शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

 मक्खियां 118 पुलिसकर्मियों को घायल

 नहीं कर सकती !!!!

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कल की आशंकित हिंसा का मुकाबला करने के लिए

दिल्ली पुलिस को सुप्रीम कोर्ट की ओर से 

खुली छूट मिलनी चाहिए थी।

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सुरेंद्र किशोर

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 क्योंकि आशंका है कि राष्ट्रद्रोही तत्व आंदोलन की आड़ में कल ऐसी हिंसा कर सकते हैं जिसका चेन रिएक्शन पूरे देश में हो सकता है जैसा इन दिनों फ्रांस में हो रहा है।

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केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट को इस बात पर ध्यान देना

चाहिए कि प्रतिपक्ष की ओर से कल नई दिल्ली में होने वाले प्रदर्शन के दौरान वैसी विषम स्थिति पैदा न हो जाए जो कुछ आज फ्रांस के विभिन्न नगरों में जारी है।कल भी सुप्रीम कोर्ट उस पर नजर रखे।जरूरत के अनुसार निदेश दे।

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 बेहतर तो यह होता कि सुप्रीम कोर्ट कल की स्थिति को संभालने का पूरा भार दिल्ली पुलिस और आम प्रशासन को सौंप देता।

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किंतु ऐसा नहीं हुआ।यह दुर्भाग्यपूण है और इससे कई तरह के अपशकुन हो रहे हैं।

कोक्रोच जनता पार्टी के प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि ‘‘मक्खी मारने के लिए हथौड़ा न चलायें।’’

सुप्रीम कोर्ट भूल गया कि इन्हीं तेलचट्टों की ओर से 

गत जुलाई में हुई हिंसा में दिल्ली पुलिस के छोटे -बड़े 118 पुलिसकर्मी घायल हो गये थे।वह अभूतपूर्व घटना थी।वे मक्खी नहीं हैं। जो शक्तियां कल दिल्ली में आंदोलनरत होने वाली हैं,उनकी मंशा के  बारे में आई.बी. जानकारी सुप्रीम कोर्ट को 

 लेनी चाहिए।

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अब मंशा की झलक देखिए।

राहुल गांधी 15 जनवरी 2025 को यह कह चुके हैं कि मैं इंडियन स्टेट से लड़ रहा हंू।(इंडियन स्टेट से लड़ने का मतलब है भारत की इस देश की संवैधानिक व्यवस्था से लड़ना।) 

कल ‘‘भाई-बहन’’ ने दिल्ली की महिला पुलिस कर्मियों के साथ जैसी अश्लील हड़कतें कीं,वह किसी जिम्मेदार नेता को शोभा नहीं देता।वे जिम्मेदार नेता हैं भी नहीं,यह बार -बार साबित हो चुका है।

उनके दल के सलमान खुर्शीद और मणिशंकर अय्यर कह चुके हैं कि जो कुछ बांग्ला देश में (तख्ता पलट)हुआ,वैसा भारत में भी हो सकता है।

  कल जो लोग दिल्ली में आंदोलनरत होने वाले हैं उनकी, भारत विरोधी विदेशी शक्तियों से साठगांठ की खबरें आती रहती हैं।

ऐसी स्थिति में देश में कई तरह के अपशकुन हो रहे हैं।    

-----सुरेंद्र किशोर

       9 अक्तूबर 26

 


गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

 ‘अयोध्या’ में भाजपा की हार नहीं हुई

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टी.वी.चैनलों पर बैठ कर अनेक भाजपा विरोधी प्रवक्ता गण अक्सर यह झूठ परोसते रहते हैं कि अयोध्या में भी भाजपा हार गई।

  अयोध्या नाम से विधान सभा क्षेत्र है (न कि लोक सभा क्षेत्र) जिसमें राम मंदिर अवस्थित है,उस अयोध्या में भाजपा नहीं हारी।

पर इतनी मामूली जानकारी भाजपा प्रवक्ताओं को भी नहीं है,इसलिए वे चैनलों पर लगातार परोसे जा रहे इस झूठ का कभी खंडन नहीं करते।याद रहे अयोध्या नाम भावना से जुड़ा हुआ है,इसलिए इस पर भाजपा प्रवक्ताओं को सतर्क रहना चाहिए।

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सुरेंद्र किशोर

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सन 2024 के लोक सभा चुनाव में फैजाबाद लोक सभा क्षेत्र के 

भीतर के अयोध्या विधान सभा खंड में सपा की हार हुई थी।उस खंड में भाजपा की जीत हुई  थी।पर,अयोध्या में भाजपा की हार का झूठा प्रचार करके यह बात फैलाने की कोशिश की जाती है कि राम मंदिर आंदोलन का भी कोई लाभ भाजपा को नहीं मिला।

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सन 2019 के लोस चुनाव की अपेक्षा 2024 के लोस चुनाव में भाजपा को अखिल भारतीय स्तर पर अपेक्षाकृत अधिक वोट मिले।

सन 2019 के लोक सभा चुनाव में भाजपा को देश में कुल मिलाकर 22 करोड़ 90 लाख वोट मिले थे।

जबकि 2024 के लोक सभा चुनाव में देश में भाजपा को 23 करोड़ 59 लाख वोट मिले।

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याद रहे 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में नव निर्मित राम लला मंदिर का समारंभ हुआ था।

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देश बड़ा है या फैजाबाद ?

देश बड़ा या उत्तर प्रदेश ?

रामलला विराजमान को ध्यान में रखें तो भी सवाल उठता है कि भावनात्मक दृष्टि से अयोध्या बड़ी है या फैजाबाद ?

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यदि चुनावों में मिले मतों की संख्या ही राम भक्ति का आधार माना जाए तो अयोध्या विधान सभा चुनाव क्षेत्र में सपा भक्तों की अपेक्षा रामभक्तों की संख्या 4500 अधिक मानी जाएगीं।

2022 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भी अयोध्या विधान सभा क्षेत्र में भाजपा को अन्य दलों से अधिक वोट मिले थे।यानी रामलला की लगातार कृपा किस पर रही ?

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अयोध्या विधान सभा चुनाव क्षेत्र, फैजाबाद लोक सभा क्षेत्र का एक हिस्सा है।

फैजाबाद लोक सभा क्षेत्र में कुल मिलाकर सपा को करीब 49 प्र्रतिशत और भाजपा को 44 प्रतिशत वोट मिले।वहां भी सिर्फ पांच प्रतिशत का फर्क।

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2024 के लोस चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर एन.डी.ए.को प्रतिपक्षी दलों की अपेक्षा अधिक सीटें आईं ।

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  यदि राम मंदिर ही मुद्दा था तो इस रिजल्ट के 

क्या नतीजे निकलते हैं ?

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उत्तर प्रदेश में लोक सभा की अपेक्षाकृत अधिक सीटें सपा को मिलीं।भाजपा को कम सीटें मिलीं।

यानी, राज्य स्तर पर राम मंदिर का जादू नहीं चला न ही मोदी का जादू चला।कोई दूसरा ही ‘जादू’ चल गया !!!

वह जार्ज सोरोस के पैसे का ‘जादू’ था।

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अब फैजाबाद लोक सभा सीट पर आइए।

सन 2024 का रिजल्ट इस प्रकार है--

सपा को 48.59 प्रतिशत मत मिले

भाजपा को 43.81 प्रतिशत मत मिले।

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यानी, फैजाबाद लोक सभा क्षेत्र कें करीब 44 प्रतिशत मतदातागण ही रामभक्त हैं,यदि चुनाव का मुद्दा राम मंदिर है तो।

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अयोध्या विधान सभा क्षेत्र

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सन 2024 के लोक सभा चुनाव में अयोध्या विधान सभा सेगमेंट में सपा की अपेक्षा भाजपा को 4500 वोट अधिक मिले।

यानी, रामजन्मभूमि में ,जहां रामलला विराजमान हैं,रामभक्तों की संख्या समाजवादी पार्टी के भक्तों की अपेक्षा, अधिक है।

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उपर्युक्त आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए जो भी नतीजा निकालना हो, आप खुद ही निकाल लीजिए।आप तो खुद ही चतुर सुजान हैं।

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और अंत में

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2024 के लोक सभा चुनाव में यू.पी. में भाजपा की अपेक्षा प्रतिपक्ष को अधिक सीटें मिलीं।

पर,नवंबर 2024 में यू.पी.के नौ विधान सभा क्षेत्रों में जो उप चुनाव हुए,उसमें किसे कितनी सीटें मिलीं ?

सपा को नौ में सिर्फ 2 सीटें मिलंीं।

राज को नौ में 7 सीटें मिलीं।


2027 के यू.पी.विधान सभा चुनाव नतीजे का पूर्वानुमान 2024 के लोक सभा चुनाव नतीजे को आधार बना कर किया  जाएगा या नंवबर, 2024 यानी बाद के उप चुनावों के नतीजों को आधार मान कर ?

विधान सभा का चुनाव मुख्यतः राज्य के मुद्दों पर लड़ा जाता है।लोक सभा चुनाव के मुद्दे अधिक राष्ट्रीय होते हंै।

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8 अक्तूबर 26 




मंगलवार, 29 सितंबर 2026

 देरी से असंतोष बढ़ता है

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अदालतों की तरह बढ रही है तारीख पर तारीख।

कब पूरा होगा गंगा पुलों के निर्माण का काम ?

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एक ही निर्माण एजेंसी को तीन-तीन गंगा पुलों के निर्माण 

का काम दे देने का खामियाजा आम जनता भुगत रही है

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सुरेंद्र किशोर

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क्या इस देश में साख वाली निर्माण एजेंसियों की इतनी कमी है कि बिहार सरकार को तीन गंगा पुल के निर्माण का भार एक ही एजेंसी को दे देनी पड़ी ?

या कोई और बात है  ?!

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दैनिक भास्कर ,पटना के अनुसार निर्माणाधीन गंगा पुलों के समय पर बन जाने के बाद उत्तर बिहार से आने-जाने वाले करोड़ों यात्रियों को महा जाम से मुक्ति मिल जाएगी।  

साथ ही, शेरपुर-दिघवारा गंगा सेतु चालू होते ही पटना रिंग रोड की परिकल्पना धरातल पर उतरेगी।

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दैनिक भास्कर की कल की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए क्या भविष्य में बिहार सरकार यह नियम बनाएगी कि किसी एक एजेंसी को दो से अधिक बड़ा काम नहीं ंमिलेगा ?

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करीब चार साल पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने राहुल गंाधी की तुलना ‘लाॅर्ड श्रीराम’ से की थी।कहा था कि राहुल जी अति मानव हैं और योगी की तरह तपस्या कर रहे हैं।

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सलमान साहब को अब बताना चाहिए कि राहुल जी अपनी तपस्या से कितना कुुछ हासिल कर सके हैं कांग्रेस के लिए और भारतीय समाज के लिए ?

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सुरेंद्र किशोर

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पूर्व केंद्रीय मंत्री व वरीय कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने 

सन 2022 में कहा था कि राहुल गांधी, लाॅर्ड राम के समान हैं।

इतना ही नहीं, खुर्शीद साहब ने यह भी कहा था कि राहुल गांधी सुपरमैन यानी अति मानव हैं और योगी की तरह तपस्या कर रहे हैं।

  इस टिप्पणी पर भाजपा ने कहा था कि जो व्यक्ति भ्रष्टाचार के आरोप में जमानत पर है,उसकी तुलना भगवान से करना अनुचित है।इससे असंख्य लोगों की, खास कर हिन्दुओं की भावनाएं आहत होती हैं।

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 सलमान खुर्शीद को कोई उनका ही यह बयान आज उन्हें दिखाए और उनसे पूछे कि आपके अति मानव ने अपनी तपस्या के जरिए काग्रेस और आम लोगों के लिए अब तक कितना कुछ हासिल किया है ?

