शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

 शराबबंदी पर गांधी और लोहिया

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गांधी ने कहा था कि ‘‘भले पैसे के अभाव में स्कूल बंद कर देने पड़े,पर मैं चाहता हूं कि देश में फिर भी पूर्ण शराबबंदी लागू हो।’’

लोहिया भी थे नशाबंदी के पक्ष मंे

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सुरेंद्र किशोर

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साठ के दशक की बात है।

रांची में डा.राम मनोहर लोहिया के दल 

की बैठक थी।

बैठक में एक ऐसा व्यक्ति शामिल था जिसके भोजनालय में शराब भी परोसी जाती थी।

किसी समाजवादी कार्यकत्र्ता ने डा.लोहिया से शिकायत की कि एक शराब बिक्रेता भी इस बैठक में है।

डा.लोहिया ने उसे पास बुलाया।

पूछा, क्या तुम शराब बेचते हो ?

उसने कहा कि मेरा भोजनालय है जिसमें शराब भी बिकती है।

इस पर डा.लोहिया ने कहा कि हमारा दल नशाबंदी का पक्षधर है।

कोई ऐसा व्यक्ति हमारे दल का सदस्य नहीं हो सकता जो शराब पीता है या फिर शराब के कारोबार में है ।

  वह व्यक्ति बैठक स्थल से चला गया।

पर, कुछ घंटे के बाद लौटा।

उसने डा. लोहिया से कहा कि मैंने अपने भोजनालय में से शराब हटवा दी है।

अब मैं शराब नहीं बेचूंगा।

उसके बाद उसे बैठक में शामिल होने की अनुमति मिल गयी।

   इसे कहते हैं राजनीति का समाज पर असर।

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दरअसल डा.लोहिया मूलतः गांधीवादी थे।

उनका समाजवाद गांधीवाद का ही विस्तार या संशोधित रूप था।

उस जमाने में दूसरे दलों के अच्छी मंशा वाले अग्रसोचू नेतागण भी डा.लोहिया की ही तरह समाज को प्रभावित किया करते थे।

पर अब राजनीति का जमाना बदल गया।

नशाबंदी के कट्टर समर्थक गांधीवादी इस संबंध में एक खास बात कहा करते हैं।

किसी ने गांधी जी से कहा था कि आबकारी टैक्स से मिले पैसों से ही सरकारी स्कूल चलते हैं।

उसके जवाब में गांधी जी ने कहा था कि ‘‘भले पैसे के अभाव में स्कूल बंद कर देने पड़े,पर मैं चाहता हूं  कि देश में फिर भी पूर्ण शराबबंदी लागू हो।’’

यदि आजादी के बाद के हमारे शासकों ने गांधी और डा.लोहिया की बातों को अमली जामा पहनाया होता तो हमारा देश बेहतर होता।

समाज बेहतर होता।

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अब जब शराबखोरी से समाज में विषम पस्थितियां पैदा होने लगीं हैं तो कुछ राज्य बारी-बारी से शराबबंदी करने को बाध्य हो रहे हैं।

या फिर उस पर विचार कर रहे हैं।

(बिहार में शराबबंदी का राज्य पर अच्छा असर पड़ा है ,कोई सर्वेक्षण चाहे जो कुछ कहे।)

  शराबखोरी से पैदा होने वाली सामाजिक बुराइयों से लोगबाग परिचित रहे हैं।

कहां तो राजनीति देश भर में धीरे-धीरे शराबखोरी बंद कराती और कहां शराब के बिक्रेता अब राजनीति में आकर राजनीति को और समाज को खराब कर रहे हैं।

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कई साल पहले की बात है।

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तब सरकार मनमोहन सिंह की थी।

उन दिनों विजय माल्या राज्य सभा के सदस्य थे।

आश्चर्य है कि उन्हें नागरिक विमानन मंत्रालय की सलाहकार समिति का सदस्य भी बना दिया गया था।

जबकि पहले इस बात का ध्यान रखा जाता था कि जिस सांसद का जिस मंत्रालय में व्यावसायिक स्वार्थ हो,उस मंत्रालय की संसदीय समिति में उसे सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

 उस समिति में माल्या ने एक प्रस्ताव रखा।

उनका प्रस्ताव था कि घरेलू उड़ानों में भी शराब परोसने की इजाजत मिलनी चाहिए।

वह प्रस्ताव पास भी हो गया।

मुझे नहीं मालूम कि वह लागू हुआ या नहीं !

क्योंकि मुझे हवाई यात्रा का कोई अनुभव नहीं है।

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  क्या कभी - कभी ही सही, गांधी का नाम लेने वाली कांग्रेस पार्टी से ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए थी ?

यदि गांधी के सपनों की सरकार होती तो ऐसा प्रस्ताव पास होता ?

भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले चैप्टर में लिखा हुआ है कि ‘‘सरकार नशाबंदी करने का प्रयास करेगी।’’

उसी को ध्यान में रखते हुए गांधीवादी प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने सन 1977 में नशाबंदी की शुरूआत की थी।

हर साल शराब की एक चैथाई 

दुकानों को बंद करना था।

पर यह काम कई कारणों से पूरा नहीं हो सका।

बाद की केंद्र सरकारों ने नशाबंदी के काम को जरूरी नहीं समझा।

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लोहियावादियों को शराब पीते 

देख मुझे सदमा लगा था।

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आपातकाल में जार्ज फर्नांडिस के बलावे पर मैं बंगलोर गया था।

एक होटल के कमरे में हम तीन लोग टिके थे।कई दिन रहे।

उनमें से एक बाद में मुख्य मंत्री बने।दूसरे राज्य सभा के सदस्य।मैं खुद पत्रकार बन गया।

दिन में हमलोग सिनेमा देखते।अंधेरा हो जाने पर एक खास तरह की टे्रनिंग के लिए हम उस पहाड़ी पर जाते जहां शोले की शूटिंग हुई थी।

रात में भावी मुख्य मंत्री,भावी राज्य सभा सदस्य और एक स्थानीय वकील शराब पीने बैठ जाते थे।मैं टुकुर -टुकुर उन्हें देखता रहता था और कूढ़ता रहता था।

(मैं आज तक शराब का स्वाद नहीं जानता।)

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14 अगस्त 2026

  


    

 सन -1931 की जातीय जन गणना के अनुसार बिहार

-ओडिशा की विभिन्न प्रमुख जातियों की कुल संख्या

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तब के आंकड़े देखकर मोटा-मोटी अनुमान लगा लीजिए।

आज के आंकड़े का अनुमान सटीक तो नहीं ही होगा।

पर,मोटा-मोटी अनुमान लगाने में इससे मदद मिलेगी। 

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   सुरेंद्र किशोर

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 सन 1931 में आखिरी बार जातियों के आधार पर देश में जनगणना हुई थी।

दूसरे विश्व युद्ध के कारण भारत में सन 1941 में जनगणना

नहीं हो सकी।

1947 में देश आजाद हुआ तो स्वतंत्र भारत की सरकार ने जातियों के आधार पर गणना बंद कर दी।

कुछ लोगों को आरोप रहा है कि बंद करने के पीछे उस सरकार का निहितस्वार्थ रहा।

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मेरे पास पूरे देश का तो नहीं किंतु सन 1931 की जनगणना के अनुसार बिहार-ओडिशा की प्रमुख जातियों की संयुक्त जनसंख्या का विवरण उपलब्ध है।

1931 में ओड़िशा भी बिहार का ही अंग था।झारखंड तो था ही।

(स्रोत--मुंगेरी लाल नीत पिछड़ा वर्ग आयोग की रपट--

16 फरवरी, 1976)

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बिहार-ओड़िशा--1931 जनगणना

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ग्वाला - 34 55 141

(इसमें अहीर,गोप व यादव शामिल हैं।)

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ब्राह्मण - 21 01 287

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कुर्मी - 14 52 724

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राजपूत --14 12 440

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कोइरी --13 01 988

चमार-- 12 96 001

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दुसाध--12 90 936

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तेली --12 10 496

...............................0

(बाभन)भूमिहार-8 9 5 6 0 2

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कायस्थ --3 83 435 

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धानुक--5 47 308 

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धोबी- 4 14 221 

हजाम - 4 56 779

मल्लाह - 4 59 560

कहार- 5 24 030 

कान्दू- 5 06 384

केवट- 4 71 389

कुम्हार- 5 99 038

तांती - 6 89 791

बनिया- 2 20 071

बढई-3 63 794

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 नोट--ऊपर दी गई सूची पूर्ण नहीं है।

मैंने कुछ ही जातियों की तब की संख्या यहां लिखी है।

मुंगेरी आयोग की रपट में विस्तृत सूची है।

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मंडल आयोग की सिफारिश लागू होने से ठीक पहले केंद्र के आखिरी कांग्रेसी मंत्रिमंडल के सदस्यों का जाति वार ब्योरा पढ़ लेना प्रासंगिक होगा।कांग्रेस ने चूंकि मंडल आयोग की रपट के आधार पर लागू आरक्षण का विरोध किया था,इसलिए उसे 

 बाद में कभी लोक सभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला।

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सन 1988 के केंद्रीय मंत्रिमंडल में जातिगत स्थिति।

इसे देख कर कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति कह सकता है कि आरक्षण कितना जरूरी है।हालांकि मंत्रिमंडल में आरक्षण नहीं होता है,पर मंत्रिमंडल को बनाने वालों की मानसिकता का इससे पता चल जाता है।अन्य क्षेत्रों में भी लगभग यही होता रहा था तब। 

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जब कांगे्रस की पूर्ण बहुमत वाली सरकारें केंद्र या राज्य में बनती थीं तो 

मंत्रिमंडल में विभिन्न जातियों को कितना -कितना प्रतिनिधित्व मिलता था,देखें ।

कम से कम एक सरकार का तो आंकड़ा मिला है।

राजीव गांधी मंत्रिमंडल का यह आंकड़ा 14 फरवरी, 1988 का है।

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  उस राजीव गांधी मंत्रिमंडल की जातिगत स्थिति

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ब्राह्मण-15

पिछड़ा--5

ईसाई-3

अनुसूचित जाति-9

मुसलमान-4

सिख-1

वनवासी-3

ठाकुर-2

अन्य ऊंची जाति-11

अन्य-6

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1988 से अब तक राजनीतिक और सामाजिक स्थिति में देश में काफी परिवर्तन हुआ है।

काफी कुछ बदल गया है।

मौजूदा नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल के सदस्यों का जातीय विवरण इस प्रकार है।इससे कांग्रेस मंत्रिमंडल और मोदी मंत्रिमंडल के बीच का फर्क साफ नजर आएगा।

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नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल --जातीय संख्या

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अन्य पिछड़ा वर्ग--27 मंत्री

सामान्य वर्ग--यानी उच्च जाति --28 मंत्री

अनुसूचित जाति--10 मंत्री

अनुसूचित जनजाति--5 मंत्री

अल्पसंख्यक--5 मंत्री

(कोई मुस्लिम नहीं )

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20 अगस्त 26 


 


 मेरे बारे में खुशखबरी,

ईश्वर करे , आपके बारे में भी ऐसी ही 

खुशखबरी मिलती रहे !

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सुरेंद्र किशोर

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मैं हर साल अपनी विस्तृत पैथोलाॅजिकल जांच करवाता हूं।

ताजा जांच रिपोर्ट को देखकर एक बड़े डाक्टर ने अपनी राय दी--

‘‘रिपोर्ट बिल्कुल परफेक्ट है।

सिर्फ विटामिन -डी और बी -12 कम है।’’

डी नाॅर्मल करना मेरे बाएं हाथ का खेल है, 

डी ठीक करना दाएं हाथ का।

इसलिए फिकिर नाॅट !!

