बुधवार, 8 जुलाई 2026

 इस देश में एक पूर्व निजी सचिव, प्रधान 

मंत्री बने तो दूसरे निजी सचिव, राष्ट्रपति 

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सुरेंद्र किशोर

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अटल बिहारी वाजपेयी कभी भारतीय जनसंघ के संस्थापक डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निजी सचिव थे।

अटल जी बाद में क्या बने,सबको मालूम है।

हुमाऊं कबीर, मौलाना अबुल कलाम आजाद के निजी सचिव थे।बाद में  कबीर साहब, केंद्रीय मंत्री बने।

राम नाथ कोविन्द प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई के निजी सचिव थे।

बाद में कोविन्द साहब राष्ट्रपति बने।

डा.सुधांशु त्रिवेदी मुख्य मंत्री राजनाथ सिंह के सूचना अधिकारी थे।

डा.त्रिवेदी आगे क्या बनेंगे ,उसकी कोई सीमा नहीं है--स्काई इज द लिमिट --जैसी उनकी अद्भुत योग्यता है।

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लगे हाथ, मैं भी अपना थोड़ा प्रचार का लूं।

मैं 1972-73 में कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था।

राजनीति से मन ऊब गया तो पत्रकार बन गया।

अन्यथा,राजनीति में रह जाता तो मैं भी कम से कम अपने गांव 

का मुखिया या सरपंच तो बन ही सकता था।

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7 जुलाई 26

  


 दिल्ली दंगे (2020) का मुआवजा

दंगाई देंगे या सरकार देगी ?

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2020 के शाहीनबाग धरने में शामिल गैर भाजपा 

दलों के नेता गण देश से अब भी माफी मांगेंगे ?

धरने से उपजी उत्तेजना ने 53 लोगों की जानें ले ली

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मुस्लिम वोट के लिए वे नेतागण इस झूठ के प्रचारक बन गए थे 

 कि सी ए ए से भारतीय मुसलमानों की नागरिकता चली जाएगी।

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सुरेंद्र किशोर

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नागरिकता संशोधन कानून यानी सी.ए.ए. के तहत पात्र लोगों को नागरिकता 

तो अब दी जा रही है ,

पर इस क्रम में किसी की नागरिकता नहीं ली जा रही है।

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नागरिकता कानून का सख्त विरोध करके ऊर्जावान प्रशांत किशोर ने

शुरू होने से पहले ही अपने राजनीतिक करियर को अनिश्चितता में डाल दिया।

प्रशांत जी, अब तो देश में एन.आर.सी.भी जल्द ही लागू हो सकता है

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नरेंद्र मोदी सरकार ने पहले ही कह दिया था कि नागरिकता संशोधन कानून से,

जो 2019 में पारित हुआ, भारत के किसी वास्तविक मुस्लिम नागरिक की नागरिकता नहीं जाएगी।

सी.ए.ए. के तहत लोगों को नागरिकता महीनों से दी जा रही है।

किसी की नागरिकता नहीं ली जा रही है।इसके बावजूद सन 2020 में शाहीन बाग धरने में 

शामिल हुए गैर भाजपा नेताओं ने देश से माफी नहीं मांगी।

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शाहीन बाग में आयोजित लंबे धरने से उत्पन्न भारी सांप्रदायिक तनाव के माहौल के 

कारण दिल्ली में सन 2020 में भीषण दंगे हुए जिसमंे 53 मरे,300 घायल हुए।

संपत्ति का भारी नुकसान हुआ।

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 कोर्ट में अब भी यह विवाद चल रहा है कि दिल्ली दंगा पीड़ितों को मुआवजा सरकार देगी या दंगा कराने वाले देंगे।अन्य कई मामलों में कोर्ट तोे कई बार फैसला दे चुका है कि दंगा कराने वाले ही मुआवजा देंगे।

2024 के लोक सभा चुनाव से पहले केरल में पी.एफ.आई.ने दंगा किया।तब वहां सी.पी.एम.की सरकार थी।

वहां के हाईकोर्ट ने सी.पी.एम.सरकार को निदेश दिया कि वह दंगाइयों से मुआवजा वसूले।सरकार के समक्ष मजबूरी हो गई।जब वसूली होने लगी तो पी.एफ.आई.-एसडीपीआई ने सीपीएम का

साथ छोड़कर कांग्रेस का साथ पकड़ लिया।

नतीजतन लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को केरल की अधिकतर सीटें मिल गईं ।

 अब तो राज्य सरकार भी कांग्रेस के ही हाथों में है।याद रहे कि केरल के अधिकतर मुस्लिम वोटर पी.एफ.आई -एसडीपी आई के साथ रहे हैं।

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याद रहे कि प्रतिबंधित जेहादी संगठन पी.एफ.आई.ने ही परदे के पीछे रह कर 

सन 2020 में दिल्ली के शाहीन बाग में 

लंबे समय तक धरना कार्यक्रम चलाया।

धरना सी.ए.ए.(नागरिकता संशोधन कानून ) के खिलाफ था।उनकी मांग थी कि 

इस देश में एन.आर.सी.भी नहीं लागू होना चाहिए।

याद रहे कि पाकिस्तान में भी एन.आर.सी.है,पर भारत के जेहादी चाहते हैं कि भारत में नहीं हो ताकि वे घुसपैठ करा कर आबादी का अनुपात बदल दें और देर-सबेर भारत पर इस्लामिक शासन कायम कर लें।

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अधिकतर राजग विरोधी दलों ने उस चर्चित शाहीन बाग धरने का सक्रिय समर्थन किया।

चूंकि नीतीश कुमार के दल ने उस संशोधन कानून का संसद में समर्थन किया था,इसलिए उसके विरोध में प्रशांत किशोर जदयू से अलग हो गए।

 तब वे जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे।

क्या प्रशांत किशोर को धरने का असली एजेंडा का पता नहीं था ?

बिहार के जागरूक लोगों को तो पहले ही मालूम हो गया था।

इसीलिए 2025 के बिहार विधान सभा चुनाव में प्रशांत किशोर को कोई चुनावी सफलता नहीं मिली।

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सी.ए.ए.के विरोध के पीछे की असली मंशा जान लीजिए।

दरअसल भारत में सक्रिय जो जेहादी लोग यहां के हिन्दू-मुस्लिम की आबादी का अनुपात बदल कर भारत पर देर-सबेर कब्जा कर लेना चाहते हैं।(डा.जाकिर नाइक को यह कहते हुए मैंने यूट्यूब पर सुना कि भारत में अब 80 प्रतिशत हिन्दू नहीं हैं।सिर्फ 60 प्रतिशत रह गए है।

दूसरे मौलाना बता रहे थे कि हमने 2014 से अब तक  भारत में 20 लाख हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराया हैं।हालांकि इस तथ्य की अभी पुष्टि होनी बाकी है।)

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि ‘‘पड़ोस के मुस्लिम देशों में उत्पीड़न के शिकार वहां के  अलपसंख्यकों को आश्रय देने की भारत की नैतिक जिम्मेदारी के लिए सी.ए.ए. जरूरी है।’’

अमित शाह के अलावा आजादी के तत्काल बाद शीर्ष कांग्रेसी नेताओं ने भी उन उत्पीड़ितों को  भारत में शरण देने का आश्वासन दिया था।

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2019 में कानून बनने के बाद यही बात भारत में सक्रिय जेहादियों को खल गई।वे उबल पड़े।उन्होंने देखा कि कितनी मेहनत से हम घुसपैठ कराकर ,धर्म परिवर्तन करा कर ,धमका कर,पैसे खर्च करके और लव जेहाद आदि के जरिए हिदुओं की आबादी का अनुपात घटा रहे हैं।दूसरी ओर, करोड़ों बाहरी लोगों यानी पाक,अफगानिस्तान,बांग्ला देश से आए गैर मुस्लिमों को यहां का नागरिक बनाकर हमारे किए कराए को मोदी सरकार प्रभावहीन बना रही है।

भारत के वोट लोलुप राजनीतिक दल तब शाहीन बाग के धरनार्थियों के समर्थन में आ गये थे।

ऐसा करके उन लोगों ने देश की नहीं बल्कि अपने वोट बैंक की चिंता की।पर,ऐसी ही चिंताओ के कारण वे दुबले होते जा रहे हैं क्योंकि हिन्दू जग रहे हैं।पूर्व सांसद अदीब ने हाल में कहा कि सेक्युलर दल अब हमारा साथ नहीं दे रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि साथ देने पर उन्हें हिन्दू लोग वोट नहीं देंगे।जबकि हमारी मस्जिदं और मजारें बड़े पैमाने पर उजाड़ी जा रही हैं।अदीब साहब ने यह नहीं बताया कि जो मस्जिदें-मजारें उजाड़ी जा रही हैं ,वे वैध जमीन पर हैं या अवैध जमीन पर !  

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शाहीन बाग धरने से उत्पन्न तनाव के कारण सन 2020 में दिल्ली में जो दंगे हुए,उनमें जो क्षति हुई,उसका विवरण यहां पेश है---

सन 1984 के सिख विरोधी दंगे के बाद का यह सबसे बड़ा दंगा था।

1.--53 मरे

2.-300 घायल

3.--122 घर जला दिए गए  

4.--200 कारें जला दी गईं

5.-300 मोटर साइकिलों में आग लगा दी गईं

6.--2  स्कूलों को तहस -नहस कर दिया गया

7.--4 धार्मिक स्थलों को जला दिया गया 

8.--4 फैक्ट्रियों को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया गया।

9.--5 गोदामों को लूट लिया गया 

10--369 एफ.आई.आर.दर्ज की गई

11.--903 गिरफ्तार किए गए

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(स्त्रोत--इंडिया टूडे हिन्दी)  

इस केस के सिलसिले में उमर खालिद और सरजिल इमाम अब भी जेल में हंै।

सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें जमानत देने से मना कर दिया है।

इसी से अपराध की गंभीरता समझ लीजिए।वे लोग नार्थ-ईस्ट को मुख्य भारत से अलग कर देने का हौसला बांध रहे थे।

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मंगलवार, 7 जुलाई 2026

 किसी ने कहा है--

‘‘भारत में बसा पाकिस्तान सरकता हुआ तुम्हारी तरफ आ 

रहा है।

तुम तो जिन्दगी गुजार लोगे ,खून के आंसू रोएगी 

तुम्हारी आने वाली पीढ़ियां।’’

सोमवार, 29 जून 2026

 दो कविता संग्रह मिले

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1.-हटो व्योम के मेघ

   --कुमार अनुपम

2.-बोध-अबोध

  --सतीश कुमार

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कुमार अनुपम परिचय के मोहताज नहीं।

जेपी के सहयोगी रहे।

एक साथ कई क्षेत्रों में सक्रिय

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सतीश कुमार पेशे से इंजीनियर और कैलिफोर्निया(अमेरिका)में कार्यरत।

इसके बावजूद भारत स्थित परिवार और यहां की ‘जमीन’ से जीवंत सपर्क।

सतीश जी ने कुछ समय तक टाइम्स आॅफ इंडिया(पटना)के

 लिए खोजपूर्ण स्टोरी भी की थी जब वे भारत में थे।

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इसलिए मैं उनकी इस ताजा कविता को,जो इस संग्रह में शामिल है,

 गंभीरता से लेते हुए यहां उधृत कर रहा हूं।

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   पत्रकारिता

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आजकल बहुधा

पत्रकारिता धरती से छूटे हुए,

नीयत से टूटे हुए,

धंधे से लुटे हुए

बेचैन लोगों की ‘‘सभ्य’’ आत्म कथा है !

