Wednesday, May 25, 2016

जंगल राज नहीं, उसकी आहट

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और बिहार में अपनी जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाये रखने की कोशिश कर रहे हैं। नशाबंदी से मिली लोकप्रियता को राष्ट्रीय स्तर पर भंजाने की कोशिश में हैं। यह प्रयास स्वाभाविक ही है। सचमुच नशाबंदी में देर-सवेर देशव्यापी मुद्दा बन जाने की संभावना है।
पर, बिहार में इन दिनों घट रही दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को लेकर राज्य में नीतीश कुमार की उपस्थिति की अधिक जरूरत महसूस की जा रही है। इन घटनाओं के कारण सुशासन और विकास के क्षेत्रों में उनकी पिछली उपलब्धियांें के मद्धिम पड़ने की आशंका है।

 नीतीश कुमार ने गत साल 20 नवंबर को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। इस छह माह में राज्य में सब कुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है। प्रतिपक्ष और विघ्नसंतोषी इसे ‘जंगल राज’ करार दे रहे हैं। इनमें से कुछ लोग तो इसे महाजंगल राज की उपमा भी दे रहे हैं।

 पर जिन लोगों ने 1990-2005 का ‘जंगल राज’ देखा और भुगता है, वे इन उपमाओं से सहमत नहीं हैं। दरअसल आज के कई नेतागण इमरजेंसी और जंगल राज की उपमा देने में जरा जल्दीबाजी कर देते हैं।
 बिहार में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वह जंगल राज तो नहीं है, पर जंगल राज की आहट जरूर है।
नब्बे के दशक में जो कुछ हो रहा था, उसको लेकर पटना हाईकोर्ट ने कई बार कहा था कि ‘बिहार में जंगल राज है।’ अदालत ने तो एक बार यह भी कहा था कि ‘जंगल राज के भी कुछ नियम होते हैं, पर बिहार में वह भी नहीं है।’

 नीतीश कुमार के शासनकाल में अदालत ने संभवतः अब तक ऐसा कुछ नहीं कहा है।

 इसका कारण यह है कि अपवादों को छोड़ दें तो नीतीश ने अपने पूरे कार्यकाल में इस वायदे का पालन किया है कि ‘हमारी सरकार न तो किसी को बचाएगी और न ही फंसाएगी।’

 हाल की जघन्य घटनाओं को लेकर भी शासन कमोवेश यही कर रहा है।

 बिहार में सबसे बड़ा सकारात्मक फर्क यह आया है कि लालू प्रसाद ने कानून-व्यवस्था के मामले में अपना रुख बदल लिया है। नब्बे के दशक में लालू प्रसाद राजनीति में सक्रिय अपराधियों के बारे में भी कहा करते थे कि ‘जिसे जनता ने जिता दिया, वह अपराधी कैसा ?’ उनका दल अपराध की घटनाओं को सामाजिक उथल-पुथल से भी जोड़कर उसे उचित ठहराता था।

पर, अब कानून-व्यवस्था लागू करने में लालू प्रसाद, नीतीश कुमार को पूरा समर्थन देने की लगातार घोषणा कर रहे हैं। एक तो उन्होंने अपनी पिछली गलतियों से सीखा है।साथ ही  उन्होंने यह बात भी समझ ली है कि उनके पुत्रों का राजनीतिक कैरियर तभी निखरेगा जब वे नीतीश कुमार के सुशासन-विकास की लाइन पर काम करेंगे।

वैसे भी लालू प्रसाद की संतानों ने लालू की शैली नहीं सीखी है। खुद लालू समझ रहे हैं कि उनकी शैली में अब राजनीति हो भी नहीं सकती। राजनीति तो होगी, पर उस शैली के बल पर सत्ता नहीं मिल सकती।

राजद के नीतीश कुमार की सरकार में शामिल होने के तत्काल बाद ही सार्वजनिक रूप से लालू प्रसाद ने यह कह दिया था कि ‘राज्य में कानून -व्यवस्था लागू करने में राजद नीतीश कुमार को पूरा साथ देगा। कोई यह नहीं समझे कि वह किसी खास जाति का होने के कारण अपराध करके बच जाएगा।’

 उनका ऐसा रुख नब्बे के दशक में नहीं था। इसीलिए उसे जंगलराज कहा गया। पर एक चिंताजनक बात यह है कि लालू प्रसाद की अपील के बावजूद राजनीति के भीतर और बाहर के कुछ अपराधी उनकी बात नहीं सुन रहे हैं। लालू प्रसाद ने एक बार कहा था कि वे राज्य भर में घुम कर लोगों को समझाएंगे। पर अभी इसके लिए उन्हें समय नहीं मिला है। यह काम वे जितनी जल्दी कर लें, उतना ही अच्छा होगा।

क्योंकि कई बार सख्त-सटीक पुलिसिया कार्रवाइयों के बावजूद कुछ नेता-सह -अपराधी बार-बार जघन्य घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।

 क्योंकि उनमें गवाहों को खरीदने, धमकाने और अभियोजन पक्ष को प्रभावित करने की अपार शक्ति है। इस समस्या से राज्य सरकार कैसे निपटेगी, सब काम छोड़कर इस मुद्दे पर नीतीश कुमार को विचार करने की अधिक जरूरत है।

