कानोंकान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कानोंकान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

भूख से अधिक भोजन के खिलाफ भी अभियान जरूरी

इन दिनों ‘चीनी छोड़ो अभियान’ की चर्चा है। पटना के बड़े चिकित्सकों के इससे जुड़ जाने से इसकी गंभीरता और भी बढ़ी है। लोगों पर इसका अच्छा असर दिख रहा है। पर एक दिक्कत आ रही है। सवाल है ंकि चीनी के बदले में हम जो गुड़ खरीदते हैं, वह कितना शुद्ध है!

कभी -कभी नकली और हानिकारक गुड़ कृत्रिम तरीके से बनाते हुए मिलावटखोर टी.वी. चैनलों पर नजर आते रहते हैं। ‘चीनी छोड़ो अभियान’ के साथ -साथ भूख से ‘कम खाओ अभियान’ की भी आज जरूरत है।
पांच साल पहले हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया भर में अति भोजन जनित मोटापा की समस्या, कुपोषण और भुखमरी की अपेक्षा अधिक बड़ी समस्या बन चुकी थी। उससे पहले बात उल्टी थी। आज तो स्थिति और भी खराब बताई जा रही है।

भारत के बारे में एक पुरानी कहावत है कि जितने लोग अति भोजन से मरते हैं, उससे कम ही लोग भोजन के अभाव में मरते हैं। मैंने खुद अपने कई परिचितों को अति भोजन का अभ्यस्त पाया। उनमें से शायद ही कोई व्यक्ति अपने शरीर की नियमित डाक्टरी या पैथोलाॅजिकल जांच कराता था। उनमें से कई व्यक्ति कम ही उम्र में  दुनिया से उठ गए।

अस्सी के दशक की बात है। न्यूयार्क टाइम्स के नई दिल्ली ब्यूरो चीफ माइकल टी. काॅफमैन पटना आए थे। उनके साथ भोजन का मौका मिला था। उन्होंने सिर्फ तली मछली के कुछ टुकड़े खाए। इधर मैंने चार रोटियों के साथ-साथ और भी बहुत कुछ खा लिया। बाद में मैंने अपने खानपान पर विचार किया। देखा कि मैं अति भोजन का आदी हो गया था। बहुत प्रयास के बाद आदत छूटी। आज यदि मैं एक रोटी से अधिक खा लूं तो असहज महसूस करता हूं। इसके बावजूद मैं बिना थके घंटांे काम करता हूं।

नियमित पैथोलाजिकल जांच कराने और अति भोजन से बचने का अभियान यदि बड़े डाॅक्टर चलाएं तो उसका अच्छा असर पड़ेगा। पर साथ-साथ राज्य सरकार कुकुरमुत्ते की तरह उग आए मानकरहित  पैथालाजिकल जांच केंद्रों पर ताले लगवाए। अच्छा है कि पटना हाईकोर्ट इस समस्या पर गंभीर है।  


अतिवादियों से दूर ही रहें नेता

अहमदाबाद विस्फोट के आरोपित तौसीफ का संबंध सिमी की बिहार शाखा का प्रधान रह चुका गुलाम सरवर से था। याद रहे कि तौसीफ को हाल में गया से गिरफ्तार किया गया। तौसीफ पर  आतंकवादी तैयार करने का आरोप है।

सिमी कैसा संगठन था, इस बात का पता एक बार फिरं देश को चला है। उसका घोषित उद्देश्य हथियारों के बल पर भारत में इस्लामिक शासन कायम करना था। जमात-ए-इस्लामी के छात्र संगठन के रूप में 1977 में सिमी का गठन अलीगढ़ में हुआ था। पर जब सिमी की अतिवादी गतिविधियों की खबर जमात-ए-इस्लामी को मिली तो उसने सिमी से अपना संबंध तोड़ लिया।

सिमी को 2001 में प्रतिबंधित किया गया। बाद में सिमी के लोगों ने मिल कर इंडियन मुजाहिद्दीन बना लिया है। इन दिनों आई.एम. किस तरह विस्फोटक कार्रवाइयां कर रहा है, यह हर जागरूक नागरिक को मालूम है। जिसे जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन से दुत्कार दिया, उसे हमारे देश के कुछ तथाकथित ‘सेक्युलर’ नेताओं ने अपना लिया।

करीब 15 साल पहले सिमी के समर्थन में कई राजनीतिक दल और उनके बड़े नेता सार्वजनिक रूप से उठ खड़े हुए थे। उनमें बिहार और उत्तर प्रदेश के चार बड़े नेता प्रमुख  थे। क्या वे नेता लोग जनता से इस बात के लिए अब माफी मांगेंगे कि सिमी को पहचानने में उनसे गलती हुई थी ? दरअसल ऐसी गलतियों के कारण ही भाजपा इस देश में मजबूत हुई है। पता नहीं माफी मांगेंगे या नहीं , पर कुछ ऐसे ‘सेक्युलरिस्ट’ नेतागण आज भी उसी तरह की गलतियां दुहरा रहे हैं।


डाॅ. स्वामी की चेतावनी

भाजपा के राज्यसभा सदस्य डाॅ. सुब्रमणियन स्वामी ने कहा है कि मैं अपनी जीवनी लिखूंगा और उसके बाद कई लोगों की प्रतिष्ठा समाप्त हो जाएगी। कौन -कौन लोग उनके दिमाग में हैं, यह तो वे ही जानते हैं। पर कुछ अनुमान जरूर लगाया जा सकता है। यानी राजनीतिक क्षेत्र के कुछ दिग्गज।

दरअसल डाॅ. स्वामी ने मनमोहन ंिसंह के शासनकाल में अनेक महाघोटालों को उजागर किया था। उन्होंने केस करके कई बड़ी हस्तियों को जेल भिजवाया। इस तरह 2014 चुनाव से पहले उन्होंने राजग के लिए राजनीतिक जमीन मजबूत की थी।

यानी 2014 की जीत में कुछ योगदान तो स्वामी का भी रहा। इसके एवज में उन्हें कैबिनेट मंे एक सीट तो मिलनी ही चाहिए थी। इसकी उम्मीद वह कर रहे थे। पर उनका दबंग व्यक्तित्व और कुछ मामलों में उनकी अतिवादी सोच के कारण वह नहीं हो सका।

उधर मोदी कैबिनेट में डाॅ. स्वामी के एक कट्टर विरोधी मजबूत स्थिति में हैं। अतः भविष्य में भी कोई चांस नहीं लगता। इस पृष्ठभूूमि में यदि डाॅ. स्वामी कोई विस्फोटक किताब लिखकर कुछ लोगों को बेनकाब करते हैं तो इसमें किसी को एतराज नहीं होना चाहिए। आम लोगों को भी यह जानने का हक है कि किस दल का कौन नेता देश की सेवा कर रहा है या कोई और धंधा। यह सब बताने की हिम्मत कम ही लोग में है। उन साहसी लोगों में डाॅ.  स्वामी भी  हंै।


बुलेट ट्रेन तो ठीक, पर आम यात्रियों की भी सुध लीजिए!

इस देश में बुलेट ट्रेन आ रही है। कुछ लोगांे को वह भी चाहिए। सरकार तो सबके लिए होती है। पर अब रेल ंत्री को चाहिए कि वह आम यात्रियों पर भी ध्यान दें। पिछली बार जब मैंने रेल यात्रा की थी तो यह अनुभव हुआ कि सेकेंड ए.सी. के शौचालय का दरवाजा टूटा हुआ है। किसी तरह काम चलाया।

अन्य समस्याएं अनेेक हैं। मोदी सरकार के आने के बाद लोगांे में उम्मीद बंधी थी। पर पता नहीं क्यों चीजें नहीं सुधर रही हैं। 

क्यों नहीं सुधर रही हैं, उस संबंध में एक खबर जवाब देगी। हजारों गैंग मैन रेलवे के बड़े अफसरों की निजी सेवा मंे हैं और उधर पटरियां असुरक्षित हैं। दुर्घटनाएं हो रही हैं। जिस महकमे में ऐसे -ऐसे अफसर हों, वहां किस तरह की उम्मीद आप कर सकते हैं? 


एक भूली बिसरी याद 

प्रधानमंत्री बनने से पहले तक लाल बहादुर शास्त्री के पास अपनी कोई निजी कार नहीं थी। याद रहे कि उससे पहले वे देश के गृहमंत्री और रेलमंत्री रह चुके थे। प्रधानमत्री बनने के बाद परिवार के सदस्यों ने उनसे कहा कि कम से कम अब तो एक अपनी कार होनी चाहिए। शास्त्री जी मान गए। उन्होंने अपना बैंक खाता चेक किया। उसमें 7 हजार रुपए थे। फिएट कार की कीमत उन दिनों 12 हजार रुपए थी। उन्होंने 5 हजार रुपए बैंक से कर्ज लिया।

कर्ज वापस करने से पहले ही शास्त्री जी का निधन हो गया। परवर्ती प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा कि इस कर्ज को हम माफ कर देना चाहते हैं। दिवंगत नेता की विधवा ललिता शास्त्री ने मना कर दिया। पेंशन के पैसे से कर्ज का भुगतान हुआ।   


और अंत में

स्वच्छ भारत अभियान का काम जहां से शुरू करना चाहिए था, वहां से नहीं हो रहा है। पहले तो देखना चाहिए कि देश के महानगरों और नगरों में जो वेतन भोगी सफाईकर्मी हैं, क्या उनकी संख्या पर्याप्त हैं ?
कार्यरत सफाई कर्मियों में से कितने कर्मी अफसरों के घरेलू नौकर बने हुए हैं और कितने सरजमीन सक्रिय हंै ? जिन सफाईकर्मियों को वेतन मिल रहे हैं, उनमें से कितने बोगस हैं और कितने असली ?
सफाई के काम के लिए ठीके पर लगाई गयी निजी एजेंसियों के साथ निकायों के अफसरों के घूसखोरी के रिश्ते की खबर में कितनी सच्चाई है ? 

