Friday, June 30, 2017

इमरजेंसी के बहाने नागार्जुन के बारे में कुछ खट्टी-मीठी बातें

एक व्यक्ति ने एक जगह हाल में लिखा कि नागार्जुन ने ‘इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आपको’ वाली चर्चित कविता इमरजेंसी में ही लिखी थी। शायद वह यह कहना चाहते थे कि इमरजेंसी में भी प्रधानमंत्री की आलोचना करने की छूट थी।

इमरजेंसी और नागार्जुन को इतना कम जानने वाले लोग भी इस बार आपातकाल पर हुई चर्चाओं में शामिल हो गए।

याद रहे कि 25 जून 1975 की रात में इस देश में इमरजेंसी लगी थी। 25 जून को हर साल इमरजेंसी पर कुछ चर्चाएं होती हैं। कुछ लेख अखबारों में छपते हैं। संयोग से 30 जून बाबा नागार्जुन का जन्मदिन भी है। पर इस बीच के दशकों में इमरजेंसी लगाने वाली पार्टी और इमरजेंसी भुगतने वाले दल सत्ता के लिए आपस में मिलते-बिछुड़ते रहे। इसलिए नयी पीढि़यां इमरजेंसी के असली स्वरूप से पूरी तरह अवगत नहीं हो सकी। उनमें से अधिकतर लोगों के पास इस संबंध में जानकारी अधकचरी है या एकतरफा है। दरअसल उन्हें बताने वालों की ही कमी पड़ गयी।

अब नागार्जुन की उस चर्चित कविता के बारे में कुछ बातें।
नागार्जुन की कविता की कुछ पंक्तियां यूं हैं --
इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको ?
सत्ता की मस्ती में भूल गयीं बाप को !
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को।

इमरजेंसी में पुलिस किसी को ऐसी कविता गुनगुनाते हुए भी देख लेती तो उसकी जगह जेल होती। दरअसल यह कविता इमरजेंसी से पहली लिखी गयी थी। जेपी आंदोलन के दौरान की जनसभाओं और नुक्कड़ सभाओं में बाबा इस कविता का भी अक्सर पाठ करते थे। बल्कि यह कविता इमरजेंसी से पहले ही पटना के एक दैनिक अखबार में छप भी चुकी थी। 



फर्नांडिस ने किया था कविता पर मीठा एतराज़

1974 के जेपी आंदोलन के दौरान वैशाली जिले के महनार मेंं जनसभा हो रही थी। मुख्य वक्ता जार्ज फर्नांडिस थे। ऐसी सभाओं के लिए नागार्जुन की तब बड़ी मांग थी। स्वाभाविक था कि वहां बाबा भी थे। एक रिपोर्टर के रूप में मैं भी था।

पहले बाबा ने मंच से अपनी यह मशहूर कविता पढ़ी। खूब तालियां बजीं। पर जब बोलने के लिए जार्ज खड़े हुए तो बाबा की इस कविता से ही अपनी बात शुरू की। जार्ज ने कहा कि ‘इंदु जी इंदु क्या हुआ आपको और भूल गयीं बाप को’, यह लाइन सही नहीं है। दरअसल इनके बाप भी ऐसे ही थे। हालांकि श्रोताओं में जार्ज की इस बात की ग्राह्यता उतनी नहीं थी जितनी बाबा की उस कविता की। खैर यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि बाबा जेपी आंदोलन में थे। जेपी उनका बड़ा ख्याल रखते थे।

उस दौरान बाबा जेल भी गए। आंदोलन पर पुलिस दमन के विरोध स्वरूप बाबा ने  बिहार सरकार से मिल रही मासिक पेंशन को भी लेने से मना कर दिया था। हालांकि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। पेंशन मना करने वालों में रेणु भी थे। 4 नवंबर 1974 को जब पटना में जेपी पर पुलिस ने लाठी चलाई तो उसके विरोध में फणीश्वरनाथ रेणु ने तो पद्मश्री लौटा दी थी।

खैर बाबा का बाद के दिनों में जेपी आंदोलन से मन उचट गया था। दरअसल आंदोलन में शामिल कुछ अनुशासनहीन छात्रों से बाबा अधिक दुःखी थे। ऐसे उदंड आंदोलनकारियों से बाबा का बक्सर जेल में पाला पड़ गय़ा था। कुछ अन्य बातें भी रही होंगी।

बाद में उन्होंने आंदोलन से अलग होकर उस जेपी आंदोलन के खिलाफ भी एक जोरदार कविता लिख दी थी। जेपी आंदोलन में शामिल कुछ लोगों ने बाद के दशकों में जैसे-जैसे गुल खिलाए, उनपर बाबा की वह कविता सटीक बैठती है।

हालांकि सारे आंदोलनकारी वैसे ही नहीं साबित हुए।



जरा ढंग से हो पैथ लैब की जांच

एक अच्छी खबर है। पटना हाईकोर्ट के आदेश पर राज्य सरकार पैथ लैब की जांच कर रही है। कई फर्जी पाए गए। फर्जी लैब और फर्जी पैथोलाॅजिकल जांच से अनेक मरीजों का बड़ा नुकसान हो जाता है। कई मामलों में ऐसा नुकसान जिसकी कभी भरपाई नहीं हो पाती।

सवाल है यह कि जांच सिर्फ पंजीयन और तकनीकी स्टाफ की मौजूदगी की ही हो रही है या पैथोलाॅजिकल जांच की गुणवत्ता की भी जांच हो रही है ?