 सुशासन व विकास के क्षेत्र में मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार की बिहार में जितनी बड़ी उपलब्धियां हंै, उसमें कोई भी नेता अपने लिए अपेक्षाकृत बड़ी राजनीतिक स्पेस चाहेगा। दशकों से विकसित गुजरात में कुछ बेहतर काम कर लेना किसी नेता के लिए आसान है। क्योंकि वहां कुल मिलाकर सिस्टम काम करता है। पर, बिहार जैसे बिगड़े शासन व उससे भी अधिक बिगड़ी राजनीति वाले बीहड़ प्रदेश को पटरी पर ला देना मुश्किल काम माना जाता था। वह मुश्किल काम भी नीतीश ने कर दिखाया।

पर गत छह महीने से जो कुछ हो रहा है, वह नीतीश के राजनीतिक भविष्य के लिए भी सुखदायी नहीं होगा। क्या प्रतिपक्षी दलों की यह भविष्यवाणी अंततः सही साबित होगी कि जिस सरकार में राजद रहेगा, वह सरकार न तो विकास कर सकती है और न ही सुशासन ? हालांकि इस बीच जदयू के कुछ नेताओं के भी घृणित कारनामे सामने आते रहते हैं। हां, उनके खिलाफ भी राजनीतिक और प्रशासनिक कार्रवाइयां करने में नीतीश ने देरी नहीं की।

  यह सच है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में हाल में अपराध घटे हैं। पर चिंताजनक बात यह है कि अपराध की घटनाओं में सत्ताधारी दलों से जुड़े नेताओं और विधायकों के हाथ भी रहे हैं। जब सत्ता के लोग ही अपराध करने लगें तो लोगबाग अधिक भयभीत हो जाते हैं भले सामान्य अपराध का आंकड़ा नीचे गिर रहा हो।

 यानी धारणा और आंकड़ा अलग-अलग हैं।

 राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार नीतीश कुमार जैसे संयमी और ईमानदार नेता के लिए यह चिंता की बात होनी चाहिए। उन्हें अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को थोड़े समय के लिए भुलाकर बिहार को किसी भी कीमत पर फिर वैसा ही शासन देना चाहिए जैसा शासन उन्होंने जून, 2013 से पहले दिया था जब भाजपा उनकी सरकार में थी।

  जदयू के राष्ट्रीय महासचिव के.सी. त्यागी ने ठीक ही कहा है कि नीतीश कुमार में प्रधानमंत्री बनने के सारे गुण हैं। पर राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार जदयू जैसे एक छोटे दल के अच्छे नेता को भी उनकी अच्छाइयों को देखकर इस देश के अन्य दल प्रधानमंत्री बना देंगे, ऐसी अच्छी राजनीति इस देश में अभी नहीं है।
 इस देश के छोटे दलों के कुछ नेता झटके में या गठबंधन की मजबूरी के तहत प्रधानमंत्री बने हैं। पर वह अवसर भिन्न परिस्थितियों में आया था। अभी तो 2019 के चुनाव में देर है।

 वी.पी. सिंह तो प्रधानमंत्री बनने से पहले ही कई गैर कांगेेसी दलों के समूह के नेता बन चुके थे। यहां तो सहयोगी राजद भी नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री बनाना दिल से चाहता है या नहीं, यह भी एक बड़ा सवाल है। हालांकि लालू प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से यह कह दिया है कि नीतीश प्रधानमंत्री बनें तो यह अच्छा होगा। सन 2019 में नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं इस बारे में अभी कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है।
पर संस्कृत के एक श्लोक को नीतीश कुमार को याद रख लेना चाहिए। उसका अर्थ है -जो ध्रुव को छोड़कर अध्रुव की ओर जाता है, उसका ध्रुव भी चला जाता है। अध्रुव तो अधु्रव है ही।

    आज नीतीश कुमार ने नशाबंदी को जो मुद्दा उठाया है, वह बोफर्स मुद्दे से कम महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि अधिक है। याद रहे कि उन्होंने बिहार मेंं नशाबंदी की शुरुआत भी कर दी है। पर इसको लेकर गैर भाजपा राजनीतिक दलों में आम सहमति बननी अभी बाकी है।

उस आम सहमति की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इससे पहले बिहार को फिर से पटरी पर लाने के लिए नीतीश कुमार को एक बार फिर जी-जान लगा देनी चाहिए। इस काम में उन्हें लालू प्रसाद के दल के भरपूर सहयोग की जरूरत होगी।

 कोई सफल मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री बनना चाहता है तो इसमें किसी को कोई एतराज भी नहीं होना चाहिए। वैसे भी कई लोग यह मानते हैं कि बिहार के विकास के लिए यह जरूरी है कि इस राज्य से कोई प्रधानमंत्री बने।
लंबे समय से बिहार का शासन-संचालन के दौरान नीतीश ने भी यह अनुभव किया है कि केंद्र सरकार से भरपूर आर्थिक मदद मिले बिना बिहार को विकसित राज्य बनाया ही नहीं जा सकता है। यदि सिर्फ लंबे समय तक वह मुख्यमंत्री बने भी रहें और इसका अर्थाभाव में विकास नहीं कर सकें तो फिर कुछ साल के बाद उनकी पिछली उपलब्धियां भी फीकी पड़ जाएंगी। यदि इसलिए वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो बात समझ में आती है। पर अभी तो बिहार में ही उनका काम अधूरा है।

   (इस लेख का संपादित अंश 18 मई 2016 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)
     


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