(प्रभात खबर पटना में 22 सितंबर 2017 को प्रकाशित)

शनिवार, 22 जुलाई 2017

भ्रष्टाचार को क्यों बनने दिया गया लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज

महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार और पाखण्ड को लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज नहीं बनने दिया जाना चाहिए जैसा कि आज हो गया है।’ आजादी के तत्काल बाद सरकारों में जो कुछ हो रहा था, उससे महात्मा गांधी चिंतित थे। उन्होंने भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलने पर बिहार के एक कैबिनेट मंत्री को पदच्युत कर देने की सलाह दी थी। पर उनकी बात नहीं मानी गयी।

1967 के आम चुनाव में बिहार में कांग्रेस की पहली बार पराजय हुई थी। उस पराजय के लिए जिम्मेवार नेताओं में उस खास नेता के भ्रष्टाचरण का सबसे बड़ा ‘योगदान’ बताया गया।

आजादी के तत्काल बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका दिया जाना चाहिए।’ नेहरू ने इसकी जरूरत समझी होगी तभी तो कहा होगा। पर यह काम भी वह नहीं कर सके। भ्रष्ट लोग फलते-फूलते गये।

पहले भ्रष्ट लोग ‘अंडे’ से अपना काम चला लेते थे। बाद में ‘मुर्गी’ को ही मार कर खाने लगे। समय बीतने के साथ सरकारी पैसों की इतनी लूट होने लगी कि टिकाऊ संरचना बनना भी कठिन होने लगा। अब तो देश में ‘प्राक्कलन घोटाले’ का दौर है।

प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने कहा था कि ‘सत्ता के दलालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।’ राजीव ने सत्ता के दलालों का वर्चस्व देखा होगा तभी तो कहा होगा। पर दलालों के खिलाफ भी कार्रवाई नहीं हो सकी। उल्टे विडंबना यह रही कि बोफर्स दलाली के शोर के बीच ही 1989 के चुनाव में केंद्र में कांग्रेस की सरकार की पराजय हो गयी। 1991-1996 की नरसिंह राव की सरकार अल्पमत की  सरकार थी। बाद के वर्षों में कभी कांग्रेस को लोकसभा में अपना बहुमत नहीं हुआ। समय बीतने के साथ स्थिति बिगड़ती चली गयी। इसी पृष्ठभूमि में सन 2003 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह ने कह दिया था कि ‘राजनेता कैंसर हैं जिनका इलाज अब संभव नहीं।’ तब अनेक लोग लिंगदोह से असहमत थे। पर यह जरूर मानने लगे थे कि चीजें तेजी से बिगड़ रही हैं।

राज्यसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता मनमोहन सिंह ने 1998 में कहा था कि ‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है।’ उन्होंने सड़न देखी होगी तभी तो कहा होगा। पर जब श्री सिंह खुद प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उस सड़न को रोकने के लिए क्या किया ?

उल्टे उन्होंने जो कुछ किया, वह सब देश ने देखा और भोगा। 2014 के चुनाव में कांग्रेस लोकसभा में 44 सीटों पर सिमट गयी। इस देश के अधिकतर नेताओं ने प्रतिपक्ष में रहने पर तो अपने राजनीतिक विरोधियों के भ्रष्टाचार पर खूब हायतोबा मचायी। पर जब वे सत्ता में आए तो खुद बहती गंगा में हाथ धोया। अपवादों की बात और है।
अपवाद स्वरूप जो भी अच्छे नेता इस देश में बचे हुए हैं, वे या तो सत्ता के मोह में डूबे हुए हैं या फिर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ बौने साबित हो रहे हैं। सत्ता संभालते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को आश्वासन दिया था कि ‘मैं न तो खाऊंगा और न ही किसी को खाने दूंगा।’ मोदी मंत्रिमंडल के किसी सदस्य पर तो घोटाले का अब तक कोई आरोप नहीं लगा है, पर सरकार के दूसरे अंग लगभग पहले ही जैसे ‘काम’ कर रहे हैं। लगता है कि वे मोदी से भी अधिक ताकतवर हैं।

संभवतः इसीलिए तीन साल के शासनकाल के बाद भी प्रधानमंत्री को 6 अप्रैल 2017 को साहिबगंज में यह कहना पड़ा कि ‘भ्रष्टाचार और ब्लैक मनी ने दीमक की तरह चाटकर इस लोकतंत्र को बर्बाद कर दिया है। इसके खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा।’ पर सवाल है कि लोगबाग कब तक प्रतीक्षा करेंगे ?

मोदी सरकार की उपलब्धि और विफलताओं का सही आकलन तो 2019 में हो जाएगा। पर इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी याद आती है। उसने 5 अगस्त 2008 को ही कह दिया था कि ‘भगवान भी इस देश को नहीं बचा सकता है।’ इस विकट स्थिति में इस देश के नेताओं तथा अन्य क्षेत्रों के जागरूक और देशभक्त लोगों का क्या कर्तव्य बनता है ?

क्या भ्रष्ट नेताओं और अफसरों तथा इसी तरह के अन्य लोगों के खिलाफ देशहित में कठोर कार्रवाई होनी चाहिए या फिर यह तर्क दिया जाना चाहिए कि चूंकि पहले के लोगों ने इस देश को लूटा है, इसलिए हमें भी लूट लेने का जन्मसिद्ध अधिकार हासिल है?


मधु लिमये से एन.सी. सक्सेना तक के एक ही स्वर 

वैसे मधु लिमये तो 1988 में ही इस नतीजे पर पहुंच गए थे कि ‘मुल्क के शक्तिशाली लोग इस देश को बेच कर खा रहे हैं।’ सन 1998 में तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एनसी. सक्सेना ने कहा कि ‘इस देश में भ्रष्टाचार में जोखिम कम और लाभ ज्यादा है।’

याद रहे कि सक्सेना की इस टिप्पणी के बावजूद ‘जोखिम अधिक और लाभ कम’ करने वाले किन्हीं कानूनी प्रावधानों की जरूरत इस देश की सरकारें नहीं समझ पा रही हैं। इस दिशा में आधे -अधूरे मन से कहीं कुछ काम भी हुए हैं तो उसका कोई खास लाभ देश को नहीं मिल रहा है। याद रहे कि मधु लिमये ऐसे नेता थे जो न तो स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेते थे और न ही पूर्व सांसद पेंशन। अखबारों में लिखे अपने लेखों के पारिश्रमिक से ही वह जीवन यापन करते थे।


अब जरा आज के नेता को देखिए !

केंद्र सरकार प्रत्येक सांसद पर हर माह 2 लाख 70 हजार रुपए खर्च करती है। यह आंकड़ा 2015 का है। इसके बावजूद इस बुधवार को राज्यसभा में सपा के नरेंश अग्रवाल ने कहा कि मौजूदा तनख्वाह से सांसदों का काम नहीं चल रहा है। सांसदों का दबाव जारी रहा तो सरकार 2.70 लाख की राशि देर-सवेर बढ़ा ही देगी।

यह सब ऐसे देश में हो रहा है जहां के सरकारी अस्पतालों के पास सभी गंभीर मरीजों के लिए भी इलाज की व्यवस्था तक नहीं है। क्योंकि सरकारें धनाभाव से जूझ रही हंै। आए दिन यह खबर आती रहती है कि अस्पताल में मृतक मरीज के लिए शव वाहन का प्रबंध नहीं हो सका। कहीं शव दोपहिया पर ढोया जाता है तो कहीं ठेले पर।

पटना के एक बड़े सरकारी अस्पताल की ताजा खबर यह है कि अस्पताल के भीतर गंभीर मरीज को परिजन चादर पर रखकर उठा रहे हैं और एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा रहे हैं।


पटना एम्स की मारक उपेक्षा

पटना में स्थापित एम्स में भी साधन के अभाव में मरीजों का उचित इलाज नहीं हो पा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अस्सी के दशक में पटना में विद्यार्थी परिषद के नेता थे। परिषद की खबरों के हैंड आउट लेकर अखबारों के दफ्तरों का चक्कर लगाते मैंने उन्हें देखा था। यानी उनका बिहार से जो लगाव होना चाहिए था, वह नहीं है।
जबकि दिल्ली एम्स के कुल मरीजों में बिहार के मरीजों का प्रतिशत 40 है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पटना के निर्माणाधीन एम्स का निर्माण जल्द पूरा कर लिया जाना चाहिए था।

2004 में इस पटना एम्स का शिलान्यास हुआ था। अब तक 50 प्रतिशत काम भी पूरा नहीं हुआ है। दरअसल केंद्र सरकार पूरा फंड ही नहीं देती। हां,सांसदों के वेतन भत्ते के लिए उसके पास पैसों की कभी कोई कमी नहीं रहती।


लोकसभा टी.वी. और राज्यसभा टी.वी.

अब तक राज्यसभा टी.वी. और लोकसभा टी.वी. के अलग- अलग राजनीतिक स्वर रहे हैं। अब वह बात नहीं रहेगी। वैसे पहले दो स्वर होने के कारण भी रहे हैं। लोकसभा की स्पीकर पहले भाजपा की नेता थीं। राजग का बहुमत राज्यसभा में नहीं है। राज्यसभा के निवर्तमान सभापति यानी उपराष्ट्रपति कांग्रेसी पृष्ठभूमि के रहे हंै। अब उस पद को अगले उपराष्ट्रपति संभालेंगे। वह भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

अब या तो राज्यसभा टी.वी. और लोकसभा टी.वी. का विलयन हो जाएगा या फिर पिछले विरोधाभास की समाप्ति हो जाएगी।


और अंत में

  संविधान के अनुच्छेद- 212 के अनुसार ‘न्यायालयों द्वारा विधायिकाओं की कार्यवाहियों की जांच नहीं की जा सकेगी।’ जब संविधान बना था, उन दिनों सदन की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की सुविधा नहीं थी। देवताओं के बारे में राज्यसभा में एक सपा नेता के कुवचन को देखते हुए अब नयी व्यवस्था की जरूरत आ पड़ी है। या तो सदनों में उच्चारित ऐसे कुवचनों के खिलाफ अदालत में मुकदमा चलाने की संवैधानिक छूट मिले या फिर सदन की कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण यथाशीघ्र बंद हो।

 (इसका संक्षिप्त अंश 21 जुलाई 2017 के प्रभात खबर (बिहार) में प्रकाशित)

रविवार, 16 जुलाई 2017

सजायाफ्ता कर्मचारी मंजूर नहीं तो नेताओं को क्यों मिले छूट

इस देश की सरकार किसी सजायाफ्ता को चपरासी तक की नौकरी नहीं देती। पर  सजायाफ्ता नेता, प्रधानमंत्री के पद तक भी पहुंच सकता है। इस तरह की विसंगतियों को दूर करने की उम्मीद नरेंद्र मोदी सरकार से कुछ लोग कर रहे थे। पर उन्हें अब निराशा हो रही है। जब सजायाफ्ता नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक की मांग को लेकर जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी तो केंद्र सरकार ने उस पर अपनी मंशा जाहिर कर दी।

केंद्र सरकार के वकील ने कहा कि यह मामला सुनवाई के लायक ही नहीं। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने यह ठीक ही सवाल उठाया है कि ऐसे में जब सरकारी कर्मचारियों और न्यायिक पदाधिकारियों पर आजीवन पाबंदी लग जाती है तो जनप्रतिनिधियों पर क्यों नहीं लगे ? उन्होंने राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण और भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि में यह याचिका दायर की है। इस याचिका पर 19 जुलाई को  सुनवाई होगी।