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कुमार अनुपम के कविता संग्रह की भूमिका 

डा.अनिल सुलभ ने ‘‘शुभाशंसा’’

के तौर पर लिखी है।

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा.सुलभ ने लिखा है कि

 ‘‘कुमार अनुपम एक ऐसे जाग्रत कवि हैं,जिनकी कविताएं लोक केंद्रित हैं।

इनकी कविताएं सामाजिक स्थितियों ,परिस्थितियों और उसकी दशा-दिशा का तात्विक 

चित्रण करती हैं और समाज को सचेत करती हैं।............’’

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--सुरेंद्र किशोर


 


बुधवार, 17 जून 2026

 हजार फूल खिलने दो

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इतिहास से सबक लो

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सुरेंद्र किशोर

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लोकतंत्र,राजनीतिक दल और देश को बचाना है तो विभिन्न 

धर्मों और जातियों के बीच संतुलन बनाये रखिए।

न तो हिन्दू राष्ट्र के विचार को समर्थन मिले न ही इस्लामी राष्ट्र को।

न सवर्णों का वर्चस्व कायम हो न ही पिछड़ों का।

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हजार फूल खिलने दो

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आजादी के तत्काल बाद कौन किस पद पर था ?

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जवाहरलाल नेहरू के दौर का सामाजिक असंतुलन

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राष्ट्रपति --डा.राजंेद्र प्रसाद --कायस्थ

प्रधान मंत्री --जवाहरलाल नेहरू--ब्राह्मण

उप राष्ट्रपति--डा.एस.राधाकृष्णन--ब्राह्मण

लोक सभा के स्पीकर--जी.वी.मावलंकर--ब्राह्मण

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश--एम.पी.शास्त्री--ब्राह्मण

आदि आदि .........

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जवहरलाल नेहरू राष्ट्रपति पद पर राजेंद्र बाबू के बदले सी.राजगोपालाचारी (ब्राह्मण )को बैठाना चाहते थे,पर सरदार पटेल की जिद्द के कारण राजेंद्र बाबू बने।

याद रहे कि राज गोपालाचारी ने सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरेाध किया था।वे महात्मा गांधी के समधी थे।

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नरेंद्र मोदी के दौर का सामाजिक संतुलन 

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राष्ट्रपति--द्रोपदी मुर्मू--अदिवासी 

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी --अति पिछड़ा

उप राष्ट्रपति -सह राज्य सभा के सभापति--

सी.पी राधाकृष्णन--ओबीसी 

लोक सभा के स्पीकर --ओम बिड़ला-ब्राह्मण

राज्य सभा के उप सभापति--हरिवंश--राजपूत

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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश--सूर्यकंात--ब्राह्मण

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आजादी के तत्काल बाद राज्यों के शासन तंत्र में भी भारी सामाजिक 

असंतुलन था।बिहार में तो लगता था कि तब दो ही जातियों भूमिहार 

और राजपूतों का शासन है।

सन 1967 तक कांग्रेस ने बिहार में किसी पिछड़ा को मुख्य मंत्री 

नहीं बनने दिया।

अन्य राज्यों की स्थिति भी लगभग वही थी।

1990 में पिछड़ा आरक्षण का कांग्रेस ने विरोध किया।उसके बाद 

कांग्रेस को लोक सभा में बहुमत मिलना बंद हो गया।

अब अंध मुस्लिम भक्ति के कारण कांग्रेस राष्ट्रीय दल से क्षेत्रीय 

पार्टी बन गई।तकनीकी रूप से भले वह राष्ट्रीय दल है।

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इतने बड़े देश में सभी दलों का यह कत्र्तव्य है कि विभिन्न जातियों और धर्मों

के प्रति संतुलन कायम रखिए।

सब तरह के अतिवादियों का विरोध करिए।तभी दल भी बचेंगे,लोकतंत्र भी बचेगा और देश भी।

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17 जून 26

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रविवार, 7 जून 2026

 ताकतवर नेताओं की सुरक्षा

बनाम असुरक्षित आम जनता 

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सुरेंद्र किशोर

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बात उस समय की है जब गांधीवादी देव नारायण यादव बिहार विधान सभा के अध्यक्ष (1995--2000) थे।

सदन की कार्यवाही चल रही थी।संवाददाता के रूप में मैं भी दर्शक दीर्घा में मौजूद था।

अचानक एक साथ कई विधायक खड़े हो गये।वे मांग करने लगे--‘‘अध्यक्ष महोदय, मेरी जान पर खतरा है।मेरी जान पर खतरा है।मेरी सुरक्षा का प्रबंध कराइए।मेरी सुरक्षा का प्रबंध कराइए।’’

कुछ देर तक हंगामा होता रहा।स्पीकर महोदय सुनते रहे।

 अंत में गांधीवादी और शालीन स्पीकर यादव जी ने कहा--‘‘मेरी जान पर तो कोई खतरा नहीं।क्योंकि मैंने किसी की हत्या नहीं की है।’’

इस टिप्पणी के बाद सदन में शांति छा गई थी।

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दूसरा दृश्य

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एक अन्य अवसर पर माकपा के विधायक अजित सरकार अचानक सदन के बीच में जाकर चिल्लाने

लगे--कुछ लोग मेरी हत्या करना चाहते हैं।यह कहते हुए उन्होंने अपना कुर्ता खोलकर जमीन पर फेंक दिया।उन्होंने गंजी नहीं पहनी थी।

उसके बाद उनके हाथ पायजामे की डोरी की तरफ बढ़े ।

वे पूर्णतः नग्न होना चाहते थे।उससे पहले कि वे पायजामा खोल पाएं ,सुरक्षाकर्मियों व कुछ विधायकों ने उन्हें रोक दिया।

   उस समय भी मैं संवाददाता के रूप में उस ऐतिहासिक दृश्य का चश्तदीद गवाह बना।

अजित सरकार को अपनी जान पर जिससे

खतरा था,उसनेे अंततः अजित सरकार की जान ले ही ली।हत्यारे को सजा नहीं हुई।

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जिस देश और राज्य में अपराधियों को तौल कर सजा नहीं मिलेगी,उस राज्य में कोई किसी को नहीं बचा सकता,चाहे आप कितनी भी सुरक्षा के बीच रहें।

इन दिनों के अखबारों को ध्यान से पढ़िए--कितनी हत्याएं होती रहती हैं ?

कितने हत्यारे को  फांसी पर चढ़ाया जाता है ?

हमारी सबसे अदालत कहती हैं--बेल नियम और जेल अपवाद।

नतीजतन हत्या आम, और सजा विरल !

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मशहूर पुलिस अफसर प्रकाश सिंह ने एक अध्ययन को उधृत करते हुए कहा था कि एक हत्यारे को फांसी पर चढ़ा देने के बाद हत्या के लिए उठे 7 हाथ अपने आप रुक जाते हैं।

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सजा न होने के कारणों के बारे में यहां कुछ बताने की कोई जरूरत नहीं।कारण सब जानते हैं।

हां,एक बात कहना चाहता हूं।

यदि सुप्रीम कोर्ट नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग और डी.एन.ए.टेस्ट आदि की इजाजत जांच एजेंसियों को दे दे तो सजाओं का प्रतिशत बढ़ जाएगा।पर,इस देश का दुर्भाग्य यह है कि किसी की जान की अपेक्षा सुप्रीम कोर्ट के लिए हत्यारे के मानवाधिकार की अधिक ंिचता रहती है।

भारत में आपराधिक मामलों में सजा की दर औसतन 40 प्रतिशत है जबकि जापान में 98 प्रतिश्ता और अमेरिका में 93 प्रतिशत।

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निष्कर्ष

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जिस देश में हत्यारे को सजा दिलाने वाली शक्तियंा कमजोर और बचाने वाली शक्तियां मजबूत हैं,वहा उसी की जान बची हुई है जिसे मारने में किसी की कोई रूचि नहीं है।बाकी सब असुरक्षित हैं ,चाहे आप अपने आसपास सुरक्षा की जितनी भी मजबूत दीवाल क्यों न खड़ी कर लें।

इसलिए बड़े नेताओं का भी कल्याण इसी बात में है कि वे सुरक्षा के लिए आम माहौल बनाएं न कि खास -खास किले खड़ा कर लें अपने आसपास।

माहौल बनाने के लिए प्राथमिक शर्त यह है कि राजनीति में अपराधियों को आगे मत बढ़ाओ।उनका सशक्तीकरण मत करो।अच्छे लोग हर जाति में हैं।

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और अंत में

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कुछ दशक पहले की बात है,बिहार के एक बाहुबली जातीय नेता अपने दलीय सुप्रीमो के यहां गये।कहा--फलां को एम.एल.सी.बना दीजिए।

सुप्रीमो ने कहा कि आप अपनी ही जाति को बनवाना चाहते हैं तो इसके बदले उसी जाति के फलां को ले आइए, बनवा दूंगा।

चूंकि फलां अच्छा आदमी था,इसलिए बाहुबली ने उसके लिए पैरवी नहीं की भले वह उसी की जाति का था।

सुप्रीमो और बाहुबली के बीच का संवाद जो अफसर सुन रहा था,उसने यह संवाद ‘‘फलां’’ को उसके घर जाकर दूसरे दिन सुनाया था।

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7 जून 26

  

 



मंगलवार, 2 जून 2026

 आजादी के तत्काल बाद की सरकार ने रासायनिक 

खाद के जरिए देश की मिट्टी को जहरीला बनाया,

मौजूदा सरकार के समक्ष ‘‘खेत बचाओ’’ की समस्या

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1960--केंद्र सरकार ने किसानों से अपील की थी और उन्हें निदेश दिया था कि वे अधिक से अधिक रासायनिक खाद-

कीटनाशक का उपयोग अपने खेतों में करें।

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कुपरिणाम से अनजान किसानों ने अधिक पैदावार के लोभ में वैसा किया भी।

नतीजतन इस देश की मिट्टी बड़े पैमाने पर जहरीली हो गई।भूजल आर्सेनिकयुक्त हुआ।करोड़ों लोग कैंसर से ग्रस्त होने लगे 

तो ‘‘अब पछताए होत का.जब चिड़िया चुग गई खेत !!

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सन 2026--आज के अखबारों में सरकार ने एक बड़ा विज्ञापन छपवाया है।उसका शीर्षक है---

खेत बचाओ अभियान।प्राकतिक खेती,उर्वर मिट्टी,सुरक्षित भविष्य।

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यानी, मौजूदा सरकार मानने लगी है कि आज की पीढ़ी का भविष्य -स्वास्थ्य सुरक्षित नहीं है।ऐसा क्यों हुआ ?

क्योंकि 1960 के दशक में आयातित रासायनिक उर्वरकों का व्यापक उपयोग राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया।

वैसा कांग्रेस के अदूरदर्शी नेतृत्व के कारण हुआ।क्योंकि सर्वोच्च नेतृत्व जमीन से पूरी तरह कटा हुआ था।

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क्या इसलिए हुआ ताकि कुछ लोग आयात के जरिए से नाजायज कमाई करके अमीर बन सके !पता नहीं !