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सन 2005 रिपीट 2005 में मैं नियमित सेवा से रिटायर कर गया।

तब से लगातार काम कर रहा हूं।नौकरी के समय से कुछ अधिक ही काम।

थकता नहीं हूं।थोड़ा संयम जरूर रखता हूं।

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आप भी नियमित रूप से विस्तृत जांच कराते रहिए।

कोई रोग पल रहा होगा तो समय से पहले पकड़ में आ जाएगा और उसका इलाज भी हो जाएगा।

उदाहरण--किडनी का 70 प्रतिशत हिस्सा जब नष्ट हो चुका होता है,उसके बाद ही उस रोग का लक्षण प्रकट होता है।

उसके बाद तो जीवन खत्म !!

डायलिसिस पर कितने दिनों तक कोई रहेगा ?!

इसलिए यह मत कहिए कि मेरे शरीर में रोग का कोई लक्षण

 ही नहीं है तो जांच पर खर्च क्यों करूं ?

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18 अगस्त 26 


बुधवार, 19 अगस्त 2026

 18 अगस्त, 2026 के प्रभात खबर (पटना संस्करण) में प्रकाशित

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 12 टाउनशिप के लिए केंद्रीयकृत गुणवत्ता नियंत्रण प्रशाखा जरूरी 

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार में प्रस्तावित 12 ग्रीन फील्ड सैटेलाइट टाउनशिप शहरी मेगा प्रोजेक्ट है।

इसके बन कर तैयार हो जाने के बाद यह एक युगांतरकारी योजना साबित होगी।

इसका श्रेय मौजूदा राज्य सरकार को मिलेगा।व्यवस्थित ढंग से बसने वाले इन शहरों में रहना अपने आप में एक सुखद अनुभव होगा।

यह टाउनशिप विकास का इंजन भी साबित होगा।इसी को ध्यान में रखकर इसकी योजना तैयार की जा रही है।

पर,एक समस्या भी है।निर्माण में गुणवत्ता की समस्या।

 12 टाउनशिप का गुणवत्तापूर्ण निर्माण सुनिश्चित किया ही जाना चाहिए।

गुणवत्ता नियंत्रण का काम तो इन दिनों और भी  कठिन हो गया है ,पर असंभव नहीं।  

 एक कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर के नेतृत्व में गुणवत्ता नियंत्रण प्रशाखा की स्थापना होनी चाहिए।

प्रशाखा निरंतर सभी 12 टाउनशिप के गुणवत्तापूर्ण निर्माण को सुनिश्चत करे।बात साफ है।यदि राज्य सरकार गुणवत्ता बनाए रखेगी तो उसे यश मिलेगा।यदि गुणवत्ता नहीं रहेगी तो अपयश मिल सकता है।

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नक्सल आन्दोलन का चढ़ाव-उतार

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  बिहार सरकार के गृह विभाग द्वारा सन 1982 में राज्य में नक्सल आंदोलन पर तैयार विस्तृत नोट में कहा गया था कि नक्सल  समस्या सिर्फ कानून -व्यवस्था की ही समस्या नहीं है,बल्कि यह सामाजिक -आर्थिक समस्या भी है।

तब तक अविभाजित बिहार के मात्र 13 जिलों के 47 प्रखंडोें में नक्सली सक्रिय हुए थे।

पर, बाद के वर्षों में बिहार और झारखंड मेें नक्सलियों का फैलाव काफी बढ़ा।

इस बीच नक्सल आंदोलन में कई उतार -चढ़ाव भी आये।

 केंद्र और राज्य की मौजूदा सरकारों ने नक्सल आंदोलन को एक अलग नजर से देखा और तदनुसार उससे मुकाबला किया। 

इसी महीने बिहार सरकार ने यह सूचना दी कि बिहार अब नक्सल मुक्त हो चुका है।हाल तक राज्य के 22 जिले नक्सल प्रभावित थे।अब कोई जिला वैसा नहीं है।

आने वाले दिनों में यह बात सामने आएगी कि सचमुच नक्सल समस्या से बिहार मुक्त हुआ है या नहीं।पर इससे अलग नक्सल अभियान को लेकर उस विचारधारा को मानने वालों में भी समय- समय पर मतभेद उभरा है।

 चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन माओ त्से तुंग ने सन 1967 में उनसे मिलने गये नक्सली नेता कानू सान्याल व तीन अन्य से कहा था कि ‘‘यहां आपने जो भी सीखा,उसे भूल जाएं और अपने देश की स्थिति के अनुसार 

वहां काम करें।’’

कभी भूमिगत अभियान में शामिल रहे माले (लिबरेान)के दिवंगत महेंद्र प्रसाद सिंह बाद में चुनाव प्रक्रिया में शामिल हुए।तीन बार बगोदर से विधायक बने।जब उन्होंने देखा कि आम जनता घूसखोरी से परेशान है तो उन्होंने सत्याग्रह के जरिए जन दबाव बना कर सरकारी कर्मियों को घूस के पैसे जनता को लौटाने को विवश करना शुरू किया।इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी।महंेद्र जी अपने जीवन काल में कभी चुनाव नहीं हारे।यह था देश और जनता की स्थिति के अनुसार काम करना।

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 फुटपाथों पर बेलगाम अतिक्रमण

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सुप्रीम कोर्ट ने गत जून में कहा कि सीमांकित फुटपाथों पर सुरक्षित रूप से चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-19 और 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है।

सरकार का कत्र्तव्य है कि वह नागरिकों के लिए सुरक्षित पैदल मार्ग प्रदान करे।

  कुछ साल पहले पटना हाई कोर्ट ने अदालत में मौजूद पटना के एक थानेदार से पूछा-‘‘सड़कों पर अतिक्रमण करा कर रोज कितना कमा लेते हो ?’’

  यानी, अतिक्रमण एक मुनाफे का ध्ंाधा रहा है।इसके बावजूद अदालतें फुटपाथों पर से अतिक्रमण हटाने का सख्त आदेश सरकारों को नहीं दे पा रही है ?

यह समस्या देशव्यापी है।

  फिलहाल अदालत सरकार को यह निदेश दे सकती है कि वह राज्य पुलिस के बदले अर्ध सैनिक बल के सहयोग से फुटपाथों पर से अतिक्रमण हटाए।

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भूली-बिसरी यादें

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एक बार लोक सभा में कांग्रेस के भागवत झा आजाद ने कह दिया था कि ‘‘काबुल की सड़कों पर सिर्फ घोड़े ही नहीं होते,गधे भी होते हैं।’’

प्रतिपक्ष के अटल बिहारी वाजपेयी ने इस उक्ति पर एतराज किया और स्पीकर से कहा कि आप इस उक्ति को सदन की कार्यवाही से निकाल दें ।क्योंकि इससे पड़ोसी मित्र देश से संबंध बिगड़ सकते हैं।

 वाजपेयी की इस बात से सदन में हंसी फूट पड़ी।

हस्तक्षेप करते हुए भागवत झा आजाद ने कहा कि ‘‘चलिए आप कहते हैं तो बदल देता हूं।

मैं कह देता हूं कि बंबई की सड़कों पर घोड़े ही नहीं ,गधे भी होते हैं।

इससे पहले आजाद साहब ने अंग्रेजी में कहा था कि ‘‘मुझे अपना मंुह मत दीजिए,अपना कान दीजिए।’’

अटल जी ने कहा कि अभिव्यक्ति की यह भाषा उचित नहीं है।

इस पर आजाद जी ने कहा कि मेरा मतलब यह है कि ‘‘आप अपना मुंह बंद रखिए और अपने कान खुले रखें।’’   

 ( तब की अपेक्षा सदन में आज की चर्चा का स्तर देखिए और दुखी होइए।)

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और अंत में

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 सन 1962 में डा.राम मनोहर लोहिया ने प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खिलाफ चुनाव लड़ा।

किसी ने पूछा कि ऐसी जगह से क्यों लड़े जहां से आपकी हार तय थी ?

डा. लोहिया ने कहा कि पार्टी के प्रचार के लिए लड़ा।साथ ही ,चट्टान को मैं तोड़ तो नहीं सका,पर उसमें दरार जरूर डाल दी। फूलपुर लोक सभा चुनाव क्षेत्र के भीतर पांच विधान सभा चुनाव क्षेत्र पड़ते थे।उनमें से नेहरू तीन क्षेत्रों में और लोहिया दो क्षेत्रों में विजयी हुए।

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(अनियतकालीन काॅलम ‘यदाकदा’ से)



 


रविवार, 16 अगस्त 2026

 कितने लोगों को पसंद हैं राहुल गांधी 

की देह -भाषा और मौखिक भाषा ??

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सुरेंद्र किशोर

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राहुल गांधी की जो मौखिक भाषा है और उनकी जो देह भाषा है,वह 

देश देख रहा है।

संसद के भीतर या बाहर राहुल गांधी जिस तरह अपनी देह भाषा--मौखिक भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं,यदि किसी शालीन व्यक्ति के ड्राइंग रूम में जाकर वे वही सब करने लगें तो क्या वह शालीन व्यक्ति चाहेगा कि राहुल जी अगले दिन भी  उस व्यक्ति के घर जायें ?(यदि उस व्यक्ति को कांग्रेस का टिकट नहीं लेना हो तो।)

  जो लोग चाहेंगे कि राहुल जी घर के बाहर और भीतर,संसद के बाहर और भीतर  भी वही सब करते रहें,जो कुछ कर रहे हैं,

सिर्फ वैसे ही लोग राहुल को अगला प्रधान मंत्री देखना पसंद करंेेगे।

बाकी जनता ?

बाकी जनता कहेगी कि अपने आचरण से आप अपनी पार्टी को जिस तरह दिन प्रति दिन बर्बाद कर रहे हैं,वह करने का आपको पूरा अधिकार है,पर आपको इस देश के साथ छेड़छाड़ करने नहीं दिया जाएगा।

  इस देश को ‘‘केरल शैली का शासन’’ नहीं चाहिए।

(केरल में आज जो कुछ हो रहा है,वह बहुत चिंताजनक है,सारी बातें बाहर नहीं आ रही हैं।वहां के हिन्दू संगठन उद्वेलित हैं।विश्वास न हो तो गुगल की मदद लीजिए।)दूसरी ओर यू.पी.में तो कुछ मुस्लिम महिलाएं भी टी.वी.चैनलों पर कहती हैं कि बाबा के राज में हम अंधेरा होने के बाद भी घर से 

निकल कर सुरक्षित घर लौट सकती हैं।सन 2017 से पहले पहले ऐसा नहीं था।

बिहार में भी सन 2005 से पहले कोई व्यक्ति अंधेरा हो जाने के बाद सामान्य स्थिति में अपने घर से नहीं निकलता था।

पटना जंक्सन पर जब कोई व्यक्ति अंधेरा हो जाने के बाद कहीं बाहर से ट्रेन से पहुंचता था तो पटना स्थित अपने घर भयवश तत्काल नहीं चला जाता था।रात पटना स्टेशन पर ही गुजार देता था।अगली सुबह जाता था।   

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16 अगस्त 26


शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

 मैं जानता हूं कि मेरी बात कोई नहीं सुनेगा।

पर, चेतावनी देना मैं अपना नागरिक कत्र्तव्य समझता हूं।

कल यह तो कोई नहीं कहेगा कि पहले चेताया क्यों नहीं था ! 

