Thursday, May 21, 2015

दिल्ली की जंग का असर देश की राजनीति पर


जन लोकपाल विधेयक जब विधानसभा से पास नहीं होने दिया गया तो विरोधस्वरुप केजरीवाल ने 2014 में मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। दिल्ली की जनता ने केजरीवाल के प्रति अभूतपूर्व एकजुटता दिखाते हुए इस साल के चुनाव में कुल 70 में से 67 सीटें ‘आप’ को दे दी।

अब जब यह धारणा बन रही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘आप’ के बेलौस युद्ध में केंद्र सरकार रोड़े अटका रही है तो इसका अगला राजनीतिक नतीजा क्या होगा ?

    राजनीतिक पे्रक्षकों के अनुसार यदि इस युद्ध में ‘आप’ सरकार शहीद हुई तो न सिर्फ भाजपा का राजनीतिक जलवा कुछ और कम हो जाएगा, बल्कि देश में अरविंद केजरीवाल का जन समर्थन बढ़ जाएगा।

 अनेक लोगों का यह मानना है कि नियमतः भले उप राज्यपाल को कुछ खास अधिकार मिले हुए हों, पर मुख्यमंत्री की मंशा सही है। वे भ्रष्टाचार से ईमानदारी से लड़ रहे हैं। उनको कम से कम उन लोगों का साथ मिलना चाहिए था जो भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते रहे हैं।

 पर साथ देने के बदले दिल्ली में ऐसी स्थिति बन गई है जहां के मुख्यमंत्री अपनी सरकार के मुख्य सचिव तक का खुद चयन नहीं कर सकते ।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ठीक ही कहा है कि ‘राज्य सरकार एक मुख्य सचिव नियुक्त नहीं कर सकती तो वह और क्या कर सकती है ? ’

    खुद मोदी सरकार गैरभाजपा शासित राज्यों में भी राज्यपाल नियुक्त करने से पहले संबंधित मुख्यमंत्री की सहमति ले लेती है। पर जब केजरीवाल को अपना मुख्य सचिव नहीं चुनने देती तो कई लोगों को केंद्र की मंशा पर शक होता है।

 खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकारी भ्रष्टाचार से परेशान रहे हैं। एक साल के शासन के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था गतिशील नहीं दिख रही है तो इसका सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार है। दूसरी ओर यदि दिल्ली में एक सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठा रही है तो केंद्र सरकार को चाहिए था कि वह उसे इस काम में बढ़ावा दे।

  गत 14 फरवरी को शपथ ग्रहण के बाद केजरीवाल ने कहा था कि उनकी सरकार दिल्ली को भ्रष्टाचार मुक्त करेगी। क्या ‘आप’ का यह कसूर है कि वह अपना वादा नहीं भूल रही है ?

 18 मई को केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली सरकार में भ्रष्टाचार 70 से 80 प्रतिशत कम हो चुका है। क्या ऐसा दावा केंद्र की मोदी सरकार कर सकती है ?

ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री अपनी सरकार से भ्रष्टाचार हटाना नहीं चाहते हंै। पर वह भ्रष्टाचार का होमियोपैथी इलाज कर रहे हंै जबकि जरुरत सर्जरी की है। केंद्र सरकार की राजनीतिक कार्यपालिका स्तर पर तो  घोटाले की कोई सूचना अब तक नहीं मिली है। पर क्या यही बात प्रशासनिक कार्यपालिका के बारे में कही जा सकती है ?

  यह ध्यान देने की बात है कि केजरीवाल की लड़ाई प्रशासनिक कार्यपालिका से ही अधिक है। होना तो यह चाहिए था कि केंद्र सरकार देशहित में ‘आप’ सरकार से सहयोग करके यह तरीका सीखती कि वह कैसे 70-80 प्रतिशत भ्रष्टाचार कम कर पाई है। इसके बदले यह धारणा बन रही है कि केंद्र सरकार  ‘आप’ सरकार को  सत्ताच्युत करना चाहती है। सवाल है कि दिल्ली राज्य की सरकार से च्युत होने के बाद कहीं पूरे देश में केजरीवाल, भाजपा के लिए राजनीतिक खतरा न पैदा कर दे !

(21 मई 2015 के दैनिक भास्कर के पटना संस्करण में प्रकाशित)

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