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27 सितंबर 26


सोमवार, 28 सितंबर 2026

 पितृ पक्ष (26 सितंबर--10 अक्तूबर) के 

अवसर पर पिता की यादें

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वह जमाना कब का गुजर गया जब इस देश के 

लोग अपने पिता के पैरों में 

स्वर्ग देखते थे !

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--सुरेंद्र किशोर--

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अपवादों को छोड़ दें तो इन दिनों अधिकतर मामलों 

में पुत्र का समय अपने पिता से 

यह कहते हुए बीतता है कि 

‘‘ आपने मेरे लिए किया ही क्या ? ’’

ऐसा कह कर एक तरफ पुत्र अपनी नाकामियों को छिपाता है तो दूसरी ओर कूढ़न में पिता की आयु कम होती जाती है।

पिता के गुजर जाने तक यह सब चलता रहता है।

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पुत्र यह कहना चाहता है कि जो भी उपलब्धि मैंने पाई,वह खुद अपने बल पर।

और, मेरे जीवन में जो भी कमी रह गई,

वह पिता के असहयोग कारण।

वैसे सच तो यह है कि सिर्फ एक पिता को ही अपने पुत्र की तरक्की से कभी ईष्र्या नहीं होती।बाकी सबको होती है।

(मैं खुद इस बात का गवाह हूं।)

यानी, पिता दिल से चाहता है कि उसका पुत्र उससे भी अधिक तरक्की करे।

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समय बीतते देर नहीं लगती।

तब तक पुत्र भी पिता बन चुका होता है ।

और, उसे भी अपने पुत्र से यही सब सुनना पड़ता है।

इस तरह इतिहास का पहिया न जाने कब से 

घर्र -घर्र करते आगे बढ़ता जा रहा है।

एक बार फिर कह दूं।

इस नियम के कुछ अपवाद भी होते हैं।

पर, कुछ ही होते हैं।

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जीवन काल में पिता की उपेक्षा करने वाले उनके निधन के बाद कुछ अधिक ही पितृपक्ष मनाने लगते हैं।

दाढ़ी के बाल बढ़ा लेंगे,

थोड़ा उदास दिखने की कोशिश करेंगे और उनमें से कुछ गया में पिंडदान करने भी चले जाएंगे।

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अंध विश्वास है या यथार्थ ?

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आप इसे मेरा अंध विश्वास मान सकते हैं।

पर,यह तो मेरे साथ घटित हुआ है !

जब तक मेरे परिवार ने गया में पिंडदान नहीं किया,

तब तक मेरे बाबू जी 

(शिव नन्दन सिंह,ग्राम-भरहापुर,अंचल-दरियापुर,जिला-सारण,बिहार।)

अक्सर मेरे सपनों में आते थे।

पिंडदान के बाद नहीं आते।कभी नहीं आये।

  गया (अब गयाजी)का बहुत महत्व रहा है ।बताते हैं कि राम-सीता ने अपने पूर्वज की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था।

 खैर, इस अवसर पर कुछ दूसरी बातें भी।

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मेरे किसान पिता ने पिता की जिम्मेदारी 

बेहतर ढंग से निभाई।

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 जब मैंने सन 1963 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक(साइंस) पास किया ,उस पर बाबू जी मुझसे बहुत खुश थे।तब इक्के-दुक्के छात्र ही प्रथम श्रेणी में पास होते थे।

  बाबू जी मुझे जूनियर इंजीनियर बनाना चाहते थे।कहते थे कि पांच साल इंजीनियरिंग पढ़ाने का हमें धैर्य और साधन नहीं है।

पर, मेरी लाइन ही अलग थी।मैं सामाजिक -राजनीतिक क्षेत्र में जाना चाहता था।इसलिए बाद में मुझसे मेरे पिता काफी निराश हुए।

फिर भी कहते थे कि ‘‘जो मन में आए,करो।पर कभी -कभी गांव आ जाया करो--मुझे देखने के लिए नहीं तो खुद को मुझे दिखाने के लिए।’’

उनकी इच्छा के अनुसार मेरे छोटे भाई नागेंद्र ने पटना विश्व विद्यालय के लाॅॅ कालेज से   

कानून की डिग्री ली।

बड़े भाई को मुजफ्फर पुर में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हेड मास्टर पृथ्वीनाथ त्रिपाठी (बी बी काॅलेजिएट स्कूल)के घर रखकर पढ़ाने की कोशिश की।

पर उनके लगातार अस्वस्थ रहने के कारण उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई।

त्रिपाठी जी बहुत ही अच्छे शिक्षक थे।बी.बी.काॅलेजिएट स्कूल के प्राचार्य थे।

मेरे ही गांव के थे।मेरे बाबू जी के देास्त थे।

  यानी अपनी संतान को शिक्षित बनाने की एक किसान की तीव्र इच्छा तो देखिए।

मेरे पिता ने अपनी जमीन बेच कर शिक्षा पर खर्च किया।आने वाले जमाने का उन्हें पूर्वानुमान था।

जमींदारी जा चुकी थी।समय बदल रहा था।

आजाद भारत में शिक्षा का महत्व बढ़ा रहा था।

बाबू जी लंबे-चैड़े कसरती शरीर के स्वामी थे।बातचीत में दबंग थे।

लघुत्तम जमींदार थे।एक बड़े जमींदार के तहसीलदार भी थे।

उनका जन्म 1898 और निधन 1986 में हुआ।

 मेरे जन्म के समय बाबू जी  22 बीघा जमीन के मालिक थे।

स्कूल में पढ़ने लगा तो देखा कि घर में दो नौकर

दो गाय,दो या तीन बैल ,एक भैंस रहते थे।

सघन आबादी वाले सारण जिले में इतनी जमीन-जायदाद  होने पर हमारे आसपास के गांवों के अन्य किसान संतुष्ट थे।

खेत बेच कर अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में उन लोगों ने सोचा भी नहीं।

उल्टे वे मेरे बाबू जी के इस काम को अदूरदर्शी मानते थे।

पर,अब जब कभी गांव जाता हूं तो देखता हूं कि हमारे बराबर जमीन के मालिक की  हम उम्र संतान  आज भी किसानी करती  है और अच्छी हालत में नहीं हैं।

 एक बार मेरे एक स्कूल सहपाठी गया राय (रामपुर जैंती)ने कहा कि तू लोग त पहले भी जमींदार थे और पढ़ाई -लिखाई के कारण अब भी जमींदार हो।

इस तुलनात्मक अध्ययन से लगता है कि मेरे बाबू जी कितने दूरदर्शी थे।

यदि वैसा नहीं होते तो हम भी आज गांव में किसानी ही कर रहे होते।

किसानी की हालत यह है कि हमारे सामूहिक परिवार का एक सदस्य यानी मेरा भतीजा जो गांव पर रहता है,वह सारी जमीन में खेती नहीं कर पाता।क्योंकि अधिक खेती यानी अधिक घाटा।

अब भी हमारे संयुक्त परिवार के पास बेच -बाच कर नौ-दस बीघा जमीन बची है।

पर जो हैं,सब पक्की सड़क पर है।हालांकि अब हमलोग बेच रहे हैं।अन्यत्र पूंजी निवेश कर रहे हैं।

  यानी बाबू जी की अन्य बातों के साथ -साथ शिक्षा के प्रति उनकी तीव्र लालसा की याद आती है।

इस कहानी का मेारल यह है कि अभिभावकों को चाहिए कि वे तकलीफ उठाकर भी अपने बच्चों को शिक्षित जरुर करें।

(पर देश -प्रदेश का दुर्भाग्य है कि शिक्षण-परीक्षण का स्तर बिलकुल नीचे गिर चुका है।)

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बाबू जी की याद में

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पंडित ओम व्यास ओम ने ठीक ही लिखा है कि 

‘पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।’

मुझे याद नहीं कि बाबू जी ने कभी हमें बचपन में एक थपड़ भी मारा हो।

दरअसल उनकी उपस्थिति मात्र से हम सब भाई अनुशासित रहते थे।

वैसी कद-काठी का शायद ही कोई व्यक्ति जवार में हो !

मेरे परमानंद मामा उनके बारे में कहते हैं कि मेरे बहनाई शेर हैं।परमा मामा मुम्बई में पुत्र के साथ रहते हैं।

  स्वाभाविक ही है कि मेरे पिता के जीवनकाल में तो हमें उनके महत्व का उतना पता नहीं चल सका।

पर, न रहने पर हम सोचते रहे कि शायद हम लोग उनसे परंपरागत विवेक को लेकर कुछ अधिक सीख सकते थे।

उनकी स्कूली शिक्षा तो नहीं थी,

किंतु वे रामायण पढ़ते थे,

कैथी लिखते थे।

जमींदारी की रसीद काटते थे।

गांव- जवार में पंचायती करने जाते थे।

हां,वे मुकदमे के सिलसिले में अक्सर पटना-छपरा 

जाते रहते थे।अच्छे किसान है तो मुकदमा तो रहेगा ही।

कहा करते थे कि पटना हाईकोर्ट भवन के आसपास पहले धान की खेती होती थी जिसेे उन्होंने देखा था।

विधायक काॅलोनी तो बाद में बनी।

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  ओम व्यास ओम की कविता के जरिए हमें पिता के पूरे महत्व का एहसास हुआ।

आपके साथ साझा कर रहा हूं।

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पिता

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पिता  जीवन है, संबल है, शक्ति है।

पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है।

पिता अंगुली पकड़े बच्चे का सहारा है।

पिता कभी खारा तो कभी मीठा है।

पिता पालन पोषण है,परिवार का अनुशासन है।

पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।

पिता रोटी है, कपड़ा है,मकान है।

पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है।

पिता अप्रदर्शित अनंत प्यार है।

पिता है तो बच्चों को इंतजार है।

पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं।

पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं।

पिता से प्रतिपल राग है।

पिता से ही मां की बिंदी और सुहाग है।

पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ति है।

पिता गृहस्थाश्रम में उच्च स्थिति की भक्ति है।

पिता अपनी इच्छाओं का हनन परिवार की पूत्र्ति है।

पिता रक्त में दिए हुए संस्कारों की मूत्र्ति है।

पिता एक जीवन को जीवन का दान है।

पिता दुनिया दिखाने का अहसास है।

पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हाथ है।

पिता नहीं तो बचपन अनाथ है।

पिता  से बड़ा अपना नाम करो।

पिता  का अपमान नहीं, अभिमान करो।

क्योंकि मां-बाप की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता।

ईश्वर भी इनके आशीषों को काट नहीं सकता।

दुनिया में किसी भी देवता का स्थान दूजा है।

मां-बाप की सबसे बड़ी पूजा है।

वो खुशनसीब होते हैं, मां-बाप जिनके साथ होते हैं।

       --  पंडित ओम व्यास ओम

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28 सितंबर 26

  



  



शनिवार, 26 सितंबर 2026

 इंदिरा जी से कुछ सीखिए राहुल जी

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सुरेंद्र किशोर

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आपातकाल में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने आर.एस.एस. और जमात ए इस्लामी दोनों पर एक साथ प्रतिबंध लगाया था।

यदि उन्होंने सिर्फ आर.एस.एस. पर प्रतिबंध लगाया होता तो वह सन 1980 में फिर से सत्ता में नहीं आ पातीं।

पर, राहुल गांधी ने इंदिरा गांधी से भी कुछ नहीं सीखा।राहुल के कुछ भी सीखने से इनकार करने का खामियाजा कांग्रेस भुगत रही है।

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 राहुल गांधी इस्लाम,इस्लामत्व या जेहाद के खिलाफ कभी कुछ नहीं बोलते।पर हिन्दुओं के बारे में लगातार कहते रहते हैं--‘‘जो लोग खुद को हिन्दू कहते हैं,वे 24 घंटे हिंसा,घृणा और असत्य की बात करते हैं।’’

    बाद में राहुल गांधी ने कहा कि मेरा बयान पूरे हिन्दू समाज के लिए नहीं बल्कि भाजपा और आरएसएस के लिए था।

  सन 2024 के लोक सभा चुनाव में 23 करोड़ 59 लाख लोगों ने भाजपा को वोट दिए थे।

क्या भारत के 23 करोड़ 59 लाख लोग 24 घंटे हिंसा,घृणा और असत्य की बात करते हैं ?