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सुरेंद्र किशोर

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घर का ही बनाया खाइए।

अपनी जमीन हो तो घर का ही उपजाया खाइए।

बाकी तो कदम- कदम पर खतरा है--

डेग- डेग पर कैंसर है ।

सरकारें दूसरे कामों में व्यस्त हैं।

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समस्या की गंभीरता को देखते हुए सरकारों को चाहिए कि वे मिलावट को रोकने के लिए एक अलग विभाग बनाए।

जिस तरह बाहर के दुश्मनों को रोकने के लिए रक्षा मंत्रालय बनाया गया है।

मिलावट खोरों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान हो।

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12 अगस्त 26 


शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

 आपातकाल के काले दिन 

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बिशन टंडन की डायरी से

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23 जुलाई 1975

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...........प्रधान मंत्री का प्रजातंत्र बचाने का पाखंड झूठे प्रचार पर ही तो अधारित है।

शारदा (प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार एच.वाई.शारदा प्रसाद)का अन्तर व्यथित है।

पर,झूठे तर्क को उसके विभिन्न रूपों में उसे लिखना पड़ रहा है।

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हर महत्वपूर्ण नियुक्ति के लिए प्रधान मंत्री, संजय गांधी की राय लेती हैं।

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शारदा, जिस प्रकार संेसर का कार्य किया जा रहा है,उससे भी बहुत असंतुष्ट व खिन्न है।

उसका कहना है कि प्रधान मंत्री इस संबंध में कुछ उदारता दिखाने के पक्ष में हैं,पर संजय व अन्य लोग जो प्रधान मंत्री निवास से सब बातों पर नियंत्रण रख रहे हैं,कठोर संेसर के पक्ष में हैं।

पिछले रविवार को मंत्रि परिषद की बैठक में सेंसर आदि पर बातें हुईं।

उसमें प्रधान मंत्री ने कहा कि यदि प्रतिपक्ष संसद में वाक-आउट करे तो उसे समाचार पत्रों में छपने देना चाहिए।

  प्रायः सभी मंत्रियों की यही राय थी।

पर बाद में महल के सिपहसालारों का निर्णय दूसरा हुआ।

(आज जो लोग अक्सर गोदी मीडिया की बातें करते हैं,उन्हें यह पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए।साथ ही, यह भी बताना चाहिए के आज के गांधी परिवार की मानसिकता इमरजेंसी की इंदिरा गांधी की मानसिकता से कितनी भिन्न है ?)

आज लोक सभा में मीसा का संशोधन प्रस्तुत किया गया।

मावलंकर ने उसका विरोध किया।

पर,होता क्या है इस विरोध से ?

..... कल के जगजीवन राम के भाषण का आकाशवाणी ने पूरा प्रसारण किया।उसके विपक्ष में जो कुछ कहा गया,वह बिलकुल नहीं बताया गया।

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आज (मशहूर वकील )पालकीवाला प्रधान मंत्री से मिले।

प्रधान मंत्री से पहले वे शेषन से मिले।

आजकल जो कुछ हो रहा है,उससे उन्हें (पालकीवाला को )बहुत क्लेश पहुंचा है।

उनकी राय है कि हमारा संविधान नष्ट हो गया।

 इस सबकी आवश्यकता नहीं थी।

बात करते- करते उनकी आंखें भर आईं।

भ्विष्य बड़ा अंधकारमय है।

पालकीवाला तो दो साल से यही कह रहे हैं कि हमारे संविधान को विकृत किया जा रहा है।

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(आई.ए.एस.अफसर बिशन टंडन आपातकाल में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के संयुक्त सचिव थे।

रिटायर होने के बाद टंडन साहब बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक बने।मैं कुछ साल तक उस फाउंडेशन की ज्यूरी का मेम्बर था।--सुरेंद्र किशोर) 

 


 

 


शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

 बवानी इमली हत्याकांड

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अंग्रेजों ने सन 1858 में यू.पी. के 52 स्वतंत्रता सेनानियों को 

एक साथ इमली के पेड़ पर लटका कर फांसी दे दी थी।

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हमारे देश के किस इतिहासकार ने इस घटना का पूरा व्योरा

लिखा है ?

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सुरेंद्र किशोर

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अंग्रेजों ने 28 अप्रैल ,1858 को यू.पी.के फतेहपुर में ठाकुर जोधा सिंह 

सहित बावन स्वतंत्रता सेनानियों को इमली के पेड़ पर लटका कर 

फांसी दे दी थी।

एक महीने तक लाशें पेड़ पर ही लटकी रहीं।अंग्रेजों ने उन्हें 

उतारने नहीं दिया ताकि अंग्रेजों का दबदबा कायम रहे और 

भयवश उसके खिलाफ कोई सिर न उठा सके ।

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क्या इस घटना का जिक्र किसी पाठ्य पुस्तक में हुआ है ?

किस इतिहासकार ने अलग से इस पर विस्तार से लिखा है ?

 ऐसी जघन्य घटना दुनिया के इतिहास में अन्यत्र भी हुई है या

भारत में ही यह अनोखी घटना हुई--

यानी 52 लोगों को एक साथ पेड़ पर लटका कर फांसी देने 

की अनोखी घटना !

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31 जुलाई 26


बुधवार, 29 जुलाई 2026

 एक सामान्य नागरिक की सलाह

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देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा कायम रखने 

के लिए संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण बंद हो।

क्योंकि संसदीय कार्य संचालन नियमावली का उलंघन 

करने वाले सदस्यों की संख्या अब काफी बढ़ गई है।

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सुरेंद्र किशोर

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बेहतर यह होगा कि संपादित करने के बाद ही एक दिन

 बाद ही कार्यवाही का टी.वी.पर प्रसारण हो।

या, एक दूसरा उपाय भी है।

संसद में सदस्य जो कुछ बोलते हैं,उसको लेकर कोर्ट में उन 

पर केस नहीं हो सकता।जब संसद में शालीन व नियम पालक

सदस्यों की संख्या अधिक थी,तब यह छूट दी गई थी।

  यदि सीधा प्रसारण जारी रखना हो तो उस छूट को यथाशीघ्र 

समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

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29 जुलाई 26 


शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

   जैसा संस्कार,सदन में वैसा ही आचरण !

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 किसी ने पूछा--भाई, इन दिनों संसद में क्या हो रहा है ?

कौन क्या कर रहा है ?

जवाब मिला--जिसने जो कुछ सीख रखा है,जिसका जैसा संस्कार है,वह वैसा आचरण संसद में कर रहा है।

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सुरेंद्र किशोर

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एक पुराना किस्सा जानिए --

एक बार हंसोड़ पीलू मोदी ने संसद में कहा था- 

    ‘‘प्याज खाने वाला यहां प्याज दिखा रहा 

   और चप्पल खाने वाला यहां चप्पल दिखा रहा’’

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बहुत पहले की बात है।

लोक दल के रामेश्वर सिंह एक दिन प्याज की माला पहन कर राज्य सभा  पहुंच गए।

इस तरह वे महंगी के खिलाफ सदन में शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे।

सत्ता पक्ष यानी कांग्रेस के अदमनीय नेता कल्पनाथ राय ने अपनी चप्पल अपने हाथ में ले ली और उसे रामेश्वर सिंह की ओर दिखाने लगे।

 इस पर सदन हंगामा हो गया।

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उस पर पीलू मोदी ने इन शब्दों में सदन के तनाव को हल्का किया--

‘‘प्याज खाने वाला प्याज दिखा रहा है और चप्पल खाने वाला चप्पल दिखा रहा है।’’

  शुक्र है कि उसके बाद भी सदस्य गण सदन में आपस में हाथापाई पर नहीं उतरे।

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अब आगे यह कहने की जरूरत नहीं है कि जिस सदस्य ने जो ‘‘विद्या’’ अपने बाल्यकाल से लेकर जवानी तक सीखी है,उसी का तो प्रदर्शन वे संसद व विधान सभाओं में और उसके बाहर भी इन दिनों कर रहे हैं।

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 दूसरी ओर ,साठ-सत्तर के दशकों के पढ़ाकू नेतागण जो जनता की समस्याओं के प्रति गंभीर थे, क्या-क्या करते थे ?

समाजवादी नेता मधु लिमये --संसद से समय बचता था तो मधु जी आॅटो रिक्शा से लाइब्रेरी चले जाते थे।(किसी व्यापारी को इशारा कर देते तो उनके लिए कार-ड्रायवर का तुरंत प्रबंध हो जाता।पर,उनके आवास में भी न तो ए.सी. और न ही फ्रीज।जब सांसद नहीं रहे तो अखबारों में लेख लिखकर गुजारे लायक पैसा कमाते थे।

एक संपादक ने मुझसे कहा था कि जब पारिश्रमिक भेजने में देर हो जाती थी तो मधु जी फोन कर देते थे।

जब दिन के फस्र्ट हाफ में कोई नेता या कार्यकर्ता उनसे मिलने जाते थे तो मधु जी उनसे कह देते थे कि  शाम में आइएगा।यह मेरे लिखने का समय है।इसी के पैसे से मेरा खर्च चलता है।    

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पर, जब संसद में मधु लिमये बोलने के लिए खड़ा होते थे तो सत्ता बेंच पर बैठे मंत्रियों को सिहरन होने लगती थी।पता नहीं,आज किस मंत्री की बारी है !!क्योंकि उनके पास तथ्य होते थे -संसदीय ज्ञान भी।  

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सदन में गला फाड़ने,कनखी मारने ,पी.एम. से गला मिलने,सदन में ही सो जाने या अशिष्ट व्यवहार करने वाला वह जमाना नहीं था।तब माकपा के ज्योतिर्मय बसु,प्रसपा के नाथ पै ,भाकपा के हीरेन मुखर्जी तथा भारतीय जनसंघ के भी कई सांसद,सदन में अपनी प्रभावशाली भूमिका निभाते थे। 

  उस कारण समाज भी लोग उनकी इज्जत करते थे।ज्योतिर्मय बसु के आवास स्थित लाइब्रेरी में उन दिनों प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जाया करते थे, बसु साहब को मदद करने के लिए।

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मधु लिमये और बसु के अलावा भी अन्य कई सांसद थे जो बोलने के लिए खड़े होते थे तो पूरा सदन उन्हें सुनता था।

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आज क्या होता है ?

कुछ साल पहले कांग्रेस की एक महिला सांसद को सदन में यह कहते मैंने सुना था--‘‘मैं तो यहां बोलना चाहती हूं,पर मेरी पार्टी के नेता कहते हैं कि हंगामा करो।’’

लोक सभा को ‘‘हंगामा सभा’’(मैं यहां इससे अधिक कठोर शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं।) में बदल देने के कारण नये सांसदों को सीखने का अवसर नहीं मिलता।संसदीय लोकतंत्र के लिए यह अच्छी बात नहीं है कि अपवादों को छोड़ कर देश के किसी भी सदन में न तो कार्य संचालन नियमावली का पालन हो रहा है और न ही अखिल भारतीय पीठासीन सम्मेलनों की सिफारिशों का।

इतिहास एक दिन पूछेगा कि इसके लिए कौन अधिक और कौन कम जिम्मेदार रहा ?