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साठ के दशक की तीन-चार बातें

1.-आजादी के समय हमारे देश के करीब मात्र 20 प्रतिशत खेतों के लिए सिंचाई जल उपलब्ध था।जैविक खाद यानी गोबर खाद का इस्तेमाल होता था।

डा.लोहिया ने नेहरू सरकार ने अपील की थी कि 700 करोड़ रुपए की फेज वाईज योजना बनाकर पूरे देश में सिंचाई का प्रबंध करिए।

उसके बदले केंद्र सरकार ने रासायनिक खाद और उन्नत बीज के नाम पर खेतों में जहर फैलाया और पुराने पौष्टिक अनाज को दरकिनार किया।हाईब्रिड के नाम पर पुराने पौष्टिक अन्न को समाप्त किया।उस जमाने के छोटे -छोटे दाने वाले गेहूं से बनी रोटी का बेहतरीन स्वाद मुझे याद है।वह आज उपलब्ध नहीं है।

2.-साठ के दशक में आचार्य रजनीश का पटना में भाषण मैं सुन रहा था।एक खास प्रसंग में उन्होंने कहा कि अमेरिका में

 दुकानों में अनाज के बोरे में ऊपर तख्ती लगी होती है जिस पर लिखा रहता है--यह अनाज जैविक खाद के जरिए उपजाया हुआ है।

 यानी, अमेरिका के लोग जब रासायनिक खाद की बुराइयांें को पहचान कर सावधान हो चुके थे ,उस समय हमारी सरकार ने मिट्टी को जहरीला बनाने का काम शुरू किया।आज स्थिति ऐसी है कि यह कहना कठिन है कि कहां की मिट्टी जहरीली है और कहां की नहीं है।

3.-मेरे पुश्तैनी गांव वाले चुनाव क्षेत्र गड़खा (सारण)से 1969 में कांग्रेस के जगलाल चैधरी विधायक थे।वे गांव -गांव जाकर किसानों से भोजपुरी में कहते थे--आप लोग रासायनिक खाद खेत में मत डालिए।इससे खेत खराब और फसल जहरीला हो जाएगा।मैंने उनको हमारे दरवाजे पर भी यही बात मेरे किसान पिता से कहते सुना था।चैधरी जी चैथे वर्ष तक एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई कलकत्ता मेडिकल काॅलेज में पढ़ चुके थे।उसी बीच पढाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे।  

चैधरी जी ने जो कहा,वही दुष्परिणाम हमारे अदूरदर्शी नेताओं के कारण हमारा देश झेल रहा है।

कैंसर के मरीजों के संख्या तेजी से बढ़ रही है।

गैर सरकारी स्तर पर भी अनेक संगठन ,खासकर सद्गुरु जग्गी वासुदेव (इशा फाउंडेशन )मिट्टी बचाओ अभियान चला रहे हैं। 

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2 जून 26

 









बुधवार, 27 मई 2026

 



आर्थिक रूप से कमजोर पद्म अवार्डीज को मासिक मानदेय देने के बारे में

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गत फरवरी में प्रभारी मंत्री विजय चैधरी ने मानदेय देने का आश्वासन बिहार 

विधान परिषद में दिया था

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सुरेंद्र किशोर

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मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी ने कल कहा  कि पद्म पुरस्कार पाने वालों ने अपने असाधारण योगदान से न केवल अपने क्षेत्र को गौरवान्वित किया ,बल्कि भारत की प्रतिभा,संस्कृति व सामथ्र्य को विश्व मंच पर नई पहचान दिलाई।’’

  ‘‘भोजपुरी लोक संगीत की अमूल्य परम्परा को जीवंत रखने वाले भरत सिंह भारती,ख्यात कृषि वैज्ञाानिक स्व.डा.गोपाल जी त्रिवेदी तथा नृत्य गुरु स्व.विश्व बंधु जी को मिला सम्मान ,आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।’’

  ध्यान रहे कि ये तीन हस्तियां बिहार से रही हैं।

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इससे पहले गत 25 फरवरी, 26 को बिहार विधान परिषद में जदयू के नीरज कुमार ने पद्म अवार्डियों के लिए मासिक मानदेय देने का प्रावधान करने के लिए बिहार सरकार का ध्यानाकर्षित किया था।

ध्यानाकर्षण सूचना के जवाब में प्रभारी मंत्री विजय कुमार चैधरी ने सदन में  आश्वासन देते हुए कहा था कि ‘‘राज्य सरकार पद्म सम्मानित हस्तियों को मासिक मानदेय या आर्थिक सहायता देने पर विचार करेगी।’’

श्री चैधरी ने सदन में यह भी कहा कि उन पद्म आर्डियों ने बिहार का सम्मान बढ़ाया है तो राज्य सरकार भी उनके लिए यथायोग्य करेगी।

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याद रहे कि सन 2014 में सत्ता संभालने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने आम तौर से प्रचार से दूर नेपथ्य में रह कर असाधारण काम करने वालों को भी जब पद्म सम्मान देना शुरू किया तो यह पता चलने लगा कि उनमें से कई अवार्डी  फटेहाल हैं और उनकी मासिक आय सरकार की न्यूनत्तम मजदूरी से भी कम है।

 पद्म सम्मानित व्यक्तियों को केंद्र सरकार कोई मासिक मानदेय नहीं देती।

किंतु उनकी फटेहाली को ध्यान में रखते हुए निम्न लिखित चार राज्य सरकारें मासिक मानदेय देती हैं--

1.-ओडिशा सरकार --30 हजार रुपए मासिक

2.-तेलांगना सरकार--25 हजार रुपए मासिक

(इसके अलावा 30 लाख रुपए एकमुश्त)

3.-हरियाणा सरकार--10 हजार रुपए मासिक

4.-छत्तीस गढ़ सरकार --10 हजार रुपए मासिक

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हिन्दुस्तान के रांची संस्करण में प्रकाशित समाचार के अनुसार ‘‘पद्म पुरस्कार विजेताओं को सम्मान राशि देगी झारखंड सरकार’’

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मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले आम तौर पर ऐसी हस्तियों को पद्म सम्मान दिए जाते थे जिन्हें गुजारे के लिए मानदेय की जरूरत नहीं पड़ती थी।

 2014 के बाद बिहार के जिन लोगों को पद्म अवार्ड मिले उनमें से कुछ को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। कुछ ऐसे पद्मश्री अवार्डीज भी हैं जिनकी पक्की मासिक आय 5 हजार रुपए से भी कम है।ऐसे कई अन्य हस्तियां भी हो सकती हैं।इसलिए बिहार सरकार वैसे पद्म अवार्डीज को आर्थिक मदद करने पर विचार कर ही सकती है जो आयकर नहीं देते।

या फिर भारत सरकार ही इस दिशा में कोई कदम उठाये ताकि इस मामले में पूरे देश में समरुपता रहे।

क्योंकि यह जरूरी नहीं कि हर राज्य सरकार का इस मामले में दिल पसीजे ही।

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देश के कुछ विपन्न पद्म अवार्डीज की कहानियां--याद रहे कि पद्मश्री अवार्ड देश का चैथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।

कल्पना कीजिए जिसे आप इतना बड़ा सम्मान लायक समझते हैं,उनकी निजी आय न्यूनत्तम मजदूरी से भी कम हो !!

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ओड़िशा के ‘‘लोक कवि रत्न’’ हलधर नाग को सन 2016 में पद्म श्री अवार्ड लेने के लिए नई दिल्ली बुलाया गया तो लोक कवि ने केंद्र सरकार को लिख दिया--‘‘साहब,मेरे पास दिल्ली आने के लिए पैसे नहीं हैं। इसलिए अवार्ड को डाक से भिजवा दीजिए।’’

बाद में उनके जाने का प्रबंध हुआ और उन्होंने अवार्ड ग्रहण किया।

ऐसी घटना से द्रवित होकर ओड़िशा सरकार ने अपने राज्य के पद्म अवार्डियों को मासिक 30 हजार रुपए मानदेय देने का निर्णय किया। वह उन सब पद्म अवार्डियों को मिल रहा है जो ओड़िशा के निवासी हैं।

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सन 2022 में तेलांगना के पद्म सम्मानित  

दर्शनम मुगोलैया को जब वहां की राज्य सरकार ने हैदराबाद में मजदूरी करते पाया तो तेलांगना सरकार ने अपने राज्य के पद्म अवार्डियों के लिए मासिक 25 हजार रुपए मानदेय देना शुरू कर दिया।

साथ ही, उन्हें एकमुश्त 25 लाख रुपए भी दिये।

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इसी तरह हरियाणा और छत्तीस गढ़ की सरकारें अपने राज्य के साधनहीन पद्म आवार्डियों को मासिक मानदेय 10 हजार रुपए देती है।

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गत साल रांची से यह खबर आई कि 90 साल के पद्म श्री अवार्डी सिमोन उरांव पैरालिसिस अटैक के बाद बिस्तर पर हैं।उनके इलाज की उचित व्यवस्था नहीं हो पा रही है।बाद में उनका क्या हुआ,यह पता नही चल सका।

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इस बार जनवरी ,2026 में जिन लोगों को पद्म अवार्ड दिए जाने की घोषणा हुई,उनकी सूची वाली खबर के साथ प्रभात खबर ने सटीक हेडिंग लगाई थी 

‘‘गुमनाम चेहरे,असाधारण काम,सेवा से बनी पहचान।’’

इस सूची को भी सरसरी तौर पर देखने से लगता है कि संभव है इनमें भी कुछ मोगलैया,सिमोन उरांव और हलधर नाग हो सकते हैं।ऐसे लोगों की सुध कौन और कब लेगा ?यह पता लगाना केंद्र और राज्य सरकारों के लिए आसान होगा कि इनमें से कितने ऐसे अवार्डीज हैं जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं और जो आयकर नहीं देते।

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27 मई 26

 


  

 


मंगलवार, 26 मई 2026

  हजारों जेपी सेनानियों  को सम्मान-सहारा मिला होता 

तो बाद की पीढ़ियां भी सार्वजनिक कामों में जुटतीं।पर 

अपवादों को छोड़कर अब भाड़े पर ही कार्यकर्ता उपलब्ध

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क्योंकि सत्ता की मलाई तो नेताओं के वंशजों-परिजनों 

 के लिए रिजर्व होती जा रही है

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करीब तीन साल पहले बिहार में जब एक नया दल बना तो

उस दल के नेता ने हर जिले में वेतन पर कार्यकर्ता रखा।

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क्योंकि आम तौर पर कोई मुफ्त में काम करने को तैयार नहीं है,अपवादों की बात और है।

क्योंकि चुनावी टिकट भी तो अब आम तौर पर पहले से स्थापित नेता 

के परिजन और धनवानों को मिलने लगे हैं।

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सन 2025 के आंकड़े के अनुसार बिहार के 24 हजार 905 स्वतंत्रता सेनानियों व उनके आश्रितों को पेंशन मिल रही है।

पर कितने जेपी सेनानी बिहार में पेंशन पा रहे हैं ?