किसी देश में इतने अधिक लोग वैसे हो जाएं तो उस देश में एक मिनट के लिए भी 

शांति बनी रहेगी ?

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राहुल गांधी को यह समझाने वाला कोई व्यक्ति नहीं है कि देश की 70-80 प्रतिशत आबादी की भावना को ठेस पहुंचाते रहिएगा तो कभी लोक सभा में बहुमत नहीं पाइएगा --चाहे मुख्य चुनाव आयुक्त पद पर ज्ञानेश कुमार हों या एस.वाई.कुरैशी हों।

  1977 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने बिना इमरजेंसी हटाए ही लोक सभा चुनाव करवाया था-सिर्फ इमरजेंसी में ढील देकर।जार्ज फर्नांडिस ने तब कहा था कि हमें चुनाव का बहिष्कार करना चाहिए क्योंकि हमें इंदिरा चुनाव जीतने नहीं देगी।पर जेपी जन भावना समझ गये थे।उन्होंने जार्ज की बात को नजरअंदाज कर दिया।

सत्ता के पूरे तंत्र पर कब्जा रहने के बावजूद फिर भी इंदिरा 1977 में सत्ता से बाहर हो गईं।उनके द्वारा बहाल चुनाव आयुक्त भी उन्हें नहीं बचा सके।

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ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त रहते केरल विधान सभा चुनाव हाल में हुआ।

वहां मुस्लिम अतिवादियों की पसंद का मुख्य मंत्री बना है।वहां उनकी सरकार ने अपने एजेंडा पर काम करना शुरू कर दिया।राहुल जिसे मुख्य मंत्री बनवाना चाहते थे,नहीं बनवा सके।केरल से देश के लिए अपशकुन आने लगे हैं।

 भाजपा सरकार और ज्ञानेश कुमार के हाथ में केरल का रिजल्ट पलटना होता तो मोदी सरकार केरल में जेहादियों को ताकतवर बनने देती ?

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2014 के लोक सभा चुनाव के समय कांग्रेस की पसंद का ही तो चुनाव आयोग था।

फिर भी नरेंद्र मोदी की सरकार बन गई।

सोनिया गांधी ने हार के कारणों की जांच का भार ए.के.एंटोनी को दिया।

एंटोनी ने अन्य बातों के अलावा अपनी रिपोर्ट में यह साफ- साफ लिखा कि हम इसलिए हारे क्योंकि मतदाताओं को लगा कि कांग्रेस मुसलमानांे की तरफ झुकी हुई है।

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पहले तो झुकी हुई थी।राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस मुसलमानों वह भी अतिवादी मुसलमानों से सटी हुई है।

सबूत देख लीजिए --तेलांगना के मुख्य मंत्री ए.रेवंत रेड्डी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ‘‘कांग्रेस का मतलब मुसलमान और मुसलमान का मतलब कांग्रेस।’’

क्या भाजपा ने कभी ऐसा कहा ?

 मनमोहन सिंह जब प्रधान मंत्री थे तो उन्होंने कहा था कि ‘‘देश के सार्वजनिक संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है।’’

 नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य ने न तो मनमोहन सिंह के बयान का खंडन किया और न ही तेलांगना के सीएम के बयान का।यानी ‘‘मौनं स्वीकृतिः लक्षणम्’’ 

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राहुल गांधी सिर्फ भाजपा-संघ-हिन्दू-हिदुुत्व

की तीखी आलाचना करते रहते हैं,पर जमात ए इस्लामी से भी अधिक कट्टर इस्लामिक संगठनों से राहुल गांधी साठगांठ करते हैं और इन जेहादियों और उनकी हिंसा के खिलाफ एक शब्द नहीं बोलते।यह बात पूरा देश जानता है।

क्या राहुल गांधी ने कभी कहा कि हम इस्लाम के पक्ष में हैं,पर हम इस्लामवाद के खिलाफ हैं ं?

या हम राजनीतिक इस्लाम के खिलाफ हैं ?

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ऐसे में हिन्दू बहुल आबादी वाले इस देश में राहुल गांधी यह उम्मीद कैसे करते हंै कि उनकी पार्टी चुनाव जीत कर केंद्र की सत्ता प्राप्त कर लेगी ?

जहां -जहां मुसलमान जितवाने की स्थिति में हैं,वहां -वहां राहुल गांधी जीत ही रहे हैं।

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सिमी कभी जमात ए इस्लामी से जुड़ा हुआ छात्र संगठन था।

पर जब सिमी ने यह घोषणा कर दी कि हम हथियारों के बल पर भारत में इस्लामिक क्रांति करेंगे तो जमात ए इस्लामी ने सिमी से अपना संबंध तोड़ लिया।

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सिमी को कांग्रेस ने अपना लिया।

कैसे ?वह जानिए।

अटल बिहारी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने सिमी पर प्रतिबंध लगाया।सिमी ने कोर्ट में अपील की।सिमी के वकील थे सलमान खुर्शीद-कांग्रेस के प्रमुख नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री।

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बाद में प्रतिबंधित सिमी के लोगों तथा ऐसे अन्य अतिवादी इस्लामिक संगठनों ने मिलकर पी.एफ.आई.बनाया।पी.एफ.आई. ने कहा है कि हम 2047 तक हथियारों के बल पर भारत मंे इस्लामिक शासन कायम कर लेंगे।केरल उनका गढ़ है।

पी.एफ.आई. ने अपना राजनीतिक संगठन बनाया है--उसका नाम है-एस.डी.पी.आई.।कांग्रेस कर्नाटका में एस.डी.पी.आई.के साथ मिलकर चुनाव लड़ चुकी है।

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केरल में पी.एफ.आई.-एस.डी.पी.आई.-मुस्लिम लीग तथा इस तरह के इस्लामिक संगठनों का जोर है।उन्हीं संगठनों के बल पर पहले राहुल और बाद में प्रियंका केरल के एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र वायनाड से सांसद बने।केरल की कांग्रेस सरकार भी अतिवादी मुसलमानों के बल पर बनी है।ऐसे में कंाग्रेस, उन संगठनों व उनके कारनामों के खिलाफ एक शब्द का कभी उच्चारण कैसे कर सकती है ?

  उसके विपरीत राहुल दिन रात हिन्दुओं -हिन्दुत्व को भला -बुरा कहते रहते हैं।

दोनों में फर्क करने का नाटक करते हैं।क्या सूर्य और उसकी किरण अलग -अलग चीज है ?

क्या किरणों को सूर्य से अलग कर सकते हैं ?

यदि नहीं तो हिन्दुत्व को हिन्दुओं से अलग कैसे कर सकते हें ? 

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ऐसे में क्या राहुल गांधी ने भारत के बहुसंख्यक समाज को मूर्ख समझ रखा है कि वे कांग्रेस को केंद्र की सत्ता में पहंुचाएंगे ताकि वे हिन्दुत्व को समाप्त कर सकें ?

 यदि राहुल केंद्र की सत्ता में नहीं पहुंच रहे हैं तो राहुल चुनाव आयोग पर हमला कर रहे हैं।चुनाव आयोग से कोई शिकायत है तो उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाइए।पहले भी वहां जाकर लोग मुंह की खाए हैं।

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26 सितंबर 26


 अपनी सुरक्षा को लेकर इतिहास से 

नहीं सीख रहे हैं राहुल गांधी

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चेतावनी के बावजूद अपनी सुरक्षा के प्रति उनकी ही लापारवाही के कारण इंदिरा गांधी ,राजीव गांधी और महात्मा गांधी की जानें गई थीं।इतिहास से सबक लेना चाहिए था।

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सुरेंद्र किशोर

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महात्मा गांधी

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दिल्ली के बिड़ला भवन में महात्मा गांधी की प्रार्थना

सभा होती थी।

20 जनवरी 1948 को बिड़ला भवन के पास बम विस्फोट हुआ।

दिल्ली के पुलिस अधीक्षक महात्मा गांधी जी के पास गये।उनसे कहा कि प्रार्थना सभा में आ रहे लोगों की तलाशी लेने की अनुमति दीजिए।गांधी नहीं माने।फिर डी.आई.जी.गये।गांधी नहीं माने।गृह मंत्री सरदार पटेल ने जाकर गांधी जी को देर तक समझाया।गांधी ने कहा कि आगंतुकों की तलाशी जैसे ही शुरू कराओगे मैं अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ जाऊंगा।निराश पटेल लौट गए।

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नतीजा

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नाथू राम गोडसे को मौका मिल गया।

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कुपरिणाम

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चूंकि नाथूराम चितपावन ब्राह्मण था,इसलिए महाराष्ट्र के कई शहरों में गांधी समर्थकों ने अनेक चितपावनों की जानें ले ली और उनके घर उजाड़े।

केंद्र सरकार ने चितपावनों पर हुए भीषण अत्याचार की खबरों को भी छपने नहीं दिया।विदेशी अखबार में कुछ खबर छपी।

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इंदिरा गांधी

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‘ब्लू स्टार आॅपरेशन’ की पृष्ठभूमि में आम सिखों में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ भारी आक्रोश था।   

तब के राॅ के प्रधान आर.एन.काव ने ,(जो प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार थे) बेअंत सिंह के संदेहास्पद होने की ताकीद की थी।

  इसी आधार पर उसका तबादला प्रधान मंत्री आवास से हटा कर दिल्ली पुलिस की सशस्त्र इकाई में कर दिया गया था।

कहते हैं कि इंदिरा गांधी उसे बेहद पसंद करती थीं और सरदार जी कहकर पुकारती थीं।

 उनकी(यानी, प्रधान मंत्री की)दखल पर वह (बेअंत)वापस (प्रधान मंत्री की सुरक्षा में )लौट आया।

 31 अक्तूबर 1984 की सुबह प्रधान मंत्री पर सबसे पहले उसी ने (यानी बेअंत ने )गोली चलाई।

 केहर और सतवंत ने उसका साथ दिया।

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खुद इंदिरा गांधी की लापरवाही का नतीजा हजारों बेगुनाह सिखों को भुगतना पड़ा।सिख मारे जा रहे थे और राष्ट्रपति जैल सिंह और संपादक खुशवंत सिंह का फोन न तो प्रधान मंत्री राजीव गांधी उठा रहे थे और न ही गृह मंत्री नरसिंह राव।ये दोनों अपने रिश्तेदारों की जान बचाने की गुहार सरकार से करना चाहते थे।जबकि खुशवंत सिंह को इंदिरा गांधी परिवार का ‘‘खुशामद सिंह’’कहा जाता था।खुद खुशवंत ंिसह ने लिखा है कि मुझे संजय गांधी ने हिन्दुस्तान टाइम्स का संपादक बनवाया था।(आज के खुशामदी लोगो, याद रख लो।समय आने पर, जरूरी नहीं है कि वह आपके काम आएगा ही ,जिसकी आप खुशामद कर रहे हैं।)

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राजीव गांधी

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दरअसल जब ‘मानव बम’ धनु राजीव गांधी की ओर बढ़ रही थी तो महिला सुरक्षाकर्मी(दारोगा ) अनुसूया डेजी आर्नेस्ट ने उसे आगे बढ़ने से दो बार रोका।

राजीव गंाधी यह सब दूर से देख रहे थे।उन्होंने उस महिला सुरक्षाकर्मी से कहा कि आप उसे आने दीजिए।

फिर जो कुछ हुआ,वह इतिहास है।

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और अब 

राहुल गांधी

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लापरवाही जारी

इतिहास से कोई सबक नहीं।

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गत साल केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के सुरक्षा प्रमुख ने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर कहा है कि राहुल गांधी सुरक्षा मानकों को लगातार तोड़ रहे हैं।

सितंबर, 2025 में सुरक्षा अधिकारी ने लिखा कि राहुल गांधी ने नौ माह में नौ विदेश यात्राएं कीं।पर किसी भी यात्रा के संबंध में सुरक्षा अधिकारी को जानकारी नहीं दी गई।

  2017 में तब के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में कहा था कि राहुल गांधी अब तक 121 बार सुरक्षा नियमों का उलंघन कर चुके हैं।

वे अपनी विदेश यात्राओं में भी सुरक्षाकर्मी को नहीं ले जाते।

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ऐसी लापारवाही का नतीजा क्या होगा ?