गत बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को फटकारा। आयोग इस मुद्दे पर कोर्ट को यह नहीं बता रहा है कि वह आजीवन प्रतिबंध के पक्ष में है या नहीं। संभवतः आयोग इस मामले में केंद्र सरकार के रुख के अनुसार ही काम कर रहा है। राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टीकरण से ऊबे इस देश के अनेक लोग सुप्रीम कोर्ट से ही यह उम्मीद कर रहे हैं कि वह इस मामले में सरकार को सख्त निर्देश दे। अन्यथा कुछ दिनों के बाद संविधान की रक्षा करना और भी मुश्किल हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट को ही तो देखना है कि इस देश में संविधान के अनुसार काम चल रहा है या नहीं। यदि राजनीति में भ्रष्ट और अपराधी लोगों की बढ़ती संख्या की रफ्तार को तत्काल नहीं रोका गया तो विधायिकाएं भ्रष्टाचार और अपराध के आरोपियों से पूरी तरह भर जाएंगी। अभी उनकी संख्या सदन की कुल संख्या की एक तिहाई है। याद रहे कि  किसी सांसद या विधायक को कम से कम दो साल की सजा मिलने के तत्काल बाद उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है। पर सजा पूरी हो जाने के छह साल बाद वह फिर से चुनाव लड़ सकता है।



यूं हुई अच्छे कार्यकर्ताओं की कमी

जब तक इस देश में संयुक्त परिवारांे का दौर चलता रहा, अच्छी मंशा वाले राजनीतिक कार्यकर्ता विभिन्न राजनीतिक दलों को मिलते रहे। पर अब तो लघु परिवारों का जमाना है। अब भी जहां-तहां संयुक्त परिवार मौजूद हैं, पर उनकी संख्या कम होती जा रही है।

पहले संयुक्त परिवार से निकले राजनीतिक कार्यकर्ता के पत्नी और बाल-बच्चों की देखरेख संयुक्त परिवार कर देता था। यानी सच्चे राजनीतिक कार्यकर्ता बनने की इच्छा रखने वालों के लिए नौकरी करने की मजबूरी नहीं थी।

पर आज तो सबको अपने-अपने लघु परिवार का पालन-पोषण खुद ही करना है। इसलिए कोई व्यक्ति राजनीतिक कर्म में लगता भी है तो वह निजी खर्चे के लिए राजनीति या शासन से ही पैसे निकालना चाहता है। हालांकि सारे राजनीतिक कार्यकर्ता ऐसे नहीं हैं। कुछ कार्यकर्ता अब भी निःस्वार्थ भाव से राजनीति में लगे हुए हैं। पर अनेक कार्यकर्ताओं को या तो कोई ठेकेदारी चाहिए या दलाली का धंधा।

अपराध के धंधे में भी काफी पैसे हैं। राजनीति के पतन का यह बड़ा कारण है। पता नहीं इस स्थिति से देश की राजनीति को कौन बचाएगा ? मौजूदा राजनीति न  तो भ्रष्टाचार और न ही अपराध पर निर्णायक हमले की स्थिति में है। राजनीति की इन दो विपदाओं को जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक की ताकत भी बढ़ाती जा रही है।



संकट में दोस्तों की पहचान

1967 में विदेश मंत्री एम.सी. छागला ने लोकसभा में कहा था कि भारत-चीन सीमा विवाद पर सोवियत संघ अब भारत के पक्ष को समझ गया है और वह हमें ही सही मानता है। पर 1962 में चीन ने जब भारत पर हमला किया तो सोवियत संघ ने हमें मदद करने से साफ मना कर दिया था। तब वह हमारे देश का पक्ष समझने को भी तैयार नहीं था। उसने कहा था कि चीन हमारा भाई है और भारत हमारा दोस्त। यानी दोस्त के लिए कोई भाई से झगड़ा नहीं करता।

हां, तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने न चाहते हुए भी अमेरिका से मदद मांगी। चीन सीमा से इस आशंका से पीछे हट गया था कि कहीं अमेरिका हस्तक्षेप न कर दे। उससे पहले भारत अमेरिका से दोस्ताना संबंध नहीं रखना चाहता था। दूसरी ओर वह सोवियत संघ से घनिष्ठ संबंध के पक्ष में रहा।

आज भी जब हमारे  देश पर युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, तो हमें विभिन्न देशों से दोस्ती के सिलसिले में अपने हितों को ध्यान में रखना चाहिए न कि किन्हीं अन्य बातों कोे। दुनिया के अन्य सभी देश भी अपने राष्ट्रीय हितों का ही ध्यान रखते हैं। पर हमारे ही देश में ऐसी राजनीतिक शक्तियां भी हैं जो परमाणु परीक्षण करने पर   चीन की तो तारीफ करती हैं, पर वही काम जब भारत सरकार करती है तो वह उसका विरोध करती है। 



कांग्रेसी वकील क्यों नहीं दिखाते करामात  

टू जी स्पैक्ट्रम आवंटन घोटाले में जीरो लाॅस का सिद्धांत पेश करने वाले मशहूर वकील कपिल सिब्बल ने अब एक नयी ‘थ्योरी’ पेश की है। स्पैक्ट्रम की नीलामी शुरू होते ही सिब्बल की जीरो लाॅस थ्योरी तो फेल हो गयी। अब देखना है कि उनकी नयी थ्योरी पास होती है या फेल!

सिब्बल का आरोप है कि भाजपा के सत्ताधारी नेताओं के यहां आयकर और ईडी के छापे क्यों नहीं पड़ रहे हैं ? क्या वे सब के सब स्वच्छ हैं ? सिर्फ गैर राजग दलों के नेता ही दागी हैं ? कपिल साहब के सवाल में दम है। यदि जनहित याचिकाओें के मामलों में कपिल सिब्बल, डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी और प्रशांत भूषण की राह अपना लें तो उन्हें इसका रोना नहीं रोना पड़ेगा कि केंद्र सरकार एकतरफा कार्रवाई कर रही है।

डाॅ. स्वामी और प्रशांत भूषण ने मनमोहन सिंह के शासनकाल में सिर्फ कपिल सिब्बल की तरह रोना तो नहीं रोया था। उन्होंने जनहित याचिकाओं के जरिए जांच एजेंसियों को ऐसी हस्तियों के खिलाफ भी कार्रवाई करने को मजबूर कर दिया था  जिन्हें मनमोहन सरकार बचा रही थी। 

यदि सिब्बल के पास भाजपा नेताओं के खिलाफ वैसे ही ठोस सबूत हैं तो वह जनहित याचिकाओं का सहारा क्यों नहीं ले रहे हैं ? सिब्बल तो बड़े काबिल वकील हैं। क्या उनके लिए जनहित याचिकाओं का रास्ता बंद है ? या फिर उनके पास कोई सबूत ही नहीं है ? क्या सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए बयान देना इतने बड़े वकील को शोभा देता है ?

अपनी सरकार में शामिल लुटेरों के खिलाफ मनमोहन सिंह सरकार जब कार्रवाई नहीं कर सकी जिस सरकार के खुद सिब्बल भी मंत्री थे तो वह मोदी सरकार से ऐसी उम्मीद क्यों कर रहे हंै ? आम धारणा यह है कि लगभग सभी दलों में चोर और लुटेरे घुसे हुए हैं। हालांकि उन्हीं के बीच ईमानदार नेता भी हैं। सत्ताधारी दल अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई करेगा ही।

पर राजग विरोधी दलों को भी चाहिए कि वे भी अपने बीच से ‘डाॅ. स्वामी’ और ‘प्रशांत भूषण’ तैयार करंे ताकि दोनों पक्षों के लुटेरों को उनके सही स्थान पर पहुंचाया जा सके।



और अंत में

एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता ने गुरुवार को मीडिया से कहा कि सी.बी.आई.जितने मामलों की जांच करती है, उनमें से सिर्फ 30 प्रतिशत मामलों में ही वह आरोपितों को अदालतों से सजा दिलवा पाती है। पर सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार ने गत अप्रैल में लोकसभा में बताया कि वह दर 66 दशमलव 8 प्रतिशत है। प्रवक्ता जी यह कहना चाहते थे कि बहुधा सी.बी.आई. झूठे केस तैयार करती है  जो अदालतों में नहीं टिकते। सी.बी.आई. की आलोचना से पहले अपने आंकड़े तो ठीक कर लीजिए प्रवक्ता जी ! 

(प्रभात खबर में 14 जुलाई 2017 को प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से)

शुक्रवार, 30 जून 2017

इमरजेंसी के बहाने नागार्जुन के बारे में कुछ खट्टी-मीठी बातें

एक व्यक्ति ने एक जगह हाल में लिखा कि नागार्जुन ने ‘इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आपको’ वाली चर्चित कविता इमरजेंसी में ही लिखी थी। शायद वह यह कहना चाहते थे कि इमरजेंसी में भी प्रधानमंत्री की आलोचना करने की छूट थी।

इमरजेंसी और नागार्जुन को इतना कम जानने वाले लोग भी इस बार आपातकाल पर हुई चर्चाओं में शामिल हो गए।


याद रहे कि 25 जून 1975 की रात में इस देश में इमरजेंसी लगी थी। 25 जून को हर साल इमरजेंसी पर कुछ चर्चाएं होती हैं। कुछ लेख अखबारों में छपते हैं। संयोग से 30 जून बाबा नागार्जुन का जन्मदिन भी है। पर इस बीच के दशकों में इमरजेंसी लगाने वाली पार्टी और इमरजेंसी भुगतने वाले दल सत्ता के लिए आपस में मिलते-बिछुड़ते रहे। इसलिए नयी पीढि़यां इमरजेंसी के असली स्वरूप से पूरी तरह अवगत नहीं हो सकी। उनमें से अधिकतर लोगों के पास इस संबंध में जानकारी अधकचरी है या एकतरफा है। दरअसल उन्हें बताने वालों की ही कमी पड़ गयी।


अब नागार्जुन की उस चर्चित कविता के बारे में कुछ बातें।

नागार्जुन की कविता की कुछ पंक्तियां यूं हैं --
इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको ?
सत्ता की मस्ती में भूल गयीं बाप को !
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को।

इमरजेंसी में पुलिस किसी को ऐसी कविता गुनगुनाते हुए भी देख लेती तो उसकी जगह जेल होती। दरअसल यह कविता इमरजेंसी से पहली लिखी गयी थी। जेपी आंदोलन के दौरान की जनसभाओं और नुक्कड़ सभाओं में बाबा इस कविता का भी अक्सर पाठ करते थे। बल्कि यह कविता इमरजेंसी से पहले ही पटना के एक दैनिक अखबार में छप भी चुकी थी। 




फर्नांडिस ने किया था कविता पर मीठा एतराज़

1974 के जेपी आंदोलन के दौरान वैशाली जिले के महनार मेंं जनसभा हो रही थी। मुख्य वक्ता जार्ज फर्नांडिस थे। ऐसी सभाओं के लिए नागार्जुन की तब बड़ी मांग थी। स्वाभाविक था कि वहां बाबा भी थे। एक रिपोर्टर के रूप में मैं भी था।

