नहीं समझता कि इस निकटता के पीछे सिद्धांत के अलावा और भी कोई बात है।लेकिन इसमें हम लोगों को बहुत सतर्क रहना चाहिए।मैं चाहता हूं कि डा.अम्बेडकर समान दूरी के खेमे की स्थिति में आ जाएं।तुम लोग अपने मित्र के जरिए सिद्धांत की थोड़ी बहुत बहस भी चलाओ।’ ‘ डा.अम्बेडकर की लिखी चिट्ठी की एक नकल भिजवा रहा हूं। अगर वे चाहते हैं कि मैं उनसे दिल्ली में मिलूं,तो तुम लोग भी वहां रह सकते हो।‘ विमल मेहरोत्ऱा ने 15 अक्तूबर 1956 को डा.अम्बेडकर को लिखा कि ‘ पिछले महीने मैं और मेरे मित्र श्री धर्मवीर गोस्वामी आपसे दिल्ली में मिले थे।उसके बाद अपनी बातचीत की खबर हमने डा.लोहिया को दी।मैंने बहुत ध्यान से परिगणित जाति संघ की कार्य समिति के फैसलों का अध्ययन किया है।उसमें से देश की जनता के लिए विशेष दिलचस्पी की तीन चीजें निकलती हैं।़........मुझ जैसे आदमी का आपको कोई सलाह देना धृष्टता होगी,लेकिन देश के लिए अच्छा होता कि देश के मौजूदा राजनीतिक दलों के नीति और कार्यक्रम को आप देख लेते और इनकी कथनी और करनी के बारे में अपनी राय देते।’ ‘ चुनाव समझौते के बारे में।हमलोग अपने को लगभग तीन हजार क्षेत्रों से अलग रखेंगे।पांच सौ या छह सौ क्षेत्रों से चुनाव लड़ेंगे।इसलिए चुनाव समझौते का रास्ता निकल आता है।सोशलिस्ट पार्टी ने अपनी नीति में तय किया है कि वहीं से चुनाव लड़ेंगे जहां कुल मतदाताओं के एक प्रतिशत पार्टी सदस्य हैं और एक तिहाई मतदान केंद्रों में फैले हों।’ ‘स्वेज के बारे में आपकी समिति का प्रस्ताव राष्ट्रीय स्वार्थ की दृष्टि से भले सोचा गया हो,लेकिन मुझे बहुत शक है कि दूर की दृष्टि से यह हिंदुस्तान के लोगों के सचमुच स्वार्थ में होगा।इसका मतलब यह होगा कि हिंदुस्तान में लगी विदेशी पूंजी का राष्ट्रीयकरण बिना उन देशोें की सहमति के नहीं किया जाएगा जिनके पूंजीपतियों का पैसा लगा हो।मैं अनुरोध करूंगा कि परिगणित जाति संघ के दफ्तर को कृपया इन प्रस्तावों को हमें भेजने के लिए कहें।मुझे पता चला है कि डा.लोहिया आपसे मिलने वाले हैं।लेकिन मैं समझता हूं कि निकट भविष्य में उनके लिए यह संभव नहीं होगा।अगर आप अपना कुछ कीमती समय दे सकें तो मैं आकर आपसे सारी बातें कर सकूं।’ पब्लिक एजेंडा (31-10-2008)

मात्र 12 हजार होते तो नहीं जाती लोहिया की जान


क्या 12 हजार रुपए का इंतजाम नहीं होने के कारण डा.राम मनोहर लोहिया को बचाया नहीं जा सका ? मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व समाजवादी विचारक डा.राम मनोहर लोहिया का पौरूष ग्रंथि के आपरेशन के बाद अस्पताल की बदइंतजामी के कारण 12 अक्तूबर 1967 को दिल्ली के विलिंग्टन अस्पताल में उनका निधन हो गया। उस अस्पताल का नाम अब डा.राम मनोहर लोहिया अस्पताल है। डा.लोहिया के एक करीबी सहकर्मी व नेता ने कुछ साल पहले इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि डा.लोहिया आपरेशन के लिए विदेश जाना चाहते थे।पर उसके लिए उन्हें बारह हजार रुपए की जरूरत थी।उन्होंने बंबई के एक मजदूर नेता से जो लोहिया के दल के ही थे, डाक्टर साहब ने कहा था कि वह रुपए का इंतजाम कर दे।पर वह मजदूर नेता समय पर पैसे का बंदोबस्त नहीं कर सका।