Thursday, October 10, 2013

बड़े जतन किए,पर नहीं बच पाए बड़बोले लालू

   सी.बी.आइ. की कठोर जांच -प्रक्रिया और बाद में अदालती कार्रवाइयों से बचने के लिए लालू प्रसाद ने पिछले 17 वर्षों में बहुत हाथ -पांव मारे। कभी किसी को धमकाया तो कभी प्रलोभन दिया। कभी किसी से पैरवी की और करवाई तो कभी  दबाव डलवाया।

  केस से बचने के लिए कभी अपने आवास पर महीनों तक विघ्ननाशक यज्ञ करवाया तो साथ ही देश के मशहूर तीर्थ स्थलों व सिद्ध शक्तिपीठों की अनेक यात्राएं कीं। लालू प्रसाद इस केस के सिलसिले में जब भी अदालत में जाते थे, उससे पहले पूजा पाठ करते थे, मछली के दर्शन करते थे। दही खाकर निकलते थे। इस बार भी रांची अदालत जाने से पहले उन्होंने वह सब किया और साथ ही अपनी प्रिय गाय के भी दर्शन किये।
    पर उनका कोई उपाय काम नहीं आया। अंततः अदालत ने उन्हें दोषी ठहरा ही दिया।

  आज की अपनी स्थिति के लिए खुद लालू प्रसाद ही जिम्मेवार हैं। सन 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू प्रसाद सार्वजनिक रूप से कहा करते थे कि ‘मैं खुद ही कानून बनाता हूं और तोड़ता हूं।’

 उनकी यही प्रवृति हाल तक भी सामने आती रहती थी। मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने जब कोई आपराधिक मामला आता है तो वह अक्सर यह कह दिया करते हैं कि ‘कानून अपना काम करेगा।’

 इसके जवाब में नीतीश का मजाक उड़ाते हुए लालू प्रसाद ने कई बार सार्वजनिक रुप से कहा कि ‘जब कानून ही अपना काम करेगा तो आप किस काम के मुख्यमंत्री बने हुए है ?’

यानी लालू प्रसाद जब मुख्यमंत्री थे तो वे खुद को सदा कानून से ऊपर समझते थे। उनके कई काम भी वैसे ही होते थे। उन्हीं कामों में यह चारा घोटाला भी शामिल है। पर अंत में कानून के गिरफ्त में वे आ ही गये।

  मंडल आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुए 1991 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद को बिहार की गरीब व पिछड़ी जनता ने अभूतपूर्व जन समर्थन दिया था। पर उन्होंने लगातार उस समर्थन का दुरुपयोग ही किया।

  एक बात का उल्लेख यहां विशेष तौर पर जरुरी है। यदि चारा घोटाले की जांच प्रक्रिया पर पटना हाईकोर्ट की निगरानी नहीं होती तो इस केस को तार्किक परिणति तक पहुंचाना संभव नहीं होता। क्योंकि चारा घोटाला न सिर्फ सर्वदलीय बल्कि सर्वपक्षीय भ्रष्टाचार का नमूना है। डा.यू.एन.विश्वास जैसे ईमानदार और निडर सी.बी.आइ. अफसर इस घोटाले की जांच टीम के अगुआ नहीं होते तो भी यह नतीजा शायद सामने नहीं आता क्योंकि राजनीति से जुड़े चारा घोटालेबाज लोग  कभी केंद्र और राज्य सरकार प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से चलाते थे।

चारा घोटालेबाजों ने रिश्वत के बल पर मीडिया के एक हिस्से सहित इस लोकतांत्रिक देश के सिस्टम के लगभग सारे अंगों के संबंधित लोगों को खरीद रखा था। सी.बी.आइ. जांच का आदेश देते हुए पटना हाईकोर्ट ने 1996 में ही कह दिया था कि उच्चस्तरीय साजिश के बिना इतना बड़ा घोटाला संभव ही नहीं था।

      1996 में जब सी.बी.आइ. ने लालू प्रसाद पर शिकंजा कसना शुरु किया तो लालू प्रसाद ने उससे बचने के लिए बहुत हाथ पैर मारे। तब लालू प्रसाद बिहार की राजनीति के महाबली नेता और मुख्यमंत्री थे। खुद को कानून की गिरफ्त से बचाने के लिए किसी की चिरौरी की और किसी की भावना उभारने की कोशिश की तो किसी को बुरी तरह धमकाया। उनके कई उदंड समर्थकों ने तो इस दिशा में  हद ही कर दी।

    कमल पासवान उन दिनों लालू प्रसाद के दल के प्रादेशिक अध्यक्ष थे। उन्होंने 29 सितंबर 1996 को सार्वजनिक रुप से यह धमकी दी कि ‘यदि लालू प्रसाद के चरित्र हनन की कार्रवाई की गई तो देश में खूनी क्रांति होगी और धरती लाल कर दी जाएगी।’