पहले बाबा ने मंच से अपनी यह मशहूर कविता पढ़ी। खूब तालियां बजीं। पर जब बोलने के लिए जार्ज खड़े हुए तो बाबा की इस कविता से ही अपनी बात शुरू की। जार्ज ने कहा कि ‘इंदु जी इंदु क्या हुआ आपको और भूल गयीं बाप को’, यह लाइन सही नहीं है। दरअसल इनके बाप भी ऐसे ही थे। हालांकि श्रोताओं में जार्ज की इस बात की ग्राह्यता उतनी नहीं थी जितनी बाबा की उस कविता की। खैर यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि बाबा जेपी आंदोलन में थे। जेपी उनका बड़ा ख्याल रखते थे।


उस दौरान बाबा जेल भी गए। आंदोलन पर पुलिस दमन के विरोध स्वरूप बाबा ने  बिहार सरकार से मिल रही मासिक पेंशन को भी लेने से मना कर दिया था। हालांकि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। पेंशन मना करने वालों में रेणु भी थे। 4 नवंबर 1974 को जब पटना में जेपी पर पुलिस ने लाठी चलाई तो उसके विरोध में फणीश्वरनाथ रेणु ने तो पद्मश्री लौटा दी थी।


खैर बाबा का बाद के दिनों में जेपी आंदोलन से मन उचट गया था। दरअसल आंदोलन में शामिल कुछ अनुशासनहीन छात्रों से बाबा अधिक दुःखी थे। ऐसे उदंड आंदोलनकारियों से बाबा का बक्सर जेल में पाला पड़ गय़ा था। कुछ अन्य बातें भी रही होंगी।


बाद में उन्होंने आंदोलन से अलग होकर उस जेपी आंदोलन के खिलाफ भी एक जोरदार कविता लिख दी थी। जेपी आंदोलन में शामिल कुछ लोगों ने बाद के दशकों में जैसे-जैसे गुल खिलाए, उनपर बाबा की वह कविता सटीक बैठती है।


हालांकि सारे आंदोलनकारी वैसे ही नहीं साबित हुए।




जरा ढंग से हो पैथ लैब की जांच

एक अच्छी खबर है। पटना हाईकोर्ट के आदेश पर राज्य सरकार पैथ लैब की जांच कर रही है। कई फर्जी पाए गए। फर्जी लैब और फर्जी पैथोलाॅजिकल जांच से अनेक मरीजों का बड़ा नुकसान हो जाता है। कई मामलों में ऐसा नुकसान जिसकी कभी भरपाई नहीं हो पाती।

सवाल है यह कि जांच सिर्फ पंजीयन और तकनीकी स्टाफ की मौजूदगी की ही हो रही है या पैथोलाॅजिकल जांच की गुणवत्ता की भी जांच हो रही है ?


एक सलाह है। जो लोग इस जांच के काम में लगे हैं, वे नमूना के तौर पर एक व्यक्ति के खून के तीन नमूनों की जांच तीन लेबोरेटरी में करवा कर देखें। यदि जांच रिजल्ट समान आता है तो खुशी की बात है। यदि नहीं तो सरकार उस मर्ज का भी स्थायी इलाज करे। तभी मरीजों का पूरा कल्याण हो पाएगा।




पैरवीकारों के प्रकाशित हों नाम 

जो व्यक्ति सरकारी जमीन बेचने के आरोप में पहले ही जेल जा चुका हो, उसकी पटना में डी.सी.एल.आर के पद पर तैनाती हैरान करती है। पर जहां जिसके पैरवीकार ताकतवर लोग हों, वहां कुछ भी असंभव नहीं। अभी फरार डी.सी.एल.आर. मिथिलेश कुमार सिंह पर पटना के कंकड़बाग पावर सब स्टेशन की जमीन गैर कानूनी तरीके से बेचने का आरोप है। जाहिर है कि जमीन करोड़ों की है।


इससे पहले के वर्षों में भी मिथिलेश कुमार सिंह पर आरोप लगते रहे। पर उसके बावजूद वह महत्वपूर्ण जगहों पर पोस्टिंग पाते रहे। ऐसा उच्चस्तरीय पैरवी से ही संभव है। ऐसी पैरवी में नेता, बड़े अफसर और रिश्वत कारगर होते हैं। कुछ मामलों में तो तीनों एक साथ। यदि मिथिलेश को इस केस में अंततः अदालत से सजा हो जाती है तो राज्य सरकार को चाहिए कि वह उनके पैरवीकारों के नाम राज्य के मंत्रियों और अफसरों में वितरित करा दे ताकि अब से उनकी जायज पैरवी पर भी कोई मंत्री-अफसर ध्यान नहीं दे। अन्य मामलों में भी ऐसा ही हो। भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए यह कारगर तरीका बन सकता है। 




ऐसे संभव है किन्नरों की मदद

 किन्नरों के सामने भी बेरोजगारी की समस्या है। इनका उपयोग कर्ज और बकाया वसूली के काम में हो सकता है। देश भर में बैंक और नगर निकाय के समक्ष बकाया और टैक्स वसूली की समस्या मुंह बाए खड़ी रहती हैं।

 2006 में पटना नगर निगम ने किन्नरों को वसूली के काम में लगा कर ऐसा प्रयोग किया भी था। उन्हें कमीशन मिलता था। वसूली के काम में कुछ सफलता भी मिली थी। पर पता नहीं, उसे क्यों बंद कर दिया गया!

किन्नर गाना-बजाना करके कुछ ही देर में बकायएदारों के यहां से आसानी से पैसे वसूल लेते हैं। कल्पना कीजिए कि जो बैंकों के कर्ज की किश्तें जान बूझकर नहीं दे रहा है। उसके दरवाजे पर पुलिस की सुरक्षा में रोज दस-पांच किन्नर पहुंच जाएं। वे रोज तीन -चार घंटे उसके घर के सामने अपना कार्यक्रम चलाएं। उनसे कर्ज लौटाने की गुजारिश करे। फिर क्या होगा ? अधिकतर मामलों में तीन चार दिनों में ही पैसे निकलने लगेंगे। 



और अंत में

महागठबंधन के आंतरिक विवाद को लेकर जिस तरह की टिप्पणी की प्रतीक्षा थी, अंततः वह भी आ ही गयी। एक बड़े नेता ने कहा कि कोई मतभेद नहीं है। सब मीडिया की साजिश है। ऐसी टिप्पणी चुनाव के दिनों में अधिक सुनने को मिलती है।


जब कोई पार्टी चुनाव जीतती है, तब तो वह कहती है कि ऐसा हमारे पुण्य प्रताप से हुआ। पर जब हारती है तो कह देती है कि मीडिया ने कुप्रचार करके हरवा दिया। मीडिया के लोगों को ऐसी बातें सुनने की आदत सी पड़ गयी है। 


वैसे अच्छा हुआ कि महागठबंधन का झगड़ा सुलझ गया। उम्मीद है कि उसकी सरकार विकास और सुशासन के काम में नए उत्साह के साथ लग जाएगी।


(प्रभात खबर पटना में 30 जून 2017 को प्रकाशित )

शुक्रवार, 23 जून 2017

भ्रष्टों के खिलाफ स्टिंग आॅपरेशन में क्यों नहीं लगते ईमानदार लोग !

कल्पना कीजिए कि कुछ उत्साही और ईमानदार लोग मिलकर एक ऐसा संगठन बना लें जो भ्रष्टाचार व अपराध के खिलाफ सिर्फ स्टिंग आपरेशन करें यानी ‘डंक अभियान’ चलाए ? जाहिर है कि वह संगठन रातोंरात देश में लोकप्रिय हो जाएगा।

क्योंकि आज बिहार सहित पूरे देश में आम लोग सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचार से काफी परेशान हैं। आज हर क्षेत्र के भ्रष्ट लोग इतने अधिक ताकतवर हो चुके हैं कि उनके खिलाफ अधिकतर मामलों में शासन की ओर से निर्णायक और सबक सिखाने वाली कार्रवाई नहीं हो पा रही है। ईमानदार मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री भी भ्रष्ट सरकारी अफसरों और कर्मियों पर काबू पाने में कई बार खुद को असमर्थ पाते हैं।

अपने मुख्यमंत्रित्व काल के प्रारंम्भिक वर्षों में नीतीश कुमार ने अपने दल के लोगों  से अपील की थी कि वे भ्रष्ट सरकारी कर्मियों को पकड़ने में निगरानी ब्यूरो की मदद करें। पर ऐसा नहीं हो सका। क्योंकि अपवादों को छोड़ दें तो आज अधिकतर राजनीतिक दलों में ऐसे ही कार्यकर्ताओं की भरमार है जो बिना कुछ किए रातोंरात कुछ पा लेना चाहते हैं। 

दरअसल स्टिंग आपरेशन वही लोग चला सकते हैं जो निःस्वार्थ समाज सेवा की भावना से ओतप्रोत हों। कुछ निजी चैनल के पत्रकार ‘डंक अभियान’ चलाते रहते हैं। उस अभियान का सकारात्मक असर भी पड़ता है। कई बार सरकार और विधायिका भी डंक अभियान पर कार्रवाई करने को बाध्य हो जाती है। 2005 में संसद ने अपने 11 सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने भी बाद में संसद के उस फैसले पर अपनी मुहर लगायी। उन सांसदों पर सदन में प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत लेने का आरोप था। उनमें से राज्य सभा के एक सदस्य पर तो सांसद फंड के बदले में घूस लेने का आरोप था। ये सभी सांसद एक स्ंिटग आपरेशन में पकड़ में आ गए थे। पर इस देश में भ्रष्टाचार की भीषण समस्या की व्यापकता को देखते हुए इस काम में अधिकाधिक लोगों के लग जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। अन्यथा देर हो जाएगी। 

अपनी सरकार में भ्रष्टाचार से परेशान एक राज्य के मुख्यमंत्री ने कई साल पहले अपने उत्साही और सिद्धांतवादी युवकों से अपील की कि वे भ्रष्टों के खिलाफ ‘डंक अभियान’ चलाएं। पर दूसरे ही दिन उस राज्य के बड़े अफसरों के संगठन ने प्रेस कांफ्रेंस करके मुख्यमंत्री की इस अपील का खुलेआम विरोध कर दिया। मुख्यमंत्री ने फिर अपनी बात नहीं दुहरायी।

इससे भी समझा जा सकता है कि यह समस्या कितनी गहरी है और उसके सामने ईमानदार नेता भी कितने लाचार हैं। हालांकि आम नेताओं में ईमानदारी तो और भी तेजी से घटती जा रही है। सरकारी भ्रष्टाचार के कारण देश के विकास की गति धीमी है।

कई बार अपने ड्राइंग रूम की बातचीत में कुछ लोग यह रोना रोते हैं कि भले लोगों के लिए राजनीतिक दलों में कोई जगह ही नहीं है। उनमें से कई अच्छी मंशा वाले लोग भी होते हैं। वैसे लोग डंक अभियान को परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से मदद कर सकते हैं। 