इस कारण जल्दीबाजी में दिल्ली के ही विलिग्टन अस्पताल में उन्हें भर्ती कराना पड़ा।डा.एल.आर.पाठक ने 30 सितंबर को उनका आपरेशन किया,पर डाक्टर व अस्पताल की लापारवाही के कारण डा.लोहिया की मौत हो गई। आपरेशन और बाद की देखभाल में लापारवाही को लेकर लंबे समय तक विवाद चलता रहा।पर इसमें यह बात तय थी कि विदेश के किसी अच्छे अस्पताल में यदि आपरेशन हुआ होता तो शायद ऐसी नौबत नहीं आई।आज जब मामूली -मामूली नेता व अफसर भी सरकारी खर्चे पर विदेश में अच्छी से अच्छी चिकित्सा करवा रहे हैं,वहीं लोक सभा के सदस्य डा.लोहिया बेहतर इलाज के बिना कम ही उम्र में चल बसे।जब उनका निधन हुआ,तब तक वे अपने साठ साल भी पूरा नहीं कर पाए थे।पर उतनी ही उम्र में उन्होंने भारतीय राजनीति व समाज में युगांतरकरी परिवत्र्तन के नेता बन चुके थे। जब उनका निधन हुआ तो वे ऐसी पार्टी यानी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के एकछत्र नेता थे जिसके दो दर्जन सदस्य लोक सभा में थे।उस समय एक दर्जन प्रदेशों में ऐसी गैर सरकारी सरकारें बन चुकी थीं जिनमें लोहिया के दल के मंत्री थे।बिहार में तो उस दल के कर्पूरी ठाकुर तो उप मुख्य मंत्री भी थे।डा.लोहिया के गैर कांग्रेस वाद के नारे के कारण ही कई राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी थीं।पर डा.लोहिया आज के अधिकतर नेताओं की तरह नहीं थे जो सरकार के धन को अपना ही माल समझते हैं।डा.लोहिया ने अपने दल द्वारा शासित प्रदेशों के अपने दल के नेताओं से कह रखा था कि वे मेरे इलाज के लिए कोई चंदा वसूली का काम नहीं करें।इसमें सरकारी पद के दुरूपयोग का खतरा है। मेरे इलाज के लिए बंबई के मजदूर चंदा देंगे जो आम भारतीय मजदूरों व किसानों की अपेक्षा थोड़े बेहतर आर्थिक स्थिति में हैं।पर इस काम में उस मजदूर नेता ने लोहिया की मदद नहीं की।लोहिया चाहते थे तो इस देश का कोई भी पूंजीपति उन्हें अपने खर्चे से विदेश भेज कर उनका समुचित इलाज करवा सकता था।उन दिनों संसद में लोहिया की तूती बोलती थी।जब वे बोलने को खड़े होते थे तो सरकार सहम जाती थी।पर लोहिया अपने उसूलों के पक्के थे।वे कहते थे कि काले धन का उपयोग करने वाला नेता गरीबों का भला नहीं कर सकता।वे यह भी कहा करते थे कि यह मत देखो ंकि कोई नेता संसद में क्या बोलता है।बल्कि इसे देखो कि वह संसद में बोलने के बाद खुद शाम में कहां उठता बैठता है। यह इस देश की विडंबना ही रही कि उसी लोहिया का नाम लेकर बाद में इस देश व प्रदेश में राजनीति करने वाले अधिकतर नेता सत्ता में आने के बाद इतने भ्रष्ट हो गए कि उनको देखकर लगने लगा कि भ्रष्टाचार के मामले में तो कांग्रेसी बच्चे है। लोहिया के इलाज की चर्चा के क्रम में यह याद दिलाना जरूरी है कि नब्बे के दशक में बिहार का एक भ्रष्ट पशुपालन अफसर जब अपने इलाज के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा था तो वह अपनी तिमारदारी में अपने खर्चे से 75 लोगों को अपने साथ ले गया। पब्लिक एजेंडा (22-09-2008)

विश्वनाथ प्रताप सिंह यानी एक सार्थक राजनीतिक जीवन