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24 जुलाई 26


बुधवार, 22 जुलाई 2026

 ताजा संदर्भ

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तेलचट्टा जनता पार्टी का ‘संसद चलो मार्च’

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सन 55 में पटना पुलिस की गोली से जब छात्र 

दीनानाथ पाण्डेय की मौत हुई तो तब के प्रधान मंत्री

नेहरू ने पटना आकर न सिर्फ प्रेस और भीड़ को भला

 -बुरा कहा,बल्कि न्यायिक जांच की मांग को ठुकरा 

दिया।

जेपी ने तो कहा था-‘‘नेहरू ने पटना प्रेस को गाली दी।’’

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सुरेंद्र किशोर

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यह बात सन् 1955 की है।पटना में पुलिस गोली कांड हुआ था। बी.एन.कालेज का छात्र दीनानाथ पांडेय मारा गया था।छात्रगण गोली कांड की न्यायिक जांच की मांग कर रहे थे।पर तत्कालीन मुख्य मंत्री डा़. श्रीकृष्ण सिंहा न्यायिक जांच के खिलाफ थे।

  जनता में इस गोली कांड को लेकर सरकार के खिलाफ रोष था जिसे शांत करने के लिए प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 30 अगस्त 1955 को पटना के गांधी मैदान में आम सभा को संबोधित किया।

  उस सभा में नेहरू ने प्रेस और भीड़ को भला -बुरा कहा और न्यायिक जांच की मांग को ठुकरा दिया।

    नेहरू के इस भाषण को उनका बेजोड़ अभिनय करार देते हुए जयप्रकाश नारायण ने एक कड़ा व लंबा  प्रेस बयान जारी किया।

जेपी का बयान 2 सितंबर 1955 के अखबारों में छपा।जेपी ने  कहा कि ‘‘यह एक ऐसी घटना है जिस पर चुप रहने का अर्थ होगा कि मैं अपने नागरिक कत्र्तव्य का पालन नहीं कर रहा हूं।अभी प्रधान मंत्री पटना आए।अपार भीड़ इस उम्मीद में जमा हुई कि ऐसे शब्द सुनने को मिलेंगे जिनसे उनका मन शांत हो सके।लेकिन प्रधान मंत्री ने उनके जख्मों पर नमक छिड़का।

अपना आपा खोकर वे भीड़ पर चिल्लाए।

उन्होंने पटना प्रेस को गाली दी ।

 पुलिस जुल्म के विरूद्ध आवाज उठाने के लिए नागरिकों की भत्र्सना की।

  ब्रिटिश राज में जो लोग जुल्म की भत्र्सना करते थे उनका शुमार देश भक्तों में होता था।

लेकिन स्वराज में उन्हें गद्दारों की तरह देखा जाता है।’’

  जेपी ने कहा कि ‘‘प्रधान मंत्री कम्युनिस्टों पर बहुत से दोषारोपण करने में संलग्न हैं।कोई शक नहीं कि उन्हें बताया गया है कि सारे बखेड़े के जिम्मेदार कम्युनिस्ट हैं।पटना में हमारे बहादुर पुलिस वालों को, जो अपना ज्ञान तंतु खो चुके हैं,हर जगह एक कम्युनिस्ट बम लिए हुए नजर आता है। 

इसी ने इस कम्युनिस्ट कहानी को फैलाया है।जैसा कि सभी जानते हैं कि मैं कोई कम्युनिस्ट प्रशंसक नहीं हूं ।

लेकिन मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं हो रही है कि इस सारी उथल पुथल में उनकी भूमिका संयमित रही है।

कम्युनिस्टों के भीतर बहुत सी कमियां हैं।

लेकिन वे संगठित और अनुशासित लोग हैं।’’

  घटना के बारे में नेहरू के आकलन को चुनौती देते हुए जेपी ने कहा कि ‘‘नेहरू ने वही कहा जो उन्हें कहने को कहा गया। उनके कान इतनी चालाकी से भरे गए कि कुछ बाकी न रहा।

   मुझे सबसे अधिक धक्का इस बात से लगा कि प्रधान मंत्री के मन में यह शिष्टाचार तो है कि बी.एन.कालेज जाकर कहीं वे आयोग को कठिनाई में न डाल दें।

लेकिन गोली कांड की घटना पर बोलते समय उन्होंने इस भावना का परिचय नहीं दिया।उन्होंने जोर- जोर से और बार -बार विद्यार्थियों और नागरिकों के हुड़दंग की भत्र्सना तो की लेकिन दूसरे पक्ष के विरूद्ध आरोपों पर वे एक शब्द भी नहीं बोले।’’

  ‘‘बिहार में देश भक्तों की कमी नहीं है । मुझे नहीं लगता कि देश भक्ति पर श्री नेहरू ने हमें कोई प्रशंसनीय पाठ पढ़ाया है।

  देश भक्ति मात्र एक कपड़े के टुकड़े की पूजा में नहीं, बल्कि निश्चित राष्ट्रीय सदाचारों,जीवन के निश्चित मूल्यों ,जनता और सरकार के आचरण के निश्चित स्तरों में है।बहुत दुःखी मन से मैंने ये पंक्तियां लिखी हैं।मेरे लिए राजनीतिक आंदोलन के दिन समाप्त हो चुके हैं।किसी विवाद में पड़ने की अब मुझमें शक्ति नहीं है।पिछले कुछ दिनों में बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष सहित कई लोगों ने मुझ पर अनुचित हमला किया है।फिर भी मैं शांत रहा।

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शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

 यदि वैध कागजात मौजूद होने के बावजूद इस देश में कहीं 

भी मस्जिदों-मजारों को तोड़ा जा रहा है तो वह अन्याय है।

यदि बात उल्टी है तो किसी को धार्मिक भावना फैला कर 

देश में बद अमनी कायम करने का कोई हक नहीं है।

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सुरेंद्र किशोर

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इन दिनों देश के कुछ बड़े मुस्लिम नेता यह प्रचार कर रहे हैं कि उनकी 

मस्जिदें और मजारें उजाड़ी जा रही हैं।उनके साथ अन्याय हो रहा है।

क्या ऐसी मस्जिदें या मजारें भी उजाड़ी जा रही हैं जो वैध ढंग से 

खरीदी गई या दान में मिली जमीन पर बनी हुई हैं ?

या सिर्फ वैसी मस्जिदें-मजारें उजाड़ी जा रही हैं जो जबरन 

सरकारी या निजी जमीन पर कब्जा करके बनाई गई हैं ?

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यदि वैध ढंग से बनी मस्जिद -मजार को उजाड़ा जा रहा हैं तो

 उस उजाड़े जाने का विरोध हर धर्म के न्यायप्रिय लोगों को

 करना चाहिए।

साथ ही,तत्संबंधी मस्जिद-मजार वालों को वैध कागज के 

साथ कोर्ट जाना चाहिए।

लेकिन यदि उजाड़ी जा रही मस्जिद-मजार की जमीन का वैध

कागज किसी के पास नहीं है तब तो उजाड़ने का पूरा हक शासन 

को है।

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16 जुलाई 26

   


सोमवार, 13 जुलाई 2026

 भूली-बिसरी यादें

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‘‘गैर-गोदी पत्रकारिता’’ के खतरे

तलवार की धार पर चलने जैसा !

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सुरेंद्र किशोर

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बात अस्सी के दशक की है।

जो राजनीतिक शक्तियां तब सत्ता में थीं,वही आज 

मीडिया के एक बड़़े हिस्से पर ‘‘गोदी मीडिया’’ बन जाने का आरोप लगा रही है।

पर,उसने खुद 80 के दशक में क्या-क्या किया,प्रेस बिल लाने के अलावा भी ! ?

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एक नमूना देखिए।

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तब मैं दैनिक ‘जनसत्ता’ का बिहार संवाददाता था।

मैंने बिहार से जाने वाले एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री के बारे में एक असुविधाजनक 

खबर लिखी।छपी भी।तब तक राज्य में ‘‘जंगल राज’’ नहीं आया था।

(‘जंगल राज’ में तो दो बार मेरी जान जाते -जाते बची थी।मैं उन दिनों दो स्टेनगन धारी की छत्रछाया में चलता था।)

वह मंत्री, प्रधान मंत्री का अत्यंत करीबी था।

उस मंत्री के पटना स्थित एक ‘‘लठैत’’ने फोन किया।तब तक मोबाइल फोन का जमाना नहीं आया था।

मेरी पत्नी ने फोन उठाया।लठैत ने रोष भरे शब्दों में कहा कि अपने पति से कह दीजिए कि होश में रहें।आपका लड़का कहां पढ़ने जाता है,मैं वह भी जानता हूं।आपको भी उठवा लिया जाएगा।

मेरी पत्नी बोल्ड है।जेपी आंदोलन में तीन बार जेल जा चुकी थी।उसने उस लठैत से कहा कि ‘‘गाड़ी लेकर आइए।मुझे उठा लीजिए।मैं आपके साथ चलने को तैयार हूं।’’

लठैत ने बाद में फोन किया तो मैंने फोन उठाया--उसने धमकाया--

‘‘जिस तरह हमने रियाज अजीमाबादी (ब्लिट्ज के पटना संवाददाता )को रेप केस में फंसा दिया था,उसी तरह तुमको भी फंसा दूंगा।होश में रहो।’’

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मैं मुकदमे से तो नहीं डरता।न जेल जाने से डरता हूं।मैं समाजवादी आंदोलन के सिलसिले में तिहाड़ जेल में भी रह चुका हूं।इमरजेंसी में जार्ज फर्नांडिस का साथ देने के कारण मैं कई महीने तक फरार रहा।फरारी जीवन में अपार कष्ट सहे।मुकदमा करना किसी का भी अधिकार है।मैं उसका स्वागत करता हूं,पर धमकी, वह भी परिवार व महिला-बच्चांे को ? वह बर्दाश्त नहीं।यह कायर का काम है।

कितु मैं भी रेप केस में फंस जाने से डर गया।

मैंने डी.जी.पी.को पत्र लिख कर कार्रवाई की उनसे मांग की ।याद रहे कि फोन करने वाले ने अपना नाम भी बता दिया था।यहां किसी का नाम लेना ठीक नहीं ।ऐसे लोग अधिकतर सत्ताधारियों के आसपास रहते हैं या रखे जाते हैं।

डी.पी.पी.ने उस व्यक्ति को खोजवाना शुरू कर दिया। उस समय मेरे स्वजातीय ही मुख्य मंत्री थे।वे मुझे जानते भी थे।उन्होंने डी.जी.पी.को बुलाया और कहा कि इस केस को बंद कीजिए।यह पत्रकार बहुत झूठ लिखता है।केस बंद हो गया।

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कहानी का मोरल

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अब आप अंदाज लगाइए कि जब गद्दी का स्वार्थ हो कोई मुख्य मंत्री या प्रधान मंत्री भी स्वजातीय के साथ भी न्याय नहीं करता।

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दूसरी बात यह कि कांग्रेस आज गोदी मीडिया की चर्चा बहुत करती है।कहती रहती है कि गोदी मीडिया से नरेंद्र मोदी को बहुत सहारा मिल रहा है।

पर,जब कांग्रेस खुद दिल्ली और पटना में सत्ता थी तो उसके नीेचे से ऊपर तक के सत्ताधारी नेताओं और उसके लठैत ने मेरे जैसे निरीह -निहत्थे पत्रकार और उसके परिवार के साथ कैसा सलूक किया ?

 लिखने में मैं गलती कर सकता हूं।उसका उपाय यह है कि मुझ पर मानहानि का केस कर दिया जाए।लेकिन रेप और अपहरण की धमकी ?!

अन्यथा, गोदी मीडिया बन जाओ।

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एक और कहानी

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सरकारी धन में से 40 प्रतिशत लूट लेने वाले के खिलाफ मैंने बम्बई की एक पत्रिका में लंबी रिपोर्ट लिखी।उसने हम पर मानहानि का केस कर दिया।

मैं तो हर तारीख पर हाजिर होता था,(केस हो जाने पर कोई साथ नहीं देता।ऐसे लेख छपने पर जरूर लोग तालियां बजाते हैं।)पर जब ‘‘मिस्टर 40 प्रतिशत’’ ने संपादक के खिलाफ कुर्की -जब्ती का वारंट भिजवा दिया तो संपादक ने मुझे फोन किया।कहा कि मैंने अभी-अभी बम्बई में मकान बनवाया है।मैं नहीं चाहता कि उसकी कुर्की हो जाए।

इसलिए आप उससे समझौता कर लीजिए।मैं लक्ष्मी साहु और पी.के.सिन्हा के साथ उस व्यक्ति के यहां गया।

वह बहुत ही स्पष्टवादी था और विनम्र था।

अब वह इस दुनिया में नहीं है।उसने कहा कि मैं पटना के पत्रकारों को जानता हूं।आपको भी जानता हूं।आप ईमानदार है। पर,आपके अखबार का मालिक ईमानदार नहीं हो सकता।मैं भी ईमानदार नहीं हूं।मैं 40 प्रतिशत चोर हूं और 60 प्रतिशत ईमानदार हूं।राजीव गांधी कहते हंै कि सौ में 85 पैसे लूट लिए जाते हैं।आपको तो मेरे पक्ष में लिखना चाहिए था कि मेरा अनुपात 85 बनाम 15 का नहीं बल्कि 40 बनाम 60 का है ।वह भी इसलिए कि  कि मुझे कई सरकारी-गैर सरकारी लोगों को ‘‘चटाना’’पड़ता है। 

आपने जो कुछ मेरे बारे में लिखा है,वह अक्षरशः सत्य है।पर,मैं जानता हूं कि आपके पास एक अक्षर का भी कागजी सबूत नहीं है।पत्रकार सियार का जात होता है।एक पत्रकार कुछ लिखता है तो दूसरा भी हुंआ -हुंआ करने लगता है।मैंने आपके खिलाफ इसलिए केस किया ताकि मेरे खिलाफ लिखने वालों का तांता न लग जाए।फ्लड गेट न खुल जाए !