हां, इस मामले में सरकार को भी डंक अभियान के बारे में स्पष्ट गाइडलाइन जारी करनी चाहिए। यदि सरकारों की मंशा अच्छी है तो उसे ऐसे अभियानों से मदद ही मिलेगी। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में कुछ बंधनों के साथ स्टिंग आपरेशन की पूरी छूट है। इसे कानून के कार्यान्वयन की दिशा में विधिसम्मत तरीका माना जाता है। 2003 में  भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी डंक अभियान पर कुछ दिशा निदेश दिए थे। उससे ठीक पहले एक केंद्रीय मंत्री का मीडिया द्वारा स्टिंग आपरेशन हुआ था। उस घूसखोर मंत्री को यह कहते हुए कैमरे पर पकड़ा गया था कि ‘पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा की कसम, खुदा से कम भी नहीं।’

अदालत के दिशा निर्देश का मूल तत्व यही है कि आम आदमी या पत्रकार व्यापक जनहित में ऐसा कर सकते हैं। पर किसी के भयादोहन के लिए इस तरीके का इस्तेमाल नहीं हो सकता। जाहिर है कि उस समय की अपेक्षा देश में भ्रष्टाचार बढ़ा है।



जी.एस.टी. के बेहतर नतीजों का इंतजार 

आर्थिक इतिहासकार अंगस मेडिसन के अनुसार पहली सदी से लेकर दसवीं सदी तक भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। पहली सदी में विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में भारत का योगदान 32 दशमलव 9 प्रतिशत था।

संभवतः भारत को सोने की चिडि़या जानकर ही अनेक विदेशी हमलावरों ने समय समय पर इस देश पर हमला किया। पंद्रहवी सदी में भारत का योगदान करीब 25 प्रतिशत था। सन् 1820 में यह आंकड़ा घटकर 16 प्रतिशत रह गया।

सन् 1950 में दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान सिर्फ 3 प्रतिशत रह गया था। यानी विदेशी लुटेरों ने पूरा दोहन किया। अब करीब छह प्रतिशत है। आजादी के बाद यह और भी बढ़ता, पर देसी लुटेरे भी कम नहीं हैं।
केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि जी.एस.टी. लागू हो जाने के बाद केंद्र और राज्यों का राजस्व बढ़ेगा। अब देखना है कि वह कितना बढ़ता है। राजस्व के बढ़ने का सीधा और सकारात्मक असर विकास पर होगा।

वैसे कोई कितनी भी अच्छी व्यवस्था बनाए, उसमें छेद करने का रास्ता भ्रष्ट लोग निकाल ही लेते हैंं। जी.एस.टी. एक अच्छी व्यवस्था मानी जा रही है। पर, भगवान इसे भ्रष्टों की नजर से बचाएं !



क्या हुआ महेश शाह की घोषणा का ?

गुजरात के एक बिंिल्ंडग व्यवसायी महेश शाह गत साल 30 सितंबर को अहमदाबाद स्थित आयकर कार्यालय गये। उन्होंने स्टेचुरी फार्म जमाकर अपने पास नकद 13 हजार 860 करोड़ रुपए होने की जानकारी दे दी। आयकर विभाग ने उनका फार्म स्वीकार कर लिया। यानी विभाग ने उनकी घोषणा को मान लिया।

पर दिसंबर, 2016 में  शाह ने कह दिया कि ‘कुछ व्यवसायियों और नेताओं ने उनका इस्तेमाल किया। नेता और व्यवसायी पीछे हट गए। इसलिए मैं पहली किस्त नहीं दे पाया।’ शाह को गिरफ्तार भी किया गया था। पर बाद में आयकर महकमे ने शाह के साथ क्या सलूक किया, यह पता नहीं चल सका। आयकर विभाग को चाहिए कि वह अब भी शाह के उस दावे और पीछे हटने के बारे में पूरा विवरण देश को बता दे। 

 केंद्र सरकार काला धन और बेनामी संपत्ति की खोज खबर के काम में गंभीरता से लगी हुई है। इस काम पर अधिकतर लोग सरकार से खुश हंै। यदि लोगों को महेश शाह के बारे में भी बता दिया जाता तो वे और भी खुश होते। क्योंकि अधिकतर लोग अब यह समझने लगे हैं कि प्रभावशाली लोगों के पास जो बेनामी संपत्ति या काला धन है, वह आम जनता का हक मार कर ही जुटाए गए हैं।  



 मजदूरी मद में किसानों को सब्सिडी देने का सुझाव

सन 2012 में तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने सुझाव दिया था कि  सरकार खेतिहर मजदूरों की मजदूरी के मद में 50 प्रतिशत सब्सिडी किसानों को देने का प्रावधान करे। आत्महत्याओं की घटनाओं को ध्यान में रखते हुए उन्होंने यह सिफारिश की थी। पर मनमोहन सरकार ने उस सिफारिश पर ध्यान नहीं दिया। वह तो दूसरे ही कामों में व्यस्त थी। वैसे मनरेगा कार्यक्रम को किसानों की खेती से जोड़ने की भी सलाह दी गयी थी।

याद रहे कि दिनानुदिन खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है। उसे उबारने के लिए सुझाव तो बहुत हैं, पर उन पर अमल कम ही होता है। एक बार फिर कर्ज माफी का दौर जारी है। यह भी जरूरी काम है। पर यह स्थायी हल नहीं है। किसानों को राहत देने के लिए कुछ स्थायी काम करने होंगे।पता नहीं यह कौन सरकार करेगी ! 



और अंत में

एक फेसबुक मित्र ने टिप्पणी की है कि ‘हे ईश्वर, मुझे कभी इतना बड़ा आदमी मत बनाना ताकि निहितस्वार्थवश मैं साहुकार को साहुकार और चोर को चोर कह पाने का साहस खो दूं!’


(23 जून 2017 को प्रभात खबर में प्रकाशित)

जून में देश के साथ-साथ बिहार की राजनीति भी रहेगी गरम

1975 के जून में इस देश की राजनीति में दूरगामी परिणामों वाली घटनाएं हुई थीं। वैसी बड़ी तो नहीं, पर कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं की आहट इस जून में भी जरूर सुनाई दे रही हैं।

बिहार में राजद और भाजपा के कुछ बड़े नेताओं के बीच गंभीर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। आरोप भ्रष्टाचार को लेकर हैं। पता नहीं, इस मामले मंे आगे क्या-क्या होने वाला है। रोज नये-नये खुलासे हो रहे हैं। यदि इन आरोप-प्रत्यारोपों में कोई बड़ा मोड़ आ गया तो वह राजनीति और कुछ नेताओं के लिए यादगार बन सकता है। बिहार की जनता के लिए भी।

  इस बार की बिहार इंटर परीक्षा के रिजल्ट ने भी देश  का ध्यान खींचा है। दो-तिहाई परीक्षार्थी फेल कर गए हैं। इसको लेकर पीडि़त छात्र उद्वेलित हैं। राज्य सरकार उनकी समस्या के समाधान का भरोसा दिला रही है। देखना है कि वैसे परीक्षार्थियों की वाजिब मांगों का समाधान कब तक होता है ! जितनी जल्द हो जाए,उतना ही अच्छा है।

इस महीने यह भी देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव में दलीय जोड़तोड़ को लेकर बिहार के महागठबंधन के नेतागण राष्ट्रीय स्तर पर कैसी भूमिका निभाते हैं! जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए अभी होने वाली दलीय गोलबंदी, 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए पूर्व पीठिका का काम कर सकती है।

यह महीना कश्मीर को लेकर भी काफी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान ने पूरा जोर लगा दिया है। भारतीय सेना पहले की अपेक्षा अधिक ताकत से भारत विरोधी ताकतों को जवाब दे रही है। केंद्र सरकार ने जरूरत के अनुसार फौजी कार्रवाइयां करने की पूरी छूट सेना को दे दी है। ऐसा कम ही होता है जब सेना को पूरी छूट मिल जाए !

हाल में पशु बाजारों में वध के लिए मवेशियों की खरीद-बिक्री पर केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। इसको लेकर ‘सेक्युलर दल’ और उनकी राज्य सरकारें रोष में हैं। इससे ध्रुवीकरण का खतरा भी सामने है। हालांकि ताजा खबर के अनुसार केंद्र सरकार इस मामले में कुछ सहूलियत देने को तैयार लग रही है।

खबर यह भी आ रही है कि यू.पी.ए. सरकार के कार्यकाल में दिग्विजय सिंह ने जाकिर नाइक को कानूनी परेशानियों से बचाया था। हालांकि जाकिर ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके साथ किसी देशभक्त की सहानुभूति हो सकती है। भारत के कई मुस्लिम धर्म गुरू भी जाकिर की कार्यशैली के खिलाफ रहे हैं।

याद रहे कि पुलिस ने जाकिर नाइक की आपत्तिजनक गतिविधियों के लिए उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रस्ताव किया था। उस पर धर्म परिवर्तन का आरोप है। वह सार्वजनिक रूप से अन्य धर्मों की निंदा करता है।
इन दिनों वह इस देश की पुलिस के डर से फरार है। पर सवाल है कि यह दिग्विजय सिंह भी कैसे नेता हैं जिनका नाम ऐसे विवादास्पद लोगों से यदाकदा जुड़ता रहता है ? या फिर ऐसे लोगों से श्री सिंह खुद को जोड़ लेते हैं ?
कपिल मिश्र जैसे अपने ही पूर्व सहयोगी द्वारा अरविंद केजरीवाल तथा उनके सहकर्मियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों से एक नयी शैली की राजनीति के पतन की आहट मिल रही है। किसी ने अनुमान भी नहीं लगाया होगा कि जनलोकपाल आंदोलन के जरिए 2011 में अन्ना हजारे के साथ उभरे अरविंद केजरीवाल की सरकार पर कुछ ही वर्षों में इतने संगीन आरोप लगेंगे।

यह बात और है कि आरोपों को अभी साबित किया जाना है। पर आरोप लग ही क्यों रहे हैं ? ऐसे आरोपों से स्वच्छ राजनीति की उम्मीद में बैठे आम नागरिकों को झटका लगता है। लगता है कि इसी जून में अरविंद मंडली पर लग रहे आरोपों को उनकी तार्किक परिणति तक पहुंचा दिया जाएगा।



जरा याद कर लें जून 1975 भी !