बोफर्स घोटाले के खिलाफ अभियान चला कर जिस राजा मांडा ने प्रधान मंत्री की कुर्सी पाई,उसी वी.पी. सिंह ने न जाने क्यों अपने जीवन के आखिरी दिनों में यह कह दिया कि उन्होंने तो बोफर्स घोटाले को लेकर राजीव गांधी पर कोई आरोप ही नहीं लगाया था। इससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा। साथ ही, इस देश की राजनीति की साख को भी थोड़ा और बट्टा लगा। पर, यदि इस एक प्रकरण को नजरअंदाज कर दिया जाए तो वी.पी. सिंह के बारे में यह कहा जा सकता है कि वे इस गरीब देश के लिए सही नेता थे।राजा नहीं, फकीर थे वे।वे पिछड़ों के हमदर्द थे। उनमें व्यक्तिगत ईमानदारी व त्याग इतना अधिक था कि उनके नाम पर कसमें खाई जा सकती हैं। यह इस देश का दुर्भाग्य रहा कि वे कम ही दिनों तक प्रधान मंत्री रहेे। इस देश की मुख्य समस्या हर स्तर पर सरकारी भ्रष्टाचार ही है। बाकी अधिकतर समस्याएं तो भ्रष्टाचार के कारण ही पैदा होती रहती हैं। वी.पी.सिंह भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर व्यक्ति यदि आज भी प्रधान मंत्री की कुर्सी पर बैठ जाए तो देश का आधा सरकारी भ्रष्टाचार वैसे ही खत्म हो जाएगा।मन मोहन सिंह खुद तो ईमानदार हैं,पर भ्रष्टाचार के खिलाफ तनिक भी कठोर नहीं हैं। पहले बोफर्स घोटाले पर उनकी भूमिका की चर्चा कर ली जाए। अस्सी के दशक में राजीव गांधी मंत्रिमंडल से हटने के बाद वी.पी.सिंह जन मोर्चा बना कर देश भर में राजीव सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चला रहे थे। उसी सिलसिले में वे पटना आए थे।वे बेली रोड के हड़ताली मोड के पास एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे।जनसत्ता के संवाददाता के रूप में इन पंक्तियों का लेखक भी उस सभा में मौजूद था।वी.पी.सिंह ने पहली बार उसी सभा में विदेशी बैंक के उस खाते का नंबर बताया जिसमें बोफर्स दलाली के पैसे जमा किए गए थे।खाता लोटस के नाम से था और उसका नंबर कई अंकों का था।वी.पी.सिंह ने खाते का नंबर सभा में बताते हुए श्रोताओं से पूछा भी, ‘आप जानते हैं न कि लोटस का अर्थ क्या होता है ?’ भीड़ से एक आवाज आई ‘राजीव।’ वी.पी.सिंह ने इस अनुवाद का खंडन नहीं किया।उनके चेहरे पर यह भाव था कि श्रोता ने सही अनुवाद बता दिया।यह बात सही है कि वी.पी.सिंह ने खुद अपने मुंह से राजीव गांधी का नाम नहीं लिया।पर पटना की उस सभा में वे जनता को जो सूचना देना चाहते थे,वह क्या था ? इससे पहले जब राजीव गांधी सरकार से विद्रोह करके पहली बार पटना आए थे तो वे एक प्रेस कांफ्रेंस में शामिल हुए।उसमें इन पंक्तियों के लेखक ने ही यह सवाल किया था कि क्या आप प्रधान मंत्री से इस्तीफे की मांग करते हैं ? उन्होंने जवाब दिया, ‘कोई सिरियस सवाल कीजिए।’ यानी वी.पी.सिंह अपने पूरे अभियान में राजीव गांधी का नाम लेने से बचते रहे।पर वे अपनी बातों से भीड़ को यह विश्वास दिलाते रहे कि बोफर्स घोटाले मंे राजीव गांधी भी शामिल हैं।इसी विश्वास के कारण जनता ने सन् 1989 के लोक सभा चुनाव मेंं राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को सत्ता से हटा दिया।यदि आरोप राजीव गांधी के अलावा किसी और पर होता तो शायद कांग्रेस की चुनाव में उतनी बुरी हालत नहीं होती। पर, बोफर्स घोटाले के खिलाफ अभियान चला कर सत्ता हासिल करने वाले वी.