पासवान ने यह भी कहा कि जो लोग यह समझते हैं कि मैं सी.बी.आइ. को धमकाने के लिए ऐसा बयान दे रहा हूं तो वे भ्रम में हैं। हमें सी.बी.आइ. पर पूरा विश्वास है। पर जांच कार्य आगे बढ़ा तो लालू समर्थकों का सी.बी.आइ. पर से विश्वास उठ गया। 1997 में एक दिन पटना के व्यस्त डाक बंगला चौराहे पर आम लोग यह देख कर हैरान रह गये कि लालू समर्थक प्रमुख नेतागण एक नंग धड़ंग बच्चे से जमीन पर पड़े दो पुतलों पर सरेआम पेशाब करवा रहे हैं और बगल खड़े वे लोग हंस रहे हैं। वे पुतले सी.बी.आइ. के जांच अधिकारी डा. यू.एन. विश्वास और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी केे थे।

   बाद में पुतलों को जला दिया गया। एक अन्य अवसर पर लालू प्रसाद के दल के नेताओं ने पटना राज भवन के सामने यू.एन. विश्वास के पुतले को जलाने से पहले तलवार से काटा। ऐसा करके उन लोगों ने सी.बी.आइ. के कर्त्तव्यनिष्ठ अफसर डा. विश्वास को आतंकित करने की कोशिश की।

  इतना नहीं। लालू प्रसाद ने पता लगा लिया कि डा. विश्वास, जो जांच कार्य में घोटालेबाजों के साथ कोई रहम करने को तैयार नहीं थे, दरअसल बौद्ध हैं। उन्होंने यह भी पता लगा लिया कि उन्होंने किस बौद्ध गुरु से दीक्षा ली है। वह बौद्ध गुरु थे राष्ट्रपाल महाथेरो। लालू प्रसाद ने यू.एन. विश्वास पर प्रभाव डालने के उद्देश्य से बोधगया स्थित उस बौद्ध गुरु राष्ट्रपाल महाथेरो को 1996 के अक्तूबर में फोन किया।

मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने उनसे कहा कि ‘भंते जी, आपके चेला ने हमें झूठमूठ बोल कर फंसा दिया है। प्लीज आप जल्दी कुछ कीजिए। मैं अभी बहुत दिक्कत में हूं।’

   पर राष्ट्रपाल महाथेरो ने मुख्यमंत्री से साफ -साफ कह दिया कि डा. विश्वास की जो गतिविधियां धर्म से संबंधित नहीं हैं, उनसे मेरा कोई सरोकार नहीं है। इस जवाब से लालू प्रसाद को झटका लगा था।

   उसके बाद लालू ने दूसरा रास्ता अपनाया। तब जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद ही थे। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौडा को 10 जनवरी 1997 को पत्र लिखा। याद रहे कि देवगौडा़ भी जनता दल में ही थे। लालू ने लिखा कि वे डा. यू.एन. विश्वास को चारा घोटाले के जांच कार्य से हटा दें। याद रहे कि डा.विश्वास सी.बी.आइ. के पूर्वी क्षेत्र के संयुक्त निदेशक की हैसियत से चारा घोटाले की जांच कार्य को निदेशित कर रहे थे। विश्वास को पटना हाईकोर्ट ने कह रखा था कि आपको जांच कार्य में कोई कठिनाई हो तो हमें सूचित करें।

   31 जनवरी 1997 को पटना के कदमकुआं से गांधी मैदान तक लालू समर्थकों ने सोंटा मार्च /यानी लाठी मार्च/ निकाला। मार्च में शामिल जद कार्यकर्ता उत्तेजक नारे लगा रहे थे। प्रतिपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि सोंटा मार्च सी.बी.आइ. तथा उन लोगों को आतंकित करने के लिए निकाला गया था जिनकी जनहित याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने जांच का भार सी.बी.आइ. को सौंपा था।

   2 मई 1997 को अपने आवास पर प्रेस कांफ्रेंस में लालू प्रसाद ने यहां तक कह दिया कि सी.बी.आइ. अमेरीकी खुफिया एजेंसी सी.आइ.ए. की तरह है। सी.बी.आइ.यहां के राजनेताओं की हत्या भी करवा सकती है। अपने समर्थकों की भावना उभारने की लालू प्रसाद की यह एक और कोशिश थी।

    18 मई 1997 को पटना के मिलर स्कूल के मैदान में आयोजित एक समारोह में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने कहा कि राज रहता है तो चेहरे पर मुस्कराहट रहती है। जिस दिन हमारा राज चला जाएगा, उस दिन गरीबों को पता चल जाएगा। उस दिन गरीबों पर सामंती शक्तियां कहर ढाहेंगीं। इसलिए राज को बचाने के लिए दलितों, पिछड़ों और गरीबों को खुद ही आगे आना होगा।

   मीडिया पर जम कर बरसते हुए लालू प्रसाद ने कहा कि सारा अखबार पूंजीपतियों का है। वे लोग पिछले डेढ़ साल से मेरे खिलाफ अभियान चला रहे हैं।

इस लेख का संपादित अंश जनसत्ता के 1 अक्तूबर 2013 के अंक में प्रकाशित/

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