5 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण ने पटना के गांधी मैदान की सभा में ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया था। यह और बात है कि वह सपना भी पूरा नहीं हुआ। 12 जून 1975 को  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रायबरेली से लोकसभा का चुनाव खारिज कर दिया। अदालत ने लोकसभा में वोट देने का प्रधानमंत्री का अधिकार भी समाप्त कर दिया। उसी दिन यह खबर आई कि गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी हार गयी।

जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी से मांग की कि वह अब प्रधानमंत्री पद छोड़ दें। उस मांग पर जोर डालने के लिए 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी ने जनसभा की। सभा बड़ी थी। स्वतःस्फूर्त भी। उसी रात देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गयी। देश के लगभग सारे गैर कांग्रेसी नेता जेलों में बंद कर दिए गए। अखबारों पर कठोर सेंसरशीप लगा दी गयी। किसी एक महीने में एक साथ इतनी बड़ी घटनाएं संभवतः कभी नहीं हुईं जितनी जून 1975 में हुईं। 



देश बचाने के लिए कठोर कार्रवाई जरूरी 

गत 29 मई 2017 को यह खबर आई कि कश्मीर में अलगाववादियों को मिल रही वित्तीय मदद के तार दिल्ली के हवाला कारोबारियों से जुड़े होने के सबूत एन.आई.ए. को मिले हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। क्योंकि हमारे देश का तंत्र चुस्त नहीं है। हवाला कारोबारियों पर कारगर कार्रवाई नहीं हो पाती। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हमारे देश के अनेक नेताओं और बड़े अफसरों का हवाला कारोबारियों से करीबी संबंध हैं।

नब्बे के दशक में वह संबंध उजागर हुआ था। तभी दोषियों को सजा हो गयी होती तो संभवतः आज कश्मीर के आतंकवादियों व अलगाववादियों को हवाला करोबारियों की ‘सेवाएं’ नहीं मिल पातीं।

27 मार्च 1991 में जे.एन.यू. का एक छात्र शहाबुददीन गोरी लाखों रुपए के साथ पकड़ा गया था। वे पैसे कश्मीर के आतंवादियों के लिए थे। इसी तरह के राष्ट्रविरोधी धंधे में लगा हिजबुल मुजाहिद्दीन का अशफाक लोन उन्हीं दिनों गिरफ्तार हुआ था। इन लोगों से मिले सुराग के बाद पांच हवाला कारोबारी  गिरफ्तार हुए।

सी.बी.आई. ने 3 मई 1991 को 20 स्थानों पर एक साथ छापे मारे। जिन स्थानों में छापामारी की गई, उनमें  जे.के. जैन का परिसर भी था। उसके यहां से सनसनीखेज डायरी मिली। उस डायरी में दर्ज था कि देश के कई दलों के 115 अत्यंत ताकवर नेताओं और बड़े अफसरों को हवाला के पैसों में से लाखों-करोड़ों रुपए दिए गए।

नेताओं में कई पूर्व केंद्रीय मंत्री भी थे। यानी जो कश्मीर के आतंकवादियों को पैसे दे रहे थे, वही इस देश के बड़े नेताओं को भी खुश कर रहे थे। जांच हुई, पर सी.बी.आई. नामक तोता ने उसे रफादफा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने भी कहा था कि इस जैन हवालाकांड की तो सी.बी.आई. ने कोई जांच ही नहीं की।



और अंत में

किसी ने ठीक ही कहा है कि ‘कफन में जेब नहीं होती।’ पर इस देश के अनेक नेताओं की तरह ही पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत जयललिता भी इस उक्ति का मर्म नहीं समझ सकीं थीं। कौन सी संपत्ति लेकर परलोक गयीं हैं जयललिता ? ताजा खबर यह है कि तमिलनाडु सरकार ने जयललिता की निजी संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। याद रहे कि अदालत ने जायज आय से अधिक संपत्ति जब्त करने का आदेश दे रखा है। 

जयललिता ने कुल कितनी संपति बनाई थी, उसके बारे में तो हमेशा अटकलों का बाजार ही गर्म रहा है। पर सवाल है कि उन्होंने किसके लिए संपत्ति बनाई ? शशिकला जिस केस में जेल की सजा भुगत रही हैं, उसी केस की मुख्य आरोपित जयललिता थीं।

बंगलुरू की विशेष अदालत ने 27 सितंबर 2014 को जयललिता को 4 साल की कैद और एक अरब रुपए का जुर्माना किया था। उन्हें जेल जाना पड़ा था। जयललिता पहले से ही अस्वस्थ चल रही थीं। जेल की  अव्यवस्था ने उनकी बीमारी को और भी गंभीर बना दिया था। नतीजतन उनका असामयिक निधन हो गया।

( दो जून 2017 को प्रभात खबर में प्रकाशित)

प्रकृति से गांधी की निकटता से सीख लेंगे आज के नेता ?

दक्षिण अफ्रीका में वकालत करते समय मोहनदास करमचंद गांधी पेट की बीमारी से ग्रस्त हो गये थे। उन्होंने दवाएं खाईं। पर कोई लाभ नहीं हुआ। वेजिटेरियन सोसायटी के एक मित्र ने उन्हें एक किताब दी। एडोल्फ जस्ट लिखित ‘रिटर्न टू नेचर’ उन्होंने ध्यान से पढ़ी। उस पुस्तक ने गांधी को बड़ी सीख दी। गांधी प्रकृति के करीब हो गए।

उन्होंने अपने आहार में बदलाव किया। उन्होंने महसूस किया कि मिट्टी, पानी, धूप और हवा मंे बड़ी ताकत है। ये चीजें शरीर को खुद-ब-खुद स्वस्थ होने और रखने में बड़ी मदद करती हैं। यह भारत जैसे देश के लिए भी अनुकूल है जहां के अधिकतर लोग गांवों में यानी प्रकृति के पास रहते हैं।

खुद महात्मा गांधी अपना इलाज धूप स्नान, पेट और शरीर पर मिट्टी की लेप तथा इसी तरह के अन्य प्राकृतिक उपायों से करते रहे। उसका उन्होंने जीवन भर पालन किया। उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र की स्थापना भी की। उनके आश्रम के अन्य सहवासी भी प्राकृतिक जीवन जीते थे। नतीजतन आजादी की लड़ाई में लगे अधिकतर गांधीवादी नेता और कार्यकर्ताओं ने लंबा जीवन जिया। 

देश गांधी के चम्पारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष मना रहा है। क्या आज के नेतागण गांधी की तरह ही भरसक प्राकृतिक जीवन जीने का संकल्प लेंगे? कुछ आधुनिक नेतागण तो प्राकृतिक जीवन से काफी दूर हैं। थोड़े से लोग पालन करते हैं। 

बढ़ते प्रदूषण और जानलेवा मिलावट के इस दौर में यह और भी जरूरी है कि लोग प्रकृति के करीब जाएं। नेता इस मामले में भी देश को नेतृत्व दे सकते हैं। इस संदर्भ में भी आज के कई बड़े नेताओं के बारे में अच्छी खबरें नहीं आतीं। सुना जाता है कि साठ-सत्तर की उम्र में ही बीमार रहने लगते हैं। उन्हें देश-विदेश के अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ते हैं। इससे खुद उन्हें, उनके परिजन और उनके समर्थकों -प्रशंसकों में निराशा फैलती है। इनमें से तो कुछ नेता समाज के एक बड़े हिस्से में बड़े लोकप्रिय होते हैं। उन्हें कोई अधिकार नहंीं है कि वे खानपान,  रहन- सहन और आहार -विहार में अतिशय कुसंयम अपनाकर अपने प्रश्ंासकों को निराश करें।
आज के नेता यदि चाहें तो प्राकृतिक जीवन और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति अपना कर वे इस चम्पारण शताब्दी वर्ष में बापू को बेहतर श्रद्धांजलि दे सकते हैं।
   
क्यों बार-बार टूट जाता है पीपा पुल 

खबर है कि दानापुर के पास गंगा नदी पर बना पीपा पुल गत चार महीनों में तीसरी बार विसंधित हो गया यानी टूट गया। नदी में पानी कम होने पर हर साल पीपा पुल बनता है। डेढ़ करोड़ रुपए की लागत आती है। इतने अधिक खर्च के बावजूद निर्मित पुल को आंधी से बचाने का कोई उपाय क्यों नहीं है, यह बात समझ में नहीं आती। क्या हर साल नये पीपे का निर्माण कराया जाता है ?

गांधी सेतु के जर्जर हो जाने की स्थिति में दानापुर का यह अस्थायी पुल लाखों लोगों को राहत देता है। इसके बावजूद इसके निर्माण और रखरखाव में इतनी बड़ी लापरवाही ? आश्चर्य होता है।

अच्छा तो होता कि दानापुर से दिघवारा के बीच गंगा नदी पर स्थायी पुल के निर्माण पर सरकार विचार करती। उससे पटना महानगर के विस्तार में भी सुविधा होती। पर जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक ऐसा पीपा पुल तो बने जो आंधियों को झेल सके !



कोयला सचिव को तो सजा, पर कोयला मंत्री ? 

दिल्ली की विशेष अदालत ने गत 22 मई को पूर्व केंद्रीय कोयला सचिव तथा दो अन्य कार्यरत आई.ए.एस. अफसरों को दो -दो साल की सजा सुनाई है। इस मामले में कुछ अन्य संबंधित लोगों को भी सजा दी गयी है। अदालत ने यह अच्छा किया है। हालांकि सजा कम लगती है। बड़े अफसरों को इस तरह सजा होगी तो शायद देश के संसाधनों की लूट कम होगी। क्योंकि यदि बड़े अफसरगण सरकारी भ्रष्टाचार के धंधे में पूरी हिम्मत से असहयोग करने लगें तो सत्ताधारी नेतागण देश को लूट नहीं सकेंगे।

हालांकि खबर तो यह भी आती रहती है कि पहले से लगभग ईमानदार रहे मंत्रियों को भी कुछ घाघ अफसर ही लूटने का मंत्र सिखा देते हैं। पर इस मामले में एक बड़ा सवाल देश के सामने है। सिर्फ अफसरों को ही क्यों सजा दी जाए?

कोयला मंत्री को क्यों नहीं ? सचिव के प्रस्ताव पर कोयला ब्लाॅक के आवंटन का अंतिम आदेश तो कोयला मंत्री का ही था ! उन दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही तो कोयला मंत्री भी थे। शायद इस मामले में ऊपरी अदालत मंे अपील होगी तो यह सवाल उठेगा कि कोयला मंत्री कैसे सजा से बच सकते हैं ? यह मामला मध्य प्रदेश में गलत ढंग से कोयला खान आवंटन का था।

वैसे तो देश भर में ऐसे घोटाले हुए थे। सी.ए.जी. ने कहा था कि इस तरह के आवंटन से सरकारी खजाने को एक लाख 86 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। हालांकि वास्तविक नुकसान और अधिक था। 24 सितंबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने 214 कोल ब्लाॅक के आवंटन को रद कर दिया था। अब सवाल है कि 214 कोल ब्लाॅक के आवंटन में घोटाला सिर्फ सचिव स्तर के अफसरों की मिलीभगत से संभव है ?