पी.सिंह को बाद में यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी कि उन्होंने राजीव गांधी पर इस संबंध में आरोप नहीं लगाया था ? जबकि, बोफर्स मुकदमे के चार्ज शीट के कालम -दो में राजीव गांधी का नाम आ ही गया ।याद रहे कि अभियुक्त की मृत्यु हो जाने पर उसका नाम कालम - 2 में लिख दिया जाता है। पर किसी एक फिसलन को आधार बना कर किसी नेता के पूरे व्यक्तित्व का आकलन नहीं किया जा सकता। वी.पी.सिंह के राजनीतिक जीवन में जो दो महत्वपूर्ण मुकाम आए,वे देश के लिए भी काफी निर्णायक रहे।उन्होंने सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता को गोलबंद किया और जनता को यह विश्वास दिलाया कि सत्ता में आने के बाद वे भ्रष्टाचार पर काबू पाने की कोशिश करेंगे। वे इस पर खरा उतरे।प्रधान मंत्री के रूप में भी उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा। सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ चुनाव लड़ने और जीतने का इस देश में वह आखिरी मौका था।उसके बाद तो चुनाव धर्म और जाति के नाम पर लड़े गए।या फिर विकास या अविकास पर।सामाजिक न्याय को राष्ट्रीय राजनीति का एक मुख्य मुद्दा बनाने का श्रेय भी वी.पी.सिंह को ही जाता है।उन्होंने सन् 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके देश की राजनीति का एजेंडा ही बदल दिया।यदि मंडल नहीं होता तो मंदिर आंदोलन भी नहीं होता।यह बात भी सही है।हालांकि मंडल आरक्षण लागू नहीं होता तो इस देश में नक्सलियों का विकास और भी तेजी से होता। इस आरोप में दम नहीं है कि जनता दल के भीतर अपने सहयोगी चैधरी देवी लाल के विद्रोह को दबाने के लिए ही वी.पी.सिंह ने मंडल कार्ड खेला।यह एक ऐसा कार्ड था जिसके खेलने में गद्दी पर खतरे ही खतरे थे। देवी लाल का खतरा तो टल भी सकता था,पर मंडल आरक्षण से उत्पन्न खतरे में तो गद्दी जानी तय थी।इतनी राजनीतिक समझ तो चतुर सुजान वी.पी.सिंह में रही ही होगी। उन्होंने बाद में कहा भी कि मैंने गोल कर दिया भले इस कारण मेरी टांग टूट गई।पर एक गद्दी से उतर कर वी.पी.सिंह कमजोर वर्ग के दिलों की गद्दी पर जरूर स्थायी रूप से बैठ गए। किसी राजनीतिक जीवन की इससे बड़ी सार्थकता और क्या हो सकती है ? बी.पी.मंडल के नेतृत्व में 1977 में गठित मंडल आयोग की रपट केंद्र सरकार को 1980 में ही मिल चुकी थी।पर उस रपट पर तीन -तीन बार संसद में चर्चा हुई थी। तत्कालीन कांग्रेसी गृह मंत्री आर.बेंकट रमण ने संसद में बहस का जवाब देते हुए साफ -साफ कह दिया था कि सरकार इसे लागू नहीं करेगी।यानी तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी इसे लागू नहीं कर सके।पर जनता दल ने तो अपने चुनाव घोषणा पत्र में भी इसे शामिल कर लिया है। वी.पी.सिंह के निधन के बाद प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’ में ठीक ही लिखा है कि ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने होने की शत्र्त पूरी की।मंडल लागू करवाने के कारण जो समझते हैं कि उनने अपने होने से धोखा किया, वे क्षात्र धर्म को नहीं जानते।’ दरअसल वी.पी.सिंह को भारतीय समाज की संरचना और राजनीति में उसके महत्व की अच्छी जानकारी थी। वे जानते थे कि पिछड़ों को सत्ता और नौकरियों में जगह देना कितना जरूरी है। न तो वी.पी. पर जातिवाद का आरोप था और न ही गद्दी के लिए अनैतिक समझौते का दाग था। वे अस्सी के दशक में भी उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके थे जबकि ऐसा करने की उनकी कोई मजबूरी नहीं थी।इस पृष्ठभूमि वाले नेता को जनहित में कोई निर्णय लेने से पहले उसके परिणामों की परवाह नहीं हुआ करती। वी.पी.सिंह के जीवन पर एक अच्छी पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने लिखी है।पुस्तक का नाम है ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह ः मंजिल से ज्यादा सफर।’यह नाम ही बहुत कुछ कह देता है।यह पुस्तक उनसे बातचीत पर आधारित है।इस बातचीत की खूबी यह है कि वी.पी.सिंह यह मान कर चल रहे हैं कि उन्हें अब आगे कोई पद नहीं लेना है।ऐसे में वे बेबाक बातें करते हैं।उस पुस्तक से वी.पी.सिंह के ही शब्दों में कुछ प्रकरण यहां प्रस्तुत है।‘सवाल ः कांग्रेस में क्या जाति आधारित गुटबाजी का चलन था ?जवाब ः पूरी तरह जातिवादी गुट नहीं बने हुए थे। एक हद तक ही उन्हें जातिवादी गुट कहा जा सकता है।कुछ नेता हर जाति में अपना प्रभाव रखते थे।हेमवतीनंदन बहुगुणा उन्हीें नेताओं में थे।कमलापति त्रिपाठी के इर्दगिर्द ब्राह्मण अधिक होते थे।लेकिन पं.कमलापति त्रिपाठी को जातिवादी नहीं कहा जा सकता।जाति की तरफ उनका झुकाव था लेकिन हेमवती नंदन बहुगुणा में वह भी नहीं था।सवाल ः जाति से परे जाकर देखें तो कांग्रेस में जो टकराव उस समय थे,उनकी जड़ें कहां कहां थीं ?जवाबःएक टकराव आर्थिक माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश में आजादी की लड़ाई में ब्राह्मणों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। उनके पास जमीन जायदाद कम थी। वह राजपूतों के पास थी।ज्यादातर जमींदार वही थे।रियासतें भी उन्हीें के पास थी।उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण रियासतें सिर्फ दो ही रही हैं।जमींदारों की दिलचस्पी आजादी की लड़ाई में कम थी।उनको अपनी जमींदारी चले जाने का खतरा दिखता था।कांग्रेस में यह तबका बाद में आया।लेकिन साधारण राजपूत तो शुरू से ही कांग्रेस में थे।ऐसे ही आजादी की लड़ाई में दलितों की प्रमुख भूमिका थी।कांग्रेस में जो सामाजिक ध्रुवीकरण बना था उसमें ब्राह्मण और दलित एक साथ थे।दलित और किसान की हिमायत में ब्राह्मण खड़े होते थे।इस कारण कांग्रेस के नेतृत्व समूह में ब्राह्मणांे की प्रमुखता थी।उस समय जाति का बोलबाला वैसा नहीं था,वह बाद में आया। सवाल ः उत्तर प्रदेश कांग्रेस के जनाधार खिसकने के खास कारण आप क्या देखते हैं ?जवाब ः कांग्रेस का स्वाभाविक नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथ में था।दूसरे वर्ग दलित और मुस्लिम भी थे।जब स्वाभाविक नेतृत्व स्थापित हो जाता है तो वह चलता रहता है।उनका नए समूहों से कई बार टकराव भी होता है।नेतृत्व यह समझ नहीं पाता कि नए समूहों को किस तरह जगह दें और उनको शामिल करें।