एक सलाह है। जो लोग इस जांच के काम में लगे हैं, वे नमूना के तौर पर एक व्यक्ति के खून के तीन नमूनों की जांच तीन लेबोरेटरी में करवा कर देखें। यदि जांच रिजल्ट समान आता है तो खुशी की बात है। यदि नहीं तो सरकार उस मर्ज का भी स्थायी इलाज करे। तभी मरीजों का पूरा कल्याण हो पाएगा।



पैरवीकारों के प्रकाशित हों नाम 

जो व्यक्ति सरकारी जमीन बेचने के आरोप में पहले ही जेल जा चुका हो, उसकी पटना में डी.सी.एल.आर के पद पर तैनाती हैरान करती है। पर जहां जिसके पैरवीकार ताकतवर लोग हों, वहां कुछ भी असंभव नहीं। अभी फरार डी.सी.एल.आर. मिथिलेश कुमार सिंह पर पटना के कंकड़बाग पावर सब स्टेशन की जमीन गैर कानूनी तरीके से बेचने का आरोप है। जाहिर है कि जमीन करोड़ों की है।

इससे पहले के वर्षों में भी मिथिलेश कुमार सिंह पर आरोप लगते रहे। पर उसके बावजूद वह महत्वपूर्ण जगहों पर पोस्टिंग पाते रहे। ऐसा उच्चस्तरीय पैरवी से ही संभव है। ऐसी पैरवी में नेता, बड़े अफसर और रिश्वत कारगर होते हैं। कुछ मामलों में तो तीनों एक साथ। यदि मिथिलेश को इस केस में अंततः अदालत से सजा हो जाती है तो राज्य सरकार को चाहिए कि वह उनके पैरवीकारों के नाम राज्य के मंत्रियों और अफसरों में वितरित करा दे ताकि अब से उनकी जायज पैरवी पर भी कोई मंत्री-अफसर ध्यान नहीं दे। अन्य मामलों में भी ऐसा ही हो। भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए यह कारगर तरीका बन सकता है। 



ऐसे संभव है किन्नरों की मदद

 किन्नरों के सामने भी बेरोजगारी की समस्या है। इनका उपयोग कर्ज और बकाया वसूली के काम में हो सकता है। देश भर में बैंक और नगर निकाय के समक्ष बकाया और टैक्स वसूली की समस्या मुंह बाए खड़ी रहती हैं।
 2006 में पटना नगर निगम ने किन्नरों को वसूली के काम में लगा कर ऐसा प्रयोग किया भी था। उन्हें कमीशन मिलता था। वसूली के काम में कुछ सफलता भी मिली थी। पर पता नहीं, उसे क्यों बंद कर दिया गया!

किन्नर गाना-बजाना करके कुछ ही देर में बकायएदारों के यहां से आसानी से पैसे वसूल लेते हैं। कल्पना कीजिए कि जो बैंकों के कर्ज की किश्तें जान बूझकर नहीं दे रहा है। उसके दरवाजे पर पुलिस की सुरक्षा में रोज दस-पांच किन्नर पहुंच जाएं। वे रोज तीन -चार घंटे उसके घर के सामने अपना कार्यक्रम चलाएं। उनसे कर्ज लौटाने की गुजारिश करे। फिर क्या होगा ? अधिकतर मामलों में तीन चार दिनों में ही पैसे निकलने लगेंगे। 


और अंत में

महागठबंधन के आंतरिक विवाद को लेकर जिस तरह की टिप्पणी की प्रतीक्षा थी, अंततः वह भी आ ही गयी। एक बड़े नेता ने कहा कि कोई मतभेद नहीं है। सब मीडिया की साजिश है। ऐसी टिप्पणी चुनाव के दिनों में अधिक सुनने को मिलती है।

जब कोई पार्टी चुनाव जीतती है, तब तो वह कहती है कि ऐसा हमारे पुण्य प्रताप से हुआ। पर जब हारती है तो कह देती है कि मीडिया ने कुप्रचार करके हरवा दिया। मीडिया के लोगों को ऐसी बातें सुनने की आदत सी पड़ गयी है। 

वैसे अच्छा हुआ कि महागठबंधन का झगड़ा सुलझ गया। उम्मीद है कि उसकी सरकार विकास और सुशासन के काम में नए उत्साह के साथ लग जाएगी।

(प्रभात खबर पटना में 30 जून 2017 को प्रकाशित )

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