Monday, October 5, 2009

ऐसे विफल कर दी गई एक गांधीवादी की भूमि सुधार योजना

जय प्रकाश नारायण का सपना था कि कोशी क्षेत्र में माॅडल भूमि सुधार कार्यक्रम चलाया जाए। यह सन 1978 की बात है। तब कर्पूरी ठाकुर की सरकार थी। स्वाभाविक ही था कि कर्पूरी ठाकुर इस काम के लिए तत्काल राजी हो जाएं। इस काम के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान से गांधीवादी बी।जी. वर्गीस पटना आये थे।

इस भूमि सुधार कार्यक्रम के तहत भूमि समस्याग्रस्त पूर्णिया जिले के पांच प्रखंडों में भूमि के रिकाॅर्ड को अद्यतन करना था। हदबंदी से फालतू घोषित जमीन का अधिग्रहण व भूमिहीनों में उनका वितरण करना था। साथ ही बटाईदारों के अधिकारों को स्वीकृति दिलानी थी। फिर उन चुने हुए पांच प्रखंडों के सर्वांगीण विकास का काम करना था। इसका नाम दिया गया कोशी क्रांति योजना।

इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए जेपी की सलाह पर बिहार सरकार ने तत्काल अलग से एक सरकारी कोषांग का गठन भी कर दिया और उसमें एक उपायुक्त व कई स्तरों के 119 अन्य लोक सेवक तैनात कर दिये गये। पर जैसे ही बनमनखी, भवानीपुर, बरहरा कोठी, धमदाहा और रुपौली में इस काम की शुरुआत करने की प्रक्रिया शुरू हुई कि भूस्वामियों और सामंती प्रवत्ति के लोगों व उनके संरक्षक नेताओं ने तगड़ा विरोध शुरू कर दिया। उस इलाके के सत्ताधारी जनता पार्टी के अनेक दबंग जन प्रतिनिधियों ने कर्पूरी सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया। पटना में भी गोलबंदी शुरू हो गई। कर्पूरी सरकार के गिरने की नौबत आ गई। कर्पूरी ठाकुर दबाव में आ गए। जेपी मन मसोस कर रह गये। और बी।जी. वर्गीस अपनी आंखों में आंसू लिए दिल्ली लौट गये। कोशी क्रांति योजना निष्क्रिय हो गई।

भूमिपतियों का दबाव इतना बढ़ा कि इस संबंध में वर्गीस ने जो लम्बा लेख लिखा था, उसकी एक ही किस्त एक अखबार में छप सकी। दूसरी किस्त छापने की हिम्मत उस अखबार ने भी नहीं की। इस प्रकरण ने यह बात साबित कर दी कि बिहार में भूमि संबंधों को बदलने का मुद्दा कितना नाजुक है और यह काम कितना कठिन है।

अब उस कोशी क्रांति योजना के बारे में प्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया द्वारा 2 अप्रैल, 1981 को जारी एक खबर का एक हिस्सा पढ़िए, ‘पूर्णिया, 2 अप्रैल (प्रे)। पूर्णिया जिले के पांच प्रखंडों में तीन वर्ष पूर्व शुरू की गई कोशी क्रांति योजना भूस्वामियों और भूमिहीनों के बीच सीधा टकराव उत्पन्न कर अपने ही भार से दबी जा रही है।

यहां अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस योजना की सफलता की उम्मीद नगण्य है। क्योंकि राजनीतिक संरक्षणप्राप्त कुछ भूस्वामी इस योजना के प्रत्येक स्तर पर अवरोध उत्पन्न कर रहे हैं। स्थानीय नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि भूमि सुधार के काम बंद नहीं किए गए तो परसबिगहा कांड की पुनरावत्ति हो सकती है। याद रहे कि मध्य बिहार के परसबिगहा में एक जमीन विवाद के चलते कई लोगों को उनके घर में बाहर से बंद कर उन्हें जिंदा जला दिया गया था।

प्रेस ट्रस्ट के अनुसार गांधी शांति प्रतिष्ठान के श्री बीजी।वर्गीस की कोशी क्रांति योजना को तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने 1978 में पूर्णिया जिले में माडल भूमि सुधार कार्यक्रम के रूप में शुरू किया था। भूमि सुधार के उपायुक्त के अनुसार दोषपूर्ण भूमि पद्धति और उपज में हिस्सा बंटाने की शोषणात्मक प्रवृत्ति आदि को देखते हुए इस योजना की आवश्यकता महसूस की गई थी। एक अधिकारी के अनुसार दो वर्षों में कार्य का केवल पहला भाग ही पूरा किया जा सका। अधिकारी ने प्रेस ट्रस्ट से बातचीत में यह स्वीकार किया कि इस गति से समस्या के समाधान में एक दशक लग जाएगा। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार पूर्णिया जिले में लगभग 10 हजार ऐसे भूस्वामी हैं जिनके पास एक सौ एकड़ से अधिक भूमि है। इस क्षेत्र की भूमि समस्या 50 साल पुरानी है। उस समय यह पूरा क्षेत्र घना जंगल था।’

कोशी क्रांति योजना ही नहीं, बाद के वर्षों में भी जब -जब भूमि सुधार की कोशिश हुई, भूस्वामियों ने तगड़ा विरोध कर दिया। दरअसल रोजगार के अन्य साधन विकसित नहीं होने के कारण भी भूस्वामी अपनी जमीन के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं और वे अपनी जमीन पर उनके स्वामित्व के मामले में किसी तरह के हल्के खतरे का भी पूरी जी-जान से विरोध कर देते हैं। आजादी के बाद राज्य का आम विकास हुआ होता तो जमीन मोह कम होता। पर सरकारी भ्रष्टाचार के कारण विकास नहीं हुआ।

इसी तरह 1992 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भूमि सुधार खास कर बंटाईदार कानून को सख्त करने की कोशिश की तो उनके ही वोट बैंक के तबके से भी इसका तगड़ा विरोध हो गया। भारी दबाव के बीच तब ही लालू प्रसाद ने कह दिया था कि मैं बर्र के छत्ते में हाथ नहीं डालूंगा। भ्ूमि सुधार के प्रति अपनी 1992 की नीति पर लालू प्रसाद तब तक कायम रहे जबतक वे और राबड़ी देवी सत्ता में थे।

(प्रभात खबर: 2 अक्तूबर, 2009 से साभार)

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