 सिर्फ 3354 जेपी सेनानी।

 फरार स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भी कांग्रेसी सरकार ने पेंशन की व्यवस्था कराई।पर फरार जेपी सेनानी कौन कहे,जेल गए और आपातकाल में अपार कष्ट सहे जेपी सेनानी भी पेंशन के लिए अब भी तरस रहे हैं।

धन्यवाद नये मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी को जिन्होंने जेपी सेनानियों की सुध लेनी शुरू की है।

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याद रहे कि अंग्रेजों ने अपने शासन काल में स्वतंत्रता सेनानियों के ‘‘जीने का अधिकार’’ नहीं छीना था।पर आपातकाल में इंदिरा गांधी सरकार ने भारत के लोगों के जीने का संवैधनिक अधिकार तक छीन लिया था।यह बात आपातकाल में सरकारी वकील ने सुप्रीम कोर्ट मेें साफ -साफ कह दिया था।

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मैं भी आपातकाल का एक अदना भुक्तभोगी रहा हूं।

 मैं सबूत के तौर पर अपना खुद का अनुभव संक्षेप में बताता हूं।

मुझे बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में जब सी.बी.आई.बेचैनी से खोज रही थी तो तब के बिहार के मुख्य मंत्री सचिवालय में तैनात मेरे एक मित्र ने मुझे आगाह कर दिया ।मैं मेरे मित्र राम बिहारी सिंह की मदद से भूमिगत हो गया।

 बिहार में जब अधिक दिनों तक भूमिगत रहना मेरे लिए संभव न हो सका तो मैं मेघालय जाकर अपने एक रिश्तेदार के यहां छिप गया।वहां कांग्रेस की सरकार नहीं थी,इसलिए आपातकाल के भीषण अत्याचार से वह राज्य बचा हुआ था।

वैसे आपातकाल में जो जेल गये,उन्हें तो भोजन आदि मिल पा रहे थे,पर मुझे कितना अपार कष्ट हुआ,वह सब मैं अपनी जीवनी में लिखूंगा।राह चलते मुझे देख लेने पर भी मेरे मित्र -परिचित मुझसे मुंह फेर लेते थे।उन्हें डर था कि मुझसे बात करते सी.आई.डी.देख लेगी तो उन्हें भी जेल जाना पड़ सकता है।

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जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद और लालू-नीतीश राज में भी मैंने कोई मुआवजा नहीं मांगा--पत्रकारिता के पेशे में जाकर जीवन यापन करने लगा।

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पर,जिन भुक्तभोगी जेपी सेनानियों को अब भी कुछ नहीं मिला,उनकी उम्मीदें 

सम्राट चैधरी पर टिकी है।

  आजादी के बाद जेपी आंदोलन बिहार का सबसे बड़ा जन आंदोलन था।

हजारों पेंशन वंचित जेपी आंदोलनकारियों को कुछ मिला होता तो सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले नौजवान आज भी उपलब्ध होते।

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इस पृष्ठभूमि में प्रभात खबर में आज प्रकाशित मेरा काॅलम पढ़िए।

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 पेंशन के लिए प्रतीक्षारत जेपी सेनानियों की उम्मीद जगी

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   सुरेंद्र किशोर

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जानकार सूत्रों के अनुसार मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी ने पेंशन के लिए वर्षों से प्रतीक्षा रत जेपी सेनानियों की उम्मीद जगा दी है।

खबर है कि जेपी सेनानी सम्मान योजना की सलाहकार पर्षद का जल्द ही पुनर्गठन होने वाला है।

  उसके बाद पेंशन के लिए एकत्र किए गए हजारों आवदेन पत्रों पर विचार होगा।

 करीब 21 हजार ऐसे जेपी सेनानियों के आवेदन पत्र विचाराधीन हैं,जिन्होंने सन 1974 से लेकर 1977 तक जेल यातना सही या फरार रहे।या उन्हें यातनाएं दी गईं।

इनमें से करीब 450 आवेदन पत्रों की जांच हो चुकी है।

ऐसे आवेदन पत्रों पर सलाहकार पर्षद की अनुशंसा अपेक्षित है।

जानकारी मिली है कि मुख्य मंत्री श्री चैधरी ने उन सेनानियों के प्रति अत्यंत सकारात्मक रुख अपनाया है जिन्होंने जेपी आंदोलन और आपातकाल में अपार कष्ट सहे थे।

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     पेंशन पर कांग्रेस का एतराज

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जेपी सेनानियों के लिए नीतीश सरकार ने सन 2009 में पेंशन योजना शुरू की।तब कांग्रेस तथा कुछ अन्य दलों ने इसका विरोध किया था।पर मुख्य मंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी ने जेपी सेनानियों और उनके परिजनों के अपार कष्टों की चर्चा करते हुए उसका औचित्य बताया।

जिन सेनानियों को पेंशन की राशि अभी मिल रही है,उनकी संख्या कम है।

बहुत सारे आवेदन लंबित हैं जिन पर फैसला होगा।जेपी सेनानियों के लिए यह संतोष की बात होगी कि मुख्य मंत्री चैधरी ने खुद ही उनकी समस्या को हल करने में रूचि दिखाई है।

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राष्ट्रीय स्तर पर सेनानी

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  जेपी सेनानी सम्मान योजना की सलाहकार पर्षद के तत्कालीन अध्यक्ष व बिहार सरकार के  पूर्व राज्य मंत्री मिथिलेश कुमार सिंह ने

सन 2015 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिखा था। दिवंगत सिंह ने लिखा था कि जेपी सेनानियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पेंशन स्वीकृत करने पर केंद्र विचार करें।

दरअसल कुछ भाजपा शासितत राज्य सरकारें जेपी सेनानियों को

अपने यहां सम्मान पेंशन तो दे देती है।पर जैसे ही वहां कांग्रेस की सरकार बन जाती है तो उसे वह बंद कर देती है।

इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में पहल होनी चाहिए।  

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  न बांस रहेगा,न बजेगी बांसुरी

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 लगता है कि डी.जे.और लाउड स्पीकर की आवाज को नियंत्रित 

करना इस देश के

शासन तंत्र के वश में नहीं है।नियंत्रण के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की लगातार उपेक्षा होती रहती है।

  दरअसल अब डी.जे. के उत्पादन पर ही प्रतिबंध लगा देने के बारे में विचार करना चाहिए।

क्योंकि यह फसाद की जड़ भी बनता जा रहा है।आए दिन तेज आवाज वाले डी.जे.के कारण हिंसा होती है और लोगों की जानें भी जाती हैं।बूढ़े और बच्चों के स्वाथ्य पर तेज आवाज का बहुत बुरा असर पड़ता है।

इसी तरह लाउड स्पीकर के निर्माण के समय ही उसमें ऐसा यांत्रिक प्रबंध हो जाए ताकि उसकी आवाज उसी सीमा तक रहे जो सीमा सुप्रीम कोर्ट ने तय की है।ऊंची आवाज वाली लाउड स्पीकर मशीन का निर्माण सिर्फ पुलिस-प्रशासन के लिए सीमित संख्या में हो।

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ग्रामीण बाजारों का संपर्क मार्ग

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बिहार में संपर्क मार्ग को लेकर राज्य सरकार का काम सराहनीय है। मुख्य मंत्री ग्राम संपर्क योजना के तहत व्यापक स्तर पर काम हो रहे हैं। मुख्य मार्गों से संपर्क विहीन बसावटों को जोड़ना है।ऐसी सड़कें हर मौसम में काम करंेगी।

इस सिलसिले में एक खास बात पर ध्यान देने की जरुरत है।

विभिन्न गांवों को पास के बाजारों से भी गांवों को जोड़ने की दिशा में प्राथमिकता के आधार पर काम होना चाहिए।

उदाहरणार्थ सारण जिले के दरियापुर अंचल के खानपुर-भरहापुर बाजार की चर्चा प्रासंगिक होगी।

इस बाजार से पश्चिम की ओर सखनौली गांव की ओर जा रही सड़क की हालत वर्षों से खराब है।

  नदी किनारे से गुजर रही इस महत्वपूर्ण सड़क के मजबूतीकरण से बाजार का भी विकास होगा और स्थानीय स्तर पर ही लोगों के रोजगार के अवसर बढ़ जाएंगे।  

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भूली-बिसरी यादें

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यह बात सन 1969 की है।इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में मोरारजी देसाई उप प्रधान मंत्री और वित्त मंत्री थे।

प्रधान मंत्री श्रीमती गांधी ने देसाई को विश्वास में लिए बिना उनसे लेकर खुद वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाल लिया।साथ ही 

प्रधान मंत्री ने मोरारजी देसाई से कहा कि आप उप प्रधान मंत्री बने रहें।

देसाई ने इसे अपनी तौहीन समझी और केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

उससे पहले प्रधान मंत्री ने देसाई को लिखा था कि चूंकि आपकी आर्थिक नीति हमारे विचारों से मेल नहीं खाती,इसलिए क्यों न आपको वित्त मंत्री पद से मुक्त कर दिया जाये ?

इस पत्र का जवाब मोरारजी देसाई लिखवा ही रहे थे कि उसी बीच उन्हें यह जानकारी मिली कि उनसे वित्त मंत्रालय ले लिया गया है।मोरारजी दसाई ने सिर्फ उप प्रधान मंत्री बने रहना ठीक नहीं समझा और मंत्रिमंडल से ही अपना इस्तीफा भेज दिया।

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और अंत में 

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इसी साल 14 फरवरी को बिहार पुलिस के आई.जी. जितेंद्र राणा ने अतिक्रमण के बारे में आयेजित बैठक में कहा था कि किसकी लापरवाही से पटना की सड़कों पर दोबारा अतिक्रमण हो जाता है,उसकी जवाबदेही तय होगी।

तीन महीने के बाद भी अब तक यह पता नहीं चल सका है कि इस मामले में किन-किन लोगों की जवाबदेही तय हुई है। 

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दैनिक प्रभात खबर,पटना में 25 मई 26 को प्रकाशित

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रविवार, 24 मई 2026

 मेरठ के पत्रकार राजेश 

अवस्थी ने की आत्म हत्या

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आर्थिक दुर्दशाग्रस्त पत्रकार की आत्म

हत्या की पृष्ठभूमि में देश के ईमानदार

 पत्रकारों की रक्षा कौन करेगा ? 

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सुरेंद्र किशोर

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मेरी पक्की आय 1231 रुपए मासिक(पी.एफ.पेंशन) है,परिवार का साथ नहीं होता तो क्या मैं भी अवस्थी की राह पर चले जाने को मजबूर हो जाता ?

पता नहीं !

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सुप्रीम कोर्ट के जज की सेवा निवृति की आयु 65 साल है।

आज भारतीयों की जीवन प्रत्याशा करीब 78 साल है।

1947 में जीवन प्रत्याशा 32 साल थी तो सरकारी सेवा से तब लोग 55 साल की उम्र में रिटायर करते

थे।आज उस अनुपात में अवकाश ग्रहण की आयु क्यों नहीं बढ़ रही है ?

मैं सन 2005 में अखबार की सेवा से रिटायर कर गया।पर आज भी मैं उतने ही घंटे काम करता हूं क्योंकि मैं अब भी शारीरिक रूप से सक्षम हूं।

भाजपा ने तो अपने लोगों के लिए अधिकत्तम आयु रखी है--75 साल।

 उसके बाद ही सलाहकार मंडल !!

पर सरकारी सेवक 60 साल की उम्र में ही रिटायर कर दिए जाते हैं।

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पत्रकार अवस्थी ने जब आत्म हत्या की,उस समय  उनकी उम्र 65 साल थी।

यदि वे सुप्रीम कोर्ट के जज होते तो 65 साल तक नौकरी करते।फिर तो उनके सामने आत्म हत्या करने की नौबत ही नहीं आती।क्योंकि तब तक वे अपनी पारिवारिक जिम्मेवारियां पूरी कर चुके होते।

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अवकाशप्राप्त पत्रकारों की पेंशन, प्रोविडेंट फंड से जुड़ी होती है।मुझे भी 1231 रुपए हर माह मिल जाते हैं।

इसमें कोई बढ़ोत्तरी नहीं।मुझे जो राशि सन 2005 में मिलनी शुरू हुई थी,वही राशि आज भी मिलती है।

मैंने 27 साल तक पी.एफ.वाली नौकरी की है।बिहार सरकार की ओर से मिल रही पेंशन के लिए आवदेन पत्र तैयार कर रहा हूं।

 देखना है कि मुझे पेंशन लायक समझा जाता है या नहीं !