यही कठिनाई कांग्रेस की भी थी।जो जनाधार कांग्रेस का था उसे वापस लाने में कामयाब नहीं हो सके।सवाल ः पहले फेयर फैक्स,फिर पनडुब्बी और उसके बाद बोफर्स तोप सौदे में दलाली का सवाल उठा।उसकी जांच की मांग कैसे उठी ?जवाब ः अखबारों में दस्तावेज आदि छपने लगे।उस समय जांच की मांग उठी।उसी समय छपा कि अजिताभ बच्चन का स्विट्जर लैंड में बंगला है।वे एक टूरिस्ट के रूप में गए थे।फिर बंगला कैसे खरीद लिया ?उस समय फेरा सख्ती से लागू होता था।सवाल ः क्या इसे आपने कहीं उठाया ?जवाब ः मैं उस समय कांग्रेस में था।संसदीय पार्टी की बैठकों में जाता था।वहां इसे उठाया।मैंने कहा कि प्रधान मंत्री जी आपने कहा है कि सच्चाई सामने लाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।कृपया इस सच्चाई का पता करिए।इसकी जांच होनी चाहिए।अगर यह सही नहीं है तो उस अखबार के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।उन्होंने कहा कि जांच करवाएंगे।सवालःराजीव गांधी से सीधी भेंट उस समय आपकी कहां हुई ?जवाब ः उन्होंने दो बार बुलाया।उन्होंने मुझसे पूछा कि यह क्या हो रहा है ?उनके सवाल में यह छिपा हुआ था कि मैं विपक्ष से हाथ मिला रहा हूं।मैंने कहा कि यह बातचीत राजीव गांधी और विश्व नाथ प्रताप में हो रही है।इस भ्रम में मत रहिए कि हमारी बातचीत प्रधान मंत्री और मंत्री के बीच हो रही है।सीधी बात है कि अगर आप यह महसूस करते हैं कि मैं आपके साथ राजनीतिक खेल, खेल रहा हूं तो इस बातचीत का कोई फायदा नहीं है।ऐसे ही अगर मेरे मन में यह है कि आप मेरे साथ राजनीति कर रहे हैं तो इस बातचीत से हम कहीं नहीं पहुंचेंगे।हममंे यह विश्वास और भरोसा होना चाहिए कि राजनीति आड़े नहीं आएगी।अगली बात यह है कि के.के.तिवारी और कल्प नाथ राय मुझे सी.आई.ए. एजेंट कहते हैं। मैं जानता हूं कि ये लोग लाउड स्पीकर हैं। माइक इस कमरे में लगा है जहां हम हैं। यहां से जो बोला जाता है वही लाउड स्पीकर पर बाहर सुनाई पड़ता है।उनकी हिम्मत कहां है कि वे मुझे सी.आई.ए.एजेंट कहें।सवाल ः राजीव गांधी ने क्या सफाई दी ?जवाब ः उन्होंने कहा कि पार्टी आपसे बहुत नाराज है।वे लोग भी नाराज हैं।इसलिए बोल रहे हैं।मैं इनसे कहूंगाा कि कम बोलें।मैंने उनसे कहा कि वे दस गाली दे रहे थे,अब दो गाली देंगे।कोई भ्रम न रहे इसलिए साफ -साफ कहा कि जो लोग गाली दे रहे हैं वे मेरी देश भक्ति पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं।जब देशप्रेम का सवाल आता है और जब भी आता है तो लोग जान की बाजी लगा देते हैं। अपना सिर कटा देते हैं और मैं भी अपनी देश भक्ति के लिए अंतिम दम तक ऐंड़ी जमा कर लड़ूंगा। सवाल ः इस पर उन्होंने क्या कहा ?जवाब ः राजीव गांधी ने कहा कि मैं इन लोगों को समझाउंगा। मैंने उनसे कहा कि देखिए आपकी मां के साथ काम करते हुए कांग्रेस नामक मशीन को हमने चलाया है। इसका एक- एक नट- बोल्ट हम जानते हैं। मेरे जैसे सेकेंड रैंकर लोगों ने हेमवती नंदन बहुगुणा को भगा दिया क्योंकि वे यह चाहती थीं। वे नहीं बोलीं। हमलोगों ने ही यह काम किया।
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