पता नहीं क्या होगा ?!

हालांकि हम तो चाहेंगे कि कुछ गलत न हो।

 





गुरुवार, 24 सितंबर 2026

   भोला पासवान शा़स्त्री के जन्म दिन पर

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(21 सितंबर, 1914--10 सितंबर ,1984)

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स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व मुख्य मंत्री भोला पासवान शास्त्री से 

सन 1967 में मेरी संक्षिप्त किंतु दिलचस्प मुलाकात

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1967 की बात है।

तब मैं संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का कार्यकर्ता था।मैं छपरा में सक्रिय था।

उस दल के नेता अम्बिका प्रसाद सिंह ‘दादा’ के साथ पटना आया था।आदरणीय अम्बिका दादा सारण जिले के मूल निवासी थे।

तब के उप मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर से मिलने के बाद ‘दादा’ भोला पासवान शास्त्री से मिलने उनके सरकारी आवास पर गये।मैं भी उनके साथ था।शास्त्री जी तब कोढ़ा से कांग्रेसी विधायक थे।

 अम्बिका दादा ने शास्त्री जी से मेरा परिचय कुछ इस तरह  कराया--‘‘ये हैं सुरेंद्र अकेला।हमारे दल के अच्छे कार्यकर्ता हैं।’’

  शास्त्री जी ने छूटते ही कहा--‘‘एक अकेला (महावीर प्रसाद अकेला)तो सत्येंद्र बाबू (सत्येंद्र नारायण सिन्हा )के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं।आप किसके खिलाफ लड़िएगा ?’’(याद रहे कि महावीर प्रसाद अकेला सी.पी.आई.के नेता थे।)

  मैंने कहा--इस संबंध में तो अभी कुछ सोचा नहीं है।

 हम तीनों के बीच कुछ देर तक बातें हुईं।उस बीच शास्त्री जी का नौकर हमारे लिए चाय लेकर आया।उसके बाद हम वहां से निकल गये।

उन दिनों रिक्शे से ही हम चलते थे।

रिक्शे पर मैंने अम्बिका दादा से पूछा--क्या शास्त्री जी के साथ उनका परिवार नहीं रहता ?

दादा ने कहा कि पहले पत्नी ने शास्त्री जी को छोड़ा।बाद में शास्त्री जी ने पत्नी को छोड दिय़़ा।

(दरअसल अम्बिका दादा आजादी की लड़ाई में पूर्णिया इलाके मंे ही अधिक सक्रिय रहते थे।इसलिए शास्त्री जी सहित वहां के सारे प्रमुख नेताओं को अच्छी तरह जानते थे।उनसे घुले-मिले हुए थे।)

 मैंने जब कारण पूछा तो अम्बिका दादा ने बताया--शास्त्री जी की शिक्षा-दीक्षा काशी विद्यापीठ में हुई थी।

उनकी शादी अच्छे परिवार मंे हुई।चूंकि शास्त्री जी अक्सर जेल

में ही रहते थे,इसलिए उनकी पत्नी मायके में जाकर रहने लगीं।बुलाने पर भी नर्हीं आइं।

  जब आजादी हुई तो शा़स्त्री जी के पास पत्नी आना चाहती थीं।पर शास्त्री जी ने कहा कि जब मेरे संकट की घड़ी में उसने मेरा साथ नहीं दिया तो मैं अब उसे नहीं बुलाऊंगा।नहीं बुलाया--दादा ने बताया।

 अम्बिका दादा की बात पर अविश्वास करने का मेरे पास कोई कारण नहीं था।

  ऐसी बातों की तब आम नेता लोग चर्चा भी नहीं करते थे जिस तरह आज होती है।तब राजनीति का स्तर आज की तरह गिरा हुआ नहीं था।न तो शास्त्री जी ने अपना जातीय वोट बैंक बनाने की कोशिश की और न ही राजनीति को पैसा कमाने का जरिया बनाया।

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शास्त्री जी तीन बार बिहार के मुख्य मंत्री रहे--1968, 1969 और 1971 में। 

वे इंदिरा गांधी सरकार में मंत्री भी रहे।सन 1978 में भोला पासवान शास्त्री राज्य सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे। तब केंद्र में मोरारजी देसाई की सरकार थी।

शास्त्री जी कभी विवादों में नहीं रहे।

 साफ-सुथरी छवि के नेता थे।

पक्ष-विपक्ष के नेता लोग भी उनका बड़ा सम्मान करते थे।

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  21 सितंबर 26

   

 

 


बुधवार, 23 सितंबर 2026

 समर शेष है,नहीं पाप का भागी केवल व्याध,

जो तटस्थ हंै,समय लिखेगा उनके भी अपराध।

  ---राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर

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आज भारत की जो स्थिति है,उसमें दिनकर की 

उपर्युक्त रचना सर्वाधिक मौजूं है।

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मुहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चैहान के बीच जयचंद तटस्थ रह गया था।मानसिंह तो अकबर का एक सेनापति बन कर महाराणा प्रताप से लड़ रहा था।

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पर,एक खास अर्थ में जयचंद का नाम आज भी अधिक ही लिया जाता है,मानसिंह का यदाकदा ही।जयचंद संज्ञा नहीं बल्कि विशेषण बन गया है।

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आज भी सनातन को समाप्त करने के लिए बाहर-भीतर की शक्तियां पूरी ताकत से लड़ रही हैं।दूसरी ओर, सनातन की रक्षा करने वाली शक्तियां बचाव के सारे उपाय कर रही हैं।

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पर,इस बीच भारत के अनेक लोग तटस्थ हैं।उन तटस्थों को पहचानने में आपको कोई दिक्कत नहीं होगी।

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आने वाली पीढ़ियां आज के तटस्थों को किस श्रेणी में रखेगी ??

पूर्व अनुमान लगा लेना कठिन नहीं है।

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सुरेंद्र किशोर--23 सितंबर 26


रविवार, 20 सितंबर 2026

 ‘‘सत्ता के सिरहाने धूनी रमाने वाले पत्रकार’’

राम बहादुर राय पर तैयार पुस्तक का 

लोकार्पण 25 सितंबर, 26 को दिल्ली में होगा।

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सुरेंद्र किशोर

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देश के प्रमुख पत्रकार व लेखक राम बहादुर राय अस्सी के हो गये।

दिल्ली राजनीति की माया नगरी है।पत्रकारिता की भी।

 उस नगरी में लगातार दशकों तक रह कर भी राय साहब बहुसंख्य लोगों के सम्मान के पात्र अब भी बने हुए हैं।यह विरल है।

 ‘‘अस्सी के राय साहब’’ नामक पुस्तक (प्रभात प्रकाशन)का लोकार्पण 25 सितंबर, 2026 को दिल्ली के डा.आम्बेडकर इंटरनेशनल आॅडिटोरियम में शाम चार बजे होगा।

  वैसे तो पुस्तक में राय साहब पर सौ से अधिक लेख हैं, पर नामी पत्रकार कुमार आनन्द के लेख का शीर्षक ‘‘सत्ता के सिरहाने धूनी रमाने वाला योगी’’राय साहब के व्यक्तित्व को पूरी तरह प्रतिबिंबित करता है।

 पुस्तक में राय साहब पर मेरा भी एक लेख है।

सारे लेख पठनीय हैं--प्रेरणादायक हैं।

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19 सितंबर 26

  


मंगलवार, 15 सितंबर 2026

 सामान्य नागरिक संहिता 

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बताशे के लिए मंदिर तोड़ने की कोशिश जारी

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मुगल काल की पुनरावृति को रोकने की 

चेष्टा  है समान नागरिक संहिता यानी यू.सी.सी.

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सुरेंद्र किशोर

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 21 प्रदेशों में यू.सी.सी.लागू करके औरंगजेब शैली की मुगल सत्ता की यहां पुनरावृति को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।

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दरअसल मुगल काल की वापसी की आशंका को रोकने के लिए भारत में

यथाशीघ्र सामान्य नागरिक संहिता लागू करना अत्यंत अनिवार्य हो गया है।पर, मुझे नहीं मालूम कि आज महाराणा प्रताप-छत्रपति शिवाजी अंततः मजबूत पडं़ेगे या मान सिंह--जयचंद !

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 वोट लोलुप नेता इस बात को नजरअंदाज कर रहे हैं कि भारतीय  संविधान के अनुच्छेद-44 में सामान्य नागरिक संहिता का प्रावधान है।इस संविधान को संघियों-भाजपाइयों ने नहीं बनाया है,बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों ने बनाया है जिनमें कांगे्रेसियों का बहुमत था।क्या वे भी साम्प्रदायिक थे ?

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पर,आज के जो वोट लोलुप तथाकथित सेक्युलर नेता यू.सी.सी.का विरोध कर रहे हैं, वे दरअसल बताशे के लिए मंदिर तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, वे जाने-अनजाने जेहादियों की मनोकामना पूरी करने में मददगार बन रहे हैं।

ऐसे में आम गैर मुस्लिम जनता को यह चुनना है कि वे महाराणा प्रताप -छत्रपति शिवाजी बनेंगे या मान सिंह-जयचंद का अनुसरण करेंगे ?