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मुझे मालूम था कि पत्रकारों को 58 साल के बाद ‘‘कार सेवक’’ यानी ‘‘स्वयंसेवक’’ यानी ‘‘फ्रीलांसर’’ बनना पड़ेगा।इसीलिए मैंने बहुत पहले से ही अपना संपन्न पुस्तकालय-सह संदर्भालय विकसित करना शुरू कर दिया था।

उसके सहारे मैं फ्रीलांसर व पुस्तक लेखन के काम सफलतापूर्वक कर लेता हूं।पर, एक अखबार से जुड़े दलित-उपेक्षित  प्राणी का नाम है--फ्रीलांसर।

 एक अखबार के प्रबंधन ने बीस साल पहले मेरे प्रत्येक लेख का जो 1000 रुपए तय किया था,वही राशि आज भी मिलती है,बढ़ी नहीं।

अखबारों के बाकी लोगों के वेतन-भत्ते में इस बीच कितनी बढ़ोत्तरी हुई होगी,उसकी कल्पना कर लीजिए।

इसलिए भी मैं गांव की अपनी खेती को विकसित कर रहा हूं ताकि कुछ अतिरिक्त आय हो सके।

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प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव के शासन काल में अनोखी पी.एफ.पेंशन योजना शुरू हुई।इसमें बढ़ोत्तरी का कोई प्रावधान ही नहीं ।न्यूनत्तम हजार रुपए मासिक।

क्या इस पेंशन योजना का नाम किसी ने अब तक गिन्नीज बुक आॅफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में दर्ज 

करवाया या नहीं !

नहीं करवाया तो करवा ही दीजिए। 

प्रधान मंत्री नरसिंह राव पर शेयर दलाल हर्षद मेहता से एक करोड़ रुपए ले लेने का आरोप लगा था।

इससे उनकी काफी बदनामी हुई।

 उनकी बदनामी को प्रचारित करने में मीडिया का भी हाथ था।

क्या इसीलिए श्रमजीवी पत्रकारों के लिए इतनी कम पेंशन राशि राव साहब ने तय करा दी ताकि वे उस अनोखे प्रधान मंत्री को जीवन भर याद रखें ?

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हां,राव साहब ने सांसदों के लिए ,अपवादों को छोड़कर 

उनके प्रत्येक कार्यकाल के लिए एक करोड़ रुपए की अघोषित व्यवस्था जरूर करा दी।--यानी मेरी नाक एक करोड़ के लिए कटी तो तुम्हारी भी उतनी ही राशि के लिए कटे।

नरसिंह राव ने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के सख्त विरोध के बावजूद एक करोड़ रुपए सालाना का सांसद फंड शुरू किया।तब सरकारी कमीशन की राशि 20 प्रतिशत थी।

यानी अपवादों को छोड़कर प्रत्येक सांसद के पूरे कार्यकाल में एक करोड़ रुपए का इंतजाम।पर अब तो वह फंड 5 करोड़ रुपए सालाना का है।उस पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का बयान आ चुका है--कहते हैं कि सारे सांसद कमीशन लेते हैं,मैं भी लेता हूं।हालांकि मेरी खबर है कि कुछ सांसद आज भी नहीं लेते।

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बिहार सरकार ने पत्रकारों के लिए जो पेंशन योजना शुरू की,उसमें कड़ी शत्र्त है--कहीं अन्य से कोई राशि

मिल रही है तो पत्रकार पेंशन नहीं मिलेगी।

यह बंधन  पूर्व विधायक जो पूर्व शिक्षक भी रहे,पर लागू नहीं है।वे दोनांे जगहों से पेंशन लेते हैं।

जो एक दिन के लिए भी विधायक बना,उसे भी पूरी पेंशन मिलती है।पर 19 साल तक पत्रकार रहने के बावजूद बिहार सरकार उसे पेंशन नहीं देगी। उस 20 साल पूरा करना पड़ेगा।

मेरे एक मित्र पत्रकार को पत्रकार पेंशन इसलिए नहीं मिली क्योंकि उन्हें जेपी सेनानी पेंशन मिलती है।

2005 की फरवरी में बिहार विधान सभा का चुनाव हुआ था।

वह विधान सभा विधिवत गठित होने से पहले ही भंग हो गई।पर उसके पूर्व सदस्य भी पेंशन पाते हैं।

यह सब समानता के अधिकार के संवैधानिक प्रावधान के खिलाफ है।

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राजेश अवस्थी की आत्म हत्या के बाद मैं यह सब लिखने को बाध्य हो गया।

  इससे नाराज होकर भले बिहार सरकार पेंशन वाले मेरे आवदेन पत्र को खारिज कर दे।

मुझे मंजूर होगा,पर राजेश अवस्थी व उनके आश्रितांे की पीड़ा मुझ पर फिलहाल हावी है।मैं अवस्थी में खुद को देखता हूं।

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24 मई 26


  


  

 


मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

    सुनील दत्त और नाना पाटेकर

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फिल्मी कलाकारों में कुल मिलाकर मुझे पहले सुनील दत्त श्रेष्ठ लगते थे।

     अब कुल मिलाकर नाना पाटेकर श्रेष्ठ लगते हैं।

ऐसा क्यों ?

मैं खुद इसका कारण नहीं बता सकता।

आप बता सकते हों तो मेरी जरा मदद कीजिए।

   ---सुरेंद्र किशोर

   23 अप्रैल 26

 


गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

 संदर्भ --निशांत कुमार पर नई जिम्मेदारी

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सुरेंद्र किशोर

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कहावत  है --‘‘आॅनेस्टि इज द बेस्ट पाॅलिसी’’

यह नहीं कहा गया है कि ’’आॅनेस्टि इज द बेस्ट वच्र्यू (गुण)।’’

आॅनेस्टि अपने साथ व्यक्ति में स्वयंमेव बहुत से गुण ला देती है।

क्या हुआ जो निशांत कुमार को शासन का अनुभव नहीं है।

उनके पास कठोर ईमानदारी की विरल पूंजी जो है।

वही पूंजी उन्हें सफल बनाएगी।

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जनशक्ति जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेज प्रताप यादव ने कहा है कि ‘‘निशांत कुमार को राजनीतिक अनुभव नहीं।उन्हें दांवपेच नहीं आता।’’

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इंदिरा गांधी सन 1966 में जब प्रधान मंत्री बनी थीं तो प्रतिपक्ष ने उन्हें

 ‘‘गूंगी गुड़िया’’ कहा था।

 उन्हंे तब इतना भी नहीं मालूम था कि यदि स्पीकर कुछ बोल रहे हों तो प्रधान मंत्री भी सदन नहीं छोड़ सकता।प्रधान मंत्री इंदिरा जी ने सदन छोड़ दिया था तो उन्हें स्पीकर से उन्हें माफी मांगनी पड़ी थी।यह 1966 की ही बात है। 

पर,बाद में इंदिरा जी ने अपने ढंग से राजपाट चलाया ही।यदि इंदिरा जी में  कठोर ईमानदारी होती तो वह और अधिक सफल होतीं।

किसी ने किसी संदर्भ में उनसे एक बार कहा था कि आपके पिता जी ईमानदार थे।

इंदिरा जी ने जवाब दिया--‘‘मेरे पिता जी संत थे।मैं पाॅलिटिशियन हूं।’’

दूसरी ओर, सब जानते हैं कि निशांत कुमार में यह खास व विरल गुण है --यानी  अपने पिता की तरह ही ईमानदारी और शालीनता।

   जिस व्यक्ति में इतनी ईमानदारी है कि पिता के दशकों तक शीर्ष सत्तासीन रहने के बावजूद इस पुत्र निशांत पर कोई छोटा दाग भी नहीं लगा,वह व्यक्ति जिस किसी पद पर कभी जाएगा,अपने आसपास ईमानदार लोगों को ही रखेगा।

उनकी और उन सबकी ईमानदारी ही निशांत को सफलता दिलाएगी।क्योंकि आॅनेस्टि इज द बेस्ट पाॅलिसी।

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मैं लंबे समय तक शीर्ष पर सत्तासीन रहे देश के किसी अन्य ऐसे नेता 

को नहीं जानता जिस मामले में 

‘‘सत्ताधारी  पिता’’ भी ईमानदार हो और ‘‘नेता पुत्र’’ भी ईमानदार हो।

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 8 अप्रैल 26


रविवार, 5 अप्रैल 2026

 प्रो.(डा.)एस.चद्रा --एक डाॅक्टर लीक से हटकर

एम.बी.बी.एस.करने के बाद होमियोपैथिक प्रैक्टिस

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सुरेन्द्र किशोर

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बहुत पहले की बात है।

मैंने पहली बार सुना कि सुमन चन्द्रा ने पहले एम.बी.बी.एस.पास किया।उसके बाद होमियोपैथ में उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण की।

लंदन में भी पढ़े।

 लंबे समय से पटना में होमियोपैथ चिकित्सा की प्रैक्टिस करते हैं।

उनसे मिलने की इच्छा थी ही।

    मशहूर पत्रकार स्वयं प्रकाश जी ने मुझे डा.चंन्द्रा से मिलवाया।

चन्द्रा साहब की जीवन संगिनी डा.अंजू चन्द्रा भी उनके साथ ही प्रैक्टिस करती हैं।

  डा.एस.चन्द्रा साहब आज सफलत्तम चिकित्सकों में एक हैं।उनके यहां भारी भीड़ रहती है।रहे भी क्यों नहीं !

मैं भी जिस किसी मर्ज के इलाज के लिए जब कभी उनसे मिला,मुझे उनके इलाज से उम्मीद से बेहतर मुझे राहत मिली ।

  डाॅक्टर, धरती के भगवान कहे जाते रहे हैं।

इस मामले में इधर स्थिति थोड़ी बदली जरूर है।

फिर भी जिन अनेक डाॅक्टरों को अब भी आप धरती का भगवान कह सकते हैं,उनमें डा.चन्द्रा प्रमुख हैं।मेरे लिए तो डा.चन्द्रा धरती के भगवान साबित भी हुए हैं। 

   ऐसे ‘धरती के भगवान’ यानी चन्द्रा दंपति के साथ मेरी और मेरी पत्नी रीता का ग्रूप फोटो हमारे लिए सौभाग्य की बात है।

(चित्र में डा.एस.चन्द्रा,सुरेन्द्र किशोर,रीता सिंह और डा.अंजू चन्द्रा)

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अगली बार के लिए उम्मीदवार न बनाये जाने के 

बावजूद हरिवंश जी की जुबान पर नीतीश कुमार 

के लिए अब भी प्रशंसा के ही शब्द आपको मिलेंगे।

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मौजूदा राजनीति में यह विरल है।

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सुरेंद्र किशोर

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राज्य सभा या विधान परिषद के टिकट से वंचित हो जाने या अगली बार फिर से नामांकित न होने पर अधिकतर नेताओं को दलीय सुप्रीमो के खिलाफ कटु शब्दों का इस्तेमाल करते और दल से नाता तोड़ते हुए दशकों से मैंने अनेक उदाहरण देखे-सुने हंै।

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चूंकि हरिवंश जी का मित्र होने का मुझे गौरव हासिल है,इसलिए मैं कुछ वैसी बातें भी जानता हूं जो सार्वजनिक नहीं हैं।

हरिवंश जी इस बात से काफी एहसानमंद रहे हैं कि नीतीश जी ने उन्हें बिन मांगे दो -दो बार राज्य सभा का सदस्य बनवाया।

हां, सन 2022 में हरिवंश जी काफी धर्म संकट में थे जब नीतीश जी राजग छोड़कर कांग्रेसनीत गठबंधन मेें शामिल हो गये थे।धर्म संकट यह था कि खुद हरिवंश जी को राज्य सभा के उप सभापति पद को छोड़ देना चाहिए या नहीं।

संभवतः राजनीतिक दूर दृष्टि वाले उनके किसी मित्र ने हरिवंश जी को बताया होगा कि खुद नीतीश जी कांग्रेस गठबंधन में अधिक दिनों तक नहीं टिकेंगे।इसलिए आपको उप सभापति का पद छोड़ने की जरूरत नहीं है। 

वही हुआ भी।

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कुछ संस्कारी लोग किसी का उपकार कभी नहीं भूलते।किंतु आज का यह जमाना ऐसा है कि मत पूछिए।

एक नमूना पेश है--

बिहार के भोजपुर इलाके के एक पूर्व एम.पी.से पूछा गया कि आप इस बार चुनाव कैसे हार गये ?