खैर, समझौता हो गया,पर मैंने यह शिक्षा ग्रहण की कि --‘‘लिखने से पहले पोख्ता सबूत अपने हाथ में रख लो।’’

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13 जुलाई 26   

    

  

 


शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

 मेडिकल पढ़ाने के लिए जो गैर मुस्लिम पिता 

अपनी बेटी को विदेश भेजना चाहते हैं,

वे इस ताजा घटना के बाद सावधान हो जाएं

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सुरेंद्र किशोर

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केरल की एक मेडिकल छात्रा की उजबेकिस्तान में हत्या कर दी गई।

हत्या उसके सहपाठी ने की।वह भी केरल का ही है।

उजबेकिस्तान में पढ़ रहे मेडिकल छात्र SARDUL ANAM  ,अपनी सहपाठी SAWARIYA BASANTH  पर धर्म परिवर्तन के लिए बहुत दिनों से दबाव डाल रहा था।इसके लिए उसने उससे मारपीट भी की थी।पर, वह लड़की धर्म बदलने के लिए तैयार नहीं हुई।फिर तो वह इस दुनिया में नहीं रही।उसने यानी अनम ने उसे मार डाला।

वे उजबेकिस्तान के बुखारा राज्य मेडिकल

संस्थान के छात्र थे।

  याद रहे कि उजबेकिस्तान में 96 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है।

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जेहादी कभी भी अपना लक्ष्य नहीं भूलते चाहे वे मेडिकल छात्र हों या 

चपरासी।वे भारत में रहें या उजबेकिस्तान में। 

उन्हें उम्मीद रहती है कि जेहादी हिंसा करके जब वे मर भी जाएंगे तो  वे जन्नत में जाएंगे।उन्हें जन्नत में बड़ी उपलब्धियों की उम्मीद रहती है।

  भारत की छात्राओं के जो पिता मेडिकल या इस तरह की पढ़ाई कराने के लिए अपनी बेटी को अकेले ही विदेश भेजना चाहते हैं,वे इस घटना से समय रहते सबक सीख ले लें।

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मशहूर वकील दिवंगत राम जेठमलानी ने बहुत पहले रजत शर्मा के कार्यक्रम ‘‘आपकी अदालत’’ में कहा था कि जेहादियों को फांसी नहीं दी जानी चाहिए।उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी जानी चाहिए।उन्हें किसी नरकनुमा जेल में रखा जाना चाहिए ताकि वे समझ जाएं कि जेहादी की हिंसा के बाद हर बार उन्हें जन्नत नहीं मिलेगी।

जेठमलानी ने तो जेहादी हिंसा को रोकने के लिए कुछ अन्य कारगर उपाय भी रजत शर्मा को बताए थे।उसे प्रसारित भी किया गया था।मैं वह यहां नहीं बता सकता।

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10 जुलाई 26 

 

  


बुधवार, 8 जुलाई 2026

 इस देश में एक पूर्व निजी सचिव, प्रधान 

मंत्री बने तो दूसरे निजी सचिव, राष्ट्रपति 

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सुरेंद्र किशोर

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अटल बिहारी वाजपेयी कभी भारतीय जनसंघ के संस्थापक डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निजी सचिव थे।

अटल जी बाद में क्या बने,सबको मालूम है।

हुमाऊं कबीर, मौलाना अबुल कलाम आजाद के निजी सचिव थे।बाद में  कबीर साहब, केंद्रीय मंत्री बने।

राम नाथ कोविन्द प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई के निजी सचिव थे।

बाद में कोविन्द साहब राष्ट्रपति बने।

डा.सुधांशु त्रिवेदी मुख्य मंत्री राजनाथ सिंह के सूचना अधिकारी थे।

डा.त्रिवेदी आगे क्या बनेंगे ,उसकी कोई सीमा नहीं है--स्काई इज द लिमिट --जैसी उनकी अद्भुत योग्यता है।

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लगे हाथ, मैं भी अपना थोड़ा प्रचार का लूं।

मैं 1972-73 में कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था।

राजनीति से मन ऊब गया तो पत्रकार बन गया।

अन्यथा,राजनीति में रह जाता तो मैं भी कम से कम अपने गांव 

का मुखिया या सरपंच तो बन ही सकता था।

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7 जुलाई 26

  


 दिल्ली दंगे (2020) का मुआवजा

दंगाई देंगे या सरकार देगी ?

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2020 के शाहीनबाग धरने में शामिल गैर भाजपा 

दलों के नेता गण देश से अब भी माफी मांगेंगे ?

धरने से उपजी उत्तेजना ने 53 लोगों की जानें ले ली

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मुस्लिम वोट के लिए वे नेतागण इस झूठ के प्रचारक बन गए थे 

 कि सी ए ए से भारतीय मुसलमानों की नागरिकता चली जाएगी।

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सुरेंद्र किशोर

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नागरिकता संशोधन कानून यानी सी.ए.ए. के तहत पात्र लोगों को नागरिकता 

तो अब दी जा रही है ,

पर इस क्रम में किसी की नागरिकता नहीं ली जा रही है।

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नागरिकता कानून का सख्त विरोध करके ऊर्जावान प्रशांत किशोर ने

शुरू होने से पहले ही अपने राजनीतिक करियर को अनिश्चितता में डाल दिया।

प्रशांत जी, अब तो देश में एन.आर.सी.भी जल्द ही लागू हो सकता है

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नरेंद्र मोदी सरकार ने पहले ही कह दिया था कि नागरिकता संशोधन कानून से,

जो 2019 में पारित हुआ, भारत के किसी वास्तविक मुस्लिम नागरिक की नागरिकता नहीं जाएगी।

सी.ए.ए. के तहत लोगों को नागरिकता महीनों से दी जा रही है।

किसी की नागरिकता नहीं ली जा रही है।इसके बावजूद सन 2020 में शाहीन बाग धरने में 

शामिल हुए गैर भाजपा नेताओं ने देश से माफी नहीं मांगी।

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शाहीन बाग में आयोजित लंबे धरने से उत्पन्न भारी सांप्रदायिक तनाव के माहौल के 

कारण दिल्ली में सन 2020 में भीषण दंगे हुए जिसमंे 53 मरे,300 घायल हुए।

संपत्ति का भारी नुकसान हुआ।

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 कोर्ट में अब भी यह विवाद चल रहा है कि दिल्ली दंगा पीड़ितों को मुआवजा सरकार देगी या दंगा कराने वाले देंगे।अन्य कई मामलों में कोर्ट तोे कई बार फैसला दे चुका है कि दंगा कराने वाले ही मुआवजा देंगे।

2024 के लोक सभा चुनाव से पहले केरल में पी.एफ.आई.ने दंगा किया।तब वहां सी.पी.एम.की सरकार थी।

वहां के हाईकोर्ट ने सी.पी.एम.सरकार को निदेश दिया कि वह दंगाइयों से मुआवजा वसूले।सरकार के समक्ष मजबूरी हो गई।जब वसूली होने लगी तो पी.एफ.आई.-एसडीपीआई ने सीपीएम का

साथ छोड़कर कांग्रेस का साथ पकड़ लिया।

नतीजतन लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को केरल की अधिकतर सीटें मिल गईं ।

 अब तो राज्य सरकार भी कांग्रेस के ही हाथों में है।याद रहे कि केरल के अधिकतर मुस्लिम वोटर पी.एफ.आई -एसडीपी आई के साथ रहे हैं।

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याद रहे कि प्रतिबंधित जेहादी संगठन पी.एफ.आई.ने ही परदे के पीछे रह कर 

सन 2020 में दिल्ली के शाहीन बाग में 

लंबे समय तक धरना कार्यक्रम चलाया।

धरना सी.ए.ए.(नागरिकता संशोधन कानून ) के खिलाफ था।उनकी मांग थी कि 

इस देश में एन.आर.सी.भी नहीं लागू होना चाहिए।

याद रहे कि पाकिस्तान में भी एन.आर.सी.है,पर भारत के जेहादी चाहते हैं कि भारत में नहीं हो ताकि वे घुसपैठ करा कर आबादी का अनुपात बदल दें और देर-सबेर भारत पर इस्लामिक शासन कायम कर लें।

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अधिकतर राजग विरोधी दलों ने उस चर्चित शाहीन बाग धरने का सक्रिय समर्थन किया।

चूंकि नीतीश कुमार के दल ने उस संशोधन कानून का संसद में समर्थन किया था,इसलिए उसके विरोध में प्रशांत किशोर जदयू से अलग हो गए।

 तब वे जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे।

क्या प्रशांत किशोर को धरने का असली एजेंडा का पता नहीं था ?

बिहार के जागरूक लोगों को तो पहले ही मालूम हो गया था।

इसीलिए 2025 के बिहार विधान सभा चुनाव में प्रशांत किशोर को कोई चुनावी सफलता नहीं मिली।

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सी.ए.ए.के विरोध के पीछे की असली मंशा जान लीजिए।

दरअसल भारत में सक्रिय जो जेहादी लोग यहां के हिन्दू-मुस्लिम की आबादी का अनुपात बदल कर भारत पर देर-सबेर कब्जा कर लेना चाहते हैं।(डा.जाकिर नाइक को यह कहते हुए मैंने यूट्यूब पर सुना कि भारत में अब 80 प्रतिशत हिन्दू नहीं हैं।सिर्फ 60 प्रतिशत रह गए है।

दूसरे मौलाना बता रहे थे कि हमने 2014 से अब तक  भारत में 20 लाख हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराया हैं।हालांकि इस तथ्य की अभी पुष्टि होनी बाकी है।)

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि ‘‘पड़ोस के मुस्लिम देशों में उत्पीड़न के शिकार वहां के  अलपसंख्यकों को आश्रय देने की भारत की नैतिक जिम्मेदारी के लिए सी.ए.ए. जरूरी है।’’

अमित शाह के अलावा आजादी के तत्काल बाद शीर्ष कांग्रेसी नेताओं ने भी उन उत्पीड़ितों को  भारत में शरण देने का आश्वासन दिया था।

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2019 में कानून बनने के बाद यही बात भारत में सक्रिय जेहादियों को खल गई।वे उबल पड़े।उन्होंने देखा कि कितनी मेहनत से हम घुसपैठ कराकर ,धर्म परिवर्तन करा कर ,धमका कर,पैसे खर्च करके और लव जेहाद आदि के जरिए हिदुओं की आबादी का अनुपात घटा रहे हैं।दूसरी ओर, करोड़ों बाहरी लोगों यानी पाक,अफगानिस्तान,बांग्ला देश से आए गैर मुस्लिमों को यहां का नागरिक बनाकर हमारे किए कराए को मोदी सरकार प्रभावहीन बना रही है।

भारत के वोट लोलुप राजनीतिक दल तब शाहीन बाग के धरनार्थियों के समर्थन में आ गये थे।

ऐसा करके उन लोगों ने देश की नहीं बल्कि अपने वोट बैंक की चिंता की।पर,ऐसी ही चिंताओ के कारण वे दुबले होते जा रहे हैं क्योंकि हिन्दू जग रहे हैं।पूर्व सांसद अदीब ने हाल में कहा कि सेक्युलर दल अब हमारा साथ नहीं दे रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि साथ देने पर उन्हें हिन्दू लोग वोट नहीं देंगे।जबकि हमारी मस्जिदं और मजारें बड़े पैमाने पर उजाड़ी जा रही हैं।अदीब साहब ने यह नहीं बताया कि जो मस्जिदें-मजारें उजाड़ी जा रही हैं ,वे वैध जमीन पर हैं या अवैध जमीन पर !  