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डा.जाकिर नाइक कहते हैं कि भारत में अब हिन्दुओं की आबादी सिर्फ 60 प्रतिशत रह गई है।(विश्वास न हो तो यूट्यूब खोल कर देख लीजिए।)

डा.नाइक ने एक बार कहा था कि हम केरल से ‘‘अपना काम’’ शुरू करेंगे।केरलम में आज वही सब हो रहा है।केरलम से आ रही खबरों पर खुले दिमाग से गौर करिए।

डा.नाइक मलेशिया में है।(बोफोर्स दलाल क्वोत्रोचि भी भाग कर मलेशिया ही गया था।)

यह संयोग नहीं कि राहुल-प्रियंका मलेशिया के प्रधान मंत्री से दिल्ली में मिले।

   मौलाना रशीदी कहते हैं कि मुसलमानों की आबादी भारत में अब 40 प्रतिशत हो चुकी है।

 सरकारी आंकड़ा बताता है कि भारत में हिन्दुओं की जनसंख्या की वृद्धि दर 16 दशमलव 8 प्रतिशत है जबकि मुसलमानों की आबादी की वृद्धि दर 24 दशमलव 6 प्रतिशत।(क्योंकि मुसलमानों को चार वीबियों और अनगिनत बच्चों की इस देश में छूट मिली हुई है।जबकि हिन्दू सिर्फ एक ही शादी कर सकते हैं।)

यह इसलिए संभव है क्योंकि मुसलमानों के लिए अलग कानून हैं।(ब्रिटेन सहित यूरोप के कई देश भी ऐसी ही समस्या से जूझ रहे हैं।)

जेहादी लोग अब जल्दीबाजी में हैं।वे भारत सहित पूरी दुनिया पर कब्जा चाहते हैं।

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आबादी बढ़ाने के अलावा,लव जेहाद,जबरन या लोभ देकर धर्म परिवर्तन या हिन्दू बच्चों के अपहरण व घुसपैठ की घटनाओं की खबरें आती रहती हैं।

उसके साथ ही भारत में प्रतिबंधित जेहादी संगठन पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया ने घोषणा कर रखी है कि वह सन 2047 तक हथियारों के बल पर भारत को मुस्लिम देश बना देगा।इसके लिए वह हथियार जुटा रहा है।

पी.एफ.आई.के राजनीतिक संगठन एस.डी.पी.आई.से कांग्रेस का ठोस

गठबंधन है।इनकी बनवाई हुई केरलम में मिलीजुली सरकार है।

हाल में केरलम से एक वीडियो आया है जिसमें जेहादी मुस्लिमों की भीड़ नारा लगा रही है--हिन्दुओं को मार कर मंदिरों के पास टांग देंगे।

उधर ब्रिटेन में सड़कों पर निकल मुस्लिमों की भीड़ नारा लगाती  है--‘‘ईसाइयों,ब्रिटेन छोड़ो।’’घर तर के बड़ तर, आउर बड़ तर के घर तर ? 

केरलम सहित भारत के जिन- जिन हिस्सों में मुस्लिमों की आबादी बढ़ रही है,वहां से गैर मुसलमानों को या तो भगाया जा रहा है या उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है।या हत्या कर दी जा रही है।

असदुद्दीन कहते हैं--जब मोदी पहाड़ पर चले जाएंगे,योगी मठ में चले जाएंगे तो तुम्हें (यानी हिन्दुओं को )कौन बचाएगा ?

उनका छोटा भाई कह चुका है--15 मिनट के लिए पुलिस हटा लो तो दिखा देंगे कि तुम कितने हो और हम कितने हैं। 

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ऐसे में मोदी सरकार और उसके गृह मंत्री अमित शाह गैर मुसलमानों के खास कर हिन्दुओं के रक्षक के रूप में सामने आए हैं।मोदी-शाह को मालूम है कि 

‘‘अब नहीं तो कभी नहीं।बाद में काफी देर हो चुकी होगी !!’’

यू.सी.सी.लागू करने में देर करने पर भारत में देर-सबेर वैसा ही शासन कायम हो जाएगा जैसा पाक और बांग्ला देश में है।तब वे भी नहीं बचेंगे जो आज जयचंद और मान सिंह की भूमिका में हैं।पाक में न तो जोगेंद्र मंडल रह सके थे न मशहूर कम्युनिस्ट सज्जाद जहीर।जोगेंद्र मंडल ने पूर्वी पाकिस्तान से जिन दलितों को भारत आने से रोक लिया था,उन्हें पहले पाक व बाद में बंाग्ला देश के जेहादियों ने जबरन धर्म परिवर्तन करा कर या मार -मार कर समाप्त कर दिया।जोगेंद्र मंडल और सज्जाद जहीर भी जान बचा कर पाक से भारत आ गये थे।

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पाकिस्तान में सन 1947 में हिन्दुओं की जनसंख्या 14 प्रतिशत थी जो अब 1 दशमलव 61 प्रतिशत है।

1947 में बांग्ला देश में हिन्दुओं की जनसंख्या 28 प्रतिशत थी जो आज 7 दशमलव 9 प्रतिशत रह गई है।

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यदि भारत में कांग्रेस नीत सरकार फिर से आ गई तो इस देश को पाकिस्तान बनने से कोई रोक नहीं सकता।

भुट्टो का नारा था--हम भारत को हजार घाव देंगे।

1947 में जिन्ना वादियों का नारा था-‘‘हंस के लिया पाकिस्तान,लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान।’’

3 करोड़ मुसलमानों को बंटवारे के समय भारत में ही रोक कर नेहरू ने एक और पाक बनाने का रास्ता साफ कर दिया था।

संघ प्रमुख मोहन भागवत को बयान आया है--‘‘यू.जी.सी.सिर्फ प्रस्ताव है,न कानून बना, न बनेगा।’’

पर,यू.जी.सी.के विरोध के नाम पर बांकी पुर विधान सभा के लोगों ने एक सी.ए.ए.-एन.आर.आर.विरोधी प्रशांत किशोर को चुनाव जितवा दिया।

  क्या आप समझते हैं कि सी.ए.ए.-एन.आर.सी.विरोध का निहितार्थ क्या है ?

निहितार्थ बहुत खतरनाक है।

यह पी.एफ.आई.एजेंडा था शाहीन बाग धरने (2019)में परिलक्षित हुआ।वहां दंगा करवाया गया--53 लोगों की जान गई थीं।

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भारत के कई बड़े- बड़े सेक्युलर नेताओं ने भारत को लूट कर विदेशों में घर-दुकान-माॅल आदि खरीद लिये हैं।वे वहां जाकर बस जाएंगे।पर आम गैर मुस्लिम आबादी खासकर हिन्दुओं का क्या हाल होगा ?

आज बंटोगे तो कल कटोगे !!!कहीं भागने की जगह भी नहीं मिलेगी।

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     15 सितंबर 26


रविवार, 13 सितंबर 2026

 मेरा रोज का नाश्ता है आर्गेनिक सत्तू

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बचपन में हम हलवाहे के भोजन के लिए 

खेत में सत्तू लेकर जाते थे।

रोज सत्तू खाकर भी हलवाले हट्््ठे-कट्ठे रहते थे।

पर,तब का सत्तू मिलावट रहित होता था।

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सुरेंद्र किशोर

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हर दिन की तरह आज भी मैंने नाश्ते में मिलावट रहित आर्गेनिक सत्तू खाया और अखबार पढ़ने बैठा।

दैनिक हिदुस्तान की एक खबर पर नजर टिक गई--

‘‘ब्रिक्स सम्मेलन में बिहार का सत्तू और मखाना परोसा गया।’’

मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी ने धन्यवाद देते हुए लिखा कि प्रधान मंत्री ने 

लोकल टू ग्लोबल के संकल्प को साकार किया है।

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मेरी एक ही आशंका है--जब सत्तू बड़े पैमाने पर विदेश जाने लगेगा तो उस पर मिलावट खोरों की राक्षसी प्रवृति हावी न हो जाए !

यदि वैसा हुआ तो 

इस देश की उल्टे बदनामी होगी।

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मुझे शुद्ध सत्तू का स्वाद अच्छी तरह याद है जो अपने गांव में मैंने पचास-साठ के दशकों में खाया था।

  इन दिनों मैं यहां जो सत्तू मंगवाता हूं,वह उसी ओरिजनल स्वाद का है।यह मेरा रोज का नश्ता है--हां,उसमें कुछ मूंगफली-किशमिश मिला देता हूं।

महंगा पड़ता है यानी 350 रुपए प्रति किलोग्राम।पर,स्वास्थ्य के लिए सही है।

  सत्तू की कंपनी का नाम मत पूछिएगा अन्यथा मुझे उसका प्रचारक मान लिया जाएगा।हां,जिन्हें इतना अधिक महंगा सत्तू फिर भी खाना है,वे मुझसे फोन पर पूछ सकते हैं।

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12 सितंबर 26

 

    

 


 मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी से एक

 छोटी मुलाकात में बड़ी बातें

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सुरेंद्र किशोर

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कुछ समय पहले एक सामाजिक समारोह में मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी 

जी से मुलाकात हुई थी।

उन्होंने मुझसे कहा था--‘‘किसी दिन हम लोग साथ चाय पिएं।’’

उनके आमंत्रण की शालीन शैली मुझे पसंद आई।

वह प्रतीक्षित मुलाकात कल अणे मार्ग स्थित उनके आवास में हुई।

मेरे साथ मशहूर पत्रकार कन्हैया भेलाड़ी भी थे।या यूं कहिए कि मैं कन्हैया जी के साथ था।

      सम्राट जी से मेरी यह पहली बातचीत थी।मैं भी उन्हें समझना चाहता था।

इस संक्षिप्त मुलाकात में ही मुझे लग गया कि बिघ्न संतोषियों और राजनीतिक विरोधियों की धारणा के विपरीत नये मुख्य मंत्री को न सिर्फ राज्य की मूल समस्याओं की समझ हैं बल्कि उनके समाधान का रोड मैप भी उनके पास है जिस पर वे काम कर रहे हैं।

  मुलाकात के दौरान ही मैंने पाया मुख्य मंत्री ने सामने आई दो समस्याओं को न सिर्फ  उन्होंने तंुरत समझ लिया बल्कि उनका त्वरित समाधान भी कर दिया।

   बातचीत के दौरान सेटेलाइट टाउनशिप ,नये उद्योगों के लिए

जमीन की उपलब्धता और राज्य के कम से कम पांच बड़े अस्पतालों के कायापलट कोे लेकर मुख्य मंत्री ने सकारात्मक व उत्साह बर्धक बातें बताईं।

  इस तरह की कुछ अन्य बातंे भी हुईं।

 एक मुख्य मंत्री की बड़ी जिम्मेदारियों और अत्यंत व्यस्तताओं को ध्यान में रखते हुए हमने ही बातचीत को अधिक लंबा नहीं किया।

अगली किसी मुलाकात का वादा करके हमने उनसे विदा ली।

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और अंत में

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इस मुलाकात के दौरान मुख्य मंत्री जी ने इस छोटी सी बात का भी ध्यान रखा कि हमारा वाहन बाहर न रहकर अणे मार्ग के परिसर के भीतर रहे ताकि हमें वाहन तक पहुंचने के लिए पैदल न चलना पड़े।  

   

 


बुधवार, 9 सितंबर 2026

 आरक्षण सुधार बनाम आरक्षण बढ़ाओ आंदोलन

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ऐसे संवदेनशील मामलों को लेकर सड़कों पर उतरने 

के बदले इन्हें दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट को सौंप देें

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सुरंेद्र किशोर

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क्योंकि सड़कों पर उतरने से सामाजिक तनाव बढ़ेगा तो उसका नुकसान 

1990 की तरह आरक्षण विरोधियों को ही अधिक होगा।

क्योंकि आरक्षण सुधार को भी आरक्षण समाप्ति की मांग 

के रूप में ही कुछ लोग पेश करेंगे।

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राजनीतिक कार्यपालिका या संसद इन मामलों में कुछ नहीं कर सकती।

पर,सुप्रीम कोर्ट को संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद-142 के तहत अपार शक्ति जरूर प्रदान कर दी है।यदि सुप्रीम कोर्ट चाहे तो न्याय हित में वह कुछ भी निर्णय कर सकता है।