उनका जवाब था--

एक बड़े गांव के प्रभावशाली परिवार के चार बेरोजगार लड़कों को मैंने बारी -बारी से नौकरी दिलवाई।जब पांचवंे को नहीं दिलवाई तो वह परिवार मेरे खिलाफ हो गया और पूरे गांव का वोट हमारे विरोधी को दिलवा दिया।

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3 अप्रैल 26

 


मंगलवार, 24 मार्च 2026

 केरल से लेकर बिहार तक देश की शिक्षा-परीक्षा पर

लंबा प्रश्न चिन्ह खड़ा है !

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सुरेंद्र किशोर

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पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं।

जो राज्य सरकार परीक्षा में कदाचार रोकती है,वह अगला चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हो जाती है।

इसलिए सत्ता कौन गंवाना चाहेगा ??

फिर उपाय क्या है ?

समझदार लोग चिंता करें और चिंतन भी।

कोई रास्ता निकालें !

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 सन 1992 में कल्याण सिंह सरकार ने नकल विरोधी कानून बनाया।

मुलायम सिंह की सरकार ने 1994 में उस कानून को रद कर दिया।

दरअसल यू.पी.बोर्ड की परीक्षा में कदाचार पूरी तरह रोक देने के कारण कल्याण सिंह की सरकार 1993 के चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई।

1992 में बाबरी ढांचा गिराने के कारण उत्पन्न भावना को भंजाने का चुनावी लाभ तक भाजपा को नहीं मिल सका था।

(राम मंदिर से अधिक महत्वपूर्ण साबित हुई थी परीक्षा में कदाचार की छूट)

मुलायम सिंह यादव कदाचारी विद्यार्थियों व उनके अभिभावकों के ‘हीरो’ बन गए थे।

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   यानी,मुझे यह लगने लगा है कि  चुनाव लड़ने वाली कोई भी सरकार आम परीक्षाओं में नकल नहीं रोक सकती।

उसके लिए शायद किसी तानाशाह शासक की जरूरत पड़ेगी।

या फिर कोई सरकार चुनाव जीतने के प्रथम साल से ही शिक्षा-परीक्षा माफियाओं पर नकल कसना शुरू कर दे तो शायद कुछ  बात बने।

 कम से कम तकनीकी संस्थानों की हालत तो सुधरे !

  आज उद्योग जगत कहता है कि सिर्फ 27 प्रतिशत इंजीनियर ही ऐसे हैं जिन्हें नौकरी पर रखा जा सकता है।

 हमारे स्वास्थ्य की देखरेख करने वाले ‘‘धरती के भगवान’’ तो ठीकठाक पढ़- लिखकर निकलें।

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जब-जब शिक्षा -परीक्षा के ध्वस्त होने की बात होती है,तब -तब कई लोग अपनी -अपनी राजनीतिक ‘सुविधा’ के अनुसार अपना ‘टारगेट’ तय करके आरोप का गोला दागने लगते हैं।

पर 1963 से इस संबंध में मैंने जो कुछ अपनी  आंखों से देखा है,उसे संक्षेप में शेयर करता हूं।

1.-राजनीति और प्रशासन में गिरावट के अनुपात में शिक्षा में भी गिरावट होनी ही थी।

हुई भी।

2.-पहले परीक्षाओं में ‘सामंतवाद’ था।सन 1967 से उसमें ‘समाजवाद’ आ गया।

3.-इमरजेंसी में माक्र्स के आधार पर बिहार में लाखों सरकारी शिक्षक बहाल हुए।तब की सरकार ने जेपी आंदोलन को कमजोर करने के लिए यह काम किया था।

4.-सरकारी नौकरियां देने के लिए कत्र्तव्यनिष्ठ उच्च पदस्थ अफसरों व सेना की देखरेख में उम्मीदवारों की कदाचारमुक्त प्रतियोगी परीक्षाएं हों।या फिर उच्च न्यायालयों और जिला जजों की देखरेख में परीक्षाएं हों।जनहित याचिका के बाद बिहार में 1996 में वैसा हुआ था।नतीजतन बिहार इंटर बोर्ड परीक्षा में 85 प्रतिशत परीक्षार्थी फेल कर गये थे।मैट्रिक परीक्षा का रिजल्ट भी ऐसा ही रहा था।

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छोटी -छोटी टुकड़ियों में सालों भर बड़े हाॅल में ऐसी परीक्षाएं होती रहें।

तभी सिर्फ योग्य लोग ही सेवाओं में आ सकेंगे।

अब भी योग्य लोग सेवा में हैं,पर काफी कम संख्या में।

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1963 में मैं मैट्रिक की परीक्षा दे रहा था।

जिला स्कूल में केंद्र था।

उस जिले के सबसे अधिक प्रभावशाली सत्ताधारी नेता के परिवार के एक सदस्य के लिए चोरी की छूट थी।

केंद्र में किसी अन्य के लिए वह ‘सुविधा’ उपलब्ध नहीं थी।

   मैं बी.एससी.पार्ट वन की परीक्षा दे रहा था।

संयोग से उस काॅलेज के प्राचार्य के पुत्र की सीट मेरे ही हाॅल में पड़ी थी।

नतीजतन पूरे हाॅल को चोरी की छूट थी।

उसी केंद्र में किसी अन्य हाॅल में कोई छूट नहीं थी।

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उन दिनों मेडिकल - इंजीनियरिंग काॅलेजों में माक्र्स के आधार पर दाखिला हो जाता था।

प्रैक्टिकल विषयों में कुल 20 में उन्नीस अंक मिल जाने पर कम तेज उम्मीदवार भी डाक्टर या इंजीनियर आसानी से बन जाते थे।

  संयोग से मेरा रूम मेट ही इन 250 रुपयों को इधर से उधर करता था।

न जाने कितनों को उसने डाक्टर-इंजीनियर बनवा दिया।

एक दिन मुझसे उसने पूछा, 

‘का हो सुरिंदर,तुमको भी नंबर चाहिए।

तुमको कुछ कम ही पैसे लगेंगे।’’दो सौ में वह काम हो रहा था।

मैंने कहा कि मुझे कोई नौकरी नहीं करनी है।

मेरा वह रूम मेट खुद हाई स्कूल का शिक्षक बना।

ऐसे गोरखधंघे के कारण ही माक्र्स के आधार पर दाखिला बाद में बंद हो गया।

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  1967 के चुनाव के बाद परीक्षाओं में धुंआधार चोरी शुरू हो गई।

कहा भी जाने लगा कि ‘चोरी में समाजवाद’ आ गया।

महामाया सरकार ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की।

छात्रगण महामाया बाबू के ‘जिगर के टुकड़े’ जो थे ! 

के.बी.सहाय की सरकार को चुनाव में हराने में छात्रों की बड़ी भूमिका थी।

1967 के आम चुनाव से पहले बड़ा छात्र और जन आंदोलन हुआ था।

छात्रों पर भी जमकर पुलिस दमन हुआ था।

मैं भी तब एक छात्र कार्यकत्र्ता था।

मैंने खुद परीक्षा छोड़ दी थी क्योंकि आंदोलन के कारण मेरी तैयारी नहीं हो पाई थी।

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1972 में केदार पांडेय की सरकार ने नागमणि और आभाष चटर्जी जैसे कत्र्तव्यनिष्ठ आई.ए.एस.अफसरों की मदद से परीक्षा में चोरी को बिलकुल समाप्त करवा दिया।

  पर सवाल है कि अगले ही साल से ही फिर चोरी किसने होने दी ?

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1996 में पटना हाईकोर्ट के सख्त आदेश और जिला जजों की निगरानी में मैट्रिक व इंटर परीक्षाआंे  में कदाचार पूरी तरह बंद कर दिया गया।शिक्षा मंत्री जयप्रकाश नारायण यादव ने प्रेस को बताया कि ‘‘शिक्षा माफिया को समाप्त कर दिया गया।’’

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पर, अगले ही साल से कदाचार फिर क्यों शुरू करवा दिया गया ?

किसने शुरू करवाया ?शिक्षा माफिया के दबाव में तब की लालू सरकार ने करवाया।क्योंकि छात्र नहीं मिलने के कारण अधिकतर निजी काॅलेज बंद होने लगे थे।

क्या कदाचार की इस महामारी के लिए आप किसी एक दल एक सरकार या एक नेता या फिर किसी एक समूह को जिम्मेवार मान कर खुश हो जाना चाहते हैं ?

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 याद रहे कि सन 1996 में बिहार इंटर विज्ञान परीक्षा में 85 प्रतिशत परीक्षार्थी फेल कर गये थे।

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सन 2026 में बिहार इंटर विज्ञान परीक्षा में 96 प्रतिशत परीक्षार्थी पास कर गये।यह चमत्कार कैसे हुआ ?

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  दिल्ली विश्वविद्यालय में सन 2022 से पहले प्राप्तांकों के आधार पर नामांकन होते थे।

यानी, राज्यों के स्कूली बोर्ड्स की परीक्षाओं में मिले अंकों के आधार पर।

  यह देखा गया कि केरल तथा कुछ दूसरे राज्यों की बोर्ड परीक्षाओं में असामान्य ढंग से 100 प्रतिशत अंक मिल रहे हैं ताकि दिल्ली विश्वविद्यालयों के विभिन्न प्रतिष्ठित काॅलेजों में उनका दाखिला हो जाये।

उसके बाद सन 2022 से दाखिला के लिए टेस्ट परीक्षा होने लगी।

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   टेस्ट परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले केरल के 1672 छात्रों को दिल्ली विश्व विद्यालय में दाखिला मिल गया  था।

प्रतियोगी परीक्षा के बाद केरल से वह संख्या घटकर 350 रह गयी।

  दूसरी ओर, जहां पहले यानी 2021 में बिहार के 556 विद्यार्थियों को दाखिला मिला था ,वहीं टेस्ट शुरू होने के बाद 1280 बिहारी विद्यार्थी 2022 में दिल्ली यूनिवर्सिटी .में दाखिला के योग्य पाए गए।

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उधर केरल में सन 2002 में ही शिक्षा का क्या हाल हो चुका था,उसके बारे में टाइम्स आॅफ इंडिया ने एक खबर दी थी। 

14 नवंबर 2002 को छपी खबर चैंकानेे वाली थी।

चूंकि खबर केरल के बारे थी,इसलिए और भी चैंकाती थीं।उस राज्य के बारे में यह कहा जाता रहा है कि वहां सर्वाधिक साक्षरता है।माना जा रहा था कि लोग पूर्ण साक्षर हंै तो सुशिक्षित और कुशल भी होंगे।पर ,सब सुशिक्षित व कुशल वहां भी नहीं हैं।कुछ जरूर होंगे जैसे अन्य राज्यों में भी होते हैं।

  केरल के सार्वजनिक क्षेत्र के एक संस्थान ने क्लर्क आदि पद पर बहाली के लिए 2002 में विज्ञापन निकाला।करीब 13500 आवेदन आये।

उनमें से 5 हजार उम्मीदवार हाईली क्वालिफायड थे।उनमें 20 इंजीनियर और दो डाक्टर्स भी थे।

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वैसे शिक्षा-परीक्षा को लेकर बिहार की आदर्श स्थिति नहीं है।बहुत सुधार की जरूरत है।

किंतु केरल के बारे में यह सब जान-सुनकर किसी को सिर्फ बिहार को ‘‘सिंगल आउट’’ करने का नैतिक हक नहीं है। 

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और अंत में

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1963 में मैंने साइंस विषयों के साथ मैट्रिक फस्र्ट डिविजन से पास किया था।

आसपास के गांव के कई लोग मुझे देखने आये थे।

2026 में जो विद्यार्थी फेल कर गए हैं ,उन्हें देखने कुछ लोग गए होंगे !