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शाहीन बाग धरने से उत्पन्न तनाव के कारण सन 2020 में दिल्ली में जो दंगे हुए,उनमें जो क्षति हुई,उसका विवरण यहां पेश है---

सन 1984 के सिख विरोधी दंगे के बाद का यह सबसे बड़ा दंगा था।

1.--53 मरे

2.-300 घायल

3.--122 घर जला दिए गए  

4.--200 कारें जला दी गईं

5.-300 मोटर साइकिलों में आग लगा दी गईं

6.--2  स्कूलों को तहस -नहस कर दिया गया

7.--4 धार्मिक स्थलों को जला दिया गया 

8.--4 फैक्ट्रियों को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया गया।

9.--5 गोदामों को लूट लिया गया 

10--369 एफ.आई.आर.दर्ज की गई

11.--903 गिरफ्तार किए गए

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(स्त्रोत--इंडिया टूडे हिन्दी)  

इस केस के सिलसिले में उमर खालिद और सरजिल इमाम अब भी जेल में हंै।

सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें जमानत देने से मना कर दिया है।

इसी से अपराध की गंभीरता समझ लीजिए।वे लोग नार्थ-ईस्ट को मुख्य भारत से अलग कर देने का हौसला बांध रहे थे।

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मंगलवार, 7 जुलाई 2026

 किसी ने कहा है--

‘‘भारत में बसा पाकिस्तान सरकता हुआ तुम्हारी तरफ आ 

रहा है।

तुम तो जिन्दगी गुजार लोगे ,खून के आंसू रोएगी 

तुम्हारी आने वाली पीढ़ियां।’’

सोमवार, 29 जून 2026

 दो कविता संग्रह मिले

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1.-हटो व्योम के मेघ

   --कुमार अनुपम

2.-बोध-अबोध

  --सतीश कुमार

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कुमार अनुपम परिचय के मोहताज नहीं।

जेपी के सहयोगी रहे।

एक साथ कई क्षेत्रों में सक्रिय

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सतीश कुमार पेशे से इंजीनियर और कैलिफोर्निया(अमेरिका)में कार्यरत।

इसके बावजूद भारत स्थित परिवार और यहां की ‘जमीन’ से जीवंत सपर्क।

सतीश जी ने कुछ समय तक टाइम्स आॅफ इंडिया(पटना)के

 लिए खोजपूर्ण स्टोरी भी की थी जब वे भारत में थे।

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इसलिए मैं उनकी इस ताजा कविता को,जो इस संग्रह में शामिल है,

 गंभीरता से लेते हुए यहां उधृत कर रहा हूं।

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   पत्रकारिता

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आजकल बहुधा

पत्रकारिता धरती से छूटे हुए,

नीयत से टूटे हुए,

धंधे से लुटे हुए

बेचैन लोगों की ‘‘सभ्य’’ आत्म कथा है !

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कुमार अनुपम के कविता संग्रह की भूमिका 

डा.अनिल सुलभ ने ‘‘शुभाशंसा’’

के तौर पर लिखी है।

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा.सुलभ ने लिखा है कि

 ‘‘कुमार अनुपम एक ऐसे जाग्रत कवि हैं,जिनकी कविताएं लोक केंद्रित हैं।

इनकी कविताएं सामाजिक स्थितियों ,परिस्थितियों और उसकी दशा-दिशा का तात्विक 

चित्रण करती हैं और समाज को सचेत करती हैं।............’’

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--सुरेंद्र किशोर


 


बुधवार, 17 जून 2026

 हजार फूल खिलने दो

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इतिहास से सबक लो

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सुरेंद्र किशोर

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लोकतंत्र,राजनीतिक दल और देश को बचाना है तो विभिन्न 

धर्मों और जातियों के बीच संतुलन बनाये रखिए।

न तो हिन्दू राष्ट्र के विचार को समर्थन मिले न ही इस्लामी राष्ट्र को।

न सवर्णों का वर्चस्व कायम हो न ही पिछड़ों का।

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हजार फूल खिलने दो

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आजादी के तत्काल बाद कौन किस पद पर था ?

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जवाहरलाल नेहरू के दौर का सामाजिक असंतुलन

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राष्ट्रपति --डा.राजंेद्र प्रसाद --कायस्थ

प्रधान मंत्री --जवाहरलाल नेहरू--ब्राह्मण

उप राष्ट्रपति--डा.एस.राधाकृष्णन--ब्राह्मण

लोक सभा के स्पीकर--जी.वी.मावलंकर--ब्राह्मण

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश--एम.पी.शास्त्री--ब्राह्मण

आदि आदि .........

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जवहरलाल नेहरू राष्ट्रपति पद पर राजेंद्र बाबू के बदले सी.राजगोपालाचारी (ब्राह्मण )को बैठाना चाहते थे,पर सरदार पटेल की जिद्द के कारण राजेंद्र बाबू बने।

याद रहे कि राज गोपालाचारी ने सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरेाध किया था।वे महात्मा गांधी के समधी थे।

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नरेंद्र मोदी के दौर का सामाजिक संतुलन 

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राष्ट्रपति--द्रोपदी मुर्मू--अदिवासी 

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी --अति पिछड़ा

उप राष्ट्रपति -सह राज्य सभा के सभापति--

सी.पी राधाकृष्णन--ओबीसी 

लोक सभा के स्पीकर --ओम बिड़ला-ब्राह्मण

राज्य सभा के उप सभापति--हरिवंश--राजपूत

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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश--सूर्यकंात--ब्राह्मण

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आजादी के तत्काल बाद राज्यों के शासन तंत्र में भी भारी सामाजिक 

असंतुलन था।बिहार में तो लगता था कि तब दो ही जातियों भूमिहार 

और राजपूतों का शासन है।

सन 1967 तक कांग्रेस ने बिहार में किसी पिछड़ा को मुख्य मंत्री 

नहीं बनने दिया।

अन्य राज्यों की स्थिति भी लगभग वही थी।

1990 में पिछड़ा आरक्षण का कांग्रेस ने विरोध किया।उसके बाद 

कांग्रेस को लोक सभा में बहुमत मिलना बंद हो गया।

अब अंध मुस्लिम भक्ति के कारण कांग्रेस राष्ट्रीय दल से क्षेत्रीय 

पार्टी बन गई।तकनीकी रूप से भले वह राष्ट्रीय दल है।

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इतने बड़े देश में सभी दलों का यह कत्र्तव्य है कि विभिन्न जातियों और धर्मों

के प्रति संतुलन कायम रखिए।

सब तरह के अतिवादियों का विरोध करिए।तभी दल भी बचेंगे,लोकतंत्र भी बचेगा और देश भी।

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17 जून 26

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रविवार, 7 जून 2026

 ताकतवर नेताओं की सुरक्षा

बनाम असुरक्षित आम जनता 

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सुरेंद्र किशोर

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बात उस समय की है जब गांधीवादी देव नारायण यादव बिहार विधान सभा के अध्यक्ष (1995--2000) थे।

सदन की कार्यवाही चल रही थी।संवाददाता के रूप में मैं भी दर्शक दीर्घा में मौजूद था।

अचानक एक साथ कई विधायक खड़े हो गये।वे मांग करने लगे--‘‘अध्यक्ष महोदय, मेरी जान पर खतरा है।मेरी जान पर खतरा है।मेरी सुरक्षा का प्रबंध कराइए।मेरी सुरक्षा का प्रबंध कराइए।’’

कुछ देर तक हंगामा होता रहा।स्पीकर महोदय सुनते रहे।

 अंत में गांधीवादी और शालीन स्पीकर यादव जी ने कहा--‘‘मेरी जान पर तो कोई खतरा नहीं।क्योंकि मैंने किसी की हत्या नहीं की है।’’

इस टिप्पणी के बाद सदन में शांति छा गई थी।

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दूसरा दृश्य

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एक अन्य अवसर पर माकपा के विधायक अजित सरकार अचानक सदन के बीच में जाकर चिल्लाने

लगे--कुछ लोग मेरी हत्या करना चाहते हैं।यह कहते हुए उन्होंने अपना कुर्ता खोलकर जमीन पर फेंक दिया।उन्होंने गंजी नहीं पहनी थी।

उसके बाद उनके हाथ पायजामे की डोरी की तरफ बढ़े ।

वे पूर्णतः नग्न होना चाहते थे।उससे पहले कि वे पायजामा खोल पाएं ,सुरक्षाकर्मियों व कुछ विधायकों ने उन्हें रोक दिया।

   उस समय भी मैं संवाददाता के रूप में उस ऐतिहासिक दृश्य का चश्तदीद गवाह बना।

अजित सरकार को अपनी जान पर जिससे

खतरा था,उसनेे अंततः अजित सरकार की जान ले ही ली।हत्यारे को सजा नहीं हुई।

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जिस देश और राज्य में अपराधियों को तौल कर सजा नहीं मिलेगी,उस राज्य में कोई किसी को नहीं बचा सकता,चाहे आप कितनी भी सुरक्षा के बीच रहें।

इन दिनों के अखबारों को ध्यान से पढ़िए--कितनी हत्याएं होती रहती हैं ?

कितने हत्यारे को  फांसी पर चढ़ाया जाता है ?

हमारी सबसे अदालत कहती हैं--बेल नियम और जेल अपवाद।

नतीजतन हत्या आम, और सजा विरल !

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मशहूर पुलिस अफसर प्रकाश सिंह ने एक अध्ययन को उधृत करते हुए कहा था कि एक हत्यारे को फांसी पर चढ़ा देने के बाद हत्या के लिए उठे 7 हाथ अपने आप रुक जाते हैं।

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सजा न होने के कारणों के बारे में यहां कुछ बताने की कोई जरूरत नहीं।कारण सब जानते हैं।

हां,एक बात कहना चाहता हूं।

यदि सुप्रीम कोर्ट नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग और डी.एन.ए.टेस्ट आदि की इजाजत जांच एजेंसियों को दे दे तो सजाओं का प्रतिशत बढ़ जाएगा।पर,इस देश का दुर्भाग्य यह है कि किसी की जान की अपेक्षा सुप्रीम कोर्ट के लिए हत्यारे के मानवाधिकार की अधिक ंिचता रहती है।

भारत में आपराधिक मामलों में सजा की दर औसतन 40 प्रतिशत है जबकि जापान में 98 प्रतिश्ता और अमेरिका में 93 प्रतिशत।

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निष्कर्ष

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जिस देश में हत्यारे को सजा दिलाने वाली शक्तियंा कमजोर और बचाने वाली शक्तियां मजबूत हैं,वहा उसी की जान बची हुई है जिसे मारने में किसी की कोई रूचि नहीं है।बाकी सब असुरक्षित हैं ,चाहे आप अपने आसपास सुरक्षा की जितनी भी मजबूत दीवाल क्यों न खड़ी कर लें।

इसलिए बड़े नेताओं का भी कल्याण इसी बात में है कि वे सुरक्षा के लिए आम माहौल बनाएं न कि खास -खास किले खड़ा कर लें अपने आसपास।

माहौल बनाने के लिए प्राथमिक शर्त यह है कि राजनीति में अपराधियों को आगे मत बढ़ाओ।उनका सशक्तीकरण मत करो।अच्छे लोग हर जाति में हैं।

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और अंत में

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कुछ दशक पहले की बात है,बिहार के एक बाहुबली जातीय नेता अपने दलीय सुप्रीमो के यहां गये।कहा--फलां को एम.एल.सी.बना दीजिए।

सुप्रीमो ने कहा कि आप अपनी ही जाति को बनवाना चाहते हैं तो इसके बदले उसी जाति के फलां को ले आइए, बनवा दूंगा।

चूंकि फलां अच्छा आदमी था,इसलिए बाहुबली ने उसके लिए पैरवी नहीं की भले वह उसी की जाति का था।

सुप्रीमो और बाहुबली के बीच का संवाद जो अफसर सुन रहा था,उसने यह संवाद ‘‘फलां’’ को उसके घर जाकर दूसरे दिन सुनाया था।

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7 जून 26

  

 



मंगलवार, 2 जून 2026

 आजादी के तत्काल बाद की सरकार ने रासायनिक 

खाद के जरिए देश की मिट्टी को जहरीला बनाया,

मौजूदा सरकार के समक्ष ‘‘खेत बचाओ’’ की समस्या

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1960--केंद्र सरकार ने किसानों से अपील की थी और उन्हें निदेश दिया था कि वे अधिक से अधिक रासायनिक खाद-

कीटनाशक का उपयोग अपने खेतों में करें।

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कुपरिणाम से अनजान किसानों ने अधिक पैदावार के लोभ में वैसा किया भी।

नतीजतन इस देश की मिट्टी बड़े पैमाने पर जहरीली हो गई।भूजल आर्सेनिकयुक्त हुआ।करोड़ों लोग कैंसर से ग्रस्त होने लगे 

तो ‘‘अब पछताए होत का.जब चिड़िया चुग गई खेत !!