 (सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर बनाने का आदेश इसी अनुच्छेद का प्रयोग करते हुए दिया था।)

यदि आरक्षण में सुधार करवाना चाहते हैं,उन्हें ऐसी सामाजिक बनावट वाली संसद का इंतजार करना पड़ेगा जो तत्संबंधी अनुच्छेद-340 में जरूरी संशोधन कर सके। 

देश की जो सामाजिक यानी जातीय बुनावट है,उसमें वैसी संसद बनना लगभग असंभव है।

  याद रहे कि अनुच्छेद-340 में सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े का प्रावधान है।आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा वाक्यांश जोड़ने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा।

 यह फिलहाल लगभग असंभव काम है।

आरक्षण विरोधी या सुधार पक्षी सड़कों पर आंदोलन जारी रखेंगे तो समाज में आपसी जातीय तनाव बढ़ेगा।उससे यह आशंका पैदा होगी कि अगली बार देश में एक ऐसी मिलीजुली सरकार बन जाएगी जिसमें सपा,राजद,तथा इस तरह के कट्टर आरक्षणपक्षियों व विवादास्पद दलों का दबदबा हो जाएगा।वे अपने साथ दूसरी ‘‘कमजोरियां’’ भी उस सरकार में लाएंगे जैसा कि उनका इतिहास रहा है।

फिर तो माना जाएगा कि सवर्णों ने 1990 के मंडल आरक्षण विरोधी अपने आंदोलन से कोई सबक नहीं सीखा।

 सन 1990 में यदि सवर्णों ने सड़कांे पर उतर कर मंडल आरक्षण का  विरोध नहीं किया होता तो लालू प्रसाद राजनीति में बलशाली नहीं बनते।लालू प्रसाद के मजबूत होने से सवर्णों को क्या लाभ मिला ?

कोई समझदार व्यक्ति नहीं चाहेगा राष्ट्रीय स्तर पर 1990 के बिहार की  पुनरावृति।

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दूसरी ओर, पिछड़ा वर्ग, आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने की मांग कर रहा है।इस मांग को पूरा करना किसी सरकार के लिए संभव नहीं है।क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी केस में 50 प्रतिशत आरक्षण की अधिकत्तम सीमा तय कर दी है।

  हालांकि कुछ राज्य अपने जनसांख्यिकी आंकड़ों को आधार बना कर 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण दे रहे हैं।पर ऐसे कुछ अन्य राज्यों के ऐसे मामले अदालत मंे अब भी विचाराधीन हंै।

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इसलिए बेहतर यही होगा कि दोनों पक्ष- यानी आरक्षण सुधारपक्षी व आरक्षण बढ़ाओ पक्षी-व्यापक सामाजिक सद्भाव के हित में ऐसे मामलों को सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दें।

वहां से जो निर्णय हो उसे, सब मानें।उससे तनाव पैदा नहीं होगा।

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और अंत में

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सन 1990 में जब पिछड़ों के लिए ‘मंडल आरक्षण’ की घोषणा हुई तो सवर्णों के बड़े हिस्से ने खास कर बिहार में उसका जोरदार विरोध किया।उस विरोध का दोगुनी ताकत से प्रतिकार भी हुआ।

उन दिनों मैं सवर्णों से यह कहा करता था-‘‘गज नहीं फाड़ोगे तो थान हारना पड़ेगा।इसलिए आरक्षण का विरोध मत करो।’’

(पूर्व कांग्रेस विधायक हरखू झा मेरी उस बात के गवाह हैं-वे अब भी यदाकदा कहते हैं कि सुरेंद्र जी आरक्षण  विरोधियांे को चेतावनी दे रहे थे।पर कोई सुनने वाला नहीं था।कोई व्यक्ति अब भी हरखू झा को फोन करके इस बात की पुष्टि कर सकते हैं।)वैसे मेरे परिवार के सदस्य भी तब मुझे पागल कहते थे।मैं उनकी नादानी पर हंसता था।  

लोग नहीं माने।नतीजतन मुख्य मंत्री लालू प्रसाद ने संपूर्ण पिछड़ों को जगा कर एकजुट कर दिया।वे राजनीति के महा बलवान बन गये-भले कुछ दिनों के लिए ही सही।

लालू प्रसाद अपनी ही गलतियों के कारण मौजूदा स्थिति को प्राप्त हुए हैं।यदि गलती नहीं करते तो वे अंततः पिछड़ों के मसीहा कहलाते।मैं तब उन्हें लिखकर चेता रहा था।उससे नाराज होकर मुझे नौकरी से निकलवा दिया उन्होंने।पर अब मेरे बारे में लालू जी कहते हैं--‘‘सुरेंदर किशोर संत है,फकीर है, 24 कैरेट का सोना है।’’पर अब पछताए होत का...।

आरक्षण समर्थन से ताकत पाए लालू प्रसाद ने 15 साल तक जैसा शासन चलाया,उससे अधिक नुकसान सवर्णों को ही हुआ।

पर,कुछ लोगों की आदत है कि वे अपनी पिछली गलतियों को दोहराते रहते हैं।आरक्षण समाप्ति या सुधार का आंदोलन उसी गलती का दोहराव है।पर कोई बात नहीं।सुप्रीम कोर्ट का रास्ता उपलब्ध है सबके लिए।

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9 सितंबर 26   


       


मंगलवार, 8 सितंबर 2026

 ‘माही’ नदी से ‘मरीन’ ड्राइव तक-

न सिर्फ नदी का नाम गलत ,बल्कि 

नदी किनारे की सड़क का नाम भी गलत !

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार के सारण जिले की मही नदी के तटबंध इस बार टूटे तो

उस नदी का नाम अखबारों में खूब छपा।

पर,मही नदी नहीं, बल्कि माही नदी छपा।

यह अंग्रेजी का असर है।

(ध्यान रहे कि मही नदी मेरे पुश्तैनी गांव से होकर बहती है।

मेरे गांव की जमीन के नक्शे में मही नदी ही लिखा हुआ है।उसकी फोटो काॅपी प्रस्तुत है।)

इसी तरह जेपी गंगा पथ को हम अखबारों के जरिए मरीन ड्राइव जानने लगे हैं।यह गलत अंग्रेजी का असर है।

क्योंकि मरीन का अर्थ समुद्रीय होता है, नदी शब्द से इसका कोई संबंध नहीं।

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एक समय था जब मैं अन्य अनेक पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ दैनिक नईदुनिया (इन्दौर)के लिए भी बिहार से लिखता था।

एक बार उसके यशस्वी संपादक राजेंद्र माथुर ने मुझे पत्र लिखा।

उन्होंने लिखा कि ‘‘आप बिहार के हर जिला और तहसील शहर के सही नाम लिख कर भेज दें।ज्यादा से ज्यादा चार सौ नाम होंगे।’’

मैंने भेज दिया था।(याद रहे कि नईदुनिया की एक गलती पर पाठकों के औसतन 13 पत्र संपादक को मिलते थे।इसलिए संपादक जागरूक रहते थे।मैं भूल रहा हूं--राजेंद्र यादव या नामवर सिंह--इन्हीं में से किसी ने इन्दौर के इस अखबार को देखकर कहा था कि देश का सबसे अच्छा हिन्दी अखबार इन्दौर से निकलता है।)  

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दरअसल अंग्रेजी न्यूज एजेंसियां जो समाचार नई दुनिया को भेजती थीं,उनमें मुंगेर,कहलगांव और पलामू आदि की अंग्रेजों द्वारा दी गई स्पेलिंग कुछ अजीब होती थीं।उसके देवनागरीकरण में नईदुनिया अक्सर गलती करता था।मैंने उस ओर माथुर साहब उर्फ रज्जू बाबू का ध्यान आकृष्ट किया तो उन्होंने मुझे एक महत्वपूर्ण काम दे दिया था।यह 1981 की बात है।तब मैं दैनिक ‘आज’ के पटना संस्करण में काम करता था।

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8 सितंबर 26



 सास याद रखें कि वे भी कभी बहू थीं।

साथ ही, अपनी दुलरुई बेटी को भी ध्यान में रखिए

जो कहीं पतोहू बन कर गई है।


 यदि 90 प्रतिशत गेहूं के आटे में 10 प्रतिशत उजले पत्थर को पीस कर 

मिला दिया जाए और उसकी रोटियां बनाकर रोज खाया जाए तो 

शरीर पर उन रोटियों का कैसा असर पड़ेगा ?

   --- सुरेंद्र किशोर

(इन दिनों इस तरह की भी मिलावट जारी है।) 

7 सितंबर 26



बुधवार, 2 सितंबर 2026

 दोहरा मापदंड

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‘गोदी मीडिया’ के मौजूदा शोर के बीच

नेहरू-इंदिरा दौर की कुछ भूली- बिसरी यादें

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सुरेंद्र किशोर

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प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने दिल्ली के एक बड़े अखबार के संपादक दुर्गा दास को उनके पद से हटवा दिया था। नेहरू के निजी सचिव ने अखबार के मालिक का फोन करके हटवा दिया।

दुर्गादास प्रधान मंत्री नेहरू की आलोचना लिख रहे थे।

(नेहरू के निजी सचिव एम.ओ.मथाई ने यह बात अपनी संस्मरणात्मक किताब में लिखी है।)

प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने उसी अखबार के संपादक पद से बी.जी.वर्गीज को हटवा दिया था।बाद में वर्गीज को रामनाथ गोयनका ने इंडियन एक्सपे्रस का संपादक बना दिया था।  

साठ के दशक में तब के कांग्रेसी मुख्य मंत्री के.बी.सहाय ने पटना के दैनिक सर्चलाइट के संपादक टी.जे.एस. जार्ज को भारत 

रक्षा कानून के तहत जेल भिजवा दिया था।नेहरू के साथ 13 साल तक उनके निजी सचिव रहे एम.ओ.मथाई के अनुसार ही टाइम्स आॅफ इंडिया और इलेस्टे्रटेड वीकली आॅफ इंडिया का तीन मूत्र्ति भवन यानी प्रधान मंत्री आवास में प्रवेश वर्जित था। 

ऐसे में उन दिनों के मीडिया को गोदी मीडिया बना देने में तो कोई दिक्कत नहीं आने वाली थी।दिक्कत आई भी नहीं।

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अब कोई मुझे बताए कि मोरारजी देसाई,अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी ने अपने प्रधान मंत्रित्व काल में किन-किन संपादकों को उनके पदों से हटवाया ?

सबूत के साथ कोई उदाहरण मिलेगा तो मैं उस पर भी लिखूंगा।

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दूसरी ओर, जब मोरारजी देसाई से किसी ने पूछा कि आर.के करंजिया की अभियानी साप्ताहिक पत्रिका ‘ब्लिट्ज’ आपकी इतनी अधिक आलोचना करता रहता है,फिर भी आप उस पर कार्रवाई क्यों नहीं करते ?