कैसा परीक्षार्थी निकला जो बहती गंगा में भी हाथ

 नहीं धो पाया !

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24 मार्च 26 





सोमवार, 9 मार्च 2026

    पद्म सम्मान लेने मैं राष्ट्रपति भवन इसलिए नहीं गया

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   सुरेंद्र किशोर

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कई लोग यह सवाल पूछते रहे हैं कि मैं पद्म सम्मान लेने राष्ट्रपति भवन मैं क्यों नहीं गया था ?

वह अकारण नहीं था।उसका कारण मैं आपको पहली बार बताता हूं।

पद्म सम्मान की स्थापना के बाद पहली बार सन 2024 में बिहार में कार्यरत किसी बिहारी पत्रकार को,यानी मुझे यह सम्मान मिला-वह भी बिन मांगे।

मेेरी इसकी न तो कभी इच्छा रही और न ही मैंने इसके लिए किसी से याचना की।

मैंने अपने परिवार की खुशी के लिए इसे स्वीकार भी कर लिया।

मुझे मिला यह सम्मान बिहार की पत्रकारिता का भी सम्मान था।

एक ऐसे व्यक्ति को मिला जो अपने परिवार का पहला मैट्रिकुलेट हैं।किसान परिवार से आता है।गांव में पला-बढ़ा।घर में राम चरित मानस-आल्हा उदल पर पुस्तक  के अलावा पढ़ने के लिए भी कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं थी।

,न्यूज सेंस भी यही कहता है कि बिहार की मुख्य धारा की पत्रकारिता की ओर से मुझसे पूछा जाता कि यह उपलब्धि आपने कैसे हासिल की ?

मैं कुछ बताता ताकि पत्रकारिता की अगली पीढ़ी को प्रेरणा मिले और उन्हें भी कभी पद्म सम्मान मिले।

पर, देखा कि मुख्य धारा की पत्रकारिता की इस बात में कोई रूचि नहीं थी यानी न्यूज सेंस पर ‘‘भावना’’ हावी हो गयी थी।

कुछ उल्टी-सीधी बातें भी सुनीं।इसलिए मैंने सोचा कि राष्ट्रपति भवन जाकर किसी की ‘‘भावना’’ को और अधिक आहत क्यों करूं ? 


शुक्रवार, 6 मार्च 2026

  बिहार का सी.एम.कैसा हो  ???

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बिहार का सी.एम.कैसा हो ?

योगी आदित्य नाथ जैसा हो।

चाहे जिस किसी ‘सामाजिक समूह’ से आता हो !

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जिससे भी बात हो रही है,उसकी यही आवाज है।

दरअसल बिहार और यू.पी की समस्याएं 

लगभग समान रही हैं।भीषण और जटिल हैं।

जिन समस्याओं से योगी जूझ रहे हैं,बिहार के नये

 सी.एम. में भी उन समस्याओं से उसी तरह जूझने का यदि 

जज्बा हो तो नेपाल की सीमा पर बसे बिहार की 

रक्षा-सुरक्षा बेहतर ढंग से हो सकती है।

शांति रहेगी तो देश-विदेश से बिहार में और भी निवेश आएगा।

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6 मार्च 26  


गुरुवार, 5 मार्च 2026

 मुख्य मंत्री नीतीश कुमार को 

उनके जन्म दिन पर हार्दिक बधाई !

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सुरेंद्र किशोर

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सत्तर के दशक में नीतीश कुमार ने मुझसे कहा था कि

‘‘मैं एक दिन मुख्य मंत्री जरूर बनूंगा।

मुख्य मंत्री बनकर अच्छा काम करूंगा।’’

उस समय तक वे 1977 का अपना पहला विधान 

सभा चुनाव हार चुके थे।

मैं तब ‘आज’ अखबार में काम कर रहा था।

हमलोग कभी -कभी काॅफी हाउस में मिलते थे।

तब मैं उनके इस आत्म विश्वास पर कुछ अचम्भित और कुछ सशंकित था।

लगा था कि यह तो इनका बड़बोलापन है।

लेकिन नीतीश सही साबित हुए और मैं गलत।

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कहा तो था कि ‘‘अच्छा काम करूंगा’’, किंतु मुख्य मंत्री बन कर, कर दिए ‘‘बहुत सारे अच्छे काम।’’

(मैंने 1967 से अब तक बिहार के सारे मुख्य मंत्रियों को काम करते देखा है।इसलिए यह बात कहने की स्थिति में हूं।)

इसलिए भी नीतीश को डबल बधाई।

पर ,नीतीश कुमार का एक भटकाव भी रहा,हालांकि एक ही भटकाव।

प्रधान मंत्री बनने के लोभ में उन्होंने 

 राजग को दो बार छोड़ा।उन दिनों मुझसे पूछते तो मैं नीतीश जी को बताता कि कांग्र्रेस को सत्ता यदि मिलेगी भी तो वह आपको पी.एम.नहीं बनाएगी।वैसे तो मिलेगी नहीं क्योंकि देश अभी मोदी के साथ है।

आप तो किसी को ‘‘न तो बचाते हंै और न फंसाते हंै।’’

कांग्रेस को तो एक और मनमोहन सिंह चाहिए होगा।

  मेरे मित्र उदयकांत मिश्र ने नीतीश कुमार की जीवनी लिखी है।बहुत अच्छा लिखा है,उसमें सारी बातेें आ गई हैं।

 पर, एक खास कोण से नीतीश कुमार के बारे में अब भी लिखने की जरूरत है ताकि राजनीति में जो कुछ थोड़े से आदर्शवादी लोग मौजूद हैं या आना चाहते हैं, उन्हें प्रेरणा मिले।

वह कोण यह है कि इस ‘‘बीहड़’’ प्रदेश बिहार में ‘‘बहुत अच्छा काम’’ करने के सिलसिले में नीतीश कुमार को किन -किन परेशानियों-कठिनाइयों-बाधाओं-असुविधाओं आदि का सामना करना पड़ा और उन पर उन्होंने कैसे काबू पाया।क्या -क्या न कर पाने का अफसोस रहा ?

उस क्रम में कितनों की नाराजगी झेली।कितने खुश हुए।यदि नीतीश यह सब बातें बताना चाहंे तो ही।

 जाहिर हैं कि इस बारे में तभी कोई बात करना चाहेगा जब वह सब आॅफ द रिकाॅर्ड हो।वह भी तभी हो सकेगा जब शासकीय जिम्मेदारी के दौर मुक्ति पा ले। 

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नीतीश कुमार से मेरा परिचय उस समय से हैं जब वे पटना इंजीनियरिंग काॅलेज के प्रथम वर्ष के छात्र थे।तब मैं लेहियावादी पार्टी का एक सामान्य पर सिरियस कार्यकर्ता था।नीतीश जी पटना के मुसल्लहपुर हाट के जिस कृष्णा लाॅज में रहते थे,उनके कमरे के बगल वाले कमरे में मेरा छोटा भाई नागेंद्र रहता था ।वह पटना लाॅ कालेज में छात्र था।

कहीं से पटना आने पर मैं नागेंद्र के कमरे में रुकता था।तब देखा था कि लोहिया और लोहियावादी राजनीति में तब से ही नीतीश जी गहरी रूचि थी।

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नीतीश जी को इसलिए भी बधाई क्योंकि वे राजनीति व प्रशासन में ‘‘भ्रष्टाचार की आंधी’’ और ‘‘परिवारवाद के तूफान’’ के बीच भी अविचलित होकर इन दोनों बुराइयों से कोसों दूर रहे।यह विरल है। 

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आम तौर पर पत्रकार किसी नेता खासकर सत्ताधारी नेता को इस तरह बधाई नहीं देता।पर नीतीश कुमार ने बिहार के लिए विशेष काम किया और अपने राजनीतिक जीवन के प्रारंभिक वर्षों में आर्थिक परेशानियां उठाने के बावजूद राजनीति में वे डटे रहे,इसलिए भी बधाई।

सक्रिय राजनीति में तो मैं भी करीब दस साल (1967-76) तक  था।पर उन परेशानियों को मैं नहीं झेल सका।सक्रिय पूर्णकालिक राजनीति से पलायन कर गया। पत्रकारिता में आ पहुंचा।यहां कम से कम पहले ही दिन से दोनों शाम भोजन लायक पैसे का इंतजाम हो गया।राजनीति में तो वह भी सुविधा नहीं थी।कल्पना कर सकता हूं कि नीतीश जी ने अपने वैसे दिन कैसे काटे होेंगे !

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2 मार्च 26 

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फेसबुक वाॅल से


रविवार, 1 मार्च 2026

 प्रखर श्रीवास्तव की पुस्तक ‘‘हे राम’’ के बारे में 

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हमें किसी नेता,दल और विचारधारा को खुले 

मन-मिजाज से देखना -पढ़ना चाहिए।

सारे तथ्य हमारे सामने हों तो हमें कोई फैसला करने में 

सुविधा होती है।

क्योंकि न तो कोई व्यक्ति पूर्ण है और न कोई संस्था 

या विचारधारा-- न मैं, न आप और न वह।

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मेरी धारणा यह बनी है कि अपवादों को छोड़कर हमारे अधिकतर 

इतिहासकारों ने जितना जाहिर किया है,उससे अधिक छिपाया है।

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1--पहले मैं कहा करता था कि इस देश के नेताओं 

के चाल,चरित्र और चिंतन को बाहर-भीतर से जानना हो तो एम.ओ.मथाई(जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव)की दोनों किताबें पढ़िए।

2--बिहार के नेताओं को,जो स्वतंत्रता सेनानी भी थे, जानना हो तो अय्यर कमीशन की रपट पढ़िए।

3.--अब मैं एक और किताब उसमें जोड़ता हूं।

नई पीढ़ी को चाहिए कि वह प्रखर श्रीवास्तव की हाल में आई पुस्तक

 ‘हे राम’ जरूर पढ़े।

  प्रखर श्रीवास्तव ने अद्भुत किताब लिखी है।पुस्तक हो तो ऐसी !

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----सुरेंद्र किशोर

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1 मार्च 26

     


रविवार, 22 फ़रवरी 2026

   मैं भारतीय पहले, पत्रकार बाद में 

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सुरेंद्र किशोर

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मैं पत्रकार हूं।

लेखक हूं।

किसान भी हूं।

गृहस्थ हूं।

पर,सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं इस देश का

नागरिक हूं।

एक नागरिक के रूप में मैं चाहता हूं कि यह देश 

लोकतांत्रिक बना रहे।पर दूसरी ओर देश-विदेश की हिंसक-अंिहंसक शक्तियां इसे इस्लामिक देश बनाने के लिए जी-जान से लगी हुई हैं।

कुछ लोग वोट के लिए और अन्य लोग ‘गजवा ए हिन्द’ के लिए

अपनी- अपनी शैली में प्रयत्नशील हैं।

कई जगह दोनों तत्व जाने-अनजाने एक दूसरे के मददगार

 बन रहे हैं।

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मध्य युग की वापसी की कोशिश को रोकने का मेरा प्रयास है।भले यह

गिलहरी प्रयास है,पर जारी रहेगा।

ताकि, मेरे वंशज को भी सनातन धर्म-संस्कृति का शांतिपूर्वक पालन करने की अनंत काल तक सुविधा उपलब्ध रहे।

इस क्रम में बाकी बातें मेरे लिए कोई महत्वहीन हैं।

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इसी बात को ध्यान में रखते हुए कोई व्यक्ति मेरे लेख या पोस्ट को पढ़े।

मुझसे जो बिलकुल सहमत नहीं हैं,उन्हें मेरा फेसबुक फें्रड बने रहने का कोई औचित्य नहीं है।

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 22 फरवरी 26


 कितने दूरदर्शी थे अटल जी !