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सन 2026--आज के अखबारों में सरकार ने एक बड़ा विज्ञापन छपवाया है।उसका शीर्षक है---

खेत बचाओ अभियान।प्राकतिक खेती,उर्वर मिट्टी,सुरक्षित भविष्य।

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यानी, मौजूदा सरकार मानने लगी है कि आज की पीढ़ी का भविष्य -स्वास्थ्य सुरक्षित नहीं है।ऐसा क्यों हुआ ?

क्योंकि 1960 के दशक में आयातित रासायनिक उर्वरकों का व्यापक उपयोग राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया।

वैसा कांग्रेस के अदूरदर्शी नेतृत्व के कारण हुआ।क्योंकि सर्वोच्च नेतृत्व जमीन से पूरी तरह कटा हुआ था।

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क्या इसलिए हुआ ताकि कुछ लोग आयात के जरिए से नाजायज कमाई करके अमीर बन सके !पता नहीं !

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साठ के दशक की तीन-चार बातें

1.-आजादी के समय हमारे देश के करीब मात्र 20 प्रतिशत खेतों के लिए सिंचाई जल उपलब्ध था।जैविक खाद यानी गोबर खाद का इस्तेमाल होता था।

डा.लोहिया ने नेहरू सरकार ने अपील की थी कि 700 करोड़ रुपए की फेज वाईज योजना बनाकर पूरे देश में सिंचाई का प्रबंध करिए।

उसके बदले केंद्र सरकार ने रासायनिक खाद और उन्नत बीज के नाम पर खेतों में जहर फैलाया और पुराने पौष्टिक अनाज को दरकिनार किया।हाईब्रिड के नाम पर पुराने पौष्टिक अन्न को समाप्त किया।उस जमाने के छोटे -छोटे दाने वाले गेहूं से बनी रोटी का बेहतरीन स्वाद मुझे याद है।वह आज उपलब्ध नहीं है।

2.-साठ के दशक में आचार्य रजनीश का पटना में भाषण मैं सुन रहा था।एक खास प्रसंग में उन्होंने कहा कि अमेरिका में

 दुकानों में अनाज के बोरे में ऊपर तख्ती लगी होती है जिस पर लिखा रहता है--यह अनाज जैविक खाद के जरिए उपजाया हुआ है।

 यानी, अमेरिका के लोग जब रासायनिक खाद की बुराइयांें को पहचान कर सावधान हो चुके थे ,उस समय हमारी सरकार ने मिट्टी को जहरीला बनाने का काम शुरू किया।आज स्थिति ऐसी है कि यह कहना कठिन है कि कहां की मिट्टी जहरीली है और कहां की नहीं है।

3.-मेरे पुश्तैनी गांव वाले चुनाव क्षेत्र गड़खा (सारण)से 1969 में कांग्रेस के जगलाल चैधरी विधायक थे।वे गांव -गांव जाकर किसानों से भोजपुरी में कहते थे--आप लोग रासायनिक खाद खेत में मत डालिए।इससे खेत खराब और फसल जहरीला हो जाएगा।मैंने उनको हमारे दरवाजे पर भी यही बात मेरे किसान पिता से कहते सुना था।चैधरी जी चैथे वर्ष तक एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई कलकत्ता मेडिकल काॅलेज में पढ़ चुके थे।उसी बीच पढाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे।  

चैधरी जी ने जो कहा,वही दुष्परिणाम हमारे अदूरदर्शी नेताओं के कारण हमारा देश झेल रहा है।

कैंसर के मरीजों के संख्या तेजी से बढ़ रही है।

गैर सरकारी स्तर पर भी अनेक संगठन ,खासकर सद्गुरु जग्गी वासुदेव (इशा फाउंडेशन )मिट्टी बचाओ अभियान चला रहे हैं। 

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2 जून 26

 









बुधवार, 27 मई 2026

 



आर्थिक रूप से कमजोर पद्म अवार्डीज को मासिक मानदेय देने के बारे में

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गत फरवरी में प्रभारी मंत्री विजय चैधरी ने मानदेय देने का आश्वासन बिहार 

विधान परिषद में दिया था

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सुरेंद्र किशोर

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मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी ने कल कहा  कि पद्म पुरस्कार पाने वालों ने अपने असाधारण योगदान से न केवल अपने क्षेत्र को गौरवान्वित किया ,बल्कि भारत की प्रतिभा,संस्कृति व सामथ्र्य को विश्व मंच पर नई पहचान दिलाई।’’

  ‘‘भोजपुरी लोक संगीत की अमूल्य परम्परा को जीवंत रखने वाले भरत सिंह भारती,ख्यात कृषि वैज्ञाानिक स्व.डा.गोपाल जी त्रिवेदी तथा नृत्य गुरु स्व.विश्व बंधु जी को मिला सम्मान ,आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।’’

  ध्यान रहे कि ये तीन हस्तियां बिहार से रही हैं।

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इससे पहले गत 25 फरवरी, 26 को बिहार विधान परिषद में जदयू के नीरज कुमार ने पद्म अवार्डियों के लिए मासिक मानदेय देने का प्रावधान करने के लिए बिहार सरकार का ध्यानाकर्षित किया था।

ध्यानाकर्षण सूचना के जवाब में प्रभारी मंत्री विजय कुमार चैधरी ने सदन में  आश्वासन देते हुए कहा था कि ‘‘राज्य सरकार पद्म सम्मानित हस्तियों को मासिक मानदेय या आर्थिक सहायता देने पर विचार करेगी।’’

श्री चैधरी ने सदन में यह भी कहा कि उन पद्म आर्डियों ने बिहार का सम्मान बढ़ाया है तो राज्य सरकार भी उनके लिए यथायोग्य करेगी।

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याद रहे कि सन 2014 में सत्ता संभालने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने आम तौर से प्रचार से दूर नेपथ्य में रह कर असाधारण काम करने वालों को भी जब पद्म सम्मान देना शुरू किया तो यह पता चलने लगा कि उनमें से कई अवार्डी  फटेहाल हैं और उनकी मासिक आय सरकार की न्यूनत्तम मजदूरी से भी कम है।

 पद्म सम्मानित व्यक्तियों को केंद्र सरकार कोई मासिक मानदेय नहीं देती।

किंतु उनकी फटेहाली को ध्यान में रखते हुए निम्न लिखित चार राज्य सरकारें मासिक मानदेय देती हैं--

1.-ओडिशा सरकार --30 हजार रुपए मासिक

2.-तेलांगना सरकार--25 हजार रुपए मासिक

(इसके अलावा 30 लाख रुपए एकमुश्त)

3.-हरियाणा सरकार--10 हजार रुपए मासिक

4.-छत्तीस गढ़ सरकार --10 हजार रुपए मासिक

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हिन्दुस्तान के रांची संस्करण में प्रकाशित समाचार के अनुसार ‘‘पद्म पुरस्कार विजेताओं को सम्मान राशि देगी झारखंड सरकार’’

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मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले आम तौर पर ऐसी हस्तियों को पद्म सम्मान दिए जाते थे जिन्हें गुजारे के लिए मानदेय की जरूरत नहीं पड़ती थी।

 2014 के बाद बिहार के जिन लोगों को पद्म अवार्ड मिले उनमें से कुछ को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। कुछ ऐसे पद्मश्री अवार्डीज भी हैं जिनकी पक्की मासिक आय 5 हजार रुपए से भी कम है।ऐसे कई अन्य हस्तियां भी हो सकती हैं।इसलिए बिहार सरकार वैसे पद्म अवार्डीज को आर्थिक मदद करने पर विचार कर ही सकती है जो आयकर नहीं देते।

या फिर भारत सरकार ही इस दिशा में कोई कदम उठाये ताकि इस मामले में पूरे देश में समरुपता रहे।

क्योंकि यह जरूरी नहीं कि हर राज्य सरकार का इस मामले में दिल पसीजे ही।

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देश के कुछ विपन्न पद्म अवार्डीज की कहानियां--याद रहे कि पद्मश्री अवार्ड देश का चैथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।

कल्पना कीजिए जिसे आप इतना बड़ा सम्मान लायक समझते हैं,उनकी निजी आय न्यूनत्तम मजदूरी से भी कम हो !!

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ओड़िशा के ‘‘लोक कवि रत्न’’ हलधर नाग को सन 2016 में पद्म श्री अवार्ड लेने के लिए नई दिल्ली बुलाया गया तो लोक कवि ने केंद्र सरकार को लिख दिया--‘‘साहब,मेरे पास दिल्ली आने के लिए पैसे नहीं हैं। इसलिए अवार्ड को डाक से भिजवा दीजिए।’’

बाद में उनके जाने का प्रबंध हुआ और उन्होंने अवार्ड ग्रहण किया।

ऐसी घटना से द्रवित होकर ओड़िशा सरकार ने अपने राज्य के पद्म अवार्डियों को मासिक 30 हजार रुपए मानदेय देने का निर्णय किया। वह उन सब पद्म अवार्डियों को मिल रहा है जो ओड़िशा के निवासी हैं।

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        2

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सन 2022 में तेलांगना के पद्म सम्मानित  

दर्शनम मुगोलैया को जब वहां की राज्य सरकार ने हैदराबाद में मजदूरी करते पाया तो तेलांगना सरकार ने अपने राज्य के पद्म अवार्डियों के लिए मासिक 25 हजार रुपए मानदेय देना शुरू कर दिया।

साथ ही, उन्हें एकमुश्त 25 लाख रुपए भी दिये।

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        3

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इसी तरह हरियाणा और छत्तीस गढ़ की सरकारें अपने राज्य के साधनहीन पद्म आवार्डियों को मासिक मानदेय 10 हजार रुपए देती है।

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गत साल रांची से यह खबर आई कि 90 साल के पद्म श्री अवार्डी सिमोन उरांव पैरालिसिस अटैक के बाद बिस्तर पर हैं।उनके इलाज की उचित व्यवस्था नहीं हो पा रही है।बाद में उनका क्या हुआ,यह पता नही चल सका।

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इस बार जनवरी ,2026 में जिन लोगों को पद्म अवार्ड दिए जाने की घोषणा हुई,उनकी सूची वाली खबर के साथ प्रभात खबर ने सटीक हेडिंग लगाई थी 