देसाई ने कहा कि मैं तो उसे पढ़ता ही नहीं।

 बिहार के मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंह से जब किसी ने पूछा तो उन्होंने इसी तरह की बात कही थी--‘‘मैं तो सर्चलाइट पढ़ता ही नहीं।किसी अखबार के खिलाफ इससेे बड़ी कार्रवाई नहीं हो सकती।’’

याद रहे कि उसके संपादक एम.एस.एम.शर्मा अपने काॅलम में श्रीबाबू के खिलाफ किसी सबूत के बिना अत्यंत आपत्तिजनक बातें लिखा करते थे।

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दूसरी ओर, आज नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ भी छपता रहता है।टी.वी.चैनलों पर बैठकर कोई कुछ भी बोलता रहता है।

आजादी के तत्काल बाद के वर्षों की बात है।

बिहार विधान सभा में साठी लैंड रिस्टोरेशन विधेयक पर व्यापक चर्चा हुई थी।

(दरअसल आजादी के तत्काल बाद बेतिया राज की जमीन की बड़े- बड़े सत्ताधारियों ने आपस में बंदरबांट कर ली।केंद्र सरकार को शिकायत गई तो गृह मंत्री सरदार पटेल ने बिहार सरकार को निदेश दिया कि जमीन वापस करो।उस वापसी के लिए साठी लैंड रिस्टोरेशन विधेयक बिहार विधान सभा से पारित हुआ।

पर चर्चा के दौरान लाभान्वितों व उनके समर्थकों ने अपने लोभ के स्वर बहस में भी मुखरित कर ही दिये।) 

उस चर्चा के दौरान कांग्रेस के एक प्रमुख नेता ने,जो बाद में बिहार के मुख्य मंत्री बने थे,कहा था कि ‘‘सन 1857 के विद्रोह को दबाने में जिन भारतीयों ने अंग्रेजों का साथ दिया था,अंग्रेजों ने उन्हें जमीन जायदाद ,जमीन्दारी ,राय बहादुर -खान बहादुर की पदवी आदि देकर सम्मानित किया था।हमने और हमारे परिजन ने भी आजादी लड़ाई में बहुत कुछ खोया,उसकी क्षतिपूत्र्ति के रूप में यदि हमने साठी की जमीन(बेतिया महाराज की जमीन)की बंदोबस्ती ली तो कौन सा अन्याय किया।’’

मैंने उस रिपोर्ट के लिए पहले स्थानीय अखबारों की फाइलें देखीं।मुझे वह खबर नहीं मिली।फिर मैं विधान सभा लाइब्रेरी में जाकर तब की विधान सभा की कार्यवाही पर तैयार किताब देखी।उसमें यह विवरण मिला।

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 नेहरू के शासन काल के सबसे बड़े घोटाले 80 लाख रुपए के जीप घोटाले,(यानी इस देश के बीज घोटाले )की कोई खोजपूर्ण रिपोर्टिंग नहीं हुई थी जबकि उस घोटाले में शीर्ष सत्ताधारी का सीधा हाथ था।इसीलिए कृष्ण मेनन को सजा देने के बदले उनको प्रमोशन मिला था।यानी हाई कमिश्नर के बाद केंद्रीय मंत्री बने थे।

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1962 में चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय के कारणों की जांच के लिए हैंडरसन -बु्रक्स-भगत समिति बनी।उसकी रिपोर्ट आई जिसके जरिए भारत सरकार की आपराधिक विफलताएं सामर्ने आइं।

पर उस समिति की रिपोर्ट भारत के तत्कालीन गोदी मीडिया में नहीं छपी।

बल्कि विदेशी पत्रकार नेविल मैक्सवेल ने प्रकाशित की।

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सन 1967 के चुनाव के लिए एक दल को छोड़ कर इस देश के सभी प्रमुख दलों ने विदेशों से नाजायज तौर पर पैसे लिये थे।उस शर्मनाक रिश्वतखोरी की रिपोर्ट भारतीय मीडिया में नहीं बल्कि न्यूयार्क टाइम्स में छपी।पूंजीवादी देश ने कम्युनिज्म के विरोध के लिए भारतीय दलों व नेताओं को पैसे दिए और कम्युनिस्ट देशों ने कम्युनिज्म के प्रचार-प्रसार के लिए। 

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इमर्जेंसी में इंदिरा सरकार ने मीडिया का क्या हाल किया था,उसकी पराकाष्ठा का एक नमूना देखिए।

अस्वस्थता के कारण आपातकाल के बीच में ही जेपी रिहा कर दिए गए थे।

जब जेल से बाहर आए तो सरकार ने मीडिया को निदेश दिया--जेपी कहां जाते हैं,किससे मिलते हैं,इसकी खबर नहीं छपेगी।नहीं छपी।गोदी मीडिया का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है ?

(ये तो नमूने के तौर पर थोड़े से उदाहरण हैं।ऐसी सारी कहानियों को एकत्र करेंगे तो मोटी किताब बन जाएगी।)

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2 सितंबर 26  



  


गुरुवार, 27 अगस्त 2026

 सी.ए.ए.और एन.आर.सी.पर प्रशांत किशोर

 की राय अब बदली है या वही है ?

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सुरेंद्र किशोर

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सन 2019 में प्रशांत किशोर को जदयू ने अपनी पार्टी से निकाल दिया था।

मुददा था-जदयू सी.ए.ए.का समर्थन कर रहा था और प्रशांत 

किशोर उसका विरोध।

प्रशांत किशोर ने तब एन.आर.सी.का भी विरोध किया था।

इस मुद्दे पर प्रशांत किशोर ने कैबिनेट स्तर के पद की सुविधा को भी 

लात मार दी थी।यानी यह मुद्दा उनके लिए इतना अधिक महत्वपूर्ण था।

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 प्रशांत किशोर की इन दो मुद्दों पर अब क्या राय है ? 

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अब आम भाषा में सी.ए.ए. और एन.आर सी.को समझें।

सी.ए.ए.के खिलाफ तब दिल्ली शाहीन बाग में धरना हुआ था।

धरना देने वालों ने यह बात फैलाई कि सी.ए.ए.लागू होने से मुसलमानों की नागरिकता ले ली जाएगी।

जबकि सी.ए.ए. है पड़ोस के देशों से प्रताड़ित होकर भारत आए गैर मुस्लिमों को नागरिकता देने का कानून।

सी.ए.ए. अब लागू है।उन पीड़ित लोगों को नागरिकता दी जा रही है।पर किसी भारतीय मुस्लिम की नागरिकता नहीं ली गई।

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एन.आर.सी.यानी नेशनल रजिस्टर आॅफ सिटिजन्स।

पाकिस्तान में भी एन आर सी है।

पर भारत में निहित स्वार्थी लोग इसे नहीं बनने दे रहे हैं।उनको आशंका है कि वे  फिर घुसपैठियों के नाम हम उस रजिस्टर में कैसे शामिल करा पाएंगे ?

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27 अगस्त 26

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 1990 के मंडल आरक्षण का विरोध करने का नुकसान

मंडल विरोधियों की ही भगतना पड़ा था

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मौजूद आरक्षण विरोधी आन्दोलन का नुकसान भी अंततः 

उन्हें ही होगा जो आरक्षण का विरोध कर रहे हैं।

लाभ सिर्फ उन अराजक तत्वों को मिलेगा जो इस देश 

को तोड़ना चाहते हैं।

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सुरेंद्र किशोर

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क्योंकि ये सब आरक्षण भारत के संविधान के अनुच्छेद-340, 341 और 342 प्रदत्त हैं।इनमें फेरबदल करने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा।

आने वाली भी किसी भारतीय संसद की जातीय बनावट ऐसी नहीं होगी 

जो संसद इस संबंध में आरक्षण विरोधियों के अनुकूल संविधान का संशोधन 

कर सके।

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इसलिए आज के आरक्षण विरोध के नतीजे के परिणामस्वरूप देश में सिर्फ अराजकता फैलेगी।और उस अराजकता का लाभ सिर्फ देशी-विदेशी जेहादियों को मिल सकता है।

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1990 के मंडल आरक्षण के विरोधी सवर्णों से मैं तब कहा करता था कि विरोध करने से अंततः लालू प्रसाद को ही राजनीतिक मजबूती मिलेगी।आपको कुछ नहीं मिलेगा।(मेरी वह बात पूर्व कांग्रेसी विधायक हरखू झा को अब भी याद है।गवाही देने के लिए झा जी अब भी हमारे बीच हैं।)

  वही हुआ भी।लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन काल में मंडल विरोधी समुदायों  की जो दुर्गति हुई ,वह सब वही लोग जानते हैं।

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विवादास्पद यू.जी.सी.निदेशों का मामला भी आप लोग सुप्रीम कोर्ट पर ही छोड़ दीजिए।उसी को फैसला करने दीजिए।अन्यथा वह भी आपके लिए प्रति उत्पादक साबित हो सकता है।

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27 अगस्त 26


  


बुधवार, 26 अगस्त 2026

 


याद आएंगे ‘‘विचारधारा के सेनापति’’ व आई.बी.के

 पूर्व अधिकारी राम नरेश प्रसाद सिंह 

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सुरेंद्र किशोर

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 बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य हरेन्द्र प्रताप और भाजपा नेता

सुधीर शर्मा के फेबुक पोस्ट से पता चला कि आई.बी.(भारत सरकार)के पूर्व 

अधिकारी राम नरेश प्रसाद सिंह नहीं रहे।

पिछले दिनों जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भारत वामपंथी उग्रवाद से अब मुक्त है तो सहसा रामनरेश बाबू याद आ गए।

(अच्छी बात है--अब गृह मंत्री और प्रधान मंत्री को जेहादी उग्रवाद और दिमागी नक्सलियांे से भी देश को मुक्त करने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा।

एक अच्छा संकेत है ।वह यह कि इस देश के अधिकतर गैर राजग राजनीतिक दल वोट के लिए जब तक हिन्दुओं को गालियां देते रहेंगे और जेहादियों से साठगांठ जारी रखेंगे,तब तक उनके चुनाव जीतने का कोई चांस मुझे नजर नहीं आता--भले अस्थायी उतार-चढ़ाव किसी को नजर आए।)

  अमित शाह की घोषणा के बाद मुझे रामनरेश बाबू के साथ-साथ कभी जहानाबाद में डी.एम.रहे प्रत्यय अमृत की बातें भी याद आ गईं।

  जब बिहार में भी नक्सलियों का बोलबाला था तो मेरी राय हुआ करती थी कि 

विकास की कमी और समाज के कुछ समूहांे के प्रति व्यवस्थागत अन्याय के कारण 

नक्सली पनपे हैं।इन समस्याओं के हल के साथ ही नक्सल समस्या हल हो जाएगी।

इस समस्या पर रामनरेश बाबू से भी चर्चा होती रहती थी।

पर,वे मुझसे सहमत नहीं होते थे।

अंततः रामनरेश बाबू सही साबित हुए --प्रत्यय अमृत भी।

अस्सी के दशक में नक्सलियों द्वारा किए गए एक जन संहार की रिपोर्टिंग करने मैं जहानाबाद गया था।संयोग से घटनास्थल पर ही तत्कालीन जिलाधिकारी प्रत्यय अमृत सेे मुलाकात हो गयी।उनकी राय भी रामनरेश बाबू से मिलती -जुलती थी।हालांकि तब तक मेरा उनसे परिचय नहीं था।

मैं तब भी जिलाधिकारी महोदय से सहमत नहीं हुआ था।पर आज दोनों से सहमत हूं।रामनरेश बाबू ने कई पुस्तकें लिखी हैं ।उनकी अधिकतर पुस्तकें मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में हंै।उन पुस्तकों की एक -एक लाइन शोधपूर्ण व तथ्यपरक है।

   माननीय हरेंद्र प्रताप के अनुसार रामनरेश बाबू सचमुच विचारधारा के सेनापति थे।

आज उनकी कमी खल रही है जब भारत सहित पूरी दुनिया में ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ तेज हो गया है।    

नब्बे के दशक में अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुएल पी.हंटिंगटन 

की एक किताब आई थी।

उसका नाम है ‘‘सभ्यताओं का संघर्ष।’’

उस पुस्तक के जरिए लेखक ने यह कहा था कि 

‘‘शीत युद्धोत्तर संसार में लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान ही संघर्षों का मुख्य कारण होगी।’’

भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में वैसा संघर्ष इन दिनों जारी भी है जो भयानक रूप लेता जा रहा है।

हमारे देश की कुछ तथाकथित सेक्युलर और वोट लोलुप शक्तियों को छोड़कर पूरी दुनिया उस भयानकता को अच्छी तरह समझ रही है।

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26 अगस्त 26


शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

 शराबबंदी पर गांधी और लोहिया

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गांधी ने कहा था कि ‘‘भले पैसे के अभाव में स्कूल बंद कर देने पड़े,पर मैं चाहता हूं कि देश में फिर भी पूर्ण शराबबंदी लागू हो।’’

लोहिया भी थे नशाबंदी के पक्ष मंे

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सुरेंद्र किशोर

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साठ के दशक की बात है।

रांची में डा.राम मनोहर लोहिया के दल 

की बैठक थी।

बैठक में एक ऐसा व्यक्ति शामिल था जिसके भोजनालय में शराब भी परोसी जाती थी।

किसी समाजवादी कार्यकत्र्ता ने डा.लोहिया से शिकायत की कि एक शराब बिक्रेता भी इस बैठक में है।

डा.लोहिया ने उसे पास बुलाया।

पूछा, क्या तुम शराब बेचते हो ?