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वाजपेयी जी यह जानते थे कि भारत की एक पार्टी 

को बर्बाद करने की क्षमता किस व्यक्ति में है !

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सुरेंद्र किशोर

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   प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जान गए थे कि अमेरिका में गिरफ्तार इसी व्यक्ति में अपनी ही पार्टी को नष्ट करने की पूरी क्षमता है।

वह क्षमता अकेली मेरी पार्टी में नहीं है।भाजपा को परोक्ष मदद चाहिए होगी !

  इसलिए उस व्यक्ति को तब के प्रधान मंत्री वाजपेयी ने अमरीकी सरकार पर अपने प्रभाव का उपयोग करके साफ रिहा करवा दिया।यानी गिरफ्तारी से संबंधित कागज-पत्र भी गायब करवा दिया।हालांकि वहां के अखबार में गिरफ्तारी की यह खबर छपी थी।

अटल जी का पूर्वानुमान सही साबित हो रहा है।

यहां अपनी पार्टी को बर्बाद करने का वह काम वे तेजी से कर रहे हैं।

सन 2015 में डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सार्वजनिक रूप से उस ‘‘क्षमतावान’’ व्यक्ति का नाम भी बताया था।

डा.स्वामी का वह बयान,जिसमंे नाम छपा था, 20 जून 2015 के दैनिक भास्कर में छपा था।

उस अखबार की कटिंग मेरे पास है।

पर,मैं नाम नहीं बताऊंगा।

अब आप कल्पना कीजिए कितने दूरदर्शी 

थे अटल जी !!!

अटल जी की मदद से व्यक्ति रिहा नहीं हुआ होता तो उसे अमेरिका के कानून के अनुसार वहां 25 साल की सजा हो गई होती।

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22 फरवरी 26


 देश के बड़े पत्रकार और चिंतक दिलीप मंडल के अनुसार,

‘‘संसद की कार्यवाही में दर्ज है और कोई भी इसे चेक कर सकता है कि इंदिरा गांधी सरकार में कानून और वक्फ मंत्री रहे मोहम्मद यूनुस सलीम ने राज्य सभा में गर्व के साथ विस्तार से बताया था--‘‘हां, न्यायप्रिय बादशाह औरंगजेब ने काशी में विश्वनाथ मंदिर को तोड़ा था।’’

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इतिहासकार इरफान हबीब ने भी कहा है कि ‘‘औरंगजेब ने काशी और मथुरा में मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था।’’

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पर,इसके बावजूद मुस्लिम वोटलोलुप राजनीतिक दल,मुस्लिम धार्मिक नेता,वामपंथी इतिहासकार और पथ भटके पत्रकार-बुद्धिजीवी  इन मामलों में लगातार झूठ क्यों बोलते हैं ?

 उनके झूठ बोलने के कारण ही हिन्दू वोट भाजपा कीे ओर जाता रहा है।

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सन 2002 में गोधरा में जेहादियों ने 59 कार सेवकों को जिन्दा जला दिया था।कितने तथाकथित सेक्युलर व भाजपा विरोधी दलों ने उस मानव दहन कांड की सार्वजनिक तौर पर निन्दा की ?

आज भी कितने वैसे लोग बंगाल में प्रस्तावित बाबरी मस्जिद का विरोध कर रहे हैं ?

इसके बावजूद कोई चाहेगा कि भाजपा न बढ़े तो हिन्दू बहुल देश में यह कैसे हो सकता है ?

जबकि भारत के भीतर भी तरह तरह के ‘जेहादी हिंसा’ में इन दिनों बड़ी संख्या में देशी-विदेशी मुस्लिम लगे हुए हैं।ऐसे जेहादियों के खिलाफ कितने भाजपा विरोधी नेताओं के बयान आते हैं ?

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बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

 पहले से कुछ हिन्दी अखबार पटना के पास के जेपी गंगा पथ को मरीन ड्राइव लिखते रहे हैं।

अब तो पटना के अंग्रेजी अखबार भी जेपी गंगा पथ को मरीन ड्राइव लिखने लगे हैं।

क्या बिहार सरकार ने जेपी गंगा पथ का नाम बदल कर मरीन ड्राइव कर दिया है ?

क्योंकि मैं यह बात नहीं मान सकता कि अंग्रेजी के पत्रकारों को भी अंग्रेजी मरीन शब्द का हिन्दी अर्थ नहीं मालूम।

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अब क्या पटना के बिस्कोमान टावर का नाम हम अखबार में किसी दिन एफिल टावर पढंेगे ?

 एफिल टावर पेरिस में है।मरीन ड्राइव बंबई में है--जाहिर है समुद्र किनारे।


मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

    20 लाख किताबों वाली निजी लाइ्रब्रेरी के मालिक 

   को इस साल का पद्म श्री सम्मान

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बेंगलुरु से प्रभाकर मणि तिवारी की एक बहुत ही अच्छी,प्रेरणादायक खबर 

दैनिक भास्कर में छपी है।

खबर के शीर्षक और उप शीर्षक से ही पूरी कहानी आप जान जाएंगे।

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उपलब्धि - कर्नाटका के एन.के.गौड़ा को अनूठे काम के लिए 

(सन 2026 का ) पद्म श्री सम्मान दिया जाएगा

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80 प्रतिशत वेतन किताबों पर खर्च कर बनाई देश की सबसे बड़ी 

निजी लाइब्रेरी 

घर में 20 लाख किताबें , फर्श पर सोते हैं।

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लाइब्रेरी में कुछ किताबें दो से तीन सौ साल पुरानी

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यहां पुराण,उपनिषदों और कुरान,दो से तीन सौ साल पुरानी इतिहास की किताबों के 

अलावा रामायण और महाभारत के तीन -तीन हजार संस्करण हंै---आदि आदि

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मेरे पास भी पटना में एक संपन्न निजी लाइब्रेरी है।

पर एन.के गौड़ा के मुकाबले यह कुछ भी नहीं।

उनके पास तो बहुमूल्य हीरा है।

पर, मैं अपने अनुभवों के आधार पर यह कल्पना कर सकता हूं कि किसी संपन्न लाइब्रेरी 

का रख-रखाब कितना

 कठिन श्रम,एकाग्रता और साधन खोजता है।

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 मेरे निजी पुस्तकालय सह संदर्भालय में अब करीब तीन दर्जन आलमारियां हैं।पर,मेरी लाइब्रेरी अनमोल 

पुस्तक आधारित नहीं बल्कि साठ-सत्तर-अस्सी के दशकों के अब अप्राप्य पत्रिकाएं आधारित हैं।मेरे पास कुछ सौ अच्छी 

किताबों के अलावा ऐसे सैकड़ों विषयवार लिफाफे हैं जिनमें संबंधित विषयों की अखबारी कतरनें भरी पड़ी हैं।जिस विषय की 

कल्पना कीजिएगा ,उम्मीद है,उस विषय से संबंधित कटिंग यहां मिल जाएंगी।ऐसी कटिंग्स तैयार करने 

के लिए मैं दिल्ली और पटना के एक दर्जन अखबार खरीदता हूं।

यह सब अखबारी लेखन और अब पुस्तक लेखन में सहायक होते हैं।

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अपवादों को छोड़ दें तो मोदी सरकार इन दिनों एन.के.गौड़ा जैसे अनूठे काम करने

वालों को ही पद्म सम्मान से 

सम्मानित करती है।हां, अपवाद स्वरूप कुछ नेता भी राजनीतिक कारणों से पद्म सम्मान

पा रहे हैं। 

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यदि एन.के.गौड़ा साहब ओड़िशा के मूल निवासी होते तो उन्हें वहां की सरकार हर माह 

30 हजार रुपए मानदेय देती जिससे उन्हें 

अपने अनोखे लाइब्रेरी के रख-रखाव में सुविधा होती।वह सरकार तथा देश के तीन अन्य 

राज्य सरकारें अपने 

यहां के पद्म अवार्डियों को मासिक मानदेश देती है।

पर, याद रहे कि पदम् अवार्डीज को न तो भारत सरकार कोई मानदेय देती है और न ही चार राज्य सरकारों

 को छोड़ कर इस देश की कोई अन्य राज्य सरकार।

इसे विरोधाभास ही कहेंगे।मेरा मानना है कि या तो कोई सरकार मानदेय

 न दे या सारे राज्य सरकार दें।या, खुद केंद्र सरकार देना शुरू करे। 

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करीब दो दशक पहले प्रभाष जोशी और डा.नामवर सिंह मेरे पटना स्थित आवास पर आये थे।

मेरी लाइब्रेरी में तब सिर्फ 15 आलमारियां थीं।उनमें रखी सामग्री को देखकर प्रभाष जोशी ने कहा था 

कि ‘‘मेेरी जानकारी के अनुसार देश के किसी अन्य पत्रकार के पास इतनी संपन्न निजी लाइबे्ररी नहीं है।’’

डा.नामवर सिंह ने दिनमान (1965 से आखिरी अंक तक-बीच के कुछ अंक गायब हैं।)को देखकर कहा था-

‘‘सुरेंद्र जी,आपने तो हीरा संजो कर रखा है।’’

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अब तो आलमारियों की संख्या तीस हो चुकी है।बढ़ती ही जा रही हैं।

मेरे सामने समस्या है--मेरी निजी पक्की आय सिर्फ 1261 रुपए मासिक है--पीएफ.पेंशन।

बाकी अखबारों में लिखकर कमाता हूं।

गांव में खेती कराने जा रहा हूं।वहां से कुछ आय हो सकती है।

मेरी लाइब्रेरी को अपडेट करते जाने में समय,साधन और एकाग्रता की जरूरत रहती है।

मेरी उम्र भी बढ़ रही है।सहायक की जरूरत महसूस होती है।अपने लेखन के काम को भी 

जारी रखना है।वैसे मेरे बाद मेरे परिवार में एकाधिक सदस्य हंै जो इस लाइब्रेरी को ंसंभाल सकते हैं।

उनकी रूचि भी है और उनका पेशा भी इसके अनुकूल है।प्रतिभा भी है।

मेरी पहली पुस्तक की सफलता के बाद दूसरी किताब की तैयारी में लग गया हूं।

देखे आगे- आगे क्या होता है !

अल्ला जाने क्या होगा आगे ??

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अंत में एन.के. गौड़ा साहब को सलाम !

प्रभाकर मणि तिवारी और दैनिक भास्कर को धन्यवाद जिन्होंने ऐसी बहुमूल्य जानकारी दी।

पद्म श्री चयन समिति को भी धन्यवाद जिसने गौड़ा के रूप में एक और मोती 

चुन लिया है।

पर यदि गौड़ा इच्छा प्रकट करें तो उनके लिए कुछ आर्थिक साधन का भी प्रबंध करंे केंद्र व राज्य सरकारें।

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1 फरवरी 26   


 


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