Tuesday, April 6, 2010

अवांछित तत्वों से कांग्रेस को बचाने की समस्या

बिहार कांग्रेस के निर्वाची पदाधिकारी और सांसद डा. गिरीश संघी ने कहा है कि आपराधिक तत्वों को संगठन में स्थान नहीं मिलेगा।

डा. संघी ने ठीक ही कहा है। इससे पहले एक पूर्व सांसद ने सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगाया था कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी गुंडों की जमात है। दूसरी ओर, बिहार की राजनीति के कुछ खास बाहुबली तत्वों की ओर से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा की जान पर खतरे की खबर भी आती रही है। कहा जाता है कि खतरा दल के भीतर से ही है। हाल में आरा और छपरा में कांग्रेस की सभाओं में हुई हिंसक घटनाओं से भी यह लगा कि प्रदेश कांग्रेस पर आपराधिक मनोवृति वाले तत्व हावी होते जा रहे हैं। इस पष्ठभूमि में डा. संघी का यह आश्वासन उम्मीद जगाता है कि कांग्रेस में आपराधिक पष्ठभूमि वालों के लिए कोई जगह नहीं है।

दरअसल जब किसी दल पर आपराधिक तत्व हावी हो जातेे हैं तो देर-सवेर उस दल के सरकार में आने के बाद उस सरकार पर भी आपराधिक तत्वों का कब्जा हो जाता है। फिर तो आम शांतिप्रिय जनता का कष्ट बढ़ जाता है। अभी तो आपराधिक तत्वों से बिहार कांग्रेस के सभा स्थल ही पीड़ित हो रहे हैं। यदि खुदा न खास्ता कांग्रेस बिहार में सरकार में आ जाए तब तो उन आपराधिक तत्वों से आम जनता भी जहां-तहां रोज-ब-रोज पीड़ित होने लगेगी।

बिहार की निरीह जनता को सरकारी संरक्षण प्राप्त अपराधियों को झेलने का लंबा अनुभव रहा है। अब तो वैसी स्थिति नहीं है, पर वह पिछला कटु अनुभव एक दुःस्वप्न की तरह अब भी लोगों को कचोटता रहता है। डा. संघी जैसे समझदार नेताओं का यह कर्तव्य बनता है कि वह उस दुःस्वप्न की पुनरावृति नहीं होने दें। याद रहे कि कांग्रेस भी बिहार में अगले विधानसभा चुनाव के बाद अपनी सरकार बनाने का दावा कर रही है। सरकार किसकी बनेगी, यह तो मतदाताओं के हाथों में है। पर सरकार बनाने का दावा करने वाले दलों का यह कर्तव्य है कि वे अभी से ऐसा आचरण दिखाएं जिससे मतदाता साफ-साफ यह देख सकें कि कौन दल अपराधियों को गले लगाने वाला दल है और कौन दल अवांछित तत्वों को ‘गर्दनिया पासपोर्ट’ देकर अपने यहां से तत्काल भगा देने वाला दल है।

कांग्रेस की एक खूबी है कि वह आम तौर पर ऐसे किसी नेता को चुनावी टिकट नहीं देती जिसके खिलाफ किसी अदालत में आरोप पत्र दाखिल हो चुका होता है। यह बात कई अन्य दलों से कांग्रेस को भिन्न दिखाती है। इसका थेाड़ा बहुत लाभ भी कांग्रेस को मिलता रहा है।

पर अब कांग्रेस को बिहार में जब अपना प्रभाव कुछ और जमाना है तो उसे एक काम और करना चाहिए। उसे ऐसे लोगों को भी अगली बार चुनावी टिकट नहीं देना चाहिए जिनके कार्यकलाप ऐसे हैं जो आरोप पत्र के लायक बन सकते हैं। छपरा और आरा में जिन तत्वों ने कांग्रेस की सभाओं में हिंसा की, क्या वे आरोप पत्र के पात्र नहीं हैं ? क्या जरूरी है कि ऐसे उपद्रवी तत्वों व उन्हें संरक्षण देने वाले नेताओं के खिलाफ सचमुच किसी अदालत में आरोप पत्र दाखिल होने की कांग्रेस प्रतीक्षा करे ? यदि कांग्रेस पहले ही यह घोषित कर दे कि ऐसे लोगों को वह अगले विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं देगी तो ऐसे लोग दूसरे दलों का दामन पहले ही पकड़ लेंगे। कांग्रेस को आपराधिक पष्ठभूमि वालों से मुक्ति पाने में इससे सुविधा होगी।

गत लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बिहार कांग्रेस ने कई विवादास्पद छवि वालों को दूसरे दलों से बुलाकर टिकट दे दिया। ऐसे-ऐसे लोगों को भी टिकट मिले जिनका चरित्र कांगे्रस की आम राजनीतिक संस्कति से कतई मेल नहीं खाता। हालांकि ऐसे लोगों को टिकट देने का कोई ठोस चुनावी लाभ कांग्रेस को नहीं मिला। कांग्रेस पर अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप जरूर लगता रहा है, पर कांग्रेस अपराधियों की ही पार्टी है, ऐसा आरोप नहीं लगा। कांग्रेस की संस्कति आम तौर पर एक शालीन संस्कृति रही है। पर गत लोकसभा चुनाव के समय से उस संस्कृति को धक्का लगा है।

कांग्रेस और बिहार के हक में है कि काग्रेस इस आरोप से जल्दी मुक्ति पा ले कि उस सवा सौ साल पुराने दल पर कम से कम बिहार में धीरे-धीरे बाहुबली तत्वों का कब्जा होता जा रहा है। इस पष्ठभूमि में डा. संघी का बयान उम्मीद की एक किरण के रूप में सामने आया है। अंत में एक यह बात भी कह देनी जरूरी है कि कांग्रेस के जो कुछ लोग बाहुबलियों के बल पर बिहार में सत्ता पर कब्जा करने का ख्वाब देख रहे हैं, वे भारी गलतफहमी में हैं। क्योंकि एक तो बाहुबली मार्का दल कांग्रेस की अपेक्षा अधिक ताकत के साथ पहले से ही बिहार में मौजूद हैं। जिस किसी को बाहुबली मार्का दल को वोट देना होगा, वह असली बाहुबली दलों को छोड़ कर किसी कार्बन काॅपी को वोट क्यों देगा ? दूसरी बात यह भी है कि अब बिहार में इस तरह अपेक्षाकृत साफ सुथरे और शांतिपूर्ण ढंग से मतदान हो रहे हैं कि बाहुबलियों की किसी चुनाव में भूमिका अब अत्यंत सीमित हो चुकी है।


( दैनिक जागरण: पटना संस्करण में 6 अप्रैल 2010 को प्रकाशित )


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