उसने कहा कि मेरा भोजनालय है जिसमें शराब भी बिकती है।

इस पर डा.लोहिया ने कहा कि हमारा दल नशाबंदी का पक्षधर है।

कोई ऐसा व्यक्ति हमारे दल का सदस्य नहीं हो सकता जो शराब पीता है या फिर शराब के कारोबार में है ।

  वह व्यक्ति बैठक स्थल से चला गया।

पर, कुछ घंटे के बाद लौटा।

उसने डा. लोहिया से कहा कि मैंने अपने भोजनालय में से शराब हटवा दी है।

अब मैं शराब नहीं बेचूंगा।

उसके बाद उसे बैठक में शामिल होने की अनुमति मिल गयी।

   इसे कहते हैं राजनीति का समाज पर असर।

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दरअसल डा.लोहिया मूलतः गांधीवादी थे।

उनका समाजवाद गांधीवाद का ही विस्तार या संशोधित रूप था।

उस जमाने में दूसरे दलों के अच्छी मंशा वाले अग्रसोचू नेतागण भी डा.लोहिया की ही तरह समाज को प्रभावित किया करते थे।

पर अब राजनीति का जमाना बदल गया।

नशाबंदी के कट्टर समर्थक गांधीवादी इस संबंध में एक खास बात कहा करते हैं।

किसी ने गांधी जी से कहा था कि आबकारी टैक्स से मिले पैसों से ही सरकारी स्कूल चलते हैं।

उसके जवाब में गांधी जी ने कहा था कि ‘‘भले पैसे के अभाव में स्कूल बंद कर देने पड़े,पर मैं चाहता हूं  कि देश में फिर भी पूर्ण शराबबंदी लागू हो।’’

यदि आजादी के बाद के हमारे शासकों ने गांधी और डा.लोहिया की बातों को अमली जामा पहनाया होता तो हमारा देश बेहतर होता।

समाज बेहतर होता।

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अब जब शराबखोरी से समाज में विषम पस्थितियां पैदा होने लगीं हैं तो कुछ राज्य बारी-बारी से शराबबंदी करने को बाध्य हो रहे हैं।

या फिर उस पर विचार कर रहे हैं।

(बिहार में शराबबंदी का राज्य पर अच्छा असर पड़ा है ,कोई सर्वेक्षण चाहे जो कुछ कहे।)

  शराबखोरी से पैदा होने वाली सामाजिक बुराइयों से लोगबाग परिचित रहे हैं।

कहां तो राजनीति देश भर में धीरे-धीरे शराबखोरी बंद कराती और कहां शराब के बिक्रेता अब राजनीति में आकर राजनीति को और समाज को खराब कर रहे हैं।

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कई साल पहले की बात है।

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तब सरकार मनमोहन सिंह की थी।

उन दिनों विजय माल्या राज्य सभा के सदस्य थे।

आश्चर्य है कि उन्हें नागरिक विमानन मंत्रालय की सलाहकार समिति का सदस्य भी बना दिया गया था।

जबकि पहले इस बात का ध्यान रखा जाता था कि जिस सांसद का जिस मंत्रालय में व्यावसायिक स्वार्थ हो,उस मंत्रालय की संसदीय समिति में उसे सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

 उस समिति में माल्या ने एक प्रस्ताव रखा।

उनका प्रस्ताव था कि घरेलू उड़ानों में भी शराब परोसने की इजाजत मिलनी चाहिए।

वह प्रस्ताव पास भी हो गया।

मुझे नहीं मालूम कि वह लागू हुआ या नहीं !

क्योंकि मुझे हवाई यात्रा का कोई अनुभव नहीं है।

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  क्या कभी - कभी ही सही, गांधी का नाम लेने वाली कांग्रेस पार्टी से ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए थी ?

यदि गांधी के सपनों की सरकार होती तो ऐसा प्रस्ताव पास होता ?

भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले चैप्टर में लिखा हुआ है कि ‘‘सरकार नशाबंदी करने का प्रयास करेगी।’’

उसी को ध्यान में रखते हुए गांधीवादी प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने सन 1977 में नशाबंदी की शुरूआत की थी।

हर साल शराब की एक चैथाई 

दुकानों को बंद करना था।

पर यह काम कई कारणों से पूरा नहीं हो सका।

बाद की केंद्र सरकारों ने नशाबंदी के काम को जरूरी नहीं समझा।

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लोहियावादियों को शराब पीते 

देख मुझे सदमा लगा था।

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आपातकाल में जार्ज फर्नांडिस के बलावे पर मैं बंगलोर गया था।

एक होटल के कमरे में हम तीन लोग टिके थे।कई दिन रहे।

उनमें से एक बाद में मुख्य मंत्री बने।दूसरे राज्य सभा के सदस्य।मैं खुद पत्रकार बन गया।

दिन में हमलोग सिनेमा देखते।अंधेरा हो जाने पर एक खास तरह की टे्रनिंग के लिए हम उस पहाड़ी पर जाते जहां शोले की शूटिंग हुई थी।

रात में भावी मुख्य मंत्री,भावी राज्य सभा सदस्य और एक स्थानीय वकील शराब पीने बैठ जाते थे।मैं टुकुर -टुकुर उन्हें देखता रहता था और कूढ़ता रहता था।

(मैं आज तक शराब का स्वाद नहीं जानता।)

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14 अगस्त 2026

  


    

 सन -1931 की जातीय जन गणना के अनुसार बिहार

-ओडिशा की विभिन्न प्रमुख जातियों की कुल संख्या

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तब के आंकड़े देखकर मोटा-मोटी अनुमान लगा लीजिए।

आज के आंकड़े का अनुमान सटीक तो नहीं ही होगा।

पर,मोटा-मोटी अनुमान लगाने में इससे मदद मिलेगी। 

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   सुरेंद्र किशोर

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 सन 1931 में आखिरी बार जातियों के आधार पर देश में जनगणना हुई थी।

दूसरे विश्व युद्ध के कारण भारत में सन 1941 में जनगणना

नहीं हो सकी।

1947 में देश आजाद हुआ तो स्वतंत्र भारत की सरकार ने जातियों के आधार पर गणना बंद कर दी।

कुछ लोगों को आरोप रहा है कि बंद करने के पीछे उस सरकार का निहितस्वार्थ रहा।

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मेरे पास पूरे देश का तो नहीं किंतु सन 1931 की जनगणना के अनुसार बिहार-ओडिशा की प्रमुख जातियों की संयुक्त जनसंख्या का विवरण उपलब्ध है।

1931 में ओड़िशा भी बिहार का ही अंग था।झारखंड तो था ही।

(स्रोत--मुंगेरी लाल नीत पिछड़ा वर्ग आयोग की रपट--

16 फरवरी, 1976)

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बिहार-ओड़िशा--1931 जनगणना

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ग्वाला - 34 55 141

(इसमें अहीर,गोप व यादव शामिल हैं।)

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ब्राह्मण - 21 01 287

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कुर्मी - 14 52 724

.................................

राजपूत --14 12 440

..........................................

कोइरी --13 01 988

चमार-- 12 96 001

...........................

दुसाध--12 90 936

...................

तेली --12 10 496

...............................0

(बाभन)भूमिहार-8 9 5 6 0 2

................................

कायस्थ --3 83 435 

................................

धानुक--5 47 308 

............................

धोबी- 4 14 221 

हजाम - 4 56 779

मल्लाह - 4 59 560

कहार- 5 24 030 

कान्दू- 5 06 384

केवट- 4 71 389

कुम्हार- 5 99 038

तांती - 6 89 791

बनिया- 2 20 071

बढई-3 63 794

.......................................

 नोट--ऊपर दी गई सूची पूर्ण नहीं है।

मैंने कुछ ही जातियों की तब की संख्या यहां लिखी है।

मुंगेरी आयोग की रपट में विस्तृत सूची है।

............................................. 

मंडल आयोग की सिफारिश लागू होने से ठीक पहले केंद्र के आखिरी कांग्रेसी मंत्रिमंडल के सदस्यों का जाति वार ब्योरा पढ़ लेना प्रासंगिक होगा।कांग्रेस ने चूंकि मंडल आयोग की रपट के आधार पर लागू आरक्षण का विरोध किया था,इसलिए उसे 

 बाद में कभी लोक सभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला।

......................................... 

सन 1988 के केंद्रीय मंत्रिमंडल में जातिगत स्थिति।

इसे देख कर कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति कह सकता है कि आरक्षण कितना जरूरी है।हालांकि मंत्रिमंडल में आरक्षण नहीं होता है,पर मंत्रिमंडल को बनाने वालों की मानसिकता का इससे पता चल जाता है।अन्य क्षेत्रों में भी लगभग यही होता रहा था तब। 

.....................................................

जब कांगे्रस की पूर्ण बहुमत वाली सरकारें केंद्र या राज्य में बनती थीं तो 

मंत्रिमंडल में विभिन्न जातियों को कितना -कितना प्रतिनिधित्व मिलता था,देखें ।

कम से कम एक सरकार का तो आंकड़ा मिला है।

राजीव गांधी मंत्रिमंडल का यह आंकड़ा 14 फरवरी, 1988 का है।

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  उस राजीव गांधी मंत्रिमंडल की जातिगत स्थिति

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ब्राह्मण-15

पिछड़ा--5

ईसाई-3

अनुसूचित जाति-9

मुसलमान-4

सिख-1

वनवासी-3

ठाकुर-2

अन्य ऊंची जाति-11

अन्य-6

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1988 से अब तक राजनीतिक और सामाजिक स्थिति में देश में काफी परिवर्तन हुआ है।

काफी कुछ बदल गया है।

मौजूदा नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल के सदस्यों का जातीय विवरण इस प्रकार है।इससे कांग्रेस मंत्रिमंडल और मोदी मंत्रिमंडल के बीच का फर्क साफ नजर आएगा।

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नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल --जातीय संख्या

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अन्य पिछड़ा वर्ग--27 मंत्री

सामान्य वर्ग--यानी उच्च जाति --28 मंत्री

अनुसूचित जाति--10 मंत्री

अनुसूचित जनजाति--5 मंत्री

अल्पसंख्यक--5 मंत्री

(कोई मुस्लिम नहीं )

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20 अगस्त 26