 जब यह घोटाला सामने आया था तो चर्चा यह थी कि इस घोटाले में परदे के पीछे बड़ी हस्तियां शामिल थीं। पर उम्मीद है कि ऊपरी अदालत उन लोगों को भी सजा देगी जिन सत्ताधारियों के दस्तखत से कोयला घोटाले को अंजाम दिया गया।



त्रिशंकु शत्रुघ्न सिन्हा

 
अन्य लाखों लोगों के साथ -साथ मैं भी कुछ बातों को लेकर शत्रुघ्न सिन्हा का प्रशंसक रहा हूं। आगे भी रहूंगा। वह एक अच्छे कलाकार हैं। कैरियर के शुरुआती दौर में उन्होंने विलेन के रूप में भी दर्शकों की तालियां बटोरी थी। यह एक नयी बात थी। जब पूरे देश में बिहारियों को उपहास की नजर से देखा जाता था, उस समय भी उन्होंने खुद को ‘बिहारी बाबू’ कहलाना पसंद किया।

जब फिल्मी दुनिया के लोग आम तौर पर प्रतिपक्षी राजनीति का दामन नहीं थामते थे, शत्रुघ्न सिन्हा ने सत्ता के खिलाफ जेपी का साथ दिया था। पर अनेक शालीन हलकों में शत्रुघ्न सिन्हा की मौजूदा राजनीतिक भूमिका अच्छी नहीं मानी जा रही है। कायदे की राजनीति की मांग तो यही है कि या तो भाजपा बिहारी बाबू को पार्टी से निकाल दे या फिर वह खुद ही पार्टी छोड़ दें। खुद दल छोड़ने में उन्हें दिक्कत हो सकती है। क्योंकि तब उनकी लोकसभा की सदस्यता चली जाएगी। पर कार्रवाई करने में पार्टी को क्या दिक्कत है ? यह बात अनेक लोगों की समझ से बाहर है।



और अंत में

बिहार भाजपा के मंत्री ऋतुराज सिन्हा ने कहा है कि शत्रुघ्न सिन्हा को ख्याल रखना चाहिए कि वह भाजपा के चुनाव चिह्न पर सांसद बने हैं। ऋतुराज ने ठीक ही कहा है। पर सवाल है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की शत्रुघ्न सिन्हा के बारे में क्या राय है ? क्या शाह जी ने बिहारी बाबू को कभी इस बात की याद दिलाई कि वे भाजपा के सांसद हैं ? यदि दिलाई भी होगी तो इस बात का पता आम लोगों को नहीं है।

दरअसल ‘शत्रु जी’ फिल्म में तो विलेन से हीरो बने थे।

राजनीति में वे विपरीत दिशा में चल रहे हैं। कम से कम भाजपा के लिए तो विलेन ही बन  गये हैं। हां, भाजपा विरोधी दलों के लिए शत्रुघ्न सिन्हा जरूर हीरो बने हुए हैं। टेढ़े-मेढ़े और परोक्ष-प्रत्यक्ष बयानों के जरिए अपनी ही पार्टी को सार्वजनिक रूप से जितनी परेशानी में बिहारी बाबू ने डाला, वह भी एक रिकाॅर्ड है।
अभी और क्या - क्या करेंगे, वह सब देखना दिलचस्प होगा।


(26 मई 2017 को प्रभात खबर में प्रकाशित)

शनिवार, 20 मई 2017

अंततः फायदे में नहीं रहते राजनीति में हिंसा का सहारा लेने वाले

 जयप्रकाश नारायण ने 14 जून 1974 को बिहार विधानसभा के स्पीकर हरिनाथ मिश्र को लिखा था कि ‘विधानसभा के सामने छात्रों के सत्याग्रह के सिलसिले में कुुछ विधायकों के साथ दुव्र्यवहार किये जाने और उनके विरूद्ध भद्दे नारे लगाये जाने की सूचना मुझे मिली है। रिपोर्ट परस्पर विरोधी है, पर यह लगता है कि कुछ भद्दे नारे तो सत्याग्रहियों ने भी दुहराये। पर कुर्ता फाड़़ना, रिक्शे से नीचे खींचना आदि दुष्कृत्य दर्शकों में से ही कुछ लोगों ने किये। पर चाहे जिन लोगों ने ऐसा किया हो, मुझे घटना के लिए बहुत खेद है। जिन विधायकों के साथ ऐसा दुव्र्यवहार किया गया, उनके प्रति मैं क्षमाप्रार्थी हूं। आप मेरी यह भावना उन सभी विधायकों तक पहुंचा दें और मेरा यह पत्र विधानसभा में पढ़कर सुना देने की कृपा करें। मैं आभार मानूंगा।’

  इस पत्र को आज के संदर्भ में देखें। बुधवार को पटना के वीरचंद पटेल पथ पर जो कुछ हुआ, उससे जेपी की आत्मा कराह रही होगी। इसलिए भी राजद और भाजपा के आज के शीर्ष नेतागण 1974 के उस आंदोलन में सकिय थे जिसका नेतृत्व जेपी ने किया था। कुछ लोग कह सकते हैं कि क्या राजनीति के सतयुग की बात आज के ‘कलियुग’ में लेकर बैठ गए! पर राजनीति के ‘कलियुग’ का एक उदाहरण यहां पेश है।

नब्बे के दशक की बात है। सी.बी.आई. चारा घोटाले की जांच कर रही थी। सी.बी.आई. के संयुक्त निदेशक डाॅ. यू.एन. विश्वास के खिलाफ राजद ने पटना राजभवन के सामने तलवार जुलूस निकाला था। विश्वास के पुतले को तलवार से काटा गया था। पर क्या ऐसे प्रदर्शन से राजद को कोई लाभ मिला? न तो कानूनी लाभ मिला और राजनीतिक लाभ।

चारा घोटाले के केस में क्या हो रहा है, यह सबको मालूम है। साथ ही जिस लालू प्रसाद ने अपने बल पर 1995 के चुनाव में विधानसभा में पूर्ण बहुमत लाया था, उनके दल ने सन 2000 के चुनाव में बहुमत खो दिया। कांग्रेस की मदद से राबड़ी देवी की सरकार बन सकी थी।

मंगलवार को आयकर महकमे ने लालू प्रसाद से जुड़े लोगों के ठिकानों पर छापे मारे। लोकतांत्रिक देश में अच्छा तो यह होता कि राजद के लोग उसका मुकाबला कानूनी तरीके से करते। लाठी-डंडे के साथ प्रतिबंधित क्षेत्र में शक्ति प्रदर्शन से न नब्बे के दशक में उन्हें लाभ मिला था और न ही अब मिलने की उम्मीद है। उधर भाजपा के लोगों ने बुधवार को राजद के प्रदर्शनकारियों के मुकाबले के सिलसिले में कोई आदर्श उपस्थित नहीं किया।

जेपी आंदोलन में यही लोग यह नारा लगा रहे थे कि ‘हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा।’ पर वीरचंद पटेल पथ पर कुछ भाजपाइयों के हाथों में भी लाठियां और पत्थर देखे गये थे। यदि बिहार में सुशासन है तो वह एक बार फिर कसौटी पर है। यदि बुधवार को पटेल पथ पर अशोभनीय और हिंसंक दृश्य उपस्थिति करने वालों दोनों पक्षों के उपद्रवियों पर कार्रवाई करनी होगी। हालांकि यह बात छिपी नहीं रही कि पहल तो राजद से जुड़े लोगों ने ही की थी।   


हिंसक राजनीति की प्रयोगशाला का हाल

पश्चिम बंगाल हिंसक राजनीति की प्रयोगशाला रहा है। सन 1967 में नक्सलबाड़ी से हिंसक आंदोलन शुरू हुआ। उसे तत्कालीन सिद्धार्थ शंकर राय की सरकार ने पुलिस और बाहुबलियों के बल पर कुचला। 1977 में कांग्रेस चुनाव हार गयी।

वाम मोर्चा ने भी लंबे समय तक राज किया। पहले तो अपने कुछ गरीबपक्षी कामों से वाम मोर्चा सरकार ने जनता का समर्थन पाया।पर बाद के दिनों में जोर जबर्दस्ती से राज चलाया। राय सरकार के दौर के अनेक बाहुबली वाम में शामिल हो गये। ममता बनर्जी ने उनकी हिंसा का विरोध करके सत्ता पायी। पर अब वैसा ही आरोप बनर्जी सरकार पर भी लग रहा है। ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का भी आरोप है। नतीजतन वहां भाजपा बढ़ रही है।

देखना है कि दीदीगिरी कब तक चलती है। बाहुबल और जातीय सांप्रदायिक वोट बैंक के जरिए चुनाव जीतने के बदले लोकतंत्र में लोगों का दिल जीतना अधिक लाभदायक तरीका है।


शिक्षकों की हो परीक्षा

मंगलवार को पटना में बिहार के कुलपतियों और प्रतिकुलपतियों का सम्मेलन हुआ। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बिहार की गरिमा को पुनस्र्थापित करने की जरूरत बताई गयी। पर सवाल है कि इस काम की शुरुआत कहां से हो? 

मुझे कम से कम एक बात समझ में आती है। विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक पहले ऐसे शिक्षक तो बहाल हों जिन्हें अपने विषय का ज्ञान हो। खबर आती रहती है कि सब तो नहीं ,पर अधिकतर शिक्षक अयोग्य हैं। हाल में एक वी.सी. ने सार्वजनिक रूप से कहा कि पटना के सबसे प्रतिष्ठित काॅलेज में ऐसे शिक्षक भी आ गए हैं जिन्हें ‘प्रिंसिपल’ तक लिखना नहीं आता।

नब्बे के दशक की एक खबर के अनुसार, एक काॅलेज शिक्षक ने छुट्टी के आवेदन पत्र में लिखा कि मेरे स्टाॅमक में हेडेक है। उन्हीं दिनों मैंेने पटना के एक प्रतिष्ठित हाई स्कूल के प्राचार्य का हस्तलिखित आवेदन पत्र पढ़ा था। दस लाइन के आवेदन पत्र में कोई लाइन भी शुद्ध नहीं थी।

इस पृष्ठभूमि में मौजूदा शिक्षकों की प्रतिभा-योग्यता की टुकड़ों में बारी -बारी से जांच होनी चाहिए। यानी छोटे सौ -दो सौ के समूहों में शिक्षकों को बारी-बारी से बुलाकर ईमानदार अफसरों व पुलिकर्मियों की कड़ी निगरानी में जांच परीक्षा होनी चाहिए। जो पास करें,वे शिक्षक रहें और जो फेल करें उन्हें किन्हीं अन्य सरकारी कामों में लगा दिया जाए।

जो काॅलेज शिक्षक प्रिंसिपल शब्द शुद्ध नहीं लिख सकता है, उसके हाथों नई पीढि़यों का भविष्य क्यों सौंपा जाए? पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अजय कुमार त्रिपाठी ने भी कहा है कि शैक्षिक मुद्दों को आयरन हैंड से हैंडल करना होगा। यानी यदि अयोग्य शिक्षकों से छात्रों को मुक्त करने का कोई कड़ा प्रयास राज्य सरकार करेगी तो अदालत से भी समर्थन मिल सकता है।  

सरकारी मकान से मोह

केंद्र सरकार की पहल अच्छी है। वह नाजयज तरीके से सरकारी मकानों में वर्षों से रह रहे प्रभावशाली लोगों को शीघ्र निकाल बाहर करने का फैसला किया है। इसके लिए संबंधित नियमों में बदलाव किया जा रहा है।

पहले के नियम के अनुसार मकान खाली के करने के लिए सरकार सात सप्ताह का समय देती थी। इसे घटाकर अब तीन दिन किया जा रहा है। साथ ही मकान में बने रहने के लिए कोई निचली अदालत की शरण नहीं ले सकता है।
  
और अंत में

खबर छपी है कि पटना के पांच सफाई निरीक्षक निलंबित कर दिये गए। इस खबर को पढ़कर किसी ने सवाल पूछा कि क्या पटना में ऐसा कोई पद भी है ? उस पद कुछ लोग बैठे हुए भी थे ? क्या इन पांच के अलावा भी ऐसे कुछ और निरीक्षक भी हैं? आखिर वे करते क्या हैं ? क्या वे सिर्फ प्रभावशाली लोगों के यहां ही सफाई करवाते हैं ? 
(प्रभात खबर में प्रकाशित)

रविवार, 7 मई 2017

किसानों की आय बढ़ाए बिना कैसे बढ़ेंगे उद्योग-धंधे !