‘‘गुमनाम चेहरे,असाधारण काम,सेवा से बनी पहचान।’’

इस सूची को भी सरसरी तौर पर देखने से लगता है कि संभव है इनमें भी कुछ मोगलैया,सिमोन उरांव और हलधर नाग हो सकते हैं।ऐसे लोगों की सुध कौन और कब लेगा ?यह पता लगाना केंद्र और राज्य सरकारों के लिए आसान होगा कि इनमें से कितने ऐसे अवार्डीज हैं जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं और जो आयकर नहीं देते।

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27 मई 26

 


  

 


मंगलवार, 26 मई 2026

  हजारों जेपी सेनानियों  को सम्मान-सहारा मिला होता 

तो बाद की पीढ़ियां भी सार्वजनिक कामों में जुटतीं।पर 

अपवादों को छोड़कर अब भाड़े पर ही कार्यकर्ता उपलब्ध

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क्योंकि सत्ता की मलाई तो नेताओं के वंशजों-परिजनों 

 के लिए रिजर्व होती जा रही है

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करीब तीन साल पहले बिहार में जब एक नया दल बना तो

उस दल के नेता ने हर जिले में वेतन पर कार्यकर्ता रखा।

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क्योंकि आम तौर पर कोई मुफ्त में काम करने को तैयार नहीं है,अपवादों की बात और है।

क्योंकि चुनावी टिकट भी तो अब आम तौर पर पहले से स्थापित नेता 

के परिजन और धनवानों को मिलने लगे हैं।

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सन 2025 के आंकड़े के अनुसार बिहार के 24 हजार 905 स्वतंत्रता सेनानियों व उनके आश्रितों को पेंशन मिल रही है।

पर कितने जेपी सेनानी बिहार में पेंशन पा रहे हैं ?

 सिर्फ 3354 जेपी सेनानी।

 फरार स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भी कांग्रेसी सरकार ने पेंशन की व्यवस्था कराई।पर फरार जेपी सेनानी कौन कहे,जेल गए और आपातकाल में अपार कष्ट सहे जेपी सेनानी भी पेंशन के लिए अब भी तरस रहे हैं।

धन्यवाद नये मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी को जिन्होंने जेपी सेनानियों की सुध लेनी शुरू की है।

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याद रहे कि अंग्रेजों ने अपने शासन काल में स्वतंत्रता सेनानियों के ‘‘जीने का अधिकार’’ नहीं छीना था।पर आपातकाल में इंदिरा गांधी सरकार ने भारत के लोगों के जीने का संवैधनिक अधिकार तक छीन लिया था।यह बात आपातकाल में सरकारी वकील ने सुप्रीम कोर्ट मेें साफ -साफ कह दिया था।

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मैं भी आपातकाल का एक अदना भुक्तभोगी रहा हूं।

 मैं सबूत के तौर पर अपना खुद का अनुभव संक्षेप में बताता हूं।

मुझे बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में जब सी.बी.आई.बेचैनी से खोज रही थी तो तब के बिहार के मुख्य मंत्री सचिवालय में तैनात मेरे एक मित्र ने मुझे आगाह कर दिया ।मैं मेरे मित्र राम बिहारी सिंह की मदद से भूमिगत हो गया।

 बिहार में जब अधिक दिनों तक भूमिगत रहना मेरे लिए संभव न हो सका तो मैं मेघालय जाकर अपने एक रिश्तेदार के यहां छिप गया।वहां कांग्रेस की सरकार नहीं थी,इसलिए आपातकाल के भीषण अत्याचार से वह राज्य बचा हुआ था।

वैसे आपातकाल में जो जेल गये,उन्हें तो भोजन आदि मिल पा रहे थे,पर मुझे कितना अपार कष्ट हुआ,वह सब मैं अपनी जीवनी में लिखूंगा।राह चलते मुझे देख लेने पर भी मेरे मित्र -परिचित मुझसे मुंह फेर लेते थे।उन्हें डर था कि मुझसे बात करते सी.आई.डी.देख लेगी तो उन्हें भी जेल जाना पड़ सकता है।

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जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद और लालू-नीतीश राज में भी मैंने कोई मुआवजा नहीं मांगा--पत्रकारिता के पेशे में जाकर जीवन यापन करने लगा।

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पर,जिन भुक्तभोगी जेपी सेनानियों को अब भी कुछ नहीं मिला,उनकी उम्मीदें 

सम्राट चैधरी पर टिकी है।

  आजादी के बाद जेपी आंदोलन बिहार का सबसे बड़ा जन आंदोलन था।

हजारों पेंशन वंचित जेपी आंदोलनकारियों को कुछ मिला होता तो सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले नौजवान आज भी उपलब्ध होते।

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इस पृष्ठभूमि में प्रभात खबर में आज प्रकाशित मेरा काॅलम पढ़िए।

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 पेंशन के लिए प्रतीक्षारत जेपी सेनानियों की उम्मीद जगी

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   सुरेंद्र किशोर

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जानकार सूत्रों के अनुसार मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी ने पेंशन के लिए वर्षों से प्रतीक्षा रत जेपी सेनानियों की उम्मीद जगा दी है।

खबर है कि जेपी सेनानी सम्मान योजना की सलाहकार पर्षद का जल्द ही पुनर्गठन होने वाला है।

  उसके बाद पेंशन के लिए एकत्र किए गए हजारों आवदेन पत्रों पर विचार होगा।

 करीब 21 हजार ऐसे जेपी सेनानियों के आवेदन पत्र विचाराधीन हैं,जिन्होंने सन 1974 से लेकर 1977 तक जेल यातना सही या फरार रहे।या उन्हें यातनाएं दी गईं।

इनमें से करीब 450 आवेदन पत्रों की जांच हो चुकी है।

ऐसे आवेदन पत्रों पर सलाहकार पर्षद की अनुशंसा अपेक्षित है।

जानकारी मिली है कि मुख्य मंत्री श्री चैधरी ने उन सेनानियों के प्रति अत्यंत सकारात्मक रुख अपनाया है जिन्होंने जेपी आंदोलन और आपातकाल में अपार कष्ट सहे थे।

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     पेंशन पर कांग्रेस का एतराज

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जेपी सेनानियों के लिए नीतीश सरकार ने सन 2009 में पेंशन योजना शुरू की।तब कांग्रेस तथा कुछ अन्य दलों ने इसका विरोध किया था।पर मुख्य मंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी ने जेपी सेनानियों और उनके परिजनों के अपार कष्टों की चर्चा करते हुए उसका औचित्य बताया।

जिन सेनानियों को पेंशन की राशि अभी मिल रही है,उनकी संख्या कम है।

बहुत सारे आवेदन लंबित हैं जिन पर फैसला होगा।जेपी सेनानियों के लिए यह संतोष की बात होगी कि मुख्य मंत्री चैधरी ने खुद ही उनकी समस्या को हल करने में रूचि दिखाई है।

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राष्ट्रीय स्तर पर सेनानी

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  जेपी सेनानी सम्मान योजना की सलाहकार पर्षद के तत्कालीन अध्यक्ष व बिहार सरकार के  पूर्व राज्य मंत्री मिथिलेश कुमार सिंह ने

सन 2015 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिखा था। दिवंगत सिंह ने लिखा था कि जेपी सेनानियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पेंशन स्वीकृत करने पर केंद्र विचार करें।

दरअसल कुछ भाजपा शासितत राज्य सरकारें जेपी सेनानियों को

अपने यहां सम्मान पेंशन तो दे देती है।पर जैसे ही वहां कांग्रेस की सरकार बन जाती है तो उसे वह बंद कर देती है।

इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में पहल होनी चाहिए।  

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  न बांस रहेगा,न बजेगी बांसुरी

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 लगता है कि डी.जे.और लाउड स्पीकर की आवाज को नियंत्रित 

करना इस देश के

शासन तंत्र के वश में नहीं है।नियंत्रण के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की लगातार उपेक्षा होती रहती है।

  दरअसल अब डी.जे. के उत्पादन पर ही प्रतिबंध लगा देने के बारे में विचार करना चाहिए।

क्योंकि यह फसाद की जड़ भी बनता जा रहा है।आए दिन तेज आवाज वाले डी.जे.के कारण हिंसा होती है और लोगों की जानें भी जाती हैं।बूढ़े और बच्चों के स्वाथ्य पर तेज आवाज का बहुत बुरा असर पड़ता है।

इसी तरह लाउड स्पीकर के निर्माण के समय ही उसमें ऐसा यांत्रिक प्रबंध हो जाए ताकि उसकी आवाज उसी सीमा तक रहे जो सीमा सुप्रीम कोर्ट ने तय की है।ऊंची आवाज वाली लाउड स्पीकर मशीन का निर्माण सिर्फ पुलिस-प्रशासन के लिए सीमित संख्या में हो।

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ग्रामीण बाजारों का संपर्क मार्ग

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बिहार में संपर्क मार्ग को लेकर राज्य सरकार का काम सराहनीय है। मुख्य मंत्री ग्राम संपर्क योजना के तहत व्यापक स्तर पर काम हो रहे हैं। मुख्य मार्गों से संपर्क विहीन बसावटों को जोड़ना है।ऐसी सड़कें हर मौसम में काम करंेगी।

इस सिलसिले में एक खास बात पर ध्यान देने की जरुरत है।

विभिन्न गांवों को पास के बाजारों से भी गांवों को जोड़ने की दिशा में प्राथमिकता के आधार पर काम होना चाहिए।

उदाहरणार्थ सारण जिले के दरियापुर अंचल के खानपुर-भरहापुर बाजार की चर्चा प्रासंगिक होगी।

इस बाजार से पश्चिम की ओर सखनौली गांव की ओर जा रही सड़क की हालत वर्षों से खराब है।

  नदी किनारे से गुजर रही इस महत्वपूर्ण सड़क के मजबूतीकरण से बाजार का भी विकास होगा और स्थानीय स्तर पर ही लोगों के रोजगार के अवसर बढ़ जाएंगे।  

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भूली-बिसरी यादें

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यह बात सन 1969 की है।इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में मोरारजी देसाई उप प्रधान मंत्री और वित्त मंत्री थे।

प्रधान मंत्री श्रीमती गांधी ने देसाई को विश्वास में लिए बिना उनसे लेकर खुद वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाल लिया।साथ ही 

प्रधान मंत्री ने मोरारजी देसाई से कहा कि आप उप प्रधान मंत्री बने रहें।

देसाई ने इसे अपनी तौहीन समझी और केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

उससे पहले प्रधान मंत्री ने देसाई को लिखा था कि चूंकि आपकी आर्थिक नीति हमारे विचारों से मेल नहीं खाती,इसलिए क्यों न आपको वित्त मंत्री पद से मुक्त कर दिया जाये ?

इस पत्र का जवाब मोरारजी देसाई लिखवा ही रहे थे कि उसी बीच उन्हें यह जानकारी मिली कि उनसे वित्त मंत्रालय ले लिया गया है।मोरारजी दसाई ने सिर्फ उप प्रधान मंत्री बने रहना ठीक नहीं समझा और मंत्रिमंडल से ही अपना इस्तीफा भेज दिया।

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और अंत में 

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इसी साल 14 फरवरी को बिहार पुलिस के आई.जी. जितेंद्र राणा ने अतिक्रमण के बारे में आयेजित बैठक में कहा था कि किसकी लापरवाही से पटना की सड़कों पर दोबारा अतिक्रमण हो जाता है,उसकी जवाबदेही तय होगी।

तीन महीने के बाद भी अब तक यह पता नहीं चल सका है कि इस मामले में किन-किन लोगों की जवाबदेही तय हुई है। 

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दैनिक प्रभात खबर,पटना में 25 मई 26 को प्रकाशित

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