गत लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने यह वादा किया था कि सत्ता में आने पर  उसकी सरकार किसानों की आय डेढ़ गुनी कर देगी। किसान उस दिन की अभी प्रतीक्षा कर रहे हैं। मोदी सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने यह भी कहा था कि सरकार 60 साल से अधिक उम्र के किसानों के लिए पेंशन योजना शुरू कर सकती है। वह भी नहीं हुआ।

इस साल के आर्थिक सर्वेक्षण में नरेंद्र मोदी सरकार से देश के प्रत्येक नागरिक को हर महीने एक तयशुदा आमदनी सुनिश्चित करने की सिफारिश की गयी है। पर सवाल है कि कर का दायरा बढ़ाये और टैक्स चोरी रोके बिना इसके लिए आर्थिक संसाधन कहां से आएंगे ?

इस बीच स्वामी रामदेव की पतंंजलि संस्था ने देश के कुछ किसानों की आमदनी जरूर बढ़ाई है। पर पतंजलि की अपनी सीमाएं हैं। पतंजलि का दावा है कि उसने देश के एक करोड़ किसानों को पतंजलि उद्योग से जोड़ा है। अगले कुछ समय में इस संख्या को बढ़ाकर पांच करोड़ करने की उनकी योजना है।

यानी कृषि उत्पाद को पतंजलि से जुड़े कारखानों में इस्तेमाल किया जा रहा है। पतंजलि दवाओं, खाद्य और पेय पदार्थों का बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रही है। पतंजलि के उत्पादों की बढ़ती मांग को देखते हुए कृषकों के लिए थोड़ी उम्मीद बन रही है।

पतंजलि किसान और संबंधित राज्य सरकारों के बीच ईमानदार तालमेल हो सके तो बड़ी संख्या में किसानों को उनके उत्पाद का उचित दाम मिल सकेगा। इससे किसानों की आत्महत्याएं कम होंगी। पर इसमें एक कठिनाई सामने आ रही है। अन्य अनेक लोगों की तरह ही मेरे परिवार में भी पतंजलि के अनेक उत्पादों का इस्तेमाल होता है। उसमें मिलावट और खराब गुणवत्ता का खतरा बहुत कम है।

पर हाल के दिनों में पतंजलि उत्पादों को लेकर छिटपुट शिकायतें भी मिलने लगी हैं।

मैंने भी पतंजलि दफ्तर को इसकी शिकायत भेजी और गुणवत्ता पर निगरानी रखने  की सलाह दी। पर कोई जवाब नहीं आया। न ही किसी तरह की जांच की कोई खबर मिली। यदि अपनी भारी तरक्की से मुग्ध पतंजलि संगठन क्वालिटी कंट्रोल की उपेक्षा करता रहा तो न तो किसानों की उम्मीदें पूरी होंगी और न ही उपभोक्ताओं का उस पर विश्वास बना रहेगा। इस स्थिति में सबसे अधिक खुशी पतंजलि के प्रतिद्वंद्वी बहुराष्ट्रीय संगठनों को होगी।

याद रहे कि मिलावटखोरों के सामने इस देश की सरकारें लगभग लाचार बनी हुई हैं। परोक्ष रूप से पतंजलि उन मानवद्रोहियों का मुकाबला कर रही है। 


किसानों के हितैषी चैधरी चरण सिंह

पूर्व प्रधानमंत्री चैधरी चरण सिंह किसानों के हित में देश का हित देखते थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में इस बात का लगातार प्रचार किया कि किसानों की आय बढ़ाये बिना कारखानों का विकास नहीं हो सकता। देश की अधिकतर आबादी गांवों में रहती है। वह खेती पर निर्भर है।

पर उनमें से अधिकतर किसानों की आय इतनी कम है कि वे अन्य जरूरी सामान के साथ-साथ अपने बच्चों के लिए भी न तो जरूरत के अनुसार कपड़े खरीद पाते हैं और न ही जूते। अधिकतर किसान परिवारों में स्कूली बैग और स्लेट-पेंसिल के भी लाले पड़े रहते हैं।

यदि उन किसानों और उनसे जुड़े लोगों की आय बढ़ेगी तभी जूते, छाते, स्कूली बैग, स्लेट -पेंसिल आदि के अधिक कारखाने लगेंगे। 

पर चरण सिंह से जुड़े नेताओं ने भी सत्ता में आने के बाद खेती की उपेक्षा की। नतीजतन अधिकतर किसानों के लिए आज भी खेती लाभ का पेशा नहीं है।  


आखिर क्यों बढ़ रही भाजपा !

भाजपा की लगातार चुनावी बढ़त से सेक्युलर दल चिंतित हैं। होना भी चाहिए। क्योंकि कोई दल यदि एकतरफा ढंग से बढ़ता जाएगा तो उसकी सरकार में तानाशाही की प्रवृत्ति पैदा हो सकती है। पर समस्या यह है कि तथाकथित सेक्युलर दलों को भाजपा की बढ़त के असली कारण समझ में नहीं आ रहे हैं। या फिर वे समझना नहीं चाहते ?

सेक्युलर दलों के लिए तथाकथित शब्द का इस्तेमाल जानबूझकर कर रहा हूं। क्योंकि अधिकतर सेक्युलर दल और नेता सांप्रदायिक सवालों और समस्याओं पर एकतरफा रवैया अपनाते हैं। इस रवैये से भी भाजपा को बढ़त मिलती है।

एक पुरानी राजनीतिक कथा याद आती है। वह कथा एक पत्रकार कामरेड ने 1977 में ही सुनाई थी। 1977 में लोकसभा का चुनाव प्रचार चल रहा था। जयप्रकाश नारायण और जनता पार्टी के नेताओं ने आपातकाल की ज्यादतियों को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाया था। तत्कालीन सरकार के भ्रष्टाचार और वंशवाद अधिकतर लोगों के लिए अहम मुद्दे थे।

पर इस देश के कम्युनिस्टों की एक जमात के नेतागण अपनी पार्टी की चुनाव सभाओं में कहते थे कि दियो गार्सिया द्वीप में अमेरिका अपना फौजी अड्डा बना रहा है। इससे भारी खतरा है। यानी जो मुद्दे अधिकतर भारतीय जनता को उद्वेलित कर रहे थे, उनको कम्युनिस्टों ने महत्व नहीं दिया था।

नतीजतन 1977 में मतदाताओं ने जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता सौंप दी। कांग्रेस के साथ-साथ अधिकतर कम्युनिस्टों की पराजय हुई। चुनाव के बाद कम्युनिस्ट नेताओं की बैठक में एक कामरेड ने चिढ़ाने के लिए अपने नेताओं से सवाल किया कि ‘कामरेड आजकल दियो गार्सिया का क्या हाल है?’ नेता चुप रहे। यानी कम्युनिस्टों ने एक ऐसे मुद्दे को चुनावी मुद्दा बना रखा था जिससे आम जनता का कुछ लेना-देना नहीं था।
कतिपय राजनीतिक प्रेक्षक बताते हैं कि यही हाल आज के अधिकतर सेक्युलर दलों का है। उनके नेता यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा क्यों जीत गयी। यह भी नहीं कि उसके बाद के अधिकतर चुनावों में वह क्यों विजयी होती जा रही है।

कुछ साल पहले पूर्व कंेद्रीय मंत्री शशि थरूर की मृत पत्नी सुनंदा पुष्कर के वेसरा को जांच के लिए भारत सरकार ने अमेरिका भेजा था। कोई हर्ज नहीं यदि सेक्युलर दल किन्हीं निष्पक्ष विदेशी एजेंसी से इस बात की जांच करा लें कि आखिर भाजपा लगातार चुनाव क्यों जीत रही है। यदि सेक्युलर दल सही नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहते तब तो कोई बात नहीं।

यह भी कहा जाता है कि अनेक सेक्युलर नेताओं को अपनी हार के असली कारणों का पता है। पर वे अपनी ‘आदतों’ से लाचार हैं। स्वार्थवश उन ‘आदतों’ को बदलने को वे तैयार नहीं हैं। अब वे गैर राजग दलों की महाएकता में अपने लिए राजनीतिक संजीवनी खोज रहे हैं।

प्रेक्षकों के अनुसार इस देश का पिछला राजनीतिक इतिहास यह बताता है कि अपनी आदतों और कमजोरियों को दूर किए बिना सिर्फ दलीय, जातीय और सांप्रदायिक एकता की संजीवनी राजनीतिक दलों को अधिक दिनों तक काम नहीं आती।


गलती मानना बड़प्पन

‘आप’ नेता अरविंद केजरीवाल ने पहले तो कहा कि ‘आप’ इवीएम के कारण हारी। पर अब वह कह रहे हैं कि हार के लिए हमारी गलतियां जिम्मेदार हैं। आज के जमाने में अपनी गलतियां स्वीकारना किसी नेता के लिए अजूबी बात है।

शायद ही कोई नेता अपनी गलती स्वीकारता है। यदि कभी किसी ने स्वीकारा भी तो उसे सुधारा नहीं। केजरीवाल ने अपनी गलती स्वीकार कर राजनीति को एक संदेश दिया है।

उम्मीद है कि अन्य नेतागण भी समय-समय पर अपनी गलतियां स्वीकारेंगे और उन्हें सुधारेंगे भी। यदि ऐसा हुआ तो लोकतंत्र के लिए अच्छा होगा।


और अंत में

भारतीय भाषाओं के लिए एक अच्छी खबर है। खासकर हिंदी भाषा भाषियों के लिए। सन 2021 तक अंग्रेजी में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या से अधिक संख्या उनकी होगी जो हिंदी में इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे।

एक ताजा आकलन के अनुसार अन्य भारतीय भाषाएं भी इस मामले में अगले चार साल में बढ़ेंगी। अगले चार साल में जितने लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे, उनमें से 75 प्रतिशत लोग भारतीय भाषाओं के होंगे।

(प्रभात खबर में 5 मई 2017 को प्रकाशित)